फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ को लेकर उत्साहित है पूरी टीम

‘देव डी’ और ‘गैंग आफ वासेपुर’ सहित कई सफल फिल्मों के सर्जक अनुराग कश्यप काफी खुश और उत्साहित हैं. काफी लंबे समय बाद उन्हें खुश होने का यह अवसर मिला है आनंद एल राय की कंपनी ‘‘कलर येलो प्रोडक्शंस’’ के साथ जुड़ने की वजह से. इससे पहले अनुराग कश्यप निर्देशित कई फिल्में बाक्स आफिस पर लगातार असफल होती रही और लोग मानने लगे थे कि अनुराग कश्यप चुक गए हैं.

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मगर जब आनंद एल राय के साथ मिलकर अनुराग कश्यप ने फिल्म‘‘मुक्काबाज’’ का निर्माण व निर्देशन किया, तो इस फिल्म की सफलता ने उनके अंदर एक नई उर्जा का संचार किया. अब वह‘कलर येलो प्रोडक्शंस’ की ही प्रेम कहानी प्रधान फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ निर्देशित कर रहे हैं.

7 सितंबर 2018 को प्रदर्शित करने के हिसाब से बनायी जा रही फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ की कहानी अमृतसर की है. इस संजीदा प्रेम कहानी मे अभिषेक बच्चन, तापसी पन्नू और विक्की कौशल की मुख्य भूमिकाएं हैं. इस फिल्म में अभिषेक बच्चन पगड़ी पहने सरदार की भूमिका में हैं. ‘दिल वही चाहता है, जो वह चाहता है’इस टैग लाइन वाली इस प्रेम कहानी में कई जटिल इमोशंस भी नजर आएंगे.

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‘‘कलर येलो प्रोडक्शंस’’की सीईओ कनुप्रिया कहती हैं- ‘‘अनुराग कश्यप  के साथ हाथ मिलाकर हम काफी रोमांचित हैं. वह संजीदा प्रेम कहानियां पेश करने में माहिर हैं. हमें पता है कि इतने वर्षों में दर्शकों की रूचि भी काफी बदली है. ‘कलर येलो प्रोडक्शंस’और ‘ईरोज’को यकीन है कि हमारी फिल्म ‘मनमर्जियां’ उस दिशा में एक बड़ा कदम है.’’

ईरोज इंटरनेशनल और आनंद एल राय प्रस्तुत फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’का निर्माण ‘फैंटम फिल्मस’के साथ मिलकर ‘कलर येलो प्रोडक्शंस’कर रहा है. फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप, लेखक कनिका ढिल्लों तथा कलाकार हैं- अभिषेक बच्चन, तापसी पन्नू और विक्की कौशल.

लालू प्रसाद यादव की जेल गार्डनिंग

बिहार के महाचर्चित चारा घोटाले का समापन राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को साढे़ 3 साल की सजा के साथ हुआ जिन्हें हजारीबाग जेल में मालीगिरी का काम सौंपा गया है. अब लालू साढ़े 3 साल जेल की बगिया संजोते क्यारियां बनाएंगे, सागसब्जी और फलफूल लगाएंगे और फिर निराईगुड़ाई भी करेंगे जिस से फसल में खरपतवार न उगे. इन्हीं खरपतवारों में से एक घास भी होती है जिसे चारे के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

भा जाए तो जेल गार्डनिंग भी किचन गार्डनिंग की तरह रुचिकर काम है जिस में माली अपने रोपे पौधों को रोज बढ़ते देख खुश होता है. फिर लालू को तो इस बाबत 93 रुपए रोज की दिहाड़ी भी मिलेगी. इस मेहनताने का वे एक अलग सुख भोगेंगे. बस, वे यह ध्यान रखें कि अब कैसे भी हो, चारा न उग पाए और हाईकोर्ट उन्हें रहम खा कर जमानत दे दे.

महंगा है कैंसर का इलाज

रवि प्रकाश के 7 साल के बच्चे को ब्लड कैंसर था. उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले का रहने वाला रवि प्रकाश पेश से किसान था. गांव में उस की 4 बीघा खेती की जमीन थी. बलरामपुर जिला अस्पताल से वह लखनऊ मैडिकल कालेज बच्चे के इलाज के लिए आ गया. यहां आ कर उसे पता चला कि वह बीपीएल कार्डधारक नहीं है यानी सरकार उसे गरीबीरेखा से नीचे का नहीं मानती, इसलिए उस के बच्चे का ‘कैंसर कार्ड’  नहीं बन सकता. ऐसे में कैंसर के इलाज में सरकार द्वारा मिलने वाली सहायता उस को नहीं मिल सकेगी.

अब रवि प्रकाश के सामने 2 तरह की परेशानियां थीं. एक तो, उसे बच्चे का इलाज कराना था. दूसरे, इलाज के लिए पैसों का इंतजाम करना था. रवि प्रकाश के परिवार में 2 बच्चे और पत्नी थी. दोनों ही बच्चे बड़े थे, स्कूल जाते थे. दोनों के स्कूल का खर्च भी कंधों पर था. पत्नी घर पर रहती थी. सब से छोटे बेटे प्रमोद के इलाज को ले कर पूरा परिवार अस्तव्यस्त हो गया था. रवि प्रकाश अपनी पत्नी के साथ लखनऊ मैडिकल कालेज आ गया था. उस के दोनों बच्चे रिश्तेदारों के भरोसे गांव में थे.

कैंसर का इलाज लंबा चलता है. ऐसे में समय और पैसा दोनों देना पड़ता है. रवि प्रकाश की सब से पहले किसानी प्रभावित हुई. वह समय पर फसल नहीं बो पाया. इस के बाद पैसों की जरूरत को ले कर उस ने अपने खेत गिरवी रख दिए. खेत को गिरवी रखने से मिले पैसों से बेटे का इलाज होने लगा. कुछ दिनों वह मैडिकल कालेज में रहता, फिर उसे गांव जाना पड़ता. जब डाक्टर बुलाता, उसे वापस आना पड़ता. 5 वर्षों के इलाज में रवि प्रकाश पूरी तरह से टूट गया था. अब उसे लगने लगा कि यह बच्चा तो बचेगा ही नहीं, उस के बचाने के चक्कर में जमीन गिरवी चली गई, सो अलग. अब परिवार कैसे चलेगा. अब वह रात में लखनऊ में ही रिकशा चलाने लगा. बच्चे के इलाज में गांव का किसान शहर में मजदूर बन गया. इस के बाद भी बच्चा सही नहीं हो सका.

रवि प्रकाश अकेला नहीं है. कैंसर का महंगा इलाज हर वर्ग के लोगों को तोड़ देता है. इस का कोई अनुमानित खर्च नहीं है. रोग की जांच से ले कर इलाज तक अलगअलग अस्पतालों की अलगअलग फीस है. कीमोथेरैपी, दवाओं का खर्च, दवाओं के शरीर पर होने वाले प्रभाव को दूर करने का इलाज सब की अलगअलग कीमतें होती हैं.

लखनऊ के ही पीजीआई में दिल्ली की एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले नीरज अपना इलाज कराने आए. नीरज मार्केटिंग विभाग में थे. अच्छी सैलरी पाते थे. नीरज के लिवर में कैंसर था. 35 साल की उम्र में नीरज को कैंसर की खबर ने तोड़ दिया. उस की 10 साल पुरानी नौकरी थी. नीरज ने शुरुआत में दिल्ली में अपना इलाज शुरू कराया. वहां उसे इलाज के लिए छुट्टी लेनी पड़ती थी. शुरुआत में उस की कंपनी से कुछ छुट्टियां मिल गईं. इलाज लंबा चलता देख कंपनी ने छुट्टी देने से मना कर दिया. नीरज को उस की कंपनी ने नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया. नौकरी में बचाया पैसा खत्म हो चुका था. पीजीआई में उसे बताया गया कि कम से कम 4 लाख रुपए का खर्च आएगा.

नीरज ने अपने हिस्से का पैतृक आवास बेच दिया. उस से मिले पैसों से अपना इलाज शुरू कराया. अब उस का परिवार किराए के कमरे में रहता था. वहां ही रह कर वह अपना इलाज करा रहा था. 3 वर्षों के प्रयासों के बाद भी नीरज का इलाज पूरा नहीं हो सका. ऐसे में वह जिंदगी की जंग हार गया. नीरज के पीछे उस का 10 साल का बेटा और पत्नी बेसहारा हो गए. पत्नी ने लखनऊ में एक दुकान पर सेल्स का काम करना शुरू किया. आज वह  अपनी और बेटे की परवरिश को ले कर परेशान है. वह कहती है, ‘‘नीरज ने जो भी कमाया और बचाया था, वह सब उस की बीमारी में खर्च हो गया. कैंसर की बीमारी से हम भिखारी हो गए. नीरज को बचा पाए होते तो शायद अफसोस न होता.’’

कैंसर के इलाज में टूटते परिवार

कैंसर के इलाज में टूटते परिवारों की दर्दनाक कहानी का अंत नहीं है. अस्पतालों में ऐसे परिवारों से मिलने के बाद समझ आता है कि कैंसर सिर्फ मरीज के लिए जानलेवा ही नहीं होता, यह पूरे परिवार की खुशियों को छीन भी लेता है है. मरीज के जाने के बाद परिवार सड़क पर बदहाल होता है. उसे समझ नहीं आता के वह अपनी जिंदगी कहां से शुरू करे. लखनऊ के मैडिकल कालेज में कैंसर पीडि़त परिवारों को सही से खाना तक नहीं मिल पाता.

लखनऊ के मैडिकल कालेज में ‘प्रसादम सेवा’ चलाने वाले विशाल सिंह कहते हैं, ‘‘हमारी संस्था कैंसर पीडि़त परिवार वालों के तीमारदारों यानी घर के लोगों को दिन का खाना खिलाने का काम करती है. हमारे पास आए परिवारों को देख कर पता चलता है कि कैंसर की मार केवल बीमार पर नहीं पड़ती, बल्कि पूरा परिवार भुक्तभोगी होता है. हम समाज के सहयोग से रोज 250 लोगों को खाना खिलाने का काम करते हैं. यहां लोग उत्तर प्रदेश, नेपाल, बिहार और बंगाल तक से आते हैं.’’

कैंसर की बीमारी बच्चों से ले कर बड़ों तक किसी को भी हो सकती है. इस के इलाज में नियमित जांच और दवाएं जरूरी होती हैं. इस के साथ ही साथ, मरीज को तनाव से मुक्त रहना, अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना भी होता है. कैंसर के प्रकार और बीमारी की स्टेज के अनुसार खर्च बढ़ता रहता है. खर्च का अनुमान लगाना संभव नहीं होता है.

सरकार इस के इलाज में सहायता देती है पर यह कुछ मरीजों तक ही सीमित रह जाती है. कैंसर के खिलाफ लड़ाई जीतने में अच्छे इलाज और आत्मविश्वास का बहुत महत्त्व होता है. कैंसर के इलाज में इतना खर्च हो जाता है कि गरीब परिवार तो छोड़ दीजिए, सामान्य परिवार तक टूट जाते हैं.

भारत में लगभग 25 लाख लोग कैंसर से ग्रस्त हैं और हर साल 7 लाख से अधिक नए मामले रजिस्टर होते हैं. सभी प्रकार के कैंसरों में, पुरुषों में मुंह व फेफड़ों का कैंसर और महिलाओं में सर्विक्स व स्तन कैंसर देश में होने वाली सभी संबंधित मौतों में लगभग 50 प्रतिशत के लिए दोषी हैं.

इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डा. के के अग्रवाल ने कहा, ‘‘हमारे देश में कैंसर का फैलाव एकसमान नहीं है. ग्रामीण और शहरी सैटिंग के आधार पर लोगों को प्रभावित करने वाले कैंसर के प्रकार में अंतर है. हम ने देखा है कि ग्रामीण महिलाओं में सर्विक्स कैंसर सब से अधिक व्यापक है, जबकि शहरी महिलाओं में स्तन कैंसर बड़े पैमाने पर है. पुरुषों के मामले में, ग्रामीण लोगों को मुंह का कैंसर प्रमुख रूप से होता है, जबकि शहरी पुरुष फेफड़ों के कैंसर से अधिक प्रभावित होते हैं. कैंसर एक महामारी की तरह बनता जा रहा है.

‘‘विडंबना यह है कि कैंसर की दवाएं बहुत महंगी हैं और आम आदमी की पहुंच से परे हैं. इस प्रकार, कैंसर की दवाइयां किफायती दामों  पर उपलब्ध कराने के लिए मूल्य नियंत्रण बहुत आवश्यक है. कैंसर के शुरुआती निदान को सुनिश्चित करने के लिए सरकार को भी पर्याप्त कदम उठाने चाहिए क्योंकि यह एक सिद्ध तथ्य है कि शीघ्र निदान से कई जानें बचाई जा सकती हैं.’’

कैंसर की प्रमुख जांच

कैंसर की प्रमुख जांच में मैमोग्राफी और पैप स्मियर शामिल होती हैं. मैमोग्राफी में स्तन के तंतु की एक्सरे के जरिए जांच की जाती है. पैप स्मियर जांच को पैपेनिकोला भी कहते हैं. गर्भाशय या सेरविक्स टिशू ले कर इस जांच को किया जाता है. इस के अलावा कैंसर की जांच के लिए शरीर के प्रभावित हिस्से का एक्सरे किया जाता है.

कैंसर का रोग जिस स्थान पर हुआ वह इस बात का मुख्य कारक होता है कि इलाज कैसे होगा? इस के साथ ही साथ मरीज की हालत कैसी है, यह भी महत्त्वपूर्ण होता है. इस के इलाज में रेडियम किरणों का प्रयोग किया जाता है. ये किरणें शरीर के कैंसर कोष को खत्म करने का काम करती हैं.

कैंसर के इलाज में रेडियम का प्रयोग काफी सावधानी से किया जाता है. कैंसर की शुरुआती अवस्था में सर्जरी सब से प्रभावशाली होती है. तब तक कैंसर शरीर में फैला नहीं होता है.

कीमोथेरैपी में कैंसर का इलाज दवाओं द्वारा किया जाता है. कैंसर के इलाज में 50 से अधिक प्रभावशाली दवाओं का प्रयोग किया जाता है. बहुत सारे इलाजों के आने के बाद, कैंसर सौ फीसदी ठीक हो जाएगा, यह नहीं कहा जाता है.

कैंसर से ठीक होने के बाद भी लोग सामान्य जीवन बिताने में लंबा समय ले लेते हैं. महंगा होने के बाद भी कैंसर का इलाज पूरी तरह से ठीक होने वाला नहीं है. यही वजह है कि मरीज तो हाथ से जाता ही है, परिवार भी इलाज के बोझ से कर्जदार हो जाता है, सो अलग.

टीवी व स्मार्टफोन नहीं पेरैंट्स हैं जिम्मेदार

साल के आखिरी महीने यानी दिसंबर 2017 में दिल्ली से सटे गौतमबुद्धनगर के ग्रेटर नोएडा में गौड़ सिटी सोसायटी में 15 वर्षीय किशोर बेटे ने अपनी मां और बहन की सिर्फ इस बात पर हत्या कर दी कि उसे पढ़ाई पर मां की डांट और छोटी बहन को मिल रहे ज्यादा प्यार पर बहुत गुस्सा आता था. जरा सोचिए, क्या एक 15 साल का मासूम मन इतना हिंसक हो सकता है कि अपने ही घर में यह खूनी खेल खेले. सच तो यही है, यही हुआ है. लेकिन सवाल है, क्यों?

पेन स्टेट शेनंगो में मानव विकास और परिवार पर किए गए अध्ययन के सहयोगी प्रोफैसर विलियम मैकग्यूगन के मुताबिक, जो मातापिता अपने बच्चों को नजरअंदाज करते हैं वे बच्चे हिंसक प्रवृत्ति के होते हैं. और यह बात दुनिया के हर देश, हर परिवार व समाज पर लागू होती है. आज परिवार और पेरैंट्स के सामने भी यही समस्या सब से बड़ी बन कर उभरी है कि उन के बच्चे हिंसक होते जा रहे हैं. गौड़ सिटी वाले मामले में भी जाहिर है बच्चे को लगता था कि उस की मां उसे नजरअंदाज करती थी. इस का मतलब उपरोक्त अध्ययन बिलकुल सही इशारा कर रहा है कि अगर बच्चे पेरैंट्स द्वारा नजरअंदाज किए जाएंगे तो इस के परिणाम हिंसक होंगे.

पेरैंट्स की गलती

अभिभावक और बाल मनोवैज्ञानिक तकनीक, स्मार्टफोन और इंटरनैट के सिर सारा दोष यह कह कर मढ़ देते हैं कि जब से ये गैजेट और इंटरनैट बच्चों के हाथ आया है, तभी से बच्चे हिंसक व गुस्सैल होते जा रहे हैं. हो सकता है किसी हद तक यह बात सच हो लेकिन फिर भी यह अधूरा सच होगा क्योंकि जब बच्चे का जन्म होता है और वह धीरेधीरे बढ़ता है तब तक उसे तकनीक और इंटरनैट की दुनिया से कोई वास्ता नहीं होता. लेकिन जब वह खिलौने, चित्र और आवाजें पहचानने लगता है तो अभिभावक उस के साथ समय बिताने के बजाय उसे टीवी के कार्टून्स, इंटरनैट के वीडियो और स्मार्टफोन के संसार से परिचित करा देते हैं. हां, सिर्फ परिचय के लिए ही नहीं कराते, बल्कि दैनिक स्तर पर उन्हें उस की लत लगा देते हैं ताकि उन्हें अपने कामों की फुरसत मिल सके.

जब यह लत बच्चे के मन को घेर रही हो

ती है, उस समय पेरैंट्स यह सोच कर खुश हो रहे होते हैं कि उन का बच्चा मोबाइल में बिजी हैं और उन्हें अपने लिए या औफिस के काम के लिए समय मिल रहा है. हालांकि, जब वे बच्चे के साथ थोड़ा सा समय साथ बिताने के लिए उस से गैजेट छीनना चाहते हैं तब वह रोनेचिल्लाने लगता है. और अब वह उन के बिना खेलने से भी इनकार कर देता है. तब जा कर पेरैंट्स को इस बात का एहसास होता है कि उन्होंने बच्चे को समय न दे कर बड़ी भूल की है.

आत्महत्या और यौनशोषण

जब बच्चों को चिकित्सक या काउंसलर की जरूरत पड़ने लगे तो समझ जाइए कि हालत इस से भी बदतर हो सकती है. मोबाइल गेम्स एडिक्शन उसे हिंसक कृत्यों, आत्महत्या या यौनशोषण का शिकार भी बना सकती है.

अमेरिका में हुई सैंटर्स फौर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रिवैंशन की रिसर्च बताती है कि किशोर उम्र के बच्चों में आत्महत्या की दर 2 दशकों तक गिरने के बाद 2010 से 2015 के बीच बढ़ गई.

ये संकेत बताते हैं कि इंटरनैट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल इस की एक वजह हो सकती है. 17 साल की काइतलिन हर्टी अमेरिका के कोलोराडो हाईस्कूल की सीनियर छात्र है, उस के मुताबिक, ‘‘कई घंटों तक इंस्टाग्राम की फीड को देखने के बाद मुझे मेरे बारे में बहुत बुरा महसूस हुआ, मैं खुद को अलगथलग महसूस कर रही थी.’’ जाहिर है यह अकेलापन ही कई बार अवसाद या आत्महत्या की मनोदशा की ओर ढकेल देता है.

क्लिनिकल साइकोलौजिकल साइंस जर्नल में छपी रिसर्च के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 36 फीसदी किशोरों ने अत्यंत निराशा व दुख की अवस्था का सामना करने के साथ ही आत्महत्या पर विचार करने की बात भी मानी. रिसर्च यह साफ करती है कि जो लोग सोशल मीडिया का कम इस्तेमाल करते हैं उन के मुकाबले इन लड़कियों के तनाव में रहने की प्रवृत्ति 14 प्रतिशत ज्यादा दिखाई दी.

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रिसर्च की लेखिका ज्यां ट्वेंगे सैन डिएगो की यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफैसर हैं. उन का कहना है, ‘‘हमें यह सोचना बंद करना होगा कि मोबाइल फोन नुकसानदेह नहीं है. यह कहने की आदत बनती जा रही है कि अरे, ये तो सिर्फ अपने दोस्तों से संपर्क रख रहे हैं. बच्चों के स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर नजर रखना जरूरी है और साथ ही, उसे उपयुक्तरूप से सीमित करना भी.’’

इंटरनैट के सहारे बढ़ता बालशोषण भी एक बड़ी समस्या है. एंटीवायरस मेकर्स कंपनी मैकऐफी की ओर से कराए गए सर्वेक्षण में कहा गया है कि इंटरनैट पर छोटे बच्चों के शिकारी खुलेआम घूम रहे हैं. वे लोग ऐसे बच्चों को बहलाफुसला कर उन से अपना मतलब साधते हैं. इंटरनैट पर दोस्ती बढ़ाने के बाद उन का यौनशोषण किया जाता है और कई मामलों में इसी के जरिए अपहरण भी कर लिया जाता है.

दरअसल, अब बच्चों के पास स्मार्टफोन से ले कर आईपैड तक हैं जिन से सोशल नैटवर्किंग साइटों पर लौगइन किया जा सकता है. बच्चे इन उपकरणों की सहायता से चौबीसों घंटे इंटरनैट से जुड़े रहते हैं. इन सब से बचने के लिए पेरैंट्स को बच्चे के साथ लगातार संवाद बरकरार रखना जरूरी है. वरना, वे वर्चुअल दुनिया में खो कर आत्महत्या या यौनशोषण की ऐसी अंधेरी गली में खो जाएंगे जहां से वापस आना उन के लिए आसान नहीं होगा.

पढ़ने की आदत डालें

इंटरनैट के आगे बेबस होने के बजाय अगर अभिभावक ठान लें तो बच्चों को इंटरनैट के संसार से बाहर कर उन्हें किताबी दुनिया में ला सकते हैं. इस के लिए उन में पढ़ने की आदत विकसित करनी होगी क्योंकि किताबें किसी भी बच्चे के मन को दूषित नहीं करती हैं, न ही भटकाती हैं.

जब पत्रिका और अखबार घर पर बच्चे पढ़ते हैं तो उन्हें सिर्फ सार्थक जानकारियां मिलती हैं और वे रचनात्मक बातें सीखते हैं लेकिन अब मोबाइल हाथ में होने से उन से किताबें व पत्रिकाएं छीन ली गई हैं. अगर अभिभावक चाहें तो उन्हें फिर से किताबों के रोचक संसार से जोड़ सकते हैं. इस से वे सकारात्मक और ज्ञानवर्धक बातें ही सीखेंगे और नुकसानदेह तकनीकी दखल उन की जिंदगी से दूर होगा.

टैक्नो नजर जरूरी

अगर बच्चे गैजेट की दुनिया से बाहर ही नहीं आना चाहते हैं और इंटरनैट के मोह में पूरी तरह फंस चुके हैं तो उन्हें इस से बचाने के लिए आप को टैक्नोसेवी होना पड़ेगा और कुछ सिक्योरिटी फिल्टर लगाने होंगे ताकि वे गलत दिशा में न भटकें. कई बार बच्चे पेरैंट्स को तकनीकी भाषा के जाल में फंसा कर यह समझा देते हैं कि वे स्मार्टफोन पर स्कूल का प्रोजैक्ट या पढ़ाई कर रहे हैं. इसलिए पेरैंट्स भी अपडेट रहें तकनीकी मोरचे पर बच्चों का मार्गदर्शन करने के लिए.

यह बात सच है कि कई बार जानकारियां जमा करने के लिए इंटरनैट की जरूरत पड़ जाती है और अब बच्चे लाइब्रेरी में जा कर इनसाइक्लोपीडिया या मोटीमोटी किताबों में जानकारी खोजने के बजाय एक क्लिक पर हासिल कर लेना ज्यादा समझदारी का काम समझते हैं.

सब से सही तो यह रहेगा कि जब वे गैजेट का इस्तेमाल करें, आप उन के साथ ही बैठें. छोटी आयु के बच्चों को मातापिता या अन्य किसी बड़े पारिवारिक सदस्य के साथ बैठा कर ही सर्फिंग करानी चाहिए और उन को एक निश्चित समय तक ही इन का प्रयोग करने दें. इंटरनैट पर कई तरह के फिल्टरिंग और ब्लौकिंग सिस्टम भी हैं, जिन में सुविधा होती है कि आप ऐच्छिक साइट्स ही खोल सकें और अनचाही व अनुपयोगी वैबसाइट्स सर्फ ही न की जा सकें.

बेशक बच्चों की शैक्षिक यात्रा में आज कंप्यूटर, इंटरनैट और स्मार्टफोन जरूरी टूल्स बन चुके हैं लेकिन जानकारियों के अथाह सागर और मनोरंजन के सोर्स के रूप में इंटरनैट बच्चों के लिए कहीं घातक न हो जाए, इस के लिए तो पेरैंट्स को ही सजग रहना होगा.

हर चीज के अच्छे और बुरे दोनों पहलू होते हैं. अगर अच्छे पहलू को आप फौलो करते हैं, तो आप को उस का सही फायदा मिलता है और अगर बुरे पहलू को फौलो करते हैं, तो नुकसान और भटकाव के अलावा आप को कुछ नहीं मिलता.

आजकल के बच्चों में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की आदत को देखते हुए यह लाइन उन पर बिलकुल फिट बैठती है. अभिभावक होने के नाते अब बेहतरी इसी में है कि बच्चे को समय दें और उन के साथ कदम से कदम मिला कर तकनीकी चुनौतियों का सामना करें.

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वर्चुअल जगत का मनोवैज्ञानिक पहलू

मैंटल हैल्थ व बिहेवियर साइंस से जुड़े विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कच्ची उम्र के बच्चे, जो सही और गलत में फर्क नहीं कर पाते, इंटरनैट के जंगल में भटक जाते हैं. स्मार्टफोन में दिखने वाली असीमित सामग्री बच्चों के मन में उथलपुथल पैदा कर देती है. बच्चे व युवा इन जानकारियों का इस्तेमाल रचनात्मक कार्यों में न के बराबर कर पाते हैं और सारा दिन फेसबुक, ट्विटर, स्काइप व सब से गंभीर पोर्नोग्राफिक साइटों को ब्राउज करने में लगे रहते हैं.

कोई क्लास बंक करता है तो कोई औनलाइन गेम खेलने व इंटरनैट ब्राउज करने में समय बिताता है. और तो और, सड़क पर भी वह मोबाइल पर गेम खेलने में व्यस्त रहता है. कई बार तो बच्चे अपने पेरैंट्स के साथ मनोचिकित्सक या डाक्टर के पास जाते हैं तो पता चलता है कि वे तो पूरी तरह वर्चुअल दुनिया में खोए हैं.

पेरैंट्स को समझना चाहिए कि बच्चों को इंटरनैट की दुनिया में धकेलने की गलती उन्होंने की है. और अब चिकित्सक या काउंसलर की जरूरत पड़ी है तो इस के लिए वे ही जिम्मेदार हैं. बेहतर यही है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखें. सप्ताह में एक दिन सिर्फ छुट्टी के दिन ही मोबाइल उन के हाथ में दें. मोबाइल सिर्फ फोन या शब्दकोष की तरह इस्तेमाल हो. बच्चा इंटरनैट पर क्या ब्राउज करता है, उस पर भी नजर रखें. बच्चों को तकनीक का सही इस्तेमाल करना सिखाएं. उन्हें किताबें या कहानियों को पढ़ना सिखाएं.

इंटरनैट व स्मार्टफोन के जंगल

बच्चों के हिंसक प्रवृत्ति के होने का एक पहलू यह भी है कि आजकल के पेरैंट्स ही बच्चों को टीवी, हिंसक गेम्स, स्मार्टफोन की असीमित दुनिया व इंटरनैट के जंगल में भटकने के लिए छोड़ते हैं जिस के परिणाम आज हादसों की शक्ल में सामने आ रहे हैं. कभी वे ब्लू व्हेल्स जैसे हिंसक गेम्स की चपेट में आ कर आत्महत्या कर रहे हैं तो कहीं चैटिंग और पोर्न के जाल में फंस कर अपने मासूम मन के अलावा अपने भविष्य के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं.

इंटरनैट में लिप्त बच्चों का बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह स्मार्टफोन और इंटरनैट के जंगल में गुम हो रहा है. सूचना तकनीक से बच्चे और युवा इस कदर प्रभावित हैं कि एक पल भी वे स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गवारा नहीं समझते. इन पर हर समय एक तरह का नशा सा सवार रहता है. इसे ‘इंटरनैट एडिक्शन डिस्और्डर’ भी कहा जाता है.

सूनी होने से बची सोनी की गोद

4 जून, 2017 को आधी रात तक उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर ज्यादातर लोग सो गए थे. सिर्फ वही जाग रहे थे, जिन की गाड़ियां आने वाली थीं. स्टेशन के वेटिंग रूम में सोने वाले यात्रियों में सोनी और राम सिंह चौहान भी थे. ये मध्य प्रदेश के जिला सीधी के रहने वाले थे. इन्हें पंजाब के अमृतसर जाना था.

उन की गाड़ी सुबह की थी, इसलिए पतिपत्नी वेटिंग रूम में जा कर साथ लाया बिस्तर लगा कर अपने 5 महीने के बेटे कुलदीप उर्फ हर्ष के साथ सो गए थे. सुबह 3, साढ़े 3 बजे सोनी की आंखें खुली तो उस ने बगल में सो रहे बेटे को टटोला. बेटे को अपनी जगह न पा कर वह एकदम से हकबका कर उठी और इधरउधर देखने लगी. उसे लगा कि बेटा खिसक गया होगा. लेकिन बेटा कहीं दिखाई नहीं दिया. उस ने झकझोर कर बगल में सो रहे पति को जगाया, ‘‘हर्ष कहां है?’’

आंखें मलते हुए राम सिंह ने भी इधरउधर देखा. बेटा कहीं नहीं दिखाई दिया तो उसे समझते देर नहीं लगी कि उस के बेटे को कोई उठा ले गया है. जैसे ही उस ने यह बात सोनी से कही, वह रोनेचीखने लगी. फिर तो जरा सी देर में उन के पास भीड़ लग गई. लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे, जबकि सोनी का रोरो कर बुरा हाल था. राम सिंह भी सकते में था कि अब वह क्या करे, बेटे को कहां खोजे?

थोड़ी ही देर में मासूम बच्चे की चोरी की बात पूरे रेलवे स्टेशन में फैल गई, जिस से वेटिंग रूम में खासी भीड़ लग गई थी. बच्चे के मांबाप की हालत देख कर सभी दुखी थे. लोग उन पर तरस तो खा रहे थे, लेकिन कुछ करने की स्थिति में नहीं थे. बच्चा चोरी की सूचना स्टेशन पर स्थित थाना जीआरपी को मिली तो जीआरपी की टीम बच्चे की खोजबीन में लग गई. लेकिन काफी मेहनत के बाद कोई सफलता नहीं मिली.

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सुबह जीआरपी थानाप्रभारी मनोज सिंह ने चोरी गए बच्चे के पिता राम सिंह से तहरीर ले कर अज्ञात के खिलाफ बच्चे की चोरी का मुकदमा दर्ज कर बच्चा चोरी की जानकारी एसपी रेलवे इलाहाबाद दीपक भट्ट को दे दी. सूचना मिलते ही दीपक भट्ट स्टेशन पर पहुंचे और इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई.

सीसीटीवी फुटेज देखी गई तो उस में काले रंग की एक महिला सोनी और राम सिंह के बेटे कुलदीप उर्फ हर्ष को चुरा कर ले जाती साफ दिखाई दी. वह औरत बच्चे को ले कर सिविल लाइंस की ओर स्टेशन से बाहर निकली और पैदल ही अंधेरे में गायब हो गई थी. इस तरह पुलिस को बच्चा चुराने वाली औरत का फोटो मिल गया था.

इस के बाद दीपक भट्ट के आदेश पर थानाप्रभारी मनोज सिंह ने सीसीटीवी फुटेज से उस औरत का फोटो निकलवा कर पोस्टर छपवाए और पूरे शहर में सार्वजनिक स्थानों पर चस्पा करवा दिए. पोस्टर में पुलिस वालों के फोन नंबर के साथ बच्चे के बारे में सूचना देने वाले के लिए इनाम की भी घोषणा की गई थी.

इसी के साथ बच्चे की तलाश और उसे चुराने वाली औरत की गिरफ्तारी के लिए एक टीम गठित की गई, जिस में जीआरपी थानाप्रभारी मनोज सिंह, एसएसआई कैलाशपति सिंह, एसआई अंजनी सिंह, विनोद कुमार मौर्य, सर्विलांस प्रभारी सुबोध कुमार सिंह, एसआई मनोज कुमार और उदयशंकर कुशवाह को शामिल किया गया था.

पुलिस ने शहर के दारागंज रेलवे स्टेशन पर भी बच्चा चुराने वाली उस औरत के फोटो वाला पोस्टर चस्पा कराया था. स्टेशन पर ही चायपकौड़ा की दुकान लगाने वाले रामखेलावन (बदला हुआ नाम) ने वह पोस्टर देखा तो जीआरपी द्वारा पोस्टर में दिए गए फोन नंबर पर उस ने फोन किया. थानाप्रभारी मनोज सिंह ने फोन उठाया तो उस ने कहा, ‘‘साहब, आप लोगों को बच्चा चुराने वाली जिस महिला की तलाश है, वह बच्चे को ले कर मेरी दुकान पर आई थी.’’

‘‘तुम ऐसा करो, तुरंत इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर स्थित जीआरपी थाने आ जाओ.’’ मनोज सिंह ने कुछ पूछने के बजाय सीधे कहा, ‘‘तुम्हें थाने आने में कोई परेशानी तो नहीं होगी?’’

‘‘नहीं साहब, अगर मेरी वजह से किसी का बच्चा मिल जाता है तो मुझे बड़ी खुशी होगी.’’ रामखेलावन ने कहा.

थोड़ी देर में रामखेलावन जीआरपी थाना पहुंच गया. पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि बच्चा चुराने वाली महिला सुबह मुंह अंधेरे उस की दुकान पर आई थी. उस के पास पैसे नहीं थे. उस ने कुछ खाने को मांगा तो उस की हालत पर तरस खा कर उस ने उसे पकौड़ा भी खिलाया था और चाय भी पिलाई थी. उस समय उस की गोद में एक बच्चा था, जिसे वह साड़ी के पल्लू से ढके थी.

रामखेलावन की सहानुभूति पा कर उस ने उसे एक मोबाइल नंबर दे कर कहा था, ‘‘भइया, आप ने मुझ पर इतनी मेहरबानी की है तो एक मेहरबानी और कर दीजिए.’’

‘‘बताओ और क्या चाहिए?’’ रामखेलावन ने पूछा.

इस के बाद उस महिला ने एक पर्ची देते हुए कहा, ‘‘इस कागज पर लिखे नंबर पर फोन कर के मेरी बात करा दीजिए. यह नंबर मेरे दामाद का है. आप मेरा इतना काम और कर दीजिए, आप की बड़ी मेहरबानी होगी.’’

रामखेलावन ने पर्ची पर लिखा फोन नंबर मिला कर फोन महिला को दे दिया था. उस ने क्या बात की, यह रामखेलावन नहीं जान सका था, क्योंकि वह अपनी दुकानदारी में लग गया था. फिर उसे क्या पता था कि वह औरत बच्चा चुरा कर ले जा रही है.

‘‘उस महिला ने जो मोबाइल नंबर तुम्हें दिया था, वह नंबर तो तुम्हारे मोबाइल में होगा?’’ मनोज सिंह ने पूछा.

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‘‘जी साहब, वह नंबर अभी भी मेरे मोबाइल में है?’’ रामखेलावन ने कहा.

इस के बाद रामखेलान ने वह नंबर निकाल कर थानाप्रभारी को दे दिया. उन्होंने वह नंबर डायरी में नोट किया और रामखेलावन का आभार व्यक्त कर के उसे विदा कर दिया.

थानाप्रभारी ने यह सारी जानकारी एसपी दीपक भट्ट को दी तो उन्होंने तुरंत रामखेलावन से मिले मोबाइन नंबर को सर्विलांस पर लगवा दिया. चूंकि वह नंबर चल रहा था, इसलिए उस नंबर की लोकेशन मिल गई. वह नंबर जिला जौनपुर के गांव सुरेरी में चल रहा था.

रामखेलावन ने मनोज सिंह को यह भी बताया था कि महिला ने कहा था कि वह ज्ञानपुर रेलवे स्टेशन पर उतर कर अपने गांव जाएगी. किस गांव जाएगी, यह उस ने नहीं बताया था. पुलिस के लिए यह एक अहम सुराग था. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो पता चला कि वह सुरेरी गांव के सिपाही के नाम है.

बच्चे की खोज के लिए गठित टीम 14 जून को जौनपुर के गांव सुरेरी पहुंच गई. पुलिस ने बच्चा चुराने वाली महिला का पोस्टर गांव वालों को दिखाया तो गांव का कोई आदमी उसे पहचान नहीं सका. पुलिस ने सिपाही के बारे में पता किया तो उस गांव में सिपाही नाम के कई लोग थे. लेकिन वह सिपाही नहीं मिला, जिस से महिला ने बात की थी.

जीआरपी टीम उसे फोन कर सकती थी, लेकिन पुलिस ने उसे इसलिए फोन नहीं किया था कि कहीं सिपाही भी इस खेल में शामिल न हो, उसे शक हो गया हो वह बच्चे को ले कर भाग सकता है. लेकिन जब उस सिपाही का पता नहीं चला, जिस से उस औरत ने बात की थी तो मजबूर हो कर पुलिस ने उसे फोन किया. वह गलत आदमी नहीं था, इसलिए उस ने पुलिस से बात ही नहीं की, बल्कि पुलिस टीम से मिलने भी आ पहुंचा.

जीआरपी ने जब उसे वह पोस्टर दिखाया तो उस ने बताया कि इस औरत का नाम करुणा है और यह उस की चाचिया सास है. यह भदोही के ज्ञानपुर में रहती है. लेकिन यह ज्यादातर मुंबई में रहती है, क्योंकि यह वहां किसी फैक्ट्री में नौकरी करती है.

इस के बाद जीआरपी टीम सिपाही को साथ ले कर उस की ससुराल पहुंची, जहां करुणा बच्चे के साथ मिल गई. लेकिन जैसे ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार करना चाहा, उस ने शोर मचा कर पूरा गांव इकट्ठा कर लिया.

उस का कहना था कि यह बच्चा उस का है और उस के बेटे को किसी और का बता कर पुलिस उस से छीन रही है. उस ने धमकी दी कि इस बात की शिकायत वह पुलिस अधिकारियों से करेगी. लेकिन जब पुलिस ने अपना पुलिसिया हथकंडा दिखाया तो वह शांत हो गई. इस की एक वजह यह भी थी कि गांव वालों की कौन कहे, उस की ससुराल वालों ने भी उस का साथ नहीं दिया था.

इस की वजह यह थी कि सभी को लगता था कि यह बच्चा उस का नहीं हो सकता. क्योंकि करुणा जहां गहरे रंग की थी, वहीं बच्चा काफी सुंदर था. जिस से लोगों को संदेह हो रहा था कि करुणा यह बच्चा कहीं से चोरी कर के लाई है.

करुणा की ससुराल वालों की मदद से पुलिस ने बच्चे को कब्जे में ले कर उसे गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पुलिस टीम उसे ले कर इलाहाबाद आ गई. बच्चे को उस के मांबाप राम सिंह और सोनी को सौंप कर करुणा से पूछताछ की गई तो उस ने बच्चा चोरी का अपना अपराध स्वीकार कर के जो कहानी सुनाई, वह पूरी कहानी इस प्रकार थी—

मुंबई के उपनगर ठाणे की रहने वाली करुणा का विवाह वहीं के विजय के साथ 8 साल पहले हुआ था. विजय से उसे एक बेटा भी हुआ. लेकिन बेटा पैदा होने के बाद ऐसा न जाने क्या हुआ कि बेटे को अपने पास रख कर विजय ने उसे घर से भगा दिया. पति के घर से भगाए जाने के बाद करुणा अलग रह कर एक कपड़ा फैक्ट्री में नौकरी करने लगी, जिस से उस का गुजरबसर आराम से होने लगा.

करुणा जिस फैक्ट्री में नौकरी करती थी, उसी में उत्तर प्रदेश के जिला जौनपुर का रहने वाला पिंटू भी नौकरी करता था. एक साथ काम करने की वजह से पहले दोनों में परिचय हुआ, उस के दोनों में प्यार हो गया. दोनों में शारीरिक संबंध बन गए तो आपसी रजामंदी से उन्होंने शादी कर ली.

पिंटू से विवाह के बाद करुणा को एक बेटी पैदा हुई, जो इस समय 7 साल की है. लेकिन उस की सास को बेटा चाहिए था. करीब 3 साल पहले पिंटू मुंबई से घर आ गया तो करुणा भी उस के साथ आ गई. लेकिन पिछले साल वह गर्भवती हुई तो अपने मायके ठाणे चली गई, जहां उस ने 4 महीने पहले बेटे को जन्म दिया. दुर्भाग्य से 2 महीने बाद ही उस के बेटे की मौत हो गई.

बेटा पैदा होने की बात तो उस ने पति और सास को बता दी थी, लेकिन उस की मौत की बात उस ने छिपा ली थी. उस की सास बारबार फोन कर के पोते को ले कर गांव आने को कह रही थी. पर करुणा के पास बेटा होता तब तो वह उसे ले कर आती. वह कोई न कोई बहाना बना कर टालती रही. अंत में उस की सास ने कहा, ‘‘तुम जब भी आना, मेरे पोते को ले कर आना, वरना मेरे यहां मत आना. तुम अपने मायके में ही रहना, यहां आने की जरूरत नहीं है.’’

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सास की इस धमकी से करुणा परेशान हो उठी. वह सोचने लगी कि अब क्या करे? बिना बच्चे के वह ससुराल आ नहीं सकती थी. काफी सोचविचार कर उस ने कहीं से 4 महीने का बच्चा चुराने की योजना बनाई. जिसे ले जा कर वह ससुराल में जगह पा सके.

यही सोच कर करुणा 27 मई को मुंबई से चली तो अगले दिन इलाहाबाद आ गई. स्टेशन पर इधरउधर भटकते हुए वह 4 महीने के बच्चे की तलाश में लग गई. चूंकि वह शक्लसूरत और पहनावे से भिखारिन जैसी लगती थी, इसलिए उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. क्योंकि स्टेशन पर इस तरह के लोग पड़े ही रहते हैं. फिर वह सचमुच भीख मांग कर अपना पेट भर रही थी.

आखिर 4 जून, 2017 को उस की तलाश पूरी हुई. सोनी और राम सिंह के 4 महीने के बेटे पर उस की नजर पड़ी तो वह उसे ले कर चंपत हो गई.

पूछताछ के बाद मनोज सिंह ने करुणा के खिलाफ अपराध संख्या 448/2017 पर आईपीसी की धारा 363, 365 के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. सोनी बेटे को पा कर बहुत खुश थी. वह बेटे को सीने से लगा कर बारबार पुलिस वालों को दुआएं देते हुए बेटे को दुलार रही थी.

सार्वजनिक वितरण योजना के अंतर्गत अपराध

सरकारी कानून किस तरह जानलेवा से होते हैं इस का एक मजेदार उदाहरण है सार्वजनिक वितरण योजना के अंतर्गत कानून में अपराध. इस योजना में मिट्टी का तेल राशन कार्ड पर दिया जाता है और दुकानदार को उस का लेखाजोखा रखना पड़ता है कि कितना तेल उसे अलौट हुआ, कितना बाकी है, कितना बेचा. इस कानून में भी ज्यादा तेल रखने पर जुरमाने और सजा का प्रावधान है. दुकानदार सजा के डर के बावजूद पैसे कमाने के लिए काम करते ही हैं.

इस में कुछ राशन कार्ड वालों को कम तेल दे कर या न दे कर बाकी ज्यादा दाम पर बेच दिया जाता है. यह गुनाह है पर केवल आर्थिक, कोई अनैतिक नहीं. पर सरकारी इंस्पैक्टर आतंक तो गब्बर सिंह का आतंक है.

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में एक दुकानदार के यहां इंस्पैक्टर ने कुछ ज्यादा कैरोसिन पकड़ लिया और मुकदमा जड़ दिया. यदि तभी लेदे कर फैसला कर लिया जाता तो बात दूसरी होती पर लगता है दुकानदार ने केस लड़ने का फैसला किया. यह कब हुआ? 2 सितंबर, 1988 को. इस का अंतिम निर्णय कब हुआ? जनवरी 2018 में.

पहले कोर्ट और अपील कोर्ट ने इस दुकानदार को 3 माह की सजा दे डाली, महज 187 लिटर अतिरिक्त तेल रखने पर. जिस देश में हत्यारे और बलात्कारी गलीगली घूमते हैं, जहां बाबास्वामी लूटते हैं और भगवा दल निहत्थों को धमकाते हैं, वहां 187 लिटर मिट्टी का तेल अतिरिक्त रखने का मामला सुप्रीम कोर्ट में 30 साल तक चला. तब तक दुकानदार 89 वर्ष का हो गया.

सुप्रीम कोर्ट ने सजा पर राहत दी पर गुनाह से नहीं. वह 89 वर्ष का है. अत: 3 माह की जेल काटना गलत होगा. एक लोकतांत्रिक देश की न्यायपालिका इस तरह आतंकवादी इंस्पैक्टरों का साथ दे सकती है और निरर्थक, अनावश्यक व रिश्वत के कुएं खोदने वाले कानूनों का समर्थन कर सकती है यह आश्चर्य की बात है. तेल की कालाबाजारी न हो यह सही है पर इस में उस दुकानदार का लाइसैंस कैंसल करना काफी होगा ताकि वह और लूट न मचा सके. उसे जबरन वर्षों बाद जेल भेजने की पेशकश करना और सरकार का अपीलों में अपने वकील खड़ा करना एक नागरिक के जीने के अधिकार को छीनना है.

मिट्टी का तेल न सोना है न शराब या अफीम कि उस से समाज में जहर फैलता हो. व्यापार की ऊंचनीच पर इस तरह का संगीन अपराध लगना जनता के साथ खिलवाड़ है.

बाबा ब्लैकशिप : कमजोर पटकथा, अच्छा अभिनय

भ्रष्ट राजनेता की करतूतों के साथ प्रेम कहानी को पेश करने वाली फिल्म ‘‘बाबा ब्लैकशिप’’ कहीं से भी दर्शकों को अपनी तरफ नहीं खींचती है.

फिल्म ‘‘बाबा ब्लैकशिप’’ की कहानी गोवा में रहने वाले बाबा (मनीष पौल) से शुरू होती है. जो कि एक आर्ट शिक्षक से आर्ट डीलर बने ब्रायन मोरिस उर्फ सांता (अन्नु कपूर) की बेटी एंजिला मोरिस (मंजरी फड़नवीस) से प्यार करता है. दोनों शादी करना चाहते हैं, मगर सांता ऐसा नहीं होने देना चाहते. उनकी नजर में एक काजू बेचने वाले की कमाई कुछ नहीं हो सकती. बाबा इस बात से अनजान है कि एंजिला के पिता मशहूर पेटिंग चुराकर, उनकी नकल वाली पेटिंग बनाकर मौलिक पेटिंग के रूप में बेचकर लोगों को ठगते रहते हैं.

उधर बाबा अब तक अपने पिता चारूदत्त शर्मा (अनुपम खेर) को अपनी मां की डांट खाते ही देखते आए हैं. शर्मा जी घर पर बर्तन धोते व बुनाई करते नजर आते हैं. लेकिन बाबा का पच्चीसवां जन्मदिन उनकी जिंदगी में उथल पुथल मचा कर रख देता है. अपने 25वें जन्मदिन पर बाबा को उसके पिता बताते हैं कि वह सर्वाधिक चर्चित हिटमैन यानी कि हत्याएं करनेमें माहिर चार्ल्स हैं. इतना ही नही शर्मा बताते हैं कि पैसा लेकर हत्या करने का यह धंधा उनका काफी पुश्तैनी धंधा है. इस धंधे में वह 12 पीढ़ी के नुमाइंदे हैं और अब तेरहवीं पीढ़ी यानी कि बाबा भी यही धंधा करेगा. पर बाबा इंकार कर देता है, वह कहता है कि वह तो काजू की दुकान पर ही बैठेगा, क्योंकि उसे एंजिला मोरिस से शादी करनी है.bollywood

चारूदत्त शर्मा पैसे का सौदा होने पर आधा पैसा एडवांस में लेकर हत्या करते हैं, बाकी पैसा हत्या होने के बाद लेते हैं. लेकिन वह सामने वाले से कहते हैं कि वह पैसा वह रेलवे स्टेशन पर बने लाकर में रख दे. लाकर कुछ इस तरह से है कि उस लाकर का पिछले दरवाजे के लाकर का नंबर अलग है, तो पीछे वाले दरवाजे पर चाभी लगाकर वह पैसा निकालते रहते हैं. इस तरह वह लोगों के सामने नहीं आते हैं.

उधर राज्य के भ्रष्ट गृहमंत्री उप्पल (मनीष वाधवा) वास्तव में सबसे बडे़ खिलाड़ी हैं. वह हैं राज्य के गृहमंत्री, मगर ड्रग्स का अवैध कारोबार वही चला रहे हैं, जिसका मैनेजर उन्होंनेकमाल (बी.शांतनु) को बना रखा है. गृहमंत्री की पत्नी लड़कियों की तस्करी से जुड़ी हुई हैं. कमाल, गृहमंत्री उप्पल का इशारा पाते ही अपने छोटे भाई जमाल से सामने वाली की हत्या करवा देता है. उप्पल इस बात से परेशन रहते हैं कि आने वाले चुनाव के लिए फंड कैसे आए, तथा वह ईमानदार एसीपी शिवराज (के के मेनन) से भी परेशान हैं.

उप्पल का आदमी जब ड्रग्स की बडी खेप लेकर गोवा एयरपोर्ट पर उतरता है, तो एसीपी शिवराज उसके पीछे पड़ जाता है, पर वह किसी तरह से बचकर अपने घर पहुंच जाता है. अब गृहमंत्री उप्पल, कमाल से कहते हैं कि किसी मंजे हुए हिटमैन को ठेका देकर उस ड्रग्स को लाने वाले की हत्या करवा दें. चारूदत्त शर्मा को यह ठेका मिलता है. चारूदत्त अपने बेटे बाबा को अपने साथ लेकर जाते हैं और उप्पल के आदमी के घर में बम फिट कर देते  हैं.

इधर, एसीपी शिवराज, कमाल व जमाल का पीछा करते हुए गृहमंत्री उप्पल के घर पहुंच जाता है. वह कमाल व जमाल को ड्रग्स के अवैध कारोबार से जुड़े होने के आरोप में गिरफ्तार करना चाहता है. एसीपी कहता है  कि वह गिरफ्तारी की जगह उप्पल का घर नहीं दिखाएगा. पर उप्पल कहते हैं कि उन्हे अपनी सैलरी चाहिए, तो सैल्यूट करके वापस चला जाए.

इधर हर बार चुनाव से पहले उप्पल को चुनावी फंड के रूप में धन राशि देने वाले उद्योगपति डैनियल ने उन्हे आंख दिखाना शुरू कर दिया है. वह चाहता है कि पहले उप्प्ल उसकी एक फाइल को पास कर दे, तब वह पैसा दे. अब उप्पल एक चाल चलता है. वह कमाल से कहकर चारूदत्त शर्मा को डैनियल र् आर्ट डीलर मोरिस की हत्या करने की सुपारी दिलवाता है,और एसीपी शिवराज के हाथों चारूदत्त उर्फ चार्ल्स को गिरफ्तार करवाकर खुद को लोगों की नजर में अच्छा साबित करना चाहता है. मगर बाबा की समझदारी से बाबा, मोरिस,चारूदत्त शर्मा व एसीपी शिवराज मिलकर नई चाल चलते हैं, जिसमें कमाल व डैनियल के साथ ही गृहमंत्री उप्पल भी मारे जाते हैं.bollywood

विश्वास पंड्या की निर्देशकीय कमजोरी और कमजोर पटकथा, बेसिर पैर की कहानी के चलते बेहतरीन व प्रतिभाशाली कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय के बावजूद फिल्म ऐसी नहीं है कि दर्शक अपनी गाढ़ी कमाई इसे देखने के लिए खर्च करे. निर्देशक ने ज्वलंत व बेहतरीन विषय की ऐसी की तैसी कर डाली. कहानी में इतने सारे ट्रैक हैं, कि दर्शक भी पूरी तरह से कन्फ्यूज हो जाता है. फिल्म का क्लायमेक्स भी बड़ा अजीब सा है. फिल्म को एडीटिंग टेबल पर भी कसने की जरुरत थी. कुछ सीन तो सीरियल का अहसास कराते हैं.

फिल्म का गीत संगीत आकर्षित नहीं करता. फिल्म गोवा की पृष्ठभूमि पर है, पर एक गाना 90 के दशक का पंजाबी गीत रखा गया है. यह बड़ा अजीब सा लगता है.

फिल्म को हास्य व प्रेम कहानी वाली फिल्म के रूप में प्रचारित किया गया, मगर रोमांस भी ठीक से उभर नहीं पाता. एक रोमांटिक गाना है, वह भी जबरन ठूंसा हुआ लगता है.

मनीष पौल पहली बार बेहतरीन अभिनय करते हुए नजर आए, उनकी कौमिक टाइमिंग भी जबरदस्त है. मगर उनका किरदार भी सही ढंग से उभरता नहीं है. अन्नू कपूर, अनुपम खेर,मनीष वाधवा व के के मेनन अपनी बेहतरीन अदाकारी से भी इस फिल्म को तहस नहस होने से नहीं बचा पाते हैं. क्योंकि पटकथा के स्तर पर इन कलाकारों को कोई मदद नहीं मिलती है. मंजरी फड़नवीस के किरदार के साथ भी न्याय नहीं हुआ है. बी.शांतनु अपनी छोटी भूमिका में भी प्रभाव डालने में सफल रहते हैं.

एक घंटे 51 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘बाबा ब्लैकशिप’’ के लेखक निर्देशक विश्वास पंड्या, लेखक संजीव पुरी, संगीतकार रोशन बालू व गौरव दास गुप्ता, कलाकार हैं – मनीष पौल, मंजरी फड़नवीस, के के मेनेन, अन्नू कपूर, अनुपम खेर, मनीष वाधवा, बी.शांतनु व अन्य.

फेसबुक पर ढूंढ़ रहे हैं गर्लफ्रैंड तो ये गलतियां न करें

‘‘यार, बहुत ट्राई कर लिया, लेकिन एक भी फ्रैंड नहीं मिली. यार, इधर तो सब फेक हैं, जो मिलती हैं वे खेलीखाई हैं, क्या ये असली  युवतियां हैं. उस ने पहले फ्रैंड रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट की, फिर ब्लौक कर दिया. यार, इंटरनैट पर जितनी जल्दी रिश्ते बनते हैं उतनी ही जल्दी वे टूट भी जाते हैं,’’ ये बातें अकसर युवक या पुरुष एकदूसरे से साझा करते सुनाई पड़ते हैं.

दरअसल, सोशल मीडिया सर्च तकनीक बेहद सटीक है. जिस की हमें तलाश हो वह हमें मिल जाता है, लेकिन अकसर लोग धोखा खा जाते हैं. कई बार कुछ गड़बड़ होने से लोगों को सोशल मीडिया पर निराशा हाथ लगती है. भारत में ज्यादातर लोग साथी ढूंढ़ने के लिए फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं.

फेसबुक के मुताबिक भारत में प्रतिदिन 6.90 करोड़ लोग फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं जो देश में इस्तेमाल की जाने वाली साइट्स का 90 फीसदी है, यानी आप इन लोगों में से अपनी गर्लफ्रैंड जरूर ढूंढ़ सकते हैं, कोई कमी नहीं है बशर्ते आप यहां दिए सुझावों पर अमल करें. :

अनजान लोगों को फ्रैंड रिक्वैस्ट न भेजें

फेसबुक उन लोगों को ही रिक्वैस्ट भेजने की इजाजत देता है जिन को आप जानते हों, लेकिन अगर आप किसी अनजान महिला से फ्रैंडशिप का आग्रह कर रहे हैं और उस ने किसी की भी रिक्वैस्ट स्वीकार करने की गुंजाइश खुली रखी है तो आप उसे अपनी रिक्वैस्ट भेज सकते हैं. बशर्ते उसे आप पसंद आएं और आप दोनों के बीच बातचीत शुरू हो.

अपनी सर्च का दायरा सीमित रखें

फेसबुक पर सर्च का औप्शन होता है, जहां आप किसी का भी नाम और उस के शहर को खोज सकते हैं. उदाहरण के लिए अगर आप दिल्ली में किसी मधुरिमा को ढूंढ़ना चाहते हैं तो मधुरिमा और दिल्ली लिख कर सर्च करें. अगर आप लाखों मधुरिमाओं की भीड़ से बचना चाहते हैं तो आप मधुरिमा के साथ उन का उपनाम (सरनेम) भी टाइप कर दें तो परिणाम और सटीक होंगे.

फेसबुक रिक्वैस्ट न भेजने दे तो क्या करें

फेसबुक किसी अनजान को रिक्वैस्ट न भेजने दे तो ऐसी दशा में आप उसे एक मैसेज भेज सकते हैं. अंगरेजी में ‘हाय लैट अस बी फ्रैंड्स’ या हिंदी में ‘क्या हम दोस्त बन सकते हैं’ संदेश के साथ एक फूल या गुलदस्ता भी भेज सकते हैं.

वह स्वीकार कर ले तो न करें ये बातें

अगर आप की रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली गई है तो इस का मतलब यह नहीं कि आप जबरन किसी के पीछे पड़ जाएं और उस पर मैसेज की बरसात कर दें. इस का मतलब यह भी नहीं कि वह आप के लिए उपलब्ध है और आप जब मरजी उसे डेट पर ले जा सकते हैं. फ्रैंड का अर्थ सैक्स नहीं, न ही उस की स्वीकारोक्ति है. अगर आप ने किसी को बारबार मैसेज किए तो वह आप को ब्लौक या अनफ्रैंड भी कर सकती है.

तमीज से पेश आएं जल्दबाजी न करें

अगर आप फेसबुक फ्रैंड के साथ तमीज से पेश आते हैं और उस को समझ कर वक्त देते हैं तो आप एक अच्छे दोस्त बन सकते हैं. आप तहजीब से बात करें. उस की पसंद व नापसंद का पता करें. उस की तारीफ करें. हो सकता है कि वह आप को सिर्फ अपने अच्छे दोस्तों की ही श्रेणी में रखे. अकसर देखा गया है कि भारत के कई युवकों ने विदेशी फेसबुक फ्रैंड्स से पहले दोस्ती की, 1-2 साल दोस्ती कायम रखी और फिर बाद में शादी कर ली.

मोबाइल रीचार्ज और पैसे मांगने वाली युवतियों से सावधान

इंटरनैट पर ठगों की कमी नहीं, वे लोगों को तरहतरह से ठगते हैं. कुछ चालाक युवतियां युवकों को मीठीमीठी बातों में फंसा कर उन से अपना मोबाइल रीचार्ज करवाती हैं और कई बार उन से पैसे भी उधार मांग लेती हैं. कुछ तो सीधेसीधे धंधे में भी उतर आती हैं और पैसों के लिए सबकुछ करने के लिए तैयार हो जाती हैं. ऐसी युवतियों से सावधान रहें.

अगर फेसबुक फ्रैंड मिलने आ जाए

यदि कोईर् फेसबुक फ्रैंड आप के आग्रह पर आप पर भरोसा कर के मिलने पहुंच जाए तो इसे न तो सैक्स का निमंत्रण समझें और न ही उस की स्वीकारोक्ति. फेसबुक फ्रैंड से मिलने से पहले युवतियों को बारबार सोचना चाहिए, क्योंकि हरियाणा के गुड़गांव, हिसार और पंजाब के मोहाली सहित कई स्थानों पर कई  भोलीभाली फेसबुक फ्रैंड्स का बलात्कार तक किया जा चुका है. इसलिए यदि वह आप से मिलने आ गई तो आप बाइज्जत उसे उस के घर पहुंचा दें. छोटी सी गलती एक ओर जहां दोस्ती तोड़ सकती है, वहीं बड़ी गलती आप को कानून के शिकंजे में फंसा सकती है.

रिलेशनशिप स्टेटस को ले कर गलतफहमी न पालें

अकसर युवक किन्हीं युवतियों का रिलेशनशिप स्टेटस पा कर उन के प्रति गलतफहमी पाल लेते हैं. मसलन, अगर किसी युवती ने खुद को विधवा, तलाकशुदा, सेपरेटेड या फिर कौंप्लिकेटेड लिखा है तो लोग मानते हैं कि वह आसानी से उपलब्ध है. अकसर ऐसे स्टेटस वाली युवतियों के पास फ्रैंड रिक्वैस्ट बहुत आती हैं जिस वजह से उन्हें अपना फेसबुक एकाउंट या तो डीऐक्टिवेट करना पड़ता है या फिर वे फ्रैंड रिक्वैस्ट की संभावना ही खत्म कर देती हैं.

साइबर स्टौकिंग से सावधान

यदि आप की फ्रैंड रिक्वैस्ट या मैसेज का कोई जवाब नहीं मिलता है तो समझिए वह आप से दोस्ती करने की इच्छुक नहीं है. उस को बारबार मेसैज न करें, क्योंकि ऐसा करना अपराध है. कानून की भाषा में इसे साइबर स्टौकिंग यानी इंटरनैट पर किसी का पीछा करना कहा जाता है और कोई चाहे तो आप के खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर सकता है.

फेसबुक सोशल नैटवर्किंग का साधन है, इसलिए इसे दूसरों को परेशान करने का जरिया न बनाएं. साफसुथरी दोस्ती किसी भी रिश्ते का रूप ले सकती है. आप एक अच्छे दोस्त के रूप में किसी का जीवन संवार सकते हैं. इंटरनैट सिर्फ सैक्स या महिलाओं के करीब आने का जरिया नहीं है. आप चाहें तो इंटरनैट का सही इस्तेमाल कर न केवल अपने जीवन में परिवर्तन ला सकते हैं बल्कि अपना ज्ञान भी बढ़ा सकते हैं.

बाइक से हैरतअंगेज करतब

युवाओं की खास पसंद है बाइक. कुछ उत्साही और दुस्साहसी युवक मोटरसाइकिल से ऐसे हैरतअंगेज कारनामे करते हैं कि देखने वाला आश्चर्यचकित रह जाए.

सेना की डेयर डेविल्स मोटरसाइकिल प्रदर्शन टीम ने ऐसे हैरतअंगेज कारनामों के लिए अनेक बार गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स में अपना नाम दर्ज कराया है. इस टीम ने अपना पहला रिकौर्ड 1991 में ग्वालियर में तब बनाया था जब 7 मोटरसाइकिलों पर 40 जवानों ने सवार हो कर 400 मीटर का फासला तय किया था. सेना की ही सिग्नल कोर टीम ने 11 मोटरसाइकिलों पर 251 जवानों को बैठा कर 11 जून, 2009 को जबलपुर में 240 मीटर चलने का रिकौर्ड बनाया था.

अक्तूबर 2014 में मध्य प्रदेश की जबलपुर डेयर डेविल्स टीम ने करतब दिखाते हुए 3 नए विश्व रिकौर्ड बनाए. पहला रिकौर्ड 70 सैकंड में 3 मोटरसाइकिलों पर 15 जवानों ने 1 किलोमीटर के वर्गाकार क्षेत्र में मानव मोटरसाइकिल पिरामिड बना कर बनाया. नायक दिलीप कुमार बोहरा के पेट के ऊपर से 1,200 बार बौक्स को निकाला गया. यह स्टंट जवानों ने 13 मिनट में पूरा किया. तीसरा रिकौर्ड हवलदार दिपायन चौधरी व ईश्वर रावटी ने वर्गाकार ट्रैक पर 218 किलोमीटर की रिवर्स राइडिंग की. उन्होंने पिछला रिकौर्ड तोड़ते हुए 4 घंटे 21 मिनट और 8 सैकंड में यह कीर्तिमान रचा.

1976 में ब्राजीलियन आर्मी पुलिस के 40 जवान एक ही मोटरसाइकिल पर सवार हो कर 1.6 किलोमीटर की दूरी तक गए थे.

मोटरसाइकिल द्वारा सब से लंबी छलांक का रिकौर्ड 69,60 मीटर का है. 6 फरवरी, 1977 को फ्रांस के एलो ज्यां प्रीयू ने पैरिस के निकट मौटलेहरी में छलांग लगा कर 16 बसों को पार कर के यह रिकौर्ड बनाया था.

22 जून को लौडन, न्यू हैंपशायर में डोग डैंजर ने 1991 होंडा सी आर 500 पर मोटरसाइकिल द्वारा लंबी छलांग में 251 फुट की सब से लंबी दूरी तय की.

रोमांचक प्रदर्शन

नई दिल्ली में हर वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह में मोटरसाइकिल के रोमांचक प्रदर्शन भारतीय सेना के जवानों द्वारा किए जाते हैं, जिन्हें देख दर्शक दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं. 26 जनवरी, 1992 को भारतीय थलसेना की मोटरसाइकिल प्रदर्शन टीम ने 42 पुरुषों और 8 मोटरसाइकिलों ने पिरामिड बनाने का रिकौर्ड बनाया था. जिस ने बिना किसी बाहरी सहायता के 600 मीटर की दूरी तय की थी. इस टीम ने 6 जून, 1992 को अपना रिकौर्ड सुधारते हुए 8 मोटरसाइकिलों पर 45 पुरुषों का पिरामिड बना कर 800 मीटर की दूरी तय की थी.

सेना की डेयर डेविल्स के नाम 2 रिकौर्ड और भी हैं, 21 दिसंबर, 2013 को उस ने चलती मोटरसाइकिल पर प्रदर्शन किया. इसी दिन उस ने जमीन पर लेटे हुए 50 जवानों के ऊपर से मोटरसाइकिल जंप करा कर लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया था.

मोटरसाइकिल से हैरतअंगेज प्रदर्शन करने वालों की कमी नहीं है. 30 नवंबर, 1988 को 10 फुट की सीढ़ी के ऊपर से पीछे की तरफ मुंह कर के लगातार 90 मिनट के लिए सिग्नलमैन डेबी जोंस, रौयल सिग्नल व्हाइट हैलमेट्स ने 23 किलोमीटर की दूरी केटरिक एयरफील्ड, न्यूयौर्क में तय की थी.

अटलांटा जौर्जिया के ग्रगेरीड ने स्ट्रीटलीगल मोटरसाइकिल प्रदर्शित की जो 15 फुट 6 इंच लंबी और 253 किलोग्राम भारी है.

क्या आप ने 25 फुट लंबी मोटरसाइकिल को चलते देखा है? जरमनी के एसेन मोटर शो में प्रदर्शित इस मोटरसाइकिल को बनाया है स्टीव हौपकिंस ने. इस पर 10 व्यक्ति आराम से बैठ सकते हैं.

लाजवाब कारनामे

ब्रिटेन के कोलिन फुर्ज ने तो कमाल ही कर दिखाया. उन्होंने 72 फुट लंबी मोटरसाइकिल प्रदर्शित की. लंबाई अधिक होने के कारण इसे सीधे चलना पड़ता है. इस पर 25 व्यक्ति आराम से बैठ सकते हैं. गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स के लिए इसे एक मील तक चला कर दिखाया गया. इस की रफ्तार 35 किलोमीटर प्रतिघंटा है.

क्या आप 7.5 फुट ऊंची मोटरसाइकिल की कल्पना कर सकते हैं? यह ‘विगटो’ है जोकि स्वीडन के टौम बीवर्ग ने बनाई है. जगुआर के 12 पावर के इंजन वाली यह मोटरसाइकिल 100 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चल सकती है.

फ्रांस के कलाकार जूलियन डूपौंट ने मैक्सिको में बाइक पर सांसें रोक देने वाले कारनामे को अंजाम दिया है. इस साहसी कलाकार ने अपने जीवन का सब से हैरतअंगेज प्रदर्शन करते हुए मैक्सिको सिटी के मोंटाना रूसा रोलर कौस्टर ट्रैक पर बाइक चलाई. 33 मीटर ऊंचा यानी 108 फुट वुडन कौस्टर बिना बिजली के चलने वाली ट्रेन के लिए तैयार किया गया था जो गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत पर काम करता है.

सड़क पर बाइक सवार प्रदर्शन करते हुए तो अकसर देखे जाते हैं लेकिन आसमान में पैराग्लाइडिंग से बाइक पर प्रदर्शन करना लोहे के चने चबाने से कम नहीं है. ऐसा ही कारनामा किया स्टंटमैन स्टीव मेयर ने. उन्होंने साल्ट लेक सिटी से 50 मील दूर उटाह में हार्ले डैविडसन से पैराग्लाइडर की तरह माउंट टिंपानोगास के चारों ओर चक्कर लगाया.

उम्र 56 साल की लेकिन जज्बा युवाओं जैसा. मिलिटरी एमसीटीई के ड्राइवर सुरेश चौधरी ने फरवरी 2014 में बगैर हैंडल पकड़े 221 किलोमीटर तक बाइक चलाने का कारनामा किया. उन्होंने मध्य प्रदेश के महू से जुलवानिया तक बाइक चला कर इस कारनामे को अंजाम दिया.

उन्होंने यह सफर 3 घंटे में पूरा किया. वे 10 साल के कड़े अभ्यास के बाद यह मुकाम हासिल कर पाए. उन का सपना हाथ छोड़ कर बाइक चलाने वाले 213 किलोमीटर के रिकौर्ड को तोड़ना था. वे अपने इस कारनामे को गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स में दर्ज कराने का दावा करेंगे.

ठगों की सम्यक दृष्टि

हमारी सभ्यता और संस्कृति में ठगी को विद्या और कला की मान्यता बेवजह नहीं मिली है. ठगी दुष्कर काम है जिस में आत्मविश्वास, ज्ञान और अभिनय सहित ढेरों गुणों व जानकारियां अनिवार्य होती हैं. यों ठगी सर्वव्यापी है. हर कोई किसी न किसी को ठग रहा है. व्यापारी ग्राहकों को, डाक्टर मरीजों को, बैंक उपभोक्ताओं को और नेता जनता को ठग रहे हैं.

यह मामला थोड़ा अलग है जिस में ठगों ने उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को ही चूना लगा डाला. यह बात खुद उन्होंने सदन में स्वीकारी कि उपराष्ट्रपति बनने के बाद वजन घटाने वाली एक दवाई का इश्तिहार उन्होंने देखा और दवा और्डर कर दी. 1 हजार रुपए लेने के बाद दवा कंपनी ने फिर हजार रुपए मांगे तो वेंकैया का माथा ठनका पर तब तक वे आम लोगों की तरह ठगे जा चुके थे.

अब उम्मीद की जानी चाहिए कि इन ठगों की बाबत कोई कठोर कानून बनेगा जो लोगों की कमजोरियों का फायदा तरहतरह के विज्ञापन दे कर खुलेआम उठाते हैं. बेहतर तो यह होगा कि मोटे लोग वजन कम करने वाले चमत्कारी विज्ञापनों के चक्कर में पड़़ने के बजाय व्यायाम और खानपान पर ध्यान दें.

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