भविष्य की तकनीक पर युवा रखें नजर

भारतीय जनता पार्टी ने देश पर एकछत्र राज तो स्थापित कर लिया है पर वह अभी भी युवाओं के मन में वह उत्साह पैदा नहीं कर पाई है जो आमतौर पर चुनाव पर चुनाव जीतने वाले नरेंद्र मोदी जैसे सफल नेता पैदा कर देते हैं. देश की युवा पीढ़ी हर रोज नए खतरों की आहट सुन रही है. जब दुनिया तकनीक व नए कुशल प्रबंधन के आयाम देख रही है, हमारी सुर्खियों में पेरियार व अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ने, लवजिहाद के नाम पर हमले, पद्मावत जैसी फिल्मों पर विवाद, नीरव मोदी जैसे बेईमानों, गौरक्षा के नाम पर हत्याओं, मंदिर की जिद आदि की कानफोड़ू आवाजें सुनाई देती हैं.

कल आज से बेहतर होगा ऐसा लगता ही नहीं है क्योंकि दुनिया की नई तकनीक पर हमारा भरोसा केवल इतना है कि हम उसे खरीद सकते हैं, बना नहीं सकते. विदेशी बाहर से आ कर कारखाने लगा लें, अपने मैनेजर ले आएं और मुगलों व अंगरेजों की तरह हमारे युवाओं को नौकर रख कर काम करा लें. इतना भर दिख रहा है.

भारतीय जनता पार्टी की लगातार चुनावी जीतों से साफ है कि देश के एक बड़े वर्ग की रुचि पिछले कल में है, अगले कल में नहीं. लोग पाखंड और झूठ के इतने आदी हो चुके हैं कि उन्हें सच साबित करने के लिए न केवल झूठ का सहारा लेना पड़ रहा है, बल्कि वे झूठ पर आधारित सरकारों का अंधा समर्थन भी कर रहे हैं. अगर आज का युवा परीक्षाओं में नकल पर ज्यादा जोर दे रहा है तो इसलिए कि उसे मालूम है कि इस झूठ के बल पर मिली नौकरी में वह मजे में पूरी जिंदगी निकाल देगा. इस तरह वह झूठ पर झूठ बोल सकता है और निकम्मा रह कर भी कमाऊ बन सकता है. देश के खून में तो सदियों से झूठ के विषाणु रहे हैं पर आज जब उस का इलाज संभव है तब भी कोई, कहीं दवा की चिंता नहीं कर रहा है.

अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों की तरह भारत अनाचार और अत्याचार का मुख्य केंद्र बनता जा रहा है. 10-15 वर्षों पहले जिस भारत ने बेंगलुरु के माध्यम से विदेशी गोरों को भयभीत कर दिया था, लेकिन अब वे ही किसी दिन इन्फोसिस और टाटा कंसल्टैंसी जैसी भारतीय कंपनियों को खरीद ही न लें, यह डर लगने लगा है.

देश के युवाओं को आज पुरातन का जो जबरन पाठ पढ़ाया जा रहा है, वह जो थोड़ीबहुत प्रगति हम ने देखी थी उसे लील जाएगा. देश का युवा आगे की न सोच कर, भगवा दुपट्टे के सहारे चौराहे पर खड़ा हो कर, पुराने को फिर से स्थापित करना चाह रहा है. क्या नई डिगरियां चोटी, तिलक के सहारे ही मिलेंगी? नए चुनावी परिणाम तो कुछ यही संकेत दे रहे हैं. उत्तर प्रदेश और बिहार के उपचुनावों में भगवाई हार से कुछ ज्यादा फर्क न पड़ेगा क्योंकि यह पुरातनवादी सोच अंदर गहरे तक दब चुकी है.

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कपिल के बचाव में उतरी शिल्पा शिंदे

बिग बौस-11 की विजेता और मशहूर अंगूरी भाभी शिल्पा शिंदे अब कपिल शर्मा के समर्थन में उतर आई हैं. शिल्पा शिंदे ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट लिखा है. अपने इस पोस्ट में उन्होंने मीडिया से अपील की है कि कपिल शर्मा को थोड़ा स्पेस दें.

हाल ही में कपिल शर्मा का एक ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. जिसमें उन्होंने एक लीडिंग वेबसाइट के एडिटर के साथ गाली गलौच की थी. जब इस ट्वीट को लेकर उनकी आलोचना की जानें लगी तो उन्होंने बाद में उस ट्वीट को डिलीट करते हुए अपना ट्वीटर अकांउट हैक होने की बात कही थी. यह मामला ठीक से ठंडा भी नहीं हुआ था कि इसी बीच एडिटर और कपिल के बीच हुई बातचीत का एक और औडियो क्लिप सोशल मीडिया पर आ गया. इस औडियो क्लिप में कपिल ने एडिटर को गंदी गालियां देने के साथ मारने की धमकी भी दी थी. कपिल ने जिस तरह की अभद्र भाषा का प्रयोग किया था, उसकी वजह से वह सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल हुए. उनकी इमेज मार्केट में काफी खराब हो गई.

कहा तो ये भी जा रहा है कि उनकी इस तरह की हरकत से नाराज होकर चैनल ने भी शनिवार को कपिल का शो भी टेलीकास्ट नहीं किया, साथ ही चैनल ने कपिल के खिलाफ लीगल एक्शन लेने की बात भी कही. मामला ज्यादा आगे बढ़ते देख शिल्पा शिंदे ने उक्त मामले में कपिल का बचाव करते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखा.

शिल्पा ने अपने पोस्ट में लिखा, किसी को गाली देना जाहिर तौर पर गलत है लेकिन कपिल ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते वह जरूर किसी बुरी स्थिति में रहे होंगे कि उन्हें ऐसा करना पड़ा. उन्होंने पत्रकार विकी लालवानी (जिसे कपिल ने गालियां दी थीं) को टार्चरिंग आर्टिस्ट भी बताया.

शिल्पा ने अपनी पोस्ट में जर्नलिस्ट विकी लालवानी के लिए लिखा- हर आर्टिस्ट यह बात जानता है कि विकी लालवानी कितना टार्चर करके सवाल करते हैं. सभी कलाकारों से निवेदन है कि उनके प्रति अपने अनुभव साझा करें. जागो आर्टिस्ट जागो. शिल्पा ने आगे कहा- कपिल इन दिनों काफी परेशान चल रहे हैं. कुछ तो समस्या जरूर है वरना इतना टैलेंटेड आर्टिस्ट इस तरह से नहीं बोल सकता. हम सभी इंसान हैं गलती किससे नहीं होती है, गाली कौन नहीं देता है?

शिल्पा ने लिखा- चढ़ते सूरज को सब सलाम करते हैं. प्लीज आप सब उन्हें माफ कर दें. सभी से बहुत विनम्र निवेदन है कि उन्हें इस वक्त थोड़ा स्पेस दें.

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6 हजार रिश्ते ठुकराने के बाद क्या इस लड़की से शादी करेंगे प्रभास

एस एस राजामौली की फिल्‍म ‘बाहुबली’ की सीरीज से फेमस हुए एक्‍टर प्रभास एक्‍ट‍िंग और सिंगल होने की वजह से चर्चा में रहते हैं. बाहुबली के बाद आए 6000 रिश्‍तों को ठुकराने वाले एक्‍टर की शादी की खबरें एक बार फिर से जोरों पर हैं. रिपोर्ट्स की मानें तो प्रभास साउथ के सुपरस्‍टार चिरंजीवी की भतीजी से शादी करने जा रहे हैं. लेकिन इस खबर में कितनी सच्‍चाई है हम आपको बता रहे हैं. बौलीवुड दीवा दीपिका पादुकोण के साथ काम करने की इच्‍छा रखने वाले प्रभास दीपिका जैसी लड़की से ही शादी भी करना चाहते हैं.

हाल में आई इस खबर में कहा गया था कि चिरंजीवी की भतीजी निहारिका से प्रभास की शादी हो रही है ने फैंस के बीच एक बाद फिर से खुशी जगा दी थी. लेकिन सच में ऐसा कुछ भी नहीं है. सुपरस्‍टार चिरंजीवी ने शादी की खबरों का खंडन करते हुए इसे सिर्फ अफवाह बताया है. वहीं अभी तक प्रभास की तरफ से भी कोई स्‍टेटमेंट नहीं आया है. निहारिका उम्र में प्रभास से लगभग 14 साल छोटी हैं.

Overwhelmed 🤩 @amitabhbachchan Ji 🙏🏼 #syera

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कौन है निहारिका कोनिडेला

एक्ट्रेस और प्रोड्यूसर 24 वर्षीय निहारिका एक्टर-प्रोड्यूसर नागेंद्र बाबू की बेटी और तेलगु सुपरस्टार चिरंजीवी की भतीजी हैं. निहारिका ने अपने करियर की शुरुआत साल 2016 में आई फिल्म ‘ओका मानसू’ से की थी. अपने बैनर ‘पिंक एलिफेंट पिक्चर्स’ के तले निहारिका कई फिल्में प्रोड्यूस कर चुकी हैं. इसके अलावा निहारिका तेलुगु डांस रिएलिटी शो की होस्ट भी रह चुकी हैं.

अमिताभ के साथ फिल्‍म में आएंगी नजर

बता दें कि इन दिनों निहारिका अपनी अपकमिंग फिल्म ‘हैप्पी वेडिंग’ की शूटिंग में बिजी हैं. फिल्म के लेखक और डायरेक्टर लक्ष्मण कार्या हैं. फिल्म में अमिताभ बच्चन, नयनतारा अहम रोल में दिखेंगे. वहीं प्रभास इन दिनों फिल्म ‘साहो’ की शूटिंग में दुबई में बिजी हैं.

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अब अमेठी अचार

राजनीति में रत्तीभर दिलचस्पी न रखने वाला आदमी भी एक भविष्यवाणी तो पूरे आत्मविश्वास से कर सकता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कोई कहीं से भी लड़े, पर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी इस बार फिर अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ेंगी. इस अनुमान का इकलौता आधार स्मृति का अमेठी मोह और सक्रियता है.

लड़ तो लेंगी, पर दिनोंदिन मजबूत होते जा रहे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से जीतेंगी कैसे, इस सवाल पर दिमाग खपाने वालों की चिंता दूर करते स्मृति ने अमेठी का अचार लौंच कर दिया है जिस के बारे में उन का कहना है कि इसे प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत अमेठी की महिलाओं ने तैयार किया है. अचार के प्रचार से लगता नहीं कि वे गांधी परिवार के इस गढ़ में सेंध लगा सकती हैं. अगर अमेठी से स्मृति ईरानी लड़ीं तो वे अमेठी अचार को भुनाने से चूकेंगी नहीं. देखना दिलचस्प होगा कि जवाब में कांग्रेस अमेठी की चटनी, पापड़ या मुरब्बा लाती है या नहीं.

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अंधविश्वास : ‘डायन’ के शोर में दबी सिसकियां

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के जिलिंग गांव में दुर्गामणि बास्के व उर्मिला हांसदा नामक 2 बूढ़ी आदिवासी औरतों पर ‘डायन’ बता कर जुल्म ढाए गए. ओझा और जानगुरु के कहने पर इन दोनों औरतों की लातघूंसों व झाड़ू से जम कर पिटाई की गई. इतना ही नहीं, इन को मुरगे का खून पिलाया गया और बिना कपड़ों के पूरे गांव में नचाया गया. आदिवासी प्रभावित शाशंगडी महल्ले के दिहाड़ी मजदूर बंकिम चंद्र टुडू की बड़ी बेटी चंचला टुडू जिलिंग हाईस्कूल में छठी क्लास की छात्रा थी. वह कई दिनों से बीमार थी. इलाज के लिए उसे स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया.

वहां जांच करने के बाद चंचला को पुरुलिया के सदर अस्पताल में भरती कराया गया, जहां उस का सीटी स्कैन और ऐक्सरे किया गया. फिर भी उस की बीमारी का पता नहीं चला. उसे घर लाया गया, पर 2-3 दिन बाद वह फिर बीमार पड़ गई. चंचला के घर वालों ने सोचा कि कहीं चंचला पर किसी ‘डायन’ की बुरी नजर तो नहीं पड़ी है. इस की जांचपड़ताल के लिए स्थानीय ओझा व झारखंड के गाड़ोवाल गांव के जानगुरु बानेश्वर महतो को बुलाया गया. ओझा और जानगुरु ने चंचला की झाड़फूंक की और गांव वालों से कहा कि वह ‘डायन’ की बुरी नजर का शिकार बन गई थी, लेकिन अब झाड़फूंक के बाद ठीक है. साथ ही, यह भी कहा गया कि दुर्गामणि और उर्मिला ही ‘डायन’ हैं. इन ‘डायनों’ ने चंचला को अपनी शिष्या बनाने के लिए उस के कान में ‘डायन विद्या’ का मंत्र पढ़ दिया था, जिस से वह बीमार हो गई.

जानगुरु के आदेश पर गांव में पंचायत बुलाई गई. पंचायत में फैसला लिया गया कि इन बूढ़ी औरतों को ‘डायन विद्या’ छोड़नी होगी. इस के बाद दुर्गामणि व उर्मिला को चंचला के घर लाया गया, जहां उन की लातघूंसों और झाड़ू से जम कर पिटाई की गई. उस के बाद 2 मुरगों को ला कर चंचला की खाट के नीचे रखा गया. इन बूढ़ी औरतों के हाथों मुरगों की पूजा कराई गई और बलि चढ़ा कर उन का खून पिलाया गया, साथ ही, बिना कपड़ों के पूरे गांव में नचाया गया. खबर पा कर पुलिस इन दोनों औरतों को बचाने गई, तो गांव वालों ने पुलिस को गांव में घुसने नहीं दिया. बाद में पुलिस बल ने गांव वालों के हाथों से दुर्गामणि और उर्मिला को बचाया.

डायन और डायन विद्या

पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड  के आदिवासी समाज में ‘डायन’ का अंधविश्वास फैला हुआ है. संथाली समाज में यह विश्वास है कि उम्र ढलने के साथ जिंदगी में नाकामी या बेइज्जती के चलते लोभ या फिर ईर्ष्या में पड़ कर औरतें ‘डायन विद्या’ में दीक्षा लेती हैं. कुछ आदिवासी समुदायों में ‘डायन’ की बेटी पर भी ‘डायन’ होने का शक किया जाता है.

पाखंडियों का चक्रव्यूह

आदिवासी व संथाली समाज में जहां एक ओर ‘डायन’ अपनी ‘डायन विद्या’ की मदद से समाज में काला जादू का मायाजाल फैलाती है, वहीं दूसरी ओर ओझा, सोखा, जानगुरु और मांझी इन पर तंत्रमंत्र का इस्तेमाल कर के समाज का कल्याण करते हैं. ओझा आमतौर पर हर गांव में रहते हैं. वे झाड़फूंक कर लोगों की बीमारी ठीक करते हैं, जबकि गांव में किसी ‘डायन’ का पता लगाने के लिए भी इन की मदद ली जाती है. आमतौर पर मार्च से जून महीनों में आदिवासी प्रभावित इलाकों में ‘डायन’ के शक में औरतों पर जोरजुल्म करने या उन की हत्या कर देने की वारदातें सब से ज्यादा होती हैं. इन महीनों में खेती में कामकाज नहीं के बराबर रहता है. ध्यान दें, जिस साल बरसात कम होती है या अच्छी फसल नहीं होती है, उस साल जमीन मालिक, आदिवासी या हिस्सेदार किसानों के पास पैसे की कमी होती है. इस कमी को दूर करने के लिए एक साजिश रची जाती है.

गरीब परिवार या लाचार विधवा की जायदाद, जमीन, घर वगैरह हड़पने या पारिवारिक दुश्मनी या महल्ले में पुराने झगड़े या गांव में किसी आदमी या जानवर की बीमारी से हुई मौत को वजह बना कर एक साजिश रची जाती है. उस साजिश के मुताबिक, किसी औरत को ‘डायन’ बता कर पहले उस की अफवाह फैलाई जाती है. उस अफवाह को सच साबित करने के लिए एक सालिसी सभा बुलाई जाती है, जहां गांव के मुखिया की मौजूदगी में जानगुरु या ओझा एक शाल के पत्ते में सिंदूर व सरसों का तेल ले कर तंत्रमंत्र के जरीए यह पता लगाते हैं कि आरोपी औरत ‘डायन’ है या नहीं.

आरोप साबित होने के बाद ‘डायन’ पर मोटी रकम का जुर्माना लगाया जाता है. जुर्माना देने में नाकाम औरत पर जुल्म ढाए जाते हैं. कभीकभार उस की हत्या भी कर दी जाती है.

डायन प्रथा व आंदोलन

‘डायन’ जैसे अंधविश्वासों को मिटाने के लिए एक स्वयंसेवी संस्था ‘भारतीय विज्ञान व युक्तिवादी समिति’ कई सालों से लगातार आंदोलन कर रही है. इस के महासचिव प्रबीर घोष ने कहा कि सरकार ने कानून व्यवस्था को मजबूत और अंधविश्वासों को दूर करने के काम में लापरवाही की है, इसलिए ओझा, जानगुरु जैसे पाखंडी किसी बेगुनाह औरत को ‘डायन’ बता कर उस पर जानलेवा जोरजुल्म करने की हिम्मत कर रहे हैं. पश्चिम मिदनापुर के सालबनी इलाके में ‘डायन’ के नाम पर तकरीबन 40 साला एक आदिवासी औरत को बिना कपड़ों के पूरे गांव में घुमाया गया. उसे बेरहमी से मारापीटा गया. उस के बाद गांव के कुछ लोगों ने उसे और उस के पूरे परिवार को गांव से खदेड़ दिया.

इस पर गांव वालों का कहना था कि वह औरत ‘डायन’ है. उस के श्राप से ही एक रिश्तेदार को कैंसर हो गया. इस घटना में पीडि़ता ने थाने में शिकायत दर्ज कराई, पर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की.

डायन हत्या और कानून

13 अगस्त, 2015 को असम विधानसभा ने ‘डायन हत्या निवारक कानून’ पास किया था. इस कानून में प्रावधान है कि कोई भी किसी औरत को ‘डायन’ बताता है, तो उसे 3 से 5 साल की सख्त सजा होगी और 50 हजार से 5 लाख रुपए तक का जुर्माना देना होगा  ‘डायन’ बता कर जुल्म करने वाले को भी 5 से 10 साल की सजा और 5 लाख रुपए तक का जुर्माना भरना होगा. अगर ऐसे किसी काम में किसी समूह को कुसूरवार पाया जाता है, तो उस समूह में शामिल हर शख्स को 5 हजार से 30 हजार रुपए तक का जुर्माना देना होगा. ‘डायन’ बता कर किसी की हत्या करने पर धारा 302 के तहत मुकदमा चलेगा. उत्तराखंड में देहरादून की एक गैरसरकारी संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर साल 2 सौ से ज्यादा औरतों को ‘डायन’ बता कर उन की हत्या कर दी जाती है.

इस हत्याकांड के मामले में झारखंड सब से आगे है, जहां 50 से 60 औरतों की ‘डायन’ बता कर हत्या कर दी जाती है. आंध्र प्रदेश दूसरे नंबर पर है, जहां तकरीबन ऐसी 30 हत्याएं की जाती हैं. रूरल लिटिगेशन ऐंड ऐनटाइटिलमैंट सैंटर के मुताबिक, इस के बाद हरियाणा और ओडिशा का नाम आता है. इन राज्यों में 25 से 30 और 24 से 28 औरतों की हत्या हुई. पिछले 15 सालों में देशभर में 25 सौ औरतों की ‘डायन’ के नाम पर बलि चढ़ा दी गई. असम में पिछले 5 सालों में 70 औरतों की ‘डायन’ बता कर हत्या कर दी गई थी. जांच करने पर पता चला है कि इन में से ज्यादातर मामलों की जद में जमीन और जायदाद का झगड़ा था. झारखंड में 5 औरतों को ‘डायन’ बता कर मार डाला गया था. पिछले 10 सालों में वहां इस तरह अब तक 12 सौ औरतों को ‘डायन’ बता कर मारा जा चुका है.

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कास्टिंग काउच के विरोध में बीच सड़क टौपलेस हुई तेलगू एक्ट्रेस

साउथ की फिल्म इंडस्ट्री टौलीवुड की एक्ट्रेस श्री रेड्डी ने कास्टिंग काउच के विरोध में टौपलेस होकर प्रदर्शन किया. एक्ट्रेस के इस तरह से प्रोटेस्ट करने पर तमिलनाडु पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया है. बता दें कि कुछ दिनों पहले अय्यारी फिल्म की एक्ट्रेस रकुल प्रीत सिंह ने कहा था कि इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच जैसी कोई चीज नहीं होती.

रकुल के इस बयान के बाद तमाम अभिनेत्रियों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. ऐसा करने वाली अभिनेत्रियों में एक नाम श्री रेड्डी का भी था. अब श्री रेड्डी ने कास्टिंग काउच का सनसनीखेज आरोप लगाया है. इसके विरोध में उन्होंने टौपलेस होकर प्रदर्शन किया. श्री रेड्डी ने फिल्म चैंबर पर कास्टिंग काउच के मुद्दे पर चुप्पी साधने का आरोप लगाया और शोषण के विरोध में हैदराबाद स्थ‍ित फिल्म चैंबर औफिस के बाहर सड़क पर टौपलेस होकर धरना दिया. ये इलाका हैदराबाद के पौश जुबली हि‍ल्स में है.

एक्ट्रेस श्री रेड्डी ने कास्टिंग काउच के मसले पर अब तक कोई एक्शन नहीं लेने के आरोप के तहत ऐसा कदम उठाया. एक्ट्रेस ने शोषण करने वाले इंडस्ट्री के कई बड़े नामों का खुलासा करने की धमकी भी दी. उन्होंने कई टौप टौलीवुड निर्माताओं, निर्देशकों और एक्टर्स पर काम के बदले यौन शोषण करने का आरोप लगाया. एक्ट्रेस ने मांग की है कि फिल्म उद्दोग में मूल तेलगू स्ट्रग्लिंग एक्टर्स को 75% मौका दिया जाना चाहिए और तेलगू फिल्म चैंबर में भी सदस्यता देनी चाहिए.

कुछ दिन पहले ही श्री रेड्डी ने सोशल मीडिया पर साउथ फिल्म इंडस्ट्री के कई डायरेक्टर्स और एक्टर्स पर कास्टिंग काउच का आरोप लगाया था. हाल ही में इस एक्ट्रेस के आरोपों के खि‍लाफ एक जाने माने डायरेक्टर एक्टर और राजनेता ने पुलिस शि‍कायत भी दर्ज करवाई थी.

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शेखर सुमन के फेसबुक पर शेयर हुई अश्लील तस्वीरें

आएदिन किसी ना किसी सेलिब्रिटी के फेसबुक अकाउंट के हैक होने की खबरें आती ही रहती हैं. इसी बीच अब एक और खबर आई है कि बौलीवुड और टीवी के जाने-माने अभिनेता शेखर सुमन का फेसबुक अकाउंट हैक हो गया है. शेखर सुमन के फेसबुक वाल पर हाल ही में अचानक से कई न्यूड तस्वीरें पोस्ट हुईं. यही नहीं, उनके कुछ दोस्तों को भी अश्लील और आपत्तिजनक चीजें भेजी गईं. उनके वाल पर ये सब देखकर हर कोई हैरान रह गया. किसी को भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिरकार ये हो क्या रहा है. फिर शेखर के ही दोस्तों ने फौरन उन्हें फोन लगाकर इस बात की जानकारी दी.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दोस्तों से जब शेखर सुमन को जानकारी मिली कि उनके फेसबुक अकाउंट से अश्लील पोस्ट्स शेयर किए जा रहे हैं, तो उन्होंने फौरन अपना अकाउंट चेक किया और जो चीजे उन्हें वहां दिखाई दी, उसे देखकर वह दंग रह गए. उन्हें समझ आ गया कि उनका अकाउंट हैक हो चुका है. अभिनेता ने बताया कि यह उनके लिए बेहद ही आश्चर्यजनक बात है और वे इसकी शिकायत साइबर क्राइम सेल में करेंगे.

शेखर सुमन ने अपने दिए एक बयान में कहा, ‘फेसबुक अकाउंट हैक होने से मैं बहुत परेशान हूं. मैं फेसबुक पर बहुत एक्टिव नहीं हूं. मगर मुझे कुछ दोस्तों ने फोन कर बताया कि मेरा अकाउंट हैक हो गया है और वहां पर अश्लील तस्वीरें पोस्ट की जा रही हैं. मैं साइबर सेल से इसकी शिकायत करूंगा.’

इस घटना के बाद शेखर सुमन अब तमाम सोशल मीडिया अकाउंट्स बंद करने की योजना बना रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘मैंने पहले भी सोचा था कि सोशल मीडिया को अलविदा कह दूं, मगर मेरे दोस्तों और फैंस ने कहा कि लोगों से जुड़े रहने के लिए यह बढ़िया जरिया है, इसलिए मैं ऐसा ना करूं. मगर इस घटना के बाद मैं ऐसा करने जा रहा हूं क्योंकि यह मेरी इज्जत का मामला है.’

टीवी शो ‘देख भाई देख’, ‘एक राजा एक रानी’, ‘हेरा फेरी’,’मूवर्स एंड शेकर्स’ से मशहूर हुए शेखर सुमन ने कहा, ‘सेलिब्रिटीज पर लोग भरोसा करते हैं. इसलिए लोग इस बात पर यकीन नहीं करेंगे कि मैंने अश्लील तस्वीर पोस्ट की है. मगर आम आदमी कैसे साबित करेगा कि वह दोषी नहीं हैं…डिजिटल दौर में हैकिंग बहुत खतरनाक है.’

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विकास बनाम गरीबी

किसी देश की गरीबी कुछ सप्ताहों या महीनों में खत्म नहीं हो सकती. एक देश का विकास करने में वर्षों नहीं, दशकों लगते हैं. यूरोप, अमेरिका, चीन, सिंगापुर, मलयेशिया, थाईलैंड को लंबा समय लगा था गरीबी की चपेट में से निकलने के लिए. इसीलिए 2014 में विकास की आभा पर जब चुनाव लड़ा गया था तो बहुत सी उम्मीदें जगी थीं पर आज केंद्र सरकार के कार्यकाल के लगभग 4 साल पूरे होने पर भी विकास की कोई किरण नजर नहीं आ रही.

भारत अमेरिकी डौलर में 1890 के आसपास की प्रतिव्यक्ति आय का देश है, इसे प्रगति कर चीन के बराबर पहुंचने में भी दशकों लगेंगे और यदि चीन की उन्नति होती रही तो संभव है कि हम कभी उस स्तर पर पहुंच ही न पाएं. चीन की प्रतिव्यक्ति आय 8,000 डौलर है और अमेरिका व यूरोप में प्रतिव्यक्ति आय 30,000 से 60,000 डौलर है. चीन, यूरोप और अमेरिका की प्रगति की दर धीमी है पर 2 प्रतिशत की दर से भी वे हर साल 300 से 600 डौलर प्रतिव्यक्ति अमीर हो जाते हैं और भारत 6-7 प्रतिशत की दर से भी महज 100-125 डौलर अतिरिक्त कमा पाता है.

देश में हर तरफ बेकारी है, खाली बैठे लोग सारे देश में दिखते हैं जो देश की सामाजिक संरचना की पोल ही खोलते हैं. यहां उत्पादकता बढ़ाने पर कोई काम हो नहीं रहा. बुलेट ट्रेनों या 8 लेन की सड़कों से गरीबी नहीं हटेगी क्योंकि ये कुछ अमीरों की विलासिता के लिए हैं. दूसरों को दिखाने के लिए गगनचुंबी इमारतें और विदेशी गाडि़यां ठीक हैं पर जब तक हर गरीब का कायाकल्प नहीं होगा, देश के विकसित होने का सवाल ही नहीं उठता.

विकास की राह में सब से बड़ा अड़ंगा सरकार की अकर्मण्यता और सामाजिक सोच है. आज सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक नीतियां सब एक विशेष विचारधारा वालों के हाथों में आ गई हैं और सामाजिक, धार्मिक परंपराएं हावी होने लगी हैं जिन में केवल ऊंचे अमीरों की सुनी जाती है, आम गरीब की नहीं. सरकार की हर दूसरी नीति ऐसी है जो चुने लोगों को विकास के नाम पर एक नया अनूठा एकाधिकार दे रही है जबकि आम लोगों को इस की कीमत चुकानी पड़ रही है.

मोबाइल आज हर हाथ में आ गया है पर इस के साथ कोई और ठोस उत्पादक प्रक्रिया क्या जुड़ी है? गप मारने, गाने सुनने, वीडियो देखने के अलावा क्या यह डिवाइस किसी काम की है? अगर पहले लोग 2 घंटे आपस में मिलबैठ कर बातें करते थे तो आज 6 घंटे मोबाइल पर लगे रहते हैं. यह विकास की नहीं, विनाश की राह है.

सरकार ने घंटे घडि़यालों का व्यापार मोबाइलों से चमकाया है. मोबाइलों से सरकार हर नागरिक पर नजर रख रही है पर वह हर नागरिक को ज्यादा मेहनत करने के मौके नहीं दे रही. मोबाइल पर आप के खर्च का ब्योरा तो मिलता है पर आय बढ़ाने के स्रोत नहीं. उलटे मोबाइलों से लूट बढ़ गई है. जीएसटी और नोटबंदी ने भी कुछ इसी तरह की ऐक्सरसाइज कराई. गरीबी से लड़ाई में ये सैनिकों को भटकाने, नशा कर के चुप रहने के साधन बन गए हैं. यह सब हमारे भविष्य की छाया है – काली, धुंधली.

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कुंआरेपन की जांच और पंचायती फरमान

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले की एक मांबेटी को उस के पिता ने घर में बंद कर दिया, क्योंकि दोनों ने बेटी के पति और पंचायत के खिलाफ पुलिस में शिकायत करने की कोशिश की थी. उन का मोबाइल फोन भी ले लिया गया. 22 मई, 2016 को लड़की योगिता, जो पुलिस में भरती होने की तैयारी कर रही थी, उस की शादी नासिक के 25 साला लड़के अर्जुन से हुई थी. यह अर्जुन की दूसरी शादी थी. लड़की जब वर्जिनिटी टैस्ट यानी कुंआरेपन की जांच में फेल हो गई, तो पति ने उसे छोड़ दिया था. इसलिए मांबेटी ने पुलिस में शिकायत करने का फैसला लिया था. दोनों पतिपत्नी कंजरभाट समुदाय के हैं, जिस के 2 हिस्से हैं, डेरा सच्चा और खंडपीठ. इस समुदाय के अपने नियम हैं, जिन्हें सब मानते हैं.

इस समुदाय में तकरीबन ढाई लाख सदस्य हैं, जो ज्यादातर संगमनेर, सांगली, पुणे जिले में बसे हैं. उन की ताकतवर जात पंचायत है. 2 साल पहले इस समुदाय का अंडमाननिकोबार द्वीप समूह पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था. इस में भारत से तकरीबन 4 सौ सदस्य शामिल हुए थे  इन के नियम के मुताबिक, शादी के बाद जब पतिपत्नी एक सफेद कपड़े पर जिस्मानी संबंध बनाते हैं, तो लड़कियों में कुंआरेपन को सब से अहम मानने वाली जात पंचायत के सदस्य उस समय बाहर इंतजार करते हैं. यह एक टैस्ट होता है कि लड़की कुंआरी है या नहीं. योगिता के केस में अर्जुन ने कहा कि सैक्स के बाद लड़की का खून नहीं दिखा, तो उस ने योगिता को अपनी पत्नी मानने से साफ इनकार कर दिया. वह फरियाद करती रही कि वह कुंआरी है. पुलिस फोर्स में भरती होने की तैयारी में काफी कसरत करने के चलते खून नहीं बहा है. उस के पति और ससुराल वालों ने उस के गहने ले लिए. अगले दिन जब योगिता और उस की मां ने थाने में शिकायत करने की कोशिश की, तो उन्हें कमरे में बंद कर दिया गया. समाजसेवी संस्था के लोगों ने उस की मदद करने की कोशिश भी की, लेकिन योगिता ने जात पंचायत के डर से मदद लेने से इनकार कर दिया. उस ने बताया कि अभी उस की शादी एक और टैस्ट पर टिकी है. उसे एक मीटर कपड़ा दिया जाएगा, जिसे वह ऊपर या नीचे के हिस्से में बांधेगी और उसे बिना कपड़ों के ही दौड़ना होगा और पंचायत के मर्द उस का पीछा करते हुए उस के शरीर पर गरम आटे की लोई फेंकेंगे. पर उस ने यह सब करने से मना कर दिया है. समाजसेवकों ने भी योगिता के पिता को समझाने की कोशिश की, पर उन्हें भी जात पंचायत का डर है. उन्होंने जात पंचायत के लोगों को समझाने की कोशिश की, जिस के बाद 1 जून, 2016 को संगमनेर तालुका, अहमदनगर जिले में योगिता के घर मीटिंग हुई.

योगिता और अर्जुन ने 10 दिन बाद मिलबैठ कर बात करने के बाद यह मामला ही खत्म कर दिया. योगिता ने अर्जुन के पास लौटने का फैसला किया, जिस से उस के परिवार का बहिष्कार भी न हो और उस के भाईबहन की शादी में कोई परेशानी न हो. अर्जुन का कहना है, ‘‘हम अपने नियम मानते हैं. पंचायत बहुत खास है, इसलिए मैं ने उन का फैसला माना, पर मैं ने योगिता से माफी भी मांगी और उस ने मुझे माफ कर दिया, इसलिए अब हम हमेशा पतिपत्नी की तरह रहेंगे.’’ जब डिप्टी सुपरिंटैंडैंट अजय देवारे और कुछ समाजसेवी इस मुद्दे पर बात करने पहुंचे, उस दिन गांव के मुख्य पंच नोडकलाल गायब रहे. ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ की समाजसेवी वकील रंजना गवडे का कहना है कि लड़की और उस का परिवार जात पंचायत के बहुत ही सामाजिक दबाव में है. योगिता की 2 कुंआरी बहनें और एक भाई है. उस के पिता पेंटर हैं. डिप्टी सुपरिंटैंडैंट अजय देवारे का कहना है कि योगिता अब किसी कानूनी पचड़े में नहीं फंसना चाहती. वह अपने पति के साथ रहना चाहती है. हम उस के फैसले की इज्जत करते हैं और उस की सिक्योरिटी का भरोसा दिलाते हैं.

अर्जुन ने योगिता को लिखित में भरोसा दिया है कि वह उस के घर महफूज और खुश रहेगी.

समाजसेवकों का कहना है कि जागरूक होना बहुत जरूरी है. वर्जिनिटी टैस्ट यानी कुंआरेपन की जांच से एक औरत की बेइज्जती होती है, यह अपराध है. एक मर्द को 2 बार शादी करने पर जब किसी को कोई एतराज नहीं है, तो एक औरत के कुंआरेपन पर इतना तमाशा क्यों? ऐसी पंचायतों के सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ ‘प्रोटैक्शन औफ पीपल फ्रौम सोशल बायकौट ऐक्ट 2016’ कानून पास करवाने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य है. इस कानून को राष्ट्रपति के दस्तखत का इंतजार है. अगर यह कानून पास हो गया, तो पंचायत के ऐसे नियम बंद हो जाएंगे, यह औरत के प्रति दिमागी और जिस्मानी जोरजुल्म है, इस के लिए सभी को जागरूक होना पड़ेगा कि ऐसी घटनाएं समाज में जल्द से जल्द बंद हों.

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पुलिस वाले गंदी आदतों के शिकार

घूस लेने के लिए तो पुलिस वाले बदनाम हैं ही, पर कई गंदी आदतें भी उन की इमेज बिगाड़ने वाली होती हैं. हालांकि पुलिस महकमे के मुलाजिमों ने कभी यह इमेज सुधारने की कोशिश भी नहीं की, लेकिन अब मध्य प्रदेश का पुलिस महकमा थोड़ी सख्ती दिखा रहा है, जिस से कि पुलिस वाले अपनी इन गंदी आदतों से छुटकारा पा लें. बीते दिनों पुलिस हैडक्वार्टर, भोपाल के आला अफसरों ने अपने महकमे के मुलाजिमों की बेवक्त हो रही मौतों की जानकारी सभी जिलों से मंगाई, तो रिपोर्ट देख कर हर कोई सकते में आ गया. तंबाकू की लत एक बड़ी वजह पुलिस वालों की मौतों की समझ आई, जिस सें टीबी और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं.

एक अंदाजे के मुताबिक, तकरीबन 70 फीसदी पुलिस वाले तंबाकू, गुटका, पान मसाला खाते हैं और बीड़ीसिगरेट का धुंआ भी जम कर उड़ाते हैं.

पिछले डेढ़ साल से सूबे में तकरीबन 450 पुलिस वालों की मौत अलगअलग बीमारियों से हुई थीं. इन में सब से ज्यादा 93 मुलाजिम हार्ट अटैक से मरे थे, कैंसर जैसी घातक जानलेवा बीमारी से 47 पुलिस वाले मरे थे, लिवर और किडनी की खराबी से तकरीबन 36 मुलाजिम मरे.

ये आंकड़े देख कर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि खानपान और आदतों का सेहत और जिंदगी से कितना गहरा ताल्लुक होता है. बुरी लत और गंदी आदतों के शिकार पुलिस वाले कभी सुधरेंगे, ऐसा लगता नहीं.

इस की एक नहीं, कई वजहें हैं. इस में कोई शक नहीं कि मलाईदार होने के बाद भी पुलिस की नौकरी बहुत ही तनाव भरी होती है और मुलाजिमों को देखा जाए, तो एक तरह से चौबीसों घंटे ड्यूटी पर रहना पड़ता है. सिपाही से ले कर बड़े अफसर तक चैन की नींद नहीं सो पाते, लेकिन इस के एवज में वे तरहतरह के नशे करें, तो कौन सा भला उन का या आम लोगों का होता है, यह वे नहीं बता पाते.

अच्छा फरमान लाया रंग

जब जानकारी इकट्ठा हो गई कि क्यों महकमे के मुलाजिमों की बेवक्त मौतें हो रही हैं, तो पुलिस कल्याण शाखा ने इस तरह की मौतों पर अंकुश लगाने के लिए एक फरमान सूबे के तमाम थानों के लिए जारी कर दिया.

इस फरमान में कहा गया है कि अब थानों और पुलिस से ताल्लुक रखते दूसरे दफ्तरों में तंबाकू का सेवन और धूम्रपान बरदाश्त नहीं किया जाएगा यानी एक तरह से खुद पुलिस के आला अफसरों ने यह मान लिया है कि उन के मुलाजिम इन नशे वाली लतों के शिकार हैं.

इन आला अफसरों को यह एहसास भी है कि अकेले फरमान जारी कर देने से बात नहीं बनने वाली. लिहाजा, उन्होंने इस में यह भी जोड़ दिया कि अब नियम से दफ्तरों और थानों के डस्टबिनों की जांच की जाएगी. अगर उन में पान या तंबाकू की पीक मिली, तो जिम्मेदार अफसरों से पूछा जाएगा और उन पर कार्यवाही भी की जाएगी. साथ ही, जो मुलाजिम पानतंबाकू खाता या बीड़ीसिगरेट पीता दिखा, तो उसे सजा दी जाएगी. यह सजा कैसी होगी, इस का जिक्र फरमान में नहीं किया गया है.

पुलिस कल्याण शाखा के एडीजी जीआर मीणा की मानें, तो ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि उन के महकमे द्वारा कराए गए सर्वे में यह बात उजागर हुई थी कि तंबाकू और धूम्रपान से होने वाली बीमारियों और उन से मौतों की बात की तसल्ली हुई थी.

यह फरमान पुलिस वालों की इस गंदी लत को काबू में करने के मकसद से जारी किया गया है. हमारी मंशा साफ है कि पुलिस वाले सेहतमंद रहें.

लागी छूटे न

भोपाल के अशोका गार्डन थाने के 45 साला एक हैड कांस्टेबल ने बताया कि नौकरी ज्वाइन करते वक्त वह तंबाकू नहीं खाता था, लेकिन जब पहली तैनाती रायसेन जिले के एक थाने में हुई, तो यह लत गले पड़ गई. उस थाने के सभी मुलाजिम तंबाकू खाते थे या बीड़ीसिगरेट पीते थे. थाना इंचार्ज को हथेली पर रगड़ा हुआ तंबाकू पसंद था और यह काम वे अपने मातहतों से करवाते थे.

उसे भी तंबाकूचूना रगड़ कर साहब को देना पड़ता था. वे उसे चैतन्य चूर्ण कहते थे और चौबीसों घंटे मुंह में दबाए उस की पीक थूकते थे. बस, वहीं से मेरी भी आदत पड़ गई.

भोपाल के ही एमपी नगर थाने के एक सबइंस्पैक्टर ने बताया कि हम पुलिस वालों की नौकरी तनाव में रहने के साथसाथ बोर करने वाली होती है. लिहाजा, इन्हें दूर करने के लिए हम लोग पानतंबाकू और बीड़ीसिगरेट का इस्तेमाल करते हैं. इस से टाइम पास भी हो जाता है और दिमाग भी बराबर काम करता रहता है.

अपने तनाव यानी नशे के हक में ऐसी कई बातें पुलिस वालों ने बताईं, जिन्हें वे दलील की शक्ल देते लगे मानो इस के अलावा कोई और रास्ता ही न हो.

क्या इस फरमान के लागू होने से कुछ फर्क पड़ेगा? वे अपनी आदतें सुधारेंगे? इस पर इन सभी का जवाब था कि लत तो नहीं छोड़ सकते. हां, अब एहतियात बरतेंगे. तंबाकू या पान खा कर डस्टबिन में नहीं थूकेंगे, बल्कि बाहर जाएंगे या फिर वाश बेसिन में थूकेंगे और साफ कर देंगे.

एक सबइंस्पैक्टर ने तो यहां तक कहा कि शौचालय इस के लिए मुफीद जगह है. वहां बैठ कर इतमीनान से तंबाकूखैनी चबाएंगे और पानी डाल कर बाहर आ जाएंगे. रही बात डस्टबिन की, तो उसे साफ रखने में जरूर फुरती दिखाएंगे.

यानी सुधरेंगे नहीं

साफ लग रहा है कि इस फरमान का कोई खास असर नहीं हुआ है. कार्यवाही के डर से पुलिस वाले एहतियात बरतने की बात कर रहे हैं. भोपाल सहित राज्य के कई थानों की दीवारों और कोनों में लगे पानतंबाकू के दागधब्बों को साफ किया जा रहा है, जिस से कभी जांच हो, तो बात थाना इंचार्ज पर न आए.

लेकिन बात अकेले तंबाकू या सिगरेट की नहीं, फसाद की एक बड़ी जड़ शराब है, जिसे पुलिस वाले खुलेआम पीते हैं. भोपाल के होशंगाबाद रोड पर बने एक ढाबे वाले ने बताया कि देर रात ये ढाबों में बैठ कर छक कर शराब पीते हैं, क्योंकि उन्हें यह मुफ्त में मिलती है. हां, आम लोगों और मीडिया की नजर से बचने के लिए ये पुलिस वाले केबिन में या कोने की आड़ ले कर पीते हैं और खाना व मुर्गमुसल्लम भी मुफ्त खाते हैं. एवज में जब तक कोई बड़ी वजह न हो, परेशान नहीं करते.

इस ढाबे वाले के मुताबिक, छोटे मुलाजिमों का वास्ता रोज ऐसे मुजरिमों से पड़ता है, जो इस तरह की लतों के शिकार होते हैं. कोई जेबकतरा भी हवालात में आए, तो उस की तलब मिटाने के लिए ये ज्यादा दाम पर उसे तंबाकू और सिगरेट मुहैया कराते हैं. यानी मुजरिमों की संगत भी एक बड़ी वजह है.

एक सिपाही ने तो यहां तक कह डाला कि आला अफसर तो इस तरह कह रहे हैं, मानो वे दूध के धुले हों. खुद बंगलों में बैठ कर रोज शाम गला तर करते हैं. इस के बाबत सोड़ा, कोल्डड्रिंक, नमकीन, काजू और सिगरेट हमें ले जा कर देना पड़ता है. ये पहले खुद को तो सुधार लें, फिर हमें उपदेश या प्रवचन दें.

हमदर्दी नहीं इमेज की चिंता

15 सितंबर, 2016 को जबलपुर में एक असिस्टैंट सबइंस्पैक्टर सरेआम शराब के नशे में हुड़दंग मचाता पकड़ा गया था, तो पुलिस महकमे की जम कर छीछालेदर हुई थी.

यह पहला या आखिरी वाकिआ नहीं था, जिस में कोई पुलिस वाला ड्यूटी के दौरान ज्यादा शराब पीने के चलते नशे में बहक गया था.

इस तरह के तमाम नशे बड़े अफसर भी करते हैं, लेकिन वे खुद को काबू में रखते हैं. उलट इस कि छोटे मुलाजिमों को यह हुनर नहीं आता, जिन्हें सिखाने और सुधारने के लिए यह सारी कवायद की जा रही है.

वहीं, डस्टबिन देखने से समस्या का हल नहीं होने वाला, क्योंकि जो मुलाजिम हर रोज सुबूतों से छेड़छाड करते हुए खेलते हैं, वे इस तरह के फरमानों का तोड़ भी बखूबी जानते हैं.

सच तो यह है कि खुद पुलिस वाले ऐसी लत से छुटकारा नहीं पाना चाहते, क्योंकि उन्हें तो सबकुछ मुफ्त में  ही मिलता है और कोई अंकुश भी उन पर नहीं रहता. इन लोगों को किसी का डर नहीं रहता.

कुछ पुलिस वालों को नौकरी से बरखास्त कर देने से बात बनेगी, ऐसा लग भी नहीं रहा. घूसखोरी की लत ने पुलिस वालों को बेलगाम बना दिया है.

यह समस्या अकेले पुलिस महकमे की नहीं है, बल्कि दूसरे महकमों के मुलाजिम भी गंदी आदतों के शिकार हैं. उन पर भी लगाम कसे जाने की कवायद जरूरी है. तमाम सरकारी दफ्तरों में पीक का दिखना आम बात है और मुलाजिम भी नशे की गिरफ्त में रहते हैं, लेकिन इमेज पुलिस महकमे की ज्यादा खराब होती है.

VIDEO : हाउ टू अप्लाई अ ब्यूटीफुल फंकी न्यूड नेल आर्ट

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