अब तो पकौड़े ही तलने पड़ेंगे

देश की आरतों को नीरव मोदी और गीतांजलि ज्वैलर्स को बचाने के लिए एकजुट हो जाना चाहिए. देश की औरतों से मतलब है पैसे वाली, ठसके वाली, जेवरों से लदीफंदी हुईं. नीरव मोदी, गीतांजलि ज्वैलर्स, गिली इंडिया, नक्षत्र जैसी कंपनियों ने ही उन्हें एक विशेष आभा दी है. पार्टियों में नीरव मोदी के हार पर हाथ फिराते हुए कहना कि ‘मैं तो सिर्फ नीरव मोदी ही’ पहनती हूं, वैसा ही हो गया था जैसे भगवाधारी कहें कि अब तक के सर्वोत्तम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं. उस नीरव मोदी या मेहुल चोकसी को भगोड़ा बताने का अर्थ है इन औरतों के लौकरों में रखे लाखों के जेवरों का पकौड़ा बना डालना. यह किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है.

सोने के लिए हर युग में, हर राजा और हर रंक ने हमेशा हर तरह के काम किए हैं. पिरामिडों के युग में राजेरानियां अपने साथ मरने के बाद भी सोना ले जाते रहे हैं, जो इन पिरामिडों में आज 5000 साल की लूट के बाद भी थोड़ाबहुत मिल जाता है और कुछ स्मगलरों के पास जाता है, कुछ संग्रहालयों में.

हिंदी फिल्मों का एक युग तो केवल सोने की स्मगलिंग पर ही टिका था. हर दूसरी फिल्म में एक तस्कर होता था, जो देशविदेश से सोना ले कर आता था या सोने को चुरा कर भागने वाला चोर होता था. रामजी ने रावण को भी तो इसी सोने के मोह के कारण मारा था. सीता ने राम से स्वर्णमृग लाने के लिए जिस तरह की जिद की थी आज की औरतों को भी उसी तरह की जिद नीरव मोदी और मेहुल चोकसी जैसे स्वर्णमृगों को बाइज्जत देश लाने के लिए करनी चाहिए.

सोना किसी तरह से गलत नहीं होता है. स्वर्ण भस्म का नाम ले कर लोगों को न जाने क्याक्या आयुर्वेदिक दवाओं में खिला दिया जाता है. उस सोने की उपलब्धि कराने के लिए क्या देश एक खट्टी डकार भी नहीं ले सकता?

यह औरतों का, अमीर पैसे वाली औरतों का, अपमान है कि उन की सेवा करने वाले नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के परिवार वालों को इस बुरी तरह लताड़ा जा रहा है.

हमारे नेता इस तरह की औरतों के गुणों और प्रभाव को जानते हैं तभी तो कभी दावोस, (स्विट्जरलैंड), कभी गुजरात, कभी शोरूमों में इन प्रतिभाशाली ज्वैलर्स की संगति में दिखते थे, वे औरतों के वोट इकट्ठे कर रहे थे. इन औरतों के लिए सोने की अवैलेबिलिटी को सुदृढ़ कर रहे थे.

क्या इन औरतों का यह कर्तव्य नहीं कि ये पंजाब नैशनल बैंक के सामने अपनी एअरकंडीशंड गाडि़यों में बैठ कर प्रदर्शन करें?

देखिए, अगर सेवा करानी है, तो कभीकभार कष्ट भोगना ही होगा. नीरव मोदी जैसों का अपमान करने की जुर्रत किसी में नहीं हो, इस के लिए कुछ करिए तुरंत वरना अगला चमचमाता हार नहीं मिलेगा.

शराब है खराब

एक बोध कथा है जिस में अलौकिकता पर न जाएं. कथा के  अनुसार, एक दिन शैतान मनुष्य के पास आया और बोला, ‘तुम सब मरने ही वाले हो. मैं तुम्हें मौत से बचा सकता हूं बशर्ते, तुम अपने नौकर को मार डालो, अपनी पत्नी की पिटाई करो या यह शराब पी लो.’

मनुष्य ने कहा, ‘मुझे जरा सोचने दीजिए अपने विश्वसनीय नौकर की हत्या करना मेरे लिए संभव नहीं, पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करना बेतुकी बात होगी. हां, मैं यह शराब पी लूंगा.’ उस के बाद उस ने शराब पी ली और नशे में धुत हो कर पत्नी को पीटा तथा जब नौकर ने उस की पत्नी का बचाव करने की कोशिश की तो नौकर को मार डाला.

उपरोक्त बोधकथा से मद्यपान के हमारे जीवन पर पड़ने वाले कुप्रभाव को भलीभांति समझा जा सकता है. निसंहेद मद्यपान का हमारे जीवन पर घातक प्रभाव पड़ता है. किंतु इस के बावजूद आज जिधर देखो उधर युवाबूढ़े, स्त्रीपुरुष, अमीरगरीब सभी इस घातक जहर की चपेट में नजर आते हैं. शराब पीना आजकल फैशन सा बन गया है. फैशनपरस्त लोगों ने साजसिंगार तथा वेशभूषा तक ही सीमित न रह कर शराब को भी उस के दायरे में समेट लिया है. शराब पीने से इनकार करने वाले को अब पुराने विचारों का तथा रूढि़वादी करार दिया जाता है और अपने को आधुनिक व प्रभावशाली साबित करने का इच्छुक हर व्यक्ति उस के खतरों को नजरअंदाज करते हुए या जानेअनजाने में इस के जानलेवा जाल में फंसता जा रहा है.

क्यों पीते हैं शराब

इस के कई कारण हैं. अकसर देखने में आता है कि मानसिक तनाव के कारण लोग शराब पीते हैं. जब व्यक्ति किसी समस्या का हल पाने में असफल होता है तो शराब पी कर उसे भूलने की चेष्टा करता है. अधिकांश मामलों में यही देखा गया है कि हताशा मद्यपान का कारण बनती है. पारिवारिक कलह, आर्थिक अभाव या कभीकभी शारीरिक यंत्रणा से मुक्ति पाने के लिए लोग इसे मुंह से लगा बैठते हैं. किंतु क्या इसे उचित कहा जा सकता है? शराब किसी समस्या का समाधान तो नहीं हो सकती या शराब पी कर भूलने से आप की समस्या का अंत तो नहीं हो जाता. किसी भी परेशानी से घबरा कर शराब पीना एक और परेशानी को गले लगाना है, उस से छुटकारा पाना नहीं.

शराब पीने के लिए लोगों के पास बहानों की कमी नहीं है. कुछ व्यक्ति केवल इसलिए शराब पीते हैं कि लोग उन्हें विशिष्ट समझें, वे शराब को स्टेटस व संपन्नता का प्रतीक मानते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि शराब का सेवन करना दिमागी खोखलेपन की निशानी भी है. दिनभर मेहनत करने के बाद शाम को शराब पीने वालों का तर्क होता है कि इस से थकान दूर हो जाती है. ये लोग शराब पीने के बाद डगमगा कर चलने व बेहोश हो जाने को ही शायद थकान का दूर होना समझते हैं.

आजकल किसी भी सामाजिक उत्सव या त्योहार पर गिलासों की खनखनाहट होनी आम बात होती है. ऐसे अवसरों पर अकसर ही यह सुना जाता है कि सोसायटी में रहना है तो उस के हिसाब से ही चलना होगा, और फिर सोसायटी में यह सब चलता ही है. इन चीजों को अपनाए बगैर कोई भी उन्नति नहीं कर सकता. यहां ये लोग शायद यह भूल जाते हैं कि कोई भी व्यक्ति अपने परिश्रम व लगन से उन्नति करता है, शराब पीने से नहीं.

शराब के संपर्क में आने के बाद व्यक्ति के पास चरित्र नाम की कोई चीज नहीं रह जाती है. कहने को इस के बचाव में वह कुछ भी कहता रहे, शराब पी कर वह केवल अपनेआप को धोखा देता है और जो व्यक्ति अपनेआप को धोखा देता है उस का क्या चरित्र हो सकता है.

विचारशक्ति खत्म होती है

कभीकभी कुछ व्यक्ति केवल झगड़ा करने के लिए शराब पीते हैं ताकि स्फूर्ति आ जाए. जबकि, ऐसा होता नहीं है. शराब पीने के बाद आदमी सामान्य नहीं रह पाता है क्योंकि हमारे मस्तिष्क में कुछ ऐसे तंत्र होते हैं जो हमारे बोलनेचालने या काम करने के तौरतरीके आदि को नियंत्रित करते हैं. शराब पीने के बाद वह नियंत्रण समाप्त हो जाता है और आदमी के सोचनेसमझने की शक्ति खत्म हो जाती है. वह उचितअनुचित का भेद नहीं कर पाता है और सभ्यता व शिष्टाचार की सीमा लांघ कर अपशब्द बोलने लगता है. इस के अतिरिक्त, कुछ व्यक्ति यह सोच कर भी शराब पीते हैं कि वे जिस से झगड़ा करने जा रहे हैं वह उन्हें नशे में देख कर डर जाएगा. पर मजा तो तब आता है जब इस का उलटा होता है और इन की पिटाई हो जाती है क्योंकि नशे में इन की प्रतिरोध क्षमता खत्म हो जाती है.

जो व्यक्ति शराब के आदी नहीं होते हैं वे कभीकभी मित्रों आदि पर रोब गांठने के लिए पी लेते हैं तो कुछ लोग यह सोचते हैं कि जहां अन्य सभी पीने वाले हों, वहां एक व्यक्ति शराब को हाथ नहीं  लगाता है तो लोग उसे बेवकूफ समझेंगे और उसे इग्नोर करने लगेंगे. इसलिए वह न चाहते हुए भी अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए पीतापिलाता रहता है. ऐसा कर के वह सोचता है कि वह भी आधुनिक और उच्च श्रेणी में आ गया है. किंतु पीने के बाद यही व्यक्ति नशें में धुत हो कर जब घर जाता है और अपनी पत्नी व बच्चों को पीटता है तो ऐसा कर के वह अपनी नीचता का ही प्रदर्शन करता है, आधुनिकता या श्रेष्ठता का नहीं.

छोटेछोटे बालक शुरू में अपने बड़ेबुजुर्गों की देखादेखी शराब पीना शुरू करते हैं, क्योंकि जब वे उन्हें पीता देखते हैं तो उन के बालसुलभ मन में भी वैसा ही करने की स्वाभाविक इच्छा जागृत होती है. इस तरह वे छिप कर शराब पीना शुरू कर देते हैं और आगे चल कर इस के आदी हो जाते हैं.

पीने की आदत

एक बार शराब का सेवन करने के बाद व्यक्ति इस की गिरफ्त में आ जाता है और फिर एक आदत बन जाती है. पहली बार शराब का सेवन करते समय आदमी यह सोचता है कि वह शराब का आदी थोड़े ही बन रहा है. पर वह यह नहीं जानता है कि एक बार पीना शुरू कर देने पर इतना विवेक किस में होता है कि अच्छाबुरा सोच सके.

शराब पीने की आदत पड़ जाने पर लोग पैसा न हो तो उधार ले कर पीना शुरू कर देते हैं. उधार न मिलने पर शराब प्राप्त करने के लिए लोग चोरी, जेबकतरी और रिश्वतखोरी आदि करते हैं. घर में कलह शुरू होता है और घर बरबाद हो जाता है. शराब के नशे में गाडि़यां चला कर दुर्घटनाएं, हत्याएं, बलात्कार व अन्य जघन्य अपराध करने के समाचार हम प्रतिदिन पढ़ते, सुनते व देखते हैं. ऐसा कौन सा कुकृत्य है जो शराब के नशे में और शराब को प्राप्त करने के लिए नहीं किया जाता.

इन सब बातों के विपरीत कोई शराबी यह नहीं चाहता कि उस की संतान शराब को हाथ लगाए. वह यह  भी नहीं चाहता कि उस के निवास स्थान के पास शराब की दुकान या होटल आदि हो. क्या यह तथ्य यह बात सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि एक शराबी भी शराब को घृणा की दृष्टि से देखता है.

इन सब बातों को जानते व समझते हुए भी बहुत से लोग शराब पीना छोड़ना नहीं चाहते हैं. कुछ लोग छोड़ना चाहते हुए भी कहते हैं कि क्या करें, छूटती ही नहीं. माना शराब मनुष्य की बहुत बड़ी कमजोरी है पर कमजोरियों पर विजय भी तो मनुष्य ने ही पाई है. ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जिसे मनुष्य पूरी इच्छा से करना चाहे और न कर सके. आवश्यकता केवल दृढ़प्रतिज्ञ होने की है.

गुरमीत राम रहीम : कलंक का बड़ा किरदार

दुनिया भर में प्रसिद्ध डेरा सच्चा सौदा की स्थापना 29 अप्रैल, 1948 को संत मस्ताना बलोचिस्तानी ने रूहानी संस्था के रूप में की थी. वह ‘हिज होलिनैस बेपरवाह मस्तानाजी महाराज’ के रूप में प्रसिद्ध हुए. इस डेरे का मुख्य मकसद था लोगों को धार्मिक शिक्षा देना. 18 अप्रैल, 1960 को मस्तानाजी के प्राण त्यागने के बाद 41 साल के शाह सतनाम सिंहजी को इस डेरे का मुखिया बनाया गया.

23 सितंबर, 1990 को महज 23 साल की उम्र में गुरमीत सिंह नाम के नौजवान ने डेरा की गद्दी संभाली. उस समय शाह सतनाम सिंहजी ने उन्हें नया नाम दिया था बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह. बाद में उन्होंने इस नाम के साथ ‘इंसां’ शब्द जोड़ लिया.

इस डेरे की पहले से ही काफी मान्यता थी. हरियाणा के शहर सिरसा में इस का मुख्यालय था, जहां प्रवचन सुनने के लिए हजारों अनुयायी आते थे. लेकिन गुरमीत राम रहीम सिंह के प्रमुख बनने के बाद डेरे की लोकप्रियता में जबरदस्त इजाफा हुआ. हिंदुस्तान में 46 जगहों पर इस के आश्रम स्थापित होने के अलावा अमेरिका, कनाडा, यूएई, आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में भी इस डेरे की शाखाएं खुल गईं.

डेरा प्रबंधकों का दावा था कि सच्चा सौदा के अनुयायियों की संख्या 6 करोड़ तक पहुंच गई थी. जो भी था, बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह को उन के अनुयायी भगवान का अवतार मानने लगे थे. सन 2015 में जारी सर्वाधिक शक्तिशाली भारतीयों की सूची में बाबा का नाम 96वें नंबर पर था.

लेकिन इस लोकप्रिय कथित ‘भगवान’ के खिलाफ डेरे की 2 साध्वियों की शिकायत पर दुष्कर्म के 2 मुकदमे दर्ज हो गए. इन मुकदमों की सुनवाई पंचकूला की सीबीआई अदालत में हो रही थी. 25 अगस्त, 2017 को अदालत में फैसला होना था कि दुष्कर्म के इन मामलों में बाबा गुरमीत राम रहीम इंसां दोषी हैं या नहीं?

अभी तक इन मुकदमों की सुनवाई वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए हो रही थी, लेकिन 25 अगस्त को बाबा को अदालत में हाजिर होना जरूरी था. बाबा को पंचकूला आना था तो उन के अनुयायी भी पंचकूला आ सकते थे. बाबा के बरी होने पर उन के अनुयायियों से कोई खतरा नहीं था, लेकिन अगर कहीं अदालत ने बाबा को दोषी ठहरा दिया तो स्थिति तनावपूर्ण हो सकती थी. इस के लिए पुलिस का चौकस रहना जरूरी था.

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असमंजस में पुलिस

इस तरह की स्थिति से बचने के लिए पुलिस ने इलाके के असलहाधारकों को अपने हथियार थाने में जमा कराने के आदेश दे दिए. इस के बाद भी अगर किसी तरह का हंगामा होता है तो पुलिस ने उस से भी निपटने की व्यवस्था कर ली थी. हरियाणा के डीजीपी बलजीत सिंह संधू ने 20 अगस्त को ही कह दिया था कि रामपाल के मामले में बिगड़े हालात से पुलिस सबक ले चुकी है.

इसलिए इस बार स्थिति बिगड़ने नहीं दी जाएगी. अगर जरूरत पड़ी तो स्थिति से निपटने के लिए सेना भी बुलाई जा सकती है. इस बीच सिरसा स्थित डेरा के मुख्यालय पर डेरा प्रेमी इकट्ठे होने लगे थे, जिन की संख्या अब तक 20 हजार को पार कर चुकी थी. लेकिन यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी.

अब समस्या यह भी थी कि बाबा को सिरसा से पंचकूला किस रास्ते से ले जाया जाए. दरअसल, बाबा पर चल रहे मुकदमों में केवल दुष्कर्म वाले मुकदमों का फैसला आने वाला था. जबकि बाबा पर अन्य कई मुकदमे चल रहे हैं, जिन में 2 हत्या के भी हैं.

ये दोनों मुकदमे पत्रकार रामचंदर छत्रपति और डेरा प्रबंधन समिति के सदस्य रणजीत सिंह की हत्या के हैं. फिलहाल तय हुआ कि बाबा को सड़क मार्ग से न ला कर हवाई मार्ग से लाया जाए. इस के लिए हेलीकौप्टर की व्यवस्था तो कर ही ली गई, पंचकूला में सेक्टर-5 के परेड ग्राउंड को हेलीपैड के रूप में उपयोग करने की व्यवस्था की जाने लगी.

उधर पंचकूला में भी बाबा समर्थकों की भीड़ जुटने लगी थी. पहले यह संख्या सैकड़ों में थी. इस के बाद हजारों में हुई और फिर देखतेदेखते लाखों में पहुंच गई. इस भीड़ ने पंचकूला के ज्यादातर हिस्सों पर अपना कब्जा कर लिया था. पुलिस इन पर पैनी नजर रखे हुए थी.

पंचकूला और चंडीगढ़ में अस्थाई जेलों की व्यवस्था कर के इन लोगों की तलाशी भी ली जा रही थी. लेकिन इन लोगों से संदिग्ध जैसी कोई चीज बरामद नहीं हुई थी. इन लोगों का कहना था कि ये डेराप्रेमी हैं और अपने गुरु की एक झलक पाने के लिए यहां आए हैं. हालांकि स्थिति को देखते हुए ट्राइसिटी (मोहाली-चंडीगढ़-पंचकूला) के सभी शिक्षण संस्थान 3 दिनों के लिए बंद कर दिए गए थे.

शहर में बाबा समर्थक

पंचकूला पुलिस को लगता था कि जो भी डेरा समर्थक यहां इकट्ठा हो रहे हैं, अगर ये कोई हंगामा करते हैं तो इन्हें काबू कर लिया जाएगा. लेकिन लाखों की भीड़ देख कर पुलिस को यह असंभव सा लगने लगा. तब सेना की मदद मांगते हुए 3 दिनों के लिए वहां मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई. आखिर 25 अगस्त, 2017 का वह दिन आ गया, जब बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह ‘इंसां’ को आ कर पंचकूला की सीबीआई अदालत के विशेष जज जगदीप सिंह लोहान के सम्मुख पेश होना था.

पहले चर्चा थी कि बाबा हेलीकौप्टर से आएंगे, लेकिन बाद में कहा गया कि 100 से ज्यादा गाडि़यों के काफिले के साथ वह सड़क मार्ग से पंचकूला पहुंचेंगे.

सुबह 8 बजे बाबा का यह काफिला सिरसा से पंचकूला के लिए चल पड़ा. रास्ते में जगहजगह सड़क के दोनों ओर उन की एक झलक पाने के लिए उन के अनुयायी हाथ जोड़े खड़े थे.

जबकि किसी को पता नहीं था कि बाबा किस गाड़ी में हैं. काफिले में काले रंग की 4 ऐसी गाडि़यां थीं, जिन के शीशे गहरे काले रंग के थे. बिना नंबर की ये चारों गाडि़यां हूबहू एक जैसी थीं. लोगों का अनुमान था कि इन्हीं लग्जरी गाडि़यों में से किसी एक में बाबा हैं.

उम्मीद थी कि यह काफिला दोपहर एक बजे तक पंचकूला पहुंच जाएगा. लेकिन कैथल में मौजूद बाबा के अनुयायियों ने गाड़ी के आगे लेट कर काफिले को आगे बढ़ने से रोक लिया. करीब घंटे भर की जद्दोजहद के बाद किसी तरह यह काफिला वहां से आगे बढ़ पाया.

2 बजे के बाद यह काफिला पंचकूला की सीमा में घुसा तो अन्य तमाम वाहनों को रोक कर केवल उन काले रंग की चारों कारों को ही आगे जाने दिया गया. क्योंकि उन्हीं चारों कारों में से एक में बाबा थे. अदालत के गेट पर पहुंच कर उन में से भी 2 कारों को रोक लिया गया. अब केवल उन 2 कारों को ही कोर्ट परिसर में दाखिल होने दिया गया, जिन में से एक में बाबा थे और दूसरी में उन की जैड प्लस सिक्योरिटी.

ठीक ढाई बजे अदालत की काररवाई शुरू हुई. वकील और जज साहब पहले से ही अदालत में मौजूद थे. बाबा के नाम की पुकार हुई तो सिरसा से उन के साथ आई उन की मुंहबोली बेटी हनीप्रीत इंसां भी उन के साथ अदालत के अंदर आ गईं. इस के लिए उन्होंने पहले से ही विशेष अनुमति ले रखी थी.

बाबा को दोषी ठहराया

इस के बाद सक्षम जज जगदीप सिंह ने अपने फैसले के बारे में बताना शुरू किया, ‘अभियुक्त बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह पर उन की 2 साध्वियों ने दुष्कर्म के जो आरोप लगाए हैं, उस के बारे में सारी काररवाई पूरी करते हुए बहस भी हो चुकी है. इस सारी काररवाई के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि सीबीआई की ओर से अभियोजन पक्ष का हर पहलू, हर दलील और हर प्रमाण मजबूत है.

‘दूसरी ओर बचाव पक्ष की ओर से प्रस्तुत किसी भी दलील में ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया, जो किसी भी तरह से इस केस को कमजोर कर रहा हो. लिहाजा अभियुक्त बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह को इस केस में दोषी पाया जाता है, इसलिए उन्हें तुरंत हिरासत में लिया जाए. इस मामले में सजा 28 अगस्त, 2017 को सुनाई जाएगी. अभियुक्त को उस दिन अदालत में पेश किया जाए.’

पुलिस ने बाबा को हिरासत में लेने की व्यवस्था करते हुए उन की जैड प्लस सिक्योरिटी सुविधा को निरस्त कर दिया. अपने वकीलों और पुलिस से घिरे बाबा कोर्टरूम से बाहर आ गए. जैसे ही बाबा को दोषी ठहराए जाने की खबर समर्थकों तक पहुंची, वे बेकाबू हो गए. जाने कहां से उन के हाथों में लोहे के सरिए और तलवारें आ गईं.

उन्हीं से न केवल पेड़ों की डालें काट कर डंडे बना लिए गए, बल्कि गोलाकार चौराहों को तोड़ कर पत्थरों की व्यवस्था कर ली गई. इस के बाद शुरू हो गए दहशतभरे वहशियाना हमले. थोड़ी ही देर में आगजनी का ऐसा खौफनाक मंजर दिखाई देने लगा, जिसे पंचकूला की धरती ने इस के पहले नहीं देखा था.

मीडियावालों को भी नहीं बख्शा गया. उन पर हमला कर के उन की ओबी वैनों को उलट कर उन में आग लगा दी गई. पुलिस और सेना इस स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही तैयार खड़ी थी. कुछ ही देर में वहां ऐसी स्थिति बन गई कि 2 दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए तो 250 से ज्यादा लोग घायल हो गए.

इन में कुछ की हालत काफी गंभीर थी. 5 टीवी चैनलों की ओबी वैनें जलाने के अलावा 100 से अधिक अन्य वाहन जला दिए गए. इस तरह की वारदातों को अंजाम देते हुए तमाम डेरा समर्थक आसपास की कालोनियों के मकानों की दीवारें फांद कर घरों में घुस गए. एक हजार डेराप्रेमियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

इस के तुरंत बाद पंचकूला और आसपास के इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया. आखिर क्या था साध्वियों के साथ दुष्कर्म का वह मामला, जिस में बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह को दोषी ठहराया गया था. इस के लिए हमें 15 साल पीछे जाना होगा, जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे.

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साध्वियों का मामला

24 सितंबर, 2002 को हिंदी में लिखी एक लंबीचौड़ी चिट्ठी पीएमओ में पहुंची, जिसे पढ़ कर हर कोई चौंक उठा था. उस चिट्ठी को यहां हूबहू पेश करना ही ठीक रहेगा.

सेवा में,

प्रधानमंत्री महोदय

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी

  विषय: सच्चे सौदे वाले महाराज द्वारा सैकड़ों लड़कियों के साथ किए गए बलात्कार के मामले की जांच के संबंध में

  श्रीमान जी,

  1. मैं पंजाब की रहने वाली एक लड़की हूं. मैं डेरा सच्चा सौदा, सिरसा (हरियाणा) में साध्वी के तौर पर पिछले 5 सालों से सेवा कर रही हूं. मेरे अलावा इस डेरे में और भी सैकड़ों लड़कियां हैं, जो रोजाना 18 घंटे सेवा करती हैं, पर हमारा शारीरिक शोषण होता है. डेरे के महाराज गुरमीत सिंह हम से बलात्कार करते हैं.

मैं बीए पास हूं. मेरे मातापिता उन के अंधभक्त हैं. उन के कहने पर मैं साध्वी बनी. साध्वी बनने के 2 साल बाद महाराज गुरमीत सिंह की एक खास चेली गुरजोत रात 10 बजे मेरे पास आई और कहा कि महाराज ने मुझे अपनी गुफा में बुलाया है. मैं खुश हुई कि महाराज ने मुझे अपनी गुफा में बुलाया है और मैं पहली बार महाराज के पास जा रही हूं.

जब मैं सीढि़यां उतर कर महाराज की गुफा में दाखिल हुई तो देखा कि महाराज बैड पर बैठे हुए हैं. उन के हाथ में टीवी का रिमोट था और वह ब्लू फिल्म देख रहे थे. उन के सिरहाने बिस्तर पर एक रिवौल्वर रखी थी. यह सब देख कर मैं घबरा गई. मैं ने महाराज के इस रूप के बारे में कभी सोचा भी नहीं था.

महाराज ने टीवी बंद कर दिया और मुझे अपने पास बिठा लिया. उन्होंने मुझे पानी पिला कर कहा कि मुझे इसलिए अपने पास बुलाया है, क्योंकि वह मुझे अपने करीब समझते हैं. यह मेरा पहला अनुभव था. महाराज ने मुझे अपनी जकड़ में ले कर कहा कि वह मुझे दिल से प्यार करते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि वह मेरे साथ प्यार करना चाहते हैं. मैं उन की चेली बनने के लिए अपना तनमनधन उन्हें सौंप चुकी हूं और उन्होंने मेरी यह भेंट स्वीकार कर ली है.

जब मैं ने इस पर ऐतराज किया तो उन्होंने कहा कि इस में कोई शक नहीं कि वह रब हैं, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि श्रीकृष्ण भी भगवान थे और उन के पास तमाम गोपियां थीं, जिन के साथ वह रासलीला रचाते थे. फिर भी लोग उन्हें भगवान मानते हैं, उन्हें कोई गलत नहीं कहता. इस में कोई हैरान होने वाली बात नहीं है.

  1. मैं इस रिवौल्वर से तुम्हें मार सकता हूं और तुम्हारी लाश भी यहीं दफन कर सकता हूं. तुम्हारे परिवार वाले मेरे पक्के भक्त हैं और उन्हें मुझ पर अंधा विश्वास है. मुझे यह अच्छी तरह पता है कि तुम्हारे परिवार वाले कभी भी मेरे खिलाफ नहीं जा सकते.
  2. सरकारों पर भी मेरा अच्छा असर है. हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्री व कई केंद्रीय मंत्री मेरे यहां माथा टेकने आते हैं. वे मेरे खिलाफ कोई काररवाई नहीं कर सकते. मैं तुम्हारे परिवार वालों को नौकरियों से निकलवा सकता हूं. अपने सेवादारों से उन्हें कहीं मरवाखपवा भी सकता हूं.

हम उन की हत्या का कोई सबूत भी नहीं छोडें़गे. तुम्हें तो पता ही है कि हम ने पहले भी डेरे के मैनेजर फकीरचंद को गुंडों से मरवाया है. आज तक उस के कत्ल का कोई सुराग नहीं मिला है. डेरे की रोज 1 करोड़ रुपए की आमदनी है. हम नेता, पुलिस और यहां तक कि जज को भी खरीद सकते हैं.

  1. इतना सब कहने के बाद महाराज ने मेरे साथ जबरदस्ती की. महाराज पिछले 3 सालों से यह सब करते आ रहे हैं. हर 25-30 दिन बाद मेरी बारी आती है. मुझे यह भी पता चला है कि मुझ से पहले भी महाराज ने अपने पास जिन लड़कियों को बुलवाया है, उन के साथ भी वह यही सब करते आए हैं.

उन में से बहुत सारी लड़कियों की उम्र 35-40 साल है और वे शादी की उम्र पार कर चुकी हैं. उन के पास इस हाल में रहने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है. इन में से कई लड़कियां काफी पढ़ीलिखी हैं, जिन के पास बीए, एमए, बीएड की डिग्रिया हैं. पर वे डेरे में नर्क भोग रही हैं, क्योंकि उन के परिवार वालों को महाराज पर अंधी श्रद्धा है.

  1. हम सफेद कपड़े पहन कर और सिर पर सफेद पटका बांध कर रहती हैं. मर्दों की तरफ देख भी नहीं सकतीं और महाराज के आदेश के मुताबिक उन से 8-10 फुट की दूरी से ही बात कर सकती हैं. हम देखने वालों को देवियां लगती हैं, पर हम वेश्याओं की जिंदगी जी रही हैं.

मैं ने कई बार इस बारे में अपने घर वालों को बताने की कोशिश कि डेरे में सब कुछ अच्छा नहीं है. पर मेरे परिवार वालों ने मुझे डांटते हुए यही समझाया कि डेरे से अच्छी जगह कोई नहीं है, क्योंकि हम महाराज की संगत में हैं. उन्होंने कहा कि मैं ने डेरे के बारे में अपने मन में गलत सोच पैदा कर ली है. घर वालों ने मुझे सद्गुरु का नाम जपने को कहा.

  1. मैं यहां मजबूर हूं कि मुझे महाराज की हर बात माननी पड़ती है. महाराज के हर हुक्म का पालन करना पड़ता है. यहां किसी लड़की को दूसरी लड़की से बात करने की इजाजत नहीं है. महाराज के आदेश के मुताबिक कोई लड़की टेलीफोन पर भी अपने घर वालों से बात नहीं कर सकती. अगर कोई लड़की डेरे की असलियत के बारे में किसी से कुछ कहती है तो उसे महाराज के आदेश के मुताबिक सजा दी जाती है.

कुछ दिनों पहले बठिंडा की एक लड़की ने महाराज की करतूतों के बारे में कुछ कह दिया था. तब अन्य चेलियों ने उस की काफी पिटाई की थी, जिस से उस की रीढ़ की हड्डी में चोट आ गई थी. हड्डी में फ्रैक्चर होने की वजह से वह बिस्तर पर पड़ गई. इस के बाद उस के पिता ने डेरे की सेवादारी छोड़ दी और बेटी को ले कर अपने घर चले गए. वह महाराज और बदनामी के डर से किसी को कुछ बता भी नहीं पा रहे हैं.

  1. इसी तरह कुरुक्षेत्र की भी एक लड़की डेरा छोड़ कर अपने घर चली गई. जब उस ने सारी कहानी अपने घर वालों को बताई तो उस के भाई ने भी डेरा छोड़ दिया. वह भी यहां सेवादार के रूप में काम करता था. संगरूर की एक लड़की डेरा छोड़ कर अपने घर गई तो डेरे के हथियारबंद सेवादार/गुंडे उस के घर गए. दरवाजा अंदर से बंद कर के उन्होंने लड़की को जान से मारने की धमकी देते हुए कहा कि कोई बात बाहर नहीं जानी चाहिए.

इसी तरह मानसा, फिरोजपुर, पटियाला और लुधियाना की भी कई लड़कियां हैं, जो डेरे के बारे में कुछ भी कहने से डर रही हैं. वे डेरा छोड़ चुकी हैं, पर महाराज के सेवादारों की धमकी के डर से वे कुछ कह नहीं पा रही हैं. इसी तरह सिरसा, हिसार, फतेहाबाद, हनुमानगढ़ और मेरठ जिलों की भी लड़कियां डेरे के गुंडों के डर से अपने साथ कई ज्यादतियों के बारे में कुछ कह नहीं पा रही हैं.

अगर मैं भी अपना नामपता बता दूं तो मेरी भी जान को खतरा है. मुझे और मेरे परिवार वालों को खत्म कर दिया जाएगा. लेकिन मैं आम लोगों को सच्चाई बताना चाहती हूं, क्योंकि अब मुझ से बरदाश्त नहीं हो रहा है. पर मुझे अपनी जान का खतरा है. अगर प्रैस या किसी और एजेंसी के जरिए जांच कराई जाए तो डेरे में रह रही 40-50 लड़कियां अपनी सच्चाई बताने को सामने आ जाएंगी.

हमारा मैडिकल भी करवाया जा सकता है कि हम कुंवारी चेलियां हैं या नहीं? इस की जांच की जाए कि हमारा कुंवारापन किस ने भंग किया है तो यह बात सामने आएगी कि महाराज राम रहीम सिंह डेरा सच्चा सौदा ने हमारी जिंदगियां बरबाद की हैं.

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 एक दुखी अबला

मामले की सीबीआई जांच

यह चिट्ठी तत्कालीन प्रधानमंत्री ने पढ़ी. इस के बाद कुछ चैनलों से निकलते हुए इस की जांच सीबीआई को सौंप दी गई. जांच कर के दिसंबर, 2002 में सीबीआई ने राम रहीम के खिलाफ भादंवि की धाराओं 376, 506 एवं 509 के तहत आपराधिक मामला दर्ज कर के अपनी काररवाई शुरू कर दी.

इस के बाद डेरे की ओर से दिसंबर, 2003 में इस काररवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई. इस से अक्टूबर, 2004 तक मामले में स्टे लग गया. स्टे खत्म होते ही जांच में तेजी आ गई. सीबीआई ने 2 ऐसी साध्वियों को ढूंढ निकाला, जो बाबा के खिलाफ बयान देने को तैयार थीं. सीआरपीसी की धारा 164 के तहत कोर्ट में उन के बयान दर्ज करवा दिए गए.

आखिर अभियोजन पक्ष के 15 गवाहों की सूची के साथ इस केस की चार्जशीट 27 अक्तूबर, 2007 को सीबीआई की विशेष अदालत में पेश कर दी गई. बचावपक्ष की ओर से 37 गवाहों की सूची अदालत को सौंपी गई. पहले यह केस अंबाला की सीबीआई कोर्ट में चला, बाद में इस की सुनवाई पंचकूला स्थित सीबीआई कोर्ट में होने लगी.

25 जुलाई, 2017 को कोर्ट ने रोजाना सुनवाई के आदेश कर दिए. 17 अगस्त को बहस होने के बाद फैसले की तारीख 25 अगस्त, 2017 तय कर दी गई. अभी तक ज्यादातर सुनवाई वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए हो रही थी, लेकिन 25 अगस्त को बाबा का अदालत में हाजिर होना जरूरी था.

25 अगस्त को तामझाम के साथ बाबा अदालत पहुंचे. लेकिन जैसे ही उन्हें दोषी करार दिया गया, दंगे भड़क उठे. इस बीच बाबा को एक हेलीकौप्टर से रोहतक की सुनारिया जेल ले जाया गया. उन की मुंहबोली बेटी हनीप्रीत इंसां भी उन के साथ जेल तक गईं. रात में वह सफेद रंग की कार एचआर26बी एस5426 से कुछ लोगों के साथ सिरसा लौट गईं.

इस बीच पंचकूला में हुए दंगों ने जैसे पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया. बस सेवा एवं रेल सेवा चरमरा गई. अनेक जगहों पर कर्फ्यू लगा दिया गया. उपद्रव में मरने वालों की संख्या 38 तक पहुंच गई. पंचकूला के डीसीपी अशोक कुमार के अलावा कोर्ट में बाबा का बैग उठा कर चलने वाले डिप्टी एडवोकेट जनरल गुरदास सिंह सलवारा को निलंबित कर दिया गया.

डेरा सच्चा सौदा पूरी तरह संदेह के दायरे में आ गया था. अटकलों का बाजार पूरी तरह गरम था. सब से बड़ी अटकल यह थी कि पंचकूला पहुंचे अनुयायियों को 1 हजार रुपए प्रतिदिन के हिसाब से वहां बुलाया गया था. भीड़ अधिक हो गई, जिस से उस में आपराधिक प्रवृत्ति के लोग घुस गए. कहा जाता है कि उन्हें 2 लाख रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से दिए गए. इन का काम बाबा को वहां से भगाना था.

बहरहाल, 28 अगस्त, 2017 भी आ गई, जिस दिन बाबा को सजा सुनाई जानी थी. सुरक्षा की दृष्टि से सुनारिया जेल के भीतर ही अस्थाई तौर पर अदालत बनाई गई. सजा सुनाए जाने के बारे में बाबा की ओर से कहा गया कि वह 50 वर्ष के हो चुके हैं और उन्हें हाइपरटेंशन, एक्यूट डायबिटीज व सघन कमर दर्द की शिकायत है. उन के साथ उन की वृद्ध मां भी रहती हैं, जो बुढ़ापे की कई बीमारियों से ग्रसित हैं. बाबा ने लोकसेवा में कई विश्व रिकौर्ड बनाए हैं. उन की कोशिश से तमाम स्कूल कालेज चल रहे हैं.

इन तथ्यों के आधार पर बाबा की ओर से दरख्वास्त की गई कि अदालत उन के मामले में नरमी बरतते हुए उन्हें कम से कम सजा दे. अभियोजन पक्ष की ओर से चंद शब्दों में पहले ही अदालत से अपील कर दी गई थी कि रेयर औफ रेयरेस्ट की श्रेणी में आने वाला यह एक ऐसा केस है, जिस में अभियुक्त ने शराफत, धर्म और महापुरुष का लबादा ओढ़ कर अपराध किया है. यही नहीं, उन्होंने उस अपराध को बारबार दोहराया है.

सजा के मुद्दे पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद विद्वान सीबीआई जज जगदीप सिंह ने अपना जो फैसला सुनाया, वह इस प्रकार था—

अदालत का फैसला

अपने ही आश्रम में अपने आधीन रहने वाली 2 साध्वियों को डराधमका कर उन से दुष्कर्म करने के आरोप में दोषी गुरमीत राम रहीम सिंह इंसां को अलगअलग 10-10 सालों की कैद बामशक्कत दी जाती है.

पीडि़त युवतियों को हरजाना दिए जाने के बारे में उन्होंने कहा कि फाइल के निरीक्षण से यह बात सामने आई है कि अभियुक्त अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिए बारबार विदेश जाने की अदालत से अनुमति लेता रहा है. तब उसी की याचिका में यह बात भी सामने आती रही है कि फिल्म के निर्माण पर उस का करोड़ों रुपया लगा है, इसलिए विदेश जा कर इस का प्रमोशन करना उस के लिए बहुत जरूरी है. लिहाजा इस से पता चलता है कि उस के पास पैसों की कोई कमी नहीं है. इसलिए यह अदालत दोनों पीडि़ताओं को 15-15 लाख रुपए हरजाना देने का आदेश देती है.

फिलहाल अटकलों के साथसाथ बाबा की ऐसी कारगुजारियां सामने आ रही हैं, जिन से यह बात साफ हो जाती है कि डेरे के भीतर उस ने एक ऐसी सल्तनत बना रखी थी, जिस का सर्वेसर्वा अकेला वही था. देश के कानून का जैसे उसे कोई भय नहीं था.

लेकिन उसी कानून ने उसे राजमहल से जेल की कोठरी तक पहुंचा दिया. अब उस के वकील अदालत के इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करने की तैयारी कर रहे हैं.

एक्ट्रेस बिदिशा बेजबरुआ मर्डर केस: शक में गंवाई जान

मुंबई में मौजूद निशीथ झा ने अपनी पत्नी बिदिशा बेजबरुआ को कई बार फोन किया. उस के फोन की घंटी तो बजी, लेकिन वह फोन नहीं उठा रही थी. वह परेशान हो गए कि पता नहीं बिदिशा फोन क्यों नहीं उठा रही?

बिदिशा गुड़गांव के सेक्टर-43 स्थित सुशांत लोक में रहती थी. वह असम की मशहूर सिंगर और फिल्म अभिनेत्री थी. रणबीर कपूर की फिल्म ‘जग्गा जासूस’ में भी उस ने काम किया था. निशीथ ने 5 जुलाई, 2017 को ही गुड़गांव में यह फ्लैट किराए पर लिया था.

निशीथ ने जिस ब्रोकर के माध्यम से यह फ्लैट किराए पर लिया था, उसे अपना परिचय दे कर फोन कर के कहा, ‘‘मैं इस समय मुंबई में हूं. मेरी पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है. आप उसे किसी अच्छे डाक्टर को दिखा दीजिए.’’

इंसानियत के नाते ब्रोकर सुशांत एस्टेट की नवीं मंजिल स्थित उस फ्लैट पर पहुंच गया, जिसे उस ने कुछ दिनों पहले ही निशीथ को किराए पर दिलवाया था. फ्लैट का दरवाजा अंदर से बंद था. फ्लैटों में रहने वाले लोग वैसे भी अपने दरवाजे बंद ही रखते हैं. ब्रोकर ने घंटी का बटन दबा दिया और वह दरवाजा खुलने का इंतजार करने लगा. दरवाजा नहीं खुला तो उस ने दोबारा घंटी बजाई. इस बार भी किसी ने दरवाजा नहीं खोला.

कई बार घंटी बजाने के बाद भी जब किसी ने दरवाजा नहीं खोला तो ब्रोकर ने निशीथ को फोन कर के दरवाजा न खुलने की बात बता दी. निशीथ ने कहा कि हो न हो बिदिशा की तबीयत ज्यादा खराब हो गई हो और वह दरवाजा खोलने लायक ही न हो. उस ने उस से अनुरोध किया कि वह जल्द से जल्द फ्लैट का दरवाजा तोड़ कर उसे डाक्टर के पास ले जाए.

निशीथ से बात होने के बाद ब्रोकर दरवाजे को जोरों से धक्का मार कर तोड़ने लगा. दरवाजा तोड़ने की आवाज सुन कर पड़ोसी अपनेअपने फ्लैटों से बाहर आ गए. उन में ज्यादातर लोग उस ब्रोकर को जानते थे. उन्होंने ब्रोकर से दरवाजा तोड़ने की वजह पूछी तो उस ने फ्लैट के मालिक निशीथ से हुई बात उन लोगों को बता दी.

हकीकत से अनभिज्ञ थे पड़ोसी

पड़ोसियों को ब्रोकर की बात पर विश्वास नहीं हुआ तो उस ने निशीथ को फोन मिला कर स्पीकर औन कर के पड़ोसियों द्वारा दरवाजा तोड़ने का विरोध करने की बात बता दी. निशीथ ने पड़ोसियों को बताया कि फ्लैट में उस की पत्नी अकेली है और उस की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है. उसे अभी डाक्टर के पास ले जाना है.

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पड़ोसियों को पता चला कि निशीथ की पत्नी की ज्यादा तबीयत खराब है तो उन्होंने भी दरवाजा तोड़ने में ब्रोकर की मदद की. थोड़ी कोशिश के बाद दरवाजा टूट गया. लोग अंदर दाखिल हुए तो वहां का नजारा देख कर सभी सन्न रह गए. निशीथ की पत्नी की लाश पंखे से लटक रही थी. ब्रोकर ने फोन द्वारा यह खबर निशीथ और थाना सुशांत लोक पुलिस को दे दी.

सुशांत एस्टेट थाने से कुछ ही दूर स्थित है, इसलिए खबर मिलते ही थानाप्रभारी गौरव, एसआई सतीश, एएसआई अर्जुन आदि के साथ वहां पहुंच गए. पुलिस नौवीं मंजिल स्थित निशीथ के फ्लैट पर पहुंची तो वहां बिदिशा की लाश पंखे से झूलती मिली. थानाप्रभारी ने इस की जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को दे दी.

थोड़ी देर में क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम भी मौके पर पहुंच गई. उसी बीच डीसीपी (ईस्ट) दीपक सहारण भी वहां आ गए. मामला एक फिल्म अभिनेत्री की मौत का था, इसलिए वहां फ्लैटों में रहने वाले जिन लोगों को भी जानकारी मिली, वे बिदिशा के फ्लैट पर पहुंच गए.

पुलिस ने लोगों के सहयोग से लाश उतार कर कमरे की तलाशी ली, पर वहां कोई सुसाइड नोट नहीं मिला. पुलिस ने आसपास के फ्लैटों में रहने वाले लोगों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि बिदिशा कुछ दिनों पहले ही वहां रहने आई थी, इसलिए वे इस के बारे में ज्यादा नहीं जानते.

हां, उन्होंने इतना जरूर बताया कि बिदिशा का व्यवहार बहुत अच्छा था. बातचीत से कभी नहीं लगा कि उसे कोई तनाव था. वह जब भी मिलती थी, खुश दिखती थी.

मौके पर वह ब्रोकर भी मौजूद था, जिस ने बिदिशा को यह फ्लैट किराए पर दिलवाया था. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि बिदिशा और उस के पति निशीथ से उस की पहली मुलाकात तब हुई थी, जब वे लोग किराए पर फ्लैट लेने आए थे. पुलिस को ब्रोकर से बिदिशा के पति निशीथ का मोबाइल नंबर मिल गया था. थानाप्रभारी ने निशीथ को फोन कर के बिदिशा द्वारा आत्महत्या करने की सूचना दी. उस ने कहा कि इस समय वह मुंबई में है और कल तक गुड़गांव पहुंच जाएगा.

बिदिशा का फोन कमरे में ही था. उस में से पुलिस को उस के मातापिता का नबर मिल गया. पुलिस ने उस के पिता अश्वनी बेजबरुआ को फोन कर के बिदिशा के सुसाइड करने की बात बता दी. वह गुवाहाटी, असम में रहते थे. बेटी की मौत की खबर पा कर अश्वनी और उन की पत्नी रंजीता रोनेबिलखने लगी.

वे दोनों अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ फ्लाइट से सोमवार की रात को दिल्ली आ गए. दिल्ली से टैक्सी ले कर वे गुड़गांव पहुंचे. इस से पहले पुलिस ने मौके की जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी में रखवा दिया था.

मृतक अभिनेत्री बिदिशा के पिता अश्वनी ने थानाप्रभारी गौरव कुमार को बताया कि बिदिशा बहुत समझदार लड़की थी. पिछले साल ही निशीथ से उस की शादी हुई थी. शादी के बाद बिदिशा को पता चला कि निशीथ के किसी और लड़की से संबंध हैं.

बिदिशा निशीथ को उस लड़की से मिलने के लिए रोकती थी, पर वह नहीं मानता था. इसी बात को ले कर वह बिदिशा से झगड़ता रहता था. बिदिशा के तनाव की सब से बड़ी वजह यही थी. उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि उन की बेटी की मौत का जिम्मेदार निशीथ है. उस के खिलाफ सख्त काररवाई की जानी चाहिए.

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निशीथ के खिलाफ केस दर्ज

मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए थानाप्रभारी ने डीसीपी दीपक सहारण से इस मसले पर बात की. उन्हीं के निर्देश पर थानाप्रभारी ने 18 जुलाई, 2017 को निशीथ के खिलाफ आत्महत्या के लिए मजबूर करने का मामला दर्ज कर लिया.

अगले दिन निशीथ गुड़गांव पहुंचा तो पुलिस ने उस से पूछताछ की. उस ने बताया कि वह बिदिशा को खुश रखता था. बस कभीकभी छोटेमोटे मतभेद हो जाते थे, जो अकसर हर घर में होते रहते हैं. पर ऐसी कोई बात नहीं थी, जिस से बिदिशा को जान देनी पड़ती. बिदिशा ने ऐसा क्यों किया, यह उस की भी समझ में नहीं आ रहा.

निशीथ भले ही खुद को बेकसूर बता रहा था, लेकिन बिदिशा के पिता ने उसी पर आरोप लगाया था, इसलिए पुलिस ने 18 जुलाई को निशीथ को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस का मोबाइल फोन और लैपटौप भी कब्जे में ले लिया.

असम की गायिका और अभिनेत्री बिदिशा के सुसाइड का मामला असम में तूल पकड़ने लगा. वहां के लोग पूर्वोत्तर का मामला बता कर तूल देने लगे. इस से कुछ दिनों पहले ही वहां पूर्वोत्तर की एक लड़की से दुष्कर्म हुआ था. तब गुड़गांव पुलिस प्रशासन ने डीजीपी व गृह सचिव के माध्यम से सरकार को प्रस्ताव भिजवाया था कि यहां पूर्वोत्तर के पुलिस अफसरों को तैनात किया जाए. इस प्रस्ताव को अभी सरकार की मंजूरी नहीं मिली है.

अभिनेत्री बिदिशा का मामला जब असम में ज्यादा ही तूल पकड़ने लगा तो वहां के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर से फोन पर बात की. उन्होंने बिदिशा के केस की जांच ठीक से कराने की बात कही. इस के बाद मनोहरलाल खट्टर ने गुड़गांव के पुलिस अधिकारियों से पूरे मामले की रिपोर्ट तलब की.

मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद पुलिस गंभीरता से इस मामले की जांच में जुट गई. पुलिस ने निशीथ के फोन की काल डिटेल्स निकाल कर जांच की. इस जांच में ऐसे 2 फोन नंबर सामने आए, जिन पर निशीथ की काफी देर तक बातें होती थीं. एक फोन नंबर तो ऐसा था, जिस पर उस की शादी से पहले भी बातें होती रही थीं.

पुलिस ने निशीथ को एक दिन के रिमांड पर ले कर इस बारे में पूछताछ की तो उस ने स्वीकार किया कि शादी से पहले उस की एक लड़की से दोस्ती थी, जो अब भी है. उसी लड़की को ले कर बिदिशा उस पर शक करती थी. आगे की कहानी जानने से पहले आइए थोड़ा बिदिशा के बारे में जान लें कि वह चाय बागानों के इलाके से निकल कर बौलीवुड तक कैसे पहुंची?

27 साल की बिदिशा मूलरूप से गुवाहाटी के रहने वाले अश्वनी कुमार की बेटी थी. उन का एक बेटा था कौशिक बेजबरुआ, जो पुणे की किसी कंपनी में नौकरी कर रहा है.

बिदिशा बेहद खूबसूरत थी. उस ने गुवाहाटी के निकोल्स हाईस्कूल से सन 2007 में हायर सैकेंडरी की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की. पढ़ाई के साथसाथ वह स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी. उस की आवाज भी बड़ी मधुर थी, इसलिए वह गाने भी गाती थी.

इस के अलावा टीवी पर डांस देखतेदेखते बिदिशा ने डांस भी सीख लिया था. बिहू डांस की तो वह इतनी शौकीन थी कि स्कूल के अलावा वह सामाजिक संस्थाओं द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भी बिहू डांस करने जाती थी. उस के डांस और गानों पर दर्शक मंत्रमुग्ध हो उठते थे. फिल्म अभिनेत्री सोनम कपूर और कोंकणा सेन शर्मा की वह बड़ी फैन थी.

स्कूली पढ़ाई पूरी होने के बाद बिदिशा ने गुवाहाटी के कौटन कालेज से इंगलिश (लिटरेचर) से ग्रैजुएशन किया. कालेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी वह बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती रही. अभ्यास करतेकरते वह एक अच्छी सिंगर बन गई.

उन्हीं दिनों उस की मुलाकात मशहूर पत्रकार अर्नब गोस्वामी से हुई. वह उन से इतनी प्रभावित हुई कि उस ने पत्रकार बनने का निर्णय ले लिया. ग्रैजुएशन करने के बाद उस ने दिल्ली के इंडियन इंस्टीट्यूट औफ मास कम्युनिकेशन से जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा किया.

बिदिशा ने तमाम नाटकों में अभिनय किया था, जिन में उस की अलगअलग भूमिकाओं की खूब सराहना हुई थी. दर्शकों से मिलने वाले इस प्यार ने उसे नया फैसला लेने पर मजबूर कर दिया. कहां तो उस ने पत्रकार बनने के लिए कोर्स किया था, लेकिन अब वह कुछ और ही सोचने लगी थी. इसी के चलते पत्रकार बनने के बजाय उस ने अभिनय के क्षेत्र को चुन लिया. सुंदर तो वह थी ही, साथ ही उस की फिगर भी बहुत अच्छी थी. कभीकभी वह अपनी सुंदरता और फिगर की तुलना बौलीवुड की नई अभिनेत्रियों से करती तो खुद को उन से बेहतर पाती.

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फलस्वरूप गायिका के साथसाथ उस ने अभिनेत्री बनने के सपने संजोने शुरू कर दिए. लेकिन उस के सामने समस्या यह थी कि फिल्म इंडस्ट्री में उस का कोई गौडफादर नहीं था, जो फिल्म इडस्ट्री में उस की एंट्री करा देता. फिर भी उस ने हिम्मत नहीं हारी और मुंबई चली गई.

फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री करने के लिए हजारों लड़कियां मुंबई में रह कर स्ट्रगल करती रहती हैं. विभिन्न डायरेक्टरों और प्रोड्यूसरों के पास चक्कर लगातेलगाते उन के सैंडल, जूते घिस जाते हैं. इन में तमाम लड़कियां ऐसी भी होती हैं, जो फिल्मों में रोल पाने के लिए हर तरह का समझौता करने को तैयार रहती हैं. मुंबई पहुंच कर बिदिशा भी स्ट्रगल करने वाली लड़कियों में शामिल हो गई.

मुंबई में बिदिशा की मुलाकात निशीथ झा से हुई. निशीथ गुजरात का रहने वाला था. पहले वह ओएनजीसी में अच्छे पद पर नौकरी करता था. नौकरी छोड़ कर वह मुंबई में वह बिजनैस करने लगा था. अच्छे रसूख वाले निशीथ के संबंध फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कुछ लोगों से थे.

निशीथ की कोशिश से बिदिशा को रणबीर कपूर की फिल्म ‘जग्गा जासूस’ में अभिनय करने का मौका मिल गया. इस फिल्म में बिदिशा ने बिहू डांस किया था. फिल्म में काम मिलने से बिदिशा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस की निशीथ से अच्छी दोस्ती हो गई. धीरेधीरे उन की यह दोस्ती प्यार में बदल गई. घर वालों की मरजी से सन 2016 में दोनों की शादी हो गई. निशीथ का मुंबई में ही औफिस था. उस में काम करने वाली एक लड़की से उस की गहरी दोस्ती थी. घर पहुंच कर भी वह उस से बातें करता रहता था. उस के अलावा वह और भी कई लड़कियों से फोन पर बातें करता था.

कुछ दिनों तक तो बिदिशा यह सब देखती रही, पर बाद में उस ने पति को टोकना शुरू कर दिया. इतना ही नहीं, उस ने अपने स्तर से पता लगा लिया कि निशीथ के एक और लड़की से गहरे संबंध हैं. बिदिशा ने इस बारे में उस से बात की तो उस ने उसे समझाते हुए कहा कि जिस लड़की को ले कर वह उस पर शक कर रही है, उस से केवल उस की दोस्ती है. इस से अलावा उस से कोई संबंध नहीं है.

पति पर शक

पर बिदिशा के दिमाग में शक बैठ गया था. शक ऐसी बीमारी है, जो मतभेद होने पर और बढ़ती है. बिदिशा क्या कोई भी युवती इस बात को हरगिज स्वीकार नहीं कर सकती कि उस का पति किसी और महिला से संबंध रखे. जब पति ने उस की बात को गंभीरता से नहीं लिया तो उस ने पति की शिकायत अपनी मां से कर दी.

मांबाप ने बेटी की गृहस्थी में इसलिए दखल नहीं दिया कि अभी कुछ दिन पहले तो दोनों की शादी हुई है. दखल देने से कहीं उन के संबंधों में दरार न आ जाए, इसलिए पिता अश्वनी ने बेटी को ही समझाया और निशीथ से भी बात की.

बिदिशा की मायके वालों से शिकायत करने की बात निशीथ को अच्छी नहीं लगी. इस का नतीजा यह निकला कि बिदिशा और निशीथ के बीच विवाद बढ़ गया. चूंकि बिदिशा अपने कैरियर के लिए चिंतित रहती थी, इसलिए वह पारिवारिक तनाव में उलझना नहीं चाहती थी. पर उस के दिमाग में पति को ले कर ऐसा शक बैठ गया था, जो निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था.

निशीथ उसे यकीन दिलाता रहता था कि उस के किसी भी लड़की से गलत संबंध नहीं हैं. पर बिदिशा उस की बात मानने को तैयार नहीं थी. घर में रोजरोज कलह न हो, इस के लिए निशीथ ने 5 जुलाई, 2017 को गुड़गांव के सुशांत लोक में एक फ्लैट किराए पर लिया और बिदिशा से कहा कि जब तक उस का मन करे वह यहां रहे और जब मन करे मुंबई आ जाए.

इतना ही नहीं, निशीथ ने यह भी कहा कि वह किसी और हिंदी फिल्म में उस के लिए काम तलाश रहा है. पति की बात मान कर बिदिशा गुड़गांव आ गई. गुड़गांव वाले फ्लैट में बिदिशा अकेली रहती थी. मन होने पर जब वह पति को फोन करती, उस का नंबर अकसर व्यस्त मिलता.

इस पर बिदिशा का शक बढ़ता गया और वह परेशान रहने लगी. जब कभी वह मांबाप को फोन कर के मन की बात बताती तो वे उसे समझाते हुए उस का डिप्रेशन दूर करने की कोशिश करते. धीरेधीरे वह इस तरह हतोत्साहित हो गई कि उसे यह जीवन नीरस लगने लगा.

बिदिशा ने पति को फोन किया तो बातचीत में उसे लगा कि बिदिशा की तबीयत ठीक नहीं है. उस ने उस से अपना खयाल रखने को कहा. उस दिन बिदिशा इतनी हताश हो गई कि गले में फंदा लगा कर पंखे से लटक गई, जिस से उस की मौत हो गई. शाम को निशीथ ने बिदिशा को फोन किया तो उस का फोन नहीं उठा.

गुड़गांव में उस का कोई जानकार तो था नहीं, जिसे वह फ्लैट में जा कर देखने को कहता. तब उसे उस ब्रोकर की याद आई, जिस के माध्यम से उस ने फ्लैट किराए पर लिया था. उसी ब्रोकर से उस ने पत्नी की तबीयत खराब होने की बात कह कर फ्लैट पर जाने को कहा.

जब ब्रोकर उस के फ्लैट पर पहुंचा तो पता चला कि मशहूर गायिका और अभिनेत्री बिदिशा बेजबरुआ की जीवनलीला समाप्त हो चुकी है. पुलिस ने निशीथ से पूछताछ कर उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से जेल भेज दिया गया. केस की विवेचना एएसआई अर्जुन कर रहे हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों एवं जनचर्चा पर आधारित

बिकिनी में नजर आईं शाहरुख की बेटी सुहाना

बौलीवुड स्‍टार किड्स का अपना अलग ही स्‍टारडम हैं. शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान लगातार खबरों का हिस्‍सा बनी रहती हैं. सुहाना का ड्रेस सेंस और उनका लुक अक्‍सर सोशल मीडिया पर वायरल होता रहता है. गर्मियां दस्‍तक दे चुकी हैं और सेलिब्रेटी के लुक्‍स ट्रेंड करना स्‍टार्ट हो चुके हैं. ऐसे एक बार फिर से सुहाना ने एंट्री ली है और उनका समर हौट लुक इंटरनेट पर सनसनी मचा रहा है.

बिकिनी पहनकर पूल साइड में दोस्‍तों के साथ एंजौय करती सुहाना की तस्‍वीरों को फैंस पसंद कर रहे हैं. स्‍टार किड्स में टौप लिस्‍ट में शामिल शाहरुख-गौरी की बेटी सुहाना के ग्‍लैमरस अंदाज उनके डेब्‍यू से पहले ही खबरों का हिस्‍सा बन रहे हैं.

इंस्‍टाग्राम पर फ्यूचर बौलीवुड के नाम से बने एक अकाउंट ने सुहाना की ये फोटो शेयर की हैं. नियोन कलर की बिकिनी में बिना मेकअप सुहाना का लुक काफी फ्रेश लग रहा है.

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मुंबई के धीरूभाई अंबानी स्कूल में 10वीं करने के बाद सुहाना आगे की पढ़ाई लंदन से कर रही हैं. सोशल मीडिया पर सुहाना काफी एक्‍ट‍िव रहती हैं. वहीं उनकी मां गौरी खान भी सुहाना की फोटोज फैंस के साथ शेयर करती रहती हैं. अपने पिता की तरह सुहाना भी बौलीवुड में करियर बनाना चाहती हैं. वह अपने स्कूल एक प्ले में अपनी एक्टिंग की कला दिखा चुकी हैं. उनके इस प्‍ले को सीनियर एक्‍ट्रेस शबाना आजमी ने भी काफी पसंद किया था.

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इतना ही नहीं सुहाना इतनी छोटी सी उम्र में अपनी ड्रेसेज से लेकर एक्‍सेसरीज तक की वजह से चर्चा में रहती हैं. सुहाना की मौम की पार्टी की गोल्‍डन ड्रेस हो या फिर पापा शाहरुख के बर्थडे पर पहना व्‍हाइट टौप, सुहाना के कपड़ों का प्राइज टैग भी काफी चर्चा में रहता है. फिलहाल सुहाना अपने दोस्‍तों के साथ समर का वेलेकम करती नजर आ रही हैं.

VIDEO : मौडर्न मौसैक नेल आर्ट

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अब काला धंधा बनती जा रही है शिक्षा

शिक्षा महंगी होती जा रही है और उस में भरपूर बेईमानी भी घुस रही है. पहले शिक्षा देने वाले अपने धंधों में चाहे बेईमानियां करते हों वे स्कूल, कालेजों को दान भी देते थे और उन के प्रबंध में समय भी. अब उलटा हो गया है और शिक्षा चाहे सरकारी हो या प्राइवेट दोनों में धांधली ही धांधली है. मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला इसी का नतीजा है. दिल्ली के समीप गुड़गांव में अंसल विश्वविद्यालय में आजकल हंगामा मचा हुआ है. अंसल विश्वविद्यालय अंसल बिल्डरों द्वारा चलाया जा रहा है और उन्होंने शिक्षा में भी छात्रों को अट्रैक्ट करने के लिए वे ही गुर अपनाए थे जो वे अपने फ्लैटों और प्लाटों को बेचने में अपनाते हैं : सब्जबाग दिखा कर पैसा वसूल करो.

छात्रों को कहा गया था कि उन्हें स्विमिंग पूल, जिम और स्पोर्ट्स सैंटर दिया जाएगा और उस के लिए मोटा पैसा ले लिया गया. पर छात्रों के हितों को तो आजकल के शिक्षा प्रबंधक ध्येय समझते ही नहीं हैं. उन्होंने छात्रों के फ्लैटों को खरीदारों के बराबर मान कर वादों को टरकाना शुरू कर दिया और नतीजा यह हुआ है कि अंसल विश्वविद्यालय के छात्र हड़ताल व धरने पर बैठे हैं. यह कई निजी विश्वविद्यालयों में हो रहा है, क्योंकि वहां प्रबंधक शिक्षा के माध्यम से अगली पीढ़ी को तैयार करने नहीं आ रहे, अपने लिए पैसा बनाने के लिए शिक्षा का इस्तेमाल कर रहे हैं.

शिक्षा आज देश का एक बड़ा काला धंधा बन गया है. आज के मातापिता जानते हैं कि शिक्षा ही बच्चों का भविष्य बना सकती है और इसलिए बच्चों की पढ़ाई पर पेट काट कर खर्च कर रहे हैं, पर शिक्षा देने वाले इसे मातापिता की मजबूरी मान कर उन्हें लूटने में लग गए हैं. सरकारी शिक्षा में कौपीइंग, एबसैंटिज्म और ट्यूशन की भरमार है तो निजी में फीस के नाम पर डोनेशन और चार्जेज का बोलबाला है.

प्रबंधक चाहे सरकारी शिक्षा के हों या निजी शिक्षा के, नई पीढ़ी के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भूल चुके हैं और उसे कमाई और सिर्फ कमाई का धंधा मान कर चलते हैं. अफसोस यह है कि मातापिता अपने को इतना लाचार व असहाय समझते हैं कि हर पग पर कंप्रोमाइज करने को तैयार हैं. वे किसी भी गलत काम पर हल्ला नहीं मचाते.

गनीमत है कि देश की आबादी इतनी ज्यादा है कि कामचलाऊ संख्या में प्रतिभाशाली छात्र निकल ही आ रहे हैं. तभी तो 95 और 98% वालों को भी दाखिला नहीं मिल रहा है, पर यह भी संभव है कि जो 95 व 98% वाले बेईमान शिक्षा के प्रौडक्ट हों और डिग्री की प्रतिष्ठा को भी नष्ट कर रहे हों, पर इतना जरूर है कि हमारे युवाओं ने इन विषम स्थितियों में भी कुछ लाभ तो कमा लिया कि अमेरिका की सिलीकौन वैली भारतीयों  से भरी पड़ी है और अमेरिका में डौनल्ड ट्रंप के निशाने पर मुसलिम आतंकवादी कम और भारतीय मेधावी छात्र ज्यादा हैं. अगर हमारे शिक्षा प्रबंधक जरा से देशभक्त हो जाएं तो वे अगली पीढ़ी ऐसी तैयार कर सकते हैं कि भारत ही भारत दिखे.

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बलात्कार : कानून के साथ सोच भी बदले

सामूहिक बलात्कार नारी अस्मिता को तोड़ने के लिए होते हैं. स्त्री को भोग और दान समझने की प्रवृत्ति इस को बढ़ावा देने का काम करती है. ऐसे मामलों में समाज औरत को ही दोषी मानता है. अहल्या से ले कर द्रौपदी तक तमाम उदाहरण धर्मग्रंथों में मौजूद हैं. वर्तमान समाज में फूलन देवी, बिलकीस बानो और निर्भया जैसे बहुत सारे ऐसे मामले हैं. इन तमाम घटनाओं के बाद भी समाज की सोच में बदलाव नहीं आता दिख रहा है. बलात्कार जैसे अपराध को कम करने के लिए सिर्फ सख्त कानून बनाने भर से काम नहीं चलेगा बल्कि समाज को अपनी सोच भी बदलनी होगी.

दिल्ली में निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के मामले में अदालत का फैसला मील का पत्थर माना जा सकता है. निर्भया कांड ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था. यह ऐसा मामला था जिस ने अदालत से ले कर देश की संसद तक को जनता की पीड़ा को सुनने के लिए झकझोर कर रख दिया था. हजारों लोगों ने निर्भया को ले कर संसद का घेराव किया.

संसद ने जहां इस कांड के बाद नाबालिग अपराध को नए सिरे से परिभाषित किया वहीं निचली अदालत से ले कर ऊपरी अदालत तक हर जगह एकजैसा ही फैसला दिया गया.

निर्भया को ले कर केवल दिल्ली में ही धरनाप्रदर्शन नहीं हुए, पूरे देश में तमाम सामाजिक संस्थाओं ने जनता को आगे कर के निर्भया के दर्द का साझा किया. 2012 से हर 16 दिसंबर को निर्भया दिवस के रूप में याद किया जाता है.

5 वर्षों के बाद इस मामले में बड़ी अदालत का फैसला आया और अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई. यह सच है कि न्यायपालिका ने अपनी जिम्मेदारी निभाई है. अब बाकी समाज के सामने जिम्मेदारी निभाने का वक्त है. अदालत का यह फैसला तभी सफल होगा जब लोग इस से सबक लेंगे. बलात्कार केवल कानून से जुड़ा मसलाभर नहीं है. समाज का दायित्व सब से बड़ा है. सब से जरूरी है कि समाज से उस मानसिकता को खत्म किया जाए जिस के कारण बलात्कार जैसे कांड होते हैं. मात्र कानून से इस सामाजिक बुराई और अपराध की प्रवत्ति को खत्म नहीं किया जा सकता.

नहीं बदल रही धर्म की सोच

सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए सब से पहले उस से जुड़ी सोच को खत्म करने की जरूरत है. सामाजिक बुराई समाज से तब तक खत्म नहीं हो सकती जब तक उस से जुड़ी मानसिकता खत्म नहीं हो जाती. इस के लिए जरूरी है कि महिलाओं को बराबरी का हक दिया जाए. धर्म के नाम पर महिलाओं को जिस तरह से पीछे ढकेला जाता है, उस सोच को खत्म किया जाए.

हमारे देश में प्रगतिशील न्याय व्यवस्था तो है पर अभी भी धर्म का शिकंजा इतना मजबूती से गले में पड़ा है कि हमें इस से छुटकारा नहीं मिल पा रहा है. हम खुद को प्रगतिशील कहते हैं पर हमारा समाज प्रगतिशील नहीं है. बलात्कार कई बार पुरुषवादी सत्ता को कायम रखने के लिए किया जाता है.

कबीलाई संस्कृति के दौर में बदला लेने के लिए औरत पर हमला किया जाता था. रामायण से ले कर महाभारत और अन्य धार्मिक ग्रंथ इस बात के गवाह हैं. महाभारत में द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित करना ऐसी ही पुरुषवादी सत्ता की सोच थी जो विरोधियों से बदला लेने के लिए द्रौपदी को दांव पर लगा देती है. लड़ाई कौरव और पांडवों के बीच थी. पांडवों को अपमानित करने के लिए द्रौपदी को दांव पर लगाया गया.

रामायण में भी ऐसे कई उदाहरण हैं. राम को सबक सिखाने के लिए सीता का अपहरण और सूर्पणखा को सबक सिखाने के लिए उस की नाक को काटना पुरुषवादी सत्ता के ही उदाहरण हैं. नाक काटना औरत के लिए अपमान का द्योतक था. यह सिलसिला आधुनिक समाज में भी कायम है. ऐसी सोच बदलने की जरूरत है. बदला देने के लिए औरत का अपमान बंद होना चाहिए. औरत का अपमान बंद होने से अपराध में कमी आएगी.

आज अगर किसी को सबक सिखाना है तो उस की औरत को अपमानित किया जाता है. बड़े अपराधों की बात को दरकिनार भी कर दिया जाए तो हम रोज ऐसे काम करते हैं जो औरतों के लिए अपमान का कारण बनते हैं. लड़ाईझगड़े में ऐसी गालियों का प्रयोग करते हैं जो औरतों से जुड़ी होती हैं. गाली हम पुरुष को देते हैं पर वह होती महिलाओं के लिए है. महिलाओं को जिस तरह से रोजमर्रा की जिंदगी में अपमान सहन करना पड़ता है उसे कानून से नहीं, समाज में सुधार लाने से ही दूर किया जा सकता है.

हावी है पुरुषवादी सोच

सामूहिक बलात्कार की घटनाएं पुरुषवादी सोच को जाहिर करती हैं. ऐसे ज्यादातर मामले सबक सिखाने जैसी प्रवृत्ति को भी दिखाते हैं. गुजरात दंगों में बिलकीस बानो का मसला ऐसा ही बड़ा मसला था. जिस में गर्भवती बिलकीस बानो का बलात्कार होता है. उस के गर्भ में पल रहे बच्चे को पेट से निकाल कर पत्थर पर पटक कर मार दिया गया. उस के परिवार के साथ बलात्कार और हत्या जैसा अपराध किया गया.

ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं जहां पर सबक सिखाने के लिए औरतों के साथ ऐसे जघन्य अपराध होते हैं. जातीय हिंसा और भेदभाव की घटनाओं में ऐसे उदाहरण देखने को मिलते रहते हैं. उत्तर प्रदेश में कई साल पहले बेहमई कांड हुआ था. जहां फूलन देवी के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ. उस के बाद फूलन देवी दस्यू सरगना बनीं और अपने साथ हुए अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने सामूहिक नरसंहार किया.

फूलन देवी बाद में संसद की सदस्य भी बनीं. उन पर फिल्म से ले कर तमाम तरह की किताबें भी लिखी गईं. फूलन की ही तरह निर्भया मसले ने भी पूरे देश को झकझोर दिया. 1981 के फूलन देवी बलात्कार कांड से ले कर 2012 में निर्भया कांड तक एकजैसे ही हालात देखने को मिले. जिस से यह लगता

है कि तमाम तरह के कानूनी झगड़ों और फैसलों के बाद भी समाज अपना दायित्व निभाने में सफल नहीं हो सका है.

गुजरात दंगों की बिलकीस बानो को भी देखें तो यही सामने आता है. इन प्रमुख तीनों घटनाओं की पृष्ठभूमि भले ही अलगअलग हो पर हालात एकजैसे ही थे. बलात्कार केवल नारी अस्मिता से जुड़ा है. पुरुष अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए इस तरह का कृत्य करते हैं.

बलात्कार में दोषी पुरुष होता है पर सजा अधिकतर औरत को ही मिलती है. गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या के साथ धोखा देने का काम इंद्र ने किया था लेकिन गौतम ऋषि ने सजा इंद्र के बजाय पत्नी अहल्या को दी, उस को पत्थर की शिला में बदल दिया.

औरतों को ही दोषी मानना

बलात्कार की शिकार औरतों के लिए समाज में मानसम्मान हासिल करना बहुत मुश्किल काम होता जा रहा है. लखनऊ की रहने वाली देविका (बदला नाम) के साथ उस के भाई और पिता ने बलात्कार किया. देविका ने इस की शिकायत उस समय के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से की. इस के बाद पिता और भाई को जेल हो गई. उस की मां और दूसरे भाई ने उसे सहयोग करने के बजाय घर से निकाल दिया. देविका एक शेल्टरहोम में रहने लगी. सरकार से मिली सहायताराशि से उस ने ब्यूटीपार्लर खोल लिया.

देविका कहती है, ‘‘मुझे ब्यूटीपार्लर के लिए दुकान मिलनी मुश्किल थी. जब लोगों को पता चलता था कि मैं बलात्कार की शिकार हूं, लोगों का व्यवहार बदल जाता है. बड़ी मुश्किल से ब्यूटीपार्लर के लिए जगह मिली.’’

देविका 27 साल की है. वह अपनी शादी का घर बसाना चाहती है. इस के लिए उस ने कई बार प्रयास भी किया. जैसे ही लोगों को यह पता चलता है कि वह रेप विक्टिम है, लोग शादी करने से मुकर जाते हैं. ऐसे मसले एक नहीं, कई हैं. बात केवल बलात्कार की शिकार लड़कियों की ही नहीं है. अगर लड़की से छेड़छाड़ की बात शादी के समय पता चलती है तो लोग उस से भी बचना ही चाहते हैं. बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाएं औरतों के चरित्र से जोड़ कर देखी जाती हैं.

असल में ये आपराधिक घटनाएं हैं. इन को अपराध की घटनाओं के रूप में ही देखा जाए तो मसले आसानी से सुलझ सकते हैं. इस तरह की घटनाओं में न केवल लड़कियों की ही गलती मानी जाती है बल्कि उन से ही उम्मीद की जाती है कि वे अच्छे से कपड़े पहनें. ठीक तरह से रहें. देर रात घर से बाहर न निकलें.

कौमार्य का दबाव

समाज के दबाव के चलते कई बार मातापिता अपने बच्चों, खासकर लड़कियों, को टोकाटाकी करते हैं. जिसे वे अपने ऊपर दबाव मानती हैं. असल में मातापिता इस तरह की टोकाटाकी इसलिए करते हैं चूंकि लड़कियों के ऐसे शिकार होने से वे सामाजिक रूप से दबाव में आ जाते हैं. लड़की के लिए ऐसी घटनाएं लांछन की तरह होती हैं, जिसे समाज भूलता नहीं. ऐसे में लड़की का आने वाला जीवन प्रभावित हो जाता है.

आज के दौर में भी शादी से पहले लड़कों को इस बात की चिंता होती है कि उस की होने वाली पत्नी का कौमार्य सुरक्षित है या नहीं. अगर शादी के बाद सुहागरात में लड़के को यह पता चलता है कि उस की पत्नी का कौमार्य सुरक्षित नहीं है, सुहागरात में रक्तस्राव नहीं हुआ तो लड़की के चरित्र पर उंगली उठ जाती है. कई बार इस तरह की शंका से दांपत्य जीवन प्रभावित हो जाता है.

धर्म नारी के निजी मामलों में दखल करता है. जिस से सब से अधिक परेशानी का सामना महिलाओं को करना पड़ता है. महिलाओं के कपड़ों से ले कर रहनसहन और आचारविचार को तय करने का काम धर्म के ठेकेदार करते हैं. जिस से यह लगता है कि वह औरतों को अपने जाल में उलझा कर रखना चाहता है. बात केवल एक धर्म की ही नहीं है, हर धर्म में महिलाओं को हाशिए पर रखा जाता है. जबकि, यह दिखावा बारबार किया जाता है कि धर्म महिलाओं को इज्जत देता है.

असल में वह महिलाओं को बराबर का हक नहीं देता. धर्म के ठेकेदारों को यह लगता है कि अगर महिलाओं को बराबरी का हक मिल गया तो वे धर्म के आडंबर से बाहर हो जाएंगी, जिस से धर्म की उन की सत्ता खतरे में पड़ जाएगी.

तीन तलाक को ले कर केंद्र की भाजपा सरकार ने कदम उठा कर यह दिखाने की कोशिश की है कि इस से मुसलिम औरतों के हालात बदल जाएंगे. तीन तलाक की ही तरह से हिंदू और दूसरे समुदाय की महिलाओं के मुद्दे भी हैं जिन में तलाक लेना बहुत मुश्किल काम होता है. ऐसे में बहुत तरह के दांपत्य अपराध होते हैं.

कई बार तलाक चाहने वाली महिलाएं अपने पतियों पर ही गलत तरह से सैक्स करने या सैक्स के नाम पर परेशान करने जैसे आरोप लगा कर तलाक लेने की बात कहती हैं. अगर तलाक लेने की प्रक्रिया को सरल कर दिया जाए तो बहुत तरह की परेशानियों से बचा जा सकता है. बहुत सारे दहेज के मुकदमों की वजह तलाक का जल्द न मिलना होता है.

एकदूसरे का सम्मान करें

दांपत्य में पत्नी को तमाम तरह के व्रत करने के लिए कहा जाता है, जिस के जरिए औरतों को सिखाया जाता है कि उन के लिए पति ही परमेश्वर है, उसे भगवान की तरह मानसम्मान देना चाहिए. असल में आज इस बात को समझाने की जरूरत है कि पतिपत्नी दोनों बराबर हैं. दोनों को एकदूसरे का मानसम्मान करना चाहिए. जब तक एकदूसरे का सम्मान नहीं होगा, दांपत्य में तनाव, झगड़े और अपराध खत्म नहीं होंगे.

शादी के पहले और शादी के बाद महिलाओं की आजादी का सम्मान जरूरी है. बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाएं एक दुर्घटना मात्र हैं. इन को ले कर महिलाओं के जीवन पर दबाव नहीं डालना चाहिए. ऐसी महिलाओं को जब सामान्य मान कर समाज में सही स्थान दिया जाएगा तभी सही मानो में निर्भया कांड के बाद आए फैसले से बदलाव हो सकेगा. कानून के साथ समाज को अपनी सोच बदलने की जरूरत है.

इन का कहना है

बलात्कार केवल महिलाओं के शरीर पर ही अपना असर नहीं डालता, वह महिलाओं के दिमाग पर भी असर डालता है. महिला को लगता है कि अब उस के लिए समाज में कोई जगह नहीं बची है. उसे समाज गलत निगाहों से देखेगा. घरपरिवार के लोग भी यह नहीं मानते कि उस की गलती नहीं रही होगी. ऐसे में सब से जरूरी है कि कानून के साथ समाज भी पीडि़ता के साथ खड़ा हो. अभी यह देखा जाता है कि इस तरह की घटनाओं की शिकार महिलाओं को अलगथलग रह कर जीवन गुजारना पड़ता है. दूसरी ओर जहां भी वह अपनी बात रखने जाती है लोग उस को सौफ्ट टारगेट समझने की कोशिश करते हैं. जिस संवेदनशीलता की उम्मीद समाज से होनी चाहिए, पीडि़ता के साथ वह नहीं होती है.

– अनुपमा सिंह, अनुपमा फाउंडेशन, लखनऊ

औरतों के प्रति होने वाले अपराध के मामलों में कानून में लगातार सुधार हुआ है. इस से अब यह उम्मीद जगी है कि कानून के पास आने पर औरतों को सही न्याय मिलेगा. यह सच है कि न्याय जितना जल्दी मिलना चाहिए, नहीं मिल रहा है. इस की कई वजहें हैं. विरोधी पक्ष न्याय व्यवस्था की खामी का लाभ उठा कर फैसले में देरी करवाता है. अभी भी अपराध के बाद होने वाली पुलिस की विवेचना बहुत वैज्ञानिक आधार पर नहीं होती. जिस से अपराधी को लाभ मिलता है. निर्भया कांड में दिल्ली पुलिस ने बहुत ही अच्छी तरह से विवेचना की है, जिस से अपराधियों को सही दंड मिल सका. इस तरह हर मामले में विवेचना शुरू हो जाए तो न्याय मिलने में समय नहीं लगेगा.

– श्वेता तिवारी, अधिवक्ता, लखनऊ

आमतौर पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध को ले कर महिलाओं को ही दोषी ठहरा दिया जाता है, यह गलत है. फैशन, फिल्म, औरतों के कपड़े किसी भी तरह के महिला अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं होते हैं. यह सोच धर्मवादी और पुरुषवादी सत्ता समझाने की कोशिश करती है. मीडिया भी कईर् बार ऐसी घटनाओं के लिए औरतों को ही दोष देता है. निर्भया कांड में भी यह तर्क दिया गया कि उसे रात में अकेले अपने दोस्त के साथ जाने की क्या जरूरत थी. इस तरह के तर्क देने से गलत संदेश जाता है. अपराधियों को अपने बचाव का मौका मिलता है. ऐसे मामलों में दोषियों का सामाजिक बहिष्कार होना जरूरी है.

– रिचा शर्मा, अभिनेत्री, मुंबई

आज के समय में केवल घर के बाहर ही नहीं, घर के अंदर भी महिलाओं के साथ ऐसे हादसे पेश आने लगे हैं जहां उन को शारीरिक व मानसिक रूप से शोषण का शिकार होना पड़ता है. हमारे पास ऐसे तमाम केस आए जिन में युवा विधवा औरतों के साथ घर में शारीरिक शोषण होता है. जब ये औरतें हालात के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करती है तो उन को तरहतरह से परेशान किया जाता है. एक घर में बड़े बेटे की पत्नी की मृत्यु के बाद छोटे बेटे की पत्नी के साथ दोनों भाइयों के संबंध रखने की शिकायत आई. मसला बड़े घर का था तो काफी प्रयास के बाद सुलह हो सकी. जिन औरतों के बच्चे नहीं होते, वे तो दूसरी शादी कर भी सकती हैं पर बच्चों के होने के बाद दूसरी शादी भी संभव नहीं रह जाती. ऐसे में समाज को अपनी सोच बदलनी चाहिए, तभी हालात में सुधार हो सकेगा.

– अजय पटेल, समाजसेवी, वाराणसी

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बौलीवुड में आने के लिए सनी लियोन को करना पड़ा था ये काम

बौलीवुड एक्ट्रैस सनी लियोन का पोर्न स्टार से इंडस्ट्री तक का सफर काफी मुश्किलों भरा रहा है. भले ही आज सनी लियोन काफी पापुलर है पर इस दौरान उन्हें यहां तक पहुंचने के लिए बहुत कुछ झेलना पड़ा. इंडस्ट्री में आने के बाद भी लोग उन्हें लोग एक पोर्न स्टार ही समझते थे और उनके साथ काम करने में झिझकते थे.

पोर्न स्टार से इंडस्ट्री तक का सफर

मैग्जीन के लिए न्यूड पोज

पोर्न इंडस्ट्री में अपने करियर की शुरुआत में सनी लियोन ने पेंटहाउस नाम की एडल्ट मैग्जीन के लिए पोज दिए. जिसके बाद उनके पास नए प्रस्तावों की झड़ी सी लग गई. सनी लियोन को मैग्जीन के लिए न्यूड पोज देने में काफी स्कोप नजर आया. इसमें पैसा और देश विदेश घूमने के अवसर भी बहुत थे. शायद यही वजह थी कि उन्होनें पोर्न फिल्मों की दुनिया में अपने कदम आगे बढ़ा दिए थे.

न्यूड डांस की तस्वीरें

सनी लियोन की न्यूड डांस की कुछ तस्वीरें वायरल हुईं थी. बताया गया था कि यह तस्वीरें मुंबई से पुणे हाइवे स्थित एक होटल की हैं. यह तस्वीरें पूरी तरह से न्यूड थीं.

लैस्बियन

सनी लियोन की पहली पोर्न फिल्म साल 2005 में रिलीज हुई थी. पोर्न इंडस्ट्री में कदम रखने के बाद सनी लियोन ने ये ऐलान किया था कि वो पोर्न फिल्मों में सिर्फ समलैंगिक संबंधों वाले सीन ही करेंगीं. फिर सनी उस वक्त सुर्खियों में आईं जब एक फिल्म में उन्होंने एक लड़की के साथ लिपलौक किया. बताया जाता है कि इस फिल्म में उन्होंने अपनी कोस्टार संध्या को लिपलौक किया. ‌फिल्मी गलियारों में इस बात की चर्चा होती रही कि आखिर सनी को ऐसा करने की क्या जरूरत पड़ गई. वह इस सीन के कारण काफी ट्रोल भी हुई थी.

बिग बौस’ के सीजन पांच में सनी लियोन की वाइल्ड कार्ड एंट्री

साल 2011 में कलर्स चैनल के रियालिटी शो ‘बिग बौस’ के सीजन पांच में सनी लियोन की वाइल्ड कार्ड के जरिए एंट्री हुई थी. यहां आने से पहले उनका नाम बहुत ही कम लोग जानते थे. इस शो में आने के बाद ही लोगों को पता चला था कि वो एक पोर्न स्टार हैं. रिएलिटी शो बिग बौस ने सनी की जिंदगी को अचानक से बदल कर रख दिया.

इस रियालिटी शो ने भारत में सनी लियोन के लिए ना सिर्फ टेलिविजन की राह बनाई बल्कि उनके लिए बौलीवुड के दरवाजें भी खोल दिए. दरअसल इस शो के एक एपिसोड में फिल्म निर्देशक महेश भट्ट मेहमान बन कर आएं थे और उन्होंने शो के दौरान ही सनी लियोन को अपनी आने वाली फिल्म के लिए चुन लिया था. भारत में टेलीविजन शो बिग बौस के जरिए चर्चा में आईं सनी लियोन ने बौलीवुड में कई मशहूर आइटम सान्ग्स किए और बाकायदा फिल्मों में हीरोइन बनी. शुरुआत में लोग कहते थे कि बड़े हीरो उनके साथ काम नहीं करेंगे, लेकिन शाहरुख ने उन्हें अपनी फिल्म ‘रईस’ के खास गीत में लिया. सलमान ने ‘बिग बौस’ में मेहमान बनाया और आमिर ने कह दिया कि वो सनी के साथ काम करने को तैयार हैं.

फिल्म ‘जिस्म 2′ के जरिए बौलीवुड में एंट्री

फिल्म ‘जिस्म 2’ के जरिए सनी लियोन ने बौलीवुड में एंट्री की थी. साल 2012 में रिलीज हुई ‘जिस्म 2’ बौक्स आफिस पर बुरी तरह फ्लाप साबित हुई थी लेकिन सनी लियोन का करियर बौलीवुड में फिट हो गया और उन्हें एक के बाद एक फिल्में भी मिलती चली गई.

सनी लियोन अब तक जैकपाट, रागिनी एमएमएस 2 ..हेट स्टोरी 2 ..मस्तीजादे समते करीब 15 फिल्मों में काम कर चुकी हैं.

टीवी पर बैन

सनी लियोन एक और बड़ी वजह से चर्चाओं में आईं थी. इसके बारे में ये बताया जा रहा था कि कपिल शर्मा ने कहा कि अब सनी लियोन को छोटे पर्दे पर नहीं ला सकते वहां फैमिली होती है. कहा जाता है कि कपिल ने सनी को अपने शो में आने से मना कर दिया था.

राखी से विवाद

बौलीवुड एक्ट्रैस राखी सावंत भी अपने विवादों के कारण काफी चर्चा में रहती हैं. लेकिन वह इंटरव्यूज के दौरान सनी को काफी गलत बताती हैं. बीते समय राखी ने एक इंटरव्यू के दौरान सनी को ये तक बोल दिया था कि वह उनका बैंड बजा देंगी. उन्होंने ये भी कहा था कि अगर सनी शार्ट कपड़े पहनती हैं तो वह भी इससे ज्यादा शार्ट कपड़े पहनेंगी और सनी को इंडस्ट्री से भगा देंगी.

बेटी के कारण विवाद

सनी उस वक्त भी काफी सुर्खियों में आई जब उन्होंने बेटी निशा को गोद लिया. इस कारण उन्हें ट्रोल भी होना पड़ा था. लोगो का कहना था कि सनी अपनी बेटी को भी अपनी ही तरह पोर्न स्टार बनाएंगी.

बता दें कि अमेरिका के जिस पोर्न इंडस्ट्री में सनी लियोन ने काम किया है वहां काम करने वाले कलाकारों को एडल्ट स्टार के नाम के साथ ही अच्छे अभिनय के लिए अवार्ड भी दिए जाते हैं लेकिन भारत जैसे देश में ऐसी फिल्मों को इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता है. ऐसे में जब सनी लियोन ने पोर्न फिल्मों से सीधे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री मारी तो उनके लिए बौलीवुड की ये राह काभी चुनौती भरी बन गई थी.

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नेता भी दें जनता को अपनी कमाई का हिसाब

खबरों के मुताबिक, आयकर विभाग सात सांसदों और 98 विधायकों की संपत्ति के ब्यौरे में पायी गयी असंगति की जांच कर रहा है. विभाग ने यह बात सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामे के जरिये कही है. केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने अदालत से यह भी कहा है कि अन्य 42 विधायकों और 9 सांसदों की संपत्ति के ब्योरे की शुरुआती जांच जारी है.

जन-प्रतिनिधियों की शिक्षा, आमदनी, सार्वजनिक पृष्ठभूमि को जानना मतदाता के लिए जरूरी है, ताकि वह अपनी पसंद का चुनाव करने से पहले तमाम पहलुओं पर सोच-विचार कर सके. ऐसी सूचनाओं के सार्वजनिक होने से जवाबदेही कायम होती है. उम्मीदवार द्वारा दी गयी सूचनाओं के आधार पर प्रश्न किये जा सकते हैं और गलत पाये जाने पर उचित कार्रवाई के लिए दबाव बनाया जा सकता है.

सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिहाज से ऐसे उपाय को अहम मान कर नागरिक संस्थाओं ने बहुत प्रयास किये. आखिरकार 2000 के नवंबर महीने में दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि चुनाव में मतदाता उम्मीदवार के बारे में सही फैसला ले सके, इसके लिए बहुत जरूरी है कि हर प्रत्याशी के अतीत के बारे में वह आगाह हो. प्रत्याशी के अतीत के बारे में जानकारी के उपलब्ध न होने को अदालत ने लोकतंत्र के लिए घातक माना था.

उसने इसी सोच से चुनाव आयोग से कहा कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार अपनी संपत्ति, अपनी शिक्षा तथा अपने खिलाफ दर्ज मुकदमों या सजा आदि के ब्योरे जगजाहिर करें. सर्वोच्च न्यायालय ने मई, 2002 के फैसले में भी यही बात कही थी. इसके बाद चुनाव आयोग ने चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के लिए विशिष्ट जानकारियों का सार्वजनिक करना अनिवार्य कर दिया.

डेढ़ दशक में इसके कुछ सुफल सामने आये हैं. फर्जी डिग्री के आधार पर अपनी उच्च शिक्षा के बारे में दावे करनेवाले जन-प्रतिनिधियों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाये गये हैं, कुछ मामलों में इस्तीफा भी हुआ है. लेकिन, संपत्ति के ब्योरे के आधार पर जन-प्रतिनिधियों के खिलाफ विशेष कुछ होता नजर नहीं आ रहा था. आयकर विभाग की जांच की पहल से सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता की मुहिम को नयी ऊर्जा मिलेगी.

आगे आयकर विभाग पर इस बात का लोकतांत्रिक दबाव बनाया जा सकता है कि वह जांच के घेरे में आये जन-प्रतिनिधियों के नाम सार्वजनिक करे, ताकि मतदाता को उनकी पार्टी और सरकार में उनकी भागीदारी के बारे में भी पता चल सके. उम्मीद है कि जांच और कार्रवाई में बहुत सारा वक्त बर्बाद नहीं किया जायेगा.

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चर्चा गुणदोषों पर होती तो अच्छा होता

जिंदगी और मौत पर किसी का बस नहीं है. यह पुरानी कहावत है. पर मौत को भुनाना तो अपने बस में है ही न? फिल्मी तारिका श्रीदेवी की सिर्फ 54 साल की उम्र में दुबई के एक होटल के कमरे में बाथटब में हुई मौत ने घंटों टीवी चैनलों को और कई दिनों तक समाचारपत्रों में सुर्खियों को चमकाने का मौका दे डाला. उन की मौत पर इस तरह की आलतूफालतू बातें हुईं मानो देश में कोई भूचाल आ गया हो.

श्रीदेवी की मौत चाहे हादसा थी, प्राकृतिक थी या फिर सुनियोजित, एक व्यक्तिगत मामले से ज्यादा नहीं थी. बोनी कपूर व श्रीदेवी कपूर में अगर अनबन थी भी और उस की मृत्यु में कोई रहस्य छिपा हुआ भी था तो भी इस बात को इतना तूल देने की जरूरत न थी. यह एक खाली बैठे समाज की पहचान है, जिसे दूसरों के गमों और गलतियों में मजा आता है ताकि वह अपने गम भुला सके.

श्रीदेवी मौत के समय एक रिटायर्ड ऐक्ट्रैस थीं. 12 साल बाद घरगृहस्थी के चक्कर से निकल कर श्रीदेवी ने ‘इंग्लिशविंग्लिश’ व ‘मौम’ फिल्मों में बेहतरीन काम किया पर फिर भी वे अपनी पुरानी जगह न ले पाईं. वे न मृत्यु के समय मर्लिन मुनरो थीं और न मधुबाला.

श्रीदेवी ने बहुत सी अच्छी फिल्मों में काम किया पर उन की कम ही फिल्मों ने कोई सामाजिक असर छोड़ा. आखिरी 2 फिल्मों में मांओं और पत्नियों के रोल में वे प्रेमिकाओं और नर्तकियों से अच्छा प्रभाव दिखा सकीं. दोनों फिल्में सामाजिक मामलों पर थीं और मां को अपने विशिष्ठ स्थान दिखाने वाली थीं. उन का प्रभाव था पर ‘चांदनी’, ‘सदमा’, ‘मिस्टर एक्स’ में उन के रोल अच्छे होते हुए भी वे लंबा प्रभाव न छोड़ पाईं. ‘लमहे’ का विषय जरूर चौंकाने वाला था और आशा थी कि उसे दूसरी फिल्मों से ज्यादा सफलता मिलेगी पर उस फिल्म को भारतीय दर्शक पचा न पाए. अपनी मां के प्रेमी से प्रेम करना लोगों को इंसैस्ट की तरह लगा था.

एक अभिनेत्री की मृत्यु उस के काम की समीक्षा करने का एक और मौका होता है और जो चर्चा कई दिनों तक होती रही वह फिल्मों, व्यक्तित्त्व, गुणदोषों पर होनी चाहिए थी पर होती इस बात पर रही कि मौत कैसे हुई?

कोई नकली बाथटब को दिखा रहा है, कोई शराब की बात कर रहा है तो कोई और ऊंची उड़ान उड़ रहा है. फिल्मी तारिका की इतनी चीरफाड़ की गई जितनी शायद पोस्टमार्टम में भी न की गई होगी.

बेहद प्रसिद्ध तारिकाओं के गुजरने के बाद एक जनून सा छाता है और वह स्वाभाविक है पर उसे संयम से देखा जाना चाहिए, गपोड़ी किस्सों के लिए अवसर नहीं.

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