औरतों को सम्मान देते हुए भी पुरुष क्याक्या बोल जाते हैं इस का नमूना 2012 में दिल्ली में रात निर्भया के बलात्कार, जो बीभत्स व क्रूर था और जिस से पूरा देश उबल पड़ा था, को बैंगलुरु में दिए जाने वाले एक सम्मान समारोह के समय मिला. उस समय कर्नाटक के पूर्व डाइरैक्टर जनरल पुलिस एचटी संगलिना ने कहा कि निर्भया कितनी सुंदर और आकर्षक रही होगी यह उस की मां को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है. निर्भया की मां अवार्ड लेने आई थीं.
संगलिना ने बाद में इसी बात की सफाई देते हुए यह भी कह डाला कि बदमाश तो खूबसूरत औरतों की ताक में रहते हैं और यदि उन के साथ कुछ गलत हो जाए तो उन्हें चुप रह कर सह लेना चाहिए ताकि पुलिस में शिकायत की जा सके. हालांकि निर्भया की मां ने उस फंक्शन के तुरंत बाद संगलिना के बयान पर रोष जता दिया था कि इस कांड की देश भर में हुई भर्त्सना के बाद कुछ नहीं बदला. फिर भी संगलिना का दिमाग इस प्रकार पुरुषवादी बना है कि वे सफाई देते हुए भी गुनाह कर गए.
असल में औरतों के प्रति समाज में पगपग पर एक जहर सा उगला जाता है. बेटियों पर घरों में जब छोटीछोटी बातों पर बंधन लगाए जाते हैं जो बेटों पर नहीं लगाए जाते, तो यह बात साफ कर दी जाती है कि बेटों में केवल लिंग के कारण कुछ विशेषता है. यह बात लड़कियों के मन में बैठ जाती है कि वे हीन हैं.
निर्भया जैसे कांड और उन पर आए उबाल से केवल लड़कियों को चेतावनी दी गई कि उन्हें घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए. उन में लड़कों को शिक्षा देने की कोई बात नहीं थी कि उन्हें सामाजिक सीमाओं के दायरे में रहना चाहिए. बलात्कारों के विरोध में दुनिया भर में औरतें जो विद्रोह कर रही हैं, जो मी टू आंदोलन कर रही हैं उन में सजा की मांग की जा रही है, सामाजिक दृष्टिकोण बदलने की नहीं. पुरुषों से अपरोक्ष रूप से कहा जा रहा है कि औरतों के साथ चाहे जो मरजी करो पर पकड़े गए तो जेल जाओगे.
होना यह चाहिए कि लड़कियों के साथ अभद्र व्यवहार है ही गलत, पकड़े जाओ या न पकड़े जाओ, यह दुनिया नहीं सिखा रही. तभी औरतों पर सैक्सी चुटकुले बन रहे हैं, इंटरनैट का भरपूर दुरुपयोग पोर्न के लिए किया जा रहा है, जिस में औरतों को सैक्स डौल बना कर प्रस्तुत किया जा रहा है.
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मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के नगरनिगम की 6 फरवरी को संपन्न हुई अहम मीटिंग में 2 अपर आयुक्तों बी के चतुर्वेदी और मलिका निगम को हटाने के साथ उन के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए गए. मामला कंप्लीशन सर्टिफिकेट से संबंधित था. कंप्लीशन सर्टिफिकेट सारे राज्यों के सभी शहरों में अनिवार्य है और इस के अभाव में लाखों बनेबनाए मकान वैध रूप से खाली रहते हैं.
भोपाल नगरनिगम के इन अधिकारियों पर आरोप था कि उन्होंने कई बिल्डर्स को गलत तरीके से कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी कर लगभग 200 करोड़ रुपयों का घोटाला कर डाला. जाहिर है कंप्लीशन सर्टिफिकेट देने के एवज में मोटी घूस ली गई और जब मामला दबाए नहीं दबा तो नगरनिगम ने उस पर लीपापोती करने की गरज से कुछ अधिकारियों को सस्पैंड कर दिया जिस के बारे में हर कोई जानता है कि इस सजा के कोई खास माने नहीं होते.
दरअसल होता यह है कि जांच चलती रहती है और दोषी अधिकारी शान से नौकरी करते रहते हैं. दूसरी तरफ कंप्लीशन सर्टिफिकेट घोटाले में दोषी पाए गए बिल्डर्स पर 0.5 फीसदी की दर से पैनल्टी लगा दी गई जो करोड़ों में होती है.
इस मामले में पैनल्टी जमा करने के लिए एक महीने का वक्त दिया गया. उलट इस के नगरनिगम के दोषी अधिकारियों की बाबत जांच की कोई समयसीमा तय नहीं की गई कि यह फलां वक्त तक पूरी कर ली जाएगी.
भोपाल के मामले में तो उस वक्त हैरानी हुई जब 3 दोषी अधिकारियों को हफ्तेभर बाद ही बाइज्जत फिर से पदस्थ कर दिया गया. नियमकायदे और कानूनों के नाम पर जो खेल इस घूसकांड में हुआ उस की मिसाल शायद ही ढूंढ़ने से कहीं मिले.
नगरनिगम परिषद ने एक संकल्प पारित करते हुए अपर आयुक्त बी के चतुर्वेदी और मलिका निगम सहित सिटी इंजीनियर जी एस सलूजा को एकतरफा कार्यमुक्त करते हुए उन्हें उन के मूल विभाग में भेजने व उन के खिलाफ विभागीय जांच की बात कही थी लेकिन 13 फरवरी को शासन ने निगम परिषद का संकल्प खारिज करते हुए उन्हें वापस नगरनिगम में ही नियुक्त करने के आदेश दे दिए. अब यह विवाद कानून के मकड़जाल में उलझ कर रह गया है, जिस में दोषी अफसर शान से नौकरी कर रहे हैं यानी या तो उन्होंने भ्रष्टाचार किया ही नहीं और अगर किया भी है तो उन का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.
प्रतिनियुक्ति इन के लिए वरदान साबित हुई पर इस का फर्जी कंप्लीशन सर्टिफिकेट पर क्या फर्क पड़ा, यह न किसी ने सोचा और न ही किसी ने बताया.
कंप्लीशन का औचित्य क्या
नवंबर 2017 में नगरनिगम, भोपाल में फर्जी कंप्लीशन सर्टिफिकेट का मामला चर्चा में था. कुछ कांग्रेसी पार्षदों ने आरोप लगाया था कि बिल्डिंग अनुभूति शाखा ने बिल्डरों से सांठगांठ कर उन्हें गलत तरीके से कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी कर दिए हैं.
ऐसा इसलिए किया गया था कि बिल्डर मई 2016 से लागू नए कानून रेरा यानी रियल स्टेट अथौरिटीज एक्ट में रजिस्ट्रेशन कराने से बच जाएं. इस घूसकांड के उजागर होने पर भोपाल के महापौर आलोक शर्मा ने एक जांच कमेटी बना दी जिस ने जांच की तो इस फर्जीवाड़े का कुछ हिस्सा सामने आ गया.
बहरहाल, जो भी सामने आया उस से एक बात तो स्पष्ट हो गई कि सरकार चाहे कितने भी नियमकानून बना ले, वे ग्राहकों के हितों के बजाय भ्रष्ट अफसरों के हित साधते हैं. चूंकि तमाम नियमों और कानूनों की चाबी इन्हीं अफसरों के पास रहती है, इसलिए घूस खाने के लिए उन्हें नया मौका मिल जाता है. कंप्लीशन सर्टिफिकेट उन में से एक है, जिस पर घूस लेने में कोई चूक नहीं की गई.
कंप्लीशन सर्टिफिकेट ग्राहक को आश्वस्त करता एक कागज है कि जिस फ्लैट, मकान या कालोनी में वह रहा है वह कानूनन पूरी तरह वैध है और वैसा ही है जैसा प्रोजैक्ट के वक्त बिल्डर ने बताया था. हिंदी में इस सर्टिफिकेट को अधिभोग एवं समापन प्रमाणपत्र कहा जाता है. जब कोई डैवलपर किसी प्रोजैक्ट को पूरा कर लेता है तो उसे स्थानीय निकाय से इस प्रमाणपत्र को हासिल करना पड़ता है. न लेने पर सजा और पैनल्टी के प्रावधान हैं. बोलचाल की भाषा में इसे कंप्लीशन सर्टिफिकेट कहा जाता है.
बदली अहमियत
भोपाल के एक सीनियर आर्किटैक्ट सुयश कुलश्रेष्ठ की मानें तो कंप्लीशन सर्टिफिकेट तो हमेशा से ही अनिवार्य रहा है पर अभी तक इस की कोई अहमियत नहीं थी, इसलिए लोग इसे लेते नहीं थे. रेरा लागू होने के बाद इस की अनिवार्यता से देशभर के बिल्डर परेशान हैं. सुयश बताते हैं कि रेरा में कोई नया प्रावधान नहीं है. हुआ इतना भर है कि बहुत से पुराने कानूनों को मिला कर एक नया कानून बना दिया गया है.
एक मकान या अपार्टमैंट कई कानूनी जटिलताओं व प्रक्रियाओं में उलझा रहता है. निर्माण से ले कर समापन तक तरहतरह की अनुमतियां डेवलपर को सरकार से लेनी पड़ती हैं. निर्माण का नक्शा पेश करने से ले कर निर्माण पूरा होने के बाद तक नियमकायदे व कानूनों के यज्ञ में सैकड़ों तरह की आहुतियां डालने के बाद भी मकान काननून आप का हुआ या नहीं, यह तय करने का हक पंडों की तरह अधिकारियों के हाथ में होता है.
कंप्लीशन सर्टिफिकेट इस बात का प्रमाण होता है कि भवन निर्माण का काम स्थानीय कानूनों व स्वीकृत नक्शे या योजना के अनुरूप हुआ है. इस में यदि रत्तीभर भी गड़बड़ी है तो आप एक अवैध भवन या मकान में रह रहे हैं. जहां तक बात बिल्डर्स की है, तो वे तब तक ग्राहक को कब्जा नहीं दे सकते जब तक उन्होंने यह कंप्लीशन सर्टिफिकेट स्थानीय निकाय से हासिल न कर लिया हो. अगर बिल्डर यह सर्टिफिकेट नहीं लेता है तो मान लिया जाता है कि उस ने निर्माण तयशुदा पैमानों व कानूनों के मुताबिक नहीं किया है.
देशभर में ऐसी इमारतों की भरमार है जिन के कंप्लीशन सर्टिफिकेट बिल्डर्स ने नहीं लिए हैं और लिए भी हैं तो भोपाल के घोटाले की तर्ज पर घूस दे कर, जिस का खमियाजा खरीदारों को भी भुगतना पड़ता है. यह परेशानी कितनी बड़ी है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देशभर में आएदिन अवैध कालोनियों को वैध बनाने की मुहिम चलती रहती है. अवैध निर्माण क्यों हुआ था और क्या यह बिना सरकारी विभागों की मिलीभगत के मुमकिन है, इस पर सरकारें मौन रहती हैं, लेकिन वे वैध करार देने के नाम पर और टैक्स यानी दक्षिणा लेने से नहीं चूकतीं. रेरा के राडार पर बिल्डर हैं. यह सर्टिफिकेट तमाम मकानों के लिए भी जरूरी है, इस लिहाज से देश के 80 फीसदी मकान अवैध या गैरकानूनी हैं. अगर इस बाबत भी अनिवार्यता लाद दी गई तो देशभर में हड़कंप मच जाएगा.
बेतुके नियमकायदे
मकान बनाना कभी आसान काम नहीं रहा. 90के दशक तक लोग खुद की देखरेख में अपनी मरजी का मकान बनवाते थे. इस बाबत तब उन्हें स्थानीय निकाय से अनुमति भर लेनी पड़ती थी जो तब 100-500 रुपए की घूस दे कर मिल जाती थी. बिजली, पानी और सीवेज को ले कर तब खासे कानून वजूद में नहीं थे. सारी सहूलियतें एक आवेदन व निर्धारित शुल्क अदा करने पर मिल जाती थीं. बड़ी दिक्कत तब मजदूरों और सामग्री की हुआ करती थी.
पर जब शहरीकरण का दौर शुरू हुआ तो रियल एस्टेट कारोबार चमक उठा. हर शहर में बिल्डर, कोलोनाइजर्स और डैवलपर कुकरमुत्तों की तरह उग आए. ये लोग आज भी आम लोगों की कानूनी परेशानियां दूर करने में अहम रोल निभाते हैं. एक बिल्डर सरकारी कायदेकानूनों की जितनी जानकारी रखता है, उतनी शायद खुद सरकार के कर्मियों को भी नहीं होती.
इन जानकारियों और सहूलियतों की कीमत वह ग्राहकों से वसूलता है तो इस में हर्ज क्या. इस सवाल पर तय है कि सहमत होना मुश्किल है. वजह, बिल्डर्स की छवि कुछ ऐसी बिगाड़ी गई है कि वे हर किसी को लुटेरे नजर आते हैं. मकान और भवन निर्माण को ले कर हर साल नए नियमकानून बनते हैं. कहने को तो ये आम लोगों के भले व हित के लिए होते हैं लेकिन हकीकत में इन से घूस का दायरा बढ़ता है.
विभिन्न विभागों से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने से उसे कंप्लीशन सर्टिफिकेट तक के मुकाम तक पहुंचाने का सफर घूस से भरा हुआ है. भोपाल के एक नामी बिल्डर की मानें तो 60 लाख रुपए का एक फ्लैट तो 40 लाख रुपए में बन जाता है पर बचे 20 लाख रुपए में से हमें 12 लाख रुपए टैक्स और घूस के रूप में देने पड़ते हैं. लोग भी हमें पैसे इसी बाबत देते हैं कि कानूनी खानापूर्तियों की बाबत उन्हें दरदर और दफ्तरदफ्तर न भटकना पड़े.
इस बिल्डर के मुताबिक, निर्माण से संबंध रखते अधिकांश नियमकानून गैरजरूरी व बेमतलब के हैं. कंप्लीशन सर्टिफिकेट उन में से एक है. अगर कोई अपनी जमीन पर मकान या अपार्टमैंट बना रहा है तो उसे कंप्लीशन सर्टिफिकेट लेने के लिए बाध्य करना ज्यादती नहीं, तो क्या है.
बात सच भी है कि इतने फुट की गली छोड़ो, इतने फुट का रास्ता अनिवार्य है, इतनी जमीन पार्किंग और इतनी पर्यावरण के नाम पर खाली रखने व बिल्डिंग का इतना या उतना हिस्सा फलां के लिए आरक्षित रखने जैसी शर्तें लागत को बढ़ाती ही हैं जिसे आम ग्राहक को ही चुकाना पड़ता है. अधिकांश पैसा सरकारी खजाने या घूस में जाता है जबकि लोग समझते हैं कि बिल्डर लूट रहा है.
डैवलपर चंदन गुप्ता का कहना है, ‘‘जिसे लूट करार दे दिया गया है वह दरअसल फीस है. एक बिल्डर तो करोड़ों का दांव खेलता है, इस पर भी उस का टेटुआ सरकारी मुलाजिमों के पंजे में रहता है. अगर वह इतना सबकुछ करने के एवज में कुछ ज्यादा ले ले, तो बेकार की हायतोबा क्यों मचती है. कुछ बिल्डर ज्यादा मुनाफे में ठगी करते हैं, पर ऐसे लोग हर पेशे में हैं. दूसरे, लागत मूल्य में उतारचढ़ाव आता रहता है, इसलिए भी धोखाधड़ी होती है.’’
रही बात कंप्लीशन सर्टिफिकेट की, तो उस का औचित्य समझ से परे है, खासतौर से तब, जब उसे भी रिश्वत दे कर हासिल किया जा सकता है. इस की अनिवार्यता से घूसखोरी और बढ़ रही है और भोपाल की तरह देशभर के स्थानीय निकायों के अधिकारी व दूसरे ओहदेदार अपनी जेबें भर रहे हैं.
कंप्लीशन सर्टिफिकेट का स्थानीय निकाय द्वारा दिया जाना और भी बेतुकी बात है. इसे ग्राहक या खरीदार से लिया जाना चाहिए जो मेहनत की गाढ़ी कमाई दे कर मकान खरीदता है. अगर उसे एतराज नहीं तो स्थानीय निकायों को सरपंच बनाने की कोई तुक नहीं. बिल्डर्स के गले में डाले इस नए फंदे को ढीला करने को निकायों के घूसखोर मुलाजिम तैयार नहीं, जिन्हें आम लोगों के भलेबुरे से लेनादेना नहीं होता.
रेरा का फेर
मई 2016 से ग्राहकों के भले के लिए सरकार ने रेरा यानी रियल एस्टेट अथौरिटी एक्ट लागू किया है जिस का हर किसी ने स्वागत किया. रेरा का प्रमुख प्रावधान यह है कि अब हर प्रोजैक्ट का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है और बिल्डर को उन शर्तों को पूरा करना जरूरी है जिन वह वादा व दावा ग्राहक से करता है.
ग्राहक बिल्डर की ठगी से बचें, यह बेहद जरूरी है लेकिन इस बाबत जो शर्तें बिल्डर पर लादी जा रही हैं वे पूरी हो पाएंगी, इस में शक है. नए प्रावधानों में से एक उल्लेखनीय यह है कि खरीदारों से जो पैसा बिल्डर लेगा, उस का 70 फीसदी निर्माण कार्य में लगाएगा, लेकिन बिल्डर इमारत की कीमत नहीं बढ़ा पाएगा भले ही बिल्डिंग मटेरियल के भाव बढ़ रहे हों. ऐसे में जाहिर है कि बिल्डर इमारत की गुणवत्ता गिराने को मजबूर होंगे. बिल्डर डिजायन में बदलाव तभी कर सकता है जब दोतिहाई खरीदार अपनी सहमति दें.
ऐसी कई बंदिशों की कोई खास अहमियत नहीं है. वजह, आमतौर पर खरीदार अब जागरूक है और ठोकबजा कर ही जायदाद खरीदता है.
रेरा को लागू हुए डेढ़ साल होने को हैं लेकिन इस का फायदा ग्राहकों को उतना नहीं मिल पा रहा है जितना कहा गया था. इस की इकलौती वजह कानून का उन बाबुओं के हाथों में होना है जो उसे अपनी मरजी से नचाते हैं.
नोएडा और ग्रेटर नोएडा के करीब डेढ़ लाख ग्राहक आज भी इंतजार कर रहे हैं कि उन्हें मालिकाना हक मिले लेकिन वह नहीं मिल रहा है. शिकायतें हो रही हैं पर उन पर कार्यवाही नहीं हो रही. ऐसे में साफ दिख रहा है कि यह कानून भी अव्यावहारिकताओं से भरा है. तयशुदा वक्त में मकान दे पाना पूंजी, बिल्डिंग मटेरियल और श्रमिक उपलब्धता पर निर्भर रहता है. ये सब बातें बिल्डर्स के हक में नहीं हैं, लिहाजा अब विवाद नएनए रूप में सामने आएंगे.
कंप्लीशन सर्टिफिकेट विवाद इसी रेरा की देन है. अप्रैल 2016 तक, जिन्होंने बिल्डिंग निर्माणकार्य पूरा कर लिया था, उन्हें इस सर्टिफिकेट की बाध्यता नहीं थी. लेकिन भोपाल की तरह देशभर में आधेअधूरे प्रोजैक्ट्स को कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी हुए ताकि बिल्डर रेरा में रजिस्ट्रेशन से बच सकें तो इस में गलती सर्टिफिकेट जारी करने वाले निकायों की भी है.
दिलचस्प बात यह भी है कि मध्य प्रदेश में तो ग्राम सचिवों तक ने ये प्रमाणपत्र बिल्डर्स को दे दिए थे जिस से यह साबित हुआ था कि सरकार को यह भी नहीं पता कि कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी करने का हक आखिर है किस को. अब मकान महंगे हो गए हैं. रेरा की शर्तों पर खरा उतरने के लिए बिल्डर दाम बढ़ाने को मजबूर हो चले हैं यानी इस नए कानून का भार भी खरीदारों को ढोना है. इस के बाद भी वे खुश और संतुष्ट हैं, तो यह खुशी कितने दिन टिक पाएगी, यह भी जल्द सामने आ जाना है.
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उत्तर प्रदेश के जिला एटा की शबाना का अलग ही मामला है. उस के पति ने उसे तलाक नहीं दिया है, फिर भी इद्दत के दौरान भरणपोषण की रकम दे कर उस से छुटकारा पा लिया है. जबकि इद्दत 2 स्थितियों में होता है. एक औरत विधवा हो जाए, दूसरा उस का तलाक हो जाए. लेकिन शबाना के साथ इन दोनों स्थितियों में एक भी नहीं है.
एटा शहर के किदवईनगर में समरुद्दीन पत्नी रजिया, 2 बेटियों शबाना, शमा तथा 2 बेटों सरताज और नूर आलम के साथ रहते थे. उन का खातापीता परिवार था. बेटियों में शबाना शादी लायक हुई तो वह उस के लिए लड़का ढूंढने लगे.
एटा में ही उन के एक रिश्तेदार अलीदराज रहते थे. बाद में वह काम की तलाश में दिल्ली चले गए और वहां दक्षिणपूर्वी दिल्ली जिले के संगम विहार में रहने लगे. उन्होंने वहीं स्टील फरनीचर का अपना कारखाना लगा लिया, जो ठीकठाक चल पड़ा.
अलीदराज के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे और 1 बेटी थी. वह बेटी की शादी कर चुके थे. बड़े बेटे आसिफ की शादी के लिए उन्होंने समरुद्दीन के पास प्रस्ताव भेजा. क्योंकि शबाना उन्हें पसंद थी. आसिफ पिता के स्टील फरनीचर के धंधे में हाथ बंटा रहा था. लड़का ठीकठाक था, इसलिए समरुद्दीन ने हामी भर दी. इस के बाद आसिफ और शबाना का निकाह हो गया.
शादी के बाद शबाना दिल्ली आ गई. वह समझदार लड़की थी, इसलिए रजिया को पूरा विश्वास था कि बेटी अपने बातव्यवहार से ससुराल वालों का दिल जीत लेगी और खुशहाल जीवन जिएगी. हुआ भी ऐसा ही. शबाना के दांपत्य के शुरुआती दिन काफी खुशहाल थे. मांबाप ने शादी में 4-5 लाख रुपए खर्च किए थे.
आसिफ का भी काम ठीक चल रहा था. सासससुर, पति, देवर सभी उसे प्यार करते थे. इसलिए शबाना भविष्य को ले कर निश्ंिचत थी. शादी के साल भर बाद शबाना को एक बेटी पैदा हुई, जिस का नाम अलीशा रखा गया. अलीशा घर की पहली संतान थी, इसलिए उसे ले कर सभी खुश थे. सब कुछ बढि़या चल रहा था, लेकिन अचानक शबाना के सुख के दिन दुखों में बदल गए.
एक दिन आसिफ शराब पी कर घर आया तो शबाना को गुस्सा आ गया. उस ने कहा, ‘‘यह क्या कर के आए हो तुम? यह नया शौक कब से पाल लिया? पीने वाले मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं हैं. तुम्हें तो पता ही है कि मेरे मायके में शराब की छोड़ो, कोई बीड़ीसिगरेट तक नहीं पीता.’’
पत्नी की नसीहत सुन कर उसे अमल में लाने के बजाय आसिफ ने शबाना के गाल पर तमाचा जड़ते हुए कहा, ‘‘क्या मैं तेरे बाप के पैसों से पी कर आया हूं, जो तू मुझे समझा रही है? तू कौन होती है मुझे रोकने वाली?’’
शौहर के इस व्यवहार से शबाना हैरान रह गई. उस ने कहा, ‘‘भले तुम मेरे बाप के पैसों की नहीं पी रहे हो, पर शराब पीना अच्छा तो नहीं है.’’
‘‘तू ठीक कह रही है. तू ही कौन सी अच्छी है. मेरे दोस्त मुझ पर हंसते हैं, वे कहते हैं कि कहां मोटी के चक्कर में फंस गया.’’
कह कर आसिफ कमरे में चला गया. उस की इस बात पर शबाना हैरान थी. उस ने तो उसे पसंद कर के निकाह किया था. अब यह क्या कह रहा है? शबाना डर गई. उस ने मन को समझाया कि आसिफ ने नशे में यह बात कह दी होगी.
लेकिन सुबह भी आसिफ का व्यवहार जस का तस रहा तो शबाना सहम उठी. क्योंकि इस से उस का दांपत्य सुखी नहीं हो सकता था. शबाना ने शौहर को समझाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘देखो, अब मैं जैसी भी हूं, तुम्हारी बीवी हूं. अब पूरा जीवन तुम्हें मेरे साथ ही बिताना होगा.’’
आसिफ ने उस की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया. वह खापी कर फैक्ट्री चला गया. शबाना को परेशान देख कर सास अफसरी ने पूछा, ‘‘क्या बात है बहू, तुम कुछ परेशान लग रही हो?’’
‘‘अम्मी आप ही बताइए कि अगर मैं मोटी हूं, तो इस में मेरा क्या दोष है?’’ शबाना ने कहा.
‘‘नहीं, इस में तुम्हारा दोष नहीं, हमारा दोष है.’’ अफसरी बेगम ने व्यंग्य किया.
उसी बीच सामूहिक विवाह समारोह में शबाना के देवर असद की शादी दिल्ली की कमरुन्निसा के साथ हो गई थी. कमरुन्निसा छरहरे बदन की काफी खूबसूरत लड़की थी. भाई की दुलहन देख कर आसिफ को लगा कि मांबाप ने उस के निकाह में कुछ ज्यादा ही जल्दी कर दी थी, वरना उस का निकाह भी किसी खूबसूरत लड़की के साथ हुआ होता.
यह बात मन में आते ही आसिफ को भाई से ईर्ष्या होने लगी. पर मन की बात बाहर नहीं आने दी. बेटी के पहले जन्मदिन पर आसिफ के कुछ दोस्त घर आए तो उन्होंने कहा, ‘‘भाई आसिफ, असद की बीवी तो बहुत सुंदर है.’’
दोस्तों की इस बात से आसिफ ने खुद को काफी अपमानित महसूस किया. उसे लगा कि शबाना से निकाह कर के उस ने बहुत बड़ी गलती की थी. उस दिन के बाद से आसिफ शबाना से उखड़ाउखड़ा रहने लगा. उसे शबाना में हजार कमियां नजर आने लगीं. बातबात में वह उस की पिटाई करने लगा. उस की इस पिटाई से शबाना का 2 बार गर्भपात हो गया.
शबाना परेशान थी कि इस तरह पिटते हुए जिंदगी कैसे बीतेगी? पति का व्यवहार काफी तकलीफ देने वाला था. परेशान हो कर उस ने पिता को फोन कर दिया कि दिल्ली आ कर वह उसे ले चलें. समरुद्दीन दिल्ली पहुंचे और शबाना को एटा ले गए. घर पहुंच कर शबाना ने मांबाप को पति द्वारा प्रताडि़त करने की सारी बात बता दी.
अब तक समरुद्दीन को कहीं से पता चल चुका था कि शादी से पहले आसिफ किसी शादीशुदा औरत को भगा ले गया था. पुलिस ने उसे चंडीगढ़ में गिरफ्तार किया था. लेकिन आसिफ के नाना इसलाम ने किसी तरह से उसे जेल जाने से बचा लिया था. उस के बाद आननफानन में शबाना से उस का निकाह करा दिया गया था. इस से समरुद्दीन को लगा कि उस के साथ धोखा हुआ है.
आसिफ मोटी बीवी शबाना से छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगा. कुछ दिनों बाद वह शबाना को ले आया. शबाना एक बार फिर गर्भवती हो गई. घर वाले बेटा होने की उम्मीद कर रहे थे. शबाना को लगा कि अगर बेटा न हुआ तो उस पर होने वाले अत्याचार बढ़ जाएंगे. समय पर शबाना को बेटा ही हुआ, लेकिन वह दिव्यांग था. उस का नाम आतिश रखा गया.
दिव्यांग बेटा पैदा होने की वजह से शबाना पर होने वाले अत्याचार बढ़ गए थे. सास ने कह दिया था कि दिव्यांग बच्चे पैदा करने वाली बहू के साथ उस के बेटे का कोई भविष्य नहीं है. अब वह अपने बेटे के लिए चांद सी बहू लाएगी.
‘‘तो फिर मेरा क्या होगा अम्मी?’’ शबाना ने पूछा तो अफसरी ने कहा, ‘‘तुझे तलाक दे देगा और क्या होगा. मेरा बेटा मर्द है, जवान है, 4-4 शादियां कर सकता है.’’
‘‘नहीं, यह गलत है.’’ शबाना ने कहा तो अफसरी ने आसिफ से कहा, ‘‘तोड़ दे इस के हाथपैर. अब यह हमें बताएगी कि क्या गलत है और क्या सही है.’’
आसिफ जानवरों की तरह शबाना पर टूट पड़ा. इस के बाद बातबात पर उस की पिटाई होने लगी. शबाना समझ नहीं पा रही थी कि वह अब क्या करे? दिव्यांग बेटा पैदा होने के बाद आसिफ बेलगाम हो गया था. अलीदराज और अफसरी अकसर फैक्ट्री में रहते थे. ऐसे में आसिफ बाजारू लड़कियों को घर ला कर शबाना के सामने ही कमरे में बंद हो जाता था. विरोध करने पर उस की पिटाई करता और उसे घर से निकाल देने की धमकी देता.
आसिफ शबाना को इतना परेशान कर देना चाहता था कि वह खुद ही घर छोड़ कर चली जाए. क्योंकि उस के लिए दूसरी बीवी की तलाश शुरू हो गई थी.
आसिफ अपने दोस्तों को घर बुला कर उन के साथ शराब पीता. उस के दोस्तों ने नशे में एक दो बार शबाना से छेड़छाड़ भी की. शबाना ने इस बात की शिकायत आसिफ से की तो उस ने कहा, ‘‘अगर तू मेरे दोस्तों के साथ सो जाएगी तो तेरा क्या बिगड़ जाएगा.’’
पति इतना गिर सकता है, शबाना ने सोचा भी नहीं था. शौहर की हरकतें बरदाश्त से बाहर होती जा रही थीं. शबाना समझ गई कि आसिफ उस से छुटकारा पाना चाहता है. वह बुरी तरह फंसी हुई थी. वह कुछ कर भी नहीं सकती थी. संयोग से उसी बीच वह गर्भवती हो गई. इस की जानकारी होते ही आसिफ ने कहा, ‘‘तुझे यह बच्चा गिरवाना होगा, वरना तू फिर से दिव्यांग बच्चे को जन्म देगी. हमें तो स्वस्थ बेटा चाहिए.’’
शबाना ने पति को बहुत समझाया, पर वह अपनी जिद पर अड़ा रहा. शबाना पिता को बुला कर उन के साथ मायके चली गई. वह ससुराल के बजाय मायके में ही बच्चे को जन्म देना चाहती थी. लेकिन अफसरी और आसिफ ने तय कर लिया था कि वह इस बच्चे को पैदा नहीं होने देंगे. उसी बीच आसिफ के लिए बरेली की एक लड़की तलाश कर ली गई थी. फरवरी, 2016 में आसिफ ससुराल पहुंचा और ससुर समरुद्दीन से कहा कि वह शबाना को ले जाना चाहता है.
लेकिन समरुद्दीन ने शबाना को विदा करने के बजाय कहा कि वह उन लोगों के खिलाफ अदालत में घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज कराएंगे. ससुर के तेवर से आसिफ डर गया. उस ने माफी मांगते हुए कहा, ‘‘मुझ से जो गलती हुई, उसे माफ कर दें. अब मैं शबाना को कुछ नहीं कहूंगा.’’
आखिर समरुद्दीन ने कुछ लोगों को बुलाया तो उन के सामने आसिफ ने आश्वासन दिया कि अब वह शबाना को अच्छी तरह रखेगा. इस के बाद समरुद्दीन ने शबाना को विदा कर दिया.
शबाना ससुराल आ गई. ससुराल में 10-15 दिन तो ठीक से गुजरे, लेकिन उस के बाद उसे फिर से प्रताडि़त किया जाने लगा. शबाना के 3 माह के गर्भ को अफसरी गिराने में जुट गई. वह उसे तरहतरह की दवाएं खिलाने लगी. आसिफ भी उस के साथ मारपीट करने लगा.
परेशान हो कर शबाना ने पिता को फोन कर के सारी बात बता दी. समरुद्दीन दिल्ली पहुंचे और थाना संगम विहार में शिकायत दर्ज करा दी. शिकायत की एक प्रति उन्होंने राष्ट्रीय महिला आयोग को भी भेज दी. यह मामला साकेत स्थित महिला सेल में पहुंचा. वहां सुनवाई भी हुई, पर कोई फैसला नहीं हुआ.
अफसरी और आसिफ ने तय कर लिया था कि उन्हें शबाना से छुटकारा पाना है. अब उसे उस के पिता समरुद्दीन से भी मिलने नहीं दिया जाता था. चूंकि शबाना गर्भवती थी, इसलिए आसिफ उसे तलाक भी नहीं दे सकता था. क्योंकि इसलाम में गर्भवती महिला को तलाक नहीं दिया जा सकता. उन्होंने मौलवियों से मशविरा कर के एक योजना बनाई और उसी योजना के तहत समरुद्दीन से कहा कि वह 11 जून, 2016 को पंचायत में आ कर अपनी बात कहें.
11 जून, 2016 को अलीदराज की फैक्ट्री में पंचायत बैठी. समरुद्दीन भी उस पंचायत में पहुंचे. शबाना भी अपने बच्चों के साथ पंचायत में आई. पंचों के पूछने पर शबाना ने कहा कि वह आसिफ के साथ रहना चाहती है, पर वह उस के साथ मारपीट न करे. परंतु आसिफ ने कहा कि अब वह उसे तलाक देना चाहता है. इस पर पंचों ने कहा कि वह गर्भवती पत्नी को तलाक नहीं दे सकता.
शबाना और समरुद्दीन परेशान थे. आखिर एक सादे कागज पर दोनों से जबरदस्ती दस्तखत करा लिए गए. फिर उसी कागज पर अलगअलग रहने का समझौता तैयार किया गया. उस में जो लिखा गया, उस के अनुसार मनमुटाव की वजह से शबाना और आसिफ एक साथ नहीं रहना चाहते. अत: दहेज का 30 हजार रुपए का चैक शबाना को दिया जाता है. इस के अलावा 5 हजार रुपए इद्दत के दौरान का खर्च भी दिया जाता है.
समझौते में यह भी लिखा गया था कि दोनों बच्चे अलीशा और आतिश आसिफ के पास रहेंगे. पंचायत में आसिफ ने शबाना से कह दिया कि वह समझ ले कि उस का तलाक हो चुका है. उस के दोनों बच्चे उस के पास ही रहेंगे. शबाना कहती रही कि उस के बच्चे उसे दे दिए जाएं, लेकिन किसी ने उस की एक नहीं सुनी और बापबेटी को जबरन बाहर निकाल दिया गया.
शबाना पिता के साथ एटा आ गई. मां रजिया को जब पता चला कि बेटी को उस के पति ने छोड़ दिया है तो उस पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. गर्भवती बेटी की हालत भी खराब थी. आखिर रजिया ने अपने आंसू पोंछ कर बेटी को संभाला.
पंचायत ने आसिफ से कहा था कि वह गर्भवती पत्नी को तलाक नहीं दे सकता, लेकिन बच्चा पैदा होने के बाद वह फोन कर के 3 तलाक कह सकता है. यही योजना बना कर इद्दत के दौरान दिया जाने वाला भरणपोषण का खर्च आसिफ ने 5 हजार रुपए पहले ही दे दिए थे.
इस के बाद आसिफ ने समझ लिया कि उस का तलाक हो चुका है. बस कहना भर बाकी है. लेकिन शबाना और उस के मांबाप आसिफ और उस के घर वालों को सबक सिखाना चाहते थे.
इस संबंध में समरुद्दीन एडवोकेट मोहम्मद इरफान से मिले. समझौता देख कर उन्होंने कहा कि किसी भी दृष्टि से शबाना और आसिफ का तलाक नहीं हुआ है. इसलिए शबाना को अपने पति से बच्चे और भरणपोषण का खर्च पाने का पूरा हक है.
एडवोकेट मोहम्मद इरफान ने 24 नवंबर, 2016 को शबाना की तरफ से मुकदमा दायर करा दिया. शबाना ने 4 दिसंबर, 2016 को एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम अहमद रखा गया. वह पूरी तरह से स्वस्थ है. जुलाई, 2017 में आसिफ ने बरेली की किसी लड़की से निकाह कर लिया. शादी की बात सुन कर शबाना काफी दुखी हुई. मांबाप के समझाने पर शबाना ने खुद को संभाला और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए कमर कस ली.
शबाना आसिफ से अपने बच्चों की वापसी का और भरणपोषण का मुकदमा लड़ रही है. उस का कहना है कि सौतेली मां उस के बच्चों को कभी खुश नहीं रख सकेगी. 9 अगस्त, 2017 को उस ने परिवार न्यायालय एटा में सैक्शन 10 के अंतर्गत गार्जियन ऐंड वार्ड्स एक्ट का केस दायर कर दिया है.
22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया है. शबाना खुश है कि अब आसिफ उसे कम से कम 3 तलाक तो नहीं दे सकता. वह अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ कर उस से अपने बच्चे और गुजाराभत्ता ले लेगी. वह एक चरित्रहीन शौहर के पास जाने के बजाय अकेली रह कर स्वाभिमान के साथ जीने का प्रण कर चुकी है.
शराब के लिए पैसे नहीं दिए तो दे दिया तलाक
बिहार के जिला बेगूसराय के थाना वीरपुर की पश्चिमी पंचायत क्षेत्र में मोहम्मद शकील अपनी पत्नी रूबेदा खातून के साथ रहता था. दोनों का विवाह 22 साल पहले हुआ था और घर में 6 बच्चे थे.
शकील शराब का लती था, मजबूरी में रूबेदा ही जैसेतैसे परिवार का भरणपोषण करती थी. बिहार में नीतीश सरकार ने शराब पर पाबंदी लगाई तो शराबियों को दिन में तारे नजर आने लगे.
लेकिन शराब ऐसी चीज है, जो पाबंदी के बावजूद भी बंद नहीं होती. लोग बेचनेखरीदने के नएनए रास्ते खोज लेते हैं. गुजरात की तरह बिहार का भी हाल है. मोहम्मद शकील ने भी शराब मिलने का अड्डा तो खोज लिया, पर उसे ज्यादा पैसों की जरूरत पड़ने लगी. एक दिन जब शकील ने रूबेदा से पैसे मांगे तो उस ने पैसे देने से इनकार कर दिया.
इस से शकील आपे से बाहर हो गया और गुस्से में रूबेदा को 3 बार तलाक बोल कर उस से रिश्ता खत्म करने का ऐलान कर दिया. घबरा कर रूबेदा ने पासपड़ोस के लोगों को हकीकत बताई. वे लोग जानते थे कि शकील आए दिन रूबेदा के साथ मारपीट करता है.
वे रूबेदा का साथ देने के वादे के साथ उसे थाना वीरपुर ले गए. जहां रूबेदा ने पूरी बात थानाप्रभारी बाबूलाल को बताई. थानाप्रभारी ने 15 अगस्त, 2017 को रूबेदा की ओर से शकील के खिलाफ उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया. लेकिन तलाक के मामले में वह भी कुछ नहीं कर सकते थे. बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद रूबेदा और उस के 6 बच्चों का भविष्य अंधकारमय होने से बच गया.
आला हजरत के खानदान की बहू भी 3 तलाक के फेर में
कोई सोच भी नहीं सकता कि 3 तलाक के चक्कर में बरेली के आला हजरत खानदान की बहू रही निदा खान मौत के आगोाश में जाने से बामुश्किल बच पाई है. 5 मई, 2017 को निदा जब अपने वालिद के घर थी, तभी करीब दर्जन भर गुंडों ने घर में घुस कर तोड़फोड़ की. निदा को कमरे में बंद कर के ताला लगा दिया गया था, इसलिए वह बच गई. बाकी घर वालों के साथ गुंडों ने मारपीट की.
बदमाश जातेजाते धमकी दे कर गए कि निदा बच नहीं पाएगी. निदा को उस के पति ने 3 तलाक कह कर घर से निकाल दिया था. इस मामले को ले कर निदा अदालत गई. उस का केस तो दर्ज हो गया, लेकिन बदले में दुश्मनी भी मिली.
निदा के भाई मोइन खान का कहना है कि जब एक दिन वह और निदा अदालत से घर लौट रहे थे तो रास्ते में कुछ बाइक सवारों ने उन के साथ बदसलूकी की और केस वापस न लेने पर जान से मारने की धमकी दी. इस के बाद उन के घर पर गुंडे आए थे. निदा अपनी लड़ाई तो लड़ ही रही है, साथ ही अपने जैसी महिलाओं की मदद भी करती है. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से निदा खुश है. उसे न्याय मिल सकेगा या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा.
जयपुर के सिटी अस्पताल में उस्मान का इलाज चलते 15 दिनों से भी ज्यादा हो गए थे लेकिन उस की तबीयत में सुधार नहीं हो रहा था.
आईसीयू वार्ड के सामने परेशान सरफराज लगातार इधर से उधर चक्कर लगा रहे थे. बेचैनी में कभी डाक्टरों से अपने बेटे की जिंदगी की भीख मांगते तो कभी फर्श पर बैठ कर फूटफूट कर रोने लग जाते.
उधर, अस्पताल के एक कोने में खड़ी उस्मान की मां फरजाना भी बेटे की सलामती के लिए नर्सों की खुशामद कर रही थी. तभी आईसीयू वार्ड से डाक्टर बाहर निकले तो सरफराज उन के पीछेपीछे दौड़े और उन के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहने लगे, ‘‘डाक्टर साहब, मेरे उस्मान को बचा लो. कुछ भी करो. उस के इलाज में कमी नहीं होनी चाहिए.’’
डाक्टर ने उन्हें उठा कर तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘देखिए अंकल, हम आप के बेटे को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. उस की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है. औपरेशन और दवाओं को मिला कर कुल 5 लाख रुपए का खर्चा आएगा.’’
‘‘कैसे भी हो, आप मेरे बेटे को बचा लो, डाक्टर साहब. मैं 1-2 दिनों में पैसों का इंतजाम करता हूं,’’ सरफराज ने हाथ जोड़ कर कहा.
काफी भागदौड़ के बाद भी जब सरफराज से सिर्फ 2 लाख रुपयों का ही इंतजाम हो सका तो निराश हो कर उस ने बेटी नजमा को मदद के लिए दिल्ली फोन मिलाया. उधर से फोन पर दामाद अनवर की आवाज आई.
‘‘हैलो अब्बू, क्या हुआ, कैसे फोन किया?’’
‘‘बेटा अनवर, उस्मान की हालत ज्यादा ही खराब है. उस के औपरेशन और इलाज के लिए 5 लाख रुपयों की जरूरत थी. हम से 2 लाख रुपयों का ही इंतजाम हो सका. बेटा…’’ और सरफराज का गला भर आया.
इस के पहले कि उन की बात पूरी होती, उधर से अनवर ने कहा, ‘‘अब्बू, आप बिलकुल फिक्र न करें. मैं तो आ नहीं पाऊंगा, लेकिन नजमा कल सुबह पैसे ले कर आप के पास पहुंच जाएगी.’’
दूसरे दिन नजमा पैसे ले कर जयपुर पहुंच गई.
आखिरकार सफल औपरेशन के बाद डाक्टरों ने उस्मान कोे बचा लिया. धीरेधीरे 10 साल गुजर गए. इस बीच सरफराज ने गांव की कुछ जमीन बेच कर उस्मान को इंजीनियरिंग की पढ़ाई करवाई और मुंबई एअरपोर्ट पर उस की नौकरी लग गई. उस ने अपने साथ काम करने वाली लड़की रेणु से शादी भी कर ली और ससुराल में ही रहने लगा.
इस के बाद उस्मान का मांबाप से मिलने आना बंद हो गया. कई बार वे बीमार हुए. उसे खबर भी दी, फिर भी वह नहीं आया. ईद, बकरीद तक पर भी वह फोन पर भी मुबारकबाद नहीं देता.
एक दिन सुबह टैलीफोन की घंटी बजी. सरफराज ने फोन उठाया उधर से उस्मान बोल रहा था, ‘‘हैलो अब्बा, कैसे हैं आप सब लोग? अब्बा, मुझे एक परेशानी आ गई है. मुझे 10 लाख रुपयों की सख्त जरूरत है. मैं 1-2 दिनों में पैसे लेने आ जाता हूं.’’
‘‘बेटा, तेरे औपरेशन के वक्त नजमा से उधार लिए 3 लाख रुपए चुकाने ही मुश्किल हो रहा है. ऐसे में मुझ से 10 लाख रुपयों का इंतजाम नहीं हो सकेगा. मैं मजबूर हूं बेटा,’’ सरफराज ने कहा.
इस के आगे सरफराज कुछ बोलते, उस्मान गुस्से से भड़क उठा, ‘‘अब्बा, मुझे आप से यही उम्मीद थी. मुझे पता था कि आप यही कहोगे. आप ने जिंदगी में मेरे लिए किया ही क्या है?’’ और उस ने फोन काट दिया.
अपने बेटे की ऐसी बातें सुन कर सरफराज को गहरा सदमा लगा. वे गुमसुम रहने लगे. घर में पड़े बड़बड़ाते रहते.
एक दिन अचानक शाम को सीने में दर्द के बाद वे लड़खड़ा कर गिर पड़े तो बीवी फरजाना ने उन्हें पलंग पर लिटा दिया. कुछ देर बाद आए डाक्टर ने जांच की और कहा, ‘‘चाचाजी की तबीयत ज्यादा खराब है, उन्हें बड़े अस्पताल ले जाना पड़ेगा.’’
डाक्टर साहब की बात सुन कर घबराई फरजाना ने बेटे उस्मान को फोन कर बीमार बाप से मिलने आने की अपील करते हुए आखिरी वक्त होने की दुहाई भी दी.
जवाब में उधर से फोन पर उस्मान ने अम्मी से काफी भलाबुरा कहा. गुस्से में भरे उस्मान ने यह तक कह दिया, ‘‘आप लोगों से अब मेरा कोई रिश्ता नहीं है. आइंदा मुझे फोन भी मत करना.’’
यह सुन कर फरजाना पसीने से लथपथ हो गई. वो चकरा कर जमीन पर बैठ गई. कुछ देर बाद अपनेआप को संभाल कर उस ने नजमा को दिल्ली फोन किया, ‘‘हैलो नजमा, बेटी, तेरे अब्बा की तबीयत बहुत खराब है. तू अनवर से इजाजत ले कर कुछ दिनों के लिए यहां आ जा. तेरे अब्बा तुझे बारबार याद कर रहे हैं.’’
नजमा ने उधर से फौरन जवाब दिया, ‘‘अम्मी आप बिलकुल मत घबराना. मैं आज ही शाम तक अनवर के साथ आप के पास पहुंच जाऊंगी.’’
शाम होतेहोते नजमा और अनवर जब घर पर पहुंचे तो खानदान के लोग सरफराज के पलंग के आसपास बैठे थे. नजमा भाग कर अब्बा से लिपट गई. दोनों बापबेटी बड़ी देर तक रोते रहे.
‘‘देखो अब्बा, मैं आ गई हूं. आप अब मेरे साथ दिल्ली चलोगे. वहां हम आप को बढि़या इलाज करवाएंगे. आप बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे,’’ नजमा ने रोतेरोते कहा.
आंखें खोलने की कोशिश करते सरफराज बड़ी देर तक नजमा के सिर पर हाथ फेरते रहे. आंखों से टपकते आंसुओं को पोंछ कर बुझी आवाज में उन्होंने कहा, ‘‘नजमा बेटी, अब मैं कहीं नहीं जाऊंगा. अब तू जो आ गई है. मुझे सुकून से मौत आ जाएगी.’’
‘‘ऐसा मत बोलो, अब्बा. आप को कुछ नहीं होगा,’’ यह कह कर नजमा ने अब्बा का सिर अपनी गोद में रख लिया. अम्मी को बुला कर उस ने कह दिया, ‘‘अम्मी आप ने खूब खिदमत कर ली. अब मुझे अपना फर्ज अदा करने दो.’’
उस के बाद तो नजमा ने अब्बा सरफराज की खिदमत में दिनरात एक कर दिए. टाइम पर दवा, चाय, नाश्ता, खाना, नहलाना और घंटों तक पैर दबाते रहना, सारी रात पलंग पर बैठ कर जागना उस का रोजाना का काम हो गया.
कई बार सरफराज ने नजमा से ये सब करने से मना भी किया पर नजमा यही कहती, ‘‘अब्बा, आप ने हमारे लिए क्या नहीं किया. आप भी हमें अपने हाथों से खिलाते, नहलाते, स्कूल ले जाते, कंधों पर बैठा कर घुमाते थे. सबकुछ तो किया. अब मेरा फर्ज अदा करने का वक्त है. मुझे मत रोको, अब्बा.’’
बेटी की बात सुन कर सरफराज चुप हो गए. इधर, सरफराज की हालत दिनपरदिन गिरती चली गई. उन का खानापीना तक बंद हो गया.
एक दिन दोपहर के वक्त नजमा अब्बा का सिर गोद में ले कर चम्मच से पानी पिला रही थी. तभी घर के बाहर कार के रुकने की आवाज सुनाई दी.
कुछ देर बाद उस्मान एक वकील को साथ ले कर अंदर आया. उस के हाथ में टाइप किए हुए कुछ कागजात थे. अचानक बरसों बाद बिना इत्तला दिए उस को घर आया देख कर सभी खुश हो रहे थे.
दरवाजे से घुसते ही वह लपक कर सरफराज के नजदीक जा कर आवाज देने लगा, ‘‘अब्बा, उठो, आंखे खोलो, इन कागजात पर दस्तखत करना है. उठो, उठो,’’ यह कह कर उस ने हाथ पकड़ कर उन्हें पैन देना चाहा.
नजमा ने रोक कर पूछा, ‘‘भाईजान, ये कैसे कागजात हैं?’’
लेकिन वह किसी की बिना सुने अब्बा को आवाजें देता रहा. सरफराज ने आंखें खोलीं. उस्मान की तरफ एक नजर देखा. और अचानक उन के हाथ में दिए कागजात और पैन नीचे गिर पड़े. उन का हाथ बेदम हो कर लटक गया. यह देख नजमा चिल्लाई, ‘‘अब्बा, अब्बा, हमें अकेला छोड़ कर मत जाओ.’’ और घर में कुहराम ?मच गया. नजमा बोली, ‘‘भाईजान जो मकान आप अपने नाम कराना चाहते थे वह तो 10 साल पहले अब्बू ने आप के नाम कर दिया था. आप अब फिक्र न करो.’’
ये सब देख कर उस्मान ने फुरती से अब्बा के बिना दस्तखत रह गए कागजात उठाए और वकील के साथ बिना पीछे देखे बाहर निकल गया.
फरजाना, नजमा और अनवर भाग कर पीछेपीछे आए लेकिन तब तक कार रवाना हो गई.
तीनों दरवाजे में खड़े कार की पीछे उड़ी धूल के गुबार में चकाचौंधभरी शहरी मतलबपरस्त दुनिया की आंधी में फर्ज और रिश्तों की मजबूत दीवार को भरभरा कर गिरते हुए देखते रह गए.
VIDEO : नेल आर्ट डिजाइन – टील ब्लू नेल आर्ट
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सवाल मैं 30 साल का हूं. मेरी 2 बेटियां हैं और बीवी गुजर चुकी है. मैं अपनी साली से शादी करना चाहता हूं. मैं क्या करूं?
जवाब
अगर आप की बीवी सामान्य तरीके से गुजरी है, तो आप की शादी में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए, बशर्ते साली राजी हो. ऐसे में आप अपनी ससुराल वालों से खुल कर बात कर सकते हैं. अगर साली तैयार न हो, तो आप इश्तिहार की मदद से किसी और लड़की से शादी कर सकते हैं.
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फिल्म की कहानी के केंद्र में तारा (मालविका मोहनन) और उसका छोटा भाई आमिर (ईशान खट्टर) है. फिल्म की कहानी शुरू होती है आमिर के अपने दोस्त अनिल के साथ ड्रग्स के पैकेट इधर से उधर पहुंचाने से. 2-3 बार ड्रग्स के पैकेट पहुंचाने के बाद आमिर एक बडे़ वेश्या गृह के मालिक और ड्रग्स के असली कारोबारी अशोक के पास पैसे लेने जाता है. अशोक 2-3 दिन में पैसे देने का वादा करता है. आमिर कह देता है कि पैसे नहीं मिलेंगें, तो काम नहीं होगा. इस बात से अशोक गुस्सा हो जाता है और वह अपने आदमी सनी के माध्यम से पुलिस के पास आमिर व उसके दोस्तों के ड्रग्स व्यापार की खबर पहुंचवा देता है.
पुलिस आमिर के अड्डे पर छापा मारती है. आमिर के कुछ साथी पकड़े जाते हैं. आमिर और अनिल भागने में सफल होते हैं. आमिर भाग कर धोबीघाट पहुंच कर कपड़ों में प्रेस कर रही अपनी बहन तारा के पास ड्रग्स का पैकेट छिपा देता है. पुलिस अभी भी उसके पीछे है. वह भाग रहा है. धोबी घाट पर एक इंसान अक्सी (गौतम घोष) उसे कपड़ों के ढेर में छिपा देता है. पुलिस खाली हाथ लौट जाती है.
दूसरे दिन तारा, आमिर को लेकर अपने घर जाती है. वह बताती है कि उसने यह घर एक इंसान से कर्ज लेकर खरीदा है. दोनों भाई बहन के बीच बहस होती है और तब दोनों की कहानी उजागर होती है. जब आमिर 13 साल का था, तब एक कार एक्सीडेंट में उसके माता पिता की मौत हो गयी थी. आमिर अपनी बहन के साथ रहता था. आमिर की नाराजगी है कि जब तारा का पति उसकी पिटाई करता था, तब बहन होते हुए भी उसको बचाती नहीं थी. इस पर तारा तर्क देती है कि उसका शराबी पति उसकी पिटाई करके चमड़ी उधेड़ देता था, ऐसे में वह उसे कैसे बचाती. बहरहाल, भाई बहन के आंसू बहते हैं. सारे गिले शिकवे मिट जाते हैं.
दूसरे दिन सुबह तारा धोबीघाट के लिए रवाना होती है. तो पता चलता है कि तारा के दो तीन पुरुषों से अवैध संबंध हैं. यह बात अक्सी को पसंद नहीं. अक्सी, तारा से कहता है कि वह सिर्फ उसकी है. और वह तारा के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करता है. तारा खुद को बचाने के लिए पत्थर से अक्सी का सिर फोड़ देती है. पुलिस आती है, अक्सी को अस्पताल पहुंचाती है. पुलिस तारा को अपने साथ ले जाती है, पुलिस तारा को अदालत में पेश करती है. अदालत तारा को जेल भेज देती है.
जेल में जेलर (जवाद असकरी), तारा को बताता है कि जब तक अक्सी का बयान नहीं आ जाता, उसे यहीं जेल में रहना पड़ेगा. तारा यह बात आमिर को बताती है. आमिर गुस्से में अस्पताल जाता है. पता चलता है कि अक्सी का औपरेशन सफल रहा. कुछ दिनों में ठीक हो जाएगा. आमिर खुद को अक्सी का दोस्त बताकर अक्सी से मिलता है. और उसे धमकाता है कि यदि उसने पुलिस को बयान नहीं दिया कि उसने तारा के साथ बलात्कार किया, इसलिए तारा ने उसके सिर पर पत्थर मारा, तो वह उसकी दोनों आंखें निकालकर उसका जीना मुश्किल कर देगा. उसके बाद आमिर हर दिन अक्सी के पास जाने लगता है. यहां तक कि अक्सी के लिए दवाईयां अपने पैसे से खरीद कर देता है.
इधर जेल में हर दूसरे तीसरे दिन आमिर अपनी बहन तारा से मिलने जाता है. तारा का एक ही रोना है कि उसे जेल में नहीं रहना है. मगर वह नहीं चाहती कि आमिर ड्रग्स सहित किसी गलत धंधे से जुड़े. जेल में ही तारा की दोस्ती 3 साल के बच्चे छोटू से हो जाती है, जिसकी मां गंभीर रूप से बीमार है. एक दिन छोटू की मां की मौत हो जाती है. अब तारा को लगता है कि उसकी भी मौत जेल में ही होगी. धीरे धीरे तारा छोटू में अपनी खुशियां तलाशने लगती है.
इसी बीच दक्षिण भारत से अक्सी की मां (शारदा जुम्पा), पत्नी(हीबा शाह) व चार साल की बेटी आ जाती है, जिन्हें हिंदी नहीं आती. अक्सी की पत्नी को टूटी फूटी अंग्रेजी आती है. हालात ऐसे बनते हैं कि आमिर, अक्सी के परिवार को अपने घर में रहने की इजाजत दे देता है. फिर अक्सी की पत्नी की तस्वीर मोबाइल से खींच कर अशोक को दिखाकर पैसे ऐंठता है. वह अशोक के हाथों अक्सी की पत्नी को बेचकर जमानत पर बहन तारा को छुड़ाना चाहता है. पर ऐन वक्त पर उसका जमीर उसे इसकी इजाजत नहीं देता. इससे अशोक उस पर चिढ़ जाता है और गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी देता है.
कई घटनाक्रम बड़ी तेजी से बदलते हैं. एक दिन तारा के आंसू देखकर गुस्से व परेशानी के साथ आमिर घर पहुंचता है. वहां अक्सी की बेटी का नाच उसका गुस्सा ऐसा बढ़ाता है कि वह गुस्से में अक्सी का सच और अक्सी की वजह से बहन तारा के जेल में होने की बात बता देता है. यह सुनकर अक्सी का परिवार आमिर के घर से रात में ही चला जाता है. सुबह आमिर उठता है तो घर की हालत देखकर उसे अहसास होता है कि उसने गुस्से में काफी कुछ गलत कर डाला. वह अस्पताल की तरफ भागता है.
इधर सुबह अक्सी की मां अदालत परिसर में अक्सी की तरफ से बयान टाइप करवाती है कि कैसे तारा निर्दोष है. मगर जब वह अस्पताल पहुंचती है, तो पता चलता है कि अक्सी की मौत हो गयी है. कुछ देर में आमिर भी पहुंच जाता है. अब तारा छोटू के साथ जेल में खुशियां तलाश रही हैं. तो वहीं आमिर, अक्सी के परिवार को अपने घर ले आता है.
लेखक निर्देशक माजिद मजीदी ने बड़ी खूबसूरती से सपनों के शहर मुंबई में भाई बहन की एक प्यारी कहानी सुनायी है, जिसमें विश्वास और परिस्थितियों के चलते जीवन के उतार चढ़ाव हैं. माजिद मजीदी ने इंसानी स्वभाव, इंसानी संवेदनाओं और भावनाओं को बहुत बारीकी से व बेहतरीन तरीके से सेल्यूलाइड के परदे पर उकेरा है. फिल्म में एक सीन है, जहां आमिर का दोस्त अनिल पिता की बीमारी और पैसे के लालचमें अशोक के हाथों बिक जाता है. वह आमिर को लेकर एक ऐसी सुनसान जगह पर पहुंचता हैं, जहां पानी और मिट्टी का कीचड़ है.
वहां अशोक के दो गुंडे अनिल को पैसा देते हैं. अनिल मुंह घुमाकर पैसे गिनना शुरू करता है. इधर अशोक के गुंडे कीचड़ में आमिर की पिटाई करने लगते हैं और वह उसे मार देना चाहते हैं. कुछ देर बाद अनिल का जमीर जागता है. वह उन दोनों गुंडों से कहता है कि अब आमिर को मत मारो. गुंडे कहां सुनने वाले. तब अनिल खुद उन गुंड़ों से लड़ने उसी कीचड़ में पहुंचता है. अनिल मारा जाता है और गुंडे आमिर को मरा हुआ समझ छोड़ देते हैं. यानी कि माजिद मजीदी ने इस दृश्य के माध्यम से मानव स्वभाव का बेहतरीन चित्रण किया है. उन्होंने यह कहने की कोशिश की है कि इंसान सिर्फ अच्छा या बुरा नहीं होता है. परिस्थितिवश वह गलत कदम उठा लेता है.
इतना ही नहीं माजिद मजीदी ने झोपड़पट्टी व गंदगी वाले इलाके में भी आर्थिक व सामाजिक रूप से रचे बसे दो अलग अलग वर्ग का भी चित्रण किया. माजिद मजीदी की जितनी तारीफ की जाए, उतना कम है.
सिर्फ फारसी भाषा के जानकार फिल्मकार माजिद मजीदी ने हिंदी में ‘बियौंड द क्लाउड्स’ जैसी फिल्म बनाकर भारतीय फिल्मकारों को चुनौती के साथ बहुत बड़ा सबक दिया है कि अपनी भारतीय सभ्यता संस्कृति व जीवन मूल्यों से दूर न भागे. मगर होली से चंद घंटे पहले तूफानी बारिश और छोटू की मां की मौत पर तारा का उलझन भरा अभिनय कुछ खटकता है.
जहां तक अभिनय का सवाल है, तो सही मायने में बौलीवुड को ईशान खट्टर और मालविका मोहनन के माध्यम से दो बेहतरीन कलाकार मिले हैं. ईशान ने साबित कर दिया है कि बिना संवाद के किसी भी दृश्य को वह अपने अभिनय व चेहरे के भाव से जीवंत बना सकते हैं. बहन को जेल से ना छुड़ा पाने की बेबसी हो, गलत घंधे में फंसे होने का गम हो, दुःख हो, इन सारे भावों को ईशन खट्टर ने आंसुओं और अपने चेहरे के भाव से जिस तरह से परदे पर उकेरा है, वह उन्हें कमाल का कलाकार बनाती है. पूरी फिल्म में एक भी दृश्य ऐसा नहीं है, जहां इस बात का अहसास हो कि ईशान खट्टर की यह पहली फिल्म है.
‘तारा’ के किरदार में मालविका मोहनन ने भी जानदार अभिनय किया है. तारा के किरदार के लिए कंगना रानौट व दीपिका पादुकोण सहित कई दिग्गज कलाकारों ने औडीशन दिये थे. पर माजिद मजीदी ने अंततः मालविका मोहनन को चुना था. मालविका मोहनन ने अपने जानदार व सशक्त अभिनय से साबित कर दिया कि माजिद मजीदी की पारखी नजर ने गलत चयन नहीं किया था.
तनिष्ठा चटर्जी, गौतम घोष व छोटे बच्चे ने भी बेहतरीन अभिनय किया है. फिल्म का संगीत पक्ष सबसे अधिक कमजोर है. फिल्म की कमजोर कड़ी संगीतकार ए आर रहमान हैं. फिल्म के कैमरामैन अनिल मेहता ने बहुत बेहतरीन काम किया है. जिसकी वजह से लोगों को मुंबई एक नए रंग में नजर आती है.
लगभग दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘बियौंड द क्लाउड्स’ का निर्माण ‘जी स्टूडियो’ के साथ मिलकर किशोर अरोड़ा व शरीन केड़िया ने ‘नमः पिक्चर्स’ के बैनर तले किया है. फिल्म के लेखक निर्देशक माजिद मजीदी, संगीतकार ए आर रहमान, कैमरामैन अनिल मेहता तथा कलाकार हैं – ईशान खट्टर, मालविका मोहनन, गौतम घोष, शारदा जुम्पा, हिबा शाह व अन्य.
जौन अब्राहम अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘‘परमाणु’’ को लेकर प्रेरणा अरोड़ा के साथ अदालती चक्कर में फंस गए हैं. दोनों के बीच विवाद के चलते मसला अदालत में विचाराधीन है. सोमवार, 16 अप्रैल को मुंबई उच्च न्यायालय के जज एस जे कांठावाला ने कहा कि फिल्म ‘‘परमाणु’’ के केस की सुनवाई के वक्त जौन अब्राहम को भी अदालत में मौजूद रहना चाहिए. उसके बाद मंगलवार, 17 अप्रैल को जौन अब्राहम भी अदालत पहुंचे.
अदालत में प्रेरणा अरोड़ा के वकील ने कहा कि प्रेरणा अरोड़ा की कंपनी जौन अब्राहम की कंपनी को बकाया पांच करोड़ रूपए देगी. मगर जौन अब्राहम को फिल्म के प्रचार पर दस करोड़ रूपए खर्च करने होंगे. काफी बहस के बाद अदालत ने दोनों पक्षों से कहा कि वह दोनों आपस में बैठकर इस मसले को सुलझा लें.
अब जौन अब्राहम और प्रेरणा अरोड़ा के बीच बातचीत होगी और दोनों ने आपस में कोई समझौता कर लिया, तो वह उस समझौते की जानकारी अदालत में देंगे, उसके बाद ही अदालत फिल्म ‘परमाणु’ के प्रचार पर लगायी गयी रोक हटा सकती है. यानी कि यह तय हो गया है कि ‘‘परमाण’’ 4 मई को नहीं आ पाएगी. बौलीवुड का एक तबका मान रहा कि अब ‘‘परमाणु’’ 25 मई को ही सिनेमाघर पहुंच पाएगी.
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‘‘टू स्टेट्स’’ फेम निर्देशक अभिषेक वर्मन अपनी नई फिल्म ‘‘कलंक’’ की शूटिंग आज, 18 अप्रैल से शुरू कर रहे हैं. 1940 की पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी वाली फिल्म ‘‘कलंक’’ एक एपिक फिल्म है. इस फिल्म की कल्पना करण जौहर और उनके पिता यश जौहर ने 15 वर्ष पहले की थी. करण जौहर ने आज ही इस फिल्म को अगले वर्ष 19 अप्रैल 2019 में प्रदर्शित करने की भी घोषणा कर दी है.
फिल्म ‘‘कलंक’’ में माधुरी दीक्षित, संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा, आलिया भट्ट, वरूण धवन व आदित्य राय कपूर अभिनय कर रहे हैं. जबकि करण जौहर इस फिल्म का निर्माण अपनी कंपनी ‘‘धर्मा प्रोडक्शन’’ और साजिद नाड़ियादवाला व फौक्स स्टार स्टूडियो के साथ मिलकर कर रहे हैं.
खुद करण जौहर कहते हैं- फिल्म ‘कलंक’ मेरे लिए एक भावनात्मक यात्रा है. इस फिल्म का बीज 15 वर्ष पहले पड़ा था. जिसे मेरे पिता बनाना चाहते थे. अब उसी फिल्म के निर्देशन का भार अभिषेक वर्मन उठा रहे हैं. कहानी शिबानी बठीजा ने लिखी है.’
जबकि साजिद नाड़ियादवाला कहते है- ‘18 अप्रैल 2014 को फिल्म ‘टू स्टेट्स’ प्रदर्शित हुई थी, और अब 18 अप्रैल 2018 को ‘कलंक’ की यात्रा शुरू हो रही है. यह फिल्म सारी सीमाओं को तोड़गी. यह सही मायनो में ऐतिहासिक फिल्म है. करण जौहर व फौक्स स्टार स्टूडियो के साथ इस फिल्म का निर्माण करते हुए काफी उत्साहित हूं.’’
‘‘फौक्स स्टार स्टूडियो’’ के विजय सिंह कहते हैं- ‘‘धर्मा प्रोडक्शन और नाड़ियादवाला ग्रैंडसंस के साथ हमारी रचनात्मक भागीदारी हमेशा सफल रही है. हमें गर्व है कि हम ‘कलंक’ जैसी फिल्म के साथ जुड़े हैं.
‘‘कलंक’’ ऐसी फिल्म है, जिसमें 1997 में प्रदर्शित फिल्म ‘महानता’ के 21 वर्ष बाद संजय दत्त और माधुरी दीक्षित एक साथ काम कर रहे हैं. बौलीवुड से जुड़ा एक तबका मानता है कि ‘कलंक’ वही फिल्म है, जिसे करण जौहर ‘‘शिद्दत’’ के नाम से बनाना चाहते थे, पर शुरू ही नही हो पाई थी.
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हम ने घर के दरवाजे पर खड़े तीनों पुलिस वालों की ओर एक नजर बारीबारी से देखा.
‘‘यों उल्लू की तरह आंखें न घुमा… हमारे साथ थाने चल,’’ नुकीली मूंछों वाले एक कांस्टेबल ने कहा.
‘‘थाने में…’’ हम ने हैरानी से पूछा.
‘‘थाने नहीं तो क्या
हम तुझे होटल ले कर चलेंगे,’’ बड़ी दबंग आवाज में सबइंस्पैक्टर गुर्राया.
‘‘मगर, मेरा कुसूर क्या है?’’ हम ने सवाल किया.
‘‘बताऊं तेरा कुसूर…’’ सबइंस्पैक्टर फिर से गुर्राया.
हमारा कुसूर केवल इतना था कि महेशजी की बात मान कर ‘किराए के लिए खाली’ का बोर्ड लिखवाने के साथसाथ अपने नए मकान के कोने वाली दीवार पर पेंटर से ‘यहां पेशाब करना मना है’ भी लिखवा दिया था. फिर तो मुसीबतों का सिलसिला शुरू हो गया था.
दूसरे दिन जब हम किसी किराएदार की राह ताकने को अपने मकान पर पहुंचे तो देखा कि कोने वाली दीवार के पास की धरती बगैर बारिश के गीली थी. जगहजगह लंबीलंबी धारें बनी हुई थीं.
हम अभी दीवार पर लिखी मनाही वाली चेतावनी पढ़ ही रहे थे कि एक महाशय जल्दी से आए और हम से थोड़ा हट कर पीठ फेर कर बैठ गए.
‘‘अरेअरे रुको… यह क्या कर रहे हो?’’ हम चिल्लाए.
उन्होंने खुद रुकने के बजाय हमें हाथ से रुकने का इशारा किया और कुछ देर बाद काम निबटा कर मुसकराते हुए हमारे सामने खड़े हो गए.
‘‘आप ने पढ़ा नहीं, यह क्या लिखा है?’’ हम ने दीवार की ओर उंगली उठा कर इशारा किया.
‘‘भाई साहब, आप के इस नोटिस बोर्ड को पढ़ कर ही मुझे एहसास हुआ कि मैं ने काफी देर से यह ‘नेक’ काम नहीं किया. इस नोटिस को पढ़ने के बाद मुझे अपनेआप पर काबू रखना मुश्किल हो गया,’’ उन्होंने दांत निकालते हुए बेशर्मी से कहा.
उस दिन हम ने देखा कि न जाने कहांकहां से लोग आआ कर हमारे घर की दीवार की सिंचाई करते रहे. कुछ तो इतने बेशर्म निकले कि रिकशा रुकवा कर हमारी दीवार तर कर गए.
शाम को हम ने महेशजी से इस बारे में बात की, तो वह पेंटर से मिलने फौरन ही चले गए. दूसरे दिन हमारी दीवार पर लिखा था, ‘यहां कुत्ते पेशाब करते हैं’. फिर तो दीवार के सामने कई पालतू और आवारा कुत्ते लाइन में लगे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे.
थोड़े ही फासले पर कुछ साहब टाइप लोग अपने हाथों में कुत्तों की जंजीरें लटकाए गपशप कर रहे थे. हमें देखते ही एक साहब हमारे करीब आए और बोले, ‘‘जैंटलमैन, आप ने हम लोगों की बहुत बड़ी समस्या हल कर दी है.’’
‘‘जी… क्या…’’ हम ने कुछ न समझते हुए कहा.
‘‘महल्ले वालों को पार्क में कुत्तों को घुमाने पर बहुत एतराज था, मगर आप ने सब का मुंह बंद कर दिया.’’
हमारा दिल चाहा कि उन के हाथ से कुत्ते का पट्टा छीन कर उन के गले में डाल कर उन को दीवार के पास ले जाएं और कहें कि अपने कुत्ते के साथसाथ आप भी अपना शौक पूरा कर लें. मगर कुत्तों और उन के मालिकों की तादाद देख कर मन मसोस कर रह जाना पड़ा. शाम को हम ने फिर महेशजी के घर का दरवाजा खटखटाया. वे उसी समय अपना स्कूटर निकाल कर पेंटर की दुकान की ओर उड़ चले.
अगले दिन जब हम ने दीवार पर नजर डाली, तो वहां लिखा था, ‘गधे के पूत, यहां मत मूत’.हम महेशजी की अक्ल पर गर्व कर उठे और इस मुसीबत से छुटकारा पा कर दिल ही दिल में खुश होने लगे.
हम पूरी तरह खुश भी न होने पाए थे कि एक हट्टेकट्टे पहलवान टाइप साहब गुस्से से आंखें लाल किए मुंह से झाग छोड़ते हुए आए और हमारी कमीज का कौलर खींच कर बोले, ‘‘तुम ने मुझे गाली क्यों दी?’’
‘‘पहलवानजी, मैं ने तो आप को कभी देखा तक नहीं. आप को गलतफहमी हुई है,’’ कहते हुए हम ने कौलर छुड़ाने के लिए जोर मारा, तो कौलर चर्र से फट गया.
वे साहब हमें कौलर से पकड़ कर खींचते हुए दीवार के पास ले आए और दहाड़े, ‘‘तुम ने मुझे गाली बक कर नहीं, लिख कर दी है,’’ और दीवार पर लिखे नोटिस की ओर इशारा किया.
हम ने एक नजर नोटिस बोर्ड पर और दूसरी दीवार के पास ताजाताजा बनी बलखाती लकीर की ओर डाली. उस के बाद उन की ओर देखा और कहा, ‘‘तो आप यहां बैठे ही क्यों थे? पढ़ेलिखे हो कर जाहिलों जैसी हरकत क्यों की?’’
‘‘पढ़ने की फुरसत किसे थी और जब पढ़ा तो देर हो चुकी थी.’’
‘‘आगे से पहले ही पढ़ लिया करना,’’ हम ने कहा.
‘‘आगे से पढ़ने की नौबत ही नहीं आएगी,’’ उन्होंने कहा. फिर पास पड़ा हुआ ईंट का टुकड़ा उठा कर दीवार पर लिखे नोटिस को रगड़रगड़ कर बिगाड़ने के बाद वे चले गए. हम ‘अरेअरे’ कहते रह गए.
शाम को महेशजी हमारा हाल और अपने ‘नोटिस’ का कमाल जानने के लिए आए और दीवार पर नजर डालते ही सब समझ गए.
उन्होंने हमें स्कूटर के पीछे बिठाया और पेंटर की दुकान की तरफ चल दिए.
अगले दिन दीवार पर नया नोटिस था, जिस में ‘इस जगह पर…’ के साथ कानूनी कार्यवाही करने की धमकी भी लिखी थी. ‘‘अब यहां सब ठीक रहेगा,’’ कह कर महेशजी ने हमारा कंधा थपथपाया.
उसी समय स्कूटर पर सवार कोई अपटूडेट नौजवान आया और स्कूटर को स्टैंड पर लगा कर हमारी और महेशजी की ओर पीठ फेर कर दीवार के पास जा कर चालू हो गया.
हम ने महेशजी का कंधा हिला कर उन्हें उस स्कूटर वाले की ‘हरकत’ दिखाई. वह हमारा हाथ थाम कर उस के स्कूटर के पास जा कर खड़े हो गए.
वह नौजवान मुसकराता हुआ हमारे पास आ कर खड़ा हो गया.
‘‘क्यों भाई, तुम ने वह चेतावनी नहीं पढ़ी?’’ हम ने सख्ती से पूछा.
‘‘तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे खिलाफ कानूनी कार्यवाही हो सकती है. तुम्हें पुलिस के हवाले किया जा सकता है…’’ महेशजी गुर्राए, ‘‘तुम गिरफ्तार किए जा सकते हो.’’
‘‘भाई साहब, मैं खुद पुलिस में हूं,’’ कह कर वह मुसकराया, ‘‘मैं आप से यह जानना चाहता हूं कि अगर आप किसी ऐसे मुलजिम को हमारे पास ले कर आते हैं, तो हम लोग उस के खिलाफ कौन सी धारा लगाएं?’’
महेशजी हमारी तरफ और हम महेशजी की तरफ ताकने लगे.वह पुलिस वाला अपने स्कूटर को ‘किक’ मार कर सवार हो गया और हाथ हिलाते हुए चल दिया.
‘‘घबराओ नहीं, इस बार ऐसा नोटिस लिखवाऊंगा कि कोई भी आप की दीवार के पास बैठने की जुर्रत नहीं करेगा,’’ कह कर महेशजी ने अपना स्कूटर स्टार्ट किया.
अगले दिन दीवार पर नया नोटिस था, ‘यहां पर छिपे हुए मूवी कैमरे से आप की फिल्म उतारी जा रही है’. इस नोटिस ने सचमुच कमाल का काम किया. हम ने कई लोगों को दीवार के पास आते, वहां बैठते और फिर नोटिस पर नजर पड़ते ही एकदम से उठ कर भागते हुए देखा. हम लोगों की बदहवासियों पर मुसकराते हुए महेशजी की अक्ल की दाद देने लगे.
‘‘ऐ भाई… क्या सोच रहा है? दरवाजे को ताला लगा और हमारे साथ थाने चल,’’ एक कांस्टेबल ने हमें पुरानी यादों से झकझोरा.
‘‘मगर, मेरा कुसूर क्या है?’’
‘‘कुसूर पूछता है?’’ सबइंस्पैक्टर ने हमारी ओर देखते हुए कहा, फिर अपने साथ खड़े कांस्टेबल की ओर मुंह फेरा, ‘‘मांगेराम, इस का कुसूर बता तो.’’
‘‘तेरा कुसूर यह है…’’ मांगेराम ने कहा, ‘‘कि तू ब्लू फिल्में बनाता है.’’
‘‘ब… ब्लू फिल्में. यह क्या कह रहे हैं आप?’’ हम ने हैरानी से कहा.
‘‘हम नहीं कहते…’’ दूसरे कांस्टेबल ने गरदन हिलाई.
‘‘तो फिर किसी ने आप को सरासर गलत सूचना दी है,’’ हम ने समझाया.
‘‘अरे, गलती किसी और को पढ़ाना. अपने घर की दीवार पर इतना बड़ा इश्तिहार लगवा रखा है और कहता है कि हमें गलत सूचना मिली है. तू थाने चल, तेरी गलती हम सुधारेंगे,’’ कह कर सबइंस्पैक्टर ने हमें धकेल दिया.
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टैक्नोलौजी बूम के इस दौर में ग्लोबल विलेज में तबदील होती दुनिया में शादियां भी तेजी से ग्लोबल होती जा रही हैं. अब अंतर्धार्मिक, अंतर्जातीय, अंतर्सांस्कृतिक, अंतर्राष्ट्रीय हर तरह की जोडि़यां बन रही हैं. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 5 फरवरी, 2018 को एक मामले के फैसले में साफ कह दिया है कि 2 वयस्कों की शादी में किसी तीसरे का दखल गैरकानूनी है. हालांकि विश्व के अन्य देशों में ऐसे कानून पहले से ही लागू हैं.
यों तो अमेरिका में भारतीय वर्षों से बस रहे हैं पर 1990 के बाद आए टैक्नोलौजी बूम के बाद अमेरिका में काफी संख्या में भारतीय आने लगे हैं. पुराने बसे भारतीयों की पहली पसंद की बहू तो भारतीय लड़की ही होती थी. पर 1990 के बाद अमेरिका आने वालों में से कुछ ने यहीं शादी की है. इन्हें अपनी शादी से संबंधित कुछ समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है. विशेषकर जब वे दूसरे धर्म या समुदाय में शादी करना चाहते हैं.
मातापिता की मानसिकता
अमेरिका में बसे भारतीय मूल के मातापिता, जिन की शादियां दशकों पहले हो चुकी थीं, उन में अंतर्जातीय लवमैरिज विरले ही होती थीं. दूसरे धर्म में शादी तो दूर की बात है. उनकी अरेंज्ड मैरिज होती थीं और ज्यादातर सफल ही होती थीं. इन में से लाखों ने सिल्वर जुबली, गोल्डन जुबली और कुछ ने डायमंड जुबली भी मनाई होंगी. उनकी मानसिकता अभी भी वही है कि जब हम अरेंज्ड मैरिज निभा सकते हैं तो हमारे बच्चे क्यों नहीं.
उन्हें डर है कि समाज क्या कहेगा या यह परिवार पर एक कलंक सा है. उन्हें लगता है कि अगर कोई बेटा या बेटी लवमैरिज करती है तो बाकी और परिवार के छोटे बच्चों की शादी में मुश्किल होगी, वे अपने बच्चों से काफी उम्मीद लगाए रहते हैं. उन्हें यह भी डर रहता है कि इस तरह की शादी से उनकी आशाएं धूमिल हो जाएंगी.
उनकी समझ में नहीं आ रहा है या वे समझना ही नहीं चाहते कि जमाना काफी बदल गया है. पहले वे पत्नी पर जिस तरह का दबाव रखते थे, आजकल की पढ़ी लिखी, कमाऊ बहू उसे बरदाश्त नहीं करेगी. यहां तक कि खुद उनके बच्चे भी अब ज्यादा स्वतंत्र होना चाहते हैं और अपनी खुशी से ही जीवनसाथी चुनना चाहते हैं.
अगर मातापिता नहीं मानते तो वे बगावत पर उतर आते हैं. चूंकि वे वयस्क हैं, इसलिए वे उनकी इच्छा के विरुद्ध लवमैरिज कर लेते हैं और कानून इसे मान्यता देता है. इस से मातापिता और बच्चों सभी को मानसिक क्लेश होता है, इस में दो मत नहीं हैं.
ज्यादातर मामलों में मातापिता भी आगे चल कर इन्हें स्वीकार कर लेते हैं. बच्चों की खुशी के लिए मातापिता शुरू से ही समझदारी दिखाएं तो रिश्तों में खटास की नौबत ही नहीं आएगी.
भावनात्मक लगाव में कमी
आधुनिकता और औद्दोगिकीकरण के युग में अभिभावक बच्चों को अपना ज्यादा समय नहीं दे पाते हैं. इसलिए बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से उनके जुड़े होने में कमी आती है और बच्चे बड़े होकर अपने साथी में यह आत्मीयता ढूंढ़ते हैं और अमेरिका की तो बात ही कुछ और है.
जो युवा विदेश खासकर अमेरिका में बस गए हैं वे यहां के मुक्त और स्वच्छंद समाज में रहने के आदी हो गए हैं. इन के बच्चे तो बचपन से एलिमैंट्री स्कूल से लेकर कालेज की पढ़ाई और नौकरी तक अमेरिकी कल्चर में करते हैं. इन्हें अपनी पसंद में जाति, धर्म या नस्ल का कोई बंधन स्वीकार नहीं होता है.
देखा गया है कि अमेरिका में लगभग 28 से 30 प्रतिशत एशियन गैरएशियन से शादी करते हैं जिन में काफी भारतीय भी होते हैं.
मिक्स्ड मैरिज
अमेरिकी इंडियंस शिक्षा और कमाई दोनों मामलों में औसत अमेरिकी या किसी भी औसत एशियन (चीनी, जापानी, वियतनामी आबादी) से काफी ऊपर हैं. इसीलिए अगर इन्हें दूसरे धर्मों की लड़कियां पसंद करें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है.
अमेरिका में भारतीय मिक्स्ड मैरिज हो रही हैं. इन जोडि़यों को सामाजिक, धार्मिक, भावनात्मक और दार्शनिक वातावरण में सामंजस्य बिठाना होता है. शुरू में एडजस्ट करने की समस्या होती है और फिर उनके होने वाले बच्चे किस धर्म से जुड़ेंगे, इस की समस्या आती है.
एक ऐसा उदाहरण देखने को मिला जिसमें एक हिंदू लड़की मुसलिम लड़के से प्यार करती थी. दोनों काफी दिनों तक एक दूसरे से मिलते जुलते रहे थे और दोनों में प्यार भी था. पर जब शादी की बात आई तो लड़की पर लड़के के माता पिता द्वारा कई शर्तें थोपी गई थीं कि उसे मुसलिम धर्म अपनाना होगा. होने वाले बच्चों के मुसलिम नाम होंगे और उसे बुरका पहनना होगा, नौकरी छोड़ कर लड़के के साथ विदेश जाना होगा. बेचारी लड़की पर क्या गुजरी होगी, आप समझ सकते हैं. वह पूरी तरह टूट गई थी और काफी दिनों तक उसे डिप्रैशन में रहना पड़ा था. अंतर्धार्मिक प्रेम और शादी करने से पहले एक बार युवावर्ग को भी ठीक से सोचना चाहिए.
एक दूसरे मामले में एक हिंदू लड़के ने एक अफ्रीकी अमेरिकी से शादी की थी. लड़के के माता पिता को शुरू में काफी आपत्ति थी कि उनकी अगली पीढ़ी भी अमेरिका में ब्लैक अमेरिकी कहलाएगी और समाज उसे निम्न स्तर का मानेगा.
एक ऐसा भी उदाहरण है जहां एक दक्षिण भारतीय कट्टर हिंदू लड़के ने अपने मातापिता की अनुमति से ईसाई धर्म की अमेरिकी लड़की से शादी की. जब लोगों ने पूछा कि ऐसा क्यों किया तो लड़के के मातापिता ने कहा, ‘‘हमारे बच्चे का जन्म ही अमेरिका में हुआ था. शुरू से वह इसी संस्कृति में पला, तो हम उस से पुराने रीतिरिवाज की उम्मीद नहीं रखते हैं.
इतना ही नहीं, वे अपनी बहू से बहुत खुश हैं. उनके दोनों पोतों में एक का नाम हिंदू और एक का क्रिश्चियन है. परिवार में दोनों धर्मों के त्योहार मनाए जाते हैं.
अमेरिका में एक तरफ कुछ आप्रवासी भारतीय हिंदू भारतीय पत्नी को बेहतर चौइस मानते हैं. उनका कहना है कि भारतीय नारी कितनी भी पढ़ीलिखी और कमाऊ क्यों न हो,
वह पति के प्रति वफादार होती है और नौकरी करते हुए भी पारिवारिक जिम्मेदारियां बखूबी निभाती है. वहीं दूसरी तरफ, अमेरिका में जन्मी और पलीबढ़ी भारतीय मूल की लड़कियां अमेरिकी बौयफ्रैंड को बेहतर मानती हैं. उनका मानना है कि ज्यादातर भारतीय अभी भी पुरानी सोच वाले हैं जो पत्नी और बहू को दासी समझते हैं.
एक और अमेरिकी भारतीय हिंदू लड़की, जिसका पति अमेरिकी क्रिश्चियन है, भी अपने पति से बहुत खुश है. उस ने हिंदू और क्रिश्चियन दोनों रीतियों से शादी है. उस के बच्चों के हिंदू नाम हैं. उस का पति भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म का बहुत आदर करता है. वह भी अमेरिकन सोसाइटी की उतनी ही इज्जत करती है.
नई पीढ़ी के कुछ भारतीय बच्चों से जब पूछा कि आप के मातापिता को जब गैरभारतीय बौयफ्रैंड या गर्लफ्रैंड पसंद नहीं हैं तो आप क्यों नहीं कोई भारतीय साथी चुनते हो तो उनका निर्भीक उत्तर था, ‘‘उन्होंने अपनी खुशी और कैरियर के लिए देश क्यों छोड़ दिया था. भारतीय संस्कृति की इतनी चिंता थी, तो हमें भी वहीं पैदा किया होता. अब जब हमारी खुशी का मौका आया तब वे दखल दे रहे हैं. आप उन्हें समझाएं, हमें नहीं.’’
समानता की सोच
अमेरिका में रहने वाली मैरी कोल्स बताती है कि उस का हैंडसम, ब्राइट और दिलफेंक भाई स्टीव एक बंगाली युवती शेफाली से शादी कर रहा है जो कालेज में उस की जूनियर थी.
दोनों की एक फोटो दिखाते हुए मैरी ने बताया कि कैसे पुराना परिचय दोस्ती में बदला, फिर डेटिंग शुरू हुई और सालभर के भीतर ही मंगनी के बाद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया.
मैरी ने बताया, स्टूडैंट वीजा के बाद 2 वर्षों के वर्क वीजा पर नौकरी करते हुए अमेरिकी नागरिक से शादी करके ओ ग्रीनकार्ड मिल जाएगा तो वापस भारत नहीं लौटना पड़ेगा. उच्चशिक्षा के लिए अमेरिका आने वाले बहुत से युवा ऐसा करने के बाद कालांतर में अमेरिकी नागरिक बन जाते हैं.
शेफाली के निर्णय के पीछे उस के जो भी निजी कारण रहे हों, अमेरिका में भारतीय मूल के अधिकांश परिवारों की बेटियां भी अमेरिकी वर चुनती हैं अपवाद की बात अलग. लेकिन पुरुषप्रधान आम भारतीय परिवारों की गृहिणी को ही गृहस्थी का अधिक बोझ उठाते देख कर शिक्षित और प्रोफैशनल रूप से महत्त्वाकांक्षी बेटी को अमेरिकी या अमेरिकी मानसिकता वाले युवक में वांछित जीवनसाथी दिखता है. ऐसा जीवनसाथी जो घर के हर छोटेबड़े काम में स्वेच्छा से बराबर का साझेदार होगा.
स्थायित्व की संभावना
विदेशों में बसने वाले भारतीय युवाओं को लगता है कि विदेशी पत्नी होने से वहां के समाज में उन्हें और उनकी संतान को प्रतिष्ठा मिलेगी.
फूड साइंटिस्ट डा. त्रिवेणी शुक्ला और उनकी पत्नी गिरिजा अमेरिका में अपने दशकों पुराने प्रवास के दौरान पूर्वी और पश्चिमी संस्कारों में सुंदर सामंजस्य स्थापित करते रहे.
अन्य भारतीय परिवारों की तरह शुक्ला दंपती की अपने बच्चों से भी यही उम्मीद थी. उनकी दोनों बेटियों और पुत्र ने अमेरिकी जीवनसाथी चुने तो मित्रों और स्वजनों में भारी आलोचना स्वाभाविक थी.
कोलंबिया यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद बड़ी बेटी रेखा ने सोच रखा था कि वह अपनी शैक्षिक और प्रोफैशनल महत्त्वाकांक्षा को विवाह जैसे अहम निर्णय पर हावी नहीं होने देगी. आज 2 दशकों बाद शुक्ला परिवार के शुभचिंतक इस विवाह को आदर्श मानते हैं.
पौलिसी राइटर रेणु शुक्ला और फाइनैंस डायरैक्टर एरिक जरेट््स्की अमेरिकी मुख्यधारा की 2 उच्छवल तरंगें मिल कर सशक्त प्रवाह बनीं.
उत्तर प्रदेशीय ब्राह्मण परिवार में जन्मी और पलीबढ़ी सुकन्या के संस्कार परंपराबद्ध से अधिक बौद्धिक हैं. वर्षों पहले हिंदू परिवार में जन्मे एक नवयुवक से परिचय भी हुआ था किंतु वैचारिक परिपक्वता के स्थान पर केवल धर्म और संस्कारों की समानता मेलजोल बढ़ाने का कारण न बन सकी.
पीस कोर के लिए वौलंटियर करने के दौरान एरिक जरेट्स्टकी की भी दोस्ती एक भारतीय युवती से हुई थी लेकिन वैचारिक अनुकूलता का अभाव था. यहूदी परिवार के पुत्र एरिक और ब्राह्मण पुत्री रेणु में समान बौद्धिक स्तर प्रथम आकर्षण का कारण बना और दोस्ती प्यार में बदली, प्यार विवाह में. यहूदी धर्मगुरु और ब्राह्मण पिता ने मिल कर विवाह संपन्न करवाया. दोनों के परिवार व बच्चे एकदूसरे के कल्चर को लेकर सम्मान का भाव रखते हैं.
कुछ ऐसी ही कहानी राजन शुक्ला और विक्टोरिया की है. राजन शुक्ला ने बताया कि विक्टोरिया से अधिक उन्हें उस के पिता ने प्रभावित किया था. राजन के सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण और जिंदादिली ने विक्टोरिया का दिल जीत लिया था. विवाह के निर्णय से पहले दोनों के ही मन में असंख्य सवाल थे जिन्हें दोनों ने ताक पर रख दिया.
त्रिवेणी शुक्ला हंस कर कहती हैं कि विवाह बेटेबेटियों का ही नहीं, शुक्ला विक्टर और जरेट्स्की परिवारों का भी हुआ है. जब भी सब जुटते हैं, यूनाइटेड नैशंस बन जाता है.
आंचलिक विस्कौन्सिन के प्रबुद्ध मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी जेसिका एक नामी बुकस्टोर में पार्टटाइम काम कर रही थी. भारत के स्वाधीनता संग्राम के प्रणेता परिवार के पुस्तकप्रेमी प्रपौत्र विष्णु की पोस्ंिटग निकटवर्ती उपनगर में थी और वह नियम से बुक्स्टोर में आता था. जेसिका से उस का परिचय हुआ और परवान चढ़ी. परिचयसूत्र में बंधने के बाद नौकरी के सिलसिले में दोनों जापान, फिनलैंड और फिर अमेरिका में कुछ वर्ष रहे.
जेसिका को आभास हुआ कि सास के हृदय में अपनी जगह बनाने के लिए उसे पहल करनी पड़ेगी. उस की सास महिला अधिकारों की प्रबल समर्थक रहीं और भारतीय प्रशासनिक सेवा से रिटायर हुईं. जेसिका ने हर वर्ष अकेले भारत जा कर कुछ समय ससुराल में बिताने का निश्चय किया.
जेसिका के दूसरे बेटे का जन्म विष्णु की भारत में पोस्टिंग के दौरान हुआ जहां वे मातापिता के निकट घर लेकर रहे. छोटे पौत्र के जन्म के बाद सास ने हफ्तेभर नवप्रसूता को अपने पास रख कर देखभाल की. जेसिका को गर्व है कि उनकी सास अपने साथ एक अलग तरह का संबंध जोड़ने के लिए पूरा श्रेय उसे देती हैं. विष्णु की तरह बहुत कम पति मां और पत्नी के बीच बंटने की दुविधा से मुक्त रह पाते हैं विशेषकर तब, जब विवाह अंतर्जातीय ही नहीं, अंतर्सांस्कृतिक भी हो.
दादी में अल्जाइमर्स के लक्षण दिखने लगे तो पतिपत्नी से साहस जुटा कर बड़े बेटे को पिछले साल क्रिसमस की छुट्टियों में दादी के पास रहने के लिए अकेले भारत भेजा, इस विचार से कि बालक पीढ़ी बुजुर्गों की सुखद स्मृतियां भरसक संजो सके.
क्याक्या समस्याएं
वैसे तो अपने देश में अरेंज्ड मैरिज में शुरू में एडजस्टमैंट में कुछ दिक्कतें आती हैं, पर मिक्स्ड मैरिज में कुछ ज्यादा एडजस्टमैंट की आवश्यकता है. मातापिता को डर रहता है कि अब परिवार का संस्कार, रीतिरिवाज खतरे में पड़ जाएंगे. हर परिवार की एक अलग परंपरा, लाइफस्टाइल, संस्कार होते हैं जिन का सम्मान दोनों को करना है.
मिक्स्ड मैरिज के बाद अकसर दोस्त, परिवार और समाज से दूरी या बहिष्कार का भय रहता है. कभीकभी एकदूसरे के त्योहारों व बच्चों की परवरिश को लेकर झगड़े होने लगते हैं जो तलाक तक पहुंच जाते हैं और इनका खमियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है. इसके लिए एक पक्ष अगर आक्रामक है तो दूसरे पक्ष को संयम बरतना चाहिए और यथासंभव रिश्तों को टूटने से बचाना चाहिए.
मातापिता को ऐसी मिक्स्ड मैरिज को सहर्ष स्वीकार करना सीखना होगा. विश्व ग्लोबल विलेज बन रहा है तो इसके वासियों की मानसिकता भी वैश्विक होनी चाहिए. वैचारिक परिपक्वता और पारिवारिक मूल्य ही दीर्घ व सुखी दांपत्य के स्रोत हैं.
कितने निभते हैं अंतर्राष्ट्रीय विवाह
पिंरसटन के रहने वाले जौर्ज दंपती ने 30 वर्षों से वहां रहने वाले परमविंदर भाटिया की बेटी शिवांगी से अपने बेटे सैम की शादी बड़ी धूमधाम से की. एमबीए शिवांगी ने अपनी सहूलियत से ऊपर उठकर उनसे निभाना चाहा पर वे हमेशा उसके खानपान व क्रिकेट प्रेम की आलोचना बड़ी कटुता से करते हुए उसकी निजता पर प्रहार करते रहे. आखिर शिवांगी ने अलग होने का फैसला ले लिया. ऐसी भी शादी क्या, जहां उस के कल्चर का मजाक उड़ाया जाए.
न्यू जर्सी के फ्रैंकलिन स्ट्रीट में रहने वाले केरलवासी गिरीश दंपती के बड़े बेटे ने अमेरिकी लड़की से शादी तो करली पर कटु आलोचनाओं से बचने के लिए वह घर से थोड़ी दूर पर ही दूसरे फ्लैट में रहने लगा. लेकिन छोटा बेटा जिसने एफ्रो अमेरिकी लड़की से शादी की थी, उन्हीं लोगों के साथ रह रहा था. एक दिन मिसेज गिरीश की अपने बहूबेटे के साथ बहुत कहासुनी हुई. बहू ने पुलिस को खबर कर दी. दोनों मांबेटे को पुलिस पकड़ कर ले गई. रातभर लौकअप में रखा. बात इतनी सी थी कि बेटेबहू ने अपने कुछ दोस्तों को बुला कर घर में पार्टी रखी थी. होहल्ला को वे बरदाश्त नहीं कर पाए और तूतूमैंमैं कर बैठे.
प्रताड़ना का पेंच
40 वर्षों से एडीसन में रहते पटेल दंपती की बेटी डा. प्रिया ने जौन से प्रेमविवाह किया था. दोनों न्यू जर्सी के प्रख्यात अस्पताल रौबर्ट वुड में साथसाथ काम करते थे. जौन का व्यवहार दूसरी महिला कर्मचारियों के साथ बड़ा ही उन्मुक्त था. जब भी प्रिया जौन को महिलाओं से दोस्ती की सीमाएं बताती, वह नाराज होकर भारतीय संस्कृति, परंपराओं, रहनसहन, खानपान का मखौल उड़ाने पर उतर आता था. मानसिक रूप से प्रताडि़त करने के बाद जब जौन शारीरिक हिंसा पर उतर आया तो प्रिया अपनी सोच पर प्रहार नहीं झेल पाई और उस से अलग हो गई. उनका 3 साल का बेटा शेरील प्रिया के पास रहता है क्योंकि वहां, भारत के विपरीत, बच्चों की गार्जियन मां ही होती है.
जमशेदपुर, झारखंड की रहने वाली वीणा पाठक की अमेरिकन बहू एलिस को 3 बच्चे, 2 लड़के और 1 लड़की एकसाथ हुए तो वह उखड़ गई. हैरिसन स्ट्रीट में रहते भारतीय परिवारों से वे जब भी, जहां भी मिलती, यह कहने से नहीं चूकती, ‘‘पता नहीं ये अमेरिकन लड़कियां खाती क्या हैं कि राक्षस की तरह 3-4 बच्चे एकसाथ पैदा कर लेती हैं. अंडा, मछली, गाय, भेड़, बकरी, सूअर सब के कलेजे खाती हैं. मुझे तो यहां पानी पीने से भी वितृष्णा होती है. पता नहीं, मेरे बेटे को यह कैसे भा गई. मैं तो जाने के दिन गिन रही हूं.’’
अमेरिका में रहने वालों के लिए यह कोई नई बात नहीं है. वहां फैशन के कपड़ों की तरह अपनी सहूलियत के अनुसार जीवनसाथी बदले जाते हैं. अलग होने की कानूनी प्रक्रिया भारत की तरह जटिल व उबाऊ नहीं है.
अगर अमेरिकन अंगरेजी में ताना मारते हैं तो भारतीय भी मुंह से हिंदी अंगरेजी दोनों में उस से बढ़कर आग उगलने से नहीं चूकते हैं. इन की सोच के तरकश में घृणा से बुझे शब्दों के ऐसे तीर होते हैं कि मन छलनी हो जाता है. चूंकि उस देश में कानून दूसरे देशवासियों के लिए भी समान है, सो, उसका लाभ भारतीय भी कम नहीं उठाते.
सुखी वैवाहिक जीवन
इसके विपरीत कितने ही अमेरिकन परिवारों की भारतीय बहुओं के साथ अच्छी निभ रही है. पेनसिल्वेनिया के डा. शिशिर प्रसाद की बेटी मेघा थौमसन परिवार की बहू है. प्रजनन संबंधी जटिलताओं के कारण जब वह मां नहीं बन सकी तो उसने भारत आ कर पुणे के एक अनाथालय से जुड़वां बच्चियों को गोद लिया. कानूनी कार्यवाही के लिए उसे न जाने कितनी बार भारत आना पड़ा. पति अलबर्ट, जो वहां साइंटिस्ट हैं, का पूरा साथ था कि यहां की जटिल कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करके यहां से बच्चियों को वह अमेरिका ले जा सकी. आज दोनों बच्चियां 18 साल की हो गई हैं और मां से ज्यादा अपने डैडी से घुलीमिली हुई हैं. इसी को नियति कहते हैं.
मिलबर्न स्ट्रीट में रहने वाले फिजिक्स के साइंटिस्ट डा. सतीश प्रसाद, जो मेघा के चाचा हैं, ने अपनी तीनों बेटियों की शादियां अमेरिकन परिवारों में की हैं. तीनों लड़कियों का वैवाहिक जीवन बहुत ही सुखी है. 2 वर्षों पहले सभी भारत आए थे. वहां पतिपत्नी दोनों नौकरी करते हैं और अपनी सुविधानुसार ही रहते हैं, लेकिन अवसरों पर वे एकदूसरे के फैमिली मैंबर से प्रेमपूर्वक अवश्य मिलते हैं.
सालों से न्यूयौर्क में रहते डा. सुधांशु की बेटी रिया ने पीटर से प्रेमविवाह किया और आज उनके 2 बच्चे हैं. हर साल क्रिसमस में पीटर का पूरा परिवार नए साल के आगमन तक न्यूयौर्क में ही अपनी बहू के यहां रह कर वहां के सैलिब्रेशंस का आनंद उठाते हैं. डाक्टर के बेटेबहू निसंतान हैं. वे रिया के दोनों बच्चों को बहुत प्यार करते हैं.
होबोकन में रहते डा. रीता प्रसाद और डा. सुधीर प्रसाद की बहू और दामाद दोनों अमेरिकन हैं. उन से मिल कर कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि 2 विपरीत सभ्यताओं और संस्कृतियों का मिलन है. सभी पेशे से डाक्टर हैं और मिलजुल कर रहते हैं. अमेरिकन और इंडियन परिवारों, जहां ऐसे रिश्ते बने हैं, से मिलने पर यही निष्कर्ष निकला कि ऐसे रिश्तों को निभाने में अमेरिकियों से ज्यादा इंडियन असहनशील हैं. अमेरिकियों को भारतीय सभ्यता संस्कृति से जुड़े सारे रिवाज बहुत भाते हैं. वे हर त्योहार, पहनावे, खानपान का लुत्फ उठाते हुए उत्सुकता के साथ खुशी से मनाते हैं
देसी बनाम विदेशी शादियां
जहां एक ओर भारतीय युवतियां विदेशी युवाओं से शादी कर खुश नजर आती हैं वहीं भारतीय युवाओं की शादियां विदेशी युवतियों के साथ असफल नजर आईं. अपना नाम और पता गुप्त रखने की शर्त पर गुरुग्राम के भरत (बदला हुआ नाम और स्थान) ने लिथुआनियन लड़की से विदेश में बस जाने की चाह में अपने मातापिता की मरजी से उनकी उपस्थिति में शादी की, लेकिन एक साल के भीतर ही उसका तलाक हो गया जबकि उस की एक नन्ही बच्ची भी है.
दिल्ली के पश्चिमपुरी के विजय (बदला हुआ नाम और स्थान) की भी ऐसी ही कहानी है. इन्होंने भी लिथुआनियन लड़की से विदेश में बस जाने की चाह में 10 साल पहले शादी की थी. इन के 7 और 9 साल के 2 बेटे हैं, लेकिन अब वे तलाक लेना चाहते हैं.
इन दोनों भारतीयों की शादी असफल होने के कारण एकजैसे ही हैं. इन्होंने बताया कि विदेशी लड़कियां शादी के बाद न तो परिवार के लोगों को अपनाना चाहती हैं और न ही भारत आना चाहती हैं. इसके अतिरिक्त अपना पैसा, अपना खर्च, अपना काम जैसा विभाजन कर घर चलाने और उनकी जीवन जीने की स्वछंद शैली से आएदिन घर में कलह का माहौल बनता है, जिस से आखिरकार तलाक की नौबत आ जाती है.
श्रुति के पिता कमलजीत सिंह चौहान से बातचीत
आप की बेटी श्रुति चौहान कहां रहती है, उस की शिक्षा कहां से हुई थी?
हमारी बेटी इटली में रहती है. उस ने दिल्ली के गार्गी कालेज से बीए औनर्स वर्ष 2003 में किया था.
वह विदेश कैसे गई थी?
उस ने वर्ष 2003 में मिस इंडिया कौन्टैस्ट में भाग लिया था और वह कौन्टैस्ट के अंतिम चरण के 5वें नंबर पर चुनी गई थी. इन्हीं दिनों उसे फ्रांस दूतावास ने कल्चरर्स ऐक्सचेंज के तहत फ्रांस आने का निमंत्रण दिया और वह फ्रांस चली गई. उस का झुकाव शुरू से मौडलिंग की ओर था. उसे इटली की एक कंपनी से वहां मौडलिंग का औफर मिला और वह वहां से इटली चली गई. इटली में उस ने मैनेजमैंट औफ लग्जरी गुड्स में पोस्टग्रेजुएट की शिक्षा प्राप्त की.
श्रुति की शादी किससे और कहां हुई, क्या यह शादी परिवार की सहमति से हुई है?
श्रुति की शादी इटली के मिस्टर जिवोनी कोसोलीटो से हुई है. इटली के मिलान शहर में उन दोनों की दोस्ती हुई. पहले हम उस के साथ कल्चरल डिफरैंस के चलते शादी के खिलाफ थे.
आप लोग हिंदू हैं, क्या धर्म से संबंधित कोई परेशानी श्रुति को शादी के बाद झेलनी पड़ी?
श्रुति की शादी एक रोमन कैथोलिक ईसाई परिवार में हुई है, लेकिन न तो कभी लड़के ने और न ही कभी उस के परिवार वालों ने उसे धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला. श्रुति तो दोनों धर्मों के त्योहार अपनी ससुराल वालों के साथ मनाती है. उस का एक बेटा भी है और वह इस विदेशी परिवार के बीच बेहद खुश है. मैं और मेरी पत्नी उस के पास कभी 6 महीने, कभी सालभर रह कर आते हैं.
मोयना की मां लीना से बातचीत
आप की बेटी कहां रहती है, वह विदेश कैसे गई थी?
मेरी बेटी आजकल लंदन में है. वह उच्चशिक्षा के लिए ब्रिटेन गई थी. उस ने पहले एडनबरा से एमए (इंग्लिश) किया, फिर लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स से मीडिया ऐंड कम्युनिकेशंस की शिक्षा प्राप्त की.
मोयना की शादी किस से और कहां हुई, क्या यह शादी परिवार की सहमति से हुई है?
मोयना की शादी ईसाई परिवार के ब्रिटिशमूल के नागरिक से हुई है. शादी से पहले लंदन में एक ही कंपनी में कार्य करने के दौरान इन की दोस्ती हुई थी. फिर दोनों परिवारों की सहमति से इन की शादी हुई है.
आप लोग हिंदू हैं, क्या धर्म से संबंधित कोई परेशानी मोयना को शादी के बाद झेलनी पड़ी?
मोयना को कभी भी किसी ने धर्म बदलने के लिए दबाव नहीं डाला और न ही उस ने अपना धर्म बदला है. परिवार के सभी सदस्य छुट्टियों के दौरान आपस में मिलतेजुलते हैं. हम भी लंदन उनके परिवार से मिलने अकसर जाते हैं और उनके परिवार के लोग भी भारत हमारे पास आते रहते हैं. मोयना इस परिवार में शादी कर बेहद खुश है.
आप्रवासी भारतीय शादियों में धर्म का धंधा
आप्रवासी भारतीयों के विवाह में धर्म ने पीछा नहीं छोड़ा है. विदेशों में बसे भारतीय परिवार बड़ी संख्या में दूसरे समाजों में शादी रचा रहे हैं. भारतीय हिंदू युवकयुवतियां विदेशी ईसाई, यहूदी, मुसलिम धर्म में विवाह तो कर लेते हैं पर दोनों अपनेअपने धर्म, आस्था को छोड़ नहीं पाते. आप्रवासी शादियों में अलगअलग सामाजिक, धार्मिक वातावरण के बावजूद धर्म की मौजूदगी देखी जा सकती है. ये परिवार धार्मिक अंधविश्वासों को नहीं छोड़ पाते.
भारतीय ही नहीं, हर देश की विवाह संस्था में धर्म एक जरूरी हिस्सा है. अकेले अमेरिका में लगभग 20 लाख प्रवासी भारतीय हिंदू आश्रमों, मंदिरों, गुरुद्वारों की जीवनशैली अपनाए हुए हैं. प्रवासी भारतीय दूसरे धर्म, संस्कृति में विवाह तो कर लेते हैं पर उनकी विचारधारा, विश्वास, रीतिरिवाज, सामाजिक पद्धति के भेद दृढ़ता के साथ अपनी जगह मौजूद रहते हैं. वे इन्हें छोड़ नहीं पाते.
विदेशों में इस तरह के अंतर्धार्मिक विवाह अकसर चर्चों या धर्मस्थलों में संपन्न होते हैं और इन शादियों में पादरी, मुल्लामौलवी, पंडित की उपस्थिति जरूर रहती है. अमेरिका, यूरोप में अधिकांश विवाहों में पादरी, भारतीय पंडे, मौलवी विवाह के लिए विधिवत रूप से नियुक्त होते हैं. कुछ अन्य कानूनी अधिकारी भी होते हैं पर धर्म के इन बिचौलियों के कहने से ही विवाह की रस्में निभाई जाती हैं.
विवाह 2 व्यक्तियों के कानूनी रूप से एकसाथ रहने केलिए सामाजिक मान्यता है पर धार्मिक रीतिरिवाज से किए गए विवाह को अधिक सामाजिक मान्यता प्राप्त होती है, कानूनी विवाहों को इतनी नहीं होती. प्राचीन यूनान, रोम, भारत आदि सभी सभ्य देशों में विवाह को धार्मिक कर्तव्य बताया गया है. विवाह का धार्मिक महत्त्व प्रचारित करने से ही अधिकांश समाजों में विवाह विधि धार्मिक संस्कार मानी जाती रही है.
इस तरह से आप्रवासी धर्म का धंधा चला रहे हैं. भारत से गए कुछ लोगों ने लिखा भी है कि भारत से आने वाले परिवार कुछ सामान, जरूरी चीजों के साथ रामायण, गीता साथ लाए थे यानी विदेशों में बसे भारतीय धर्म की पूरी गठरी ले गए थे और अपनी अलग धार्मिक पहचान बनाने में जुटे रहे.
हालांकि अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों में विवाह के लिए कानून बहुत उदार हैं और मैरिज अफसर के पास जा कर सीधे शादी कर सकते हैं, लेकिन फिर भी विवाह करने वाले दंपती और उनके परिवार धर्म की शरण में जाना अनिवार्य समझते हैं. रोमन कैथोलिक चर्च अब तक विवाह को धार्मिक बंधन समझता है.
यहूदियों की धर्मसंहिता के अनुसार, विवाह से बचने वाला व्यक्ति उनके धर्मग्रंथ के आदेशों का उल्लंघन करने के कारण हत्यारे जैसा अपराधी माना जाता है. रोमनों का भी यह विश्वास था कि परलोक में मृत पूर्वजों का सुखी रहना इस बात पर निर्भर करता है कि उनका विवाह संस्कार धार्मिक विधि से हो तथा उनकी आत्मा की शांति के लिए उन्हें अपने वंशजों की प्रार्थनाएं, भोज और भेंटें यथासमय मिलती रहें. इस तरह मिश्रित विवाहों में धर्म का धंधा खूब कामयाब है.
धर्म का भेद बुनियादी है और इसी से समस्याएं पैदा होती हैं. जोडि़यां अलगअलग धार्मिक, सामाजिक वातावरण से आती हैं. यूथ अपनी अलग संस्कृति में रगेपगे होते हैं. विवाह के लिए वे धर्म के रिवाजों का दामन थामे रखते हैं.
शिक्षा, सूचना, प्रौद्योगिकी, विज्ञान व उद्योग के क्षेत्र में बड़ी प्रगति के बावजूद प्रवासी समाज अभी भी दकियानूस बना हुआ है. दकियानूसी आप्रवासियों के बल पर विदेश में धर्म का धंधा चलता रहता है.
विक्टोरिया फ्रैंक और राजन शुक्ला के विवाह ने 2 भिन्न परिवारों, संस्कृतियों को मिला कर नई मौलिकता दिखाई.
दुनियाभर के प्रवासियों में भारतीय नंबर वन
करीब 3 करोड़ से भी अधिक प्रवासी भारतीय दुनिया के कोनेकोने में सफलतापूर्वक व्यवसाय व नौकरी कर अपने परिवार के साथ रह रहे हैं. अपनी मेहनत, अनुशासन, कानून अनुसरणता और शांत स्वभाव के चलते विदेशों में रह रहे भारतीयों को अन्य आप्रवासी समुदायों के लिए रोल मौडल की तरह पेश किया जाता है.
यह संख्या अन्य देशों के प्रवासियों के मुकाबले सब से ज्यादा है. सबसे अधिक संख्या में पंजाबी, गुजराती, बिहारी, तमिल, तेलुगू समुदायों और उत्तर प्रदेश के लोगों ने विदेशों में पलायन किया है.
आज भारतीय लोग मुख्यरूप से यूके, यूएसए, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशो में जा कर बसना पसंद कर रहे हैं. यूएसए, यूके, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, यूएई, कतर, सिंगापुर, फिजी, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, केन्या, मौरीशस, सेशल्स, मलयेशिया में फैले भारतीय प्रवासी अन्य प्रवासियों से आंकड़ों के लिहाज से सबसे ऊपर हैं. सिर्फ बड़े देशों में ही नहीं, बल्कि कुक आइलैंड, किरिबाली, समोआ, पोलिनेसिया व माइक्रोनेसिप जैसे अपेक्षाकृत कम चर्चित देशों में भी भारतीय प्रवासियों की तादाद खासी है.
दुनिया के करीब 208 देश ऐसे हैं जहां भारतीय आबादी है. विदेश मंत्रालय, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक, 3 करोड़ 8 लाख 40 हजार भारतीय 208 देशों के या तो स्थायी निवासी हैं या वहां रह रहे हैं. यह संख्या भारत में कई बड़े राज्यों की कुल आबादी से भी अधिक है. दिलचस्प बात तो यह है कि भारत समेत 45 देश ही ऐसे हैं जिन की कुल जनसंख्या विदेशों में बसे भारतीयों से ज्यादा है.
आकर्षक रोजगार और बेहतर भविष्य की संभावनाएं जहां ज्यादा दिखती हैं, भारतीय वहां बस जाते हैं. शायद इसीलिए सर्वाधिक यानी 86 लाख 40 हजार भारतीय पश्चिम एशियाई देशों और 60 लाख 30 हजार लोग दक्षिणपूर्व एशिया में हैं. दक्षिण एशिया के देशों में भी भारतीयों की संख्या 23 लाख 20 हजार है. दक्षिण एशिया के देशों में रहने वाले ज्यादातर भारतीय लेबर क्लास के हैं, जबकि उत्तरी अमेरिका में टैक्निकल लोगों की खासी मांग है और इस मांग को पूरा करने में 54 लाख 80 हजार भारतीय हिस्सेदारी निभा रहे हैं.
यूरोपीय देशों की बात करें तो रिपोर्ट बताती है कि उत्तरी यूरोप के देशों में करीब 19 लाख 10 हजार भारतीय हैं तो पश्चिमी यूरोप में उनकी संख्या 5 लाख 40 हजार और दक्षिण यूरोप में 3 लाख 40 हजार है. पूर्वी यूरोप के देशों तक में 50 हजार भारतीय प्रवास कर रहे हैं, जबकि अफ्रीकी देशों में भी भारतीयों की संख्या 31 लाख से ज्यादा है. लैटिन अमेरिका व कैरेबियाई देशों में 12 लाख 10 हजार भारतीय हैं.
अपना देश छोड़ कर दूसरे देशों में रहने वालों में सब से ज्यादा भारतीय हैं. इसके बाद मेक्सिको, रूस, चीन, बंगलादेश, पाकिस्तान, फिलीपींस, अफगानिस्तान, यूके्रन तथा ब्रिटेन शीर्ष 10 में हैं.
एक और दिलचस्प रिपोर्ट आई है जिस के मुताबिक दुनिया के देशों में इंडियन सिर्फ आबादी में ही सब से आगे नहीं हैं बल्कि प्रवास के दौरान अपने देश में पैसा भेजने में भी अव्वल हैं. विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि प्रवासी भारतीयों ने वर्ष 2017 में करीब 72 अरब डौलर भारत भेजे. 64 अरब डौलर के साथ चीन के प्रवासी दूसरे स्थान और फिलीपींस (30 अरब डौलर) के साथ तीसरे?स्थान पर हैं.
यह अलग बात है कि आज भी प्रवासी भारतीयों के साथ नस्लभेद की घटनाएं सुनने को मिलती रहती हैं. आस्ट्रेलिया में जहां भारतीय स्टूडैंट्स को पीटा जाता है वहीं अमेरिका में रैड डौट रेसिस्ट गु्रप का काला इतिहास है.
और तो और, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी भारतीय आईटी पेशेवरों की राह में एच-1 वीजा की आड़ में मुश्किलें पैदा कर रहे हैं. रंग और नस्लभेद की तमाम रुकावटों को पार करते हुए भारतीय आज दुनियाभर में अगर सीना तान कर जीवनयापन कर रहे हैं, तो वह उनकी अपनी मेहनत है.
शकुंतला सिन्हा के साथ इंदिरा मितल, सुरेश चौहान, जगदीश पंवार, राजेश कुमार और रेणु श्रीवास्तव.
VIDEO : टिप्स फौर लुकिंग ब्यूटीफुल एंड अट्रैक्टिव
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