प्रियंका चोपड़ा हुईं रंगभेद की शिकार, हाथ से निकली हौलीवुड फिल्म

हौलीवुड में रंगभेद और नस्लवादी भावना के वजूद का इतिहास करीब 80 साल पुराना हो गया है और समय समय पर कलाकारों को इसका शिकार होना पड़ा है. ताजा मामले में हौलीवुड में प्रमुख भूमिका पाने वाली बौलीवुड और दक्षिण एशिया की पहली अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के नस्‍लवाद का शिकार होने की खबरें सामने आई है. प्रियंका ने खुद अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका को दिए इंटरव्यू में इस बात का खुलासा किया है. बौलीवुड की ‘देसी गर्ल’ प्रियंका चोपड़ा ने एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका को दिए इंटरव्यू में बताया कि रंग के आधार पर होने वाले भेदभाव के कारण उनके हाथ से एक हौलीवुड फिल्म फिसल गयी.

प्रियंका ने कहा, यह पिछले साल की बात है जब वह एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में बाहर गयी हुई थीं तब एक स्टूडियो से उनके मैनेजर से बातचीत हुई. उनके मैनेजर से कहा गया कि प्रियंका इस फिल्म के लिए उपयुक्त नहीं हैं और इसका कारण फिजिकैलिटी बताया गया. प्रियंका ने अपने मैनेजर से इस पूरे मामले को समझा, तो पता चला कि फिल्म मेकर्स का मतलब स्किन कलर से था. मेकर्स फिल्म में ऐसे कलाकार को चाहते थे जो ब्राउन न हो. प्रियंका ने कहा कि उन्हें यह सुनकर काफी हैरानी हुई और तकलीफ भी पहुंची.

बता दें कि यह पहला मामला नहीं है जब किसी सेलिब्र‍िटी को रंगभेद का शिकार होना पड़ा है. कुछ समय पहले शिल्पा शेट्टी भी रंगभेद और नस्लभेद की शिकार हुई थीं, जब वह एक अंतर्राष्ट्रीय टीवी शो बिग ब्रदर का हिस्सा बनी थीं.

यही वजह हो सकती है कि प्र‍ियंका ने अब बौलीवुड कमबैक का मन बना लिया है. क्वांटिको के मेकर्स सीजन 4 की तैयारी में लगे हैं, लेकिन प्र‍ियंका अब इसका हिस्सा नहीं होंगी. सूत्रों की मानें, तो प्रियंका अब कुछ नया करना चाहती हैं.

बता दें कि कुछ समय पहले प्र‍ियंका ने क्वांटिको के तीसरे सीजन का पोस्‍टर जारी किया था. प्रियंका इन दिनों क्वांटिको आयरलैंड में इसकी शूटिंग कर रही हैं. इस शो का आयोजन इसी साल 26 अप्रैल से किया जाएगा. प्र‍ियंका ने ट्व‍िटर पर क्वांटिको सीजन 3 का फर्स्‍ट लुक पोस्‍टर साझा किया था, जोकि बेहद दमदार है इससे पहले क्वांटिको के दो सीजन में भी प्र‍ियंका काफी प्रभावी अंदाज में दिखाई दी थीं.

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महिलाओं के लिए कानून बनाना ही काफी नहीं

जब किसी लड़की को लगता है कि कोई लड़का या आदमी उस का लगातार पीछा कर रहा है, तो उस में एक गहरी दहशत छा जाती है. पहले तो यह संयोग लगता है पर जब पता चल जाए कि पीछा करने वाला घंटों सड़क पर इंतजार करता है, घर के सामने जमा रहता है, तो यह डर लाजिम ही है. इस से न सिर्फ लड़की के दिनरात खराब होते हैं वह पलपल सहमी भी रहती है.

अब सरकार ने एक नया कानून बना कर पीछा करने को भी गंभीर अपराधों की श्रेणी में डाल दिया है. पहले पीछा करना पर नुकसान न पहुंचाना कोई अपराध नहीं था. मगर 2013 में बने कानून में इंडियन पीनल कोड की धारा 354डी के अंतर्गत पीछा करने वाले को 3 साल तक की सजा हो सकती है भले उस पीछा करने वाले ने कोई नुकसान न पहुंचाया हो.

पर यह कानून बनाना एक बात है और इस का इस्तेमाल करवाना दूसरी. आमतौर पर घर वाले इस कदर डर जाते हैं कि वे पुलिस तक जाने की हिम्मत भी नहीं कर पाते. जो यदाकदा पीछा करते हैं वे तो माह 2 माह में अपना रास्ता बदल लेते हैं, पर जो जनून के शिकार हो जाते हैं वे गैंग बना लेते हैं और स्वभाव से अपराधी किस्म के होते हैं, उन से निबटना आसान नहीं होता.

पुलिस में शिकायत करो तो शुरू में पुलिस कानून के बावजूद कोई विशेष ध्यान नहीं देती. अगर पुलिस पीछा करने वाले को पकड़ कर धमका भी दे तो भी बात नहीं बनती. ऐसे में पीछा करने वाला जगह बदल लेता है. घर की जगह दफ्तर, बाजार, रिश्तेदार या फिर किसी के यहां भी पहुंच जाता है.

पीछा करने वाले शातिर के दोस्तयार भी बहुत होते हैं, क्योंकि जिस के पास पीछा करने का समय होता है उस के पास पैसा भी होता है और सड़कों पर घंटों धूप, सर्दी, बारिश में खड़े होने की शारीरिक ताकत भी. वह अपराध करने में सक्षम होता है. वह दूसरों से पीछा करने के अधिकार पर उलझ भी जाता है, क्योंकि एक लड़की का पीछा करने वाले को दूसरे लोग पहचानने लगते हैं. आसपास के घर वालों, दुकानदारों, चौकीदारों के कहने के बावजूद यदि वह पीछा करना न छोड़े तो लड़की के मन पर गहरा असर पड़ता है.

यह पीछा करने वाले का मानसिक रोग होता है पर लड़की को भी रोगी बना देता है. जब तक नुकसान न हो तब तक पुलिस में जाने का मतलब जगहंसाई कराना होता है. भारत में तो इस तरह के हर मामले में पहला आक्षेप लड़की पर ही लगता है कि उस ने ही कुछ ऐसा किया होगा कि कोई उस पर दीवाना हो गया.

आजकल पीछा करने वाले मोबाइल से भी तंग करने लगते हैं. वे मैसेज, प्रैंक काल, फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजभेज कर परेशान कर देते हैं. यह भी प्राइवेसी के हनन के आरोप में अपराध है पर ऐसे अपराधों पर सजाएं कम मिलती हैं. वैसे भी भारत में कानून बनाना आसान है पर सजा दिलाना मुश्किल. महीनों नहीं सालों मामले चलते रहते हैं.

दिल्ली में एक लड़की का एक शातिर 2008 से 2010 तक पीछा करता रहा. उस की स्कूटी के पीछे अपनी बाइक लगा देता था. वह इतना दुस्साहसी था कि एक बार रैड लाइट पर उस लड़की की स्कूटी पर ही बैठ गया और शादी करने की जिद करने लगा. उस के पास रिवौल्वर भी था. लड़की के मना करने पर उस ने उस की पीठ में गोली मार दी. यह घटना 2010 की है. वह लड़की अब लकवाग्रस्त है पर 2017 तक मामला अदालत में चल रहा है, क्यों?

जब तक मामला अदालत में होता है पीडि़ता को चैन नहीं होता, क्योंकि कितनी ही तारीखों पर उसे भी मौजूद रहना पड़ता है.

यह सामाजिक गुनाह है पर अफसोस है कि समाज के ठेकेदार, धर्म के दुकानदार, राजनीतिक दल व अदालतें इस तरह के मामलों को मक्खी के भिनभिनाने का सा मान कर नजरअंदाज कर देते हैं पर यह मक्खी नहीं ततैया होती है, जो दिनरात हराम करती है.

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जिंदगी जीने की मुझे एक वजह तो चाहिए

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बदल रहा है कट्टरवादी सऊदी अरब

सऊदी अरब का नाम सुनते ही एक ऐसे देश की छवि उभरती है जहां पिछड़ापन, हिंसा और भेदभाव का बोलबाला है. लेकिन अब यहां सुधार हो रहे हैं और इन सुधारों की वजह है सऊदी अरब के युवराज प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान. अब तक की उत्तराधिकार की परंपरा के तहत पूर्व शासक के पुत्रों में से ही एक के बाद एक सुलतान की गद्दी पर आसीन होते थे. नतीजतन, राजगद्दी संभालते समय उन की उम्र 80 वर्ष से ऊपर हो जाती थी जिस उम्र में कुछ नया करने का जज्बा नहीं होता.

पहली बार वर्तमान शासक ने अपने भाइयों की जगह अपने युवापुत्र को युवराज घोषित किया. उसी का परिणाम है कि नई सोच की सुधारवादी बयार, परंपरावादी व दकियानूसी सऊदी अरब जैसे समर्थ राष्ट्र का चेहरा बदलने की तैयारी में है.

देश में एक दशक के दौरान भयंकर भ्रष्टाचार हुआ है. भ्रष्टाचारियों में शाही परिवार के लोग, मंत्री और उद्यमी शामिल हैं. हो सकता है कि युवराज मोहम्मद बिन सलमान भ्रष्टाचार को बहाना बना कर तमाम विरोधियों का सफाया कर रहे हों. टीकाकारों का मानना है कि आले सऊद में सत्ता को ले कर लड़ाई शुरू हो चुकी है. बिन सलमान हर उस व्यक्ति को रास्ते से हटा देना चाहते हैं जो उन की सत्ता के मार्ग में थोड़ा सा भी रोड़ा अटका सकता है.

पिछले दिनों सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने समाज सुधार की ओर पहल करते हुए भ्रष्टाचार के आरोप को कुछ को बर्खास्त कर दिया और कुछ को गिरफ्तार कर लिया. शहजादे यानी युवराज सत्ता में आंतरिक असंतुष्टों की पहचान कर उन्हें बाहर कर रहे हैं.

विरोधाभास भी

अपनी सुधारवादी छवि के साथ शहजादे अपने राजनीतिक विरोधियों से लड़ रहे हैं. वहीं आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अन्य देशों के साथ मिल कर काम करने की बात करते हैं. जो सऊदी अरब को जानते हैं उन्हें यह बात सुन कर हंसी आई होगी, क्योंकि यह तो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. सऊदी अरब तो दुनियाभर में फैले इसलामी आतंकवाद का स्रोत है. अलकायदा के ओसामा बिन लादेन, तालिबान के मुखिया मुल्ला उमर, बोको हरम के नेता शेकाऊ, आईएसआईएस सरगना अबू बक अल बगदादी आदि हैं. दुनिया के सिरमौर आतंकवादियों में एक बात समान यह है कि यह सभी और इन के संगठन वहाबी हैं. इसलिए वहाबी इसलाम आज की दुनिया में इसलामी आतंकवाद का प्रतिनिधि चेहरा है. पैट्रो डौलर ही दुनियाभर में बहाबी विचारधारा को फैलाने का काम करते हैं. पिछले कुछ दशकों में फैले वहाबी आतंकवाद के पीछे सऊदी राजवंश की ताकत है. बता दें कि सऊदी राजशाही वहाबी विचारधारा की रही है.

politics

धीरेधीरे अमेरिकी मीडिया में भी अब सऊदी अरब की तीखी आलोचना होने लगी है. दिग्गज अमेरिकी पत्रकार फरीद जकरिया ने एक लेख में लिखा, ‘‘सऊदियों ने इसलाम की दुनिया में राक्षस पैदा कर दिए हैं.’’ अब राजनीतिक नेता भी सऊदी को खलनायक मानने लगे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के दोनों उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप के नजरिए में पूरबपश्चिम जैसा अंतर था, लेकिन एक बात पर दोनों सहमत थे और वह बात थी सऊदी अरब की.

हिलेरी क्ंिलटन का आरोप था कि सऊदी अरब ने दुनियाभर में कई युवाओं को कट्टरपंथ की तरफ धकेलने के इरादे से कट्टरपंथी स्कूल और मसजिदें बनाने में मदद की. वहीं डोनाल्ड ट्रंप सऊदी अरब को आतंकवाद की वित्तीय मदद करने वाला सब से बड़ा देश करार दे चुके हैं. यह बात अलग है कि राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने सब से पहली विदेश यात्रा सऊदी अरब की ही की, क्योंकि अमेरिका ही सऊदी अरब का सब से बड़ा संरक्षक है.

राजनीतिक संकट

अब सऊदी अरब विशेषज्ञों का मानना है कि असल में सऊदी अरब का अंदरूनी राजनीतिक संकट गहरा रहा है जिस से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए आतंकवाद से लड़ने की बातें की जा रही हैं. सऊदी अरब का राजनीतिक ही नहीं, आर्थिक संकट भी गहरा रहा है. सऊदी अरब के पास दुनिया का

22 प्रतिशत कच्चा तेल है और अभी तक उस की अर्थव्यवस्था पूरी तरह तेल के निर्यात पर निर्भर थी. इस देश के पास आय का दूसरा स्रोत नहीं है. अब चूंकि कच्चे तेल के भावों में निरंतर गिरावट और विश्व में उस के उपयोग में हो रही गिरावट ने सऊदी अर्थव्यवस्था को चुनौती दे डाली है. ऐसे में सऊदी अरब को अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए आय के अन्य स्रोतों पर काम करना जरूरी था. युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने यही किया.

सऊदी युवराज ने देश को बाहरी निवेशकों के लिए खोला है जो कुछ अरसे पहले तक सोचना भी संभव नहीं था. मगर विदेशी निवेश तभी हो पाएगा जब सऊदी अरब की कट्टरतावादी छवि सुधरे. इसलिए शहजादा मजबूरी में सुधार करने में लगे हैं.

विश्व में सऊदी अरब के समाज को एक अति रूढि़वादी समाज के रूप में देखा जाता है जहां पर मानवाधिकारों का हनन एक सामान्य सी बात है. अपनी धूमिल होती छवि को ठीक करने के लिए सऊदी अरब ने नया हथकंडा अपनाया है जिसे महिलाओं की स्वतंत्रता की आड़ में प्रचारित किया जा रहा है.

दुनियाभर में सऊदी ऐसे देशों में शामिल है जहां महिलाओं पर सब से ज्यादा प्रतिबंध हैं. यहां खेल के मैदानों में महिलाओं को लंबे समय से दूर रखा गया है. लेकिन नए सऊदी प्रिंस महिला अधिकारों को ले कर अब काफी उदारता दिखा रहे हैं. नए आदेश के मुताबिक, महिलाएं भी आने वाले समय में खेलों के मैदान में जा सकेंगी. यह घोषणा शक्तिशाली क्राउन पिं्रस मोहम्मद बिन सलमान के महत्त्वपूर्ण महत्त्वाकांक्षी सुधारों में से एक है. कुछ समय पहले प्रिंस ने महिलाओं के ड्राइविंग करने पर लगे प्रतिबंध को भी हटा दिया. जून 2018 से महिलाएं भी सऊदी अब में ड्राइविंग कर सकेंगी.

महिलाओं के अधिकार

बता दें कि कुछ महीने पहले सैकड़ों महिलाओं को रियाद में एक स्पोर्ट्स स्टेडियम में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी कि ज्यादातर फुटबौल मैच के लिए थी, यह सऊदी अरब के राष्ट्रीय दिवस का मौका था. सऊदी की संरक्षकता प्रणाली के अंतर्गत परिवार का पुरुष सदस्य, जो आमतौर पर पिता, पति या भाई होता है, महिला को पढ़ने, यात्रा करने और अन्य गतिविधियों के लिए अनुमति देता है. लेकिन आर्थिक और सामाजिक सुधारों के मद्देनजर अपने ‘विजन 2030’ को पूरा करने के लिए अब महिलाओं को कुछ अधिकार दिए जा रहे हैं, जिन का उद्देश्य महिला रोजगार को बढ़ावा देना है.

महिलाओं के अधिकार बहुत ही सीमित हैं और उन की स्वतंत्रता कड़े परदे में है. 2015 में उन्हें पहली बार स्थानीय निकायों के चुनावों में वोट देने का अधिकार प्राप्त हुआ. वर्तमान युवराज युवा हैं और नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं. मगर यह सुधार भी दिखावे के ज्यादा हैं.

एक नारी अधिकार कार्यकर्त्ता के मुताबिक, अब महिलाएं गाड़ी चलाएंगी, लेकिन नारीविरोधी सभी कानून बदस्तूर जारी रहेंगे. दुष्कर्म की शिकार होने पर भी महिलाओं को ही सजा भुगतनी होती है, क्योंकि दुष्कर्म के 4 गवाह पेश करने पड़ते हैं. दुष्कर्म नामक कोई शब्द सऊदी अरब के संविधान में नहीं है. है तो व्यभिचार नामक शब्द. व्यभिचार में पकड़े जाने पर महिला व पुरुष दोनों को ही सजा मिलती है. दुष्कर्मी को तो सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन दुष्कर्म पीडि़ता को सजा क्यों?

परपुरुष के साथ यदि किसी महिला को देख लिया गया तो उस का अर्थ यह होता है कि महिला ने व्यभिचार किया है. लड़की को अगवा कर उस के साथ यदि दुष्कर्म किया गया है तो उसे 4 गवाह लाने होते हैं. यदि ऐसा नहीं हुआ तो दुष्कर्मी के साथ उसे भी सजा दी जाती है.

पीडि़ता को गवाह कहां मिलेंगे? सऊदी की महिलाएं अपने पति की अनुमति के बिना देश से बाहर घूमने के लिए नहीं जा सकतीं. इलाज कराने के लिए भी यदि वे बाहर जाती हैं तो घर के पुरुष अभिभावक से अनुमति लेनी होती है. पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना लड़कियों को शादी करना, तलाक, स्कूल व कालेज में दाखिला, नौकरी, व्यवसाय करना यहां तक कि बैंक में खाता खुलवाना भी संभव नहीं है.

वहां लड़कियों के लिए अभिभावक पिता, पति, भाई, चाचा या फिर पुत्र होता है. किसी भी अपरिचित पुरुष के साथ लड़कियों की बातचीत और किसी तरह का मिलनाजुलना प्रतिबंधित है. वर्ष 2013 में सड़क हादसे में जख्मी एक महिला का औपरेशन कर हाथ काटना था लेकिन ऐसा करना संभव नहीं हो सका, क्योंकि उक्त महिला का कोई अभिभावक नहीं था जो अनुमति दे सके. क्योंकि उसी हादसे में उस के पति की मौत हो गई थी.

आर्थिक सांस्कृतिक मोरचे पर

युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने देश में उदार इसलाम के पालन का संकल्प जताया है. 24 अक्तूबर, 2017 को रियाद में एक बड़ा आर्थिक सम्मेलन आयोजित किया गया जिस का मूल उद्देश्य तेल से होने वाली आय पर सऊदी अरब की निर्भरता को कम करना था. सलमान ने विजन 2030 पेश करते हुए कहा, ‘‘हम उस तरफ लौट रहे हैं जो हम पहले थे अर्थात उदार इसलाम वाला देश जोकि सभी धर्मों और दुनिया के लिए खुला हो. हम अपनी जिंदगी के आगामी 30 वर्ष विनाशकारी विचारों के साथ नहीं गुजारना चाहते. हम जल्द अतिवाद को खत्म करेंगे.’’

सऊदी अरब ने सिनेमा पर कई दशकों से जारी पाबंदी हटाने की घोषणा की है. सऊदी अरब ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के सामाजिक सुधारों के तहत यह कदम उठाया है. संस्कृति और सूचना मंत्रालय ने कहा, ‘35 वर्षों से ज्यादा समय बाद 2018 की शुरुआत में देश में व्यावसायिक सिनेमा के संचालन को मंजूरी दी जाएगी.’

एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब, परंपरावादियों के विरोध के बावजूद विजन 2030 के तहत मनोरंजन को समाज में व्यापक बदलाव के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है.

इस के अलावा 17 अक्तूबर, 2017 को शाही परिवार ने इसलामी विद्वानों के एक अंतर्राष्ट्रीय निकाय का गठन किया जो हदीसों (पैगंबर मोहम्मद द्वारा स्थापित) की समीक्षा कर उन की कट्टरवादी और फर्जी बातों को हटाएगा. इसे भी उदार इसलाम की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

समय बदल रहा है. सऊदी अरब को ले कर पश्चिम पहले से कहीं ज्यादा सतर्क हो चुका है. इलैक्ट्रिक गाडि़यों और सौर ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल के चलते तेल की मांग भी भविष्य में कम होगी. सऊदी अरब की समृद्धि का सूरज धीरेधीरे डूबने की राह पर है. राजशाही बाहर और भीतरी दबाव झेल रही है, लेकिन क्या वह वैचारिक सुधार का रास्ता अपनाने की हिम्मत कर सकेगी, यह सवाल अभी शेष है जिस का जवाब नए शहजादे की हुकूमत के भावी कदम देंगे.

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छोटे पर्दे की वैम्प ‘काम्या पंजाबी’ ने शेयर की बिकिनी पोस्ट

साल 2002 में टीवी शो “कहता है दिल” से टीवी पर अपने करियर की शुरुआत करने वाली एक्ट्रेस काम्या पंजाबी ने बोल्ड लुक में अपनी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर की है. काम्या ने यह तस्वीर अपने वैरिफाइड इंस्टाग्राम अकाउंट से शेयर की है. फोटो में वह स्विमिंग पूल में बिकिनी पहन कर मस्ती करती नजर आ रही हैं. आज कल सोशल मीडिया पर इस तरह की तस्वीरें अपलोड किए जाने पर ट्रोल होने का खतरा बना रहता है. शायद इसी वजह से काम्या ने फोटो शेयर करने के साथ ही उसके कैप्शन में ट्रोल्स को जवाब भी लिख दिया है.

काम्या ने फोटो के साथ कैप्शन में लिखा- मेरी गलती, मेरा चुनाव, कोई पछतावा नहीं. तस्वीर के कैप्शन पर रूपेश झा नाम के एक यूजर ने लिखा- पछतावा होना भी क्यों चाहिए जब आप चीजों को फेस करने के लिए तैयार हो तो, चाहे वो बुरी हों या अच्छी क्योंकि आप बहादुर हो. हालांकि ट्रोल करने वाले अपनी आदतों से बाज नहीं आते और इसी वजह से उनकी इस तस्वीर पर आपत्ति जताने वाले कई यूजर्स ने भी कमेंट कर ही दिए हैं. हितेन नाम के एक यूजर ने लिखा- इस उम्र में यह सब शोभा नहीं देता है. काम्या ने कई शोज में निगेटिव रोल प्ले किए हैं.

बता दें कि उन्होंने छोटे पर्दे पर तकरीबन 16 साल तक काम किया है. टीवी शो शक्ति अस्तित्व के अहसास की में वह प्रीतो का किरदार निभाती हैं और उन्होंने 16 साल के अपने लंबे करियर में अस्तित्व. एक प्रेम कहानी, बनूं मैं तेरी दुल्हन, परवरिश, बेइंतेहां, डोली अरमानों की और मर्यादा जैसे टीवी शोज में काम किया है. रिएलिटी शोज की बात करें तो काम्या कौमेडी सर्कस, बिग बौस सीजन-7 और बौक्स क्रिकेट लीग जैसे शोज का हिस्सा रह चुकी हैं. बड़े पर्दे पर भी काम्या ने थोड़ा बहुत काम किया है वह ऋतिक रोशन स्टारर फिल्म कहो ना प्यार है और ना तुम जानो ना हम में छोटे मोटे किरदार प्ले कर चुकी हैं.

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देश में नौकरियों का अकाल

बेरोजगारी का फंदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गले में कसता जा रहा है. इसलिए अब अच्छे दिनों, 15 लाख रुपए हर खाते में, पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काट कर लाने जैसे झूठे वादों की तरह रेलवे में 90 हजार नौकरियों का विज्ञापन छपवाया गया है. यही नहीं, विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में भारतीयों को नौकरी देने के समाचार भी छपवाए जा रहे हैं. ये सब बातें लोकलुभावन हैं क्योंकि असली नौकरियों का अभी अकाल ही है.

वैसे जो अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है, जैसा वित्तमंत्री अरुण जेटली देश की अर्थव्यवस्था के बारे में सोतेजागते कहते रहते हैं, वहां नौकरियों की कमी नहीं होती. नौकरियों की कमी वहीं होती है जहां अर्थव्यवस्था संकुचित हो रही हो और व्यापार व उत्पादन कम हो रहा हो. सरकार घटते व्यापार व उत्पादन की वजह से ज्यादा टैक्स जमा कर के निठल्लों को नौकरियां नहीं दे पा रही. निजी सैक्टर पर कानूनों, नोटबंदी, जीएसटी और ऊपर से कंप्यूटरी युग थोपने की वजह से नौकरियां और भी कम हो रही हैं.

पहले के समय में अखबार नए उद्योगों, नई कंपनियों, नए उत्पादनों की खबरों से भरे रहते थे. लेकिन आजकल भगोड़ी कंपनियां ही सुर्खियों में हैं. हर रोज पता चलता है कि किसी गुमनाम सी कंपनी ने 250 से 3,000 करोड़ रुपए तक कर्ज लिया और उस के प्रमोटर्स भाग गए. ऐसी कंपनियों के चलते रोजगार कम होंगे, बढ़ेंगे नहीं.

कुछ सैक्टरों को छोड़ दें तो हर क्षेत्र में सन्नाटा सा है. कृषि मंडियों से ले कर आईटी कंपनियों तक एक तलवार लटकी है कि कल न जाने क्या होगा. सरकारी वादे असल में पंडों जैसे वादे साबित हो रहे हैं कि यजमान, बस, तुम दानपुण्य करते रहो, भगवान झोली भरेंगे. बेरोजगारों से कहा जा रहा है कि तुम एप्लीकेशनें और उन की फीस भरते रहो और ऊपर से नौकरियों के टपकने का इंतजार करते रहो.

सरकारी क्षेत्र में लगीबंधी, ऊपरी कमाई वाली नई नौकरियां बहुत कम होती जा रही हैं. सरकार के पास न पैसा है और न ही ऐसे क्षेत्र बचे हैं जिन में वह बेरोजगारों को नौकरी दे कर खपा सके. लाखों नौकरियां तो सरकार ने खुद कौंटै्रक्टरों को दे दी हैं जो युवाओं को रखते हैं, उन से काम लेते हैं पर उन्हें सरकारी नौकरी सा मजा नहीं देते. मेहनत से काम करने की आदत होती तो नौकरियों का अकाल ही क्यों होता?

कठिनाई यह है कि अब शिक्षा महंगी हो गई. पहले सस्ती सरकारी शिक्षा के बाद कम वेतन वाली नौकरी करने में दिक्कत नहीं होती थी. अब लगता है कि यदि लाखों रुपए खर्च कर ऊंची पढ़ाई करने के बाद भी कुछ विशेष नहीं मिला तो क्या लाभ? विदेशों में तो कुछ अवसर हैं पर वहां भारतीयों की महंगी शिक्षा भी काम नहीं आती. वे उस न्यूनतम ज्ञान से भी अनभिज्ञ होते हैं जिस को विदेशी सामान्य मानते हैं.

नौकरियों के अवसर देना किसी भी देश की सरकार के लिए टेढ़ी खीर होता है. भारत सरकार के लिए तो यह और ही कठिन है. हां, अगर पूजापाठ की नौकरियां चाहिए तो शायद बहुत अवसर हैं क्योंकि देश में कारखाने बने नहीं, मंदिर जरूर बनतेबढ़ते जा रहे हैं.

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अंशु प्रकाश को मारे गए थप्पड़ का सच

आम आदमी पार्टी के 2 विधायकों प्रकाश जारवाल और अमानतुल्ला खान ने दिल्ली के चीफ सैक्रेटरी अंशु प्रकाश को मीटिंग में आधी रात को थप्पड़ मारे थे या नहीं, उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले विधानसभा चुनाव से पहले अदालत में इस बारे में कोई फैसला हो जाएगा.

असल फसाद आप बनाम एलजी और भाजपा है जो इस बवंडर में दब गया और बेचारे चीफ सैक्रेटरी साहब बेवजह बलि का बकरा बन गए, जिन पर आप का आरोप है कि वे आम लोगों के हितों से जुड़े सवालों व बातों पर गौर ही नहीं कर रहे थे. अपने साथी की बेइज्जती पर देशभर के आईएएस अधिकारी इकट्ठा हो गए. इस बाबत उन्हें गृहमंत्री राजनाथ सिंह की शह मिली हुई थी जिन्होंने इस कथित थप्पड़ को अफसरशाही के स्वाभिमान से जोड़ दिया था. रिपोर्ट दोनों पक्षों ने लिखाई लेकिन आम राय आप के पक्ष में जा रही है, तो इस की वजह यह थप्पड़ नहीं, बल्कि वे साहब लोग हैं जो सरकार को अपने इशारों पर नाचते देखने के आदी हो गए हैं.

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बौडी फिट तो लाइफ हिट

अच्छा स्वास्थ्य हर कोई चाहता है, लेकिन आज के तनाव भरे वातावरण में अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना करना एक चुनौती से कम नहीं है. अधिकतर लोगों का मानना है कि पौष्टिक भोजन करने से ही शरीर हमेशा स्वस्थ और तंदुरुस्त रहता है, लेकिन यह बात कुछ हद तक ही सही है. क्योंकि कोई भी आहार लेने से पहले व्यक्ति को यह देख लेना चाहिए कि वह जो भोजन खा रहा है, क्या उस को पचाने की शक्ति उस के पास है.

भोजन पचाने का काम अधिकतर व्यक्ति के परिश्रम पर निर्भर करता है. जितनी अधिक वह मेहनत करता है, उतना ही अधिक उसे पौष्टिक आहार लेने की आवश्यकता पड़ती है.

आज के युवा पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक भोजन के बजाय स्वाद को ज्यादा तरजीह देते हैं. नतीजतन, वे कम उम्र में ही आलसीपन और मोटापे के शिकार हो जाते हैं. ऐसे में चाह कर भी वे फिट बौडी नहीं रख सकते. शारीरिक रूप से फिट व्यक्ति को कई प्रकार के लाभ मिलते हैं:

  • आप का एनर्जी लेवल बढ़ता है.
  • शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.
  • आप मानसिक रूप से स्वस्थ रह सकते हैं.
  • आप में आत्मविश्वास की भावना बढ़ती है.

खुद को हमेशा चुस्त दुरुस्त बनाने के लिए डेली वर्कआउट करना बहुत जरूरी है. मुंबई के एलिविंसर फिटनैस केंद्र के ट्रेनर डिसूजा कहते हैं, ‘‘शरीर को फिट रखने के लिए नियमित व्यायाम जरूरी है. साथ ही, खूब पानी पिएं ताकि शरीर के टौक्सिक कण बाहर निकल जाएं. भूखे पेट काम करना सब से अधिक हानिकारक है. खाना 3 बार के बजाय 6 बार खाएं ताकि आप कभी आलसीपन महसूस न करें. अधिकतर युवा दूसरे कार्यों की वजह से वर्कआउट करना छोड़ देते हैं, जिस से उन के शरीर पर बुरा असर पड़ता है. कार्य चाहे कुछ भी हों पर वर्कआउट रोज करना चाहिए.

‘‘कई युवा मोटापे के शिकार होने पर जिम का रुख करते हैं जबकि 18 साल के बाद अगर वे किसी भी प्रकार के वर्कआउट को नियमित रूप से अपनी दिनचर्या में शामिल करेंगे तो हमेशा स्वस्थ रहेंगे. हर व्यक्ति को 40 से 45 मिनट रोज वर्कआउट करना चाहिए.’’

स्नैप फिटनैस जिम के फिटनैस ट्रेनर शैलेंद्र सावंत 15 साल से इस क्षेत्र में हैं का कहना है, ‘‘मुंबई में 75 फीसदी लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हैं. उन में महिलाएं कम, पुरुष अधिक हैं. यहां हर युवा हिंदी सिने कलाकार से प्रेरित है और उन के बौडी स्टाइल को खुद भी अपनाना चाहता है. कई बार वे वर्कआउट कम शुरू तो करते हैं पर बीच में छोड़ जाते हैं.

‘‘नियमित वर्कआउट करने से कई बीमारियां नहीं होती है. शरीर का ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है, जिस से भूख लगती है. भोजन में रोटी, सब्जीदाल के साथसाथ प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होनी चाहिए. जंकफूड से हमेशा दूर रहें. हर व्यक्ति  को चुस्त रहने के लिए 40 से 50 मिनट रोज व्यायाम करना चाहिए.

‘‘शरीर के हर भाग के लिए अलग अलग व्यायाम हैं, जिसे ट्रेनर की सहायता से सीखना चाहिए. बौडी मास इंडैक्स के साथसाथ फैट प्रतिशत की जांच भी जरूरी है.’’

शैलेंद्र आगे कहते हैं, ‘‘वर्कआउट करने के बाद कुछ लोगों को शिकायत होती है कि उन का वजन कम नहीं हो रहा है. ऐसे में वे कहते हैं कि व्यक्ति को 1 किलो के वजन पर सिर्फ 1 ग्राम प्रोटीन लेना चाहिए. गाइडलाइन के द्वारा अगर आप सही डाइट लेंगे, तो वजन अवश्य कम होगा और आप चुस्तदुरुस्त रहेंगे. 15-16 साल के युवा भी हलकाफुलका वर्कआउट कर सकते हैं. उन्हें कम उम्र से ही स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना चाहिए.’’

जब आप इतनी सारी खूबियां अपनी बौडी को फिट बना कर पा लेंगे तो जाहिर है कि लाइफ भी हिट हो ही जाएगी.

कुछ फायदे जो बौडी फिट होने पर मिलते हैं:

    • आत्मविश्वास बढ़ेगा.
    • मानसिक दबाव कम होगा.
    • ब्लड सर्कुलेशन बढ़ेगा.
    • शक्ति बढ़ेगी.
    • हृदय मजबूत होगा.
    • ऊंचाई बढ़ेगी.
    • बोन डैन्सिटी अच्छी होगी.
    • मांसपेशियों का विकास सही तरीके से होगा.

 

वीडियो : एविल आई नेल आर्ट

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अंधविश्वास : बाबागीरी का गोरखधंधा

  • ‘बाबा की ऐयाशी का अड्डा’
  • ‘गुफा का रहस्य’
  • ‘दत्तक पुत्री का सच’

आजकल लगभग हर न्यूज चैनल ऐसी कितनी ही कहानियां और गुफा के आभासी वीडियो दिखा कर लोगों को भ्रमित कर रहा है.

सवाल उठता है कि खोजी मीडिया चैनल्स इतने सालों से कहां थे? न तो बाबा नए हैं, न ही गुफाएं रातोंरात बन गई हैं. फिर यह कैसी दबंग पत्रकारिता है जो अब तक सो रही थी. अब बाबाओं के जेल जाते ही यह मुखरित होने लगी है.

इन स्वार्थी और अवसरवादी चैनलों पर भी जानबूझ कर जुर्म छिपाने का आरोप लगना चाहिए, क्योंकि ये दावा करते हैं कि–देशदुनिया की खबर सब से पहले, आप को रखे सब से आगे… वगैरहवगैरह.

किसी भी बाबा का मामला उजागर होते ही सारा इलैक्ट्रौनिक मीडिया एक सुर में अलापना शुरू कर देता है कि लोग इतने अंधविश्वासी कैसे हो गए?

चैनल्स राशिफल, बाबाओं के प्रवचन, तथाकथित राधे मां या कृष्णबिहारी का रंगारंग शो, प्यासी चुडै़ल, नागिन का बदला, कंचना, स्वर्गनरक, शनिदेव जैसे तमाम अंधविश्वासों पर आधारित कार्यक्रम दिनरात चला कर लोगों के दिमाग में कूड़ा भरते हैं और बेशर्म बन कर टीवी पर चोटी कटवा जैसे मुद्दे पर डिबेट करवाते हैं. फिर पूछते हैं कि लोग अंधविश्वासी कैसे बन गए.

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अगर सच में आप जनता को सचाई दिखाना चाहते हैं तो अपने जमीर को जिंदा कर दिखाएं. गरीबी से जूझ रहे लोगों, बढ़ती बेरोजगारी, रोजाना बढ़ रही महंगाई, अस्पतालों की अवस्था, डाकू बने डाक्टरों, जगहजगह पड़े कचरे के ढेरों, भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी तंत्रों की जमीनी हकीकत और निष्पक्ष जांच न्याय प्रणालियों को दिखाओ. तब जा कर नए भारत का सपना कुछ हद तक सही हो सकता है.

पिछले दिनों एक दैनिक अखबार के मुखपृष्ठ पर एक विज्ञापन छपा था. अखबार के एक ही एडिशन में उस के छपने की कीमत कम से कम डेढ़दो लाख रुपए तो होगी ही. ऐसे न जाने कितने एडिशनों में यह विज्ञापन छपा था.

समझ में यह नहीं आता कि इतने महान बाबाओं के समागमों और प्रवचनों के बावजूद देश में असमानता, हिंसक वारदातें, अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं. यही न कि धर्म के नाम पर लोगों को उल्लू बनाते रहो और अपनी दुकान चलाते रहो.

विज्ञापन में यह दावा भी किया गया कि इस कथित ब्रह्मांडरत्न को साक्षात श्रीहरि ने देवराज इंद्र को प्रदान किया था.

कहते हैं कि जिस देश की प्रजा जैसी होती है, उसे वैसा ही राजा मिल जाता है. इस में कमी हम भारतीयों की भी नहीं है. किसी गरीब को 10 रुपए मेहनत के देने हों तो उसे पाठ पढ़ा देंगे, लेकिन मंदिरमसजिदों में, बाबाजी के समागमों में हजारों खर्च कर देंगे.

मीडिया भी है जिम्मेदार

आध्यात्मिक या धार्मिक पोंगापंथ फैलाने वाले चैनल्स व समाचारपत्र बाबाओं की एक ऐसी फौज खड़ी कर रहे हैं जो देश में धर्म के नाम पर लूटखसोट मचा रही है. लगातार बढ़ रही इन की फेहरिस्त और इन पर हर रोज चलने वाले बाबाओं के प्रवचनों में आध्यात्म के नाम पर लोगों को उल्लू बनाया जा रहा है.

धर्मभीरू जनता का जितना शोषण धार्मिकता का लबादा ओढ़े इन बाबाओं ने किया है, उस में चैनलों और समाचारपत्रों का भी बराबर या उस से भी ज्यादा हाथ है. चैनल अपने फायदे को कैश करने के लिए बाबाओं को बराबर पब्लिसिटी और एंकर तक मुहैया करवा कर उन का तथाकथित धार्मिक सामान बेचने का औफर दे रहे हैं.

पाखंडी बाबा किसी भी तरह से अपनी जेबें भरने में जुटे हुए हैं. इन की प्रौपर्टी और बैंकबैलेंस का मुकाबला कुबेरपति भी नहीं कर सकते. भक्तों के बीच ये ऐसे महात्मा हैं जिन का माहात्म्य विवादों में उलझ कर रह गया है. ये मोहमाया छोड़ने का आह्वान करते हैं जबकि वे खुद गले तक मोह और माया में जकड़े हुए हैं.

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आज भी आधे अधूरे हैं नीलोफर के सवालों के जवाब

कहानी की शुरुआत एक उर्दू मैगजीन के औफिस से होती है. एक हसीन नौजवान शायरा नीलोफर गुस्से में तमतमाई औफिस में दाखिल होती है और एक कर्मचारी से एडीटर का पताठिकाना पूछती है. उस कर्मचारी के मुंह में पान की पीक भरी थी. वह इशारा कर के उसे चपरासी के साथ एडीटर के कमरे की तरफ भेज देता है.

चपरासी जब नीलोफर का विजिटिंग कार्ड एडीटर को देता है तो वह एक मुलाजिम पर किसी बात पर गुस्सा हो रहा होता है और उसी गुस्से में कार्ड अंगुलियों पर घुमाते हुए बोलता है, ‘‘जाओ, कह दो मेरे पास वक्त नहीं है.’’

बाहर खड़ी नीलोफर यह सब सुनती है तो उस का पारा और चढ़ जाता है और वह गुस्से में धड़ाम से दरवाजा धकेलने की बेअदबी करने से खुद को नहीं रोक पाती और कमरे में पहला कदम रखते ही लगभग चिल्लाती है, ‘‘वक्त तो मेरे पास भी नहीं है जनाब.’’

हैदर जैसे ही उस गुस्ताख आवाज और लड़की को देखने के लिए नजर उठाता है तो ऐसे चौंकता है, मानो बिच्छू ने डंक मार दिया हो. ठीक यही हालत नीलोफर की भी था, जो गुस्सा भूल कर हैदर को इस तरह अपलक देख रही थी, मानो उसे यकीन न हो रहा हो.

चंद लमहे दोनों सुधबुध खो कर बिना पलक झपकाए एकदूसरे को देखते रहते हैं. और जब खुद पर यकीन हो जाता है कि वे कोई ख्वाब नहीं देख रहे हैं तो सहज होने की कोशिश करते हैं. हैदर मुलाजिम को कमरे से बाहर भेज देता है और चपरासी को चायनाश्ता लाने का हुक्म देता है. इस दौरान उस की हड़बड़ाहट देखने काबिल होती है.

नीलोफर अदब से उसे आदाब करती है और वह भी उसे पूरी इज्जत से बैठाता है. हैदर को इस बात पर कुदरती तौर पर हैरानी होती है कि इतने बड़े नवाब खानदान की बहू यूं आ कर 50 रुपए फीस के लिए झिकझिक करेगी. नीलोफर हैदर को बताती है कि वह नाम बदल कर नज्में लिखती है और इसी शहर के एक गर्ल्स हौस्टल में रहती है. यह सुन कर हैदर और भी ज्यादा चकरा जाता है.

थोड़ी देर में दोनों सहज हो जाते हैं और फिर शुरू होता है बातचीत का सिलसिला, जिस में हैदर नीलोफर को बड़ी बेतकल्लुफी से बताता है कि कालेज के दिनों में वह उस पर मरता था और उसे इंप्रैस करने के लिए उस ने क्याक्या नहीं किया था. वह आगे बताता है कि कालेज के पहले ही दिन नीलोफर यानी उस की चर्चा हुई थी तो लड़के कह रहे थे कि नीलोफर है तो बला की खूबसूरत, लेकिन किसी को घास तक नहीं डालती.

इस पर हैदर ने एक दोस्त सैफ से शर्त लगाई थी और 10 रुपए जीत गया था. नीलोफर यह जान कर चकित होती है कि हैदर उसे चाहने लगा था तो उस ने कभी अपनी चाहत का इजहार क्यों नहीं किया. हालांकि एक दफा गुलाब का फूल ले कर वह उस के घर तक भी गया था, पर अल्हड़ नीलोफर ने उसे झिड़क कर भगा दिया था. इस के बाद मायूस हैदर ने उसे भूल जाने में ही बेहतरी समझी. यह दीगर बात है कि वह उसे कभी भूल नहीं पाया.

हैदर नीलोफर को बताता है कि शर्त में जीते 10 रुपए और कभी उस की किताब से गिरा गुलाब का फूल आज भी उस के पास सलामत है. और तो और नीलोफर को पटाने के लिए उस ने एक सितार भी खरीदा था, लेकिन जिस दिन उसे मालूम हुआ कि उस नीली आंखों वाली नीलोफर की शादी किसी नवाब से होने जा रही है तो उस ने दूसरी यादों की तरह उस सितार को भी हमेशा के लिए सहेज कर एक कोने में रख दिया, साथ ही उस ने उस का नाम ही नीलोफर रखा था.

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अपनी बात सुना कर जब वह नीलोफर से उस के बारे में पूछता है तो वह सुबकने लगती है. फिर धीरेधीरे कई मुलाकातों में अपनी दर्दभरी दास्तां बयान करती है, जिसे सुन कर हैदर का दिल दर्द से भर जाता है.

जहां से तुम्हारी कहानी खत्म होती है, वहीं से मेरी कहानी शुरू होती है. नीलोफर हैदर को बताती है कि कालेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद उस की शादी वसीम से तय हो गई थी. वसीम एक नामी नवाब खानदान का वारिस था, जिसे वह बचपन से जानती थी और चाहती भी थी. वसीम विदेश से वापस लौटा तो उन दोनों की शादी धूमधड़ाके से हो गई.

शादी के दूसरे दिन ही वसीम को तार के जरिए इत्तला मिली कि उसे एक फाइवस्टार होटल का कौंट्रैक्ट मिल गया है. यह सुन कर वह मारे खुशी के झूम उठा और नीलोफर को अपने लिए लकी मानने लगा. महत्त्वाकांक्षी वसीम रोमांटिक तो था, लेकिन बहुत सारा पैसा कमा लेना चाहता था, इसलिए शादी के बाद वह अपने कारोबार में इस तरह तल्लीन हो गया कि नीलोफर के लिए उस के पास वक्त ही नहीं रहा.

वह नीलोफर से अकसर वादा करता रहता कि आज फिल्म देखने चलेंगे या किसी होटल में साथसाथ लंच करेंगे. यह सुन कर नीलोफर खुश हो जाती थी, लेकिन वसीम कभी वक्त पर नहीं आता तो वह झल्लाने लगती थी. फिर भी वसीम हर बार प्यार से उसे मना लेता था.

जब वे हनीमून मनाने मुंबई गए, तब भी वसीम अपनी कारोबारी मीटिंगों में उलझा रहा और वह फाइवस्टार होटल में अकेली पड़ी उस का इंतजार करती रही.

इसी दौरान वसीम के घर वाले यानी नीलोफर के सासससुर और ननद व उस के बच्चे हज पर चले गए तो वह और भी तनहा हो गई. अब बड़ी हवेली में घर का बुजुर्ग नौकर जुम्मन भर रह गया था, जो उसे छोटी दुलहन कह कर पुकारता था. रोजाना डायरी लिखने की शौकीन नीलोफर अपनी तनहाई का दर्द पन्नों पर उतारती थी.

एक दिन उस वक्त हद हो गई, जब देर रात वसीम शराब पी कर आया. इस पर नीलोफर ने ऐतराज जताया और मरजी न होते हुए शौहर की मांग पर सैक्स करने से मना कर दिया. इस के लिए वसीम ने उसे खासी खरीखोटी सुनाई. उस रात दोनों में खूब तकरार हुई और नीलोफर दूसरे कमरे में जा कर सो गई. नशे में धुत वसीम अपने बिस्तर पर लुढ़क गया.

सुबह जब नीलोफर जागी तो रेडियो चालू करने पर 18 अक्तूबर की तारीख सुन उसे याद आया कि आज तो बड़ा मुबारक दिन है. एक साल पहले इसी दिन वसीम से उस की शादी हुई थी.

नीलोफर तय कर लेती है कि आज सारे गिलेशिकवे भूल जाएगी. रात की बात भूल कर वह जुम्मन मियां के हाथ से चाय की ट्रे ले कर खुद वसीम को चाय देने जाती है और प्यार से वसीम को जगाती है. वसीम दोहराता है कि आज उस की जिंदगी का सब से भाग्यशाली दिन है, क्योंकि आज ही के दिन नीलोफर उस की शरीकेहयात बनी थी.

प्यारभरी बातें करतेकरते दोनों तय करते हैं कि अब कभी लड़ाईझगड़ा नहीं करेंगे और प्यार से रहेंगे. औफिस जातेजाते वसीम उसे बताता है कि उस ने आज शाम हवेली में शादी की पहली सालगिरह की बड़ी दावत रखी है और वह वक्त पर घर आ जाएगा.

नीलोफर दिन भर सजतीसंवरती है और पार्टी की तैयारियां करती है. उस की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. शाम ढलते ही मेहमानों के आने का सिलसिला शुरू हो गया, पर वसीम आदतन वक्त पर नहीं आया. घंटे दो घंटे तो नीलोफर ने सब्र किया, पर मेहमानों के बारबार वसीम के दावत में न होने के जवाब पर झूठ बोलतेबोलते वह झल्लाने लगी. पार्टी में कालेज के जमाने का दोस्त सैफ भी आया था, जो अब एक मैगजीन का एडीटर बन गया था.

जब मेहमान ज्यादा ताने मारने लगते हैं तो गुस्साई नीलोफर बगैर कुछ कहेसुने ऊपर जा कर अपने कमरे में बंद हो जाती है और शौहर की व्यस्तता को कोसती है. नीचे दावत में सैफ और एक अन्य औरत के भड़काने पर मेजबान के न होने को अपनी बेइज्जती समझ मेहमान बगैर खाना खाए चले जाते हैं. सालगिरह का केक ज्यों का त्यों रखा रह जाता है.

देर रात वसीम वापस आता है तो जुम्मन से उसे पता चलता है कि मेहमान बगैर खाना खाए ही चले गए हैं. वसीम को नीलोफर की यह हरकत नागवार गुजरती है. उसे लगता है कि बीवी ने जानबूझ कर उस के नवाबी खानदान की बेइज्जती करा दी है.

कमरे में जा कर वह नीलोफर से सफाई मांगता है तो पहली दफा वह ऊंची आवाज में उस के हर सवाल का सधा जवाब देती है. दोनों में खूब झगड़ा होता है. वसीम अपनी गलती नहीं मानता और नीलोफर के माफी न मांगने पर उसे ‘तलाक तलाक तलाक’ कह कर हवेली से निकाल देता है.

अपनी कहानी सुना कर नीलोफर सिसकने लगती है तो हैदर उसे सांत्वना देते हुए पूछता है कि वह बजाय अपने घर यानी मायके जाने के हौस्टल में क्यों रहती है? इस पर नीलोफर जवाब देती है कि शौहर के घर के अलावा दुनिया की कोई भी चारदीवारी औरत के लिए घर नहीं हो सकती. यह जवाब सुन कर हैदर निरुत्तर हो जाता है.

वह मन ही मन नीलोफर से शादी करने का फैसला कर लेता है. नीलोफर भी उस की सादगी और रोमांटिक अंदाज पर फिदा हो जाती है. बढ़ती मेलमुलाकातों के दौरान प्यार का इजहार होता है और शादी की बात भी हो जाती है.

लेकिन शादी के पहले ही नीलोफर सैफ की मैगजीन में नौकरी कर लेती है. मिठाई ले कर वह यह खबर हैदर को सुनाने जाती है तो वह अचकचा उठता है, क्योंकि वह जानता था कि सैफ अच्छा आदमी नहीं है. वह अव्वल दरजे का लंपट है. लेकिन वह नीलोफर से सीधे उस के यहां नौकरी करने के लिए मना नहीं कर पाता.

हैदर को मिठाई खिला कर नीलोफर उस के दफ्तर से चली जाती है, लेकिन अपना चश्मा वहीं भूल जाती है. अपने दफ्तर में बदनीयत सैफ जानबूझ कर नीलोफर को देर रात तक काम के बहाने बैठाए रखता है और सभी मुलाजिमों के चले जाने के बाद अकेले में उस की इज्जत लूटने की कोशिश करता है. इत्तफाक से नीलोफर का चश्मा लौटाने आया हैदर वक्त पर पहुंच जाता है और नीलोफर को सैफ के चंगुल से बचा लेता है.

जल्द ही दोनों शादी का फैसला कर लेते हैं. इस बीच नीलोफर की याद में तड़पते हुए पछता रहा वसीम उसे वापस पाने की हर मुमकिन कोशिश करता है, लेकिन नीलोफर उस की बातें सुन कर नहीं पसीजती. एक बार वसीम के बुलावे पर वह हवेली गई भी, लेकिन जल्द ही वापस भी लौट गई. उस वक्त नशे में धुत हवेली में पड़ा वसीम एक पुरानी गजल सुन रहा था.

जुम्मन नीलोफर से वापस आने की गुजारिश करता है, पर नीलोफर का दोटूक जवाब सुन कर वह खामोश रह जाता है कि आज जिस चौराहे पर मैं खड़ी हूं, वहां से कोई भी रास्ता इस घर की तरफ नहीं आता.

मायूस वसीम इमाम से मिलता है और नीलोफर से दोबारा शादी के बारे में पूछता है. इस पर इमाम उसे हलाला का हवाला दे कर बताता है कि नीलोफर को उस से दोबारा शादी करने से पहले किसी गैदमर्द से शादी करनी होगी और बाकायदा बीवी की तरह उस के साथ कुछ वक्त गुजारना होगा. अगर उस का वह शौहर नीलोफर को तलाक देने पर तैयार हो जाए, तभी वह उस से शादी करने का हकदार होगा.

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हैदर और नीलोफर की शादी में वसीम तोहफा ले कर पहुंचता है और उसे मुबारकबाद देता है, तभी बिजली चली जाती है. बिजली ठीक कराने हैदर खुद जाता है तो वसीम नीलोफर से कहता है कि तुम ने शादी करने का ठीक फैसला लिया, अब जल्द से घर वापस आ जाओ, मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.

नीलोफर उसे समझाने की कोशिश करती है कि यह उस की गलतफहमी है कि वह अब भी उसे चाहती है और हलाला के लिए शादी कर रही है. वह अपनी बात सख्ती से वसीम को समझा पाती, इस के पहले ही बिजली और हैदर दोनों आ जाते हैं, लिहाजा वह चुप हो जाती है.

शादी के बाद हैदर के घर आ कर नीलोफर को सुकून मिलता है. हैदर बेहद रोमांटिक होने के साथसाथ उस का खयाल रखने वाला शौहर भी है, जो उस की हर पसंदनापसंद का खयाल रखता है.

नीलोफर साफसाफ महसूस करती है कि वसीम के पास उस के लिए वक्त नहीं होता था, पर हैदर के पास उस के लिए मुकम्मल वक्त है. जैसा घर और शौहर उसे चाहिए था, दूसरी शादी के बाद ठीक वैसा ही मिल गया.

दोनों हनीमून मनाने मुंबई पहुंचते हैं तो इत्तफाक से उन्हें उसी होटल और उसी कमरे में जगह मिलती है, जहां पहली शादी के बाद वसीम और उसे मिली थी. यहां तक कि होटल का स्टाफ भी नीलोफर को पहचान लेता है कि वह करीब 2 साल पहले भी अपने शौहर के साथ यहां आई थी.

नीलोफर की हालत अजीब हो जाती है. उसे रहरह कर वसीम के साथ वहां गुजारा वक्त याद आने लगता है. हालांकि उस के दिल में अब वसीम के लिए कुछ भी नहीं था, मगर यादें आसानी से पीछा नहीं छोड़तीं.

घर वापस आ कर वह इन तमाम वाकयों को आदतन सिलसिलेवार डायरी में लिखती जाती है. एक दिन हैदर उस की डायरी पढ़ लेता है. बीवी का लिखा यह जुमला उस के चेहरे की रंगत उड़ा देता है कि औरत अपना पहला प्यार कभी नहीं भूलती.

इस डायरी को पढ़ने के बाद हैदर के मन में शक पैदा हो जाता है कि नीलोफर उस से शादी करने और इतना प्यार देने के बाद भी वसीम को भूल नहीं पाई है. नीलोफर उस का पहला प्यार थी, इसलिए उसे एकदम इस बात पर यकीन भी नहीं होता.

अपनी तसल्ली के लिए वह एक मनगढं़त कहानी उसे सुना कर क्लाइमैक्स पूछता है कि एक लड़की थी, जो एक लड़के से बेहद प्यार करती थी. दोनों की सगाई हो चुकी थी, लेकिन लड़का मिलिटरी में था और जंग के चलते उस के मरने की खबर आई.

कुछ दिनों बाद लड़की की शादी दूसरे लड़के से तय हो जाती है. दोनों एकदूसरे को बहुत चाहते हैं, लेकिन तभी पता चलता है कि उस का मंगेतर मरा नहीं था, बल्कि जिंदा था. ऐसी स्थिति में एक अजीब सी उलझन पैदा हो जाती है. हैदर नीलोफर से पूछता है कि ऐसे में लड़की को किस लड़के को चुनना चाहिए. नीलोफर कुछ सोच कर जवाब देती है कि पहले लड़के को.

इस जवाब को सुन कर हैदर सन्न रह जाता है और समझता है कि नीलोफर अभी भी वसीम को चाहती है. उस ने उसे महज हलाला की रस्म अदा करने के लिए उस से शादी की है. वह मन ही मन दोनों के रास्ते से हटने का फैसला ले लेता है.

नीलोफर के जन्मदिन पर वह बतौर तोहफा वसीम को सामने ला कर खड़ा कर देता है तो वह सन्न रह जाती है. हैदर के यह कहने पर कि तुम्हीं ने तो उस कहानी का क्लाइमैक्स तय किया था. नीलोफर समझ जाती है कि हैदर एक ऐसी गलतफहमी का शिकार हो गया है, जो अब दूर होने वाली नहीं है.

इधर दरियादिली दिखाते हुए हैदर उसे शरई तौर पर आजाद करने की बात कहता है तो वह और भी तिलमिला उठती है.

वह हैदर और वसीम दोनों से कहती है कि आप मर्दों ने औरत को समझ क्या रखा है, जेब में रखा नोट या पलंग, जो जब चाहा बदल लिया. औरत क्या जायदाद होती है, जो जब चाहा, दूसरे को दे दिया. वसीम ने तलाक गाली की तरह दिया तो हैदर तोहफे की तरह दे रहा है. क्या औरत की मरजी और वजूद के कोई मायने नहीं हैं.

इसी गुस्से में वह एक सवाल और पूछती है कि जब निकाह औरत की मरजी से होता है तो तलाक उस की बिना मरजी के कैसे हो सकता है? नीलोफर के बेबस गुस्से के सवालों के जवाब न तो वसीम के पास थे और न ही हैदर के पास.

निकाह, तलाक और शरीयत के खेल में औरत के वजूद और हैसियत को तलशते सवालों के जवाब बीती 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले में सिमटे हैं, जो अभी पूरी तरह साफ नहीं हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने 3 तलाक के रिवाज को नाजायज बताते हुए संसद को इस बाबत कानून बनाने का निर्देश दिया तो निर्मातानिर्देशक बलदेव राज चोपड़ा की साल 1982 में प्रदर्शित ‘निकाह’ फिल्म की इस कहानी की याद हो आई, जो स्वाभाविक बात थी. इस फिल्म में वसीम की भूमिका में दीपक पाराशर, हैदर की भूमिका में राजबब्बर और नीलोफर के किरदार को पाकिस्तानी मूल की नायिका और गायिका सलमा आगा ने निभाया था.

बहुत सी सत्यकथाओं के बीच निकाह फिल्म की यह कहानी उन से ज्यादा प्रभावी साबित हुई थी, जब भारत सहित पाकिस्तान में भी कट्टरवादी इस फिल्म के विरोध में सड़कों पर उतर आए थे.

किसी को अंदाजा नहीं था कि एक कुरीति पर प्रहार करती फिल्म ‘निकाह’ इतनी हिट साबित होगी. इस की वजह इस की कास्टिंग बेहद कमजोर मानी जा रही थी और हकीकत में थी भी. फिर भी फिल्म को इसलिए पसंद किया गया, क्योंकि यह एक कुरीति के विरुद्ध कटु सत्य बयां करती थी.

‘निकाह’ के सफल होने की वजह एक ज्वलंत सामाजिक समस्या को बेहद सटीक अंदाज में पेश किया जाना था. प्रसिद्ध लेखिका अचला नागर द्वारा लिखित इस कहानी में तलाकशुदा औरत की बेबसी को सलमा आगा ने जीवंत कर दिया था.

मर्दों का समाज पर किस हद तक दबदबा है, यह भी फिल्म ने साबित किया था. क्योंकि परेशानी एक नहीं, बल्कि लाखों नीलोफरों की है, जो तलाक तलाक तलाक के बुरे दौर से गुजरती हैं तो कहीं की नहीं रह जातीं, न घर की न घाट की.

चूंकि फिल्म थी, इसलिए इस का अंत सुखद था. नहीं तो आमतौर पर ऐसा होता नहीं है कि कोई वसीम अपनी गलती और खुदगर्जी स्वीकार ले. 3 लफ्ज तलाक के कह कर बीवी को अपनी जिंदगी और घर से निकाल देना कोई मर्दानगी की नहीं, बल्कि सामाजिक तौर पर शर्मिंदगी और जलालत की बात है.

बी.आर. चोपड़ा की इस फिल्म में कई और भी दिलचस्प बातें थीं. मसलन पहली बार चरित्र अभिनेता इफ्तिखार ने नौकर का रोल किया था, नहीं तो वह अकसर पुलिस इंसपेक्टर, डाक्टर या जज के रोल में ही दिखाई देते थे.

दूसरे चोपड़ा साहब ने इस फिल्म का नाम पहले ‘तलाक तलाक तलाक’ रखा था, जिस पर उन के नजदीकी मुसलिम दोस्त ने चिंता जताते हुए कहा था कि ऐसे तो एक दिन में लाखों तलाक हो जाएंगे, क्योंकि मुसलमान दर्शक जब यह फिल्म देख कर घर पहुंचेंगे और बीवी के पूछने पर फिल्म का नाम बताएंगे तो वे ‘तलाक तलाक तलाक’ कहेंगे और शरीयत के मुताबिक उन का तलाक हो जाएगा. इस पर बी.आर. चोपड़ा ने फिल्म का नाम ‘निकाह’ रख दिया था.

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‘निकाह’ फिल्म के गाने आज 35 साल बाद भी शिद्दत से गाए और गुनगुनाए जाते हैं, जिन में सलमा आगा ने भी आवाज दी है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सलमा आगा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई भी दी थी और इस फैसले को औरतों के हक में राहत देने वाला बताया था.

35 सालों तक नीलोफर के सवाल जवाब तलाशते रहे, जिन्हें अब कानूनी जामा संसद पहनाएगी. इस पर विवाद और बहस जारी है. अपने हक की लड़ाई लड़ती औरतें अपनी दास्तां बयान कर रही हैं, पर क्या यह इतना आसान है? इस सवाल का जवाब बेहद निराशाजनक तरीके से न में निकलता है.

80 के दशक के एक शिक्षित मुसलमान परिवार में तलाक बड़ी आसानी से दे दिया जाता था तो अशिक्षित तबके में क्या कुछ नहीं होता होगा, इस का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि मर्द अपने दबदबे और शरीयत का किस तरह फायदा उठा रहे थे.

दहेज कानून के बाद भी दहेज हत्याएं जारी हैं, बहुएं जलाई जा रही हैं. ऐसे में क्या नए प्रस्तावित कानून के मसौदे से उम्मीद रखी जाए? तलाक के मुकदमे सालोंसाल चलते हैं, जिस का खामियाजा और तनाव मियांबीवी दोनों को भुगतना पड़ता है.

असल में फसाद की जड़ धर्म और कानून दोनों हैं. कानून बना तो मुसलिम औरतें और मर्द दोनों सालोंसाल अदालत के चक्कर काटते 3 तलाक के दिनों को याद करेंगे कि इस से बेहतर तो वही था. अगर भाग कर वे धर्म की शरण लेने को विवश होंगे तो यह उस कानून की हार होगी, जिस पर आज देश भर में जश्न मनाया जा रहा है.

औरत किसी कानून के बना देने से मुसीबतों से छुटकारा नहीं पा सकती, यह कहने और स्वीकारने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए. जब तक तलाक नहीं हो जाता, तब तक उस से कोई दूसरी शादी नहीं कर सकता. ऐसे में उस की हैसियत क्या होगी, कौन उसे छत और रोटी देगा, इस पर कानून शायद ही कुछ बोले या करे.

नीलोफर के सवालों के मुकम्मल जवाब अभी भी नहीं मिले हैं और न ही मिलने की उम्मीद है, क्योंकि समाज और धर्म पर कब्जा और दबदबा तो मर्दों का ही था, है और रहेगा. बहस तलाक के तरीके पर हो रही है, औरत की हैसियत सुधारने पर हर कोई खामोश है.

इन महिलाओं पर नहीं चलता इराकी शरीयत का कानून

इराक ऐसा मुसलिम देश है, जहां शरीयत कानून चलता है, जिस की वजह से वहां की महिलाओं पर तमाम पाबंदियां हैं. मसलन वे बिना बुरका पहने नहीं निकल सकतीं, इधरउधर घूम नहीं सकतीं, मर्दों के साथ पार्टियां नहीं कर सकतीं. वहीं दूसरी ओर एक तबका ऐसा भी है, जिस पर ये पाबंदियां लागू नहीं होतीं.

यह तबका है उच्चवर्ग का. उन के घर की महिलाएं चाहे जिस तरह का कपड़ा पहनें, जहां मन हो वहां आएंजाएं, बिना बुरका पहने घूमें, कोई रोकनेटोकने वाला नहीं है. यही नहीं, वे शराब और सिगरेट भी पीती हैं, कोई कुछ नहीं कहता.

एक ही देश में भेदभाव के आधार पर शरीयत का कानून लागू करने वाली बात अजीब सी लगती है. जब शरीयत का कानून लागू होता है तो वह सभी के साथ होना चाहिए, इस में भेदभाव कैसा. बंदिशों की वजह से अनेक महिलाएं घुटघुट कर जी रही हैं. एक सामाजिक संस्था ने महिलाओं का सर्वे किया तो जानकारी मिली कि 17 फीसदी महिलाएं मानसिक परेशानियों से जूझ रही हैं. ये वही महिलाएं हैं, जिन पर शरीयत का कानून थोपा गया है.

ये आंकड़े पता चलने के बाद सन 2003 में कुछ सामाजिक संस्थाएं पिछड़े तबके की महिलाओं को आजादी दिलाने के लिए आगे आईं. संस्थाओं का कहना था कि अमीर घरानों की लड़कियों और महिलाओं की तरह पिछड़े वर्ग की लड़कियों और महिलाओं को भी आजादी मिले.

अमीर घरों की लड़कियां बुरका पहनना तो दूर की बात, वे आधुनिक फैशन के कपड़े पहन कर महंगी गाडि़यों में घूमने निकलती हैं. उन की आधुनिकता देख कर हर कोई यही समझेगा कि ये शरीयत का कानून वाले देश की नहीं, बल्कि अमेरिका या आस्ट्रेलिया की हैं.

इंस्टाग्राम पर richkidsofiraq नाम से चलने वाले एकाउंट पर जब आप इन उच्चवर्ग की लड़कियों, महिलाओं के फोटो देखेंगे तो यकीनन आप चौंक जाएंगे. जब इन लड़कियों पर कोई प्रतिबंध नहीं तो पिछड़े वर्ग की लड़कियों को सामाजिक और धार्मिक प्रतिबंधों में क्यों जकड़ कर रखा गया है.

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