भूरिया मुच्छड़ : क्या भूरिया ले पाया संध्या की जवानी का मजा

राजस्थान के उदयपुर जिले में देवली नाम का एक छोटा सा गांव था. तकरीबन 700-800 घरों की बस्ती. वहां सभी जाति के लोग रहते थे, जो बहुत मेहनतकश थे.

उसी गांव में सूरज नाम का एक मेहनती किसान रहता था. वह अपनी पुश्तैनी 10-12 बीघा जमीन पर खेतीबारी किया करता था. उस का खेत महावली की पहाड़ी के बीच मैदान में था, जिस में वह एक कुएं से सिंचाई करता था.

सूरज 6 फुट हट्टाकट्टा नौजवान था. घर में उस की बूढ़ी मां व पत्नी संध्या रहती थी. संध्या का गोरा रंग और भरापूरा बदन लोगों के दिलों की धड़कनें तेज कर देता था.

भोर में ही सूरज खेत पर चला जाता था. खेतों में उस के पास ट्रैक्टर, ट्रौली व खेती संबंधी सभी जरूरी सामान थे, जिस से वह गन्ने की उपज की सिंचाई, निराईगुड़ाई वगैरह अकेला ही करता था.

संध्या दिन में सूरज के लिए जब खाना ले कर घर से निकलती थी, तो घाघरे से उस की गोरीगोरी पिंडलियां साफ नजर आती थीं. छाती ढकने के लिए कस कर चोली बंधी रहती थी. सिर पर सतरंगी ओढ़नी का एक पल्लू चोली में खोंसा होता था.

सिर पर एक पोटली में 8-10 मक्के की मोटीमोटी रोटियां, सरसों का साग व हाथ में दही या छाछ का बरतन लिए जब वह कमर मटका कर चलती थी, तो कई मनचले मक्खियों की तरह उस के चारों ओर मंडराने लगते थे, पर वह किसी को भी नजदीक फटकने नहीं देती थी.

पर देवली गांव में एक मुच्छड़ लट्ठबाज खुद को बड़ा तीसमारखां मानता था. वह अपनी मूंछों पर ताव दे कर खोमचे वालों, सब्जी वालों, दुकानदारों व राहगीरों को तंग कर उन का माल हड़पता था और औरतों को गंदे इशारे करता. मौका मिलने पर वह छेड़खानी भी कर देता था. उस का नाम वैसे तो भूरा राम था, पर सभी उसे भूरिया मुच्छड़ कहते थे.

गांव वाले भूरिया मुच्छड़ से डरते थे. पुलिस चौकी के 2 सिपाहियों और उस की खिचड़ी साथ पकती थी.

एक दिन भूरिया मुच्छड़ बाजार में बवाल मचा रहा था कि तभी किसी ने उस से कह दिया कि यहां क्या अपनी धाक जमा रहा है? हिम्मत है तो सूरज की घरवाली संध्या को वश में कर के दिखा, फिर तुझे मर्द मानें?

तभी भूरिया मुच्छड़ पलट कर गरजते हुए बोला, ‘‘उस छोकरी को मैं चिडि़या की तरह अपनी कैद में न ले आऊं, तो मेरा नाम भी भूरा नहीं.

‘‘मैं कल ही संध्या पर डोरे डालना शुरू कर दूंगा.’’

दूसरे दिन जब संध्या सूरज के लिए खाना ले कर सजधज कर कमर मटकाती हुई अपने खेत की ओर चली, तो भूरिया मुच्छड़ उस के आगेपीछे मंडराने लगा.

संध्या ने उस से कहा, ‘‘भूरिया, मधुमक्खी के छत्ते में हाथ मत डालना, वरना बुरा हाल हो जाएगा.’’

उस की धमकी सुन कर भूरिया मुच्छड़ चुपचाप वहां से बिना कुछ किए चला गया.

उसी दिन जब शाम को संध्या ने भूरिया मुच्छड़ की गंदी हरकतों के बारे में सूरज को बताया, तो वह बोला, ‘‘ऐसी बात है, तो मैं कल ही उस मच्छर को मसल देता हूं.’’

इस पर संध्या ने कहा, ‘‘ऐसा मत करना. जब किसी को मीठी गोली देने से मारा जा सकता है, तो जहर नहीं देना चाहिए. मैं भी चित्तौड़गढ़ की बेटी हूं. मुझे केवल गुलाब के फूल जैसी नाजुक मत समझना. उस लठैत से तो मैं अकेले ही निबट लूंगी.’’

इस के बाद संध्या ने सूरज के कान में अपनी योजना कही, जिसे सुन कर वह मुसकरा दिया.

सूरज बोला, ‘‘वाह मेरी दिलदार, क्या योजना बनाई है. चलो, ट्रैक्टर पर गन्ने का खेत देख कर आते हैं.’’

अगले दिन जब संध्या भोजन ले कर खेत की ओर चली, तो भूरिया मुच्छड़ फिर आ धमका.

इस बार संध्या ने आंख के इशारे से उसे अपने पास बुलाया और कहा, ‘‘देख भूरिया, तेरा पहलवान जैसा बदन देख कर मेरा भी मन ललचा गया है. अगर मेरी खूबसूरती और तेरी जवानी मिल जाए, तो जो औलाद पैदा होगी, उस में हम दोनों के गुण आ जाएंगे.

‘‘वैसे, सूरज नामर्द है. 4 साल हो गए, पर मेरी गोद अभी भी सूनी है. शाम को ही मेरे खेत में गन्नों के बीच बने चबूतरे पर मेरा इंतजार करना. मैं सूरज को घर भेज दूंगी और तेरे पास आ जाऊंगी. पर एक बात है…’’

भूरिया मुच्छड़ खुशी के मारे बोला, ‘‘क्या बात है? मैं तो तेरे लिए जान भी देने को तैयार हूं.’’

भूरिया मुच्छड़ को अपने जाल में फंसता देख संध्या बोली, ‘‘जान तेरे दुश्मन की जाए. मैं तो यह कहती हूं कि तेरी ये लंबीलंबी मूंछें मेरे गुलाब की कलियों जैसे गोरेगोरे गालों व होंठों का रसपान करने में अड़चन आएंगी. इसलिए इन मूंछों को कटा कर सफाचट हो जाओ.’’

‘‘ओह, यह बात है. मैं अभी जा कर मूंछें साफ करा देता हूं,’’ भूरिया मुच्छड़ खुशी से चहकते हुए बोला.

संध्या ने कहा, ‘‘याद रखना, अपना लट्ठ जरूर साथ लाना और रात को 8 बजे से पहले मत आना. चबूतरे पर मेरा इंतजार करना,’’ इतना कह कर संध्या घर चली गई और भूरिया मुच्छड़ अपनी मूंछें मुंड़वाने.

योजना के मुताबिक, सूरज चबूतरे के पास ही गन्नों के झुरमुट में छिप गया. रात को भूरिया मुच्छड़ चबूतरे पर संध्या की बाट देखते हुए मन ही मन मुसकरा रहा था कि आज तो उन दोनों का मिलन हो ही जाएगा. उस की बांछें खिल रही थीं.

थोड़ी देर बाद संध्या भी सजधज कर उस के पास आ गई. उसे देख कर भूरिया मुच्छड़ की लार टपकने लगी. उस ने उसे अपनी बांहों में लेना चाहा, पर संध्या ने कहा, ‘‘इतनी भी जल्दी मत कर. पहले मैं अपनी चोली की डोरी कमर से खोल लेती हूं, फिर तू पूरा मजा ले लेना.’’

इस के बाद संध्या ने अपनी कमर के पीछे खोंसी हुई दरांती निकाली और फुरती से भूरिया मुच्छड़ की नाक पर वार कर उस की नाक काट कर अलग कर दी.

भूरिया दर्द के मारे चिल्लाया और बोला, ‘‘धोखा. मैं तुझे नहीं छोड़ूंगा.’’

इतना कह कर भूरिया मुच्छड़ ने अपने पास रखे लट्ठ पर हाथ मारा, पर वह गायब था. सूरज ने वह लट्ठ उठा लिया था और उस ने उसी का लट्ठ उसी पर धड़ाधड़ मारना शुरू कर दिया.

संध्या ने 2 बार के हमले में ही उस के दोनों कान भी काट दिए. भूरिया मुच्छड़ लहूलुहान हो कर इस तरह भागा, जैसे बंदूक से गोली चली.

सूरज ने अपनी पत्नी संध्या को बांहों में भर कर उस की पीठ थपथपाई और इस के बाद वे दोनों खुशीखुशी अपने घर चले आए.

जब गांव वालों को मालूम हुआ कि भूरिया मुच्छड़ अपनी नाक और कान दोनों ही एक औरत से कटवा कर गांव छोड़ कर भाग गया है, तो सब ने राहत की सांस ली.

इस तरह बहादुरी दिखाते हुए संध्या ने अपने गांव को बदमाश भूरिया मुच्छड़ से नजात दिलाई. अब उस का रुतबा पूरे गांव में और भी ज्यादा बढ़ गया था.

हां तक भूरिया मुच्छड़ की बात है, तो वह उस के बाद गांव के आसपास कहीं नहीं दिखाई दिया.

हवाई सेवाएं और आमजन

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देश में ही नहीं, दुनियाभर में हवाई सेवाएं लोकप्रिय हो रही हैं. काश, ऐसा दिन आ जाए जब आप बिना प्रीबुक कराए, जैसे टैक्सी को हाथ हिला कर बुला सकते हैं, वैसे ही हवाई सेवा का उपयोग कर सकें. आजकल बड़ेबड़े हवाई अड्डे बनने लगे हैं जहां मीलों तक बाजारों व खानेपीने की दुकानों से गुजर कर पहुंचना पड़ता है. यह अड़चन हवाई सेवाओं का सुख छीन रही है.

विशाल हवाई अड्डों की जगह छोटे हवाई अड्डे और बड़े जहाजों की जगह छोटे हवाई जहाज शायद ज्यादा उपयोगी हों.

देश में दिल्ली और मुंबई के क्रमश: जेवर और नवी मुंबई में विशाल हवाई अड्डे बनाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है जहां पहुंचने में दिल्ली और मुंबई वालों को घंटों सड़कों पर ट्रैफिक से जूझना पड़ेगा. फिर आजकल सुरक्षा के नाम पर मनमाने कंट्रोल होने लगे हैं. आधे घंटे पहले हवाई जहाज में चढ़ा दिया जाता है. उतरते वक्त मीलों चलना पड़ता है. बैगेज का इंतजार करना पड़ता है.

मस्तमौलाओं के लिए हवाई सेवाएं भी क्यों नहीं मस्तमौला हो सकतीं. चाहे 4 सीटर प्लेन हों या 400 सीटर, जब चाहो जैसे चाहो, बैठो और पहुंचो. भारीभरकम हवाई जहाज इसलिए चल रहे हैं क्योंकि हवाई कंपनियां इतनी बड़ी हो गई हैं कि वे छोटे हवाई जहाजों के उद्योग को पनपने ही नहीं दे रही हैं. जहां जमीनी वाहनों में 400-500 यात्रियों को ले जाने वाली ट्रेनों से ले कर 2 जनों तक ले जाने वाली बाइक हैं, वहीं हवाई सेवाओं में छोटे वाहनों की भारी किल्लत है. छोटे हवाई जहाज तो लक्जरी आइटम हैं और उन को चलाना व खरीदना नीरव और ललित मोदियों के बस का ही है, जो जनता का पैसा लूट सकते हैं. होना तो यह चाहिए कि जम कर रिसर्च हो कि आम लोगों को हवा में उड़ने लायक ज्यादा व आसान सुविधाएं कैसे दी जाएं.

विज्ञान आवश्यकता के अनुसार खोज कर लेता है. मोबाइल और कंप्यूटर कभी बेहद महंगे होते थे पर आज एकदम सस्ते हो गए हैं. इतने सस्ते कि सरकार समझने लगी है कि मोबाइल नंबर ही आदमी की पहचान बन गया है. ऐसा ही हवाई सेवाओं के क्षेत्र में होना चाहिए और किसी भी शहर के ऊपर हवाई जहाज वैसे ही उड़ते नजर आने चाहिए जैसे चीलकबूतर उड़ते नजर आते हैं. यह संभव भी है. बस, बड़ी कंपनियों का कंट्रोल तो हटे.

एक लड़का काफी समय से मेरे साथ सैक्स कर रहा था. मेरे पति को मेरे सैक्स संबंध का पता तो नहीं चल जाएगा.

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सवाल
मैं 22 साल की युवती हूं. 2 महीने पहले तक मेरा एक लड़के से अफेयर था. वह भरोसे में ले कर काफी समय से मुझ से सैक्स कर रहा था, लेकिन उस से जब शादी की बात करती तो वह टाल जाता. अब मैं ने उस से नाता तोड़ लिया है तो कहता है कि मैं मर जाऊंगा और तुम्हें इस का जिम्मेदार बताऊंगा. तुम किसी और से शादी करोगी तो उसे भी इस रिश्ते के बारे में बता दूंगा. दरअसल, वह ऐसा शख्स था जो भोलीभाली युवतियों को अपने मोहपाश में फंसा कर ब्लैकमेल करता है, मैं उस के चंगुल में फंस चुकी हूं. यह सुझाएं कि इस दुविधा से कैसे निकलूं? मेरे पति को शादी के बाद कहीं मेरे सैक्स संबंध का पता तो नहीं चल जाएगा?

जवाब
आप बिलकुल न घबराएं. शादी के बाद आप के पति को आप के सैक्स संबंध के बारे में बिलकुल भी पता नहीं चलेगा जब तक कि आप खुद न बताएं. रही उस ब्लैकमेलर की बात तो जान लें कि निस्वार्थ प्रेम की आड़ में भोलीभाली युवतियों को अपने जाल में फंसा कर ऐसे युवक सिर्फ अपना फायदा देखते हैं जबकि युवतियां अपना सर्वस्व लुटा बैठती हैं.

आप बोल्ड हैं जो आप ने ऐसा कदम उठाया. आगे भी जागरूक रहें. अगर वह ब्लैकमेल करे तो अपने पति व घर वालों को कौन्फिडैंस में ले कर अपनी प्रेम व ब्रेकअप की बात बताएं. फिर पुलिस में भी कंप्लैंट कर सकती हैं. बस, घबराइए नहीं.

फिल्म “साहो” में इस अंदाज में दिखेंगी श्रद्धा कपूर

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फिल्म ‘बाहुबली’ और ‘बाहुबली 2’ से दुनियाभर में फेमस हुए एक्टर प्रभास जल्द ही फिल्म ‘साहो’ में नजर आने वाले हैं. कुछ वक्त पहले ही इस फिल्म के पोस्टर को शेयर किया गया था. इसमें प्रभास अपने चेहरे को एक मास्क से ढकते हुए रहस्मयी रूप में दिखाई दे रहे हैं. अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अभिनेत्री श्रद्धा कपूर भी अपने लुक से उत्सुकता बढ़ाने वाली हैं. श्रद्धा की यह तस्वीर सोशल मीडिया पर काफी देजी से वायरल हो रही है.

श्रद्धा की इस तस्वीर को मेकअप आर्टिस्ट श्रद्धा नायक ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया है. इस तस्वीर में श्रद्धा काफी सिंपल लुक में दिखाई दे रही हैं. बता दें, श्रद्धा इस फिल्म से तेलुगु सिनेमा में डेब्यू करने वाली हैं. पिछले साल प्रभास के बर्थडे पर फिल्म के फर्स्ट पोस्टर को शेयर किया गया था. इस पोस्टर में प्रभास अपना चेहरा छिपाए हुए नजर आए थे. अब तक श्रद्धा द्वारा फिल्म से जुड़ी किसी तस्वीर को शेयर नहीं किया गया है.

हालांकि इस फिल्म को तेलुगु के साथ-साथ हिंदी और तमिल में भी फिल्माया जा रहा है. फिल्म में ऊंचे दर्जे के एक्शन सीन रखे गए हैं, जिसके लिए निर्माता कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं. फिल्म में जैकी श्रौफ, मंदिरा बेदी और नील नीतिन मुकेश भी प्रमुख भूमिकाओं में होंगे. फिल्म का निर्माण यूवी क्रिएशन के वामसी, प्रमोद और विक्रम कर रहे हैं.

आपसी उधारी, बिगाड़े रिश्तेदारी

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नए जमाने की यह कहावत श्रुति और स्मृति पर आधारित न हो कर ढेरों अनुभवों व उदाहरणों का निचोड़ है कि अगर रिश्तेदारी बिगाड़नी हो तो उधार ले लो या फिर उधार दे दो. अर्थशास्त्र के शुरुआती पाठों में ही पढ़ा दिया जाता है कि फाइनैंस का एक बड़ा स्रोत व्यक्तिगत भी होता है. इन्हीं पाठों में बताया जाता है कि सहज उपलब्ध होने के साथसाथ इस तरह के फाइनैंस की एक खासियत यह भी है कि इस में ब्याज या अवधि का दबाव नहीं होता. पढ़ाया हालांकि यह भी जाता है कि दोस्तीयारी और रिश्तेदारी में लेनदेन अकसर रिश्तों के लिए नुकसानदेह साबित होता है और उन के टूटने की वजह भी बनता है.

रिश्ते हमेशा से ही अर्थप्रधान रहे हैं. धर्म और संस्कृति की दुहाई दे कर बेवजह ही इस सच से मुंह मोड़ने की कोशिश भी हमेशा की जाती रही है. जबकि सच यह है कि समाज में रहना है तो आप आपस में उधारी के लेनदेन से बच नहीं सकते.

बिलाशक अपनों की मदद का जज्बा एक अच्छी बात है जो न केवल मानव जीवन की बल्कि पैसे की भी सार्थकता सिद्ध करता है. भोपाल के 70 वर्षीय एक नामी डाक्टर की मानें तो साल 1968 में उन्हें मैडिकल में दाखिले के लिए उस वक्त महज 600 रुपए की जरूरत थी. तब यह रकम काफी भारीभरकम थी. डाक्टर साहब के पिताजी ने बेबसी से असमर्थता जाहिर कर दी तो उन की उम्मीद टूटने लगी और सपने दम तोड़ने लगे. पैसों के आगे प्रतिभा घुटने टेकती नजर आई.

ऐसे में रिश्ते के एक मामा ने उन की मदद की और बगैर ज्यादा पूछताछ किए या एहसान जताए उन्हें पैसे उधार दिए और खूबी यह कि उन की 5 वर्षों की पढ़ाई पूरी होने तक कभी तकाजा नहीं किया. भावविह्वल हो कर डाक्टर साहब बताते हैं कि अब मामाजी इस दुनिया में नहीं, लेकिन मैं अकसर उन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं. उन के उस वक्त के 600 रुपए के मुकाबले आज अपनी कमाई की करोड़ों की दौलत और जायदाद फीकी लगती है.

ऐसे कई उदाहरण आसपास मिल जाएंगे जिन में निस्वार्थ उधारी देने के चलते किसी की जिंदगी संवरी या जरूरी काम वक्त पर हो पाया. लेकिन ये उदाहरण उन उदाहरणों के मुकाबले कुछ भी नहीं जिन में स्थायी रूप से रिश्तों में खटास पड़ गई, वजह थी आपस में उधारी.

गौर से देखें तो असल वजह उधारी नहीं, बल्कि उस में रिश्तों की तरह पसरी अपारदर्शिता है. भारतीय समाज की यह बड़ी कमजोरी है, जिस में लिहाजा, संकोच और रिश्तों को बनाए रखने की कोशिश के चलते अकसर बहुतकुछ स्पष्ट नहीं होता.

भोपाल की ही एक प्रोफैसर की मानें तो अब से 8 वर्षों पहले उन्होंने अपने दिवंगत देवर की बेटी को 2 लाख रुपए उधार दिए थे. मंशा मदद की थी जिस से वह एमबीए करने का अपना सपना पूरा कर सके. पढ़ाई के बाद भतीजी की नौकरी एक नामी कंपनी में तगड़े पैकेज पर लग गई तो उन्हें आस बंधी कि अब वह पैसा वापस कर देगी.

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इस बाबत उन्होंने इशारों में कई दफा कहा भी पर भतीजी चालाक थी जो जानबूझ कर अंजान बनी रही. प्रोफैसर साहिबा के पति उन से काफी नाराज हुए पर मामला नजदीकी था और इस की कोई लिखापढ़ी नहीं थी, इसलिए कुछ नहीं किया जा सकता था सिवा अपनी मूर्खता पर कलपते रहने के.

अब वह भतीजी अपने पति के साथ मौज से बेंगलुरु में रह रही है और ताई व ताऊ के स्पष्ट मांगने पर भी पैसे वापस नहीं कर रही. नतीजतन, बोलचाल बंद है. हर कोई यह कहता है कि 2 लाख रुपए जैसी भारीभरकम रकम सगी भतीजी को भी बिना लिखापढ़ी के नहीं देनी चाहिए थी. अकसर फुरसत में अपनी मेहनत की कमाई के 2 लाख रुपयों को ले कर प्रोफैसर साहिबा क्षोभ, अवसाद और क्रोध से घिर जाती हैं कि अगर इन्हें कहीं निवेश करतीं तो कम से कम 6-7 लाख रुपए तो हो जाते और तनाव भी झेलना न पड़ता.

आपस में उधारी से ताल्लुक रखते एक ही शहर के दिलचस्प उदाहरण सामने हैं. डाक्टर साहब को वक्त पर उधारी मिल गई थी जो उन्होंने डाक्टर बनते चुका भी दी थी. इसलिए वे अब हर किसी जरूरतमंद रिश्तेदार की मदद करने के लिए तैयार रहते हैं और उधार देते वक्त न यह सोचते हैं, न पूछते हैं कि पैसा वापस कब मिलेगा. उलट इस के, प्रोफैसर साहिबा ने कसम खा ली है कि मर जाएंगी लेकिन अब वे किसी अपने वाले को कभी उधार नहीं देंगी.

क्या ऐसा कोई रास्ता है जिस से रिश्तों की मिठास भी कायम रहे और उधारी की खटास उन पर हावी न हो? इस सवाल का एक ही जवाब है, नहीं, क्योंकि उधार लेने वालों की नीयत नारियल जैसी होती है. आप ऊपर से नहीं भांप सकते कि नारियल भीतर से सड़ा है या साबुत है. यानी नीयत को नापने का कोई पैमाना नहीं है.

वक्त तेजी से बदल रहा है, बाजार में पैसों की किल्लत है और नोटबंदी के बाद तो हालात और भी बिगड़े हैं. ऐसे में जरूरी है कि आपस में उधारी को

2 हिस्सों में बांट कर देखा जाए. पहला, देने वाला और दूसरा, लेने वाला. इन दोनों ही पक्षों को कुछ सावधानियां बरतने की जरूरत है जिस से रिश्तों पर कोई आंच न आए.

  • देने वाले को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि मांगने वाले की जरूरत वाकई गंभीर है. पढ़ाई, बीमारी और शादी के बाबत पैसा मांगा जा रहा है तो उधार देना हर्ज की बात नहीं. लेकिन आप को लगता है कि उधारी मौजमस्ती और सैरसपाटे के लिए मांगी जा रही है तो विनम्रता से असमर्थता जता दें.
  • मांगने वाले से रिश्ते की नजदीकी व दूरी देखें. अगर रिश्तेदार अकसर मिलनेजुलने वाला और विश्वसनीय है तो उधार दिया जा सकता है.
  • देने वाले की वापस करने की क्षमता का आकलन बैंक की तरह करें. बेरोजगार रिश्तेदारों और बाहर रहने वाले छात्रों को देने से अकसर पैसा डुब जाता है.
  • नौकरीपेशा या नियमित आमदनी वाले रिश्तेदारों को उधार दिया गया पैसा कम ही डूबता है.
  • आपस में उधारी की बात पतिपत्नी को एकदूसरे से छिपाना नहीं चाहिए.

जब बात उलझ जाए

इन तमाम एहतियातों को बरतने के बाद भी बात उलझ जाए तो रिश्तेदारी या दोस्ती का टूटना एक तय बात है जिस का जिम्मेदार लेने वाला ही होता है. एक कैमिस्ट अनिल कुमार ललवानी की मानें तो उधार लेने वाले के बाद अपने वाले भी कतराने लगते हैं जिस से देनदार का तनाव व ब्लडप्रैशर और बढ़ जाता है.

वक्त का तकाजा है कि आपस के हर लेनदेन की लिखापढ़ी हो, यह कतई हर्ज या शर्म की बात नहीं बल्कि इस से संबंध पूर्व की तरह बने रहते हैं. अगर उधारी की रकम बड़ी है और उस की मियाद ज्यादा है तो ब्याज लेने में भी हर्ज नहीं. अगर यही राशि देने वाला बैंक में जमा करेगा तो उसे ब्याज तो मिलता जो उस का हक है.

भोपाल के एक अधिवक्ता महेंद्र श्रीवास्तव का कहना है, ‘‘आपस में लिखापढ़ी न होने से देने वाला अदालत नहीं जा पाता और अपनी नादानी पर पछताता रहता है. मौखिक लेनदेन को अदालत में साबित करना मुश्किल होता है. कोर्ट में कागजी लिखापढ़ी ही कारगर होती है लेकिन उस पर 2 गवाहों के दस्तखत होने चाहिए.’’

जब उधारी लेने वाला न देने की ठान ही ले तो उस से पैसे निकलवाना दुष्कर काम है. बात यहीं से बिगड़ती है, इसलिए पहली कोशिश आपस में लेनदेन से बचने की होनी चाहिए. रिश्ते पैसों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं होते. लेकिन मदद का जज्बा है तो बेहतर है मांगने वाले को किसी तीसरे से दिलवाएं और लिखापढ़ी करवाएं.

रखें इन बातों का ध्यान

  • 1 लाख रुपए तक या इस से ज्यादा की उधारी की लिखापढ़ी करना शर्म या हर्ज की बात नहीं. याद रखें आप मदद कर रहे हैं, इसलिए अपनी कमाई व बचत के पैसों के प्रति सजग रहना आप की जिम्मेदारी है, न कि लेने वाले की.
  • लिखित दें या मौखिक दें, उधारी के पैसों की समयसीमा जरूर तय करें, जिस से लेने वाले पर वक्त के भीतर चुकाने की बाध्यता रहे.
  • रिश्तेदारी और दोस्तीयारी में उधार मांग कर वापस न लौटाने वाले कुख्यात लोगों को टरकाना ही बेहतर होता है.
  • रिश्तेदारी में ब्याज लेना एक असमंजस वाली बात है, इस से यथासंभव बचा जाना चाहिए. आप कोई बनिए या सूदखोर नहीं हैं जो जरा सी रकम के लिए रिश्तेदारी में अपनी इमेज बिगाड़ें. यही बात दोस्तों पर लागू होती है.
  • सब से अहम बात यह है कि पहले देख लें कि आप के पास देने लायक अतिरिक्त पैसा है या नहीं. भावुकता में खुद यहांवहां से पैसा जुगाड़ कर किसी को उधार देना बुद्धिमानी की बात नहीं. इस के अलावा झूठी शान, भभके या दिखावे, रिश्तेदारी या दोस्ती में धाक जमाने के लिए उधार न दें.
  • हर समय तकाजा न करें, न ही 4 लोगों के सामने अपनी ही उधारी का गाना गाएं. इस से कुछ हासिल नहीं होता, सिवा इस के कि उधारी मांगने वाले कुछ दूसरे भी पैदा हो जाते हैं.
  • वक्त पर पैसा वापस न मिले तो धैर्य से काम लें और फिर नियमित अंतराल से तकाजा करें. इस के बाद भी बात न बने तो लेने वाले को अपमानित करने में हर्ज नहीं. लेकिन यह अपमान शिष्ट तरीके का होना चाहिए.
  • बड़ी उधारी अकाउंटपेयी चैक से दें. संकोच व रिश्तों को बनाए रखने की कोशिश में अकसर उधारी से  संबंध बिगड़ जाते हैं.

लेने वाले भी सोचें

  • यह न सोचें कि जिस अपने ने जरूरत के वक्त आर्थिक मदद की है या उस की मजबूरी या रिश्ता निभाने की शर्त थी, बल्कि सोचें यह कि उस ने उदारता और अपनापन दिखाया, इस बाबत उस के आभारी रहें.
  • अगर देने वाला अमीर है तो यह भी न सोचें कि उसे पैसों की क्या जरूरत. जब ज्यादा पैसे होंगे तब दे देंगे जैसी सोच से बचें, यह एक तरह की एहसानफरामोशी और चालाकी है जो अपनेपन को दरकाती है.
  • अगर तयशुदा वक्त पर किसी वजह से पैसों का इंतजाम न हो तो पूरे कारण और हालात से देने वाले को अवगत कराएं और मियाद बढ़वाएं. लेकिन ऐसा बारबार करना आप की इमेज बिगाड़ने वाली बात होगी, इसलिए वक्त पर पैसा लौटाने की कोशिश करें.
  • उधार ले कर कतराएं नहीं, बल्कि देनदार के संपर्क में रहें और कभीकभार उसे बताएं कि आप पैसा वापसी के प्रति गंभीर हैं, इस से उसे बेफिक्री रहेगी.
  • अगर रकम ज्यादा है तो खुद अपनी तरफ से वैधानिक लिखापढ़ी की पहल करें. इस से एक फायदा यह होगा कि आप भी लापरवाही के शिकार होने से बच जाएंगे.
  • उधार मांगने की नौबत महज जरूरत की वजह से नहीं, बल्कि कभीकभार आप के फुजूलखर्ची होने और बचत की आदत न होने से भी पड़ती है. इसलिए इस तरफ ध्यान दें कि खर्च आमदनी के मुताबिक रखें जिस से मांगने की नौबत ही न आए.

यह भी सोचें

  • अपनी नीयत साफ रखें, पैसा हड़पने की बात मन में न लाएं.
  • अगर देने वाला असमर्थता जता रहा है या कन्नी काट रहा है तो मांगने के लिए उस के पीछे न पड़ जाएं. इस से तो अपनापन उधारी की डील के पहले ही खत्म हो जाएगा.
  • जरूरत के वक्त आपस वालों से उधार लेना हर्ज या शर्म की बात नहीं. लेकिन आप खुद देखें कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आप अपना पैसा दबा कर उधार मांग रहे हैं. यह तो उधारी पूर्व की बेईमानी है, इस से बचें.
  • पैसा लौटाने के बाद हृदय देने वाले का आभार व्यक्त करें. यह न केवल शिष्टता की, बल्कि नैतिकता का भी तकाजा है.
  • एकमुश्त न दे पाएं तो ली गई राशि किस्तों में लौटाएं.

खून में डूबी ‘हिना’ : नफरत की अनूठी दास्तान

5 जुलाई, 2017 को इलाहाबाद और कानपुर के बीच स्थित जिला कौशांबी के थाना कोखराज के गांव पन्नोई के पास सड़क किनारे एक युवती की लाश पड़ी होने की खबर फैलते ही वहां अच्छीखासी भीड़ लग गई. लाश औंधे मुंह पड़ी थी. उस के आसपास खून भी फैला था, जो सूख कर काला पड़ चुका था. किसी ने इस बात की सूचना पुलिस कंट्रोलरूम को दी तो थोड़ी ही देर में पुलिस कंट्रोलरूम की सूचना पर थाना कोखराज पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई.

पुलिस ने लाश सीधी कराई तो पता चला कि युवती के माथे के बीचोबीच सटा कर गोली मारी गई थी. वहां बड़ा सा छेद स्पष्ट दिखाई दे रहा था. मृतका ने नीले रंग की जींस और गुलाबीसफेद रंग की डौटेड कुर्ती पहन रखी थी. शक्लसूरत और पहनावे से वह बड़े घर की लग रही थी.

थानाप्रभारी की सूचना पर एसपी अशोक कुमार पांडेय भी घटनास्थल पर आ गए थे. उन्होंने भी थानाप्रभारी बृजेश द्विवेदी के साथ घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. लाश के पास से कोई खोखा नहीं मिला था. वहां जितना खून फैला होना चाहिए था, वह भी नहीं था. इस से अंदाजा लगाया गया कि हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी.

पुलिस ने वहां जमा लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन शिनाख्त हो नहीं सकी. इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर पन्नोई गांव के चौकीदार की ओर से अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

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लाश की शिनाख्त के चक्कर में ही उस का पोस्टमार्टम 9 जुलाई को किया गया. 2 डाक्टरों अनुभव शुक्ला और रेखा सिंह के पैनल ने लाश का पोस्टमार्टम किया. इस की वीडियोग्राफी भी कराई गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मृतका के साथ दुष्कर्म हुआ था. वह प्रेग्नेंट भी थी. डाक्टरों ने दुष्कर्म और प्रेग्नेंसी टेस्ट के लिए स्वाब और स्मीयर प्रिजर्व कर लिए थे.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार,युवती की मौत करीब 115 से 120 घंटे पहले हुई थी. इस का मतलब लाश मिलने से करीब 40 घंटे पहले ही उस की हत्या हो चुकी थी यानी उस की हत्या 4/5 जुलाई की रात 12 से 1 बजे के बीच हुई थी. युवती के माथे से जिस तरह सटा कर गोली मारी गई थी, उस से साफ लगता था कि गोली मारने वाला उस का कोई करीबी था.

लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पोस्टमार्टम के बाद 10 जुलाई को पुलिस ने उस का अंतिम संस्कार करा दिया. कौशांबी पुलिस के लिए यह मामला एक चुनौती बन गया था, क्योंकि 7 दिनों बाद भी मृतका की पहचान नहीं हो सकी थी.

एसपी अशोक कुमार पांडेय ने लाश की शिनाख्त और मामले के खुलासे के लिए थाना पुलिस को तो लगाया ही, क्राइम ब्रांच की भी एक टीम को लगा दिया. घटना के 8 दिनों बाद यानी 12 जुलाई को लाश के फोटो वाट्सऐप, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर प्रसारित हुए तो किसी व्यक्ति ने फोन कर के क्राइम ब्रांच को बताया कि कौशांबी में मिली लाश हिना तलरेजा की है. फेसबुक पर इस का एकाउंट है.

पुलिस के लिए यह सूचना काफी महत्त्वपूर्ण थी. पुलिस ने हिना तलरेजा का एकाउंट खंगाला तो उस का पता और मोबाइल नंबर मिल गया. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो वह बंद था. उस की लोकेशन पता की गई तो उस की अंतिम लोकेशन इलाहाबाद के मीरापुर से सटे मोहल्ला दरियाबाद की मिली. उसी के आधार पर पुलिस ने अनुमान लगाया कि मृतका इलाहाबाद की रहने वाली हो सकती है.

इस के बाद क्राइम ब्रांच की टीम मृतका के घर वालों की तलाश में इलाहाबाद पहुंची. आखिर 4 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद 18 जुलाई को पुलिस उस की मां नीलिमा तलरेजा तक पहुंच गई. 18 जुलाई को थाना पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीम इलाहाबाद के मीरापुर पहुंची तो पता चला कि हिना वहां किराए पर रहती थी.

हिना की लाश का फोटो दिखाने पर मकान मालिक ने बताया कि यह फोटो हिना तलरेजा की है, महीने भर पहले यह अपनी मां के साथ उन के यहां किराए पर रहती थी, लेकिन उन्होंने उन से अपना मकान खाली करा लिया था. उस के पिता की मौत हो चुकी थी. उन के मकान से जाने के बाद मांबेटी कहां रह रही हैं, यह वह नहीं बता सके. उन्होंने यह जरूर बताया था कि हिना सिविल लाइंस स्थित किसी हुक्का बार में काम करती थी.

पुलिस खोजतेखोजते सिविल लाइंस स्थित उस हुक्का बार तक पहुंच गई, जहां हिना काम करती थी. हुक्का बार की मालकिन दामिनी चावला (बदला हुआ नाम) ने भी फोटो देख कर उस की शिनाख्त हिना तलरेजा के रूप में कर दी. उन के बताए अनुसार, खुद को पर्सनैलिटी मेकर बताने वाली हिना का इलाहाबाद के कई बारों में आनाजाना था. उसे शराब की लत लग चुकी थी. शराब का निमंत्रण मिलने पर वह किसी भी समय, किसी के भी साथ, कहीं भी चली जाती थी. कुछ दिनों पहले वह शराब पी कर एक बार में बेहोश हो गई थी, तब 2 लड़कों ने उसे अपनी कार से उस के घर पहुंचाया था.

दामिनी चावला के माध्यम से पुलिस हिना की मां तक पहुंची. वह मीरापुर में ही दूसरी जगह पर किराए पर रह रही थीं. पुलिस ने उन्हें फोटो दिखाई तो बेटी की लाश की फोटो देखते ही वह रो पड़ीं. पुलिस ने उन्हें शांत कराया तो उन्होंने बताया कि 4 जुलाई, 2017 की शाम 7 बजे वह दिल्ली जाने की बात कह कर घर से निकली थी. उसी दिन रात को उस ने 10:44 और 10:45 बजे अपनी 2 फोटो फेसबुक पर शेयर किए थे. उस के बाद से उस के एकाउंट पर कोई अपडेट नहीं था. उस ने मां से भी संपर्क नहीं किया था. वह तो यही समझ रही थीं कि हिना दिल्ली में है.

जांच आगे बढ़ाते हुए पुलिस ने हिना के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस के नंबर पर अंतिम बार जिन 2 लोगों से बात हुई थी, उन के नाम अदनान खान और खालिद थे. दोनों थाना शाहगंज के रहने वाले थे. पुलिस उन के घर पहुंची तो दोनों ही अपनेअपने घरों से गायब मिले. इस से पुलिस को उन पर शक हुआ.

पुलिस ने अदनान खान और खालिद के बारे में पता किया तो पता चला कि हिना ने फरवरी, 2015 में अदनान खान से लवमैरिज की थी. सबूत के तौर पर मैरिज सर्टिफिकेट भी पुलिस को मिल गया था. दोनों ने न सिर्फ शादी की थी, बल्कि रजिस्टर्ड भी कराया था. इस शादी से न हिना की मां खुश थीं और न अदनान के घर वाले. खालिद अदनान का दोस्त था.

पुलिस ने अदनान और खालिद के बारे में मुखबिरों से पता कराया तो पता चला कि वे मुंबई में हैं. पुलिस की एक टीम उन्हें पकड़ने के लिए मुंबई गई तो वे दोनों वहां नहीं मिले. पुलिस के पहुंचने से पहले ही वे वहां से भाग चुके थे. इसलिए पुलिस की टीम को खाली वापस आना पड़ा.

29 जुलाई, 2017 की सुबह थानाप्रभारी बृजेश द्विवेदी को अपने किसी मुखबिर से पता चला कि अदनान और खालिद रंगीलेछबीले मजार के पास घूमते देखे गए हैं. थानाप्रभारी पुलिस बल के साथ मजार पर पहुंच गए और उसे घेर लिया.

पुलिस से घिरा देख कर 3 युवक इधरउधर भागने लगे. उन में से 2 तो भाग गए, लेकिन एक पकड़ा गया. पता चला कि हट्टेकट्टे बदन वाला वह युवक अदनान खान है. उसे थाना कोखराज लाया गया, जहां पूछताछ में बड़ी आसानी से उस ने हिना की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

अदनान के बताए अनुसार, उसी ने अपने 2 दोस्तों खालिद और विक्की के साथ मिल कर हिना की हत्या की थी. उस का कहना था कि उस के पास उस की हत्या के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं बचा था. ब्लैकमेल करकर के उस ने उस का जीना हराम कर दिया था. तंग आ कर उस ने गोली मार कर उस की हत्या कर दी थी. उस ने हिना तलरेजा की हत्या की जो कहानी सुनाई थी, वह इस प्रकार थी—

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23 साल की हिना तलरेजा इलाहाबाद के मोहल्ला मीरापुर की रहने वाली थी. रतन कुमार तलरेजा और नीलिमा तलरेजा की एकलौती संतान होने की वजह से वह लाड़प्यार में पलीबढ़ी थी. मांबाप के लाड़प्यार ने उसे काफी जिद्दी बना दिया था. वह जो मांगती थी, उसे मिल जाता था. वह जो चाहती थी, वही करती थी. मांबाप ने उसे कभी रोकाटोका नहीं.

हिना खूबसूरत भी थी और महत्त्वाकांक्षी भी. वह इतनी दौलत कमाना चाहती थी कि दुनिया की हर चीज उस के कदमों में हो. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार थी. पढ़ाईलिखाई के साथसाथ उसे अच्छे फैशनेबल कपड़े पहनने और बनठन कर रहने का भी शौक था.

उस ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स भी किया था. उसी बीच उस की दोस्ती कुछ अमीर लड़कों से हो गई तो वह उन्हीं के बीच ज्यादा समय बिताने लगी. धीरेधीरे यह उस का शौक बन गया. अमीरजादों के साथ रह कर उसे बीयर की ऐसी लत लगी कि बीयर के बिना वह रह ही नहीं सकती थी.

हिना पूरी तरह स्वच्छंद हो चुकी थी. वह किसी भी तरह की शर्म भी नहीं करती थी. खुलापन उसे अच्छा लगता था. विचार भी उस के वैसे ही थे. वह कुछ कर पाती, उस के पहले ही अचानक उस के पिता की मौत हो गई. पिता की मौत के बाद उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं रहा. मां थी सीधीसादी, उस के कहने का उस पर कोई असर नहीं पड़ता था. वह वही करती थी, जो उस का मन करता था.

पिता की मौत के बाद हिना ने अपना खर्चा चलाने के लिए सिविल लाइंस स्थित एक हुक्का बार में नौकरी कर ली. पुलिस के अनुसार, हिना जिस हुक्का बार में नौकरी करती थी, वह वहां अन्य काम करने वालों की तरह नहीं रहती थी. कहते हैं, हुक्का बार में उस का जलवा मालिक से भी बढ़ कर था.

उस का फैशन, बातचीत का लहजा वहां आने वाले बड़े से बड़े रईसजादों को भी मात देता था. उस की अदाएं और ग्लैमर लोगों को न सिर्फ लुभाता था, बल्कि उस की ओर आकर्षित कर के उस का नजदीकी भी बना देता था. यही वजह थी कि हिना की फ्रैंड सर्किल में शहर के बड़े से बड़े रईसजादे शामिल थे.

31 साल का अदनान खान रईस मांबाप की बिगड़ी औलाद था. पुलिस के अनुसार, अदनान के पिता अहमद खान शहर के बड़े कारोबारियों में हैं. अदनान पिता की कमाई दोस्तों पर उड़ाता था. खालिद और विक्की उस के खास दोस्त थे. दोनों परछाई की तरह उस के साथ लगे रहते थे. उस के अच्छेबुरे हर काम में उस का साथ देते थे.

अदनान फेसबुक पर काफी सक्रिय रहता था. फेसबुक पर उस ने हिना का फोटो देखा तो वह उसे भा गई. फेसबुक पर हिना का परिचय देखा तो उसे यह जान कर बड़ी खुशी हुई कि वह इलाहाबाद की ही रहने वाली है. उस में हिना का मोबाइल नंबर भी था. उस ने हिना से बात की तो उस ने बता दिया कि वह सिविल लाइंस स्थित हुक्का बार में काम करती है. फिर क्या था, अदनान उस से मिलने वहां पहुंच गया.

वह अपने दोस्तों के साथ सिविल लाइंस स्थित हुक्का बार में हिना से मिला तो उसे देख कर उस पर मर मिटा. इस के बाद वह हर दिन वहां जाने लगा. उस ने पहले हिना से जानपहचान बनाई, उस के बाद दोस्ती कर ली. अदनान आकर्षक पर्सनैलिटी वाला युवक तो था ही, पैसे वाले बाप की बिगड़ी औलाद भी था. इसलिए हिना को भी उस में रुचि पैदा हो गई. दोनों ने एकदूसरे में रुचि दिखाई तो उन्हें प्यार हो गया. फिर तो हिना अकसर अदनान के साथ दिखाई देने लगी. यह सन 2015 की बात है.

अदनान और हिना का प्यार गहराया तो दोनों ने शादी का फैसला कर लिया. हिना हिंदू थी, जबकि अदनान मुसलिम. हिना की मां नीलिमा ने इस शादी से मना कर दिया. अदनान के घर वाले भी इस शादी के लिए राजी नहीं थे. ऐसे में हिना और अदनान ने घर वालों से बगावत कर के मसजिद में निकाह कर लिया.

बेटी की इस हरकत से नाराज हो कर नीलिमा ने उस से बात करना बंद कर दिया. हिना पहले से ही आजाद थी, अब और आजाद हो गई. क्योंकि अब कोई रोकनेटोकने वाला नहीं रहा. एक साल तक तो अदनान और हिना में खूब पटी, लेकिन उस के बाद संबंध बिगड़ने लगे. इस की वजह यह थी कि हिना खुले हाथों खर्च करने वालों में थी. अब अदनान को उस का खर्चा उठाना भारी पड़ने लगा था.

हिना अदनान से शादी के बाद भी हुक्का बार की नौकरी कर रही थी. अदनान को यह पसंद नहीं था. इस के अलावा हिना की आदतों को बदलने के लिए वह उसे कहीं भी आनेजाने से रोकने लगा. वह उसे एक अच्छी बीवी की तरह देखना चाहता था, पर हिना तो पूरी तरह बिगड़ चुकी थी. वह मनमानी कर रही थी, जबकि अदनान रोक रहा था. बस, दोनों में विवाद होने लगा, जिस से रिश्तों में खटास आने लगी.

आखिर एक दिन दोनों में काफी तकरार हो गई. परिणामस्वरूप दोनों अलग रहने लगे. पति से अलग होने के बाद हिना शराब भी पीने लगी. जल्दी ही उसे शराब की ऐसी लत लग गई कि वह शराब पीने के लिए दोस्तों के साथ कभी भी, कहीं भी जाने लगी. इस तरह दोस्तों के साथ रात बिताना उस के लिए आम बात हो गई.

हिना के जाने के बाद अदनान ने हिना को बताए बगैर दूसरी शादी कर ली. लेकिन इस तरह की बातें छिपी कहां रहती हैं, हिना को भी उस की शादी की जानकारी हो गई. चूंकि उस का हिना से तलाक नहीं हुआ था, इसलिए जानकारी होते ही उस ने अदनान के खिलाफ कोहना पुलिस चौकी में शिकायत दर्ज करा दी. शिकायत दर्ज कराने की जानकारी अदनान को हुई तो उस ने माफी मांग कर किसी तरह उसे मना लिया.

अदनान ने माफी मांग कर किसी तरह हिना को मना तो लिया था, लेकिन वह जानता था कि हिना इतनी आसानी से उस का पीछा छोड़ने वाली नहीं है. वह उस की दूसरी शादी को कभी स्वीकार नहीं करेगी. हुआ भी यही, हिना ने साफसाफ कह दिया कि वह उसी के साथ जीना और मरना चाहती है. अगर उस ने ऐसा नहीं किया तो वह उस का जीवन नरक बना देगी. हिना की इस धमकी से अदनान डर गया और परेशान रहने लगा.

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दूसरी शादी कर के अदनान ने अपनी परेशानी बढ़ा ली थी. हिना लगातार उस से पैसों की डिमांड करती रहती थी, नईनई जगह घुमाने को कहती थी.

दूसरी तरफ अदनान की पत्नी को भी शक होने लगा था. उसे लगता था कि हिना के अभी भी उस के पति से संबंध हैं. दूसरी बीवी को किसी कीमत पर अदनान खोना नहीं चाहता था. ऐसा ही उस की बीवी के साथ भी था. यही वजह थी कि अदनान हिना को रास्ते से हटाने के बारे में सोचने लगा.

काफी सोचविचार कर आखिर अदनान ने हिना को खत्म करने का निर्णय ले लिया. यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था. इसलिए अपने दोस्तों खालिद और विक्की से बात की तो वे इस काम में उस का साथ देने को तैयार हो गए. फिर तीनों ने बैठ कर हिना को खत्म करने की योजना बना डाली. उसी  के तहत उस ने एक पिस्टल खरीदी.

योजना के मुताबिक, 4 जुलाई की शाम अदनान ने हिना को फोन किया और होटल में खाना खाने के लिए दरियाबाद बुलाया. उस के बुलाने पर हिना टैंपो से दरियाबाद पहुंच गई. घर से निकलते समय उस ने मां नीलिमा तलरेजा से कहा था कि वह दिल्ली जा रही है.

‘‘क्यों, दिल्ली क्यों जा रही है?’’ नीलिमा ने पूछा.

‘‘मम्मी, वहां थोड़ा काम है, मैं जल्दी ही आ जाऊंगी.’’

‘‘बेटी, तुम अपने काम के तरीके बदल लो, जमाना बहुत खराब है. देखो न, अखबारों में रोज तरहतरह की खबरें छपती रहती हैं. जिस तरह काम चल रहा है, चलने दो. हमें पैसे से ज्यादा तुम्हारी जरूरत है बेटी.’’ नीलिमा ने हिना को समझाते हुए कहा.

‘‘कहा न, मैं जल्दी ही लौट आऊंगी. मम्मी, आप बेकार ही परेशान हो रही हैं. 2-4 दिनों की ही तो बात है. अपना खयाल रखना. खानेपीने का भी ध्यान रखना.’’ हिना ने कहा.

‘‘वैसे भी तू मेरी कहां सुनने वाली है. कभी सुना है कि आज ही सुनेगी. हमेशा से अपनी मरजी की करती आई है और आज भी करेगी. तू भी अपने खानेपीने का खयाल रखना और जल्दी से जल्दी वापस आ जाना.’’ नीलिमा ने हिना को समझाया.

नीलिमा हिना को समझा ही रही थीं कि वह घर से निकल गई. वह दरियाबाद पहुंची तो चौराहे पर अदनान कार लिए खड़ा था. उस के साथ खालिद और विक्की भी थे. हिना के आते ही अदनान ने कहा, ‘‘आज मौसम बड़ा सुहाना है, इसलिए चलो किसी ढाबे पर खाना खाते हैं.’’

अदनान के मन में क्या है, हिना को क्या पता था. इसलिए वह उन के साथ जाने को तैयार हो गई. सभी कार में बैठ गए. कार खालिद चला रहा था. कार कानपुर जाने वाली रोड पर चल पड़ी. रास्ते में चारों ने बीयर पी. रात 10 बजे के करीब कौशांबी के मूरतगंज स्थित एक ढाबे पर सब ने खाना खाया. खाना खाने के बाद चारों फिर चल पड़े. कार में बैठेबैठे ही हिना ने 2 सेल्फी ली और उन्हें फेसबुक पर पोस्ट कर दी. हलके नशे में हिना काफी खुश थी.

खालिद ही अभी भी कार चला रहा था. विक्की उस की बगल वाली सीट पर बैठा था. हिना और अदनान पिछली सीट पर बैठे थे. ढाबे से कुछ दूर जाने के बाद अदनान की वासना जाग उठी. उस ने हिना से शारीरिक संबंध बनाने की बात की तो उस ने मना कर दिया. इस के बाद उस ने चलती गाड़ी में ही उस के साथ जबरदस्ती की. इस के बाद विक्की और खालिद ने भी बारीबारी से जबरदस्ती की.

उन लोगों की इस हरकत से हिना बुरी तरह बौखला उठी और जोरजोर से चीखनेचिल्लाने लगी. हिना के चिल्लाने से अदनान और उस के साथी डर गए. कोई बवाल हो, उस के पहले ही अदनान ने झट से पिस्टल निकाली और हिना के माथे पर बीचोबीच रख कर गोली चला दी. उसी एक गोली में हिना ढेर हो गई.

इस के बावजूद अदनान को डर था कि कहीं हिना बच न जाए. आश्वस्त होने के लिए उस ने उस के गोली वाले घाव में चाकू डाल कर घुमा दिया. इस के बाद उस के दोनों मोबाइल फोन और पर्स ले लिया, ताकि उस की शिनाख्त न हो सके. लाश को उन्होंने वहां से थोड़ी दूर स्थित पन्नोई गांव के पास सड़क के किनारे फेंक दिया और इलाहाबाद लौट आए.

अदनान ने खालिद और विक्की को उस रात अपने घर पर ही रोक लिया था. रात तीनों ने एक साथ सोए थे. अगले दिन से तीनों रोजाना अखबारों में देखने लगे कि हिना की पहचान हुई या नहीं?

13 जुलाई को अखबारों में छपा कि लाश की शिनाख्त हो गई है तो तीनों के हाथपांव फूल गए. 14 जुलाई को तीनों अपनाअपना घर छोड़ कर मुंबई भाग गए. लाश की शिनाख्त होने के बाद कौशांबी पुलिस इलाहाबाद के मीरापुर पहुंची तो हिना की जिंदगी की सच्चाई सामने आ गई.

खुलासा होने के बाद पुलिस ने अज्ञात की जगह अदनान खान, खालिद और विक्की को नामजद आरोपी बना दिया. अदनान के दोनों साथियों खालिद और विक्की को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस उन के ठिकानों पर छापा मारने लगी, लेकिन वे नहीं मिले. कथा लिखे जाने तक उन की गिरफ्तारी नहीं हो सकी थी.

अदनान खान को पुलिस ने अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. उस की वह कार भी पुलिस ने बरामद कर लिया था, जिस में हिना की हत्या हुई थी. अदनान ने जो किया, शायद उसे उस के गुनाहों की सजा मिल जाए, लेकिन हिना ने समाज की वर्जनाओं को तोड़ कर खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी. हर रात आंखों में नए सपने सजाने वाली बिंदास हिना ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उस की जिंदगी इस तरह छिन जाएगी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में दामिनी चावला परिवर्तित नाम है.

– साथ में राजीव वर्मा

बाघ से 2-2 हाथ

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उत्तराखंड के जिला उत्तरकाशी के तहत आने वाले गांव खट्टूखाल में रहने वाले सुमेर सिंह की शादी बरसों पहले छवि से हुई थी. घर के सारे लोग खेतीबाड़ी और पशुपालन से जुड़े थे. छवि भी ससुराल आने के बाद छवि भी घरगृहस्थी के कामों के अलावा खेतीबाड़ी के भी काम करने लगी थी. जंगली जानवरों से खेतों की रखवाली के लिए अगर उसे खेतों पर भी रुकना पड़ जाता तो वह मचान पर रातरात भर जागते हुए पहरा देने से पीछे नहीं हटती थी.

रात के वक्त अगर कोई जंगली जानवर खेतों की तरफ आ जाता तो वह ऊंची आवाज में हांक लगा कर उसे भगा देती थी. खेतों की रखवाली करते वक्त वह अपने साथ एक मजबूत डंडा रखती थी. घर पर भी वह हमेशा चौकस रहती थी. पहले जंगली जानवर आ कर गांव के अन्य घरों की तरह उस के घर भी नुकसान कर जाते थे. लेकिन जब से छवि ब्याह कर आई थी, उस ने अपने घर का कभी नुकसान नहीं होने दिया था.

इन्हीं खूबियों की वजह से छवि का अपनी ससुराल में खूब आदरसम्मान था. सभी उसे पसंद करते थे. देखतेदेखते छवि एक बेटी और 2 बेटों की मां बन गई. 3 बच्चे होने के बाद भी वह न जिस्मानी रूप से कमजोर हुई थी, न ही उस के आत्मबल में जरा भी कमी आई थी. वक्त के साथ बच्चे बड़े होने लगे तो वह भी बुढ़ापे की ओर बढ़ने लगी.

गांव खट्टूखाल की भौगोलिक स्थिति कुछ इस तरह से थी कि यह गांव चारों तरफ से घने जंगलों से घिर हुआ है. इस गांव से जो सब से करीबी गांव है, वह 6 किलोमीटर की दूरी पर है. रास्ता भी जंगल से ही हो कर जाता है. मुख्य सड़क पर जाने के लिए करीब डेढ़ किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है. यह सफर ज्यादातर दिन में ही तय किया जाता है. क्योंकि रात में जंगली जानवरों के हमले का खतरा बना रहता है.

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मुख्य सड़क पर पहुंच कर नजदीकी कस्बा है देवीधर, जो वहां से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर है. कुछ दिनों पहले की बात है. रविवार का दिन था. बच्चे घर पर ही थे. छवि खेतों पर जाने लगी तो उस की बेटी अंजलि भी उस के साथ चल दी. अब तक वह 17 साल की हो चुकी थी. मांबेटी घर से निकली ही थीं कि गांव की एक लड़की ललिता भी उन के साथ हो ली. वह भी अंजलि की हमउम्र थी.

इन के खेत घर से 4 किलोमीटर की दूरी पर थे. सुमेर सिंह के हिस्से में खेतों की 16 सीढि़यां थीं, इन्हीं में से एक जगह उस ने छानी बना रखी थी. छानी एक झोपड़ी की तरह होती है, जिस में मुख्यत: पशु बांधे जाते हैं. लेकिन बरसात के दिनों में अगर खेतों में रुकना पड़ जाए तो छानी रुकने के भी काम आती है.

सुमेर ने अपनी छानी में 5 भैंसें पाल रखी थीं. जिन की देखभाल के लिए एक कारिंदा रहता था. छवि अकसर अपने खेतों पर जाया करती थी. कभीकभार रात होने पर वह छानी में ही रुक जाती थी. चूंकि सावन का सोमवार आने वाला था. उस दिन गांव की कई महिलाओं को व्रत के लिए छाछ की जरूरत पड़ती थी. इस के लिए छवि छानी पर ही छाछ तैयार किया करती थी. वहां से गांव लौट कर वह महिलाओं को मुफ्त में छाछ बांट देती थी.

उस दिन भी वह इसी मकसद से अपनी बेटी अंजलि को ले कर छानी पर जा रही थी कि गांव की लड़की ललिता भी उन के साथ हो ली थी. छानी पर पहुंच कर तीनों ने भैसों के दूध से जमाए दही की छाछ बनानी शुरू कर दी. रात में कारिंदे को छुट्टी दे कर छवि बेटी अंजलि और ललिता के साथ छानी में ही सो गई.

दिन भर मेहनत की थी, इसलिए थकेहारे होने के कारण लेटते ही सब को नींद आ गई. भैंसें छानी से बाहर बंधी थीं. अंजलि और ललिता को छानी के भीतर सुला कर छवि भी भैसों से कुछ दूरी पर चारपाई बिछा कर लेट गई. छवि के पास घड़ी तो थी नहीं, जो वह टाइम देख पाती, फिर भी उस का अनुमान है कि उस वक्त आधी रात का एक बज रहा होगा, जब अचानक उस की आंख खुल गई.

छवि को लगा कि कोई उसे सिर के बालों से पकड़ कर तेजी से घसीटते हुए ले जा रहा है. छवि की समझ में नहीं आया कि आखिर वह कौन है, जो इस तरह तेजी से उसे घसीटते हुए ले जा रहा है. वह करीब 50 मीटर तक घिसटती चली गई. कुछ ही देर में हरेभरे खेतों से घिसटती हुई वह कंटीली झाडि़यों पर आई तो उस का जिस्म बुरी तरह छिल गया.

झाडि़यों के पास ही बरसाती नाला था, जिस के पास मुलायम दूब वाली जगह थी. छवि अपने पशुओं को चराने के लिए अकसर वहां लाया करती थी. बालों से खींच कर वहां तक लाने वाले ने उसे उस दूब पर पटक दिया.

अब तक उस के हवास दुरुस्त हो चुके थे. उस ने देखा, उसे यहां तक घसीट कर लाने वाला एक खूंखार बाघ था. उस की लंबाई 7-8 फुट से कम नहीं थी. वह खूंखार बाघ छवि के सिर के बाल अपने मुंह में दबाए उसे घसीटता हुआ वहां तक लाया था. यह जानकारी होते ही छवि की घिग्गी बंध गई.

बाघ के रूप में छवि को अपनी मौत साफसाफ दिखाई दे रही थी. उस ने सुन रखा था कि बाघ पकड़ में आए शिकार को कभी नहीं छोड़ता. पहले वह उसे शिथिल करता है, फिर उस की श्वांस नली पर हमला कर के नली को पंक्चर कर देता है, जिस से धीरेधीरे उस के शिकार की मौत हो जाती है. बाद में वह अपने शिकार को सुरक्षित जगह पर ले जा कर आराम से खाता है.

जो भी था, छवि को अपने बचाव का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था. फिर भी वह हिम्मत कर के उठी और वहां से भागने लगी. बाघ ने लपक कर उस की गर्दन अपने जबड़ों में दबोच ली. छवि की गर्दन पर उस के दांत गड़ गए.

दर्द से छवि की चीख निकल गई. एक पल के लिए उस ने सोचा कि अब वह नहीं बच पाएगी. उस की मौत निश्चित है. लेकिन उस के सोचने की शक्ति अभी खत्म नहीं हुई थी. उस ने मन ही मन अपना आत्मबल बटोर कर सोचा कि बाघ का निवाला तो बनना ही है. जब मौत तय है तो क्यों न मरने से पहले एक बार मौत का मुकाबला कर लिया जाए. छवि ने अपनी सारी हिम्मत जुटाई और एक हैरान करने वाला फैसला ले लिया.

छवि ने चीखते हुए अपने दोनों हाथ बाघ के मुंह में डाले और पूरी ताकत से उस के दोनों जबड़ों को फैलाना शुरू किया, ताकि उस के दांत उस की गर्दन पर ज्यादा गहराई तक न गड़ सकें. इस के साथ ही उस ने अपनी लात से बाघ के पेट पर 2-3 भरपूर वार किए.

उस के ऐसा करने से चमत्कार सा हुआ. जो बात सोची भी नहीं जा सकती थी, आर्श्चजनक रूप से वह हो गई. छवि की जबरदस्त हिम्मत और ताकत के सामने बाघ के जबड़े की पकड़ ढीली पड़ गई, जिस से छवि की गर्दन भी उस की पकड़ से मुक्त हो गई.

बाघ को कमजोर पड़ते देख छवि ने पूरी ताकत से उस के पेट पर लात मारी, साथ ही उस के जबड़े चीरने का प्रयास करने लगी. उस ने पूरी ताकत लगा कर बाघ को एक जोर का धक्का दिया तो बाघ पीछे जा गिरा. छवि उस के चंगुल से मुक्त हुई तो उस की हिम्मत चौगुनी हो गई. उस ने पास ही पड़ा बड़ा सा पत्थर उठा कर उस पर दे मारा.

पत्थर बाघ के सिर पर लगा. अपनी प्रवृति के अनुसार, हिंसक जानवर चोट खाने के बाद ज्यादा उग्र और आक्रामक हो उठते हैं. लेकिन यहां उलटा हुआ. एक अबला नारी की गर्जना और हिम्मत से बाघ का हौसला पस्त हो गया. घबरा कर वह तेजी से पलटा और जंगल की ओर भाग निकला.

छवि बुरी तरह जख्मी थी. गर्दन से खून बह रहा था. लेकिन उस ने हौसला नहीं खोया. शायद इसी के चलते वह पूरी ताकत से चीखी. उस के गले से निकली आवाज रात की निस्तब्धता को चीर गई. वह पूरा जोर लगा कर अंजलि और ललिता को पुकारने लगी.

कुछ ही देर में हड़बड़ाई हुईं दोनों लड़कियां वहां पहुंच गईं. छवि की हालत देख कर दोनों रोती हुईं ‘बचाओ बचाओ’ की गुहार लगाने लगीं. उसी बीच छवि ने पहनी हुई धोती का टुकड़ा फाड़ कर अपनी गर्दन में बांध लिया था. इस का फायदा यह हुआ कि काफी हद तक घाव से खून बहना रुक गया.

लड़कियों से चीड़ के पेड़ के छिलके मंगवा कर छवि ने आग जलाई. उल्लेखनीय है कि जंगली जानवर आग के नजदीक नहीं आते. उन्हें भरोसा था कि आग देख कर बाघ उन के पास नहीं आएगा, वरना वह फिर से हमला कर सकता था, बल्कि अब तो छवि के साथसाथ उस की बेटी अंजलि व उस की सहेली ललिता भी खतरे के दायरे में आ गई थीं.

खैर, इस के बाद छवि के कहने पर लीसे वाले छिलके को एक डंडे पर बांधा गया. उसे मशाल की तरह जला कर तीनों रात के अंधेरे में जंगली रास्ते से 4 किलोमीटर पैदल चल कर अपने गांव आ गईं. घर के बरामदे में पहुंच कर छवि निढाल सी हो कर पोल के सहारे बैठ गई. दोनों लड़कियों ने पहले की तरह रोते हुए शोर मचाना शुरू कर दिया.

शोर सुन कर सब से पहले सुमेर सिंह अपने कमरे से निकला. फिर घर के अन्य लोगों के अलावा पासपड़ोस के तमाम लोग जमा हो गए. हर शख्स यह सुन कर हैरान था कि छवि ने खुद को एक बाघ के चंगुल से बचा लिया था. लोग छवि को तुरंत अस्पताल ले जाने पर विचार करने लगे. किसी ने कहा कि चारपाई पर डाल कर ले जाते हैं तो किसी ने सलाह दी कि कंधे पर उठा कर ले जाया जाए.

लेकिन छवि ने कहा कि वह सड़क तक पैदल चली जाएगी, वहां से गाड़ी का इंतजाम कर लो. ऐसा ही किया गया. सुमेर ने अपने एक परिचित यजविंदर सिंह परमार को अपनी गाड़ी ले कर सड़क पर पहुंचने को कहा. देवीधार में यजविंदर की कंस्ट्रक्शन कंपनी है. वह अपनी गाड़ी ले कर बताई गई जगह पर पहुंच गया.

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घायल अवस्था में ही छवि अपने पति और अन्य लोगों के साथ डेढ़ किलोमीटर पैदल चल कर सड़क पर पहुंची. वहां से उसे देवीधार ले जाया गया. उस वक्त रात के 3 बजे से ज्यादा का समय हो गया था. इतनी रात को कोई डाक्टर न मिलने पर बोलेरो का रुख डुंडा की ओर कर दिया गया.

छवि को ले कर जब वे लोग सरकारी प्राथमिक चिकित्सालय पहुंचे तो ड्यूटी पर मौजूद डाक्टर ने मामला देखते ही घायल को किसी बड़े अस्पताल ले जाने को कहा. तब ये लोग वहां से 17 किलोमीटर दूर उत्तरकाशी के जिला अस्पताल पहुंचे, जहां इमरजेंसी में छवि का चैकअप करते ही डाक्टरों ने कहा कि इस की जान बचाना चाहते हैं तो तुरंत देहरादून के दून अस्पताल जाओ.

वहां से चलते वक्त साथ आए लोगों ने डाक्टरों की बातें सुन ली थीं. वे हैरान हो कर कह रहे थे कि यह औरत यहां तक पहुंच  गई है तो यह इस के आत्मबल और साहस का ही कमाल है, वरना जख्म जितना गहरा है, वह भी बाघ के दांतों का, इसे तो रास्ते में ही दम तोड़ देना चाहिए था.

खैर, छवि को ले कर वे सब उत्तरकाशी से 220 किलोमीटर दूर देहरादून पहुंचे. वहां अस्पताल के डाक्टरों की टीम ने छवि का तुरंत इलाज शुरू कर दिया, पर घाव की स्थिति देख कर उन्होंने भी अपने हाथ खींच लिए. एक सीनियर डाक्टर ने कहा, ‘‘केस इतना सीरियस है कि हम इस की जान बचाने के लिए अभी कुछ नहीं कर पाएंगे. यहां के हरिद्वार रोड पर बहुत बड़ा हौस्पीटल है सीएमआई. आप लोग इन की जान बचाना चाहते हैं तो इन्हें वहां ले जाएं.’’

कंबाइंड मैडिकल इंस्टीट्यूट (सीएमआई) देहरादून का काफी अच्छा निजी चिकित्सा संस्थान है. छवि को तत्काल वहां पहुंचाया गया. वहां के डाक्टरों ने छवि का उपचार तो शुरू कर दिया, साथ ही उस के पति सुमेर सिंह से कहा, ‘‘यहां का इलाज बहुत महंगा है. हमें नहीं लगता कि यहां का खर्चा आप लोग उठा सकोगे.’’

‘‘डाक्टर साहब, मैं अपने खेत और घर वगैरह सब बेच दूंगा, बस आप मेरी पत्नी को बचा लें. मेरी और मेरे बच्चों की जिंदगी इसी के साथ है.’’ सुमेर सिंह ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा.

इस पर छवि का औपरेशन करने के लिए बाहर से एक स्पैशलिस्ट को फोन किया गया. 10 मिनट में ही स्पैशलिस्ट डाक्टर आ पहुंचे. पर जैसे ही उन्होंने गर्दन का घाव चक किया, उन्होंने भी अपने हाथ खड़े कर दिए. कहा, ‘‘इस का इलाज कर पाना मेरे लिए संभव नहीं है, आप इन्हें चंडीगढ़ के पीजीआई ले जाएं. वहां शायद इन की जान बच जाए.’’

पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट औफ मैडिकल साइंसेज (पीजीआई) चंडीगढ़ का विश्वविख्यात मैडिकल संस्थान है. 250 किलोमीटर का सफर तय कर के छवि के घर वाले पीजीआई आ पहुंचे. इमरजेंसी में उस वक्त डा. ऋषि मणि श्रीवास्तव ड्यूटी पर थे. उन्होंने तुरंत छवि का चैकअप किया.

छवि की गर्दन पर बाघ के दांतों का 10×6 सेंटीमीटर का ऐसा घाव था, जिस ने भीतर का सिस्टम पूरी तरह सें तहसनहस कर दिया था. उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी. वह बोल भी नहीं पा रही थी. घाव चूंकि बाघ का था, इसलिए यह केस और भी खतरनाक और गंभीर था.

डा. ऋषि का संबंध डिपार्टमेंट औफ ओटोलारिनजोलौजी एंड हैड नेक सर्जरी से था. उन्होंने तुरंत इस इमरजेंसी केस के बारे में अपने एचओडी प्रोफेसर ए.के. गुप्ता से संपर्क किया. प्रो. गुप्ता ने भी तत्काल इमरजेंसी वार्ड में पहुंच कर छवि की हालत का मुआयना किया. तय हुआ कि डाक्टरों की टीम को तुरंत औपरेशन करना होगा.

प्रो. गुप्ता की अगुवाई में बनी इस टीम में डा. ऋषि मणि श्रीवास्तव के अलावा 2 अन्य सर्जनों डा. श्रुति व डा. निशिकांत को शामिल किया गया. डा. श्रीवास्तव के बताए अनुसार, यह एक नितांत मुश्किल एवं उलझा हुआ औपरेशन था, जो निरंतर 7 घंटों तक चला. मगर डाक्टरों को खुशी थी कि उन के प्रयास हर तरह से सफल रहे.

औपरेशन पूरी तरह कामयाब रहा. छवि की कट चुकी नसों को सफलतापूर्वक जोड़ दिया गया. उस के छोटेबड़े हर घाव को ठीक करने का प्रयास किया गया. उस की वोकल कौर्डस को काफी नुकसान पहुंचा था. सांस की नली में छेद हो गया था. लेकिन डाक्टर संतुष्ट थे कि उस की हर परेशानी पकड़ में आ गई थी. इन परेशानियों का इलाज भी सही रूप से होने लगा था.

औपरेशन के बाद 22 दिनों तक छवि को गहन औब्जर्वेशन में रखा गया. इस के बाद उसे तब डिस्जार्च किया गया, जब वह खाने और चलनेबोलने के काबिल हो गई. छवि जब स्वस्थ हो कर गांव लौटी तो सब ने इसे चमत्कार माना. पहले छवि की हिम्मत ने एक चमत्कार किया था कि बाघ के मुंह से वह अपनी गर्दन छुड़ा लाई थी. आगे मैडिकल साइंस ने चमत्कार किया कि पीजीआई के डाक्टरों ने उसे बचा लिया.

शिवराज को सिंधियाओं से डर लगता है

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बेहद टसल बाले मुंगावली और कोलारस विधानसभा उप चुनावों में कांग्रेस की जीत के अपने अलग सियासी माने हैं, जिसका असर सीधे सीधे इसी साल होने वाले तीन राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के आम चुनावों पर इस संदेश के साथ पड़ेगा कि भाजपा शासित इन राज्यों के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे सिंधिया और रमन सिंह अपनी पकड़ और प्रभाव खो रहे हैं.

राजस्थान के दो लोकसभा और एक विधानसभा उप चुनाव की करारी हार के सदमे से भाजपा अभी पूरी तरह उबर भी नहीं पाई थी कि नया झटका उसे मध्य प्रदेश की मुंगावली और कोलारस के नतीजों से लगा.

मुंगावली सीट से कांग्रेस के बृजेन्द्र सिंह यादव ने भाजपा की बाई साहब यादव को 2124 और कोलारस से कांग्रेस के महेंद्र सिंह यादव ने भाजपा के देवेंद्र जैन को 8083 वोटों से हराकर यह साबित कर दिया कि अभी भी मध्य भारत इलाके में सिंधिया राजघराने का दबदबा कायम है, जिसे चुनौती दे पाना या तोड़ पाना कम से कम शिवराज सिंह के बूते की बात तो नहीं.

ये दोनों चुनाव पूरी तरह सिंधिया बनाम शिवराज सिंह हो गए थे, जिनमे दोनों ने ही अपनी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. प्रचार के आखिरी सात दिन शिवराज केबिनेट के तमाम मंत्री इन दोनों सीटों पर घर घर जाकर भाजपा को जिताने मतदाताओं के हाथ जोड़ रहे थे. खुद शिवराज सिंह ने ऐलान कर दिया था कि पांच महीनों में सरकार यहां इतना विकास कर देगी जितना पांच सालों में भी नहीं हुआ. प्रचार में दोनों दलों ने साम, दाम, दंड, भेद सारे हथकंडे अपनाए थे. दोनों दलों की तरफ से नोट बांटने की शिकायतें हुईं थीं और हजारों फर्जी वोटरों के होने की बात भी उजागर हुई थी, कलेक्टरों के तबादले हुये थे और कई कार्यकर्ताओं के सर भी फूटे थे.

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ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से सांसद हैं, मुंगावली और कोलारस दोनों सीटें इसी संसदीय क्षेत्र में आती हैं जहां से साल 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा की लहर होने के बाद भी परचम लहराया था. शिवराज सिंह की मंशा और दिलचस्पी यह थी कि जैसे भी हो इस इलाके से सिंधिया घराने का सूपड़ा साफ किया जाये, जिससे कांग्रेस ज्योतिरादित्य को बतौर मुख्यमंत्री पेश न कर पाये, जो उनकी सरदर्दी की बड़ी वजह बन सकते हैं. शिवराज सिंह की लोकप्रियता को चुनौती देने का जोखिम ज्योतिरादित्य ने प्रचार में यह कहते उठाया था कि जनता मुझे चुन ले या शिवराज सिंह को चुन ले.

मतदाताओं के सामने यह बड़ी दुविधा थी एक तरफ सरकार और शिवराज के लुभावने लोलीपोप थे, तो दूसरी तरफ महाराज कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य का यह पासा था कि वह अगर शिवराज सिंह को चुनती है, तो वे फिर इस इलाके में झांकेगे नहीं. इसी कशमकश के चलते कांग्रेस बहुत कम वोटों से जीती, जिसे भाजपा अपनी उपलब्धि बताते हार की खिसियाहट पर लीपा पोती कर रही है.

यह मुंगावली और कोलारस के नतीजों का वह पहलू है जो हर किसी को नजर आ रहा है. दूसरे पहलू की स्क्रिप्ट खुद शिवराज सिंह ने साल भर पहले सिंधियाओं की ही प्रभाव वाली सीट अटेर के उपचुनाव प्रचार अप्रेल 2017 में यह कहते लिखी थी कि सिंधिया राजघराने के पूर्वज गद्दार थे और आजादी की लड़ाई के वक्त उन्होंने जनता का नहीं अंग्रेजों का साथ दिया था. तब शिवराज के इस बयान पर खासा बवाल मचा था और बवाल ज्योतिरादित्य ने नहीं बल्कि उनकी बुआओं यशोधरा राजे और वसुंधरा राजे ने मचाया था.

यशोधरा राजे ने तो मीडिया के सामने सुबकते हुये गिनाया था कि कैसे उनकी मां राजमाता विजया राजे सिंधिया ने अपने गहने तक बेच बेच कर पहले जनसंघ और फिर भाजपा को खड़ा करने में अपनी जिंदगी भी पार्टी के नाम कर दी थी और आज उसी पार्टी का जिम्मेदार नेता और मुख्यमंत्री कैसे और क्यों  इस तरह की अनर्गल बातें कह रहा है.

यशोधरा राजे के आंसू रंग लाये थे और भाजपा आलाकमान और आरएसएस ने शिवराज सिंह को चेतावनी दी थी कि वे सिंधिया घराने के पूर्वजों के बारे में कुछ न कहें, लेकिन ज्योतिरादित्य को जितना चाहें कोस लें.

तब दरअसल में शिवराज के निशाने पर यशोधरा राजे ही थीं, जिन्होंने कभी शिवराज सिंह के सामने झुक कर बात नहीं की थी और न अभी करती हैं. दोनों यदा कदा ही एक साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखे और जब भी दिखे तब तब यशोधरा राजे की राजसी ठसक भी उनके चेहरे पर दिखी. यह ठसक अभी भी शिवराज सिंह के कलेजे में नश्तर सरीखी चुभती है. शिष्टता और आरएसएस की खुशामद को हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहने वाले शिवराज सिंह के बारे में हर कोई जानता है कि उमा भारती और बाबूलाल गौर सरीखे आधा दर्जन दिग्गजों को अपने रास्ते से दूध में पड़ी मक्खी की तरह हटाया है, लेकिन यशोधरा राजे का वे बाल भी बांका नहीं कर पा रहे.

28 फरवरी को जब वोटों की गिनती चल रही थी, तब प्रादेशिक न्यूज चेनल्स पर भाजपा के पिछड़ की वजह गिनाते नेताओं, पत्रकारों और विश्लेषकों ने सब कुछ गिना डाला कि किसान व्यापारी कर्मचारी सभी भाजपा से नाराज हैं, युवा बेरोजगारी से त्रस्त हैं और सिंधिया के गढ़ में सेंधमारी करना उतना आसान काम है नहीं, जितना शिवराज सिंह और भाजपा समझते हैं, दूसरे शिवराज सिंह की लच्छेदार भाषण शैली और वादे करने के रोग से प्रदेश की जनता ऊब चली है. कुछ कुछ ने भाजपा की अंदरूनी कलह और फूट की तरफ भी इशारा किया.

लेकिन मुद्दे की बात देर रात शिवराज सिंह खेमे से इस चर्चा को तूल देना रही कि मुंगावली कोलारस में भाजपा नेताओं का बड़बोलापन हार की वजह बना. इस चर्चा का सीधा इशारा यशोधरा राजे के उस भाषण की तरफ था जिसमें उन्होंने मतदाताओं से यह कहा था कि अगर भाजपा को नहीं जिताया तो सरकारी योजनाओं का फायदा नहीं मिलेगा. कमोबेश ऐसे ही बातें एक और कैबिनेट मंत्री माया सिंह ने भी कहीं थी जो सिंधिया घराने के नजदीकी रिश्तेदार हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि पूरी ताकत झोंक देने के बाद भी इस प्रतिष्ठा पूर्ण चुनाव में मिली हार से शिवराज सिंह की साख और धाक दोनों को धक्का लगा है. यशोधरा ने जानबूझ कर मतदाताओं को नाराज करने बाला भाषण अगर दिया था और हार की एकलौती वजह वही भाषण है तो भी राजनीति के लिहाज से बात हैरत की नहीं, कोई भी अपनी पूर्वजों को सरेआम गद्दार जैसे संबोधन से नवाजा जाना हजम नहीं कर सकता. कइयों को धकियाने वाले शिवराज सिंह पहली बार दिक्कत में दिख रहे हैं कि कैसे इन दोनों हारों का ठीकरा यशोधरा राजे के सर इस तरह फोड़ें कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे.

आम चुनाव सर पर हैं और शिवराज सिंह विरोधी लौबी भी सक्रिय हो चली है, ऐसे में कोई फसाद खड़ा करने का जोखिम शिवराज उठाएंगे, वह भी यशोधरा राजे के खिलाफ ऐसा लग नहीं रहा. राज्य में चौराहों पर चटखारे लेकर कहा जा रहा है कि बुआ भतीजे ने मिलकर ऐसे निबटाया है कि भड़ास न उगलते बन रही न ही निगलते बन रही. शिवराज सिंह के गृह जिले के एक भाजपा कार्यकर्ता ने बड़े चुटीले अंदाज में कहा चुनाव से डर नहीं लगता भाईसाहब को सिंधियाओं से डर लगता है.

‘हेट स्टोरी 4’ की वजह से उर्वशी को मिली जान से मारने की धमकी

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बौलीवुड अभिनेत्री उर्वशी रौतेला इन दिनों अपनी अगली फिल्म ‘हेट स्टोरी 4’ से हंगामा बरपाए हुए हैं. 9 मार्च को रिलीज हो रही ‘हेट स्टोरी 4’ बोल्ड तेवरों वाली रिवेंज ड्रामा फिल्म है. लेकिन जहां एक ओर इस फिल्म में उर्वशी रौतेला के बोल्ड लुक को पसंद किया जा रही है वहीं दूसरी तरफ वह अपनी इसी बोल्ड फिल्म को लेकर मुश्किल में पड़ गई हैं.

दरअसल इस फिल्म का ट्रेलर रिलीज होने के बाद से उन्हें जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं. ये धमकियां फिल्म में अपनी तुलना द्रौपदी से किए जाने की वजह से मिल रही हैं. ‘हेट स्टोरी 4’ के ट्रेलर में महाभारत के एक चरित्र द्रौपदी पर संवाद रखा गया है. ट्रेलर के एक सीन में दो भाइयों के प्यार के बीच फंसा उर्वशी का किरदार कहता है, द्रौपदी के पास तो पांच पांडव थे यहां तो बस दो हैं. इस बयान से नाराज लोगों का कहना है कि वह द्रौपदी का अपमान कर रही हैं.

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बता दें कि ये फिल्म रिलीज के बाद से ही उनके बोल्ड अवतार की वजह से सुर्खियों में छाई हुई है. उर्वशी रौतेला ‘हेट स्टोरी 4’ में स्ट्रिप क्लब डांसर का किरदार निभा रही हैं, इस किरदार में घुसने के लिए उन्होंने कई तरह के डांस मूव्ज में परफेक्शन हासिल करने के लिए खूब मेहनत की. अपनी बौडी लैंग्वेज को परफेक्ट बनाने के लिए उर्वशी लंदन के स्ट्रिप क्लब में ही पहुंच गई थीं. उन्होंने वहां जाकर डांसर्स के हर मूव्ज को गहराई से देखा, और फिल्म में अपने किरदार में इसे पूरी तरह से उतारने की कोशिश की है. उन्होंने इन डांसर्स के साथ प्रैक्टिस भी की, और एक समय ऐसा आया जब उनके मूव्ज उन डांसर्स से भी बेहतर हो गए.

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उर्वशी के हौट लुक के अलावा “आशिक बनाया आपने” के रीक्रिएटेड वर्जन की वजह से ये फिल्म खबरों में रही है. साल 2005 में आई फिल्म “आशिक बनाया आपने” के टाइटल ट्रैक को इसमें बड़ी ही खूबसूरती से फिट किया गया है. पर्दे पर कमाल के दिख रहे इस गाने की शूटिंग के दौरान उर्वशी रौतेला को कई रीटेक देने पड़े थे. फिल्म के डायरेक्टर विशाल पांड्या भी उर्वशी की मेहनत से काफी इम्प्रेस हैं और वे बताते हैं, “उनकी मेहनत ‘आशिक बनाया आपने’ गाने की सफलता से बखूबी दिख भी जाती है.” ‘हेट स्टोरी 4’ में उर्वशी के अलावा करण वाही, विवान भटेना, इहाना ढिल्लों और गुलशन ग्रोवर भी नजर आएंगे.

थोथा मंत्र है मोदी का मेक इन इंडिया

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हरियाणा,छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश  आदि राज्यों की सरकारों ने कहा है कि उन्हें नए इंजीनियरिंग कालेजों की जरूरत नहीं है. हर राज्य में पहले से निर्धारित सीटों में से आधी से ज्यादा खाली हैं. इंजीनियरिंग कालेजों की आर्थिक स्थिति डगमगा रही है. इन निजी कालेजों को छात्रों की फीस पर निर्भर रहना पड़ता है और कम छात्रों का अर्थ है कि कम छात्रों को पूरी फैकल्टी व विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर का आर्थिक बोझ उठाना पड़ेगा.

देश के 3,291 इंजीनियरिंग कालेजों की 15.5 लाख सीटों में से आधी का खाली रहना बताता है कि देश के युवाओं का भविष्य संकट में है. इंजीनियरिंग स्किल देश की उन्नति में अनिवार्य है और इंजीनियर का कैरियर अब तक एक अच्छा व स्थायी माना जाता था. इंजीनियरों की घटती मांग और महंगी होती इंजीनियरिंग की शिक्षा का अर्थ है कि देश के कारखानों की हालत भी खराब है और मेक इन इंडिया केवल थोथा मंत्र है.

इंजीनियरिंग वास्तव में हमारी सोच के खिलाफ है. हम ठहरे विश्वगुरु, हम भला लोहे से काम क्यों करेंगे. हमारे यहां तो अच्छी नौकरियां पटवारी, हवलदार, इंस्पैक्टर, छोटे अफसर, क्लर्क, बाबू की हैं. कंप्यूटर हमें सुहाता है क्योंकि उस में हाथ काले नहीं करने पड़ते.

इंजीनियरों को मैले कारखानों में काम करना पड़ता है. उन्हें गरम या ठंडे मौसम में बिना सुखसुविधा के रहना पड़ता है. उन का वास्ता शूद्रों व दलितों से पड़ता है जिन्हें हमारे शासक न जाने क्याक्या कहते हैं. उन्हें पुचकार कर इंजीनियरों को उन से काम लेना पड़ता है.

किसी भी देश का विकास उस के इंजीनियरों के बलबूते होता है, ऐडमिनिस्ट्रेटरों, फाइनैंशियल एनालिस्टों, एमबीओं, बाबुओं, पटवारियों से नहीं. ये लोग केवल उन सामानों के निर्माण का लाभ उठाते हैं, वितरण करते हैं या उन की कीमत निर्धारित करते हैं जो इंजीनियरों ने बनाए. देश में इंजीनियर नहीं हैं, तभी हम जुगाड़ संस्कृति के गुणगान गाते हैं क्योंकि हमें मैकेनिकों से वे काम लेने पड़ते हैं जो इंजीनियरों के लायक हैं.

इंजीनियरों की हमें पगपग पर जरूरत है. हमारे यहां कोई मकान सीधा नहीं बनता, कोई धार सीधी नहीं खिंचती क्योंकि हमारे यहां प्रशिक्षित व योग्य इंजीनियर हैं ही नहीं. यहां इंजीनियरों का इतना अभाव है कि सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति चीन में ढाली जा रही है. सरकारी विभागों के इंजीनियर हेराफेरी में ज्यादा लगे रहते हैं, कमीशन खाना उन का मुख्य काम होता है. हालांकि, अब ये नौकरियां कम भी होती जा रही हैं.

रेलों, सड़कों, मकानों की दुर्घटनाओं की वजह इंजीनियरों या इंजीनियरिंग मस्तिष्क की कमी का होना है. अगर इंजीनियरिंग कालेजों में सीटें नहीं भर रहीं, तो देश को चौकन्ना होना चाहिए. लेकिन यहां तो गौपूजा, गौमूत्र और गंगा मैया का गुणगान हो रहा है. ऐसे देश में तो इंजीनियरिंग कालेजों की जगह वैदिक यज्ञशालाओं के निर्माण की शास्त्रीय विधि में ज्यादा आस्था रहती है. इस पर भी पंडों की पुश्तैनी जमातों का ही एकाधिकार है. इंजीनियर तो केवल थोड़े ऊंचे मिस्त्री हैं, राज या मैकेनिक की तरह के.

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