दुर्वासा बनते अन्ना हजारे

द्वापर युग में एक थे भीष्म पितामह, जिन्हें इच्छामृत्यु का वरदान मिला हुआ था. पांडवों ने बड़ी मिन्नतें कर उन का वध किया तब कहीं जा कर वे हस्तिनापुर पर काबिज हो पाए थे. किंवदंती यह है कि खुद भीष्म ने उन्हें अपनी मौत का तरीका बताया था. मौजूदा बात एकदम इस के उलट है. समाजसेवी अन्ना हजारे ने जोरदार दहाड़पत्र के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा है कि आप ही बताइए कि 23 मार्च से दिल्ली में आंदोलन और अनशन किस जगह पर करूं.

अब अन्ना हजारे पूरी तरह नरेंद्र मोदी पर हमलावर होते उन पर तरहतरह के आरोप लगा रहे हैं कि उन की सरकार भ्रष्टाचार रोकने में नाकाम रही है और जन लोकपाल विधेयक को उन्होंने कमजोर कर दिया है. बकौल अन्ना हजारे, उन्होंने 30 चिट्ठियां नरेंद्र मोदी को लिखीं पर उन्हें एक का भी जवाब नहीं मिला. अब गेंद मोदी के पाले में है कि अन्ना के इस आखिरी आंदोलन का शिकार बनने की जगह का चुनाव वे खुद करें.

सैल्फी का जानलेवा जनून

आज के दौर में सैल्फी युवाओं व किशोरों के लिए फैशन व जनून बन गई है. वे अपनी मनचाही तसवीरें खींचते हैं और सोशल नैटवर्किंग साइट्स के अलावा व्हाट्सऐप पर अपने दोस्तों से शेयर करते हैं. इस में उन की खुशियां, फैशन और भाव झलकते हैं. इस में कोई दो राय नहीं कि अपनी तसवीरें लेने का सब से बेहतरीन और आसान तरीका सैल्फी ही है.

यह सुनहरा पहलू है, लेकिन दूसरा चिंताजनक पहलू यह है कि भारत में सैल्फी से होने वाली मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है. स्थिति उन के लिए और भी खतरनाक है जो सैल्फी के लिए सारी हदों को लांघ जाते हैं. वे भूल जाते हैं कि जिंदगी की अहमियत एक सैल्फी से कहीं ज्यादा होती है.

खतरनाक सैल्फी लेने की होड़ में कब किस की सैल्फी आखिरी साबित हो जाए इस को कोई नहीं जानता. इस के खतरनाक रूप सामने आने के बाद युवाओं को खतरों से बचाने के लिए अब कानून का सहारा लेना पड़ रहा है. रेलवे ने पटरियों को ‘नो सैल्फी जोन’ घोषित कर दिया है. ऐसा करने वालों को जेल की हवा खाने के साथ जुर्माना भी भरना पड़ सकता है. यात्रियों को खतरों से आगाह भी किया जाएगा.

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युवाओं के लिए बनी खतरा

जब वर्ष 2005 में सैल्फी शब्द सामने आया, तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वह इतना चर्चित हो जाएगा और खतरा भी बनेगा. शब्द की तेजी से हुई चर्चाओं का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2013 तक यह सब से ज्यादा चर्चित हो गया.

औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने सैल्फी को वर्ल्ड औफ द ईयर तक चुना. यह युवाओं के दिमाग पर छा गया. हर हाथ में मोबाइल और सैल्फी का फैशन पंख लगा कर चल रहा है. इस के लिए दीवानगी है. नेताओं और फिल्मों ने भी इस को बढ़ावा दिया. नौबत ऐसी आ गई कि रेलवे को ‘नो सैल्फी’ की गाइडलाइन जारी करनी पड़ गई. ऐसी नौबत आने के पीछे भी बड़े कारण रहे.

ट्रेन में सफर करते समय खतरनाक तरीके से व पटरी पर सैल्फी लेना युवाओं की मौत का सबब बन गया. पहले हुए कई गंभीर हादसों की कड़ी में ताजा कई हादसे भी जुड़ते गए. मुंबईहावड़ा ऐक्सप्रैस में बिलासपुर के निपनिया के पास बोगी के गेट से बाहर लटक कर रेलवे पुल और अपनी सैल्फी लेते एक युवक का संतुलन बिगड़ गया और वह नदी में जा गिरा.

इसी तरह दुर्ग में भी ऐसा ही हादसा हुआ. खारून पुल के पास सैल्फी लेता एक युवक पैर फिसलने से गिर गया. वह दरवाजे पर लटक कर सैल्फी ले रहा था.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में तो चलती ट्रेन के आगे सैल्फी लेने की चाहत में एक किशोर ने अपनी जान गवां दी. गीता कालोनी का रहने वाला कार्तिक कक्कड़ 10वीं का छात्र था. वह पढ़ाईलिखाई, खेलकूद में अव्वल था. उसे सैल्फी लेने का बहुत शौक था. वह तरहतरह की सैल्फी दोस्तों तक पहुंचाता था. एक दिन सुबह कार्तिक अपने दोस्तों समीर, प्रत्यूष व रोहित के साथ लढ़ौरा रेलवे फाटक पर सैल्फी लेने पहुंच गया. उस की ख्वाहिश थी कि सैल्फी चलती ट्रेन के आगे ली जाए ताकि रियल लुक आ सके.

उसे हरिद्वारअजमेर ऐक्सप्रैस ट्रेन आती दिखी, तो वह ट्रैक पर आ गया और सैल्फी लेने लगा. ट्रेन की रफ्तार का उसे अनुमान नहीं था. ट्रेन चालक ने उसे हटाने के लिए कई बार हौर्न दिया, लेकिन वह नहीं हटा. आखिर कार्तिक ट्रेन की चपेट में आ गया. करीब सौ मीटर दूर जा कर चालक ने ट्रेन रोकी. अगले हिस्से में फंसे उस के शरीर के टुकड़ों को निकाला गया. मौके पर उस के शरीर के हिस्से, मोबाइल के टुकड़े, जूते बिखर चुके थे. इस खौफनाक मंजर ने हर किसी को दहला दिया. एक सैल्फी के लिए उसे जान से हाथ धोना पड़ा. इस से उस के परिवार को जो दर्द मिला उस की भरपाई शायद ही कभी हो सके.

इसी दिन मिर्जापुर जिले में भी 2 युवाओं को चलती ट्रेन से सैल्फी लेना भारी पड़ गया. दरअसल, विनोद व जितेंद्र नामक युवक दिल्लीगुवाहटी ब्रह्मपुत्र मेल के बराबर में पटरियों पर खड़े हो कर सैल्फी ले रहे थे. तभी दूसरी तरफ से सिंगरौलीवाराणसी इंटरसिटी ट्रेन आ गई और वे उस की चपेट में आ गए. दोनों की मौके पर ही मौत हो गई. इस हादसे का दर्शक बनने की कोशिश एक अधेड़ यात्री को भी भारी पड़ गई. ब्रह्मपुत्र मेल में सवार यह यात्री करीब सौ मीटर दूर ट्रेन पहुंचने पर दरवाजे पर खड़े हो कर नीचे झांकने लगा, तभी उस का पैर फिसल गया और ट्रेन की चपेट में आ कर उस ने जान गवां दी.

एक साल पहले सैल्फी के चक्कर में मथुरा में 3 युवकों याकूब, इकबाल व अफजल को अपनी जान गंवानी पड़ी. तीनों जानलेवा जोखिम उठा कर चलती ट्रेन के सामने सैल्फी लेने लगे. चालक के हौर्न देने पर भी वे नहीं हटे और ट्रेन की चपेट में आ गए. इन के अलावा और भी कई अफसोसजनक हादसे हुए.

ऐसे हादसों के मद्देनजर ही रेलवे ट्रैक व दरवाजों पर खड़े हो कर सैल्फी लेने पर रोक लगाने का फैसला किया गया. रेल अधिकारियों के साथ जीआरपी व आरपीएफ के अधिकारियों की कई दौर की बैठक हुईं. उत्तर रेलवे दिल्ली मंडल ने सैल्फी लेने को प्रतिबंधित कर दिया. रेलवे का मकसद हादसों को रोकने के साथ ही यात्रियों को जागरूक करना है.

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असुरक्षित और जानलेवा जोखिम वाली सैल्फी के जनून में देश में मौतें बढ़ रही हैं. अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल दुनियाभर में सैल्फी से होने वाली मौतों में से 27 हादसे भारत में हुए. बढ़ते हादसों से मुंबई पुलिस ने शहर के 16 जगहों पर नो सैल्फी जोन बना दिए. हादसों के बाद यह निर्णय लिया गया. पुलिस अब खतरनाक सैल्फी लेने वालों पर नजर रखती है. इसी तरह गोआ में भी कुछ स्थानों पर सैल्फी लेने पर रोक लगानी पड़ी. कई बार युवा साहसिक सैल्फी के लिए जोखिम उठाते हैं. अमेरिकी मनोचिकित्सक एसोसिएशन ने तो जरूरत से ज्यादा सैल्फी की आदत को एक मानसिक बीमारी माना है.

ऐसे जनूनी किशोरों व युवाओं की कमी नहीं जो सैल्फी लेने का कोई मौका नहीं चूकते. एडवैंचर्स सैल्फी उन्हें वाहवाही लूटने का माध्यम भी लगती है. ऐसी सैल्फी सोशल साइट्स के जरिए वे दोस्तों को पहुंचा कर ज्यादा से ज्यादा प्रतिक्रिया चाहते हैं. अलग अंदाज की सैल्फी की होड़ है. नेता भी सैल्फी को युवाओं के साथ जुड़ने का माध्यम बनाने लगे हैं. फिल्मों ने भी इसे खूब बढ़ावा दिया. बजरंगी भाईजान फिल्म का गाना ‘चल बेटा सैल्फी लेले रे…’ सिर चढ़ कर बोला. अभिनेता, अभिनेत्रियों और नेताओं की सैल्फी आती रहती हैं जो चर्चा का केंद्र भी बनती हैं.

कानपुर शहर के गंगाबैराज पर सैल्फी लेने के चक्कर में 6 दोस्तों की, पैर फिसलने से एकसाथ जान चली गई. एक अन्य युवक उन्हें बचाने के चक्कर में डूब गया.

सैल्फी के चक्कर में होने वाले हादसों पर डा. फरीदा खान कहती हैं, ‘‘सैल्फी की वजह से होने वाली मौतें झकझोर कर देने वाली हैं. हादसों से युवाओं को सबक लेना चाहिए. देखादेखी वे क्रेजी न बनें. ऐसी जिज्ञासा से दूर ही रहें जिस से जान का खतरा हो. अभिभावकों को भी अपने बच्चों को जागरूक करना चाहिए. जब जिंदगी ही नहीं होगी तो सैल्फी कहां से आएगी.’’

बकौल उत्तर रेलवे के दिल्ली मंडल के पीआरओ अजय माइकल, ‘‘सैल्फी लेने वालों पर रोक लगाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे. यात्रियों को खतरों के बारे में आगाह किया जाएगा. जांच अभियान चलाने वाले पुलिसकर्मियों को निर्देश दिए जाएंगे कि वे लोगों को समझाएं. न मानने की दशा में उन पर कार्यवाही करें. सैल्फी के संबंध में यात्रियों की शिकायत को भी गंभीरता से लिया जाएगा.’’

सैल्फी लेना चलन है, इस से बचा नहीं जा सकता, लेकिन उन खतरों से जरूर बचा जा सकता है जिन के जनक युवा खुद बन जाते हैं. अपनी सैल्फी को ज्यादा पौपुलर करने के चक्कर में जोखिम उठा कर जान से ही हाथ धोने पड़ जाएं, तो ऐसी सैल्फी को कौन पसंद करेगा. साधारण सी बात है कि जान से ज्यादा कीमत तो किसी सैल्फी की नहीं हो सकती. जरूरत सावधान रहने की है. ऐसे जनून में कतई न पड़ें जो जान पर भी भारी पड़ जाए

रिवौल्वर के साथ सैल्फी, गई जान

पंजाब के पठानकोट के 15 वर्षीय किशोर रमनदीप को अपनी सैल्फी लेने का शौक था. उस ने बेहद रोमांचक सैल्फी लेने की सोची. इस का विकल्प उसे अपने घर में ही नजर आ गया. एक दिन उस ने अपने पिता की घर में रखी 32 बोर की लाइसैंसी रिवौल्वर उठाई और कनपटी पर लगा दी. वह रिवौल्वर के साथ सैल्फी लेने लगा. इसी बीच लोडेड रिवौल्वर का ट्रिगर दब गया और गोली चल गई. गोली लगते ही वह नीचे गिर पड़ा. मातापिता घर पर नहीं थे. गोली चलने की आवाज सुन कर घर पहुंचे पड़ोसियों ने उसे गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाया. गोली उस के सिर में घुसी थी. बाद में उसे लुधियाना के अस्पताल में रैफर किया गया, लेकिन उस की मौत हो गई. अलगअलग अंदाज की सैल्फी का जनून मौत का कारण भी बन जाता है.

विदेशी उच्चशिक्षा बनाम लचर भारतीय शिक्षा

भारत में एक ओर उच्चशिक्षा के स्तर को ले कर सवाल उठते रहे हैं तो दूसरी ओर पढ़ने के लिए छात्र बड़ी संख्या में विदेशों का रुख कर रहे हैं. भारतीय छात्रों के माध्यम से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को अरबों डौलर मिल रहे हैं. इस का बुरा प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है.

प्रतिभा किसी एक ही देश की परिरक्षित निधि नहीं है. प्रत्येक देश के अपनेअपने क्षेत्र के प्रवीण व्यक्ति होते हैं, जैसे वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, साहित्य या कलाओं के विद्वान, चित्रकार, कलाकार आदि. असाधारण प्रतिभा संपन्न ऐसे पुरुष और स्त्रियां अपने देश की  प्रगति व समृद्धि में योगदान तो देते ही हैं साथ ही, अपनी विशिष्टता वाले क्षेत्र में भी उत्कर्षता लाते हैं.

यह कोई असामान्य बात नहीं है कि इन योग्य व्यक्तियों में से कुछ लोगों को अपने ही देश में संतोषजनक काम नहीं मिल पाता या किसी न किसी कारण वे अपने वातावरण से तालमेल नहीं बिठा पाते. ऐसी परिस्थितियों में ये लोग बेहतर काम की खोज के लिए या अधिक भौतिक सुविधाओं के लिए दूसरे देशों में चले जाते हैं.

उच्चशिक्षा पर सवाल

अपने कुशल और प्रतिभासंपन्न व्यक्तियों की हानि से विकासशील देश सब से अधिक प्रभावित हुए हैं. इस का मुख्य कारण यह है कि विकासशील देशों में वेतन और अन्य सुविधाओं के रूप में प्राप्त होने वाले लाभ कम हैं. इन में भारत भी एक है.

भारत में उच्चशिक्षा के स्तर को ले कर हमेशा ही सवाल उठते रहते हैं. अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग में भारतीय विश्वविद्यालय पहले 100 संस्थानों में अपनी जगह क्यों नहीं बना पाते हैं? शीर्ष भारतीय संस्थानों में कोई मौलिक शोधकार्य क्यों नहीं होता है? दाखिले में आरक्षण का मुद्दा, ऊंचे अंक हासिल करने के बावजूद दाखिले से वंचित रह जाना, शिक्षक और छात्रों का बिगड़ा हुआ अनुपात, प्रोफैसरों और कुलपतियों की राजनीतिक नियुक्तियां और किस तरह से उच्चशिक्षा के संस्थान अकादमिक भ्रष्टाचार और औसत दरजे के डिगरीधारकों के उत्पादन की फैक्टरियां बन गए हैं. इन सवालों में एक बड़ा सवाल अब यह भी जुड़ गया है कि इतनी बड़ी संख्या में भारतीय छात्र विदेशों का रुख क्यों कर रहे हैं? इतना ही नहीं, इन छात्रों के साथ फीस और पढ़ाई का पैसा भी बह कर विदेशों में जा रहा है.

ओपन डोर संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी कालेजों में दाखिला लेने वाले भारतीय छात्रों में 25 फीसदी की वृद्धि हुई है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उन्होंने 5 अरब रुपए का योगदान दिया है.

सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में यूरोप और आस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों में भी नाटकीय ढंग से वृद्धि हुई है, जबकि इसी दौर में भारत में बड़ी संख्या में उच्च शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय खुले हैं. आखिर ये छात्र देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में क्यों नहीं पढ़ना चाहते?

ब्रेनड्रेन की बड़ी वजह

आज भारत की उच्चशिक्षा व्यवस्था विश्व की बड़ी व्यवस्थाओं में एक मानी जाती है. 2030 तक भारत में कालेज जाने की उम्र वाले 14 करोड़ से अधिक लोग होंगे और ये विश्व का सब से जवान देश माना जाएगा.

ताजा हालात में भारत के लिए यह चुनौती होगी कि वह किस तरह से इन संभावित विद्यार्थियों को स्वदेश में ही रोके और उन की प्रतिभा व योग्यता का अपने यहां अधिकतम इस्तेमाल कर सके ताकि वे मेक इन इंडिया में अपना सहयोग कर सकें.

ब्रेनड्रेन की सब से बड़ी वजह है कि विदेशी डिगरी खासतौर पर अमेरिकी डिगरी से नौकरी पाना आसान है. आर्थिक उदारीकरण के बाद मध्यवर्गीय परिवारों की आय का स्तर बढ़ा है और उन की दृष्टि में भारतीय उच्चशिक्षा प्रणाली में सीमित अवसर हैं.

भारत में चुनिंदा विश्वविद्यालयों में ही पढ़ाई का स्तर ठीक है और सीमित सीटों के कारण वहां दाखिला दुष्कर होता जा रहा है. ज्यादातर छात्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित पढ़ने के लिए बाहर जाते हैं. बेशुमार सरकारी स्कौलरशिप और अनुदान से छात्रों का बाहर जा कर पढ़ने का सपना पूरा होना आसान हो गया है.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय और एसोचैम जैसे संस्थानों को इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि इसे कैसे रोका जाए. ब्रेनड्रेन अब निश्चित रूप से घाटे का सौदा बनता जा रहा है. प्रतिभा पलायन रोकने के लिए आईआईटी और आईआईएम जैसे और संस्थान स्थापित किए जाने की जरूरत है. विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपने कैंपस खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. उन के लिए कर रियायतें और प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए जिस से हमारे देश का शिक्षा स्तर ऊपर हो. इस से ब्रेनड्रेन पर भी लगाम लगेगी.

दूसरी तरफ उच्चशिक्षा के लिए सिर्फ सरकार पर ही निर्भर रहना उचित नहीं है बल्कि उद्योग और अकादमिक सहयोग से नई संस्थाएं स्थापित करनी चाहिए और उन का स्तर बढ़ाया जाना चाहिए.

कदम उठाए सरकार

सरकार द्वारा उच्चशिक्षा की फीस भी बढ़ाई जाए, क्योंकि जो छात्र विदेशों में इतना खर्च करने के लिए तैयार हैं वे अच्छी शिक्षा के लिए स्वदेश में भी खर्च कर सकते हैं. जहां तक गरीब छात्रों का सवाल है, उन के लिए अमेरिका की तरह गारंटी प्रणाली की स्थापना की जाए जहां उन्हें बिना अभिभावकों की सुरक्षा के भी सस्ता लोन मिल सके.

विदेशों में पढ़ने के लिए उदार भाव से दी जा रही सरकारी छात्रवृत्तियों और अनुदानों में कटौती भी की जा सकती है. अभी ब्राजील ने ऐसा किया है और उस के बाद वहां के छात्रों के विदेश जाने में कमी आई है.

आज विदेश का रुख करने वाले छात्रों के लिए एक आकर्षक विकल्प देश में ही पैदा करने की जरूरत है. आज अधिकांश सरकारी संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए आमूलचूल बदलाव की जरूरत है. शिक्षा माफिया के काले धन पर भी सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है. ये शिक्षा व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहे हैं.

विज्ञान, चिकित्सा या ज्ञान के किसी अन्य क्षेत्र का विशेषज्ञ कम वेतन और अन्य कठिनाइयों को भी सह सकता है, यदि उस की योग्यता को अच्छी मान्यता मिले. उस के काम का ठीक मूल्यांकन हो. अच्छे तरह साधनसंपन्न प्रयोगशाला या पुस्तकालय राष्ट्रीय प्रतिभाओं में से अधिकांश को अपनी मातृभूमि छोड़ने से रोक देंगे, चाहे विदेशों में  उन्हें कितना ही अधिक वेतन क्यों न मिले.

विकसित देशों के रहनसहन के ऊंचे स्तर ने विकासशील क्षेत्रों के लोगों को सदा ही अत्यधिक आकृष्ट किया है और प्रतिभाशाली लोग और विशेषज्ञ भी इस मोहजाल से अपनेआप को नहीं बचा पाए.

इस का परिणाम यह हुआ कि विकासशील देशों के अधिकांश प्रतिभासंपन्न व्यक्ति रहनसहन के इस स्तर को प्राप्त करने में प्रसन्नता का अनुभव करने लगे जोकि विकसित देशों के एक साधारण नागरिक को भी उपलब्ध होती है. इसलिए ऐसी सुविधा देश में ही उपलब्ध कराने की योजना बनाई जाए.

महाराष्ट्र सरकार ने दी दिनरात शौपिंग की इजाजत

महाराष्ट्र सरकार ने लोगों को काम करने में आजादी देते हुए दुकानों और मौलों को 24 घंटे खुला रखने की इजाजत दे कर सही किया है. पहले कर्मचारियों के हितों के नाम पर दुकानों के घंटे बांधे गए थे ताकि मालिक उन से रातदिन काम न ले सकें. यह कानून बिजली के आने से पहले तो शायद ठीक था पर जब से पूरे शहर ही नहीं, कसबे और गांव भी रातदिन रोशनी में जगमगा रहे हैं, तो यह निरर्थक है.

इस बदलाव के बाद अब व्यवसायियों पर निर्भर है कि वे अपने प्रतिष्ठानों को कब खोलें और कब बंद करें. पहले जहां लोग सुबह जल्दी दुकानें खोलते थे और जल्दी बंद करते थे, अब उलटा होने लगा है. ज्यादातर बाजार निर्धारित 9-10 बजे की जगह 11-11:30 बजे तक खुलते हैं और देररात तक खुले रहते हैं.

आज लोगों को घर से काम की जगह तक जाने में एक तरफ से 1 से 2 घंटे लगाने पड़ रहे हैं. ऐसे में उन के पास रात को ही शौपिंग का समय बचता है. दिन में बच्चों की देखरेख, स्कूल होमवर्क में व्यस्त गृहिणियों तक को फुरसत नहीं मिलती कि वे आराम से शौपिंग कर सकें. रात को यह सुविधा मिलने का अर्थ है कि बच्चों को सुला कर घर से आराम से निकला जा सकता है.

दरअसल, अभी भी सरकारों ने नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत से अंकुश लगा रखे हैं. कुछ कर्मचारियों के हितों के नाम पर हैं, कुछ सामाजिक व्यवस्था के नाम पर, कुछ कानून बनाए रखने के नाम पर. अब समय आ गया है कि लोग छोटे समूहों में अपने नियम खुद तय करें. दुकानों का समय दुकानों के मालिक अकेले या बाजार में व्यापारियों के साथ मिलजुल कर तय करें.

पार्किंग भी कुछ ऐसा ही मामला है. इसे घरों और दुकानों को तय करना चाहिए, ट्रैफिक पुलिस या कौर्पाेरेशनों को नहीं. केवल सड़कों पर असुविधा न हो, इस के लिए बंधन हों पर जहां सीमित आनाजाना है वहां जनता खुद तय करे. यह सोच कि सरकारी दफ्तर में बैठा अफसर या चुना हुआ नेता ज्यादा जानकार है, बंद होनी चाहिए.

व्यक्तिगत मामलों में सरकार का दखल न हो क्योंकि हर दखल का मतलब है रिश्वतखोरी और तरफदारी की एक खिड़की खोल देना. रिश्वत की दलदल के कारण यहां कानूनों की भरमार है जो तेजी से बढ़ रहे हैं. रातभर दुकानें खोेले जाने की अनुमति मिलना एक राहत है. पक्की बात है कि इस में भी सरकारी अगरमगर जरूर होंगे जो जल्दी ही दिखेंगे.

मृत्यु पूर्व हरिद्वार जांच

ताउम्र व्यवस्था के खिलाफ लड़तेलड़ते मरने को आ गया तो अचानक याद आया कि मरने के बाद मैं कहीं जाऊं या न, कम से कम हरिद्वार तो जाना ही पड़ेगा. तो जिंदगी में क्यों न कम से कम वहां की स्थितियों का जायजा ले लिया जाए, ताकि मरने के बाद व्यवस्था से अपने को एक और शिकायत न हो.

सच पूछो तो मैं मरने से उतना नहीं डरता जितना धर्म से डरता हूं. यह धर्म ही है जो समाज में कभी भी, कुछ भी करने का माद्दा रखता है. कहते हैं, धर्म जोड़ता है पर मैं ने तो इसे तोड़तेमरोड़ते ही बहुधा देखा. एक ही आदमी को सैकड़ों हिस्सों में टांकते देखा. मरने के बाद बंदा ही जाने कि वह कहां जाता है, कहीं जाता भी है या नहीं, पर हम फिर भी लाख सैक्युलर, समाजवादी होने के बाद भी उस के जीतेजी उस के बारे में उतने चिंतित नहीं होते जितने चिंतित उस के मरने के बाद होते हैं.

बस, यही सोच सारे कामधाम छोड़ हरिद्वार के लिए बस पकड़ी और नाक की सीध में सीधे हरिद्वार जा पहुंचा. वहां पहुंचते ही एक पहुंचे हुए पंडितजी टकरा गए. गोया, वे मेरा ही इंतजार कर रहे हों. आत्माओं के प्रति उन के मन में इंतजार देख मन बागबाग हो उठा. मुझे सिर से पांव तक तोलनेदेखने के बाद वे अलापे, ‘‘कहो जजमान, कैसे आना हुआ?’’

‘‘बस, यों ही चला आया. यहां की व्यवस्था देखने. सोचा, मरने के बाद हांडीलोटे में पड़े तो सभी आप के दर्शन करते ही हैं, जीतेजी भी जो आप से एकबार साक्षात्कार हो जाए तो…’’ मैं ने कहा तो वे चौंक कर बोले, ‘‘मान गया तुम्हारा दुस्साहस, हे जीव! जो जिंदा रहते ही हमारे से मिलने चले आए. यहां तो जीव मरने के बाद भी आने से, हम से मिलने से डरता है जबकि तुम जिंदा ही चले आए?’’

‘‘पंडितजी, इसलिए आया हूं कि मरने के बाद यहां कि सुव्यवस्था देख परेशान न होना पड़े. पहले ही कहीं की व्यवस्था के बारे में पता हो तो कुछ भी घटते देखते मन नहीं दुखता. बस, इसीलिए…’’

‘‘गुड, वैरी गुड, बहुत दूरदर्शी मालूम होते हो?’’ कह वे अपनी राह होने को हुए तो मैं ने उन्हें तनिक रोकते पूछा, ‘‘माफ करना, पर सुना है जीवों को स्वर्ग पहुंचाने वाला रास्ता यहीं से शुरू होता है?’’

‘‘हां, कोई शक?’’

‘‘नहीं, आप पर शक कर नरक को जाना है क्या? बंदा अपने कर्मों से स्वर्ग को जाए या न, पर आप के बूते नरक को जा जरूर सकता है. मैं चाहता था कि जो आप की मेहरबानी हो तो…इस नरक में रहतेरहते असल में बहुत तंग आ गया हूं.’’ कह मैं ने जेब में हाथ डाला तो वे बोले, ‘‘नहीं, हम विधि के विधान के खिलाफ कुछ नहीं कर सकते. इसलिए बेहतर होगा अपना हाथ जेब से निकाल लो. बंदे के मरने के बाद तो हम खुद ही उस के लाख जेब पकड़े रखने के बाद भी उस की जेब में हाथ डाल लेते हैं. हमारी एक जीव ट्रांसपोर्ट कंपनी है, आइएसओ. पर हमारा कायदा है कि हम मरने के बाद ही जीव को स्वर्ग को भेजते हैं.’’

‘‘क्यों? जिंदा जीव क्यों नहीं? जिंदा जीव के पास दिमाग और आंखें तो दोनों होती हैं?’’

‘‘होती हैं, इसलिए तो यह नहीं हो सकता. जिंदा आदमी के पास पर वे आंखें नहीं होतीं जिन से स्वर्गनरक का रास्ता दिखे. नश्वर आंखें तो अपने स्वार्थ से आगे रत्तीभर नहीं देख सकतीं. स्वर्गनरक का रास्ता मरने के बाद ही जीव को दिखता है. जीवित की आंखों और दिमाग पर माया के बहुत भारी परदे पर परदे पड़े होते हैं,’’ उन्होंने सतर्क तर्क दिया.

‘‘पर मेरी आंखें तो सब देख सकती हैं,’’ मैं ने अपनी आंखों पर ठोक बजा कर दावा प्रस्तुत किया तो वे बोले, ‘‘बस, यहीं तो जीव धोखा खा जाता है, बुद्धू. सब्सिडी वाले राशन के चलते राशनकार्ड पर अंकित आटेदाल के अतिरिक्त और कुछ, असल में, बंदे को दिखता ही नहीं, चाहे वह कितनी ही कोशिश क्यों न कर ले. धर्म के विनाश का कारण भी यही तर्क है.

‘‘जीव दूसरों की आंखों से अधिक जब अपनी आंखों पर विश्वास करता है तभी तो सारे तीर्थ करने के बाद भी जीव नरक में औंधेमुंह जा कर पड़ता है. तुम्हें भी स्वर्ग का द्वार हम दिखाएंगे तो जरूर लेकिन तुम्हारे मरने के बाद ही. एक बार मर कर आओ, तो फिर देखना हमारा कमाल. पुश्तों से पूरी ईमानदारी से यह काम कर रहे हैं. पर क्या मजाल जो किसी ने भी एक शिकायत की हो कि हम ने उसे स्वर्ग भेजा लेकिन वह नरक में जा पहुंचा.

‘‘पूरे देश में एक भी केस ऐसा निकाल कर बता दो तो अपनी मूंछें कटवा कर रख दूं. यह लो उस्तरा और यह लो मेरा कार्ड. जरूरत पड़े आ जाना. हम मोक्ष के लिए आतुर जीवों की दिनरात सेवा में हाजिर रहते हैं.’’ बंदे ने अपनी जेब से विजिटिंग कार्ड और उस्तरा निकाला लेकिन मुझे देने के बजाय अपनी जेब के हवाले कर मुझे खैनी से सड़े दांत दिखाते, खिसियानी हंसी हंसता रहा.

हर घाट पर घूमतेघूमते स्वर्ग को भेजी जा रही आत्माओं को ठूंसठूंस कर रिकशा में बैठातेबैठाते देखने के बाद कुशाघाट पर जा पहुंचा. अब तक मेरे मन में पापपुण्य सावन के झूलों की तरह हिलोरें मारने लग गए थे. मुझे लग रहा था कभी पेटभर रोटी न खाने वाला भी पाप तले दब सा रहा है. मैं ने वहीं घाट पर अपने कपड़े उतारे और अवांछित पापों से मुक्ति के लिए गंगा में डुबकी लगाने को हुआ कि कहीं से आवाज आई, लगा, जैसे कोई मेरा नाम ले कर मुझे पुकार रहा हो. इधरउधर देखा, तो कोई नजर नहीं आया. फिर नाक पकड़ हिम्मत कर डुबकी लगाने को हुआ कि लगा, जैसे कोई मेरा नाम ले रहा हो. मैं ने डुबकी लगाने को पकड़ी नाक छोड़ी और कहा, ‘कौन?’

‘मैं, गंगा.’

‘गंगा में गंगा?’ मैं चौंका.

‘हां गंगा,’ पहले तो विश्वास ही न हुआ क्योंकि धर्म के नाम पर, भगवान के नाम पर विश्वास करने लायक अब कुछ बचा ही नहीं है. पर जब गंगा ने दृढ़ता से कहा तो सामने साक्षात् गंगा को पा, लगा मैं सशरीर मोक्ष पा गया.

‘पर तुम यहां पंडोंपापियों के मेले में क्या कर रहे हो?’

‘सोचा, बहती गंगा में मैं भी नहा ही लूं.’

‘तुम्हें तो नहा कर मुक्ति मिल जाएगी पर मेरा क्या होगा? कभी इस बारे में भी सोचा? अब मैं कहां नहाने जाऊं? है कहीं कोई ऐसी नदी?’ गंगा ने उदास हो पूछा तो मुझे काटो तो खून नहीं. कुछ देर तक एकटक मुझे देखने के बाद गंगा ने कहा, ‘नहीं सोचा, तो अब सोचो.’

‘सरकारी स्तर पर तो, हे गंगा, हम सोचसोच कर हार गए. अब किसी को स्वच्छ नहीं होना हो तो हम भी क्या करें?’ मैं ने अपनी जिम्मेद?ारी से बचने की कोशिश की तो वह बोली, ‘अपने स्तर पर भी कुछ सोचो तो बात बने. अपनी मुक्ति की बात तो युगों से करते रहे हो, मेरी मुक्ति की बात करो तो मेरा भी कल्याण हो,’ कह अंतर्ध्यान हुईं तो पीछे मुड़ कर देखा, एक पंडा मेरे कपड़े चुरा, बदहवास दौड़े जा रहा था.

इस एक्ट्रेस से निर्देशक ने मांगी थी न्यूड तस्वीर

टीवी सीरियल ‘ससुराल सिमर का’ और ‘कैसी हैं ये यारियां’ में अपने अभिनय और फैशन सेंस से क्रिस्नन बरेटो दर्शकों का दिल जीत चुकी हैं. क्रिस्नन बरेटो ने हाल ही में एक चौंका देने वाला खुलासा किया है. क्रिस्नन ने कास्टिंग डायरेक्टर पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया है. क्रिस्नन बरेटो का आरोप है कि डायरेक्टर ने उनसे न्यूड तस्वीरों की मांग की थी. क्रिस्नन बरेटो ने व्हाट्सऐप पर हुई बातचीत के स्क्रीनशौट्स भी शेयर किए हैं.

एक रिपोर्ट के अनुसार, क्रिस्नन बरेटो ने कहा कि कंपनी ओमनीकौम मीडिया ग्रुप के नाम से चल रही है. प्रीती सिंह ने पहली बार संपर्क किया था. उसने शूट के लिए संपर्क किया. कई तस्वीरों को शेयर करने के बाद प्रीती ने मुझसे प्रोजेक्ट हेड हर्ष शर्मा से संपर्क करने के लिए कहा और बताया कि वह ओमनीकौम मीडिया ग्रुप की मुंबई शाखा का प्रबंधन कर रहे हैं और वही अंतिम आठ लड़कियों का चयन भी करेंगे. इसके बाद में मुझे एक मैसेज मिला, जिसमें मुझसे 100 प्रतिशत सेक्सी, बोल्ड, हौट और आकर्षक तस्वीरें शेयर करने की बात कही गई.

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अभिनेत्री प्रीती से वह लगातार शूट और हर्ष शर्मा द्वारा फाइनल करने की बात पूछती रही. हालांकि, प्रीती की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिला. इसके बाद क्रिस्नन को मामला कुछ संदिग्ध लगा और बाद में पता चला कि वह फंस गई. किस्नन ने आगे कहा, ”मैं स्ट्रगलर नहीं हूं और काम पाने के लिए ऐसे तरीकों की जरूरत नहीं है.

It helps to have superhuman energy and stamina

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लेकिन इंडस्ट्री में ऐसी कई लड़कियां हैं, जिन्होंने अभी शुरुआत की है या फिर इस इंडस्ट्री में आने का विचार कर रही हैं. प्रीती सिंह और हर्ष शर्मा जैसे नकली लोग किसी भी असली प्रतिभा को इंडस्ट्री में काम दिलाने की बात कर अपमानित कर रहे हैं, क्योंकि न्यूकमर्स के लिए नकली और वास्तविक कास्टिंग निर्देशकों के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है.” क्रिस्नन ने कहा, ”मैं अकेली नहीं हूं जिससे उन्होंने मुझसे संपर्क किया. मेरी सहेली डिंपल को भी सेम मैसेज और औफर दिया गया था.”

औडिशन में करना पड़ा था फोन सेक्स : राधिका

बौलीवुड अभिनेत्री राधिका आप्टे अपने दोस्त और अभिनेता राजकुमार राव के साथ नेहा धूपिया के शो ‘बीएफएफ विद वोग्स’ का हिस्सा बनीं. शो में होस्ट नेहा और एक्टर राजकुमार राव के साथ राधिका ने जमकर मस्ती करने के साथ कई चौंकाने वाले खुलासे भी किये. नेहा ने राजकुमार और राधिका से कई इंटरेस्टिंग सवाल भी किए. इस दौरान राधिका आप्टे ने अपने करियर के बारे में बातचीत की और कई अनकही बातों से पर्दा हटाया.

राधिका से जब शो में सवाल किया गया कि उनके करियर का सबसे वीयर्ड औडिशन कौन-सा है, तो राधिका ने सवाल का जवाब देते हुए कहा कि फिल्म ‘देव-डी’ के लिए उन्हें फोन सेक्स करना पड़ा था, उस समय वह पुणे में रहती थीं. राधिका ने कहा इसके बाद उन्होंने कभी फोन सेक्स नहीं किया.

नेहा ने राधिका से सवाल किया कि आपने बीते सालों में पैसों के लिए कौन-सी विचित्र नौकरी की है? राधिका ने कहा, “मैंने साउथ इंडियन फिल्मों में काम किया है.” राधिका ने एक राज से पर्दा हटाते हुए यह भी बताया कि पैर में गुदगुदी करने के कारण एक तेलुगु फिल्म के सेट पर पहले ही दिन उन्होंने साउथ इंडस्ट्री के एक जाने-माने एक्टर को थप्पड़ मारा था.

बता दें कि जब एकता कपूर से इसी शो में राधिका के बारे में सवाल किया गया था तो एकता ने कहा था कौन राधिका आप्टे? इस पर राधिका आप्टे ने कहा, “मुझे नहीं पता कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा, मैं जब उनसे मिली तो उन्होंने अच्छा बर्ताव किया.” तुषार कपूर को डेट करने के सवाल पर राधिका ने कहा, “मेरे पास तुषार का नंबर नहीं है.”

जब शो की होस्ट नेहा ने राधिका से मोस्ट ओवररेटेड एक्टर के बारे में पूछा, तो राधिका ने कहा, “शायद सुशांत सिंह.” इसके साथ ही नेहा ने राजकुमार राव से सवाल किया, “आपने किस सबसे बड़ी डिवा के साथ काम किया है तो राजकुमार ने कंगना रनौत का नाम लिया.

युवाओं का उपेक्षा वाला स्वभाव

हर युवा अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए प्रयत्नशील रहता है. वे अकसर बहस करते रहते हैं, कार्य पर ध्यान नहीं देते. वे दूसरों के कार्यों, विचारों का विरोध कर सकते हैं. युवा अकसर दिवास्वप्न देखते हैं. अपने विचारों में खोए रहते हैं. युवाओं को अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व व अलग अस्तित्व बनाना होता है. इस के लिए वे बड़ों, मातापिता की नसीहत, सलाह को नजरअंदाज कर सकते हैं.

अनेक युवा अपने परिवारों से ज्यादा दोस्तों के साथ समय व्यतीत करना पसंद करते हैं. लेकिन जब इन के अनादरपूर्ण, उपेक्षापूर्ण और शत्रुतापूर्ण व्यवहार से दूसरे प्रभावित होते हैं तो इन का पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षणिक जीवन प्रभावित होता है. ऐसा व्यवहार उन के हमउम्र वालों से ज्यादा होता है. अगर किसी युवा में यह स्थिति लगातार 6 माह से ज्यादा समय तक रहती है तो यह मानसिक बीमारी मानी जाती है. इस को मनोचिकित्सक अपोजीशनल डिफिऐंट डिसऔर्डर यानी ओडीडी कहते हैं.

असहयोग की भावना

हर परिवार में गलत व्यवहार की सहनक्षमता भिन्नभिन्न होती है. कुछ परिवारों में मामूली सा अनुशासन तोड़ने को बहुत बुरा माना जाता है, जबकि ज्यादातर परिवारों में विरोधी, उपेक्षापूर्ण व्यवहार को अनदेखा कर दिया जाता है. इस तरह के व्यवहार को इन परिवारों में तभी गलत समझा जाता है, जब वह समस्याएं उत्पन्न करता है.

रोगग्रसित युवा दूसरों को सहयोग नहीं करते, दूसरों के साथ उपेक्षा, तिरस्कारपूर्ण और शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते हैं. नतीजतन, उन की दैनिकचर्या, कार्यक्षमता प्रभावित होती है. इन को कभी भी गुस्सा आ जाता है और बड़ों से बेवजह बहस करते हैं, घर के नियममान्यताओं को तोड़ते हैं, जानबूझ कर दूसरों को नाराज करते हैं और गुस्सा दिलाते हैं.

विरोधी व्यवहार के शिकार युवा अपनी गलतियों की तोहमत दूसरों पर लगाते हैं. ये भावुक, संवेदनशील होते हैं, दूसरों की बातों को बुरा मान कर दुर्व्यवहार करते हैं, कभी भी क्रोधित हो सकते हैं. कभीकभी ये हलकाफुलका झगड़ा, मारपीट भी कर सकते हैं. इन की भाषा अश्लील व झगड़ालू होती है.

समस्या की शुरुआत अधिकांश में शिशुकाल में होती है. शिशुकाल यानी बचपन में बिना कारण रोते हैं, आसानी से शांत नहीं होते, अडि़यल होते हैं, अवज्ञाकारी होते हैं. ये खाना खाने, मल त्याग करने आदि कार्यों में मातापिता को परेशान करते हैं.

रोगग्रस्त युवा समय बरबाद करते हैं. वे बेकार में इधरउधर घूमते रहते हैं. यदि ये किसी कार्य को करने के लिए हां भी कर देते हैं तो बाद में उस कार्य के लिए अनभिज्ञता जाहिर करते हैं. ये घर, स्कूल, एवं अन्य स्थानों पर दिक्कत उत्पन्न करते हैं. इन युवाओं और परिवार के सदस्यों के बीच कमरा साफ रखने, नहाने, सही ढंग के कपड़े पहनने, अपनी देखभाल सही ढंग से करने, सही व्यवहार करने जैसी मामूली बातों में कहासुनी, बहस होती है. कभीकभी उन्हें अपनी बेइज्जती महसूस करते ये उत्तेजित हो कर लड़ाई पर पर उतारू हो जाते हैं. ये अपनी भाषा, व्यवहार के कारण पुलिस के चंगुल में फंस सकते हैं.

कारण और परिणाम

संभवतया यह रोग परिवार और बच्चों व युवाओं के आपस चक्रीय व्यवहार के कारण होता है. यदि बच्चा जिद्दी और आसानी से शांत नहीं होता तो मातापिता परेशान होते हैं, सोचने लगते हैं कि कहां गलती हुई. धीरेधीरे ये बच्चे को गलत, गंदा बच्चा समझने लगते हैं, जिस के कारण बच्चा अपने को असहाय और अनचाहा महसूस करने लगता है. नतीजतन, वह ज्यादा उग्र हो सकता है. मातापिता इन के गलत व्यवहार को अलग ढंग से नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं, तो बच्चे सहयोग नहीं करते. जब ये बच्चे इस तरह का व्यवहार करते हैं तो मातापिता की सोच बच्चे के प्रति और ज्यादा नकारात्मक हो जाती है. बच्चों को सही आदतें, व्यवहार सिखाने के लिए मातापिता उन को बुराभला कहते हैं. पर फिर भी इन के व्यवहार में सुधार नहीं होता बल्कि उन का व्यवहार और ज्यादा उग्र हो जाता है.

युवाओं और मातापिता के संबंध जब इस तरह के हो जाते हों, तो अनुशासन नहीं रह पाता और मातापिता गुस्से में आगबबूला हो कर सजा देते हैं या कभीकभी अनदेखा कर मनमानी करने देते हैं.

रोगग्रसित बच्चे स्कूल में अध्यापक, साथियों के साथ भी इस तरह का व्यवहार करते हैं जिस के कारण इन को उन का गुस्सा, तिरस्कार, भर्त्सना सहनी पड़ती है. ये उन से बहस करते हैं, उन पर दोषारोपण करते हैं, झगड़ा भी कर सकते हैं.

भर्त्सना, तिरस्कार इत्यादि के कारण इन में हीनभावना पनप सकती है. ये खुद तथा दूसरों के लिए समस्याएं पैदा करते रहते हैं.

क्या है समाधान

यदि आशंका है कि युवा उपेक्षा रोग यानी ओडीडी ग्रस्त है तो लापरवाही न करें, मनोरोग चिकित्सक से परामर्श लें. वह विश्लेषण कर व्यवहार के मूल कारण जानने का प्रयास करेगा. रोग की पुष्टि होने पर चिकित्सक स्थिति के अनुसार उपचार विधि निर्धारण करता है.

मातापिता को बच्चों के साथ सही व्यवहार का प्रशिक्षण दिया जाता है. उन को बताया जाता है कि इन के व्यवहार पर वे कैसे प्रतिक्रिया करें. साथ ही, वे युवाओं के साथ संपर्क बनाए रखने के कैसे प्रयास करें.

इन युवाओं को मनोचिकित्सक द्वारा सिखाया जाता है कि वे कैसे अपने गुस्से को काबू करें ताकि इन का अवज्ञाकारी व्यवहार बदले. इन को समस्याओं को हल करने के सुझाव दिए जाते हैं.

मातापिता को इन युवाओं के सही व्यवहार की प्रशंसा करनी चाहिए, पुरस्कृत करना चाहिए जबकि गलत व्यवहार करने पर उन के लिए निर्धारित दंड देने का पालन करना चाहिए. पर इन को मारना, गाली देना उचित नहीं होता.

संज्ञान व्यावहारिक चिकित्सा द्वारा इन को खुद पर नियंत्रण करने, सही व्यवहार करने के लाभ बताए जाते हैं. इन को समाज में व्यवहार करने की निपुणता भी सिखाई जाती है.

कभीकभी मनोचिकित्सक इन को अवसाद प्रतिरोधी, तनाव प्रतिरोधी दवाओं के सेवन का भी परामर्श देते हैं.

ओडीडी सामान्य समस्या है. यदि बच्चे या युवा इस से ग्रसित हैं तो ये घर, स्कूल एवं अन्य स्थानों पर परेशानी पैदा कर सकते हैं, इन का विकास प्रभावित होता है. इन का उपचार संभव है. उपचार न करने पर करीब 50 प्रतिशत में यही व्यवहार वयस्क होने पर भी रहता है. इन में से करीब आधे और ज्यादा गंभीर मनोरोग कंडक्ट डिसऔर्डर से ग्रसित हो सकते हैं.

टिकटों का वैज्ञानिक विश्लेषण

गुजरात के नतीजों से उत्साहित कांग्रेस अब वैज्ञानिक विश्लेषण कर उम्मीदवारों को टिकट बांटेगी, यह खबर ही अपनेआप में अवैज्ञानिक लगती है. वजह, टिकट बंटवारे का एक बड़ा आधार जाति हुआ करती है जिस के तहत किसी भी विधानसभा क्षेत्र में खास जाति के वोटों की तादाद देख उसी जाति के मुखिया को टिकट थमा दिया जाता है.

राहुल गांधी की ताजपोशी के बाद कांग्रेस अब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इस टोटके को वैज्ञानिक विश्लेषण नाम देने की बात कर रही है. इस नई कथित वैज्ञानिक पद्धति के आविष्कारक राजस्थान कांगे्रस के आविष्कारक सचिन पायलट हैं जो भाजपा से दो कदम आगे चल कर अभी से टिकट बांटने की बात कर रहे हैं. इस वैज्ञानिक पद्धति और विश्लेषण के विवरण का अभी उन्होंने खुलासा नहीं किया है, लेकिन कांग्रेसी प्रयोगशाला में अब नएनए प्रयोग होने स्वाभाविक हैं क्योंकि सवाल वजूद का जो ठहरा.

प्रेम का तीसरा कोण

दिल्ली के रहने वाले साहिल और नीरज दोस्तों के साथ गरमियों की छुट्टियां बिताने 22 मई, 2017 को मनाली गए थे. उन्हें पता था कि गरमियों में वहां घूमने वालों की तादाद बढ़ जाती है, इसलिए उन्होंने होटल में कमरे पहले ही बुक करवा लिए थे. पहले दिन होटल में आराम करने के बाद अगले दिन सभी पहाड़ों की ओर घूमने निकल गए.

मैदानी इलाके में भीषड़ गरमी होने के बावजूद कुल्लू मनाली का मौसम सुहाना था. दोपहर लगभग 12 बजे तक कुदरती नजारों के फोटो और सेल्फी लेते हुए नीरज ग्रुप के साथ फालीनाला की ओर निकल गया. उसी तरफ पर्वतीय झाड़ियों से आए दुर्गंध के एक झोंके ने उन सब को कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया.

जिधर से दुर्गंध आ रही थी, सभी दोस्त उसी ओर बढ़े. उन्हें वहां झाड़ियों में एक युवक की लाश दिखाई दी. उन्होंने शोर मचाया तो उधर से गुजरने वाले सैलानी उन के पास पहुंच गए. सभी लाश पहचानने की कोशिश करने लगे. उसी बीच किसी ने पुलिस को फोन कर दिया.

सूचना पा कर थाना मनाली पुलिस वहां पहुंच गई. थोड़ी देर बाद डीएसपी पुनीत रघु भी घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक की उम्र 30-35 साल रही होगी. उस के शरीर पर जींस और प्रिंटेड शर्ट थी. शरीर पर कहीं चोट का कोई निशान नजर नहीं आ रहा था, वहां संघर्ष का भी कोई निशान नहीं था. बस, जहां लाश पड़ी थी, उस के पास 3-4 लोगों के पैरों के घिसटने जैसे निशान थे.

मृतक की जेबों की तलाशी लेने पर जेब से कोई ऐसी चीज नहीं मिली, जिस से उस की शिनाख्त हो सकती. उस बीच एसपी पदम चंदर भी आ गए थे. मौकामुआयना करने के बाद उन्होंने मामले की जांच डीएसपी पुनीत रघु को सौंप दी थी. घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. इस के बाद थाने आ कर अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

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हत्यारों का पता लगाने से पहले मृतक की शिनाख्त जरूरी थी. लिहाजा पुलिस यह पता लगाने में जुट गई कि मृतक कौन और कहां का रहने वाला था, पुलिस ने मृतक का फोटो सभी स्थानीय अखबारों में छपवा कर शिनाख्त की अपील की. इस का नतीजा यह निकला कि अगले दिन राजीव सिंह और दुर्गादत्त ने थाने आ कर बताया कि अखबार में लाश का जो फोटो छपा है, वह उन की कंपनी के कुक बिंदु सिंह का लगता है.

थानाप्रभारी ने लाश के फोटो और कपड़े उन दोनों को दिखाए तो उन्होंने कपड़े देखते ही कहा कि ये कपड़े तो बिंदु सिंह के ही हैं. इस के बाद थानाप्रभारी ने उन से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वे एडी हाइड्रो प्रोजैक्ट साइंस-2011 में काम करते हैं. बिंदु सिंह भी उसी प्रोजैक्ट में बतौर कुक काम करता था. वह चक जिले के गांव तोपरा कुठेर का रहने वाला था.

कंपनी की तरफ से उसे प्रोजैक्ट के गेस्टहाउस में रहने के लिए क्वार्टर मिला था. ड्यूटी खत्म होने के बाद वह क्वार्टर पर चला जाता था. लेकिन 22 मई, 2017 की शाम के बाद उसे किसी ने नहीं देखा. रात को वह क्वार्टर पर भी सोने नहीं गया था. प्रोजैक्ट अधिकारियों ने उस की तलाश कराई. वे भी उस की तलाश कर रहे थे.

राजीव और दुर्गादत्त से बातचीत के बाद पुलिस ने कंपनी से बिंदु का पता ले कर उस के घर सूचना भिजवा दी. घर वालों ने भी पोस्टमार्टम हाउस पहुंच कर बिंदु की लाश की शिनाख्त कर दी. पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों को सौंप दी गई. इस के बाद डीएसपी ने एडी हाइड्रो प्रोजैक्ट पहुंच कर मृतक के बारे में पूछताछ की. वहां से पता चला कि उस की किसी से दुश्मनी नहीं थी. हां, वह खानेपीने का शौकीन जरूर था.

सहकर्मियों ने बताया कि बिंदु जब अपने क्वार्टर पर नहीं मिला तो उन्होंने कई बार उस के मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वह बंद मिला. इस से पुलिस को पता चला कि बिंदु के पास मोबाइल फोन था. अगर उस के पास मोबाइल फोन था तो वह कहां गया? थानाप्रभारी एक बार फिर घटनास्थल पर जा पहुंचे. उन्होंने बारीकी से छानबीन की तो उन्हें झाडि़यों के पास से एक मोबाइल फोन मिला. उन्होंने थाने लौट कर फोन का काल लौग देखा तो पता चला कि एक नंबर से बिंदु को लगातार कई फोन किए गए थे.

जांच में वह नंबर मीना नाम की युवती का पाया गया. मीना के बारे में पता लगवाया तो जानकारी मिली कि वह एक विधवा और चरित्रहीन औरत थी. उस के कई लोगों से नाजायज संबंध थे. मृतक के सहकर्मियों ने बताया कि बिंदु का मीना के साथ उठनाबैठना था. पुलिस मीना को थाने ले आई. डीएसपी पुनीत रघु की मौजूदगी में उस से पूछताछ शुरू हुई.

पहले तो मीना ने बिंदु को पहचानने से ही इनकार कर दिया था, लेकिन जब उस पर सख्ती की गई तो उस ने बिंदु की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि यह काम उस ने अपने 2 अन्य प्रेमियों की मदद से किया था.

मीना की निशानदेही पर तिब्बती कालोनी के पास से देविंदर शर्मा और जीतराम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. तीनों को अदालत में पेश कर के एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान तीनों से पूछताछ की तो बिंदु की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह प्रेम त्रिकोण पर आधारित नाजायज संबंधों का पुलिंदा थी—

मीना हिमालय की गोद में बसे क्षेत्र मनाली के गांव शारू की रहने वाली थी. वह सुंदरता की मूरत थी. सैलानियों की सैरगाह होने के कारण पर्यटकों को देख कर बचपन से ही उस के मन में महत्त्वाकांक्षा ने अपने पांव पसारने शुरू कर दिए थे. वह यही सपने देखती थी कि उस के पास भी कोठी, लंबी कार, नौकरचाकर हों.

जब वह जवान हुई तो स्थानीय लोगों के अलावा सैलानी भी उस के सौंदर्य के दीवाने हो उठे थे. वे भी उसे सपने दिखाते थे. वह भी सपने देखती चली गई. वह सपने तो देखती, पर सपनों की ताबीर उसे कहीं दिखाई नहीं देती थी. वह आसमान की ऊंचाइयों को छूना चाहती थी पर उस के परिवार की ऐसी स्थिति नहीं थी कि उस की महत्त्वाकांक्षाएं पूरी होती.

उस के पिता मेहनतमजदूरी कर के किसी तरह घर का खर्च चलाते थे. यहां तक कि मां भी मजदूरी करती थी. एक दिन उसे अपने इस छोटे संसार में प्रेम नाम का युवक मिल गया, जिस ने वादा किया कि वह उस के सपनों को साकार करेगा. मीना ने उस के ऊपर विश्वास कर लिया और अपना घर छोड़ कर उस के साथ चली आई.

प्रेम के घर वालों ने जब मीना को नहीं स्वीकारा तो उस ने अपने परिवार से विद्रोह कर सन 2008 में मीना से मंदिर में शादी कर ली और अपने गांव बंजार में अलग मकान किराए पर ले कर रहने लगा. मीना ने सोचा था कि शायद अब उस के सपनों को ताबीर मिलेगी, पर यह उस की कल्पना थी. शादी के कुछ समय बाद ही प्रेम की अकाल मौत हो गई. उस के बाद मीना मायके लौट आई.

मायके लौट कर कुछ दिन वैधव्य गुजारने के बाद मीना के सपनों और महत्त्वाकांक्षाओं ने फिर अंगड़ाई ली. पर इस बार उस ने अपने सपनों को बेकाबू नहीं होने दिया. जीवन में अब तक के मिले अनुभव से वह यह बात अच्छी तरह समझ गई थी कि वही सपने देखने चाहिए, जो पूरे हो सकें.

उसी दौरान उस की मुलाकात बिंदु सिंह से हुई. बिंदु चंबा के तोपरा कुठेर का रहने वाला था और मनाली स्थित साइंस-2011 के अंतर्गत चलने वाले एडी प्रोजैक्ट में बतौर कुक का काम करता था. उम्र में भले ही वह उस से बड़ा था, पर दिलोजान से उस की सुंदरता और अदाओं पर फिदा था.

दोनों के बीच प्रेमसंबंध स्थापित हो गए. वह मीना से शादी करना चाहता था, पर मीना अब किसी एक की बन कर नहीं रहना चाहती थी. उस ने बिंदु के साथ शादी का वादा तो किया, पर मन से वह इस के लिए तैयार नहीं थी. वह तो बस उस के साथ मौजमस्ती कर अपना समय गुजारना चाहती थी.

उसी बीच मीना की मुलाकात देविंदर शर्मा से हुई. वह पैसे वाला था और मीना का दीवाना था. उस से भी मीना के नाजायज संबंध बन गए. मीना उस के साथ भी ऐश करने लगी. वह मीना को महंगे उपहार खरीद कर देता. 2 युवकों से संबंध होने के बावजूद मीना ने अन्य युवकों से भी संबंध बना लिए. मजे की बात यह थी कि कई युवकों से संबंध होने की भनक उस ने अपने किसी प्रेमी को नहीं लगने दी.

उस का हर प्रेमी यही समझता था कि वह केवल उसी की है. पर मीना की यह चालाकी ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी. एक दिन बिंदु सिंह को जब इस बात का पता चला तो उस के दिल को गहरा सदमा लगा. उस ने मीना से इस बारे में बात की तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम भी किस गुजरे जमाने की बात करते हो बिंदु, आजकल की दुनिया कुछ और है. तुम ने जो सुना है, वह सच है पर हकीकत यह है कि वे सब केवल मेरे दोस्त हैं और कुछ नहीं. मैं उन के साथ घूमतीफिरती हूं, ऐश करती हूं, बस और कुछ नहीं करती.’’

‘‘लेकिन किसी दूसरे युवक से तुम्हारी यह दोस्ती मुझे पसंद नहीं है.’’ बिंदु ने कहा.

‘‘क्यों? मैं तुम्हारी बीवी या गुलाम हूं, जो तुम्हारे इशारों पर नाचूंगी?’’ मीना ने तपाक से कहा.

मीना की बात सुन कर बिंदु अवाक रह गया. लेकिन उस समय उस ने चुप रहने में अपनी भलाई समझी. अगले दिन से ही वह मीना पर शादी के लिए दबाव बनाने लगा. दूसरी ओर देविंदर शर्मा भी कई दिनों से उस पर शादी के लिए दबाव डाल रहा था.

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मीना असमंजस में फंस चुकी थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इन बातों से अपना पीछा कैसे छुड़ाए. कुछ दिनों तक तो वह दोनों को कोई न कोई बहाना बना कर टालती रही. आखिर ऐसा वह कब तक चलता. बिंदु को शक ही नहीं, पूरा विश्वास था कि मीना उसे उल्लू बना रही है.

एक दिन उस ने मीना की बांह पकड़ कर गुस्से में पूछा, ‘‘मीना, सचसच बताओ, तुम मुझ से शादी करोगी या नहीं? अब यह बहानेबाजी मुझे पसंद नहीं.’’

‘‘मैं अभी शादी नहीं करना चाहती.’’ मीना ने दोटूक कहा.

‘‘अभी करना नहीं चाहती या मुझ से करनी ही नहीं है?’’ बिंदु ने पूछा.

‘‘तुम जो भी समझो.’’ मीना ने बिंदु को टका सा जवाब दे कर चुप कराना चाहा, पर बिंदु भी उस दिन शायद कुछ और ही तय कर के आया था.

शादी की तारीख पक्की करने को ले कर दोनों में तीखी झड़प हो गई. अंत में बिंदु ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, तुम जितना चाहो, झूठ बोलो और बहाने बनाओ, लेकिन मैं सच कह रहा हूं कि अगर एक सप्ताह में तुम ने मेरे साथ शादी नहीं की तो मैं तुम्हारी सभी वीडियो पूरे मनाली को दिखा दूंगा, तब पता चलेगा कि तुम कितनी सतीसावित्री हो.’’

बिंदु के मुंह से धमकी भरे ये शब्द सुन कर मीना भीतर तक कांप उठी. यह बात 15-16 मई के आसपास की है. अब मीना को बिंदु से डर लगने लगा था, क्योंकि उस ने उसे खूब महंगे गिफ्ट खरीदवाए थे. मीना किसी एक खूंटे से बंध कर नहीं रहना चाहती थी. वह हर हालत में बिंदु से छुटकारा पाना चाहती थी.

इस मुसीबत से पीछा छुड़ाने का उसे एक ही उपाय दिखाई दिया कि उसे रास्ते से हटवा दिया जाए. उसी शाम मीना ने देविंदर शर्मा से मिल कर बताया कि बिंदु उन के प्यार का दुश्मन बन गया है. वह कहता है कि अगर उस ने उस से शादी नहीं की तो वह उस की हत्या कर देगा.

यह सुन कर देविंदर शर्मा तैश में आ गया. उस ने गुस्से में कहा, ‘‘उस के बाप का राज है. मेरे पास आ कर तो देखे. तुम ने उसे क्या जवाब दिया?’’

देविंदर के इस सवाल पर मीना ने अपना तीर चलाते हुए कहा, ‘‘मैं क्या कहती, मैं तुम्हारी हत्या होते थोड़े ही देख सकती हूं. इसलिए मैं ने कह दिया कि मैं उस से शादी करने को तैयार हूं, पर वह देविंदर को कुछ न कहे.’’

‘‘तुम पागल तो नहीं हो गई हो, जो बेवजह उस की गीदड़भभकी से डर गई. मैं नहीं डरने वाला उस से और तुम्हें उस के साथ शादी करने की कोई जरूरत नहीं है…समझी.’’ देविंदर ने कहा.

‘‘तो फिर मैं क्या करूं? जब तक बिंदु जिंदा है, वह कभी मेरी शादी तुम्हारे साथ नहीं होने देगा.’’ मीना ने आंसू टपकाते हुए कहा.

मीना को रोता देख कर देविंदर का खून खौल उठा. उस ने कहा, ‘‘उस की ऐसी की तैसी. इस के पहले कि वह मुझे खत्म करे, मैं ही उस का काम तमाम कर यह झंझट खत्म कर दूंगा. पर पहले तुम यह बताओ कि तुम मुझ से शादी करोगी या नहीं?’’

‘‘मैं तो हमेशा से ही तुम्हारी हूं देविंदर.’’

‘‘तो फिर ठीक है.’’ देविंदर ने कहा.

बस उसी दिन से बिंदु की हत्या का तानाबाना बुना जाने लगा. इस काम के लिए देविंदर ने अपने एक दोस्त जीतराम को कुछ पैसों का लालच दे कर तैयार कर लिया. जीतराम मीना को भी जानता था. पैसों के अलावा उसे मीना के शरीर का भी लालच था.

अपनी योजना के अनुसार, 22 मई, 2017 की शाम 7 बजे मीना ने बिंदु को फोन कर के शादी की बात करने के बहाने फालीनाला के पास बुला लिया. देविंदर और उस का दोस्त जीतराम वहां एक झाड़ी की ओट में पहले ही आ कर छिप कर बैठ गए थे.

बिंदु जैसे ही फालीनाला पहुंचा, वहां पहले से मौजूद मीना उसे अपनी बातों में उलझा कर उस जगह ले गई, जहां देविंदर और जीतराम छिपे बैठे थे. इस बीच शादी की बात को ले कर मीना बिंदु से उलझने लगी. बिंदु का सारा ध्यान मीना की बातों पर था. उसी समय देविंदर और जीतराम ने उसे पीछे से दबोच लिया. बिंदु ने खुद को उन के चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की, पर असफल रहा.

उसी बीच मीना ने अपने गले से दुपट्टा निकाल कर बिंदु के गले में डाल कर कहा, ‘‘लो देविंदर, कर दो इस की शादी. यह शादी के लिए मरा जा रहा है.’’

तभी सब ने पोजीशन बदल कर अपनाअपना मोर्चा संभाल लिया. मीना ने आगे से बिंदु के हाथ पकड़ लिए. जीतराम ने पीछे से पकड़ लिया तो देविंदर ने बिंदु के गले में पड़ा मीना का दुपट्टा पूरी ताकत से कस दिया. थोड़ी देर में उस की सांसें रुक गईं. इस के बाद वे बिंदु की लाश को वहीं छोड़ कर चले गए.

रिमांड अवधि खत्म होने पर पुलिस ने तीनों को पुन: मनाली की सक्षम अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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