भगवा विजय पताका पर पराजय के पैबंद

विकास की खोखली हवा के सहारे भाजपा का विजय रथ ज्योंज्यों चारों ओर आगे बढता जा रहा है, पीछेपीछे पराजय की धूल उस की जीत को धुंधला रही है. यह स्थिति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के अजेय रहने के गर्व को तोड़ रही है.

2014 में मोदी जिस विकास की बात कर राज्य दर राज्य जीतते आ रहे हैं, तब से हो रहे उपचुनावों में मिल रही लगातार हार उस विकास की पोल खोलती आ रही है. हाल ही उत्तरप्रदेश और बिहार में हुए 3 लोकसभा और 2 विधानसभा के उपचुनावों में भाजपा को करारी हार से उस के अंध समर्थक हैरान हैं. उत्तरप्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट मोदी और योगी के विकास की गंगा में बह गईं.

करीब एक साल पहले हिंदुत्व के कट्टर चेहरे योगी आदित्यनाथ को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने से खाली हुई गोरखपुर और उपमुख्यमंत्री बने केशवप्रसाद मौर्य की फूलपुर लोकसभा सीट उपचुनाव में मिली शिकस्त ने भाजपा के बड़बोले दिग्गजों की हेकड़ी निकाल दी है.

गोरखपुर सीट 3 दशक से हिंदुत्व के गोरखनाथ मठ की बपौती रही है पर इस बार समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिल कर पार्टी के गढ को ढहा दिया. भाजपा के उपेंद्र शुक्ल को सपा के प्रवीण निषाद ने हरा दिया. 1989 से इस लोकसभा सीट पर गोरखनाथ मठ का दबदबा था. योगी आदित्य नाथ 1998 से लगातार 5 चुनावों में यहां से जीतते आ रहे थे. इस से पहले यह सीट उन के गुरु महंत अवैधनाथ केपास थी.

उधर फूलपुर से सपा के नागेंद्र पटेल ने भाजपा के कौशलेंद्र सिंह पटेल को 59 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज की. गोरखपुर और फूलपुर क्षेत्र में दलित और पिछड़े मतदाताओं की तादाद अधिक है. गोरखपुर में सब से अधिक निषाद वोटर करीब 3.6 लाख हैं. इस के अलावा करीब 2-2 लाख यादव और दलित और 1.5 लाख ब्राह्मण मतदाता हैं. इस तरह सीधी लड़ाई में निषाद, यादव, दलित और मुस्लिम वोटरों ने मिल कर भाजपा को ले बैठे.

भाजपा ने उत्तरप्रदेश और बिहार में पूरी ताकत झोंक दी थी. पिछले एक महीने से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उन की कैबिनेट के दिग्गजों ने यहां डेरा डाल रखा था पर 23 साल पुरानी दुश्मनी भुला कर सपाबसपा एक साथ आए तो भाजपा के लिए जीत मुश्किल हो गई. कांग्रेस ने यहां अकेले चुनाव लड़ा था. बिहार के अररिया लोकसभा सीट पर जेल में बंद लालू प्रसाद यादव के राजद की जीत से नीतीश कुमार और भाजपा को करारा तमाचा पड़ा है. कुछ समय पहले ही नीतीश कुमार ने लालू का साथ छोड़ मोदी जाप करते हुए भाजपा के हिंदुत्व रथ पर सवार हो गए थे. यहां राजद का कांग्रेस से समर्थन हासिल था.

जहानाबाद विधानसभा से भी राजद के सुदय यादव जीते जबकि भभुआ विधानसभा से भाजपा की रिंकी पांडेय को जीत मिली यानी भाजपा मात्र एक विधानसभा सीट हासिल कर पाई. उत्तरप्रदेश में भाजपा नेता सपाबसपा गठबंधन को बेमेल बताते रहे. इन चुनाव नतीजों का संकेत है कि सपा और बसपा का साथ दोनों के समर्थक मतदाताओं को रास आया है. दलित और पिछड़े मतदाता मिल गए. दोनों पार्टियों का तालमेल भाजपा पर भारी पड़ा. अब सपाबसपा का गठजोड़ 2019 में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है.

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इन उपचुनावों से पहले राजस्थान की अजमेर और अलवर 2 लोकसभा और एक विधानसभा सीट मांडलगढ भाजपा को गंवानी पड़ी थीं. इस से पहले मध्यप्रदेश की रतलाम सीट शिवराज सिंह के अति हिंदुत्व प्रेम की बलि चढ गई. पंजाब में गुरदासपुर लोकसभा सीट से हाथ धोना पड़ा. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 11 राज्यों में 19 लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में भाजपा अधिकतर हारती गई. भाजपा सिर्फ वडोदरा और शहडोल सीट ही जीत पाई.

हिंदुत्व के नाम पर तमाम जातियों को एक करने का फार्मूला अब उत्तरप्रदेश में सफल नहीं रहा क्योंकि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद हिंदुत्व के समर्थकों के कई जगह उग्र और हिंसक तेवर देखे गए. योगी की हिंदू युवा वाहिनी में बड़ी संख्या में संघ से जुड़े ब्राह्मण, बनिए और राजपूत युवा शामिल हुए. इन का उपद्रव जगहजगह देखा गया. कासगंज में इस कट्टर हिंदू संगठन के युवाओं द्वारा मुस्लिम आबादी में जा कर उन्हें चुनौती देने, सहारनपुर में महाराणा प्रताप के जुलूस के दौरान दलित बस्ती में दलितों पर फब्तियां कसने, दलित युवाओं के मूंछ रखने, महाराष्ट्र में दलित युवकों द्वारा अंबेडकर पर बने गीत सुनने पर उन से मारपीट जैसे घटनाओं ने मोदीयोगी के प्रति लोगों में गुस्से की लहर फैलने लगी. केंद्र में चाहे मोदी हों, राज्यों में योगी, चौहान, रूपाणी, फड़नवीस या वसुंधरा हों, निचलों के लिए गुजरबसर करना आसान नहीं रहा. यह तबका भाजपा के प्रति आक्रोशित दिखने लगा. गुजरात विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को जीत के लिए नाके चने चबाने पड़े.

दरअसल भाजपा केवल वही काम कर रही है जो हिंदुत्व को पालनेपोसने वाला हो. केंद्र और राज्यों में धार्मिक नीतियां लागू की जा रही हैं जिस से धर्म का व्यापार फैलेफूले. वर्णव्यवस्था में निचला वर्ग अभी भी विकास में पीछे हैं. गैर बराबरी उस का पीछा नहीं छोड़ रही. असल में जब तक देश में नीतिनिर्धारक दलितपिछड़े नहीं होंगे, देश तरक्की नहीं कर पाएगा. शासनप्रशासन में फैसले करने का अधिकार 2 प्रतिशत ऊपरी पदों पर बैठे लोगों के हाथ में है. निचले तबकों के लिए जो नीतियां बनती हैं उसे ऊपरी तबके वाले अपने फायदे के लिए बनाते हैं जिस से उन लोगों का कोई कल्याण नहीं हो पाता.

निचला वर्ग उपेक्षा और अपमान सहता रहता है. इस धारणा प्रचारित किया जाता है कि दलित, अति पिछड़े में काबिलियत नहीं होती इसलिए उन्हें उच्च पदों पर न लगाया जाए. उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद प्रशासन में तमाम बड़े पदों पर पीएमओ में बैठे प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नगेंद्र मिश्रा ने ऐसे उच्च अधिकारी छांट कर भेजे जिन को पुराने हिंदू ग्रंथों के अनुसार पढनेलिखने का अधिकार दिया गया था. लखनऊ सचिवालय में तमाम मंत्रालयों में योजनाएं, नीतियां बनाने और फैसले लेने वाले उच्च, श्रेष्ठि वर्ग के अधिकारी पदस्थ हैं.

हमारे नेताओं के दिमाग में यह गलत धारणा बैठा रखी है कि निचली जातियों के अधिकारी ही देश का प्रशासन चलाने के काबिल हैं. इस धारणा से मुक्ति पा कर निचली जातियों के योग्य लोगों को नीतिनिर्धारण में जब तक नहीं लगाया जाएगा, विकास में समानता नहीं आ पाएगी.

लड़कियों का यौन शोषण कब तक

यौन हिंसा की घटनाएं आजकल कुछ ज्यादा ही घट रही हैं. दुराचार, शायद अनियंत्रित कामवासना को संतुष्ट करने का एक जुगाड़ है.

असल में बलात्कार या डेटरेप से पहले बलात्कारी के दिमाग में नशे की तरह से फैला हुआ संक्रमण होता है. लेकिन उस संक्रमण का शिकार बलात्कारी नहीं, पीडि़ता होती है. सहना पीडि़ता को ही पड़ता है. पीडि़ता को ही दोषी माना जाता है. समाज व खानदान के नाम पर उसे धब्बा भी कहा जाता है. इतना ही नहीं, उसे खानदान के नाम पर प्रताडि़त भी किया जाता है.

शादी का झांसा दे कर किसी लड़की के साथ शारीरिक रिश्ते बनाना और बाद में शादी से मना करना, आजकल आम बात है.  क्या यह बलात्कार के दायरे में आता है, वह भी तब, जब लड़के का लड़की से शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा न हो? हम इसे शादी की आड़ में यौन शोषण कह सक सकते हैं.

अधिकतर लड़के शादी का झांसा दे कर लड़कियों से शारीरिक रिश्ते बनाते हैं और तब तक कार्यक्रम चलता रहता है जब तक लड़की गर्भवती नहीं हो जाती. फिर आसान सा रास्ता सुझाया जाता है गर्भपात का. कुछ मामलों में गर्भपात कराना मुश्किल हो जाता है और आखिरकार  मामला परिवार व पड़ोसियों की नजर में आ ही आता है.

सहमति का संशय

अधिकतर मामलों में ऐसे दोषियों के खिलाफ मामले बहुत कम दर्ज होते हैं. कारण, समाज का डर होता है. अगर मामला दर्ज हो भी, तो होता कुछ नहीं. लगभग रोज ही ऐसी कई घटनाएं घट रही हैं. कई बार सवाल उठाए गए हैं कि किसी लड़की से शादी का झूठा वादा कर के शारीरिक रिश्ते बनाना सहमति है या नहीं? यदि वह बलात्कार नहीं है तो धोखेबाजी है या नहीं?

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ऐसे ही एक केस में कलकत्ता उच्च न्यायालय का मानना था, ’’अगर कोई बालिग लड़की शादी के वादे के आधार पर शारीरिक रिश्ते बनाने को राजी होती है और तब तक इस गतिविधि में लिप्त रहती है जब तक कि वह गर्भवती नहीं हो जाती, तो यह उस की ओर से स्वच्छंद संभोग के दायरे में आएगा. ऐसे में, तथ्यों को गलत इरादे से प्रेक्षित नहीं किया जा सकता. इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा-90 के तहत अदालत द्वारा कुछ नहीं किया जा सकता. जब तक यह आश्वासन न मिले कि रिश्ते बनाने के दौरान आरोपी का इरादा आरंभ से ही शादी करने का नहीं था.‘‘

वहीं दूसरी ओर, बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बी बी वग्यानी ने एक सुनवाई के दौरान कहा, ’’शादी करने का झूठा वादा महज धोखाधड़ी है. भारतीय दंड संहिता की धारा-415 में धोखाधड़ी के अपराध को परिभाषित किया गया है. बिना किसी संदेह के अपराधी का अपराध दंडनीय है, क्योंकि पीडि़ता को जानबूझ कर शादी करने के वादे के झांसे में रख कर, शारीरिक रिश्ते बनाने के लिए उकसाया गया था. आरोपी ने लड़की से शादी करने का वादा किया और इसी प्रभाव में लड़की ने उस के साथ शारीरिक रिश्ते भी बना लिए. लड़की भी उस से शादी करने को उत्सुक थी, लेकिन लड़के ने जो वादा किया, वह झूठा था. यह विवाह करने के वादे को ले कर वादाखिलाफी का मामला प्रतीत होता है, न कि विवाह के झूठे वादे का मामला.‘‘

असल में यह भावनाओं और नाजुक पलों में जनून से जुडे़ मामले होते हैं. जब भी लड़कालड़की मिलते हैं, एकदूसरे को बहुत प्यार करते हैं. लड़की भी उस लड़के को काफी छूट देती है, जिस से वह बेहद प्यार करती है. लड़के के बुलाने पर चोरीछिपे लड़की सुनसान जगह पर चुपचाप मिलती भी है और संबंध भी बनाती है.

जब दो जवान लोग हों, तो आमतौर पर यह होता ही है कि वे सभी अहम बातें भुला कर जनून में आ कर प्यार कर बैठें, खास कर तब जब वे कमजोर क्षणों में अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पाते. ऐसे में, दोनों के बीच शारीरिक रिश्ते कायम हो ही जाते हैं. लड़की स्वेच्छा से लड़के के साथ रिश्ते कायम करती है, वह उस से बेहद प्यार करती, इसलिए नहीं कि उस लड़के ने उस से शादी करने का वादा किया था, बल्कि इसलिए कि लड़की ऐसा चाहती भी थी.

गलतफहमी या धोखा

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में लड़की की उम्र, उस की शिक्षा और उस के सामाजिक स्तर व लड़के के मामले में भी इन्हीं सब पर गौर किया जाना जरूरी है. वैसे तो लड़की स्वयं इस कृत्य में बराबर की भागीदार है पर वह समझ नहीं पा रही हो कि किन हालात के चलते वह ऐसे कृत्य में फंस गई और ऐसे में, लड़की के हामी भरने की कोई अहमियत नहीं है. उस से गलतफहमी में हामी भरवाना धोखा है. इसे लड़की की मंजूरी नहीं माना जा सकता.

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी के जैन ने 1 फरवरी, 2010 को आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए और ऐसे आपराधिक कृत्य की निंदा करते हुए कहा, ’’अदालत ऐसे मौकापरस्त लोगों को लड़की की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का लाइसैंस नहीं दे सकती. लड़कियों का शोषण करने वाले ऐसे लोगों को बेखौफ बच निकलना कानून का मकसद कभी नहीं हो सकता, जो इस घिनौने कृत्य के बाद ताउम्र जेल की सजा का हकदार है.‘‘

बंबई हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बी यू वाहाने ने (1991) के एक मामले में सामाजिक अनुभव के आधार पर स्पष्ट किया कि वयस्क लड़की से चालबाजी से उस की सहमति ले ली जाए वह भी तब जब वह बेसहारा और सैक्स को ले कर असंतुष्ट हो, उसे पैसे की जरूरत हो, बहानों से उसे प्रभावित किया जाए या हामी भरने के हालात बनाए जाएं आदि में कानूनी राय और फैसले सीधेसीधे बंटे हुए हैं, सहमति और तथ्यों के उलझाव में उलझे हुए हैं, क्योंकि कानून पूरी तरह पारदर्शी नहीं है और फैसले हर मामले के तथ्यों व हालात के आधार पर होते हैं.

हालांकि न्यायिक राय को ले कर आमराय यही है कि ऐसे मामलों में सब से कठिन काम यह साबित करना होता है कि लड़की का शारीरिक शोषण हुआ है. औरत के खिलाफ अपराध संबंधी किंतुपरंतु को ले कर जब तक कानून में संशोधन नहीं होता, न्याय से जुड़े ऐसे कानूनी पेंच यों ही कायम रहेंगे.

उदाहरण के लिए बाराबंकी में 9वीं क्लास की नाबालिक लड़की से उस के ही सहपाठी द्वारा एकांत पा कर बलात्कार किया गया. लेकिन पुलिस ने सिर्फ छेड़छाड़ का मामला दर्ज किया. मुरादाबाद और झांसी में भी कुछ ऐसा ही हुआ. सिर्फ फर्क इतना है कि संबंध सहमति से बने थे पर बाद में एक लड़की एमएमएस का शिकार हुई तो दूसरी गैंगरेप का और उस ने खुद को आग लगा ली. कानपुर और लखनऊ में भी बलात्कार की शिकार 2 नाबालिक लड़कियां मौत की नींद सो गईं.

सिर्फ सवाल जवाब नहीं

एक शोध के अनुसार दुनियाभर में हर 3 में से 1 महिला को शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होना पड़ता है. यही नहीं, दुनियाभर में 30 प्रतिशत महिलाएं नजदीकी साथी द्वारा हिंसा या दुर्व्यवहार की शिकार होती हैं. एक और रिपोर्ट के मुताबिक, अपने साथी द्वारा शारीरिक या यौन दुर्व्यवहार की शिकार होने वाली 42 प्रतिशत महिलाएं इस से चोटिल होती हैं. हजारों ऐसे मुकदमे, आंकड़े, तर्ककुतर्क, जालजंजाल और सुलगते सवाल समाज के सामने आज भी मुंह बाए खड़े हैं.

अन्याय, शोषण और हिंसा की शिकार स्त्रियों के लिए घरपरिवार की दहलीज से अदालत के दरवाजे तक बहुत लंबीचौड़ी खाई है, जिसे पार कर पाना दुसाध्य काम है. अदालत के बाहर अंधेरे में खड़ी आधी दुनिया के साथ न्याय का फैसला कब तक सुरक्षित रहेगा या रखा जाएगा? कब, कौन, कहां, कैसे सुनेगा इन के दर्द की दलील और न्याय की अपील, ये सवाल समाज से जवाब मांग रहे हैं.

युवा तोड़ें धार्मिक जकड़न

किशोरावस्था तक जो त्योहार मन को खूब भाते हैं वे युवावस्था आतेआते क्यों मन को कचोटने लगते हैं, इस बात का हमारे तीजत्योहार प्रधान देश में इस सवाल से गहरा संबंध है कि त्योहार कैसे मनाएं. 15-16 वर्ष की उम्र तक के किशोरों के तर्कों को हवा में उड़ा दिया जाता है लेकिन युवाओं के तर्कों का सहज जवाब आज तक कोई धर्म या उस का जानकार नहीं दे पाया.

यह दीगर बात है कि उन्हें गोलमोल वैज्ञानिक किस्म के जवाब दे कर संतुष्ट करने और धर्म से सहमत करने की कोशिशें की जाती हैं जिन के अपनेअलग माने होते हैं.

त्योहारों का संबंध समाज से ज्यादा है या धर्म से, इस सवाल के जवाब में भोपाल के एक प्राईवेट इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ रहे द्वितीय वर्ष के छात्र शाश्वत मिश्रा कहते हैं कि सिखाया तो यही गया है कि त्योहार किसी न किसी धार्मिक कारण के चलते मनाए जाते हैं जिन में आजादी कम बंदिशें ज्यादा होती हैं. बकौल शाश्वत, ‘‘भोपाल में पढ़ने आने के पहले तक घर में उसे नवरात्रि के दिनों में व्रत रखने को बाध्य किया जाता था लेकिन होस्टल में आ कर यह नियम टूट गया. इस से कोई खास फर्क नहीं पड़ा. उलटे, एक दबाव से मुक्ति मिली.’’

साफ यह हुआ कि भारतीय समाज बहुत ही वर्जनाओं में जीता है. त्योहारों के दिनों में तो खासतौर से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कोई माने नहीं रह जाते.

शाश्वत के ही एक सहपाठी अनिमेष की राय उस से उलट है कि धर्म के दिशानिर्देशों को मानने में हर्ज क्या है. अनिमेष की नजर में इस बात को मुद्दा बनाया ही नहीं जाना चाहिए कि धर्म क्या कहता है. हमें त्योहारों के दूसरे पहलुओं को देखना चाहिए, मसलन सब से बड़ा त्योहार दीवाली एक सामाजिक उल्लास का प्रतीक है. इस दिन और रात हम एक विशिष्ट मानसिकता में रहते हैं. साफसफाई पर जोर दिया जाता है. घरों में नएनए सामान खरीदे जाते हैं. नए कपड़े पहने जाते हैं. पकवान बनते हैं. आतिशबाजी चलाई जाती है. ऐसे में धर्म का रोना ले कर बैठ जाना फुजूल का पूर्वाग्रह नहीं, तो क्या है.

विरोधाभासी जकड़न

5वीं क्लास में रटाया जाने वाला दीवाली का निबंध बांच रहा अनिमेष और उस निबंध को धार्मिक जकड़न बता रहा शाश्वत दरअसल 2 अलगअलग विचारधाराओं का प्रतिनिधत्व करते नजर आते हैं. पहली समझौतावादी है जबकि दूसरी तर्क आधारित है.

हैरत की बात यह है कि इन दोनों ने ही बीती 5 सितंबर को गणेश विसर्जन के दौरान होस्टल में साथ बैठ कर शराब पी थी और दोनों को ही इस में किसी गणेश या धर्म का खौफ नहीं लगा था. इन की नजर में यह झूमनेनाचने गाने का इवैंट था ठीक वैसे ही जैसा हर साल एक जनवरी को होता है.

फिर एक वर्ग क्यों तर्क को पूर्वाग्रह करार देते धर्म और उस की बंदिशों पर बहस या चर्चा करने से बचना चाहता है. इस सवाल का मनोवैज्ञानिक जवाब तो यही नजर और समझ आता है कि धार्मिक सिद्धांतों और निर्देशों का पालन करना बचपन से ही थोप दिया जाता है.

ऐसे में इन की सफाई समझने के बाद भी अधिकांश युवा धर्म के खोखलेपन को इसलिए स्वीकार लेते हैं और जिंदगीभर ढोते भी रहते हैं कि कौन फालतू के विवादों में फंसे, सदियों और पीढि़यों से जो होता आ रहा है उसे करते रहने में हमारा क्या बिगड़ता है.

बिगड़ता यह है

हर युवा का अपना एक दार्शनिक दृष्टिकोण भी होता है जो अपनी जिज्ञासाओं का समाधान चाहता है, लेकिन वह खोखली बातों से बहलने को तैयार नहीं होता, मसलन बहुत साधारण और प्रचलित यह धारणा कि दीवाली पर विधिविधान से पूजापाठ करने से लक्ष्मी आती है.

लक्ष्मी यानी पैसा अगर एक खास दिन पूजापाठ करने से आता होता तो मेहनत की जरूरत क्या, इस बात को अब अधिकांश युवा सोचने लगे हैं.

बीकौम की छात्रा अदिति की मानें तो अगर ऐसा है तो मैं रोज लक्ष्मीपूजा करने को तैयार हूं, लेकिन लक्ष्मी या कोई दूसरा देवीदेवता इस बात की गारंटी तो ले.

बीकौम करने के साथसाथ बैंक की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही अदिति का मानना है कि जो हासिल होगा वह लगन और मेहनत से होगा. मेहनत तो हम खूब करते हैं और उस से ही कैरियर बनता है पर हमारी लगन को धर्म का नाम प्रेरणा या उपलब्धि करार दे दिया जाता है.

यानी कुछ अच्छा हुआ तो व्रत, उपवास और पूजापाठ की वजह से हुआ और मनमाफिक नहीं हुआ तो किस्मत खराब थी या मेहनत में कोई कमी थी. जिस की जिम्मेदारी लेने से कोई तैयार नहीं. युवा पीढ़ी कभी भाग्यवादी नहीं रही, इसलिए वह त्योहारों की धार्मिक जकड़न से मुक्ति चाहती है जो उसे आसानी से नहीं मिल रही. ऐसे में वह या तो अनिमेष की तरह समझौता कर लेती है यानी धार्मिक जकड़न के आगे हथियार डालती है या फिर शाश्वत की तरह अपने सवाल व तेवर कायम रखती है.

मिलता यह है

सवालों और तर्कों का गहरा संबंध युवाओं के आत्मविश्वास से है. जो युवा जवाब न मिलने पर धार्मिक जकड़नों को नकारने लगे हैं उन में एक अलग तरह का आत्मविश्वास होता है क्योंकि वे दिमागीतौर पर किसी रूढि़ या चमत्कार के गुलाम नहीं रहते.

कम मात्रा में ही सही ये वे युवा हैं तो संतुष्ट रहते हैं, किसी संदेह में नहीं जीते. लेकिन जिन युवाओं ने असमंजस पाल रखा है वे कैरियर में सफल भले ही हो जाएं पर संतुष्ट नहीं रह पाते. इसलिए उन में आत्मविश्वास बेहद कम होता है.

हर दौर में युवा यह सवाल पितृपक्ष के दिनों में जरूर करते हैं कि जब ब्राह्मण के जरिए खायापिया पूर्वजों तक पहुंच जाता है तो वे मोबाइल फोन क्यों नहीं ले लेते जिस से पूर्वजों से बातचीत ही हो जाए. सोशल मीडिया पर यह सवाल या दलील इस साल भी खूब वायरल हुई थी. लेकिन इस पर बहस नहीं हुई. यह बेहद निराशाजनक बात है. वजह, युवा फेसबुक और व्हाट्सऐप पर धर्म व जाति के आधार पर तो खूब एकदूसरे पर कीचड़ उछालते हैं लेकिन एक मामूली सवाल का जवाब नहीं दे पाते.

यह युवावर्ग कहीं जवाब मांगने की जिद पर अड़ न जाए, इसलिए हर साल धार्मिक जकड़न शिथिल कर दी जाती है, जिस का मकसद या साजिश युवाओं को धर्म के मकड़जाल में उलझाए रखना होता है.

एक नई जकड़न

मिसाल झांकियों की लें तो अब युवा शराब पी कर विसर्जन समारोह में नाचगा सकते हैं. इस से अब धर्म भ्रष्ट नहीं होता. जींसटौप पहने युवतियों को भी नाचनेगाने की छूट मिल गई है और अब वे धार्मिकतौर पर अछूत नहीं रही हैं. गणेश और दुर्गा के साथ सैल्फी खींचते युवा अगर यह समझते हैं कि वे धार्मिक जकड़न से अपनी कोशिशों के चलते इस तरह मुक्त हो रहे हैं तो यह उन की गलतफहमी ही है.

दरअसल, उन्हें एक नई जकड़न में कसा जा रहा है जिस में धर्म की रस्सी थोड़ी मुलायम है. बंद कोठरी से निकाल कर किसी कैदी को हवा और रोशनी देने वाली खिड़की वाली कोठी में रख दिया जाए तो उसे थोड़ी राहत तो मिलेगी पर रिहाई नहीं. कुंडी ज्यों की त्यों ही बंद रहती है.

युवाओं को इस जकड़न को त्योहारों के मद्देनजर समझना होगा कि मिल रही रियायतें रिहाई नहीं हैं, एक नए किस्म की जकड़न हैं. जिन की तुलना उस आलीशान मौल से की जा सकती है जिस में चमकदमक है और डिस्काउंट भी लेकिन घाटा उठाने को दुकानदार तैयार नहीं. यह लुभाने का नया तरीका है जिस से प्रोडक्ट इस तरह बेचा जाए कि खरीदार को लगे कि उस का फायदा हुआ है.

त्योहार अगर सामाजिक भाईचारे व उल्लास के प्रतीक होते तो उन में पूजापाठ व्रत, उपवास और दर्जनों बंदिशों की जरूरत नहीं पड़ती. अगर त्योहार आज भी कुछ छूट के साथ ही सही, धर्म के मुताबिक मनाया जा रहा है तो यह एक साजिश है जिस में युवाओं की मरजी की कोई अहमियत नहीं रह जाती.

युवा कब तक इस धार्मिक जकड़न से नजात पाएंगे इस सवाल का जवाब कभी नहीं मिला. हां, व्यक्तिगत स्तर पर हिम्मत करते वे खुद को मुक्त कर पाए तो जरूर दूसरे भी उन के पीछे चलेंगे और त्योहारों का सही लुत्फ उठा पाएंगे. किसी शाश्वत और अनिमेष का गणेश विसर्जन पर शराब पीना कोई चुनौती, बुद्धिमानी या बगावत की बात नहीं थी क्योंकि वे दूसरे तरह से अपनी सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं और इस से धर्म को एतराज नहीं, तो यह जकड़न का नया संस्करण नहीं तो और क्या है?

नशे की आजादी, युवाओं की बरबादी

शराब पीना एक बीमारी है. शराब पीने के लिए लोग आप को उकसाएंगे चाहे वे आप के दोस्त ही क्यों न हों. केरल का रहने वाला जैकब ऐसा ही एक व्यक्ति है. उस ने 9 वर्ष की छोटी सी उम्र से ही शराब पीनी शुरू कर दी थी. उस के पिता भी शराबी थे. पिताजी के पीने के बाद जब गिलास में कुछ शराब बच जाती थी, तो उसे वह गटक लेता था. इसी वजह से वह भी शराबी बन गया.

जब वह स्कूल में पढ़ता था तब सस्ती शराब पीया करता था. उस ने अपना बचपन शराब के नशे में ही बिताया और कालेज की पढ़ाई भी छोड़ दी. शराब की बुरी लत के कारण उसे अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा. 2 बार उस ने अपने हाथ की नसें काट कर आत्महत्या करने की भी कोशिश की, लेकिन बच गया. शराबी होने के कारण उस के सगेसंबंधी, रिश्तेनाते सब छूट गए. उस ने समाज व परिवार में अपना सम्मान खो दिया. यह कहानी उस राज्य केरल की है जहां साक्षरता सब से ज्यादा है. सोचिए, अन्य राज्यों का क्या हाल होगा.

शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जो हमें अच्छा इंसान बनाता है. यह बात उस लड़की पर सटीक बैठती है जो अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए गांव में ही शराब की बोतलों में पैट्रोल बेचती है. उसे यह परवा नहीं कि लोग क्या कहेंगे. उसे तो बस, अधिकारी बनने की चाह है. इसलिए वह ऐसा करने को मजबूर है. फिरोजाबाद की एक लड़की ठेले पर बैठ कर बड़ी तल्लीनता से किताब पढ़ती रहती है. उस के पास रखी शराब जैसी दिखने वाली भरी बोतल ने लोगों को अचंभे में डाल रखा है.

काफी पूछने पर उस ने बताया कि उसे पढ़ने के लिए इस का सहारा लेना पड़ता है. राहगीरों को बीच रास्ते में पैट्रोल खत्म होने पर कोसों दूर मोटरसाइकिल नहीं घसीटनी पड़ती. पढ़ाई के प्रति ऐसी लगन बहुत कम छात्रों में देखने को मिलती है.

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नशाखोरी में मस्त युवा

हमें अपनी युवाशक्ति पर गर्व है, लेकिन सचाई तो कुछ और ही है. इस समय भारत दुनिया में नशाखोरी के मामले में दूसरे स्थान पर है. यहां 10 करोड़ 80 लाख युवा धूम्रपान की गिरफ्त में हैं. देश में प्रतिवर्ष धूम्रपान की वजह से 10 लाख लोगों की मौत हो रही है. यह आंकड़ा देश में होने वाली कुल मौतों का 10 प्रतिशत है.

देश में पिछले डेढ़ दशक में सिगरेट पीने वालों की तादाद काफी बढ़ी है. सिगरेट पीने के मामले में आज भारत पूरी दुनिया में दूसरे स्थान पर है. वह सिर्फ चीन से पीछे है, जिस रफ्तार से भारतीय युवाओं में सिगरेट पीने का चलन बढ़ रहा है, अगर यही गति बनी रही तो जल्द ही वह चीन को भी पीछे छोड़ देगा.

तबाह होती सभ्यताएं

नशा हमेशा ही विनाशकारी रहा है. नशे के चक्कर में सभ्यता और संस्कृतियां तबाह हो गईं. एक जमाने में चीन भी अफीमचियों का देश कहा जाने लगा था. उस से उबरने में उसे दशकों लगे. आज भी कई देश हैं जो अपने शत्रु देशों से निबटने के लिए वहां के नागरिकों में नशे की लत डालने की कोशिश करते रहते हैं. हमारी सरकार भी नशाखोरी में हमसाज रहती है. राज्यों के आबकारी विभाग एक तरफ नशे को बढ़ावा देने में लगे रहते हैं तो दूसरी तरफ मद्यनिषेध विभाग इसे रोकने में. यह कैसा अंतर्विरोध और विरोधाभास है?

नशा कोई भी हो, वह एक मीठा जहर है. नशे को ले कर हमारी सरकारें दोहरा मापदंड अपनाती हैं. एक तरफ तो नशीली वस्तुओं का जोरशोर से उत्पादन और बिक्री हो रही है, वहीं दूसरी तरफ उस का सेवन न करने के खर्चीले अभियान चलाए जा रहे हैं.

लाखोंकरोड़ों रुपए इन विज्ञापनों में फूंके जा रहे हैं. पंजाब राज्य आज नशाखोरी की वजह से ही चर्चा का विषय बना हुआ है. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार, पिछले 10 साल में जहरीली शराब पीने से वहां 11,032 लोगों की मौत हो चुकी है, फिर भी सरकार आंखें बंद किए रहती है.

अभिव्यक्ति की आजादी पर हावी

फिल्मों में शराब पीते हीरो दिखाए जाते हैं. इस का बुरा असर युवाओं पर पड़ रहा है. वे भी फिल्मी स्टाइल में आप को शराब पीते दिख जाएंगे. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया है कि फिल्मों में नायकनायिकाओं द्वारा शराब पीते दिखाने से दर्शकों की मानसिकता पर इस का असर पड़ता है. लिहाजा, इसे प्रतिबंधित किया जाए.

नशे की वस्तुओं के पैकेटों पर दी जाने वाली स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी, गले और मुंह के कैंसर के खौफनाक चित्र और तमाम तरह के विज्ञापन किसी भी नशे को कम करने के लिए रत्तीभर भी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं. ऐसी कोशिशें हास्यास्पद हो कर रह गई हैं.

सरकार की सुस्ती

पूरे पंजाब को नशे ने अपनी गिरफ्त में लिया है, वहां हर तरफ नशा पसरा हुआ है. मादक द्रव्यों ने युवाओं को जकड़ रखा है. अफीम, मौरफीन और हेरोइन जैसे नशीले पदार्थों ने वहां अपना जाल बिछाया हुआ है. पंजाब में सब से ज्यादा हेरोइन का इस्तेमाल होता है. पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान से आने वाली हेरोइन की खेप आसानी से यहां पहुंचती है.

नशे की भूख पर वहां तस्करों की पैनी नजर रहती है. वे पहले पंजाब में ही अपना बाजार तलाशते हैं. हेरोइन की तस्करी में लगे लोगों को पंजाब एक बड़ा बाजार मिल गया है. इस का नशा तो जल्दी लोगों को आदी बनाता है. शरीर के हर हिस्से पर इस का कुप्रभाव पड़ता है. पंजाब जैसे खुशहाल प्रदेश के लिए इस से बड़ा अभिशाप क्या होगा कि वहां के युवा हेरोइन जैसे खतरनाक नशे की चपेट में हैं.

अब प्रश्न यह है कि क्या सचमुच सरकार चाहती है कि लोग सिगरेटशराब का सेवन न करें? अगर हां, तो फिर वह इन चीजों के उत्पादन पर रोक क्यों नहीं लगा रही है? जनहित में जारी तमाम विज्ञापन आज ढोंग बन कर क्यों रह गए हैं? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकसर अपने भाषणों में युवाओं के भविष्य का जिक्र करते हैं. क्या नशाखोरी से उन का भविष्य उज्ज्वल होगा?

रेस 3 : सलमान के बाद जैकलीन का फर्स्ट लुक हुआ लौन्च

सलमान खान की फिल्म ‘रेस 3’ से सोमवार को उनका फर्स्ट लुक सामने आया था. वहीं अब इसके बाद फिल्म से जैकलीन फर्नांडीस का फर्स्ट लुक भी जारी कर दिया गया है. जैकलीन फिल्म के पोस्टर में काफी बोल्ड नजर आ रही हैं. जैकलीन ने अपने फर्स्ट लुक पोस्टर में हाथ में गन पकड़ी हुई है. ब्लैक कलर के वी शेप टौप में जैकलीन काफी स्मार्ट नजर आ रही हैं. जैकलीन ने पोस्टर में हाफ क्लच बालों के साथ हेयरस्टाइल बनाया हुआ है.

फिल्म के एक्टर सलमान खान ने जैकलीन के फर्स्ट लुक की तस्वीर ट्विटर पर जारी की है. सलमान ने साथ ही फिल्म में जैकलीन के कैरेक्टर का नाम क्या है ये भी बताया है. सलमान ने इस पोस्ट के साथ कैप्शन में लिखा है, ‘जैसिका: रौ पावर’, जैकलीन ने भी इस पोस्टर को अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया है. साथ ही कैप्शन देते हुए जैकलीन ने लिखा है, “और पावर बहुत डेंजरस हो सकती है #Race3 इस ईद”.

इससे पहले ‘रेस 3’ से सलमान खान का फर्स्ट लुक भी जारी किया गया था. फिल्म के पोस्टर में सलमान बहुत हैंडसम लग रहे हैं. सलमान ने भी पोस्टर में अपने हाथ में गन पकड़ी हुई है और साइड प्रोफाइल देते हुए सलमान लुक दे रहे हैं. सलमान ने इससे पहले अपनी इस फिल्म का टीजर भी अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया था.

दर्शकों को सलमान और जैकलीन का फर्स्ट लुक काफी पसंद आ रहा है. जहां सलमान के फर्स्ट लुक पोस्टर में उनके फैंस ने कई सारे कमेंट्स करे और फिल्म के लिए एक्साइटमेंट दिखाई. वहीं जैकलीन के लुक को भी फैंस द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है.

जैकलीन का एक इंस्टाग्राम यूजर और फैन लिखता है, ‘फिल्म हिट है’. दूसरे यूजर ने लिखा ‘रेस 3’ के लिए बहुत एक्साइटेड हूं. तो दूसरे फैन ने भी लिखा, ‘फिल्म का बेसब्री से इंतजार , वेट नहीं कर सकता’ सलमान की फिल्म ‘रेस 3’ का उनके फैंस को बेसब्री से इंतजार है. यह फिल्म इस साल ईद के मौके पर रिलीज होनी है. फिल्म में सलमान खान-जैकलीन फर्नांडीस के अलावा बौबी देओल, डेजी शाह और अनिल कपूर भी हैं.

ब्रेक लेने की वजह से मेरा करियर डूबा : चित्रांगदा सिंह

बौलीवुड अभिनेत्री चित्रांगदा सिंह ने बेहद कम लेकिन दमदार फिल्मों में काम कर इंडस्‍ट्री में अपनी एक अलग जगह बनाई है. साल 2015 अक्षय कुमार की आई फिल्म गब्बर इज बेक का गाना कुंडी ना खड़काओ राजा सीधा अंदर आओ…तो आप सभी ने सुना होगा और देखा भी होगा. इस गानें में बौलीवुड की हौट अभिनेत्री चित्रांगदा सिंह ठुमके लगाते नजर आई थी और लोगों ने इस गाने को काफी पसंद भी किया था. लेकिन इस फिल्म में आइटम सांग करने के बाद चित्रांगदा काफी लम्बे समय तक ना ही किसी फिल्म में नजर आईं और ना ही किसी कार्यक्रम में. लेकिन अभी हाल ही में वे मीडिया से रूबरू हुई और अपने करियर से जुड़ी कुछ खास बाते भी सांझा की.

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फिल्म ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाली अदाकारा चित्रांगदा ने अपने करियर में ज्‍यादा आगे न बढ़ पाने को लेकर कहा, ‘मुझे लगता है कि ब्रेक लेने की वजह से मेरे करियर को नुकसान हुआ है और मेरा करियर डूब गया. मैंने जब शुरुआत की थी तो मेरे जीवन में ऐसे मोड़ आए जहां मेरी प्राथमिकताएं बदल गईं. मैंने फिल्मों में आगाज किया और फिर चार साल का ब्रेक लिया. मैं फिर वापस आई और फिर मैंने दो साल का ब्रेक लिया.’

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चित्रांगदा के मुताबिक, ‘काम मिलने के लिए सिर्फ प्रतिभाशाली होना ही काफी नहीं है बल्कि सही समय पर मौजूद होना भी जरूरी है. चित्रांगदा ने कहा, ‘फिल्म उद्योग में जब आपको मौके मिल रहे हों और उस समय आप वहां मौजूद नहीं हों तो निश्चित रूप से आपके करियर पर असर पड़ेगा. मेरे साथ भी यही हुआ. ज्यादातर फिल्ममेकर्स मेरे पास ऐसे रोल्‍स लेकर आए जो महिला प्रधान थे या फिर मजबूत बौद्धिक क्षमता वाले किरदार थे. ऐसा लग रहा था जैसे मैं आम हिंदी फिल्मों की हिरोइन वाले रोल निभाना ही नहीं चाहती. शायद मैंने फिल्मी दुनिया का चमकता सितारा बनने के लिए भरपूर कोशिश नहीं की.’

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चित्रांगदा ने कहा, ‘मैं एक अभिनेत्री हूं, मैं हर किरदार निभा सकती हूं. मैं उतनी ही सामान्य और हंसमुख हूं, जितना एक आम लड़की होती है.’ उन्होंने कहा कि उन्हें डांस करना पसंद है, जो पर्दे पर गढ़ी उनकी छवि से एकदम अलग है. चित्रांगदा ने कहा कि उन्होंने तीन साल तक कत्थक सीखा है और उन्हें फिल्म में मात्र एक आइटम गीत पर डांस करने का मौका मिला. फिर उन्हें ऐसा कोई मौका नहीं मिला. उन्होंने चीजें बदलने की उम्मीद जताई है.

साल 2003 में फिल्मी सफर का आगाज करने वाली चित्रांगदा ने ‘सौरी भाई’, ‘देसी ब्वायज’, ‘ये साली जिंदगी’ और ‘गब्बर इज बैक’ में भी काम किया है. चित्रांगदा की आने वाली फिल्मों में ‘बाजार’ और ‘साहेब, बीवी और गैंगस्टर-3’ शामिल हैं.

जीवन को गुलाम बना देता है धर्म

सुप्रीम कोर्ट चाहे लाख कह ले कि हर वयस्क को प्रेम व विवाह का मौलिक अधिकार है और किसी बजरंगी, किसी खाप, किसी सामाजिक या धार्मिक गुंडे को हक नहीं कि इस अधिकार को छीने, मगर असल में धार्मिक संस्थाएं विवाह के बीच बिचौलिए का हक कभी नहीं छोड़ेगी. विवाह धर्म की लूट का वह नटबोल्ट है जिस पर धर्म का प्रपंच और पाखंड टिका है और इस में किसी तरह का कंप्रोमाइज कोई भी धर्म नहीं सहेगा, सुप्रीम कोर्ट चाहे जो कहे.

जो भी धर्म के आदेश के खिलाफ जा कर शादी करेगा, सजा सिर्फ उसे ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार और रिश्तेदारों को भी मिलेगी. सब को कह दिया जाएगा कि इस परिवार से कोई संबंध न रखो. कोई पंडित, मुल्ला, पादरी शादीब्याह न कराएगा. श्मशान में जगह नहीं मिलेगी, लोग किराए पर मकान नहीं देंगे, नौकरी नहीं मिलेगी.

धर्म का जगव्यापी असर है. जब लोग 7 समंदर पार रहते हुए भी कुंडली मिलान के बाद विवाह करते हों, गोरों व कालों की कुंडली भी बनवा लेते हों ताकि सिद्ध किया जा सके कि धर्म, रंग और नागरिकता अलग होने के बावजूद विवाह विधिविधान से हुआ है, तो क्या किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट की फुसफुसाहट हिंदुत्व के नगाड़ों के बीच खो जाएगी.

पारंपरिक शादियां चलती हैं, तो इसलिए कि शादी चलाना पतिपत्नी के लिए जरूरी होता है, उन का कुंडली, जाति, गोत्र, सपिंड, धर्म से कोई मतलब नहीं होता. शादी दिलों का व्यावहारिक समझौता है. एकदूसरे पर निर्भरता तो प्राकृतिक जरूरत है ही, सामाजिक सुरक्षा के लिए भी जरूरी है और इस के लिए किसी धर्मगुरु के आदेश की जरूरत नहीं. यदि प्यार हो, इसरार हो, इकरार हो, इज्जत हो तो कोई भी शादी सफल हो जाती है. बच्चे मातापिता पर अपनी निर्भरता जता कर किसी भी बंधन को, शादी को ऐसे गोंद से जोड़ देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट, कानून या कुंडली की जरूरत नहीं.

कुंडली, जाति, गोत्र, सपिंड के प्रपंच पंडितों ने जोड़े हैं, ये धर्म की देन हैं, प्राकृतिक या वैज्ञानिक नहीं. शादी ऐसा व्यक्तिगत कृत्य है जो व्यक्ति के जीवन को बदल देता है और धर्म इस अवसर पर मास्टर औफ सेरिमनीज नहीं मास्टर परमिट गिवर बन कर पतिपत्नी को जीवन भर का गुलाम बना लेता है.

शादी में धर्म शामिल है, तो बच्चे होने पर उसे बुलाया जाएगा और तभी उसे धर्म में जोड़ लिया जाएगा ताकि वह मरने तक धर्म के दुकानदारों के सामने इजाजतों के लिए खड़ा रहे.

विधर्मी से विवाह पर धर्म का रोष यही होता है कि एक ग्राहक कम हो गया है. चूंकि दूसरे धर्म का ग्राहक भी कम होता है, दोनों धर्मों के लोग एकत्र हो कर इस तरह के विवाह का विरोध करते हैं. आमतौर पर शांति व सुरक्षा तभी मिलती है जब पति या पत्नी में से एक धर्म परिवर्तन को तैयार हो.

अगर उसी धर्म में गोत्र या सपिंड का अंतर भुला कर शादी हो रही हो तो धर्म के दुकानदारों के लिए दोनों को मार डालने के अलावा कोई चारा नहीं होता. शहरों में तो यह संभव नहीं होता पर गांवों में इसे चलाना आसान है, संभव है और लागू करा जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट चाहे जितना कह ले, जब तक देश में धर्म के दुकानदारों का राज है और आज तो राज ही वे कर रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल नरेंद्र मोदी के अच्छे दिन आ चुके हैं, जैसा है.

बड़ा फील करने के अवसर पगपग पर

हर आदमी बड़ा होना, बड़ा बनना चाहता है. लेकिन हर आदमी बड़ा बन नहीं सकता. यदि सभी बड़े बन जाएं तो फिर कोई बड़ा नहीं रहेगा क्योंकि कोई छोटा नहीं बचेगा. आदमी जो मुकाम हासिल नहीं कर पाता है, वह उस के अवचेतन में बैठ जाता है और समयसमय पर प्रकट होता है. कोई सोते में सपने देखता है तो कोई जागते में देखता है. वैसे, जो बड़ा नहीं बन पाया उस के लिए हर जगह अवसर उपलब्ध हैं कि वह अपनेआप को दूसरों से बड़ा फील करे. एक उदाहरण ले लें, एक प्रसिद्ध गायक का कार्यक्रम शहर के औडिटोरियम में चल रहा था. हजारों की भीड़ होने से जगह की मारामारी हो रही थी. कुरसियां भीड़ से काफी कम थीं. जो पहले आ गए वे कुरसी पा गए. जो देर से आए उन्हें यहांवहां खड़ा होना पड़ा. अब जो कुरसी में बैठे थे वे इन खड़े लोगों से अपने को बड़े समझने लगे. यह भाव उन में ज्यादा झलक रहा था जिन की कुरसी के बिलकुल पास 10-15 लोग खड़े थे. वे अब कार्यक्रम कम देख रहे थे, खड़े लोगों को ज्यादा देख रहे थे. यहां अवसर था छोटे होते हुए भी अपने को बड़ा फील करने का. एकदो चवन्नी के चलन से बाहर होने के बाद भी अपनेआप को हजार रुपए के सिक्के के बराबर समझ रहे थे. बड़े होने के अवसर बड़ा न होते हुए भी हर जगह हैं.
दूसरी स्थिति लीजिए, आप भद्र पुरुष हैं. अचानक शहर से बाहर जाना पड़ा. ट्रेन में आरक्षण नहीं मिला. आप को स्लीपर में बिना आरक्षण के जाना पड़ा. ट्रेन में खचाखच भीड़ थी. कई लोग अर्थ पर थे, मतलब फर्श पर. आप जिस बर्थ पर बैठे, वह आरक्षित थी. बैठे हुए सज्जन ने पहले तो कोई प्रतिक्रिया नहीं की लेकिन बाद में पूछ बैठे कि आप का बर्थ नंबर कौन सा है. आप ने कहा कि अभी तो टीटीई का इंतजार कर रहे हैं. आप ने उसे बड़ा फील करने का अवसर प्रदान कर दिया. वह बड़ा फील कर रहा था लगातार और आप उस के रहमोकरम पर थे. आप जब कभी अर्थ पर बैठे लोगों और कभी इस को देखते तो आप को लगता कि वह आप से बड़ा है. उस के चेहरे के हावभाव से ऐसा लगता भी था. ऐसे ही स्थिति सिटी बसों में भी बनती है यदि आप को खड़ा होना पड़े और कोई बैठा हो. लेकिन यहां बड़ा होने का खयाल बहुत कम समय के लिए रहता है. जो आज सीट पर बैठा है वह कल खड़ा हो कर छोटा फील कर सकता है.
छोटा होते हुए बड़ा फील करने के बड़े अवसर हैं. आप सिनेमा देखने सपरिवार गए हैं. लाइन में लगे हैं टिकट लेने के लिए और आप के पहले वाले को टिकट मिल गया है. आप के आते ही टिकटखिड़की धड़ाम से बंद हो जाती है. अब जिसे टिकट मिल गया है उस के चेहरे पर मुसकान है. आप के चेहरे पर मायूसी. वह बड़ा फील कर रहा है. छोटा आदमी हो सकता है, फेरी लगा कर पेट भरता हो या गुब्बारे बेचता हो लेकिन इस समय उस का मुंह प्रसन्नता की हवा से गुब्बारे की तरह फूल कर कुप्पा हो गया है. आज सपरिवार वह इस हिट मूवी को देखेगा और आप टिकटरूपी खेल में हिटविकेट हो गए हैं. आप की पत्नी का भी मुख फूल कर कुप्पा हो गया है लेकिन यह नाराजगी की हवा भरने से हुआ है.
यही तत्काल के आरक्षण की लाइन में भी होता है. आप सुबह 6 बजे से जा कर लाइन में लग गए हैं. आप के पहले 4 बजे से ही कई लोग लगे हैं. 8 बजे खिड़की छपाक से खुलती है, काम शुरू हो गया है. कैसे पता चला? रेलवे के चरमराते हुए डौट मैट्रिक्स प्रिंटर की कर्णभेदी ध्वनि लय में सुनाई दे रही है.
लाइन में सब बराबर हैं रिकशे वाला, आटो वाला, फेरी वाला, बाबू, अधिकारी, व्यापारी, प्रोफैशनल. लेकिन आप के नंबर आने के पहले 4 आदमी और हैं. आप व पीछे के सभी हाथ मलते रह गए जब छपाक से खुली खिड़की धड़ाम से बंद हो गई. ऐसी कि लगा कि धड़कन न बंद हो जाए. अब जो आदमी आरक्षण करवा कर जा रहा था, वह आप जैसे छोटे रह गए लोगों के सामने अपने को बड़ा समझेगा ही. आप बड़े बाप की औलाद हो, कार से कालेज आते हो. आप के कालेज का आज रिजल्ट आया है. आप सैकंड ग्रेड में आए हैं जबकि रामरतन मोची का साइकिल में आने वाला लड़का फर्स्ट ग्रेड में है. अब उस का समय है बड़ा फील करने का.
बड़ा फील करने का अवसर तो किसी होटल बुक करते समय भी उपलब्ध है. सीजन है, होटल्स बुक हैं. पर्यटकों से भरे पड़े हैं. आप भी पहुंच गए हैं. होटलों के चक्कर काट रहे हैं. कहीं कमरा नहीं मिला. 7वीं होटल में आए हैं. एक ही कमरा बचा है. एक अनार और 4 बीमार, 3 और लोग कमरे को खोजते आ गए हैं. एक ज्यादा व्यावहारिक निकला. ऐसे मौके पर उस ने बिना कमरे को देखे ही हां कर बुक कर दिया. अब आप तीनों छोटों के सामने वह अंदर ही अंदर मुसकराता हुआ बड़ा फील कर रहा है.
भगवानों की दुकानों में भी लोग अपने को बड़ा फील करते हैं या करवाते हैं. कहने को यहां सब बराबर होने चाहिए लेकिन कई लोग खुद दुकानदार पंडों को पैसा दे कर उन से वीआईपी पास बनवा लेते हैं और लाइन से हट कर सीधे पूजा के प्रोडक्ट के सामने पतली गली से पहुंच जाते हैं. श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखते ही रह जाती है और ये अपने को बड़ा फील करने लगते हैं. बड़ा फील करने के अवसर हर जगह हैं. बड़ा बनना बड़ा कठिन है, बड़ा फील करना बड़ा आसान है. बस, मौका मिलना चाहिए. ठीक है समय ने आप को अभी तक छोटा ही रखा है. लेकिन बड़ा फील करने, थोड़ी देर के लिए बड़ा बन जाने के अवसर पगपग पर हैं.
वैसे भी, इस देश में आम आदमी छोटा ही रह जाता है ताउम्र. यहां बड़ा माना जाता है उस को जिस के पास धनदौलत हो, भले ही वह घोटालेबाजी से, कालाबाजारी से या सरकारी धन में पलीता लगा कर की गई कमाई हो. और यहां बड़ा बनने के अवसर अधिकारी, ठेकेदार, नेता व दलालों को ज्यादा मिलते हैं. तो फिर, बड़ा फील करने के जितने अवसर मिलते हैं उन को एंजौय करने में ही समझदारी है.

औकात : सतिया के बदन से खेल पाया प्रधान

रामसकल का अपने गांव और आसपास के इलाके में रुतबा था. कुछ समय पहले घर की माली हालत अच्छी नहीं थी, लेकिन रामसकल के 2 भाइयों के बैंकौक जा कर पैसा कमाने से पासा पलट गया और पतझड़ बने घर में हरियाली छा गई.

पैसों की कमी नहीं होने पर रामसकल एक ईंट भट्ठा खोल कर घर पर ही पैसों की बरसात करने लगे. घर के बाहर समाज में सब से अच्छे बरताव से रहना उन की दिनचर्या बन गई. इस तरह चारों दिशाओं से इज्जत और दौलत मिलने लगी.

गांव में प्रधान के चुनाव का समय आ गया था. रामसकल के मन में भी प्रधान बनने के अंकुर फूटने लगे थे.

कुछ लोगों से इस बारे में बात भी की. सभी लोग रजामंद हुए और खुश भी, क्योंकि रामसकल दीनदुखियों की मदद करते थे. सब को लगता था कि अगर वे प्रधान बन जाएंगे, तो गांव की हालत सुधर जाएगी.

धीरेधीरे चुनाव का समय आ गया. जोरशोर से चुनाव का प्रचार हो रहा था. रामसकल का गांव 7 मोहल्लों में बंटा हुआ था. उन के विपक्ष में दूसरे मोहल्लों के 3 उम्मीदवार खड़े थे. जब चुनाव का नतीजा आया, तो रामसकल भारी वोटों से जीते थे.

सभी लोगों ने उन्हें फूलमालाओं से लाद दिया था. कुछ लोग उन्हें अपने कंधों पर उठा कर नाचने लगे. जीत की खुशी में शाम को उन के घर जम कर पार्टी हुई. जो जैसा था वैसा शाकाहारी, मांसाहारी और शराब का मजा लिया.

समय का पहिया अपनी रफ्तार से चलता रहा. रामसकल घरघर जा कर सभी की समस्याओं को सुनते और हल करते.

रामसकल ने गांव के ही बैजू को अपना पर्सनल सैके्रटरी बनाया था. वह था तो बहुत चालाक, लेकिन शराब और शबाब उस की कमजोरी थी.

इन 5 सालों में रामसकल प्रधान ने तमाम काम कर दिखाए. पैसे की कमी थी नहीं कि वे सरकारी पैसा चुराते.

जब आदमी के पास शोहरत और दौलत होती है, तब अहंकार का भी जन्म होता है. रामसकल लगातार 3 बार प्रधान बन चुके थे. इन 15 सालों से प्रधान रहते हुए उन को भी अहंकार ने घेर लिया था.

दरअसल, उन के सैके्रटरी बैजू का संबंध गांव की ही एक विधवा औरत से था. एक दिन शराब के नशे में बैजू ने अपनी प्रेमिका सतिया का जिक्र उन से कर दिया.

यह सुन कर प्रधान रामसकल की भी लार टपकने लगी. उसी दिन से वे सतिया को पाने के लिए बिस्तर पर करवटें बदलने लगे. लेकिन समाज में अपनी इज्जत भी तो देखनी थी.

लेकिन उन से रहा नहीं गया. एक दिन बैजू को चुपके से 5 हजार रुपए देते हुए प्रधान रामसकल ने अपनी इच्छा जाहिर कर दी.

बैजू तो जैसे खुश हो कर बोला, ‘‘किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होगी और आज ही शाम को मैं इंतजाम कर दूंगा.’’

शाम होते ही बैजू सतिया को ईंट के भट्ठे पर ले आया. शराब और मुरगा खानेपीने के बाद आधी रात तक प्रधान ने सतिया के बदन से खेल कर अपने मन की प्यास बुझा ली. इस के बाद बैजू से उसे उस के घर छोड़ आने को कहा.

अब तो जब भी प्रधान रामसकल का मूड सतिया से खेलने का होता, तो ईंटभट्ठे पर उस से मिलते. बाद में बैजू भी सतिया की जवानी का मजा ले कर उसे घर छोड़ देता.

सतिया का घर गांव के किनारे रास्ते पर ही था, इसलिए कोई ध्यान नहीं देता था कि वह कहां आतीजाती है.

जब तक आदमी कीचड़ से बचता है, तब तक साफसुथरा रहता है, लेकिन जब एक बार कीचड़ में पैर पड़ जाता है, तो कीचड़ की परवाह नहीं करता. यही हाल अब प्रधान रामसकल का भी हो चुका था.

वे औरत के नशे में आ कर जनता की समस्याओं की अनदेखी करने लगे थे. एक बार उन्होंने गांव के कोटेदार काशीनाथ सिंह को भी जनता के सामने खूब खरीखोटी सुनाई, जबकि उस की कोई गलती नहीं थी.

इस बात से गुस्साई जनता ने कोटेदार काशीनाथ सिंह के बेटे महावीर सिंह को अब की चुनाव में खड़ा कर के भारी वोटों से जिता दिया और रामसकल को औकात दिखा दी.

प्रधान रामसकल की हालत खिसियानी बिल्ली की तरह हो गई थी. उन का सारा अहंकार बर्फ की तरह पिघल कर बह गया था. हाथ आई तो सिर्फ बदनामी.

शिक्षित युवाओं का आतंक

आज पूरी दुनिया में आतंक पसरा हुआ है. अब तो शिक्षित युवा भी आतंक फैला रहे हैं. सितंबर माह में ही जम्मूकश्मीर के बनिहाल में एसएसबी पर हुए जानलेवा आतंकी हमले में शामिल 2 आतंकी तो पहले ही गिरफ्त में आ गए थे जबकि तीसरे आतंकी आकिब वाहिद को बाद में अरेस्ट किया गया. आकिब अनंतनाग के डिगरी कालेज में बीएससी का छात्र है. इसी तरह ढाका में हुए आतंकी हमले में यही बात सामने आई थी कि जिन हमलावरों की पहचान हुई है, वे सभी अमीर घरों से संबंध रखते थे और अच्छे, जानेमाने स्कूलोंकालेजों में पढ़े थे. 2 हमलावर, जिन की मौत गोलीबारी में हुई, वे अच्छे खातेपीते परिवार के थे. इन में से एक निबस इसलाम, देश के एक अभिजात निजी विश्वविद्यालय, नार्थसाउथ यूनिवर्सिटी से पढ़ा था, वहीं दूसरा हमलावर मीर सबीह और रोशन इम्तियाज भी देश के सब से बढि़या स्कूलों में पढ़े थे.

रोशन इम्तियाज की पहचान बंगलादेश ओलिंपिक एसोसिएशन के उपमहासचिव इम्तियाज खान बाबुल के बेटे के रूप में हुई. अब यह बात गलत साबित हो रही है कि इसलामिक स्टेट और अलकायदा की पहुंच केवल गरीब घरों के युवाओं तक है. अब इन में अमीर और पढ़ेलिखे घराने के युवा भी शामिल हो रहे हैं. एक समय कहा जाता था कि कम पढ़ेलिखे युवा ही आतंकवादियों के झांसे में आ कर आतंक के रास्ते पर चलते हैं, लेकिन अब आतंक की राह पकड़ने वाले नौजवान अनपढ़जाहिल नहीं, बल्कि शिक्षित और डिगरीधारी हैं, जो अपने आकाओं के इशारे पर दुनियाभर में मारकाट मचा रहे हैं.

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बेकार हैं ऐसी डिगरियां

दिल्ली, अहमदाबाद, बेंगलुरु, जयपुर और वाराणसी में हुए बम धमाकों को अंजाम देने वाले खूंखार आतंकियों के मामले में जो समानता सामने आई थी उस ने सब को चौंका दिया. ये सभी आतंकी न केवल पढ़ेलिखे बल्कि इन के पास इंजीनियरिंग, मैनेजमैंट और आईटी की डिगरियां भी थीं. कुछ समय पहले पुणे की एक पढ़ीलिखी युवती के बारे में खबर सुर्खियों में आई थी, जिस में मैडिकल की पढ़ाई करने की इच्छा रखने वाली यह छात्रा सोशल नैटवर्किंग के जरिए आतंकी संगठन के संपर्क में आई और सीरिया जाने को तैयार हो गई.

ऐसे अनगिनत मामले हैं जो साफसाफ इशारा करते हैं कि इन युवाओं को दीनहीन समझने की जरूरत नहीं है. हमारे समाज, परिवार और देश के लिए ये युवा खलनायक बन चुके हैं. ऐसे युवाओं को सही रास्ते पर लाने की जरूरत है. पारिवारिक जागरूकता भी इस का अहम पहलू है. यहां जरूरी यह है कि ऐसी बातें सामने आने पर परिवार उन्हें दबाने की कोशिश न करे बल्कि इन का हल खोजे. ऐसे कृत्यों में चालाकी दिखाने का कोई लाभ नहीं है, क्योंकि आतंक की राह पर चल रहे युवा अपने परिवार का भी भला नहीं करेंगे.

मां तक का गला रेत डाला

यह विडंबना ही है कि खुद एक स्तरीय जिंदगी जी रहे युवा दूसरों के परिवार उजाड़ने के लिए हथियार उठा रहे हैं. ढाका के रेस्तरां में हुए आतंकी हमले में एक ऐसी मां का भी गला रेत दिया गया, जिस की कोख में 7 महीने का गर्भ पल रहा था.

आखिर बर्बरता की राह पकड़ चुके ये युवा चाहते क्या हैं? इन युवाओं को जिस उम्र में अपने देश की बेहतरी और सकारात्मक बदलाव की सोच रखनी चाहिए थी उस उम्र में ये सबकुछ उजाड़ने पर तुले हैं. इन से सहानुभूति रखने वाले लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि उन की ये हरकतें न जाने कितने बच्चों का भविष्य बरबाद कर रही हैं. आज ऐसे सिरफिरों के संगठन न केवल दुनिया के लिए नासूर बन गए हैं बल्कि ये अपने परिवारों को भी पीड़ा दे रहे हैं. ढाका आतंकी हमले में वहीं की सत्तारूढ़ पार्टी के नेता का बेटा कुछ समय पहले ही घर से लापता हुआ था. उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट भी थाने में लिखवाई गई थी. ऐसे युवाओं के मातापिता यह समझ लें कि ऐसे बच्चे अपनों के भी नहीं होते.

बेगुनाहों का कत्लेआम

बेगुनाहों के कत्लेआम को अंजाम देने वाले ये कुत्सित मानसिकता के युवा आज खुद अपने देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए खौफ का कारण बन गए हैं. कई संगठित गिरोह इन्हें अपने मनसूबे पूरे करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. अब तक ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिन में आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में अपनी पैठ बनाने के लिए उतावले हैं. वे सोशल नैटवर्किंग साइट्स के माध्यम से नौजवानों से संपर्क कर उन्हें बरगलाने का काम कर रहे हैं. कभी जिहाद के नाम पर तो कभी मोटी रकम का लालच दे कर यह काम किया जा रहा है. यह विडंबना ही है कि पढ़ेलिखे युवा भी इन के जाल में फंस रहे हैं.

यह कैसी जन्नत

अगर हम जीवन के किसी भी पहलू को देखें तो आतंकी मानसिकता वाले ऐसे शातिर युवा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सभी को प्रभावित करते हैं. यही कारण है कि आतंकवाद के मार्ग पर चलने वाले ये युवा न केवल सभी देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती हैं बल्कि सामाजिक व मानवीय मोरचे पर भी चिंतनीय हैं.

ग्लोबल टैरर इंडैक्स के अनुसार, आज दुनिया के एकतिहाई देश आतंकी हिंसा के शिकार हैं. यह ऐसा दंश है जो किसी देश के पूरे सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक ढांचे की नींव हिला देता है. कई अमीर घरों तक इसलामिक स्टेट और अलकायदा की पहुंच ने यह मिथक तोड़ दिया है कि वैश्विक आतंकवाद में सिर्फ गरीब घरों के युवा ही शामिल हैं.

पढ़ेलिखे, समृद्ध पृष्ठभूमि के कई युवाओं को आतंकी गतिविधियां आकर्षित कर रही हैं. वे इसलाम की खातिर और जन्नत के  नाम पर दुनिया में कहीं भी हमला करने को तैयार हैं. इन का जाल अब एशिया से ले कर पश्चिमी देशों तक फैल गया है. इन के पास पैसा ही नहीं, दिमागी क्षमता भी बहुत अधिक है. सोशल साइट्स ने इन की पहुंच दूरदराज के पढ़ेलिखे युवाओं तक कर दी है जो आज यह पूरी दुनिया के लिए नई चुनौती बन गई है.

बेटा घर नहीं लौटा

बंगलादेश के एक हमलावर की उम्र महज 18 साल थी. खातेपीते परिवार का यह युवक कैसे कट्टरपंथियों के हत्थे चढ़ गया? इसी सवाल का जवाब उस के पिता खोज रहे हैं. रमजान के महीने का आखिरी जुम्मा था. मीर हैयत कबीर उम्मीद लगाए बैठे थे कि शायद आज उन का बेटा घर लौट आएगा. पिछले 4 महीने से बेटे की कोई खबर नहीं थी. उन्हें यह भी समझ नहीं आ रहा था कि वह खुद ही घर छोड़ कर चला गया या किसी के कब्जे में है.

एक दिन खबर आई कि 18 साल का मीर सामेह मुब्बशीर ढाका में पुलिस के हाथों मारा गया. वह उन 5 बंदूकधारियों में से एक था, जिन्होंने ढाका के एक रेस्तरां पर हमला कर 20 लोगों की जान ली थी. पिता सदमे में हैं, समझ नहीं पा रहे हैं कि उन के बेटे ने यह राह क्यों चुनी.

मुब्बशीर ने अपना बचपन गरीबी या मुश्किलों के बीच नहीं बिताया था. वह ढाका का रहने वाला था और अच्छे परिवार से था. रोज स्कूल जाने वाला, कम बोलने वाला. ‘कहीं तो कुछ गलत हुआ है, कहीं कुछ गड़बड़ हुई है,’ अपने आंसू रोकते हुए पिता बारबार यही दोहरा रहे थे. उन्हें बारबार अखबारों और टीवी पर अपने बेटे का नाम देखने को मिल रहा था, लेकिन उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि उन का बेटा आतंकियों से जा मिला और मारा गया.

मुब्बशीर का बचपन सामान्य उच्च मध्यवर्गीय परिवार में बीता था. उसे डायनासौर पसंद था. वह जानवरों के नाम याद करता था. एक बार वह परिवार के साथ ताजमहल देखने भारत आया था. उस से प्रभावित हो कर वह मुगल राजाओं और दुर्गा की तसवीरें बनाने लगा था. स्कूल में उस ने 1971 की जंग और आजादी के बारे में पढ़ा, तो इतिहास में रुचि बढ़ गई. उसे कार्टून देखने का बहुत शौक था. वह अंगरेजी फिल्में भी देखा करता था. स्कूल में बच्चे उसे मां का लाड़ला कह कर चिढ़ाते थे.

वह घर के पास वाली मसजिद में जाता और दिन में 5 बार नमाज भी पढ़ता. उस के पिता बताते हैं कि गायब होने से पहले उन्हें उस के रवैए में कोई खास बदलाव देखने को तो नहीं मिला, लेकिन उन का ध्यान इस ओर जरूर गया था कि बेटे ने फेसबुक का इस्तेमाल कम कर दिया था और अब वह हर वक्त पढ़ता रहता था.

मुब्बशीर की ही तरह बाकी हमलावर भी बंगलादेश के अच्छे स्कूलों में पढ़े थे और अच्छे परिवारों से नाता रखते थे. ऐसे में पूरा देश इस वक्त यही सवाल कर रहा है कि इन युवाओं के साथ आखिर हुआ क्या.

एक अन्य आतंकी की पहचान 22 साल के निबस इसलाम के रूप में की गई, जिस ने मलयेशिया की मोनाश यूनिवर्सिटी से बैचलर्स की पढ़ाई की थी. वहां सालाना फीस 9 हजार डौलर है. ऐसे में अब गरीबी और अनपढ़ता को आतंकवाद के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता.

हाल ही में आतंकवादियों की जो नई खेप आई है, वह हमारे देश की खराब उपज है. आज राजनीतिक हालात बदलते जा रहे हैं, ऐसे में यह युवापीढ़ी अपनेआप को असुरक्षित महसूस कर रही है. इन को सही दिशा देने की जरूरत है.

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