मनोज बाजपेयी और जौन अब्राहम को है आयशा शर्मा का सहारा

बौलीवुड में फिल्म की सफलता के साथ ही कलाकार की कीमत कम या ज्यादा होती रहती है. इन दिनों जौन अब्राहम और मनोज बाजपेयी के करियर की बड़ी दुर्गति है. अतीत में इन दोनों कलाकारों की कई फिल्में बाक्स आफिस पर बुरी तरह से मात खा चुकी हैं. इसी के चलते जौन  अब्राहम और मनोज बाजपेयी के साथ निखिल अडवाणी की नई फिल्म में काम करने के लिए तमन्ना भाटिया और पूजा हेगड़े सहित कई अभिनेत्रियां मना कर चुकी थीं. जिसके चलते पिछले एक वर्ष से इस फिल्म का निर्माण अधर में लटका हुआ था. यहां तक गत माह प्रदर्शित मनोज बाजपेयी की फिल्म ‘‘अय्यारी’’ को भी बाक्स आफिस पर सफलता नहीं मिली. जिसके चलते बौलीवुड में चर्चाएं गर्म हो गयी थी कि अब यह फिल्म कभी नहीं बनेगी.

लेकिन ताजा तरीन खबर यह है कि मनोज बाजपेयी और जौन अब्राहम की यह फिल्म शुरू हो चुकी है, पर इन कलाकारों ने समझौता करके एक नई अभिनेत्री आयशा शर्मा के साथ काम करने के लिए तैयार हो गये हैं. जौन अब्राहम और मनोज बाजपेयी के साथ फिल्मी करियर की शुरूआत कर रही आयशा शर्मा की बड़ी बहन नेहा शर्मा भी अभिनेत्री हैं. किंगफिशर कैलेंडर गर्ल के रूप में ही आयशा शर्मा चर्चा में रही हैं.

आयशा शर्मा कहती हैं- ‘‘मुझे नहीं लगता कि बौलीवुड में अभिनय करियर शुरू करने के लिए इससे अच्छी फिल्म मुझे मिल सकती थी. जौन अब्राहम व मनोज बाजपेयी के साथ अभिनय करना मेरे लिए सम्मान की बात है. मुझे उम्मीद है कि मैं मिलाप झवेरी लिखित किरदार के साथ न्याय कर सकूंगी.’’

पहले इस फिल्म का निर्माण व निर्देशन निखिल अडवाणी ही कर रहे थे और उन्हे साथ में सह निर्माता की तलाश थी, मगर कोई उनके साथ जुड़ने को तैयार न था. अब इस फिल्म के निर्माण के साथ टीसीरीज जुड़ा है, मगर अब फिल्म का लेखन व निर्देशन मिलाप झवेरी कर रहे हैं.

इस फिल्म व आयशा को जोड़ने की चर्चा चलने पर मिलाप झवेरी कहते हैं- ‘‘शुरू से ही मैं इस फिल्म का लेखन व निर्देशन कर रहा था. किंगफिशर कैलेंडर गर्ल के रूप में आयशा काफी चर्चित हैं. वह खूबसूरत होने के साथ ही काफी भोली सूरत वाली हैं, जो कि हमारी फिल्म के किरदार के लिए उपयुक्त लगी. जब हमने उसका टेस्ट लिया, तो हमें उसके अंदर जबरदस्त अभिनय प्रतिभा नजर आयी. इतना ही नहीं जौन  अब्राहम के साथ आयशा की जोड़ी भी अच्छी लग रही है.’’

भारतीय जनता पार्टी का गैरसंवैधानिक उपदेश

भारतीय जनता पार्टी के विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री और यहां तक कि प्रधानमंत्री भी सामाजिक व पारिवारिक मामलों में उपदेश देना अपना कर्तव्य ही नहीं, अपना अधिकार भी मानते हैं. यह उन की गलती नहीं, उन की आदत है जो हिंदू पाखंडभरी दुकानदारी की देन है जिस में पंडेपुजारी न केवल ईश्वर के एजेंट बन कर धर्म कर वसूलते हैं, बल्कि जीवन कैसे जिया जाए और क्या वर्जित है, के उपदेश भी वे देते रहते हैं.

प्रधानमंत्री का पकौड़े बेचने को सही, आदर्श व कमाऊ व्यवसाय घोषित करने की कड़ी में गोवा के मुख्यमंत्री ने बयान दे डाला कि लड़कियों का बीयर पीना चिंता की बात है. अगर मनोहर पर्रिकर बीयर और दूसरी शराबों को सभी के पीने पर आपत्ति कर रहे होते तो बात दूसरी थी पर उन का केवल लड़कियों के पीने पर आपत्ति करना भाजपाई मानसिकता है. इस मानसिकता के तहत हम मर्द चाहे जो गुनाह कर लें, औरतों को सीमा और संयम में ही रहना चाहिए.

इस पर उदार विचारों वाली औरतों का आपत्ति करना सही ही है. शराब किसी के लिए भी सही नहीं है. शराब की शिकार औरतें ही ज्यादा होती हैं. शराब पीने पर रोकटोक मुख्यमंत्री के कार्यक्षेत्र में नहीं आता. उन की सरकार गोवा में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दे, न औरतें पिएं न आदमी. ऐसा करने से स्वास्थ्य के सुखद परिणाम आएंगे जबकि राजस्व की हानि होगी. सिर्फ औरतों के लिए उसे वर्जित माना जाए, यह किसी को स्वीकार्य नहीं होगा. ऐसा उपदेश देना परिवार का काम है. जो सरकार बीयर के टैक्स पर फलफूल रही है उसे, अंदर से भेडि़या हो कर, गाय की खाल पहन कर, पाबंदी लगाने का हक किस ने दिया?

वैसे यह चिंता की बात है कि सिगरेट की तरह शराब को भी आरतों को पिला कर जम कर व्यापार बढ़ाया जा रहा है. अगर देश के कर्णधार चिंतित हैं तो वे स्त्रीपुरुष का भेदभाव छोड़ कर शराब को खुलेआम बेचने को तो प्रतिबंधित कर ही दें और इस से होने वाली कमाई को भूल जाएं.

चोरी, डकैती, लूट कभी किसी जमाने में राजाओं के लिए टैक्स वसूलने का अच्छा साधन होते थे. वे अघोषित ठेके देते थे ताकि उन्हें टैक्स वसूलने वाले न नियुक्त करने पड़ें. अपने समय में अंगरेजों ने लगानरूपी आपराधिक टैक्स वसूलने के लिए जमींदारी प्रथा लागू की थी. आज वे दोनों स्रोत गैरकानूनी, गैरसंवैधानिक हैं. इसी तरह शराब पर टैक्स असंवैधानिक करने का हक आज के भगवा शासकों के पास है. हिम्मत है तो वे ऐसा करें लेकिन शराब के बहाने वे औरतों को निचला स्थान बारबार याद दिलाने की चेष्टा न करें.

जिस्म की आग में मां बेटी ने खेला खूनी खेल

8 नवंबर, 2016 को किसी ने राजस्थान के बाड़मेर जिले के थाना पचपदरा पुलिस को फोन कर के सूचना दी कि मंडापुरा साजियाली फांटा के पास सड़क किनारे झाडि़यों में एक लाश पड़ी है. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी जयकिशन सोनी पुलिस टीम के साथ सूचना में बताई गई जगह पर पहुंच गए. वहां बबूल की झाडि़यों में 25-26 साल के एक युवक की लाश पड़ी थी. उस के गले में रस्सी का फंदा लगा था. इस से यही लग रहा था कि उस की हत्या रस्सी से गला घोंट कर की गई थी. लाश के पास किसी आदमी के पैरों के निशान के साथ मोटरसाइकिल के टायरों के भी निशान थे.

पुलिस ने वहां पर मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की, पर मृतक को कोई भी पहचान नहीं सका. थानाप्रभारी ने अज्ञात युवक की लाश मिलने की सूचना बाड़मेर के एसपी डा. गगनदीप सिंगला और बालोतरा के एडिशनल एसपी कैलाशदान रतनू को भी दे दी थी.

कुछ ही देर में एसपी और एडिशनल एसपी भी मौके पर पहुंच गए. लाश का निरीक्षण कर उन्होंने भी वहां मौजूद लोगों से बात की. इस के बाद दोनों पुलिस अधिकारी थानाप्रभारी जयकिशन सोनी को जरूरी दिशानिर्देश दे कर चले गए. अधिकारियों के जाने के बाद थानाप्रभारी ने लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए बालोतरा के सरकारी अस्पताल भिजवा दिया.

लाश की शिनाख्त जरूरी थी, इसलिए पुलिस अधिकारियों ने सलाहमशविरा कर के लाश के फोटो वाट्सएप ग्रुप में शेयर कर लोगों से शिनाख्त की अपील की. पुलिस की यह तरकीब काम कर गई और किसी ने उस की शिनाख्त कर दी. उस का नाम गोमाराम था और वह थाना धोरीमन्ना के गांव कोठाला के रहने वाले गुमानाराम का बेटा था.

जयकिशन सोनी ने गुमानाराम को बुलवाया तो उन्होंने बालोतरा अस्पताल जा कर लाश देखी और उस की शिनाख्त अपने बेटे गोमाराम के रूप में कर दी. शिनाख्त हो गई तो पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों को सौंप दी गई. घर वालों ने पुलिस को बताया कि गोमाराम की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. इस से मामला और पेचीदा हो गया. पुलिस ने हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर केस की जांच शुरू कर दी.

एसपी डा. गगनदीप सिंगला ने इस केस को सुलझाने के लिए 2 पुलिस टीमें बनाई. पहली टीम में थाना नागाणा के थानाप्रभारी देवीचंद ढाका, एसपी (स्पेशल टीम) कार्यालय से भूपेंद्र सिंह तथा ओमप्रकाश और दूसरी टीम में कल्याणपुर के थानाप्रभारी चंद्र सिंह व उन के थाने के तेजतर्रार सिपाहियों को शामिल किया.

दोनों टीमों का निर्देशन एडिशनल एसपी कैलाशदान रतनू कर रहे थे. पुलिस ने मृतक के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि बाटाड़ू गांव का एक लड़का मृतक के साथ आताजाता रहता था. 2 महीने पहले वह गांव लुखू स्थित मृतक की ससुराल भी गया था.

उस युवक की पहचान गंगाराम निवासी दुर्गाणियों का तला, थाना लुंदाड़ा गिड़ा, के रूप में हुई. पुलिस ने 13 नवंबर, 2016 को उसे जोधपुर से धर दबोचा. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई तो सारा सच सामने आ गया.

उस ने बताया कि गोमाराम की हत्या में उस की पत्नी वीरो और सास जीतो भी शामिल थीं. पुलिस ने 14 नवंबर की सुबह उन दोनों को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों से पूछताछ के बाद गोमाराम की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

राजस्थान का बाड़मेर जिला जाट बाहुल्य है. यहां के लोगों का मुख्य पेशा खेतीकिसानी है. पहले राजस्थान में बालविवाह का प्रचलन था. दादादादी अथवा नानानानी की मौत होने पर मौसर (मृत्युभोज) की कड़ाही पर नन्हें बच्चों का बालविवाह करने की परंपरा थी.

अक्षय तृतीया को भी हजारों की संख्या में बालविवाह किए जाते थे. इसी जिले के गांव कोठाला के रहने वाले गोमाराम का भी 15-16 साल पहले लुखू गांव के श्रवणराम चौधरी की बेटी के साथ बालविवाह हुआ था. उस समय वीरो की उम्र 4 साल थी, जबकि गोमाराम 10 साल का था.

घर वालों ने गुड्डेगुडि़यों के खेल की तरह छोटी सी उम्र में इन दोनों की शादी कर दी थी. इस से पहले गोमाराम की शादी अपनी ही बिरादरी की एक लड़की के साथ हो गई थी, पर गौना होने से पहले ही उस की बीवी टांके में डूब कर मर गई थी. राजस्थान में अंडरग्राउंड बने पानी के टैंक को टांका कहते हैं.

वक्त के साथ गोमाराम और वीरो जवान हो गए. दोनों ने घर वालों से सुन रखा था कि उन की बचपन में ही शादी हो चुकी है. गोमाराम ने स्कूली पढ़ाई के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, जबकि वीरो जब 10वीं कक्षा में पढ़ रही थी, तभी उस का गौना गोमाराम से कर दिया गया था.

वीरो ने अपने वैवाहिक जीवन को ले कर कई रंगीन ख्वाब देखे थे, मगर गौने के बाद जब गोमराम से उस का सामना हुआ तो उस के ख्वाब टूट गए. किसी सुंदरस्वस्थ युवक के बजाय उस का पति दुबलापतला और शराबी था. चूंकि उस के साथ उस की शादी हो चुकी थी, इसलिए निभाना उस की मजबूरी थी.

गोमाराम हर समय शराब के नशे में डूबा रहता था. पत्नी से जैसे उसे कोई लगाव ही नहीं था. वह तो केवल शराब को अपनी जरूरत समझता था. नईनवेली दुलहन का दुखसुख पूछना तो दूर, वह उस से रात में भी बात नहीं करता था. शराब पी कर वह बिस्तर पर एक तरफ लुढ़क जाता था.

गौने के कुछ दिनों बाद ससुराल से वीरो जब मायके आई तो उस ने अपना दुखड़ा अपनी मां जीयो से कह सुनाया. उस ने साफसाफ कहा कि ऐसे शराबी के साथ वह जिंदगी कैसे गुजारेगी. बेटी की व्यथा सुन कर जीयो को भी महसूस हुआ कि बचपन में गोमाराम के साथ बेटी की शादी कर के उस ने बड़ी गलती की थी.

मां ने उसे दिलासा दी कि वक्त के साथ सबकुछ ठीक हो जाएगा. गौने के बाद वीरो स्कूल की गर्मियों की छुट्टियों में ससुराल गई. मगर पति की शराब की आदत में कोई सुधार नहीं आया. गौने के डेढ़ साल तक वह ससुराल में रही. उस ने अपने प्यार से पति का दिल जीतना चाहा, पर पति पर इस का कोई फर्क नहीं पड़ा.

वीरो ने मायके आ कर मां को सारी बातें बताईं तो बेटी का दुख देख कर जीयो को बड़ा झटका लगा. गोमाराम जोधपुर शहर की एक फैक्ट्री में नौकरी करता था. उस के साथ गंगाराम और उस का भाई चूनाराम भी काम करते थे. तीनों आपस में अच्छे दोस्त थे.

गोमाराम अपनी ज्यादातर कमाई शराब पर उड़ा देता था. वहीं गंगाराम और चूनाराम शराब को हाथ तक नहीं लगाते थे. वे अपनी तनख्वाह बचा कर रखते थे.  गोमाराम की बीवी वीरो पिछले 6 महीने से मायके में थी. गोमाराम कभीकभी उस से फोन पर बातें कर लेता था. वह उस से आने को कहती तो वह पैसे न होने का बहना कर देता. उस के पास पैसे होते भी कहां से, क्योंकि वह सारे पैसे शराब में उड़ा देता था.

एक बार पैसे न होने पर गोमाराम ने अपना मोबाइल चूनाराम को बेच दिया. चूनाराम ने वह मोबाइल अपने भाई गंगाराम को दे दिया. वीरो को यह बात पता नहीं थी, इसलिए जब उस ने पति को फोन किया तो फोन गंगाराम ने रिसीव किया. वीरो ने पूछा, ‘‘कैसे हो?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं. तुम कैसी हो?’’ गंगा ने पूछा.

उस की आवाज सुन कर वीरो चौंकी, क्योंकि एक तो वह आवाज उस के पति की नहीं थी, दूसरे पति ने कभी उस से इतनी तमीज से बात नहीं की थी. उस ने कहा, ‘‘यह नंबर तो गोमाराम का है, आप कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘मैं गोमाराम का दोस्त गंगाराम बोल रह हूं. उन का फोन मैं ने ले लिया है. आप इसी नंबर पर फोन करना, मैं गोमा से बात करा दूंगा.’’

‘‘बात क्या करनी है, उन्हें तो शराब पीने से ही फुरसत नहीं है. उन के लिए कोई मरे या जिए, उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं है.’’ वीरो ने लंबी सांस ले कर कहा.

‘‘आप सही कह रही हैं, उसे सचमुच किसी की परवाह नहीं है. आप को मायके गए कितने दिन हो गए, मिलने तक नहीं जाता. पता नहीं कैसा आदमी है. दिनरात शराब में मस्त रहता है.’’

‘‘बिलकुल सही कह रहे हैं आप.’’ वीरों ने लंबी सांस ले कर कहा.

इस बातचीत से गंगाराम समझ गया कि वीरो अपने पति से खुश नहीं है. इसलिए जब भी वीरो उस से बात करती, वह उस से बड़ी तहजीब से बातें करता.

गंगाराम की यही आदत वीरो को भा गई. वह अकसर उस से मोबाइल पर बातें करने लगी. उसे गंगारम ने बताया कि उस का बचपन में बालविवाह हुआ था. वीरो जब भी गंगाराम से बातें करती, उसे अपनेपन का अहसास होता.

थोड़े दिनों तक फोन पर होने वाली बातों से दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए. वीरों ने अपनी मां जीयो को भी गंगाराम के बारे में बता दिया. जीयो ने भी गंगाराम से बात की. उसे भी गंगाराम का व्यवहार सही लगा. इस के बाद जीयो ने गंगाराम से कहा कि गोमाराम के साथ उस की बेटी खुश नहीं है. अगर वीरो का उस से तलाक हो जाए तो नाताप्रथा के तहत वह बेटी का ब्याह उस के साथ कर देगी.

इस बात से गंगाराम का दिल बागबाग हो उठा. वीरो ने भी गंगाराम से कहा कि वह गोमाराम का दोस्त है, उसे तलाक के लिए मनाए. एक दिन गोमा जब शराब के नशे में धुत था तो गंगाराम ने उस से कहा, ‘‘तुम वीरो का जीवन क्यों बरबाद कर रहे हो. उसे तलाक दे दो.’’

‘‘तलाक… मैं उसे इस जनम में तो तलाक नहीं दूंगा. वह अपने आप को बहुत सुंदर और होशियार समझती है. मुझे शराबी, निकम्मा और न जाने क्याक्या कहती है. इसलिए जीते जी मैं उसे तलाक नहीं दे सकता. वह शादीशुदा हो कर भी विधवा की तरह जीती रहे. बस मैं यही चाहता हूं?’’ गोमाराम ने कहा.

गंगाराम ने यह बात जब वीरो को बताई तो उस ने अपनी मां से बात की. इस के बाद उन्होंने गंगाराम को अपने गांव लुखू बुलाया. यह 2 महीने पहले की बात है. गंगाराम अपनी प्रेमिका वीरो से मिलने लुखू पहुंच गया. वहां पर गंगाराम और वीरो ने एकदूसरे को देखा.

दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया. बस फिर क्या था, मांबेटी ने गंगाराम से कहा कि वह गोमाराम से वीरो का तलाक करवा दे. अगर वह तलाक के लिए राजी न हो तो उसे रास्ते से हटा दे. गंगाराम को भी उन की बात पसंद आ गई.

गंगाराम गोमाराम को रास्ते से हटाने का मौका तलाशने लगा. वीरो और उस की मां की गंगाराम से अकसर मोबाइल पर बातें होती रहती थीं. दोनों उसे उकसाती रहती थीं कि जल्द से जल्द गोमाराम का पत्ता साफ करे. गंगाराम भी इसी धुन में था, मगर मौका नहीं मिल रहा था.

गोमाराम ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की बीवी और सास उस की हत्या का तानाबाना बुन रही हैं. वह तो अपनी मस्ती में मस्त था. आखिर 7 नवंबर, 2016 को गंगाराम को उस समय मौका मिल गया, जब दिन में ही गोमाराम उसे शराब के नशे में धुत मिल गया. इस मौके को भला वह हाथ से क्यों जाने देता.

उस ने रात होने का इंतजार किया. रात करीब 8 बजे गंगाराम ने अपनी मोटरसाइकिल पर गोमाराम को बिठाया और गांव चलने को कहा. गोमाराम उस मना नहीं कर सका. बालोतरा रोड पर मोटरसाइकिल पहुंची तो रास्ते में भांडू गांव के ठेके से गंगाराम ने शराब की बोतल खरीद कर गोमाराम को दी. एक जगह बैठ कर वह उसे पी गया. इस के बाद दोनों ने कल्याणपुर के एक ढाबे पर खाना खाया.

गंगाराम को लग रहा था कि गोमाराम अभी भी होश में है. उस ने पचपदरा में जोधपुर रोड पर उसे फिर शराब पिलाई. इस से उसे गहरा नशा हो गया. मोटरसाइकिल के पीछे बैठ कर वह लहराने लगा. गंगाराम इसी मौके की ताक में था. वह गोमा को मोटरसाइकिल से उतार कर बबूल की झाडि़यों के बीच ले गया और वहीं उस का गला दबा कर मार डाला. लाश को वहीं पड़ी छोड़ कर वह मोटरसाइकिल से जोधपुर चला गया.

गंगाराम ने गोमाराम की हत्या करने की बात वीरो तथा जीयो को बता दी थी. वीरो खुश थी कि अब गंगाराम से वह नाता के तहत ब्याह कर लेगी. गंगाराम भी यही सोच रहा था. मगर पुलिस ने उन के मंसूबों पर पानी फेरते हुए 5 दिनों में इस हत्याकांड का खुलासा कर दिया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने 16 नवंबर, 2016 को तीनों को पचपदरा की कोर्ट में पेश किया, जहां से वीरो और जीयो को केंद्रीय कारागार जोधपुर और गंगाराम को बालोतरा जेल भेज दिया गया. क्योंकि बालोतरा जेल में महिलाओं को रखने की जगह नहीं है. इस मामले में भी वही हुआ, जो ऐसे मामलों में होता है. थानाप्रभारी जयकिशन सोनी इस मामले की जांच कर रहे हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

राखी ने सनी लियोनी से पूछा, तुम प्रेग्नेंट कब हुई और बच्चे कब पैदा हुए?

VIDEO : नेल आर्ट का ये तरीका है जबरदस्त

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बौलीवुड अभिनेत्री सनी लियोनी और उनके पति डेनियल वेबर हाल ही में जुड़वा बेटों के माता-पिता बने हैं. दोनों ने सोमवार को सोशल मीडिया पर बेटों के जन्म की खबर शेयर की थी. इस खबर के बाद से ही दोनों को बधाइयां मिलने का सिलसिला शुरू हो गया है. हालांकि इस पर कई लोगों ने उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया कि जब वह प्रेग्नेंट नहीं थीं, तो जुड़वा बच्चों की मां कैसे बन गईं.

सनी को ट्रोल करने में ड्रामा क्वीन राखी सावंत भी पीछे नहीं रहीं. अपने बड़बोलेपन के लिए जानीं जाने वाली आइटम गर्ल राखी सांवत ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट में एक विडियो के जरिए पहले सनी को तीन बच्चों की मां बनने के लिए बधाई दी और उसके बाद एक के बाद एक कई सवाल भी पूछे. राखी ने सनी से पूछा है कि वो कब प्रेग्नेंट हुई और बच्चे कब पैदा किए.

राखी सावंत ने अपने इस वीडियो में कहा, ‘हाय सनी लियोनी, मैं बहुत खुश हूं कि तुमने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया है, तुम्हें बार-बार शुभकामनाएं. यार मुझे पता ही नहीं चला तुम प्रेग्नेंट कब हुई और बच्चे कब पैदा कर लिए? बहुत गुपचुप तरीके से चुपचाप कर लिया तुमने यह सब… एक तरफ लैला मैं लैला गाना भी कर लिया और दूसरी तरफ बच्चे भी पैदा कर लिए. अच्छा तो जब एल ए गई थी तब बच्चे पैदा हुए क्या? अच्छा सुनों बच्चों की खूब अच्छी तरह परवरिश करना, जैसे फर्राटेदार अंग्रेजी तुम बोलती हो वैसी ही अंग्रेजी बच्चों को सिखाना, ऐसे ही तुम बच्चों पर बच्चे पैदा करती जाओ… वैसे इन बच्चों को तुमने भारत में पैदा किया है या विदेश में? कुछ पता नहीं… वैसे कोई बात नहीं बढिया कर रही हो कीप रौकिंग.’

राखी ने एक दूसरा वीडियो भी पोस्ट किया जिसमें उन्होंने कहा, तुमने शादी भी कर ली और अब बच्चे भी. अब तो तुम्हारे पास तीन बच्चे हो गए… यार मैंने तो अब तक एक चूहा भी नहीं पैदा किया, किसी को पकड़ना पड़ेगा अब मुझे, हां अब तो मुझे भी कुछ न कुछ तो पैदा करना ही पड़ेगा.’

राखी आगे कहती हैं, ‘यार सनी आजकल तो डांस में, बातों में और हर चीज में प्रतियोगिता हो रही है. अब तो बच्चे पैदा करने की भी प्रतियोगिता शुरू हो गई है, जिसे देखो वही… बच्चा पैदा कर रहा है… मैं पीछे नहीं हटूंगी… मैं भी बच्चा पैदा करूंगी, हां… लेकिन कोई मिलना तो चाहिए बच्चा पैदा करने के लिए… लेकिन मैं पहले शादी करूंगी, बिना शादी के थोड़ी न कोई बच्चा पैदा करता है… वैसे आजकल तो यह भी चल जाएगा. देखते हैं… मैं ढूंढ रही हूं किसी को.’

लोगों के इसी तरह के सवालों का जवाब देने के लिए ही सनी ने बाद में एक ट्वीट किया. सनी ने लिखा, ‘यहां कोई भ्रम ना रहे इसलिए बताना जरूरी है कि अशर और नोआ हमारे बायलौजिकल बच्चे हैं. हमने तीन साल पहले इसके लिए सरोगसी को चुना था जो अब हकीकत में तब्दील हुआ है और अब जाकर हमारा परिवार पूरा हो गया है.’ बता दें कि सनी और डोनियल पहले से ही एक बेटी के माता-पिता हैं. पिछले साल जुलाई में दोनों ने महाराष्ट्र के लातूर से 21 महीने की बच्ची को गोद लिया था जिसका नाम उन्होंने निशा सिंह वेबर रखा है.

सूदखोरों के मकड़जाल में न फंसें

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संस्कारधानी के नाम से प्रसिद्ध मध्य प्रदेश के महाकौशल इलाके के प्रमुख शहर जबलपुर में मिठाइयों की एक पुरानी और मशहूर दुकान चंद्रकला स्वीट्स है. सालों पहले चंद्रकला स्वीट्स एक छोटी सी दुकान हुआ करती थी पर धीरेधीरे यह बड़ी और आधुनिक हो गई. पिछले 10 वर्षों से इस दुकान का संचालन कपिल गोकलानी कर रहे हैं जिन्हें जमाजमाया पुश्तैनी व्यवसाय मिला था.

शुरुआत में तो कपिल अपने पिता की तरह सफलतापूर्वक दुकान संभालते रहे पर साल 2013 में उन्हें कारोबार बढ़ाने के लिए कुछ रुपयों की जरूरत पड़ी तो उन्होंने बजाय बैंकों से कर्ज लेने के सरल रास्ता यानी शौर्टकट चुना और परिचित कारोबारियों से ब्याज पर पैसा ले लिया. किसी भी शहर में कारोबारियों के बीच ब्याज पर लाखों का लेनदेन कतई हैरत की बात नहीं है. चंद्रकला स्वीट्स की साख और कारोबार देखते हुए कपिल के कारोबारी दोस्तों ने उसे जरूरत के मुताबिक पैसा दे दिया.

कपिल को सपने में भी अंदाजा नहीं था कि शहर के जिन करोड़पति दोस्तों को वह अपना हमदर्द समझ रहा है वे उस के कारोबार को ब्याज की शक्ल में दीमक बन कर चाट जाएंगे. जब पानी सिर से गुजरने लगा और कंगाली की नौबत आने लगी तो 8 अक्तूबर को कपिल ने हिम्मत जुटा कर जबलपुर के ओमती थाने में सूदखोरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई.

अपनी रिपोर्ट में कपिल ने लिखा कि मिक्की इलैक्ट्रौनिक्स के संचालक दीपक भाटिया के अलावा दूसरे नामी बिल्डर्स और कारोबारी संजय खत्री, इंद्रजीत सिंह कोहली, पराग ग्रोवर, सनी जग्गी और जेके जग्गी जबरन उसे धमका रहे हैं. कोरे स्टांप पेपरों पर उस से सिर्फ दस्तखत ही नहीं बल्कि उन्होंने कई कोरे चैक भी दस्तखत करवा कर अपने पास रख लिए थे. ये कथित आरोपी लगातार उसे धमकी दे रहे थे कि अगर वक्त पर ब्याज नहीं दिया तो वे लोग उस के पिता की जायदाद अपने नाम करा लेंगे.

जानकर हैरानी होती है कि 4 साल पहले लिए 50-60 लाख रुपयों के कर्ज पर ये सूदखोर कपिल से कोई 2 करोड़ रुपए ब्याज के एवज में वसूल चुके थे और इतना ही नहीं उन्होंने जबलपुर के अलगअलग इलाकों में स्थित कपिल के नाम की 4 दुकानें और आदर्श नगर स्थित एक मकान अपने नाम करवा लिया था.

ब्याज पर उधार लेने के बाद कुछ महीने तो कपिल ईमानदारी से किस्तें चुकाता रहा पर इस के बाद उसे समझ आया कि जल्दबाजी में उस ने बहुत महंगे ब्याज पर कर्ज ले लिया है. जितना यानी 8-10 लाख रुपए के करीब महीने में वह मिठाई की दुकान से कमाता है वह सब इन सूदखोरों की तिजोरियों में चला जाता है. इस पर भी मूल रकम ज्यों की त्यों बनी हुई थी, लेकिन कोरे चैक और स्टांप पर दस्तखत कर वह कानूनीतौर पर फंस चुका था. इन सूदखोरों के चंगुल में नैतिक रूप से तो वह उसी दिन फंस चुका था जिस दिन उस ने कारोबार बढ़ाने के लालच में बगैर सोचेसमझे लाखों रुपए ब्याज पर ले लिए थे.

कपिल के मुताबिक जब आरोपियों को लगने लगा कि ब्याज चुकाना भी उसे मुश्किल पड़ रहा है तो उन्होंने उसे पैसा कमाने का आसान रास्ता क्रिकेट पर सट्टा लगाने का सुझाव दिया. ब्याज के दलदल में धंसे और एक झटके में बहुत सा पैसा कमाने के लालच में आए कपिल को लगा कि अगर एक दांव भी सटीक बैठ गया तो एक बार में ही न केवल ब्याज चुकता हो जाएगा बल्कि मूल भी अदा हो जाएगा.

महंगा पड़ा लालच

यह लालच भी कपिल को महंगा पड़ा. सट्टे के लालच में इन्हीं सूदखोरों से उस ने जो 50 लाख रुपए लिए थे वे एक झटके में डूब गए. यह रकम तो और भी महंगे ब्याज पर दी गई थी.

अब कपिल पूरी तरह सूदखोरों के चंगुल में फंस चुका था. वे उसे जायदाद हड़पने के साथसाथ जान से मरवा देने की धमकी भी दे रहे थे. कपिल इन रसूखदार कारोबारियों की पहुंच और इन के कानून से भी लंबे हाथों से वाकिफ था इसलिए जितना बन पड़ा ब्याज देता रहा.

जब अति हो गई तो हिम्मत जुटाते वह रिपोर्ट लिखाने थाने पहुंचा. कपिल को फंसाने के लिए इन्हीं हमदर्दों ने कुछ दिन पहले ही ओमती थाने में उस के खिलाफ झूठी रिपोर्ट दर्ज करा दी थी जिस से वह और दबा रहे. हालांकि उस की शिकायत पर 2 आरोपी गिरफ्तार तो हुए, लेकिन जल्द ही कपिल की सांसे यह देख कर फूलने लगीं कि ये सूदखोर खुली हवा में घूम रहे हैं.

गिरफ्तारी के डर से बाकी आरोपी फरार हो गए थे लेकिन पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों को यह कहते छोड़ दिया कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक ऐसे मामलों में किसी भी आरोपी को गिरफ्तार करने के बजाय उसे नोटिस दे कर कोर्ट में हाजिर होने के लिए कहा जाता है. इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का ही पालन किया गया है.

अब प्रियअप्रिय कुछ भी हो लेकिन इस हाइप्रोफाइल मामले ने सूदखोरों की देशभर में जमीन में गहरे तक धंसी जड़ें दिखा दी हैं कि वे आज भी हैं. बस, सूदखोरों की पोशाक, हुलिया और लेनदेन का तरीका बदल गया है. जो रकम देना जानता है वह उसे वसूलने की कूवत भी रखता है. रही बात कानून की तो देश में ऐसा कोई कानून कभी नहीं बन पाया जो कैक्टस की तरह उगे सूदखोरों पर कोई अंकुश लगा पाए यानी जबतक कपिल गोकलानी जैसे जरूरतमंद और लालची लोग हैं तब तक ये सूदखोर भी वजूद में रहेंगे और ऐसी कई वजहें हैं जिन के चलते इन का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता.

यत्रतत्र सर्वत्र और वीभत्स

होशंगाबाद जिले का एक छोटा सा कस्बा है सोहागपुर जहां आएदिन कोई न कोई किसान, व्यापारी या छोटामोटा नौकरीपेशा आदमी खुदकुशी कर लेता है. आदिवासी बाहुल्य इस इलाके में सूदखोरों की तादाद सैकड़ों में है. ये सूदखोर चलअचल संपत्ति और मकान व जमीनजायदाद वगैरह गिरवी रख कर महंगे ब्याज पर जरूरतमंदों को पैसा देते हैं. इस कसबे में कई लोग कंगाली की कगार पर हैं. यहां के एक युवा समाजसेवी रतन उमरे की मानें तो सूदखोरी का लाइसैंस मध्य प्रदेश साहूकारी अधिनियम की धारा 1954 के तहत आसानी से मिल जाता है.

लेकिन गैर लाइसैंसधारी सूदखोरों की तादाद कहीं ज्यादा है. रतन बताते हैं कि हालांकि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने लाइसैंस और कितने गैरलाइसैंसधारी सूदखोर हैं, क्योंकि इन की जांच कभी नहीं होती. रतन के मुताबिक सूदखोरी कइयों की रोजीरोटी का जरिया बन चुकी है. अगर वक्त पर ब्याज न मिले तो ये लोग गरीबों का रहना मुश्किल कर देते हैं. इस पर भी दिक्कत यह है कि इन के संबंध राजनेताओं और अफसरों से होते हैं, क्योंकि चुनाव के वक्त ये भारीभरकम चंदा राजनीतिक पार्टियों को देते हैं और अपने कर्जदारों पर मनचाही पार्टी या उम्मीदवार को वोट देने के लिए दबाव भी बनाते हैं.

पैसों की जरूरत हर किसी को पड़ती है. बीमारी में, पढ़ाई के लिए, शादीब्याह के लिए या फिर फसल के लिए. पर बड़ी दिक्कत अब यह दिखने लगी है कि लोग जुए, सट्टे, नशे व अय्याशी के लिए ब्याज पर कर्ज लेने लगे हैं.

लोग इन के जाल में फंसे रहे इस बाबत अब सूदखोर नएनए प्रपंच रचने लगे हैं. ओडिसा, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों के कोलमाइंस वाले इलाकों के मजदूरों और छोटे कर्मचारियों को जुए व शराब की लत लगाने में ये सूदखोर पीछे नहीं रहते.

इन से एक बार जिस ने पैसा ले लिया फिर वह कभी बगैर बिके या मरे इन के शिकंजे से नहीं निकल पाता. कई दफा तो मरने के बाद दूसरी पीढ़ी इन का कर्ज चुकाती रहती है. ‘मदर इंडिया’ फिल्म के एक किरदार सूदखोर लाला जिसे चरित्र अभिनेता कन्हैयालाल ने जीवंत किया था, को आज भी शिद्दत से याद किया जाता है. वजह, कई सुक्खी लाला आज भी मौजूद हैं.

सूदखोरों की कोई तयशुदा ब्याज दरें नहीं होतीं, बल्कि ये लेने वाले की जरूरत पर निर्भर करती है. आमतौर पर इन की ब्याज दर 10 से ले कर हैरतअंगेज तरीके से 40 फीसदी तक होती है वह भी वार्षिक नहीं बल्कि मासिक यानी अगर कोई जरूरतमंद किसी सूदखोर से 1 लाख रुपए लेता है तो लिखित या मौखिक करार के मुताबिक वह हर महीना 8 हजार से ले कर 40 हजार रुपए तक ब्याज देता है.

न देने पर दबंग सूदखोर कर्जदार की जमीनजायदाद हड़प लेते हैं. महिलाओं के गहने पोटली में बांध कर भर ले जाते हैं. और तो और बरतन तक भी नहीं छोड़ते. इन कामों के लिए खुद सीधे झगड़े में पड़ने के बजाय सूदखोर अब पगार पर गुंडे पालने लगे हैं. कपिल गोकलानी से तो ये ब्याज में मिठाई तक ले रहे थे. विलाशक अपना दिया पैसा वसूलना हर किसी का हक है पर अफसोस की बात अनापशनाप ब्याज की चट्टान है जिस के नीचे दब कर कोई बाहर नहीं आ पाता.

कुछ नहीं बिगड़ता इन का

शहरी इलाकों के सूदखोर कर्जदारों के एटीएम कोरी दस्तखत की हुई चैकबुक और जमीनजायदाद के असल कागज भी रख लेते हैं जिस से लेने वाला फंसा रहे. बड़ी रकम की ये लोग स्टांप पेपर लिखापढ़ी करवा लेते हैं यानी बचने का कोई मौका नहीं देते. अब से कुछ महीने पहले जबलपुर के ही जगदीश चौधरी नाम के शख्स की हत्या का शक सूदखोरों पर गया था, लेकिन इस से सूदखोर खत्म नहीं हो गए और न ही सूदखोरी खत्म हो गई, उलटे उन की दहशत और बढ़ गई.

मध्य प्रदेश में किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के मद्देनजर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सूदखोरी कानून में बदलाव की बात कही थी, पर आज तक पुराना कानून चला आ रहा है जिस में सूदखोरों को अनापशनाप छूट मिली हुई है. साल 2014 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी मौजूदा कानून को बदलने की बात कही थी पर वहां भी कुछ नहीं बदला.

बीती 24 अक्तूबर को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीसामी को भी ऐसी घोषणा करना पड़ी थी कि कलैक्टर और पुलिस कमिश्नरों को निर्देश दिए गए हैं कि वे सूदखोरों के खिलाफ कार्यवाही करें.

पर बचना तो खुद पड़ेगा

जो सूदखोर सरकार चलाते हों और खुद के बचाव के लिए किसी न किसी राजनीतिक दल के कुछ न कुछ होते हों, उन्हें कोई रोक पाएगा ऐसा सोचने की कोई वजह नहीं. जरूरत तो इस बात की है कि लोग खुद इन से बच कर रहें.

सूदखोरी बैंकिंग व्यवस्था और कार्यप्रणाली को ठेंगा दिखाता उस से भी बड़ा सिस्टम है जिसे पुलिसिया प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ रहता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली भले ही फ्लौप नोटबंदी और भस्मासुर बनती जीएसटी को आर्थिक क्रांति बताते गाल बजाते रहें पर हकीकत में ऐसे फैसलों का सूदखोरों पर कोई फर्क नहीं पड़ता जो आम लोगों की गाढ़ी कमाई को मुफ्त के भाव चाट रहे हैं.

जरूरत और उम्मीद कभी दिल्ली से इस आवाज के आने की है कि आज रात 12 बजे से सूदखोर और सूदखोरी खत्म, क्योंकि इन की वजह से हर साल लाखों लोग खासतौर से किसान बेमौत मरते हैं और करोड़ों लोगों को सुरसा के मुंह जैसा ब्याज चुकाना पड़ रहा है.

पर चूंकि ऐसा कुछ होगा नहीं इसलिए सूदखोरों के मकड़जाल से बचने का इकलौता रास्ता यही है कि इन से पैसा लिया ही न जाए. फिर भले ही कोई अस्पताल या घर में दम तोड़ दे, बेटी का विवाह न हो पाए या फिर बेटे की पढ़ाई के लिए फीस का इंतजाम न हो.

वह पैसा जिसे ले कर चुकाना जीतेजी मुमकिन न हो उसे न लेना ही बेहतर है. निश्चित रूप से यह सूदखोरी के सामने हथियार डालने जैसी बात है, क्योंकि कोई बैंक या सरकार आधी रात को सेलाइन की बोतल और अस्पताल की फीस के लिए कर्ज नहीं देते. मुसीबत के वक्त अपने सगे फोन उठाना बंद कर देते हैं और यारदोस्त कन्नी काटने लगते हैं.

इतना जरूर हर कोई कर सकता है कि जरूरत के वक्त के लिए बचत करे, लालच और शौर्टकट के पैसे से दूर रहे और जरूरत बड़ी हो तो बेहतर है कि बजाय सूदखोरों से कर्ज लेने के औनेपौने में गहने या जायदाद बेच दी जाए.

कपिल गोकलानी जैसा करोड़पति कारोबारी इसी गैरजरूरी जरूरत और लालच के चलते सूदखोरों के हत्थे चढ़ कर कंगाली की कगार पर खड़ा है उस से सबक तो सीखा ही जा सकता है.

ऐसे बचें

  • सूदखोरों  से ब्याज के बाबत स्पष्ट बात करें. ये लोग बात तो 10 फीसदी सालाना की करते हैं पर लिखापढ़ी वार्षिक के बजाय मासिक की करते हैं.
  • पहले से टाइप की हुई लिखापढ़ी बगैर पढ़े और बिना सोचेसमझें दस्तखत न करें, यह कोई बैंक का छपा हुआ फार्म नहीं होता.
  • कभी भी कोरे कागज या स्टांप पेपर पर दस्तखत न करें.
  • नशा, जुआ, सट्टा और वेश्यावृत्ति से खुद को बचाएं.
  • कोरे दस्तखत किए गए चैक तो हरगिज न दें. वजह, आजकल चैक बाउंस होने का कानून काफी सख्त हो गया है और बैंक को किसी ग्राहक की मजबूरी से कोई मतलब नहीं होता.
  • गवाह अपने रखने की कोशिश करें.
  • जमीनजायदाद या जेवरात गिरवी रखें तो उन का अनुमानित वर्तमान बाजार मूल्य जरूर दर्ज कराएं.
  • अदा किए गए प्रत्येक भुगतान की रसीद अवश्य लें और ब्याज का भुगतान अकाउंट पेयी चैक से करें जिस से सनद रहे.
  • अगर सूदखोर नाजायज ब्याज के लिए खुद या गुर्गों के जरिए डराए या धमकाए तो पुलिस के पास जाने में देर न करें. वक्त पर यानी पहली दफा ही यह ऐक्शन न लेने पर वह आप पर हावी होता चला जाता है.
  • अपना एटीएम व उस का पासवर्ड किसी सूदखोर को कतई न दें और याद रखें कि ली गई रकम पर आप ब्याज देते हैं, उस लिहाज से सूदखोर आप पर कोई एहसान नहीं करता है. इसलिए उस से डरें नहीं न ही किसी किस्म का लिहाज करें.
  • अगर सूदखोर जमीनजायदाद की नीलामी की धौंस दे तो भी न डरें. इस की शिकायत भी पुलिस और दूसरे अधिकारियों से करें.

वसीयत का पैसा जब पहले ही बांटना हो

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महीपत के 1 बेटी और 1 बेटा थे. दोनों भाई बहन एक साथ पले बढे़ थे. उन में कोई मतभेद भी नहीं था. महीपत ने अपनी पत्नी लक्ष्मी की मौत के बाद वसीयत तैयार कराई और उस में अपनी बेटी को भी बराबर का अधिकार दिया. महीपत की मौत के बाद उस की सारी प्रौपर्टी 2 हिस्सों में बंटनी थी. भाई शिवम को बहन रश्मि से कोई दिक्कत नहीं थी. उसे अपने बहनोई दिवाकर से समस्या थी.

पिता की मौत के बाद दिवाकर का महीपत खानदान में दखल बढ़ गया था. दिवाकर की निगाह एक होटल पर थी जो महीपत अपने बेटे शिवम के नाम पर ही बना कर गए थे. बहन रश्मि भी यही चाहती थी कि होटल भाई शिवम के पास ही रहे. दिवाकर को यह बात पसंद नहीं थी.

उस ने पत्नी पर दबाव बनाना शुरू किया कि वह होटल पर भी अपना अधिकार मांगे. पिता की वसीयत के आधार पर होटल पर उस का आधा अधिकार है.

शिवम होटल पर बहन को हिस्सा देने को तैयार नहीं था. ऐसे में मामला कोर्ट में गया. कानूनी रूप से बहन का होटल पर अधिकार था पर मानसिक रूप से शिवम और बहन रश्मि इस के लिए तैयार नहीं थे. ऐसे में वसीयत होने के बाद भी दोनों भाईबहनों के बीच रिश्ते खराब नहीं हुए.

आपसी रिश्तों को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हर मातापिता अपनी जायदाद का बंटवारा सही तरह से अपनी ही जिंदगी के दौरान करें. वसीयत से पहले ही अपने पैसों व जायदाद का बंटवारा कर दें. इस में कुछ आर्थिक दबाव जरूर पड़ता है पर बाद की मुकदमेबाजी और रिश्ते खराब होने से बच जाता है.

कानून खडे़ करते हैं विवाद

वसीयत को ले कर कानून कहता है कि रजिस्टर्ड और गैररजिस्टर्ड में कोई भेद नहीं है. सरकार ने वसीयत के बाद होने वाले झगड़ों से बचने के लिए प्रावधान बनाया है कि केवल रजिस्टर्ड वसीयत ही मान्य है. अलगअलग राज्यों में इस के अलगअलग नियमकायदे हैं. उत्तर प्रदेश में खेती की जमीन के बदलाव में रजिस्टर्ड वसीयत ही मान्य है. अगर मसला कोर्ट में जाता है तो वहां रजिस्टर्ड और गैररजिस्टर्ड में कोई भेद नहीं है.

भारतीय कानून के अलावा यहां पर अविभाजित हिंदू परिवार कानून भी लागू होता है. जिस के तहत अलग तरह के बंटवारे का प्रावधान है. कानून यह भी मानता है कि अगर आप अपनी पैतृक जायदाद का बंटवारा करते हैं तो उस में उत्तराधिकार कानून के तहत ही हिस्सेदारी देनी होगी. अपनी स्वअर्जित जायदाद का बंटवारा ही आप अपनी वसीयत के अनुसार कर सकते हैं.

वसीयत के अलावा अगर अपनी जायदाद का बंटवारा करना है तो जमीन या मकान की रजिस्ट्री कराना ही सब से मुफीद तरीका होता है. इस से लोग बचते हैं, क्योंकि जायदाद की रजिस्ट्री कराने में सरकारी खर्च यानी स्टांप ड्यूटी देनी पड़ती है. लोगों को यह अनावश्यक बोझ लगता है. दूसरे कई बार माता पिता को इस बात का भी भय होता है कि जायदाद लेने के बाद बच्चे बुढ़ापे में सेवा करेंगे या नहीं. इसलिए वे बंटवारे की सारी जिम्मेदारी वसीयत पर छोड़ कर जाते हैं. वसीयत उन के न रहने पर ही मान्य होती है. ऐसे में मरने के बाद परिवार में झगडे़ शुरू हो जाते हैं. इन झगड़ों से बचने का एक ही जरिया है कि अपने पैसों और जायदाद का बंटवारा वसीयत से पहले ही कर के जाएं.

वसीयत से पहले बंटवारा

जायदाद चल और अचल 2 तरह की होती है. चल संपत्ति में पैसा आता है. इस के बंटवारे का सब से अच्छा जरिया यह है कि जिसे आप देना चाहते हो उस के नाम पर बैंक में अपना सहखाता खोलें. कई बार बैंक खाते में नौमिनी बनाने के बाद भी उत्तराधिकार कानून के तहत विवाद खडे़ कर दिए जाते हैं. ऐसे में सब से सरल रास्ता यही है कि आप बैंक में सहखाता खोलें और उस के जरिए ही पैसों का बंटवारा करें.

अगर एक से अधिक संतान हैं तो यह रास्ता ही सब से सरल होगा, जिस में किसी भी तरह की वसीयत की समस्या नहीं रहेगी. कई बार पिता के न रहने के बाद मां बेटी या मां और बेटे के बीच भी संबंध खराब हो जाते हैं. पत्नी, पुत्र और पुत्री स्वाभाविक उत्तराधिकारी होते हैं. उन में से बिना सहमति के किसी एक को पैसा देना सरल नहीं है. सहखाते के जरिए ही बिना किसी विवाद के पैसा दिया जा सकता है. केवल बैंक बचत खाता ही नहीं, दूसरी बचत योजनाओं में भी सह खातेदार प्रक्रिया ही सब से सरल होती है.

अगर अचल संपत्ति यानी मकान, जमीन, फैक्टरी का बंटवारा करना हो तो उस का भी बंटवारा वसीयत के अनुसार सरलता से नहीं हो पाता. पैतृक  जायदाद में बेटा बेटी और पत्नी का स्वाभाविक अधिकार होता है. ऐसे में इन में अगर किसी एक को देना हो तो जायदाद की रजिस्ट्री कराना ही सब से सरल तरीका होता है.

वसीयत के जरिए अगर किसी एक को अपनी जायदाद देना चाहते हैं तो दूसरा पक्ष विवाद खड़ा कर सकता है. भारत में न्याय पाने के लिए सालोंसाल भटकना पड़ता है. ऐसे में अगर पूरी तरह से मजबूत बंटवारा न हो तो कानून की किसी न किसी धारा के तहत परिवाद यानी मुकदमा दर्ज हो ही जाता है.

ऐसे में जरूरी है कि आपसी बंटवारा सहमति से न हो रहा हो तो वसीयत से पहले ही उस का सही बंटवारा कर दें. सरकार को चाहिए कि इस तरह के बंटवारों के जरिए जो जायदाद परिवार में ही किसी और के नाम हो रही हो उस की स्टांप ड्यूटी में राहत दी जाए.

सरकार को इस दिशा में कुछ प्रभावी कदम उठाने चाहिए. अगर कोई व्यक्ति अपनी जायदाद उपहार भी देना चाहे तो दोनों तरफ से सरकार को टैक्स देना पड़ता है. यही वजह है कि लोग वसीयत से पहले जायदाद के बंटवारे की पहल नहीं करते जिस से उत्तराधिकार कानून के तहत ही उन की जायदाद का स्थानांतरण होता है.

अभी हमारे समाज में बेटियों को पिता की जायदाद में हक देने का रिवाज नहीं है. कानून से बेटियों को पिता की जायदाद में हक मिल गया है. यह पेंच भाईबहन के बीच आपसी रिश्तों को खराब करने वाला होता है.

ऐसे में जरूरी है कि बंटवारे को वसीयत के बाद के झगड़ों से दूर रखते हुए पहले ही निबटा दिया जाए. तभी भाईबहन के बीच स्वाभाविक संबंध बने रह सकते हैं. आम धारणा यह बन गई है कि  वसीयत अंतिम समय में किसी न किसी तरह के भौतिक दबाव के तहत तैयार कराई जाती है. उस समय यह फैसला वसीयत करने वाले के विवेक पर नहीं होता. जिस का लाभ कानून दूसरे पक्ष को देता है जहां से विवाद शुरू हो जाता है.

अगर वसीयत के पहले सामान्य कानून के तहत जायदाद का बंटवारा हो तो बाद में विवाद नहीं होगा. पिता अपनी बात बेटा और बेटी दोनों को समझा सकता है, जिस से उन के बाद के संबंध मधुर रह सकते हैं. इसलिए जरूरी है कि वसीयत करने के लिए रखे पैसों को पहले ही बेटाबेटी को दे दें.

कांग्रेस और सपा भाजपा को देंगी चुनौती

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गुजरात विधानसभा और राजस्थान उपचुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी को अपना जनाधार टूटता दिखने लगा है. 2019 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को दोहरा पाना सब से बड़ी चुनौती होगी. निकाय चुनाव में प्रदेश के कसबों और गांवों में भाजपा को पहले जैसे वोट नहीं मिले. भाजपा लगातार यह प्रयास कर रही है कि उस के खिलाफ विपक्ष एकजुट हो कर मुकाबले में न आए. भाजपा को पता है कि अपने दम पर पूरे देश में कांग्रेस का लोकसभा चुनाव में उतरना उस के संगठन की क्षमता से बाहर है. ऐसे में कांग्रेस अलगअलग प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल कर के चुनाव मैदान में उतरेगी. भाजपा ने लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सब से बड़ी जीत हासिल की है. उस के बाद नगर निगम के चुनावों में सब से अधिक मेयर भाजपा के चुने गए हैं. ऐसे में अब भाजपा के पास कोई बहाना नहीं है कि प्रदेश का विकास क्यों नहीं हो पाया.

परेशानियों से जूझ रही है जनता

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश के विकास को पटरी पर लाने में असफल रहे हैं. प्रदेश की जनता कई तरह की परेशानियों से जूझ रही है. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित की जाने वाली हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षाओं में 10 लाख छात्रों ने परीक्षा छोड़ दी. योगी सरकार इसे अपनी सफलता के रूप में देख रही है जबकि हकीकत में यह योगी सरकार के लिए सब से बड़ा संकट साबित होने वाला है.

योगी सरकार का तर्क है कि नकल पर नकेल कसने के कारण छात्रों ने परीक्षा छोड़ी. इन छात्रों के साथ उन के परिवारों का तर्क यह है कि कक्षा में छात्रों को सही तरीके से पढ़ाया ही नहीं गया. हाईस्कूल और इंटर के छात्रों की संख्या बहुत है. इस परीक्षा का असर परीक्षाफल पर भी पड़ेगा. पास होने वाले छात्रों की संख्या कम होगी. उन के नंबर कम आएंगे. समाजवादी पार्टी की सरकार ने हाईस्कूल और इंटर के बच्चों से किया अपना वादा पूरा नहीं किया था. उन को पूरी तरह से लैपटौप और टैबलेट नहीं दिए थे. सपा को चुनाव में इस की कीमत चुकानी पड़ी.

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योगी सरकार का एक और फैसला खनन नीति को ले कर है. इस की वजह से घर बनाने में प्रयोग होने वाली बालू और मोरंग बहुत महंगी हो गई है. एक तरफ सरकार सब को घर देने की बात कर रही है वहीं दूसरी तरफ घर बनाने में लगने वाली सामग्री महंगी होती जा रही है. गांव का किसान अपने खेतों को नुकसान पहुंचा रहे छुट्टा जानवरों से परेशान है. गांवों में इस को ले कर झगड़े तक हो रहे हैं. सरकार के पास इस का कोई उपाय नहीं है. वह तरहतरह की हवाहवाई योजनाएं फाइलों में तैयार कर रही है. ऐसे में सब से बड़ा प्रभाव उस जनता पर पड़ रहा है जो गांवों में रहती है. गांव और कसबे के लोगों को यह लग रहा है कि यह सरकार बड़ी और ऊंची जातियों के प्रभाव में है.

धर्म के नाम पर लोकसभा और विधानसभा में भाजपा को वोट देने वाला वर्ग खुद को ठगा महसूस कर रहा है. सहारनपुर दंगा इस की मिसाल बना. इस के बाद कासगंज में हुए दंगे से साफ हो गया कि योगी सरकार प्रदेश में जिस अपराधमुक्त वातावरण की बात कर रही थी उस में वह सफल नहीं हुई. सरकार ‘पुलिस एनकांउटर’ नीति से अपराध को खत्म करने की दिशा में चल रही है.

बदलते समीकरण

2014 के लोकसभा चुनाव और 2019 के आगामी लोकसभा चुनाव की स्थिति में काफी अंतर है. उस समय देश में कांग्रेस के विरोध में वातावरण बना हुआ था. लोगों को भाजपा नेता नरेंद्र मोदी से चमत्कार की उम्मीद थी. नोटबंदी और जीएसटी से साफ हो गया कि केंद्र सरकार ने किसी भी फैसले को लागू करने से पहले कोई तैयारी नहीं की. नोटबंदी से क्या लाभ हुए, यह बताने में सरकार असफल रही. जीएसटी में एक देश एक टैक्स की बात कही गई पर 5 तरह के स्लैब के साथ जीएसटी लागू हुआ. 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं है. भाजपा के लिए अपनी सीटों को बचाने की चुनौती है.

सपाकांग्रेस गठबंधन का आधार उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटों में से केवल 7 सीटें विपक्ष के पास हैं.

72 लोकसभा सीटें भाजपा और उस के सहयोगी दलों के पास हैं. भाजपा के लिए इन 72 लोकसभा सीटों को दोबारा हासिल करना बड़ी चुनौती है. तब तक उत्तर प्रदेश की सत्ता में भी रहते हुए भाजपा को ढाई साल का समय हो चुका होगा. तब उत्तर प्रदेश सरकार की नाकामियां भी सामने होंगी.

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव में नई शुरुआत करनी है. सपा के पास 5 लोकसभा सीटें हैं तो कांग्रेस के पास केवल 2 सीटें हैं. 2017 में विधानसभा चुनाव सपाकांग्रेस ने साथ मिल कर लड़े थे. लेकिन उस में दोनों को कोई खास सफलता नहीं मिली थी. विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा नेता अखिलेश यादव के बीच कोई तालमेल नहीं दिखा. अखिलेश यादव ने यह कहा था कि वे दोस्ती नहीं तोड़ते हैं. इस बात से यह साफ है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपाकांग्रेस एकसाथ खड़ी होंगी.

अखिलेश और राहुल की जोड़ी के लिए अच्छी बात यह है कि अब उन के पास अपनी पार्टियों की सीधी कमान है. दोनों ही अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. 2017 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी अपने घरेलू विवाद में फंसी थी और राहुल गांधी पूरी तरह से पार्टी की कमान नहीं संभाल पाए थे. ऐसे में अब उन के लिए काम करना सरल है.

धीरेधीरे एक बड़ा वर्ग यह भी मान रहा है कि भाजपा केवल हिंदुत्व यानी पाखंडी दुकानदारी को आगे रख कर ही लड़ाई जीतने की कोशिश में रहती है. हिंदुत्व के तहत धुव्रीकरण का प्रयास भाजपा लोकसभा चुनाव में भी करेगी. अयोध्या का राममंदिर विवाद इस का सब से बड़ा माध्यम बन सकता है. कांग्रेस और सपा अगर खुद को भाजपा के इस जाल से बाहर निकालने में सफल रहे तो दोनों दलों के लिए लोकसभा चुनाव बेहतर साबित हो सकते हैं.

भाजपा के पास चुनावी मैनेजमैंट बहुत बेहतर है पर उस के पास जमीनी स्तर पर जनाधार वाला नेता नहीं है. यही वजह है कि भाजपा को एक मुख्यमंत्री और 2 उपमुख्यमंत्री के बल पर अपना काम करना पड़ रहा है. सत्ता में रहने के कारण विधायक, सांसद और कार्यकर्ता अपनी उपेक्षा से परेशान हैं. कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि उन की बातें सुनी नहीं जा रहीं. नौकरशाही सरकार पर पूरी तरह हावी है. ऐसे में केवल भगवा रंग के सहारे लोकसभा चुनाव में पार पाना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा.

सपा के लिए अब तक मुश्किल यह थी कि प्रमुख विपक्षी बहुजन समाज पार्टी तालमेल के पक्ष में नहीं रहती थी. ऐसे में 4 बड़े दल अलगअलग चुनाव लड़ते थे. उत्तर प्रदेश में मायावती की दलित राजनीति अब कमजोर हो चली है.

दलित धर्म के नाम पर भाजपा के पक्ष में खड़े होते हैं पर सामाजिक स्तर पर भाजपा के साथ उन का कोई तालमेल नहीं है. ऐसे में दलित के लिए सपाकांग्रेस के पक्ष में खड़ा होना मुफीद लगता है. सपा में अब तक होने वाले फैसलों में मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव और तमाम बड़े नेताओं का प्रभाव होता था. अब सभी फैसले केवल अखिलेश के होते हैं. ऐसे में किसी पहल के लिए उन को दूसरे नेताओं के समर्थन और आलोचना की चिंता नहीं है. कमोबेश यही हालत कांग्रेस की है. अब राहुल गांधी के हाथ में पार्टी की कमान है.

भाजपा में शाहमोदी की जोड़ी ने पूरी पार्टी को अपने कब्जे में कर रखा है. वहां सारे फैसले उन के ही होते हैं. विपक्ष का आरोप है कि उत्तर प्रदेश में अदृश्य मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा कार्यालय से सरकार चलाई जा रही है. ऐसे में पार्टी के तमाम नेता चुनावी समय में असहयोग कर सकते हैं.

उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव के परिणाम 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों को भी प्रभावित करेंगे. अगर कांग्रेस सपा की जोड़ी लोकसभा चुनावों में भाजपा को मात दे पाई तो विधानसभा चुनावों में वह सब से प्रबल दावेदार हो सकती है. कांग्रेस के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि गुजरात चुनावों में जिस तरह से भाजपा के खिलाफ लामबंदी का परिणाम देखने को मिला उस से कांग्रेस हर प्रदेश में इसे प्रयोग में लाएगी.

इसी साल राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभाओं के चुनाव होने हैं. भाजपा की रणनीति यह बन रही है कि इन राज्यों के चुनावों के साथ ही वह लोकसभा चुनाव भी करा दे, जिस से विपक्ष संभल न पाए और भाजपा इस का लाभ उठा कर चुनाव जीत ले. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकारें हैं. ऐसे में यहां सरकार बचाना कठिन काम है.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सब से कमजोर प्रदेश हैं. अगर 3 राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को मात मिली तो उत्तर प्रदेश में उसे लोकसभा की 72 सीटें हासिल करना बहुत मुश्किल हो जाएगा. कांग्रेससपा भले ही अभी साथसाथ न दिख रही हों पर लोकसभा चुनाव में वे भाजपा को रोकने के लिए आपसी समझ बना चुकी हैं. समय आने पर यह सामने दिखेगा.

मेरा कसूर क्या था

3 जुलाई, 2017 की रात कोई 10 बजे अफजल का परिवार खापी कर सोने की तैयारी कर रहा था कि उस के मोबाइल फोन की घंटी बजी. उस समय मोबाइल अफजल की बीवी नूरी के पास था. नूरी ने देखा, फोन हाशिम का है. हाशिम उस का सगा भाई था. भाई का नंबर देख कर उस ने जैसे ही फोन रिसीव किया, दूसरी ओर से हाशिम ने घबराए स्वर में कहा, ‘‘बाजी, मेरी कार का ऐक्सीडेंट हो गया है. तुम्हारी भाभी की हालत बहुत नाजुक है. आप लोग जितनी जल्दी हो सके, आ जाइए.’’

इस के बाद हाशिम ने बहन को वह जगह बता दी, जहां ऐक्सीडेंट हुआ था. बहन को ऐक्सीडेंट की बात बता कर हाशिम ने अपने घर वालों को भी फोन कर के ऐक्सीडेंट की बात बता दी थी. भाई की बात सुन कर नूरी हक्काबक्का रह गई. उस ने तुरंत यह बात अफजल और घर के अन्य लोगों को बताई.

अफजल ने हाशिम के ऐक्सीडेंट की बात रिश्तेदारों को बताई और नूरी को साथ ले कर चल पड़ा. ये लोग वहां पहुंचते, जहां ऐक्सीडेंट हुआ था, उस के पहले ही हाशिम खुद कार चला कर एक निजी अस्पताल पहुंच गया था. डाक्टरों ने उस की पत्नी यानी शाहीन को तो मृत घोषित कर दिया था, जबकि उसे भरती कर के उस का इलाज शुरू कर दिया था.

भरती होने से पहले हाशिम ने घर वालों को शाहीन के खत्म होने की बात बता दी थी. हाशिम की कार को ही देख कर लगता था कि उस की किसी चीज से जबरदस्त टक्कर हुई थी. उस की कार का शीशा बुरी तरह से टूटा हुआ था. इस में उस की पत्नी शाहीन की मौत हो गई थी, जबकि उस के सिर में मामूली चोट आई थी.

शाहीन की मौत की खबर सुन कर उस के घर में मातम छा गया था. वह 3 भाइयों की एकलौती बहन थी. वह 3 महीने की थी, तभी उस की मां की मौत हो गई थी. शाहीन के अब्बू नसीम और भाइयों ने जैसेतैसे पालपोस कर उसे बड़ा किया था. यही वजह थी कि उस की मौत की खबर से उस के घर में कोहराम मच गया था.

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ऐक्सीडेंट का मामला होने के बावजूद न तो हाशिम ने और न ही उस के घर वालों ने इस बात की सूचना पुलिस को दी थी. रिश्तेदारों के कहने पर शाहीन के घरवालों ने भी ऐक्सीडेंट मान कर बिना पोस्टमार्टम कराए ही 3 जुलाई, 2017 को उत्तराखंड के काशीपुर के मोहल्ला करबला बस्ती अल्लीखां स्थित रहमत शाह बाबा वाले कब्रिस्तान में शाहीन की लाश को दफना दिया था.

लेकिन शाहीन को दफन कर सभी घर आए तो उन्हें एक बात परेशान करने लगी कि शाहीन की मौत ऐक्सीडेंट से हुई थी तो उस का शरीर नीला क्यों पड़ गया था? नसीम अहमद अपनी लाडली बेटी शाहीन का जनाजा उठते देख फूटफूट कर रो पड़े थे. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन की जवान बेटी की मौत इस तरह होगी.

घर आ कर नसीम अहमद और उन के बेटे इसी बात को ले कर परेशान थे. अब उन्हें इस बात का अफसोस होने लगा था कि उन्हें जल्दबाजी में शाहीन को दफनाना नहीं चाहिए था. उन्हें संदेह हुआ तो सब ने निर्णय लिया कि शाहीन की मौत की सच्चाई का पता लगाना जरूरी है. उन्होंने तय किया कि पुलिस की मदद से लाश कब्र से निकलवा कर उस का पोस्टमार्टम कराया जाए.

फिर क्या था, अगले दिन अफजल घर वालों के साथ काशीपुर कोतवाली पहुंचा और बहन की हत्या की आशंका प्रकट करते हुए बहनोई हाशिम अली के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. उस ने पुलिस को बताया कि मौत के बाद शाहीन का शरीर नीला पड़ गया था, इसलिए उन्हें लगता है कि उस की मौत कार ऐक्सीडेंट में नहीं, बल्कि किसी अन्य वजह से हुई है. इसलिए अब वह उस की लाश को कब्र से निकलवा कर पोस्टमार्टम कराना चाहता है.

मामले को गंभीरता से लेते हुए कोतवाली प्रभारी चंचल शर्मा ने एसडीएम विनीत तोमर से बात की तो उन्होंने लाश को कब्र से निकालने की अनुमति दे दी. अनुमति मिलते ही चंचल शर्मा, एसआई पी.डी. जोशी और अन्य पुलिसकर्मियों के साथ जा कर मृतका शाहीन के सगेसंबंधियों की मौजूदगी में कब्रिस्तान में दफनाई शाहीन की लाश निकलवा कर बारीकी से निरीक्षण किया तो उस के शरीर पर चोट का कोई निशान नजर नहीं आया.

इस से साफ हो गया कि शाहीन की मौत ऐक्सीडेंट से नहीं, बल्कि किसी अन्य वजह से हुई थी. पुलिस ने आवश्यक काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया.

शक के आधार पर पुलिस ने उसी दिन मृतका शाहीन के पति हाशिम अली को हिरासत में ले लिया. पुलिस ने घटनास्थल का भी निरीक्षण किया. घटनास्थल पर कोई ऐसा सबूत नहीं मिला कि कार किसी वाहन से या किसी पेड़ से टकराई हो. कार का अगला हिस्सा बिलकुल सहीसलामत था, सिर्फ उस का आगे का शीशा टूटा हुआ था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार शाहीन की मौत 36 से 72 घंटे पहले हो चुकी थी, जबकि हाशिम के अनुसार, कार का ऐक्सीडेंट हुए हुए अभी 24 घंटे भी पूरे नहीं हुए थे.

इस के बाद हाशिम अली शक के दायरे में आ गया. पुलिस को अब विसरा रिपोर्ट का इंतजार था. विसरा रिपोर्ट आई तो उस में साफ लिखा था कि मृतका की मौत जहर से हुई थी. फिर तो साफ हो गया कि हाशिम अली ने बीवी की हत्या कर उस की मौत को ऐक्सीडेंट में दिखाने की कोशिश की थी.

इस के बाद पुलिस ने हाशिम अली को बाकायदा गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने घटनास्थल के पास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवा कर देखी तो हाशिम की करतूत का खुलासा हो गया. फिर तो हाशिम के झूठ बोलने का सवाल ही नहीं रहा. उस ने शाहीन की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर के उस की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

काशीपुर के मोहल्ला कानूनगोयान में मोहम्मद नसीम अपने परिवार के साथ रहते थे. पत्नी की मौत के बाद उन के परिवार में 3 बेटे अशरफ, अफजल और जाकिर तथा एक बेटी शाहीन थी. जिस समय नसीम की पत्नी की मौत हुई थी, बच्चे छोटेछोटे थे. बेटी शाहीन तो मात्र 3 महीने की थी. इस के बावजूद उन्होंने दूसरी शादी नहीं की.

जैसेतैसे नसीम ने बच्चों को पाला. बेटे थोड़ा बड़े हुए तो उन के काम में हाथ बंटाने लगे. अशरफ और जाकिर इनवर्टर मरम्मत का काम करने लगे तो अफजल वैल्डिंग का काम करने लगा. शाहीन बड़ी हुई तो उस ने पढ़ने से साफ मना कर दिया, क्योंकि वह अब्बू और भाइयों की परेशानी देख रही थी, इसलिए पढ़ाई छोड़ कर उस ने घरगृहस्थी संभाल ली.

समय पर नसीम ने बेटों की शादी कर दी थी. घर में बहुएं आ गईं तो शाहीन का बोझ काफी कम हो गया. तीनों भाइयों की शादी होतेहोते शाहीन भी शादी लायक हो गई. नसीम उस के लिए लड़का ढूंढने लगे. काशीपुर के ही मोहल्ला अली खां में नसीम का साढू मोहम्मद अली रहता था. उस से नसीम के 2 रिश्ते थे. एक रिश्ते से वह उन का साढ़ू लगता था तो दूसरे रिश्ते से समधी. क्योंकि मोहम्मद अली की बेटी नूरी उन के बेटे अफजल से ब्याही थी.

ऐसे में ही कभी नसीम ने शाहीन की शादी की बात मोहम्मद अली से चलाई तो उस ने कहा, ‘‘अरे समधीजी, बेटी की शादी को ले कर इतना परेशान क्यों हो रहे हो? आप की बेटी के लायक एक लड़का मेरी नजर में है. आप जब चाहें, देख लें.’’

मोहम्मद अली का इतना कहना था कि नसीम लड़का देखने के लिए बेताब हो उठे. उन्होंने लड़का दिखाने को कहा तो मोहम्मद अली ने अपने बेटे हाशिम अली को बुला कर कहा, ‘‘हमारा हाशिम भी तो शादी लायक है, क्यों न आप अपनी बेटी की शादी इसी से कर दें.’’

हाशिम अली को देख कर नसीम को झटका सा लगा. उन्होंने कहा, ‘‘आप कह तो ठीक रहे हैं, लेकिन इस के लिए बच्चों से सलाह लेनी पड़ेगी. उस के बाद ही कोई निर्णय लूंगा.’’

नसीम ने बेटों से बात की तो सभी को यह रिश्ता ठीक लगा. हाशिम देखने में तो ठीकठाक था ही, वह रोजीरोजगार से भी था. उस की काशीपुर की मेनबाजार में जूतेचप्पलों की दुकान थी. उस की दुकान चलती भी ठीकठाक थी, इसलिए नसीम के बेटों ने हामी भर दी. इस के बाद दोनों परिवारों ने बैठ कर शाहीन और हाशिम अली की शादी तय कर दी.

शाहीन और हाशिम अली की शादी तय हो गई तो दोनों के घर वाले शादी की तैयारी में जुट गए. इस के बाद 28 जुलाई, 2007 को दोनों का निकाह हो गया तो शाहीन ससुराल आ गई.

शादी के कुछ दिनों बाद तक सब ठीकठाक चला. हाशिम शाहीन को दिल से प्यार करता था. कभी भी उस ने किसी तरह की शिकायत का मौका नहीं दिया. उस की दुकान अच्छी चल रही थी, जिस से उसे अच्छी आमदनी हो रही थी. दुकान की ही कमाई से उस ने सैंट्रो कार भी खरीद ली थी.

आदमी की कमाई अच्छी हो तो वह पैसे भी खुले हाथों से लुटाता है. लेकिन अगर वही पैसा गलत कामों में लगने लगे तो कमाई का कोई मतलब नहीं रह जाता. ऐसा ही हाशिम अली के साथ हुआ. वह शराब पीने लगा. शराब के बाद उसे शबाब का शौक लग गया. गलत लोगों के साथ पड़ कर वह इस तरह बिगड़ गया कि दोनों हाथों से पैसे लुटाने लगा.

आए दिन हाशिम दोस्तों के साथ अय्याशी करने रामनगर जाने लगा. वहां वह महंगे होटलों में लड़कियों के साथ मौजमस्ती करता. इस से पैसे तो बरबाद हो रहे ही थे, दुकानदारी पर भी असर पड़ रहा था.

अब तक शाहीन के 2 बच्चे हो चुके थे, बेटी लाइवा और बेटा हमजा. पति की करतूतों का पता शाहीन को चला तो उसे बच्चों की चिंता सताने लगी. उस ने हाशिम अली को बहुत समझाया, पर पत्नी के समझाने का असर उस पर जरा भी नहीं हुआ. मजबूर हो कर शाहीन ने हाशिम की शिकायत अपने अब्बू और भाइयों से कर दी. नसीम ने हाशिम अली को अपने घर बुला कर समझाने की कोशिश की तो उस ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को झूठा बताया.

शाहीन ने सोचा था कि शिकायत करने से हाशिम अली डर कर सुधर जाएगा, लेकिन हुआ इस का उलटा. हाशिम अली शाहीन से खफाखफा रहने लगा. अब वह उस से ठीक से न बात करता और न उस के पास उठताबैठता. ठीक से दुकान पर न बैठने की वजह से कमाई भी कम हो गई थी. जबकि हाशिम अली के खर्च बहुत बढ़ गए थे.

इस स्थिति में मियांबीवी में तनाव रहने लगा. शाहीन का समझाना हाशिम अली को बुरा लगता था. इसी वजह से हाशिम ज्यादातर घर से बाहर ही रहने लगा. हाशिम को आपराधिक धारावाहिक काफी पसंद थे. बीवी की पाबंदियों से वह परेशान रहने लगा था. शाहीन अब उसे पत्नी नहीं, चुडै़ल नजर आने लगी थी. जिसे अब वह एक पल भी नहीं देखना चहता था.

शायद यही वजह थी कि आपराधिक धारावाहिक देखतेदेखते उस ने खुद अपराध करने का विचार कर लिया. वह जानता था कि अपराध का परिणाम अच्छा नहीं होता, लेकिन उसे लगता था कि वह इस तरह अपराध करेगा कि कोई उसे पकड़ नहीं पाएगा. यही सोच कर उस ने शाहीन को खत्म करने की योजना बना डाली.

योजना बना कर हाशिम शाहीन को अपने मकड़जाल में फंसाने लगा. अपना व्यवहार बदल कर वह शरीफ बन गया. वह शाहीन और बच्चों को प्यार करने का नाटक करने लगा. उस के इस बदलाव से शाहीन हैरान थी, लेकिन उसे खुशी भी थी. उस ने यह बात मायके वालों से बताई तो उन्हें भी खुशी हुई.

हाशिम में आए बदलाव को देख कर शाहीन के भाइयों ने उसे अलग मकान दिलाने का विचार किया. अफजल ने बहन के लिए पदमावती कालोनी में एक मकान खरीद दिया. बस इसी के बाद हाशिम ने षडयंत्र रचना शुरू कर दिया. शाहीन को विश्वास में ले कर उस ने समझाया कि कारोबार बढ़ाने के लिए उसे पैसों की जरूरत है. क्यों न वह अपने मकान पर कर्ज ले ले.

शाहीन ने इस बारे में अब्बू और भाइयों से सलाह ली तो हाशिम अली की बेहतरी के लिए सभी ने हां कर दी. इस के बाद हाशिम अली ने मकान पर 12 लाख रुपए कर्ज ले लिया.

हाशिम अली ने बिना किसी को बताए शाहीन का 8 लाख रुपए का दुर्घटना बीमा करा दिया, जिस का नामिनी उस ने खुद को बनाया. इतना सब कर के वह निश्ंिचत हो गया. शाहीन को लग रहा था कि हाशिम अब पूरी तरह से सुधर गया है, जबकि वह कुछ और ही तैयारी कर रहा था.

संयोग से उसी बीच शाहीन ने हाशिम अली को किसी औरत से फोन पर बातें करते पकड़ लिया तो दोनों में संबंध फिर बिगड़ गए. इस तरह हाशिम की योजना पर पानी फिर गया. शाहीन को कहीं से पता चला कि हाशिम के एक नहीं, कई औरतों से संबंध हैं तो दोनों के बीच तनाव काफी बढ़ गया.

अब रोज ही घर में क्लेश होने लगा. इस से हाशिम अली शाहीन को रास्ते का कांटा समझ कर उसे जल्दी निकालने की योजना बनाने लगा. उसे पूरा विश्वास था कि वह अपनी बनाई योजना में शाहीन को खत्म भी कर देगा और किसी को उस पर शक भी नहीं होगा. शाहीन के खत्म होते ही वह मालामाल हो जाएगा. उस के मकान और बीमे से मिलने वाली रकम से वह मौज करेगा.

अपनी उसी योजना के अनुसार, हाशिम अली दिल्ली माल लाने गया तो वहीं से जहर ला कर घर में रख लिया. अब वह मौके की तलाश में लग गया. 1 जुलाई, 2017 की रात किसी बात को ले कर पतिपत्नी के बीच बहस हो गई. हाशिम जानता था कि इस तरह उस की योजना सफल नहीं हो पाएगी. योजना को सफल बनाने के लिए उस ने शाहीन से माफी मांग कर कहा कि अब वह ऐसी गलती फिर कभी नहीं करेगा.

भोलीभाली शाहीन उसे अब तक न जाने कितनी बार माफ कर चुकी थी, इसलिए उस दिन भी माफ कर दिया. अगले दिन यानी 2 जुलाई, शनिवार को हाशिम अली शाहीन और बच्चों को कार से घुमाने ले गया. दरअसल घुमाने के बहाने वह ऐसी जगह देखने गया था, जहां अपनी योजना को अंजाम दे सके. पहले रामनगर रोड पर गया, उस के बाद वह दढि़याल वाली रोड पर गया.

अपना काम करने के लिए दढि़याल वाली रोड उसे ज्यादा उचित लगी, क्योंकि रात को वह सुनसान हो जाती थी. जगह देख कर वह वापस आ गया. घर आ कर शाहीन बच्चों और हाशिम अली को खाना खिला कर घर के काम निपटाने लगी.

उसी बीच हाशिम अली ने कोल्डड्रिंक की बोतल में दिल्ली से लाया जहर मिला कर रख दिया. काम निपटा कर शाहीन उस के पास आ कर बैठी तो उस ने प्यार जताते हुए फ्रिज से कोल्डड्रिंक की बोतल ला कर जहर वाली कोल्डड्रिंक शाहीन को थमा दी और दूसरी खुद ले ली.

जहर वाली कोल्डड्रिंक पी कर शाहीन का काम तमाम हो गया तो हाशिम ने उसे बिस्तर से उतार कर नीचे लेटा दिया और खुद बच्चों के पास जा कर लेट गया. सुबह 4 बजे उठ कर उस ने शाहीन की लाश को कार की डिक्की में रख कर अपने 5 साल के बेटे हमजा को बगल वाली सीट पर बैठा कर कहा कि उस की मम्मी रामनगर में है, वह उसे वहीं ले चल रहा है.

3 जुलाई, 2017 को पूरे दिन वह शाहीन की लाश को ठिकाने लगाने के लिए इधरउधर घूमता रहा, लेकिन दिन में उसे मौका नहीं मिला. रात 8 बजे वह दढि़याल वाली रोड पर पहुंचा तो सुनसान जगह पर कार रोक कर अंधेरे का फायदा उठाते हुए अगली सीट पर सो रहे बेटे को पिछली सीट पर लिटा दिया और कार की डिक्की खोल कर शाहीन की लाश को निकाल कर अगली सीट पर इस तरह बैठा दिया, जैसे वह सो रही हो.

इस के बाद हाशिम ने कार का अगला शीशा तोड़ दिया और कार को सड़क के किनारे इस तरह खड़ी कर दी, जैसे कोई वाहन वाला उस की कार को टक्कर मार कर चला गया हो. शाहीन मरी पड़ी थी. जरा सा झटका लगते ही उस का सिर टूटे शीशे से जा टकराया. अपनी योजना को अंजाम दे कर खुद को चोटिल दिखाने के लिए उस ने अपना सिर कार की बौडी पर पटक दिया.

इस तरह उस ने अपनी योजना को अंजाम दे दिया. घर वालों ने शव भी दफना दिया. लेकिन शाहीन के घर वालों को शक इस बात पर हुआ कि शाहीन की लाश नीली क्यों थी?

हाशिम को सुंदर और सुशील बीवी मिली थी. ससुराल भी अच्छी थी. उस के फूल से 2 सुंदर बच्चे भी थे. लेकिन शराब और शबाब के चक्कर में उस ने अपनी बसीबसाई गृहस्थी उजाड़ दी. पत्नी को मार कर वह जेल चला गया, जिस से उस के बच्चे अनाथ हो गए.

हाशिम के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने अपराध संख्या 350/2017 पर भादंवि की धारा 302, 201 के तहत उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. शाहीन के बच्चे अब अपने मामा अफजल के पास हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

भूरिया मुच्छड़ : क्या भूरिया ले पाया संध्या की जवानी का मजा

राजस्थान के उदयपुर जिले में देवली नाम का एक छोटा सा गांव था. तकरीबन 700-800 घरों की बस्ती. वहां सभी जाति के लोग रहते थे, जो बहुत मेहनतकश थे.

उसी गांव में सूरज नाम का एक मेहनती किसान रहता था. वह अपनी पुश्तैनी 10-12 बीघा जमीन पर खेतीबारी किया करता था. उस का खेत महावली की पहाड़ी के बीच मैदान में था, जिस में वह एक कुएं से सिंचाई करता था.

सूरज 6 फुट हट्टाकट्टा नौजवान था. घर में उस की बूढ़ी मां व पत्नी संध्या रहती थी. संध्या का गोरा रंग और भरापूरा बदन लोगों के दिलों की धड़कनें तेज कर देता था.

भोर में ही सूरज खेत पर चला जाता था. खेतों में उस के पास ट्रैक्टर, ट्रौली व खेती संबंधी सभी जरूरी सामान थे, जिस से वह गन्ने की उपज की सिंचाई, निराईगुड़ाई वगैरह अकेला ही करता था.

संध्या दिन में सूरज के लिए जब खाना ले कर घर से निकलती थी, तो घाघरे से उस की गोरीगोरी पिंडलियां साफ नजर आती थीं. छाती ढकने के लिए कस कर चोली बंधी रहती थी. सिर पर सतरंगी ओढ़नी का एक पल्लू चोली में खोंसा होता था.

सिर पर एक पोटली में 8-10 मक्के की मोटीमोटी रोटियां, सरसों का साग व हाथ में दही या छाछ का बरतन लिए जब वह कमर मटका कर चलती थी, तो कई मनचले मक्खियों की तरह उस के चारों ओर मंडराने लगते थे, पर वह किसी को भी नजदीक फटकने नहीं देती थी.

पर देवली गांव में एक मुच्छड़ लट्ठबाज खुद को बड़ा तीसमारखां मानता था. वह अपनी मूंछों पर ताव दे कर खोमचे वालों, सब्जी वालों, दुकानदारों व राहगीरों को तंग कर उन का माल हड़पता था और औरतों को गंदे इशारे करता. मौका मिलने पर वह छेड़खानी भी कर देता था. उस का नाम वैसे तो भूरा राम था, पर सभी उसे भूरिया मुच्छड़ कहते थे.

गांव वाले भूरिया मुच्छड़ से डरते थे. पुलिस चौकी के 2 सिपाहियों और उस की खिचड़ी साथ पकती थी.

एक दिन भूरिया मुच्छड़ बाजार में बवाल मचा रहा था कि तभी किसी ने उस से कह दिया कि यहां क्या अपनी धाक जमा रहा है? हिम्मत है तो सूरज की घरवाली संध्या को वश में कर के दिखा, फिर तुझे मर्द मानें?

तभी भूरिया मुच्छड़ पलट कर गरजते हुए बोला, ‘‘उस छोकरी को मैं चिडि़या की तरह अपनी कैद में न ले आऊं, तो मेरा नाम भी भूरा नहीं.

‘‘मैं कल ही संध्या पर डोरे डालना शुरू कर दूंगा.’’

दूसरे दिन जब संध्या सूरज के लिए खाना ले कर सजधज कर कमर मटकाती हुई अपने खेत की ओर चली, तो भूरिया मुच्छड़ उस के आगेपीछे मंडराने लगा.

संध्या ने उस से कहा, ‘‘भूरिया, मधुमक्खी के छत्ते में हाथ मत डालना, वरना बुरा हाल हो जाएगा.’’

उस की धमकी सुन कर भूरिया मुच्छड़ चुपचाप वहां से बिना कुछ किए चला गया.

उसी दिन जब शाम को संध्या ने भूरिया मुच्छड़ की गंदी हरकतों के बारे में सूरज को बताया, तो वह बोला, ‘‘ऐसी बात है, तो मैं कल ही उस मच्छर को मसल देता हूं.’’

इस पर संध्या ने कहा, ‘‘ऐसा मत करना. जब किसी को मीठी गोली देने से मारा जा सकता है, तो जहर नहीं देना चाहिए. मैं भी चित्तौड़गढ़ की बेटी हूं. मुझे केवल गुलाब के फूल जैसी नाजुक मत समझना. उस लठैत से तो मैं अकेले ही निबट लूंगी.’’

इस के बाद संध्या ने सूरज के कान में अपनी योजना कही, जिसे सुन कर वह मुसकरा दिया.

सूरज बोला, ‘‘वाह मेरी दिलदार, क्या योजना बनाई है. चलो, ट्रैक्टर पर गन्ने का खेत देख कर आते हैं.’’

अगले दिन जब संध्या भोजन ले कर खेत की ओर चली, तो भूरिया मुच्छड़ फिर आ धमका.

इस बार संध्या ने आंख के इशारे से उसे अपने पास बुलाया और कहा, ‘‘देख भूरिया, तेरा पहलवान जैसा बदन देख कर मेरा भी मन ललचा गया है. अगर मेरी खूबसूरती और तेरी जवानी मिल जाए, तो जो औलाद पैदा होगी, उस में हम दोनों के गुण आ जाएंगे.

‘‘वैसे, सूरज नामर्द है. 4 साल हो गए, पर मेरी गोद अभी भी सूनी है. शाम को ही मेरे खेत में गन्नों के बीच बने चबूतरे पर मेरा इंतजार करना. मैं सूरज को घर भेज दूंगी और तेरे पास आ जाऊंगी. पर एक बात है…’’

भूरिया मुच्छड़ खुशी के मारे बोला, ‘‘क्या बात है? मैं तो तेरे लिए जान भी देने को तैयार हूं.’’

भूरिया मुच्छड़ को अपने जाल में फंसता देख संध्या बोली, ‘‘जान तेरे दुश्मन की जाए. मैं तो यह कहती हूं कि तेरी ये लंबीलंबी मूंछें मेरे गुलाब की कलियों जैसे गोरेगोरे गालों व होंठों का रसपान करने में अड़चन आएंगी. इसलिए इन मूंछों को कटा कर सफाचट हो जाओ.’’

‘‘ओह, यह बात है. मैं अभी जा कर मूंछें साफ करा देता हूं,’’ भूरिया मुच्छड़ खुशी से चहकते हुए बोला.

संध्या ने कहा, ‘‘याद रखना, अपना लट्ठ जरूर साथ लाना और रात को 8 बजे से पहले मत आना. चबूतरे पर मेरा इंतजार करना,’’ इतना कह कर संध्या घर चली गई और भूरिया मुच्छड़ अपनी मूंछें मुंड़वाने.

योजना के मुताबिक, सूरज चबूतरे के पास ही गन्नों के झुरमुट में छिप गया. रात को भूरिया मुच्छड़ चबूतरे पर संध्या की बाट देखते हुए मन ही मन मुसकरा रहा था कि आज तो उन दोनों का मिलन हो ही जाएगा. उस की बांछें खिल रही थीं.

थोड़ी देर बाद संध्या भी सजधज कर उस के पास आ गई. उसे देख कर भूरिया मुच्छड़ की लार टपकने लगी. उस ने उसे अपनी बांहों में लेना चाहा, पर संध्या ने कहा, ‘‘इतनी भी जल्दी मत कर. पहले मैं अपनी चोली की डोरी कमर से खोल लेती हूं, फिर तू पूरा मजा ले लेना.’’

इस के बाद संध्या ने अपनी कमर के पीछे खोंसी हुई दरांती निकाली और फुरती से भूरिया मुच्छड़ की नाक पर वार कर उस की नाक काट कर अलग कर दी.

भूरिया दर्द के मारे चिल्लाया और बोला, ‘‘धोखा. मैं तुझे नहीं छोड़ूंगा.’’

इतना कह कर भूरिया मुच्छड़ ने अपने पास रखे लट्ठ पर हाथ मारा, पर वह गायब था. सूरज ने वह लट्ठ उठा लिया था और उस ने उसी का लट्ठ उसी पर धड़ाधड़ मारना शुरू कर दिया.

संध्या ने 2 बार के हमले में ही उस के दोनों कान भी काट दिए. भूरिया मुच्छड़ लहूलुहान हो कर इस तरह भागा, जैसे बंदूक से गोली चली.

सूरज ने अपनी पत्नी संध्या को बांहों में भर कर उस की पीठ थपथपाई और इस के बाद वे दोनों खुशीखुशी अपने घर चले आए.

जब गांव वालों को मालूम हुआ कि भूरिया मुच्छड़ अपनी नाक और कान दोनों ही एक औरत से कटवा कर गांव छोड़ कर भाग गया है, तो सब ने राहत की सांस ली.

इस तरह बहादुरी दिखाते हुए संध्या ने अपने गांव को बदमाश भूरिया मुच्छड़ से नजात दिलाई. अब उस का रुतबा पूरे गांव में और भी ज्यादा बढ़ गया था.

हां तक भूरिया मुच्छड़ की बात है, तो वह उस के बाद गांव के आसपास कहीं नहीं दिखाई दिया.

हवाई सेवाएं और आमजन

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देश में ही नहीं, दुनियाभर में हवाई सेवाएं लोकप्रिय हो रही हैं. काश, ऐसा दिन आ जाए जब आप बिना प्रीबुक कराए, जैसे टैक्सी को हाथ हिला कर बुला सकते हैं, वैसे ही हवाई सेवा का उपयोग कर सकें. आजकल बड़ेबड़े हवाई अड्डे बनने लगे हैं जहां मीलों तक बाजारों व खानेपीने की दुकानों से गुजर कर पहुंचना पड़ता है. यह अड़चन हवाई सेवाओं का सुख छीन रही है.

विशाल हवाई अड्डों की जगह छोटे हवाई अड्डे और बड़े जहाजों की जगह छोटे हवाई जहाज शायद ज्यादा उपयोगी हों.

देश में दिल्ली और मुंबई के क्रमश: जेवर और नवी मुंबई में विशाल हवाई अड्डे बनाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है जहां पहुंचने में दिल्ली और मुंबई वालों को घंटों सड़कों पर ट्रैफिक से जूझना पड़ेगा. फिर आजकल सुरक्षा के नाम पर मनमाने कंट्रोल होने लगे हैं. आधे घंटे पहले हवाई जहाज में चढ़ा दिया जाता है. उतरते वक्त मीलों चलना पड़ता है. बैगेज का इंतजार करना पड़ता है.

मस्तमौलाओं के लिए हवाई सेवाएं भी क्यों नहीं मस्तमौला हो सकतीं. चाहे 4 सीटर प्लेन हों या 400 सीटर, जब चाहो जैसे चाहो, बैठो और पहुंचो. भारीभरकम हवाई जहाज इसलिए चल रहे हैं क्योंकि हवाई कंपनियां इतनी बड़ी हो गई हैं कि वे छोटे हवाई जहाजों के उद्योग को पनपने ही नहीं दे रही हैं. जहां जमीनी वाहनों में 400-500 यात्रियों को ले जाने वाली ट्रेनों से ले कर 2 जनों तक ले जाने वाली बाइक हैं, वहीं हवाई सेवाओं में छोटे वाहनों की भारी किल्लत है. छोटे हवाई जहाज तो लक्जरी आइटम हैं और उन को चलाना व खरीदना नीरव और ललित मोदियों के बस का ही है, जो जनता का पैसा लूट सकते हैं. होना तो यह चाहिए कि जम कर रिसर्च हो कि आम लोगों को हवा में उड़ने लायक ज्यादा व आसान सुविधाएं कैसे दी जाएं.

विज्ञान आवश्यकता के अनुसार खोज कर लेता है. मोबाइल और कंप्यूटर कभी बेहद महंगे होते थे पर आज एकदम सस्ते हो गए हैं. इतने सस्ते कि सरकार समझने लगी है कि मोबाइल नंबर ही आदमी की पहचान बन गया है. ऐसा ही हवाई सेवाओं के क्षेत्र में होना चाहिए और किसी भी शहर के ऊपर हवाई जहाज वैसे ही उड़ते नजर आने चाहिए जैसे चीलकबूतर उड़ते नजर आते हैं. यह संभव भी है. बस, बड़ी कंपनियों का कंट्रोल तो हटे.

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