बगावत एक अफसर की

जनाब, आजकल हमारा मूड बड़ा उखड़ाउखड़ा रहता है. अब माना कि हमारी जरा सी तोंद निकल आई है या जरा पान के शौक में दीवार पर भूल से थूक ही दिया हो, तब भी किसी को क्या हक कि हमें पिछड़ा, 19वीं सदी का सरकारी बाबू कह कर हमारी तौहीन कर दे. खामखां हमारी इमेज तोंदवाले, मुच्छड़, पान से रंगे दांतों वाले, घड़ीघड़ी दांत खुरचते, खींसें निपोर कर हर काम में दांत से जीभ काटते किसी ढपोरशंखी सी बना दी गई है. भई, यह तो सरासर गलतबयानी है.

अब हम अपने कामों या नाकामियों में काफी मौडर्न हो गए हैं, अपनी फितरत हम ने बड़ी स्मार्ट बना ली है और ढर्रों में भी हम ने मौडर्न जान फूंक दी है. अब अमेरिका वाले डोनाल्ड ट्रंप को ही ले लीजिए, कुएं के अंदर का ट्रंप सूटबूट में कितना रोबीला गबरू जवान लगता है. देख कर कौन कहे कि साहब, जाति, प्रजाति व धर्म को ले कर जनाब इतने कूपमंडूक होंगे. उन्हें सिर्फ गोरे नजर आते हैं. भूरे, पीले, काले, दाढ़ी वाले, टोपी वाले दुश्मन हैं उन के लिए. फिर भी क्या अदा है, क्या रुतबा है, क्या स्टाइल है. स्टाइल और अदा के जलवे ने उन की ढपोरशंखी चुल्लूवाली मानसिकता को कैसा नायाब हीरो वाला ट्रंप सूट पहना कर खड़ा कर दिया है कि दुनिया को अच्छाखासा कंफ्यूजन हो रहा है कि महारथी की फितरत का विरोध करें या इंतजार ही कर लें कि और किनकिन बेहतरीन तरीकों से वे पिछड़ेपन को पेश कर सकते हैं.

भई, वे ठहरे अमेरिका वाले ट्रंप, तो हम ठहरे भारत सरकार के सरकारी अफसर मुलाजिम, क्या हम कम हैं. सरकार यों ही इतना हमें नहीं देती. गाड़ी देती है, बंगला देती है, अर्दलीचपरासी देती है. और तो और, काम लेने को तरहतरह के नियमों के चाबुक भी देती है.

अब यह तो कोई बात नहीं हुई कि इतना ठाटबाट पा कर भी हम जरा अपने कौलर में ठसक न रखें. फिर अब यह न पूछ बैठना कि कोई कितनी पढ़ाई कर के सरकारी अफसर बने या कौन कितना खिलापिला कर रिश्तोंनातों की सुरंग से अंदर घुस आए-बराबरी की बात है. कोई कैसे भी घुसा, जब सिंहासन मिल गया तो योग्यता क्या माने रखेगी? सब बराबर. समान अधिकार. हां, गलती से भी अब कर्तव्य की बात न छेड़ना, मिस्टर. हम कोई कम नहीं हैं काम करने में या कहिए कि करवाने में. काम लेने का हुनर न होता तो इतना बड़ा सिस्टम चलता कैसे. खुद ही देख लो, किस जमाने से इतना बड़ा सिस्टम इतना सिस्टमैटिक चल रहा है. सरकारें बदल जाती हैं मगर सिस्टम के अंदर की दीमक ठीक अपने सिस्टम से उसी तरह काम पे लगी हैं.

लोग कहते हैं काम नहीं होता? कैसे काम नहीं होता. अगर हम अफसर हैं तो पूछो जरा ड्राइवर से- नहीं जाता वह बीवी की शौपिंग से ले कर बच्चे के स्कूल तक. पूछो अर्दली से-हुक्म की तामील न हो तो उस की क्या लानतमलामत होती है. चाय दे, पानी दे, ये ला, वो ला, दुकान जा, बैंक जा, दौड़दौड़दौड़, क्या दौड़ लगवाता हूं. पूछो जरा चपरासी से, घर पर क्याक्या नहीं करता. घास छीलने से ले कर जूते पौलिश तक सबकुछ. हम तो क्या, हमारी बीवी और उस के रिश्तेदारों तक के हुक्म बजाने में वह उस्ताद हो गया है और वह भी हमारे दिए स्मार्टफोन के स्मार्ट तरीकों के सहारे. क्यों, कह लो हमें पिछड़ा, नकारा. हो गई न गुम सिट्टीपिट्टी.

अफसर ही क्यों, अगर हुए हमारे फाइलों वाले बाबू, तो जनाब अब भूल जाओ. पुरानी फाइलों वाले बाबू अब कहां. अब हम कागज की फाइल नहीं टरकाते साहब, अब तो कंप्यूटर पर फोल्डर और फाइल खिसकाते हैं. खींसें निपोर कर हाथ नहीं बढ़ाते. काम करवाना है तो दे दो चवन्नी.

अब हम इतने स्मार्ट तो हो ही गए हैं कि आप की स्मार्टनैस का हम बखूबी अंदाजा लगा सकें. काम करवाने के बहाने पैसे दिए नहीं, कि सेटिंग ले कर हाजिर. ये नैट बैंकिंग और स्मार्टफोन किस दिन काम आएंगे. गहरे पानी में उतरने की कला के हम फनकार हुए हैं वर्षों की साधना के बाद. यों ही न समझना हमें. मोबाइल में उंगली चलाई कि सुदामा समझ गया कि मौडर्न किशन है. आंखों का पानी उतार कर पैर नहीं, इज्जत धो देगा, हे…हे! अपना यह तरीका भी अब रहा नहीं कि ‘मोहन बाबू, इन की फाइल देख लीजिएगा’ कह कर आसामी को अगले टेबल तक सरकाएं और मोहन बाबू के हाथों की खुजली उन्हें जब तक अगली तारीख तक सरकाए, आसामी अपने गले चढ़ बैठे. अब तो उन की अर्जी को सीधे कंप्यूटर के फोल्डरों के तहखाने में डाल मंदमंद मुसकराते कह लो, ‘जी, जी, आप का केस प्रोसैस में डाल दिया है,’ हाथ मिलाया, भेदभरी निगाहें मिलाईं. अब घूमते रहो जब तक नैट ट्रांजैक्शन का फायदा हमें भी न मिल जाता. सारा लेनदेन तो कैशलैस करना जानते हैं. बीवी के भाई के अकाउंट में भी पैसा आता है और उस के भाई के भी. 5 प्रतिशत उस का 95 प्रतिशत हमारा.

और तो और, किसी डिपार्टमैंट में काम निकलवाना है, अपनी सैटिंग वहां भी मौडर्न तरीके से फिक्स रहती है. संबंधित विभाग में बैठे व्यक्ति की पूरी कुंडली निकलवाता हूं ठीक मंदिरों के तकनीकी जानकार पंडों की तरह. किस का कौन सा भाई किस के दामाद का कौन सा भतीजा है ताकि कब किस के खाला के भतीजे के चाचा का काम मैं ने या मेरे विभाग ने किया था, वह पता लगे. फिर इस बदौलत मैं उस से काम निकलवाने का हक बीपीएल कार्डधारक के हक की तरह अनायास ही पा सकूं. अब यह न सोचिएगा कि ये सब फलांफलां जगह पर चप्पल घिसते हुए फलांफलां आदमी से पूछपूछ कर मैं ने जानकारी जुटाई. नहीं जी, अब हम इतने पिछड़े नहीं रहे, अब तो हम मौडर्न तरीके से पिछड़ रहे हैं. सौ तरीके के ऐप्स डाउनलोड कर रखें हैं, हजार तरह के कौन्टैक्ट बना रखे हैं. काम से बचना हो, जवाब न देना हो, काम का झांसा दे कर फर्जीवाड़ा करना हो, सरकारी पैसे की हेराफेरी करनी हो.

भई, अब हमें पान की दुकान पर मुवक्किल को आते देख मुंह घुमा कर पीक थूकने के बहाने पहचान छिपा कर भागने की जरूरत नहीं पड़ती. सीधी उंगलियों से टेढ़ा काम हम आसानी से निबटा जाते हैं. मौडर्न तरीका, मौडर्न डिवाइस. नंबर ब्लौक, नौट सीन – हो गया काम तमाम. ढूंढ़ते रह जाओगे, समझे क्या….

खुलेपन में बुराई नहीं : अंजना सिंह

भोजपुरी फिल्मों की खास बात यह है कि इन में छोटे शहरों की लड़कियों के लिए भी दरवाजे खुले हुए हैं. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की रहने वाली अंजना सिंह आज भोजपुरी फिल्मों की सब से महंगी हीरोइनों में से एक हैं. अंजना सिंह पिछले 5 साल में 50 से ज्यादा फिल्में कर चुकी हैं. उन्हें भोजपुरी फिल्मों की हौट और सैक्सी हीरोइन माना जाता है. वे तकरीबन हर बड़े हीरो के साथ काम कर चुकी हैं.

फिल्म ‘जिगर’ की कामयाबी के बाद अंजना सिंह की एक और फिल्म ‘नागराज’ आने वाली है जिस में वे खूबसूरत सैक्सी नागिन का रोल अदा कर रही हैं. पेश हैं, अंजना सिंह के साथ हुई बातचीत के खास अंश :

आप का अब तक फिल्मों का सफर कैसा रहा है?

मैं ने फिल्मों में हर कामयाब स्टार के साथ काम किया है. सभी के साथ हिट फिल्में दी हैं. भोजपुरी फिल्मों ने मुझे बहुतकुछ दिया है. मैं फैशन की दुनिया से ऐक्टिंग में आई. यहां आ कर काम सीखा और कामयाबी हासिल की. मैं अब तक के अपने सफर से खुश हूं.

मैं ने दिनेशलाल के साथ फिल्म ‘जिगर’ की थी जो बहुत कामयाब रही थी. अब फिल्म ‘नागराज’ सिनेमाघरों में आने वाली है जिसे लोग जरूर पसंद करेंगे.

आप ने फिल्मों में आने का फैसला कैसे लिया था?.

मैं बहराइच के एक साधारण परिवार से हूं. 4 भाईबहनों में मैं दूसरे नंबर पर हूं. मेरा बचपन से ही हीरोइन बनने का सपना था. जब मैं 12वीं क्लास में थी उसी समय लखनऊ में ‘मिस यूपी शो’ हो रहा था. उस में हिस्सा लेने के लिए मुझे ‘मिस बहराइच’ का खिताब जीतना जरूरी था. मैं ने ‘मिस बहराइच’ का खिताब जीता और लखनऊ पहुंच गई. ‘मिस यूपी’ में मैं रनरअप रही थी. वहां से मुझे लगा था कि फैशन प्रतियोगिताओं के जरीए मैं हीरोइन बनने का अपना सपना पूरा कर सकती हूं. मैं मुंबई गई. वहां कुछ शो किए और फिर मुझे एक टैलीविजन सीरियल में काम करने का मौका मिला.

सीरियल में मेरा काम देख कर रविकिशन के साथ फिल्म ‘फौलाद’ मुझे मिली. इस के बाद मैं ने वापस मुड़ कर नहीं देखा. एक साल में सब से ज्यादा फिल्में साइन करने वाली हीरोइन के रूप में भी मुझे जाना जाता है.

भोजपुरी फिल्मों में आप को बोल्ड सीन करने के लिए ज्यादा जाना जाता है. इस की वजह?

मैं फिल्मों में अपने रोल के हिसाब से काम करती हूं. भोजपुरी फिल्मों में दर्शक थोड़े अलग होते हैं. उन में से ज्यादातर गांवदेहात के मजदूरकिसान ही होते हैं. वे मनोरंजन करने के लिए हमारी फिल्में देखते हैं. वे चाहते हैं कि उन के खरीदे गए टिकट का पूरा पैसा वसूल हो. ऐसे में भोजपुरी फिल्मों में उन की पसंद की कहानीऔर गाने रखे जाते हैं. मुझे लगता है कि फिल्म देखते समय हमारे गाने, डांस और ऐक्टिंग देख कर अगर दर्शक सीटी बजाने लगते हैं तो हम उन का मनोरंजन करने में कामयाब हो जाते हैं. दर्शक मुझे ज्यादा पसंद करते हैं, इसीलिए मुझे ज्यादा फिल्में मिली हैं.

भोजपुरी फिल्मों में खुलेपन की बहुत बुराई होती है. आप इसे कैसे देखती हैं?

भोजपुरी फिल्मों से ज्यादा खुलापन तो हिंदी फिल्मों में होता है. वहां काम करने वाले कलाकारों को अलग नजर से देखा जाता है, इसलिए उन की बुराई कम होती है. भोजपुरी फिल्मों का बड़ा दर्शक वर्ग गांवों में रहता है. गंवई बोली होने के चलते इन में कही गई हर बात लोगों को देहाती लगती है. हमारे समाज में छोटे आदमी की बुराई करने का रिवाज भी है पर मुझे भोजपुरी फिल्मों के खुलेपन में कोई बुराई नजर नहीं आती.

आप अपना खाली समय कैसे बिताती हैं?

मैं घुड़सवारी करना पसंद करती हूं. इस के अलावा ड्राइविंग, पढ़ना और घूमना मुझे अच्छा लगता है. मुझे अपने घर को सजाना पसंद है और डांस करने का भी शौक है. जब मैं फिल्मों में काम नहीं करती थी तब खूब स्टेज शो करती थी. मैं ने देशविदेश में बड़ेबड़े स्टेज शो और फैशन शो किए हैं.

मुझे लगता है कि हर लड़की को खुद पर यकीन होना चाहिए. लड़कियां जो भी काम करें मजबूत इरादे के साथ करें. समाज हमारे इसी यकीन की कद्र करता है.

श्रिया सरन ने की गुपचुप तरीके से शादी

अजय देवगन के साथ फिल्‍म ‘दृश्‍यम’ में काम कर चुकीं अभिनेत्री श्रिया सरन ने रशियन ब्‍वौयफ्रेंड संग गुपचुप शादी रचा ली है. खबरों के अनुसार, श्रिया और एंड्रे कोसचीव की शादी 12 मार्च को हुई. इस शादी में कुछ चुनिंदा कलाकार शामिल हुए थे. शादी की सभी रस्‍मों को सीक्रेट रखा गया था. शादी में अभिनेता मनोज वाजपेयी अपनी पत्‍नी के साथ पहुंचे थे.

एक रिपोर्ट के मुताबिक साउथ फिल्‍मों की मशहूर एक्‍ट्रेस श्रिया सरन ने मुंबई के लोखंडवाला में बने अपने अपार्टमेंट में शादी रचाई. खबरों के मुताबिक शादी हिंदू रीति-रिवाज से हुई. अभिनेत्री ने इस खास मौके पर पिंक कलर का आउटफिट पहना था.

श्रिया सरन के पति एंड्रे कोसचीव नेशनल लेवल के टेनिस प्‍लेयर और बिजनेसमैन हैं. बताया जा रहा है कि वेडिंग फंक्‍शन से एक दिन पहले प्रीवेडिंग पार्टी रखी गई थी. जिसमें सिर्फ करीबी रिश्‍तेदार और परिवारवाले शामिल हुए थे.

entertainment

पहले खबरें थी कि यह शादी उदयपुर में होगी, हालांकि श्रिया सरन ने इसे सिर्फ अफवाह करार दिया था. श्रिया ने अपनी निजी जिंदगी के बारे में कभी भी खुलकर बात नहीं की. फिलहाल फैंस अब एक्‍ट्रेस के औफिशियल बयान का इंतजार कर रहे हैं.

बता दें कि श्रिया ने साल 2001 में तेलुगू फिल्‍म ‘इष्‍टम’ से सिनेमा जगत में डेब्‍यू किया था. साल 2002 में आई फिल्‍म ‘संतोषम’ ने उनके करियर को एक नयी उड़ान दी. इसके बाद उन्‍होंने एक के बाद एक कई फिल्‍मों में काम किया. श्रिया ने बौलीवुड में फिल्‍म ‘तुझे मेरी कसम’ से डेब्‍यू किया था. इसके अलावा उन्‍होंने ‘आवारापन’, ‘मिशन इस्‍तानबुल’ और ‘दृश्‍यम’ जैसी फिल्‍में की.

इस अभिनेत्री के साथ रोमांस करेंगे अक्षय

बौलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने बड़े पर्दे पर कौमेडी से लेकर गंभीर तक हर तरह के किरदार निभाए हैं और दर्शकों ने उन्हें हमेशा ही काफी पसंद किया है. अक्षय कुमार स्टारर हाउसफुल 4 की तैयारी धमाकेदार तरीके से शुरू हो चुकी है.

वहीं, एक्ट्रेस की बात करें तो इस बार निर्माता जैकलीन फर्नांडीज को बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं. सूत्रों के अनुसार, फिल्म में जैकलीन नहीं.. बल्कि अक्षय कुमार के अपोजिट कृति सैनन दिखेंगी. जी हां, कृति सेनन इस फिल्म में अक्षय कुमार के साथ रोमांस करती हुई नजर आ सकती हैं. बता दें कि कृति सैनन पहली बार हाउसफुल फ्रैंचाइजी से जुड़ने वाली हैं. वहीं, पहली बार उन्हें किसी सीनियर सुपरस्टार के साथ काम करने का भी मौका मिलेगा.

अब तक इस फिल्म के लिए अक्षय कुमार, रितेश देशमुख और बौबी देओल के नाम के फाइनल होने की खबर है. खबरें तो ये भी हैं कि हाउसफुल 4 में अभिषेक के लिए रोल नहीं था. लेकिन फिल्म के निर्देशक साजिद खान और अक्षय कुमार की मांग पर जूनियर बच्चन को फिल्म में वापस लाया गया है.

रिपोर्ट्स की मानें तो इस बार इस फिल्म की कहानी पुनर्जन्म पर आधारित होगी. साजिद नाडियाडवाला ने कहा, पुनर्ज्नम पर बौलीवुड में काफी गंभीर फिल्में बन चुकी हैं, लिहाजा, मैंने सोचा कि इस पर क्यों ना कौमेडी बनाई जाए. हाउसफुल 4 पुनर्ज्नम की कहानी है. हाउसफुल 4 दो समय की कहानी है. एक वर्तमान.. और एक भूतकाल, जिसे बाहुबली युग जैसा दिखाया जाएगा. साजिद नाडियाडवाला ने कहा कि यह हमारे प्रोडक्शन की सबसे मंहगी फिल्म होगी. सभी के कौस्ट्यूम बिल्कुल बाहुबली स्टाइल में होंगे. कुछ ही महीनों में फिल्म की शूटिंग शुरू हो जाएगी.

रिपोर्ट्स की मानें तो बजट के हिसाब से यह हाउसफुल सीरिज की सबसे मंहगी फिल्म होगी. साथ ही यह बौलीवुड की सबसे मंहगी कौमेडी फिल्म भी होगी. हाउसफुल 4 की शूटिंग जून- जुलाई से शुरु कर दी जाएगी. देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म में और दो कौन सी हीरोइने फाइनल होती हैं. बता दें, कृति ने अपने बौलीवुड करियर की शुरुआत साजिद नाडियाडवाला की फिल्म ‘हीरोपंती’ से की थी और अगर अब वह ‘हाउसफुल 4’ में नजर आती हैं तो यह उनकी साजिद नाडियाडवाला के साथ दूसरी फिल्म होगी.

गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स यानी जीएसटी का कहर

गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स यानी जीएसटी, राहुल गांधी के शब्दों में गब्बर सिंह टैक्स, असल में पंडों का कुंडली टैक्स है जो हर हिंदू को जन्म से ब्रेनवाशिंग द्वारा जकड़ लेता है. केंद्र सरकार बड़ेबड़े विज्ञापन दे रही है कि वन नेशन वन टैक्स के जरिए अभूतपूर्व प्रगति होगी. दरअसल, यह वैसा ही है जैसा पंडित कहते हैं कि कुंडली बनवाओ, ग्रहदोष ठीक कराओ और जीवनभर सुख पाओ.

सरकारी टैक्स और हिंदू टैक्स में समानताएं ही समानताएं हैं. लगता है वित्त मंत्रालय में कुंडली बनाने वालों की बरात बैठी है जिन के डीएनए में ही है कि हर मानव पापी है और केवल पाखंडी कर्मकांड कर के ही वह पापों का प्रायश्चित्त कर सकता है. यही नहीं, ये कर्मकांड उसे हर रोज, हर सप्ताह, हर माह, हर वर्ष करने ही होंगे और हर बार दान, दक्षिणा, आहुतियां और सब से बड़ी बात, समय देना ही होगा. जीएसटी में कुंडली में कुंडली है और ग्रहदोष पर ग्रहदोष.

जीएसटी ऐसा है जैसा अकसर हिंदी फिल्मों में दिखता है कि विवाह का शुभमुहूर्त निकला जा रहा है और वर व वधू का मंडप में होना अनिवार्य है. जीएसटी में इस तरह के प्रावधानों का अंबार है. ईवे बिल तो हर काम पंडित से पूछ कर करने वाली प्रक्रिया जैसा है जब तक कंप्यूटर पंडा हां न कहे आप बनाबनाया सामान कहीं भेज नहीं सकते.

जीएसटी के प्रवर्तक सारे देश में गौसेवकों की तरह फैलने वाले हैं. गौसेवकों के गले में भगवा दुपट्टा होता है और हाथों में डंडे, फरसे जबकि जीएसटी सेवकों के पास कंप्यूटर टैबलेट होंगे ताकि वे पता कर सकें कि सामान आवश्यक मुहूर्त में सभी विधिविधानों के बाद कंप्यूटर पंडा की अनुमति से ही निकला है या नहीं. हर गलती पर महापाप लगेगा जिस के दंड में अपना आखिरी लंगोट तक जीएसटी पुरोहितों को देना पड़ सकता है.

व्यापारियों को इस तरह के प्रपंचों की सदियों से आदत है. राजाओं ने डकैतों, दूतों और मुख्यतया शास्त्रधारी तिलक लगाए प्रतिनिधियों की नियुक्ति कर रखी थी जो हर सौदे में अपना हिस्सा रखते थे. हर व्यापारी तिजोरी पर ‘शुभलाभ’ लिखता है तो वह अपनी कर्मठता जताने के लिए नहीं, बल्कि यह जताने के लिए कि उस ने सारे विधिविधान पूरे किए हैं. अब वह जीएसटी नंबर उसी तरह लगाएगा.

टैक्स बुरा नहीं है पर यह तैमूरी या ईस्ट इंडिया कंपनी का सा न हो. जीएसटी आज हिंदू, मुगल व ब्रिटिश तीनों हुकूमतों का सम्मिलत कहर सा बन गया है.

इरफान खान ने ट्वीट कर दी अपनी बीमारी की जानकारी

इरफान खान ने अपनी बेहद दुलर्भ बीमारी का सोशल मीडिया पर खुलासा कर दिया है. राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार विजेता इरफान खान न्‍यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर (कैंसर) का शिकार हुए हैं. अपनी इसी बीमारी के इलाज के लिए इरफान विदेश रवाना हो चुके हैं. 5 मार्च को जैसे ही इरफान ने अपनी बीमारी का खुलासा किया, उनके फैन्‍स से लेकर बौलीवुड तक में हर कोई उनके लिए दुआएं मांगने लगा.

यह है न्‍यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर

डौक्‍टरों द्वारा पुष्टि के बाद प्रकाशित जानकारी देने वाली वेबसाइट एसो कैंसर डौट नेट के अनुसार न्‍यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर एक ऐसा कैंसर है जो शरीर के हार्मोन पैदा करने वाले हिस्‍सों में पनपता है. यह एक रेयर बीमारी है. न्‍यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर शरीर के न्‍यूरो एंडोक्राइन सिस्‍टम में हार्मोन पैदा करने वाली कोशिकाओं में होता है.

जो हार्मोन पैदा करने वाली एंडोक्राइन कोशिकाओं और नर्व कोशिकाओं में होता है. न्‍यूरो एंडोक्राइन शरीर के फेफड़े, गेस्‍ट्रोइनटेस्‍टाइन ट्रैक यानी पेट और इनटेस्‍टाइन में होती हैं. न्‍यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर कई प्रकार का होता है.

कुछ देर पहले ही इरफान ने अपनी बीमारी के बारे में ट्विटर पर बताते हुए लिखा, ‘अनिश्‍चितता हमें समझदार बनाती हैं, और मेरे पिछले कुछ दिन इसी बारे में रहे हैं. मैं समझ रहा था कि मुझे न्‍यूरो इनडोक्राइन ट्यूमर हुआ है. अभी तक यह जज्‍ब करना थोड़ा मुश्किल था लेकिन आप सब के प्‍यार ने मुझे हिम्‍मत दी है.

इसी सफर में देश से बाहर हूं मैं आप सभी से निवेदन करता हूं कि मेरे लिए दुआएं मांगते रहें. और जैसा की अफवाहें उड़ रही हैं, ‘न्‍यूरो’ का मतलब हमेशा मस्तिष्‍क नहीं होता और गूगल कर आप आसानी से इसे जान सकते हैं. जो लोग मुझसे कुछ सुनना चाह रहे थे, मैं उम्‍मीद करता हूं कि कुछ और कहानियों के साथ आपके पास लौटुंगा.’

30 से अधिक फिल्मों में कर चुके हैं काम

इरफान खान हिन्दी, अंग्रेजी फ़िल्मों, व टेलीविजन के एक अभिनेता हैं. उन्होने द वारियर, मकबूल, हासिल, द नेमसेक, रोग, पान सिंह तोमर, हिंदी मीडियम, करीब-करीब सिंगल जैसी फिल्मों मे अपने अभिनय का लोहा मनवाया. ‘हासिल’ फिल्म के लिए उन्हें वर्ष 2004 का फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. वह बौलीबुड की 30 से ज्यादा फिल्मों मे अभिनय कर चुके हैं. इरफान ने टेलीवीजन की दुनिया में भारत एक खोज, सारा जहां हमारा, चंद्रकांता और श्रीकांत जैसे धारावाहिकों में भी काम किया है.

VIDEO : हेयरस्टाइल फौर कौलेज गोइंग गर्ल्स

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

उपचुनाव में टूट गया ‘मोदी-योगी’ का करिश्मा

उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा की 3 और विधानसभा की 2 सीटों के लिये हुये उपचुनाव में भाजपा को करारी मात मिली. उत्तर प्रदेश की 2 लोकसभा सीटों में गोरखपुर और फूलपुर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य साल 2014 में सांसद बने थे. उस समय फूलपुर में केशव मौर्य को 52 फीसदी और योगी आदित्यनाथ को 51 फीसदी वोट मिले थे.

बिहार में अरहरिया लोकसभा सीट पर राष्ट्रीय लोकदल यानि आरजेडी के तस्लीमुददीन सांसद बने थे. बिहार की भभुवा और जहानाबाद में विधानसभा के उपचुनाव थे. जहानाबाद में मुद्रिका सिंह यादव आरजेडी से जीते थे और भभुवा से भाजपा के आनंद भूषण पांडेय चुनाव जीते थे. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री और केशव मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद यहां उपचुनाव हुये. जबकि बिहार में तीनों सीटों से चुने गये प्रत्याशियों के न रहने से सीटे खाली हुई थी.

politics

भाजपा के लिये उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर सीट सबसे खास थी. गोरखपुर मुख्यमंत्री का क्षेत्र था. फूलपुर उपमुख्यमंत्री का क्षेत्र था. ऐसे में किसी को यह गुमान नहीं था कि भाजपा की यह हालत हो जायेगी. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद भाजपा की जीत पर किसी को कोई सुबहा नहीं रह गया था. 2017 में विधानसभा में मिली जीत के बाद भाजपा को करारी मात मिली. उत्तर प्रदेश में ही नहीं बिहार में भी भाजपा ने सरकार में शामिल होने के बाद खराब प्रदर्शन किया. उत्तर प्रदेश और बिहार के इन उपचुनावों के संकेत बड़े हैं. इनका असर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक के विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा. उपचुनावों के नतीजों से साफ हो गया है कि ‘मोदी-योगी मैजिक’ अब अपनी चमक खो रहा है.

इसके लिये भाजपा की नीतियां, भाजपा नेताओं की हठधर्मिता, केवल धर्म का प्रचार जिम्मेदार है. 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने विकास की बात कही थी. चुनाव जीतने के बाद भाजपा सरकार अपनी बात पर कायम न रह कर केवल धर्म को बेचने लगी. धर्म का सहारा लेकर केवल मंदिर, आश्रम, बाबा सरकार पर हावी होने लगे. उत्तर प्रदेश में तो योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री ही बना दिया. उनकी योग्यता धार्मिक चेहरा होना ही था. भाजपा दलित और पिछड़ों को साथ लेकर नहीं चल पाई. खासकर दलितों को लेकर जो माहौल बना, उसने दलित पिछड़ों को एकजुट होने पर विवश कर दिया. ऐसे में जब बसपा और सपा करीब आये, तो भाजपा के लिये मुश्किल हो गया.

हिन्दू रक्षा के नाम पर जिस तरह गुंडे तत्व सक्रिय हुये उससे प्रदेश की कानून व्यवस्था बिगड़ गई. लोगों ने कानून की परवाह करनी बंद कर दी. दीवार से लेकर हर तरफ भगवा रंग फैलने लगा. जिस विकास की बात करके 2014 का लोकसभा चुनाव जीता वह दरकिनार हो गया. देश में बेरोजगारी फैलने लगी. जीएसटी और नोटबंदी ने लोगों को भुखमरी के करीब ला खड़ा किया. इसका गुस्सा अब बाहर आने लगा है. भाजपा पार्टी में लोकतंत्र की जगह पर तानाशाही फैल गई, जिससे परेशान भाजपा के लोगों ने उपचुनाव में वोट डालने और डलवाने का काम नहीं किया. जिसकी वजह से मतदाता वोट के लिये नहीं गया और भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा.

VIDEO : गर्मियों के लिए बेस्ट है ये हेयरस्टाइल

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

नई दुनिया बनाएंगे मिलेनियल्स

21वींसदी को युवाओं की सदी माना जाता है. इन युवाओं में विशेषरूप से उस पीढ़ी की चर्चा होती है, जो 1980 से 1995 के बीच जन्मी है. यही पीढ़ी इस वक्त पढ़लिख कर अपनी काबिलीयत दिखाने के लिए भारत समेत पूरी दुनिया में आतुर है. इस पीढ़ी को वाई जैनरेशन या फिर सहस्राब्दि युवा (मिलेनियल्स) कह कर संबोधित किया जाता है. इन 20 से 35 वर्ष की उम्र के बीच करीब 35-36 करोड़ मिलेनियल्स के बल पर भारत खुद को एक युवा देश कहता है. दुनिया के दूसरे देशों में भी इन की यह कह कर चर्चा की जाती है कि अब दुनिया बनाने या बिगाड़ने की जिम्मेदारी इन्हीं मिलेनियल्स के कंधों पर है. पर जिम्मेदारी के जिस जिक्र के साथ इन सहस्राब्दि युवाओं की ओर देखा जाता है, उसे ले कर कई संदेह पूरी दुनिया समेत भारत में भी पसरे हुए हैं.

बदलती सोच के नए युवा

यह सिर्फ कहने की बात नहीं है कि आज जमाना बदल चुका है. अगर किसी युवक या किसी युवती से पूछा जाए कि कैसा चल रहा है, तो वे यही कहेंगे, मस्ती है, कोई टैंशन नहीं. चाहे उन की जिंदगी में पढ़ाई और कैरियर को ले कर काफी तनाव हो, पर उन की कोशिश होती है कि वे हमेशा अपना मुसकराता चेहरा सामने रखें. उन के मन में यह भरोसा बना हुआ है कि आज नहीं तो कल, उन्हें भी अपने टैलेंट को दिखाने का मौका मिलेगा और तब वे दिखा देंगे कि वे क्या हैं.

ऐसा वे साबित भी करते हैं. परिवार नई तकनीक से जुड़ी चीजों की लेटैस्ट जानकारी इन्हीं किशोरों या युवाओं के पास होती है बल्कि कहना चाहिए कि मोबाइल या स्मार्टफोन के नएनए फंक्शंस से ले कर ऐप्स के बारे में बड़े लोग इन्हीं से सीखते हैं.

फैशन हो या फिल्म, फेसबुक हो या ट्विटर, सोशल मीडिया के हर प्लेटफौर्म के बारे में सब से पहले इसी नई पीढ़ी को नई बातें पता चलती हैं. पर इस के बावजूद, आजकल के किशोरों व युवाओं को समझाने व सिखाने की जरूरत महसूस होती है.

ये हैं तोहमतें

जैसे कहा जाता है कि यह नई पीढ़ी बहुत जल्दबाज है. जितनी जल्दी पैसा कमाना, उतनी ही जल्दी पैसा उड़ाना, इस पीढ़ी की यह खास पहचान मानी जाती है. कोई भी काम करने के लिए नौजवान शौर्टकट तलाश करते हैं. इस पीढ़ी के मन में बड़ों के लिए सम्मान नहीं होता. कुछ तो ऐसे आरोप भी लगाते हैं कि मिलेनियल्स असल में खुद में मगन रहने वाले ऐसे युवाओं की भीड़ है जिसे देश और समाज के कायदों व रीतियों की कोई परवा नहीं होती.

इसी आधार पर दावा किया जाता है कि ये नौजवान न तो कैरियर को ले कर गंभीर हैं और न जिंदगी को ले कर. मांबाप इन के कैरियर के लिए दिनरात मेहनत करते हैं, अपना पैसा इन पर फूंकते हैं, फिल्म, स्पोर्ट्स और मोबाइल फोन जैसे इन के महंगे शौक पूरे करते हैं, पर इस के बदले ये अपने पेरैंट्स को क्या देते हैं?

इन बिंदुओं को ले कर सिर्फ भारत में ही नहीं, अमेरिका, ब्रिटेन जैसे विकसित देश भी चिंतित हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर हमारी नई पीढ़ी इस तरह बेपरवाह रहेगी तो देश का भविष्य चौपट हो सकता है. इन्हीं वजहों से तकरीबन पूरी दुनिया में इस नई पीढ़ी को एक किस्म की नाउम्मीदी से देखा जाता रहा है. कहा जाता रहा है कि अगर इस पीढ़ी ने कैरियर के चुनाव, उस के स्थायित्व और समाज के प्रचलित कायदों को ले कर संजीदगी नहीं दिखाई, तो समाज और देश के बिखराव तक की नौबत आ सकती है.

इन बातों को ले कर पेरैंट्स परेशान रहते हैं. उन्हें लगता है कि आजकल बच्चों में वह समझदारी नहीं है, जिस के बल पर वे दुनिया का सामना कर पाएं और बड़ों की दिखाई राह पर संभलते हुए चलना सीख पाएं. 2015 में भारत समेत 12 देशों में कराए गए एक सर्वेक्षण ‘आईकी प्ले रिपोर्ट’ में ऐसी ही चिंताएं अभिभावकों ने अपने बच्चों के बारे में जताई थीं.

आईकी प्ले रिपोर्ट

पारिवारिक जीवन के कई पक्षों पर किए गए सर्वेक्षण में जो खुलासे हुए थे, उन से ऐसा लगा था कि भारतीय पेरैंट्स दुनिया के सब से दुखियारे मांबाप हैं, क्योंकि वे अपने बच्चों के लिए कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहे हैं.

एक ओर बच्चे कहीं बाहर घूमनेखेलने जाने के बजाय स्मार्टफोन या टीवी से चिपके रहते हैं, तो दूसरी ओर मांबाप को यह चिंता सताती है कि वे अपने बच्चों को ज्यादा वक्त नहीं दे पाते हैं. इस रिपोर्ट से ये मुख्य बातें पता चली थीं, जो इस प्रकार हैं :

मौके हैं बेशुमार

अगर यह देखें कि सहस्राब्दि युवाओं के पास आज क्या है, तो इस मामले में पाएंगे कि उन्हें असल में किसी चीज की कमी नहीं है.

पिछली पीढि़यों के मुकाबले वाई जनरेशन कही जाने वाली इस पीढ़ी के पास पढ़ाई और कैरियर के ऐसे नए मौके हैं, जिन के बारे में पहले कभी सोचा तक नहीं गया था. जैसे, भारत के संदर्भ में देखें तो पिछले दोढाई दशकों में जिस आईटीबीपीओ सैक्टर में हमारे युवाओं ने कामयाबी के नए मोरचे खोले थे, अब हाल के वर्षों में औनलाइन बिजनैस के सहारे मिलेनियल्स ने सफलता की नई इबारत रची है.

जगने लगी है उम्मीद

हाल में कुछ ताजा सर्वेक्षण ऐसे आए हैं, जो इन धारणाओं को तोड़ते और वाई जैनरेशन कही जाने वाली इस पीढ़ी के प्रति नजरिया साफ करने की जरूरत महसूस कराते प्रतीत हो रहे हैं. जैसे, 25 देशों में 19 हजार कामकाजी सहस्राब्दि युवाओं के बीच 2016 के शुरुआती महीनों में कराए गए सर्वेक्षण में ह्यूमन रिसोर्स कंसल्टिंग फर्म मैन पावर ग्रुप ने पाया कि नौकरी के पारंपरिक तौरतरीकों को ले कर यह नौजवान पीढ़ी कतई जल्दबाज नहीं है. ये नौजवान नौकरी खोजते वक्त पैसे से ज्यादा तवज्जुह उस के स्थायित्व यानी जौब सिक्योरिटी को देते हैं. भारत के संदर्भ में इस सर्वेक्षण ‘मिलेनियल्स कैरियर्स 20:20 विजन’ का नतीजा यह है कि इन सहस्राब्दि युवाओं में से 39 फीसदी 65 साल से ज्यादा उम्र तक काम करना चाहते हैं. सर्वे में शामिल 25 फीसदी मिलेनियल्स तो 70 साल की उम्र के बाद भी काम करते रहने के इच्छुक हैं. इस तरह साबित हुआ है कि हरेक 10 में से 4 सहस्राब्दि युवा कैरियर की लंबी पारी खेलना चाहते हैं. इस से यह साबित हुआ है कि नए अवसरों की तलाश के साथसाथ यह नई पीढ़ी कुछ अरसा पहले टाइम मैगजीन द्वारा मैंमैं करने वाली पीढ़ी के रूप में संबोधित की गई यह पीढ़ी, धारणा के उलट समाज के प्रचलित कायदों पर ही अमल करना चाहती है.

मिलेनियल्स को ले कर अमेरिका में जो सर्वे आधारित अध्ययन हुआ है, वह तो इन के बारे में और भी चौंकाने वाली जानकारी दे रहा है. वहां ऐसा अध्ययन प्यू रिसर्च सैंटर द्वारा किया गया.

इस अध्ययन में सब से ज्यादा चौंकाने वाला संकेत यह है कि आधुनिक इतिहास में पहली बार यह सहस्राब्दि अमेरिकी युवा अपने मांबाप या रिश्तेदारों के पास उन के ही घर में रहने को ज्यादा तरजीह दे रहा है, बजाय हमउम्र लाइफपार्टनर के. यह बदलाव कितना उलटफेर भरा है. यह इस से समझा जा सकता है कि 60 के दशक (पिछली सदी) में इस उम्र (20-35) के महज 13 फीसदी युवा ही अपने अभिभावकों के पास रहने की समझदारी दिखाते थे, लेकिन अब ऐसे युवाओं की तादाद अमेरिका में 22 फीसदी है. इसी समयांतराल में कई और क्रांतिकारी तब्दीलियां प्यू रिसर्च में नजर आई हैं.

जैसे, अब शादी की उम्र बढ़ गई है. पहले जहां महिलाओं में औसतन 20 और पुरुषों में औसतन 22 वर्ष की उम्र में लोग शादी कर लेते थे, वहीं अब यह औसत महिलाओं में 27 और पुरुषों में 29 वर्ष है. इसी तरह कभी शादी न करने वालों की तादाद इस दौरान बढ़ी है. पहले जहां 10 में से 1 ही युवा ही शादी न करने का जोखिम लेता था, वहीं अब हर 5 में से 1 युवा ऐसा करने लगा है. शादी लंबे वक्त तक टालने के इस ट्रैंड के पीछे भी संकेत यही निकलता है कि युवाओं को लाइफपार्टनर से ज्यादा मांबाप और रिश्तेदारों का आकर्षण अपनी ओर खींचने लगा है. जो आधुनिकता के उलट एक रूढि़वादी या पारंपरिक युवा की छवि समाने रखता है.

यह सही है कि आज के किशोर या युवा नौकरी की मजबूरी में अपने घरपरिवार से दूर भले ही हो जाएं, पर मौका मिलते ही वे अपने मांबाप और बड़ेबुजुर्गों के साथ रहना चाहते हैं. युवतियां भी परिवार के साथ रहना चाहती हैं क्योंकि उन का मानना है कि हर सुखदुख में परिवार ही सब से बड़ी ताकत होता है. इस मामले में भारत पूरी दुनिया से थोड़ा अलग है. यहां शादी के बाद परिवारों का बिखराव आमतौर पर नौकरी की मजबूरी में होता है, अन्यथा लड़कियां अपने सासससुर और देवरननद के साथ रहना चाहती हैं.

असल में, आज का युवा भावुक होने के साथसाथ प्रैक्टिकल भी है, क्योंकि उसे मालूम है कि मांबाप से अलग अपना परिवार बसाना और घर चलाना आसाना नहीं है. इसीलिए वह मातापिता के साथ रहना चाहता है. जरूरत के वक्त उन की मदद लेना और देना चाहता है. यही नहीं, जो सपना मांबाप ने उन के लिए देखा था, अगर मांबाप किसी कारण से उसे पूरा नहीं कर पाए, तो उसे वह अपने दम पर पूरा करना चाहता है.

VIDEO : गर्मियों के लिए बेस्ट है ये हेयरस्टाइल

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

स्वामी बोतलानंद महाराज

यह नहीं मालूम कि उन का असली नाम ‘स्वामी’ था या ‘बोतलानंद’ या फिर दोनों ही थे. सच तो यह है कि उन में ‘बोतल’ जैसा खिंचाव था. जैसे शराबी किसी शराब की बोतल की ओर खिंचा चला आता है ठीक उसी तरह उन के भक्त भी अपना दिमाग अलमारी में बंद कर उन के पैरों में लमलेट हो जाया करते थे.

गजब का चमत्कार था उन में. हर समस्या का चुटकी बजाते इलाज, वह भी बहुत सस्ता, आसान और टिकाऊ. भक्त चाहें तो ‘तनमनधन’ से फीस अदा कर सकते थे. कोई दबाव, डर, धमकी कुछ भी तो नहीं था. सारा खेल श्रद्धा पर टिका था. हमें तो लगता है कि अगर कश्मीर, आतंकवाद या पाकिस्तान को सबक सिखाने जैसे मसले हों या घोर गरीबी, बेरोजगारी जैसे मुद्दे, स्वामी बोतलानंद महाराज के पास इन का भी कोई शर्तिया इलाज जरूर होगा.

सरकार को एक बार उन से जरूर इन मसलों पर सलाह लेनी चाहिए, यह हमारा सुझाव है. सस्ते में और मजेमजे में इतनी बड़ी समस्याओं का इलाज हो जाए तो इस में बुराई क्या है? यही तो हम सब चाहते भी हैं. खैर, अब मूल मुद्दे पर आते हैं कि स्वामीजी के नामकरण का आखिर राज क्या था? हर आम आदमी को यह नाम अटपटा लगेगा लेकिन यह पक्का है कि इस के मूल में कुछ न कुछ शुभ संकेत जरूर छिपा होगा.

जैसे कोई भी चमत्कारी बाबाओं की लीलाओं की थाह कभी नहीं पा सकता, ठीक वैसे ही स्वामी बोतलानंद महाराज को समझना आसान नहीं था. नाम हो या उन के कारनामे, सबकुछ किसी गहरे राज में लिपटी मुश्किल पहेली सा था. ऐसा लगता है कि स्वामी बोतलानंद महाराज नाम का सही मतलब सिर्फ और सिर्फ सच्चे भक्त ही समझ सकते हैं जो सिर्फ सुनते हैं, कभी सवाल नहीं करते.

हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसना भी ठीक नहीं है. क्या तर्क से कभी किसी का भला हुआ है? उलटे लोग धर्मकर्म से कटते चले जाते हैं, श्रद्धा का नाश हो जाता है. स्वामी बोतलानंद महाराज का आश्रम कहो या कुटिया शहर से दूर सुनसान जगह पर बनी थी लेकिन सरकारी कृपा से वहां देशीविदेशी शराब के ठेके जरूर खुले हुए थे, इसलिए वह सुनसान जगह आबाद रहती थी.

इसे स्वामी बोतलानंद महाराज का कल्याणकारी काम माना जाए जो उन्होंने ऐसी सुनसान जगह को आबाद किया. पीने के शौकीन भक्तों के लिए तो यह सोने पर सुहागा जैसा है. पूरा पैकेज एक छत के नीचे. महाराज बोतलानंद स्वामी के दर पर कोई भेदभाव नहीं, कोई रोकटोक भी नहीं. कायदेकानून का वहां न कोई वजूद और न ही जरूरत.

अब आप को दिव्य स्वामी बोतलानंद महाराज के दर्शन भी करा देते हैं. उन की कुटिया में लेदे कर एक बिछौना नजर आता था. उसी पर महाराज कभी बैठे, कभी लेटे तो कभी आधी नींद की हालत में मिलते थे.

पूरी कुटिया बोतलों से अटी नजर आती थी. खालीभरी बोतलों के बीच महाराज झूमते हुए प्रवचन करते रहते थे. कुछ नासमझों को उन की यह अदा रोनापीटना लग सकती है लेकिन बंदर अदरक का स्वाद नहीं जानता इसलिए बंदरों की सोच पर हमें कुछ कहना भी नहीं है. धर्म और श्रद्धा की बात हो तो सवाल खड़े करना घोर पाप है. यहां जो है, जैसा है, बस मान लो. स्वामी बोतलानंद महाराज की कुटिया गरीबों और अमीरों से भरी रहती थी. भक्तों की ऐसी जबरदस्त भीड़ हर किसी के हिस्से में नहीं आती.

स्वामी बोतलानंद महाराज की एक खूबी यह भी थी कि वे कभी किसी भक्त को ‘न’ नहीं कहते थे. शायद ही उन के मुंह से कभी ऐसे शब्द निकले हों, ‘तुम्हारा काम नहीं होगा… यह सोच अच्छी नहीं है…’ जैसी जो भी इच्छा भक्त जाहिर करते महाराज तुरंत उन्हें आशीर्वाद दे देते.

अब सब से निराली खूबी देखिए. स्वामी बोतलानंद महाराज न संन्यासी का चोला धारण करते थे और न ही लंबे केश, जटाजूट. मतलब एक संन्यासी की इमेज से वे कोसों दूर थे. एक आम शराबी की तरह जो हर वक्त मदहोश रहता है. जिसे न तन का होश और न मन का. सबकुछ कुदरती रूप में देशी स्टाइल में चलता था.

यह बड़ी अच्छी बात है. फालतू के दिखावे, बाहरी आडंबर का क्या करना? जैसे हैं, उसी रूप को सच में दिखा दें, यह भी कम ईमानदारी नहीं है, वरना धर्म के कारोबार में मार्केटिंग इतनी हावी हो गई है कि हकीकत का पता पुलिस केस होने पर ही पता चलता है, इसलिए हम उन के इस रूप को दिल से नमस्कार करते हैं. उन्हें जमीन पर लेट कर प्रणाम करते हैं. सभी भक्तजन एक बार जोर से जयकारा लगाएं, ‘‘बाबा बोतलानंद महाराज की जय.’’

VIDEO : हेयरस्टाइल फौर कौलेज गोइंग गर्ल्स

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

एक अनार सौ बीमार

खातेपीते खुशहाल घरों की सुंदर, स्लिम, स्मार्ट और पूरी दुनिया को ठेंगे पर रखने की कूवत वाली भरीपूरी स्त्रियां स्कूटर या कार चलाना सीखें, इस से अच्छी बात नहीं हो सकती. अपनी श्रीमती की 2 दर्जन से ऊपर कच्चीपक्की सुंदर, सलोनी और चुस्तचालाक सहेलियों को स्कूटर, कायनी और कार सिखाने का श्रेय इस महाबदौलत को जाता है. सब तरफ स्कूटर सीखने की धुन सवार थी और हम में भी अजीब सी सनक थी कि घरबाहर सबकुछ भुला कर चुलबुली व हसीन अप्सराओं को स्कूटर सिखाते रहो, बस.

हमारा तो सिद्धांत था कि न जाने किस भेस में मिल जाएं भगवान. एक लेडी अगर स्कूटर सीखने में दक्ष हो गई तो 2 दिन पहले ही किसी दूसरी जगह से संदेश आ जाता और हम अपना फटीचर सा स्कूटर उठा कर सुबहसुबह उधर लपक लेते. अंधे को और चाहिए भी क्या-2 आंखें. हुस्न का जादू हमारे चारों ओर बिखरा रहता और हमारी आंखें तृप्त रहतीं. जानकार लोग अच्छी तरह जानतेसमझते हैं कि स्कूटर सीखना और सिखाना बहुत मेहनत, लगन और सब्र के काम हैं. सीखने वाली अगर नादान, फक्कड़ और अल्हड़ स्त्री हो तो मामला और भी पेचीदा व जिम्मेदारीवाला हो जाता है.

जरा सी घबराहट, हड़बड़ी या जल्दबाजी सीखने वाली की टांगें या बाहें तुड़वा सकती है. बड़ी सावधानी से हर दिशा में कदम बढ़ाया जाता है. हम 1-2 हफ्ते तक सीखने वाली की तरफ मंदमंद मुसकराहट फेंकते हैं. उस की सुंदरता की तारीफ में ऊंचेऊंचे जुमले फेंकते हैं, जैसे परसों तुम्हारा पीकौक ब्लूसूट गजब ढा रहा था या तुम्हारी नाक पर छोटा सा डायमंड का कोका बहुत जंच रहा है. हैरानी तो हमें तब होती जब वह स्त्री हमारे तारीफ के अनुरूप ही कपड़े व गहने पहनने लगती. और भी कई तरह के टैस्ट हम उन पर करते तब जा कर इश्क में कुछ निखार आता. अब और क्याक्या बताएं. इतने पतले पापड़ बेलबेल कर हमारी कमर टूट जाती मगर कई चुस्त व चंट लेडी ‘थैंक्यू, भाईसाहब’ कह कर ये जा और वो जा, निकल लेती. बहुत बार तो अंधे के पैरों तले बटेर खुद ही आ गिरता और कई बार पहाड़ खोद डालते पर मरा हुआ चूहा भी हाथ न लगता. माया महाठगनि हम जानि.

स्त्रियों में भेड़चाल बहुत होती है. जहां 4 सहेलियां जुड़ीं, वहीं यह प्रश्न उछलता था, ‘अरे मोना, तूने तो कमाल कर दिया. मैं ने सुना कि कल मेघा की किट्टी पार्टी में तू अकेली कायनी चला कर इतनी दूर से आई. तुम्हारे तो पंख लग गए. कोई रोकनेटोकने वाला नहीं. तेरा तो अच्छा सोशल सर्कल बन जाएगा. हम तो ज्यादातर घर में बैठी कुढ़ती रहती हैं. स्कूटर व कायनी तो हमारे घर में भी खड़े हैं मगर कोई चलाना सिखाए तब न? हम तो पति के मुहताज हो कर 2-4 जगह चली भी जाएं तो क्या खाक मजा आता है. तेरी तो समय ही पलट गया. सच्ची बता, तूने कायनी चलाना कब सीखा, किस ने सिखाया, लाइसैंस कहां से बनवाया?’

उत्तर मिलता, ‘अरे, वो हैं न स्वीटी के हस्बैंड, उन की जानपहचान बहुत है. मेरा ड्राइविंग लाइसैंस भी घर बैठे ही बन गया. बहुत प्यार से स्कूटर चलाना सिखाते हैं. हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा. हैं भी बड़े स्मार्ट और समझदार.’ उन सुस्तीभरे सस्ते दिनों में अपने पास एक पुराना सा खटारा स्कूटर था और मन में ढेर सारी बेईमानी व बेशर्मी थी. अपना एक सूत्रीय आदर्श वाक्य था-फालतू का कोई लोचा नहीं. प्यारमुहब्बत के बदनाम पचड़े में हम नहीं पड़ते थे. स्त्री अगर स्कूटर सीखने के दौरान देहस्पर्श के सुख से हमें महरूम न करे तो समझ लो हमारी गुरुदक्षिणा वसूल हो गई. और अगर कोई सडि़यल जलकुकड़ी बातबात पर विरोध व्यक्त करे तो फिर सारी उम्मीदें अगले उम्मीदवार पर रखनी पड़ती हैं.

हमारी श्रीमती ताने देदे कर थक गई, ‘बच्चों के स्कूल की रिपोर्ट देखी है कभी आप ने. मर कर पास होते हैं. मैं सब जानती हूं कि आजकल आप क्याक्या और कहांकहां गुल खिला रहे हैं. घर के काम को छोड़ कर मेरी सहेलियों को स्कूटर सिखाने के बहाने गुलछर्रे उड़ाते फिरते हैं आप. कितनी शर्म आती है मुझे जब लोग ताना देते हैं कि तुम्हारे पति को कोई और कामधंधा नहीं है आजकल. जब देखो गांधी ग्राउंड या नेहरू पार्क में लोगों की पत्नियों को स्कूटर सिखा रहे होते हैं. प्यार अंधा होता है मगर पड़ोसी तो अंधे नहीं होते.’

सबकुछ चुपचाप सहना पड़ता है. प्यार के मामले में कितनी भी गोपनीयता रख लो मगर इश्क और मुश्क कहां छिपते हैं. अब ओखली में सिर दे ही दिया हो तो फिर मूसलों से क्या डरना. उन दिनों नारीमुक्ति आंदोलन अपने चरम पर था. स्त्रीमुक्ति का सब से प्रभावशाली प्रतीक था- स्कूटर. अर्थात घर की चारदीवारी से विद्रोह. स्कूटर सीखने की अदम्य इच्छा रखने वाली नवयौवना का सब से अधिक विरोध उस का पति तथा विशेषरूप से उस की सास करती थी. उन्हें डर था कि स्कूटर सीखा नहीं कि बंद पिंजरे की चिडि़या आजाद हो जाएगी. काबू में नहीं रहेगी. जाएगी कहीं और आ कर बताएगी कि मंदिर गई थी.

जब भी कोई सुकुमारी स्कूटर सीखने की जिद करती तो उसे एक ही रटारटाया उत्तर मिलता था, ‘क्या करोगी इस उम्र में स्कूटर सीख कर? तुम को कौन सा दफ्तर, स्कूल या कचहरी जाना है. वैसे भी तुम्हारे बेटे बबलू को तो चलाना आता ही है. वही ले जाएगा तुम्हें बाजार. फिर तुम्हें स्कूटर सिखाएगा कौन? मालूम है लाइसैंस बनवाने में कितने झंझट हैं. पहले 6 महीने तक कच्चा बनवाओ और फिर डीसी दफ्तर में जा कर पुलिस वालों को टैस्ट दो. बबलू तो ट्यूशन के चक्कर में इधरउधर भटकता है और तुम्हारे पति सुरेश को तो दुकान से ही फुरसत नहीं है. फिर तुम्हें स्कूटर चलाना सिखाएगा कौन?’ पूरे महल्ले में एकमात्र मैं ही ऐसा नायक था जिस के पास इस कौन का उत्तर था और बड़ा संतोषजनक उत्तर था. मैं कोई कमउम्र का लंपट भी नहीं था कि लोगों को बेवजह शक हो. अच्छाखासा इज्जतदार और अधेड़ पक्की हुई उम्र का संजीदा आदमी था मैं. स्त्रियों की राय तो मैं नहीं जानता मगर आसपास और जानपहचान के आदमी मुझे औसतन अच्छी नजर से देखते थे. इसलिए स्त्रियों के मामले में मेरी साख अच्छी थी.

मुझे न तो दफ्तर जाना होता था और न किसी दुकान पर. मांबाप की अच्छीखासी जायदाद थी जहां से अच्छा किराया आ जाता था. इधर मैं ने समय पर ज्योतिष विज्ञान में डिगरी प्राप्त कर ली थी. अच्छे मोटे ग्राहक चंगुल में फंस जाते थे. अपनी व्यस्त दिनचर्या में से स्कूटर सिखाने के लिए समय हम निकाल ही लेते थे.

सिखाने वाला एक था और सीखनेवालियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही थी. एक अनार और सौ बीमार वाली अजीब अटपटी स्थिति थी. फिर भी हम खुश थे. अभी एक शोख हसीना को स्कूटर चलाना सिखा रहे होते तो दूसरी जगह से किसी मित्र या परिचित का फोन आ जाता, ‘यार, मेरी पत्नी कई दिनों से मेरे पीछे पड़ी है. मैं ने उस से वादा किया है कि नया कायनी ले कर दूंगा. तुम्हारे पास वक्त है, स्कूटर चलाना सिखा दो उसे. लाइसैंस भी बनवा देना. खर्चा मैं दे दूंगा. तुम्हें तो पता ही है कि मैं तो टूर पर रहता हूं.’ नारीमुक्ति की इतनी तेज आंधी चल रही थी कि सुबह हम सुनीता को स्कूटर चलाना सिखाते, दोपहर को संगीता को और शाम को अनीता के पहलूनशीं होते. किसी सुपरस्टार हीरो की तरह 3-3 शिफ्टों में काम मिल रहा था हमें. हमारी तो पांचों उंगलियां घी में थीं. दुनिया के सभी गमों से बेखबर हमें बस एक ही धुन थी कि शहर की सभी चुलबुली व तेजतर्रार स्त्रियां स्कूटर चलाना सीख जाएं तथा अपनी गुलामी की जंजीरें हम से खुलवा लें.

इन दिनों हम कार चलाना सिखा रहे हैं. जिनजिन प्यारी सखियों ने हम से स्कूटर चलाना सीखा था वही अब कार चलाना भी सीख रही हैं. कल जब नारीमुक्ति आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा तब उस में हमारा नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा. हमारे कंपीटिशन में 3-4 ड्राइविंग स्कूल हैं मगर हम में और उन में जमीनआसमान का अंतर है. हम मुफ्त में सिखाते हैं और बड़े प्यार व लगन से सिखाते हैं. सारे महल्ले में सब से खटारा कार हमारे पास है. नौसिखिए को नई कार से सीखने कौन देता है भला. हमारा कलेजा और जिगर देखिए- कार हमारी, वक्त हमारा और पैट्रोल भी हमारा. जनून की हद है यह.

VIDEO : गर्मियों के लिए बेस्ट है ये हेयरस्टाइल

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें