खुल कर बोलो देश सुधारो

गोवा के टाउन ऐंड कंट्री प्लानिंग मिनिस्टर विजय सरदेसाई ने कहा है कि उत्तर भारतीय पर्यटक गोवा आ कर उसे गुरुग्राम जैसा गंदा बनाने की पूरी कोशिश करते हैं. वे सड़क पर कूड़ा फेंकते हैं, समुद्री तटों को गंदा करते हैं, बस में खड़े हो कर पेशाब तक कर डालते हैं.

16 लाख की आबादी वाले गोवा में 65 लाख यात्री सैर करने आते हैं. ये यात्री पूरी तरह से बिगड़ैल और असभ्य ही होते हैं और इन्हें गोवा को दूसरे राज्यों की तरह गंदा करने से कोई परहेज नहीं है.

नरेंद्र मोदी की 4 साल की स्वच्छ भारत कैंपेन को इस से अच्छा सर्टिफिकेट मिलना कठिन है, जब उन की ही पार्टी का एक मंत्री उन्हीं के नारों को खोखला बनाए. दरअसल, हमारे पूरे देश में सिविक सैंस की भारी कमी है और उस का कारण यह है कि हमारे नीतिनिर्धारक, शिक्षित, अमीर, सभ्य साफ कालोनियों में रहने वाले दूसरों को जानवर और गंवार समझते हैं.

हमारे यहां सफाई की जिम्मेदारी हमेशा दूसरों की रही है. सफाई की हजार चीजें उपलब्ध हों पर यहां बिकती झाड़ुएं ही हैं, क्योंकि अगर महंगी मशीनें अनपढ़ों को दे भी दी जाएं तो वे 4 दिन में ही खराब हो जाएंगी. चूंकि पढ़ेलिखों को झाड़ू नहीं चलानी आती, इसलिए बहुत थोड़े से घरों में वैक्यूम क्लीनर दिखेंगे.

सफाई का एक कल्चर होता है पर हमारे यहां तो कल्चर यह है कि सफाई करने वाला खुद गंदा रहे. अच्छे वेतन वाले सफाई कर्मचारी को साफसुथरा देख कर हमारे यहां आंखें चौड़ी कर ली जाती हैं. हमारे यहां सफाई रखना वर्ग विशेष का काम है, बाइयों का काम है. इसीलिए सारा देश गंदा रहता है. हम खुद साफ न करेंगे तो इस की महत्ता समझ न पाएंगे.

गोवा कई दशकों तक पुर्तगाली शासन में रहा जहां उन्होंने हरेक को बराबर का समझा और नतीजा यह है कि वहां की प्रति व्यक्ति आय भी अच्छी है और सफाई के प्रति हर जने की अवधारणा भी. और इलाकों से आने वाले भारतीय पर्यटक यह समझ नहीं पाते.

साफसफाई उत्पादकता बढ़ाती है, यह भेदभाव कम करती है, बीमारियां कम करती है, पर हमारे यहां घरों से ले कर नौर्थ ब्लौक (जहां केंद्र सरकार के कार्यालय हैं) तक सभी एकसमान गंदे हैं. डिगरी का फर्क हो सकता है पर मूलतया सफाई की जिम्मेदारी हमेशा किसी और की होती है.

गोवा के मंत्री का गुस्सा वाजिब है. उन के बयान पर थोड़ा हल्ला मचा है पर जब तक लोग खुल कर न बोलेंगे, देश सुधर नहीं सकता.

वीडियो : नोरा फतेही ने स्टेज पर लगाई आग

‘बाहुबली’ फेम नोरा फतेही बेहतरीन बैली डांसर हैं. वह ‘बिग बौस 9’ में भी अपनी अदाओं के जलवे दिखा चुकी हैं. इस बार नोरा का एक और हौट और सिजलिंग डांस वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में नोरा स्टेज पर अकेले बैली डांस करती नजर आ रही हैं. इस वीडियो के जरिये उन्होंने दिखा दिया है कि बैली डांस में उन्होंने महारत हासिल कर रखी है.

bollywood

बता दें ये वीडियो बेंगलुरु में हुए मिस इंडिया फेमिना दीवा अवार्ड्स 2018 का है. इस दौरान उन्हें एक ग्रुप परफौर्मेंस देना था, लेकिन तभी उन्हें सोलो परफौर्म करने के लिए कह दिया गया. दिलचस्प बात यह है कि इस सोलो परफौर्मेंस के लिए उन्होंने कोई प्रैक्टिस नहीं की थी. पर जब उन्होंने स्टेज पर बैली डांस करना शुरू किया तो हर कोई उन्हें बस देखता ही रह गया.

A post shared by Nora Fatehi (@norafatehi) on

नोरा अक्सर ही अपने सिजलिंग डांस की वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं. उन्होंने खुद अपने इस डांस वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर किया और कैप्शन में लिखा, ‘मैं इस सोलो परफौर्मेंस के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी. मैं बस संगीत को महसूस कर रही थी. मैं संगीत सुनती गईं और पूरी परफौर्मेंस दे डाली.

bollywood

26 वर्षीय नोरा फतेही को असली पौपुलैरिटी फिल्म ‘बाहुबली (2015)’ के मनोहारी.. गाने में दी अपनी बेहतरीन परफौर्मेंस से मिली. इस गाने पर उन्होंने जबरदस्त डांस किया था और प्रभास के साथ इस गाने में उनकी कैमेस्ट्री काफी जमी भी थी. यही नहीं, बिग बौस के घर में भी उन्होंने शानदार मूव्ज दिखाए थे. बता दें कि नोरा हाल ही में पंजाबी सिंगर हार्डी संधू के गाने ‘ना’ में नजर आईं थी. हार्डी के इस नए गाने में नोरा उनकी महबूबा के रोल में दिखी थीं.

A post shared by Nora Fatehi (@norafatehi) on

बता दें नोरा फतेही इंडो-कैनेडियन हैं. फतेही इंग्लिश, हिंदी, फ्रेंच और अरेबिक भाषाएं बोल लेती हैं. उन्होंने बौलीवुड फिल्म ‘रोरः टाइगर्स औफ द सुंदरबंस’ से अपने करियर की शुरुआत की थी. उसके बाद वे ‘क्रेजी कुक्कड़ फैमिली’ में भी नजर आ चुकी हैं. तेलुगु फिल्म ‘टेंपर’, ‘बाहुबली’ और ‘किक-2’ में उनके सौन्ग ने उन्हें पौपुलर बनाने का काम किया. वे मलयालम फिल्म ‘डबल बैरल’ में भी नजर आ चुकी हैं. लेकिन फिल्मों से ज्यादा सुर्खियां उन्होंने आइटम सौन्ग के जरिये बटोरी है.

बैड पर ये है शाहिद की पत्नी की पसंदीदा पोजिशन

बौलीवुड अभिनेता शाहिद कपूर और मीरा राजपूत की जोड़ी अक्सर चर्चा में बनी रहती हैं. मीरा और शाहिद ने रैंपवौक कर भी सुर्खियां बटोरी थीं. हाल ही में यह दोनों नेहा धूपिया के टौक शो ‘बीएफएफ विद वोग्स’ का हिस्सा बने थें. शो में मीरा ने अपनी लव-लाइफ से भी जुड़ी कई बातें शेयर की. शो के स्केयरी स्पाइस सेगमेंट में जब शो की होस्ट नेहा धूपिया ने मीरा से सवाल किया कि बैड पर उनकी पसंदीदा पोजिशन क्या है?

तो शाहिद ने जवाब दिए बिना ही आगे बढ़ने की सलाह पर मीरा ने कहा, “मुझे लगता है कि शाहिद कंट्रोल फ्रीक हैं.” हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब मीरा ने अपनी लव लाइफ के बारे में खुलकर बात की इसके पहले वह करण जौहर के शो कौफी विद करण में भी खुलासा किया था कि मीरा एक नेचुरल किसर हैं.

entertainment

मीरा और शाहिद की वजह से शो के होस्ट करण जौहर भी असहज महसूस करने लगे थे और कहा, आपको फ्लर्टिंग का मौका हम बाद में देंगे. करण ने अपने शो में मीरा से शाहिद की एक्स गर्लफ्रेंड्स के बारे में भी बात की थी. करण ने शाहिद से कहा, तुम चौथी बार भी लकी निकले.

जिस पर शाहिद ने कहा, ”यह आपकी गिनती है.” जिसके बाद मीरा ने पति शाहिद का पक्ष लेते हुए कहा, ”हम एक-दूसरे के बारे में सब कुछ जानते हैं.” जिसके बाद नेहा ने सवाल किया, किस बौलीवुड सेलिब्रिटी को नए स्टाइलिस्ट की जरुरत है जिस पर मीरा ने विद्या बालन का नाम लिया. नेहा ने दूसरा सवाल किया, बौलीवुड पार्टीज में सबसे बोरिंग सेलिब्रिटी कौन है मीरा ने शाहिद कपूर का नाम लिया हालांकि बाद में मीरा ने कहा, वह मजाक कर रही हैं.

एक इंटरव्यू के दौरान मीरा ने कहा, ”मैं मीशा के साथ केवल एक घंटे बीताने के बाद काम पर नहीं जा सकती. मीशा कोई पपी नहीं है. मुझे उसके लिए हर समय रहना चाहती हूं.” जिस पर बहुत लोगों को लगा कि मीरा शाहिद की एक्स गर्लफ्रेंड करीना कपूर खान पर तंज कस रही हैं क्योंकि वह प्रेगनेंसी के साथ ही काम करने की खबरों को लेकर चर्चा में थीं. जिस पर करीना ने मीडिया से बातचीत में कहा, ”मैं किस तरह की मां हूं, वह समय के साथ लोगों को पता चलेगा. मुझे लोगों को चिल्लाकर बताने की जरुरत नहीं है कि मैं तैमूर को प्यार करती हूं. हर मां और बच्चे का 9 महीने का सफर अलग होता है.”

मैं 22 वर्षीय युवती हूं. एक युवक से प्यार करती हूं. वह अकसर मुझ से सैक्स की मांग करता है. मैं क्या करूं.

सवाल
मैं 22 वर्षीय युवती हूं. पिछले एक वर्ष से एक युवक से प्यार करती हूं. वह भी मुझे काफी प्यार करता है. हम अकसर कौफी हाउस, रैस्टोरैंट वगैरा में भी साथ समय बिताते हैं. वह अकसर मुझ से सैक्स की मांग करता है, लेकिन मैं मना कर देती हूं. साथ ही जब भी मैं शादी की बात करती हूं तो वह टाल जाता है, जबकि वह अपने पैरों  पर भी खड़ा है. मैं भी जौब कर रही हूं. इधर मेरे लिए रिश्ते भी आ रहे हैं. मैं क्या करूं?

जवाब
आप जिस युवक से प्यार करती हैं उसे समझने की कोशिश करें. आखिर क्या कारण है कि वह आप से सैक्स की इच्छा तो रखता है पर शादी टाल रहा है. उस से कहें कि मेरे लिए रिश्ते आ रहे हैं. अगर वह सीरियस होगा तो अपने घर बात कर आप के पेरैंट्स के पास अपने पेरैंट्स को भेजेगा वरना समझ लीजिए कि वह टाइम पास कर रहा है.

भूल कर भी उस से सैक्स संबंध न बनाएं. जब वह संबंध बनाने की इच्छा जाहिर करे तो कहें कि पहले शादी कर ले सैक्स तो शादी के बाद ही सही रहता है. इस पर यदि वह नाराज हो तो परवा न करें वरना खुद के पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार बैठेंगी.

ये भी पढ़ें…

सैक्स फैंटेसीज : बदल रही है लोगों की सोच

कौमेडी सीरियल ‘भाभीजी घर पर हैं’ की कहानी कई बार सैक्स फैंटेसीज दिखाने की कोशिश करती है. इस सीरियल में अनिता और विभू मिश्रा नामक पतिपत्नी एक रोमांटिक कपल है. अनीता के करैक्टर में वह कई बार समाज की सैक्स फैंटेसीज को दिखाने की कोशिश भी करती है. अनीता जब बहुत रोमांटिक मूड में होती है, तो पति विभू से कहती है कि वह किसी दूसरे रूप में प्यार करना चाहती है. कभी वह उसे प्लंबर बनने को कहती है, कभी इलैक्ट्रीशियन तो कभीकभी गुंडामवाली तक बनने को कहती है. पति विभू उसी गैटअप में आता है. वह पत्नी से उसी अंदाज में बात करता है. इस से पत्नी अनीता को बहुत खुशी महसूस होती है. वह दोगुनी ऐनर्जी से प्यार करती है. यह कौमेडी सीरियल भले ही हो, पर इस में पतिपत्नी संबंधों को बहुत ही नाटकीय ढंग से दिखाया जा रहा है.

सैक्स को ले कर महिलाओं पर रूढिवादी सोच हमेशा हावी रही है. लेकिन अब समय के साथ यह टूटने लगी है. अब पुरुषों की ही तरह महिलाएं भी सैक्स को पूरी तरह ऐंजौय करना चाहती हैं. इसे ले कर उन के मन में कई तरह के सपने भी होते हैं. अब ये बातें भी पुरानी हो गई हैं कि कौमार्य पति की धरोहर है. अब शादी के पहले ही नहीं शादी के बाद भी सैक्स की वर्जनाएं टूटने लगी हैं. शादी के बाद पतिपत्नी खुद भी ऐसे अवसरों की तलाश में रहते हैं जहां वे खुल कर अपनी हसरतें पूरी कर सकें.

परेशानियों से बचाव

सैक्स के बाद आने वाली परेशानियों से बचाव के लिए भी महिलाएं तैयार रहती हैं. प्लास्टिक सर्जन डाक्टर रिचा सिंह बताती हैं, ‘‘शादी से कुछ समय पहले लड़कियां हमारे पास आती हैं, तो उन का एक ही सवाल होता है कि उन्होंने शादी के पहले सैक्स किया है. इस बात का पता उन के होने वाले पति को न चले, इस के लिए वे क्या करें? लड़कियों को जब इस बारे में सही राय दी जाती है तो भी वे मौका लगते ही सैक्स को ऐंजौय करने से नहीं चूकतीं. शादी के कई साल बाद महिलाएं हमारे पास इस इच्छा से आती हैं कि वे शारीरिक रूप से कुंआरी सी हो जाएं.’’

विदेशों में तो सैक्स को ले कर तमाम तरह के सर्वे होते रहते हैं पर अपने देश में ऐसे सर्वे कम ही होते हैं. कई बार ऐसे सैंपल सर्वों में महिलाएं अपने मन की पूरी बात सामने रखती हैं. इस से पता चलता है कि सैक्स को ले कर उन में नई सोच जन्म ले रही है. डाक्टर रिचा कहती हैं कि शादी से पहले आई एक लड़की की समस्या को एक बार सुलझाया गया तो कुछ दिनों बाद वह दोबारा आ गई और बोली कि मैडम एक बार फिर गलती हो गई.

सैक्स रोगों की डाक्टर प्रभा राय बताती हैं कि हमारे पास ऐसी कई महिलाएं आती हैं, जो जानना चाहती हैं कि इमरजैंसी पिल्स को कितनी बार खाया जा सकता है. कई महिलाएं तो बिना डाक्टर की सलाह के इस तरह की गोलियों का प्रयोग करती हैं. कुछ महिलाएं तो गर्भ ठहर जाने के बाद खुद ही मैडिकल स्टोर से गर्भपात की दवा ले कर खा लेती हैं. मैडिकल स्टोर वालों से बात करने पर पता चलता है कि बिना डाक्टर की सलाह के इस तरह की दवा का प्रयोग करने वाले पतिपत्नी नहीं होते हैं.

बदल रही सोच

सैक्स अब ऐंजौय का तरीका बन गया है. शादीशुदा जोड़े भी खुद को अलगअलग तरह की सैक्स क्रियाओं के साथ जोड़ना चाहते हैं. इंटरनैट के जरीए सैक्स की फैंटेसीज अब चुपचाप बैडरूम तक पहुंच गई है, जहां केवल दूसरे मर्दों के साथ ही नहीं पतिपत्नी भी आपस में तमाम तरह की सैक्स फैंटेसीज करने का प्रयास करते हैं. इंटरनैट के जरीए सैक्स की हसरतें चुपचाप पूरी होती रहती हैं. सोशल मीडिया ग्रुप फेसबुक और व्हाट्सऐप इस में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं. फेसबुक पर महिलाएं और पुरुष दोनों ही अपने निक नेम से फेसबुक अकाउंट खोलते हैं और मनचाही चैटिंग करते हैं. इस में कई बार महिलाएं अपना नाम पुरुषों का रखती हैं ताकि उन की पहचान न हो सके. वे चैटिंग करते समय इस बात का खास खयाल रखती हैं कि उन की सचाई किसी को पता न चल सके. यह बातचीत चैटिंग तक ही सीमित रहती है. बोर होने पर फ्रैंड को अनफ्रैंड कर नए फ्रैंड को जोड़ने का विकल्प हमेशा खुला रहता है.

इस तरह की सैक्स चैटिंग बिना किसी दबाव के होती है. ऐसी ही एक सैक्स चैटिंग से जुड़ी महिला ने बातचीत में बताया कि वह दिन में खाली रहती है. पहले बोर होती रहती थी. जब से फेसबुक के जरीए सैक्स की बातचीत शुरू की है तब से वह बहुत अच्छा महसूस करने लगी है. वह इस बातचीत के बाद खुद को सैक्स के लिए बहुत सहज अनुभव करती है. पत्रिकाओं में आने वाली सैक्स समस्याओं में इस तरह के बहुत सारे सवाल आते हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि सैक्स की फैंटेसी अब फैंटेसी भी नहीं रह गई है. इसे लोग अपने जीवन का अंग बनाने लगे हैं.

समाजशास्त्री डाक्टर मधु राय कहती हैं, ‘‘पहले ऐसी बातचीत को मानसिक रोग माना जाता था. समाज भी इसे सही नहीं मानता था. अब इस तरह की घटनाओं को बदलती सोच के रूप में देखा जा रहा है. हमारे पास सैक्स समस्याओं पर चर्चा करने आए व्यक्ति ने बताया कि वह अपनी पत्नी के साथ सैक्स करने में असमर्थ था. उस ने कई डाक्टरों से अपना इलाज भी करवाया, लेकिन कोई लाभ न हुआ. ऐसे में उस की पत्नी ने घर के नौकर के साथ संबंध बना लिए. एक दिन पति ने पत्नी को नौकर के साथ संबंध बनाते देख लिया. मगर उसे गुस्सा आने के बजाय अपने में बदलाव महसूस हुआ. उस दिन उस ने अपनी पत्नी के साथ खुद भी सैक्स संबंध बनाने में सफलता पाई. अब वह खुद को सहज महसूस करने लगा था.’’

तरहतरह के लोग

फेसबुक को देखने, पसंद करने और चैटिंग करने वालों में हर वर्ग के लोग हैं. ज्यादातर लोग गलत जानकारी देते हैं. व्यक्तिगत जानकारी देना पसंद नहीं करते. छिबरामऊ की नेहा पाल की उम्र 20 साल है. वह पढ़ती है. वह लड़के और लड़कियों दोनों से दोस्ती करना चाहती है. 32 साल की गीता दिल्ली में रहती है. वह नौकरी करती है. उस की किसी लड़के के साथ रिलेशनशिप है. वह केवल लड़कियों से सैक्सी चैटिंग पसंद करती है. उस की सब से अच्छी दोस्त रीथा रमेश है, जो केरल की रहने वाली है. वह दुबई में अपने पति के साथ रहती है. अपने पति के साथ शारीरिक संबंधों पर वह खुल कर गीता से बात करती है. ऐसे ही तमाम नामों की लंबी लिस्ट है. इन में से कुछ लड़कियां अपने को खुल कर लैस्बियन मानती हैं और लड़कियों से दोस्ती और सैक्सी बातों की चैटिंग करती हैं. कुछ गृहिणियां भी इस में शामिल हैं, जो अपने खाली समय में चैटिंग कर के मन को बहलाती हैं. कुछ लड़केलड़कियां और मर्द व औरतें भी आपस में सैक्सी बातें और चैटिंग करते हैं.

कई लड़केलड़कियां तो अपने मनपसंद फोटो भी एकदूसरे को भेजते हैं. फेसबुक एकजैसी रुचियां रखने वाले लोगों को आपस में दोस्त बनाने का काम भी करता है. एक दोस्त दूसरे दोस्त को अपनी फ्रैंडशिप रिक्वैस्ट भेजता है. इस के बाद दूसरी ओर से फ्रैंडशिप कन्फर्म होते ही चैटिंग का यह खेल शुरू हो जाता है. हर कोई अपनीअपनी पसंद के अनुसार चैटिंग करता है. कुछ लड़कियां तो ऐसी चैटिंग करने के लिए पैसे तक वसूलने लगी हैं. वाराणसी के रहने वाले राजेश सिंह कहते हैं, ‘‘मुझ से चैटिंग करते समय एक लड़की ने अपना फोन नंबर दिया और कहा इस में क्व500 का रिचार्ज करा दो. मैं ने नहीं किया तो उस ने सैक्सी चैटिंग करना बंद कर दिया.’’

इसी तरह से लखनऊ के रहने वाले रामनाथ बताते हैं, ‘‘मेरी फ्रैंडलिस्ट में 4-5 लड़कियों का एक ग्रुप है, जो मुझे अपने सैक्सी फोटो भेजती हैं. मेरे फोटो देखना भी वे पसंद करती हैं. कभीकभी मैं उन का नैटपैक रिचार्ज करा देता हूं. इन से बात कर मैं बहुत राहत महसूस करता हूं. मुझे यह अच्छा लगता है, इसलिए मैं कुछ रुपए खर्च करने को भी तैयार रहता हूं.’’ फेसबुक के अलावा अब व्हाट्सऐप पर भी इस तरह की चैटिंग होने लगी है.

भगवा विजय पताका पर पराजय के पैबंद

विकास की खोखली हवा के सहारे भाजपा का विजय रथ ज्योंज्यों चारों ओर आगे बढता जा रहा है, पीछेपीछे पराजय की धूल उस की जीत को धुंधला रही है. यह स्थिति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के अजेय रहने के गर्व को तोड़ रही है.

2014 में मोदी जिस विकास की बात कर राज्य दर राज्य जीतते आ रहे हैं, तब से हो रहे उपचुनावों में मिल रही लगातार हार उस विकास की पोल खोलती आ रही है. हाल ही उत्तरप्रदेश और बिहार में हुए 3 लोकसभा और 2 विधानसभा के उपचुनावों में भाजपा को करारी हार से उस के अंध समर्थक हैरान हैं. उत्तरप्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट मोदी और योगी के विकास की गंगा में बह गईं.

करीब एक साल पहले हिंदुत्व के कट्टर चेहरे योगी आदित्यनाथ को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने से खाली हुई गोरखपुर और उपमुख्यमंत्री बने केशवप्रसाद मौर्य की फूलपुर लोकसभा सीट उपचुनाव में मिली शिकस्त ने भाजपा के बड़बोले दिग्गजों की हेकड़ी निकाल दी है.

गोरखपुर सीट 3 दशक से हिंदुत्व के गोरखनाथ मठ की बपौती रही है पर इस बार समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिल कर पार्टी के गढ को ढहा दिया. भाजपा के उपेंद्र शुक्ल को सपा के प्रवीण निषाद ने हरा दिया. 1989 से इस लोकसभा सीट पर गोरखनाथ मठ का दबदबा था. योगी आदित्य नाथ 1998 से लगातार 5 चुनावों में यहां से जीतते आ रहे थे. इस से पहले यह सीट उन के गुरु महंत अवैधनाथ केपास थी.

उधर फूलपुर से सपा के नागेंद्र पटेल ने भाजपा के कौशलेंद्र सिंह पटेल को 59 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज की. गोरखपुर और फूलपुर क्षेत्र में दलित और पिछड़े मतदाताओं की तादाद अधिक है. गोरखपुर में सब से अधिक निषाद वोटर करीब 3.6 लाख हैं. इस के अलावा करीब 2-2 लाख यादव और दलित और 1.5 लाख ब्राह्मण मतदाता हैं. इस तरह सीधी लड़ाई में निषाद, यादव, दलित और मुस्लिम वोटरों ने मिल कर भाजपा को ले बैठे.

भाजपा ने उत्तरप्रदेश और बिहार में पूरी ताकत झोंक दी थी. पिछले एक महीने से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उन की कैबिनेट के दिग्गजों ने यहां डेरा डाल रखा था पर 23 साल पुरानी दुश्मनी भुला कर सपाबसपा एक साथ आए तो भाजपा के लिए जीत मुश्किल हो गई. कांग्रेस ने यहां अकेले चुनाव लड़ा था. बिहार के अररिया लोकसभा सीट पर जेल में बंद लालू प्रसाद यादव के राजद की जीत से नीतीश कुमार और भाजपा को करारा तमाचा पड़ा है. कुछ समय पहले ही नीतीश कुमार ने लालू का साथ छोड़ मोदी जाप करते हुए भाजपा के हिंदुत्व रथ पर सवार हो गए थे. यहां राजद का कांग्रेस से समर्थन हासिल था.

जहानाबाद विधानसभा से भी राजद के सुदय यादव जीते जबकि भभुआ विधानसभा से भाजपा की रिंकी पांडेय को जीत मिली यानी भाजपा मात्र एक विधानसभा सीट हासिल कर पाई. उत्तरप्रदेश में भाजपा नेता सपाबसपा गठबंधन को बेमेल बताते रहे. इन चुनाव नतीजों का संकेत है कि सपा और बसपा का साथ दोनों के समर्थक मतदाताओं को रास आया है. दलित और पिछड़े मतदाता मिल गए. दोनों पार्टियों का तालमेल भाजपा पर भारी पड़ा. अब सपाबसपा का गठजोड़ 2019 में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है.

politics

इन उपचुनावों से पहले राजस्थान की अजमेर और अलवर 2 लोकसभा और एक विधानसभा सीट मांडलगढ भाजपा को गंवानी पड़ी थीं. इस से पहले मध्यप्रदेश की रतलाम सीट शिवराज सिंह के अति हिंदुत्व प्रेम की बलि चढ गई. पंजाब में गुरदासपुर लोकसभा सीट से हाथ धोना पड़ा. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 11 राज्यों में 19 लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में भाजपा अधिकतर हारती गई. भाजपा सिर्फ वडोदरा और शहडोल सीट ही जीत पाई.

हिंदुत्व के नाम पर तमाम जातियों को एक करने का फार्मूला अब उत्तरप्रदेश में सफल नहीं रहा क्योंकि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद हिंदुत्व के समर्थकों के कई जगह उग्र और हिंसक तेवर देखे गए. योगी की हिंदू युवा वाहिनी में बड़ी संख्या में संघ से जुड़े ब्राह्मण, बनिए और राजपूत युवा शामिल हुए. इन का उपद्रव जगहजगह देखा गया. कासगंज में इस कट्टर हिंदू संगठन के युवाओं द्वारा मुस्लिम आबादी में जा कर उन्हें चुनौती देने, सहारनपुर में महाराणा प्रताप के जुलूस के दौरान दलित बस्ती में दलितों पर फब्तियां कसने, दलित युवाओं के मूंछ रखने, महाराष्ट्र में दलित युवकों द्वारा अंबेडकर पर बने गीत सुनने पर उन से मारपीट जैसे घटनाओं ने मोदीयोगी के प्रति लोगों में गुस्से की लहर फैलने लगी. केंद्र में चाहे मोदी हों, राज्यों में योगी, चौहान, रूपाणी, फड़नवीस या वसुंधरा हों, निचलों के लिए गुजरबसर करना आसान नहीं रहा. यह तबका भाजपा के प्रति आक्रोशित दिखने लगा. गुजरात विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को जीत के लिए नाके चने चबाने पड़े.

दरअसल भाजपा केवल वही काम कर रही है जो हिंदुत्व को पालनेपोसने वाला हो. केंद्र और राज्यों में धार्मिक नीतियां लागू की जा रही हैं जिस से धर्म का व्यापार फैलेफूले. वर्णव्यवस्था में निचला वर्ग अभी भी विकास में पीछे हैं. गैर बराबरी उस का पीछा नहीं छोड़ रही. असल में जब तक देश में नीतिनिर्धारक दलितपिछड़े नहीं होंगे, देश तरक्की नहीं कर पाएगा. शासनप्रशासन में फैसले करने का अधिकार 2 प्रतिशत ऊपरी पदों पर बैठे लोगों के हाथ में है. निचले तबकों के लिए जो नीतियां बनती हैं उसे ऊपरी तबके वाले अपने फायदे के लिए बनाते हैं जिस से उन लोगों का कोई कल्याण नहीं हो पाता.

निचला वर्ग उपेक्षा और अपमान सहता रहता है. इस धारणा प्रचारित किया जाता है कि दलित, अति पिछड़े में काबिलियत नहीं होती इसलिए उन्हें उच्च पदों पर न लगाया जाए. उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद प्रशासन में तमाम बड़े पदों पर पीएमओ में बैठे प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नगेंद्र मिश्रा ने ऐसे उच्च अधिकारी छांट कर भेजे जिन को पुराने हिंदू ग्रंथों के अनुसार पढनेलिखने का अधिकार दिया गया था. लखनऊ सचिवालय में तमाम मंत्रालयों में योजनाएं, नीतियां बनाने और फैसले लेने वाले उच्च, श्रेष्ठि वर्ग के अधिकारी पदस्थ हैं.

हमारे नेताओं के दिमाग में यह गलत धारणा बैठा रखी है कि निचली जातियों के अधिकारी ही देश का प्रशासन चलाने के काबिल हैं. इस धारणा से मुक्ति पा कर निचली जातियों के योग्य लोगों को नीतिनिर्धारण में जब तक नहीं लगाया जाएगा, विकास में समानता नहीं आ पाएगी.

लड़कियों का यौन शोषण कब तक

यौन हिंसा की घटनाएं आजकल कुछ ज्यादा ही घट रही हैं. दुराचार, शायद अनियंत्रित कामवासना को संतुष्ट करने का एक जुगाड़ है.

असल में बलात्कार या डेटरेप से पहले बलात्कारी के दिमाग में नशे की तरह से फैला हुआ संक्रमण होता है. लेकिन उस संक्रमण का शिकार बलात्कारी नहीं, पीडि़ता होती है. सहना पीडि़ता को ही पड़ता है. पीडि़ता को ही दोषी माना जाता है. समाज व खानदान के नाम पर उसे धब्बा भी कहा जाता है. इतना ही नहीं, उसे खानदान के नाम पर प्रताडि़त भी किया जाता है.

शादी का झांसा दे कर किसी लड़की के साथ शारीरिक रिश्ते बनाना और बाद में शादी से मना करना, आजकल आम बात है.  क्या यह बलात्कार के दायरे में आता है, वह भी तब, जब लड़के का लड़की से शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा न हो? हम इसे शादी की आड़ में यौन शोषण कह सक सकते हैं.

अधिकतर लड़के शादी का झांसा दे कर लड़कियों से शारीरिक रिश्ते बनाते हैं और तब तक कार्यक्रम चलता रहता है जब तक लड़की गर्भवती नहीं हो जाती. फिर आसान सा रास्ता सुझाया जाता है गर्भपात का. कुछ मामलों में गर्भपात कराना मुश्किल हो जाता है और आखिरकार  मामला परिवार व पड़ोसियों की नजर में आ ही आता है.

सहमति का संशय

अधिकतर मामलों में ऐसे दोषियों के खिलाफ मामले बहुत कम दर्ज होते हैं. कारण, समाज का डर होता है. अगर मामला दर्ज हो भी, तो होता कुछ नहीं. लगभग रोज ही ऐसी कई घटनाएं घट रही हैं. कई बार सवाल उठाए गए हैं कि किसी लड़की से शादी का झूठा वादा कर के शारीरिक रिश्ते बनाना सहमति है या नहीं? यदि वह बलात्कार नहीं है तो धोखेबाजी है या नहीं?

crime

ऐसे ही एक केस में कलकत्ता उच्च न्यायालय का मानना था, ’’अगर कोई बालिग लड़की शादी के वादे के आधार पर शारीरिक रिश्ते बनाने को राजी होती है और तब तक इस गतिविधि में लिप्त रहती है जब तक कि वह गर्भवती नहीं हो जाती, तो यह उस की ओर से स्वच्छंद संभोग के दायरे में आएगा. ऐसे में, तथ्यों को गलत इरादे से प्रेक्षित नहीं किया जा सकता. इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा-90 के तहत अदालत द्वारा कुछ नहीं किया जा सकता. जब तक यह आश्वासन न मिले कि रिश्ते बनाने के दौरान आरोपी का इरादा आरंभ से ही शादी करने का नहीं था.‘‘

वहीं दूसरी ओर, बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बी बी वग्यानी ने एक सुनवाई के दौरान कहा, ’’शादी करने का झूठा वादा महज धोखाधड़ी है. भारतीय दंड संहिता की धारा-415 में धोखाधड़ी के अपराध को परिभाषित किया गया है. बिना किसी संदेह के अपराधी का अपराध दंडनीय है, क्योंकि पीडि़ता को जानबूझ कर शादी करने के वादे के झांसे में रख कर, शारीरिक रिश्ते बनाने के लिए उकसाया गया था. आरोपी ने लड़की से शादी करने का वादा किया और इसी प्रभाव में लड़की ने उस के साथ शारीरिक रिश्ते भी बना लिए. लड़की भी उस से शादी करने को उत्सुक थी, लेकिन लड़के ने जो वादा किया, वह झूठा था. यह विवाह करने के वादे को ले कर वादाखिलाफी का मामला प्रतीत होता है, न कि विवाह के झूठे वादे का मामला.‘‘

असल में यह भावनाओं और नाजुक पलों में जनून से जुडे़ मामले होते हैं. जब भी लड़कालड़की मिलते हैं, एकदूसरे को बहुत प्यार करते हैं. लड़की भी उस लड़के को काफी छूट देती है, जिस से वह बेहद प्यार करती है. लड़के के बुलाने पर चोरीछिपे लड़की सुनसान जगह पर चुपचाप मिलती भी है और संबंध भी बनाती है.

जब दो जवान लोग हों, तो आमतौर पर यह होता ही है कि वे सभी अहम बातें भुला कर जनून में आ कर प्यार कर बैठें, खास कर तब जब वे कमजोर क्षणों में अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पाते. ऐसे में, दोनों के बीच शारीरिक रिश्ते कायम हो ही जाते हैं. लड़की स्वेच्छा से लड़के के साथ रिश्ते कायम करती है, वह उस से बेहद प्यार करती, इसलिए नहीं कि उस लड़के ने उस से शादी करने का वादा किया था, बल्कि इसलिए कि लड़की ऐसा चाहती भी थी.

गलतफहमी या धोखा

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में लड़की की उम्र, उस की शिक्षा और उस के सामाजिक स्तर व लड़के के मामले में भी इन्हीं सब पर गौर किया जाना जरूरी है. वैसे तो लड़की स्वयं इस कृत्य में बराबर की भागीदार है पर वह समझ नहीं पा रही हो कि किन हालात के चलते वह ऐसे कृत्य में फंस गई और ऐसे में, लड़की के हामी भरने की कोई अहमियत नहीं है. उस से गलतफहमी में हामी भरवाना धोखा है. इसे लड़की की मंजूरी नहीं माना जा सकता.

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी के जैन ने 1 फरवरी, 2010 को आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए और ऐसे आपराधिक कृत्य की निंदा करते हुए कहा, ’’अदालत ऐसे मौकापरस्त लोगों को लड़की की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का लाइसैंस नहीं दे सकती. लड़कियों का शोषण करने वाले ऐसे लोगों को बेखौफ बच निकलना कानून का मकसद कभी नहीं हो सकता, जो इस घिनौने कृत्य के बाद ताउम्र जेल की सजा का हकदार है.‘‘

बंबई हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बी यू वाहाने ने (1991) के एक मामले में सामाजिक अनुभव के आधार पर स्पष्ट किया कि वयस्क लड़की से चालबाजी से उस की सहमति ले ली जाए वह भी तब जब वह बेसहारा और सैक्स को ले कर असंतुष्ट हो, उसे पैसे की जरूरत हो, बहानों से उसे प्रभावित किया जाए या हामी भरने के हालात बनाए जाएं आदि में कानूनी राय और फैसले सीधेसीधे बंटे हुए हैं, सहमति और तथ्यों के उलझाव में उलझे हुए हैं, क्योंकि कानून पूरी तरह पारदर्शी नहीं है और फैसले हर मामले के तथ्यों व हालात के आधार पर होते हैं.

हालांकि न्यायिक राय को ले कर आमराय यही है कि ऐसे मामलों में सब से कठिन काम यह साबित करना होता है कि लड़की का शारीरिक शोषण हुआ है. औरत के खिलाफ अपराध संबंधी किंतुपरंतु को ले कर जब तक कानून में संशोधन नहीं होता, न्याय से जुड़े ऐसे कानूनी पेंच यों ही कायम रहेंगे.

उदाहरण के लिए बाराबंकी में 9वीं क्लास की नाबालिक लड़की से उस के ही सहपाठी द्वारा एकांत पा कर बलात्कार किया गया. लेकिन पुलिस ने सिर्फ छेड़छाड़ का मामला दर्ज किया. मुरादाबाद और झांसी में भी कुछ ऐसा ही हुआ. सिर्फ फर्क इतना है कि संबंध सहमति से बने थे पर बाद में एक लड़की एमएमएस का शिकार हुई तो दूसरी गैंगरेप का और उस ने खुद को आग लगा ली. कानपुर और लखनऊ में भी बलात्कार की शिकार 2 नाबालिक लड़कियां मौत की नींद सो गईं.

सिर्फ सवाल जवाब नहीं

एक शोध के अनुसार दुनियाभर में हर 3 में से 1 महिला को शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होना पड़ता है. यही नहीं, दुनियाभर में 30 प्रतिशत महिलाएं नजदीकी साथी द्वारा हिंसा या दुर्व्यवहार की शिकार होती हैं. एक और रिपोर्ट के मुताबिक, अपने साथी द्वारा शारीरिक या यौन दुर्व्यवहार की शिकार होने वाली 42 प्रतिशत महिलाएं इस से चोटिल होती हैं. हजारों ऐसे मुकदमे, आंकड़े, तर्ककुतर्क, जालजंजाल और सुलगते सवाल समाज के सामने आज भी मुंह बाए खड़े हैं.

अन्याय, शोषण और हिंसा की शिकार स्त्रियों के लिए घरपरिवार की दहलीज से अदालत के दरवाजे तक बहुत लंबीचौड़ी खाई है, जिसे पार कर पाना दुसाध्य काम है. अदालत के बाहर अंधेरे में खड़ी आधी दुनिया के साथ न्याय का फैसला कब तक सुरक्षित रहेगा या रखा जाएगा? कब, कौन, कहां, कैसे सुनेगा इन के दर्द की दलील और न्याय की अपील, ये सवाल समाज से जवाब मांग रहे हैं.

युवा तोड़ें धार्मिक जकड़न

किशोरावस्था तक जो त्योहार मन को खूब भाते हैं वे युवावस्था आतेआते क्यों मन को कचोटने लगते हैं, इस बात का हमारे तीजत्योहार प्रधान देश में इस सवाल से गहरा संबंध है कि त्योहार कैसे मनाएं. 15-16 वर्ष की उम्र तक के किशोरों के तर्कों को हवा में उड़ा दिया जाता है लेकिन युवाओं के तर्कों का सहज जवाब आज तक कोई धर्म या उस का जानकार नहीं दे पाया.

यह दीगर बात है कि उन्हें गोलमोल वैज्ञानिक किस्म के जवाब दे कर संतुष्ट करने और धर्म से सहमत करने की कोशिशें की जाती हैं जिन के अपनेअलग माने होते हैं.

त्योहारों का संबंध समाज से ज्यादा है या धर्म से, इस सवाल के जवाब में भोपाल के एक प्राईवेट इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ रहे द्वितीय वर्ष के छात्र शाश्वत मिश्रा कहते हैं कि सिखाया तो यही गया है कि त्योहार किसी न किसी धार्मिक कारण के चलते मनाए जाते हैं जिन में आजादी कम बंदिशें ज्यादा होती हैं. बकौल शाश्वत, ‘‘भोपाल में पढ़ने आने के पहले तक घर में उसे नवरात्रि के दिनों में व्रत रखने को बाध्य किया जाता था लेकिन होस्टल में आ कर यह नियम टूट गया. इस से कोई खास फर्क नहीं पड़ा. उलटे, एक दबाव से मुक्ति मिली.’’

साफ यह हुआ कि भारतीय समाज बहुत ही वर्जनाओं में जीता है. त्योहारों के दिनों में तो खासतौर से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कोई माने नहीं रह जाते.

शाश्वत के ही एक सहपाठी अनिमेष की राय उस से उलट है कि धर्म के दिशानिर्देशों को मानने में हर्ज क्या है. अनिमेष की नजर में इस बात को मुद्दा बनाया ही नहीं जाना चाहिए कि धर्म क्या कहता है. हमें त्योहारों के दूसरे पहलुओं को देखना चाहिए, मसलन सब से बड़ा त्योहार दीवाली एक सामाजिक उल्लास का प्रतीक है. इस दिन और रात हम एक विशिष्ट मानसिकता में रहते हैं. साफसफाई पर जोर दिया जाता है. घरों में नएनए सामान खरीदे जाते हैं. नए कपड़े पहने जाते हैं. पकवान बनते हैं. आतिशबाजी चलाई जाती है. ऐसे में धर्म का रोना ले कर बैठ जाना फुजूल का पूर्वाग्रह नहीं, तो क्या है.

विरोधाभासी जकड़न

5वीं क्लास में रटाया जाने वाला दीवाली का निबंध बांच रहा अनिमेष और उस निबंध को धार्मिक जकड़न बता रहा शाश्वत दरअसल 2 अलगअलग विचारधाराओं का प्रतिनिधत्व करते नजर आते हैं. पहली समझौतावादी है जबकि दूसरी तर्क आधारित है.

हैरत की बात यह है कि इन दोनों ने ही बीती 5 सितंबर को गणेश विसर्जन के दौरान होस्टल में साथ बैठ कर शराब पी थी और दोनों को ही इस में किसी गणेश या धर्म का खौफ नहीं लगा था. इन की नजर में यह झूमनेनाचने गाने का इवैंट था ठीक वैसे ही जैसा हर साल एक जनवरी को होता है.

फिर एक वर्ग क्यों तर्क को पूर्वाग्रह करार देते धर्म और उस की बंदिशों पर बहस या चर्चा करने से बचना चाहता है. इस सवाल का मनोवैज्ञानिक जवाब तो यही नजर और समझ आता है कि धार्मिक सिद्धांतों और निर्देशों का पालन करना बचपन से ही थोप दिया जाता है.

ऐसे में इन की सफाई समझने के बाद भी अधिकांश युवा धर्म के खोखलेपन को इसलिए स्वीकार लेते हैं और जिंदगीभर ढोते भी रहते हैं कि कौन फालतू के विवादों में फंसे, सदियों और पीढि़यों से जो होता आ रहा है उसे करते रहने में हमारा क्या बिगड़ता है.

बिगड़ता यह है

हर युवा का अपना एक दार्शनिक दृष्टिकोण भी होता है जो अपनी जिज्ञासाओं का समाधान चाहता है, लेकिन वह खोखली बातों से बहलने को तैयार नहीं होता, मसलन बहुत साधारण और प्रचलित यह धारणा कि दीवाली पर विधिविधान से पूजापाठ करने से लक्ष्मी आती है.

लक्ष्मी यानी पैसा अगर एक खास दिन पूजापाठ करने से आता होता तो मेहनत की जरूरत क्या, इस बात को अब अधिकांश युवा सोचने लगे हैं.

बीकौम की छात्रा अदिति की मानें तो अगर ऐसा है तो मैं रोज लक्ष्मीपूजा करने को तैयार हूं, लेकिन लक्ष्मी या कोई दूसरा देवीदेवता इस बात की गारंटी तो ले.

बीकौम करने के साथसाथ बैंक की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही अदिति का मानना है कि जो हासिल होगा वह लगन और मेहनत से होगा. मेहनत तो हम खूब करते हैं और उस से ही कैरियर बनता है पर हमारी लगन को धर्म का नाम प्रेरणा या उपलब्धि करार दे दिया जाता है.

यानी कुछ अच्छा हुआ तो व्रत, उपवास और पूजापाठ की वजह से हुआ और मनमाफिक नहीं हुआ तो किस्मत खराब थी या मेहनत में कोई कमी थी. जिस की जिम्मेदारी लेने से कोई तैयार नहीं. युवा पीढ़ी कभी भाग्यवादी नहीं रही, इसलिए वह त्योहारों की धार्मिक जकड़न से मुक्ति चाहती है जो उसे आसानी से नहीं मिल रही. ऐसे में वह या तो अनिमेष की तरह समझौता कर लेती है यानी धार्मिक जकड़न के आगे हथियार डालती है या फिर शाश्वत की तरह अपने सवाल व तेवर कायम रखती है.

मिलता यह है

सवालों और तर्कों का गहरा संबंध युवाओं के आत्मविश्वास से है. जो युवा जवाब न मिलने पर धार्मिक जकड़नों को नकारने लगे हैं उन में एक अलग तरह का आत्मविश्वास होता है क्योंकि वे दिमागीतौर पर किसी रूढि़ या चमत्कार के गुलाम नहीं रहते.

कम मात्रा में ही सही ये वे युवा हैं तो संतुष्ट रहते हैं, किसी संदेह में नहीं जीते. लेकिन जिन युवाओं ने असमंजस पाल रखा है वे कैरियर में सफल भले ही हो जाएं पर संतुष्ट नहीं रह पाते. इसलिए उन में आत्मविश्वास बेहद कम होता है.

हर दौर में युवा यह सवाल पितृपक्ष के दिनों में जरूर करते हैं कि जब ब्राह्मण के जरिए खायापिया पूर्वजों तक पहुंच जाता है तो वे मोबाइल फोन क्यों नहीं ले लेते जिस से पूर्वजों से बातचीत ही हो जाए. सोशल मीडिया पर यह सवाल या दलील इस साल भी खूब वायरल हुई थी. लेकिन इस पर बहस नहीं हुई. यह बेहद निराशाजनक बात है. वजह, युवा फेसबुक और व्हाट्सऐप पर धर्म व जाति के आधार पर तो खूब एकदूसरे पर कीचड़ उछालते हैं लेकिन एक मामूली सवाल का जवाब नहीं दे पाते.

यह युवावर्ग कहीं जवाब मांगने की जिद पर अड़ न जाए, इसलिए हर साल धार्मिक जकड़न शिथिल कर दी जाती है, जिस का मकसद या साजिश युवाओं को धर्म के मकड़जाल में उलझाए रखना होता है.

एक नई जकड़न

मिसाल झांकियों की लें तो अब युवा शराब पी कर विसर्जन समारोह में नाचगा सकते हैं. इस से अब धर्म भ्रष्ट नहीं होता. जींसटौप पहने युवतियों को भी नाचनेगाने की छूट मिल गई है और अब वे धार्मिकतौर पर अछूत नहीं रही हैं. गणेश और दुर्गा के साथ सैल्फी खींचते युवा अगर यह समझते हैं कि वे धार्मिक जकड़न से अपनी कोशिशों के चलते इस तरह मुक्त हो रहे हैं तो यह उन की गलतफहमी ही है.

दरअसल, उन्हें एक नई जकड़न में कसा जा रहा है जिस में धर्म की रस्सी थोड़ी मुलायम है. बंद कोठरी से निकाल कर किसी कैदी को हवा और रोशनी देने वाली खिड़की वाली कोठी में रख दिया जाए तो उसे थोड़ी राहत तो मिलेगी पर रिहाई नहीं. कुंडी ज्यों की त्यों ही बंद रहती है.

युवाओं को इस जकड़न को त्योहारों के मद्देनजर समझना होगा कि मिल रही रियायतें रिहाई नहीं हैं, एक नए किस्म की जकड़न हैं. जिन की तुलना उस आलीशान मौल से की जा सकती है जिस में चमकदमक है और डिस्काउंट भी लेकिन घाटा उठाने को दुकानदार तैयार नहीं. यह लुभाने का नया तरीका है जिस से प्रोडक्ट इस तरह बेचा जाए कि खरीदार को लगे कि उस का फायदा हुआ है.

त्योहार अगर सामाजिक भाईचारे व उल्लास के प्रतीक होते तो उन में पूजापाठ व्रत, उपवास और दर्जनों बंदिशों की जरूरत नहीं पड़ती. अगर त्योहार आज भी कुछ छूट के साथ ही सही, धर्म के मुताबिक मनाया जा रहा है तो यह एक साजिश है जिस में युवाओं की मरजी की कोई अहमियत नहीं रह जाती.

युवा कब तक इस धार्मिक जकड़न से नजात पाएंगे इस सवाल का जवाब कभी नहीं मिला. हां, व्यक्तिगत स्तर पर हिम्मत करते वे खुद को मुक्त कर पाए तो जरूर दूसरे भी उन के पीछे चलेंगे और त्योहारों का सही लुत्फ उठा पाएंगे. किसी शाश्वत और अनिमेष का गणेश विसर्जन पर शराब पीना कोई चुनौती, बुद्धिमानी या बगावत की बात नहीं थी क्योंकि वे दूसरे तरह से अपनी सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं और इस से धर्म को एतराज नहीं, तो यह जकड़न का नया संस्करण नहीं तो और क्या है?

नशे की आजादी, युवाओं की बरबादी

शराब पीना एक बीमारी है. शराब पीने के लिए लोग आप को उकसाएंगे चाहे वे आप के दोस्त ही क्यों न हों. केरल का रहने वाला जैकब ऐसा ही एक व्यक्ति है. उस ने 9 वर्ष की छोटी सी उम्र से ही शराब पीनी शुरू कर दी थी. उस के पिता भी शराबी थे. पिताजी के पीने के बाद जब गिलास में कुछ शराब बच जाती थी, तो उसे वह गटक लेता था. इसी वजह से वह भी शराबी बन गया.

जब वह स्कूल में पढ़ता था तब सस्ती शराब पीया करता था. उस ने अपना बचपन शराब के नशे में ही बिताया और कालेज की पढ़ाई भी छोड़ दी. शराब की बुरी लत के कारण उसे अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा. 2 बार उस ने अपने हाथ की नसें काट कर आत्महत्या करने की भी कोशिश की, लेकिन बच गया. शराबी होने के कारण उस के सगेसंबंधी, रिश्तेनाते सब छूट गए. उस ने समाज व परिवार में अपना सम्मान खो दिया. यह कहानी उस राज्य केरल की है जहां साक्षरता सब से ज्यादा है. सोचिए, अन्य राज्यों का क्या हाल होगा.

शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जो हमें अच्छा इंसान बनाता है. यह बात उस लड़की पर सटीक बैठती है जो अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए गांव में ही शराब की बोतलों में पैट्रोल बेचती है. उसे यह परवा नहीं कि लोग क्या कहेंगे. उसे तो बस, अधिकारी बनने की चाह है. इसलिए वह ऐसा करने को मजबूर है. फिरोजाबाद की एक लड़की ठेले पर बैठ कर बड़ी तल्लीनता से किताब पढ़ती रहती है. उस के पास रखी शराब जैसी दिखने वाली भरी बोतल ने लोगों को अचंभे में डाल रखा है.

काफी पूछने पर उस ने बताया कि उसे पढ़ने के लिए इस का सहारा लेना पड़ता है. राहगीरों को बीच रास्ते में पैट्रोल खत्म होने पर कोसों दूर मोटरसाइकिल नहीं घसीटनी पड़ती. पढ़ाई के प्रति ऐसी लगन बहुत कम छात्रों में देखने को मिलती है.

society

नशाखोरी में मस्त युवा

हमें अपनी युवाशक्ति पर गर्व है, लेकिन सचाई तो कुछ और ही है. इस समय भारत दुनिया में नशाखोरी के मामले में दूसरे स्थान पर है. यहां 10 करोड़ 80 लाख युवा धूम्रपान की गिरफ्त में हैं. देश में प्रतिवर्ष धूम्रपान की वजह से 10 लाख लोगों की मौत हो रही है. यह आंकड़ा देश में होने वाली कुल मौतों का 10 प्रतिशत है.

देश में पिछले डेढ़ दशक में सिगरेट पीने वालों की तादाद काफी बढ़ी है. सिगरेट पीने के मामले में आज भारत पूरी दुनिया में दूसरे स्थान पर है. वह सिर्फ चीन से पीछे है, जिस रफ्तार से भारतीय युवाओं में सिगरेट पीने का चलन बढ़ रहा है, अगर यही गति बनी रही तो जल्द ही वह चीन को भी पीछे छोड़ देगा.

तबाह होती सभ्यताएं

नशा हमेशा ही विनाशकारी रहा है. नशे के चक्कर में सभ्यता और संस्कृतियां तबाह हो गईं. एक जमाने में चीन भी अफीमचियों का देश कहा जाने लगा था. उस से उबरने में उसे दशकों लगे. आज भी कई देश हैं जो अपने शत्रु देशों से निबटने के लिए वहां के नागरिकों में नशे की लत डालने की कोशिश करते रहते हैं. हमारी सरकार भी नशाखोरी में हमसाज रहती है. राज्यों के आबकारी विभाग एक तरफ नशे को बढ़ावा देने में लगे रहते हैं तो दूसरी तरफ मद्यनिषेध विभाग इसे रोकने में. यह कैसा अंतर्विरोध और विरोधाभास है?

नशा कोई भी हो, वह एक मीठा जहर है. नशे को ले कर हमारी सरकारें दोहरा मापदंड अपनाती हैं. एक तरफ तो नशीली वस्तुओं का जोरशोर से उत्पादन और बिक्री हो रही है, वहीं दूसरी तरफ उस का सेवन न करने के खर्चीले अभियान चलाए जा रहे हैं.

लाखोंकरोड़ों रुपए इन विज्ञापनों में फूंके जा रहे हैं. पंजाब राज्य आज नशाखोरी की वजह से ही चर्चा का विषय बना हुआ है. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार, पिछले 10 साल में जहरीली शराब पीने से वहां 11,032 लोगों की मौत हो चुकी है, फिर भी सरकार आंखें बंद किए रहती है.

अभिव्यक्ति की आजादी पर हावी

फिल्मों में शराब पीते हीरो दिखाए जाते हैं. इस का बुरा असर युवाओं पर पड़ रहा है. वे भी फिल्मी स्टाइल में आप को शराब पीते दिख जाएंगे. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया है कि फिल्मों में नायकनायिकाओं द्वारा शराब पीते दिखाने से दर्शकों की मानसिकता पर इस का असर पड़ता है. लिहाजा, इसे प्रतिबंधित किया जाए.

नशे की वस्तुओं के पैकेटों पर दी जाने वाली स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी, गले और मुंह के कैंसर के खौफनाक चित्र और तमाम तरह के विज्ञापन किसी भी नशे को कम करने के लिए रत्तीभर भी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं. ऐसी कोशिशें हास्यास्पद हो कर रह गई हैं.

सरकार की सुस्ती

पूरे पंजाब को नशे ने अपनी गिरफ्त में लिया है, वहां हर तरफ नशा पसरा हुआ है. मादक द्रव्यों ने युवाओं को जकड़ रखा है. अफीम, मौरफीन और हेरोइन जैसे नशीले पदार्थों ने वहां अपना जाल बिछाया हुआ है. पंजाब में सब से ज्यादा हेरोइन का इस्तेमाल होता है. पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान से आने वाली हेरोइन की खेप आसानी से यहां पहुंचती है.

नशे की भूख पर वहां तस्करों की पैनी नजर रहती है. वे पहले पंजाब में ही अपना बाजार तलाशते हैं. हेरोइन की तस्करी में लगे लोगों को पंजाब एक बड़ा बाजार मिल गया है. इस का नशा तो जल्दी लोगों को आदी बनाता है. शरीर के हर हिस्से पर इस का कुप्रभाव पड़ता है. पंजाब जैसे खुशहाल प्रदेश के लिए इस से बड़ा अभिशाप क्या होगा कि वहां के युवा हेरोइन जैसे खतरनाक नशे की चपेट में हैं.

अब प्रश्न यह है कि क्या सचमुच सरकार चाहती है कि लोग सिगरेटशराब का सेवन न करें? अगर हां, तो फिर वह इन चीजों के उत्पादन पर रोक क्यों नहीं लगा रही है? जनहित में जारी तमाम विज्ञापन आज ढोंग बन कर क्यों रह गए हैं? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकसर अपने भाषणों में युवाओं के भविष्य का जिक्र करते हैं. क्या नशाखोरी से उन का भविष्य उज्ज्वल होगा?

रेस 3 : सलमान के बाद जैकलीन का फर्स्ट लुक हुआ लौन्च

सलमान खान की फिल्म ‘रेस 3’ से सोमवार को उनका फर्स्ट लुक सामने आया था. वहीं अब इसके बाद फिल्म से जैकलीन फर्नांडीस का फर्स्ट लुक भी जारी कर दिया गया है. जैकलीन फिल्म के पोस्टर में काफी बोल्ड नजर आ रही हैं. जैकलीन ने अपने फर्स्ट लुक पोस्टर में हाथ में गन पकड़ी हुई है. ब्लैक कलर के वी शेप टौप में जैकलीन काफी स्मार्ट नजर आ रही हैं. जैकलीन ने पोस्टर में हाफ क्लच बालों के साथ हेयरस्टाइल बनाया हुआ है.

फिल्म के एक्टर सलमान खान ने जैकलीन के फर्स्ट लुक की तस्वीर ट्विटर पर जारी की है. सलमान ने साथ ही फिल्म में जैकलीन के कैरेक्टर का नाम क्या है ये भी बताया है. सलमान ने इस पोस्ट के साथ कैप्शन में लिखा है, ‘जैसिका: रौ पावर’, जैकलीन ने भी इस पोस्टर को अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया है. साथ ही कैप्शन देते हुए जैकलीन ने लिखा है, “और पावर बहुत डेंजरस हो सकती है #Race3 इस ईद”.

इससे पहले ‘रेस 3’ से सलमान खान का फर्स्ट लुक भी जारी किया गया था. फिल्म के पोस्टर में सलमान बहुत हैंडसम लग रहे हैं. सलमान ने भी पोस्टर में अपने हाथ में गन पकड़ी हुई है और साइड प्रोफाइल देते हुए सलमान लुक दे रहे हैं. सलमान ने इससे पहले अपनी इस फिल्म का टीजर भी अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया था.

दर्शकों को सलमान और जैकलीन का फर्स्ट लुक काफी पसंद आ रहा है. जहां सलमान के फर्स्ट लुक पोस्टर में उनके फैंस ने कई सारे कमेंट्स करे और फिल्म के लिए एक्साइटमेंट दिखाई. वहीं जैकलीन के लुक को भी फैंस द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है.

जैकलीन का एक इंस्टाग्राम यूजर और फैन लिखता है, ‘फिल्म हिट है’. दूसरे यूजर ने लिखा ‘रेस 3’ के लिए बहुत एक्साइटेड हूं. तो दूसरे फैन ने भी लिखा, ‘फिल्म का बेसब्री से इंतजार , वेट नहीं कर सकता’ सलमान की फिल्म ‘रेस 3’ का उनके फैंस को बेसब्री से इंतजार है. यह फिल्म इस साल ईद के मौके पर रिलीज होनी है. फिल्म में सलमान खान-जैकलीन फर्नांडीस के अलावा बौबी देओल, डेजी शाह और अनिल कपूर भी हैं.

ब्रेक लेने की वजह से मेरा करियर डूबा : चित्रांगदा सिंह

बौलीवुड अभिनेत्री चित्रांगदा सिंह ने बेहद कम लेकिन दमदार फिल्मों में काम कर इंडस्‍ट्री में अपनी एक अलग जगह बनाई है. साल 2015 अक्षय कुमार की आई फिल्म गब्बर इज बेक का गाना कुंडी ना खड़काओ राजा सीधा अंदर आओ…तो आप सभी ने सुना होगा और देखा भी होगा. इस गानें में बौलीवुड की हौट अभिनेत्री चित्रांगदा सिंह ठुमके लगाते नजर आई थी और लोगों ने इस गाने को काफी पसंद भी किया था. लेकिन इस फिल्म में आइटम सांग करने के बाद चित्रांगदा काफी लम्बे समय तक ना ही किसी फिल्म में नजर आईं और ना ही किसी कार्यक्रम में. लेकिन अभी हाल ही में वे मीडिया से रूबरू हुई और अपने करियर से जुड़ी कुछ खास बाते भी सांझा की.

bollywood

फिल्म ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाली अदाकारा चित्रांगदा ने अपने करियर में ज्‍यादा आगे न बढ़ पाने को लेकर कहा, ‘मुझे लगता है कि ब्रेक लेने की वजह से मेरे करियर को नुकसान हुआ है और मेरा करियर डूब गया. मैंने जब शुरुआत की थी तो मेरे जीवन में ऐसे मोड़ आए जहां मेरी प्राथमिकताएं बदल गईं. मैंने फिल्मों में आगाज किया और फिर चार साल का ब्रेक लिया. मैं फिर वापस आई और फिर मैंने दो साल का ब्रेक लिया.’

bollywood

चित्रांगदा के मुताबिक, ‘काम मिलने के लिए सिर्फ प्रतिभाशाली होना ही काफी नहीं है बल्कि सही समय पर मौजूद होना भी जरूरी है. चित्रांगदा ने कहा, ‘फिल्म उद्योग में जब आपको मौके मिल रहे हों और उस समय आप वहां मौजूद नहीं हों तो निश्चित रूप से आपके करियर पर असर पड़ेगा. मेरे साथ भी यही हुआ. ज्यादातर फिल्ममेकर्स मेरे पास ऐसे रोल्‍स लेकर आए जो महिला प्रधान थे या फिर मजबूत बौद्धिक क्षमता वाले किरदार थे. ऐसा लग रहा था जैसे मैं आम हिंदी फिल्मों की हिरोइन वाले रोल निभाना ही नहीं चाहती. शायद मैंने फिल्मी दुनिया का चमकता सितारा बनने के लिए भरपूर कोशिश नहीं की.’

bollywood

चित्रांगदा ने कहा, ‘मैं एक अभिनेत्री हूं, मैं हर किरदार निभा सकती हूं. मैं उतनी ही सामान्य और हंसमुख हूं, जितना एक आम लड़की होती है.’ उन्होंने कहा कि उन्हें डांस करना पसंद है, जो पर्दे पर गढ़ी उनकी छवि से एकदम अलग है. चित्रांगदा ने कहा कि उन्होंने तीन साल तक कत्थक सीखा है और उन्हें फिल्म में मात्र एक आइटम गीत पर डांस करने का मौका मिला. फिर उन्हें ऐसा कोई मौका नहीं मिला. उन्होंने चीजें बदलने की उम्मीद जताई है.

साल 2003 में फिल्मी सफर का आगाज करने वाली चित्रांगदा ने ‘सौरी भाई’, ‘देसी ब्वायज’, ‘ये साली जिंदगी’ और ‘गब्बर इज बैक’ में भी काम किया है. चित्रांगदा की आने वाली फिल्मों में ‘बाजार’ और ‘साहेब, बीवी और गैंगस्टर-3’ शामिल हैं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें