परिवारवाद और लोकतंत्र

राहुल गांधी ने कांग्रेस पर खासी पकड़ बना ली है. गुजरात के चुनावों में जीत तो नहीं मिली पर हार अपमानजनक न थी. राजस्थान के उपचुनावों में कांग्रेस को मिली भारी सफलता ने राहुल में विश्वास की गोली का काम किया है.

जब राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने थे तो आम जनता या कांग्रेसियों को आपत्तियां होतीं, तो बात कुछ गंभीर होती पर यहां तो सारी आपत्तियां भारतीय जनता पार्टी को थीं जो कुछ अजीब लग रहा है. यह तो ठीक है कि हिंदू धर्म की खराब परंपराओं को निभाने में दक्ष भाजपा हर दूसरे के निजी मामले में टांग अड़ाने का मौलिक हक रखती है पर चोरचोर मौसेरे भाई होते हैं और एकदूसरे को तो बख्शते ही हैं.

भाजपा आज देश की बड़ी नहीं, बल्कि बहुत बड़ी पार्टी है, उसे कांग्रेस जैसी छोटी पार्टी से डर नहीं लगना चाहिए और उसे अपने हिसाब से जीने का हक देना चाहिए पर आदत से मजबूर महान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ले कर झुमरीतलैया की कच्ची बस्ती के मंदिर के पुजारी तक राहुल पर कमैंट करते रहे हैं व लोकतंत्र की हत्या होने का बेजा राग अलापते रहे हैं.

कांग्रेस जेबी पार्टी है, इस में शक नहीं है पर यह फिर भी लोगों को उसी तरह मान्य है जैसे 15वीं शताब्दी के मामलों को सिर पर उठाए चल रही भारतीय जनता पार्टी मान्य है. जब आप के चेहरे पर खुद कालिख पुती हो तो दूसरे के चेहरे के निशान दिखाना बड़प्पन नहीं, खीझ जाहिर करता है.

राहुल गांधी से भाजपा भयभीत रही है, यह सच है. वर्ष 2014 से पहले भाजपाइयों का आक्रमण सोनिया गांधी या मनमोहन सिंह पर इतना नहीं था जितना राहुल गांधी पर था. शायद उन की रणनीति थी कि यदि राहुल गांधी को लगातार निशाने पर रखा जाएगा तो वे घबरा कर मैदान छोड़ देंगे. अफसोस यह है कि हिंदू समाज सुधारकों की तरह राहुल गांधी भी कट्टरपंथियों का मुकाबला करते रहे.

पार्टियों में लोकतंत्र एक आदर्श व्यवस्था है पर दुनियाभर में इस के नुकसान भी हुए हैं. आज अमेरिका में इस आंतरिक लोकतंत्र के कारण न डैमोक्रेटिक पार्टी में, न रिपब्लिकन पार्टी में सही नेतृत्व है. इंगलैंड की कंजर्वेटिव पार्टी व लेबर पार्टी दोनों, नेताओं के अभाव से ग्रस्त हैं. फ्रांस के नएनवेले राष्ट्रपति को अपनी नईनवेली पार्टी से काम चलाना पड़ रहा है. जरमनी की चांसलर एंजेला मर्केल की धाक यूरोप व अमेरिका की राजधानियों में तो है पर वोटरों के दिलों में नहीं.

परिवारवाद आदर्श नहीं है पर इस के पर्याय शायद कम हैं. राजनीतिक माहौल में पले युवा सफल नेता बन जाते हैं क्योंकि उन के सैकड़ों से संबंध होते हैं. भारतीय जनता पार्टी में दूसरीतीसरी पीढ़ी के दसियों नेता ऐसे हैं जिन के पुरखे राजनीति में थे और राजनीति ही उन का मुख्य व्यवसाय है. लोकतंत्र परिवारों के सही लोगों को मान्यता देता है और उन पर आपत्ति करना निरर्थक सा है क्योंकि जब भी परिवार नहीं होता, ‘टीना’ फैक्टर यानी ‘देयर इज नो अल्टरनेटिव’ दिखने लगता है.

भारतीय जनता पार्टी की परेशानी यह है कि उस के पास आज नरेंद्र मोदी का पर्याय नहीं है जबकि कांग्रेस के पास राहुल गांधी जैसा पर्याय है.

चीड़ से चाटुकारिता तक

चीड़ का पेड़ बहुतायत में हिमालय की पहाड़ियों में 7 हजार फुट की ऊंचाई तक पाया जाता है. इस पेड़ में पाया जाने वाला एक तत्त्व एलीकोकेम अपने आसपास किसी और पेड़ को नहीं पनपने  देता. चीड़ के पेड़ का तना 3 मीटर तक मोटा होता है.

चीड़ के पेड़ के ये गुणधर्म काफी हद तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मिजाज से मेल खाते हैं. शायद इसीलिए अपने स्टाइलिश प्रधानमंत्री के लिए केंद्रीय कपड़ा मंत्री अजय टमटा चीड़ की लकड़ी के रेशे से बनी हुई जैकेट तोहफे में देंगे जिस का नाम, लौंचिंग से पहले ही, नमो वस्त्र रखा गया है.

आदमी जब जंगल में रहता था तब पेड़ की पत्तियों और छाल से ही तन ढकता था. अब आधुनिक मानव के लिए यह फैशन हो गया है. यों चीड़ के पेड़ की यह चीरफाड़ यानी शोध काफी दिनों से चल रहा था पर अब वैज्ञानिकों ने इस के रेशे से कपड़ा बनने की पुष्टि कर दी है तो सब से पहले नमो जैकेट बनाई जाएगी. नरेंद्र मोदी से इस शोध का मतलब न पूछें. यह चाटुकारिता का नायाब नमूना है.

जिएं दूसरों की खातिर भी

एक दिन अनायास एक व्यक्ति आता है और भीड़भरे चौराहे पर,  चिलचिलाती धूप में ट्रैफिक कंट्रोल करते पुलिसमैन को ठंडे पानी की बोतल पकड़ा कर खामोशी से आगे बढ़ जाता है.

ट्रैफिक पुलिस के इस बंदे का गला भरी दोपहरी में सूख रहा था. ऐसे में ठंडे पानी की यह बोतल उसे तृप्त कर गई. वह एक सांस में ही पूरा पानी पी गया और दूर जाते उस इंसान को देखता रहा जिस में दूसरों की खातिर जीने का जज्बा था. वह उसे नम्रतावश सलाम करने लगा.

एक और दिन एक चौराहे पर एक अजनबी ने एक बूढ़े व्यक्ति को हाथ पकड़ कर रास्ता पार करा दिया और आगे बढ़ गया.

ट्रैफिक पुलिस और बूढ़े व्यक्ति के चेहरे पर इत्मीनान था. इस से ज्यादा इत्मीनान और खुशी उन चेहरों पर दिखी जो मदद के लिए आगे आए थे.

लोग शांति और सुकून की तलाश में न जाने कहांकहां भटकते हैं. वे कई मंदिरों और तीर्थों के फेरे लगा आते हैं. लेकिन फिर भी उन्हें शांति और सुकून नहीं मिलता. कुछ लोग ऐसे होते हैं जो लोगों को छोटीछोटी खुशियां बांट कर मदद के लिए हाथ आगे बढ़ा कर असीम सुख और सुकून महसूस करते हैं, ऐसा सुकून जो पूजापाठ से हासिल नहीं होता.

छोटेछोटे कामों में बड़ीबड़ी खुशियां : 70 वर्षीया मन्नू देवी घरेलू महिला हैं. ये अपने पासपड़ोस में, रिश्तेदारों में देखती हैं कि कहीं कोई तकलीफ में है या जरूरतमंद है तो वहां पहुंच कर चुपके से उस की मदद अपनी सामर्थ्यानुसार कर आती हैं. घरों में काम करने वाली गरीब महिला के किसी बच्चे की स्कूल की फीस भर आती हैं तो कभी होनहार गरीब बच्चों के लिए छात्रवृत्ति दे आती हैं. और तो और, रास्ते चलते किसी गरीब बच्चे को देखती हैं तो झट उसे चौकलेट, खिलौने पकड़ा कर खामोशी से आगे बढ़ जाती हैं.

एक सवाल के जवाब में मन्नू देवी कहती हैं, ‘‘काम ऐसा हो जिस से किसी के चेहरे पर खुशी आ जाए. उस हंसते हुए चेहरे को देख कर जो खुशी मिलती है, उसे बयान नहीं कर सकती.’’

दूसरों की तकलीफ महसूस करती हैं: 69 वर्षीया दर्शन नरवाल ऐसी महिला हैं जो दूसरों के दर्द को शिद्दत से महसूस करती हैं.

एक बार शहर में ऐक्सिडैंट हुआ. दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति रात में अपनी बाइक से घर जा रहा था. रास्ते का डिवाइडर अंधेरे की वजह से दिखा नहीं और दुर्घटना हो गई. कुछ ही देर में उस व्यक्ति की मौत हो गई. इस घटना से दर्शन नरवाल अंदर तक हिल गईं. घटनास्थल पर जा कर घटना के कारणों को समझा, तब समझ आया कि अंधेरे में डिवाइडर, ग्रिल आदि दिखाई नहीं देते, इसलिए ऐसी गंभीर दुर्घटनाएं होती हैं.

बस, फिर क्या था, सड़कों पर उतर कर उन जगहों को चिह्नित किया जो दुर्घटना का कारण बन सकती थीं. इस के बाद वे वहां पहुंच कर लालपीली रेडियम की पट्टी लगाती जाती हैं. वे रास्ते के पेड़ों पर, गांव की ओर जाती साइकिलों, बैलगाडि़यों पर भी रेडियम की पट्टी लगाती हैं ताकि ये अंधेरे में चमकें और लोगों को रास्ते का सही अंदाजा हो जाए.

पिछले 16 सालों से छत्तीसगढ़ के रायपुर में दर्शन नरवाल यह काम लगातार कर रही हैं. इस के अलावा वे गरीब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें सिलाई मशीन, विकलांगों को ट्रायसाइकिल दे कर प्रशिक्षित करती हैं.

पूजापाठ करने से बेहतर टूटी झोंपड़ी ठीक कराना : ‘‘पूजापाठ का आयोजन कराने से कहीं बेहतर है किसी गरीब की टूटी झोंपड़ी ठीक कराना, बेसहारों, अनाथों के लिए घर बनवाना.’’ यह कहना है रायपुर निवासी बसंत अग्रवाल का. ये कहते ही नहीं, बल्कि कर के दिखाते हैं. ये दूसरों के दर्द को शिद्दत से महसूस करते हैं.

दूसरों के दर्द को महसूस करने का यह जज्बा आप को कहां से मिला? यह पूछने पर बसंत अग्रवाल कहते हैं, ‘‘अपने मातापिता से ऐसे संस्कार मिले हैं. जब हम गांव में रहते थे, हमारे घर में कोई भी अतिथि आता था तो मां उसे खिलाए बिना जाने नहीं देती थीं. अगर किसी के पास जाने का साधन नहीं होता था तो उसे साधन जुटा कर देते थे. ये सब बचपन से देख कर हम ने सीखा है औरों के काम आना.’’

बसंत अग्रवाल की एक खास बात यह है कि वे अपने कार्यों का प्रदर्शन या दिखावा नहीं करते, सिर्फ स्वयं की भीतरी खुशी के लिए वे ऐसा करते हैं.

कोशिश किसी के काम आ पाने की : कूलर इंडस्ट्रीज चलाने वाले रायपुर के दिलीप कुंदु बहुत ही भावुक प्रवृत्ति के इंसान हैं. उन में एक भावना है कि वे किसी के काम आएं.

इस के लिए जरूरी नहीं कि व्यक्ति हजारोंलाखों रुपए खर्च कर के ही किसी की मदद कर सकता है. बिना कुछ खर्च किए भी इंसान किसी की मदद कर के यादगार बना रह सकता है.

दिलीप कुंदु चूंकि कूलर के व्यवसाय से जुड़े हैं, लिहाजा, अपने जुड़े कार्य से ही ये लोगों की भरपूर मदद करते हैं, जैसे किसी के घर में शोक (गमी) होता है, गरमी में शोकसभाओं में कूलर की जरूरत होती है, तो ऐसे घरों में वे निशुल्क कूलर भिजवा कर सेवा देते हैं. अनाथालयों में कूलरों की निशुल्क मरम्मत करवा देते हैं.

एक बार ये एक बेसहारों के आश्रम में गए. वहां उस दिन भोजन नहीं बना था. कारण पूछा तो पता चला गैस सिलैंडर खत्म हो गया है, दूसरा नहीं है. बस, फिर क्या था, दिलीप कुंदु ने महज 20 मिनट में एक भरे गैस सिलैंडर की व्यवस्था की. तब जा कर वहां खाना बना. खाना खा कर तृप्त हुए लोगों ने उन्हें तहेदिल से शुक्रिया अदा किया. दिलीप कहते हैं, ‘‘मेरी कोशिश रहती है कि मैं किसी के काम आऊं.’’

रक्तदान कर के बचाते हैं जीवन : 53 वर्षीय मुकुंद राठौर अपनी 18 वर्ष की उम्र से रक्तदान कर रहे हैं. रक्तदान करने का उन में ऐसा जनून है कि 35 वर्षों में अब तक वे 47 बार रक्तदान कर चुके हैं.

इन के साथ एक दुखद घटना घटी. इन के बेटे की असमय ही मृत्यु हो गई. बेटे के जीवन को स्मरणीय बनाने के लिए उस की पुण्यतिथि पर न सिर्फ वे खुद रक्तदान करते हैं बल्कि कैंप लगा कर 50 बोतल रक्त इकट्ठा कर अस्पतालों को निशुल्क दान करते हैं ताकि लोगों को जीवनदान मिल सके.

वे कहते हैं, ‘‘मेरे रक्त से जब किसी का जीवन बचता है तो मुझे बहुत ज्यादा खुशी मिलती है.’’

जख्मों को छील कर उस पर नमक छिड़कने वाले लोग बहुत मिल जाएंगे लेकिन दुखते जख्मों पर मरहम लगाने वाले लोग कम ही होते हैं.

दरअसल, अपने जीवन को वही लोग सार्थक करते हैं जो औरों के काम आते हैं. आज समाज में जिस तरह से असहष्णिता बढ़ रही है और लोग छोटीछोटी बातों पर हिंसा पर उतारू हो रहे हैं, ऐसे समय में दूसरों की खातिर कुछ कर गुजरने वालों की सख्त जरूरत है

विद्या बालन की राह पर ऋचा चड्ढा, निभाएंगी इस एडल्ट अदाकारा का किरदार

भोली पंजाबन के नाम से मशहूर बौलीवुड अभिनेत्री ऋचा चड्ढा एक बार फिर सुर्खियों में हैं. ऋचा पिछले दिनों अपनी फिल्‍म ‘3 स्‍टोरीज’ को लेकर चर्चा में थी. फिल्‍म ‘3 स्‍टोरीज’ के बाद अब वे विद्या बालन की राह पर चलती दिखाई दे रही हैं. साल 2011 में विद्या ने फिल्‍म ‘द डर्टी पिक्‍चर’ में साउथ की अदाकारा सिल्‍क स्मिता का किरदार निभाया था. अब ऋचा भी उनकी तरह साउ‍थ की एडल्‍ट स्‍टार की बायोपिक पर काम करेंगी. जी हां, ऋचा चड्ढा, 1990 के दशक की मशहूर मलयालम अभिनेत्री शकीला की बायोपिक में मुख्य भूमिका निभाती नजर आएंगी.

मालूम हो कि शकीला केरल से थीं और उन्होंने तमिल, तेलुगू, मलयालम और कन्नड़ जैसी भाषाओं की कई एडल्‍ट फिल्मों में काम किया है. शकीला की फिल्‍में सिर्फ भारत में ही कई भाषाओं में डब नहीं होती थी, बल्कि उन्‍हें चाइनीज, नेपाली और कई अन्‍य भाषाओं में भी डब किया जाता था.

बता दे कि ऋचा द्वारा फिल्माएं जाने वाले इस बायोपिक में शकीला के 16 वर्ष की आयु में फिल्म-उद्योग में कदम रखने के समय से उनके पूरे जीवन की कहानी दिखाई जाएगी.

ऋचा चड्ढा ने अपने एक बयान में कहा,’ यह फिल्‍म 1990 के दशक से मलयालम सिनेमा के प्रसिद्ध कलाकारों में से एक, शकीला की कहानी है, जिन्‍होंने फिल्‍म जगत में काफी उपलब्धि हासिल की थी. उनके फैंस एशिया भर में थे, उन्‍होंने एक महिला कलाकार के रूप में धूम मचाई, जो उस समय एक आम बात नहीं थी.’

उन्‍होंने यह भी कहा कि फिल्‍म की पटकथा रोमांचक है और इसकी कहानी दर्शकों को बेहद पसंद आनेवाली है. फिल्‍म की शूटिंग अप्रैल या मई के अंत में शुरू होगी. इंद्रजीत लंकेश के निर्देशन में बनने वाली यह फिल्‍म अगले साल रिलीज होगी. बता दें कि इस फिल्‍म का निर्देशन कर रहे इंद्रजीत लंकेश, पिछले साल हिंसा की शिकार हुईं दिवंगत पत्रकार गौरी लंकेश के भाई हैं.

मोनालिसा ने उतार दिए सारे कपड़े, वायरल हुआ वीडियो

बिग बॉस-10 की सबसे चर्चित कंटेस्टेंट रहीं मोनालिसा एक भोजपुरी एक्ट्रेस हैं. जब से मोना ने बिग बॉस में एंट्री की थी तब से उनके नए-नए वीडियो सामने आते रहते हैं. इस बार भी उनका एक वीडियो सामने आया है जिसमे वह कपड़े उतारती नजर आ रही हैं. यह वीडियो इन दिनों चर्चा का विषय बन गया है.

इस वीडियो को इंटरनेट पर बहुत बार देखा जा चुका है. बताया जा रहा है यह सीन मोनालिसा की किसी फिल्म में फिल्माया गया है. इस बार वह इस वीडियो की वजह से सोशल मीडिया पर छा रही हैं. इस वीडियो में मोनालिसा कपड़े उतार कर आईने में देख रही हैं. वीडियो को अब तक 34 लाख लोग देख चुके हैं.

आप भी देखिए ये वीडियो…

धर्मस्थलों से आवाज, ध्वनि प्रदूषण का खतरा

इलाहाबाद की लखनऊ बैंच में एक याचिकाकर्ता ने पीआईएल दाखिल की. जिस में हवाला दिया गया लाउडस्पीकर को ले कर सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का जो साल 2000 में जारी किया गया था. साल 2000 में सुप्रीम कोर्ट ने लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक लगाते हुए आदेश जारी किया था कि रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच लाउडस्पीकर का सार्वजनिक प्रयोग नहीं किया जाएगा. तब से ले कर अब तक करीब 17 साल हो चुके हैं लेकिन सरकार लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए सख्त फैसला नहीं ले पाई है. अब इस याचिका ने एक बार फिर इस बहस को हवा दे दी है कि सरकार धार्मिक आयोजनों के दौरान नवरात्रों व जगरातों, कीर्तन में ध्वनि प्रदूषण करते लाउडस्पीकरों पर अंकुश कब लगाएगी.

धार्मिक आोजनों में लाउडस्पीकर के बढ़ते प्रयोग से ध्वनि प्रदूषण का खतरा बढ़ता जा रहा है. ऐसे में जरूरी है कि बिना किसी भेदभाव के धर्मस्थलों से बढ़ रहे ध्वनि प्रदूषण के खतरे को रोका जाए. यह बहाना अब बंद होना चाहिए कि एक धर्म के धर्मस्थल में लाउडस्पीकर का प्रयोग होता है तो दूसरे धर्म में यह क्यों बंद किया जाए. प्लास्टिक से ले कर दूसरे तमाम तरह के प्रदूषणों को ले कर आवाज बुलंद करने वाली संस्थाओं को ध्वनि प्रदूषण पर भी बोलना चाहिए और धर्मस्थलों से होने वाले ध्वनि प्रदूषण को रोकने की मांग करनी चाहिए.

‘कानून सब के लिए बराबर होता है. अगर धर्मस्थलों से आवाज गूंजने पर रोक की बात है तो किसी भी धर्मस्थल से आवाज नहीं आनी चाहिए,’ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ के कन्वैंशन सैंटर में लखनऊ जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में यह कहा. मुख्यमंत्री का मकसद यह था कि किसी भी धर्मस्थल से आवाज नहीं आनी चाहिए. ऐसे में उन्हें बिना किसी भेदभाव के हर धार्मिक स्थल से होने वाले ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ कड़े कदम उठाने चाहिए.

यह सच है कि धर्मस्थल, किसी भी धर्म के हों, से लाउडस्पीकर की तेज आवाज आती है. वैज्ञानिक तथ्य है कि ध्वनि प्रदूषण भी सेहत के लिए बेहद खतरनाक होता है. यही वजह है कि यातायात के नियमों में है कि स्कूल और अस्पतालों के पास तेज ध्वनि वाले हौर्न का प्रयोग न किया जाए. इस से बच्चों और बीमार लोगों पर प्रभाव पड़ता है. इसलिए दूसरे तमाम प्रदूषणों की ही तरह ध्वनि प्रदूषण को ले कर भी नियम सख्त होने चाहिए और धार्मिक स्थलों में होने वाले ध्वनि प्रदूषण पर रोक लगाई जानी चाहिए.

आज के दौर में धार्मिकस्थलों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है. मंदिर, मसजिद और गुरुद्वारे हर जगह होने वाले कार्यक्रमों में तेज ध्वनि फैलाने वाले लाउडस्पीकरों का प्रयोग होता है. इस के साथ ही, सड़क और घरों में भी लाउडस्पीकर लगा कर आयोजन होने लगे हैं. मसला धर्म से जुड़ा होता है तो कोई विरोध नहीं करता. बौलीवुड गायक सोनू निगम ने जब मसजिद से आने वाली आवाज की आलोचना की तो उस पर एक बहस शुरू हुई पर कुछ ही दिनों में बंद हो गई.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस से पहले यह कह चुके हैं कि पहले की सरकार पुलिस थानों में कृष्ण जन्माष्टमी के आयोजन पर रोक लगा चुकी है. योगी ने कहा था कि अगर हम सड़क पर पढ़ी जाने वाली नमाज को नहीं रोक सकते तो थानों में होने वाले कृष्ण जन्माष्टमी त्योहार को कैसे रोक सकते हैं? बचाव के लिए इस तरह के बयान सरकार को नहीं देने चाहिए. योगी आदित्यनाथ की यह बात पूरी तरह से सही है कि कानून सब के लिए एकसमान है.

इस का मतलब यह नहीं कि धर्म के नाम पर कुछ भी करने की आजादी दी जाए. ध्वनि प्रदूषण धर्मस्थल से आने वाली आवाज से भी होता है. यह धर्म के आधार पर कम या ज्यादा नहीं होता, यह धर्मस्थल से आने वाली आवाज की तेजी से तय होता है कि आवाज कितनी ध्वनि प्रदूषण बढ़ाने वाली है. जिस धर्मस्थल से निकलने वाली आवाज जितनी तेज होगी उस का कुप्रभाव उतना अधिक होगा.

ध्वनि प्रदूषण पर अंकुश जरूरी

ध्वनि प्रदूषण का मतलब अनावश्यक, अनुपयोगी, असुविधाजनक, कर्कश ध्वनि होती है. यह 2 तरह की होती है. प्राकृतिक ध्वनि प्रदूषण में बादलों का गरजना, तूफान, भूकंप, नदियों और झरनों का शोर आता है. प्राकृतिक ध्वनि प्रदूषण से अधिक खतरनाक मानवकृत ध्वनि प्रदूषण होता जा रहा है. इस को कृत्रिम ध्वनि प्रदूषण के नाम से जाना जाता है. इस में वाहनों से होने वाली आवाज, कारखाने, धार्मिक आयोजन, राजनीतिक कार्यक्रम, विवाह समारोह जैसे वे कार्यक्रम आते हैं जिन में लाउडस्पीकर के जरिए आवाज को तेज किया जाता है. वाहनों में प्रैशरहौर्न का प्रयोग किया जाता है.

ध्वनि प्रदूषण को उस की मात्रा, सघनता, उच्चता अथवा तारत्व से मापा जाता है. ध्वनि प्रदूषण मापने की इकाई को डैसीबल या डीबी कहते हैं. इस का सब से अधिक प्रभाव कानों पर पड़ता है. इस से हमारे सुनने की क्षमता प्रभावित होती है. इस के अलावा ध्वनि प्रदूषण से दूसरी तरह के रोग भी हो सकते हैं. इन में चिड़चिड़ापन, बहरापन, चमड़ी पर सरसराहट, उलटी, जी मचलाना, चक्कर आना और स्पर्श अनुभव की कमी का होना शामिल हैं. शोर का स्तर 190 डैसीबल अधिक होने पर व्यक्ति की मौत तक हो सकती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलगअलग स्तर के ध्वनि प्रदूषणों को सुरक्षित माना है. औद्योगिक क्षेत्र में 75 डैसीबल, व्यापारिक क्षेत्र में 65 डैसीबल, आवासीय क्षेत्र में 55 डैसीबल और शांत क्षेत्र में 50 डैसीबल से अधिक शोर नहीं होना चाहिए. शांत क्षेत्र में वे जगहें शामिल हैं जिन में अस्पताल, पुस्तकालय और स्कूल आते हैं.

ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए जरूरी है कि निजी वाहनों की जगह पर सार्वजनिक वाहनों के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाए. टीवी, डीजे, रेडियो, म्यूजिक प्लेयर धीमी आवाज में बजाए जाएं. वाहनों में हौर्न का प्रयोग न किया जाए. बहुत जरूरी होने पर ही हौर्न का प्रयोग करें. प्रैशरहौर्न का प्रयोग कभी भी न करें. आतिशबाजी भी ध्वनि प्रदूषण को बढ़ाती है, ऐसे में इस का प्रयोग न करें.

आस्था का बहाना

ध्वनि प्रदूषण का सब से बड़ा खतरा लाउडस्पीकरों से होने लगा है. धार्मिक आडंबरों में लाउडस्पीकरों का प्रयोग बढ़ने लगा है. मसजिद में अजान देने के लिए लाउडस्पीकरों का प्रयोग हो रहा है. कई तरह के धार्मिक प्रवचनों में लाउडस्पीकरों का प्रयोग होने लगा है. मूर्तियों के विसर्जन के लिए निकलने वाली यात्रा में भी लाउडस्पीकरों का प्रयोग होने लगा है. इन के चलते ध्वनि प्रदूषण के खतरे को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट तक ने अलगअलग तरह के फैसलों में इस की रोकथाम का आदेश दिया हुआ है. रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर का प्रयोग वर्जित है.

धार्मिकस्थलों से होने वाले प्रदूषण को छोड़ दें, तो बाकी ध्वनि प्रदूषण पर रोकथाम के उपाय किए जा रहे हैं. धार्मिकस्थलों से होने वाली तेज आवाज को रोकने के लिए जब बात होती है तो कट्टरपंथी लोग धर्म की आस्था का सवाल खड़ा करने लगते हैं.

मसजिद में अजान को देखें तो यह चलन उस समय का है जब लोगों के पास घडि़यां और अलार्म नहीं होते थे. इसी वजह से नमाज पढ़ने वाला व्यक्ति सुबह दूसरे व्यक्ति को जगाने के लिए उस के घर पर आवाज देता था. जिस समय धर्म के नियम बने थे उस समय लाउडस्पीकर का जन्म नहीं हुआ था. ऐसे में लाउडस्पीकर का प्रयोग धर्म का मुद्दा नहीं है. लाउडस्पीकर का प्रयोग बाद में शुरू हुआ. इस की वजह धर्म का प्रचार नहीं, बल्कि धार्मिक दिखावे के कारण यह आगे बढ़ा. कीर्तन, भजन, कथा और अखंडपाठ में लाउडस्पीकर का प्रयोग किसी धर्मग्रंथ में नहीं लिखा है. धार्मिक यात्राओं के दौरान सड़क पर तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाने का प्रयोग होता है. कानून और प्रशासन चुप्पी साधे रहते हैं. जो पुलिस किसी पार्टी में तेज ध्वनि से बजने वाले लाउडस्पीकर को बंद कराने पहुंच जाती है, वह धार्मिक आयोजन के समय मूकदर्शक बनी रहती है.

समझें खतरे को

ध्वनि प्रदूषण को रोकने के तमाम कानून बने हैं. कोर्ट का आदेश है. इस के बाद भी कानून लागू करने वाले लोग इस मुद्दे पर गंभीर नहीं हैं. ये लोग अपने दायित्व को नहीं समझ रहे.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे हर धार्मिकस्थल पर लगने वाले लाउडस्पीकर को बंद कराएं. यह कहने से काम नहीं चलेगा कि एक धर्म इस का प्रयोग करता है तो दूसरे धर्म के लिए यह जायज है.

आज इस बात की जरूरत है कि सभी लोग ध्वनि प्रदूषण के खतरे को समझें और उस से निबटने के लिए अपने उत्तरदायित्व को निभाएं. बिना किसी भेदभाव के जब यह काम होगा तो ही इस समस्या का समाधान निकल सकेगा. ध्वनि प्रदूषण दूसरे प्रदूषणों की तरह ही खतरनाक है. इस की रोकथाम के लिए एकदूसरे पर आरोप लगाना बंद होना चाहिए. बिना भेदभाव के धार्मिकस्थलों से होने वाले ध्वनि प्रदूषण को रोका जाना जरूरी है.

भैंसों से कांचा इलैया की तुलना

दलित लेखक और चिंतक कांचा इलैया को आएदिन कट्टरपंथियों की धमकियां मिलती रहती हैं जिनका सार यह रहता है कि सुधर जाओ, नहीं तो…धमकी कोरी गीदड़ भभकी न लगे, इसलिए उन पर छोटेमोटे हमले भी यदाकदा होते रहते हैं. पिछले साल अक्तूबर में उन्हें विजयवाड़ा में पुलिस ने ही नजरबंद कर लिया था. कांचा पर आरोप हैं कि वे दलितों की भावनाओं को भड़काते हैं और सवर्णों के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं.

इस विवादित लेखक ने अब दलितों की तुलना भैंसों से कर के एक नया फसाद खड़ा कर दिया है. उन का कहना है कि भैंस ज्यादा दूध देती है फिर भी उपेक्षित है क्योंकि गुणगान गाय का होता है, ठीक यही हाल दलितों का है. वे मेहनत करते हैं और मलाई ऊंची जाति वाले खा जाते हैं. देखा जाए तो बात नई नहीं है लेकिन चूंकि कांचा इलैया ने कही है, इसलिए अहम हो गई है.

अब इस के पुरस्कारस्वरूप कोई पद्म खिताब तो उन्हें मिलने से रहा, लेकिन नई धमकी या नए हमले के लिए उन्हें फिर तैयार रहना चाहिए.

मैं फाइटर हूं : उषा जाधव

बचपन से अभिनय की इच्छा रखने वाली अभिनेत्री उषा जाधव महाराष्ट्र के कोल्हापुर की हैं. उन्होंने अभिनय की शुरुआत मराठी थिएटर से की थी. थिएटर में काम करने के दौरान उन्हें कई टीवी विज्ञापनों में भी काम मिला. हिंदी फिल्म में उन्हें पहला ब्रेक मधुर भंडारकर की फिल्म ‘ट्रैफिक सिग्नल’ से मिला.

दलित और लोअर मिडिल क्लास की होने की वजह से उषा को अभिनय के क्षेत्र में आने में काफी मुश्किलें आईं. संघर्ष के बारे में पूछे जाने पर वे बताती हैं, ‘‘कोल्हापुर एक छोटा शहर है, वहां मैं ने 12वीं तक की पढ़ाई की. मेरे घर की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी. इसलिए पुणे आ कर एक ट्रैवल एजेंसी में काम किया. उस समय 3,000 रुपए की सैलरी मेरे लिए काफी थी. काम करतेकरते 3 साल निकल गए. जब घर की जिम्मेदारी थोड़ी कम हुई, तो मुंबई आ कर फिल्मों के लिए औडिशन दिया और मुझे कास्टिंग डायरैक्टर की मदद से मधुर भंडारकर की फिल्म ‘ट्रैफिक सिग्नल’ मिली, क्योंकि इस फिल्म में उन्हें ‘डस्की स्किन’ की लड़की चाहिए थी. पहले उस में केवल एक सीन ही था. जब मैं ने उस सीन को अच्छी तरह से किया तो मधुर ने खुश हो कर 3 सीन और करने के लिए दिए.

‘‘इस के बाद दीप्ति नवल की फिल्म ‘दो पैसे की धूप चार आने की बारिश’, ‘भूतनाथ रिटर्न्स’ आदि में भी छोटे रोल किए. फिल्मों में मुझे 2 या 3 सीन्स मिल रहे थे, कोई बड़ा प्रोजैक्ट नहीं मिल रहा था. मैं ने ऐसा काम करना बंद कर दिया. ऐसे में मुंबई में रहना मुश्किल हो रहा था. मैं अपनी जौब भी छोड़ चुकी थी. मैं ने एड फिल्मों की ओर रुख किया. जहां भी कुछ औफर मिलता, मैं तुरंत औडिशन देने लगी. करीब 20 से 25 एड फिल्मों में मैं ने काम किया और मैं थोड़ी सैटल हो गई.’’

उषा जाधव स्वभाव से मिलनसार और स्पष्टभाषी हैं. उन्हें जो बात अच्छी नहीं लगती, उसे तुरंत कह देती हैं. मराठी फिल्म में मुख्य भूमिका का मिलना उन के लिए खुशी की बात थी.

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वे कहती हैं, मैं महाराष्ट्रियन हूं और मराठी मेरी मातृभाषा है. मुझे फिल्म ‘धग’ के निर्देशक शिवाजी लोटन पाटिल, जिन्होंने मुझे एक विज्ञापन फिल्म में देखा था, ने जब कहानी सुनाई, तो मैं दंग रह गई और तुरंत हां कह दी. कहानी इतनी अच्छी थी कि मैं फिल्म करने के लिए उत्साहित हो गई. लेकिन यह पता नहीं था कि यह फिल्म मुझे नैशनल अवार्ड दिलवाएगी. इस फिल्म को मैं अपने कैरियर का टर्निंग पौइंट मानती हूं. इस फिल्म में मैं ने एक युवा बालक की मां की भूमिका अदा की थी. जो निम्न मध्यम वर्ग की होने के बावजूद चाहती है कि उस का बच्चा सब से अधिक शिक्षित हो.

बैस्ट ऐक्ट्रैस के पुरस्कार का मिलना उषा के जीवन में सब से अहम था. इस से उन्हें स्फूर्ति मिलती है और आगे भी वे ऐसी ही चुनौतीपूर्ण भूमिका करना चाहती हैं.

वे कहती हैं, ‘‘यह भूमिका मेरे लिए बहुत चैलेंजिंग थी, क्योंकि एक दलित डोम जाति की महिला कैसे अपने बच्चे को आगे लाने की बात सोच सकती है और उसे किनकिन हालात से गुजरना पड़ता है, यह सब इस फिल्म में दिखाया गया है. इस तरह के हालात अभी भी हमारे देश में गांव और छोटेछोटे कसबों में पाए जाते हैं जहां दलित को कुछ भी करने का हक नहीं है.’’

क्या असल जिंदगी में आप का दलित होना, आप के कैरियर को बाधित करता है, यह पूछे जाने पर उषा बताती हैं, ‘‘दलित होने से भी अधिक मेरा रंग सब से अधिक आड़े आता है. ऐक्ट्रैस होने का अर्थ है गोरीचिट्टी और खूबसूरत होना, जबकि मैं सांवली हूं. बहुत अधिक रिजैक्शन का सामना इंडस्ट्री में करना पड़ा. अधिकतर निर्माता निर्देशक कहते थे कि वे कैसे मान लें कि मुझे ऐक्टिंग आती है? मेरी तरफ देखने का नजरिया ही बहुत अलग था. कोई सम्मान मुझे नहीं मिला, लेकिन मैं ने सोच लिया था कि मैं हार नहीं मानूंगी और एक दिन जरूर साबित करूंगी कि मैं एक अभिनेत्री हूं. मराठी फिल्म ‘धग’ की सफलता के बाद मेरी पहचान बदल गई.’’

उषा आगे हंसती हुई कहती हैं, ‘‘दलित होने का एहसास सब ने मेरे साथ बहुत जताया. अगर मेरा किसी में चुनाव होता था, तो मैं ने कई बार लोगों को कहते हुए सुना है कि मुझे इस से अधिक क्या मिल सकता था. मैं ने सोचा, मैं अपना काम करूंगी, क्योंकि हाथी जब रास्ते पर चलता है तो कुत्तों के भूंकने से कुछ नहीं होता. इस के अलावा मेरे पिता को दलित होने का बहुत मलाल था क्योंकि दलित होने की वजह से उन का परिवार पिछड़ा था.

‘‘मेरे पिता कृष्णा जाधव ने खुद पढ़ाई पूरी की और इस दलदल से निकले और हमें अच्छी तालीम दी. 5 बहन और एक भाई के परिवार में मेरे मातापिता बहुत समझदार थे. मेरे पिता खुद अपनी पढ़ाई के लिए रोज 4 किलोमीटर चल कर जातेआते थे. मैं इस बात से गर्वित हूं कि मेरे मातापिता ने मुझे हर तरह की आजादी दी.’’

आजकल वोटबैंक को कायम रखने के लिए आरक्षण को अधिक महत्त्व दिया जा रहा है. इस बारे में उषा जाधव की राय है, ‘‘मेरे हिसाब से कई ऐसे परिवार हैं जो आर्थिक रूप से बहुत गरीब हैं और बच्चों की पढ़ाई की फीस तक दे नहीं पाते. आरक्षण उन के लिए जरूरी है. आर्थिकरूप से कमजोर परिवार को ही आरक्षण देना चाहिए, वह भी कुछ खास क्षेत्र में, सभी में नहीं.’’

उषा की हिंदी अच्छी है, इसलिए उन्हें हिंदी बोलना सीखना नहीं पड़ा. उन्हें हिंदी फिल्में देखना बचपन से अच्छा लगता है. वे धैर्यवान हैं और किसी भी परिस्थिति में अपनेआप को संभाल सकती हैं. उन की इच्छा है कि वे हमेशा अलगअलग किरदार निभाएं. मां की भूमिका अब वे नहीं करना चाहतीं.

वे कहती हैं, ‘‘मैं एक फाइटर हूं और अच्छी भूमिका के लिए अंत तक लड़ती रहूंगी. अभी मैं एक स्पैनिश फिल्म में काम कर रही हूं, जिस के लिए मैं स्पैनिश सीख रही हूं. मैं एक स्टूडैंट हूं और आगे भी सीखती रहूंगी. इस के अलावा मैं पिता की बायोपिक में अपनी मां की भूमिका निभाना चाहती हूं.’’

इंडस्ट्री में अपने अनुभवों के बारे में उषा का कहना है, ‘‘यहां भाईभतीजावाद से अधिक गु्रपिज्म हावी रहता है. स्टार के बच्चों का प्रैशर मेरे ऊपर नहीं है, क्योंकि आजकल हर तरह की फिल्में बनती हैं और सब को काम मिल सकता है.’’

उषा के परिवार का सहयोग उन के इस काम में नहीं था. वे नहीं चाहते थे कि वह फिल्मों में काम करे. उन का कहना है, ‘‘मेरे शहर में मिडिल क्लास परिवार में लड़की के काम करने को अच्छा नहीं माना जाता है. ऐसे में जब मैं ने काम करना शुरू किया, तो वे मेरे मातापिता से कहते थे कि तुम्हारी लड़की मुंबई में कोई गलत काम तो नहीं कर रही? वह कहीं दिखती तो नहीं है? ऐसी बातें उन्हें दुखी करती थीं, लेकिन जब ‘धग’ फिल्म आई और मुझे पुरस्कार मिला तो आसपड़ोस के सब के मुंह बंद हो गए और मातापिता भी काफी खुश हुए.’’

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