जिंदगी जब जीने की राह दिखाए

विश्व के सब से बड़े आर्ट फैस्टिवल एडिनबर्ग फ्रिंज में जब मुंबई के रेड लाइट एरिया की 15 कलाकारों ने ‘लाल बत्ती ऐक्सप्रैस टू’ नामक नाटक का मंचन किया, तो सभी दर्शक दंग रह गए. एनजीओ ‘क्रांति’ की इन लड़कियों की उम्र 15 से 23 वर्ष है. इन्होंने अपने संवाद और नृत्य द्वारा खुद पर होने वाले जुल्म, शोषण और डिप्रैशन की कहानी दर्शकों के आगे नाटक के जरिए इस तरह पेश की कि वे अपने अनुभव भी उन के साथ बांटने लगे.

अच्छी बात यह रही कि इन क्रांतिकारी लड़कियों ने इस नाटक द्वारा समाज और दुनिया के आगे एक क्रांति लाने की कोशिश की है, जिस में वे सफल रहीं और विश्वपटल पर 1 लाख शोज में उन का 10वां स्थान रहा. यह नाटक इन क्रांतिकारी लड़कियों द्वारा ही लिखा व निर्देशित किया गया है. पूरे यूरोप में इन लड़कियों ने इस नाटक के 57 परफौर्मेंस दिए. इतना ही नहीं, इस नाटक को बीबीसी ने भी दिखाया, जो उन के पिछले 10 वर्षों के रिकौर्ड को तोड़ कर सब से अधिक दर्शकों का हकदार बना.

हर जगह मिली प्रशंसा

यह नाटक अलग तरह का है, जिस में नाटक के दौरान कुछ दर्शकों को उस में शामिल कर पात्र के अनुसार अभिनय करने के लिए कहा जाता है. इस में पहले उन्हें कुछ जानवर बनने के लिए कहते हैं. लेकिन ज्यों ही उन्हें सैक्सवर्कर बनने के लिए कहा जाता है, वे चुप हो जाती हैं. यह भाव और यह सोच दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर वे खुद ऐसा क्यों सोचते हैं. कितना मुश्किल होता है एक सैक्सवर्कर बनना और शायद यही वजह है कि यह नाटक हर जगह पसंद किया जा रहा है.

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यह सच है कि हमारे देश में सैक्सवर्कर्स की दुर्दशा से कोई अनजान नहीं है. पतली और तंग गुमनाम गलियों में इन की जिंदगी की सचाई काफी भयावह है. गरीबी और बीमारी से लड़ रही इन महिलाओं से सैक्सुअल सुखप्राप्ति के लिए लोग आते हैं. इन में गरीब से ले कर रईसजाद तक सभी वर्ग, जाति और धर्म के लोग होते हैं. काम उन का होता है पर बदनामी इन महिलाओं को मिलती है. इस से भी बदतर होती है इन के बच्चों की जिंदगी, जिन्हें न तो कोई नाम मिलता है, न प्यार और न ही सही भविष्य.

यूनाइटेड नैशंस की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 3 मिलियन कमर्शियल सैक्सवर्कर्स हैं जिन से करीब 40 प्रतिशत बच्चे जन्म लेते हैं. इन बच्चों को न तो कोई काम मिलता है, न बैंक लोन और न ही पासपोर्ट. इस दलदल से सैक्सवर्कर्स और उन की लड़कियों का निकलना भी मुश्किल होता है. रोबिन चौरसिया और बानी दास की संस्था ‘क्रांति’ इस दिशा में काम कर रही है.

‘क्रांति’ की पहल

क्रांति की संस्थापिका बानी दास बताती हैं, ‘‘एक एनजीओ के कैंपस में मुंबई के कमाठीपुरा रेड लाइट एरिया से लड़कियों को ला कर रखा जाता था. पुलिस छापा मार कर 13-14 वर्ष की लड़कियों को यह कह कर लाती थी कि इन्हें शिक्षा दे कर आत्मनिर्भर बनाया जाएगा, लेकिन वहां पढ़ाई के नाम पर कुछ भी नहीं होता था. एक कक्षा में 80 लड़कियों को एकसाथ बैठा दिया जाता था.

‘‘ये लड़कियां अलगअलग उम्र की होती थीं. उन में कुछ पढ़ीलिखी होती थीं तो कुछ अनपढ़ थीं. ऐसी लड़कियां अपने मनमुताबिक न तो काम कर सकती थीं, न ही आगे बढ़ सकती थीं और उन्हें एहसास कराया जाता था कि वे सैक्सवर्कर्स की बेटियां हैं और उन्हें पुलिस द्वारा ‘रेड’ कर लाया गया है. उन के पास यही विकल्प है. उन का कोई सपना नहीं हो सकता. उन्हें एक लैवल तक पढ़ालिखा कर अचारपापड़ बनाने, सिलाई करने या छोटेमोटे काम में लगा दिया जाता था.

‘‘लेकिन मैं ने पाया कि इन में से कुछ लड़कियां काफी प्रतिभावान हैं और वे आगे पढ़लिख कर अच्छा काम कर सकती हैं. ऐसे में मेरी मुलाकात रोबिन चौरसिया से हुई, जो अमेरिका से मुंबई आ कर कुछ सामाजिक काम करना चाहती थीं. उन की भी सोच मेरी ही तरह थी.’’

रोबिन और बानी की जोड़ी चाहती थी कि वह केवल बच्चों को शिक्षा ही न दे, बल्कि उन की प्रतिभा को निखारने और उन की इच्छाओं को भी फलनेफूलने दे. साल 2007 में उन दोनों ने कमाठीपुरा की 4 बच्चियों को ले कर क्रांति एनजीओ की स्थापना की.

संस्था की सहसंस्थापिका रोबिन चौरसिया कहती हैं, ‘‘लाल बत्ती ऐक्सप्रैस टू नाटक के मंचन का उद्देश्य यह था कि इन लड़कियों की समस्या को किसी रचनात्मक माध्यम से लोगों तक पहुंचाया जाए और लोगों में इन के प्रति जो भ्रांतियां हैं, उन्हें दूर किया जाए. मुंह से कह कर एक बार में केवल एक व्यक्ति को ही समझाया जा सकता है. इस के अलावा इन बच्चों की इच्छा थी कि सैक्सवर्कर्स क्या हैं? उन का जीवन क्या है? उन के बच्चों की गलती क्या है? वे आजाद क्यों नहीं घूमफिर सकतीं? आदि सवालों को सब के सामने लाना, लेकिन कैसे लाएं? समस्या यह थी. सैक्सवर्कर की बेटी का नाम सुनते ही लोग उसे अलग नजर से देखते हैं.

‘‘ये लड़कियां बताना चाहती थीं कि अगर कोई महिला मजदूरी करती है तो उसे वर्कर की संज्ञा दी जाती है. वैसे ही हमारी मां भी पेट पालने के लिए यह काम करती हैं. इस में बुराई क्या है? इस बात को वे एक रिसोर्स के सहारे लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए लाना चाहती थीं और इस के लिए इन लड़कियों ने नाटक का सहारा लिया. अगर 500 लोग भी साथ बैठ कर 50 मिनट के इस नाटक को देखते हैं और इस से केवल 5 लोगों के विचारों में भी यदि फर्क आ जाए, तो बड़ी बात होगी.

साल 2013 में पहली बार इसे मुंबई में मंच पर दिखाया गया था, जिस की दर्शकों ने खूब तारीफ की थी.

प्रतिभा को पहचान

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रोबिन आगे बताती हैं, ‘‘मेरी अमेरिका में बहुत जानपहचान है. कुछ बच्चे पढ़ाई पूरी करने के लिए अमेरिका गए हैं, लेकिन जिन्हें पढ़ाई का शौक नहीं है और वे अभिनय करते हैं, उन्हें भी आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए. यह सोच कर साल 2015 में मैं ने अमेरिका में इस नाटक के मंचन का प्रस्ताव रखा और इस में कामयाब हुई. 15 सदस्यों की इस नाटक टीम की परफौर्मेंस सभी ने पसंद की. न्यूयौर्क, शिकागो, येलो स्टोन आदि करीब 5 शहरों में इस नाटक का मंचन किया गया था. इस काम में एक महिला निर्देशक जया अय्यर ने भी काफी साथ दिया. वे अभिनय को एक थेरैपी बताती हैं और उसी के अनुसार अभिनय करने में लड़कियों की मदद करती हैं.

‘‘नाटक का नाम पहले ‘लाल बत्ती’ था, अब इसे ‘लाल बत्ती ऐक्सप्रैस टू’ नाम दिया गया है. इस की वजह यह है कि ये लड़कियां मानती हैं कि उन की लाइफ एक ऐक्सप्रैस टे्रन की तरह है, जिस में कई लोग चढ़ते, उतरते हैं और इस जर्नी में काफी लोगों का साथ भी रहता है. यह नाटक केवल आईओपनर ही नहीं था, बल्कि कई लोगों की निजी जिंदगी से जुड़े उन के भाव भी प्रकट कर रहा था, जैसे कि कई बार महिलाएं सामने आ कर कहती हैं कि उन के साथ भी सैक्सुअल हेरेसमैंट हुआ है, जिसे वे आज तक बता नहीं पाई हैं और अब ये छोटी लड़कियां खुल कर स्टेज पर इसे बता रही हैं. इस तरह की बातें सभी के लिए प्रेरणादायक रहीं.’’

थेरैपी द्वारा मानसिक उपचार

कम उम्र में जब सैक्सुअल हेरेसमैंट होता है, तो बच्चा उसे अपनी गलती मान, अकेले रहने की कोशिश करता है. कई बार तो मां और घर वाले भी उसे चुप रहने की सलाह देते हैं, जबकि गलती उस की नहीं, शोषण करने वाले की होती है. यहां बच्चों को थेरैपी द्वारा उन की खोई हुई मानसिक शक्ति को फिर से वापस लाया जाता है.

क्रांति की सब से पुरानी और 10 वर्षों से क्रांतिकारी रही श्वेता कट्टी के साथ भी बचपन में सैक्सुअल अब्यूज हुआ था, लेकिन क्रांति ने उस की जिंदगी बदल दी. साल 2014 में यूएन यूथ करेज अवार्ड मिलने के साथ अमेरिका जा कर पढ़ने वाली वह पहली रेड लाइट एरिया की लड़की थी.

वहां रहने वाली कविता बताती है, ‘‘मैं कमाठीपुरा से यहां 18 साल की उम्र में आई थी. मैं ने 12वीं की परीक्षा दी, कमाठीपुरा में आगे पढ़ाई की कोई सुविधा नहीं है और उस उम्र में वहां रहना भी मुश्किल था. मैं वहां दादी के साथ 4 साल की उम्र से रह रही थी. उन्होंने ही मुझे पाला है. दादी की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. वे आगे मुझे रख नहीं पा रही थीं. मैं दादी से बहुत जुड़ी हुई थी और उन्हें छोड़ कर नहीं आना चाहती थी. मेरी हाफसिस्टर श्वेता क्रांति में सालों से रहती है, उस ने ही मुझे यहां आने की सलाह दी.

‘‘कमाठीपुरा में रहने वाली सभी लड़कियां सोचती हैं कि जल्दी से कुछ छोटीमोटी जौब कर, शादी कर यहां से निकल जाओ. मैं ऐसा नहीं चाहती थी. मैं अपने तरीके से जिंदगी जीना चाहती थी. 7 साल की उम्र में मेरे साथ भी सैक्सुअल अब्यूज हुआ है. मैं ने इस बारे में कभी किसी को नहीं बताया क्योंकि मुझे डरा कर रखा गया था.

‘‘जहां मैं रहती थी, वहां सैक्सवर्कर, डब्बे वाले और सामान्य सरकारी लोग रहते थे. वहां पास के एक अंकल मुझे अपनी गोदी में बिठा कर गलत तरीके से हर जगह छूते थे और मुझ से भी छूने के लिए कहते थे, जो मुझे अच्छा नहीं लगता था. उन्होंने कहा था कि अगर मैं इस बात को किसी से बताऊंगी तो वे मुझे जान से मार देंगे.

‘‘थोड़ी बड़ी होने के बाद मुझे सहीगलत का फर्क समझ में आया. वह दर्द और गुस्सा आज तक मेरे मन से गया नहीं है, पर क्रांति संस्था में आ कर मुझे अपनी पहचान मिली है. मैं चाहती हूं कि बचपन से ही मातापिता अपनी बच्चियों को बताएं कि गुड टच और बैड टच क्या होता है. मेरी दादी भी पहले सैक्सवर्कर ही थीं और बाद में कुछ घरों में काम किया करती थीं लेकिन मेरी मां सैक्सवर्कर नहीं थीं. मां की जब शादी हुई और मैं पैदा हुई, उसी दौरान मेरे पिता को एचआईवी होने से उन की मृत्यु हो गई. पिता के परिवार वालों ने 23 साल की उम्र में मां को ही पिता की मृत्यु का दोषी ठहराया. तब मेरी दादी ने मुझे अपने पास रख लिया और पढ़ाया. मां को उन के मायके भेज दिया गया.

‘‘मुझे याद है, दादी वेश्यालय की हैड थीं और वहां जा कर वेश्याओं की बच्चियों को संभाला करती थीं. मैं भी वहीं दादी के साथ रहती थी. मुझे याद आता है जब मैं बचपन में वहां की लड़कियों को शाम को पेटी निकाल कर, गजरा लगा कर सजते हुए देखती थी, तब बड़ा अच्छा लगता था. बाद में दादी भी वहां से हट गईं और कमाठीपुरा में दूसरी जगह रहने लगीं. मैं अभी भी यह सोचने पर मजबूर होती हूं कि मैं और मेरी दादी यहीं क्यों रहीं, कहीं और क्यों नहीं चली गईं. कभी दादी से पूछा भी तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘यह भी सही था कि किसी सैक्सवर्कर को आम लोगों के साथ रहने का अधिकार नहीं होता. इस के अलावा कभी किसी सैक्सवर्कर ने मुझे उस फील्ड में नहीं धकेला. वे चाहती थीं कि मैं कोई अच्छा काम कर घर बसा लूं क्योंकि उन्हें जीने की जो आजादी नहीं मिली वह मुझे मिले. बड़ी होने पर मैं ने कई बार एनजीओ के साथ काम किया, पर मैं आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

‘‘12 साल बाद मैं मां से मिलने कर्नाटक गई थी. दादी से मिलने भी मैं वहीं जाती हूं. मैं अब गायिका बनना चाहती हूं. मैं पढ़ना पसंद नहीं करती. मैं एक अलग संस्था मेटा क्रांति से जुड़ कर कमाठीपुरा की लड़कियों को पढ़ाना चाहती हूं, ताकि वे आगे बढ़ें.’’

सैक्स : एक जरूरत

कविता आगे कहती है, ‘‘भारत में सैक्स को एक टैबू बना कर रखा गया है, जबकि यहां जनसंख्या बहुत अधिक है और सैक्सुअल अपराध भी अधिक होते हैं. दरअसल, सैक्स शरीर की एक जरूरत है, इस पर खुल कर बातचीत होनी चाहिए.’’

यहां रहने वाली 17 वर्षीया रानी 5 वर्ष पहले क्रांति में आई थी. उस की मां कर्नाटक में देवदासी थी. पिता की मृत्यु के बाद उस के सौतेले पिता ने उस की मां को पहले पुणे, फिर मुंबई के कमाठीपुरा में ला कर डाल दिया. वह कहती है, ‘‘मेरे पिता रोज मुझे मारते थे. वहां मैं नरक जैसे हालात में जी रही थी. मैं ने अपनी इच्छा से क्रांति को चुना है. पुलिस वाले भी हमें वहां से छुड़ाने आते थे, लेकिन सब दिखावा होता था. वे वहां की महिलाओं से पैसा वसूल कर निकल जाते थे.

‘‘मेरी मां आज भी जो कमाती हैं, उस में से कुछ हिस्सा पुलिस वालों को देना पड़ता है. हर व्यक्ति से वे लोग कम से कम 2,000 रुपए ऐंठते हैं. मेरे साथ भी 7 साल की उम्र में मेरे कजिन ने यौनशोषण किया और इस बारे में घर वालों को बता कर भी कुछ लाभ नहीं हुआ. मुझे तो एक बार ऐसा लगने लगा था कि मैं ही गलत हूं. अपनेआप से घृणा होने लगी थी, लेकिन क्रांति की बानी से मिल कर मैं यहां पहुंची और डांस थेरैपी से ठीक हुई.’’

अपनी पहचान को बनाए रखने और अपनेआप को समझने में क्रांति संस्था बहुत बड़ा काम कर रही है. वित्तीय सहायता के बारे में पूछे जाने पर बानी कहती हैं, ‘‘हमें वित्तीय सहायता बहुत कम मिलती है.

3 महीने में एक छोटी ग्रांट ग्लोबल की तरफ से वुमन राइट्स और वुमन शिक्षा के लिए मिलती है. कुछ लोग तो सीधे स्कूलकालेज में पढ़ने वाले बच्चों की फंडिंग करते रहते हैं. इस के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है. लोगों को बताना पड़ता है कि वे कैसे क्या कर रही हैं.

‘‘सरकार की तरफ से यह संस्था फंडिंग नहीं चाहती, क्योंकि इस से सरकार की दखलंदाजी अधिक हो जाती है. सरकार काम से अधिक पाबंदी लगाती है और सही काम नहीं करने देती. केवल 20 रुपए एक लड़की के खाने के लिए देती है, बाकी पैसे की व्यवस्था खुद करनी पड़ती है. इतना ही नहीं, अगर कभी रेड लाइट एरिया में रेड हुई, तो पकड़ी गई सारी लड़कियों को मेरे यहां बिना पूछे डाल देगी, जिन्हें 3 सप्ताह तक यहां रखना पड़ता है, जिस से यहां का माहौल बिगड़ता है. कहीं जानेआने के लिए सरकार की अनुमति लेनी पड़ती है.

बानी कहती हैं, ‘‘क्रांति इन लड़कियों का घर है और इस में बच्चों को मैं पूरी आजादी देना चाहती हूं. मेरी एक बेटी है. मैं अपनी बेटी की तरह सारी लड़कियों को देखती हूं. मेरे यहां की 20 क्रांतिकारी लड़कियां ही आगे और 20 को सुधार सकती हैं, यही मेरा लक्ष्य है. हम गुणवत्ता को अधिक महत्त्व देते हैं.’’

अलग कहानी अलग वेदना

यहां रहने वाली हर लड़की की अपनी कहानी और मनोवेदना है, जो हृदय विदारक है. आंखों में आंसू लिए 18 वर्ष की अस्मिता बताती है, ‘‘बचपन में मेरा यौनशोषण हुआ. हमारे जानने वाले, जो हमारी देखभाल करते थे, मां के काम पर जाने के बाद मेरे साथ गंदी हरकतें करते थे. मैं ने इस बारे में अपनी बड़ी बहन और मां को बताया था लेकिन उन्होंने चुप रहने की सलाह दी. मेरी मां एक कंपनी में काम करती थीं. मेरा वहां से निकलना बहुत मुश्किल था. मैं 2 साल पहले 16 साल की उम्र में क्रांति में आई हूं. जो माहौल मुझे वहां नहीं मिला, वह यहां मिला है. यहां मुझे सबकुछ करने की आजादी है. क्रांति में मैं ने अपनेआप को पाया है.’’

यहां यौनशोषण से ग्रसित लड़कियों को एक थेरैपी दी जाती है, जिस से वे फिर से अपने अस्तित्व को पा सकें. अस्मिता की जिंदगी में काफी बदलाव आ गया है. पहले उस के अंदर जो डर था, अब नहीं है, उसे पहचान मिली है. वह मैंटली चैलेंज्ड बच्चों के साथ काम करना चाहती है.

अस्मिता कहती है, ‘‘मेरे हिसाब से पूरे विश्व में यौनशोषण का सामना बहुत सारी लड़कियों को करना पड़ता है. उन से मेरा कहना है कि रेप या यौनशोषण के लिए अपनेआप को दोषी समझ कर कभी आत्महत्या न करें. ऐसा मानसिक विकृति वाले लोग ही करते हैं. आप इस से निकल कर नई जिंदगी शुरू करें.’’

अस्मिता की तरह 20 साल की पिंकी की जिंदगी भी बहुत भयावह थी. 9 साल की उम्र में उस की शादी करा दी गई थी. उस के चाचा और पति ने बारबार उसे मानसिक व शारीरिक रूप से अब्यूज किया. परिणामस्वरूप, 10 साल की कच्ची उम्र में उसे ऐबौर्शन कराना पड़ा. आज यहां पर उसे सुकून की जिंदगी मिली है.

रहने का आसरा

क्रांति में आने के लिए लड़कियों के और उन की मांओं के लगातार फोन आते रहते हैं, पर संस्था के पास जगह की कमी है. बानी और रोबिन कमाठीपुरा की और लड़कियों को भी शरण देना चाहती हैं. इस के लिए उन्हें खुद का घर बनाने की इच्छा है, क्योंकि अभी 20 लड़कियों के लिए उन्होंने 5 मकान बदले हैं और किराए के मकान में केवल 20 ही लड़कियों को रखने की परमिशन मिलती है. इतना ही नहीं, अधिकतर लोग इन्हें घर देने से भी मना कर देते हैं.

रोबिन कहती हैं, ‘‘ये लड़कियां सैक्सवर्कर्स की बेटियां हो सकती हैं, पर इन की सोच आम लड़कियों से अलग और अच्छी है. मेरी पूरी जिंदगी इन्हें हौसला और अच्छी जिंदगी देने में ही बीतेगी, यही मेरा मकसद है.’’

आज 3 क्रांतिकारियों ने पढ़ाई पूरी कर ‘मेटा क्रांति’ नामक संस्था बनाने की सोच बनाई है. इन लड़कियों का उद्देश्य है सैक्सवर्कर्स की लड़कियों को शिक्षा दे कर उन्हें आगे बढ़ाने में मदद करना. इन में कोई ड्रम, तो कोई संगीत या पेंटिंग में माहिर हैं. इन लड़कियों की कोशिश रहेगी कि उन के इस हुनर के जरिए कमाठीपुरा से आने वाली सभी लड़कियों के मनोबल को आर्ट थेरैपी द्वारा ऊंचा उठाया जाए ताकि वे मानसिक तनाव से अपनेआप को मुक्त कर सकें.

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क्या आपने देखा दिशा पटानी का ये अंदाज

बौलीवुड एक्ट्रेस दिशा पटानी ने फिल्म ‘एमएस धोनी’ में एक छोटा सा रोल निभाया था और उसके बाद से ही वह देशभर में अपनी एक स्माइल की वजह से फेमस हो गईं. इसके बाद से दिशा लगातार अपनी तस्वीरों को लेकर सुर्खियों में रहती है. दिशा जल्द ही अपने कथित ब्वौयफ्रेंड टाइगर श्रौफ के साथ ‘बागी 2’ में नजर आने वाली हैं. यह फिल्म इसी हफ्ते 30 मार्च को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है.

दिशा पटानी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आए दिन वायरल होती रहती हैं. इस बार हम आपको उनकी कुछ ऐसी तस्वीरें दिखाने जा रहे हैं, जिसमें उनके अंदाज काफी अलग-अलग हैं. हाल ही में दिशा पटानी ने बाताया था कि डांस के दौरान उनके सह कलाकार टाइगर श्रौफ का मुकाबला करना मुश्किल है. टाइगर को हिंदी फिल्म उद्योग में सर्वश्रेष्ठ डांसर माना जाता है.

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दिशा ने ‘बागी 2’ में टाइगर के साथ डांस के अनुभव के बारे में कहा था, “मैं ‘बागी 2’ के लिए बहुत उत्साहित हूं. मुझे कड़ी मेहनत करनी पड़ी क्योंकि वह बहुत मेहनती है और उनके ऊर्जा के स्तर का सामना करना बहुत कठिन है. यह मुश्किल था, लेकिन हमने तालमेल बैठाया.”

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दिशा ने ‘बागी 2’ के निर्देशक अहमद खान के साथ काम के बारे में कहा, “वह अद्भुत हैं और बहुत प्यारे हैं. फिल्म में जो भी प्रस्तुति दी है, उसकी वजह वही हैं.” अपने नृत्य कौशल के लिए पहचानी जाने वाली दिशा रोजाना व्यायाम के साथ डांस करती हैं. वह आए दिन इंस्टाग्राम पर डांस वीडियोज पोस्ट करती रहती हैं.

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दिशा ने यह भी बताया था, “यह मेरा शौक है. मुझे डांस पसंद है और मैं नृत्य की अलग-अलग शैलियां सीखना चाहती हूं.”

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इन फिल्मों में बोल्ड हुई बाहुबली की मां, बौलीवुड स्टार्स के साथ किया लिपलौक

फिल्‍म ‘बाहुबली 2’ ने अभी तक के भारतीय सिनेमा के इतिहास के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं. यही कारण है कि इस फिल्‍म का हर किरदार लोगों के दिल और दिमाग पर छा गया है. इसी फिल्‍म का एक किरदार है राजमाता शिवगामी का. राजमाता शिवगामी का वह डायलाग तो आपको याद ही होगा, ‘मेरा वचन ही है शासन..’ इस फिल्‍म में प्रभास की मां शिवगामी का किरदार निभाकर सुर्खियां बटोरने वालीं राम्या कृष्णन 13 साल की उम्र में तमिल फिल्म ‘वेल्लई मानसु’ से बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट डेब्यू किया था. इतना ही नहीं, राम्‍या लोकप्रिय हिन्दी शो ‘शक्तिमान’ में भी नजर आ चुकी हैं.

वो अब तक 200 से भी ज्यादा तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम फिल्मों में काम कर चुकीं हैं. वैसे राम्या बौलीवुड फिल्मों में भी कुछ कम एक्टिव नहीं रहीं. उन्होंने यहां भी कई बड़े बौलीवुड स्टार्स के साथ काम किया और बोल्ड सीन्स दिए. इस पैकेज में हम आपको बता रहे हैं राम्या की ऐसी ही कुछ फिल्मों में बारे में जिसमें उन्होंने काफी ज्यादा बोल्ड और इंटीमेट सीन्स दिए.

जब विनोद खन्ना के साथ किया लिपलौक

1993 में आई फिल्म ‘परंपरा’ में राम्या कृष्णन और विनोद खन्ना के बीच शानदार कैमेस्ट्री देखने को मिली थी. इतना ही नहीं राम्या कृष्णन को इस फिल्म में काफी बोल्ड दिखाया गया था, जिसे लेकर वह चर्चाओं में रहीं. फिल्म में उन्होंने बौलीवुड सुपरस्टार रहे विनोद खन्ना के साथ न सिर्फ लिपलौक किया था बल्कि कई इंटीमेट सीन्स भी दिए थे.

फिल्म में लता मंगेशकर की आवाज में गाया हुआ गाना ‘तू सावन मैं प्यार पिया’ फिल्माया गया था. जिसमें विनोद खन्ना और राम्या ने काफी बोल्ड सीन्स दिए थे. जानकर हैरानी होगी कि विनोद, राम्या से करीब 24 साल बड़े थे.

1988 में आई फिल्म ‘दयावान’  में भी वह फिरोज खान और विनोद खन्ना के साथ नजर आ चुकी हैं.

अनिल कपूर के साथ भी बोल्ड हुईं राम्या

राम्या ने अनिल कपूर से साथ भी बोल्ड सीन्स किये हैं. दरअसल 1995 में आई फिल्म त्रिमूर्ति में राम्या को एक वैंप का रोल आफर किया गया था. इस रोल के लिए उन्होंने अनिल कपूर के साथ बोल्ड सीन्स की शूटिंग भी कर ली थी, लेकिन बाद में फिल्म से ये रोल ही हटा दिया गया. इसी वजह से बाद में राम्या का फिल्म में कहीं नाम ही नहीं आया. हालांकि इन सीन्स के फोटोज बोल्ड होने की वजह से काफी चर्चाओं में रहे.

नाना पाटेकर और राम्या

1998 में फिल्म ‘वजूद’ में वो नाना पाटेकर के साथ राम्या बेडरूम सीन्स देते हुए, लिपलौक करतीं और इंटीमेट होतीं नजर आई थीं. इस फिल्म में राम्या ने काफी बोल्ड सीन्स दिए थे.

अमिताभ बच्चन के साथ राम्या कृष्णन

फिल्म ‘बनारसी बाबू’ के बाद डायरेक्टर डेविड धवन ने एक्शन कामेडी फिल्म ‘बड़े मिया छोटे मिया’ बनाई. जिसमें उन्होंने राम्या को अमिताभ बच्चन की लेडी लव बनाया था. फिल्म के सान्ग ‘धिन तक धिन तक’ में राम्या व्हाइट कलर की शार्ट ड्रेस में अमिताभ के साथ फ्लर्ट करतीं दिखाई दीं.

शाहरुख खान के साथ राम्या

फिल्म ‘चाहत’ में राम्या, शाहरुख खान के साथ भी रोमांस कर चुकी हैं. इस फिल्म में शाखरुख से राम्या को प्यार हो जाता है. ऐसे में वो उन्हें इम्प्रेस करने के लिए बोल्ड डांस करती हैं.

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सिंपल अंदाज में दिखीं प्रिया प्रकाश वारियर, वीडियो वायरल

पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट पर छाई एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश वारियर ने जैसे करोड़ों युवाओं के दिल पर कब्जा कर लिया है. उनका वीडियो इतनी तेजी से वायरल होता है कि लोग उन्हें अब वायरल गर्ल के नाम से जानने लगे हैं. कई वीडियो वायरल होने के बाद प्रिया का नाम काफी मशहूर हो चुका है. अब उनका एक और वीडियो सबके सामने आया है. इस वीडियो में प्रिया सिंपल लुक में बहुत ज्यादा खूबसूरत नजर आ रही हैं.

50 लाख से भी ज्यादा हैं इंस्टाग्राम फौलोअर्स

प्रिया के इस वीडियो को उनके ही किसी एक फैन द्वारा इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया है. वीडियो में प्रिया पिंक कलर के टौप और ब्लैक कलर के पैंट में नजर आ रही हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार प्रिया ने अपने वीडियो के जरिए इंस्टाग्राम से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ दिया है. दरअसल, प्रिया प्रकाश के कई वीडियो वायरल होने के बाद उनके इंस्टाग्राम फौलोअर्स की संख्या 50 लाख से भी ज्यादा हो चुकी है. इतनी बड़ी संख्या में फौलोअर होने के बाद प्रिया ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कई बड़े ब्रैंड का प्रमोशन करना शुरू कर दिया है. एक रिपोर्ट के अनुसार प्रिया प्रकाश एक इंस्टाग्राम पोस्ट के लिए 8 लाख रुपये चार्ज लेती हैं.

कई बड़े ब्रांड से मिल रहे हैं विज्ञापन के प्रस्ताव

इसके अलावा कई बड़े ब्रांड प्रिया प्रकाश के पास विज्ञापन का प्रस्ताव लेकर पहुंच रहे हैं. खबरों की मानें तो प्रिया सोशल मीडिया के माध्मय से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ चुकी हैं. प्रिया प्रकाश की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इंटरनेट पर छाने के बाद उन्होंने गूगल सर्च के मामले में सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली सनी लियोनी और दीपिका पादुकोण को भी पीछे छोड़ दिया. एक ही दिन में उनके 6 लाख से भी ज्यादा फौलोअर बने थे. फिलहाल उनके फौलोअर की संख्या 51 लाख तक पहुंच गई है.

बेहद खुश हैं प्रिया प्रकाश

प्रिया फौलोअर के मामले में अमेरिकन रियल्टी टीवी स्टार काइली जेनर और फुटबौल स्टार क्रिस्टियानो रोनाल्डो की बराबरी कर ली है. यह दो सेलीब्रिटी ही एक दिन में 6 लाख से ज्‍यादा फैन्‍स बनाने में सफल रहे हैं. प्रिया प्रकाश के इंटरनेट स्टार बनने के बाद जब मीडिया ने उनसे बात की तो उन्होंने कहा मेरे लिए यह बहुत सुखद है. मुझे नहीं पता कि मैं अपनी खुशी का इजहार कैसे करूं. उन्होंने बताया इस कामयाबी के बाद खुशी मनाने के लिए मेरे कौलेज में एक इवेंट आर्गेनाइज किया गया था. यह मेरे लिए नया अनुभव है. मैं यही उम्मीद करती हूं कि सभी लोगों का सपोर्ट मेरे साथ बना रहे.

ठुकरा दिए कई फिल्मों के औफर

आपको बता दें कि वीडियो वायरल होने के बाद प्रिया को कई बड़ी फिल्मों के औफर की गए लेकिन उन्होंने उस फिल्म का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया. बता दें कि प्रिया प्रकाश मलयालम फिल्म ‘उरु अदार लव (Oru Adaar Love)’ के वीडियो में नजर आने के बाद उनके आंखों के एक्सप्रेशन की जमकर तारीफ हुई थी. इसके बाद ही वह इंटरनेट पर छा गई थीं.

VIDEO : लिप्स मेकअप का ये है आसान तरीका

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टौपलेस फोटोशूट में नजर आई टाइगर श्रौफ की बहन

बौलीवुड अभिनेता टाइगर श्रौफ की बौडी, स्टाइल और एक्शन के तो सभी दीवाने हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी बहन कृष्णा श्रौफ भी इस मामले में कुछ कम नहीं हैं. कृष्णा की खूबसूरती और हौटनेस ने इंटरनेट पर तहलका मचा रखा है. हाल ही में उनकी एक तस्वीर ने लोगों को उनकी अदाओं का दीवाना बना दिया है.

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टाइगर श्रौफ की बहन कृष्णा श्रौफ ने हाल ही में अपना एक टौपलेस फोटोशूट करवाया है. बहुत से सेलीब्रिटीज हैं जो अपनी बौडी को शो करने से जरा भी नहीं हिचकिचाते और कृष्णा भी उन्हीं में से एक हैं. कृष्णा इस फोटोशूट में अपमने हौटनेस को डिस्क्राइब कर रही हैं. उन्होंने अपनी इस टौपलेस फोटोशूट की कुछ फोटोज को शेयर कर सोशल मीडिया पर आग लगा दी है. इन फोटोज में उन्होंने कैप्शन तो नहीं लेकिन अपनी फोटोग्राफर दोस्त दिविना रिखये को क्रेडिट दिया.

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इस शूट की सबसे खास बात उनकी बौडी पर बने शानदार टैटू हैं. उनके कंधे से लेकर पीठ तक बने टैटु उनकी खूबसूरती को और बढ़ा रही है. बेड पर टौपलेस और अपने टैटुज को शो औफ करती कृष्णा के इस फोटोज मे एक्सप्रेशन भी लाजवाब हैं.

इसके पहले भी कृष्णा ने अपने इसी फोटोशूट का एक फोटो अपलोड किया था. इसके अलावा भी वे अक्सर ही सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें शेयर करती रहती हैं. कृष्णा को फिल्मों में आने का शौक नहीं लेकिन वे कैमरे के पीछे रहकर एक अच्छी फिल्ममेकर बनना चाहती हैं. उन्होंने टाइगर की फिल्म मुन्ना माइकल में निर्देशक शब्बीर खान को असिस्ट भी किया था. कृष्णा एक्ट्रेस नहीं बनना चाहती लेकिन वे इंटरनेट सेंसेशन तो बन ही चुकी हैं. उम्मीद है वे जल्द ही अपनी एक फिल्म लेकर बौलीवुड में उतरे.

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अब धर्म की आग में और जलेगी दुनिया

किसी न किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह करना ही था. अमेरिका को अब एक सिरफिरा, दंभी और न देश, न जनता, न पार्टी की चिंता करने वाला राष्ट्रपति मिला है, जो मुसलिमों, लैटिनियों, मैक्सिकियों, इमिग्रैंटों, चीनियों, अखबार वालों सब से बिना चेहरे पर शिकन लाए ‘अमेरिका फर्स्ट’ कह कर कुछ भी कर सकता है. उस ने मुसलिमों के देश में प्रवेश पर पाबंदियां लगा कर यह साबित कर दिया है कि उस की पहले की बातें नरेंद्र मोदी के नारे ‘अच्छे दिन’ की तरह केवल चुनावी जुमले नहीं थे. वह अमेरिकन समाज के तानेबाने को तारतार करने की हिम्मत रखता है, उस से चाहे लाभ हो या न हो.

उस ने कुछ मुसलिम बहुल देशों से वीजा प्राप्त मुसलिमों के अमेरिका में प्रवेश पर जैसे ही प्रतिबंध लगाया. अमेरिका देश भर में मुसलिम विरोधी तत्त्व खड़े हो गए हैं. 2-4 जगह मसजिदें जला दी गई हैं. 2002 में मुसलिम आतंकवादियों द्वारा न्यूयौर्क के ट्विन टौवर पर हमले का बदला अब फिर शुरू हो गया है, क्योंकि अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया को तहसनहस करने के भी मुसलिम आतंकवादियों ने अपना कहर ढाहना बंद नहीं किया है.

अब हिटलरी अंदाज में इंतहाई बदला लेने का माहौल डोनाल्ड ट्रंप तैयार कर रहे हैं और अगर वे चुनाव जीत सकते हैं तो देश में ही नहीं विश्व भर में मुसलिम विरोधी माहौल पैदा कर सकते हैं, क्योंकि कितने ही देश मुसलिम आतंकवाद के शिकार हो चुके हैं.

डोनाल्ड ट्रंप गलत हैं, खब्ती हैं, मूर्ख हैं पर उन का मुकाबला अपने से कहीं ज्यादा कट्टरों से है, जो अपने गांव, शहर, देश और धर्म वालों किसी की भी चिंता नहीं करते और धर्म की आग में किसी को भी झोंकते हुए अपनेपराए को भूल जाते हैं.

अगर डोनाल्ड ट्रंप के लिए ‘अमेरिका फर्स्ट’ नारा है तो मुसलिम कट्टरपंथियों के लिए ‘इसलाम फर्स्ट’ है. अब समय आ गया है जब पश्चिमी एशिया के अमीर मुसलिम देश अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मलयेशिया, सूडान, नाइजीरिया, सोमालिया, इजिप्ट, लीबिया की सरकारें यह तय करें कि इसलाम के नाम पर कहर को अपने देशों में ही समाप्त करना होगा वरना डोनाल्ड ट्रंप हर देश में पैदा हो जाएंगे.

इसलाम हो या हिंदू धर्म अथवा ईसाई धर्म, किसी में कोई हीरेमोती नहीं जड़े हैं कि उसे मानने वाले सुखी हो जाते हैं. सभी धर्म फसाद की जड़ ज्यादा हैं, प्रेम का कम.

सिरफिरा शासक डोनाल्ड ट्रंप गलत कर रहा है पर अगर गोरी चमड़ी वाले अमेरिकी उसे समर्थन दे रहे हैं तो समझा जा सकता है कि उदारता की सीमा पूरी हो चुकी है और दंभी राष्ट्रपति के नेतृत्व में अमेरिका ने इसलाम पर ही नहीं हर गैर गोरे अमेरिका में रह रहे लोगों पर भी धावा बोल दिया है.

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औरतों को सिर्फ सैक्स टौय समझते हैं ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ दुनियाभर की महिलाओं ने यों ही नहीं मोरचा खोल रखा है. दरअसल, ट्रंप अलगअलग मौकों पर महिलाओं को ले कर अपनी घटिया मानसिकता का सुबूत कुछ इस तरह देते रहे हैं कि कोई भी उन से नफरत करने लगेगा. आइए नजर डालते हैं डोनाल्ड ट्रंप के महिलाओं को ले कर कुछ विवादित व शर्मनाम बयानों पर —

–       सितंबर 2015 में तत्कालीन प्रतिद्वंद्वी कार्ली फियोरेना के बारे में डोनाल्ड ने बड़े भद्दे तरीके से बोला था कि, ‘‘जरा इन का चेहरा देखिए. क्यों इस के लिए कोई वोट करेगा. क्या आप सोच भी सकते हैं कि ऐसे चेहरे वाली हमारी अगली राष्ट्रपति होगी?’’

–       सितंबर में ही पूर्व मिस यूनीवर्स और ऐक्ट्रैस मेलिसिया माचादो को डोनाल्ड ट्रंप ने मिस पिग्गी कहा था और बाद में उन के मोटापे को ले कर भी भद्दी टिप्पणी की थी.

–       अप्रैल 2015 में एक ट्वीट किया था, जिस में कहा था कि हिलेरी क्लिंटन अपने पति को संतुष्ट नहीं कर पाती हैं, ऐसे में वे अमेरिकी राष्ट्रपति बन कर देश को कैसे संतुष्ट करेंगी.

–       7 अगस्त, 2015 को डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में एंकर मेगिन कैली के बारे में कहा कि, ‘उस की आंखों से खून आ रहा था. दरअसल, उस से हर जगह से खून बाहर आ रहा था.’

–       एक वीडियो में ट्रंप रेडियो एवं टीवी प्रस्तोता बिली बुश के साथ बातचीत के दौरान महिलाओं के बारे में, बिना सहमति के महिलाओं को छूने व उन के साथ यौन संबंध बनाने के बारे में बेहद अश्लील टिप्पणियां करते दिखाई दिए थे.

–       मार्च 2013 में ट्रंप ने कौमेडियन रोजी ओ डोनेल को ले कर अनापशनाप बोला और फिर बजाय अपनी गलती मानने के उन्होंने कहा था, ‘‘मुझे ऐसा लगता है कि वह इसी लायक है. मुझे इस बात के लिए बिलकुल भी खेद नहीं है.’’

–       डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी बेटी इवांका के बारे में कहा था कि इवांका पहले से ज्यादा कामुक लग रही है. यदि मेरी खुद की बेटी नहीं होती तो मेरा उस से जरूर अफेयर होता.

–       1991 में डोनाल्ड ट्रंप ने महिलाओं के बारे में कहा था कि अगर उन के पास खूबसूरत ‘एस’ हैं, तो अमेरिकी मीडिया उन के बारे में क्या लिखता है, उस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है.

–       इन आरोपों के अलावा ट्रंप का एक और टेप सामने आया था जिस में वे 10 साल की बच्ची पर अभद्र टिप्पणी करते दिखे.

–       पीपल मैगजीन की पत्रकार ने भी ट्रंप पर जबरदस्ती किस करने का आरोप लगाया था. मैनहटन की जेसिका लीड्स के साथ डोनाल्ड ट्रंप ने 30 साल पहले एक फ्लाइट में अश्लील हरकत की थी.

–       जेसिका लीड्स अकेली नहीं हैं, पीपल मैगजीन की रिपोर्टर नताशा ने भी डोनाल्ड ट्रंप पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था.

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नेतागिरी की आड़ में नकली नोटों का धंधा

अचानक हुए हजार व 5 सौ के नोटबंदी के फैसले के बाद पूरे देश में अफरातफरी का जो माहौल कायम हुआ, उस से उत्तर प्रदेश का मेरठ शहर भी अछूता नहीं रहा. बैंकों में भीड़ उमड़ पड़ी थी. कोई पुराने नोटों को जमा करना चाहता था तो कोई अपनी जरूरत के हिसाब से नए नोट लेना चाहता था. हर रोज बैंकों में लंबी कतारें लग रही थीं. होने वाली परेशानी से लोगों में गुस्सा भी पनप रहा था. कई दिन बीत जाने के बाद भी हालात जस के तस थे. पुलिस को भी अतिरिक्त ड्यूटी करनी पड़ रही थी. कानूनव्यवस्था की स्थिति न बिगड़े, इस के लिए बैंकों में पुलिस बल तैनात कर दिया गया था. ऐसे में ही एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ को सूचना मिली कि कुछ लोग नए नकली नोटों का धंधा कर रहे हैं. इस के लिए उन्होंने पूरा नेटवर्क भी तैयार कर लिया है. सूचना गंभीर थी, लिहाजा जे. रविंद्र गौड़ ने इस की जानकारी एसपी (क्राइम) अजय सहदेव को दे कर सर्विलांस टीम को अविलंब काररवाई करने के आदेश दिए. थाना पुलिस को भी निर्देश दिए गए कि चैकिंग अभियान चला कर संदिग्ध लोगों की तलाश की जाए. सर्विलांस टीम ने कुछ संदिग्ध लोगों के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया.

23 दिसंबर, 2016 की रात नेशनल हाइवे संख्या 58 दिल्लीदेहरादून मार्ग स्थित पल्लवपुरम थानाक्षेत्र के मोदी अस्पताल के सामने पुलिस चैकिंग अभियान चला रही थी. आनेजाने वाले संदिग्ध वाहनों की जांच सख्ती से की जा रही थी. दरअसल पुलिस को सूचना मिली थी कि नकली नोटों का धंधा करने वाले कुछ लोग उधर से निकलने वाले हैं. सीओ वी.एस. वीरकुमार के नेतृत्व में थाना पल्लवपुरम पुलिस और सर्विलांस टीम इस चैकिंग अभियान में लगी थी. पुलिस को एक काले रंग की इंडीवर लग्जरी कार आती दिखाई दी. कार पर किसी पार्टी का झंडा लगा था और उस के अगले शीशे पर बीचोबीच बड़े अक्षरों में वीआईपी लिखा स्टिकर लगा था.

पुलिस ने कार को रोका. उस में कुल 3 लोग सवार थे. एक चालक की सीट पर, दूसरा उस की बराबर वाली सीट पर और तीसरा पिछली सीट पर बैठा था. कार रुकवाने पर उस में सवार कुरतापायजामा और जवाहर जैकेट पहने नौजवान ने रौबदार लहजे में पूछा, ‘‘कहिए, क्या बात है, मेरी कार को क्यों रोका?’’

‘‘सर, रूटीन चैकिंग है.’’ एक पुलिस वाले ने कहा.

पुलिस वाले की यह बात उस नौजवान को नागवार गुजरी हो, इस तरह उस ने तंज कसते हुए कहा, ‘‘रूटीन चैकिंग है या आम लोगों को परेशान करने का हथकंडा. आप यह सब करते रहिए और हमें जाने दीजिए.’’

‘‘सौरी सर, हमें आप की कार की तलाशी लेनी होगी.’’ पुलिस वाले ने कहा.

पुलिस वाले का इतना कहना था कि युवक गुस्से में चीखा, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा, हम कोई चोरउचक्के हैं. तुम जानते नहीं मुझे. मैं लोकमत पार्टी का नेता हूं.’’

‘‘वह सब तो ठीक है सर, लेकिन यह हमारी ड्यूटी है. वैसे भी कानून सब के लिए एक है.’’

‘‘पुलिस का काम अपराधियों को पकड़ना है न कि हम जैसे लोगों को परेशान करना. मेरी पहुंच बहुत ऊपर तक है. अगर मैं अपने पावर का इस्तेमाल करने पर आ गया तो एकएक की वरदी उतर जाएगी.’’ युवक ने धमकी दी.

वह युवक चैकिंग का जिस तरह विरोध कर रहा था, उस से पुलिस को उस पर शक हुआ. एक बात यह भी थी कि कई बार शातिर लोग इस तरह की कारों का इस्तेमाल गलत कामों के लिए करते हैं. पुलिस ने तीनों युवकों को जबरदस्ती नीचे उतारा और कार की तलाशी शुरू कर दी. पुलिस को कार में एक बैग मिला. पुलिस ने जब उस बैग को खोला तो उस में 2 हजार और 5 सौ के नए नोट बरामद हुए. उन के मिलते ही पुलिस को धमका रहे युवक के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. पुलिस ने बरामद रकम को गिना तो वह 4 लाख 27 हजार रुपए निकली. पुलिस ने उस के बारे में पूछा, ‘‘यह पैसा कहां से आया?’’

‘‘सर, ये हमारे हैं.’’ जवाब देते हुए युवक सकपकाया.

पुलिस ने नोटों पर गौर किया तो उन का कागज न सिर्फ हलका था, बल्कि रंग भी नए नोटों के मुकाबले थोड़ा फीका था. इस से पुलिस को नोटों के नकली होने का शक हुआ. दूसरी तरफ बरामद रकम के बारे में युवक कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके. पुलिस ने कार की एक बार फिर तलाशी ली तो उस में से एक तमंचा और 2 चाकू बरामद हुए. पुलिस ने तीनों को हिरासत में लिया और थाने ला कर उन से पूछताछ शुरू कर दी. पहले तो उन्होंने पुलिस को चकमा देने का प्रयास किया, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो उन्होंने जो सच कबूला, उसे सुन कर पुलिस हैरान रह गई. वे तीनों नकली नोट छाप कर उन्हें बाजार में चलाने का धंधा कर रहे थे.

पुलिस से बहस करने वाला युवक ही इस धंधे का मास्टरमाइंड था. वह एक पार्टी का पदाधिकारी था और नेतागिरी की आड़ में ही नकली नोटों के इस धंधे को अंजाम दे रहा था. वह नकली नोटों के बदले जमा होने वाली असली रकम के बल पर चुनाव लड़ना चाहता था. जिन युवकों को गिरफ्तार किया गया था, उन के नाम मोहम्मद खुशी गांधी, ताहिर और आजाद थे. तीनों मेरठ के ही भावनपुर थानाक्षेत्र के गांव जेई के रहने वाले थे. पुलिस ने उन के गांव जा कर उन की निशानदेही पर खुशी के घर से प्रिंटर, स्कैनर, कटर और एक प्लास्टिक के कट्टे में भरी कागज की कतरनें बरामद कीं. बरामद सामान के साथ पुलिस उन्हें थाने ले आई. पुलिस ने तीनों युवकों से विस्तृत पूछताछ की तो एक युवा नेता के गोरखधंधे की ऐसी कहानी सामने आई, जो हैरान करने वाली थी. मुख्य आरोपी खुशी गांधी हनीफ खां का बेटा था. हनीफ के पास काफी खेतीबाड़ी थी. सुखीसंपन्न होने की वजह से गांव में उन का रसूख था. खुशी अपने 5 भाइयों में चौथे नंबर पर था. उस के बड़े भाई खेती करते थे. लेकिन खुशी का मन खेती में नहीं लगा. गलत संगत में पड़ने की वजह से उस के कदम बहक गए थे.

बेटे का चालचलन देख कर हनीफ ने उसे समझाने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन उस के मन में तो कुछ और ही था. खुशी महत्त्वाकांक्षी युवक था. वह दिन में सपने देखता था और ऊंची उड़ान भरना चाहता था. वह इस सच को स्वीकार नहीं करना चाहता था कि बिना मेहनत के सपनों की इमारत खड़ी नहीं होती. वक्त के साथ खुशी के रिश्ते जरायमपेशा लोगों से भी हो गए. संगत अपना गुल जरूर खिलाती है. कुछ संगत तो कुछ शौर्टकट से अमीर बनने की चाहत उसे जुर्म की डगर पर ले गई. हर गलत काम दफन ही हो जाए, यह जरूरी नहीं है. आखिर एक मामले में वह पुलिस के शिकंजे में आ गया. दरअसल, 2 साल पहले मेरठ के ही टीपीनगर थानाक्षेत्र के एक तेल कारोबारी के यहां डकैती पड़ी. इस मामले में पुलिस ने खुशी को भी गिरफ्तार कर के जेल भेजा था. कुछ महीने बाद उस की जमानत हो गई थी. अच्छा आदमी वही होता है, जो ठोकर लगने पर संभल जाए. लेकिन खुशी उन लोगों में नहीं था. अपने जैसे युवकों की उस की मंडली थी. वह छोटेमोटे अपराध करने लगा था. किसी का एक बार अपराध में नाम आ जाए और उस के बाद पुलिस उसे परेशान न करे, ऐसा नहीं होता. खुशी पुलिस के निशाने पर आए दिन आने लगा तो खाकी से बचने के लिए उस ने राजनीति को हथियार बना लिया. इस के लिए उस ने अलगअलग पार्टी के नेताओं से रिश्ते बना लिए. वह रैलियों में भी जाता और लड़कों की टोली अपने साथ रखता. अपना रसूख दिखाने के लिए उस ने एक इंडीवर कार खरीद ली.

उस ने नेशनल लोकमत पार्टी का दामन थाम लिया. खुशी युवा था. पार्टी ने न सिर्फ उसे प्रदेश अध्यक्ष बना दिया, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए वह पार्टी का प्रत्याशी भी बन गया. कार में सायरन व पार्टी का झंडा लगाने के साथ उस ने उस पर वीआईपी भी लिखवा दिया था. 8 नवंबर को प्रधानमंत्री की नोटबंदी की घोषणा के बाद पुरानी मुद्रा पर रोक लग गई और नई मुद्रा आनी शुरू हुई. खुशी को लगा कि अमीर बनने का यह अच्छा मौका है. उस ने सोचा कि अगर पैसा होगा तो वह चुनाव भी अच्छे से लड़ सकेगा. पैसों के लिए ही उस के मन में नकली नोट छापने का आइडिया आ गया.

उस ने अपने 2 साथियों ताहिर और आजाद से बात की. वह जानता था कि देहाती इलाकों में नई करेंसी में असली और नकली की पहचान करना आसान नहीं है. क्योंकि नए नोट अभी पूरी तरह प्रचलन में नहीं आए हैं. उस ने शहरी बाजारों में भी नकली नोट चलाने के बारे में सोच लिया. इस खुराफाती काम में उस ने जरा भी देरी नहीं की और बाजार से अच्छे किस्म का स्कैनर, प्रिंटर और कागज खरीद लाया. फिर क्या था, उस ने नए नोटों से नकली नोटों के प्रिंट निकालने शुरू कर दिए.

खुशी ने शहर जा कर खरीदारी में वे नोट चलाए तो आसानी से चल गए. इस के बाद उस के हौसले बढ़ गए और वह नकली नोट छापने और चलाने लगा. उन रुपयों से उस ने जम कर शौपिंग की. देहात के भोलेभाले लोगों को भी उस ने अपना निशाना बनाया. खुशी ने नकली नोट चलाने के लिए कुछ एजेंट बना रखे थे, जिन्हें वह 40 हजार के पुराने नोटों के बदले एक लाख के नए नकली नोट देता था. वह कार का सायरन बजाते हुए पुलिस के सामने से निकल जाता और उस पर किसी को शक नहीं होता. वह खादी की आड़ में खाकी वरदी से बचे रहना चाहता था. खुशी शातिर किस्म का युवक था. वह जानता था कि यह काम ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है, क्योंकि जल्दी ही लोग असलीनकली नोट में फर्क करना सीख जाएंगे, इसलिए वह जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा नोट खपाने की कोशिश कर रहा था. यही वजह थी कि वह पुलिस के निशाने पर आ गया.

पूछताछ के बाद एसपी (सिटी) आलोक प्रियदर्शी ने पुलिस लाइन में प्रैसवार्ता कर के युवा नेता के कारनामों का खुलासा किया. इस के बाद पुलिस ने खुशी और उस के साथियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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अस्थमा रोगियों को हो सकती है स्लीप एपनिया

रात को सांस लेने में तकलीफ के चलते बारबार आंख खुलने की समस्या से अगर आप परेशान हैं तो इस की वजह स्लीप एपनिया हो सकती है. इस बीमारी में रात को सोते समय ऊपरी एयरवेज ब्लौक होने से सांस लेने में परेशानी होने लगती है. इस बीमारी में सांस 10 से 20 सैकंड के बीच रुकती है. लेकिन समस्या यह है कि ऐसा रात में कई बार होता है और इस वजह से रोगी रातभर सो नहीं पाता.

रात को नींद न पूरी होने के कारण उसे दिनभर नींद की झपकियां आती रहती हैं और चिड़चिड़ाहट रहती है. इस बीमारी की वजह से दुर्घटना होने का खतरा भी बढ़ जाता है.

आंकड़ों के अनुसार, औब्सट्रैक्टिव स्लीप एपनिया यानी ओएसए से 5 में से 1 वयस्क पुरुष प्रभावित है. सांस से जुड़ी बीमारियों में अस्थमा के बाद यह दूसरी ऐसी बीमारी है जिस की सब से ज्यादा पहचान हुई है. जिन लोगों को यह बीमारी होती है उन की गरदन की मांसपेशियां सोते समय शिथिल हो जाती हैं जिस से एयरवेज सिकुड़ जाते हैं और सांस लेने में तकलीफ होने लगती है.

ओएसए से उपजी बीमारियां

ओएसए से रोगी को डायबिटीज, हाई ब्लडप्रैशर, दिल की बीमारियां, स्ट्रोक और वजन बढ़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं. ओएसए और ब्रोनकिल अस्थमा एकदूसरे से जुड़े हुए हैं. हालिया कुछ अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों से पता चला है कि अस्थमा के रोगियों में ओएसए होने का खतरा ज्यादा रहता है. कई अस्थमा रोगियों को पता ही नहीं चलता कि वे ओएसए से पीडि़त हैं और इस वजह से वे ओएसए का इलाज नहीं कराते. इस कारण उन्हें बारबार अस्थमा का अटैक पड़ता है और लगातार दवाइयों की जरूरत रहती है. इसलिए, स्लीप एपनिया के बारे में जानना और इस का एडवांस तकनीकों से इलाज करा कर जिंदगी को बेहतर बनाना जरूरी है.

इलाज है जरूरी

अगर स्लीप एपनिया ज्यादा गंभीर नहीं है तो लाइफस्टाइल में बदलाव कर के ठीक किया जा सकता है. इस में वजन कम करना और सोने के तरीके को बदलने जैसे जीवनशैली से जुड़े बदलाव शामिल हैं. लेकिन गंभीर मामलों में, जहां ओएसए से डायबिटीज, हाई ब्लडप्रैशर और हार्ट अटैक जैसी बीमारियां जुड़ी हों, मैडिकल की नई तकनीकों की मदद से नजात पाया जा सकता है.

अब मैडिकल टैक्नोलौजी की सहायता से ओएसए का समय पर पता लगाया जा सकता है और इस का इलाज किया जा सकता है. मैडिकल की नई तकनीकों की मदद से स्लीप एपनिया के रोगियों की एयरवेज को खोला जाता है ताकि रोगी आसानी से सांस ले कर रातभर चैन की सांस ले सके.

उपयोगी उपकरण

सीपीएपी मशीन, मुंह के उपकरण और खासतौर पर तैयार किए गए तकियों की मदद से ओएसए को नियंत्रित किया जा सकता है. आमतौर पर मेनडीबुलर एडवांसमैंट डिवाइस यानी एमएडी का इस्तेमाल किया जाता है. इसे ऊपर व नीचे के दांतों में लगा दिया जाता है और निचले जबड़ों को आगे ला कर जीभ व तालू को स्थिर रखा जाता है, जिस से सोते समय आसानी से सांस ली जा सके.

कौंटीन्यूअस पौजिटिव एयरवे प्रैशर थेरैपी यानी सीपीएपी स्लीप एपनिया के इलाज में बेहद कारगर है. इस में नाक के ऊपर मास्क लगाया जाता है, जो नाक और मुंह में प्रैशर डालता है और इस से सोते समय सांस की नलियां खुली रहती हैं.

इस के अलावा, जीभ को स्थिर रखने का उपकरण भी इस्तेमाल किया जाता है, जो एयरवेज को खोलता है. कई तरह के तकिए भी डिजाइन किए गए हैं जिन्हें सीपीएपी मशीन के साथ या इस के बिना इस्तेमाल किया जा सकता है. जिन लोगों को सीपीएपी मशीन लगाने में मुश्किल होती है, उन के लिए कुछ नर्व स्टीमुलेशन उपकरण भी उपलब्ध हैं.

साल 2014 में शोधकर्ताओं ने नया इलाज ढूंढ़ा था जिस में जब शरीर को सांस लेने की जरूरत होगी तो सैंसर तंत्रिकाओं को स्टीमुलेट करेंगे और रोगी सांस लेने में सक्षम होगा.

सर्जरी भी है विकल्प

सर्जरी की मदद से भी ओएसए का इलाज किया जाता है. इस में ऊपरी एयरवेज, मुंह के ढांचे और मोटापे के रोगियों की बेरिएट्रिक सर्जरी कर के इलाज किया जाता है. सर्जरी रोगी की स्थिति के अनुसार ही की जाती है. हाल ही में हुई नई खोजों ने सर्जरी को काफी आसान व सुरक्षित कर दिया है जिस में लेजर एसिड युविलोपेलेटोप्लौस्टी, रेडियो फ्रिक्वैंसी एबलेशन, पेलेटल इंप्लांट और ऊपरी एयरवेज मांसपेशियों में इलैक्ट्रिकल स्टीमुलेशन शामिल हैं.

इस के अलावा, इंस्पायर नाम की थेरैपी में ब्रीदिंग सैंसर, स्टीमुलेशन लीड और छोटी बैटरी/कंप्यूटर प्रत्यारोपित किया जाता है. इस इलाज में भी काफी सफलता मिली है. सो, स्लीप एपनिया की बीमारी से जुड़े लक्षणों को पहचानें और एडवांस तकनीकों की मदद से इलाज करवाएं ताकि आप रात को चैन की नींद का लुत्फ सकें. अगर इसे सामान्य बीमारी समझ कर अनदेखा करेंगे तो बाद में यह लापरवाही बड़ी मुसीबत बन सकती है.

(लेखक नई दिल्ली स्थित नैशनल हार्ट इंस्टिट्यूट में सीनियर कंसल्टैंट हैं.)

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गर्भ के दौरान इन सेहतमंद आदतों को अपनाएं

गर्भावस्था के दौरान मां की सेहत का तुरंत और लंबे समय में बच्चे की सेहत पर गहरा प्रभाव पड़ता है. गर्भकाल की डायबिटीज और एनीमिया, यानी कि मां में एनीमिया और डायबिटीज बच्चे की सेहत पर बुरा असर डाल सकते हैं. मां में एनीमिया हो तो बच्चे का जन्म के समय 6.5 प्रतिशत मामलों में वजन कम होने और 11.5 प्रतिशत मामलों में समय से पहले प्रसव की समस्या हो सकती है. गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज की वजह से बच्चे को 4.9 प्रतिशत मामलों में एनआईसीयू (नवजात गहन चिकित्सा इकाई) में भरती होने और 32.3 प्रतिशत मामलों में सांस प्रणाली की समस्याएं होने का खतरा रहता है.

गर्भावस्था में इन समस्याओं की वजह से पैदा हुए बच्चों में मोटापे, दिल के विकार और टाइप 2 डायबिटीज होने का खतरा उम्रभर रहता है.

गर्भावस्था के दौरान हाइपरटैंशन, जो कि 20वें सप्ताह में होता है, पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होती है. इस से गर्भनाल (एअंबीलिकल कौर्ड) की रक्तधमनियां सख्त हो जाती हैं जिस से भू्रूण तक औक्सीजन और पोषण उचित मात्रा में नहीं पहुंच पाता. इस वजह से गर्भाशय में बच्चे की वृद्धि में रोक, जन्म के समय बच्चे का कम वजन, ब्लडशुगर में कमी और लो मसल टोन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. कुछ मामलों में आगे चल कर किशोरावस्था में बच्चे में हाइपरटैंशन की समस्या भी हो सकती है.

मां में मोटापा हो तो गर्भावस्था में डायबिटीज होने की संभावना होती है जिस वजह से समय से पहले प्रसव और बच्चे में डायबिटीज व मोटापा होने के खतरे रहते हैं. गर्भावस्था के दौरान मां के पोषण में मामूली कमी का भी प्रतिकूल असर बच्चे की सेहत पर पड़ सकता है, जैसे कि गर्भावस्था में विटामिन डी की कमी से आगे चल कर जच्चा और बच्चा दोनों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

डा. संजय कालरा, कंसल्टैंट एंडोक्राइनोलौजिस्ट, भारती हौस्पिटल, करनाल एवं वाइस पै्रसिडैंट, साउथ एशियन फैडरेशन औफ एंडोक्राइन सोसायटीज, कहते हैं कि अगर मां को गर्भावस्था में डायबिटीज या हाइपरटैंशन हो जाए तो बच्चे की सेहत का, खासतौर पर शुरुआती दिनों में, पूरा ध्यान रखना चाहिए. बच्चे के ग्रोथ चार्ट पर नियमित ध्यान देते रहना चाहिए और रोगों की रोकथाम वाली जीवनशैली अपनानी चाहिए. आहार में आयरन, फोलेट और विटामिन बी12 की कमी की वजह से गर्भवती महिलाओं में एनीमिया होने की संभावना काफी ज्यादा होती है.

गर्भावस्था में आयरन की अत्यधिक जरूरत होने की वजह से यह समस्या और भी बढ़ जाती है. एनीमिया की वजह से गर्भनाल से भ्रूण तक औक्सीजन जाने में कमी से शिशु के विकास में कमी हो सकती है और एंडोक्राइन ग्रंथि की कार्यप्रणाली पर असर पड़ सकता है.

भारतीय महिलाओं को आयरन और हेमाटोपौयटिक (रक्तोत्पादक) विटामिन देने चाहिए ताकि गर्भावस्था से पहले और गर्भावस्था के दौरान हीमोग्लोबीन का उचित स्तर बना रहे. गर्भावस्था में डायबिटीज और हाइपरटैंशन के  आने वाले जीवन में पड़ने वाले प्रभावों से बचने के लिए मां और बच्चे दोनों को ही रोगों की रोकथाम वाली जीवनशैली अपनानी चाहिए.

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