बौडी फिट तो लाइफ हिट

अच्छा स्वास्थ्य हर कोई चाहता है, लेकिन आज के तनाव भरे वातावरण में अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना करना एक चुनौती से कम नहीं है. अधिकतर लोगों का मानना है कि पौष्टिक भोजन करने से ही शरीर हमेशा स्वस्थ और तंदुरुस्त रहता है, लेकिन यह बात कुछ हद तक ही सही है. क्योंकि कोई भी आहार लेने से पहले व्यक्ति को यह देख लेना चाहिए कि वह जो भोजन खा रहा है, क्या उस को पचाने की शक्ति उस के पास है.

भोजन पचाने का काम अधिकतर व्यक्ति के परिश्रम पर निर्भर करता है. जितनी अधिक वह मेहनत करता है, उतना ही अधिक उसे पौष्टिक आहार लेने की आवश्यकता पड़ती है.

आज के युवा पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक भोजन के बजाय स्वाद को ज्यादा तरजीह देते हैं. नतीजतन, वे कम उम्र में ही आलसीपन और मोटापे के शिकार हो जाते हैं. ऐसे में चाह कर भी वे फिट बौडी नहीं रख सकते. शारीरिक रूप से फिट व्यक्ति को कई प्रकार के लाभ मिलते हैं:

  • आप का एनर्जी लेवल बढ़ता है.
  • शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.
  • आप मानसिक रूप से स्वस्थ रह सकते हैं.
  • आप में आत्मविश्वास की भावना बढ़ती है.

खुद को हमेशा चुस्त दुरुस्त बनाने के लिए डेली वर्कआउट करना बहुत जरूरी है. मुंबई के एलिविंसर फिटनैस केंद्र के ट्रेनर डिसूजा कहते हैं, ‘‘शरीर को फिट रखने के लिए नियमित व्यायाम जरूरी है. साथ ही, खूब पानी पिएं ताकि शरीर के टौक्सिक कण बाहर निकल जाएं. भूखे पेट काम करना सब से अधिक हानिकारक है. खाना 3 बार के बजाय 6 बार खाएं ताकि आप कभी आलसीपन महसूस न करें. अधिकतर युवा दूसरे कार्यों की वजह से वर्कआउट करना छोड़ देते हैं, जिस से उन के शरीर पर बुरा असर पड़ता है. कार्य चाहे कुछ भी हों पर वर्कआउट रोज करना चाहिए.

‘‘कई युवा मोटापे के शिकार होने पर जिम का रुख करते हैं जबकि 18 साल के बाद अगर वे किसी भी प्रकार के वर्कआउट को नियमित रूप से अपनी दिनचर्या में शामिल करेंगे तो हमेशा स्वस्थ रहेंगे. हर व्यक्ति को 40 से 45 मिनट रोज वर्कआउट करना चाहिए.’’

स्नैप फिटनैस जिम के फिटनैस ट्रेनर शैलेंद्र सावंत 15 साल से इस क्षेत्र में हैं का कहना है, ‘‘मुंबई में 75 फीसदी लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हैं. उन में महिलाएं कम, पुरुष अधिक हैं. यहां हर युवा हिंदी सिने कलाकार से प्रेरित है और उन के बौडी स्टाइल को खुद भी अपनाना चाहता है. कई बार वे वर्कआउट कम शुरू तो करते हैं पर बीच में छोड़ जाते हैं.

‘‘नियमित वर्कआउट करने से कई बीमारियां नहीं होती है. शरीर का ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है, जिस से भूख लगती है. भोजन में रोटी, सब्जीदाल के साथसाथ प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होनी चाहिए. जंकफूड से हमेशा दूर रहें. हर व्यक्ति  को चुस्त रहने के लिए 40 से 50 मिनट रोज व्यायाम करना चाहिए.

‘‘शरीर के हर भाग के लिए अलग अलग व्यायाम हैं, जिसे ट्रेनर की सहायता से सीखना चाहिए. बौडी मास इंडैक्स के साथसाथ फैट प्रतिशत की जांच भी जरूरी है.’’

शैलेंद्र आगे कहते हैं, ‘‘वर्कआउट करने के बाद कुछ लोगों को शिकायत होती है कि उन का वजन कम नहीं हो रहा है. ऐसे में वे कहते हैं कि व्यक्ति को 1 किलो के वजन पर सिर्फ 1 ग्राम प्रोटीन लेना चाहिए. गाइडलाइन के द्वारा अगर आप सही डाइट लेंगे, तो वजन अवश्य कम होगा और आप चुस्तदुरुस्त रहेंगे. 15-16 साल के युवा भी हलकाफुलका वर्कआउट कर सकते हैं. उन्हें कम उम्र से ही स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना चाहिए.’’

जब आप इतनी सारी खूबियां अपनी बौडी को फिट बना कर पा लेंगे तो जाहिर है कि लाइफ भी हिट हो ही जाएगी.

कुछ फायदे जो बौडी फिट होने पर मिलते हैं:

    • आत्मविश्वास बढ़ेगा.
    • मानसिक दबाव कम होगा.
    • ब्लड सर्कुलेशन बढ़ेगा.
    • शक्ति बढ़ेगी.
    • हृदय मजबूत होगा.
    • ऊंचाई बढ़ेगी.
    • बोन डैन्सिटी अच्छी होगी.
    • मांसपेशियों का विकास सही तरीके से होगा.

 

वीडियो : एविल आई नेल आर्ट

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अंधविश्वास : बाबागीरी का गोरखधंधा

  • ‘बाबा की ऐयाशी का अड्डा’
  • ‘गुफा का रहस्य’
  • ‘दत्तक पुत्री का सच’

आजकल लगभग हर न्यूज चैनल ऐसी कितनी ही कहानियां और गुफा के आभासी वीडियो दिखा कर लोगों को भ्रमित कर रहा है.

सवाल उठता है कि खोजी मीडिया चैनल्स इतने सालों से कहां थे? न तो बाबा नए हैं, न ही गुफाएं रातोंरात बन गई हैं. फिर यह कैसी दबंग पत्रकारिता है जो अब तक सो रही थी. अब बाबाओं के जेल जाते ही यह मुखरित होने लगी है.

इन स्वार्थी और अवसरवादी चैनलों पर भी जानबूझ कर जुर्म छिपाने का आरोप लगना चाहिए, क्योंकि ये दावा करते हैं कि–देशदुनिया की खबर सब से पहले, आप को रखे सब से आगे… वगैरहवगैरह.

किसी भी बाबा का मामला उजागर होते ही सारा इलैक्ट्रौनिक मीडिया एक सुर में अलापना शुरू कर देता है कि लोग इतने अंधविश्वासी कैसे हो गए?

चैनल्स राशिफल, बाबाओं के प्रवचन, तथाकथित राधे मां या कृष्णबिहारी का रंगारंग शो, प्यासी चुडै़ल, नागिन का बदला, कंचना, स्वर्गनरक, शनिदेव जैसे तमाम अंधविश्वासों पर आधारित कार्यक्रम दिनरात चला कर लोगों के दिमाग में कूड़ा भरते हैं और बेशर्म बन कर टीवी पर चोटी कटवा जैसे मुद्दे पर डिबेट करवाते हैं. फिर पूछते हैं कि लोग अंधविश्वासी कैसे बन गए.

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अगर सच में आप जनता को सचाई दिखाना चाहते हैं तो अपने जमीर को जिंदा कर दिखाएं. गरीबी से जूझ रहे लोगों, बढ़ती बेरोजगारी, रोजाना बढ़ रही महंगाई, अस्पतालों की अवस्था, डाकू बने डाक्टरों, जगहजगह पड़े कचरे के ढेरों, भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी तंत्रों की जमीनी हकीकत और निष्पक्ष जांच न्याय प्रणालियों को दिखाओ. तब जा कर नए भारत का सपना कुछ हद तक सही हो सकता है.

पिछले दिनों एक दैनिक अखबार के मुखपृष्ठ पर एक विज्ञापन छपा था. अखबार के एक ही एडिशन में उस के छपने की कीमत कम से कम डेढ़दो लाख रुपए तो होगी ही. ऐसे न जाने कितने एडिशनों में यह विज्ञापन छपा था.

समझ में यह नहीं आता कि इतने महान बाबाओं के समागमों और प्रवचनों के बावजूद देश में असमानता, हिंसक वारदातें, अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं. यही न कि धर्म के नाम पर लोगों को उल्लू बनाते रहो और अपनी दुकान चलाते रहो.

विज्ञापन में यह दावा भी किया गया कि इस कथित ब्रह्मांडरत्न को साक्षात श्रीहरि ने देवराज इंद्र को प्रदान किया था.

कहते हैं कि जिस देश की प्रजा जैसी होती है, उसे वैसा ही राजा मिल जाता है. इस में कमी हम भारतीयों की भी नहीं है. किसी गरीब को 10 रुपए मेहनत के देने हों तो उसे पाठ पढ़ा देंगे, लेकिन मंदिरमसजिदों में, बाबाजी के समागमों में हजारों खर्च कर देंगे.

मीडिया भी है जिम्मेदार

आध्यात्मिक या धार्मिक पोंगापंथ फैलाने वाले चैनल्स व समाचारपत्र बाबाओं की एक ऐसी फौज खड़ी कर रहे हैं जो देश में धर्म के नाम पर लूटखसोट मचा रही है. लगातार बढ़ रही इन की फेहरिस्त और इन पर हर रोज चलने वाले बाबाओं के प्रवचनों में आध्यात्म के नाम पर लोगों को उल्लू बनाया जा रहा है.

धर्मभीरू जनता का जितना शोषण धार्मिकता का लबादा ओढ़े इन बाबाओं ने किया है, उस में चैनलों और समाचारपत्रों का भी बराबर या उस से भी ज्यादा हाथ है. चैनल अपने फायदे को कैश करने के लिए बाबाओं को बराबर पब्लिसिटी और एंकर तक मुहैया करवा कर उन का तथाकथित धार्मिक सामान बेचने का औफर दे रहे हैं.

पाखंडी बाबा किसी भी तरह से अपनी जेबें भरने में जुटे हुए हैं. इन की प्रौपर्टी और बैंकबैलेंस का मुकाबला कुबेरपति भी नहीं कर सकते. भक्तों के बीच ये ऐसे महात्मा हैं जिन का माहात्म्य विवादों में उलझ कर रह गया है. ये मोहमाया छोड़ने का आह्वान करते हैं जबकि वे खुद गले तक मोह और माया में जकड़े हुए हैं.

वीडियो : एविल आई नेल आर्ट

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आज भी आधे अधूरे हैं नीलोफर के सवालों के जवाब

कहानी की शुरुआत एक उर्दू मैगजीन के औफिस से होती है. एक हसीन नौजवान शायरा नीलोफर गुस्से में तमतमाई औफिस में दाखिल होती है और एक कर्मचारी से एडीटर का पताठिकाना पूछती है. उस कर्मचारी के मुंह में पान की पीक भरी थी. वह इशारा कर के उसे चपरासी के साथ एडीटर के कमरे की तरफ भेज देता है.

चपरासी जब नीलोफर का विजिटिंग कार्ड एडीटर को देता है तो वह एक मुलाजिम पर किसी बात पर गुस्सा हो रहा होता है और उसी गुस्से में कार्ड अंगुलियों पर घुमाते हुए बोलता है, ‘‘जाओ, कह दो मेरे पास वक्त नहीं है.’’

बाहर खड़ी नीलोफर यह सब सुनती है तो उस का पारा और चढ़ जाता है और वह गुस्से में धड़ाम से दरवाजा धकेलने की बेअदबी करने से खुद को नहीं रोक पाती और कमरे में पहला कदम रखते ही लगभग चिल्लाती है, ‘‘वक्त तो मेरे पास भी नहीं है जनाब.’’

हैदर जैसे ही उस गुस्ताख आवाज और लड़की को देखने के लिए नजर उठाता है तो ऐसे चौंकता है, मानो बिच्छू ने डंक मार दिया हो. ठीक यही हालत नीलोफर की भी था, जो गुस्सा भूल कर हैदर को इस तरह अपलक देख रही थी, मानो उसे यकीन न हो रहा हो.

चंद लमहे दोनों सुधबुध खो कर बिना पलक झपकाए एकदूसरे को देखते रहते हैं. और जब खुद पर यकीन हो जाता है कि वे कोई ख्वाब नहीं देख रहे हैं तो सहज होने की कोशिश करते हैं. हैदर मुलाजिम को कमरे से बाहर भेज देता है और चपरासी को चायनाश्ता लाने का हुक्म देता है. इस दौरान उस की हड़बड़ाहट देखने काबिल होती है.

नीलोफर अदब से उसे आदाब करती है और वह भी उसे पूरी इज्जत से बैठाता है. हैदर को इस बात पर कुदरती तौर पर हैरानी होती है कि इतने बड़े नवाब खानदान की बहू यूं आ कर 50 रुपए फीस के लिए झिकझिक करेगी. नीलोफर हैदर को बताती है कि वह नाम बदल कर नज्में लिखती है और इसी शहर के एक गर्ल्स हौस्टल में रहती है. यह सुन कर हैदर और भी ज्यादा चकरा जाता है.

थोड़ी देर में दोनों सहज हो जाते हैं और फिर शुरू होता है बातचीत का सिलसिला, जिस में हैदर नीलोफर को बड़ी बेतकल्लुफी से बताता है कि कालेज के दिनों में वह उस पर मरता था और उसे इंप्रैस करने के लिए उस ने क्याक्या नहीं किया था. वह आगे बताता है कि कालेज के पहले ही दिन नीलोफर यानी उस की चर्चा हुई थी तो लड़के कह रहे थे कि नीलोफर है तो बला की खूबसूरत, लेकिन किसी को घास तक नहीं डालती.

इस पर हैदर ने एक दोस्त सैफ से शर्त लगाई थी और 10 रुपए जीत गया था. नीलोफर यह जान कर चकित होती है कि हैदर उसे चाहने लगा था तो उस ने कभी अपनी चाहत का इजहार क्यों नहीं किया. हालांकि एक दफा गुलाब का फूल ले कर वह उस के घर तक भी गया था, पर अल्हड़ नीलोफर ने उसे झिड़क कर भगा दिया था. इस के बाद मायूस हैदर ने उसे भूल जाने में ही बेहतरी समझी. यह दीगर बात है कि वह उसे कभी भूल नहीं पाया.

हैदर नीलोफर को बताता है कि शर्त में जीते 10 रुपए और कभी उस की किताब से गिरा गुलाब का फूल आज भी उस के पास सलामत है. और तो और नीलोफर को पटाने के लिए उस ने एक सितार भी खरीदा था, लेकिन जिस दिन उसे मालूम हुआ कि उस नीली आंखों वाली नीलोफर की शादी किसी नवाब से होने जा रही है तो उस ने दूसरी यादों की तरह उस सितार को भी हमेशा के लिए सहेज कर एक कोने में रख दिया, साथ ही उस ने उस का नाम ही नीलोफर रखा था.

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अपनी बात सुना कर जब वह नीलोफर से उस के बारे में पूछता है तो वह सुबकने लगती है. फिर धीरेधीरे कई मुलाकातों में अपनी दर्दभरी दास्तां बयान करती है, जिसे सुन कर हैदर का दिल दर्द से भर जाता है.

जहां से तुम्हारी कहानी खत्म होती है, वहीं से मेरी कहानी शुरू होती है. नीलोफर हैदर को बताती है कि कालेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद उस की शादी वसीम से तय हो गई थी. वसीम एक नामी नवाब खानदान का वारिस था, जिसे वह बचपन से जानती थी और चाहती भी थी. वसीम विदेश से वापस लौटा तो उन दोनों की शादी धूमधड़ाके से हो गई.

शादी के दूसरे दिन ही वसीम को तार के जरिए इत्तला मिली कि उसे एक फाइवस्टार होटल का कौंट्रैक्ट मिल गया है. यह सुन कर वह मारे खुशी के झूम उठा और नीलोफर को अपने लिए लकी मानने लगा. महत्त्वाकांक्षी वसीम रोमांटिक तो था, लेकिन बहुत सारा पैसा कमा लेना चाहता था, इसलिए शादी के बाद वह अपने कारोबार में इस तरह तल्लीन हो गया कि नीलोफर के लिए उस के पास वक्त ही नहीं रहा.

वह नीलोफर से अकसर वादा करता रहता कि आज फिल्म देखने चलेंगे या किसी होटल में साथसाथ लंच करेंगे. यह सुन कर नीलोफर खुश हो जाती थी, लेकिन वसीम कभी वक्त पर नहीं आता तो वह झल्लाने लगती थी. फिर भी वसीम हर बार प्यार से उसे मना लेता था.

जब वे हनीमून मनाने मुंबई गए, तब भी वसीम अपनी कारोबारी मीटिंगों में उलझा रहा और वह फाइवस्टार होटल में अकेली पड़ी उस का इंतजार करती रही.

इसी दौरान वसीम के घर वाले यानी नीलोफर के सासससुर और ननद व उस के बच्चे हज पर चले गए तो वह और भी तनहा हो गई. अब बड़ी हवेली में घर का बुजुर्ग नौकर जुम्मन भर रह गया था, जो उसे छोटी दुलहन कह कर पुकारता था. रोजाना डायरी लिखने की शौकीन नीलोफर अपनी तनहाई का दर्द पन्नों पर उतारती थी.

एक दिन उस वक्त हद हो गई, जब देर रात वसीम शराब पी कर आया. इस पर नीलोफर ने ऐतराज जताया और मरजी न होते हुए शौहर की मांग पर सैक्स करने से मना कर दिया. इस के लिए वसीम ने उसे खासी खरीखोटी सुनाई. उस रात दोनों में खूब तकरार हुई और नीलोफर दूसरे कमरे में जा कर सो गई. नशे में धुत वसीम अपने बिस्तर पर लुढ़क गया.

सुबह जब नीलोफर जागी तो रेडियो चालू करने पर 18 अक्तूबर की तारीख सुन उसे याद आया कि आज तो बड़ा मुबारक दिन है. एक साल पहले इसी दिन वसीम से उस की शादी हुई थी.

नीलोफर तय कर लेती है कि आज सारे गिलेशिकवे भूल जाएगी. रात की बात भूल कर वह जुम्मन मियां के हाथ से चाय की ट्रे ले कर खुद वसीम को चाय देने जाती है और प्यार से वसीम को जगाती है. वसीम दोहराता है कि आज उस की जिंदगी का सब से भाग्यशाली दिन है, क्योंकि आज ही के दिन नीलोफर उस की शरीकेहयात बनी थी.

प्यारभरी बातें करतेकरते दोनों तय करते हैं कि अब कभी लड़ाईझगड़ा नहीं करेंगे और प्यार से रहेंगे. औफिस जातेजाते वसीम उसे बताता है कि उस ने आज शाम हवेली में शादी की पहली सालगिरह की बड़ी दावत रखी है और वह वक्त पर घर आ जाएगा.

नीलोफर दिन भर सजतीसंवरती है और पार्टी की तैयारियां करती है. उस की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. शाम ढलते ही मेहमानों के आने का सिलसिला शुरू हो गया, पर वसीम आदतन वक्त पर नहीं आया. घंटे दो घंटे तो नीलोफर ने सब्र किया, पर मेहमानों के बारबार वसीम के दावत में न होने के जवाब पर झूठ बोलतेबोलते वह झल्लाने लगी. पार्टी में कालेज के जमाने का दोस्त सैफ भी आया था, जो अब एक मैगजीन का एडीटर बन गया था.

जब मेहमान ज्यादा ताने मारने लगते हैं तो गुस्साई नीलोफर बगैर कुछ कहेसुने ऊपर जा कर अपने कमरे में बंद हो जाती है और शौहर की व्यस्तता को कोसती है. नीचे दावत में सैफ और एक अन्य औरत के भड़काने पर मेजबान के न होने को अपनी बेइज्जती समझ मेहमान बगैर खाना खाए चले जाते हैं. सालगिरह का केक ज्यों का त्यों रखा रह जाता है.

देर रात वसीम वापस आता है तो जुम्मन से उसे पता चलता है कि मेहमान बगैर खाना खाए ही चले गए हैं. वसीम को नीलोफर की यह हरकत नागवार गुजरती है. उसे लगता है कि बीवी ने जानबूझ कर उस के नवाबी खानदान की बेइज्जती करा दी है.

कमरे में जा कर वह नीलोफर से सफाई मांगता है तो पहली दफा वह ऊंची आवाज में उस के हर सवाल का सधा जवाब देती है. दोनों में खूब झगड़ा होता है. वसीम अपनी गलती नहीं मानता और नीलोफर के माफी न मांगने पर उसे ‘तलाक तलाक तलाक’ कह कर हवेली से निकाल देता है.

अपनी कहानी सुना कर नीलोफर सिसकने लगती है तो हैदर उसे सांत्वना देते हुए पूछता है कि वह बजाय अपने घर यानी मायके जाने के हौस्टल में क्यों रहती है? इस पर नीलोफर जवाब देती है कि शौहर के घर के अलावा दुनिया की कोई भी चारदीवारी औरत के लिए घर नहीं हो सकती. यह जवाब सुन कर हैदर निरुत्तर हो जाता है.

वह मन ही मन नीलोफर से शादी करने का फैसला कर लेता है. नीलोफर भी उस की सादगी और रोमांटिक अंदाज पर फिदा हो जाती है. बढ़ती मेलमुलाकातों के दौरान प्यार का इजहार होता है और शादी की बात भी हो जाती है.

लेकिन शादी के पहले ही नीलोफर सैफ की मैगजीन में नौकरी कर लेती है. मिठाई ले कर वह यह खबर हैदर को सुनाने जाती है तो वह अचकचा उठता है, क्योंकि वह जानता था कि सैफ अच्छा आदमी नहीं है. वह अव्वल दरजे का लंपट है. लेकिन वह नीलोफर से सीधे उस के यहां नौकरी करने के लिए मना नहीं कर पाता.

हैदर को मिठाई खिला कर नीलोफर उस के दफ्तर से चली जाती है, लेकिन अपना चश्मा वहीं भूल जाती है. अपने दफ्तर में बदनीयत सैफ जानबूझ कर नीलोफर को देर रात तक काम के बहाने बैठाए रखता है और सभी मुलाजिमों के चले जाने के बाद अकेले में उस की इज्जत लूटने की कोशिश करता है. इत्तफाक से नीलोफर का चश्मा लौटाने आया हैदर वक्त पर पहुंच जाता है और नीलोफर को सैफ के चंगुल से बचा लेता है.

जल्द ही दोनों शादी का फैसला कर लेते हैं. इस बीच नीलोफर की याद में तड़पते हुए पछता रहा वसीम उसे वापस पाने की हर मुमकिन कोशिश करता है, लेकिन नीलोफर उस की बातें सुन कर नहीं पसीजती. एक बार वसीम के बुलावे पर वह हवेली गई भी, लेकिन जल्द ही वापस भी लौट गई. उस वक्त नशे में धुत हवेली में पड़ा वसीम एक पुरानी गजल सुन रहा था.

जुम्मन नीलोफर से वापस आने की गुजारिश करता है, पर नीलोफर का दोटूक जवाब सुन कर वह खामोश रह जाता है कि आज जिस चौराहे पर मैं खड़ी हूं, वहां से कोई भी रास्ता इस घर की तरफ नहीं आता.

मायूस वसीम इमाम से मिलता है और नीलोफर से दोबारा शादी के बारे में पूछता है. इस पर इमाम उसे हलाला का हवाला दे कर बताता है कि नीलोफर को उस से दोबारा शादी करने से पहले किसी गैदमर्द से शादी करनी होगी और बाकायदा बीवी की तरह उस के साथ कुछ वक्त गुजारना होगा. अगर उस का वह शौहर नीलोफर को तलाक देने पर तैयार हो जाए, तभी वह उस से शादी करने का हकदार होगा.

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हैदर और नीलोफर की शादी में वसीम तोहफा ले कर पहुंचता है और उसे मुबारकबाद देता है, तभी बिजली चली जाती है. बिजली ठीक कराने हैदर खुद जाता है तो वसीम नीलोफर से कहता है कि तुम ने शादी करने का ठीक फैसला लिया, अब जल्द से घर वापस आ जाओ, मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.

नीलोफर उसे समझाने की कोशिश करती है कि यह उस की गलतफहमी है कि वह अब भी उसे चाहती है और हलाला के लिए शादी कर रही है. वह अपनी बात सख्ती से वसीम को समझा पाती, इस के पहले ही बिजली और हैदर दोनों आ जाते हैं, लिहाजा वह चुप हो जाती है.

शादी के बाद हैदर के घर आ कर नीलोफर को सुकून मिलता है. हैदर बेहद रोमांटिक होने के साथसाथ उस का खयाल रखने वाला शौहर भी है, जो उस की हर पसंदनापसंद का खयाल रखता है.

नीलोफर साफसाफ महसूस करती है कि वसीम के पास उस के लिए वक्त नहीं होता था, पर हैदर के पास उस के लिए मुकम्मल वक्त है. जैसा घर और शौहर उसे चाहिए था, दूसरी शादी के बाद ठीक वैसा ही मिल गया.

दोनों हनीमून मनाने मुंबई पहुंचते हैं तो इत्तफाक से उन्हें उसी होटल और उसी कमरे में जगह मिलती है, जहां पहली शादी के बाद वसीम और उसे मिली थी. यहां तक कि होटल का स्टाफ भी नीलोफर को पहचान लेता है कि वह करीब 2 साल पहले भी अपने शौहर के साथ यहां आई थी.

नीलोफर की हालत अजीब हो जाती है. उसे रहरह कर वसीम के साथ वहां गुजारा वक्त याद आने लगता है. हालांकि उस के दिल में अब वसीम के लिए कुछ भी नहीं था, मगर यादें आसानी से पीछा नहीं छोड़तीं.

घर वापस आ कर वह इन तमाम वाकयों को आदतन सिलसिलेवार डायरी में लिखती जाती है. एक दिन हैदर उस की डायरी पढ़ लेता है. बीवी का लिखा यह जुमला उस के चेहरे की रंगत उड़ा देता है कि औरत अपना पहला प्यार कभी नहीं भूलती.

इस डायरी को पढ़ने के बाद हैदर के मन में शक पैदा हो जाता है कि नीलोफर उस से शादी करने और इतना प्यार देने के बाद भी वसीम को भूल नहीं पाई है. नीलोफर उस का पहला प्यार थी, इसलिए उसे एकदम इस बात पर यकीन भी नहीं होता.

अपनी तसल्ली के लिए वह एक मनगढं़त कहानी उसे सुना कर क्लाइमैक्स पूछता है कि एक लड़की थी, जो एक लड़के से बेहद प्यार करती थी. दोनों की सगाई हो चुकी थी, लेकिन लड़का मिलिटरी में था और जंग के चलते उस के मरने की खबर आई.

कुछ दिनों बाद लड़की की शादी दूसरे लड़के से तय हो जाती है. दोनों एकदूसरे को बहुत चाहते हैं, लेकिन तभी पता चलता है कि उस का मंगेतर मरा नहीं था, बल्कि जिंदा था. ऐसी स्थिति में एक अजीब सी उलझन पैदा हो जाती है. हैदर नीलोफर से पूछता है कि ऐसे में लड़की को किस लड़के को चुनना चाहिए. नीलोफर कुछ सोच कर जवाब देती है कि पहले लड़के को.

इस जवाब को सुन कर हैदर सन्न रह जाता है और समझता है कि नीलोफर अभी भी वसीम को चाहती है. उस ने उसे महज हलाला की रस्म अदा करने के लिए उस से शादी की है. वह मन ही मन दोनों के रास्ते से हटने का फैसला ले लेता है.

नीलोफर के जन्मदिन पर वह बतौर तोहफा वसीम को सामने ला कर खड़ा कर देता है तो वह सन्न रह जाती है. हैदर के यह कहने पर कि तुम्हीं ने तो उस कहानी का क्लाइमैक्स तय किया था. नीलोफर समझ जाती है कि हैदर एक ऐसी गलतफहमी का शिकार हो गया है, जो अब दूर होने वाली नहीं है.

इधर दरियादिली दिखाते हुए हैदर उसे शरई तौर पर आजाद करने की बात कहता है तो वह और भी तिलमिला उठती है.

वह हैदर और वसीम दोनों से कहती है कि आप मर्दों ने औरत को समझ क्या रखा है, जेब में रखा नोट या पलंग, जो जब चाहा बदल लिया. औरत क्या जायदाद होती है, जो जब चाहा, दूसरे को दे दिया. वसीम ने तलाक गाली की तरह दिया तो हैदर तोहफे की तरह दे रहा है. क्या औरत की मरजी और वजूद के कोई मायने नहीं हैं.

इसी गुस्से में वह एक सवाल और पूछती है कि जब निकाह औरत की मरजी से होता है तो तलाक उस की बिना मरजी के कैसे हो सकता है? नीलोफर के बेबस गुस्से के सवालों के जवाब न तो वसीम के पास थे और न ही हैदर के पास.

निकाह, तलाक और शरीयत के खेल में औरत के वजूद और हैसियत को तलशते सवालों के जवाब बीती 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले में सिमटे हैं, जो अभी पूरी तरह साफ नहीं हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने 3 तलाक के रिवाज को नाजायज बताते हुए संसद को इस बाबत कानून बनाने का निर्देश दिया तो निर्मातानिर्देशक बलदेव राज चोपड़ा की साल 1982 में प्रदर्शित ‘निकाह’ फिल्म की इस कहानी की याद हो आई, जो स्वाभाविक बात थी. इस फिल्म में वसीम की भूमिका में दीपक पाराशर, हैदर की भूमिका में राजबब्बर और नीलोफर के किरदार को पाकिस्तानी मूल की नायिका और गायिका सलमा आगा ने निभाया था.

बहुत सी सत्यकथाओं के बीच निकाह फिल्म की यह कहानी उन से ज्यादा प्रभावी साबित हुई थी, जब भारत सहित पाकिस्तान में भी कट्टरवादी इस फिल्म के विरोध में सड़कों पर उतर आए थे.

किसी को अंदाजा नहीं था कि एक कुरीति पर प्रहार करती फिल्म ‘निकाह’ इतनी हिट साबित होगी. इस की वजह इस की कास्टिंग बेहद कमजोर मानी जा रही थी और हकीकत में थी भी. फिर भी फिल्म को इसलिए पसंद किया गया, क्योंकि यह एक कुरीति के विरुद्ध कटु सत्य बयां करती थी.

‘निकाह’ के सफल होने की वजह एक ज्वलंत सामाजिक समस्या को बेहद सटीक अंदाज में पेश किया जाना था. प्रसिद्ध लेखिका अचला नागर द्वारा लिखित इस कहानी में तलाकशुदा औरत की बेबसी को सलमा आगा ने जीवंत कर दिया था.

मर्दों का समाज पर किस हद तक दबदबा है, यह भी फिल्म ने साबित किया था. क्योंकि परेशानी एक नहीं, बल्कि लाखों नीलोफरों की है, जो तलाक तलाक तलाक के बुरे दौर से गुजरती हैं तो कहीं की नहीं रह जातीं, न घर की न घाट की.

चूंकि फिल्म थी, इसलिए इस का अंत सुखद था. नहीं तो आमतौर पर ऐसा होता नहीं है कि कोई वसीम अपनी गलती और खुदगर्जी स्वीकार ले. 3 लफ्ज तलाक के कह कर बीवी को अपनी जिंदगी और घर से निकाल देना कोई मर्दानगी की नहीं, बल्कि सामाजिक तौर पर शर्मिंदगी और जलालत की बात है.

बी.आर. चोपड़ा की इस फिल्म में कई और भी दिलचस्प बातें थीं. मसलन पहली बार चरित्र अभिनेता इफ्तिखार ने नौकर का रोल किया था, नहीं तो वह अकसर पुलिस इंसपेक्टर, डाक्टर या जज के रोल में ही दिखाई देते थे.

दूसरे चोपड़ा साहब ने इस फिल्म का नाम पहले ‘तलाक तलाक तलाक’ रखा था, जिस पर उन के नजदीकी मुसलिम दोस्त ने चिंता जताते हुए कहा था कि ऐसे तो एक दिन में लाखों तलाक हो जाएंगे, क्योंकि मुसलमान दर्शक जब यह फिल्म देख कर घर पहुंचेंगे और बीवी के पूछने पर फिल्म का नाम बताएंगे तो वे ‘तलाक तलाक तलाक’ कहेंगे और शरीयत के मुताबिक उन का तलाक हो जाएगा. इस पर बी.आर. चोपड़ा ने फिल्म का नाम ‘निकाह’ रख दिया था.

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‘निकाह’ फिल्म के गाने आज 35 साल बाद भी शिद्दत से गाए और गुनगुनाए जाते हैं, जिन में सलमा आगा ने भी आवाज दी है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सलमा आगा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई भी दी थी और इस फैसले को औरतों के हक में राहत देने वाला बताया था.

35 सालों तक नीलोफर के सवाल जवाब तलाशते रहे, जिन्हें अब कानूनी जामा संसद पहनाएगी. इस पर विवाद और बहस जारी है. अपने हक की लड़ाई लड़ती औरतें अपनी दास्तां बयान कर रही हैं, पर क्या यह इतना आसान है? इस सवाल का जवाब बेहद निराशाजनक तरीके से न में निकलता है.

80 के दशक के एक शिक्षित मुसलमान परिवार में तलाक बड़ी आसानी से दे दिया जाता था तो अशिक्षित तबके में क्या कुछ नहीं होता होगा, इस का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि मर्द अपने दबदबे और शरीयत का किस तरह फायदा उठा रहे थे.

दहेज कानून के बाद भी दहेज हत्याएं जारी हैं, बहुएं जलाई जा रही हैं. ऐसे में क्या नए प्रस्तावित कानून के मसौदे से उम्मीद रखी जाए? तलाक के मुकदमे सालोंसाल चलते हैं, जिस का खामियाजा और तनाव मियांबीवी दोनों को भुगतना पड़ता है.

असल में फसाद की जड़ धर्म और कानून दोनों हैं. कानून बना तो मुसलिम औरतें और मर्द दोनों सालोंसाल अदालत के चक्कर काटते 3 तलाक के दिनों को याद करेंगे कि इस से बेहतर तो वही था. अगर भाग कर वे धर्म की शरण लेने को विवश होंगे तो यह उस कानून की हार होगी, जिस पर आज देश भर में जश्न मनाया जा रहा है.

औरत किसी कानून के बना देने से मुसीबतों से छुटकारा नहीं पा सकती, यह कहने और स्वीकारने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए. जब तक तलाक नहीं हो जाता, तब तक उस से कोई दूसरी शादी नहीं कर सकता. ऐसे में उस की हैसियत क्या होगी, कौन उसे छत और रोटी देगा, इस पर कानून शायद ही कुछ बोले या करे.

नीलोफर के सवालों के मुकम्मल जवाब अभी भी नहीं मिले हैं और न ही मिलने की उम्मीद है, क्योंकि समाज और धर्म पर कब्जा और दबदबा तो मर्दों का ही था, है और रहेगा. बहस तलाक के तरीके पर हो रही है, औरत की हैसियत सुधारने पर हर कोई खामोश है.

इन महिलाओं पर नहीं चलता इराकी शरीयत का कानून

इराक ऐसा मुसलिम देश है, जहां शरीयत कानून चलता है, जिस की वजह से वहां की महिलाओं पर तमाम पाबंदियां हैं. मसलन वे बिना बुरका पहने नहीं निकल सकतीं, इधरउधर घूम नहीं सकतीं, मर्दों के साथ पार्टियां नहीं कर सकतीं. वहीं दूसरी ओर एक तबका ऐसा भी है, जिस पर ये पाबंदियां लागू नहीं होतीं.

यह तबका है उच्चवर्ग का. उन के घर की महिलाएं चाहे जिस तरह का कपड़ा पहनें, जहां मन हो वहां आएंजाएं, बिना बुरका पहने घूमें, कोई रोकनेटोकने वाला नहीं है. यही नहीं, वे शराब और सिगरेट भी पीती हैं, कोई कुछ नहीं कहता.

एक ही देश में भेदभाव के आधार पर शरीयत का कानून लागू करने वाली बात अजीब सी लगती है. जब शरीयत का कानून लागू होता है तो वह सभी के साथ होना चाहिए, इस में भेदभाव कैसा. बंदिशों की वजह से अनेक महिलाएं घुटघुट कर जी रही हैं. एक सामाजिक संस्था ने महिलाओं का सर्वे किया तो जानकारी मिली कि 17 फीसदी महिलाएं मानसिक परेशानियों से जूझ रही हैं. ये वही महिलाएं हैं, जिन पर शरीयत का कानून थोपा गया है.

ये आंकड़े पता चलने के बाद सन 2003 में कुछ सामाजिक संस्थाएं पिछड़े तबके की महिलाओं को आजादी दिलाने के लिए आगे आईं. संस्थाओं का कहना था कि अमीर घरानों की लड़कियों और महिलाओं की तरह पिछड़े वर्ग की लड़कियों और महिलाओं को भी आजादी मिले.

अमीर घरों की लड़कियां बुरका पहनना तो दूर की बात, वे आधुनिक फैशन के कपड़े पहन कर महंगी गाडि़यों में घूमने निकलती हैं. उन की आधुनिकता देख कर हर कोई यही समझेगा कि ये शरीयत का कानून वाले देश की नहीं, बल्कि अमेरिका या आस्ट्रेलिया की हैं.

इंस्टाग्राम पर richkidsofiraq नाम से चलने वाले एकाउंट पर जब आप इन उच्चवर्ग की लड़कियों, महिलाओं के फोटो देखेंगे तो यकीनन आप चौंक जाएंगे. जब इन लड़कियों पर कोई प्रतिबंध नहीं तो पिछड़े वर्ग की लड़कियों को सामाजिक और धार्मिक प्रतिबंधों में क्यों जकड़ कर रखा गया है.

जीत ली अधिकार की लड़ाई

22 अगस्त, 2017 को शायरा बानो सही टाइम पर कोर्ट पहुंची गई थीं. सब से पहले वह अपने वकील से मिलीं. वकील साहब ने उन्हें आश्वस्त किया, ‘‘डरने की कोई बात नहीं है. हिम्मत रखो, फैसला तुम्हारे ही पक्ष में आएगा. यह भी हो सकता है कि तुम देश और धर्म के लिए ऐतिहासिक महिला बन जाओ.’’

22 अगस्त, 2017 को 3 तलाक पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने वाला था. सुबह से ही मीडियाकर्मी व अन्य लोग कोर्ट के बाहर जमे हुए थे. यह ऐतिहासिक फैसला सुनाने के लिए अलगअलग धर्म के 5 न्यायमूर्ति तय किए गए थे, जो सही समय पर अपनीअपनी कुरसी पर विराजमान हो गए थे.

खचाखच भरी अदालत में सब से पहले अपना फैसला पढ़ने की शुरुआत मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर ने की. उन्होंने अपना फैसला पढ़ना शुरू किया, ‘‘3 तलाक पर्सनल ला का हिस्सा है और इसे संविधान में मिली धार्मिक आजादी में संरक्षण प्राप्त है. इसलिए अदालत इस में दखल नहीं दे सकती.’’

यह सुनते ही अदालत में मौजूद एक बड़े वर्ग के चेहरे पर मुसकान उभर आई. लेकिन जब जस्टिस खेहर ने आगे कहा कि 3 तलाक पर सरकार कानून बनाने पर विचार करे और जब तक यह कानून बने, तब तक 3 तलाक पर पूरी तरह से रोक लगी रहेगी तो तमाम लोगों के चेहरे पर निराशा के भाव उभर आए.

जस्टिस खेहर के बाद जस्टिस कुरियन जोसेफ ने मुख्य न्यायाधीश के फैसले पर असहमति जताते हुए अपना फैसला पढ़ा. उन्होंने 3 तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया. इस के बाद जस्टिस आर.एफ. नरीमन ने अपनी और जस्टिस यू.यू. ललित की राय बताते हुए मुख्य न्यायाधीश की राय से असहमति जताई.

उन्होंने 3 तलाक को असंवैधानिक घोषित किया तो अदालत में मौजूद लोगों के चेहरों पर तरहतरह के भाव उभर आए. जस्टिस खेहर ने चारों जस्टिस के फैसला सुनने के बाद अपना आखिरी फैसला सुनाया. उन्होंने अंतिम फैसला सुनाते हुए कहा कि न्यायाधीशों के बीच मतभिन्नता के बीच बहुमत से दिए गए फैसले में 3 तलाक निरस्त किया जाता है.

इस से यह बात साफ हो गई कि सर्वोच्च न्यायालय ने 3 तलाक पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी. इस तरह 14 सौ साल पुरानी मुसलिम रूढि़वादी परंपरा के खत्म होते ही यह ऐतिहासिक फैसला बन चुका था, जिस से मुसलिम औरतों को बड़ी राहत मिलने वाली थी.

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भारत के सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार  है कि वह भारतीय संविधान के दूसरे पार्ट के अधिनियम संख्या 32 के अंतर्गत देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करे. इस की स्थापना अक्तूबर, 1937 में हुई थी. भारतीय संविधान के तहत यह न्यायालय भारत का अंतिम और सवर्ोेच्च न्यायालय है, जो ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ की नीति को खुद में समाहित कर के चलता है.

इसी सर्वोच्च न्यायालय ने मुसलिम महिलाओं के लिए अभिशाप माने जाने वाले 3 तलाक को खत्म कर के उन्हें बहुत बड़ी निजात दिलाई है. आज के दौर में शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा, जिस में पारिवारिक कलह न हो. किसी न किसी बात को ले कर हर घर में लड़ाईझगड़ा आम बात है.

हालांकि घर के मामले अधिकांशत: घर में ही निपटा लिए जाते हैं. कोर्टकचहरी तक बहुत कम मामले पहुंचते हैं. लेकिन मामला घर से बाहर समाज से लड़ने का हो तो बहुत हिम्मत चाहिए. समाज से टकराना अपनी जिंदगी को दांव पर लगाने जैसा है.

लेकिन उत्तराखंड निवासी शायरा बानो ने यह हिम्मत दिखाई. पति ने दर्द दिया तो वह उस दर्द का इलाज ढूंढने कोर्ट जा पहुंची. वह जानती थीं कि उन्होंने जो रास्ता चुना है, वह समाज से होते हुए ही उन के पति तक पहुंचेगा. जबकि समाज से टकराना जोखिम भरा काम था. लेकिन जब इंसान के हौंसले बुलंद हों तो राह में आने वाली सारी बाधाएं खुदबखुद हटने लगती हैं.

शायरा बानो ने जिस सामाजिक कुरीति के विरुद्ध केस लड़ने की ठानी थी, वह थी मुसलिम समाज में सदियों से चली आ रही 3 तलाक की परंपरा. 3 तलाक मुसलिम समाज में पत्नी से अलग होने के वह जरिया था, जिस में पति अपनी पत्नी को 3 बार तलाक… तलाक…तलाक… कह कर उस से जिंदगी भर के लिए छुटकारा पा सकता था.

इस मामले में न तो देश का कोई भी कानून या न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती थी और न ही समाज. 3 तलाक की परंपरा में कई बार ऐसा भी होता था कि जल्दबाजी या गुस्से में पति पत्नी को तलाक तो दे देता था, लेकिन बाद में उसे पश्चाताप होता था. क्योंकि औरतें गुलामों की तरह काम तो करती ही थीं, साथ ही बच्चे भी पालती थीं. कुछ पढ़ीलिखी औरतें पैसा कमा कर घर भी चलाती थीं.

इसलिए कुछ लोगों को अपनी बीवी पर तरस आने लगता था और वह अपनी पत्नी को वापस लाना चाहते थे. लेकिन तलाकशुदा बीवी को दोबारा अपनाने का एक ही तरीका था हलाला. हलाला के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, क्योंकि इस शब्द का संबंध मुसलमानों के वैवाहिक जीवन और शरीयत के महिला विरोधी कानून से है.

शरीयत के इस जंगली कानून की आड़ में मुल्लामौलवी और मुफ्ती खुल कर अय्याशी करते थे. मुसलिम महिलाओं के लिए हलाला शब्द ही सब से दुखदाई था, जो बलात्कार की श्रेणी में आता था. हलाला तब तक जायज नहीं माना जाता था, जब तक तलाकशुदा औरत किसी दूसरे मर्द के साथ निकाह करने के बाद उस के साथ सहवास न कर ले.

इस के बाद वह आदमी उसे तलाक दे देता था, उस के बाद वह अपने पूर्व पति से फिर से निकाह कर सकती थी. कई बार ऐसा भी होता था कि इस बीच अगर तलाकशुदा औरत को वह शख्स पसंद आ जाता था तो वह उसी के साथ रहने लगती थी. इस स्थिति में उस का पहला पति या शरीयत कानून कुछ नहीं कर सकता था.

हालांकि मुसलमानों में 2-3 औरतें रखना जायज माना जाता है. वैसे भी मुसलिम समाज में रिश्ते की बहनों से भी शादियां जायज हैं. मुसलिम लोग अक्सर संयुक्त परिवार में रहना पसंद करते हैं. इसलिए पतिपत्नी में झगड़े    होना आम बात है. ऐसे में कभी पति गुस्से में पत्नी को तलाक दे देता था. हलाला का समय भी कम से कम 3 महीने का होता है.

बहरहाल, 22 अगस्त, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मुसलिम समाज में 14 सौ सालों से प्रचलित 3 तलाक के चलन को असंवैधानिक करार दे कर निरस्त कर दिया. कोर्ट ने 2-3 के बहुमत से फैसला देते हुए कहा कि एक साथ 3 तलाक संविधान में दिए गए बराबरी के अधिकार का हनन है. तलाक ए बिद्दत इसलाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे संविधान में दी गई धार्मिक आजादी (अनुच्छेद 25) में संरक्षण नहीं मिल सकता.

इस के साथ ही कोर्ट ने शरीयत कानून 1937 की धारा-2 में एक बार में 3 तलाक को दी गई मान्यता निरस्त कर दी. 5 जजों में से 3 जज जस्टिस नरीमन, जस्टिस ललित और जस्टिस कुरियन इसे असंवैधानिक घोषित करने के पक्ष में थे. वहीं 2 जज चीफ जस्टिस खेहर और जस्टिस नजीर इस के पक्ष में नहीं थे.

इस मामले की जीत का श्रेय शायरा बानो और अन्य 4 मुसलिम महिलाओं, जिन में सहारनपुर, उत्तर प्रदेश निवासी मजहर हसन की बेटी आतिया साबरी, जयपुर निवासी आफरीन रहमान, रामपुर, उत्तर प्रदेश निवासी गुलशन परवीन व बिहार के नवादा जिले की रहने वाली इशरत जहां को जाता है.

लेकिन इन से पहले भी इंदौर की रहने वाली मुसलिम महिला शाहबानो 3 तलाक के इस मामले को जीत कर भी हार गई थीं. शाहबानो के पति मोहम्मद खान ने सन 1978 में उन्हें तलाक दे दिया था. मोहम्मद अहमद खान ने 2 शादियां की थीं, जिस की वजह से आए दिन घर में तकरार होती रहती थी.

शाहबानो को जो हासिल नहीं हो पाया था, अब सन 2017 में अपने हक की लड़ाई लड़ने वाली शायरा बानो और अन्य 4 महिलाएं मुसलिम समाज की 14 सौ साल पुरानी परंपरा को खत्म करने में कामयाब रहीं. हालांकि मुसलिम समाज की कई महिलाओं ने 3 तलाक के विरुद्ध आवाज उठाते हुए कोर्ट में केस दायर किया था.

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लेकिन 3 तलाक के इस फैसले का श्रेय उत्तराखंड निवासी इकबाल अहमद की बेटी शायरा बानो को जाता है. काशीपुर (उत्तराखंड) के हेमपुर डिपो में रहता है इकबाल अहमद का परिवार. उन के 3 बच्चों में शायरा बानो सब से बड़ी थी. उन के 2 बेटे हैं शकील अहमद और अरशद अली.

इकबाल अहमद हेमपुर डिपो में एकाउंटैंट हैं. उन का सुशिक्षित और सभ्य परिवार है. उन्होंने अपने तीनों बच्चों को भी उचित शिक्षा दिलाई. शायरा बानो ने हेमपुर डिपो के पास स्थित गांव प्रतापपुर से हाईस्कूल किया. जीजीआईसी काशीपुर से इंटरमीडिएट करने के बाद उन्होंने काशीपुर के ही राधे हरि राजकीय महाविद्यालय से एमए किया.

हालांकि शायरा बानो पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थीं, लेकिन घर में सब से बड़ी होने के नाते उन्हें विवाह जैसे बंधन में बंधने पर मजबूर होना पड़ा. अब से करीब 15 साल पहले सन 2002 में शायरा बानो का रिश्ता इलाहाबाद के बारा बाजार के रहने वाले रिजवान के साथ हो गया.

रिजवान के पिता इकबाल अहमद का प्रौपर्टी का काम था. इकबाल का भी परिवार शायरा के परिवार की तरह छोटा था. उन के 2 बेटे इरशाद अहमद, रिजवान अहमद और एक बेटी थी. रिजवान ने अपने पिता का प्रौपर्टी डीलिंग का काम संभाल रखा था. घरपरिवार ठीक था. इकबाल अहमद ने रिजवान से शायरा का निकाह कर दिया. शायरा और रिजवान की शादी के बाद सब कुछ ठीकठाक चलता रहा.

शादी के बाद शायरा ने नौकरी करने की इच्छा जाहिर की तो घर वालों को उन की यह बात पसंद नहीं आई, जिस की वजह से शायरा को मन मार कर घर में बैठना पड़ा.

वह अच्छे परिवार की पढ़ीलिखी लड़की थी. इस के बावजूद उस की सास रईसा बेगम उसे बिलकुल पसंद नहीं करती थीं. वह उसे बातबात में रोकतीटोकती रहती थीं.

सास की इस हरकत से आजिज आ कर शायरा ने रिजवान से शिकायत की तो वह भी अपनी अम्मी के पक्ष में दलीलें देने लगा. इस से शायरा का मन ससुराल से उचटने लगा. सास रईसा बातबात पर उसे डांटती तो रहती ही थीं, आए दिन दहेज के लिए ताने भी मारती थीं.

अब तक शायरा एक के बाद एक 2 बच्चों की मां बन चुकी थी, बड़ा बेटा इरफान अहमद और उस से छोटी बेटी हुमेरा नाज. इस बीच शायरा की तबीयत खराब रहने लगी. अब उस की सास उसे और भी ज्यादा परेशान करने लगी. घर के विवाद ने जब भयानक रूप ले लिया तो मजबूरन रिजवान को किराए का मकान ले कर अलग रहना पड़ा.

अलग होने के बाद रिजवान का अपने घर आनाजाना लगा रहता था. वह जब भी घर आता, उस की अम्मी रईसा उसे शायरा बानो के प्रति भड़काने का काम करती. आखिरकार मियांबीवी में हर वक्त तकरार रहने लगी.

उसी दौरान अचानक शायरा बानो की तबीयत खराब हुई तो रिजवान उसे अनदेखा कर ज्यादातर अपने घर पर ही रहने लगा. पति और सास के अत्याचारों से आजिज आ कर शायरा बानो को अपने मायके आने पर मजबूर होना पड़ा. इलाहाबद से मुरादाबाद तक रिजवान शायरा और बच्चों के साथ आया और वहीं से वापस लौट गया.

11 अप्रैल, 2015 के बाद न तो रिजवान अपने बीवीबच्चों से मिलने आया और न ही उस ने कोई फोन किया. जब शायरा को लगने लगा कि अब उस का पति उसे लेने नहीं आएगा तो उस ने अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए काशीपुर के फैमिली कोर्ट में उन के भरणपोषण के लिए खर्च देने का दावा कर दिया.

शायरा की ओर से बच्चों के भरणपोषण का नोटिस पहुंचने के बाद भी रिजवान ने उस से किसी तरह की कोई बात नहीं की. उसी दौरान 10 अक्तूबर, 2015 को इकबाल अहमद के घर के पते पर शायरा बानो के नाम स्पीड पोस्ट से एक पत्र आया. शायरा बानो ने उसे खोल कर देखा तो उस की आंखों के आगे अंधेरा छा गया.

उस में लिखा था, ‘मैं रिजवान अहमद आज से तुम्हें पूरी तरह से आजाद करता हूं. मैं तुम्हें तलाक देता हूं. तलाक…तलाक… तलाक… आज के बाद मुझ से तुम्हारा किसी तरह का कोई रिश्ता नहीं रहा.’

स्पीड पोस्ट से आए इस पत्र के मिलते ही इकबाल अहमद के घर मातम सा छा गया. शायरा बानो का रोरो कर बुरा हाल था. लेकिन वह उस वक्त कुछ भी नहीं कर सकती थी. इतना सब कुछ होने के बाद भी शायरा बानो के मायके वालों ने उसे समझाते हुए कहा कि वह हिम्मत न हारे, पूरा परिवार उस के साथ है.

शायरा बानो ने उसी दिन कसम खाई कि जहां तक हो सकेगा, इस तलाक के खिलाफ वह मुकदमा लड़ेगी और न्याय पा कर ही रहेगी.

रिजवान द्वारा तलाक देने के बाद इकबाल अहमद ने अपनी बेटी को साथ ले जा कर काशीपुर के फैमिली कोर्ट में धारा 125 के तहत अधिवक्ता गोपाल कृष्ण द्वारा भरणपोषण का मुकदमा दायर करा दिया. रिजवान को जब काशीपुर अदालत से भेजा गया भरणपोषण का नोटिस मिला तो उस ने तत्काल इलाहाबाद के परिवार न्यायालय में हक-ए-जोजियत का मुकदमा दर्ज करा दिया.

कुछ ही दिनों में इलाहाबाद के न्यायालय से शायरा को नोटिस प्राप्त हुआ, जिसे ले कर शायरा ने अधिवक्ता गोपाल कृष्ण से संपर्क किया. नोटिस देखने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से स्टे लेने की बात कही.

शायरा ने इस फैसले के खिलाफ स्टे लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण ली. दिल्ली में वह सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता बालाजी श्रीनिवासन से मिली और अपनी दुख भरी दास्तान उन्हें सुनाई. बालाजी श्रीनिवासन ने 3 तलाक को घोर अमानवीय और असंवैधानिक मानते हुए इस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की सलाह दी. शायरा बानो की तरफ से तलाक की याचिका दायर होते ही श्रीनिवासन ने उन्हें कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराई.

इस याचिका के दायर होने के बाद यह मामला मीडिया की सुर्खियां बना तो एक के बाद एक ऐसी कई याचिकाएं दायर हो गईं. फिर तो तलाक का मामला इतना उछला कि सुप्रीम कोर्ट को इस की सुनवाई के लिए संविधान पीठ का गठन करना पड़ा. शायरा बानो के अलावा 3 तलाक को ले कर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाली जो अन्य मुसलिम महिलाएं थीं, उन की दुखभरी दास्तान भी कुछ कम नहीं थी. जयपुर निवासी आफरीन रहमान की कहानी भी शायरा बानो ही जैसी थी.

लंबी लड़ाई के बाद आफरीन भी इंसाफ पाने में सफल रही. सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुनने के लिए वह 22 अगस्त की सुबह 5 बजे ही दिल्ली पहुंच गई थी. इस ऐतिहासिक फैसले के आते ही आफरीन खूब खुश थी. इसी तरह आतिया भी 3 तलाक का शिकार हो कर जिंदगी को दांव पर लगा बैठी थी. उन्होंने भी सर्वोच्च नयालय में याचिका दायर कर रखी थी.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को सुन कर आतिया ने अपनी खुशी का इजहार करते हुए कहा कि एक साथ 3 तलाक को असंवैधानिक घोषित कर के सर्वोच्च न्यायालय ने मुसलिम महिलाओं के साथ इंसाफ किया है. आतिया को उम्मीद है कि सरकर जो भी कानून बनाएगी, वह मुसलिम महिलाओं के हक में ही होगा.

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रामपुर निवासी गुलशन परवीन के पति ने भी उसे कुछ इसी तरह से तलाक दे कर उस से पीछा छुड़ाने की कोशिश की थी. गुलशन की शादी अप्रैल, 2013 को हुई थी. शादी के बाद कुछ दिनों तक तो सब कुछ ठीक रहा. लेकिन एक साल बीततेबीतते उस का उस के पति से मनमुटाव रहने लगा. गुलशन का पति नोएडा में काम करता था. जबकि वह स्वयं रामपुर स्थित अपनी ससुराल में रहती थी.

गुलशन ने कई बार अपने पति से साथ ले चलने को कहा, लेकिन वह किसी भी सूरत में उसे साथ रखने को तैयार नहीं था. उस के ससुराल वाले उसे अपने ऊपर बोझ समझ कर दहेज लाने के लिए मजबूर कर रहे थे.

हालांकि उस की शादी में उस के घर वालों ने दहेज के रूप में उसे 2.5 लाख रुपए नकद दिए थे, साथ ही इलैक्ट्रौनिक का सामान व फर्नीचर सेट के साथ उन की मांग के अनुसार कपड़े भी दिए थे. इस के बाद भी उस का पति और उस के घर वाले खुश नहीं थे. इसलिए वे दहेज मांगते हुए उसे तंग करते थे. उन्होंने उस के सारे जेवर भी छीन लिए थे.

गुलशन ससुराल वालों से बुरी तरह तंग आ चुकी थी. इस के बावजूद उस का पति भी जब कभी नोएडा से आता, वह भी उसे बुरी तरह प्रताडि़त करता. गुलशन ने काफी दिनों तक ससुराल वालों की प्रताड़ना झेली, लेकिन जब उस का शरीर जवाब दे गया तो उस ने यह बात अपने बड़े भाई रईस अहमद को बताई. गुलशन का भाई रईस भी गाजियाबाद में नौकरी करता था.

गुलशन की परेशानी देखते हुए रईस उसे अपने साथ गाजियाबाद ले गया. रईस ने उस के पति को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन उस ने उस की एक नहीं सुनी. जब मामला ज्यादा बढ़ गया तो रईस अहमद ने उस के विरुद्ध रामपुर में ही दहेज उत्पीड़न और आपराधिक धमकी का केस दर्ज करा दिया. उसी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

इस के बाद से गुलशन मायके में ही रहने लगी. उसी दौरान उस के पति ने 10 रुपए के एक स्टांप पेपर पर तलाकनामा लिख कर भेज दिया. लेकिन गुलशन ने उसे स्वीकार करने से मना कर दिया. इस पर उस के पति ने रामपुर की फैमिली कोर्ट की शरण ली और उसी तलाकनामे के आधार पर शादी तोड़ने की मांग की.

यह जानकारी मिलते ही गुलशन के भाई रईस अहमद ने उसे उत्तराखंड काशीपुर निवासी शायरा बानो के वकील से मिलने को कहा. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस की याचिका को भी संयोजित कर लिया.

3 तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली बिहार के नवादा की रहने वाली इशरत जहां ने भी थाना गोलाबाड़ी, हावड़ा कोर्ट से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक लंबी लड़ाई लड़ी.

मूलरूप से बिहार के नवादा जिले की रहने वाली इशरत जहां का निकाह नवादा निवासी मुर्तजा के साथ सन 2001 में हुआ था. शादी के वक्त दोनों नवादा में ही रहते थे. लेकिन निकाह के बाद दोनों हावड़ा जा कर रहने लगे थे. हावड़ा जाने के बाद कुछ दिनों तक दोनों एक किराए के मकान में रहे. इशरत की परेशानी को देखते हुए उस के मायके वालों ने उसे हावड़ा में एक मकान दिला दिया था.

मुर्तजा अंसारी दुबई में काम करता था. गुजरते वक्त के साथ इशरत जहां एक के बाद एक 3 बेटियों की मां बनी. बेटी ही बेटी होने के कारण उस के ससुराल वालों ने उसे तंग करना शुरू कर दिया. जबकि मुर्तजा अंसारी को इस बात से कोई लेनादेना नहीं था. वह दुबई में रह रहा था. लेकिन ससुराल वालों ने इशरत को बेटे के लिए प्रताडि़त करना शुरू कर दिया.

इशरत जानती थी कि उसे ससुराल वालों के साथ एक ही घर में रहना है. यही सोच कर वह उन से किसी तरह का बैर नहीं लेना चाहती थी. इस के बावजूद उस के ससुराल वाले मुर्तजा अंसारी से फोन कर के उसे इशरत के प्रति भड़काते रहे. फलस्वरूप दुबई में रहने के दौरान ही उस के पति मुर्तजा ने उसे फोन पर ही अचानक 3 बार तलाक कह कर निकाह तोड़ दिया.

इशरत ने यह बात अपने मायके वालों को भी बता दी थी. इस के बाद ससुराल वालों ने उसे घर से निकल जाने को कहा. वह घर से नहीं निकली तो उन्होंने उस के घर का बिजली का कनेक्शन कटवा दिया, जिस में वह रहती थी. फोन पर तलाक मिलते ही इशरत ने सन 2015 में निचली अदालत में केस डाल दिया. इस के बाद उस ने जुलाई, 2016 में अधिवक्ता नाजिया खान इलाही खान के जरिए सुप्रीम कोर्ट की शरण ली.

3 तलाक के खिलाफ जंग लड़ने वाली इशरत जहां ने सोचा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन की मुश्किलें कम हो जाएंगी. लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि इस ऐतिहासिक फैसले के बाद उन का सामाजिक बहिष्कार हो सकता है.

इशरत जहां की एक जंग खत्म होते ही अपनों के बीच दूसरी जंग शुरू हो गई. गरीबी के बावजूद सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाली इशरत जहां को उस के ही रिश्तेदारों और पड़ोसियों की आलोचना और बदजुबानी का शिकार होना पड़ रहा. कोर्ट के फैसले के बाद उस के ससुराल वाले और पड़ोसी उस के चरित्र को दागदार बताने में लगे हैं.

इशरत जहां हावड़ा में पिलखना स्थित मकान में रहती है. यह मकान उस के पति ने सन 2004 में शादी के बाद मिली दहेज की रकम से खरीदा था. इस मकान में उस के पति के बड़े भाई और परिवार के अन्य लोग भी रहते थे. कोर्ट का फैसला आने से इशरत जहां के हौसले बुलंद हो गए हैं.

इशरत जहां का कहना है कि सभी को अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़नी चाहिए. तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुहिम छेड़ने वाली इशरत जहां को इन दिनों ससुराल वालों और पड़ोसियों द्वारा धमकी भरे फोन किए जा रहे हैं.

इन धमकियों को देखते हुए इशरत ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिख कर सुरक्षा की गुहार लगाई है. इशरत जहां ने अपने और बच्चों के लिए खतरे को देख कर उस पत्र की कौपी हावड़ा के पुलिस कमिश्नर औफिस और लोकल पुलिस स्टेशन को भी भेजी है.

3 तलाक को ले कर भले ही 5 महिलाएं ही अपना हक पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण में गईं. लेकिन इस फैसले के आते ही देश के कोनेकोने से ऐसी महिलाओं की आवाज उभर कर सामने आ रही है, जो इस 3 तलाक से अपनी बसीबसाई जिंदगी को बरबाद कर के खून के आंसू रोने पर मजबूर हो गई थीं.

इस 3 तलाक के मुद्दे पर पहले से ही 2 धड़ों में बंटे मुसलिम रहनुमाओं की सियासत में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद गरमी आ गई है. जहां एक तरफ सुन्नी समुदाय के लोगों को इस फैसले से जबरदस्त आघात पहुंचा है, वहीं शिया समुदाय के लोग इस के पक्ष में आ खड़े हुए हैं.

3 तलाक के मामले पर सुप्रीम कोर्ट फैसला सुना चुकी है. अदालत ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया है. लेकिन सवाल यह है कि क्या शायरा बानो और उन के साथ खड़ी 4 तलाक पीडि़त महिलाओं को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कोई लाभ मिल पाएगा, यह अभी पूरी तरह भविष्य के गर्भ में है.

15 साल में 4 निकाह 3 तलाक

उत्तर प्रदेश का बड़ा शहर है बरेली. तारा इसी शहर की है. जब वह 20 साल की थी, तभी मांबाप ने उस का निकाह जाहिद के साथ कर दिया था. कुछ दिनों तक सब ठीक रहा. लेकिन बच्चे नहीं हुए तो जाहिद ने दूसरी शादी कर ली और तारा को तलाक दे दिया. तारा का 7 साल का वैवाहिक जीवन बहुत ही नारकीय रहा.

तारा मांबाप के पास आ गई. चंद दिनों बाद उस का निकाह पप्पू के साथ कर दिया गया. निकाह के कुछ दिनों बाद पप्पू ने उस पर दबाव बनाया कि वह गैरमर्दों के साथ सोए. तारा ने इस का विरोध किया तो 3 साल बाद उस ने भी तलाक दे दिया.

2 बार 3 तलाक का दंश झेल चुकी तारा फिर मांबाप के पास आ गई. मांबाप गरीब थे, बेटी का घर बसाने के लिए उन्होंने एक बार फिर उस का निकाह सोनू से करवा दिया.

सोनू और तारा के बीच एक अन्य औरत के आ जाने से दोनों में झगड़ा बढ़ा और बात मारपीट तक जा पहुंची. तारा का विरोध करना सोनू को अच्छा नहीं लगा. सो 2 साल बाद उस ने भी 3 बार तलाक कह कर तारा को घर से बाहर कर दिया. मजबूरी में तारा को इस बार अपने मामू के यहां शरण लेनी पड़ी.

वहां रहते हुए 8 महीने पहले उस का चौथा निकाह शमसाद से करा दिया गया. शमसाद बच्चा चाहता था. बच्चा नहीं हुआ तो दोनों में झगड़ा रहने लगा.

फलस्वरूप बात चौथे तलाक तक आ गई. लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद तारा ने पुलिस की शरण ली. पुलिस अब दोनों को परामर्श केंद्र भेज कर समझौता कराने की कोशिश कर रही है. तारा अब तलाक लेना नहीं चाहती.

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सुमोना चक्रवर्ती ने कराया बोल्ड फोटोशूट

एक तरफ तो कपिल शर्मा अपने ट्वीट को लेकर चर्चा में बने हुए हैं. ट्वीट और पत्रकार के साथ किये गए गाली गलौच की वजह से उनकी काफी आलोचन की जा रही है, तो वहीं दूसरी तरफ कपिल की औनस्क्रीन बीवी यानी कि छोटो पर्दे की अदाकारा सुमोना चक्रवर्ती काफी हौट और बोल्ड फोटोशूट कराकर सुर्खियां बटोर रही हैं. जी हां, वही सुमोना चक्रवर्ती जो कपिल शर्मा के शो ‘कौमेडी नाइट्स विद कपिल शर्मा’ में आती थीं.

कपिल की औनस्क्रीन बीवी के तौर पर फेमस हुई सुमोना ने कुछ दिनों के लिए टीवी से ब्रेक लिया है. वो इन दिनों छुट्टी पर हैं और वो इन छुट्टियों का भरपूर आनंद उठा रही हैं. इन्ही छुट्टियों के दौरान उन्होंने बोल्ड लुक में फोटोशूट कराया हैं और इस फोटोशूट की कई फोटो इंस्टाग्राम पर शेयर की हैं.

लोग उनके इस हौट लुक को काफी पसंद कर रहे हैं. बता दें कि सुमोना का ये फोटोशूट फोटोग्राफर दिनेश अहूजा ने किया हैं. दिनेश ने भी अपने इंस्टा अकांउट पर सुमोना की कई तस्वीरें पोस्ट की हैं.

बता दें कि कपिल और सुमोना की जोड़ी ‘कौमेडी नाइट्स विद कपिल’ के दौरान खूब पौपुलर हुई थी. यहां से लोग सुमोना को कपिल की औनस्क्रीन बीवी के रूप में जानने लगे थे. वे सोनी टीवी के शो ‘द कपिल शर्मा शो’ में भी कपिल के लव इंटरेस्ट के रूप में लौटीं. लोगों ने उनकी जोड़ी को यहां भी काफी पसंद किया था. कपिल के शो ‘द कपिल शर्मा शो’ में सुमोना डा. मशहूर गुलाटी यानि सुनील ग्रोवर की बेटी और कप्पू यानि कपिल शर्मा की चाइल्डहुड फ्रेंड सरला के रोल में नजर आई थीं. यहां कपिल उनके बड़े होठों का काफी मजाक उड़ाते थे.

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सवाल 2 रुपए का

यह बात उन दिनों की है, जब महंगाई ज्यादा नहीं थी. महज 10 रुपए में आधा किलो दही आ जाता था. राजनगर नाम के एक महल्ले में रमानाथ नाम के एक रिटायर प्रोफैसर छोटे से मकान में अकेले रहते थे. वे बहुत ही सीधे, सरल, परंतु भुलक्कड़ स्वभाव के थे. वे हर समय किसी न किसी खयाल में खोए रहते थे.

एक दिन की बात है. रात के 8 बजे वे खाना खाने बैठे तो देखा कि दही नहीं है. फिर क्या था? वे हाथ में डब्बा और जेब में 10 रुपए का नोट ले कर बाजार की ओर चल पड़े.

डेरी की दुकानें अकसर जल्दी बंद हो जाती हैं. रमानाथजी बाजार में बहुत घूमे, पर सभी दुकानें बंद हो चुकी थीं. आखिर में उन्हें एक दुकान खुली मिल ही गई. दुकान वाला दुकान बंद कर ही रहा था कि रमानाथजी वहां पहुंच गए.

‘‘भाई साहब, आधा किलो दही दे दीजिए,’’ रमानाथजी ने दुकानदार के हाथ में डब्बा देते हुए कहा.

‘‘बाबूजी, दही आधा किलो से कुछ कम है… 8 रुपए दे दीजिए,’’ दुकानदार ने डब्बे में दही डालते हुए कहा.

‘‘ठीक है, यह लीजिए 10 रुपए का नोट.’’

‘‘बाबूजी, 2 रुपए तो छुट्टे नहीं हैं. कल सुबह आप बाजार में सब्जियां खरीदने आएंगे, तो अपने 2 रुपए ले लीजिएगा.’’

‘‘ठीक है, कोई बात नहीं. 2 रुपए कल ले जाऊंगा,’’ रमानाथजी ने दही का डब्बा पकड़ कर जाते हुए कहा.

अचानक वे रुके, पीछे मुड़ कर सोचने लगे, ‘मैं भुलक्कड़ हूं. दुकान कहां है, जरा निशान तो देख लूं…

‘हां, दुकान के सामने एक सफेद सांड़ बैठा जुगाली कर रहा है. दुकानदार 60 साल का बूढ़ा है. उस के सिर पर एक भी बाल नहीं है. चेहरे पर दाढ़ीमूंछ भी नहीं है. कुलमिला कर आलू की तरह चिकना.’

रमानाथजी घर पहुंचे, खाना खाया और सो गए. फिर वे सुबह उठे, नहाएधोए, चाय बना कर पी और अखबार देखने लगे. अचानक उन्हें 2 रुपए का खयाल आया.

गरमी के दिन थे. कंधे पर छतरी लटका कर रमानाथजी घर से निकल पड़े. वे बाजार में बहुत घूमे, पर उन्हें आलू की तरह चिकने सिर वाला कोई दुकानदार नहीं मिला. तब उन्हें याद आया कि दुकान के सामने सफेद सांड़ बैठा था.

रमानाथजी सांड़ की तलाश में बाजार में घूमने लगे. सूरज सिर पर आ गया था. धूप तेज होने लगी थी. प्यास से गला सूख रहा था. एक होटल में उन्होंने 10 रुपए का चायनाश्ता कर लिया. इस तरह 10 रुपए का चूना लग गया. मगर वह कमबख्त सांड़ कहां मर गया? रमानाथजी माथे का पसीना पोंछते हुए सोच रहे थे.

सुबह होते ही सांड़ उठ कर सब्जी मंडी में मुंह मारने चला गया था. सब्जियां खाखा कर उस का पेट भर गया और दुकानदारों के डंडे खाखा कर उस की मोटी चमड़ी में जलन होने लगी. ऊपर से धूप भी तेज हो गई थी. तब वह एक नीम के पेड़ की छाया में बैठ कर जुगाली करने लगा. वहां नाई की दुकान थी. नाई की दाढ़ीमूंछ और सिर के बाल बढ़े हुए थे.

‘‘मिल गया सांड़, मिल गया. अब मैं दही वाले दुकानदार से 2 रुपए मांग लूंगा…’’ खुशी से चहकते हुए रमानाथजी नाई की दुकान में चले गए.

नाई को एक ग्राहक की हजामत बनाते देख रमानाथजी हैरानी से बोले, ‘‘वाह बेटा, जिंदगी में पहली बार देख रहा हूं कि एक रात… केवल एक रात में आलू जैसा चिकना सिर भालू बन गया है.’’

‘‘साहब, आप साफसाफ बोलें. यह आलू और भालू की भाषा मेरी समझ में नहीं आ रही है,’’ नाई ने कहा.

‘‘ऐ मिस्टर, मेरे 2 रुपए निकालिए,’’ रमानाथजी बोले.

‘‘2 रुपए… साहब, क्या आप चंदा मांगने आए हैं?’’

‘‘जी नहीं, रात को मैं ने 8 रुपए का दही खरीदा था. मैं ने आप को 10 रुपए का नोट दिया था. रात को आप के पास छुट्टा नहीं था. सो, अब मैं 2 रुपए लेने आया हूं.’’

‘‘आलू, भालू, दही, 2 रुपए… क्या है यह सब… लगता है, मैं पागल हो जाऊंगा,’’ नाई ने अपने सिर के बाल खुजाते हुए कहा.

‘‘घोर कलयुग आ गया है… अरे, आप ने केवल 2 रुपए मारने के लिए रातोंरात अपना धंधा ही बदल दिया. दाढ़ीमूंछ और सिर के बाल बढ़ा लिए. इतना ही नहीं, 60 साल का बुढ़ापा छोड़ 40 साल का जवान बन गए.

‘‘हाय रे घोर कलयुग, नीम के नीचे बैठा सांड़ सुबूत है कि मैं सच बोल रहा हूं,’’ रमानाथजी हैरानी से बाहर देखते हुए बोले.

रमानाथजी के पैरों तले जमीन खिसक गई, क्योंकि वहां अब सांड़ नहीं था. वे झट बाहर निकल कर बोले, ‘‘अरे, अभी तो यहां सांड़ बैठा हुआ था. लगता है, मुझे भरम हो गया था. बेकार ही तुम्हें बेईमान कह दिया.’’

रमानाथजी फिर से सांड़ की तलाश में धूप में छतरी लगा कर घूमने लगे. वे भूखप्यास से बेहाल हो गए. फिर से 10 रुपए का नाश्ता किया.

अब धूप में चलना मुश्किल था. रमानाथजी ने घर जाने के लिए 10 रुपए का रिकशा किया. रिकशा उन के घर की ओर चल पड़ा. वे मन ही मन अपने को कोसने लगे, ‘केवल 2 रुपए के लिए 30 रुपए का चूना…’

अचानक रिकशे वाले को उन्होंने रुकने को कहा. एक मकान के नीचे सांड़ आराम कर रहा था. वह नेताजी का मकान था. चमचों से घिरे नेताजी गद्दी पर बैठे चुनाव की बातें कर रहे थे कि रमानाथजी वहां पहुंच गए.

‘‘कहिए मतदाता महोदय, मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं? महल्ले में पक्की नालियों का इंतजाम, बिजली, नल…’’ नेताजी बोले.

‘‘नेताजी, अब मैं क्या कहूं? आप तो आप हैं. जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों डकारने वाला केवल 2 रुपए मार सकता है? नहींनहीं, वह दही वाला कोई और ही था. अब मैं नहीं कहूंगा कि एक दही बेचने वाला रातोंरात नेता बन गया. वह भी केवल 2 रुपए मारने के लिए.

‘‘जाइए, आप पर 2 रुपए छोड़ दिए. नमस्कार,’’ रमानाथजी जल्दी से निकलते हुए बोले.

नेताजी और उन के चमचे कुछ समझ नहीं पाए और वे सब रमानाथजी को देखते रह गए.

रमानाथजी सांड़ की ओर देखते हुए रिकशे में बैठ गए. वे सोच रहे थे, ‘मुझे 30 रुपए की बरबादी का गम नहीं है. मुझे तो केवल 2 रुपए नहीं मिलने का दुख ज्यादा है.

VIDEO : हाउ टू फिल इन आई ब्रोज यूसिंग पेंसिल, पाउडर एंड क्रीम


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धार्मिक कर्मकांड : गुमराह करता अद्वैतवाद

दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर होने के नाते मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इस विषय में दिलचस्पी स्वाभाविक बात है लेकिन इस का प्रदर्शन बीते 2 सालों से जिस तरह से वे कर रहे हैं वह प्रदेश को सिर्फ बरबाद कर रहा है.

साल 2005 से ले कर 2014 तक शिवराज सिंह की लोकप्रियता किसी सुबूत की मुहताज नहीं थी, क्योंकि इस वक्त तक वे धार्मिक पाखंडों को व्यक्तिगत स्तर तक सीमित रखते थे लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो धर्म का दर्शन उन के सिर इस तरह चढ़ कर बोलने लगा कि तब से ले कर अब तक का अधिकांश वक्त उन्होंने धार्मिक यात्राओं व समारोहों में जाया किया.

भाजपाई और हिंदूवादियों का धर्मप्रेम आएदिन तरहतरह से उजागर होता रहता है. इस के बिना उन्हें सत्ता और जीवन व्यर्थ लगने लगते हैं.

शिवराज सिंह चौहान ने धर्म को सीधे पाखंडों और कर्मकांडों के जरिए कम थोपा इस के बजाए यह कहना सटीक साबित होगा कि उन्होंने दर्शनशास्त्र और पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों की ओट ले कर धर्म को अभिजात्य तरीके से थोपने की कोशिश की और ऐसी उम्मीद है कि पूरे चुनावी साल वे यही करते रहेेंगे.

इस के पीछे उन का मकसद सिर्फ यह है कि जनता बहुत बड़े पैमाने पर सूबे की बदहाली के बाबत सवालजवाब न करने लगे कि बेरोजगारी क्यों बढ़ रही है, राज्य बिकने की हद तक कर्ज में क्यों डूबा है, प्रदेशभर में अपराधों का ग्राफ तेजी से क्यों बढ़ा है और किसान क्यों आत्महत्याएं कर व आंदोलनों के जरिए अपना दुखड़ा रो रहे हैं.

एकात्म यात्रा ने दिए जवाब

22 जनवरी को मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में आदि शंकराचार्य की 108 फुट की मूर्ति की स्थापना के साथ धूमधड़ाके वाली 22 दिवसीय एकात्म यात्रा आखिरकार  समाप्त हो गई.

यह एकात्म यात्रा वाकई अद्भुत थी जो राज्य के चारों कोनों से शुरू हुई थी और इस का हर जगह सरकारी स्तर पर सरकारी पैसे से स्वागत किया गया. जगहजगह कलैक्टरों और विधायकों ने आदि शंकराचार्य की जूतियां, जिन्हें चरण पादुकाएं कहा गया, सिर पर ढो कर एक नए किस्म के पाखंड का प्रदर्शन किया तो उन की हीनता व मानसिक दरिद्रता पर तरस आना स्वाभाविक बात थी.

अधिकारी और जनप्रतिनिधि जनता के काम करने और उन की समस्याएं हल करने के लिए होते हैं या फिर किसी धर्मविशेष के गुरु की पादुकाएं सिर पर ढोने के लिए, इस सवाल का जवाब भी जनता न चाहने लगे, इसलिए शिवराज सिंह ने चालाकी दिखाते जगहजगह शंकराचार्य के अद्वैतवाद का राग अलापा जिस का अनुसरण जनप्रतिनिधियों और अफसरों ने भी अपना फर्ज समझ कर किया.

यह अद्वैतवाद आखिर क्या बला है और क्यों इस की जरूरत आ पड़ी, यह समझनेसमझाने की किसी ने जरूरत नहीं समझी, तो स्पष्ट हो गया कि अब लोग अपनी परेशानियां भूल इस नए सम्मोहक दर्शन में खोए अपनी जिज्ञासाओं के जवाब ढूंढ़ते रहेंगे. ईश्वर साकार है या निराकार, यह सवाल सदियों से उत्सुकता से पूछा जाता रहा है पर यह कोई नहीं पूछता कि ईश्वर आखिर कहीं है भी कि नहीं, कहीं वह कोरी गप तो नहीं जिसे सच साबित करने के लिए तथाकथित विद्वान और धर्म के दुकानदार सदियों से तरहतरह की बातें करते रहे हैं.

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कोई शासक नहीं चाहता कि प्रजा नास्तिक या अनीश्वरवादी हो कर तर्क करने लगे, इसलिए भगवान में भरोसा बनाए रखने के लिए तरहतरह के स्वांग रचते रहते हैं. लोकतंत्र इस परंपरा का अपवाद नहीं है. एकात्म यात्रा के समापन पर शिवराज सिंह चौहान ने अद्वैत दर्शन का सार बांच दिया कि विश्व शांति का मार्ग युद्ध में नहीं है, बल्कि आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में है.

बकौल शिवराज सिंह चौहान, अद्वैत दर्शन मानता है कि संपूर्ण प्रकृति और प्राणियों में एक ही चेतना है और राजनीति लोगों को तोड़ती है जबकि धर्म जोड़ता है.

विरोधाभासी दर्शन

सुनने वालों ने इस फिलौसफी को हाजमे के चूर्ण की तरह फांक लिया और यह भी आत्मसात कर लिया कि एकात्म यात्रा कोई मामूली यात्रा नहीं है जिस में राज्य की 23 हजार ग्राम पंचायतों से 30 हजार कलश आए जिन में मिट्टी और धातुएं थीं.

राजनीति अगर तोड़ती है तो फिर क्यों अद्वैत के पैरोकार शिवराज सिंह चौहान राजनीति करते हैं, यानी तोड़ने का गुनाह करते हैं, इस सवाल का जवाब शायद ही शिवराज ईमानदारी से दे पाएं. रही बात एक चेतना की, तो वह निहायत ही फुजूल की बात है जिस का देशप्रदेश की समस्याओं से कोई वास्ता नहीं.

एकात्म यात्रा के नाम पर हुआ सिर्फ इतना है कि ओंकारेश्वर में एक अवतार आदि शंकराचार्य का मठ बन गया है जहां कुछ साल बाद लोग जा कर पैसा चढ़ाएंगे, मन्नतें मांगेंगे और पूजापाठ करेंगे.

मुट्ठीभर बुद्धिजीवी, जो खुद को मुख्यधारा मानते हैं, धर्म और अद्वैतवाद ब्रैंड अफीम का सेवन करते बहस करते रहेंगे कि यह चेतना ही दरअसल, आत्मा है जो मृत्यु के बाद शरीर का साथ छोड़ देती है और फिर ऊपर आकाश की तरफ 84 लाख योनियों की परिक्रमा के बाद नया शरीर ढूंढ़ने लगती है. पुराना शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो जाता है जिस के बाबत तुलसीदास ने कहा भी है कि क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंचतत्त्व मिल बना शरीरा.

वैसे भी यह एकात्म यात्रा उन जाहिलों के लिए नहीं थी जो ईश्वर को वैज्ञानिक स्तर पर समझने की कोशिश नहीं कर पाते. यह यात्रा उन ब्राह्मण विद्वानों को खुश करने के लिए थी जो वर्णव्यवस्था और मनुवाद में यकीन करते हैं. खुद आदि शंकराचार्य ब्राह्मण थे और उन का इकलौता मकसद देशभर के ब्राह्मणों को एक वैचारिक मंच के नीचे लाना था कि आपस में लड़ोगे तो रोजीरोटी चली जाएगी. लोग तेजी से नास्तिक हो रहे हैं, उन्हें रोकने के लिए जरूरी है कि ब्राह्मण आपसी विवादों को त्यागें और इस बाबत उन्होंने चारों कोनों में मठ बना कर मठाधीश भी नियुक्त कर दिए थे.

चारों पीठों के शंकराचार्य आज भी धर्मध्वज फहराते शानोशौकत की जिंदगी जी रहे हैं. ये महामानव पैदावार नहीं बढ़ाते, रोजगार के मौके मुहैया नहीं कराते और लेशमात्र भी मेहनत नहीं करते.

परेशान है तो आम जनता जो अपनी समस्याओं का हल धर्म में ढूंढ़ने की गलती दोहरा रही है. देशप्रदेश के बुद्धिजीवियों ने यह नहीं सोचा कि एकात्म जैसी धार्मिक यात्राओं पर करोड़ों रुपए फूंके जाते हैं जो जनता के हैं और क्या सरकार को उसे इस तरह बरबाद करने का हक है.

साजिश की देन हैं समस्याएं

धर्म और राजनीति दोनों एकदूसरे को ताकत देते हैं. राजा के जरिए धर्म के दुकानदार धर्म को तरहतरह से थोपते हैं जिस से वह आसानी से धार्मिक खर्चों की भरपाई करने के लिए टैक्स लगा सके और उस में से उन का हिस्सा उन्हें चढ़ावे की शक्ल में मिलता रहे. राजा का स्वार्थ यह रहता है कि लोग तंगहाली और बदहाली में जीने के बाद भी उसे सत्ता में बनाए रखें. हजारों सालों से यह षड्यंत्रकारी व्यवस्था ही लोगों को जीवनचक्र और मृत्यु के बाद क्या, जैसे फुजूल के सवालों में उलझाए रखे हुए है.

महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ते अपराध जैसी समस्याएं इसी साजिश की देन हैं जिन से घबराए लोग इन्हीं मठमंदिरों में जा कर त्राहिमामत्राहिमाम करते हैं और तथाकथित भगवान से गुहार लगाते हैं कि हे प्रभु, बचाओ.

अब प्रभु कहीं हो, तो कुछ करे या बचाए. लेकिन राजा और पंडे बेफिक्र रहते हैं कि सबकुछ ठीकठाक चल रहा है–लोग मंदिर जा रहे हैं, पूजाअर्चना कर रहे हैं, दानदक्षिणा दे रहे हैं और थोड़े बहुत विरोध व असहमति के बाद भी सबकुछ ठीकठाक है. लोकतंत्र इस का अपवाद नहीं है, यह एक बार फिर मध्य प्रदेश सरकार की एकात्मक यात्रा से साबित हो गया है जिस के तहत मुमकिन है कुछ सालों बाद कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चार्वाक दर्शन को जीवन का सार बताते हुए देश को बेच डाले.

हालांकि चिंता की बात ऐसा शुरू हो जाना भी है. उदाहरण मध्य प्रदेश का ही लें, तो एकात्मक यात्रा के 2 दिनों बाद ही मध्य प्रदेश सरकार को यह फैसला लेने की पहल करनी पड़ी कि क्यों न सरकारी जमीनें बेच कर खजाना भरा जाए. कंगाल होते सूबे की दयनीय हालत किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही जो किसी द्वैत अद्वैतवाद से तो हल होने से रही. जब राज्य का मुखिया ही अधिकांश वक्त पूजापाठ और धार्मिक यात्राओं में गुजारे तोे क्या खा कर राज्यवासियों से यह उम्मीद रखी जाए कि वे उत्पादन बढ़ाने के लिए कोई कोशिश या मेहनत करेंगे.

रही बात एकात्म यात्रा के नायक शिवराज सिंह चौहान की, तो साफसाफ दिख रहा है कि वे अपना बढ़ता विरोध और बिगड़ती छवि देख घबराने लगे हैं, इसलिए ज्यादा से ज्यादा वक्त वे धर्म व भगवान की शरण में बिता रहे हैं और सपत्नीक प्रार्थना करते रहते हैं कि हे प्रभु, इस बार भी नैया पार लगा देना. यह एहसास उन्हें है कि नीचे वाले प्रभु यानी जनता उन्हें तभी चुनेगी जब वह वास्तविकताओं से मुंह मोड़े, रामराम करती रहेगी, इसलिए उस का ध्यान द्वैतअद्वैत जहां भी हो, की तरफ मोड़े रखने में ही फायदा है.

थप्पड़ से कतराता मीडिया

अखबारों की हालत आज घर के किसी कोने में पड़े उपेक्षित बुजुर्गों सरीखी हो चली है, जो होते हुए भी नहीं होते. आमतौर पर अब लोग अखबार पर यों ही सरसरी नजर डाल मान लेते हैं कि आज के ढाईतीन रुपए वसूल हो गए. लेकिन मध्य प्रदेश के लोग कुछ दिनों से पूरा अखबार खोल कर इस उम्मीद के साथ पढ़ते रहे कि शायद किसी कोने में यह खबर दिख जाए कि धार के सरदारपुर कसबे में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आपा खोते एक सुरक्षाकर्मी कुलदीप सिंह गुर्जर को जोरदार थप्पड़ जड़ दिया.

खबर धांसू थी लेकिन सोशल मीडिया के दायरे में सिमट कर रह गई. एकाध न्यूज चैनल ने एकाध बार ही इसे दिखाया, फिर यह गधे के सिर से सींग की तरह गायब होने वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली हो गई. इधर लोगों ने अखबार टटोले, पर किसी ने इसे नहीं छापा.

खुद शिवराज सिंह को हैरानी और खुशी हो रही होगी कि बात तो बात, बेबात में भी तिल का ताड़ बना देने वाला मीडिया उन का कितना लिहाज और सम्मान करता है. इधर प्रदेशभर में गुर्जर समाज के लोगों ने आहत होते इस ऐतिहासिक हो चले थप्पड़ के विरोध में न केवल धरनेप्रदर्शन किए, बल्कि शिवराज सिंह का पुतला भी फूंका, लेकिन मीडिया के मुंह में मानो गुड़ भरा है, जो इस खबर को खबर मानने को तैयार ही नहीं हुआ.

अब कहने वाले कहते रहें कि मीडिया बिकाऊ है या मैनेज कर लिया गया है, पर इस से शिवराज सिंह के अदब व रसूख की टीआरपी नहीं गिर रही. उलटे और बढ़ रही है. गोया कि एक अदने से मुलाजिम का कोई स्वाभिमान ही नहीं होता और सीएम से पिटना जिल्लत या जलालत की नहीं, बल्कि फख्र की बात होती है. लोकतंत्र के इस अलिखित उसूल का ही प्रताप इसे कहा जाएगा कि सरकारी विज्ञापनों के एहसान तले दबा मीडिया इस थप्पड़ पर इस तरह खामोश है जैसे अगर इस पर कुछ बोला, लिखा या दिखाया तो अगला थप्पड़ उस के ही गाल पर पड़ना है.

अब भला कौन किस मुंह से कहने का साहस रखता है कि देश में इमरजैंसी सरीखे हालात हैं और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का गला घोंटा जा रहा है. कल को हुक्मरान अगर खुलेआम गुंडागर्दी पर भी उतारू हो आएं, तो यकीन मानें किसी के पेट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी मरोड़ नहीं उठेगी, अब डर तो इस बात का सताने लगा है कि कहीं इस को, यानी मुलाजिमों की सरेआम पिटाई को, सर्विस बुक में शामिल न कर लिया जाए.

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निजी स्कूलों की मनमानी के शिकार अभिभावक

पढ़ाई के नाम पर कमाई की दुकान का दूसरा नाम बन चुके प्राइवेट स्कूलों को न तो बच्चों की पढ़ाई की चिंता है न उन की सुरक्षा की, उन्हें चिंता है तो बस अपने हित साधने की. क्लासरूम में बच्चों के लिए भले ही सहूलियतें न हों पर वे फीस समय पर वसूलते हैं. आनेजाने की नियमित सुविधा दें या न दें पर बस का किराया पूरा व समय पर लेते हैं.

शिक्षा के नाम पर किताब कौपियां, बस किराया, वरदी, जूते आदि से ले कर बिल्डिंग फंड के नाम पर भी अभिभावकों से लाखों वसूले जाते हैं.

दिल्ली के एक निजी स्कूल को उदाहरण स्वरूप लेते हैं, जिस में 11वीं कक्षा की 3 महीने की फीस का लेखाजोखा कुछ इस तरह है :

ट्यूशन फीस के नाम पर पेरैंट्स पर दोहरी मार पड़ती है क्योंकि वे स्कूल में भी ट्यूशन फीस देते हैं और बाहर कोचिंग की भी. हर 3 महीने में डैवलपमैंट फीस लेने का क्या औचित्य है? फीस में ऐक्टिविटी चार्जेज तो जोड़ दिए जाते हैं लेकिन अधिकांश स्कूलों में अलग से भी इस की वसूली की जाती है.

स्कूल हर साल बिना किसी रोक के फीस बढ़ा देते हैं, भले ही अभिभावक लाखों धरनाप्रदर्शन करें. सरकार कैसे भी कड़े नियम बनाए, इन की दुकानदारी न तो रुकती है और न ही इन पर कोई बंदिश लगती है. फीस बढ़ाने का कोई न कोई बहाना स्कूल ढूंढ़ ही लेते हैं.

हाल में निजी स्कूलों ने 7वें वेतन आयोग को लागू करने के नाम पर फीस में भारी वृद्धि की है. उन का कहना है कि स्कूली खर्च व 7वें वेतन आयोग के एरियर को देने के लिए फीस वृद्धि जरूरी है. 7वें वेतन आयोग के अनुसार शिक्षकों का वेतन बढ़ाया गया है पर इस की असल मार तो अभिभावक ही सह रहे हैं. जो शिक्षक कम वेतन पर काम करने को तैयार थे और उसी लायक थे, उन्हें वेतन में भारी वृद्धि, बिना कुछ किए मिल गई.

लूट का खेल

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा है कि निजी स्कूल सेवा देने के बजाय लूट रहे हैं. सच ही है कि कभी फीस के नाम पर तो कभी ऐडमिशन के लिए लाखों के डोनेशंस लिए जाते हैं. पिछले साल ईस्ट दिल्ली के एक निजी स्कूल में अपने बच्चे का दाखिला करवाने के लिए एक मां को काफी परेशान होना पड़ा.

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असल में पूरा माजरा यह था कि उस का अपने पति से किसी बात को ले कर विवाद चल रहा था जिस कारण वह अपने मायके में रह रही थी. वहां रह कर जब वह अपने बच्चे का ऐडमिशन करवाने एक निजी स्कूल में गई तो उस से मातापिता दोनों की उपस्थिति को जरूरी बताया गया. जब उस ने स्कूल प्रशासन को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया तो स्कूल ने उस के बच्चे को ऐडमिशन देने से मना कर दिया.

बच्चे की मां रिक्वैस्ट करने लगी तो प्रिंसिपल ने साफ शब्दों में कहा, ‘‘हम आप के बच्चे को ऐडमिशन सिर्फ एक ही शर्त पर देंगे जब आप हमें डोनेशन देंगी.’’ उस बेचारी मां, जिस की कोई गलती भी नहीं थी, को अपने बच्चे के ऐडमिशन की खातिर लाखों रुपए देने पड़े.

यही नहीं, जो काम सस्ती किताबों से चल सकता है उस की आड़ में भी कमीशन कमाने के चक्कर में पेरैंट्स पर जबरदस्ती स्कूल से ही किताबकौपियां, यूनीफौर्म तक खरीदने का दबाव डाला जाता है. छोटे बच्चों की जो किताबें बाहर से 2,000-2,500 रुपए में आसानी से मिल जाती हैं उन्हें स्कूल वाले पब्लिशर्स से सांठगांठ कर महंगे दामों पर बेच कर अपनी जेबें भरते हैं.

आज शिक्षक कक्षा में जाते जरूर हैं लेकिन वे सीमित पाठ्यक्रम पढ़ाने में ही विश्वास रखते हैं वरना उन का निजी ट्यूशन पढ़ाने वाला बिजनैस पिट जाएगा. शिक्षक बच्चों को अच्छे मार्क्स दिलाने का भरोसा दिलवा कर उन्हें बाहर ट्यूशन पढ़ने पर मजबूर करते हैं. 7वें वेतन आयोग में बढ़ी पगार के साथ ट्यूशन की दरें भी बढ़ा दी गई हैं.

स्कूल में पढ़ाने में ज्यादा मेहनत न करने के बावजूद टीचरों को पूरी पगार मिल रही होती है, वहीं ट्यूशन का बिजनैस भी जोरों से चल रहा होता है.

असुरक्षा का बोलबाला

स्कूल को बच्चों का दूसरा घर कहा जाता है. पेरैंट्स अपने बच्चों के लिए ऐसे स्कूलों का चयन करते हैं जो उन के बच्चों को ऐडवांस स्टडीज देने के साथसाथ उन की सुरक्षा की भी पूरी गारंटी दें.

यह कहना गलत नहीं होगा कि ऐडमिशन देने के वक्त सुरक्षा के लाख दावे किए जाते हैं, लेकिन एक बार ऐडमिशन होने के बाद ऐसे सारे दावे खोखले साबित होते हैं. आएदिन स्कूल बस ड्राइवर की गलती से कोई न कोई बच्चा ऐक्सिडैंट और शिक्षकों की हवस का शिकार होता है.

इन सब के बावजूद उन के खिलाफ कोई खास कार्यवाही नहीं होती. हाल ही में दिल्ली के निकट गुरुग्राम के एक स्कूल में दूसरी शिक्षा में पढ़ने वाले छात्र की स्कूल के वाशरूम से बौडी मिली. इस हादसे के बाद पेरैंट्स के मन में एक डर बना रहता है जब तक कि उन का बच्चा स्कूल से सहीसलामत घर वापस नहीं लौट आता.

सरकारी बनाम निजी स्कूल

हर जगह निजी स्कूलों का ही शोर है. यहां तक कि पेरैंट्स भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ाना चाहते हैं. क्योंकि एक तो यह स्टेटस सिंबल बन चुका है और दूसरा उन्हें लगता है कि उन का बच्चा प्राइवेट स्कूल में ही अच्छी पढ़ाई कर पाएगा. माना तो यह भी जाता है कि निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचर्स ज्यादा क्वालीफाइड होते हैं.

हालांकि, यह सोच गलत है. सरकारी स्कूलों के टीचर्स ज्यादा क्वालीफाइड होते हैं क्योंकि वे कई परीक्षाएं पास कर नौकरी हासिल करते हैं, जबकि निजी स्कूलों में कम सैलरी लेने वाले शिक्षक को प्रमुखता दे कर रखा जाता है.

हमारे देश में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता. पेरैंट्स भी अपने बच्चों को ऐसे बच्चों से बात करने से मना करते हैं. ‘हिंदी मीडियम’ फिल्म में भी यही दर्शाया गया.

विदेशों की तरह भारत में भी समान शिक्षा के अधिकार कानून पर सख्ती से पालन किया जाना चाहिए ताकि सब को सामान शिक्षा मिले और निजी स्कूलों का लूट का गोरखधंधा रुक सके.

सरकारी स्कूलों के प्रति बेरुखी का एक कारण यह भी है कि इन में हर जाति, धर्म, वर्ग व गरीब के घरों से बच्चे आ रहे हैं और ऊंची जातियों के मातापिता नहीं चाहते कि उन के बच्चे नीची जातियों के घरों के बच्चों के साथ पढ़ें चाहे उन का घरेलू आर्थिक स्तर कैसा भी क्यों न हो.

आप को बता दें कि इन सब के लिए कहीं न कहीं अभिभावक भी जिम्मेदार हैं क्योंकि वे फुली स्मार्ट क्लासेज, स्कूल की शानदार बिल्डिंग को देख कर अपने बच्चों का ऐडमिशन ऐसे स्कूलों में करवा देते हैं. ऐसा वे अपने स्टेटस के लिए करते हैं. भले ही उस स्कूल की फैकल्टी अच्छी हो या न हो. अगर अभिभावक इस चकाचौंध से बाहर निकलें तो निजी स्कूलों की मनमानी बहुत जल्द रुक जाएगी और पेरैंट्स खुद को लुटने से बचा पाएंगे.

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नीतीश कुमार के लिए चुनौती बनते धोबी

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित अगर बिहार के तमाम नेता मैलेकुचैले कपड़ों में नजर आएं तो बात हैरानी की होगी. जल्दी ही ऐसा हो भी सकता है. वजह, बिहार में धोबियों ने चेतावनी दी है कि धोबी समाज की 18-सूत्री मांगों पर जल्द गौर नहीं किया गया तो वे जनप्रतिनिधियों के कपड़े धोना बंद कर देंगे. धोबी समाज मुद्दत से पटना के कंकड़बाग में धोबीघाट के निर्माण की मांग करता रहा है. सो, अब उस पर अड़ गया है.

धोबी या रजक समाज के लोगों की गिनती हिंदीभाषी राज्यों में अनुसूचित जाति यानी दलितों में होती है. समाज का मैला धोने वाला यह वर्ग दूसरे दलितों की तरह ही अछूत व भेदभाव का शिकार रहा है. अब नई आफत बिहार के ही नहीं, बल्कि देशभर के धोबियों की रोजीरोटी पर आ पड़ी है कि धोबीघाट खत्म होते जा रहे हैं. देखना दिलचस्प होगा कि दलितों की हिमायत करते रहने वाले नीतीश कुमार धोबियों के इस दर्द को दूर करते हैं या नहीं.

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स्पीड पोस्ट से आया तलाक

यह जनवरी, 2016 की दोपहर की बात है. कड़ाके की सर्दी पड़ने की वजह से आफरीन रहमान जयपुर स्थित अपने घर पर ही थीं. उन का खाना खाने का मन नहीं था, इसलिए कुरसी पर बैठ कर वह सोचने लगीं कि अब क्या किया जाए, क्योंकि घर के सारे काम वह पहले ही निपटा चुकी थीं. वह कुरसी पर बैठी थीं कि तभी उन की नजर सामने सैंटर टेबल पर पड़ी पत्रिका पर पड़ गई.

उसे एक दिन पहले ही वह बाजार से खरीद कर लाई थीं. रात को वह उसे पढ़ रही थीं, तभी उन्हें नींद आ गई थी. तब मैगजीन सैंटर टेबल पर रख कर वह सो गई थीं. मैगजीन देख कर आफरीन को उस कहानी की याद आ गई, जिसे वह पढ़ रही थीं. वह एक महिला की कहानी थी, जिसे पति ने घर से निकाल दिया था. इस समय वह महिला मायके में भाइयों के साथ रह रही थी.

आफरीन ने उसी कहानी को पढ़ने के लिए मैगजीन उठा ली. वह पन्ने पलट रही थीं, तभी डोरबैल बजी. आफरीन सोच में पड़ गईं कि इस समय दोपहर में कौन आ गया? उन्होंने बैठेबैठे ही आवाज लगाई, ‘‘कौन..?’’

बाहर से जवाब आने के बजाय दोबारा डोरबैल बजी तो आफरीन मैगजीन मेज पर रख कर अनमने मन से उठीं और दरवाजे पर जा कर दरवाजा खोलने से पहले एक बार फिर पूछा, ‘‘कौन है?’’

‘‘मैडम, मैं पोस्टमैन.’’ बाहर से आवाज आई.

आफरीन ने दरवाजा खोला तो बाहर खाकी वर्दी में पोस्टमैन खड़ा था. उस ने एक लिफाफा आफरीन की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप के यहां आफरीन रहमान कौन हैं? यह स्पीड पोस्ट आई है.’’

‘‘मैं ही आफरीन रहमान हूं.’’ उन्होंने कहा.

‘‘मैडम,’’ पोस्टमैन ने एक कागज आफरीन की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘इस पर दस्तखत कर दीजिए.’’

कागज थाम कर आफरीन ने पोस्टमैन की ओर देखा तो उस ने अपनी जेब से पैन निकाल कर उस की ओर बढ़ा दिया. आफरीन ने उस कागज पर दस्तखत कर दिए तो पोस्टमैन ने एक लिफाफा उन्हें थमा दिया. आफरीन ने दरवाजा बंद किया और कमरे में आ कर उस लिफाफे को उलटपलट कर देखने लगी. वह स्पीड पोस्ट उन्हीं के नाम थी. पत्र भेजने वाले की जगह अशहर वारसी, इंदौर लिखा था.

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इंदौर से अशहर का पत्र देख कर आफरीन खुश हो गईं लेकिन तुरंत ही अपनी उस खुशी को झटक कर वह सोचने लगीं कि अगर अशहर को उस की जरूरत होती तो वह खुद आता या फोन करता. पत्र भेजने की क्या जरूरत थी? आफरीन के मन में तरहतरह की आशंकाएं उपजने लगीं. 5-6 महीने बाद उस ने इस तरह क्यों याद किया? यह चिट्ठी क्यों भेजी, वह भी स्पीड पोस्ट से?

आफरीन का मन बैठने सा लगा. उन्होंने कांपते हाथों से स्पीडपोस्ट का वह लिफाफा खोला. उस में से एक कागज निकला. उन्होंने वह कागज खोला तो उस पर लिखा था ‘तलाक…तलाक… तलाक…’. उन्होंने एक बार फिर उस कागज पर लिखी इबारत पढ़ी. उस पर वही लिखा था, जो उन्होंने पहले पढ़ा था.

आफरीन ने उस कागज पर लिखे शब्दों को कई बार पढ़ा. उस तलाकनामा को देख कर उन की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. वह कुरसी पर बैठ गईं. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि उन की खुशियों को इतनी जल्दी ग्रहण कैसे लग गया? उन्हें जो खुशियां मिली थीं, वे इतनी जल्दी कैसे छिन गईं?

उन्होंने तो ऐसी कोई गलती भी नहीं की थी कि उस गलती की इतनी बड़ी सजा मिल रही हो. करीब डेढ़, दो साल पहले अशहर से रिश्ता तय होना, उस की बेगम बन कर जयपुर से इंदौर जाना, कुछ ही दिनों में ससुराल वालों की ओर से दहेज के लिए उन पर अत्याचार करना और फिर एक दिन उन्हें घर से निकाल देने की एकएक घटना उस के जेहन में फिल्म की तरह चलने लगी.

सन 2014 के मईजून महीने की बात रही होगी. जयपुर की रहने वाली 23 साल की आफरीन रहमान अपनी एमबीए की पढ़ाई पूरी कर नौकरी तलाश रही थी. उस के पिता मोहम्मद नसीर की सन 2009 में कौर्डियक अटैक से मौत हो गई थी. उस के बाद परिवार की जिम्मेदारी आफरीन के 2 भाइयों पर आ गई थी.

परिवार में आफरीन, मां और 2 भाई थे. भाई चाहते थे कि आफरीन का जल्द से जल्द निकाह हो जाए. वैसे भी आफरीन शादी लायक हो चुकी थी. उस की पढ़ाई भी पूरी हो चुकी थी. भाई उस के लिए रिश्ता तलाश रहे थे. उसी बीच एक मैट्रीमोनियल वेबसाइट के माध्यम से अशहर वारसी और आफरीन में जानपहचान हुई.

अशहर वारसी मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के रहने वाले थे. वह वकालत करते थे. जानपहचान हुई तो बात शादी की चली. अशहर ने आफरीन को देखा और आफरीन ने अशहर को. दोनों ही एकदूसरे को पसंद आ गए. इस के बाद घर वालों की रजामंदी से नातेरिश्तेदारों की मौजूदगी में रिश्ता तय हो गया.

रिश्ता तय होने पर आफरीन अपने सपनों के राजकुमार अशहर के साथ भविष्य के सपने बुनने लगी. अशहर जवान थे और खूबसूरत भी. आफरीन ने पहले ही तय कर लिया था कि वह किसी अच्छे पढ़ेलिखे लड़के से ही शादी करेगी. अशहर वकालत की पढ़ाई कर के प्रैक्टिस कर रहे थे.

सब कुछ ठीकठाक था, इसलिए आफरीन के भाई और मां इस बात से बेफिक्र थे कि नाजनखरों में पली उन की लाडली को ससुराल में कोई परेशानी नहीं होगी. आफरीन की मां को केवल इसी बात का दुख था कि आफरीन जयपुर से सैकड़ों किलोमीटर दूर इंदौर चली जाएगी.

मां की इस बात पर आफरीन के भाई यह कह कर उन्हें सांत्वना देते थे कि आजकल इतनी दूरी कुछ भी नहीं है. सुबह जा कर रात में जयपुर आया जा सकता है. अशहर के घर वाले चाहते थे कि निकाह धूमधाम से हो. उन की चाहत को देखते हुए आफरीन के भाइयों ने शादी की तैयारी शुरू कर दी.

बहन की शादी के लिए उन्होंने इधरउधर से कर्ज भी लिया. लेकिन भाइयों ने शादी 4 सितारा होटल में की. 24 अगस्त, 2014 को आफरीन रहमान और अशहर वारसी की शादी धूमधाम से हो गई. आफरीन की शादी में उस के भाइयों ने अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज दिया, ताकि उन की बहन को ससुराल में कोई परेशानी न हो.

शादी के बाद आफरीन इंदौर चली गई. शुरुआती दिन हंसीखुशी में निकल गए. अशहर भी खुश था और आफरीन भी. आफरीन को अपने शौहर के वकील होने का फख्र था तो अशहर को भी अपनी बेगम के उच्च शिक्षित होने की खुशी थी. न तो आफरीन को कोई गिलाशिकवा था और ना ही अशहर को.

दोनों मानते थे कि पढ़ालिखा होने से वे अपनी जिंदगी को खुशहाल बना लेंगे. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. लेकिन आफरीन की खुशियां ज्यादा दिनों तक टिकी नहीं रह सकीं. शादी के 3-4 महीने बाद ही अशहर और उस के घर वालों का व्यवहार बदलने लगा. जो अशहर आफरीन से प्यारमोहब्बत की बातें करते नहीं थकता था, वह उसे आंखें तरेर कर बातें करने लगा.

ससुराल वालों का भी व्यवहार बदल गया था. वे दहेज और अन्य बातों को ले कर ताने मारने लगे थे. आफरीन समझ नहीं पा रही थीं कि यह सब क्यों होने लगा? मौका मिलने पर वह अशहर को समझाने की कोशिश करती, लेकिन अशहर समझने के बजाय उन्हें ही दोषी ठहराता.

आफरीन पढ़ीलिखी और समझदार थीं. वह जानती थीं कि इन बातों का परिणाम अच्छा नहीं होगा. वह भाइयों की स्थिति को भी जानती थीं. अब वे इस हालत में नहीं थे कि बहन की ससुराल वालों की दहेज की मांग पूरी कर सकते. वह यह भी जानती थीं कि अगर एक बार इन की दहेज की मांग पूरी भी कर दी गई तो क्या गारंटी कि ये आगे कुछ नहीं मांगेंगे. उन्हें परेशान नहीं करेंगे.

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यही सोच कर आफरीन ससुराल वालों के अत्याचार सहती रहीं. वह जब भी अकेली होतीं, उस समय को कोसती रहतीं, जब उन की अशहर से जानपहचान हुई थी. उन का सोचना था कि शायद कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा. लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. ससुराल वालों के अत्याचार लगातार बढ़ते ही गए. अब उन के साथ मारपीट भी होने लगी थी, जिसे वह यह सोच कर सहन करती रहीं कि एक न एक दिन यह सब ठीक हो जाएगा.

अशहर घर वालों के कहने पर चल रहा था. वह आफरीन से सीधे मुंह बात भी नहीं करता था. बात सिर से गुजरने लगी तो आफरीन ने अपनी परेशानी भाइयों को बताई. भाई इंदौर गए और अशहर तथा उस के घर वालों को समझाया. अपनी आर्थिक स्थिति भी बताई.

इस के बाद महीना, 15 दिन तक आफरीन के प्रति ससुराल वालों का रवैया ठीक रहा, पर इस के बाद फिर वे उसे परेशान करने लगे. यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा. शादी के करीब एक साल बाद अगस्त, 2015 में अशहर और उस के घर वालों ने पैसे और कई तरह का अन्य सामान लाने की बात कह कर आफरीन से मारपीट की और उन्हें घर से धक्के मार कर निकाल दिया.

आफरीन सब के सामने गिड़गिड़ाती रहीं और कहती रहीं कि उन के भाइयों की इतनी हैसियत नहीं है कि वे उन की मांगें पूरी कर सकें. ससुराल वालों ने उन की एक भी बात नहीं सुनी. आफरीन क्या करती? वह जयपुर भाइयों के पास आ गईं. भाइयों ने अशहर और उन के घर वालों से बात की. नातेरिश्तेदारों से दबाव डलवाया.

आखिर 7-8 दिनों बाद आफरीन के ससुराल वाले आ कर उन्हें इंदौर ले गए. आफरीन भी यह सोच कर उन के साथ चली गईं कि शायद अब इन्हें अक्ल आ गई होगी. लेकिन जल्दी ही ससुराल में उन के साथ फिर वैसा ही व्यवहार होने लगा. अशहर और उन के घर वाले फिर दहेज की मांग करते हुए उन के साथ मारपीट करने लगे. ऐसा कोई दिन नहीं होता था, जिस दिन उन्हें ससुराल न मारा जाता रहा हो.

आफरीन ने एक बार फिर अशहर को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. सितंबर, 2015 में अशहर और उस के घर वालों ने एक बार फिर मारपीट कर आफरीन को घर से निकाल दिया. आंखों से आंसू लिए आफरीन एक बार फिर जयपुर स्थित अपने मायके आ गईं. आफरीन अपने भाइयों पर बोझ नहीं बनना चाहती थीं.

आफरीन पढ़ीलिखी थीं, इसलिए अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थीं. जयपुर में वह नौकरी की तलाश करने लगीं. उसी बीच उन पर दुखों का एक और पहाड़ टूट पड़ा. अक्तूबर, 2015 में जयपुर से जोधपुर जाते समय सड़क दुर्घटना में आफरीन की मां की मौत हो गई. हादसे में उन्हें भी चोटें आई थीं.

आफरीन की ससुराल वालों को सूचना भेजी गई. अशहर जयपुर आया जरूर, लेकिन 2-3 दिन रुक कर चला गया. उस ने आफरीन को ले जाने की बात एक बार भी नहीं की. आफरीन के भाइयों ने कहा भी तो उस ने कोई जवाब नहीं दिया. आफरीन जयपुर में रहते हुए अपने भविष्य के बारे में सोच रही थीं.

कभीकभी उन्हें लगता था कि सब कुछ ठीक हो जाएगा. अशहर को जिस दिन उस की अहमियत का अहसास होगा, वह जयपुर आ कर उसे ले जाएगा. लेकिन उन का यह सोचना केवल मन को तसल्ली देने वाली बात थी. जयपुर में रहते हुए आफरीन को पता नहीं था कि उस के शौहर अशहर के मन में क्या चल रहा है? जनवरी, 2016 के आखिरी सप्ताह में स्पीडपोस्ट से अशहर का भेजा तलाकनामा आ गया.

तलाकनामा में 3 बार लिखे ‘तलाक…तलाक…तलाक…’ को पढ़ कर आफरीन की आंखों में आंसू आ गए. वह सोचने लगीं कि अब क्या किया जाए? उन्होंने अपने भाइयों तथा मिलनेजुलने वालों से राय ली. सभी ने उन की हिम्मत बढ़ाई. वह कुछ महिला संगठनों, मुसलिम संगठनों एवं वकीलों से मिलीं. आखिर उन्होंने 3 तलाक के सिस्टम को ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया.

इस बीच, अप्रैल 2016 में आफरीन के बड़े भाई फहीम की दुर्घटना में मौत हो गई. एक तरफ आफरीन का विवाह टूट रहा था और दूसरी ओर 7 महीने के अंदर मां और बड़े भाई की हादसों में हुई मौत ने उन्हें तोड़ कर रख दिया था. परिवार में भाभी और एक छोटा भाई ही बचा था.

इस के बावजूद आफरीन ने अपना दिल कड़ा किया. 3 तलाक के खिलाफ अपने वकील के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने मई, 2016 में आफरीन की यह याचिका स्वीकार कर ली.

3 तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली आफरीन देश की दूसरी महिला थीं.

इस से पहले उत्तराखंड के काशीपुर की शायरा बानो ने फरवरी, 2016 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 3 तलाक और बहुविवाह को खत्म करने का आग्रह किया था.

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आफरीन का कहना है कि 3 तलाक पूरी तरह से नाइंसाफी है. उन की तलाक की इच्छा थी या नहीं, यह उन से एक बार भी नहीं पूछा गया. इस तरह चिट्ठी के जरिए तलाक देना अपने आप में क्रूरता है. इस तरह तलाक दे कर महिलाओं के अधिकारों और इच्छाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाता है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब आफरीन पति से मेहर की रकम और गुजारा भत्ता चाहती हैं.

दर्द के दरिया में डूबी मुमताज

उत्तर प्रदेश के झांसी के थाना सीपरी के इलाके की आवास विकास कालोनी की रहने वाली मुमताज बेगम का निकाह 21 दिसंबर, 2003 को वहीं के रहने वाले वारिस उज्जमा के साथ हुआ था. शादी के बाद वह जल्दी ही गर्भवती भी हो गई. लेकिन उस के पति और ससुराल वालों ने कहना शुरू कर दिया कि उन्हें बेटा चाहिए.

जब दिसंबर, 2004 में मुमताज बेटी की मां बनी तो उस पर मुसीबतें टूट पड़ीं. उत्पीड़न के साथ पति और ससुराल वाले उस पर यह कह कर मायके से 5 लाख रुपए लाने के लिए दबाव डालने लगे कि उस की बेटी मायके की है. उस की शादी के लिए पैसे की जरूरत पड़ेगी.

बात बेटी की शादी बचाने की थी. पूरा हालहवाल जान कर मायके वालों ने यह कह कर कि जब बेटी बड़ी हो जाए तो प्लौट बेच कर उस की शादी कर दी जाएगी. मुमताज के नाम एक प्लौट की रजिस्ट्री करा दी गई. कुछ समय शांति रही. इस बीच मुमताज एक बेटे और एक बेटी की मां बनी. इस के बावजूद फिर से मुमताज के साथ बदसलूकी शुरू हो गई. मारपीट भी होने लगी.

जल्दी ही वह दिन भी आ गया, जब 3 तलाक कह कर वारिस उज्जमा ने उसे घर से निकाल दिया. बाद मे उस ने बाकायदा लिख कर शरिया हिसाब से उसे तलाक दे दिया.

मुमताज ने समाज के ठेकेदारों से न्याय दिलाने की मांग की. मुसलिम पर्सनल लौ बोर्ड  से संबंद्ध अदालत के काजी (जज) से संपर्क किया.  लेकिन सब ने एक ही बात कही कि यह धर्म का मामला है, तलाक हो चुका है. इसलिए कुछ नहीं किया जा सकता. औल इंडिया पर्सनल लौ बोर्ड से संबंद्ध दारुल कजा शरई अदालत के मुफ्ती सिद्दीकी नकवी ने कहा कि बेशक तलाक का तरीका गलत है, पर तलाक तो हो ही गया है, इसलिए कुछ नहीं किया जा सकता.

अब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद मुमताज को न्याय मिल सकेगा. अभी तक वह न्याय के लिए धर्म के ठेकेदारों के पास भटकती रही, जिन्होंने उसे दिलाशा देना तक उचित नहीं समझा.

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