भागवत का बयान संगीन इरादों का संकेत

हमारा समाज और व्यवस्था 1947 के बाद सब से गहरे संकट के दौर में है. एक तरफ कश्मीर में सीमा को फिर गरम किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ घर में ही एक ऐसी विघटनकारी ताकत खड़ी हो गई है जो पूरी सेना व देश के संविधान को चुनौती दे रही है और ऊपर से यह मौजूदा सरकार को निर्देशित करने की भूमिका में भी है. यह संकट न प्राकृतिक है, न बाहरी, हमारे रक्षकों का खुद का बनाया हुआ है.

पिछले दिनों मुजफ्फरपुर में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान को इसी आईने की चौखटे में देखा जाना चाहिए. जब वे कह रहे हैं कि उन की सेना देश की सेना से भी बड़ी हो गई है, तो उस के कुछ माने हैं. उन के कथन को सीधे खारिज करने के बजाय उसे समझने की जरूरत है. उन की सेना न तो सीमा पर पाकिस्तान से लड़ने जा रही है और न ही चीन की सेना से डोकलाम में मोरचा लेगी. चूंकि सेना है तो जाहिर है उस का  इस्तेमाल भी होगा.

ऐसे में भागवत की सेना के लिए केवल घर बचता है, बल्कि कहा जा सकता है कि इस सेना का घर यानी देश के भीतर इस्तेमाल हो भी रहा है. अभी, लगभग घोषित तौर पर, यह युद्ध अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रहा है, लेकिन वास्तव में सभी दलित, पिछड़े, आदिवासी और गरीब इस सेना के निशाने पर हैं और यह सिलसिला आगे बढ़ा तो निश्चित तौर पर देश को एक बड़े गृहयुद्ध के लिए तैयार रहना होगा?.

दरअसल, मुसलमानों के खिलाफ संघ की लड़ाई प्रायोजित है, जिस के लिए उसे अलग से अपने समर्थकों में राष्ट्रवाद की हवा भरनी पड़ती है और फिर उस राष्ट्रवादी गुस्से को मुसलमानों की तरफ मोड़ना पड़ता है. लेकिन यह बात गौर करने की है कि अगर मुसलमानों के खिलाफ लड़ने वाला तबका संघ के इशारे पर अपनी जान देने के लिए तैयार है तो फिर वह उन अपनों, जो उस के स्वाभाविक दुश्मन हैं और जिन को जीवनभर उस ने अपने पैरों की जूती समझ कर उन पर शासन किया है, के साथ क्या सुलूक करेगा, आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है.

दलितपिछड़ों पर हमला

उस व्यापक वंचित दलित और पिछड़े तबके का सशक्तीकरण सवर्णसामंती वर्चस्व की कीमत पर हुआ है. पिछले 25 सालों में सत्ता और समाज के वर्चस्व से बाहर रहने की इस तबके की कुंठा अब दलितों व पिछड़ों पर हमले के रूप में सामने आ रही है. इलाहाबाद में बीच चौराहे पर सवर्ण दबंगों द्वारा एक दलित छात्र की हत्या इसी का नतीजा है. वहां एकबारगी उसे भले ही सीधे दलित समझ कर न मारा गया हो, लेकिन सवर्ण तबके में यह एहसास है कि सत्ता अपनी है और अब कुछ भी गलत कर के बचा जा सकता है, इस घटना को अंजाम देने के पीछे का सर्वप्रमुख कारण यही है.

देश में यह पूरा तबका आज खुद को ही सत्ता समझने लगा है. इस हिस्से के युवा भले बेरोजगार हों, लेकिन उन में सत्ता में रहने का एहसास पैदा करा दिया गया है और सत्ता के इस नशे ने ही उन्हें संघ के गणवेशधारियों से इतर एक विस्तारित सेना के अभिन्न हिस्से में तबदील कर दिया है. ऐसे में आने वाले दिनों में मुसलिम समुदाय से इतर, बाकी सामाजिक समुदायों के बीच अंदरूनी संघर्ष छिड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है.

वहीं आरएसएस प्रमुख के दावे के विपरीत संघ परिवारियों को शर्मिंदा करने वाला एक दूसरा सच भी है कि लड़ाई के किसी भी मोरचे पर संघ कभी आगे नहीं रहा है. इस के उलट, देश में उस के भागने और माफी मांगने का ही इतिहास है. आजादी की लड़ाई हो या आपातकाल का समय, सभी जगहों के लिए यह बात सही है. आजादी की लड़ाई इस का सब से दुरुस्त उदाहरण है. इस में अमूमन तो उस ने हिस्सा ही नहीं लिया और अगर किसी ने लिया भी तो वह सावरकर साबित हुआ. उस ने माफी मांगी और अंगरेजों की सेवा में जुट गया और बाद में अंगरेजों के निर्देश पर मुसलिम लीग के साथ सरकार बनाने की हद तक चला गया.

संघ व बीजेपी नेता देश के बंटवारे के लिए नेहरू को कोसते नहीं थकते, जबकि सचाई यह है कि बंटवारे की नींव इन के पुरखों ने डाली और उस की असली जिम्मेदार मुसलिम लीग के साथ सत्ता की रास रचाई. उस के बाद दूसरी लड़ाई के मोरचे का सच यह है कि आपातकाल में जेलों में बंद इन के नेता सरकार को चिट्ठियां लिखते रहे और बहुतों ने इलाज के बहाने खुद को अस्पतालों में भरती करा लिया था.

भागवत के उद्घोष में एक और चीज शामिल थी, जिस पर भी गौर किया जाना जरूरी है. उन्होंने कहा कि जिस दिन देश हिंदू राष्ट्र बन जाएगा और व्यवस्था उस के मुताबिक चलने लगेगी, उस दिन आरएसएस की भूमिका खत्म हो जाएगी और वह खुद को समाप्त कर लेगा. अब यह हिंदू राष्ट्र किस की कीमत पर बनेगा, इस की राह में कौन रोड़ा है? आंख मूंद कर भी कोई बता सकता है कि वह रोड़ा संविधान और मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था है.

अगर कोई शख्स संविधान और लोकतंत्र को खुलेआम चुनौती दे रहा हो और उस की कब्र खोदने की तैयारी कर रहा हो, और फिर इस कड़ी में उस की रक्षा करने वाली सेना के सामने सब से बड़ी सेना खड़ी करने का ऐलान कर रहा हो, तब किसी के लिए भी खतरे की आशंका को समझना कठिन नहीं होना चाहिए. अगर संघ उस मकसद को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ता है तो उस को रोकने वाली ताकतें भी कम नहीं हैं और न ही किसी रूप में कमजोर हैं. लिहाजा, ये बातें एक बड़े गृहयुद्ध की सी आशंका पैदा करती हैं.

बयानबयान का फर्क

कल्पना कीजिए कि भारतीय सेना की तुलना में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तैयारियों के संबंध में जो बयान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दिया है, वैसा ही बयान अगर असदुद्दीन ओवैसी ने या किसी अन्य मुसलिम, दलित या आदिवासी संगठन के नेता ने दिया होता तो सरकार, सत्तारूढ़ दल और मीडिया का रवैया क्या होता?

सरकार भले ही फौरीतौर पर बयान को नजरअंदाज कर जाती या उस के कुछ मंत्री कड़ी निंदा वाला बयान जारी कर देते, मगर सत्तारूढ़ दल तथा संघ के प्रवक्ता और देशभक्ति का व्यापार करने वाले टीवी चैनलों ने तो निश्चित ही आसमान सिर पर उठा लिया होता. ज्यादा कुछ नहीं तो कम से कम बयान देने वाले नेता और उस के संगठन को देशविरोधी तो करार दे ही दिया गया होता और देश के कुछेक शहरों में तो बयान देने वाले नेता के खिलाफ मुकदमे तक दर्ज करा दिए गए होते. हमारी अदालतें जो इस तरह के बयानों पर तुरंत गिरफ्तारी का आदेश दे देती हैं, इन ताकतों का हथियार बन जाती हैं.

हालांकि संघ प्रमुख के बयान पर भी फौरी प्रतिक्रियाओं का बाजार गरम रहा है. कांग्रेस सहित दूसरे विपक्षी दलों ने इस बयान को देश की सेना का अपमान करार दिया. सोशल मीडिया पर तरहतरह के चुटकलों के जरिए भागवत और संघ की खिल्ली उड़ाई गई. संघ और भाजपा की ओर से भागवत के बयान का बचाव करते हुए उस पर सफाई पेश की गई, कहा गया कि उन के बयान का गलत अर्थ निकाला गया. पर इस सब के बीच भागवत के बयान के मानों पर चर्चा लगभग नहीं के बराबर ही हुई.

जो भी व्यक्ति संघ और उस के काम करने के तरीके को ठीक तरह से जानता है, उसे मालूम है कि संघ का हर काम संगठित और योजनाबद्ध तरीक से होता है. सर संघचालक को कब क्या बोलना है, कैसे बोलना है और कितना बोलना है, यह भी पूरी तरह सुनियोजित होता है.

उन के बयान चाहे मुसलमानों की कथित बढ़ती आबादी के संबंध में हों, भारतीय विवाह संस्था के बारे में हों, हर हिंदू को 4 से अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह देने वाला हो, दलितों, आदिवासियों को पिछड़े वर्गों के आरक्षण को ले कर हो, लड़कियों और महिलाओं के पहनावे को ले कर हो या फिर बलात्कार जैसे अपराधों को आधुनिक शिक्षा का नतीजा बताने वाला हो, हर बयान के पीछे संघ की विचारधारा और मकसद छिपा होता है.

क्या है एजेंडा

देश के हर शहर, गांव, महल्ला, गली, सरकारी व गैर सरकारी दफ्तरों, स्कूलों और मैदानों में संघ व उस से जुड़े संगठनों के स्वयंसेवक हिंदुत्व की खास विचारधारा के तहत नियमित जुटते हैं और अनुशासित ढंग से अपने एजेंडे पर काम करते हैं. सेना की वरदी के समान प्रतीकात्मक तौर पर संघ के स्वयंसेवक भी खाकी निक्कर, सफेद शर्ट, काली टोपी और हाथ में लाठी धारण करते हैं. हालांकि, निक्कर की जगह अब काली फुलपैंट ने ले ली है. संघ की शाखाओं में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है, लेकिन सहयोगी संगठनों में महिलाओं के लिए दुर्गावाहिनी जैसे संगठन हैं, जो अपने मूल संगठन के एजेंडे के तहत काम करते हैं.

हर साल दशहरे के अवसर पर पथ संचालन के नाम पर देश के तमाम शहरों व गांवों में संघ के स्वयंसेवक अपनी वरदी धारण कर तथा लाठियां ले कर सड़कों पर निकल कर अपना शौर्य प्रदर्शन करते रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों से लाठियों के साथ अब अकसर तलवारों, बंदूकों और अन्य हथियारों का प्रदर्शन भी होने लगा है. दुर्गावाहिनी में शामिल महिलाएं भी ऐसे हथियारों का प्रदर्शन करती हैं. शस्त्रपूजा के नाम पर इन हथियारों की पूजा भी की जाती है.

संघ अपने स्वयंसेवकों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देने के लिए समयसमय पर शिविरों का आयोजन करता रहता है. इन शिविरों में सेना के अवकाशप्राप्त अफसरों को प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया जाता है.

यह गौरतलब है कि संघ 93 वर्र्ष पुराना संगठन है. भागवत से पहले 5 सर संघचालक हो चुके हैं. संघ की जो गतिविधियां आज चल रही हैं, वे भागवत के सर संघचालक बनने से पहले से जारी हैं, लेकिन इस से पहले किसी सर संघचालक ने ऐसा बयान नहीं दिया था जबकि उन के दौर में देश को युद्ध की स्थिति का सामना भी करना पड़ा. आज तो युद्ध जैसी कोई बात अभी तक नहीं है. फिर भागवत को यह बयान देने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

राजनीतिक ताकत भी संघ ने पर्याप्त तौर पर अर्जित कर ली है, जिस के बूते वह केंद्र सहित देश के 19 राज्यों में सत्ता पर काबिज है. वर्षों की तैयारी और सत्ता प्रतिष्ठान से वह देश में एक सशस्त्र ताकत के तौर पर तैयार हो चुका है. सेना के कई अवकाशप्राप्त अफसर संघ के विभिन्न आनुषंगिक संगठनों में काम कर रहे हैं.

संघ अपने प्रचार यानी कि अफवाह फैलाने वाले तंत्र का परीक्षण भी वर्षों से समयसमय पर करता रहा है. इस संदर्भ में गणेश प्रतिमाओं को दूध पिलाने वाला वाकेआ तो कुख्यात है ही. संघ प्रमुख भागवत के बयान का सीधा आशय यह है कि आज तो जरूरत नहीं है क्योंकि आज हम सत्ता में हैं, लेकिन कल अगर हमारे प्रतिकूल कोई स्थिति आई तो संघ की यह सैन्य तैयारी भारतीय सेना को भी चुनौती दे सकती है और देश में गृहयुद्ध हुआ तो उथलपुथल मच सकती है.

संघ की विचारधारा से असहमति रखने वाली सामाजिक व राजनीतिक ताकतों के लिए संघ का बयान एक संगीन चेतावनी है, जिसे महज सेना के अपमान से जोड़ कर न देखा जाए और न ही उस की खिल्ली उड़ा कर खारिज किया जाए.

आप भी बचें जानलेवा सैल्फी से

कहीं आप को भी सैल्फी लेने की लत तो नहीं है? कुछ विशेष पलों को यादगार बनाने वाली सैल्फी आप की जान को खतरा तो नहीं पैदा कर रही? एक अध्ययन के अनुसार, सैल्फी लेने की लत घातक हो सकती है.

कारनेग मैलन यूनिवर्सिटी और अन्य संस्थानों के अध्ययनकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन ‘मी, माईसैल्फ ऐंड माई किल्फी : कैरेक्टराइजिंग ऐंड प्रीवैंटिंग सैल्फी डैथ्स’ के अनुसार, 2014 में दुनियाभर में सैल्फी के कारण हुईं 127 में से अकेले भारत में 76 मौतें हुई. ये मृतक खतरनाक जगहों पर सैल्फी ले रहे थे.

10 जनवरी, 2016 को बैंडस्टैंड, मुंबई में सैल्फी लेते हुए 3 युवतियां समुद्र में बह गईं, एक व्यक्ति ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उस की भी मृत्यु हो गई. अगस्त 2016 में महाराष्ट्र की ही 27 वर्षीया एक वकील की पुणे के पास मंदोषी घाट पर अपने पति के साथ सैल्फी लेते हुए गिर कर मृत्यु हो गई. नवंबर में लायंस पौइंट, लोनावाला पर 25 वर्षीय एक युवक की सैल्फी लेते हुए मृत्यु हो गई.

2015 में भी सैल्फी के कारण कई मौतें हुईं. आगरा के पास सामने से आती हुई ट्रेन के सामने पोज बनाते हुए कुछ विद्यार्थियों की मृत्यु हो गई. इसी वर्ष नागपुर में नौका पर सैल्फी लेते हुए 7 युवक डूब गए. एक जापानी युवक की भी ताजमहल पर सैल्फी लेते हुए गिरने के बाद सिर में लगी और चोट से मृत्यु हो गई थी.

एक अध्ययन के अनुसार, विश्वभर में सैल्फी से हुई मौतों का एक सामान्य कारण है, किसी बिल्डिंग या पहाड़ से नीचे गिरना. इस कारण से अब तक 29 जानें गई हैं. इस के बाद सैल्फी के चक्कर में 11 मौतें हुईं.

कुछ जगहों पर तो सैल्फी स्टिक को बैन ही कर दिया गया है, जैसे, कांस फिल्म फैस्टिवल, विंगल्डन, द कोलोसियम, रोम, कई थीम पार्क्स, द नैशनल गैलरी, लंदन, द गगेनहेम, न्यूयौर्क में द मैट्रोपोलिटन म्यूजियम औफ आर्ट, पैलेस म्यूजियम, बीजिंग, कोशैला म्यूजिक फैस्टिवल और बुल्स फैस्टिवल, स्पेन.

दांव पर जान

मुंबई के एवार्ड औफिसर किरण दिघवकर का कहना है कि मार्च 2017 में सीएसटी और बीएमसी बिल्डिंग के बाहर स्पैशल जगह बनाई जाएगी, सैल्फी जोन, क्योंकि भारत में यहां काफी सैल्फी ली जाती हैं. यह उचित रैलिंग वाली जमीन से 5 फुट ऊपर बनेगी.

क्या आप ने ब्रैगी बैन सुना है? ब्रैगी किसी खूबसूरत लोकेशन पर या जिम में हैवीवेट उठाते हुए सैल्फी है जो दोस्तों और परिवार को चिढ़ाने के लिए ली जाती है. दक्षिण फ्रांस में तो एक टूरिस्ट बीच को नो ब्रैगी जोन बना दिया गया है.

रेलवे प्रोटैक्शन फोर्स द्वारा प्रस्तावित नए रेलवे ऐक्ट के अनुसार, ट्रेन के पास खतरनाक सैल्फी लेने वाले को 5 वर्षों की सजा हो सकती है. यह कदम युवाओं में बढ़ते सैल्फी क्रेज को रोकने के लिए उठाया गया है.

यह जीवन एक अमूल्य उपहार है, इसे सस्ता न समझें, इस का महत्त्व समझें. टैक्नोलौजी मानव विकास के लिए है. सैल्फी के चक्कर में पड़ कर, अपने व्यर्थ के शौक में अपने जीवन को दांव पर न लगाएं.

लिट्टीचोखा बेच कर बना सुपरस्टार : खेसारी लाल

बिहार के छपरा जिले के रहने वाले खेसारी लाल कामकाज की तलाश में दिल्ली आए थे और ओखला इलाके में रहने लगे थे. बहुत तलाश करने के बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिली तो वे अपने पिता के साथ लिट्टीचोखा बेचने लगे. खेसारी लाल को भोजपुरी गाने गाना बहुत पसंद था. लिट्टीचोखा बेचते समय वे कई लोकगीत गाते रहते थे. दुकान पर आने वाले लोगों ने उन की बहुत तारीफ की.

दोस्तों के सुझाव पर खेसारी लाल ने भोजपुरी गाने का कैसेट निकाला. यहां से उन्हें कामयाबी मिलनी शुरू हुई. दिल्ली में रहने के चलते उन्हें कैसेट कंपनियों के पास आनेजाने में सहूलियत भी रही.

भोजपुरी फिल्मों में गायक ही हीरो बन जाता है, यही सोच कर खेसारी लाल ने भी ऐक्टिंग की दुनिया में कदम रखा. साल 2011 में फिल्म ‘साजन चले ससुराल’ के बाद खेसारी लाल अब तक 55 फिल्में कर चुके हैं. उन के म्यूजिक अलबम तो पसंद किए ही जा रहे हैं, वे सब से महंगे स्टेज आर्टिस्ट भी हैं.

फिल्म ‘दबंग सरकार’ की शूटिंग करने खेसारी लाल लखनऊ आए तो उन से मुलाकात हुई. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

फिल्म ‘दबंग सरकार’ में आप का क्या रोल है?

भोजपुरी फिल्में अपने ट्रेंड पर ही चलतीबनती हैं. फिल्म ‘दबंग सरकार’ मौजूदा ट्रैंड से काफी अलग है. यह साफसुथरी पारिवारिक फिल्म है. इस में मेरी भूमिका एक पुलिस अफसर की है. इस रोल को करने के लिए मैं ने अपना 12 किलो वजन कम किया है, जिस से मैं पुलिस वाले की तरह फिट दिख सकूं.

मैं ने अभी तक अपने बाल किसी रोल के लिए नहीं कटवाए थे, पर इस बार मैं ने पहली बार अपने बाल कटवाए हैं. इस ऐक्शन फिल्म में मेरे साथ 2 नई हीरोइनें आकांक्षा अवस्थी और दीपिका त्रिपाठी भी हैं.

आप ने अपना वजन कैसे कम किया?

डाइट और ऐक्सरसाइज के दम पर मैं ने अपने वजन को कम किया. उस का फर्क अब मुझे खुद दिख रहा है. मैं अंदर से खुद को फिट महसूस कर रहा हूं. मुझ में एक पुलिस वाले का सा अहसास होने लगा है. साधारण फिल्मों में ढीलेढाले पुलिस वाले चल जाते हैं, पर यहां पर मैं ने खुद को रोल के लिए फिट किया, जिस से रोल अच्छा हो सके.

आप के गाने बहुत चुटीले होते हैं. डबल मीनिंग के लिए इन की बुराई भी होती है. आप क्या कहेंगे?

भोजपुरी फिल्मों और म्यूजिक की दुनिया में डबल मीनिंग बातें काफी लंबे समय से चलन में हैं. इस की खास वजह यह है कि लोग ऐसे गानों को पसंद करते हैं. मैं ने भी ऐसे तमाम गाने गाए हैं.

मैं इसे अपनी गलती भी मानता हूं. अब मुझे अहसास हुआ है कि हमारी जिंदगी पर ऐसे गानों का काफी गहरा असर पड़ता है.

आप को कैसे पता लगा कि डबल मीनिंग गाने नहीं गाने चाहिए?

मेरी फिल्में सभी देखते हैं. मां ने मेरी कोई फिल्म नहीं देखी थी. जब मेरी फिल्म ‘मेहंदी लगा के रखना’ आई तो मां ने उस के बारे में सुना. पहली बार उन्होंने इच्छा जताई कि वे यह फिल्म देखेंगी. फिल्म देखने के बाद उन्होंने कहा कि तुम ऐसी ही फिल्में किया करो, मुझे अच्छा लगेगा. तब से मैं साफसुथरी फिल्में करने लगा हूं. अब मैं अपने गानों में भी सुधार करना चाहता हूं.

लिट्टीचोखा से फिल्मी परदे तक के अपने सफर को आप कैसे देखते हैं?

बदलाव तो हुआ है जो बहुत अच्छा रहा है. मेरी भी पहचान बन गई है. इस में मेरी शादी का भी अहम रोल रहा है. जिस साल मेरी शादी हुई, तभी मेरी पहली फिल्म भी रिलीज हुई. फिल्म हिट हो गई. अब मेरे गाने भी पहले से ज्यादा लोगों तक पहुंचने लगे हैं. अच्छे स्टेज कार्यक्रम भी मिलने लगे हैं.

मैं अपनी जिंदगी में आए बदलाव में शादी और अपनी पत्नी का खास योगदान मानता हूं. मेरे 2 बच्चे हैं. मेरे लिए परिवार ही सब से पहले है.

भोजपुरी फिल्मों में हीरोइन के साथ जोड़ी बना कर फिल्में करने का रिवाज ज्यादा है, क्यों?

मैं तो नईपुरानी हर हीरोइन के साथ काम करता हूं. फिल्म ‘दबंग सरकार’ की दोनों ही हीरोइनें नई ही हैं. मुझे कहानी पसंद आनी चाहिए. भोजपुरी फिल्म बनाने वाले प्रोड्यूसरडायरैक्टर बहुत कम नई कहानी पर काम करते हैं. वे भी बने बनाए ढर्रे पर फिल्म बनाते हैं.

डायरैक्टर योगेश राज मिश्रा ने फिल्म ‘दबंग सरकार’ में अलग कहानी की बुनियाद रखी है. इस में प्रोड्यूसर राहुल वोहरा और दीपक कुमार का भी उन्हें साथ मिला. मुझे भी काम करने में मजा आ रहा है. इस फिल्म में गाने, डांस और कहानी के बीच एक बैलैंस देखने को मिलेगा.

भोजपुरी फिल्में अपने दायरे से बाहर नहीं आ पा रही हैं. इस की क्या वजह है?

अच्छी भोजपुरी फिल्में अपनी पहचान बनाने में कामयाब होती हैं. फिल्म ‘दबंग सरकार’ 2 करोड़ रुपए से भी ज्यादा के बजट की फिल्म है. अच्छी सोच और तैयारी के साथ यह फिल्म बन रही है. हमारी मिलीजुली कोशिश यह है कि यह फिल्म अपने बाजार से बाहर भी दिखे.

भोजपुरी सिनेमा की वजह से ही सिंगल स्क्रीन सिनेमाहाल चल रहे हैं. अब इन फिल्मों को मल्टीप्लैक्स में भी दिखना चाहिए, तभी यह बाजार आगे बढ़ेगा. इस का फायदा पूरी भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को होगा.

दिल हथेली पर

अमित और मेनका चुपचाप बैठे हुए कुछ सोच रहे थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए. तभी कालबेल बजी. मेनका ने दरवाजा खोला. सामने नरेन को देख चेहरे पर मुसकराहट लाते हुए वह बोली, ‘‘अरे जीजाजी आप… आइए.’’

‘‘नमस्कार. मैं इधर से जा रहा था तो सोचा कि आज आप लोगों से मिलता चलूं,’’ नरेन ने कमरे में आते हुए कहा. अमित ने कहा, ‘‘आओ नरेन, कैसे हो? अल्पना कैसी है?’’

नरेन ने उन दोनों के चेहरे पर फैली चिंता की लकीरों को पढ़ते हुए कहा, ‘‘हम दोनों तो ठीक हैं, पर मैं देख रहा हूं कि आप किसी उलझन में हैं.’’ ‘‘ठीक कहते हो तुम…’’ अमित बोला, ‘‘तुम तो जानते ही हो नरेन कि मेनका मां बनने वाली है. दिल्ली से बहन कुसुम को आना था, पर आज ही उस का फोन आया कि उस को पीलिया हो गया है. वह आ नहीं सकेगी. सोच रहे हैं कि किसी नर्स का इंतजाम कर लें.’’

‘‘नर्स क्यों? हमें भूल गए हो क्या? आप जब कहेंगे अल्पना अपनी दीदी की सेवा में आ जाएगी,’’ नरेन ने कहा. ‘‘यह ठीक रहेगा,’’ मेनका बोली.

अमित को अपनी शादी की एक घटना याद हो आई. 4 साल पहले किसी शादी में एक खूबसूरत लड़की उस से हंसहंस कर बहुत मजाक कर रही थी. वह सभी लड़कियों में सब से ज्यादा खूबसूरत थी. अमित की नजर भी बारबार उस लड़की पर चली जाती थी. पता चला कि वह अल्पना है, मेनका की मौसेरी बहन.

अब अमित ने अल्पना के आने के बारे में सुना तो वह बहुत खुश हुआ. मेनका को ठीक समय पर बच्चा हुआ. नर्सिंग होम में उस ने एक बेटे को जन्म दिया.

4 दिन बाद मेनका को नर्सिंग होम से छुट्टी मिल गई. शाम को नरेन घर आया तो परेशान व चिंतित सा था. उसे देखते ही अमित ने पूछा, ‘‘क्या बात है नरेन, कुछ परेशान से लग रहे हो?’’

‘‘हां, मुझे मुंबई जाना पड़ेगा.’’ ‘‘क्यों?’’

‘‘बौस ने हैड औफिस के कई सारे जरूरी काम बता दिए हैं.’’ ‘‘वहां कितने दिन लग जाएंगे?’’

‘‘10 दिन. आज ही सीट रिजर्व करा कर आ रहा हूं. 2 दिन बाद जाना है. अब अल्पना यहीं अपनी दीदी की सेवा में रहेगी,’’ नरेन ने कहा. मेनका बोल उठी, ‘‘अल्पना मेरी पूरी सेवा कर रही है. यह देखने में जितनी खूबसूरत है, इस के काम तो इस से भी ज्यादा खूबसूरत हैं.’’

‘‘बस दीदी, बस. इतनी तारीफ न करो कि खुशी के मारे मेरे हाथपैर ही फूल जाएं और मैं कुछ भी काम न कर सकूं,’’ कह कर अल्पना हंस दी. 2 दिन बाद नरेन मुंबई चला गया.

अगले दिन शाम को अमित दफ्तर से घर लौटा तो अल्पना सोफे पर बैठी कुछ सोच रही थी. मेनका दूसरे कमरे में थी. अमित ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही हो अल्पना?’’

‘‘कुछ नहीं,’’ अल्पना ने कहा. ‘‘मैं जानता हूं.’’

‘‘क्या?’’ ‘‘नरेन के मुंबई जाने से तुम्हारा मन नहीं लग रहा?है.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है. वे जिस कंपनी में काम करते हैं, वहां बाहर जाना होता रहता है.’’ ‘‘जैसे साली आधी घरवाली होती है वैसे ही जीजा भी आधा घरवाला होता है. मैं हूं न. मुझ से काम नहीं चलेगा क्या?’’ अमित ने अल्पना की आंखों में झांकते हुए कहा.

‘‘अगर जीजाओं से काम चल जाता तो सालियां शादी ही क्यों करतीं?’’ कहते हुए अल्पना हंस दी. 5-6 दिन इसी तरह हंसीमजाक में बीत गए. एक रात अमित बिस्तर पर बैठा हुआ अपने मोबाइल फोन पर टाइमपास कर रहा था. जब आंखें थकने लगीं तो वह बिस्तर पर लेट गया.

तभी अमित ने आंगन में अल्पना को बाथरूम की तरफ जाते देखा. वह मन ही मन बहुत खुश हुआ. जब अल्पना लौटी तो अमित ने धीरे से पुकारा.

अल्पना ने कमरे में आते ही पूछा, ‘‘अभी तक आप सोए नहीं जीजाजी?’’ ‘‘नींद ही नहीं आ रही है. मेनका सो गई है क्या?’’

‘‘और क्या वे भी आप की तरह करवटें बदलेंगी?’’ ‘‘मुझे नींद क्यों नहीं आ रही है?’’

‘‘मन में होगा कुछ.’’ ‘‘बता दूं मन की बात?’’

‘‘बताओ या रहने दो, पर अभी आप को एक महीना और करवटें बदलनी पड़ेंगी.’’ ‘‘बैठो न जरा,’’ कहते हुए अमित ने अल्पना की कलाई पकड़ ली.

‘‘छोडि़ए, दीदी जाग रही हैं.’’ अमित ने घबरा कर एकदम कलाई छोड़ दी.

‘‘डर गए न? डरपोक कहीं के,’’ मुसकराते हुए अल्पना चली गई. सुबह दफ्तर जाने से पहले अमित मेनका के पास बैठा हुआ कुछ बातें कर रहा था. मुन्ना बराबर में सो रहा था.

तभी अल्पना कमरे में आई और अमित की ओर देखते हुए बोली, ‘‘जीजाजी, आप तो बहुत बेशर्म हैं.’’ यह सुनते ही अमित के चेहरे का रंग उड़ गया. दिल की धड़कनें बढ़ गईं. वह दबी आवाज में बोला, ‘‘क्यों?’’

‘‘आप ने अभी तक मुन्ने के आने की खुशी में दावत तो क्या, मुंह भी मीठा नहीं कराया.’’ अमित ने राहत की सांस ली. वह बोला, ‘‘सौरी, आज आप की यह शिकायत भी दूर हो जाएगी.’’

शाम को अमित दफ्तर से लौटा तो उस के हाथ में मिठाई का डब्बा था. वह सीधा रसोई में पहुंचा. अल्पना सब्जी बनाने की तैयारी कर रही थी. अमित ने डब्बा खोल कर अल्पना के सामने करते हुए कहा, ‘‘लो साली साहिबा, मुंह मीठा करो और अपनी शिकायत दूर करो.’’

मिठाई का एक टुकड़ा उठा कर खाते हुए अल्पना ने कहा, ‘‘मिठाई अच्छी है, लेकिन इस मिठाई से यह न समझ लेना कि साली की दावत हो गई है.’’ ‘‘नहीं अल्पना, बिलकुल नहीं. दावत चाहे जैसी और कभी भी ले सकती हो. कहो तो आज ही चलें किसी होटल में. एक कमरा भी बुक करा लूंगा. दावत तो सारी रात चलेगी न.’’

‘‘दावत देना चाहते हो या वसूलना चाहते हो?’’ कह कर अल्पना हंस पड़ी. अमित से कोई जवाब न बन पड़ा. वह चुपचाप देखता रह गया.

एक सुबह अमित देर तक सो रहा था. कमरे में घुसते ही अल्पना ने कहा, ‘‘उठिए साहब, 8 बज गए हैं. आज छुट्टी है क्या?’’ ‘‘रात 2 बजे तक तो मुझे नींद ही नहीं आई.’’

‘‘दीदी को याद करते रहे थे क्या?’’ ‘‘मेनका को नहीं तुम्हें. अल्पना, रातभर मैं तुम्हारे साथ सपने में पता नहीं कहांकहां घूमता रहा.’’

‘‘उठो… ये बातें फिर कभी कर लेना. फिर कहोगे दफ्तर जाने में देर हो रही है.’’ ‘‘अच्छा यह बताओ कि नरेन की वापसी कब तक है?’’

‘‘कह रहे थे कि काम बढ़ गया है. शायद 4-5 दिन और लग जाएं. अभी कुछ पक्का नहीं है. वे कह रहे थे कि हवाईजहाज से दिल्ली तक पहुंच जाऊंगा, उस के बाद ट्रेन से यहां तक आ जाऊंगा.’’ ‘‘अल्पना, तुम मुझे बहुत तड़पा रही हो. मेरे गले लग कर किसी रात को यह तड़प दूर कर दो न.’’

‘‘बसबस जीजाजी, रात की बातें रात को कर लेना. अब उठो और दफ्तर जाने की तैयारी करो. मैं नाश्ता तैयार कर रही हूं,’’ अल्पना ने कहा और रसोई की ओर चली गई. एक शाम दफ्तर से लौटते समय अमित ने नींद की गोलियां खरीद लीं. आज की रात वह किसी बहाने से मेनका को 2 गोलियां खिला देगा. अल्पना को भी पता नहीं चलने देगा. जब मेनका गहरी नींद में सो जाएगी तो वह अल्पना को अपनी बना लेगा.

अमित खुश हो कर घर पहुंचा तो देखा कि अल्पना मेनका के पास बैठी हुई थी. ‘‘अभी नरेन का फोन आया है. वह ट्रेन से आ रहा है. ट्रेन एक घंटे बाद स्टेशन पर पहुंच जाएगी. उस का मोबाइल फोन दिल्ली स्टेशन पर कहीं गिर गया. उस ने किसी और के मोबाइल फोन से यह बताया है. तुम उसे लाने स्टेशन चले जाना. वह मेन गेट के बाहर मिलेगा,’’ मेनका ने कहा.

अमित को जरा भी अच्छा नहीं लगा कि नरेन आ रहा है. आज की रात तो वह अल्पना को अपनी बनाने जा रहा था. उसे लगा कि नरेन नहीं बल्कि उस के रास्ते का पत्थर आ रहा है. अमित ने अल्पना की ओर देखते हुए कहा, ‘‘ठीक है, मैं नरेन को लेने स्टेशन चला जाऊंगा. वैसे, तुम्हारे मन में लड्डू फूट रहे होंगे कि इतने दिनों बाद साजन घर लौट रहे हैं.’’

‘‘यह भी कोई कहने की बात है,’’ अल्पना बोली. ‘‘पर, नरेन को कल फोन तो करना चाहिए था.’’

‘‘कह रहे थे कि अचानक पहुंच कर सरप्राइज देंगे,’’ अल्पना ने कहा. अमित उदास मन से स्टेशन पहुंचा. नरेन को देख वह जबरदस्ती मुसकराया और मोटरसाइकिल पर बिठा कर चल दिया.

रास्ते में नरेन मुंबई की बातें बता रहा था, पर अमित केवल ‘हांहूं’ कर रहा था. उस का मूड खराब हो चुका था. भीड़ भरे बाजार में एक शराबी बीच सड़क पर नाच रहा था. वह अमित की मोटरसाइकिल से टकराताटकराता बचा. अमित ने मोटरसाइकिल रोक दी और शराबी के साथ झगड़ने लगा.

शराबी ने अमित पर हाथ उठाना चाहा तो नरेन ने उसे एक थप्पड़ मार दिया. शराबी ने जेब से चाकू निकाला और नरेन पर वार किया. नरेन बच तो गया, पर चाकू से उस का हाथ थोड़ा जख्मी हो गया. यह देख कर वह शराबी वहां से भाग निकला.

पास ही के एक नर्सिंग होम से मरहमपट्टी करा कर लौटते हुए अमित ने नरेन से कहा, ‘‘मेरी वजह से तुम्हें यह चोट लग गई है.’’ नरेन बोला, ‘‘कोई बात नहीं भाई साहब. मैं आप को अपना बड़ा भाई मानता हूं. मैं तो उन लोगों में से हूं जो किसी को अपना बना कर जान दे देते हैं. उन की पीठ में छुरा नहीं घोंपते.

‘‘शरीर के घाव तो भर जाते हैं भाई साहब, पर दिल के घाव हमेशा रिसते रहते हैं.’’ नरेन की यह बात सुन कर अमित सन्न रह गया. वह तो हवस की गहरी खाई में गिरने के लिए आंखें मूंदे चला जा रहा था. नरेन का हक छीनने जा रहा था. उस से धोखा करने जा रहा था. उस का मन पछतावे से भर उठा.

दोनों घर पहुंचे तो नरेन के हाथ में पट्टी देख कर मेनका व अल्पना दोनों घबरा गईं. अमित ने पूरी घटना बता दी. कुछ देर बाद अमित रसोई में चला गया. अल्पना खाना बना रही थी.

नरेन मेनका के पास बैठा बात कर रहा था. अमित को देखते ही अल्पना ने कहा, ‘‘जीजाजी, आप तो बातोंबातों में फिसल ही गए. क्या सारे मर्द आप की तरह होते हैं?’’

‘‘क्या मतलब…?’’ ‘‘लगता है दिल हथेली पर लिए घूमते हो कि कोई मिले तो उसे दे दिया जाए. आप को तो दफ्तर में कोई भी बेवकूफ बना सकती है. हो सकता है कि कोई बना भी रही हो.

‘‘आप ने तो मेरे हंसीमजाक को कुछ और ही समझ लिया. इस रिश्ते में तो मजाक चलता है, पर इस का मतलब यह तो नहीं कि… अब आप यह बताइए कि मैं आप को जीजाजी कहूं या मजनूं?’’ ‘‘अल्पना, तुम मेनका से कुछ मत कहना,’’ अमित ने कहा.

‘‘मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगी पर आप तो बहुत डरपोक हैं,’’ कह कर अल्पना मुसकरा उठी. अमित चुपचाप रसोईघर से बाहर निकल गया.

आंख खुलती नहीं हादसों के बाद भी

31 दिसंबर, 2017 : मुंबई. रैस्टोरैंट में नए साल के जश्न के दौरान लगी आग से 14 मरे.

17 अक्तूबर, 2016 : भुवनेश्वर. अस्पताल में लगी आग से 22 मरे व 120 घायल.

27 फरवरी, 2013 : कोलकाता. बाजार में लगी आग से 19 मरे व 17 जख्मी.

5 सितंबर, 2012 : शिवकाशी. पटाका फैक्टरी में लगी आग से 54 मरे व 70 जख्मी.

9 दिसंबर, 2011 : कोलकाता. अस्पताल में लगी आग से 19 मरे व 17 जख्मी.

10 अप्रैल, 2006 : मेरठ. विक्टोरिया पार्क की नुमाइश में लगी आग से 65 मरे व 150 जख्मी.

15 सितंबर, 2005 : पटना. नाजायज पटाका फैक्टरी में लगी आग से 35 मरे व 50 जख्मी.

16 जुलाई, 2004 : कुंभकोणम. स्कूल में लगी आग से 94 बच्चे मरे.

24 मई, 2002 : आगरा. जूता फैक्टरी में लगी आग से 42 मरे.

6 अगस्त, 2001 : इरावदी. मानसिक अस्पताल में लगी आग से 28 मरीज मरे.

13 जून, 1997 : दिल्ली. उपहार सिनेमा में लगी आग से 59 मरे व 103 जख्मी.

23 दिसंबर, 1995 : डबवाली. स्कूल में आग से 442 मरे व 160 जख्मी.

ऐसे दर्दनाक हादसों की खबरें अकसर सुर्खियों में रहती हैं लेकिन सबक नहीं लिया जाता. ज्यादातर जगहों पर कूवत से ज्यादा भीड़, बेतरतीबी, बदइंतजामी, कामचोरी व लापरवाही के चलते अकसर आग लग जाती है.

अब गलीगली में पब व रैस्टोरैंट धड़ल्ले से खुल रहे हैं. मुंबई में बंद पड़ी अकेली कमला मिल की खस्ताहाल इमारत में 30 से भी ज्यादा मनोरंजन केंद्र चल रहे हैं. ज्यादातर में वहां आने वाले व काम करने वालों की हिफाजत के इंतजाम अधूरे हैं.

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राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण  के मुताबिक, हमारे देश में दमकल केंद्र 3.5 फीसदी, दमकल वाहन 19.6 फीसदी व दमकल मुलाजिम 3.72 फीसदी कम हैं. दमकल महकमे में मौजूद ज्यादातर साधन बरसों पुराने हैं. नई तकनीक व उपकरणों की भी भारी कमी है.

अंजाम पर रोना आया

हालांकि जानमाल की हिफाजत को सब से पहले तरजीह देनी चाहिए, लेकिन हैरत होती है कि हमारे देश में आम आदमी की जान की कोई कीमत ही नहीं है. आग बुझाने के ज्यादातर उपकरण सिर्फ दिखावे व खानापूरी करने के लिए लगाए जाते हैं. जरूरत पड़ने पर वे कारगर साबित नहीं होते. भ्रष्ट व निकम्मे अफसर घूस ले कर बिना जांचपड़ताल किए ही नो औब्जैक्शन सर्टिफिकेट दे देते हैं.

इस के अलावा रसूख, दबाव व कनवर्जन फीस ले कर रिहायशी इलाकों में भी कारोबारी इस्तेमाल की इजाजत दे दी जाती है. उस के बाद निगरानी सिर्फ कागजों पर व नाम के लिए होती है. ज्यादातर मालिक सिर्फ महीना देते हैं, नियमों पर कोई ध्यान ही नहीं देते.

मूंद लेते हैं आंखें

आग लगने पर नुकसान इसलिए भी ज्यादा होता है, क्योंकि बाहर निकलने के लिए रास्ते कम व बेहद संकरे होते हैं. सीढि़यों से हादसों के वक्त निकासी नाकाफी हो जाती है, ऊपर से बगैर सोचेसमझे हर कदम पर प्लास्टिक का अंधाधुंध इस्तेमाल करना भी आग लगने से ज्यादा नुकसान होता है.

शादीब्याह, जागरण व जलसों में रोशनी व पंखों के लिए बिजली के तार व उन के जोड़ जहांतहां खुले हुए फैले रहते हैं. किसी को कोई परवाह नहीं होती कि जरा सी चिनगारी से तंबू में लगी आग सबकुछ स्वाहा कर सकती है.

आग लगने के बाद किए जाने वाले उपायों के बारे में कहीं कोई सार्वजनिक चर्चा या प्रचारप्रसार नहीं किया जाता. नतीजतन, जानकारी न होने से लोग बिजली से लगने वाली आग पर भी पानी डालते दिखाई देते हैं.

क्या है वजह

जनता में जागरूकता व जानकारी की कमी इस की एक बड़ी वजह है. ज्यादातर लोग भाग्यवादी, कम पढ़ेलिखे, आलसी व निकम्मे हैं. धर्म के ठेकेदार बराबर यही घुट्टी पिलाते रहते हैं कि जिंदगी की डोर हमारे हाथ में नहीं, बल्कि किसी और के हाथ में है. हादसे हमारे पिछले जन्मों में किए गए पापों का फल हैं, जिन्हें भोगना ही पड़ता है.

ज्यादातर लोग हादसों को भी तकदीर व ग्रहचाल की खराबी मानते हैं. वे हादसों से बचने के लिए सही और वैज्ञानिक तरीके अपनाना दूर कोई कोशिश ही नहीं करते. उन्हें बताया, सिखाया जाता है कि कथा, कीर्तन, सत्संग, मंदिरों, तीर्थों, कुंभ जैसे धार्मिक मेलों में मरने से सीधा स्वर्ग मिलता है. बहुत से लोग मानते हैं कि एक न एक दिन तो मरना ही है.

इतना ही नहीं, लोग हादसों व नजर से बचने के लिए माथे पर काला टीका लगाते हैं. अंगूठी में काला पत्थर पहनते हैं. कार में देवी की चुनरी टांगते हैं. सथिए का निशान लगाते हैं. दुकान पर नीबू व मिर्च की माला टांगते है. शनिवार के दिन लोहे पर तेल चढ़ाते हैं.

आम जनता में बुरी तरह फैले इन अंधविश्वासों के चलते बहुत से लोगों की दुकानदारी धड़ल्ले से चल रही है.

ये हैं उपाय

प्लास्टिक, फोम, परदे, सिंथैटिक कपड़े, कागज, फर्नीचर, रबड़, अलकोहल वगैरह कैमिकल्स, रसोई गैस, डीजल, पैट्रोल व मिट्टी का तेल जल्दी आग पकड़ते हैं. इन के इस्तेमाल में पूरी चौकसी रखनी चाहिए. आग से ज्यादा नुकसान अफरातफरी मचने पर होता है. सूझबूझ, सही उपाय, हिम्मत, नई तकनीक, बेहतर उपकरण हों तो आग पर शुरू में काबू पाया जा सकता है.

आग से हिफाजत के कायदेकानूनों को सख्ती से लागू किया जाए. साथ ही आग से बचाव के सही उपायों की जानकारी मेले, नुमाइश, प्रचारप्रसार व ट्रेनिंग के जरीए सभी को दी जानी चाहिए. फायर महकमे के मुलाजिमों को स्कूलकालेजों, संस्थाओं व बस्तियों में जा कर आग से सावधानी व बचाव के उपाय बताने चाहिए.

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रात को गैस का नौब बंद कर दें. जली गैस पर तेल रख कर ज्यादा देर तक न छोड़ें. दीपक, धूप व अगरबत्ती जला कर बाहर न जाएं. परदों के पास गरम इस्तिरी व मोमबत्ती न रखें. बाथरूम में बिजली के स्विच पानी से दूर लगवाएं. गैस गीजर का सिलैंडर बाहर रखें. बाहर जाने से पहले बिजली के सभी स्विच व इनवर्टर बंद कर दें. फ्रिज का दरवाजा खुला न छोड़ें, वरना कंप्रैशर गरम हो कर फटने से आग लग सकती?है.

पहले बालटी से रेत या मिट्टी फेंक कर, ठंडा कर के व बीटर से पीट कर छोटी आग बुझाते थे. न जलने वाले खास कंबल, स्मोक डिटैक्टर व आग बुझाने वाले स्प्रे, पंप, हौज रील जैसे नए व कारगर उपकरण अब आ गए हैं. इन की जानकारी व मौजूदगी बनाए रखें, ताकि बाद में पछताना न पड़े.

आग लगने पर ऐसा करें

आग लगने पर घबरा कर इधरउधर भागने के बजाय सूझबूझ से काम लें. सब से पहले आग लगने की वजह खोजें. फायर ब्रिगेड को खबर दें. उसे बढ़ने से रोकें. आग बुझाने के उपाय करें. अपने मुंह व नाक पर गीला कपड़ा रखें. मौजूद लोगों को खुली व महफूज जगह ले जाएं. लकड़ी, कोयले, कपड़े व कचरे में लगी आग पानी डालने से बुझ जाती है.

तेल, पैट्रोल, वार्निश व तारकोल की आग पर पानी न डालें. इन्हें ढक कर बुझाएं. गैस सिलैंडर में आग लगने पर गीला बोरा वगैरह डालें. गैस सिलैंडर का नौब बंद करें. बिजली की ओवर लोडिंग, ओवर हीटिंग, टूटे हुए उपकरणों वगैरह से आग लगने पर मेन स्विच बंद करें, ताकि पावर सप्लाई बंद हो जाए. वहां पानी न डालें व कार्बन डाईऔक्साइड गैस से बुझाएं.

कड़ाही में गरम तेल से आग लगे तब भी पानी न डालें बल्कि उसे थाली या परात वगैरह से ढक दें. आग कपड़ों में लगे तो लेट कर लोटपोट हों व कंबल डालें. कोई इलैक्ट्रौनिक उपकरण जले तो रेतमिट्टी डालें.

आग बुझाने वाले यंत्र की ऊपरी नोक पर लगी सेफ्टी पिन हटाएं. वाशर को दबाएं. उस से निकली गैस को लपटों पर छोड़ने की जगह जहां से आग उठ रही हो उस जगह की ओर छोड़ें. जले लोगों को जल्द से जल्द नजदीकी अस्पताल ले जाएं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दलित प्रेम दिखावा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत जनवरी महीने के पहले पखवारे पूरे वक्त मध्य प्रदेश में थे. मकसद साफ था कि अपनी सालाना बैठकों में मध्य प्रदेश समेत राजस्थान और छत्तीसगढ़ के लिए चुनावी तैयारियां करना. वे 11 से 13 जनवरी तक विदिशा में रहे और यहीं से सार की बातें कहीं जो साफतौर पर भारतीय जनता पार्टी का घोषणापत्र है.

इस के पहले उज्जैन और भोपाल में भी संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ के पदाधिकारियों से चर्चा की थी. मुद्दा था गुजरात में भाजपा को वोट और सीटें कम क्यों मिलीं? नतीजा यह निकला कि दलितों ने उत्तर प्रदेश की तरह गुजरात में न तो भाजपा का साथ दिया और न ही उस पर भरोसा किया, इसलिए उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं आए.

विदिशा आ कर मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों और भाजपाइयों को एकलौता मंत्र यह दिया कि अगर सत्ता का लड्डू खाना है तो दलितों में तिलगुड़ जम कर बांटो. मौका मकर संक्रांति का था इसलिए तिलगुड़ बांटने की नसीहत उन्होंने दी थी.

फिर समरसता की साजिश

27 सितंबर, 1925 से लगातार हिंदू राष्ट्र की सोच पर काम कर रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पहली बड़ी कामयाबी साल 2014 के लोकसभा चुनावों में मिली थी, जब समाज के सभी तबकों खासतौर से दलितों ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाए जाने के नाम पर वोट दिए थे. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में दलितों ने फिर भाजपा के पक्ष में वोट दिए तो इस की एक अहम वजह संघ के समरसता मंत्र को माना गया था.

इस समरसता के माने बेहद साफ थे और हैं कि संघ दलितों व आदिवासियों को साथ ले कर चलेगा. इस बाबत बजाय सामाजिक बराबरी के धार्मिक पाखंडों पर ज्यादा जोर दिया गया.

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दलित समुदाय के लोगों के घर जा कर उन के साथ खाना खाया और उज्जैन के सिंहस्थ में दलितों और उन के संतों के साथ न केवल खुद क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई, बल्कि अवधेशानंद सरीखे ऊंची जाति के संत को भी दलित संत उमेश दास के साथ नहला दिया था.

पहली कोशिश कामयाब रही लेकिन गुजरात के नतीजों ने फिर संघ और भाजपा के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं कि अगर गुजरात का दोहराव मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हुआ तो सत्ता का लड्डू हाथ और मुंह से छिन जाएगा, इसलिए अब दूसरे किसी तरीके से दलितों को बहलाया जाए.

आमतौर पर मकर संक्रांति का त्योहार दलित तबका नहीं मनाता है. यह ऊंची जाति वालों का त्योहार है. इसे अब दलितों को भी मनाने की छूट दे दी गई है और इस बात के लिए उन्हें बढ़ावा भी दिया जा रहा है.

इस तिलगुड़ मुहिम के तहत स्वयंसेवकों ने दलित आदिवासियों को तिलगुड़ भेंट किए. अब आगे और दूसरे त्योहारों पर भी यह सिलसिला जारी रहेगा जिस में दलितों के साथ स्वयंसेवक होली खेल सकते हैं और उन के माथे पर भगवा टीका लगा कर उन से गले मिल सकते हैं.

सामाजिक समरसता के इस नए टोटके को अपनाते हुए सब से पहले 11 जनवरी, 2018 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विदिशा में ऐलान किया कि वे खुद घरेलू काम करने वालों मसलन कपड़े धोने व प्रैस करने वाले और दूसरे गरीब तबके के लोगों के घर तिलगुड़ ले कर जाएंगे.

जब तिलगुड़ टोटके पर मोहन भागवत और शिवराज सिंह चौहान की मुहर लग गई तो मकर संक्रांति पर तिलगुड़ बांटा गया.

दिख गया भेदभाव

गरीब तबके से सीधा मतलब उन दलितों से था जो जाति के आधार पर ऊंची जाति वालों की सेवा करते आ रहे हैं. साफतौर पर यह छोटी जाति वालों को उन की जाति की बिना पर नीचा दिखाने की कोशिश थी. अगर यही समरसता है तो लगता नहीं कि जागरूक और आक्रामक होता दलित समुदाय इसे एक हद से ज्यादा बरदाश्त करेगा.

एक तरफ तो संघ कहता है कि सब बराबर हैं और हिंदू हैं वहीं दूसरी तरफ यह अहसास जताने में कोई कसर नहीं छोड़ता कि इस बराबरी में भी जाति के आधार पर भेदभाव है और इसे दूर करने का उस का न तो कोई इरादा है और न ही इस बाबत वह कभी कोई पहल करेगा.

मोहन भागवत का इशारा और बढ़ावा पा कर शिवराज सिंह चौहान ने यह तो साफ कर दिया कि वे धोबी के यहां जा कर तिलगुड़ बाटेंगे, पर यह नहीं कहा कि वे पंडों यानी ब्राह्मणों के घर जा कर भी तिलगुड़ बाटेंगे. आखिर वे भी तो पारिश्रमिक ले कर पूजापाठ ही करते हैं यानी सर्विस देते हैं, तो यह भेदभाव क्यों? बनियों, कायस्थों और ठाकुरों के यहां जा कर भी तिलगुड़ देने की बात क्यों नहीं की गई?

साफ यह भी है कि इन ऊंची जाति वालों की तरफ से ही यह बात की गई थी कि अगर हिंदुओं की ताकत को बढ़ाना है तो दलितों को दुत्कारो मत बल्कि उन्हें तीजत्योहारों पर दान देते रहो जिस से वे सेवा में लगे रहें.

वैसे भी तीजत्योहारों पर गांवदेहातों और शहरों में भी छोटे तबके के लोग ऊंची जाति वालों के घरघर जा कर पावन इकट्ठा करते हैं. पावन के तहत आटा और खानेपीने का सामान छोटी जाति वालों की झोली में इस तरह डाला जाता है कि कहीं हाथ उन्हें न छू जाए, नहीं तो फिर से नहाना पड़ेगा.

इस में कोई शक नहीं कि अब इस रिवाज में थोड़ी कमी आई है. पर इनसानी तौर पर यह शर्मनाक है कि होलीदीवाली पर छोटी जाति वाले ऊंची जाति वालों के दरवाजों पर जा कर मिठाई, नकदी, आटादाल वगैरह मांगें.

छोटेपन की इस हद को दूर करने की न तो संघ ने कभी कोई बात की थी, न ही भाजपा ने की है. उलटे अब इन्हें दूसरे तरीके से बढ़ावा देने की शुरुआत कर दी गई है कि अगर वे लेने नहीं आते तो खुद ही देने चलें, जिस से उन के मन में बैठा दलितपना दूर न हो.

अब कौन पढ़ालिखा और जागरूक नागरिक यह कहेगा कि यह सामाजिक बराबरी या किसी दूसरे किस्म की समरसता है. यह तो सीधेसीधे मनुवाद को बदले ढंग से ही परोसने की साजिश है जिस का आरोप संघ पर साल 1925 से ही लगता रहा है.

दलितों की नई पीढ़ी जागरूक हो रही है और उस के पास इज्जत के साथसाथ पैसा भी आ रहा है, लिहाजा फेंके गए फटेपुराने कपड़े और अनाज लेने में वह अपनी तौहीन समझती है.

अगर वाकई संघ सामाजिक समरसता के प्रति गंभीर है तो बजाय तिलगुड़ बांटने के उसे दलितों से रोटीबेटी के संबंधों की बात करनी चाहिए जिस से जातिगत भेदभाव जमीनी तौर पर मिटे लेकिन बात अफसोस की है कि तकनीक के इस जमाने में भी छोटी जाति वालों को धर्म के नाम पर भीख देने की बात की जा रही है. इसे दानदक्षिणा इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि उस पर तो पंडों का हक होता है जो उन्हें पैर छू कर दी जाती है.

चिंता या नसीहत

मोहन भागवत की बात और सरोकार सामाजिक समरसता तक ही सिमटा नहीं रहे. उन्होंने संघ के एजेंडे का सार दोहराया कि हिंदुस्तान हिंदुओं का देश है. यहां के मुसलिमों के पूर्वज भी हिंदू ही थे और ईसाई भी यूरोप से नहीं आए थे. हिंदू समाज सभी को जोड़ता है. समाज को जगाओ, जिन्होंने लालच में आ कर धर्म बदला है, उन की घर वापसी कराओ, धर्मांतरण रोको और हिंदुओं की तादाद बढ़ाओ.

मोहन भागवत का पूरा फोकस जातपांत के भेदभाव को खत्म करने पर रहा है लेकिन उन्होंने फुले, अंबेडकर, रैदास या कबीर की बात नहीं की बल्कि विवेकानंद और संघ के संस्थापक डाक्टर हेडगेवार के इर्दगिर्द अपना भाषण रखा.

मोहन भागवत यह तो मानते हैं कि अभी भी जातिगत भेदभाव है और दलितों को ऊंची जाति वालों की बराबरी से पानी लेने का हक नहीं है. उन के श्मशान भी अलग हैं और मंदिरों में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता है.

उन की मानें तो दलितों को बराबरी के दर्जे के लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा यानी सामाजिक समरसता ‘अच्छे दिन आएंगे’ की तरह है जिन के आने की कोई गारंटी नहीं, चाहे भाजपा का सारे देश में राज क्यों न चल रहा हो.

एक दलित चिंतक का कहना है कि संघ की मंशा हमेशा ही वर्णवाद को कायम रखने की रही है जिसे भीमराव अंबेडकर ने पूरा नहीं होने दिया. देश के मौजूदा हालात वर्ग संघर्ष के बन रहे हैं तो इस का जिम्मेदार दलित तबका तो कतई नहीं है. रही बात संघ की तो वह खुद अपनी भूमिका इस बारे में साफ करे तो बेहतर होगा.

दलित समुदाय आज 2 भागों में बंटा हुआ है. इस में कोई शक नहीं कि तकरीबन 30 फीसदी दलित अब पूरी तरह भाजपा के साथ हैं लेकिन संघ की कोशिश बाकी 70 फीसदी को भी भाजपा और अपने पाले में लाने की दिख रही है. इसी कोशिश में देश का माहौल तेजी से बिगड़ रहा है और अंबेडकरवादी दलित बेचैनी और घुटन महसूस कर रहे हैं.

बहुजन संघर्ष दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष फूलसिंह बरैया कहते हैं, ‘‘असल में संघ और भाजपा अंबेडकर को हथिया कर दलितों के खिलाफ ही हथियार बना रहे हैं. इन का सनातनी मकसद ब्राह्मणवाद थोपना है.

‘‘कुछ दलित ही संघ पर भरोसा करते हैं, नहीं तो बाकी उन से दूर रहते हैं. दलित समुदाय कभी संघ पर भरोसा नहीं करेगा, राजनीतिक बात और है.

‘‘नरेंद्र मोदी के नाम पर अगर दलितों ने भाजपा को वोट दिया था तो उस की एक अहम वजह चुनाव प्रचार में किए गए वादों के अलावा दलित नेतृत्व की कमी और खुद नरेंद्र मोदी का छोटी जाति का होना थी.’’

‘‘जैसेतैसे कांशीराम ने दलितों को एक मंच पर इकट्ठा किया था लेकिन मायावती ने दलित हित सरेआम बेच खाया जिस का खमियाजा अब पूरा दलित समुदाय भुगत रहा है. अब उस की एकजुटता में सेंध लग चुकी है.

‘‘लेकिन दलित हताश नहीं हुआ है. वह अपने हकों के प्रति पहले से ज्यादा जागरूक हो गया है तो इस की वजह संघ के तिलगुड़ बांटो जैसे अभियान भी हैं जो साफतौर पर दलित को दलित ठहराते हैं.’’

इतिहास ऐसी बातों और घटनाओं से भरा पड़ा है कि संघ ऊंची जाति वालों का संगठन है और वह बेहतर जानता है कि हिंदुओं की असली ताकत दलित ही हैं इसलिए इन्हें बहलाएपुचकारे रखना जरूरी है. इस के लिए साम, दाम, दंड भेद, सब टोटके आजमाए जाते हैं.

संघ की एकलौती बड़ी दिक्कत जातिगत आरक्षण है जिस के चलते दलित पढ़लिख कर जागरूक हो रहा है और दिलचस्प बात यह है कि यही पढ़ालिखा दलित संघ की मंशा और हकीकत समझता है, क्योंकि बारबार आरक्षण पर विचार करने की बात भगवा खेमे से ही की जाती है.

छोटे अपराध और सीबीआई

6 लाख रुपए के नकली बिल से एनीमल हसबैंड्री डिपार्टमैंट से पैसे निकलवाने पर यदि जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो ने करनी हो तो 6,000 करोड़ रुपए की हेराफेरी कौन करेगा, यह सवाल आप न ही पूछें. हमारे यहां छोटेछोटे मामले इस तरह सीबीआई को सौंपे जा रहे हैं कि नीरव मोदी जैसे मामलों के लिए उस के पास समय ही नहीं या फिर सीबीआई आम पुलिस फोर्स की तरह भारीभरकम और अकुशल मशीनरी बन रही है.

यह 6 लाख रुपए का मामला कम रोचक नहीं है जो सुप्रीम कोर्ट तक 22 साल में पहुंचा. साल 1995 में मुजफ्फरपुर में एनीमल हसबैंड्री डिपार्टमैंट में 6 लाख रुपए के नकली बिलों के आधार पर पैसा निकाला गया. जांच के बाद तथ्य मिलने पर नरेश चौबे और दूसरे 2 लोगों को चार्जशीट दी गई और मामला सीबीआई को सौंप दिया गया. सीबीआई की जांच पर निचली अदालत ने उन तीनों को 3 साल की सजा सुनाई. मामला सुप्रीम कोर्ट में गया पर अपराधियों की सुनी नहीं गई.

जब मामला अपराधी सुप्रीम कोर्ट में ले गए तो उन में से नरेश चौबे 75 साल का हो चुका था. सुप्रीम कोर्ट ने सजा तो बरकरार रखी पर कैद में राहत दी कि 20 महीने ही जो उन्होंने कभी जेल में काटे थे काफी हैं.

जब एक छोटे अफसर का मामला पूरी तरह सुलझाने में 22 साल लग रहे हों तो नीरव मोदी जैसे 11,000 से 20,000 करोड़ रुपए के मामले को सुलझाने में कितने साल लगेंगे, इस का अंदाजा लगाया जा सकता है. मुजफ्फरपुर के मामले में तो अपराधी एक साधारण अफसर था और उस के साधन सीमित थे पर जब मामला नीरव मोदी का होगा तो शायद 8-10 सरकारें बदल जाएंगी पर फैसला नहीं आ पाएगा.

यह सोच लेना कि सीबीआई को मामला दे दिया गया है तो हल हो गया गलत है. न्याय व्यवस्था में देर इतनी है कि अंधेरा ही अंधेरा लगता है. लाखों कैदी जेलों में बिना अपराध साबित हुए बंद हैं क्योंकि वे जमानत के लिए वकील और पैसे का इंतजाम नहीं कर सकते और सैकड़ों को सजा तब मिलती है जब सजा देना बेमतलब का हो जाता है.

जानलेवा गेम ब्लू व्हेल का खूनी खेल

पिछले साल 4 सितंबर की बात है. रात के 11 बजने वाले थे. राजस्थान की सूर्य नगरी कहलाने वाले जोधपुर में लोग दिनभर की भागदौड़ के बाद सोने की तैयारी कर रहे थे. कुछ लोग रात का भोजन कर के टहलने निकल गए थे. कुछ लोग कायलाना सिद्धनाथ की पहाड़ियों के आसपास भी टहल रहे थे.

इसी बीच टहल रहे लोगों ने देखा कि 16-17 साल की एक किशोरी ने पहाड़ियों से नीचे कायलाना झील के पानी में छलांग लगा दी. उम्रदराज लोगों में मानवता जागी. उन्होंने वहां घूम रहे और उधर आ रहे कुछ युवाओं से कहा कि वे झील में कूद कर उस किशोरी की जान बचाने की कोशिश करें. तैरना जानने वाले 3-4 युवकों ने आगे बढ़ कर झील में छलांग लगा दी. किशोरी झील में जीवन और मौत से संघर्ष करते हुए हाथपैर चला रही थी.

उन युवकों ने किशोरी को सकुशल पानी से बाहर निकाल लिया. बाहर आ कर वह चिल्ला कर कहने लगी, ‘‘मुझे झील में कूदने दो, टास्क पूरा करना है. अगर तुम ने मुझे बचा लिया तो मेरी मम्मी मर जाएंगी.’’ वहां मौजूद लोगों ने बालिका को समझाबुझा कर शांत किया.

सूचना मिलने पर राजीव गांधी नगर थाना पुलिस भी मौके पर पहुंच गई. थाने ले जा कर किशोरी से पूछताछ की गई तो पता चला कि वह 17 वर्षीया किशोरी जोधपुर के मंडोर क्षेत्र में रहने वाले बीएसएफ जवान की बेटी है और 10वीं में पढ़ती है. उस किशोरी के पास एंड्रायड फोन था. पता चला कि पिछले कुछ दिनों से वह मोबाइल पर ब्लू व्हेल गेम खेल रही थी. उस ने इस गेम की सारी स्टेज पार कर ली थीं. किशोरी ने अपने घर वालों को यह गेम खेलने की भनक तक नहीं लगने दी थी. आखिरी टास्क के रूप में उसे 4 सितंबर को पहाड़ी से कूद कर अपनी जान देनी थी.

आखिरी टास्क को पूरा करने के लिए ही वह 4 सितंबर को दोपहर में परिवार वालों से सहेलियों के साथ बाजार जाने की बात कह कर घर से स्कूटी पर निकली थी. उस ने बाजार से एक चाकू खरीदा और उस से अपने दाहिने हाथ की कलाई पर व्हेल की आकृति उकेर कर ए.एस. लिख दिया. शाम को उस ने अपना मोबाइल रास्ते में फेंक दिया.

उस का यह मोबाइल एक भले आदमी को मिल गया, जिस ने मोबाइल पुलिस को सौंप दिया. रात करीब पौने 11 बजे वह स्कूटी ले कर कायलाना-सिद्धनाथ की पहाडि़यों के पास पहुंच गई. स्कूटी खड़ी कर के वह पहाड़ी पर चढ़ने लगी. रात का घना अंधेरा होने के कारण एक बार वह फिसली भी, लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी. वह फिर पहाड़ी पर चढ़ी और कायलाना झील में कूद गई.

उस की किस्मत अच्छी थी कि लोगों ने उसे देख लिया और बचा लिया. बाद में पुलिस ने किशोरी को उस के मातापिता के हवाले कर दिया. घर जा कर जब दूसरे दिन भी उस के दिमाग से गेम का भूत नहीं उतरा तो उस ने कई तरह की दवाओं की गोलियां खा कर आत्महत्या करने का प्रयास किया.

जब उल्टीसीधी दवाएं खाने से उस की तबीयत बिगड़ गई तो घर वाले उसे कायलाना रोड स्थित एक निजी अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने किशोरी की मानसिक व शारीरिक स्थिति को देखते हुए आईसीयू वार्ड में भर्ती करा दिया. अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान इस किशोरी ने मीडिया से कहा कि कोई बच्चा भूल कर भी इस गेम के चक्कर में ना फंसे, इसे खेलना तो दूर डाउनलोड भी नहीं करें.

कैसे पड़ी चक्कर में

किशोरी ने बताया कि टीवी पर ब्लू व्हेल की खबर देखने के बाद उसे लगा कि यह झूठ होगा, लेकिन जिज्ञासावश उसने मोबाइल में यह गेम डाउनलोड कर लिया. जब उस ने गेम खेलना शुरू किया तो वह पूरी तरह गेम खेलती रही. कई स्टेप पूरे करने के बाद उस की औनलाइन चैट चलती रही. चैट के दौरान उसे मरने के लिए 4 औप्शन दिए गए. ऐसा नहीं करने पर उस की मां की जान को खतरा बताया गया. गेम के चक्कर में उस के दिमाग ने कुछ इस तरह काम करना बंद कर दिया कि वह कुछ समझने के काबिल नहीं रही.

ब्लू व्हेल गेम के इस मामले को गंभीरता से ले कर राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ के न्यायाधीश गोपाल कृष्ण व्यास ने 6 सितंबर को इसे संज्ञान में लिया. उन्होंने किशोरों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बच्चों व उन के अभिभावकों में जागरूकता लाने के लिए स्कूलों में कैंप लगाने के निर्देश जारी किए. वहीं, दूसरी ओर राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान ले कर राज्य के प्रमुख गृह सचिव से रिपोर्ट मांगी कि इस खेल को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं.

राजस्थान के पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह के निर्देश पर जोधपुर के थाना मंडोर की पुलिस ने उस किशोरी का मोबाइल और लैपटौप जब्त कर लिया. दोनों चीजों को साइबर एक्सपर्ट के पास भेजा गया है, ताकि पता चल सके कि छात्रा ने यह गेम कहां से डाउनलोड किया था. पुलिस ने किशोरी के परिजनों को हिदायत दी है कि वे उस की गतिविधियों पर नजर रखें और कोई भी संदिग्ध बात नजर आने पर पुलिस को सूचना दें. किशोरी को 7 सितंबर को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी.

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ब्लू व्हेल का एक और शिकार

जोधपुर की इस घटना से पहले 21 अगस्त को जयपुर के करणी विहार का रहने वाला 10वीं का एक 16 साल का छात्र गायब हो गया था. उस के गायब होने की रिपोर्ट जयपुर के करणी विहार पुलिस थाने में दर्ज कराई गई. लापता छात्र की तलाश के दौरान पता चला कि वह औनलाइन ब्लू व्हेल गेम खेलता था.

पूरी दुनिया में कई बच्चों की जान लेने वाले ब्लू व्हेल गेम का पता चलने पर उस छात्र की तलाश के लिए वैशाली नगर एसीपी रामअवतार सोनी के निर्देशन में एक पुलिस टीम गठित की गई. पुलिस ने छात्र के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर पता लगाया कि वह जयपुर से मुंबई पहुंच गया है. पुलिस ने 25 अगस्त को उस छात्र को मुंबई के चर्चगेट रेलवे स्टेशन पर पकड़ कर आखिरी क्षणों में बचा लिया.

गेम का आखिरी चरण पार करने के लिए उस ने बाजार से चाकू खरीद लिया था. टास्क के तहत उसे एक ऊंची इमारत पर चढ़ना था. वह उस इमारत की लोकेशन के लिए मोबाइल पर आने वाले मैसेज के इंतजार में था, तभी जयपुर से गई पुलिस टीम और उस के घर वाले वहां पहुंच गए थे.

पूछताछ में पुलिस को छात्र ने बताया कि उस ने 5-7 दिन पहले मोबाइल के ब्राउजर पर ब्लू व्हेल लिख कर सर्च किया. एक पेज पर जौइन करने का विकल्प दिया गया था. उसे पहला टास्क मिला कि हाथ की नस काट कर फोटो शेयर करो. इस से छात्र डर गया, लेकिन टास्क पूरा करना था. इसलिए उस ने इंटरनेट से ऐसी ही एक फोटो निकाल कर शेयर कर दी. इस के बाद उसे 21 अगस्त को इंदौर जाने का टास्क मिला.

वह उसी दिन जयपुर से ट्रेन द्वारा इंदौर पहुंच गया. इंदौर में अगला टास्क मुंबई पहुंच कर चाकू खरीदने का मिला. इस पर उस ने मुंबई पहुंच कर चाकू खरीद लिया. इस के बाद उसे आखिरी चरण में ऊंची इमारत पर जाने का टास्क मिलने वाला था. वह चर्चगेट स्टेशन पर बैठा, इसी मैसेज का इंतजार कर रहा था.

पुलिस ने बताया कि छात्र के पास 2 मोबाइल और 4 सिम थीं. वह इन्हें बदलबदल कर इस्तेमाल कर रहा था. इस वजह से उस की लोकेशन तलाशने में काफी परेशानियां आईं.

पुलिस की आईटी टीम ने मोबाइल हैंडसेट के आईएमईआई नंबर से उस की लोकेशन का पता लगाया. परिवार वालों के मुताबिक छात्र बहुत सीधा, कम बातें करने और इंटरनेट से दूर रहने वाला था. उस के फेसबुक पेज पर फ्रैंड लिस्ट में परिवार व परिचितों में केवल 4-5 लोग हैं. उन्हें तो यह भी नहीं पता था कि वह अपना खुद का मोबाइल भी रखता था.

जयपुर के इस बालक और जोधपुर की बालिका को तो आखिरी मौके पर बचा लिया गया, लेकिन दुनिया भर में बच्चों की जान ले रहा सुसाइड गेम ब्लू व्हेल आजकल सब से ज्यादा सुर्खियों में है. भारत में रोजाना कहीं न कहीं से किसी बच्चे या युवा के इस गेम में सुसाइड करने की खबरें आ रही हैं. देश का शायद ही कोई ऐसा राज्य हो, जहां इस तरह की घटना न हुई हो.

मुंबई भी अछूता नहीं

पिछले साल जुलाई महीने में ब्लू व्हेल उस समय चर्चा में आया, जब मुंबई के अंधेरी ईस्ट की शेर-ए-पंजाब कालोनी में 14 साल के एक बच्चे मनप्रीत सिंह साहनी ने 7वीं मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर ली थी. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने इस बालक की आत्महत्या के लिए ब्लू व्हेल गेम को दोषी बताया था.

बताया गया कि मनप्रीत ने ब्लू व्हेल गेम का टास्क पूरा करने के लिए यह कदम उठाया था. उस ने 9वीं कक्षा में पढ़ने वाले अपने दोस्त को मैसेज भेजा था कि गेम का टास्क पूरा करने के लिए मैं बिल्डिंग से कूद रहा हूं. हो सकता है मनप्रीत से पहले भी ब्लू व्हेल गेम के चक्कर में किसी बालक या युवा ने अपनी जान गंवाई हो, लेकिन ज्यादा चर्चा न होने से ऐसी कोई घटना उभर कर सामने नहीं आई.

इस के बाद तो ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि रोजाना किसी न किसी राज्य से इस तरह की खबरें आने लगीं. हालांकि आधिकारिक तौर पर केंद्र सरकार के पास अभी तक कोई ऐसा आंकड़ा नहीं है, जिस से यह पता चल सके कि इस गेम के चक्कर में कितने युवाओं की जान जा चुकी है और कितने ऐसे युवा हैं, जिन की जान बचा ली गई है.

जुलाई के चौथे सप्ताह में केरल के तिरुवंतपुरम में 11वीं कक्षा में पढ़ने वाले एक छात्र मनोज ने संदिग्ध हालत में खुदकुशी कर ली. उस का शव कमरे में पंखे से लटका हुआ मिला. घर वालों का कहना है कि ब्लू व्हेल गेम ने उन के बेटे की जान ले ली. पिछले कई महीनों से उस के व्यवहार में बदलाव आ गया था.

कुछ महीने पहले मनोज ने इस गेम के बारे में अपनी मां अनु को बताया था, बाद में वह झूठ भी बोलने लगा था. मनोज कब्रिस्तान जैसी जगहों पर अकेला चला जाता था. उस के शरीर पर कई तरह के निशान बने हुए थे. वह रातरात भर जागता और सुबह 5 बजे सोता था. पुलिस ने उस के मोबाइल की जांच की.

अगस्त के दूसरे सप्ताह में पश्चिम बंगाल में बेस्ट मिदनापुर के आनंदपुर कस्बे में रहने वाले अंकन डे का शव बाथरूम में पाया गया. अंकन ने अपने सिर को प्लास्टिक बैग से ढका हुआ था और बैग को गर्दन के पास कस कर बांधा हुआ था. उस की मौत दम घुटने से हुई थी. 10वीं कक्षा के छात्र अंकन के दोस्तों ने बाद में बताया कि वह ब्लू व्हेल गेम खेल रहा था.

दिल्ली में भी दस्तक

अगस्त के तीसरे सप्ताह में दिल्ली के द्वारका में रहने वाले 17 साल के किशोर की जान उस की मां की सतर्कता से बच गई. बच्चे ने इस गेम के आधे पौइंट पार कर लिए थे. अगले चरण में उस ने गेम के निर्देश के तहत अपने चेहरे पर ज्योमेट्री बौक्स के टूल से जख्म बना लिए थे. मां ने साइकियाट्रिस्ट डाक्टरों की मदद ली. अब इस किशोर की हालत स्थिर है. इस से पहले उस का व्यवहार बदल गया था और वह अकेला रहने लगा था. पूछने पर सही जवाब भी नहीं देता था.

अगस्त के चौथे सप्ताह में उत्तर प्रदेश के शहर हमीरपुर में 13 साल के पार्थ ने पंखे से लटक कर फांसी लगा ली. घर वाले उसे अस्पताल भी ले गए, लेकिन उस की जान नहीं बचाई जा सकी. वह जयपुरिया स्कूल में 7वीं कक्षा में पढ़ता था. बताया गया कि ब्लू व्हेल गेम का टास्क पूरा करने के लिए उस ने यह कदम उठाया था. अपनी जान देने से पहले वह मोबाइल मे ब्लू व्हेल गेम खेल रहा था. इस दौरान वह अचानक कमरे में गया और बैड के ऊपर कुर्सी रख कर अंगौछे के सहारे पंखे से लटक गया.

ब्लू व्हेल बन गया फांसी

अगस्त महीने के ही आखिरी दिनों में तमिलनाडु के मदुरै में ब्लू व्हेल गेम खेल रहे 19 साल के विग्नेश ने फांसी लगा कर अपनी जान दे दी. वह बीकौम द्वितीय वर्ष का छात्र था. उस ने सुसाइड नोट में लिखा कि ब्लू व्हले गेम नहीं, बल्कि खतरा है. एक बार इस में घुसने के बाद निकल नहीं सकते. उस ने अपने हाथ पर व्हेल का निशान भी बनाया था. मां ने जब इस निशान के बारे में पूछा तो विग्नेश ने कहा था कि चिंता मत करो.

विग्नेश की मौत के दूसरे दिन अगस्त के आखिर में पुडुचेरी की सैंट्रल यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले 23 साल के एमबीए के छात्र शशि कुमार वोरा ने हौस्टल के कमरे में फांसी लगा कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली. वह मूलत: असम का रहने वाला था. उस ने ब्लू व्हेल गेम की चुनौती पूरी करते हुए आत्महत्या की थी. पुलिस ने वोरा के मोबाइल फोन की जांच करने के बाद इस बात की पुष्टि की थी कि आत्महत्या करने से पहले वह ब्लू व्हेल गेम खेल रहा था.

अगस्त महीने के आखिरी दिन ही गुजरात के बनासकांठा में ब्लू व्हेल गेम खेलते हुए एक युवक ने साबरमती नदी में छलांग लगा कर आत्महत्या कर ली.

20 साल के अशोक मुलाणा ने अपनी जान देने से पहले फेसबुक पर एक वीडियो मैसेज पोस्ट किया, जिस में उस ने कहा कि मैं जिंदगी से परेशान हो गया हूं. मेरा शिकार ब्लू व्हेल गेम ने किया है, इसलिए सुसाइड कर रहा हूं, मेरे परिवार में किसी की कोई गलती नहीं है.

अशोक 4 बहनों का एकलौता भाई था. उस के पिता परथीभाई की मौत हो चुकी थी. वह 3 महीने से नौकरी पर भी नहीं जा रहा था. दूसरी ओर पुलिस ने इस युवक के ब्लू व्हेल गेम का शिकार होने की बात से इनकार किया है.

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सितंबर के पहले दिन असम के गुवाहाटी में एक लड़के ने खुद को काट लिया. नौगांव में 5वीं कक्षा में 2 बच्चों की अपने हाथ की कलाई पर व्हेल बनाने की कोशिश करते समय खून बहने पर बचा लिया गया. जोरहाट में एक छात्र ने फेसबुक पोस्ट कर ब्लू व्हेल की एडवांस स्टेज पर पहुंचने की पोस्ट डाली. इस के बाद वह लापता हो गया.

सितंबर के पहले सप्ताह में ही मध्य प्रदेश के दमोह में सात्विक नाम का छात्र ब्लू व्हेल गेम की आखिरी स्टेज का चैलेंज पूरा करने के लिए टे्रन के आगे घुटने टेक कर बैठ गया. इस से उस के परखच्चे उड़ गए. वह विज्ञान का 11वीं का छात्र था. जहां सात्विक की मौत हुई, वहां से कुछ ही दूरी पर लगे सीसीटीवी कैमरे में इस घटना के कुछ फुटेज पुलिस ने देखे. पुलिस ने सात्विक के मोबाइल की भी जांच की. बताया गया कि घटना से कुछ दिनों पहले से वह हर जगह मोबाइल ले कर जाता था. वह ब्लू व्हेल गेम खेलने की वजह से काफी परेशान था. उस ने दोस्तों से कहा था कि मेरे पास वक्त कम है.

हिमाचल प्रदेश के सोलन में सितंबर के दूसरे सप्ताह में ब्लू व्हेल गेम का पहला मामला सामने आया. इस का पता तब चला, जब एक निजी स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे के घर वालों ने उस की कलाई पर ब्लेड के कट के निशान देखे. पूछने पर बच्चे ने बताया कि स्कूल के दूसरे छात्र भी इस गेम को खेल रहे हैं. गेम के टास्क के तहत उस ने कलाई पर कट लगाए हैं. खुद के पास मोबाइल न होने के कारण वह दोस्त के मोबाइल से और कैफे में जा कर यह खतरनाक गेम खेलता था.

उत्तर प्रदेश में पसरे पांव

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में ब्लू व्हेल से दूसरी मौत सितंबर के दूसरे सप्ताह में हुई. इस घटना में 21 साल के दीपक वर्मा ने अपने घर की दूसरी मंजिल की छत से नीचे छलांग लगा दी थी. दूसरी घटना में लखनऊ के पौश इलाके इंदिरा नगर में 14 साल के आदित्यवर्द्धन ने अपने घर पर कमरे में फांसी लगा ली थी. दोस्तों ने बताया कि आदित्य 2 सप्ताह से मोबाइल पर ब्लू व्हेल गेम खेल रहा था.

कानपुर में एक छात्र की जान अध्यापकों की सतर्कता से बच गई. बर्रा के जरौली स्थित सरदार पटेल इंटर कालेज में 11वीं में पढ़ने वाला 16 साल का छात्र इस गेम के चक्कर में फंस कर क्लास में बैठा सुसाइड नोट लिख रहा था, तभी एक टीचर की नजर उस पर पड़ गई. कई दिनों से इस छात्र को गुमशुम देख कर शिक्षक उस पर नजर रखे हुए थे.

अभी 14 सितंबर को पता चला कि छत्तीसगढ़ के बालोद में एक साथ 6 छात्र ब्लू व्हेल गेम के चक्कर में फंस कर अपनी कलाई काट बैठे. जांच में पता चला कि इन में से एक ही छात्र गेम खेलता था, बाकी को उसी ने चैलेंज दिया था. इन सभी छात्रों के हाथों पर ब्लेड से काटने के निशान मिले.

गेम खेलने वाले एक छात्र ने बताया कि जब उसे ब्लू व्हेल गेम का पता चला तो इस के लिए ब्लू व्हेल लिख कर इंटरनेट पर सर्च किया. इस कोशिश में एक वीडियो आया, जिस में कलाई काट कर ब्लू व्हेल या एफ 57 का निशान बनाना था. खेलने का मन हुआ तो उस ने अपनी कलाई काट ली. दूसरे दिन उस ने अपने दोस्तों को दिखा कर कहा कि यह टास्क सिर्फ मैं पूरा कर सकता हूं. तुम सब डरपोक हो. जोश में आ कर उस के 5 दोस्तों ने कलाई पर वैसे ही कट बना लिए.

जानलेवा औनलाइन गेम ब्लू व्हेल चैलेंज सन 2013 में रशिया में लौंच हुआ था. इसे द ब्लू व्हेल गेम भी कहते हैं. इस की शुरुआत फिलिप बुदेइकिन नामक 21 साल के युवा ने की थी. वह साइकोलौजी का छात्र था, लेकिन यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया था. बाद में फिलिप को 16 युवाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया. उसे 3 साल की सजा सुनाई गई. अभी वह जेल में है. गिरफ्तारी के बाद जब उस से यह गेम बनाने का कारण पूछा गया तो उस का जवाब था कि मैं समाज में कचरे को साफ करना चाहता हूं.

फिलिप की जगह बाद में दूसरे लोगों ने यह काम संभाल लिया. इस ग्रुप से जुडे़ लोग ऐसे बच्चों की तलाश में रहते हैं, जो सोशल मीडिया पर टौर्चर, हिंसा या अपवाद का कंटेंट शेयर करते हैं. संपर्क के बाद गेम में शामिल करने के लिए वाट्सऐप, फेसबुक या मैसेंजर का इस्तेमाल किया जाता है.

इस गेम को डाउनलोड नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह कोई सौफ्टवेयर या एप्लीकेशन नहीं है. इस गेम को खेलने के लिए एक लिंक होता है, जो भी यूजर इस लिंक को ऐक्टिव करता है, वह एडमिन के शिकंजे में आ जाता है.

ऐसे दिया जाता है टास्क

50 दिन के गेम में रोजाना एक टास्क दिया जाता है. शुरुआती टास्क अपेक्षाकृत आसान होते हैं. जैसे सुबह 4 बजे उठना या रात भर जागना. 49 टास्क तक आतेआते चैलेंज इतने मुश्किल हो जाते हैं कि खेलने वाले की जान तक चली जाती है. इन में एडमिनिस्टे्रेटर को फोटो प्रूफ भी देने होते हैं. मसलन इस में शरीर पर कट लगाना, हाथ की नसें काट लेना, ब्लेड या चाकू से कलाई पर व्हेल का निशान बनाना, शरीर में सुइयां चुभाना जैसी चीजें शामिल होती हैं. कोई लड़का या लड़की 49वें टास्क तक भी चलता रहे तो 50वां टास्क होता है खुद की जान ले लो.

यह गेम भारत समेत चीन, अमेरिका, फ्रांस, इंगलैंड, पश्मिची यूरोप एवं कई अन्य देशों में करीब 150 से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है. कुछ समय पहले रशियन पुलिस ने 17 साल की एक लड़की को गिरफ्तार किया था. पुलिस ने उसे ब्लू व्हेल औनलाइन गेम की मास्टरमाइंड बताया. एक समाचार एजेंसी ने रूस की इंटीरियर मिनिस्ट्री के कर्नल इरिना वौक के हवाले से कहा था कि आरोपी लड़की गेम बीच में छोड़ने वालों को जान से मारने की धमकी और उन के परिवार की हत्या जैसी धमकियां दे कर मासूमों को खुदकुशी करने के लिए मजबूर करती थी.

रशियन पुलिस को उस लड़की के कमरे से हौरर किताबें, डरावनी पेंटिंग, सुसाइड के लिए मजबूर करने वाले फोटो, डीवीडी और विवादित उपन्यास मिले थे, साथ ही साइकोलौजी के छात्र फिलिप बुदेइकिन के फोटो भी मिले थे. रूस की पुलिस के मुताबिक पहले इस लड़की ने खुद गेम खेला था, लेकिन उस ने आखिरी टास्क पूरा करने के लिए सुसाइड नहीं किया. इस के बाद वह गेम की एडमिनिस्ट्रेटर बन गई.

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भारत सहित दुनिया के कई देशों में चिंता का कारण बन रहा ब्लू व्हेल गेम गूगल पर आजकल काफी सर्च किया जा रहा है. गूगल ट्रेंड रिपोर्ट्स में बताया गया है कि ब्लू व्हेल गेम सर्च में 3 महीने से भारत टौप पर है. कुछ समय पहले कोलकाता गूगल सर्च में टौप पर था. इस के बाद पहले स्थान पर कोच्चि आ गया है. तिरुवनंतपुरम दूसरे और कोलकाता तीसरे नंबर पर है. भारत में दिल्ली, गुड़गांव, मुंबई व भोपाल 32वें स्थान पर हैं. इस गेम को खोजने वालों में सितंबर के पहले सप्ताह में  राजस्थान 7वें नंबर पर था.

भारत सरकार की चिंता

ब्लू व्हेल गेम को ले कर भारत सरकार काफी चिंतित है. कई राज्य सरकारों ने भी चिंता जताई है. केंद्र सरकार ने 11 अगस्त को इस गेम पर रोक लगाते हुए सभी इंटरनेट कंपनियों गूगल, फेसबुक, वाट्सऐप, इंस्टाग्राम, माइक्रोसौफ्ट, याहू आदि को निर्देश जारी कर कहा था कि ये कंपनियां इस गेम को अपने प्लेटफौर्म से हटा दें.

केंद्र सरकार का मानना है कि आने वाले समय में साइबर हमला और इस तरह के लिंक बड़ी चुनौती बन सकते हैं. केंद्र सरकार की साइबर अपराध से संबंधित संस्था सीईआरटी भी इस गेम के बारे में जांच कर रही हैं. पुलिस की साइबर सेल को भी अलर्ट किया गया है.

कई राज्य सरकारों ने विद्यार्थियों के घर वालों और टीचर्स के लिए गाइडलाइन जारी की है. विभिन्न राज्यों की पुलिस ने भी ऐतिहासिक कदम उठाए हैं. राजस्थान के पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह ने सभी पुलिस अधीक्षकों को ब्लू व्हेल गेम की रोकथाम के लिए स्कूल कालेजों में व्यापक जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं. कई जगह अदालतों में याचिकाएं दायर कर इस गेम पर रोक लगाने की मांग की गई है.

इतना सब कुछ होने के बावजूद अभी तक यह गेम युवाओं की जान ले रहा है. बच्चों को इस से बचाने के लिए अभिभावकों को खासतौर से सतर्क रहने की जरूरत है. ब्लू व्हेल गेम विरोधी वीडियो भी यूट्यूब पर आ गए हैं. न्यूज प्रोड्यूसर ख्याली चक्रवर्ती के ब्लू व्हेल विरोधी वीडियो को हफ्तेभर में ही 1 करोड़ 30 लाख से ज्यादा हिट मिले हैं. सायकोलौजी की पढ़ाई करने वाली ख्याली ने इस गेम की रिसर्च करने के बाद वीडियो बना कर यूट्यूब पर डाला है.

सर्वोच्च न्यायालय का आदेश

‘ब्लू व्हेल गेम’ जैसे जानलेवा खेल से लोगों का चिंतित होना स्वाभाविक ही है. ब्लू व्हेल पर बैन लगाने के लिए मदुरै के 73 साल के अधिवक्ता एन.एस. पोन्नैया ने 15 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है, जिस में कहा गया है कि यह गेम अब तक 200 लोगों की जान ले चुका है, लेकिन केंद्र सरकार ने इस से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. केंद्र सरकार को चाहिए कि वह इस गेम के विरोध में जागरूकता अभियान चलाए. इसी बीच कोलकाता हाईकोर्ट में ऐसी ही एक याचिका दायर की गई है. वहां के हाईकोर्ट ने इस संबंध में पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश भी जारी कर दिए हैं.

सर्वोच्च न्यायालय ने भी पोन्नैया की याचिका के आधार पर केंद्र सरकार को 3 सप्ताह में जवाब देने को कहा है, साथ ही कोर्ट ने इस मामले में अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल से इस मामले में सहयोग करने को कहा है.

गठबंधन संस्कार

गुलाबचंद महीनेभर के सफर के बाद थकेमांदे घर वापस आए थे. अटैची को रख कर सोफे पर अधलेटे हुए ही थे कि मेज पर रखे शादी के एक न्योते पर नजर पड़ गई. गुलाबचंद ने पास बैठी अपनी श्रीमतीजी से पूछा, ‘‘यह न्योता किस का है?’’

श्रीमतीजी बोलीं, ‘‘आप के बचपन के लंगोटिया यार मंत्रीजी आज ही दे गए हैं. उन के लाड़ले की शादी अपने इलाके के सांसदजी की बेटी से चट मंगनी पट ब्याह वाली तर्ज पर तय हो गई है. आप को बरात में चलने के लिए कह गए हैं.’’ खुशी और हैरानी से न्योते के कार्ड को जैसे ही उठाया, लिफाफे पर लिखी गई इबारत पर नजर पड़ते ही गुलाबचंद के दिमाग में अजीब सी हलचल मच गई. उन के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘छपाई में इतनी बड़ी गलती हो गई और मंत्रीजी का इस पर ध्यान ही नहीं गया…’’

श्रीमतीजी भी कुछ चौंक कर बोलीं, ‘‘क्या गलती हो गई? मैं ने तो इसे अभी तक छुआ भी नहीं है. आप के आने के तकरीबन घंटाभर पहले ही तो दे गए हैं मंत्रीजी.’’ गुलाबचंद ने वह कार्ड श्रीमतीजी को थमा दिया. देखते ही वे भी हैरानी से सन्न रह गईं.

बात थी ही कुछ ऐसी. लिफाफे के बाहर और भीतर ‘पाणिग्रहण संस्कार’ की जगह ‘गठबंधन संस्कार’ छपा था. इस कमबख्त एक शब्द के चलते गुलाबचंद महीनेभर की थकान भूल से गए और उन्होंने श्रीमतीजी से कहा, ‘‘मंत्रीजी को फोन मिलाओ.’’

श्रीमतीजी ने कहा, ‘‘अभीअभी थकेमांदे इतने दिनों बाद आए हो… पहले फ्रैश हो कर कुछ चायनाश्ता कर लो, बाद में आराम से मंत्रीजी से बात करना.’’ श्रीमतीजी की बात को तरजीह देते हुए गुलाबचंद फ्रैश होने चल दिए, लेकिन ‘गठबंधन संस्कार’ दिमाग से निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था. उन्होंने मंत्रीजी को मोबाइल फोन से नंबर मिला ही डाला.

फोन पर मंत्रीजी का छोटा सा वाक्य कानों में पड़ा, ‘गुलाबचंदजी, इस समय पार्टी की एक जरूरी मीटिंग चल रही है, जो देर रात तक चलने की उम्मीद है. सुबह मुलाकात होगी…’

दूसरे दिन सुबह जब गुलाबचंद नाश्ता कर ही रहे थे कि मंत्रीजी का फोन आ गया, ‘हैलो गुलाबचंदजी, मैं आप का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं… जल्दी आ जाओ.’ मंत्रीजी का फोन सुन कर गुलाबचंद ने जल्दबाजी में नाश्ता किया और जैसेतैसे गरमगरम चाय पी. बड़े ही उतावलेपन के साथ, बिना कपड़े बदले, जिस हालत में थे, उसी हालत में वे मंत्रीजी के घर की ओर चल पड़े.

‘गठबंधन संस्कार’ शब्द उन्हें अब भी दुखी कर रहा था. ‘सोलह संस्कारों’ के बाद यह ‘सत्रहवां गठबंधन संस्कार’ कब से, कहां से आ गया है? जैसे नए जमाने के फिल्म वाले पुराने फिल्मी गीतों को ‘रीमिक्स’ कर के उन्हें मौडर्न बना रहे हैं, उसी तरह ‘सोलह संस्कारों’ को रीमिक्स कर के मौडर्न तो नहीं बनाया जा रहा है? इसी उधेड़बुन में गुलाबचंद मंत्रीजी के दरवाजे पर पहुंचे. देखा कि मंत्रीजी दरवाजे पर ही खड़ेखड़े अपनी पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं से बतिया रहे थे. गुलाबचंद को देखते ही मंत्रीजी कार्यकर्ताओं से विदा लेते हुए उन्हें घर के अंदर ले गए.

उन्होंने मंत्रानी को आवाज लगाई, ‘‘देखो, आज घर पर कौन पधारा है?’’ मंत्रानी ने रसोई से निकलते हुए जैसे ही गुलाबचंद को देखा, बड़ी खुश हो कर बोलीं, ‘‘इतने दिनों तक कहां रहे गुलाबचंदजी? हम लोग बड़ी बेसब्री से आप का इंतजार कर रहे थे…’’

मंत्रानी कुछ और कहने जा रही थीं कि गुलाबचंद बीच में बोल पड़े, ‘‘भाभीजी, मुझे तो भाई साहब से कुछ दूसरी ही शिकायत है और इतनी बड़ी है कि घर आ कर जैसे ही शादी के कार्ड पर नजर पड़ी…’’ ‘‘रहने दो गुलाबचंदजी…’’ मंत्रीजी ने उन की बात को काटते हुए कहा, ‘‘मैं जानता हूं कि तुम्हें किसकिस बात को ले कर मुझ से शिकायत है…’’

इसी बीच भाभीजी यानी मंत्रानी जलपान ले कर आ गईं. जलपान करते हुए मंत्रीजी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पहली बड़ी शिकायत तो यह है कि शादी के कार्ड को देखते ही तुम गुस्से में आपे से बाहर हो गए होंगे… और दूसरी शिकायत जिस में तुम उलझे हुए हो कि लड़की वाले विपक्षी पार्टी में होने के साथसाथ मेरे घोर राजनीतिक विरोधी ही नहीं, दुश्मन भी हैं. मेरा उन से हमेशा छत्तीस का ही आंकड़ा रहा है. क्यों, है न यही बात?

‘‘बात यह थी कि एक दिन हमारे भावी समधी सांसदजी ने अपने एक भरोसेमंद हमराज द्वारा बातोंबातों में राजनीतिक स्टाइल की चाशनी में मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि अगर मैं सांसदजी की बेटी से अपने एकलौते लाड़ले की सगाई कर दूं तो सांसदजी अपने खास विधायकों से बिना शर्त मेरी पार्टी को समर्थन दिलवा देंगे. बाद में सही मौका आने पर वे अपनी पार्टी का मेरी पार्टी में विलय भी कर लेंगे. ‘‘तुम तो जानते ही हो कि मेरी पार्टी अल्पमत में रहते हुए कितनी मुश्किलों से सरकार चला रही है. मेरी सरकार की कुरसी के गठबंधन में इतनी बेमेल गांठें हैं कि अगर एक गांठ भी खुल जाए तो सबकुछ इस कदर बिखर जाएगा कि भविष्य में दोबारा कुरसी पर बैठने की शायद ही नौबत आए.

‘‘ऐसी मजबूर हालत में अगर समधी सांसदजी हमें समर्थन दे रहे हैं और वे अपनी पार्टी का मेरी पार्टी में विलय कर लेते हैं तो हमारी हालत ऐसी हो जाएगी कि गठबंधन की अगर 2-4 गांठें खुल भी जाएं, टूट जाएं तब भी सरकार चलाने में मेरी पार्टी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा. ‘‘और एक राज की बात तुम्हें चुपके से कह रहा हूं… मौका आने पर अपनी ही पार्टी में जोड़तोड़ करवा कर मैं खुद ही मुख्यमंत्री बनने के चक्कर में लग गया हूं. इन्हीं सब राजनीतिक पैतरों को ध्यान में रखते हुए उन का ‘औफर’ आते ही मैं ने तुरंत हां कर दी और शादी का मुहूर्त निकलवा लिया.

‘‘गठबंधन संस्कार… यही शब्द तुम्हें दुखी कर रहा है न? चूंकि यह शादी राजनीति की बिसात पर हो रही है, जहां हर वक्त अपने फायदे के लिए मौके की तलाश रहती है, आज का दोस्त कल का दुश्मन और आज का विरोधी, कल का समर्थक बन जाता है, इसी माहौल में यह रिश्ता तय हुआ है. ‘‘इन बातों के ध्यान में आते ही मेरे दिमाग में ‘पाणिग्रहण संस्कार’ की जगह ‘गठबंधन संस्कार’ का जन्म हुआ.

‘‘भावी समधी सांसदजी ने भी यह रिश्ता राजनीति की बिसात पर तय किया है और नेता का क्या भरोसा? काम सधने के बाद कब पलटी मार जाए? कौनसी नई शर्त थोप दे? इन्हीं सब बातों को ध्यान में रख कर ही मैं ने ‘गठबंधन संस्कार’ शब्द का इस्तेमाल किया है. ‘‘सांसदजी ने शर्त रखी थी कि अगर मैं उन की लड़की की सगाई अपने लड़के से कर दूं तो पहले वे अपने विधायकों का बिना शर्त समर्थन मेरी पार्टी को देंगे और मौका आने पर वे अपनी पार्टी का विलय मेरी पार्टी में करेंगे. अगर उन्हें सामान्य रूप में यह रिश्ता तय करना होता तो वे सीधेसीधे मुझ से कह सकते थे. राजनीति अपनी जगह, रिश्ता अपनी जगह. रिश्तों को तो राजनीति से संबंध रखना ही नहीं चाहिए. सामान्य रूप में मैं इस रिश्ते को नकार भी सकता था, लेकिन उन की इस बात पर मेरे नकारने की गुंजाइश ही न रही.

‘‘रही रिश्तों की राजनीति की बात. मान लो कि शादी हो जाने के बाद वे ऊपर से समर्थन तो करते रहते लेकिन विलय वाली बात को यह कह कर नकारते रहते कि अभी सही समय नहीं आया या विलय तभी करेंगे जब मैं मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने करीबियों की बलि दे कर उन के विधायकों को मलाईदार पदों पर बैठा दूं. अगर मैं ऐसा मजबूरन कर भी दूं तब भी वे मुझे चैन से नहीं रहने देंगे. हमेशा समर्थन वापसी का डर दिखाते हुए एक न एक नई शर्त मुझ से मनवाते रहेंगे. ‘‘इन हालात में मैं क्या करता? इन्हीं सब पैतरों की काट करने के लिए मैं ने ‘गठबंधन संस्कार’ लिखवाया है.

‘‘हिंदू धर्म में ‘पाणिग्रहण संस्कार’ होने के बाद आसानी के साथ रिश्ता तोड़ा नहीं जा सकता. भविष्य में सांसदजी के अडि़यलपन पर अगर रिश्ता तोड़ने के बारे में विचार करता तो दहेज के नाम पर सताने की तलवार आसानी से मेरा गला काट सकती है. मन मसोस कर समधीजी की ऊलजुलूल शर्त मुझे माननी पड़ती, लेकिन ‘गठबंधन संस्कार’ में ऐसा हरगिज नहीं हो सकता.

‘‘राजनीति में अलगअलग पार्टी की बेमेल गांठों का बंधन कब बंधे, कब खुले या टूटे, कहा नहीं जा सकता और इस जुड़ने, खुलने या टूटने में हमारा संविधान चुप है, कानून लाचार है… ‘‘इस समय हमारी पार्टी सरकार चला रही है, कल सुबह के अखबार में आप हैडिंग पढ़ सकते हैं कि कल की फलां विपक्षी पार्टी ने आज सत्ता हथिया ली है.

‘‘अब अगर राजनीति में इस ‘गठबंधन’ शब्द का इस्तेमाल न होता तो सत्ता का जोड़तोड़ भी इतनी आसानी से न होता. कानून इजाजत ही नहीं देता. ‘‘ठीक यही बात ‘गठबंधन संस्कार’ में है. ‘गठबंधन संस्कार’ कब तक दांपत्य जीवन में जुड़ा रहे और कब यह संस्कार दांपत्य जीवन से अलग हो जाए… इस पर कानून या समाज या फिर सरकार का कोई बंधन नहीं है, जबकि ‘पाणिग्रहण संस्कार’ में बंधन ही बंधन हैं. धर्म, समाज, कानून सब ‘पाणिग्रहण संस्कार’ को जकड़े हुए हैं.

‘‘अब अगर समधी सांसदजी पार्टी का समर्थन वापसी का जरा सा भी तेवर भविष्य में दिखाएंगे तो उन के तेवर को उन्हीं के ऊपर साधते हुए मैं भी ‘गठबंधन संस्कार’ को भंग करने, तोड़ देने की चेतावनी दूंगा. यह एक ऐसा हथियार होगा जिस के बलबूते मैं समधी सांसदजी को जब तक जीवन में राजनीति रहेगी, तब तक उन पर ताने रहूंगा और वे बेबस बने रहेंगे, चुप रह कर समर्थन देते रहेंगे. ‘‘मुख्यमंत्री बनने के बाद मैं ‘गठबंधन संस्कार’ को सदन में एक नया विधेयक पास करा कर कानूनी जामा पहना दूंगा.’’ अपने नेता दोस्त के ऐसे विचार सुन कर गुलाबचंद सन्न रह गए और उलटे पैर घर लौट गए.

राज कुमार राव क्यों नहीं जाएंगे कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल?

सिनेमा से जुड़े लोगों के लिए ‘‘कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’ कुंभ माना जाता है. ‘कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ में पूरे विश्व का सिनेमा व फिल्मकार जुटता है. भारतीय सिनेमा से जुड़ा हर इंसान किसी न किसी तरह कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा बनना चाहता है. मगर ‘शाहिद’, ‘अलीगढ़’, ‘न्यूटन’ और ‘ओमेर्टा’ जैसी फिल्मों में अभिनय कर बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान रखने वाले राज कुमार राव को अब तक के अपने करियर में कभी भी ‘कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ में जाने का अवसर नही मिला. पर अब जब उन्हें यह अवसर मिल रहा है, तो वह कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल नहीं जाएंगे.

वास्तव में भारतीय मूल की अमरीकन फिल्मकार नम्रता गुजराल के निर्देशन में राज कुमार राव ने एक फिल्म ‘‘ 5 वेडिंग्स’’ की है, जिसमें उनके साथ नरगिस फाखरी भी हैं. अंग्रेजी भाषा में बनी यह फिल्म भारत में ही फिल्मायी गयी है. अब ‘‘71 वें कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’ में फिल्म ‘‘ 5 वेडिंग्स’’ का विश्व प्रीमियर होना है, इसलिए इस फिल्म से जुड़े हर शख्स को ‘कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ का हिस्सा बनने का गौरव मिलने जा रहा है, मगर राज कुमार राव इस मौके का फायदा नहीं उठाएंगे.

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खुद राज कुमार राव कहते हैं- ‘‘हर कलाकार का सपना होता है, कान फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा बनना. यह मेरी खुश किस्मती है कि मेरी फिल्म ‘फाइव वेडिंग्स’ कान फिल्म फेस्टिवल में जा रही है. पर अफसोस मैं खुद नहीं जा पाउंगा. क्योंकि उस वक्त मैं अपनी फिल्म की शूटिंग में व्यस्त रहूंगा.’’

फिल्म ‘‘ 5 वेडिंग्स’’ जीवन मृत्यु, खोए हुए प्यार, हिजड़ों, सभ्यता व संस्कृति के टकराव के साथ साथ राजनीति की भी बात करती है.

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