नेताजी कहिन जनता से, भूखे मत मरना

गांव में अफरातफरी  थी. लोगों की आंखें आसमान की तरफ लगी थीं. वे आसमान में पानी के लिए नहीं, बल्कि इसलिए टकटकी लगाए हुए थे, क्योंकि वहां हैलीकौप्टर से मंत्रीजी आने वाले थे. मंत्रीजी वहां इसलिए आ रहे थे, क्योंकि अखबारों में यह खबर छपी थी कि उस गांव में कुछ लोग भूख से मर गए हैं. मंत्रीजी को इस बात पर कतई यकीन नहीं था कि कोई भूख से मरा होगा. उन का मानना था कि आदमी अपने कर्मों से मरता है, भूख तो केवल एक बहाना है. इस में सरकार क्या करे. पर वे अपने मन की इन बातों को लोगों के सामने जाहिर नहीं करना चाहते थे. इस से वोट बैंक पर बुरा असर पड़ सकता था.

फिलहाल मंत्रीजी जिला हैडक्वार्टर पहुंच चुके थे. अफसरों के साथ बैठक और लंच के बाद गांव के दौरे पर जाने का कार्यक्रम था. बाहर विरोधी दल के लोग काले झंडे दिखा रहे थे. पुलिस दूर से ही उन्हें डंडे दिखा रही थी. अभी तक केवल देखनेदिखाने का ही खेल चल रहा था. आगे क्याक्या होना था, यह किसी को पता नहीं था. भीतर अफसरों के साथ मंत्रीजी की मीटिंग चल रही थी. मंत्रीजी ने मिनरल वाटर का घूंट भरा. दिन में वे केवल मिनरल वाटर ही पीते थे. उन्होंने बड़े अफसर से सवाल किया, ‘‘क्या यह सच है कि आप के जिले में लोग भूख से मरे हैं  ऐसी खबर छपने पर आप को शर्म आनी चाहिए. आप को पता है कि ऐसी खबरों से सरकार और हमारी इमेज पर कितना बड़ा धब्बा लग सकता है ’’

पीछे खड़ा एक छोटा अफसर, जिस का तबादला मंत्रीजी ने रुकवा दिया था, बुदबुदाया, ‘‘सर्फ ऐक्सल है न.’’ उधर मंत्रीजी कह रहे थे, ‘‘भूख से मरे या प्यास से, खबर तो नहीं छपनी चाहिए थी. कौन है जनसंपर्क अधिकारी  उसे तत्काल सस्पैंड करो, समझे. बोलिए, क्या कहना चाहते हैं आप ’’ उस अधिकारी ने बड़ी तमीज से अर्ज किया, ‘‘सर, यह खबर सरासर गलत है. कुछ लोग मरे जरूर हैं, पर भूख से नहीं, वे उलटीसीधी चीजें खाने से मरे हैं. इस में प्रशासन की कोई गलती नहीं है. उन की पोस्टमार्टम रिपोर्टों में भी लिखा हुआ है कि उन के पेट में आम की गुठलियां पाई गई थीं, जो जहरीली थीं.

‘‘सर, वे लोग बहुत चालाक थे, यानी आम के आम और गुठलियों के दाम. भूख से मरने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता.’’

मंत्रीजी ने ऐसे सिर हिलाया, जैसे उन के मन की बात कह दी गई हो. वे बोले, ‘‘लगता तो यही है, यह सरकार को बदनाम करने की साजिश है. इस के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और विदेशियों का हाथ हो सकता है. क्या इस बारे में आप लोगों ने पता लगाया है ’’

अधिकारी महोदय ने जवाब दिया, ‘‘श्रीमानजी, हम भी इस की जांच करा रहे हैं.’’

मंत्रीजी ने पूछा, ‘‘क्या इस जिले में अनाज की कोई कमी है ’’

अधिकारी बोले, ‘‘नहीं सर, गोदाम भरे पड़े हैं. सैकड़ों टन अनाज तो बाहर ही सड़ गया है. ऐसी हालत में भूख से मरने का तो सवाल ही नहीं उठता.’’

मंत्रीजी झुंझला कर बोले, ‘‘पर सवाल तो उठ ही गया है. विरोधी लोग चीखचीख कर रोज यही सवाल उठा रहे हैं. उस का क्या करोगे ’’

अफसर समझदार था. वह जानता था कि ऐसी हालत में चुप रहना ही समझदारी है.

मंत्रीजी ने फिर पूछा, ‘‘क्या मरने वाले गरीबी रेखा से नीचे के परिवार के सदस्य थे’’

अधिकारी महोदय ने जवाब दिया, ‘‘बिलकुल नहीं श्रीमानजी, गरीबी रेखा से नीचे के परिवार के लोगों का भूख से मरना नामुमकिन है. क्योंकि इस सूची में शामिल सभी लोगों के पास 10-15 एकड़ जमीन और नौकरी है. इन में से कुछ आप के दल के हैं और कुछ दूसरे रसूख वाले लोग हैं.

‘‘भूख से मरने वालों… सौरी सर, मेरा मतलब है कि आम की गुठली खा कर मरने वालों का तो नाम भी इस सूची में नहीं था. फिर गरीबी की वजह से मरना…  श्रीमानजी, यह अफवाह है.’’

मंत्रीजी ने सिर हिलाया और बोले, ‘‘हमें भी ऐसा ही लगता है. हम ने देश की बड़ीबड़ी पत्रपत्रिकाओं में इश्तिहार दे कर देश की जनता को यह बता दिया है कि हमारे यहां अनाज की कोई कमी नहीं है. गोदाम अनाजों से भरे पड़े हैं.’’

यह सुन कर सब लोग खुश हो गए. फिलहाल अपना पेट भरने का समय हो गया था. एक अधिकारी, जो इस के इंतजाम में सुबह से ही जुटा हुआ था, बोला, ‘‘सर, लंच का समय हो गया है. लंच करने चलिए, वरना पत्रकार घेर लेंगे. हम ने उन के खानेपीने का इंतजाम अलग से किया है. हम उन्हें आप की फिक्र से भी वाकिफ करा देंगे.’’

मंत्रीजी भी थक चुके थे, इसलिए मीटिंग बरखास्त करते हुए बोले, ‘‘ठीक है, तो लंच कर लिया जाए.’’

मंत्रीजी लंच के लिए चले गए, तो उन के साथ बड़ेबड़े अफसर और उन की पार्टी के कुछ छुटभैए नेता भी डाइनिंग रूम में घुस गए.

वहां दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था, जो चेहरा पहचान कर ही लोगों को घुसने दे रहा था. एकदो लोगों से उस की कुछ बहस भी हुई. जो घुस गए, वे अपनी कामयाबी पर इठलाने लगे. जो रह गए, वे भड़ास निकाल रहे थे.

एक आदमी कुछ ज्यादा ही बोल रहा था, ‘‘देखो, वहां लोग भूखे मर रहे हैं और यहां मुरगमुसल्लम के साथ काजूकिशमिश पर हाथ साफ किए जा रहे हैं.’’

एक अफसर ने जब यह सुना, तो हाथ पकड़ कर उसे भीतर खींच लाया और उस के मुंह में एक पूरा भुना हुआ मुरगा ठूंस दिया. उस का मुंह बंद हो गया.

मंत्रीजी चटकारे ले कर खाना खा रहे थे. वे बोले, ‘‘खाना बढि़या बना है. रसोइया होशियार लगता है.’’

खाने का इंतजाम करने वाले अफसर की बांछें खिल गईं. उस ने कहा, ‘‘जी हां सर, काफी पुराना रसोइया है. अब तक सैकड़ों मंत्रियों और अफसरों को खाना खिला चुका है.

‘‘वह जानता है कि किस मौके पर क्या पकाना चाहिए. बाढ़ के समय मछली, सूखे के समय मुरगा और चक्रवात के समय दूसरे पक्षियों के बड़े जायकेदार आइटम पकाता है.

‘‘सर, आज जो मुरगे पके हैं, वे उसी गांव से मंगाए गए थे, जिस का आप को दौरा करना है.’’

मंत्रीजी बोले, ‘‘अच्छा, उसी गांव का मुरगा है. अरे भाई, जब वहां खाने को इतने मुरगे थे, तो लोगों को आम की गुठलियां खाने की क्या जरूरत थी. मुरगा भी तो खा सकते थे,’’ कह कर मंत्रीजी ने जोरदार ठहाका लगाया.

लंच के बाद थोड़ी देर आराम कर के मंत्रीजी का हैलीकौफ्टर उड़ा. अफसरों की कारों और जीपों का काफिला लंच के फौरन बाद ही रवाना हो गया था. उस गांव के लोगों के इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं. हैलीकौप्टर नीचे उतरा.

मंत्रीजी हैलीकौप्टर से उतर कर आए. लोग उन को देख कर खुश हो गए.

मंत्रीजी के साथ हैलीकौप्टर से बड़ेबड़े बंडल भी उतारे गए. जनता ने समझा, शायद मंत्रीजी अपने साथ राहत का सामान लाए हैं, जबकि ऐसा होता नहीं है. आमतौर पर राहत की घोषणा दौरे के बाद राजधानी में पत्रकार सम्मेलन में की जाती है. यहां भी कुछ ऐसा नहीं था. वह सामान राशन नहीं कुछ और था.

अफसरों और पार्टी कार्यकर्ताओं को मंत्रीजी निर्देश दे रहे थे, ‘‘देखिए, इन बंडलों में ‘कोई भूख से नहीं मरेगा’ इश्तिहार वाले अखबार और पोस्टर हैं, जिस में हमारी सरकार ने बताया है कि देश में कितना अनाज है. साथ ही, गरीबों को मुफ्त अनाज देने की कितनी योजनाएं हैं. इन्हें सारे गांव में बंटवा दीजिए.

‘‘ध्यान रहे, उन परिवारों को, जिन के यहां मौतें हुई हैं, ये पोस्टर काफी तादाद में दें. गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को इन सब की 4-4 प्रतियां दी जाएं. इस में लापरवाही हुई, तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी.

‘‘चलिए, अब मालाएं रहने भी दीजिए, गरदन दुखने लगी है. सभा की जगह कहां है  वैसे भी हमें काफी देर हो गई है.’’

आखिर मंत्रीजी सभा की जगह पर पहुंचे. सभी छुटभैए नेता सरकार और मंत्रीजी की शान में तारीफ के पुल बांध रहे थे.

उस के बाद मंत्रीजी ने माइक संभाला, ‘‘भाइयो और बहनो, जब हमें यह पता चला कि इस गांव के कुछ लोग भूख से मरे हैं, तो हमें बेहद दुख हुआ. पर यहां आ कर मालूम हुआ है कि

वे भूख से नहीं, आम की जहरीली गुठली खा कर मरे हैं, तो हमें चैन आया. उन्हें आम की गुठली नहीं खानी चाहिए थी.

‘‘देखिए, देश के गोदाम अनाजों से भरे पड़े हैं. अनाज की कोई कमी नहीं है. अनाज गोदामों में पड़ापड़ा सड़ रहा है. यह मरने वालों की जल्दबाजी है. उन्हें हमारे इश्तिहार का इंतजार करना चाहिए था.

‘‘हम लोग टैलीविजन पर और अखबारों में जनता को समझाते हैं कि गंदा पानी नहीं पीना चाहिए और उलटासीधा भोजन नहीं करना चाहिए. कितनी बड़ी कंपनियां मिनरल वाटर और फास्ट फूड बना रही हैं. हमें उन का इस्तेमाल करना चाहिए. पर जो हो गया, सो हो गया.

‘‘हमें मरने वालों को ले कर गहरी हमदर्दी है. मैं अपने साथ ढेर सारे पोस्टर और अखबार लाया हूं, जिन में देश के बड़ेबड़े नेताओं के बयान और सरकारी इश्तिहार छपे हैं कि इस देश में अनाज की कोई कमी नहीं है.

‘‘आप लोगों तक शायद ये चीजें नहीं पहुंच पाती हैं, वरना आप लोग मरते नहीं. मेरा मतलब उन लोगों से है, जो मर गए हैं.

‘‘हमारे देश में ऐसे कई संतमहात्मा हुए हैं, जो महीनों तक कुछ नहीं खाते थे या घासपात चबा कर जिंदा रहते थे. आप भी उन्हीं संतों की संतान हैं. इस तरह भूख से मरना आप को शोभा नहीं देता. इस से देश बदनाम होता है. मरने के और भी कई रास्ते हैं. ‘‘मेरी आम जनता से अपील है कि वह भूख से न मरे, क्योंकि हमारे देश के गोदामों में अनाज भरा पड़ा है. ये इश्तिहार और पोस्टर इस बात के गवाह हैं. मुझे यकीन है कि सरकार की इस कार्यवाही से अब कोई भूखा नहीं मरेगा. ‘जय हिंद’.’’ भूखे लोगों के मुंह से धीरे से ‘जय हिंद’ निकला. कुछ दिनों बाद उस गांव में कुछ और लोग मर गए. उन के पोस्टमार्टम के बाद सरकार ने बयान दिया कि उन लोगों की मौत भूख से नहीं हुई, क्योंकि उन के पेट में ‘भूख से कोई नहीं मरेगा’ के इश्तिहारों और पोस्टरों की कतरनें मौजूद थीं.

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6 साल की उम्र में हुआ मेरा रेप : डेजी ईरानी

बौलीवुड एक ऐसी जगह है जहां जितनी चकाचौंध है उसके पीछे उतने ही घरे अंधेरे भी हैं. ऐसा नहीं है कि ये सब केवल आज से हो रहा है बल्कि आज से 60 साल पहले के हालात भी ऐसे ही थी और ये दावा हम नहीं कर रहे हैं बल्कि ये कहना है फिल्म इंडस्ट्री की ही एक जानी मानी अभिनेत्री का. अपने दौर के लगभग हर बड़े सुपरस्टार के साथ स्क्रीन स्पेस शेयर कर चुकीं डेजी ईरानी ने अपने कुछ पुराने बुरे वक्त के बारे में बात करते हुए एक इंटरव्यू में बेहद चौंकाने वाले खुलासे किए हैं.

6 साल की उम्र में हुआ था रेप

डेजी ईरानी ने मिड डे से बात करते हुए बताया कि महज 6 साल की उम्र में उनके साथ रेप हुआ था. उन्होंने बताया, ”वो शख्स कहने को तो मेरा मेंटर था. वो मुझे फिल्म ‘हम पंछी एक डाल के’ की शूटिंग के लिए अपने साथ मद्रास ले गया था. उसी दौरान एक रात होटल के कमरे में उसने मुझे प्रताड़ित किया और मेरी बैल्ट से पिटाई भी की. उसने मुझे धमकी दी कि अगर मैंने किसी को भी इसके बारे में बताया तो वो मुझे जान से मार देगा और मैंने उस पर यकीन करके कभी किसी को इसके बारे में नहीं बताया.”

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उन्होंने बताया ”वो शख्स अब जा चुका है और मर गया है. उसका नाम नजर था और उसके फेमस सिंगर जोहरा बाई अंबालावाली से संबंध थे. जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि फिल्म इंडस्ट्री में उसके अच्छे संबंध थे. मेरी मां मुझे हर हालात में स्टार बनाना चाहती थी. मैंने मराठी फिल्म बेबी से एक्टिंग में डेब्यू किया था. इसलिए नजीर अंकल मुझे अपने साथ मद्रास ले गए थे. मुझे साफ तौर पर तो सब याद नहीं लेकिन कुछ-कुछ क्षण मुझे याद आते हैं. लेकिन एक चीज मैं अभी तक नहीं भूली और वो है वो जानलेवा दर्द और उस शख्स का चेहरा जब वो मुझे बेल्ट से मारता था. ”

कास्टिंग काउच का भी हुईं शिकार

डेजी ने अपने साथ हुई शारीरिक हिंसा और प्रताड़ना के बाद फिल्म इंडस्ट्री में होने वाले कास्टिंग काउच के बारे में भी खुलकर बात की. उन्होंने बताया ‘मैं जब 15 साल की थी. मेरी मां ने मुझे साड़ी पहनने के लिए कहा और मुझे प्रोड्यूसर मल्लिकचंद कोचर के साथ जो कि एक फिल्म बनाने की तैयारी में थे, मुझे औफिस में उनके साथ अकेला छोड़ दिया. उस वक्त उस निर्माता का दफ्तर मराठा मंदिर के पास कहीं मौजूद था. ये सब बेहद अजीब है. उस दौरान वो मेरे पास सोफे पर आकर बैठ गया और मुझे छूने लगा. मैं जानती थी वो मुझसे क्या चाहता था और उसके दिमाग में क्या चल रहा था. मैंने तुरंत अपने नए स्पंज उतारकर उसके हाथ में दे दिए.”

जीनत अमान ने कारोबारी के खिलाफ दर्ज कराया रेप का केस

मुंबई में बौलीवुड की पूर्व अभिनेत्री जीनत अमान ने एक व्‍यापारी के खिलाफ बलात्‍कार का मामला दर्ज कराया है. मुंबई के जुहू पुलिस स्टेशन पर केस दर्ज किए जाने के बाद मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया, और पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है.

याद दिला दें कि पुराने जमाने की इस मशहूर फिल्‍म अभिनेत्री ने एक महीने पहले भी इसी कारोबारी पर उनका पीछा करने और उन्हें धमकाने के आरोप लगाये थे. जिसके बाद सरफराज उर्फ अमन खन्ना नामक आरोपी कारोबारी को मुंबई पुलिस ने फरवरी में हिरासत में लिया था. पुलिस ने सरफराज के खिलाफ पीछा करने 354 (D) और महिला को सरेआम धमकाने के खिलाफ 509 आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था.

इस अभिनेत्री ने जुहू थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि सरफराज उर्फ अमन खन्ना नामक एक कारोबारी उनके घर आया और उनके गार्ड के साथ बदतमीजी और मारपीट की. उसने उन्हें भी नतीजा भुगतने की धमकी दी. अभिनेत्री ने यह भी आरोप लगाया है कि सरफराज उन्हें पिछले कुछ दिनों से व्हाट्सएप पर अश्लील मैसेज भेज रहा था. जिससे वह काफी परेशान थीं.

बता दें कि अमन खन्ना कई तरह के कारोबार करता है. वह फिल्म मेकिंग और रियल स्टेट के कारोबार में सक्रिय है. साथ ही उसे मानसिक रूप से भी परेशान बताया जा रहा है. उसके खिलाफ मुंबई के बांगुर नगर में भी कई आपराधिक मामले दर्ज हैं.

फलफूल रही है विरासत की राजनीति

भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में राजनीति अब पुश्तैनी पेशा बन गई है. जो भी राजनीति में एक बार सफल हो जाता है वह अपने बच्चों को अन्य व्यवसाय में भेजने के बजाय राजनीति में ही भेजना पंसद करता है. भारत में गांधी परिवार, सिंधिया परिवार, मुलायम परिवार, लालू यादव परिवार, हेमवती नंदन बहुगुणा परिवार, बाल ठाकरे परिवार, देवीलाल परिवार, बादल परिवार और करुणानिधि परिवार जैसे बहुत सारे उदाहरण भरे पड़े हैं. विश्वस्तर पर देखें तो अमेरिका, श्रीलंका, क्यूबा, उत्तर कोरिया, सिंगापुर, बंगलादेश और पाकिस्तान तक तमाम देशों में राजनीति अब विरासत की बात हो गई है. इस के अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण हैं.

भारत में नेहरू-गांधी परिवार की आलोचना कर राजनीति की शुरुआत करने वाले दल खुद भी परिवारवाद में डूब गए. भाजपा जैसे दल, जो परिवारवाद की आलोचना करते थे, अब वे भी परिवारवाद के शिकार हो गए हैं.

विदेशों में भी विरासत की सियासत बहुत पुरानी है. अमेरिका में बहुत पहले ही जस्टिन और एडम्स के परिवार राजनीति में एक के बाद एक कर के आगे बढ़े. इस के बाद वहां पर ही कैनेडी और क्ंिलटन परिवार इस विरासत को आगे बढ़ाने में लग गए. ये परिवार तो ऐसे हैं जिन के लोग राजनीति में आगे बढ़े और सब से बड़े पदों पर बैठे नजर आते हैं.

अमेरिका में बहुत सारे ऐसे परिवार भी हैं जिन के बच्चे सीनेट तक पहुंचे हैं. अमेरिका का एक सर्वे बताता है कि एक सामान्य बच्चे के मुकाबले नेताओं के बच्चों में सीनेटर बनने की संभावना 6,000 गुना अधिक होती है. अमेरिका के अलावा दूसरे देशों में भी हालत वैसी ही है. यही वजह है कि नेताओं के बच्चे तेजी से इस दिशा में अपना कैरियर बनाने में लगे हैं. पाकिस्तान में नवाज शरीफ परिवार और भुट्टो परिवार लोकतंत्र के समर्थक जरूर रहे हैं पर वहां भी लोकतंत्र की आड़ में परिवारवाद खूब फलफूल रहा है.

भारत के पड़ोसी मुल्क बंगलादेश और श्रीलंका में भी विरासत की सियासत का रंग देखने को मिलता है. शेख हसीना और खालिदा जिया ने बंगलादेश में परिवारवाद को बढ़ावा दिया. श्रीलंका में भंडरनायके, रणतुंगा परिवार राजनीति की मुख्यधारा में हैं. पूरी दुनिया में ऐसे देशों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है जहां लोकतंत्र में परिवारवाद पनप रहा है. इस की अपनी कुछ मूल वजहें भी हैं.

आज के समय में चुनाव लड़ना सरल नहीं है. एक बार जो नेता अपने को स्थापित कर लेता है वह ब्रैंड बन जाता है. उस के ब्रैंड के सहारे पूरा परिवार आगे बढ़ता है. ऐसे परिवार में पैदा होने वाले लोगों को जनता स्वत: राजा मान लेती है. उन के पास पैसा और चुनाव लड़ने की समझ होती है. इस के प्रभाव को ले कर पूरी दुनिया में अलगअलग तरह के विचार हैं. कुछ लोग इस को लोकतंत्र के लिए सही मानते हैं, कुछ लोग इस को खतरा मानते हैं. दोनों विचारधाराओं के बीच परिवारवाद पूरी तरह से आगे बढ़ रहा है.

परिवारवाद की नई पौधशाला

देश में नेहरूगांधी और मुलायम परिवार की परिपाटी अब हर नेता के लिए नजीर का काम कर रही है. उत्तर प्रदेश में मुलायम परिवार की सदस्य अपर्णा यादव और अनुराग यादव राजधानी लखनऊ से चुनाव मैदान में उतरे. मुलायम परिवार पहली बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने मजबूत गढ़ से बाहर निकल कर चुनाव मैदान में उतरा पर हार का सामना करना पड़ा.

चुनाव दर चुनाव राजनीति में परिवारवाद बढ़ता जा रहा है. परिवारवाद की यह बीमारी किसी एक दल की बीमारी नहीं रह गई है. हर दल इस हमाम में एक ही हालत में है. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में बड़ी संख्या में परिवारवाद के उदाहरण दिखे. सब से बड़ी बात यह है कि 30 साल से नीचे के करीब आधा दर्जन युवा परिवारवाद के सहारे चुनाव मैदान में रहे.

परिवारवाद का विरोध करने वाली भाजपा के तमाम लोग चुनाव जीते. आजम खां-अब्दुल्ला खां, मुख्तार अंसारी-अब्बास अंसारी और स्वामी प्रसाद मौर्य-उत्कृष्ट मौर्य के रूप में 3 जोडि़यां ऐसी हैं जिन में पितापुत्र दोनों ने एकसाथ अलगअलग विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा. परिवारवाद के रूप में ज्यादातर नेताओं ने अपने बेटों को अपना उत्तराधिकारी बनाया है. जहां बेटे नहीं, वहां बेटियों को आगे लाया जा रहा है.

अब तक परिवारवाद के नाम पर भाईभतीजे ही चुनाव लड़ते थे. अब यह दायरा भी सिमटता जा रहा है. नेताओं को अब अपने परिवार के लोग नहीं, बल्कि करीबी लोग उत्तराधिकार के लिए चाहिए. इस में पत्नी, बेटा और बेटी सब से बड़ी चाहत बन गई हैं. पहले यह परेशानी ऊंची जातियों के लोगों में दिखती थी. अब दलित और पिछड़ी जातियों में भी यही बीमारी पनपने लगी है. बड़ी संख्या में दलित और पिछड़े नेता अपने लोगों को राजनीति में ला रहे हैं.

युवाओं ने संभाली कमान

रायबरेली जिले की रहने वाली अदिति सिंह ने अपने पिता अखिलेश सिंह की पारंपरिक सीट रायबरेली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. अदिति ने अमेरिका से एमबीए की डिगरी हासिल की है.

पिता की बीमारी के बाद वे उन की विरासत को संभालने का काम कर रही हैं. राजनीति में उतरने से पहले वे लंदन के एक फैशन हाउस में काम कर रही थीं. उन्होंने अपना जौब छोड़ कांग्रेस के टिकट पर रायबरेली की सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा. अदिति रायबरेली जिले के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए काम करना चाहती हैं. जिस चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता चुनाव हारे उस चुनाव में अदिति ने जीत कर दिखा दिया कि युवाओं में कितना दम है.

अब्दुल्ला खान सपा के नेता आजम खान के बेटे हैं. वे रामपुर की स्वार-टांडा विधानसभा सीट से चुनाव जीत कर विधायक बने. आजम खान रामपुर से विधानसभा का चुनाव लड़े और जीत हासिल की. पितापुत्र की जोड़ी ने एकसाथ चुनाव मैदान में जीत हासिल की.

अब्दुल्ला के पास एमटेक की डिगरी है. 27 साल के अब्दुल्ला अपने पिता द्वारा बनाई गई जौहर यूनिवर्सिटी के सीईओ हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में जब चुनाव आयोग ने आजम के चुनावप्रचार करने पर बैन लगा दिया था तब अब्दुल्ला ने अकेले ही चुनावप्रचार किया था.

अब्बास अंसारी बाहुबली मुख्तार अंसारी के बेटे हैं. वे नैशनल स्तर के शूटर हैं. घोसी विधानसभा सीट से वे चुनाव लड़े और हार गए.

प्रतीक भूषण सिंह गोंडा सदर सीट से चुनाव मैदान में थे और जीत हासिल की. वे बलरामपुर से सांसद बृजभूषण के बेटे हैं. प्रतीक ने मेलबर्न से एमबीए किया है. वे रेसलर बनना चाहते थे, लेकिन घर का माहौल पौलीटिकल था. उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने पिता बृजभूषण के लिए प्रचार किया था.

नितिन अग्रवाल हरदोई से सपा के नेता नरेश अग्रवाल के बेटे हैं. 34 साल के नितिन ने 2004 में पुणे से एमबीए की डिगरी हासिल की. 2012 से वे राजनीति में सक्रिय हैं. 2012 में वे पहली बार विधायक बने. नितिन ने पुणे के सिंबोएसिस इंस्टिट्यूट से एमबीए किया है. अखिलेश सरकार में नितिन मंत्री रहे.

पंकज सिंह भाजपा के प्रमुख नेता व केंद्रीय गृहमंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे हैं. 30 साल के पंकज ने एमिटी यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है. पंकज 2002 से राजनीति में सक्रिय हैं. पार्टी में वे अलगअलग पदों पर रहे हैं. पहली बार वे विधायक बने, उन्होंने नोएडा विधानसभा क्षेत्र से जीत हासिल की.

भाजपा के दूसरे प्रमुख नेता उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के पोते संदीप सिंह भी पहली बार चुनाव जीत कर विधायक बने. संदीप के पिता राजवीर सिंह एटा से सांसद हैं. संदीप ने लंदन की लीड्स बैकेट यूनिवर्सिटी से एमए किया है. वे अपने दादा कल्याण की पारंपरिक सीट से चुनाव लड़े. 26 साल के संदीप कल्याण सिंह की तीसरी पीढ़ी के सदस्य हैं. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में वे मंत्री बने.

तनुज पुनिया कांग्रेस के सांसद पी एल पुनिया के बेटे हैं. वे बाराबंकी की जैदपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े और हार गए. तनुज ने आईआईटी रुड़की से कैमिकल इंजीनियरिंग की डिगरी हासिल की है. 32 साल के तनुज का सपना आईएएस बनने का था. लेकिन तनुज के पिता पी एल पुनिया चाहते थे कि वह राजनीति में आए, इस कारण वे राजनीति में आ गए.

उत्कृष्ट मौर्य ऊंचाहार सीट से चुनाव लड़े और हार गए. वे बसपा के नेता रहे स्वामी प्रसाद मौर्य के बेटे हैं जो अब भाजपा में हैं. 31 साल के उत्कृष्ट ने कानपुर के छत्रपति साहूजी महाराज विश्वविद्यालय से 2016 में बीए किया है.

सकते में कर्मठ कार्यकर्ता

जिस तरह से बड़ी संख्या में नेता अपने परिवार के लोगों को राजनीति में ला रहे हैं, वह कर्मठ कार्यकर्ताओं के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. अपने परिवार के लोगों को स्थापित करने के लिए नेताओं को अपनी विचारधारा को छोड़ने में भी कोई एतराज नहीं रह गया है. अब परिवार के लोगों को मनचाहा टिकट न मिलने से नेता अपने दल को छोड़ कर दूसरे दल में शामिल हो रहे हैं. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में दलबदल कोई मुद्दा नहीं रह गया. हर दल ने दूसरे दलों के लोगों को बखूबी टिकट दिया.

जनता के लिए भी दलबदल और परिवारवाद कोई मुद्दा नहीं रह गया. अभी भी चुनाव का मुख्य मुद्दा जाति और धर्म ही है. जनता को जातिधर्म में उलझा कर नेता राजनीति को कुछ परिवारों तक समेट कर रख देने के पक्ष में लामबंद हैं. बड़े नेता अपने परिवार के लोगों को संसद और विधानसभा ले जाने के प्रयास में रहते हैं, छोटे कार्यकर्ताओं के परिवार को पंचायत और पार्षद चुनावों में मौके दे कर उन की जबान को बंद कर दिया जाता है.

सफल है विरासत की राजनीति

असल में राजनीति अब पहले की तरह सरल नहीं रह गई है. यहां धनबल और बाहुबल दोनों जरूरी हो गया है. दूसरे कैरियर के मुकाबले यहां उतारचढ़ाव थोड़ा ज्यादा हो सकता है पर मुनाफा दूसरे कैरियर के मुकाबले बहुत ज्यादा है. नेता हार कर भी नेता बना रहता है. अगर कोई किसी घोटाले या अपराध में फंस भी जाए तो भी राजनीति नेताओं के बच्चों को मरने नहीं देती. उन को सहारा दे कर मुख्यधारा में ले आती है. नेताओं के बच्चों को छोटेमोटे पद हर दल की सरकार में मिल जाते हैं. पूरे देश की विधानसभाओं में ऐसी बहुत सारी कमेटियां बनी हैं जिन में ये सदस्य बन जाते हैं, बैंकों में चेयरमैन बन जाते हैं, सार्वजनिक उपक्रमों में चेयरमैन हो जाते हैं. हजारों रास्ते ऐसे हैं जहां मुख्यधारा से कम लाभ नहीं है.

उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में मुलायम परिवार की बात करें तो गांव के प्रधान से ले कर मुख्यमंत्री तक उन के परिवार के लोग कहीं न कहीं किसी न किसी पद पर बैठे हैं हालांकि मुख्यमंत्री पद अब इस परिवार के पास नहीं है. विरोधी दल के नेता भी नेताओं के परिवार पर मेहरबान होते हैं. क्योंकि उन का आपस में मिलनाजुलना होता है. उन की दुश्मनी केवल वोट मांगने के समय होती है. तमाम ऐसे नेता हैं जिन के काम विरोधी नेताओं के समय में भी असरदार तरीके से होते हैं.

राजनीति को सेवा की परिभाषा से अलग करने की जरूरत है. यह अब एक तरह का पेशा बन गया है. पार्टी चलाने के लिए पैसे की जरूरत उसी तरह से होती है जिस तरह से फैक्टरी चलाने के लिए होती है. यह भूल जाना चाहिए कि बिना पैसा लिए कोई जनता के लिए काम करेगा. केवल पार्टी की ही बात नहीं है, अगर कोई स्वयंसेवी संस्था भी चलाता है तो उस को भी संचालक से ले कर चपरासी तक का खर्च उठाना ही पड़ता है. पार्टियां भी अपने काम करने वालों को वेतन देती हैं. ऐसे में हर नेता को अच्छाखासा पैसा चाहिए. पार्टी के साथ कुछ पैसा नेता अपने व परिवार के लिए भी बचा कर रखना चाहता है, जिस से खराब समय में, जब वह सत्ता में न रहे, उस को भूखों न मरना पड़े.

पूरी दुनिया में राजनीति अब एक कैरियर की तरह हो गई है. यह सच है कि नेताओं के बच्चों के सफल होने की संभावना हजारगुना अधिक होती है पर कई बार मेहनत करने वाले और अवसर का लाभ उठाने वाले दूसरे लोग भी सफल हो जाते हैं.

यह कैरियर उसी तरह से मुश्किलभरा है जैसे एमबीए, डाक्टर या इंजीनियर बनना. इस में बुद्धि के साथ शरीर का बल भी ज्यादा चाहिए. सैकड़ों लोगों से मिलना, उन को याद रखना, उन की खुशी के लिए उन के जैसा व्यवहार करना सीखना सरल नहीं होता है. इस के अलावा झगड़े कराने से ले कर निबटाने की कला, वाकपटु होना, भाषण देना आना चाहिए. राजनीति नेता के परिवार के लोग करें या आम परिवारों के, ध्यान रखने वाली बात यह है कि समाज को सही दिशा देने का काम करें. सही नेता ही समाज को नई दिशा देते हैं, सही नेता ही सरकार को मनमानी करने से रोकते हैं, तो कभी वे सरकार भी चलाते हैं.

आखिर बलात्कारी मानसिकता कैसे खत्म हो

16 दिसंबर, 2012 की रात दिल्ली में 23 वर्षीय पैरामैडिकल की छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था, जिस के फलस्वरूप अधिकांश जनमानस आंदोलित हो उठा था. लेकिन उस के बाद भी मासूम बच्चियों से ले कर प्रौढ़ों तक कई सामूहिक बलात्कार की घटनाएं घटीं. इस बात पर कोई विचार नहीं किया जा रहा है कि आखिर बलात्कारियों की संख्या क्यों बढ़ रही है? ऐसे कौन से कारण हैं जिन से कोई किशोर या प्रौढ़ अपनी मानमर्यादा व आचारविचार छोड़ कर दुष्कर्म जैसा कुकृत्य कर बैठता है? इस का मुख्य कारण केवल कामवासना है या महिलाओं के खिलाफ आक्रोश की अभिव्यक्ति?

खुलापन और आधुनिकता इस अंध यौन लिप्सा के सामने असहाय क्यों हैं? पहले किशोरकिशारियों के आपस में न मिल पाने को दोष दिया जाता था, तो अब कहा जा रहा है कि युवतियां बिंदास व उन्मुक्त हो रही हैं तथा युवाओं से अधिक घुलमिल रही हैं, जिस कारण वे कभी रेप तो कभी गैंगरेप या फिर कभी अपने ही किसी रिश्तेदार की शिकार हो जाती हैं.

नैशनल इलैक्शन वाच और एसोसिएशन फौर डैमोक्रेटिक रिफौर्म की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 5 साल में देश के विभिन्न राजनीतिक दलों ने 260 ऐसे उम्मीदवारों को अपनी पार्टियों से चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिए जिन पर दुष्कर्म व महिला उत्पीड़न जैसे संगीन आरोप थे. इन प्रमुख राजनीतिक दलों में कांग्रेस सब से आगे है, उस ने 26 बलात्कारियों को टिकट दिया है. इस के बाद भाजपा ने 24 को, बसपा ने 18 को और सपा ने 16 आरोपियों को टिकट दिया.

बढ़ती हताशा और हमारी सोच

केंद्र और राज्य सरकारों के पास वर्तमान युवापीढ़ी को शिक्षित करने के लिए न तो कोई योजना है और न ही सामाजिक संस्कार व रोजगार देने की कोई व्यवस्था. कुछ लोग आधुनिकता को कोस रहे हैं जोकि हकीकत से कोसों दूर है, क्योंकि बलात्कार अनादिकाल से अस्तित्व में है.

बदलती प्रवृत्ति

लिव इन रिलेशनशिप व समलैंगिकता को अपराधमुक्त किया जाना भी इस का एक कारण है. जो लोग यह सवाल उठाते हैं कि दबीढकी महिलाओं के साथ बलात्कार क्यों होते हैं, तो उन्हें सैक्स सर्वे पर गौर करना चाहिए, जिन में बताया जाता है कि कुछ पुरुषों को महिलाओं का उन्नत सीना आकर्षित करता है तो कुछ को उन के हिप्स आकर्षित करते हैं. यहां तक कि कुछ पुरुष तो किसी महिला की चाल पर ही फिदा हो जाते हैं.

परपीड़न की प्रवृत्ति भी एक कारण है. इस प्रवृत्ति के लोग, दूसरों को कष्ट पहुंचा कर खुद आनंदित होते हैं. अभी तक घटी सामूहिक दुष्कर्म की घटनाओं में इस प्रवृत्ति की स्पष्ट झलक मिलती है. नशे की बढ़ती प्रवृत्ति भी एक कारण है. नशे का आदी मानव अपना आपा खो बैठता है तथा उस की यौन उत्तेजना में बढ़ोतरी हो जाती है. वर्तमान में किशोर तो किशोर किशोरियां भी जाम से जाम टकरा रही हैं.

महिलाओं में बढ़ती जागरूकता

महिलाओं के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘जागोरी’ का कहना है कि चूंकि अब भारतीय महिलाओं में जागृति आ रही है और वे यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठा रही हैं इसलिए कुछ परंपरागत मर्द इसे पचा नहीं पा रहे हैं, इसलिए वे इन साहसी महिलाओं को सबक सिखाने के लिए बर्बर तरीके अपना रहे हैं.

भारत की निर्वाचित सरकारें केवल आर्थिक बदलाव लाना चाहती हैं. स्वतंत्रता के बाद हमारे देश में विदेशी पूंजी के साथ ही वहां की विकृत संस्कृति भी आ धमकी है, जिस के चलते हमारी दमित इच्छाएं सामने आने लगी हैं तथा हमारे मनोविकार भी बढ़ते चले जा रहे हैं. हम अपने परंपरागत नैतिक मूल्यों व समृद्ध संस्कृति को ले कर बहुत ही आत्ममुग्ध हैं, जबकि हमारी सांस्कृतिक परंपराएं अब केवल सांस्कृतिक समारोहों और साहित्य तक ही सीमित रह गई हैं, जोकि आज के इंटरनैट के युग में बहुत पिछड़ी मानी जाती हैं. जिस कारण आज का युवक गलत आचरण करने से भी नहीं हिचकता.

लचर कानून व्यवस्था व संसाधनों का अभाव

शासनप्रशासन की लचर कानून व्यवस्था, रात को प्रकाश का उचित प्रबंध न होना तथा बिजली की कमी, सार्वजनिक परिवहन का उचित प्रबंध न होना, सड़कों का उचित रखरखाव न होना, चिकित्सा सुविधाओं और शिक्षण संस्थाओं का अभाव भी इस के मुख्य कारण हैं.

शहरी गरीबों में बढ़ती हताशा और लंपटपन के कारण उन में असंवेदनशीलता भी बढ़ रही है, जिस कारण वे अपने जैसी ही किसी गरीब या कामकाजी युवती के साथ बलात्कार या दूसरी तरह की हिंसा करते वक्त शर्मशार नहीं होते.

वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा. अरुणा ब्रूटा मानती हैं कि शहरों में जिस तरह से आर्थिक असमानता बढ़ रही है, उस से भी आम लोगों में कुंठा बढ़ रही है. शहरी पुरुष वर्ग ज्यादा आक्रामक और हिंसक हो गया है. सदियों से पुरुष महिलाओं का शोषण करता आया है. उन्हें भोग की वस्तु माना जाता है. पुरुषों के इस नजरिए के चलते भी महिलाओं से बलात्कार के मामले होते हैं.

अब युवतियां बड़ी संख्या में घरपरिवार से बाहर निकल कर कामकाजी दुनिया में अपनी पैठ मजबूत कर रही हैं. ऐसे में पहले से ही कुंठित युवाओं में युवतियों के प्रति जलन का भाव भी बढ़ रहा है. इसलिए वे मौका मिलते ही युवतियों को कमतर साबित करने की कोशिश करते हैं. कईर् बार इस की परिणति बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के रूप में होती है.

मीडिया

हमारे देश का चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलैक्ट्रौनिक, सभी जगह उत्तेजक दृश्य व अन्य सामग्री की कोईर् कमी नहीं है. विज्ञापन चाहे किसी भी वस्तु का हो, लेकिन उस में नारी की कामुक अदाएं व उस के अधिक से अधिक शरीर को दिखाने पर जोर रहता है. फुटपाथ पर अश्लील साहित्य व ब्लू फिल्मों की सीडी, डीवीडी आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं. बाकी कसर मोबाइल व इंटरनैट ने पूरी कर दी है. जहां प्रतिदिन हजारों नाबालिग अश्लील सामग्री का अवलोकन करते हैं.

भारतीय सिनेमा में बलात्कार के दृश्यों को बहुत ही ग्लैमराइज तरीके से तथा बढ़ाचढ़ा कर दिखाया जाता है. कुछ युवा इन फिल्मी दृश्यों से प्रेरणा ले कर बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं.

यौन शिक्षा का अभाव

यह एक शाश्वत सत्य है कि मानव जीवन की एक बुनियादी आवश्यकता है सैक्स. समाज ने इस के लिए विवाह के रूप में एक उचित व्यवस्था की है. विवाह के बाद स्त्री व पुरुष दोनों ही अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं, लेकिन वर्तमान में हमारे समाज में युवाओं के मुकाबले युवतियों की संख्या दिन पर दिन कम होती जा रही है. कुछ युवतियां व युवक शादी के बंधन में बंधना ही नहीं चाहते. वे शिक्षा व रोजगार में स्थायित्व पाने के फेर में भी अपनी सैक्स जैसी बुनियादी आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाते.

घटिया शिक्षा पद्धति की वजह से अल्प मानसिक विकास के कारण भी कई युवा ड्रग्स, शराब और ग्लैमर के नशे में बलात्कार को रोमांच का हिस्सा मान लेते हैं. असामान्य यौन प्रवृत्ति के युवक, युवतियों के विरुद्ध हिंसा करने लगते हैं.

बलात्कारी का व्यवहार

दिल्ली की स्वयंसेवी संस्था ‘स्वचेतन’ द्वारा पिछले 5 साल में जेल में बंद 242 बलात्कारियों का अध्ययन किया गया. ज्यादातर बलात्कारी पकड़े जाने से पूर्व बलात्कार कर चुके थे और इन सभी के मन में महिलाओं के प्रति गहरी नफरत थी. वे महिलाओं के प्रति अपमानजनक और अश्लील गालियों का प्रयोग करते थे तथा इन में अपने शिकार पर यौन फंतासियां आजमाने की कभी न मिटने वाली भूख थी.

आंकड़ों की जबानी

पिछले 40 वर्षों में दुष्कर्म की घटनाएं 873.3% बढ़ी हैं तथा पीडि़त महिलाओं में आधी से अधिक की उम्र 18 से 30 साल के बीच होती है. 1971 में दुष्कर्मियों को सजा देने की दर 41% थी वहीं 2014 में यह दर घट कर मात्र 24.7% रह गई.

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2011 में महिलाओं के साथ हुए अपराधों का विवरण इस प्रकार है : बलात्कार 24,206, उत्पीड़न 42,968, यौन शोषण 8,570 तथा घरेलू हिंसा के 99,135 मामले प्रकाश में आए, जबकि केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में 2009 से 2011 के बीच बलात्कार के 67 हजार से अधिक मामले दर्ज हुए. इन में से केवल 26% मामलों का ही निष्कर्ष निकल पाया.

वर्ष 2011 में बलात्कार की 26,206 घटनाएं हुईं, जिन में मात्र 26.4% को सजा हुई. छेड़छाड़ की 35,565 घटनाओं में से 25% को सजा हुई. शारीरिक शोषण के 42,968 मामलों में से केवल 27% को सजा हुई जबकि वर्ष 2011 में औरतों के साथ हर 26वें मिनट में छेड़छाड़, हर 34वें मिनट में बलात्कार, हर 42वें मिनट में अपहरण और हर 93वें मिनट में औरत की हत्या की गई. 2011 में औरत विरोधी अपराधों में 2010 के मुकाबले 20% की वृद्धि हुई है.

यदि 21वीं सदी के पहले दशक के शुरूव अंत की तुलना करें तो भी स्थिति काफी गंभीर है.

समाधान

 नारी को वह सम्मान देना होगा जिस की वह हकदार है और यह तभी होगा जब हम युवाओं के मन में यह कूटकूट कर भर दें कि एक आदर्श समाज निर्माण के लिए महिलाओं का सम्मान करना अति आवश्यक है. इस के लिए स्कूलों में नैतिक शिक्षा को लागू करना होगा. इस के लिए यह भी आवश्यक है कि उन्हें अच्छा साहित्य पढ़ने को मिले.

–  टीवी चैनलों पर अच्छे कार्यक्रम दिखाए जाएं जिस से युवाओं की नकारात्मक सोच में बदलाव हो.

– खेलकूद से भी बुरी प्रवृत्तियों का शमन किया जा सकता है. इस के बाद भी अगर कोई बलात्कार करता है तो बलात्कारी का अंगोच्छेद कर देना या रासायनिक विधि से उसे हमेशा के लिए नपुंसक बना देना चाहिए. शोहरत व दौलत के बल पर जो लोग कानून का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं उन्हें हर हाल में रोकना होगा. राजनीति में बढ़ती चरित्रहीनता व अपराधीकरण को रोकना होगा.

– बलात्कारी मनोवृत्ति के फैलाव को रोकने के लिए नैतिक शिक्षा का विस्तार व सामाजिक मूल्यों का विकास अति आवश्यक है. सामाजिक मूल्यों के विकास में लोक संस्कृति, इतिहास तथा साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए इन को बढ़ावा देना भी जरूरी है.

बेटी के नाम पर कलंक है हरमीत कौर

पंजाब के जिला गुरदासपुर के कस्बाथाना धारीवाल के रहने वाले जाट सरदार पलविंदर सिंह के परिवार में पत्नी परमजीत कौर के अलावा 20 साल की बेटी हरमीत कौर थी. वह पंजाब पुलिस में हवलदार थे और इन दिनों पीएसी की 75वीं बटालियन की ओर से धार्मिक गुरु बाबा भनियार वाले की सुरक्षा में तैनात थे. वह शरीफ, ईमानदार और जांबाज सिपाही थे. पलविंदर सिंह एक जिम्मेदार पिता और पति ही नहीं, समाजसेवक भी थे. उन्होंने कई रक्तदान कैंप अपने खर्चे पर लगवाए थे और जरूरतमंद लोगों के लिए सैकड़ों यूनिट खून जमा करा कर प्रशासन को दिया था. बाबा भनियार वाले की सुरक्षा में तैनाती के बाद से वह काफी व्यस्त हो गए थे. वह महीने, डेढ़ महीने में ही घर आ पाते थे.

28 अगस्त, 2016 को वह 4 दिनों की छुट्टी ले कर घर आए थे. सोमवार की रात को खाना खा कर वह आंगन में ही चारपाई डाल कर सो गए थे, जबकि पत्नी और बेटी अपनेअपने कमरों में जा कर सो गई थीं. रात करीब 2 बजे कमरे में सो रही परमजीत कौर को आंगन में सो रहे पति के कराहने की आवाज सुनाई दी तो वह कमरे से निकल कर पति के पास आ गई. उस समय पलविंदर सिंह तड़पते हुए छाती को जोरजोर से मसल रहे थे.

परमजीत कौर को लगा कि पति को हार्ट अटैक आया है, वह भी उन के सीने को सहलाने लगी. तभी उन्होंने देखा कि पति के नाक और मुंह से खून निकल रहा है. यह देख कर वह घबरा गईं और जल्दी से जा कर पड़ोस में रहने वाले जेठ मंगल सिंह को बुला लाई. पत्नी के साथ वह तुरंत आ गए. लेकिन जब वह आए तो पलविंदर एकदम शांति से बिस्तर पर लेटे थे. उन्होंने उन्हें हिलाडुला कर भी देखा. ऐसा लगा, जैसे उन में जान ही नहीं है. अब तक मंगल सिंह का बेटा और पलविंदर की बेटी हरमीत कौर भी वहां आ गई थी.

पलविंदर को उठा कर गाड़ी में डाल कर गुरदासपुर के सिविल अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने चैकअप कर के उन्हें मृत घोषित कर दिया. घर वालों ने बताया था कि यह मौत हार्ट अटैक से हुई है, लेकिन चैकअप करने वालों डाक्टरों को यह मौत हार्ट अटैक से नहीं लगी तो उन्होंने इस की सूचना थाना धारीवाल पुलिस को दे दी. सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर कुलवंत सिंह अधीनस्थों के साथ सिविल अस्पताल पहुंच गए थे.

पलविंदर की लाश कब्जे में ले कर कुलवंत सिंह ने परमजीत कौर से पूछताछ की तो उन्होंने उन से भी बताया कि रात में सोने के दौरान उन की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी. इस के बाद कुलवंत सिंह ने सीआरपीसी की धारा 174 के तहत काररवाई करते हुए मौत की पुष्टि के लिए लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी में रखवा दिया.

पर परमजीत कौर का कहना था कि उस के पति की मौत हार्ट अटैक से हुई है तो पोस्टमार्टम कराने की क्या जरूरत है, अंतिम संस्कार के लिए लाश उन के हवाले कर दी जाए. इस बात को ले कर परमजीत कौर और हरमीत कौर ने अस्पताल में अच्छाखासा हंगामा भी किया, लेकिन कुलवंत सिंह ने यह कह कर उन्हें शांत करा दिया कि सच्चाई का पता लगाने के लिए यह जरूरी है. यह 30 अगस्त, 2016 की बात है.

सिविल अस्पताल के डाक्टरों ने एक पैनल बना कर उसी दिन पलविंदर सिंह की लाश का पोस्टमार्टम कर के रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी, जो काफी चौंकाने वाली थी. रिपोर्ट के अनुसार मृतक का गला किसी तेजधार हथियार से काटा गया था. श्वांस नली कटने से पलविंदर की मौत हुई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कुलवंत सिंह को यह मामला काफी संदिग्ध लगा. उन्हें परमजीत का बयान रहस्यमय लगने लगा, इसलिए उन्होंने तुरंत एएसआई जसबीर सिंह और हैडकांस्टेबल गुरमुख सिंह को मृतक पलविंदर सिंह के घर भेज कर घटनास्थल को सील करा दिया, जिस से घटनास्थल पर किसी चीज से छेड़छाड़ न की जा सके. इस के बाद उन्होंने इस घटना की सूचना अपने अधिकारियों को दे दी थी.

चूंकि मामला विभाग के एक पुलिसकर्मी की रहस्यमयी मौत का था,इसलिए सूचना मिलते ही एसएसपी जगदीप सिंह, एसपी प्रदीप मलिक, डीएसपी ए.डी. सिंह मृतक पलविंदर सिंह के घर पहुंच गए थे. क्राइम टीम, डौग स्क्वायड को भी बुलवा लिया गया था.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया तो उन्हें यह मामला हत्या का लगा. क्योंकि पलविंदर सिंह जिस बिस्तर पर सोए थे, वह खून से तर था. नाक और कान से इतना खून नहीं निकल सकता था.

एसएसपी जगदीप सिंह के आदेश पर थाना धारीवाल पुलिस ने पलविंदर सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. कुलवंत सिंह को लगा था कि परमजीत कौर को या तो कुछ पता नहीं है या फिर वह झूठ बोल रही है. क्योंकि हार्ट अटैक से हुई मौत और हत्या में जमीनआसमान का फर्क होता है.

उन्होंने एएसआई जसबीर सिंह, विजय कुमार, हैडकांस्टेबल ओंकार सिंह, गुरमुख सिंह, कुलविंदर सिंह, कांस्टेबल मंजीत को मिला कर एक टीम बनाई और उसे सच्चाई का पता लगाने के लिए लगा दिया. पड़ोसियों से की गई पूछताछ में कुलवंत सिंह को पता चला कि पलविंदर सिंह की बेटी हरमीत कौर से किसी बात को ले कर अकसर कहासुनी होती रहती थी.

ऐसी ही एक हैरान करने वाली जानकारी यह भी मिली कि हरमीत कौर का किसी लड़के से प्रेमसंबंध चल रहा था और वह उस से शादी करना चाहती थी. जबकि पलविंदर सिंह इस शादी के लिए राजी नहीं थे, लेकिन उन की पत्नी परमजीत कौर राजी थी. इसी बात को ले कर अकसर घर में झगड़ा होता रहता था.

कुलवंत सिंह ने इस बात को ध्यान में रख कर जांच शुरू की. महिला सिपाही सुरजीत कौर ने हरमीत कौर से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि अपने प्रेमी के साथ मिल कर उसी ने वासनापूर्ति के लिए जिस बाप ने अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया, पढ़ालिखा कर समाज में जीने का मकसद दिया, उसी को मार दिया था.

इस के बाद परमजीत कौर ने भी स्वीकार कर लिया था कि उस ने भी बेटी को बचाने के लिए झूठ बोला था. कुलवंत सिंह ने उसी दिन हरमीत कौर की निशानदेही पर गांव दोस्तपुर से हरमीत कौर के प्रेमी गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी तथा उस के दोस्त मनजिंदर सिंह को गिरफ्तार कर सभी को जिला मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर विस्तृत पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था.

रिमांड अवधि के दौरान सभी से हुई पूछताछ में पलविंदर सिंह की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह अधिक लाडप्यार में बिगड़ी औलाद और स्वार्थ की खोखली नींव पर टिके रिश्ते की कहानी थी—

हरमीत कौर बचपन से ही पलविंदर सिंह की बेहद लाडली थी. वह बेटी को दुनिया की तमाम खुशियां देना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने उस की पढ़ाई महंगे स्कूलों में कराई. वह चाहते थे कि हरमीत कौर उच्च शिक्षा हासिल कर आईपीएस बने. लेकिन कालेज में कदम रखते ही हरमीत कौर उन के अरमानों पर पानी फेर कर आधुनिकता के रंग में रंग कर आशिकी के चक्कर में पड़ गई.

हरमीत कौर सुंदर तो थी ही, उस की बातचीत की शैली और व्यक्तित्व भी काफी प्रभावशाली था. उस के चाहने वाले तो बहुत थे, पर उस का दिल गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी पर आ गया.  धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. नजदीकियां बढ़ीं तो दोनों में शारीरिक संबंध भी बन गए. फिर तो हरमीत को इस का ऐसा चस्का लगा कि वह गुरप्रीत से बाहर तो मिलती ही थी, घर भी बुलाने लगी.

क्योंकि घर में उसे पूरी तरह एकांत मिलता था. उस की मां का अलग कमरा था. वह ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती थीं. पलविंदर महीने, डेढ़ महीने में आते थे. ऐसे में हरमीत मरजी की मालिक बन गई थी. यही नहीं, वह दिन पर दिन जिद्दी भी होती जा रही थी.

अपने इसी जिद्दी स्वभाव की वजह उस ने तय कर लिया था कि वह शादी करेगी तो गुरप्रीत से ही करेगी. पलविंदर सिंह बेटी के इस फैसले और हरकत से अंजान उस के भविष्य को संवारने के लिए एकएक पैसा जोड़ रहे थे. जिस दिन उन्हें हरमीत की इस आवारगी का पता चला, गहरा आघात लगा.

पहले तो उन्होंने पत्नी परमजीत को आड़े हाथों लिया, उस के बाद हरमीत कौर की खबर ली. उन्होंने साफसाफ कह दिया कि इश्कमुश्क और शादीब्याह को दिमाग से निकाल कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. अब अगर उन्होंने सुन लिया कि वह उस लड़के से मिली है तो ठीक नहीं होगा.

लेकिन जिद्दी हरमीत कौर ने पिता की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया और बेहिचक पहले की ही तरह गुरप्रीत से मिलती रही. ऐसे में ही किसी दिन उस ने गुरप्रीत से कहा, ‘‘पापा के जीते जी तो हम दोनों कभी शादी कर नहीं सकते, क्यों न हम दोनों भाग कर शादी कर लें?’’

‘‘घर से भाग कर शादी करने के लिए काफी रुपयों की जरूरत होती है, जो हमारे पास नहीं है.’’ गुरप्रीत ने कहा तो हरमीत ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम रुपयों की चिंता मत करो. मेरे पापा ने मेरे भविष्य के लिए बहुत रुपए जमा कर रखे हैं.’’

हरमीत कौर ने गुरप्रीत के साथ भागने की कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार वह यह सोच कर शांत बैठ गई कि अंजान जगह पर अंजान लोगों के बीच वह कैसे रह पाएगी? एक दिन किसी ने पलविंदर को हरमीत और गुरप्रीत के मिलने की जगह और समय बता दिया तो पलविंदर ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया.

इस बार उस ने हरमीत कौर को लताड़ा ही नहीं, 2-4 थप्पड़ जड़ कर हाथ जोड़ कर रोते हुए कहा, ‘‘मेरे सपने और अपना भविष्य बरबाद मत कर बेटी. मैं यह सब सह नहीं पाऊंगा और आत्महत्या कर लूंगा.’’

हरमीत कौर को पिता पर दया आने के बजाय घृणा हो गई. उस के मन में आया कि पिता की सर्विस रिवौल्वर से गोली मार उन्हें खत्म कर दे. बाद में कह देगी कि किसी बदमाश ने उन पर हमला किया है. इस के बाद दिनरात वह केवल एक ही बात सोचने लगी कि प्रेम कहानी में रोड़ा बन रहे पिता को कैसे रास्ते से हटाया जाए?

एक दिन पलविंदर सिंह पत्नी के साथ सो रहा था, तभी रात 1 बजे उसे हरमीत कौर के कमरे से खटरपटर की आवाजें आती सुनाई दीं. वह उठ कर बाहर आया तो उस के कमरे से एक साए को निकल कर दीवार फांदते देखा.

पलविंदर सिंह समझ गया कि वह गुरप्रीत ही था. अगले दिन ड्यूटी पर जाने से पहले पलविंदर ने हरमीत को खूब समझाया. अंत में उस ने यह भी बताया कि रात को उस ने सब कुछ देख लिया है. वह यह सब बंद कर दे, वरना परिणाम बहुत भयानक होगा.

बस, उसी दिन हरमीत कौर ने तय कर लिया कि अब चाहे कुछ भी हो, वह पिता को जिंदा नहीं छोड़ेगी. उसी दिन गुरप्रीत से मिल कर उस ने पिता की हत्या की योजना बना डाली.

चूंकि गुरप्रीत यह काम अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने जिगरी दोस्त मनजिंदर सिंह को अपने साथ मिला लिया. उस ने इस काम के लिए उसे कुछ पैसे भी देने को कहा. हरमीत कौर ने कुछ रुपए गुरप्रीत को दिए, जिस से उस ने एक तेजधार वाला दातर खरीदा और कुछ रुपए मनजिंदर को दे दिए.

अब उन्हें इंतजार था पलविंदर सिंह के छुट्टी आने का. 29 अगस्त को वह छुट्टी पर घर आए और हरमीत कौर पर नजर रखने के लिए अपना बिस्तर आंगन में लगाया.

हरमीत कौर ने रात 9 बजे गुरप्रीत को पिता के घर आने और आंगन में सोने की सूचना दे दी. रात करीब 1 बजे हरमीत कौर ने उठ कर बाहर के दरवाजे की कुंडी खोल दी, जिस से गुरप्रीत को अंदर आने में परेशानी न हो. रात 2 बजे के करीब गुरप्रीत अपने दोस्त मनजिंदर के साथ हरमीत के घर पहुंचा तो वह उसे बरामदे में खड़ी मिली.

बिना आवाज किए तीनों पलविंदर सिंह की चारपाई के पास पहुंचे. मनजिंदर और हरमीत कौर ने गहरी नींद सो रहे पलविंदर सिंह के हाथपैर पकड़ लिए तो गुरप्रीत ने दातर से उस की श्वांस नली काट दी, जिस से उस की तुरंत मौत हो गई. पलविंदर सिंह की हत्या कर के गुरप्रीत और मनजिंदर चले गए तो हरमीत कौर मां के साथ मिल कर पिता की हार्ट अटैक से हुई मौत का नाटक करने लगी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने वह दातर बरामद कर लिया था, जिस से पलविंदर सिंह की हत्या की गई थी. इस के बाद 3 सितंबर, 2016 को सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

इस तरह स्वार्थी रिश्तों ने खून को पानी बना दिया और एक कानून के रक्षक की बेटी यह भी नहीं सोच सकी कि चाहे कितना भी झूठ क्यों न बोला जाए, सच से आखिर परदा उठ कर ही रहता है.

 – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दकियानूसी समाज में चिनगारी हैं फोगट बहनें

हरियाणा की कुश्ती पदक विजेता गीता फोगट, जिस पर आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ बनी थी, को 2010 के कौमनवैल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीतने पर वह वाहवाही नहीं मिली थी, जो फिल्म ने दिलाई है. अब गीता और बबीता फोगट घरघर का नाम बन गई हैं और लड़कियों की नई आशा बन गई हैं. हिंदी फिल्में इस प्रकार का सामाजिक बदलाव कम करा पाती हैं, पर इस बार ऐसा हो गया है.

हरियाणा में एक पिता ने अपनी 2 बेटियों को कुश्ती में महारत दिलाने का संकल्प लिया था, यही अपनेआप में बड़ी बात है. इस देश में जहां औरतों को सदियों से बोझ समझा जाता रहा है, वहां एक पिता का बेटियों को कुश्ती में अपनी मरजी से डालना आश्चर्य ही है.

अब फिल्म ‘दंगल’ के बाद इन लड़कियों को नई पहचान मिलने लगी है और वे रोल मौडल बन रही हैं. महिला कुश्ती में वैसे तो लड़कियां ही होंगी, पर हरियाणा के पिछड़े गांवों में से इस तरह लड़कियों का बाहर निकलना एक सामाजिक बदलाव की निशानी है.

यह बदलाव असल में बहुत गहरे जाना जरूरी है. औरतों और लड़कियों को सामाजिक व धार्मिक रीतिरिवाजों से इस तरह बांध दिया जाता है कि वे खूंटे से बंधी गाय की तरह हो जाती हैं, जिन का काम केवल दूध देना भर रह जाता है. लड़कियों का व्यक्तित्व तो खो ही जाता है, देश को उत्पादन की एक भरपूर सक्षम इकाई से भी हाथ खो देना पड़ता है.

यह नहीं भूलना चाहिए कि कमजोर इनसान चाहे मर्द हो या औरत, पूरे समाज पर बोझ होता है. किसी समाज की अमीरी उस की उत्पादकता पर निर्भर होती है और यदि लड़कियों को घर में बंद कर के पूजापाठ, सिर्फ चूल्हेचौके और बच्चे पैदा करने पर लगा दिया जाए, तो परिवार ही नहीं पूरा देश पीछे रह जाता है. धर्म ने साजिश कर के सदियों से औरतों को कमजोर रखा, ताकि वे मर्दों की सेवा करते रहें और कोई मांग न करें. ऐसा समाज गुलामी को तख्त पर बैठा देता है और उसे अपनी खुद की गुलामी का एहसास भी नहीं रहता.

फोगट बहनें महिला कुश्ती में नाम कमा कर एक दकियानूसी समाज में चिनगारी का काम कर रही हैं. अगर वे दूसरे पाखंडों का भी इसी तरह विरोध करें, तो ही उन का काम सफल होगा. फिल्म ‘दंगल’ में उन का ट्रेनिंग के दौरान लड़कों को भी पछाड़ना असल चैलेंज है और यह हर स्तर पर होना जरूरी है.

हिचकीः नकल के लिये अकल की जरूरत होती है

टारेंट सिंड्रोम से पीड़ित रहे अमरीकन मोटीवेशनल प्रवक्ता और शिक्षक ब्रैड कोहेन तमाम मुसीबतों का सामना करते हुए सफल शिक्षक बने थे. फिर उन्होंने अपनी कहानी पर एक किताब भी लिखी, जिस पर अमरीका में 2008 में एक फिल्म ‘‘फ्रंट आफ द क्लास’ बनी थी, उसी के अधिकार लेकर ‘यशराज फिल्मस’ ने फिल्म ‘हिचकी’ का निर्माण किया है. मगर यह फिल्म रानी मुखर्जी के अभिनय को नजरंदाज करने पर शून्य हो जाती है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि रानी मुखर्जी महज अपने अभिनय के बल पर इस फिल्म को बौक्स औफिस पर कितनी सफलता दिला पाएंगी?

फिल्म ‘‘हिचकी’’ की कहानी टारेंट सिंड्रोम की बीमारी से पीड़ित शिक्षक नैना माथुर(रानी मुखर्जी) के इर्दगिर्द घूमती है. इस बीमारी की वजह से उन्हें बार बार हिचकी आती है. इसके चलते बचपन में उन्हें 12 स्कूल बदलने पड़े और अब जब वह शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को पढ़ाना चाहती हैं, तो उसे 18 स्कूलों ने नौकरी देने से इंकार कर दिया. जबकि नैना माथुर के पास कई डिग्रियां हैं. पर वह हार नहीं मानती. जबकि नैना माथुर सभी को टारेंट सिंड्रोम के बारे में विस्तार से बताती भी है. अंततः पांच साल के संघर्ष के बाद नैना माथुर को एक कैथोलिक स्कूल में नौकरी मिल जाती है. इस स्कूल के संस्थापक को भी बोलने की समस्या थी. इस स्कूल में शिक्षा के अधिकार के तहत भर्ती गरीब बच्चों की कक्षा नौ एफ को भौतिक शास्त्र पढ़ाने का अवसर नैना माथुर को मिलता है. नैना माथुर इन बच्चों को आम प्रचलित पद्धति की बजाय अनोखे तरीके से पढ़ाती हैं. इस कक्षा के बच्चे झोपड़पट्टी के हैं, तो स्वाभाविक तौर पर वह अपनी शिक्षक को परेशान भी करते हैं और नैना माथुर,आतिष(हर्ष मयार) सहित 14  विद्रोही व शरारती बच्चों से निपटती भी हैं.

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नकल के लिए अकल की जरुरत होती है. पर फिल्म ‘हिचकी’ के लेखक व निर्देशक के पास शायद यह अक्ल भी नहीं रही. यह फिल्म 2008 में बनी अमरीकन फिल्म ‘‘फ्रंट आफ द क्लास’’ की अति घटिया नकल है. वास्तव में फिल्म के निर्देशक सिद्धार्थ पी मल्होत्रा ने फिल्म को बेवजह अति नाटकीय/मेलोड्रमैटिक बनाने के चक्कर में फिल्म की ऐसी की तैसी कर दी, जिसे रानी मुखर्जी का उत्कृष्ट अभिनय भी नहीं बचा पाया. मजेदार बत यह है कि इसी विषय पर दक्षिण भारत में एक हौरर फिल्म बनी थी, जिसे हिंदी में ‘मोहन वदनी’ के नाम से डब किया गया. इस फिल्म की हीरोईन भी यही बीमारी है, जिसकी मौत कक्षा के अंदर होती है और उसकी आत्मा स्कूल में भटकती रहती है. यह फिल्म भी टारेंट सिंड्रोम पर जागरूकता लाने में असफल है.

लेखकीय यानी कि कथा कथन और निर्देशकीय कमजोरी के चलते फिल्म ‘‘हिचकी’’ अपने पूरे मकसद से भटक गयी. इसे अपने दमदार अभिनय की बदौलत रानी मुखर्जी भी नहीं बचा पाएंगी? फिल्मकार ने शिक्षक व विद्यार्थी के बीच ऐसा आदर्शवाद परोसा है, जो कि पूरी तरह से बनावटी लगता है, परिणामतः दर्शकों का फिल्म के मूल मकसद से ध्यान हट जाता है. यानी कि फिल्म‘‘हिचकी’’ टारेंट सिंड्रोम जैसी बीमारी को लेकर जागरूकता नही पैदा कर पाती. यहां तक कि छात्र व शिक्षक के बीच का रिश्ता भी जबरन थोपा हुआ नजर आता है. इंटरवल से पहले दर्शक नैना माथुर के साथ जुड़े रहते हैं, मगर इंटरवल के बाद आने वाले उतार चढ़ाव, फिल्म में आने वाले मोड़ का आकलन दर्शक पहले ही लगा लेता है, जिसके चलते इंटरवल के बाद फिल्म दर्शकों को बोर करती है. इतना ही नहीं खलनायक के रूप में नीरव कावी जो कुछ करते हुए नजर आते हैं, वह भी अनावश्यक लगता है. फिल्म का क्लायमेक्स भी अति बनावटी है. लेखक व निर्देशक दोनों ही रूप में सिद्धार्थ पी मल्होत्रा असफल रहे हैं.

फिल्म का गीत संगीत फिल्म के कथानक के साथ तारतम्य नही बैठाता. फिल्म के कैमरामैन बधाई के पात्र हैं.

रानी मुखर्जी ने नैना माथुर के किरदार को पूरे सम्मानजनक तरीके से परदे पर अपने अभिनय से पेश करते हुए टारेंट सिंड्रोम को जिया है. दर्शक नैना माथुर के पढ़ाने की अपरंपरागत शैली के सम्मोहन में जरुर बंधता है. दर्शक सिर्फ रानी मुखर्जी के अभिनय के लिए ही इस फिल्म को देखने जा सकता है.

एक घंटे 58 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हिचकी’’ का निर्माण ‘यशराज फिल्मस’ ने किया है. फिल्म के लेखक सिद्धार्थ पी मल्होत्रा व अंकुर चैधरी, पटकथा लेखक अंकुर चैधरी, अंबर हड़प व गणेश पंडित, संगीतकार हितेष सोनिक, कैमरामैन अविनाश वरूण व कलाकार हैं – रानी मुखर्जी, हर्ष मयार, नीरज कावी, सुप्रिया पिलगांवकर, सचिन पिलगांवकर, कुणाल शिंदे, शिवकुमार सुब्रमणियम, सुप्रिया बोस, जन्नत जुबेर रहमानी व अन्य.

जब बिदिता बाग से नाराज होकर उनके पिता ने घर छोड़ा था?

फिल्म ‘‘बाबू मोशाय बंदूक बाज’’ से चर्चा में आईं अदाकारा बिदिता बाग ने 2011 में अभिनय जगत में कदम रखा था. 2011 से अब तक उन्होंने करीबन एक दर्जन से अधिक फिल्में की होंगी, जो कि सिनेमाघरों तक नही पहुंच पाई, जबकि कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में यह फिल्में काफी चर्चा बटोर चुकी हैं. अब बिदिता बाग का करियर काफी तेज गति से आगे बढ़ रहा है. इन दिनों वह निर्माता नीरज भारद्वाज व श्वेता ठाकोर तथा निर्देशक मनोज सिंह की फिल्म ‘‘माया’’ सहित कई फिल्में कर रही हैं. बिदिता बाग ने बिना प्रोस्थेटिक मेकअप का प्रयोग किए फिल्म ‘‘दयाबाई’’ में 16 से 77 वर्ष तक का किरदार निभाया है.

बिदिता बाग के पिता सराकरी नौकरी करने के साथ ही कला से भी जुड़े रहे हैं. वह अमैच्योर थिएटर करने के साथ ही अपने आस पास के बच्चों को थिएटर की ट्रेनिंग भी देते रहे हैं. इसके बावजूद उन्हें पसंद नहीं था कि उनकी बेटी बिदिता बाग फिल्मों से जुड़े. इसलिए जब बिदिता बाग ने बौलीवुड से जुड़ने का ऐलान किया, तो उनके पिता ने काफी विरोध किया था, यहां तक बिदिता के पिता ने बिदिता के निर्णय से नाराज होकर घर छोड़ दिया था.

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अपने पिता की नाराजगी की चर्चा करते हुए खुद बिदिता बाग कहती हैं- ‘‘जब मैने अभिनय को करियर बनाने का निर्णय लिया तो नाराज होकर मेरे पिताजी ने घर छोड़ दिया था. पूरे 45 दिन वह घर नहीं आए. शायद वह कभी घर वापस ना आते लेकिन मेरे फूफाजी को कैंसर हो गया और उनका इलाज हमारे घर से ही हो रहा था. उनकी हालत बिगड़ रही थी. इस वजह से काफी समझाने पर पिताजी घर वापस आए थे.

मेरे पिताजी मुझसे बहुत ज्यादा भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं और मेरे अभिनेत्री बनने में सबसे ज्यादा समस्या उन्होंने ही खड़ी की. वही मेरे सबसे बडे़ आलोचक हैं. वह अभी भी सोचते हैं कि मैं अभिनय छोड़ कर नौकरी कर लूं. वह चाहते हैं कि भविष्य सुरक्षित हो जाए. भारतीय सिनेमा में सबसे बड़ी कमी यह है कि हम कलाकारों को पैसे समय पर नही मिलते और पैसे डूब जाते हैं. कलाकार के तौर पर हमें पैसे बार बार मांगने पड़ते हैं. तो मेरे पापा कहते हैं कि ऐसा काम करने से क्या फायदा काम करो पैसे ना मिले. ’’

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