डकैती के ज्यादातर किस्से ‘चंबल’ के ‘जंगलों’ और ‘बीहडों’ के ही सुनने को मिलते थे. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चंबल जैसे बीहड और जंगल भले न हों, पर डकैतों के कारनामें लोगो को दहला रहे हैं. अब तक लखनऊ की नवनिर्मित कालोनियों को अपना शिकार बनाने वाले डकैत अब शहर की सबसे पौश और सुरक्षित माने जाने वाली कालोनियों को अपना शिकार बनाने में सफल हो रहे हैं.
घर के मालिकों को बुरी तरह से मारपीट कर लहूलुहान करने के बाद उनके हाथ और पांव बांध कर कमरे में बद कर घर में लूट कर फरार हो जाते हैं. कई घटनाओं में तो घर की महिलाओं के साथ बदसलूकी और गाली गलौज तक की जाती है. दो दिन के अंदर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की साउथ सिटी कालोनी और गोमती नगर कालोनी के विवेक खंड में डकैतों ने अपना हौसला दिखा कर पुलिस और प्रशासन को बौना साबित कर दिया है.
गोमतीनगर का विवकेखंड इलाका सबसे सुरक्षित माना जाता है. बिजली विभाग के रिटायर इंजीनियर गिरीश चन्द्र पांडेय के घर 2 घंटे तक डकैत घुस कर लूटपाट करते रहे. इन सबने गिरीश के साथ उनकी पत्नी, बेटे और बहू को मारपीट कर घायल कर दिया. गिरीश के घर के ठीक सामने रिटायर पुलिस महानिदेशक एमसी द्विवेदी का घर है. इससे पता चलता है कि यह जगह कितनी सुरिक्षत थी. इसके बाद भी डकैत साहस दिखाने में सफल रहे. डकैतों ने 8 लाख से अधिक की लूटपाट की.
गोमती नगर की ही तरह साउथ सिटी लखनऊ की दूसरी सबसे पौश कालोनी है. यहां एचएएल के चीफ सुपर वाइजर देवेन्द्र सिंह नेगी के घर डकैती पड़ गई. विरोध को देखते हुये राज्यमंत्री स्वाति सिंह यहां पहुंची. तो लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा. गोमतीनगर में इसके पहले भी एसएम रिजवी और चमन लाल दिवाकर के घर डकैती पड़ चुकी है.
असल में डकैती की घटनायें शहरों में कम देखने को मिलती थी. हाल के कुछ दिनों में राजधानी लखनऊ ही नहीं वाराणसी और मथुरा तक में बड़ी डकैतियां पड़ चुकी हैं. मथुरा में डकैतों ने हत्या को भी अंजाम दिया था और वाराणसी में 12 करोड़ के सोने की लूट हुई. लखनऊ में पहले कई डकैतियां पड़ चुकी हैं. पुलिस दबाव में आकर आनन फानन में जो खुलासे करती है, वह पूरी तरह से सही नहीं होते. असल डकैतों के बच निकलने से उनके हौसले बुलंद हो जाते हैं. ऐसे में वह एक के बाद एक घटनाओं को अंजाम देते हैं.
कानून व्यवस्था पर किसी भी तरह का समझौता न करने की घोषणा करने वाली योगी सरकार पूरी तरह से असफल हो रही है. पुलिस विभाग में तमाम तबादले करने के बाद भी प्रदेश की कानून व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो रहा है. सरकार के लोग इस तरह की घटनाओं को विरोधियों की साजिश मानकर अपना बचाव करने की कोशिश कर रहे हैं. हकीकत यह है कि सरकार प्रदेश की कानून व्यवस्था को संभालने में असफल हो रही है. इससे साफ है कि अपराध रोकने की बात करने वाली सरकार अपराध रोक कर प्रदेश के लोगों को भयमुक्त माहौल देने में पूरी तरह से असफल हो रही है.
अपना मकान हो, यह सपना सब देखते हैं पर देशभर में बिल्डरों से मकान खरीदना जोखिमभरा काम है. यह लौटरी के महंगे टिकट लेने की तरह का कदम हो गया है जिस में पैसे तो लगाने पड़ते हैं पर मकान मिले या न मिले, कुछ नहीं कहा जा सकता. दिल्ली के आसपास नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम आदि में सैकड़ों बिल्डरों ने मकान बनाने के वादे कर पैसे तो ले लिए पर जो काम 2 वर्षों में होना चाहिए था, 5-7 वर्षों में भी नहीं किया.
बहुत से लोगों ने इस लालच में अपनी जमापूंजी लगाई कि बाद में या तो रहने को मिलेगा या महंगे में बेच कर मोटा पैसा मिलेगा. बहुतों ने कर्ज भी लिया और वे किस्तें भी भर रहे हैं और किराए के मकान में भी रह रहे हैं. अदालतें आजकल बिल्डरों पर सख्त हो रही हैं पर सच यह है कि न केवल बिल्डर, सरकारें और जनता भी दोषी हैं.
कई मामलों में सरकार द्वारा किसानों की अधिग्रहित जमीन पर मकान बन रहे हैं जिसे बिल्डरों ने महंगे दामों पर लिया था. पर किसानों ने मुआवजों आदि पर मुकदमा किया तो मकान बनाने का काम रुक गया. कुछ मामलों में फ्लैट या प्लौट खरीदार मुकदमे ठोक देते हैं कि जो वादा किया था उस से ज्यादा फ्लैटप्लौट बन रहे हैं और काम रुक जाता है. कई दफा पर्यावरण वाले अनुमति नहीं देते.
कई बार आसपड़ोस के रहने वाले बिल्डर का काम रोक देते हैं इसलिए कि उन के नए प्लौटोंफ्लैटों से उनकी सुविधाएं कम हो जाएंगी. जिन्होंने फ्लैटप्लौट बुक कराए थे, उन में से कुछ पूरा पैसा एडवांस न दें तो बिल्डरों के पास पैसे की कमी हो जाती है और काम रुक जाता है.
एक बिल्डर एक जगह गंभीर रूप से फंस जाए तो नई जगह उस का काम चल भी रहा हो तो वह धीमा हो जाता है या रुक जाता है. मुकदमों के निबटने में लगने वाले समय व पैसे के कारण भी काम रुक जाता है. आजकल अदालतें मामले हाथ में तो ले लेती हैं पर व्यावहारिकता को ताक पर रख कर आदेश जारी कर देती हैं. लेकिन आदेशों से फ्लैट तो नहीं उपज सकते.
बिल्डरों की जमात दूध की धुली नहीं है पर वह उतनी ही बेईमान है जितने नेता, अफसर, पंडे, शिक्षक, दुकानदार, उत्पादक या आम कामगार हैं. बेईमानी हमारी रगरग में भरी है. पर हर किसी ने सफेद कपड़े पहन कर मानो दूसरों की कालिख की बातें करने के ठेके लिए हों.
ऐसे माहौल में बिल्डरों को जेल में भेजने या उन पर मोटा फाइन लगाने की धमकी देना निरर्थक है. यह काउंटर प्रोडक्टिव है. या तो इस से लोग उस क्षेत्र में आएंगे ही नहीं या फिर इस जोखिम की कीमत फ्लैटोंप्लौटों की कीमत में जोड़ देंगे.
अच्छी बात तो यह होगी कि बिल्डरों को मजबूर किया जाए कि वे सपने न बेचें, बनेबनाए मकान बेचें. केवल नक्शों पर बेचने की जो परंपरा चली है, उसे बंद कर दिया जाए ताकि तैयार मकान बिकें और पूरा पैसा उसी समय लिया जाए जब रहने योग्य फ्लैट या मकान का निर्माण करने योग्य प्लौट दिया जा रहा हो. इस से उस क्षेत्र की बहुत सी तकलीफें कम हो जाएंगी.
अगर आप भी भोजपुरी एक्ट्रेस आम्रपाली दुबे के फैन हैं तो इस साल आप बैक टू बैक लगातार उनकी फिल्में देखने वाले हैं. मजेदार बात ये है कि इस साल उनकी दिनेश लाल यादव के साथ अकेले उनकी सात फिल्में आएंगी तो एक और फिल्म भोजपुरी इंडस्ट्री के दूसरे सुपरस्टार खेसारी लाल यादव के साथ आएगी.
भोजपुरी फिल्मों की सबसे पौपुलर एक्ट्रेस आम्रपाली दुबे की अच्छी खासी फैन फौलोइंग है. उनके अपने को-स्टार्स दिनेश लाल यादव और पवन सिंह के साथ केमेस्ट्री पसंद की जाती है. इतना ही नहीं आम्रपाली भोजपुरी फिल्मों की सबसे अधिक फी चार्ज करने वाली एक्ट्रेस भी हैं. अगर रिपोर्ट्स की मानें तो वो एक फिल्म के लिए लगभग 8 से 9 लाख तक चार्ज करती हैं.
आम्रपाली ने अपने करियर की शुरुआत टीवी इंडस्ट्री से की थी लेकिन फिल्मों में उन्होंने 2014 में डेब्यू किया था. आपको जानकर शायद हैरानी होगी कि महज 4 साल के करियर में आम्रपाली का स्टारडम कुछ ऐसा है कि इस साल उनकी लगभग 8 फिल्में रिलीज होने वाली हैं. कहना गलत नहीं होगा कि वो फिलहाल भोजपुरी इंडस्ट्री की सबसे बैंकेबल एक्ट्रेस हैं.
दिनेश लाल यादव के साथ आम्रपाली दुबे की निरहुआ चलल लंदन, वीर योद्धा महाबली, निरहुआ चलल अमेरिका, निरहुआ चलल ससुराल 3, बौर्डर, पटना जंक्शन और तुझको रखे राम तुझको अल्लाह रखे रिलीज होगी. वहीं उनकी आठवीं फिल्म दुल्हन गंगा पार के में उनके साथ खेसारी लाल यादव नजर आएंगे.
इसके पहले भी आम्रपाली पटना से पाकिस्तान, निरहुआ रिक्शावाला 2, जिगरवाला, बागी भइले सजना, राजा बाबू, काशी अमरनाथ, तुझको राखे राम, तुझको अल्लाह रखे जैसी सुपरहिट फिल्मों में रिलीज हो चुकी हैं. भोजपुरी दर्शकों के बीच उनकी अच्छी खासी पहचान है और लोग आम्रपाली को काफी पसंद भी करते हैं.
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कपिल शर्मा का नया शो ‘फैमिली टाइम विद कपिल शर्मा’ का प्रसारण शुरू होने के कुछ दिन बाद ही बंद हो गया. इसी बीच उन्होंने एक वेबपोर्टल के खिलाफ ट्विटर पर आपत्तीजनक शब्द लिखे थे. इसके कुछ ही दिन बाद कपिल ने उसी पोर्टल के एक रिपोर्टर को फोन पर गालियां दी और उनके द्वारा फोन पर की गई यह बातचीत सोशल मीडिया पर लीक हो गई. इन सारी चीजों को लेकर वह दिन पर दिन विवादों पर घिरते चले गए.
जिसके चलते उनकी काफी आलोचना हुई. वहीं उनके करीबी दोस्त उनके समर्थन में आ खड़े हुए. उन्होंने कपिल को बचाने के लिए डिप्रेशन का हवाला देते हुए लोगों से उन्हें स्पेस देने की अपील की. इतने विवादों के बीच कपिल शर्मा ने अपनी पूर्व मैनेजर प्रीति सिमोस, उनकी बहन नीति और रिपोर्टर विकी लालवानी के खिलाफ उन्हें बदनाम करने की शिकायत दर्ज कराई. यह शिकायत मराठी भाषा में लिखी गई है. उनके द्वारा की गई यह शिकायत भी सोशल मीडिया पर लीक हो गई.
शिकायत में कपिल ने लिखा है कि उन्होंने प्रीति सिमोस को 2 लाख सैलरी में बतौर मैनेजर रखा था. ‘उनके शो कौमेडी नाइट्स विद कपिल’ शो की पूरी रूपरेखा प्रीति ही तय करती थीं. प्रीति के काम से खुश होकर उन्होंने उनकी बहन नीति को भी रख लिया. उनपर विश्वास करके कपिल ने व्यक्तिगत जिंदगी से लेकर आर्थिक लेनदेन की सभी बातें उनको बताया करते थे.
उन्होंने प्रीति और नीति के कहने पर ही प्रोडक्शन हाउस की टैलेंट मैनेजर अनुश्री को काम से निकाल दिया. प्रीति ने उन्हें बताया था कि वह उनके पीठ पीछे कुछ घोटाला कर रही हैं. कपिल ने अपनी शिकायत में लिखा है कि जब वे एक कार्यक्रम में अनुश्री से मिले तो उन्होंने कपिल को बताया कि वो नहीं बल्कि प्रीति खुद शो में बतौर दर्शक बुलाए जाने वाले लोगों से पैसे लेती हैं. अनुश्री ने यह भी बताया कि वह दोनों उनके दूसरे साथी कलाकारों को भी भड़काने का काम भी करती हैं. जिसकी वजह से उनके बिजनस को काफी नुकसान झेलना पड़ रहा है.
कपिल ने कहा है कि उन्होंने जिन लोगों पर विश्वास किया उन्हीं ने उन्हें धोखा दिया. बाद में कपिल ने प्रीति और नीति को निकाल दिया. इसके बाद प्रीति ने एक वेबपोर्टल के साथ मिलकर उन्हें काफी बदनाम किया. जब कपिल के करीबी दोस्त गुरजोत ने प्रीति को ऐसा करने से मना किया तो उसके बदले उनसे 25 लाख रुपये मांगे. इन सबसे तंग आकर फरवरी, 2018 में कपिल खुद प्रीति से मिलने गए. वहां उन्होंने कपिल से कहा कि उनके बगैर वह इंडस्ट्री में काम नहीं कर सकते हैं और वह उन्हें छोड़ेगी नहीं. उन्होंने उनसे भी 25 लाख रुपये मांगे.
कपिल ने 6 अप्रैल को फिर प्रीति को फोन किया पर उन्होंने फोन नहीं उठाया. फिर उन्होंने नीति को फोन करके पोर्टल के रिपोर्टर का नंबर मांगा और उन्हें फोन किया. फोन पर ही दोनों का झगड़ा हो गया. इसके बाद वकील से बात करके उन्होंने शिकायत दर्ज कराने का मन बनाया.
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अभिनेता कमल हासन जल्द ही तमिलनाडु में अपनी राजनीतिक पार्टी का आगाज करने वाले हैं. सियासत को लेकर उनके दोस्त और सहकर्मी रजनीकांत भी पिछले दो दशक से गंभीर रहे हैं और पिछले कुछ महीनों से हवा का रुख भांपने की कोशिश में हैं. तमिलनाडु में सियासत और सिनेमा के बीच हमेशा से करीबी रिश्ता रहा है. यह सही है कि कुछ सिने अदाकारों ने राजनीति में खासी लोकप्रियता कमाई और अपना एक प्रभावशाली मुकाम बनाया, पर कई ऐसे भी हैं, जिनके हिस्से असफलताएं आईं. शिवाजी गणोशन इसका उदाहरण हैं.
तमिलनाडु की राजनीति में अभी जो शून्य दिख रहा है, उसकी वजह जे जयललिता जैसी नेता का पिछले वर्ष निधन होना और उम्र संबंधी दिक्कतों के कारण एम करुणानिधि की सक्रिय राजनीति से बढ़ती दूरी है. बावजूद इसके तमिलनाडु की राजनीति में कमल हासन या रजनीकांत के लिए वह मुकाम हासिल करना आसान नहीं, जो कभी एमजीआर को हासिल था. एमजीआर यानी एमजी रामचंद्रन अन्नाद्रमुक के संस्थापक थे और उन्हें सूबे में अपार जन-समर्थन हासिल था. वह ऐसा नेता बनकर उभरे, जिसने गरीबों, हाशिये के लोगों और वंचितों की कल्पनाओं को मूर्त रूप दिया. उन्होंने अपनी एक ऐसी सजग छवि बनाई, जिसने द्रविड़ आंदोलन को मजबूती दी और बाद में तमिल जनता ने जिसे अपना आदर्श माना.
हालांकि, ऐसे सूबे में, जहां द्रविड़ राजनीति तमिल पहचान और भाषा को समेटे हुए हो, वहां थियेटर और सिनेमा लोगों को एकजुट करने व प्रभावित करने के प्रभावशाली उपकरण बन चुके हैं. लेखक व अनुवादक आजी सेन्थिलनाथन कहते हैं, ‘सिनेमा या थियेटर संचार का माध्यम थे. अतीत में इसे एक कारगर औजार की तरह इस्तेमाल किया गया था. राजनीति में महज सेलिब्रिटी स्टेटस का जादू नहीं चल पाता’.आलोचकों की नजर में कमल हासन और रजनीकांत, दोनों अभिनेता अवसरवादी हैं. इन्होंने वर्षो चुप्पी साधे रखी और अब जाकर अपना मुंह खोला, जब तमिलनाडु बीते कई दशकों में अब तक की सबसे कमजोर सरकार के हवाले है. लेकिन हाल में ‘मुख्यमंत्री की कुरसी संभालने को तैयार’ होने की इच्छा जताने वाले कमल हासन का दावा है कि वह तो ‘हमेशा से राजनीति में रहे हैं’.
इस पर प्रतिक्रियाएं भी हुई हैं. मत्स्य मंत्री डी जयकुमार कहते हैं कि सिर्फ ट्विटर पर सक्रियता से कोई अभिनेता मुख्यमंत्री नहीं बन जाता, ‘उसे जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होना चाहिए, इसलिए पहले उन्हें (कमल हासन) विधायक तो बनने दीजिए.’ सेन्थिलनाथन भी रजनीकांत को घेरते हैं कि वह ‘राजनीति का इस्तेमाल अपनी फिल्मों की मार्केटिंग रणनीति के तौर पर करते रहे हैं’.
इस सूबे ने वर्ष 2005 में विजयकांत को भी राजनीति में उतरते देखा. वह दो प्रमुख खिलाड़ियों के विकल्प के तौर पर सियासत में उतरे और एक साल के भीतर उनकी पार्टी डीएमडीके ने आठ फीसदी वोट हासिल कर लिए. मगर बाद में वह विफल रहे. सेन्थिलनाथन कहते हैं कि ‘दस साल पहले, जब विजयकांत राजनीति में उतरे थे, तब उन्होंने अपनी एक जमीन तैयार की थी. उनके पास बाकायदा पार्टी का झंडा और निशान भी था. मगर हासन और रजनीकांत अब तक अपना कोई सियासी ढांचा तक तैयार नहीं कर सके हैं’.
एमजीआर की बात करें, तो बकौल सेन्थिलनाथन, ‘द्रमुक समर्थकों में एक बड़ा हिस्सा एमजीआर के प्रशंसकों या फैन्स क्लबों का था. एमजीआर बाद में जब द्रमुक से अलग हुए, तो तमाम प्रशंसक और फैन्स क्लब समर्थक में तब्दील हो गए. करुणानिधि की राजनीति से नाराज रहने वालों के लिए वह उनकी टक्कर के नेता बनकर सामने आए.’1936 से लेकर 1978 तक एमजीआर ने 133 फिल्मों में काम किया और कमोबेश एक चौथाई फिल्में द्रविड़ विचारधारा के इर्द-गिर्द थीं. इसी तरह, करुणानिधि फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखते रहे, क्योंकि वह इसी विचारधारा का प्रसार करना चाहते थे. जयललिता भी पार्टी की मुखिया बनने से पहले अन्नाद्रमुक की प्रचार सचिव और राज्यसभा सदस्य रही थीं. स्पष्ट है, सिनेमा और सियासत में चोली-दामन सा रिश्ता होने के बावजूद फिल्मी कलाकारों ने राजनीति को पूरी तरह से शायद ही प्रभावित किया. सच तो यह है कि दक्षिण में राजनीति ही सिने अभिनेताओं को प्रभावित करती आई है.
(साभार : धरानी थांगवेलू)
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आज लाइफ भी फास्ट फूड जैसी बनती जा रही है. इंतजार, मेहनत और सब्र जैसे कहीं गायब होते चले जा रहे हैं. प्रेम भी फास्ट फूड जैसा होता जा रहा है. कहीं किसी किताब में रखा बरसों पुराना सूखा गुलाब, किसी उपन्यास के पन्ने पर सूख चुके आंसुओं के निशान कहीं उस पल को, उस लमहे को न तो पुराना होने देते हैं न ही भूलने देते हैं. कितने खुशनुमा पल होते होंगे वे जब अलसाई दोपहर में किसी की यादों में खोए समय को जीना, किसी घने वृक्ष की छाया में लेटेलेटे बादलों की मदहोशी में अपने को मदहोश कर लेना कितना अच्छा लगता है. नजदीक से ही चिडि़या का फुर्र से उड़ जाना कितना प्यारा एहसास होता है.
फिल्म ‘परदेश’ की नायिका नायक शाहरुख खान से कहती है कि मुझे ऐसा प्यार चाहिए जैसा तुम करते हो. शाहरुख कहता है कि मुझे भी ऐसा ही प्यार चाहिए जिस में शरारत हो, भोलापन हो, मस्ती हो, लेकिन उस में लालच और बनावट न हो. दिखावा, महंगे कपड़े, लिपेपुते चेहरे वाली युवतियां जो कपड़ों की तरह प्रेमी बदलती हैं, जिन के लिए प्रेम एक अराधना हो, एक तड़प हो, एक प्यास हो, एक मीठी कसक हो, एक नाजुक सा समर्पण हो. लेकिन कब तक इंतजार करूं, कहां हो तुम जिस की तलाश है मुझे. मेरे वे सब सपने अधूरे हैं. मैं उन सब सपनों में रंग भरना चाहता हूं.
यात्रा तो मैं ने फिरोजपुर जनता ऐक्सप्रैस से शुरू की थी, बोरीवली और बांद्रा तक, पर फिर तो लोकल ट्रेन से ही मेरा सफर पूरा हुआ.
चर्चगेट से बांद्रा और बोरीवली आतेजाते सफर का आनंद तो न जाने कहां उड़न छू हो गया, बस एक रूटीन सा बनता चला गया. ये सब मेरे जौब लगने के बाद हुआ, उस के पहले ऐसा नहीं था. बांद्रा में मेरा घर है. जब शुरुआती दिन थे तो बड़ा मजा आता था, कभी लोकल ट्रेन में जगह मिल जाती थी तो कभी खड़े हो कर ही सफर पूरा करना पड़ता था. लोकल ट्रेन में युवतियों को घूरने का अपना ही आनंद होता है.
कभीकभी ऐसे वाकेए होते थे, लगता था अफेयर हो रहा है, पर फिर टांयटांय फिस्स. युवती कहीं और बुक है, उस की कहीं और सैटिंग है, इसलिए समझ में नहीं आता कि यह पता कैसे चले कि युवती का कोई लवर नहीं है. बौयफ्रैंड और गर्लफ्रैंड वाली परिपाटी मेरी तो समझ में नहीं आती. इस में लव कहां से टपक पड़ा?
ऐसा ही एक वाकेआ है. एक युवती मुझे हमेशा टकराती थी. मुझे भी हर दिन जब वह नहीं दिखती थी तो उस का इंतजार रहता था. ऐसा कई बार हुआ कि वह नहीं मिली तो मैं दूसरे दिन उस का इंतजार करता रहा.
जब वह मिलती तो एकटक हम दोनों एकदूसरे को देखते रहते. मेरे व्हाट्सऐप पर भी सैकड़ों फ्रैंड थे. बीचबीच में उस युवती से ध्यान हटा कर मैं व्हाट्सऐप पर आए मैसेज पढ़ने में बिजी हो जाता, फिर मैसेज पढ़ने के बाद उस युवती की तरफ ध्यान देता, तो पाता कि वह भी अपने मोबाइल पर बिजी है. मोबाइल पर उस की उंगलियां बड़ी तेजी से चल रही हैं.
यही तो रोना है, वाट लगा दी फेसबुक और व्हाट्सऐप ने. समझ नहीं आता किस के व्हाट्सऐप पर कितने फ्रैंड्स हैं. कितनी देर और कबकब चैटिंग हो रही है. मेरे एक फ्रैंड ने बताया कि उस के 2 हजार फ्रैंड्स हैं. मैं ने बड़े आश्चर्य से उसे देखा और पूछा, ‘‘2 हजार?’’
‘‘हां, 2 हजार, फ्रैंड्स,‘‘ उस ने बड़े गर्व से बताया.’’
मैं ने उस से पूछा, ‘‘2 हजार में से मुलाकात कितनों से होती है?’’
‘‘मुलाकात, कैसी मुलाकात? लाइक करो, शेयर करो, कमैंट्स करो, हो गई मुलाकात. यदि कोई पसंद नहीं है तो उसे डिलीट कर दो या फिर ब्लौक कर दो,’’ कह कर वह जोरजोर से हंसने लगा.
मुझे आज अपने उस दोस्त की याद आई और मैं सोचने लगा कि यह युवती भी या तो मैसेज कर रही है या फिर मैसेज पढ़ कर डिलीट मार रही होगी. मैं भी तो ऐसा ही करता हूं न. आज के युग में, आज के समय के साथ चल रहा हूं, फिर यह दिमागी टैंशन क्यों? क्या चाहता हूं मैं, समझ नहीं आता?
यह दोस्ती यानी फ्रैंडशिप भी क्या चीज हो गई है लाइक करते रहो, कमैंट्स करते रहो, शेयर करो, कभीकभार कोई पट जाए तो फ्रैंडशिप, मिलने के लिए गोते लगाते रहो. कहीं मुलाकात हो गई तो ठीक है
नहीं तो डिलीट मारते रहो. इंटरनैट की फ्रैंडशिप फ्रैंडशिप नहीं बल्कि भाजीतरकारी खरीदनेबेचने जैसी हो गई है.
हां, तो मैं बता रहा था कि कभी तो वह युवती बिजी मिलती और कभी मैं बिजी हो जाता. हम दोनों उड़ती नजर एकदूसरे पर डालते और दोनों चर्चगेट पर उतर कर अपनीअपनी राह पकड़ लेते. ये सब तब होता जब लोकल ट्रेन में जगह मिल जाती अन्यथा खड़ेखड़े ही सफर करना पड़ता.
एक दिन मैं हमेशा की तरह लोकल टे्रन में चढ़ा ही था कि मेरी नजरें कहीं कोई टिकने की जगह तलाश रही थीं. दूर तक नजर डाली, लेकिन कहीं कोई चांस नहीं दिखा. नजर जैसे ही नजदीक वाली सीट पर पड़ी वही युवती सीट पर विराजमान थी. मैं ने उसे रिक्वैस्ट भरी नजरों से देखा. एक मधुर मुसकराहट से उस की तरफ देखा. उस ने उस रिक्वैस्ट का सम्मान करते हुए मुझे आंखों से इशारा किया और थोड़ी सी जगह बना दी. अंधा क्या चाहे दो आंखें. मैं तुरंत जा कर उस के साथ बैठ गया.
लोकल ट्रेन ने अपनी स्पीड पकड़ी. मैं ने उस युवती से बातों का सिलसिला जारी रखने की कोशिश में अपना मोबाइल निकाला और बिजी दिखाने की कोशिश करने लगा, लेकिन मुझे लग रहा था कि जैसे शरीर में कान उग आए हों. आखिर मैं ने ही बात शुरू की.
‘‘आप चर्चगेट तक जाएंगी?’’ मैं ने थोड़ा फ्रैंडली होने की कोशिश की.
‘‘हां, चर्चगेट तक. लगभग रोज ही देखते हैं आप,’’ युवती मुसकराते हुए बोली.
‘‘आप?’’ युवती ने सवाल किया.
‘‘चर्चगेट, जौब है वहां,’’ मैं ने अपने हाथ की खूबसूरत घड़ी देखते हुए कहा. इतनी देर में उस के मोबाइल पर लगातार कई मैसेज आ गए और मेरी बातें बीच में ही छोड़ कर वह फोन पर मैसेज देखने में बिजी हो गई.
मैं ने भी अपना मोबाइल निकाला और व्हाट्सऐप में बिजी हो गया. इतनी देर में चर्चगेट आ गया. हम दोनों वहीं उतर गए. उतरतेउतरते मैं ने उस से पूछा, ‘‘आप का नाम?’’
‘‘नीरा,’’ जवाब मिला. फिर वह भीड़ में कहीं गुम हो गई. मेरे नाम में उसे इंट्रैस्ट नहीं था शायद.
कुछ दिन बाद फिर वह मुझे मिली. मैं ने उस से पूछा, ‘‘नीराजी आप, इतने दिन बाद?’’
‘‘नहीं, मैं रैगुलर आ रही हूं,’’ फिर वह पर्स से छोटा सा आईना निकाल कर अपनी लिपस्टिक ठीक करने लगी.
‘‘अरे, मैं ने आप का नाम तो पूछा ही नहीं.’’
‘‘जितेंद्र.’’
‘‘ओह… उस ने अपने होंठों को गोल घुमाया. अगर मैं आप को जीतू कहूं तो,’’ नीरा ने मस्ती भरे स्वर में कहा.
‘‘और मैं आप को नीरू…’’ मैं कहां पीछे हटने वाला था.
‘‘ओके जीतू.’’
‘‘ओके नीरू.’’
फिर क्या था. हमारी मुलाकात लोकल ट्रेन में रोज होने लगी.
हम दोनों अकसर अब शाम को जौब से लौटने के बाद चर्चगेट पर एकदूसरे का इंतजार करने लगे. वहां से साथसाथ ही वापसी के लिए लोकल ट्रेन में बैठते. वह बोरीवली उतरती और मैं दादर.
मुझे एहसास होने लगा था कि मैं उसे चाहने लगा हूं, लेकिन वह भी मुझे चाहती है या नहीं यह कैसे पता चले? इसी कशमकश में रोज उस के साथ बंधता चला जा रहा था. कभीकभी चर्चगेट पर हम दोनों किसी रेस्तरां में जा कर स्नैक्स, कौफी व आइसक्रीम जम कर ऐंजौय करते.
मुझे वह अब अच्छी लगने लगी थी. उस का व्यवहार देख कर मुझे लगता कि वह भी मुझे चाहती है. उस का जीतूजीतू कह कर बोलने का अंदाज मुझे भाने लगा था, लेकिन कभीकभी बीच में बातों के दौरान जब वह व्हाट्सऐप पर बिजी हो जाती, तब मैं खुद को ठगा सा महसूस करता. लगता था कि जैसे जबरदस्ती आ गया हूं, लेकिन मैं कर भी क्या सकता था.
अकसर लोकल ट्रेन में मुझे एक युवती इधरउधर घूमती दिखती थी. उस के बिखरे बाल, कुछकुछ फटेपुराने कपड़े. हम लोग अकसर हर फ्राइडे को नाश्तापार्टी करते थे तो वह युवती भी हमारे आसपास मंडराने लगती थी. हम उसे भी नाश्ता करवा देते थे, तो वह बहुत खुश हो जाती थी.
उस के कपड़े व हावभाव देख कर उस के पागल होने का भ्रम होता था, इसलिए मैं ने उस का नाम ही बावली रख दिया था. उस की बड़ीबड़ी काली आंखें जो अकसर खोईखोई रहती थीं. मासूमियत से भरा सांवला चेहरा, चेहरे पर बालसुलभ चंचलता, उम्र होगी यही कोई 24-25 वर्ष.
पकौडि़यों की सुगंध हो या समोसे की, बावली समोसे और पकौडि़यां ले कर खुश हो कर चली जाती. बावली का ध्यान एक फेरी वाला रखता था, जो अकसर लोकल ट्रेन में बावली के पीछेपीछे घूमता रहता था. उस फेरी वाले को देखते ही बावली खुश हो जाती थी.
खुशी के मारे उस के अंगअंग में बिजली सी दौड़ने लगती थी. खुशी के जो भाव उस की आंखों में देखने को मिलते थे. उन में एक जनून सा दिखता था. एक प्रेम करने वाले की आंखों में ही ऐसा जनून होता है, क्या बावली फेरी वाले से प्रेम करती है?
वह जनून, वह नशा, मुझे कब मिलेगा? प्रेम के इस बावलेपन का न जाने कब से मैं इंतजार कर रहा हूं. क्या पता नीरू मुझे इस बावलेपन के साथ चाहने लगे? यह सोच कर मैं ने सामने बैठी नीरू को देखा पर वह व्हाट्सऐप पर बिजी थी. मैं ने अपनी नजरें फेर लीं.
चर्चगेट आने का अनाउंसमैंट हो चुका था. मैं अपना बैग लिए गेट पर आ गया था. मैं ने देखा कि नीरू भी ठीक मेरे साथ ही आ कर खड़ी हो गई थी.
चर्चगेट आते ही हम दोनों उतर पड़े.
‘‘ओके जीतू, अभी अपनेअपने औफिस चलते हैं शाम को यहीं मिलेंगे.’’
‘‘ओके नीरू,’’ मैं ने कहा.
‘‘बायबाय,’’ कहती हुई नीरू अपनी मंजिल की तरफ चली गई और मैं अपनी मंजिल की तरफ. चलतेचलते मैं सोच रहा था कि अच्छा सा मौका देख कर नीरू को अपने प्यार का इजहार कर ही दूंगा, लेकिन कब? कल शाम को. औफिस के बाद मेरिन ड्राइव का प्रोग्राम बनाता हूं.
औफिस पहुंच कर टेबल पर फैली डाक को समेटा, फिर कंप्यूटर खोल कर ईमेल चैक करने लगा, लेकिन मन था कि नीरू की तरफ ही दौड़ कर पहुंच रहा था. काम में मन नहीं लग रहा था, रहरह कर मन उचट रहा था. जैसेतैसे शाम हुई, मैं ने नीरू को मैसेज किया, ‘‘कल शाम को डिनर हम साथ करेंगे और मेरिन ड्राइव भी चलेंगे.’’
‘‘ओके जीतू,’’ नीरू की स्वीकृति आ गई.
वापसी में नीरू नहीं दिखाई दी. मैं ने उस का इंतजार भी किया, जहां वह अकसर मिलती थी, लेकिन जब वह दिखी नहीं तो मैं लोकल ट्रेन में बैठ गया और सोचने लगा कि हो सकता है वह निकल गई हो या देर से आए. कुछ सोच कर मैं ने मैसेज किया कि तुम कहां पर हो?
‘‘ओह… सौरी जीतू मैं तो घर आ गई.‘‘ नीरू का कुछ देर बाद जवाब आ गया.
‘‘क्या तुम औफिस से जल्दी निकल गई थी?’’ मैं ने मैसेज किया.
‘‘ हां. मेरा एक फ्रैंड आ गया था, उस के साथ मैं मौल गई थी और फिर घर आ गई. डौंटवरी हम कल मेरिन ड्राइव पर मिलेंगे. बायबाय,’’ नीरू का मैसेज आ गया.
‘‘ओके नीरू,’’ मैं ने मैसेज पढ़ कर जवाब दे दिया.
फिर वही रूटीन, दूसरे दिन मैं लोकल ट्रेन में खड़ा हो गया, बैठने तक की कहीं जगह नहीं मिली. इसलिए व्हाट्सऐप वगैरा भी देख नहीं पाया. सिर्फखयालों में वही लोकल ट्रेन में घूमने वाली बावली आ रही थी, उस की आंखों में छाया प्यार का जनून क्या कभी मुझे नसीब होगा. जब कहीं सचाई होती है तो शरीर के पोरपोर से टपकने लगती है. आंखों में उस प्रेम का नशा हमेशा बना रहता है, व्यक्ति भीड़ में भी खुद को अकेला महसूस करता है. वह खोयाखोया रहता है.
आज कहीं बावली दिखी भी नहीं, लेकिन नीरू में रहरह कर मुझे वह बावली दिखने लगती. खयालों के इसी भंवर में उलझताउलझता मैं औफिस पहुंच गया. फाइलों के हर पेज पर मुझे नीरू और बावली की शक्ल दिखती. कभीकभी दोनों चेहरे एक होने लगते तो कभी अलगअलग. कंप्यूटर पर भी मुझे नीरू और बावली की ही शक्लें दिखतीं. जैसेजैसे शाम नजदीक आ रही थी मेरे दिल की धड़कनों का ग्राफ बढ़ता जा रहा था.
जैसे ही ड्यूटी का समय खत्म होने को आया, मैं ने मैसेज छोड़ दिया, ‘‘नीरू, कहां हो तुम?’’
‘‘मैं चर्चगेट पर हूं,’’ नीरू का मैसेज आया.
फिर क्या था मैं ने जल्दीजल्दी अपने बालों को ठीक किया और चर्चगेट की तरफ चल दिया.
ठीक 10 मिनट बाद मैं नीरू के सामने था. हम दोनों ने एकदूसरे को देखा और टैक्सीस्टैंड की तरफ बढ़ गए. कुछ समय बाद हमारी टैक्सी मैरिन ड्राइव की तरफ जा रही थी. मैं हसरत भरी नजरों से नीरू की तरफ देखने लगा. नीरू ने आज पिंकग्रीन कलर का सूट पहना था. ग्रीन लैगिंग्स, पिंक शौर्ट स्लीवलैस कुरती और ग्रीन दुपट्टा गले में मफलर की तरह लपेट रखा था. कुरती में शरीर के अंदर की झलक साफसाफ दिख रही थी. मैं ने नजरें फेर लीं. मुझे आधुनिक ड्रैस पसंद है, लेकिन भोंड़ापन मैं सहन नहीं कर पाता. जब अफेयर है तो भोंड़ापन चलेगा.
मैरिन ड्राइव पर भीड़ उस दिन बाकी दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही थी, लेकिन मुंबईवासियों के लिए यह आम बात है. हम ने अपनी जगह निश्चित की. हमारे सामने विशाल समुद्र अपनी ताकत पर गुमान करता हुआ हिलौरे भर रहा था. हम दोनों उस शोर में अपनी दोस्ती को प्रेम का रूप देने वाले थे.
समझ में नहीं आ रहा था कि मैं बात कहां से शुरू करूं. इतने में नीरू के मोबाइल पर मैसेज की लाइन लग गई और वह व्हाट्सऐप में बिजी हो गई. मैं ने भी अपना मोबाइल निकाला और फेसबुक देखने लगा, पर दिल नहीं लगा. आखिर मैं ने झल्ला कर फोन बंद कर दिया. सोच लिया कि एक बार तो बात कर ली जाए. मैं ने देखा नीरू अभी भी व्हाट्सऐप पर ही उलझी हुई है.
मैं ने कहा, ‘‘नीरू छोड़ो भी मोबाइल, हम यहां बात करने आए हैं कि मोबाइल व्हाट्सऐप देखने.’’
‘‘ओके जीतू, सिर्फ 2 मैसेज और बचे हैं. बस, फिर में फ्री हूं.’’
मैं ने मन को समझाया कि 5-10 मिनट और सही.
आखिर 10 मिनट बाद नीरू फ्री हुई, ‘‘बोलो न, तुम कुछ बोलना चाहते थे,’’ नीरू ने मोबाइल पर्स में रखा और मुझ से बोली.
‘‘नीरू, देखो, मैं साफसाफ बात करना चाहता हूं, घुमाफिरा कर बात करना मुझे नहीं आता.’’
‘‘बोलो न यार, कह कर नीरू ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया.’’
मुझ में थोड़ी हिम्मत आई. मैं ने उस के हाथ को महसूस किया, नौर्मल था, लेकिन मुझे मेरा हाथ बेहद गरम महसूस हो रहा था. दिल में हलकी सी घबराहट भी महसूस कर रहा था.
‘‘देखो, नीरू, हम अच्छे दोस्त हैं, क्या हम लाइफ पार्टनर नहीं बन सकते? एकदूसरे को हम समझते भी हैं. हमारे विचार और पसंद भी काफी मिलतेजुलते हैं, तुम क्या सोचती हो?’’ मैं ने कहा.
वह बड़े ध्यान से मेरा चेहरा देखने लगी. फिर खिलखिला कर जोर से हंस दी. मेरा कलेजा मुंह को आने लगा. मैं खुद को हताश सा महसूस करने लगा.
‘‘क्यों, क्या मैं ने कोई गलत बात कही?’’ मैं ने पूछा.
‘‘नहीं भोलूराम, नहीं. तुम ऐसा कैसे सोच सकते हो?’’ नीरू ने कहा.
‘‘क्या मतलब?’’ मैं ने आश्चर्य से देखा.
‘‘अरे यार, फेसबुक, व्हाट्सऐप पर मेरे लगभग हजार फ्रैंड्स हैं, कई फ्रैंड्स से अकसर मिलती रहती हूं, उस दिन जो औफिस से जल्दी गई थी वह मेरा फेसबुक फ्रैंड था, जिस के साथ मुझे शौपिंग भी करनी थी और उसी की गाड़ी में चली गई थी. इस में प्रेम वाली बात कहां से आ गई? तुम भी इन्हीं में से एक फ्रैंड हो,’’ नीरू ने बिंदास हो कर कहा.
मेरे पांवों के नीचे की जमीन ने खिसकना शुरू कर दिया था. मैं गूंगा बन गया था.
‘‘और, जीतू, तुम्हारे कितने फ्रैंड्स हैं व्हाट्सऐप पर,’’ नीरू ने मेरा कंधा पकड़ कर झकझोरा.
मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.
‘‘यही कोई 15-20 युवक युवतियां कुल मिला कर,’’ मैं ने बड़ी मुश्किल से कहा.
‘‘15-20,’’ नीरू ने जो हंसना शुरू किया तो उस की हंसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी.
‘‘क्या फायदा इतनी फ्रैंडलिस्ट से. क्या सभी से दोस्ती हो जाती है,’’ मैं ने फिर समझाने की कोशिश की.
‘‘काहे की दोस्ती, कुछ लोगों से मिलतेजुलते रहो, बाकी को मैसेज भेजते रहो,’’ नीरू ने कहा.
‘‘चलें, आप की बात खत्म हो गई हो तो,’’ नीरू ने कहा और पूछा ‘‘डिनर कहां लेंगे?’’
‘‘डिनर, हां याद आया मुझे, डैडी के साथ एक फंक्शन में जाना है, डिनर मैं वहीं करूंगा,’’ मैं ने झूठ बोला.
‘‘क्या बकवास करते हो?’’ नीरू गुस्से से भड़क गई, ‘‘फालतू में टाइम खराब किया.’’
जब मैं घर पहुंचा तो मेरे शरीर में जान तो बची नहीं थी. यह दूसरी युवती थी, जिस ने मेरे दिल को इस कदर तोड़ा था. मुझे संभलने में महीनों लग गए, पर मैं ने व्हाट्सऐप और फेसबुक पर दायरा सीमित कर लिया. कसम खा ली व्हाट्सऐप और फेसबुक पर दोस्ती नहीं करूंगा.
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भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों यशवंत सिन्हा, अरुण सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा के तीखे बयानों के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने बचाव में, अपना पक्ष रखने के लिए जनता की अदालत में आंकड़ों का ढेर, कंपनी सैक्रेटरियों की एक सभा में पेश किया. भाषण लंबा था, बहुत से आंकड़े स्क्रीन पर थे, नए तरह के वादे थे पर वे सुलगती आग को ठंडा कर पाएंगे, इस में संदेह है.
किसी प्रधानमंत्री को यह हक नहीं कि 3 साल राज करने के बाद वह पिछले 70 सालों, 10 सालों या अपने से पहले के 2-3 सालों के आंकड़ों के सहारे अपने लिए गोरखपुरी औक्सीजन को ढूंढ़ने की कोशिश करे. मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ जनता थी तभी तो नरेंद्र मोदी को भारी सफलता मिली. जनता को मोदी से बहुत उम्मीदें हैं.
उन उम्मीदों को पूरा न करने की जगह यह कहना कि पिछली सरकार कौन सी अच्छी थी, बेबुनियाद है. आज जनता एक तरफ आर्थिक समस्याओं से जूझ रही है तो दूसरी तरफ देशभर में फैल रही दहशत, गुंडागर्दी, गालीगलौज और विरोधी को मार डाले जाने के वातावरण को झेल रही है. ये दोनों प्राकृतिक आपदाएं नहीं हैं, ये दोनों 2014 में बनी सरकार की नई देन हैं.
जनता ठगा महसूस कर रही है कि वह भ्रष्ट सरकार से मुक्त हुई या नहीं. उसे तो अपने ऊपर हर रोज हावी होती और उस के हाथ बांधती सरकार नजर आ रही है. कंपनी सैक्रेटरियों से नरेंद्र मोदी ने इस तरह का कुछ नहीं कहा जो आम जनता को राहत दे सके. हां, जिन कंपनियों में उन के श्रोता सैक्रेटरी हैं, कंपनी कानून की बाध्यता के कारण उन कंपनियों के आंकड़े अच्छे हैं क्योंकि यह दिख रहा है कि पैसा आम छोटे, बहुत छोटे और पटरी वाले व्यापारियों के हाथों से निकल कर मोटी धन्ना सेठ कंपनियों के हाथों में जा रहा है.
नोटबंदी बिलकुल फेल ही नहीं हुई, लोगों पर भूकंप साबित हुई है, इस में अब कोई संदेह नहीं रहा. 8 नवंबर को कहा गया था कि नोटों के पुराने काले, आतंकी, नकली नोटों के महल की जगह साफसुथरा, चमचमाता, सहज, सुलभ भवन मिलेगा जिस में केवल अमीर नहीं, हर गरीब को जगह मिलेगी. पता चला कि पुराना महल तो गिर गया पर अधबने, बिना खिड़कियों, दरवाजों वाले, ऊंचे सरकारी भवन में जनता को ला पटक दिया गया है.
यही गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स के बारे में कहा गया कि 1 जुलाई, 2017 से टैक्स स्वतंत्रता मिलेगी. पर 1947 की स्वतंत्रता के बाद की जनता को बेहाली से गुजरना पड़ रहा है. जो दर्द लाखों ने 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता की खातिर सहा, वही अब जीएसटी लाखों को आर्थिक स्वतंत्रता के नाम पर कंप्यूटरों व रिटर्नों की जंजीरों के कारण दे रहा है. सरकारी आजादी, गुलामी का कब रूप ले लेगी, यह न भाजपा की भक्त जनता ने सोचा था न भाजपा के अतिभक्त व्यापारियों ने. दोनों बहुत खिन्न और रोष में हैं.
नरेंद्र मोदी का कहना कि बस कुछ दिन और, अच्छे दिन आने वाले हैं इतनी बार दोहराया जा चुका है कि इस पर सहज विश्वास नहीं हो रहा. मोदी कह रहे हैं कि वे जीएसटी में सुधार करेंगे पर तेजाब तो बोतल से निकल चुका है और बोतल टूट चुकी है. अब जितना मरजी पानी डाल लो, वह जनता को, व्यापार को, घरघर को झुलसाएगा तो सही. आंकड़ेबाजी पढ़ेलिखों के लिए है पर वे तो सहीगलत पहचानते हैं और प्रधानमंत्री के आंकड़ों की पोल खोलने में लगे हैं.
आम जनता को अपनी पक्की नौकरी, ज्यादा पैसे और सुरक्षा की चिंता है. नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में किसी ठोस कदम का वादा नहीं किया जिस से कंपनियों को नुकसान पहुंचे और जनता को लाभ पहुंचे. कंपनियां देश व अर्थव्यवस्था की दुश्मन नहीं हैं, उन के बिना जंगल मरुस्थल बन जाएंगे पर वे जंगल कुछ की मिलकियत नहीं रह सकते.
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25 साला रिंकू निचले तबके के एक मजदूर का बेटा था. जब वह 12 साल का था, तभी उस ने अपने पिता के साथ मजदूरी पर जाना शुरू कर दिया था. काम के दौरान जब उस ने साथी मजदूरों को थकान उतारने के लिए तंबाकू, गुटका, बीड़ीसिगरेट का सेवन करते देखा, तो उस की भी ऐसा करने की इच्छा होती थी. एक दिन रिंकू ने एक मजदूर से बीड़ी मांग कर पी, जो बाद में आदत बन गई. जब रिंकू 22 साल का हुआ, तो उस के मुंह में छाले की समस्या बनी रहने लगी. जब आम दवाओं से उसे कोई फायदा नहीं हुआ, तो उस ने पास के एक सरकारी अस्पताल में एक डाक्टर को अपनी समस्या बताई.
डाक्टर ने रिंकू के मुंह के छालों की जांचपड़ताल के बाद कैंसर की जांच कराने की सलाह दी. रिंकू ने जरूरी टैस्ट कराए, तो पता चला कि उसे मुंह का कैंसर हो चुका है.
चूंकि रिंकू एक गरीब मजदूर का बेटा था, इसलिए वह अपनी बीमारी का इलाज सही तरीके से नहीं करा पाया और 25 साल की उम्र में कैंसर की वजह से उस की मौत हो गई.
अनिल को बचपन में ही स्कूल में गलत दोस्तों की संगत पड़ गई और वह तंबाकू व गुटका का सेवन करने लगा और इसे अपनी लत बना लिया.
जब अनिल की 22 साल की उम्र में शादी हुई, तो उसे लगा कि वह एक नई जिंदगी की शुरुआत कर रहा है. इस बीच वह एक बच्चे का बाप भी बन गया.
कुछ समय तक तो सबकुछ ठीकठाक रहा, लेकिन एक दिन उसे लगा कि वह अपना मुंह पूरी तरह नहीं खोल पा रहा है. जब उस ने डाक्टर से जांच कराई, तो पता चला कि उसे मुंह का कैंसर हो चुका है, जो आखिरी स्टेज पर है.
अनिल के पिता सरकारी नौकरी करते थे. वे उस के इलाज के लिए देश के बड़ेबड़े अस्पतालों में दौड़े, लेकिन पिछले साल अनिल की कैंसर की वजह से मौत हो गई.
मुंह व फेफड़े का कैंसर होने की अहम वजह तंबाकू का ज्यादा सेवन करना है, क्योंकि तंबाकू में कैंसर बनाने वाले निकोटिन और नाइट्रोसोप्रोलिन जैसे खतरनाक तत्त्व पाए जाते हैं.
तंबाकू से बनी बीड़ी व सिगरेट में कार्बन मोनोऔक्साइड, थायोसाइनेट, हाइड्रोजन साइनाइड व निकोटिन जैसे खतरनाक तत्त्व पाए जाते हैं, जो न केवल कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को जन्म देते हैं, बल्कि शरीर को भी कई खतरनाक बीमारियों की तरफ धकेलते हैं.
जो लोग तंबाकू या तंबाकू से बनी चीजों का सेवन नहीं करते हैं, वे भी तंबाकू का सेवन करने वाले लोगों खासकर बीड़ीसिगरेट पीने वालों की संगत में बैठ कर यह बीमारी मोल ले लेते हैं. इसे अंगरेजी भाषा में ‘पैसिव स्मोकिंग’ कहते हैं.
नुकसान ही नुकसान
तंबाकू के सेवन में न केवल लोगों की कमाई का ज्यादातर हिस्सा बरबाद होता है, बल्कि इस से उन की सेहत पर भी कई तरह के गलत असर देखने को मिलते हैं, जो बाद में कैंसर के साथसाथ फेफड़े, लिवर व सांस की नली से जुड़ी कई बीमारियों को जन्म देने की वजह बनते हैं.
तंबाकू या सिगरेट का इस्तेमाल करने से सांस में बदबू रहती है व दांत गंदे हो जाते हैं. इस में पाए जाने वाला निकोटिन शरीर की काम करने की ताकत को कम कर देता है और दिल से जुड़ी तमाम बीमारियों के साथसाथ ब्लड प्रैशर की समस्या से भी दोचार होना पड़ता है.
पहचानें कैंसर को
डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि पूरी दुनिया में जितनी तादाद में मौतें होती हैं, उन में से 20 फीसदी मौतों की वजह सिर्फ कैंसर है. गाल, तालू, जीभ, होंठ व फेफड़े में कैंसर की एकमात्र वजह तंबाकू, पान, बीड़ीसिगरेट का सेवन है.
अगर कोई शख्स तंबाकू या उस से बनी चीजों का इस्तेमाल कर रहा है, तो उसे नियमित तौर पर अपने शरीर के कुछ अंगों पर खास ध्यान देना चाहिए.
अगर आप पान या तंबाकू का सेवन करते हैं, तो यह देखते रहें कि जिस जगह पर आप पान या तंबाकू ज्यादातर रखते हैं, वहां पर कोई बदलाव तो नहीं दिखाई पड़ रहा है. इन बदलावों में मुंह में छाले, घाव या जीभ पर किसी तरह का जमाव, तालू पर दाने, मुंह का कम खुलना, लार का ज्यादा बनना, बेस्वाद होना, मुंह का ज्यादा सूखना जैसे लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं, तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जा कर अपनी जांच कराएं. बताए गए सभी लक्षण कैंसर की शुरुआती दशा में दिखाई पड़ते हैं.
बढ़ती तंबाकू की लत
अकसर स्कूलकालेज जाने वाले किशोरों व नौजवानों को शौक में सिगरेट के धुएं के छल्ले उड़ाते देखा जा सकता है. यह आदत वे अपने से बड़ों से सीखते हैं.
सरकार व कोर्ट द्वारा सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान करने पर पूरी तरह से रोक लगाई गई है और अगर ऐसा करते हुए किसी को पाया जाता है, तो उस पर जुर्माना भी लगाए जाने का कानून है, लेकिन यह आदेश सिर्फ आदेश बन कर ही रह गया है. हम गुटका खा कर जहांतहां थूक कर साफसुथरी जगहों को भी गंदा कर बैठते हैं, जो कई तरह की संक्रामक बीमारियों की वजह बनता है.
पा सकते हैं छुटकारा
एक सर्वे का आंकड़ा बताता है कि 73 फीसदी लोग तंबाकू खाना छोड़ना चाहते हैं, लेकिन इस का आदी होने की वजह से वे ऐसा नहीं कर पाते हैं.
अगर आप में खुद पर पक्का यकीन है, तो आप तंबाकू की बुरी लत से न केवल छुटकारा पा सकते हैं, बल्कि तंबाकू को छोड़ कर दूसरों के लिए भी रोल मौडल बन सकते हैं.
तंबाकू या उस से बनी चीजों का सेवन करने वाला शख्स अगर कुछ देर इन चीजों को न पाए, तो वह अजीब तरह की उलझन यानी तलब का शिकार हो जाता है, क्योंकि उस का शरीर निकोटिन का आदी बन चुका होता है. ऐसे में लोग तंबाकू के द्वारा निकोटिन की मात्रा को ले कर राहत महसूस करते हैं, लेकिन यही राहत आगे चल कर जानलेवा लत भी बन सकती है.
इन सुझावों को अपना कर भी तंबाकू की लत से छुटकारा पाया जा सकता है:
* तंबाकू की लत को छोड़ने के लिए अपने किसी खास के जन्मदिन, शादी की सालगिरह या किसी दूसरे खास दिन को चुनें और आदत छोड़ने के लिए इस दिन को अपने सभी जानने वालों को जरूर बताएं.
* कुछ समय के लिए ऐसी जगह पर जाने से बचें, जहां तंबाकू उपयोग करने वालों की तादाद ज्यादा हो, क्योंकि ये लोग आप को फिर से तंबाकू के सेवन के लिए उकसा सकते हैं.
* तंबाकू, सिगरेट, माचिस, लाइटर, गुटका, पीकदान जैसी चीजों को घर से बाहर फेंक दें.
* तंबाकू या उस से बनी चीजों के उपयोग के लिए जो पैसा आप द्वारा खर्च किया जा रहा था, उस पैसे को बचा कर अपने किसी खास के लिए उपहार खरीदें. इस से आप को अलग तरह की खुशी मिलेगी.
* तंबाकू की तलब होने के बाद मुंह का जायका सुधारने के लिए दिन में 2 से 3 बार ब्रश करें. माउथवाश से कुल्ला कर के भी तलब को कम कर सकते हैं.
* हमेशा ऐसे लोगों के साथ बैठें, जो तंबाकू या सिगरेट का सेवन नहीं करते हैं और उन से इस बात की चर्चा करते रहें कि वे किस तरह से इन बुरी आदतों से बचे रहे हैं.
* बीड़ीसिगरेट पीने की तलब महसूस होने पर आप अपनेआप को किसी काम में बिजी करना न भूलें. पेंटिंग, फोटोग्राफी, लेखन जैसे शौक पाल कर तंबाकू की लत से छुटकारा पा सकते हैं.
इस मुद्दे पर डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन का कहना है कि अकसर उन के पास ऐसे मरीज आते रहते हैं, जो किसी न किसी वजह से नशे का शिकार होते हैं और वे अपने नशे को छोड़ना चाहते हैं. लेकिन नशे के छोड़ने की वजह से उन को तमाम तरह की परेशानियों से जूझना पड़ता है, जिस में तंबाकू या सिगरेट छोड़ने के बाद लोगों में दिन में नींद आने की शिकायत बढ़ जाती है और रात को नींद कम आती है.
सिगरेट छोड़ने वाले को मीठा व तेल वाला भोजन करने की ज्यादा इच्छा होती है. इस के अलावा मुंह सूखने का एहसास होना, गले, मसूढ़ों व जीभ में दर्द होना, कब्ज, डायरिया या जी मिचलाने जैसी समस्या भी देखने को मिलती है. इस की वजह से वह मनोवैज्ञानिक रूप से मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाता है.
ऐसी हालत में तंबाकू की लत के शिकार लोगों को एकदम से इसे छोड़ने की सलाह दी जाती है, क्योंकि धीरेधीरे छोड़ने वाले अकसर फिर से तंबाकू की लत का शिकार होते पाए गए हैं.
तंबाकू छोड़ने के बाद अकसर कोई शख्स हताशा का शिकार हो जाता है. इस हालत में उसे चाहिए कि वह समयसमय पर किसी अच्छे मनोचिकित्सक से सलाह लेना न भूले.
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2014 में प्रदर्शित तमिल फिल्म ‘‘पिसासु’’ के हिंदी रीमेक वाली फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ इस कदर घटिया है कि इसे देखना पैसा व समय बर्बाद करने के साथ ही सिरदर्द है. इस फिल्म से दूर रहने में ही हर तरह की भलाई है. फिल्म में एक दृश्य है, जहां नानू की मां (हिमानी शिवपुरी) एक फिल्म देख रही हैं. जब नानू पूछता है कि फिल्म कैसी है, तो नानू की मां कहती है-‘‘बहुत बकवास’’. तो लेखक ने अपनी फिल्म की सच्चाई खुद ही इस दृश्य में व्यक्त कर दी है.
फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ की कहानी एक भूत की प्रेम कहानी है. आनंद उर्फ नानू (अभय देओल) दिल्ली शहर का गुंडा है. वह लोगों से उनका मकान किराए पर लेता है और फिर उसे हड़प लेता है. इसमें उसका दोस्त डब्बू (मनु रिषि) मदद करता है. एक दिन जब नानू अपनी कार से घर की तरफ वापस लौट रहा होता है, तभी उसकी मां का फोन आ जाता है, मां से मोबाइल फोन पर बात करते हुए वह गाड़ी को किनारे लगाने की कोशिश करता है, तो उसकी कार से स्कूटी की टक्कर हो जाती है और स्कूटी पर सवार लड़की सिद्धि उर्फ जानू (पत्रलेखा) की मौत हो जाती है. पर नानू को इस बात का अहसास ही नहीं है. मगर सिद्धि यानी कि जानू का भूत उसके पल्ले पड़ जाता है.
भूतनी जानू अब नानू के घर में ही रहने लगती है. और नानू के साथ कई बड़ी अजीब सी चीजें होने लगती है. नानू इनसे निजात पाने का असफल प्रयास करता है. नानू अपने दोस्त डब्बू के साथ पता लगाना शुरू करता है कि किस लड़की की मौत हुई है, जो कि भूतनी बनकर उसके साथ रह रही है. तो पता चलता है कि उस रात सड़क पर सिद्धि की मौत हुई थी. नानू,सिद्धि के पिता से मिलते हैं. सिद्धि के पिता ने सिद्धि का अंतिम संस्कार नहीं किया है. बल्कि उसके मृत शरीर को अपनी फैक्टरी में बर्फ के बीच सुरक्षित रखा है. क्योंकि वह मानते हैं कि वह जिंदा है.
अब नानू व उसका दोस्त यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि सिद्धि की हत्या किसने की. कहानी कई मूर्खतापूर्ण हास्य दृश्यों के साथ आगे बढ़ती है और फिर पता चलता है कि सिद्धि की स्कूटी की टक्कर नानू की ही कार से हुई थी. इस बीच सिद्धि के पिता नानू को बता चुके हैं कि वह तो उनकी बेटी का प्रेमी है. क्योंकि सिद्धि हमेशा कहा करती थी कि वह जिससे प्रेम करेगी, उसके घर रहने खुद ही चली जाएगी. अब नानू सिद्धि के पिता के साथ फैक्टरी पहुंचता है. तो अचानक बर्फ के टुकड़े हो जाते हैं और सिद्धि उर्फ जानू उठकर खड़ी हो जाती है. वह कहती है कि उसका समय नहीं आया था. यमराज के बंदे उसे गलती से उठा ले गए थे. इसलिए उन्होंने उसे वापस भेज दिया है और अब वह अपने प्रेमी नानू के घर में ही रहेगी. फिर अचानक एक घटना घटती है तो पता चलता है कि वह तो भूतनी ही है.
फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ को देखते चंद मिनटों में ही दर्शक को अहसास होने लगता है कि हम बुरी तरह से ठगे गए हैं. बेसिर पैर की कहानी, ऊटपटांग पटकथा वाली यह फिल्म बेवजह के हंसी के दृश्यों से भरी गयी है. फिल्म में न हौरर है, न कौमेडी है और न ही कोई अन्य भावनाएं. फिल्म में कहीं कोई लौजिक नहीं है. मनोरंजन भी नहीं है.
दर्शक अपना सिर पीटते हुए कहता है-‘‘कहां फंसायो नाथ..’’ फिल्म के निर्देशक फराज हैदर ने तो शायद कसम खा रखी थी कि वह बद से बदतर फिल्म बनाकर दिखाएंगे. फिल्म के निर्देशक फराज हैदर तो बेहतरीन प्रतिभाओं का उपयोग ही नहीं कर पाए. फिल्म का गीत संगीत भी आकर्षित नहीं करता.
जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अभय देओल बुरी तरह से निराश करते हैं. ‘सोचा ना था’, ‘देव डी’, ‘ओए लक्की लक्की ओए’, ‘शंघाई ’, ‘हैप्पी भाग जाएगी’ जैसी फिल्मों के अभिनेता अभय देओल पूरी तरह से चुक गए हैं. दो साल बाद वह अति घटिया व बेसिर पैर की कहानी, अति घटिया पटकथा वाली फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ में अति घटिया अभिनय करते हुए नजर आए हैं. कई दृश्यों में वह अपने चचेरे भाई सनी देओल की नकल करते हुए नजर आते हैं.
पूरी फिल्म में पत्रलेखा महज पांच से छह मिनट के लिए नजर आती हैं. इंटरवल से पहले दो मिनट और इंटरवल के बाद चार मिनट के लिए. पत्रलेखा के सामने एक अति घटिया फिल्म में छोटा सा किरदार निभाने की क्या मजबूरी थी, यह तो वही जानें. पर वह इस छोटे से किरदार में भी अपनी कोई छाप नहीं छोड़ती. ‘सिटी लाइट’ में अपने अभिनय से बौलीवुड में छा जाने वाली पत्रलेखा फिल्मों चयन में गलतियां कर अपने करियर पर खुद ही कुल्हाड़ी मार रही हैं.
दो घंटे की अवधि वाली एक्शन हौरर व कौमेडी फिल्म ‘‘नानू की जानू’’ के निर्माता साजिद कुरेशी, निर्देशक फराज हैदर, लेखक मनु रिषि चड्ढा, कैमरामैन एस आर सतीष कुमार,संगीतकार मीत ब्रदर्स, साजिद वाजिद, जीत गांगुली तथा कलाकार हैं-अभय देओल, पत्रलेखा, राजेष शर्मा, मनु रिषि, ब्रजेंद्र काला, मनोज पाहवा, हिमानी शिवपुरी व अन्य
एकता कपूर के अपकमिंग सीरियल ‘नागिन-3’ की चर्चा काफी समय से हो रही थी. सीरियल में करिश्मा तन्ना और अनीता हसनंदानी ‘नागिन’ का किरदार निभाने वाली हैं. इन दोनों लीड एक्ट्रेस का नागिन वाला हौट लुक तो पहले ही सामने आ चुका है. खुद एकता कपूर ने सोशल मीडिया पर ‘नागिन 3’ के दो पोस्टर रिलीज किए थे हालांकि एकता ने सीरियल के बाकि एक्टर्स का खुलासा नहीं किया है.
लेकिन अब अनीता हसनंदानी ने सीरियल के सेट पर अपनी कुछ तस्वीरें और वीडियो को सोशल मीडिया पर साझा किया है. जिन्हें देखने के बाद साफ है कि उन्होंने इस शो की शूटिंग शुरू कर दी है. तस्वीरों में साफ है कि नागिन के किरदार के साथ अनीता न्याय करने वाली हैं. फैंस उन्हें अब शो में देखने के लिए काफी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. जानकारी के मुताबिक अनीता इस सीरियल में निगेटिव किरदार में नजर आएंगी. फिलहाल अनीता इन दिनों स्टार प्लस के मशहूर सीरियल ‘ये है मोहब्बतें’ में भी शगुन का किरदार निभा रही हैं.
बता दें कि इससे पहले टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले ‘नागिन’ सीरियल के दोनों सीरीज में मौनी राय और अदा खान लीड रोल में थीं. दोनों ही सीजन में दर्शकों ने इनके किरदार को काफी पसंद किया है. कहा जा रहा है इस बार आने वाले सीरियल ‘नागिन-3’ में पहले से ज्यादा स्पेशल इफेक्ट्स का इस्तेमाल किया जा रहा है. हालांकि यह सीरियल कब से शुरू होगा इस बात की जानकारी नहीं मिली है.
VIDEO : नेल आर्ट डिजाइन – टील ब्लू नेल आर्ट
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