सवाल मैं और मेरी गर्लफ्रैंड विवाह करना चाहते हैं. घर वाले राजी नहीं हैं. क्या हमें घरवालों की रजामंदी के बगैर विवाह कर लेना चाहिए?
जवाब
आप दोनों अगर बालिग हैं और अपने पैरों पर खड़े हैं तो घर वाले आप दोनों के विवाह के लिए क्यों राजी नहीं हैं? क्या आप का मामला अंतर्जातीय विवाह का है? अगर आप दोनों बालिग हैं, अपने पैरों पर खड़े हैं, एकदूसरे को अच्छी तरह जानते व समझते हैं और लगता है कि एकदूसरे के साथ खुशहाल जिंदगी गुजार सकते हैं, तो विवाह कर लें. पर ध्यान रहे, आगे चल कर कोई भी समस्या हुई तो आप दोनों ही उस के लिए जिम्मेदार होंगे. प्यार में बड़ा दम होता है, वह बहुत सी समस्याओं का हल खुद है लेकिन जमीनी समस्याओं का. पर शारीरिक आकर्षण कहीं विवाह बाद फीका न पड़ जाए, यह आशंका रहती है. इसलिए आप ऐसा न होने दें.
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दिल्ली सरकार ने हौलीवुड स्टार पियर्स ब्रौसनन को तंबाकू के विज्ञापन के आरोप में नोटिस जारी कर दिया है. दिल्ली सरकार की तंबाकू नियंत्रण सेल ने फिल्म जेम्स बौन्ड के अभिनेता को यह नोटिस जारी किया है. तंबाकू नियंत्रण सेल का कहना है कि एक भारतीय ब्रांड पान मसाला बेचने की आड़ में तंबाकू का विज्ञापन कर रही है. पियर्स को सिगरेट व अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (कोटपा) के सेक्शन पांच के तहत नोटिस जारी किया गया है. पियर्स ने ब्रांड के लिए सरोगेट विज्ञापन किया था.
इस तरह के विज्ञापनों में मूल वस्तु को न दिखाकर उससे जुड़ी चीजों को दिखाया जाता है जिससे ग्राहक दिमाग में वही चीज आए लेकिन विज्ञापनदाता उसका नाम नहीं ले. सेल ने पियर्स ने 10 दिन के भीतर इस पर जवाब मांगा है.
एक खबर के मुताबिक सेल के प्रभारी डा. अरोड़ा ने बताया- उन्हें पहले भी नोटिस किया गया था और उन्होंने विज्ञापन बंद कर दिया था लेकिन फिर दोबारा उन्हें ऐसा करते देखा गया. दुकानों पर उनके पोस्टर लगाए गए हैं और सेल ने कई जगहों से पोस्टर हटवाए हैं.
उन्होंने बताया कि पान मसाला में सुपारी का इस्तेमाल किया जाता है और इससे कैंसर का खतरा रहता है. अरोड़ा ने बताया कि जिस उत्पाद का विज्ञापन करते पियर्स को दिखाया गया है उसी नाम से कंपनी का तंबाकू उत्पाद भी आता है.
गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली सरकार ने इसी तरह के एक मामले में बौलीवुड स्टार अजय देवगन को नोटिस जारी किया था. सरकार ने यह निर्देश भी दिया था कि बौलीवुड के कलाकार इस तरह के उत्पादों का विज्ञापन करने से बचें.
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बौलीवुड अभिनेत्री मेघना नायडू तकरीबन 10 साल बाद बंगाली फिल्म से फिल्मी पर्दे पर वापसी करने जा रही हैं. अपनी आने वाली बंगाली फिल्म ‘सितारा’ में मेघना एक सेक्स वर्कर का किरदार निभाती नजर आएंगी. अपने रोल के बारे में मेघना ने एक इंटरव्यू में कहा कि फिल्म की कहानी उस दौर की है जब भारत और बांग्लादेश से चीजों की तस्करी हुआ करती थी. अपने किरदार के बारें में बात करते हुए उन्होंने कहा कि उनके रोल का नाम लोखोन्ना होगा, जो कि एक सेक्स वर्कर है और भारत-बांग्लादेश से सामानों की तस्करी में मदद करती है. यह फिल्म वेश्यावृति से जुड़ी हुई है.
मेघना ने कहा कि बांग्ला बहुत प्यारी भाषा है लेकिन इसे बोलना जरा मुश्किल है. यह फिल्म अपने आप में एक खास अनुभव होगी. मैं फिल्म में रमिया सेन, एम. नस्सार और जाहिद हसन के साथ काम करूंगी. उन्होंने कहा कि मैंने एक डांसर और परफौर्मर के तौर पर काम करने को खूब इंज्वाय किया है. मैंने इस साल की शुरुआत परिवार और दोस्तों के साथ वक्त बिताने से की है. पिछले 15 साल में पहली बार यह हुआ है कि मैंने नए साल पर कोई शो नहीं किया है.
बता दें कि मेघना ने बौलीवुड में कई आइटम सौन्ग किए हैं. वह कुछ बी-ग्रेड फिल्मों में भी काम कर चुकी हैं. मेघना ने साउथ की फिल्मों में भी काम किया है. मेघना इससे पहले 2004 की बंगाली फिल्म ‘कुली’ में दिखी थीं. मेघना को वीडियो सौन्ग ‘कलियों का चमन’ से पौपुलैरिटी मिली थी. उन्होंने ‘हवस’ फिल्म से बौलीवुड में डेब्यू किया था. लेकिन वह बौलीवुड में अपने पैर जमाने में नाकामयाब रहीं. फिर उन्होंने साउथ की फिल्मों का रुख किया.
मेघना फिल्मों के अलावा टीवी रियलिटी शो में भी नजर आई हैं. वह फीयर फैक्टर, खतरों के खिलाड़ी, डांसिंग क्वीन में पार्टिसिपेट भी कर चुकी हैं. साथ ही उन्होंने टीवी शो जोधा अकबर, अदालत और ससुराल सिमर का में काम किया है.
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बौलीवुड एक्टर सिद्धार्थ मल्होत्रा एक्ट्रेस रकुल प्रीत और मनोज बाजपेयी की फिल्म ‘अय्यारी’ 16 फरवरी को सिनेमा घरों में रिलीज हुई. फिल्म की स्टार कास्ट प्रमोशन के लिए दिल्ली पहुंची थीं. इस मौके पर सिद्धार्थ और रकुल ने एसआरसीसी कौलेज में स्टूडेंट्स के साथ काफी मस्ती की.
इस दौरान दोनों ने अपने चाहने वालों के खास डिमांड पर रोमांटिक डांस भी किया. जिसके बाद दोनों का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.
बता दें, फिल्म की टीम ‘अय्यारी’ के प्रमोशन के लिए एसआरसीसी कौलेज पहुंची थी. इस दौरान फैन्स के कहने पर सिद्धार्थ और रकुल ने अपनी फिल्म के गाने ले डूबा पर परफौर्म किया था. इस दौरान दोनों के बीच अच्छा ताल मेल नजर आया. दोनों को डांस करता देख फैन्स ने भी उन्हें काफी चियर किया. यहां देखें दोनों का वीडियो.
बता दें, अय्यारी का गाना ‘ले डूबा’ सिद्धार्थ और रकुल पर फिल्माया गया है और इस गानें को काफी पसंद किया जा रहा है. वहीं अगर फिल्म के रिव्यू की बात करें तो फिल्म में सिद्धार्थ और मनोज की एक्टिंग की सरहाना की गई है लेकिन फिल्म की कहानी को कन्फ्यूजिंग बताया गया है. अय्यारी का बजट लगभग 65 करोड़ का है और पहले इस फिल्म को 25 जनवरी को रिलीज किया जाना था लेकिन बाद में फिल्म की रिलीज को पद्मावत की वजह से बदल दिया गया था और आखिरकार यह फिल्म 16 फरवरी को रिलीज हुई.
भारतीय टेलीविजन और फिल्म इंडस्ट्री की जानी-मानी शख्सियत एकता कपूर ने कास्टिंग काउच पर एक सनसनीखेज खुलासा किया है. एकता का कहना है कि अगर प्रोड्यूसर्स अपनी पावर का इस्तेमाल शोषण करने में करते हैं, तो कलाकार भी कई बार काम और मौका पाने के लिए अपना शोषण करवाने के लिए तैयार रहते हैं.
इस बात का खुलासा हाल ही में एक इवेंट में पहुंचीं एकता कपूर ने किया. जब एकता से पूछा गया कि क्या बौलीवुड में भी कोई हार्वे विंस्टीन है, तो उन्होंने कहा कि बौलीवुड में भी हार्वे विंस्टीन हैं, लेकिन ऐसे मामले में दूसरी तरफ वाले हार्वे विंस्टीन के बारे में लोग बात नहीं करते हैं. इससे उनका इशारा उन कलाकारों की तरफ था, जो अपने शोषण का मौका देते हैं.
एकता कपूर ने कहा, इस ग्लैमर की दुनिया में बहुत से प्रोड्यूसर्स हैं जो अपने पौजिशन का फायदा उठाते हैं और काम देने के नाम पर यौन शोषण करते हैं लेकिन ऐसे कलाकारों की भी कमी नहीं है जो काम पाने के लिए प्रोड्यूसर्स के साथ सेक्शुअल रिलेशनशिप बनाते हैं. कहानी के दो पहलू होते हैं लेकिन लोग अक्सर दूसरे पहलू पर बात नहीं करना चाहते हैं.
एकता कपूर ने ये भी कहा, ‘इस इंडस्ट्री में दो तरह के लोग हैं. हमेशा से यह माना जाता रहा है कि ताकतवर इंसान ही छोटे और उभरते एक्टर का फायदा उठाता है लेकिन यह सच नहीं है. कई बार लोग काम के लिए अपना सेक्शुअली यूज करवाते हैं लेकिन एक निर्माता अपने पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ को हमेशा अलग रखता है.’
एकता कपूर ने अपनी ये प्रतिक्रिया बीते दिन इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में यौन शोषण के मामले सामने आने के मुद्दे पर दी. बता दें, हौलीवुड प्रोड्यूसर हार्वे वेइंस्टीन पर कई महिलाओं के यौन शोषण का आरोप है. इसे लेकर पिछले साल दुनियाभर में #Metoo कैंपेन भी चलाया गया था, जिसे लेकर कई महिलाओं ने अपनी अपनी प्रतिक्रियाएं दी थीं.
हाल ही में एकता कपूर के पिता और जाने-माने एक्टर जितेंद्र पर भी उनकी एक रिश्तेदार के यौन शोषण का आरोप लगाने का मामला सामने आया था. इस रिश्तेदार ने घटना के 47 साल बाद उन पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी. हालांकि इस पूरे मामले को जितेंद्र ने सिरे से खारिज करते हुआ कहा कि उन पर लगाए गए सारे आरोप निराधार हैं.
आप ने मुंबई की लोकल ट्रेन की काफी शिकायतें सुनी होंगी. शिकायतों से मतलब सवारी करने वालों की शिकायतें. मसलन, काफी भीड़ का होना, सीट का न मिलना, यहां तक कि इन्हें कलंक, हत्यारिन वगैरह कहना. वैसे तो लोकल ट्रेनें मुंबई की लाइफलाइन हैं और लाइफलाइन की शिकायत भला कैसे की जा सकती है? यहां की लोकल टे्रनों के कुछ खास फायदे हैं. इन्हें जान कर आप का मन खुश हो जाएगा.
फायदा नंबर एक यह है कि आप कितने भी सीधेसरल क्यों न हों, यहां की लोकल ट्रेन की कृपा से आप जीवट इनसान में तबदील हो जाते हैं.
शुरुआत में भीड़ देख कर आप 1-2 ट्रेनें छोड़ भी सकते हैं. ट्रेन में भीड़ के चढ़ जाने पर प्लेटफार्म चुनाव में हारी हुई पार्टी के दफ्तर या हारी हुई क्रिकेट टीम के खिलाड़ी के घर की तरह सूना हो सकता है और आप यह गलतफहमी पाल सकते हैं कि अगली ट्रेन में आप आराम से जा पाएंगे. पर अगली टे्रन आने तक, जिस में सिर्फ चंद मिनट ही होते हैं, भीड़ फिर पहले जैसी ही हो जाएगी.
जैसे बारिश के डर से चींटियां बिलबिला कर बिल से निकलती हैं, वैसे ही कुछ ही पलों में हजारों की तादाद में लोगों का प्रकट होना यहां आम बात है. आखिर में आप को लगेगा कि किसी ने चारा घोटाला कर चारे का हरण कर लिया है और आप के पास कोई चारा नहीं बचा है. नतीजतन, आप भीड़ से डरने के बजाय उस का हिस्सा बन जाएंगे. ट्रेन में चढ़ना तो अपनेआप में भगीरथ प्रयास है ही, ट्रेन में टिके रहना भी उतना ही बहादुरी भरा काम है. बदन की मालिश बगैर किसी खर्चेपानी के होती रहेगी. कभी रेलिंग के सहारे खड़े रहने, तो कभी दीवार से हाथ टेके खड़े रहने से आप की मांसपेशियां मजबूत होंगी. सेहत सुधरती जाएगी और बगैर ज्यादा कोशिश किए आप का बदन गठीला हो कर लोगों के जलने की वजह बन जाएगा.
जब आप प्लेटफार्म पर पहुंचते हैं और देखते हैं कि ट्रेन के आने में महज एक मिनट ही बाकी है तो आप फर्राटा धावक बन जाते हैं, वह भी अपने जैसी बहुत सी बाधाओं से टकराने से बचने की जुगत के साथ. आप भले ही मोबाइल फोन से कितनी भी दूरी बना कर रखते हों, पर ट्रेन में समय बिताने के लिए आप को इस से दोस्ती करनी पड़ेगी और आप का अपने मोबाइल फोन से मधुर संबंध बन जाएगा. इन ट्रेनों में कुछ घोर पुस्तक विरोधियों को पुस्तक प्रेमी बनते, नास्तिकों को भजन करते भी देखा गया है. इसी तरह इन लोकल ट्रेनों में नाश्ता करते लोग भी मिल जाते हैं. वे भी जो बड़े आराम से नाश्ता करने के हिमायती हैं, इन लोकल ट्रेनों के चक्कर में सब से पहले जगह पाने की जुगत भिड़ाते हैं. खड़ा होने या बैठने की जगह मिल जाने के बाद ही ये नाश्ता करते हैं. पहले ट्रेन में सीट पाओ, फिर खाना खाओ.
कभीकभी आप ट्रेन से बैग ले कर उतरेंगे तो हाथ में सिर्फ बैग का हैंडल रह जाएगा मानो भीड़रूपी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने किसी अंगरेज सैनिक का सिर धड़ से अलग कर दिया हो. इस से बैग इंडस्ट्री को काफी बढ़ावा मिलेगा. अगर बैग भारत में बनेंगे तो ‘मेक इन इंडिया’ को भी बढ़ावा मिलेगा. अगर इस हालत यानी बैग के सिर और धड़ को अलग होने से बचाना है तो आप को बैग को हाथ में न ले कर पीठ पीछे कस कर लटकाना होगा. अगर पीछे से किसी के बैग से कुछ निकाल लेने का डर सता रहा हो तो बैग को बैकपैक के बजाय चैस्टपैक बनाना पड़ेगा यानी बैग को पीठ पर न लटका कर सीने पर लटकाना पड़ेगा.
इस का एक बड़ा फायदा मर्दों को को ‘खिलाडि़यों के खिलाड़ी’ अक्षय कुमार की तरह ‘पेट से होने’ का अहसास हो पाएगा. यहां हम किसी तरह का लिंगभेद न करते हुए बताते चलें कि यही हालत औरतों की बोगी की भी होती है और वे औरतें भी इसी तरह के सुख भोगने का हक रखती हैं. आखिरी स्टेशन को छोड़ कर बीच के किसी स्टेशन पर टे्रन से उतरने में भी काफी मशक्कत की जरूरत होती है यानी बीच के किसी स्टेशन पर सहीसलामत उतरना मतलब महारथी होना ही है. फिर इस से आप चौकन्ने भी होते हैं, क्योंकि अगर 1-2 स्टेशन पहले से ही कोशिश नहीं करेंगे तो अपने स्टेशन के 1-2 स्टेशन बाद ही उतर पाएंगे और फिर वापसी में फिर से वही परेशानी मोल लेनी पड़ेगी. इस से आप जागरूक मुसाफिर बन जाते हैं.
इस के अनेक फायदों में से एक फायदा यह भी है कि डियोडरैंट इंडस्ट्री को इस से काफी बढ़ावा मिलता है. 50 लोगों के बैठने के लिए बनी बोगी में डेढ़ सौ लोगों के लदने से सब के पसीनों की गंध ‘मिले गंध मेरी तुम्हारी तो गंध बने हमारी’ का राग अलापते लगते हैं. उन के इस राग से बचने के लिए डियोडरैंट की जरूरत होती है और इस से संबंधित इंडस्ट्री को काफी बढ़ावा मिलता है. ‘स्टार्टअप’ और?‘स्टैंडअप इंडिया’ को इस से बढ़ावा मिल सकता है. यहां की लोकल ट्रेन वर्गभेद को भी दूर करती है. सैकंड क्लास और फर्स्ट क्लास में कोई खास फर्क नहीं होता. बहुत हुआ तो सैकंड क्लास में डेढ़ सौ मुसाफिर होंगे तो फर्स्ट क्लास में 140.
मुसाफिरों की तादाद के मामले में लिंगभेद भी नहीं है. औरतों की बोगी में भी यही देखने को मिलेगा. हां, लोकल मुसाफिर एक फर्क बताते हैं कि फर्स्ट क्लास में पसीने की गंध डियोडरैंट की गंध से हार मानती है तो सैकंड क्लास में डियोडरैंट की गंध अपनी हार मान लेती है. बाकी मामलों में दोनों एक से हैं. हालांकि कई मामलों में मुकाबला बराबरी पर भी छूटता है.
ट्रेन के डब्बों में सामान बेचने वालों के भी वारेन्यारे होते हैं. कितनी भी भीड़ हो, वे लोग अपना सामान आसानी से बेच देते हैं. फायदे और भी हैं, पर ज्यादा फायदे गिनाने से कहीं आप कब्ज के शिकार न हो जाएं, इसलिए फिलहाल इतना ही.
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मध्य प्रदेश में एक स्कूल में घूमर नाच कर रहे बच्चों पर करणी सेना के नाम से कुछ लोगों का उत्पात मचाना साबित करता है कि आतंकवादी अब खालिस्तानी, माओवादी, तालिबानी, जैश ए मोहम्मद ही नहीं, सरकार में ऊंचे पदों पर बैठे हैं. वे देश की यूनिवर्सिटियों को चलाने वालों, अफसरों, जजों के स्थान पर बैठे हैं और उन के इशारों पर ये आतंकवादी घरघर में मौजूद हैं. जावरा कसबे के सैंट पौल कौनवैंट स्कूल के बच्चे वार्षिक उत्सव के दिन घूमर डांस कर रहे थे जो फिल्म ‘पद्मावत’ की धुन पर बना था. करणी सेना को यह नागवार लगा और उस ने कानून की परवाह किए बिना न केवल उत्सव भंग कर दिया, बल्कि तोड़फोड़ व मारपीट कर डाली. जैसा देशभर में हो रहा है, उस सेना के किसी आतंकी को गिरफ्तार नहीं किया गया. भगवा दुपट्टे की ढाल वाले बिगड़ैल मतवाले कानून तोड़ कर मजे में घरों में चले गए.
जराजरा सी बात पर गिरफ्तार व चालान करने वाली पुलिस और अफसर चुप क्यों रहे, इस का जवाब ढूंढ़ना मुश्किल नहीं है. देशभर में फिल्म ‘पद्मावत’ पर मचाया जा रहा उत्पात असल में भगवा राजनीति का एक ऐसा रूप है जिस का मकसद हरेक को यह साफ करना है कि या तो लकीर के फकीर बनो वरना मारपीट को तैयार रहो. 10 लोग भगवा दुपट्टा डाल कर हर तरह के गुनाह कर के साफ बच सकते हैं. यह गैरसवर्णों को संदेश है कि चाहे राजपूत और उन के समर्थक संख्या में कम हैं, पौराणिक युग की तरह उन का दबदबा कायम है और डंडों के सहारे ही वे सारे देश को काबू में कर सकते हैं. जैसा सदियों से होता आया है, आम आदमी इस तरह के लोगों से भिड़ना नहीं चाहता क्योंकि इन्हें सत्ता का संरक्षण भी हासिल है और मंदिरों की दुकानदारी कर रहे संतोंमहंतों का भी. ये लोग राजपूती शानबान की हिफाजत नहीं कर रहे, बल्कि इन का मकसद बड़ा है, देश में पौराणिक वर्णव्यवस्था को फिर से थोपना है और गरीबों, दलितों, अतिपिछड़ों को संदेश देना है कि वे चुपचाप बिना प्रोटैस्ट करे ऊंचों को वोट भी दें और कहना भी मानें.
देशभर में फिल्म ‘पद्मावत’ पर किए गए हंगामे की कामयाबी के बाद इन का अगला निशाना मतदाता केंद्र होगा. जैसे दशकों तक बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश में पिछड़ों और दलितों को मतदाता केंद्रों तक जाने ही नहीं दिया जाता था, यही अब चुनावों में होगा. फिल्म ‘पद्मावत’ पर हंगामा मतदाता केंद्रों पर कब्जों की रिहर्सल है, फुल ड्रैस रिहर्सल. देश को उत्तर कोरियाई रंग में रंगने की पूरी तैयारी है ताकि विशेष ऊंची जातियों को अपना पुराना स्थान मिल सके. यही भेदभाव हमारी सदियों की गुलामी की वजह रहा है. मुट्ठीभर विदेशी इस देश पर कब्जा कर सके, क्योंकि ये लोग जो अपनों पर जुल्म ढा रहे हैं, विदेशियों के सामने पिछड़ जाते थे और देश की विशाल दबीकुचली जनता विदेशियों को अपना तारणहार समझती थी. अब आर्थिक गुलामी का युग शुरू हो रहा है और देश गूगल, सैमसंग, अलीबाबा, माइक्रोसौफ्ट, सुजुकी, होंडा, अमेजौन जैसी कंपनियों का गुलाम बनता जा रहा है. ऊंची जातियां ‘पद्मावत’ जैसे मामले उठा कर मुंह बंद करने और दैनिक सोचविचार पर पूरा कंट्रोल कर रही हैं ताकि गुलामी की आदत खून में बहने लगे.
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गुजरात के युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी जैसे पाखंडवाद के खिलाफ आवाज को बुलंद कर पाएंगे इस में शक है और जब तक हर तरह के पाखंड की पोल और चाल का भंडाफोड़ न होगा, समाज वर्गों व वर्णों में बंटा रहेगा. दलितों पर अत्याचार होते ही इसलिए हैं कि पाखंडवाद के चलते हर बच्चे को एक धर्म, एक जाति, एक गोत्र पकड़ा दिया जाता है जिसे उसे जीवनभर ढोना होता है. उस की जिंदगी इसी बंधन के सहारे बीतेगी यह जन्म के दिन ही तय हो जाता है.
वह पढ़े या न पढ़े, सफल हो या असफल, गरीब हो या अमीर उस की जिंदगी जन्मकुंडली से तय रहती है. उसी के हिसाब से उसे मंदिरों में जाने की इजाजत होती है. उसी के हिसाब से उस का काम तय हो जाता है. उसी के हिसाब से उस को पत्नी मिलती है. उसी के हिसाब से उसे आरक्षण मिलता है या नहीं मिलता.
जन्म के साथ जुड़े इस पाखंड का न कांशीराम ने विरोध किया, न उन की वारिस मायावती ने. न जिग्नेश कर रहे हैं, न रामविलास पासवान. उलटे सब इस पाखंड को पाल रहे हैं और इस की आड़ में अपनी राजनीति चमका रहे हैं.
दलितों के नेता यह सवाल नहीं पूछ रहे कि वे आखिर जन्म से ही दलित क्यों हैं? सुप्रीम कोर्ट उन की बदहाली पर आंसू बहाता है, पर यह नहीं पूछता कि यह तमगा उन्हें क्यों दिया गया और क्यों इस पाखंड पर रोक लगाने की बात नहीं की जाती?
भीमा कोरेगांव का हुजूम दलितों की इज्जत को ले कर जमा हुआ पर वे दलित कहे ही क्यों गए, यह सवाल नहीं पूछा जा रहा. उन मराठों को ऊंची पदवी किस ने दी जिन्होंने इन दलितों को निशाना बनाया. आपस में भाईचारे की बात होती है पर इस भेदभाव की खाई को कौन कैसे खोद रहा है इस की जिम्मेदारी कौन ले रहा है. जो यह कर रहा है वह दलित या भगवा नेताओं से ज्यादा बड़ा गुनाहगार है और उसे रोकना होगा.
रोकने से पहले तो यह तय करना होगा कि हम यह करना भी चाहते हैं या नहीं. अगर ऊंची जातियां आज अपने उच्च कुल में जन्म लेने पर रोब से रहती हैं तो नीची से नीची जाति भी अपनी जाति इसी पाखंडवाद की पट्टी के कारण छोड़ने को तैयार नहीं. हाल के सालों में पाकिस्तान का बहाना ले कर इस पाखंड का जम कर बाजारीकरण हुआ है. गली का पाखंडबाज आज कईकई शहरों में मौल से पाखंड केंद्र बना बैठा है. इस पाखंड की फ्रैंचाइजी दी जाने लगी हैं.
दलित आंदोलन शायद हिंदू समाज को सोचने पर मजबूर करे कि यह पाखंडवाद है जो देश को गरीब बनाए रख रहा है. वैसे उम्मीद कम है. साम, दाम, दंड, भेद का पाखंडी हथियार सदियों से कामयाब रहा है. आज क्यों नहीं रहेगा.
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राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार भारतीय जनसंघ के संस्थापक दीनदयाल उपाध्याय को महापुरुष का सरकारी दर्जा देने जा रही है. राज्य सरकार ने तय किया है कि सरकारी कार्यक्रमों में महात्मा गांधी की तसवीर के साथ अब उन की तसवीर भी लगाई जाएगी. इस के साथ ही ‘गांधी जयंती’ की तर्ज पर उन का जन्मदिन मनाने को ले कर भी विचार किया जा रहा है.
सरकारी लैटरपैड और आदेशों में दीनदयाल उपाध्याय का फोटो भी अनिवार्य किया जाएगा. इस से पहले प्रदेश के सरकारी इश्तिहारों में उन की तसवीर अनिवार्य करने के साथ ही स्कूलों की लाइब्रेरी में उन की जीवनी रखना अनिवार्य किया जा चुका है.
सरकारी इश्तिहारों की तर्ज पर लैटरपैड व आदेशों में भगवा रंग में दीनदयाल उपाध्याय की तसवीर वाला लोगो छापा जाएगा. भाजपा विधायकों के लैटरपैड पर भी उन की तसवीर छापना अनिवार्य किया गया है.
11 दिसंबर, 2017 के एक शासनादेश के मुताबिक, अब सरकारी पत्राचार के लिए इस्तेमाल में आने वाले लैटरपैड पर दीनदयाल उपाध्याय का लोगो लगाना अनिवार्य होगा. राज्य सरकार के सभी 72 महकमों, बोर्डों, निकायों, निगमों, स्वायत्त संस्थाओं को उन के पुराने छपे लैटरपैड पर दीनदयाल उपाध्याय का लोगो का स्टीकर लगवाना होगा. साथ ही, आगे से जो स्टेशनरी छपवाई जाएगी, उस पर भी यह लोगो होना जरूरी है.
11 दिसंबर के इस शासनादेश पर प्रमुख सचिव के दस्तखत हैं और इसे तुरंत लागू करने की बात कही गई है.
कांग्रेस व दूसरी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने इस का जबरदस्त विरोध किया है. कांग्रेस ने वसुंधरा राजे सरकार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे को लागू किए जाने का आरोप लगाते हुए कहा कि जिस तरह से शिक्षा का भगवाकरण किया गया है, उसी तरह अब प्रशासन का भगवाकरण करने की कोशिश की जा रही है.
भाजपा द्वारा इस आदेश को ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी वर्ष’ के लिए बनी कमेटी के लैवल पर लिया गया फैसला बता कर बचाव किया जा रहा है.
प्रदेश के गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया ने कहा कि सरकारी पत्रों पर फोटो वाला लोगो लगा कर सरकार दीनदयाल उपाध्याय का सम्मान कर रही है. उन्होंने जो काम किए हैं, उस का हम सम्मान कर रहे हैं. कांग्रेस का काम ही विरोध करना है.
कांग्रेस के प्रदेश महासचिव ने भाजपा से जवाब मांगा है कि पहले सरकार यह साफ करे कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का आजादी की लड़ाई और देश को बनाने में क्या योगदान था? साथ ही, भाजपा जनता के बीच यह भी खुलासा करे कि वह उन्हें अशोक महान के समान क्यों मानती है?
इस से पहले भी भाजपा सरकार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार के आरोप सच साबित होते रहे हैं.
22 सितंबर, 2017 को विदेश मंत्रालय ने अपनी आधिकारिक वैबसाइट के होमपेज पर ‘इंटीग्रल ह्यूमनिज्म’ शीर्षक से एक ईबुक अपलोड की थी. इस ईबुक, जिसे विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की कड़ी मेहनत का नतीजा बताया था, में आजाद भारत के शुरुआती इतिहास को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया था.
उस समय भी सवाल उठा था कि क्या सत्ताधारी दल को अपना प्रचारप्रसार करने के लिए जनता के पैसे और सरकारी संस्थाओं का गलत इस्तेमाल करने की छूट है?
इस के बाद उत्तर प्रदेश के स्कूलों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्म शताब्दी के मौके पर भाजपा द्वारा कराई गई सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता पर भी सवाल उठे थे. इस प्रतियोगिता की तैयारी के लिए छात्रों को दी गई किताब पर हिंदुत्व की विचारधारा की प्रचार सामग्री होने की बात कही गई थी. इस के अलावा उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर दीनदयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन किया गया है.
इस तरह के दर्जे पहले पुराने जमाने में धार्मिक लोग बांटते थे. राजा व राज्य व्यवस्था गांव प्रमुख, जनप्रमुख वगैरह के रूप में नियुक्तियां जरूर देती थी, जिस का काम प्रशासन का काम देखना, दूसरे कामों में मदद करना व कर वसूली में मदद करना होता था.
मौर्यकाल के समय के ब्राह्मण ग्रंथ पढ़ेंगे तो उन में मौर्य राजाओं को शूद्र का दर्जा दिया गया था. बौद्ध ग्रंथ, स्तंभ, शिलालेख वगैरह पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि उन में मौर्यों को क्षेत्रीय का दर्जा दिया गया था व जैन ग्रंथों में भी मौर्यों को शूद्र बताया गया था.
मौर्यों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया था इसलिए ऊंचा दर्जा मिल गया. ब्राह्मण धर्म को किनारे कर दिया गया तो नाराज ब्राह्मणों ने मौर्यों को शूद्र का दर्जा दे दिया. जैन धर्म को भी सत्ता का संरक्षण नहीं मिला व बौद्धों के भारी विरोध के बाद वे मगध से भाग कर कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में जा कर ठहरे थे तो इन के ग्रंथों में भी मौर्यों को शूद्र घोषित कर दिया था.
यह दर्जों का दौर भारतीय इतिहास में हमेशा से रहा है. लेकिन मुगलों के समय में एकाएक ही बदलाव आया था. पहले धार्मिक लोग सत्ता पक्ष को इस तरह के दर्जे देते थे, लेकिन मुगलकाल में सत्ता पक्ष की तरफ से भी दूसरों को दर्जा देने की शुरुआत हुई थी.
आप को याद ही होगा कि अकबर के नौ रत्न थे. ये दर्जे ही थे. जो अकबर को खुश कर देते थे, उन को वे रत्न घोषित कर देते थे.
अंगरेजों के समय दर्जों को उपाधियां कहा जाने लगा था. अंगरेजों ने भी खूब उपाधियां बांटीं. आजादी के बाद भारत की लोकतांत्रिक सरकार ने भी इसे उचित समझ कर जारी रखा.
सत्ता पक्ष दर्जा या उपाधियों की रेवडि़यां बांटेगा तो आम लोगों को तो मिलेंगी नहीं, क्योंकि सत्ता पर कब्जा एक जातिविशेष का है जिस को अंगरेजों ने यह कह कर जज बनाने से इनकार कर दिया था कि ‘ब्राह्मणों में न्यायिक चरित्र ही नहीं है. जो खुद भेदभाव की जड़ों में हैं वे कभी न्याय कर ही नहीं सकते.’
अब दोबारा मौर्यकाल याद कीजिए, जहां ब्राह्मणों ने दान न देने के चलते मौर्यों को शूद्र का दर्जा दिया था. अब धर्म व सत्ता दोनों पर कब्जा ब्राह्मणों का है. दर्जा चाहे धर्म दे या सत्ता दे, देने वाले तो ब्राह्मण ही हैं. अब आप को समझ आ गया होगा कि दर्जें या उपाधियां कैसे व किस को दी जाती होंगी.
अब राजस्थान की सरकार इतिहास बदलने में लगी है तो हलदी घाटी की लड़ाई तो जितवा ही दी है और अब दीनदयाल उपाध्याय को महापुरुष बना कर ही छोड़ेगी.
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बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि लोकतंत्र का चौथा खंभा कही जाने वाली पत्रकारिता अब सिर्फ पक्षकारिता बन कर रह गई है. जिन के कंधों पर समाज को नई दिशा दिखाने की जिम्मेदारी थी, जो सच के पहरेदार थे, अब वे लोग एकपक्षीय हो कर जज बन कर फैसले सुनाने लगे हैं. पत्रकारिता की खाल ओढ़ कर वे अब अपने राजनीतिक मालिकों के लिए एजेंडा चलाने लगे हैं.
कुलमिला कर देखा जाए तो पत्रकार किसी महल्ले की चुगलखोर आंटियों की तरह बरताव करने लग गए हैं.
ऐसे माहौल में कुछ पत्रकारों ने अभी भी पत्रकारिता की इज्जत बचा कर रखी है, जो बेबाक हो कर बिना किसी का पक्ष लिए अपनी राय रखते हैं.
ताजा मामला संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ को ले कर है, जिस पर पत्रकार रोहित सरदाना को बेबाक राय रखने के लिए जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं. उन्होंने कहा था कि दूसरे पक्ष की बात को भी सुना जाए. अपनी बात कहने की आजादी के नाम पर आप राधा और दुर्गा के लिए तो गलत शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं, पर कभी आयशा या फातिमा के नाम पर ऐसी फिल्में या गीत बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं.
मीडिया के इस दोहरेपन पर चोट क्या की गई, गाजियाबाद से ले कर गाजीपुर तक और मुंबई से ले कर दुबई तक, उन को और उन के परिवार को जान से मारने की धमकी मिलनी शुरू हो गई और देशभर के थानों में उन के खिलाफ शिकायत दर्ज हो गई. इस दोहरे मापदंड पर सवाल उठाते ही वही लोग जो सहिष्णुता का पाठ पढ़ाते हैं चुप्पी साध कर बैठ जाते हैं.
यह दोहरा मापदंड आज से नहीं, बल्कि 80 के दशक से है जब राजीव गांधी सरकार ने सलमान रुश्दी का भारत में आना ही बैन कर दिया था. तसलीमा नसरीन और तारिक फतह पर भी कई बार हमले हो चुके हैं.
आज का सब से बड़ा सवाल यह है कि इन सब की भावना तब आहत क्यों नहीं होती जब कोई विवाहिता दहेज के लालचियों द्वारा मार दी जाती है? इन की भावना तब आहत क्यों नहीं होती जब कोई किसान खुदकुशी कर लेता है? इन की भावना तब आहत क्यों नहीं होती जब किसी गरीब की जमीन छीन ली जाती है? इन की भावना तब आहत क्यों नहीं होती जब किसी मासूम बच्ची या औरत से बलात्कार होता है? लेकिन एक फिल्म से इन की भावना आहत हो जाती है और शुरू हो जाता है इतिहास पर मातम मनाना. आखिर क्यों? हम आज भी अपनी सोच को गुर्जर या राजपूत या फिर किसी दूसरी जाति का होने से ऊपर क्यों नहीं उठा पा रहे हैं?
इस फिल्म में जोकुछ दिखाया गया, अगर जनता में जागरूकता होती तो इतना बवाल ही नहीं होता. कुसूर किस का है? हमारा ही है, क्योंकि हम शराफत का लिबास पहने हुए हैं. हमें शराफत के इस लिबास में मुंह छिपा कर जीने की आदत सी पड़ गई है. हर किसी के भीतर वही कुछ दबा हुआ?है, जो मेरेआप और सब के भीतर दबा है. लेकिन हम हैं कि एक निडर नेता के इंतजार में बैठे हुए हैं. नेता आते हैं, हमारी भावनाओं का सौदा करते हैं और फिर हम वहीं के वहीं खड़े रह कर अगले नेता का इंतजार करते हैं. न जाने कितने नेता आए और चले गए लेकिन जनता वहीं की वहीं रह गई.
एक विदेशी कारोबारी आता है और करोड़ों रुपए कमा कर चला जाता है. लेकिन यहां के किसान भूखे मरते हैं. यहां के कारोबारी कर्जे में डूबे मिलते हैं. लेकिन हमारे नेता देखते ही देखते करोड़ों के मालिक बन जाते हैं. फिर वही नेता राजनीतिक पकड़ बनाए रखने के लिए अपनीअपनी सेनाएं बनाते हैं और ये सेनाएं जनता के सेवक होने का मुखौटा लगा कर घूमती हैं.
कुलमिला कर फिल्म ‘पद्मावत’ को ले कर खड़ा किया जा रहा सारा विवाद राजनीतिक फायदा लेने के लिए सत्ताधारी पार्टी और उस के समर्थक दलों की साजिश है. चुनाव हमेशा होते रहते हैं. अब फिर 2 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और उस के बाद अगले साल लोकसभा चुनाव भी होंगे, इसलिए उस विवाद को ठंडा नहीं होने दिया जा रहा है.
अगर आप सब को याद हो तो साल 1996 में आई फिल्म ‘फायर’ के समय भी बहुत बवाल मचा था. उस फिल्म में 2 औरत किरदारों के बीच लैस्बियन संबंध दिखाए गए थे. फिल्म के खास किरदारों के लिए सीता और राधा का नाम इस्तेमाल हुआ था. इस से बहुत हंगामा मचा था. फिल्म के पोस्टर जलाए गए थे. देश में कई जगह तोड़फोड़ की गई थी.
इस के 20 साल बाद साल 2016 में समलैंगिक संबंधों को ले कर एक और फिल्म ‘अलीगढ़’ रिलीज हुई थी. तब तक समाज आगे बढ़ चुका था, इसलिए उस पर किसी तरह का बवाल नहीं मचाया गया.
सवाल उठता है कि अगर हमारी सोच का दायरा नहीं बढ़ेगा तो समाज की समझ कैसे मैच्यौर होगी? हमारा देश कैसे मैच्यौर होगा? यह जल्दी से जल्दी समझने और महसूस करने का मुद्दा है.
यह कैसा समाज है जो किसी सोच को चुनौती देने की जगह उस की सरपरस्ती करता है? अब हमें बदलने की जरूरत है. रूढि़वादी और दकियानूसी परंपराओं को तोड़ने की जरूरत है. फिल्म ‘पद्मावत’ का विरोध हो रहा है तो इसलिए कि राजूपतों के एक छोटे से गिरोह ने इसे पहले जातीय पहचान से जोड़ा और फिर धार्मिक पहचान से. अब यह एक धर्म की पहचान का सवाल बन गया है. यह बड़ी साजिश लगती है.
इसी मुद्दे पर एक विचारक और व्यंग्यकार राजेश सेन से बात की गई. वे इंदौर के रहने वाले हैं और नियमित रूप से अखबार के लिए लिखते हैं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:
यह मुद्दा राजनीति ने गोद लिया है – राजेश सेन
फिल्म ‘पद्मावत’ पर हुआ विवाद हर किसी के लिए चिंता की बात है. इस पर आप की निजी राय क्या है?
यह मुद्दा इसलिए विवादित बना हुआ है क्योंकि इसे राजनीति ने गोद ले रखा है, वरना यह कभी का हवा हो चुका होता.
इतिहास के लिए हंगामा करना कहां तक सही है?
जिस तरह शिवाजी सिर्फ मराठों के नहीं हैं, महात्मा गांधी सिर्फ गुजरातियों के नहीं हैं, सरदार पटेल सिर्फ पटेलों के नहीं हैं, वैसे ही रानी पद्मिनी सिर्फ राजपूतों की नहीं हैं. वे हमारे देश की साझा विरासत हैं. वे हर भारतीय की पहचान हैं. जो लोग उन का नाम ले कर लोगों को बांट रहे हैं, उन की नीयत को समझिए.
सैंसर बोर्ड के आदेश पर फिल्म का नाम ‘पद्मावती’ से बदल कर ‘पद्मावत’ किया जा चुका है. कई दूसरे बदलाव किए गए हैं. उस के बाद भी विवाद क्यों?
करणी सेना जिस तरह बवाल मचा रही है, वह रानी पद्मिनी से नहीं बल्कि अलाउद्दीन खिलजी से ज्यादा प्रभावित दिखती है. वह उस के रास्तों पर चलती नजर आ रही है. जो रानी पद्मिनी और रावल रतन सिंह को अपना पूर्वज मानते हैं, वे ऐसा बवाल नहीं मचा सकते.
इसका मतलब यह है कि कुछ भी लिखने से पहले करणी सेना जैसे सैकड़ों गुटों से रजामंदी लो?
अजीब उलटबांसी है कि इतिहास में भी लड़ा गया और अब उस इतिहास के नाम पर भी लड़ा जा रहा है, जबकि यह तो हमारा इतिहास ही नहीं है. और जो इतिहास था, उसे तो हम कभी का भूलाबिसरा बना चुके हैं.
शायद हम इतिहास के दृश्यों को रजामंदी के साथ वर्तमान के रुपहले परदे पर ईमानदारी से कैद नहीं करना चाहते या फिर हम इतिहास के नामजद पात्रों की हिफाजत करने में खुद ही दूसरों पर जुल्म करने वाले बन जाना चाहते हैं.
सत्ता के चंद लालची व उठाईगीर किस्म के लोग, निजी फायदों से जुड़े लोग इस फिल्म की आड़ में जातीय और धार्मिक भावनाएं भड़का रहे हैं. क्या यह तरीका सही है?
कथाओं को इतिहास के पन्नों से बेइज्जत खदेड़ कर वर्तमान के चौराहों पर खड़ा करने की यह हमारी अजीब ही जल्दबाजी है, जबकि वह कथा खुद कभी की अपने को बिसरा भी चुकी है और हम भी अपने पुरखों का तर्पण कर कभी से उन्हें अपनी उम्रदराज यादों से खारिज कर चुके हैं. अब बिसरी हुई बातों पर अपने हक का नाच करने से आखिर हमें क्या हासिल होना है?
इतिहास अकसर हकीकत को लिखतेलिखते खुद कथा बन जाते हैं. वह कथा जिसे हम बड़े करीने से अपनी उजली यादों में मोरपंख की तरह संजो कर रख लेना चाहते हैं.
आज धर्म खतरे में है. जातियों की पहचान भी मुसीबत में है. पूरे देश में अजीब सी लहर है. धर्म और जाति के ठेकेदार छोटीछोटी बातों पर दूसरों को ललकार रहे हैं. क्यों?
हम लोग अपने मनमंदिर में समय को देवता बना कर हमेशा ही पूज लेना चाहते हैं, जबकि हमें पता है कि मौजूदा वर्तमान को भी कल को इतिहास बन कर हमारी आने वाले पीढि़यों की यादों में बेबसी से कैद हो कर रह जाना है. वे खट्टीमीठी यादें, जो हमारे घरों में लगे तारीखों के कलैंडर की फड़फड़ाहट के साथ जबतब हम से हर पल विदा होती रहती हैं, सत्ता के चंद लालची और उठाईगीर किस्म के लोग इस का फायदा उठाते हैं. वे इस फिल्म की आड़ में जातीय और धार्मिक भावनाएं भड़का रहे हैं.
आप इस फिल्म के लिए लोगों को कोई संदेश देना चाहेंगे?
मैं तो यही कहूंगा कि फिल्म ‘पद्मावत’ देखें. यह करणी सेना और उस के आगे झुके हुक्मरानों के खिलाफ हमारा विरोध होगा और उन तमाम लोगों के मुंह पर एक तमाचा होगा जो एक शख्स को उस के विचार जाहिर करने से रोकते हैं. उसे उस का काम करने से रोकते हैं.
राजपूतों के तथाकथित ठेकेदारों और उन की बनाई करणी सेना के घमंड को तोड़ने की जरूरत है. उन के आगे सजदा कर चुके हुक्मरानों की बुजदिली को चुनौती देने की जरूरत है.
पर क्या अब समाज को बदलना मुमकिन है?
यह तभी मुमकिन होगा जब समाज के तमाम लोग इस साजिश के खिलाफ खुल कर आवाज उठाएंगे. सभी अपने गलीनुक्कड़ में, चौकचौराहों और सोशल नैटवर्क के पन्नों पर इस तरह के बैन लगाने की सोच की खुल कर खिलाफत करें.
जब इस फिल्म के समर्थन में मजबूत आवाज उठेगी तो करणी सेना जैसे तमाम गिरोहों के हौसले टूट जाएंगे. उन की दुकान बंद हो जाएगी. उन के आगे झुके हुक्मरान शर्मिंदा होंगे और भविष्य में वे ऐसे बैन लगाने का अपराध नहीं करेंगे.
क्या यह अपनी बात कहने की आजादी के खिलाफ है?
कितने शर्म की बात है कि आज भी यहां कोई बात कहने की आजादी पर देश में लंबी बहस चलती है. वह भी इसलिए कि फिल्मकारों को क्या दिखाना चाहिए, क्या नहीं दिखाना चाहिए. यही नहीं, पत्रकारों को क्या लिखना और बोलना चाहिए और क्या नहीं, इस मुद्दे पर तमाम अखबारों और न्यूज चैनलों पर घंटों बहस हो चुकी है.
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