गोरे गोरे गालों पे राज्यपाल का हाथ

चेहरे पर अच्छी भौगौलिक हैसियत रखने के बाद भी गाल हमेशा ही उपेक्षा और अनदेखी के शिकार रहे हैं. कवियों और शायरों ने स्त्री सौन्दर्य का वर्णन चित्रण करते वक्त नाक, आंखों, होठों और जुल्फों को ही प्राथमिकता दी है, ये तमाम अंग गालों के नजदीकी ही हैं. गालों की तुलना सेव, अनार और टमाटर जैसे फलों से कर उन्हें बगीचा बनाकर छोड़ दिया गया है. इस ज्यादती के बाद भी गाल, गाल हैं जो अपना अलग आकर्षण रखते हैं. अगर वे लाल हों तो यह आकर्षण और बढ़ जाता है.

फूले लाल गालों को छूने और सहलाने का अपना एक अलग आनंद है, जिसमे वासना का भाव और अभाव दोनों होते हैं, मसलन गाल किसी बच्चे के हों तो उन्हें सहलाने में वासना नहीं बल्कि वात्सल्य होता है उलट इसके यही गाल किसी युवती के हों तो वासना या वात्सल्य का निर्धारण छूने वाले पुरुष की उम्र देख कर किया जाता है. हालांकि किसी अपरिचित यौवना के गाल छूना वह भी बिना उसकी अनुमति या सहमति के सभ्यता की बात या निशानी नहीं समझी जाती.

तमिलनाडु के राज्यपाल बुजुर्गवार बनवारी लाल पुरोहित को जाने क्या सूझी कि उन्होंने यूं ही एक प्रैस कान्फ्रेंस के दौरान एक महिला पत्रकार के गाल सहला दिये. हल्ला मचने यह एक मुक्कमल वजह थी और यह पत्रकार वार्ता की मर्यादा (अगर कोई होती हो तो) और उसका उल्लंघन भी था. मौजूदा दूसरे पत्रकारों ने राज्यपाल की इस हरकत पर एतराज जताया और विपक्ष ने भी निंदा की. बनवारी लाल की मंशा क्या थी यह शायद ही कभी स्पष्ट हो पाये.

विदर्भ क्षेत्र की नागपुर सीट से सांसद और विधायक रहे बनवारी लाल खुद भी पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं उन्हे गोपालकृष्ण गोखले द्वारा शुरू किए गए अखवार ‘द हितवाद’ को जिंदा रखने का श्रेय दिया जाता है. बनवारी लाल कभी किसी राजनैतिक दल या विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध नहीं रहे, बल्कि पदों के लालच में कांग्रेस और भाजपा के बीच झूला सा झूलते रहे. आखिरकार भाजपा ने गवरनरी से नवाजकर उन्हें इनाम दे दिया. कई विवादों से भी उनका नाम जुड़ा, मौजूदा गाल विवाद उसकी अगली कड़ी है.

एक पुरानी कहावत है कि बंदर कितना भी बूढ़ा हो जाये, कुंलाटे मारना नहीं छोड़ पाता यही हालत बनवारी लाल की है. गाल छू तो लिया पर महिला पत्रकार के एतराज पर वे इतना घबरा भी गए कि राज भवन पहुंचते ही जूते मोजे उतारने से पहले मेल के जरिये सफाई देकर उसे मेनेज करते नजर आए.

सौ प्रतिशत भावुकता आत्मीयता और सज्जनता दिखाते उन्होंने पीड़ित महिला पत्रकार से माफी मांगते अपने मेल में लिखा कि, जब तुमने मुझसे सवाल पूछा था तब हम प्रेस कान्फ्रेंस खत्म कर रहे थे. चूंकि मुझे तुम्हारे द्वारा पूछा सवाल अच्छा लगा इसलिए मैंने तुम्हारा एक पत्रकार होने के नाते उत्साह बढ़ाने के उद्देश्य से तुम्हारा गाल सहलाया था. तुम मेरी पोती के समान हो, अगर तुम उस घटना से आहत हुई हो तो मैं माफी मांगता हूं.

हाल फिलहाल तो इस माफीनामे के साथ ही बात आई गई हो रही है, पर सवाल बनवारी लाल की घटना के वक्त की मंशा का है कि वह क्या थी और जो भी थी वह साबित कैसे होगी. देश भर की युवतियां लड़कों से ज्यादा कुत्सित मानसिकता वाले बूढ़ों की बेजा हरकतों से परेशान रहती हैं, जो अपनी पकी उम्र को हथियार और फिर ढाल बनाकर उनके नाजुक अंगों को सहलाया करते हैं. भोपाल के एक गर्ल्स कालेज मे पढ़ रही एक 20 साल की युवती की मानें तो सिटी बस में जब कोई बूढ़ा बगल में बैठ जाता है तो कई दफा अंजान बनते वह नाजुक अंगों को छूने और सहलाने से बाज नहीं आता. दादा नाना की उम्र के इन लंपटों की हरकतें देख उन्हें थप्पड़ मारने और लताड़ने का मन करता है पर फिर लगता है फसाद खड़ा करने से कोई फायदा नहीं. इस युवती के मुताबिक अगर इन बूढ़ों को झिड़क दो तो वे फिर लाइन पर आते बेटी बेटी करने लगते हैं.

अच्छा तो यह हुआ कि ज्यादा प्रोत्साहन बनवारी लाल ने नहीं दिया. रहा सवाल पत्रकार के पोती समान होने का तो यह बात उन्हें बवाल मचने के बाद क्यों सूझी और क्या अब मानसिक यंत्रणा भुगत रही पीड़ित पत्रकार को वे कानूनन यह हक देने की दिलेरी या हिम्मत दिखा पाएंगे.

महिला पत्रकार का एतराज जायज था कि बिना पूछे उसके गाल सहलाये जाना अपमान और ज्यादती वाली बात थी,  जो हो ही  गए हैं तो उसकी भरपाई माफी मांग कर करना थूक कर चाटने जैसी बात नहीं तो और क्या है. औरतें कहीं सुरक्षित नहीं हैं पर जब शालीन और मर्यादित पदों पर बैठे लोग ही सार्वजनिक रूप से गलत तरीके से प्रोत्साहन देने के नाम पर बेजा हरकतें वो भी महिला पत्रकारों से करने लगें तो बात देश भर का माहौल देखते चिंता की तो है.

अब महिला पत्रकारों को चाहिए कि वे प्रेस कांफ्रेंसों में हेलमेट या बुर्का पहनकर जाएं जिससे उनके गाल सलामत रहें और अच्छे सवाल तो भूलकर भी न पूछें.

VIDEO : प्रियंका चोपड़ा लुक फ्रॉम पीपुल्स चॉइस अवार्ड मेकअप टिप्स

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टौम आल्टर की अंतिम फिल्म ‘‘हमारी पलटन’’ 27 अप्रैल को होगी रिलीज

अपनी अभिनय प्रतिभा से हर किसी को अपना बना लेने वाले अभिनेता टौम आल्टर आज हमारे बीच नहीं है. 29 सितंबर 2017 को उनका निधन हो गया था. मगर उनके अभिनय से सजी अंतिम फिल्म ‘‘हमारी पलटन’’ उनके निधन के सात माह बाद अब 27 अप्रैल को सिनेमाघरों में पहुंच रही है. पर्यावरण संरक्षण की बात करने वाली इस फिल्म की कहानी व कौंसेप्ट से टौम आल्टर काफी प्रभावित थे. मजेदार बात यह है कि इस फिल्म का ट्रेलर टौम आल्टर के निधन से कुछ दिन पहले ही बाजार में आ गया था.

फिल्म ‘‘हमारी पलटन’’ की कहानी ऐसे बच्चों की है, जिनकी परवरिश अलग अलग पृष्ठभूमि में हुई है, मगर जब यह बच्चे मिलते हैं, तो खेलकूद के माध्यम से जिगरी दोस्त बन जाते हैं. फिर यह बच्चे एक अवकाश प्राप्त प्रोफेसर से प्रेरणा लेकर एक नए अभियान की शुरूआत करते हैं.

‘अलख मीडिया’ निर्मित फिल्म ‘‘हमारी पलटन’’ के लेखक व निर्देशक जैनेंद्र जिज्ञासु हैं. इसका एनीमेशन मोहम्मद इरफान ने किया है. संगीतकार मालती माथुर, वी हेमानंदन व अनुराग सिंह तथा कैमरामैन सतिंदर व विजय चैहाण हैं. फिल्म में बाल कलाकारों के साथ टौम आल्टर और मनोज बख्शी की अहम भूमिकाएं हैं.

फिल्म ‘‘हमारी पलटन’’ के निर्देशक जैनेंद्र जिज्ञासु कहते हैं – ‘‘मेरे लिए गौरव की बात है कि मुझे अपने करियर की पहली फिल्म में ही टौम आल्टर जैसे महान कलाकार को निर्देशित करने का अवसर मिला. वह अपने आप में अभिनय के विद्दालय थे. हमारी फिल्म ‘हमारी पलटन’ में उन्होंने बच्चों के मेंटर का किरदार निभाया है. मैं अपनी इस फिल्म को बाल फिल्म मानता हूं.’’

सावधान ! ऐसे ड्राइवर से वरना…

कोई भी अनहोनी या परेशानी बता कर नहीं आती. जिस तरह उजाले को शाम का अंधेरा अपने आगोश में समेटता है, वैसा ही कुछ हाल अनहोनी और परेशानी का भी होता है. नोएडा के वीआईपी इलाके सैक्टर ओमेगा वन स्थित ग्रीनवुड सोसायटी के रहने वाले कारोबारी अशोक गुप्ता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. 13 जनवरी, 2017 की दोपहर उन की आलीशान कोठी में अजीब सी हलचल थी. ऐसी हलचल, जिसे पहले कभी महसूस नहीं किया गया था. दरअसल उस दिन अशोक गुप्ता की पत्नी और बेटा विपुल काफी परेशान थे. मृदुभाषी अशोक का बैटरी बनाने का बड़ा कारोबार था, जिसे वह अपने 2 बेटों की मदद से चला रहे थे.

यूं तो अशोक गुप्ता खुशियों भरी जिंदगी जी रहे थे, लेकिन उस दिन जैसे उन के परिवार की खुशियों को किसी की नजर लग गई थी. दरअसल ढाई बजे के करीब उन के बेटे विपुल के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. नंबर चूंकि पिता का था, इसलिए उन्होंने तत्काल फोन रिसीव कर के कहा, ‘‘हैलो पापा.’’

विपुल को झटका तब लगा, जब दूसरी ओर से किसी अनजान आदमी की आवाज आई, ‘‘पापा, नहीं मैं बोल रहा हूं.’’

‘‘आप कौन ’’ विपुल ने पूछा.

‘‘यह भी बता देंगे, फिलहाल इतना जान लो कि तुम्हारे पापा हमारे कब्जे में हैं. अगर उन की जान की सलामती चाहते हो तो जल्दी से 3 करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो, वरना अच्छा नहीं होगा.’’ फोन करने वाले ने सख्त लहजे में कहा.

उस की बात सुन कर विपुल के पैरों तले से जमीन खिसक गई. विपुल ने पूछना चाहा कि वह कौन बोल रहा है तो उस ने डांटने वाले अंदाज में कहा, ‘‘ज्यादा सवाल नहीं, जितना कहा है, सिर्फ उतना करो.’’

इतना कह कर फोन करने वाले ने फोन काट दिया. इस के बाद गुप्ता परिवार सकते में आ गया. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि अशोक गुप्ता का अपहरण हो चुका है. वह बदमाशों के चंगुल में हैं. उन्हें छोड़ने के लिए बदमाश फिरौती मांग रहे हैं.

अशोक गुप्ता घर में बाजार जाने की बात कह कर अपनी कोरोला कार से ड्राइवर पवन के साथ निकले थे. उसी बीच उन का अपहरण हो गया था. उन का तो अपहरण हो गया, ड्राइवर पवन कहां गया, उस का कुछ पता नहीं था. घर वाले उसी के बारे में सोच रहे थे कि घबराया हुआ पवन घर में दाखिल हुआ. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. वह काफी डरा हुआ था.

उस के आते ही विपुल ने पूछा, ‘‘पवन, पापा को क्या हुआ ’’

‘‘वे मेरी आंखों के सामने से उन्हें ले गए और मैं कुछ नहीं कर पाया.’’ कह कर पवन जोरजोर से रोने लगा.

‘‘क्या हुआ, पूरी बात ठीक से बताओ.’’ विपुल ने पूछा.

‘‘भैयाजी, मैं साहब को ले कर सैक्टर पी-3 गोलचक्कर के पास जा रहा था, तभी एक मारुति वैन ने हमारी कार को ओवरटेक कर के रोक लिया. 3 बदमाशों ने हथियारों के बल पर साहब को निकाल कर अपनी कार में बैठाया और देखतेदेखते ले कर चले गए. मैं ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन्होंने मुझे धक्का दे कर गिरा दिया.’’ डरे हुए अंदाज में पवन ने कहा.

पवन अपनी बात कह ही रहा था कि अपहर्त्ता का फिर फोन आ गया. विपुल ने जल्दी से फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से पूछा गया, ‘‘पैसों का इंतजाम हो गया’’

‘‘इतनी बड़ी रकम का इंतजाम इतनी जल्दी कैसे हो सकता है ’’

‘‘गुप्ताजी को जिंदा देखना चाहते हो तो फिरौती तो देनी ही होगी.’’

‘‘आप लोग मेरी बात समझने की कोशिश कीजिए, रकम बहुत ज्यादा है. हम कोशिश कर के भी इतनी बड़ी रकम का इंतजाम नहीं कर सकते. हमारे पास जो नकदी और गहने हैं, वह सब हम देने को तैयार हैं. लेकिन मेरे पापा को कुछ नहीं होना चाहिए.’’

‘‘उस की फिक्र तुम मत करो, हम अपने वादे के पक्के हैं. तुम पैसा तैयार करो, हम दोबारा फोन करते हैं. और हां, गलती से भी पुलिस को खबर की तो मजबूरन हमें अपने हाथ खून से रंगने पड़ेंगे.’’ अपहर्त्ता ने कहा और फोन काट दिया. इस तरह अपहर्त्ता लगातार विपुल के संपर्क में बने थे.

नातेरिश्तेदारों से सलाहमशविरा कर के विपुल ने पिता के अपहरण की सूचना पुलिस को दे दी. कारोबारी के अपहरण की सूचना मिलते ही सीओ डा. अरुण कुमार और स्थानीय थाना कासना के थानाप्रभारी सुधीर त्यागी अशोक गुप्ता की कोठी पर पहुंच गए.

मामला सीधे अपहरण का था. अब तक मिली जानकारी से पुलिस को पूरा विश्वास था कि अपहर्त्ता जरूर किसी न किसी रूप में अशोक गुप्ता के जानकार थे. उन्होंने उन की हैसियत देख कर ही फिरौती की मांग की थी.

उन के ड्राइवर पवन के सामने उन का अपहरण हुआ था, इसलिए पुलिस ने उस से पूछताछ की. उस ने वहीं बातें पुलिस को भी बताईं, जो विपुल को बताई थीं. पुलिस ने जब उस से पूछा कि उस ने वहां शोर क्यों नहीं मचाया तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं बहुत डर गया था.’’

एसएसपी धर्मेंद्र सिंह ने एसपी सुजाता सिंह से सलाह की. वह अपहृत कारोबारी अशोक गुप्ता की जल्द से जल्द बरामदगी चाहते थे, इसलिए उन के निर्देश पर एसपी सुजाता सिंह ने सर्विलांस टीम को सक्रिय कर दिया. पुलिस ने अपराध क्रमांक 33/2017 पर धारा 364ए/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी, साथ ही विपुल से अपहर्त्ताओं से संपर्क बनाए रखने को कहा.

अपहर्त्ता का फोन आया तो विपुल ने बात 15 लाख रुपए नकद और आभूषणों में तय कर ली. लेकिन अपहर्त्ताओं की एक बात ने विपुल को न सिर्फ चौंका दिया, बल्कि वह सोचने पर भी मजबूर हो गए. अपहर्त्ता ने कहा था, ‘‘हम यह फिरौती एक शर्त पर लेंगे.’’

‘‘क्या ’’

‘‘आप को रकम अपने ड्राइवर के हाथों भेजनी होगी, क्योंकि हम उसे पहचानते हैं. इस में कोई चालाकी नहीं होनी चाहिए. फिरौती ले कर कहां आना है, यह हम थोड़ी देर में बता देंगे.’’

अपहर्त्ता ने जैसे ही फोन रखा, विपुल ने पुलिस अधिकारियों से कहा, ‘‘सर, अपहर्त्ता कौन है, मुझे पता चल गया है.’’

‘‘क्या ’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘जी सर, मैं ने उस की आवाज पहचान ली है. वह कोई और नहीं, हमारा पुराना ड्राइवर सनेश है. मेरा शक उस पर इसलिए और बढ़ गया है, क्योंकि उस ने फिरौती की रकम पहुंचाने के लिए पवन को भेजने की शर्त रखी है. पवन को डेढ़ महीने पहले उसी ने हमारे यहां नौकरी पर रखवाया था.’’ विपुल ने बताया.

विपुल ने यह बात बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कही थी, इसलिए पुलिस के शक की सुई पवन पर ठहर गई. उस की भूमिका पुलिस की नजर में पहले से ही संदिग्ध थी, क्योंकि उस ने पुलिस को फोन न कर के और शोर न मचा कर घर आ कर अपहरण की बात बताई थी.

जबकि अपहरण के मामलों में ऐसा होता नहीं है कि अपहर्त्ता किसी ड्राइवर के जरिए फिरौती मंगवाएं. असलियत जानने के लिए पुलिस की सर्विलांस टीम ने पवन, अशोक गुप्ता और सनेश की काल डिटेल्स निकलवाई तो घटना के समय की तीनों की लोकेशन एक साथ की पाई गई. यही नहीं, पवन और सनेश की लगातार बातें भी हो रही थीं.

पुलिस को अपहर्त्ताओं तक पहुंचने की राह मिल गई थी. पवन से पूछताछ की गई तो पहले वह अपना हाथ होने से इनकार करता रहा, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो वह टूट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि अपहरण की साजिश में वह खुद भी शामिल है.

सपी सुजाता सिंह जानती थीं कि अपहर्त्ताओं को जरा भी शक हुआ तो अशोक गुप्ता की जान को खतरा हो सकता है, इसलिए उन्होंने पवन के जरिए अपहर्त्ताओं तक पहुंचने और अशोक गुप्ता को सकुशल बरामद करने की योजना बनाई. इस मामले में खास बात यह थी कि पवन को पता था कि अशोक गुप्ता को कहां रखा गया है.

विपुल ने अपहर्त्ताओं को फोन कर के बता दिया था कि उन्होंने पवन को रकम दे कर भेज दिया है. जबकि पुलिस टीम ने पवन को कार में अपने साथ बैठा रखा था. 10 मिनट बाद ही पवन के साथी का फोन उस के मोबाइल पर आ गया. पवन ने पुलिस के इशारे पर उसे विश्वास दिला दिया कि किसी तरह का कोई खतरा नहीं है और वह फिरौती का माल ले कर उन के पास पहुंच रहा है.

अब तक रात हो चुकी थी. हथियारों से लैस पुलिस टीम पवन को साथ ले कर रात करीब 12 बजे बुलंदशहर जनपद के थाना सिकंदराबाद के गांव सनौटा के जंगल में पहुंची. थोड़ी कोशिश कर के पुलिस ने ईंख के एक खेत में बंधक बनाए गए अशोक गुप्ता को सकुशल अपहर्त्ताओं के चंगुल से मुक्त करा लिया.

पुलिस ने घेराबंदी कर के सनेश और उस के साथी राबिन को गिरफ्तार कर लिया, जबकि इन के 2 साथी पुलिस को चकमा दे कर भाग निकले. पुलिस को इन के कब्जे से 315 बोर के 2 तमंचे मिले. अशोक गुप्ता काफी डरेसहमे थे. पुलिस सभी को ले कर नोएडा आ गई. पुलिस के लिए यह बड़ी सफलता थी.

एसपी सुजाता सिंह ने आरोपियों से पूछताछ की. इस पूछताछ में राह से भटके एक शातिर महत्त्वाकांक्षी नौजवान की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

एक साल पहले अशोक गुप्ता ने सनेश को अपने यहां ड्राइवर रखा था. वह नोएडा से ही लगे जिला बुलंदशहर के गांव खगावली का रहने वाला था. निम्नवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाला बीए पास सनेश काफी महत्त्वाकांक्षी था और बचपन से ही अमीर बनने के सपने देखता आया था.

यह बात अलग थी कि उस के सपने पूरे नहीं हो सके थे और वह ड्राइवर बन कर रह गया था. अपने काम से सनेश जरा भी खुश नहीं था. अपने सपने के बारे में वह अकसर अशोक गुप्ता से भी जिक्र करता रहता था कि एक दिन उसे भी बड़ा आदमी बनना है. अशोक गुप्ता उस की बातें सुन कर मुसकरा देते थे.

अमीर बनने के सपने ने सनेश को कुंठित कर दिया था. अक्तूबर, 2016 के अंत में नौकरी छोड़ कर उस ने कोई दूसरा काम करने का विचार किया. जबकि अशोक गुप्ता नहीं चाहते थे कि वह नौकरी छोड़ कर जाए. उन्हें परेशानी हुई तो उन्होंने उस से कोई दूसरा ड्राइवर दिलाने को कहा.

अशोक गुप्ता के कहने पर उस ने अपने रिश्तेदार पवन को उन के यहां नौकरी पर रखवा दिया. पवन का बड़ा भाई सनेश का जीजा था. पवन उसी के पड़ोस के गांव शरीकपुर का रहने वाला था. यहां अशोक गुप्ता की लापरवाही ही कही जाएगी कि उन्होंने दोनों ड्राइवरों का पुलिस वैरिफिकेशन कराना जरूरी  नहीं समझा.

सनेश ने नौकरी तो छोड़ दी, लेकिन काफी भटकने के बाद भी उसे न कोई दूसरी नौकरी मिली और न ही वह कोई दूसरा काम कर सका. हर समय वह किसी भी तरह रुपए कमाने के बारे में सोचा करता था. दिमाग में जब एक ही बात बैठ जाए तो आदमी अच्छाबुरा भी नहीं देखता.

ऐसे में ही सनेश के दिमाग में गलत तरीके से पैसे कमाने की बात आई तो उस ने अपने पुराने मालिक का अपहरण कर मोटी फिरौती वसूलने का मन बना लिया. क्योंकि वह अशोक गुप्ता की आर्थिक स्थिति और स्वभाव को जानता था.

उस ने सोचा कि अगर अशोक गुप्ता का अपहरण कर लिया जाए तो उन से आसानी से मोटी रकम फिरौती में मिल सकती है. चूंकि उस का रिश्तेदार पवन उन के यहां ड्राइवर था, इसलिए उस के जरिए बिना किसी खतरे के अशोक गुप्ता का अपहरण किया जा सकता था. पूरी योजना बना कर सनेश ने इस मुद्दे पर पवन से कहा, ‘‘पवन मेरा बचपन से करोड़पति बनने का सपना है. अगर तू मदद कर दे तो मैं एक ही झटके में करोड़पति बन सकता हूं, साथ ही तुझे भी करोड़पति बना सकता हूं.’’

‘‘इस के लिए मुझे क्या करना होगा ’’ पवन ने पूछा.

‘‘अपने लालाजी का अपहरण कराना होगा.’’

‘‘क…क…क्या ’’ पवन चौंका.

‘‘देख, सीधे रास्ते से तो करोड़पति बनने से रहे. भाई इस के लिए कुछ ऐसा ही करना होगा. लेकिन इस में तुझे घबराने की जरूरत नहीं है. मैं सब संभाल लूंगा. किसी को हम पर शक भी नहीं होगा.’’ सनेश ने पवन को समझाया तो अमीर बनने का उस का भी सपना जाग गया.

सनेश का ही एक दोस्त था राबिन, जो मेरठ जिले के थाना भावनपुर के गांव किनानगर का रहने वाला था. अपना इरादा उस ने राबिन और अन्य 2 साथियों विपिन और ललित को बताया तो पैसों के लालच में वे भी साथ देने को राजी हो गए. इस के बाद एक दिन सभी ने बैठ कर पूरी योजना तैयार की.

सनेश शातिर दिमाग था. वह पूरी सफाई के साथ अशोक गुप्ता का अपहरण कर फिरौती वसूलना चाहता था. उन की योजना थी कि फिरौती वसूल कर को वे अशोक गुप्ता की हत्या कर देंगे, क्योंकि वह उन्हें पहचानते थे. अगर उन्हें जिंदा छोड़ दिया जाता तो बाद में सभी पकड़े जाते. इसलिए वे फिरौती मिलने तक ही उन्हें जिंदा रखना चाहते थे. इस तरह अपहरण की फूलप्रूफ योजना तैयार कर ली गई.

योजना के मुताबिक, 13 जनवरी को पवन अशोक गुप्ता को ले कर निकला. उन्हें रामपुर बाजार जाना था. वापसी में पवन ने कार सेक्टर पी 3 गोलचक्कर के पास अचानक सर्विस रोड की ओर घुमा दी. अशोक गुप्ता को उधर नहीं जाना था, इसलिए

उन्होंने पूछा, ‘‘पवन, इधर कार कहां ले जा रहे हो ’’

‘‘अभी पता चल जाएगा.’’ पवन ने जवाब में कहा.

अशोक गुप्ता कुछ समझ पाते, उस के पहले ही पवन ने कार को किनारे कर के रोक दी. कार के रुकते ही पहले से ही मोटरसाइकिल से पीछा कर रहे सनेश और उस के साथियों ने कार को घेर लिया. इस के बाद सनेश और उस के अन्य साथी कार में दाखिल हो कर अशोक गुप्ता पर तमंचे तान दिए. अचानक घटी इस घटना से अशोक गुप्ता घबरा गए.

सनेश और उस के साथी राबिन ने अशोक को कब्जे में कर लिया. पवन ने कार बढ़ा दी तो बाकी 2 साथी मोटरसाइकिल से उन के पीछेपीछे चल पड़े. अशोक गुप्ता ने चीखने की कोशिश की तो उन्होंने उन के साथ मारपीट कर के और उन्हें जान से मारने की धमकी दे कर चुप करा दिया. इस में उन की स्वेटर भी फट गई.

कार पवन ही चला रहा था. योजना के मुताबिक वे उन्हें जंगल में ले गए और ईंख के खेत में बंधक बना लिया. इस के बाद पवन ने घर जा कर अपहरण की मनगढ़ंत कहानी सुना दी, जबकि सनेश आवाज बदल कर विपुल को फोन करता रहा. वे अपनी योजना में सफल भी हो जाते, लेकिन बुरे कामों का अंजाम कभी अच्छा नहीं होता. विपुल ने आवाज पहचान ली, जिस से अपहर्त्ताओं की पोल खुल गई.

पूछताछ के बाद पुलिस ने सनेश, पवन और राबिन को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानत नहीं हो सकी थी. बाकी बचे उन के साथियों ललित और विपिन की पुलिस तलाश कर रही थी. सनेश ने अपने बेलगाम सपनों को काबू में रखा होता तो ऐसी नौबत कभी न आती.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

रिश्तों की आड़ में…सेक्स, सेक्स और बस सेक्स

हमारे समाज में ऐसी औरतें या लड़कियां कम नहीं हैं, जो अपने किसी न किसी हथकंडे से मर्दों को पा कर ही रहती हैं. ऐसी औरतें सोचती हैं कि अगर वे किसी को अपना जिस्म सौंप कर उन्हें मजे दे देंगी, तो इस से उन का बिगड़ेगा भी क्या? 24 साला सुचित्रा अंगरेजी में एमए और फिर बीऐड करने के बाद भी सरकारी टीचर नहीं बन पाई, तो उस ने तमाम प्राइवेट स्कूलों में टीचर की नौकरी के लिए आवेदन देना शुरू कर दिया. सुचित्रा पिछड़ी जाति की थी, इसलिए उसे बहुत सी जगह रखा ही नहीं गया. जब उसे अपने शहर के स्कूलों में नौकरी नहीं मिल पाई, तो उस ने गांवों के निजी स्कूलों में आवेदन भेजना शुरू कर दिया था. वहां ऊंची जाति की औरतें नौकरी के लिए नहीं जाती थीं.

जब अपने शहर से डेढ़ सौ किलामीटर दूर एक कसबेनुमा गांव के निजी स्कूल में नौकरी मिली, तो सुचित्रा ने उसे स्वीकर कर लिया था. स्कूल के मैनेजर ने सुचित्रा के रहने का इंतजाम अपने गांव के सेना एक रिटायर्ड अफसर लाखन सिंह के मकान में कर दिया था.

50 साला मकान मालिक लाखन सिंह अपने मकान में अकेले ही रहते थे. उन का बेटा अपने परिवार के साथ किसी बड़े शहर में रहता था. लाखन सिंह ने अपने मकान के चौक में पानी के लिए बोरिंग लगा रखा था. जब वे नहाते थे, तब उन के गठीले बदन को देख कर सुचित्रा का दिल उन्हें पाने को मचल उठता था. एक रात जब लाखन सिंह शौच के लिए जाने लगे, तो उन्होंने बैड पर सोती हुई सुचित्रा को झीने कपड़ों में देखा.

उन का दिल उसे पाने के लिए मचलने लगा. 10 साल पहले उन की बीवी की मौत हो चुकी थी. उस के बाद उन्होंने किसी औरत से जिस्मानी संबंध नहीं बनाए थे.

उस समय सुचित्रा भी जागी हुई थी, पर वे सोती समझ बैड के पास खड़े हो कर उस के शरीर को गौर से देखने लगे. अचानक सुचित्रा ने उन की ओर मुसकराते हुए एक मादक अंगड़ाई ली और अपने बैड पर बिठा लिया.

सुचित्रा उन से बोली, ‘‘आप भी प्यासे हैं और मैं भी प्यासी हूं, इसलिए अब हम दोनों अपनीअपनी प्यास बुझा लेते हैं. कोई हम पर शक भी नहीं कर सकता है.’’

यह कहते हुए जब सुचित्रा ने उन्हें अपने ऊपर गिराया, तो वे भी उस समय अपना आपा खो बैठे. वे उस पर बुरी तरह झपट पड़े.

प्यार का खेल खेलने के बाद जब वे दोनों एकदूसरे से अलग हुए, तो सुचित्रा उन से बोली, ‘‘अच्छी सेहत के लिए सैक्स करना जरूरी होता है, क्योंकि इस से हमारे शरीर की जकड़ी हुई नसें खुल जाती हैं. आप में तो इतनी ताकत है कि मुझे वाकई मजा आ गया.’’

कुछ दिनों के बाद सुचित्रा की एक 22 साला सहेली प्रमिला उस के पास रहने आई. उसे पता चल गया कि उस की सहेली सुचित्रा और अंकल के बीच क्या संबंध हैं. वह भी उन से मजे लेने के लिए मचल उठी और दूसरे दिन खुद ही उन के पास चली गई.

प्रमिला के मादक अंगों को देख कर वे हैरान रह गए थे. उस के बाद वे दोनों सहेलियां उन से खूब मजे लेने लगी थीं. लाखन सिंह ने एक जिगरी दोस्त अमर सिंह को भी अपने पास बुला लिया और उसे भी मजे दिलवाना शुरू कर दिया था. मजे लेने के बाद वे दोनों ही उन्हें खूब पैसे देने लगे थे.

एक बार जब सुचित्रा के मांबाप उस से मिलने गांव आए, तब वे यह जान कर खुश हुए थे कि लाखन सिंह ने उन की बेटी को अपनी धर्म बेटी बना लिया है. लेकिन उन्हें इस बात की भनक तक नहीं थी कि इस रिश्ते की आड़ में उन की बेटी सुचित्रा लाखन सिंह के साथ सैक्स संबंध बना कर मजे ले रही है.

सुचित्रा ने जब अपने मांबाप को लाखन सिंह के दिए हुए रुपए थमाए, तो वे उन्हें किसी देवता से कम नहीं समझ रहे थे. यही हाल सुचित्रा की सहेली प्रमिला के मांबाप का भी था. लाखन सिंह ने न सिर्फ उसे जिस्मानी मजे दिए थे, बल्कि एक लाख रुपए देने के साथसाथ अपने गांव के स्कूल में नौकरी भी लगवा दी थी.

ऐसी ही एक और दास्तान शहर में रहने वाले सुनील और उस के मकान में किराए पर रहने वाले मोहन की 20 साला खूबसूरत बीवी हर्षा की थी. शादी के बाद जब हर्षा पहली बार अपने पति मोहन के साथ शहर में आई, तो उसे देख कर उस का मकान मालिक सुनील ऐसा लट्टू हुआ कि वह उसे पाने के लिए बेचैन हो गया.

इधर, राधिका अपने पति सुनील से बोर हो चुकी थी. उस का दिल मोहन पर आ गया था. एक दिन वह मोहन के कमरे में जा कर बोली, ‘‘मैं आप की हर्षा को अपनी छोटी बहन बनाना चाहती हूं और आप को अपना जीजा.’’

यह सुन कर मोहन उस से बोला, ‘‘बना लो. इसी बहाने मुझे भी अपनी साली से हंसीठिठोली करने का मौका मिलेगा और हर्षा भी साली बन कर सुनीलजी से हंसीठिठोली कर लेगी.’’ मोहन ने अपनी नईनई बनने वाली 23 साला खूबसूरत साली राधिका को आंख मारी, तो वह खुशी से मुसकरा उठी.

राधिका अपने पति सुनील से बोली, ‘‘जब हर्षा को मैं ने अपनी छोटी बहन बना कर आप की साली बना दिया है, तो आप इसे अपने साथ ले जा कर इस की पसंद की खरीदारी कराओ और इसे कुछ खिलापिला कर शहर में घुमाफिरा कर लाओ. इस पर कुछ पैसे खर्च करो.’’

हर्षा से मजे पा कर सुनील ने उसे खूब खिलायापिलाया और उस की पसंद की खरीदारी कराई. जब वे दोनों घर पहुंचे, तब तक मोहन दफ्तर जा चुका था.

राधिका ने हर्षा से पूछा, ‘‘तुम्हें जीजाजी ने परेशान तो नहीं किया?’’

‘‘परेशान तो काफी किया था, पर मैं उस परेशानी को भूल गई हूं. रात को इन से फिर मिलूंगी.’’

इन झूठे रिश्तों की आड़ में सैक्स संबंध बनाने की दास्तानें बहुत हैं. आजकल सैक्स संबंध बनाने के लिए लोग किसी से भी अपने रिश्ते बना लेते हैं. दिक्कत तब होती है, जब कई मर्दों से संबंध रखने वाली औरत पेट से हो जाती है, तब सारे मर्द उस का साथ छोड़ कर भाग जाते हैं.

रुपहले पर्दे की तवायफ : आधी हकीकत, आधा फसाना

पिछले साल अप्रैल में प्रदर्शित फिल्म ‘बेगम जान’ निस्संदेह खास किस्म के दर्शकों को ध्यान में रखते हुए बनाई गई थी, लेकिन इस फिल्म में अभिनेत्री विद्या बालन का जीवंत अभिनय हर वर्ग के दर्शकों को पसंद आया. जिस ने भी फिल्म देखी, विद्या बालन की अभिनय प्रतिभा का लोहा माना.

बंगला फिल्म ‘राजकहिनी’ की रीमेक ‘बेगम जान’ कई मायनों में एक अहम फिल्म थी, जो भारत पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी में तवायफों के दर्द को बयां करती थी, इस फिल्म की जान केंद्रीय पात्र बेगम जान उन्मुक्त और सख्त स्वभाव की औरत है, जो कोठा चलाती है. कोठा चलाना कभी भी आसान काम नहीं रहा, इस बात को श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म ‘मंडी’ में बड़ी ईमानदारी से दिखाया गया था.

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बंटवारे के दौरान कैसेकैसे कहर टूटे यह कई फिल्मों में दिखाया गया है, लेकिन बेगम जान के कोठे की बात ही कुछ और है. उस का कोठा एक ऐसी जगह बना हुआ है, जो दोनों देशों की सीमा पर है. इस कोठे को तोड़ना प्रशासनिक मजबूरी भी है और जरूरत भी. नाटकीय अंदाज में अधिकारी साम, दाम, दंड, भेद अपनाते हैं तो बेगम जान चौकन्नी हो जाती है. तवायफों से सख्ती से पेश आने वाली बेगम जान कोठा बचाने के लिए जीजान लगा देती है, पर सरकार से जीत नहीं पाती.

फिल्म का दूसरा अहम पहलू बेगम जान की कोठे और अपने पेशे के प्रति प्रतिबद्धता है. बेगम जान को आजादी से कोई सरोकार नहीं है, क्योंकि आर्थिक और सामाजिक रूप से गुलाम तवायफों की दुनिया कोठे तक ही सीमित रहती है. इस के बाहर वे झांकती तक नहीं कि कहां क्या हो रहा है? मसाला फिल्मों की तरह फिल्म आगे बढ़ती रहती है, उस के साथसाथ चलती है तवायफों की बेबस जिंदगी, अनिश्चितता, असुरक्षा और अकेलापन.

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बंगला निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी ने इस फिल्म को निखारने और संवारने में खुद को पूरी तरह झोंक दिया है. विद्या बालन के कंधों पर टिकी फिल्म ‘बेगम जान’ दरअसल एक ऐसी तवायफ की कहानी है, जिस के कोठा चलाने के अपने उसूल हैं. वह मर्दों की कमजोरी पहचानती है और अपना काम साधने के लिए उसूलों से भी समझौता करने को तैयार हो जाती है.

रुपहले पर्दे की कोई भी अभिनेत्री तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक वह किसी फिल्म में तवायफ का किरदार न निभा ले. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हर सफल अभिनेत्री ने किसी न किसी फिल्म में तवायफ की भूमिका की है. तवायफ की भूमिका निभाना कोई आसान काम नहीं होता, यह बात ‘पाकीजा’ से ले कर ‘बेगम जान’ तक साबित हुई है.

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कोठों और तवायफों की जिंदगी पर दर्जनों फिल्में बनी हैं. उन में से कुछ तो आज भी ब्रांड की तरह हैं. दरअसल, आम लोगों के लिए तवायफें और कोठे हमेशा से ही बेहद जिज्ञासा, उत्सुकता और आकर्षण का केंद्र रहे हैं. बावजूद इस के कि कोठों पर हर कोई नहीं जाता. एक ऐसा वक्त भी था, जब तवायफों के कोठे या तो राजाओं और नवाबों की विलासिता अथवा मनोरंजन के महफूज अड्डे हुआ करते थे या फिर बेहद खास लोगों की अय्याशी के ठिकाने. अभिजात्य मध्यमवर्ग का वास्ता उन से फिल्मों के जरिए ही पड़ा. धार्मिक सामाजिक और पारिवारिक बंदिशों में जीने वाले लोगों ने तवायफों और कोठों को सिर्फ फिल्मी परदे पर ही देखा और समझा.

समानांतर या कला फिल्मों की तवायफ भी पर्दे पर दिखाई गईं और तवायफों वाली व्यावसायिक फिल्में भी खूब चलीं. इन दोनों किस्म की तवायफों में एक फर्क रहा. फर्क यह कि कला फिल्मों की ज्यादातर तवायफ बुद्धिजीवी महिला होती थीं और साथ में अच्छी शायरा भी. पर व्यासायिक सिनेमा की तवायफ एक खूबससूरत जिस्म भर होती थी, जो शाम ढलते ही कोठों की रौनक में ढल जाती थीं. घुंघरुओं की छमछम और वाद्य यंत्रों की थाप पर जब वह नाचती थीं तो उन के कद्रदान झूम उठते थे.

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इन फिल्मों ने तवायफों और कोठों की जो छवि गढ़ी, उस में एक गुलजार गली होती थी, जिस के नीचे पान की दुकानें होती थीं. उन दुकानों पर लोगों की खासी चहलपहल रहती थी. सूरज ढलते ही ये गलियां उजियारी हो जाती थीं और कोठे रोशनियों से नहा उठते थे. गलियों में दलाल घूमते नजर आते थे, जो ग्राहकों से मुजरा सुनने की गुजारिश करते थे.

इन का ग्राहक वर्ग भी अलग था, जो हाथ में गजरा लपेटे रहता था. उस के गले में रंगीन स्कार्फ या रूमाल झूलता रहता था. मुंह में पान की पीक भरी रहती थी और सिर से तेल टपकता रहता था. ग्राहकों में गुंडे, मवालियों से ले कर पैसे वाले और इज्जतदार लोग भी शुमार रहते थे. कोठे पर पहुंच कर ये लोग गावतकिए का सहारा ले कर टिक जाते थे और मुजरे का लुत्फ उठाते हुए तवायफ की हर अदा पर नोट लुटाते थे. इन में से ही कोई तवायफ पर फिदा हो कर उस से मोहब्बत कर बैठता था. फिर शुरू होती थी एक प्रेम कहानी, जिस का अंत अकसर ट्रेजेडी में होता था.

इन व्यावसायिक फिल्मों की एक कमी यह थी कि इन में तवायफ की जिंदगी की कहानी कम ही होती थी, क्योंकि ये फिल्में नीचे के दर्शकों के मनोरंजन के लिए और फिल्म में नाचगाने के दृश्य ठूंसने के लिए बनती थीं.

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हर एक फिल्म में कोठे की संचालिका यानी मौसी जरूर होती थी, जिस के इशारे पर महफिल शुरू और खत्म होती थी. यह मौसी आमतौर पर रिटायर्ड तवायफ होती थी, जिसे कोठे की गार्जियन भी कहा जा सकता है्. कोठों का संचालन और प्रबंधन करने वाली इस महिला के ताल्लुकात मालदारों के अलावा गुंडों और पुलिस वालों तक से होते थे. बेगम जान में विद्या बालन लगभग इसी अंदाज में दिखीं, जो कहानी की मांग के मुताबिक जरूरत से ज्यादा क्रूर दिखाई गई है, लेकिन वह तवायफों का दर्द भी समझती है और उन्हें सांत्वना भी देती है.

कोठा संस्कृति का पूरा ऐतिहासिक सच दर्शकों ने 1972 में प्रदर्शित अपने जमाने की सुपर डुपर हिट फिल्म ‘पाकीजा’ से समझा था.

कमाल अमरोही की निर्देशन क्षमता किसी सबूत या तारीफ की मोहताज नहीं रही. वह कहानी में डूब कर फिल्में बनाते थे. पाकीजा की केंद्रीय भूमिका में उन की पत्नी और अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी थीं. इस फिल्म के गाने आज भी शिद्दत से गाए और सुने जाते हैं.

नवाबी दौर को जीवंत करती पाकीजा की कहानी आम कहानियों से हट कर थी. साहिब जान बनी मीना कुमारी की एक्टिंग ने साबित कर दिया था कि हर तवायफ के अंदर एक औरत भी होती है, जिस के अपने जज्बात होते हैं. वह महज पैसों या मनोरंजन के लिए नहीं जीती, बल्कि प्यार भी कर सकती है और उसे आखिरी सांस तक निभा भी सकती है.

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‘पाकीजा’ की पाकीजा उर्फ नरगिस उर्फ साहिबजान की भूमिका मीना कुमारी ने बेहद सहज ढंग से निभाई थी, जिस के लिए वह जानी भी जाती थीं. कोठे पर ही पलीबढ़ी नरगिस अपने दौर की प्रसिद्ध नर्तकी और गायिका है. जब वह कोठे का चक्रव्यूह नहीं भेद पाती तो उस से समझौता कर लेती है. तभी उस की जिंदगी में एक नवाब सलीम अहमद खान आता है. सलीम की भूमिका में 68-70 के दशक के दौर के मशहूर अभिनेता राजकुमार थे.

सलीम और साहिबजान कोठे की बंदिशों को भूल कर एकदूसरे से प्यार करने लगते हैं और शादी करने का फैसला ले लेते हैं. दोनों भाग तो जाते हैं, पर शादी नहीं कर पाते. अपनी शोहरत के कारण साहिबजान हर जगह पहचान ली जाती है. फिल्म का अंत भले ही सामाजिक उपन्यासों जैसा रहा हो, जिस में साहिबजान अपने आशिक की प्रतिष्ठा के लिए अपना प्यार कुर्बान कर देती है. इस पूरी फिल्म में मीना कुमारी छाई रहीं तो उस की मुकम्मल वजहें भी थीं.

एक वजह यह भी थी कि मीना कुमारी वाकई एक ऐसी अभिनेत्री थीं, जो वास्तविक जिंदगी में जीवन भर सच्चे प्यार के लिए भटकती रहीं. वह एक उम्दा गजलकार भी थीं. मीना कुमारी की गजलें आज भी गजल प्रेमी डूब कर सुनते हैं. कमाल अमरोही से शादी करने के बाद भी वह अभिनेता धर्मेंद्र को नहीं भुला पाई थीं और उन्होंने खुद को शराब के नशे में डुबो लिया था.

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‘पाकीजा’ 1958 में बनना शुरू हुई थी, पर प्रदर्शित 1972 में हो पाई. एक वक्त में लग रहा था कि यह फिल्म डिब्बे में ही बंद रह जाएगी. पर राजकुमार की कोशिशों के चलते इस का प्रदर्शन संभव हो पाया. अक्खड़ मिजाज के राजकुमार शायद पहली दफा किसी के सामने गिड़गिड़ाए थे. वह मीना कुमारी ही थीं, जो राजकुमार के अनुनयविनय को टाल नहीं पाईं और ‘पाकीजा’ की बाकी शूटिंग बीमारी की हालत में भी करने तैयार हो गईं. ‘पाकीजा’ के प्रदर्शन के चंद दिनों बाद ही उन की मृत्यु हो गई थी.

फिल्म जब प्रदर्शित हुई तो उस ने बौक्स औफिस के सारे रिकौर्ड तोड़ डाले. जिन मीना कुमारी को दर्शक एक घरेलू महिला के तौर पर देखने के आदी हो गए थे, उन्होंने बड़े शिद्दत से उन्हें तवायफ के रोल में पसंद किया.

‘पाकीजा’ ने तवायफ की एक नई और लगभग वास्तविक छवि दर्शकों के सामने रखी, जो आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है. मीना कुमारी ने ‘पाकीजा’ में तवायफ की जो भूमिका निभाई, उस ने दर्शकों के मन में यह बात स्थापित कर दी कि तवायफ सिर्फ मुजरा ही नहीं करती, बल्कि उस के अंदर एक औरत भी होती है, उस की भावनाएं होती हैं. उस का दिल भी किसी के लिए धड़कता है. वह भी मोहब्बत करने का हक रखती है और अपनी मोहब्बत के लिए कोठे के उसूल तोड़ने का दुस्साहस भी कर सकती है.

यह ट्रेजेडी भी दर्शकों को रास आई थी कि एक तवायफ का मुकाम आखिरकार कोठा ही है, जहां से उस की जिंदगी का सफर शुरू होता है और उसी पर आ कर खत्म होता है. समाज तवायफ को बहैसियत पत्नी तो दूर की बात है, बतौर आम औरत भी मान्यता नहीं देता. तवायफ आखिरकार तवायफ ही होती है और तवायफ ही रहती है.

‘पाकीजा’ के बाद लंबे वक्त तक तवायफों पर आधारित कोई फिल्म नहीं बनी, जिस की बड़े पैमाने पर चर्चा हुई हो. व्यावसायिक फिल्मों में जरूर तवायफें और कोठे दिखाए जाते रहे, पर यह दर्शकों को बांधे रखने का टोटका भर था, जिस के एकाध दृश्य में आइटम सौंग की तरह तवायफ और मुजरा डाल दिए जाते थे.

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8 साल के सन्नाटे के बाद जब चुप्पी टूटी तो उस का अंदाज भी जुदा था. तवायफों पर लगातार क्रमश: 4 फिल्में 1981 में ‘उमराव जान’, 1982 में ‘बाजार’, 1983 में ‘मंडी’ और 1984 में ‘उत्सव’ प्रदर्शित हुईं.

इन फिल्मों के प्रदर्शन से बुद्धिजीवी वर्ग में एक बार फिर से यह बहस छिड़ गई कि आखिर तवायफ के माने क्या है? क्या वह वेश्या और कालगर्ल्स से भिन्न है? और यदि है तो किस तरह?

एक वर्ग वह था, जो इस जिद पर अड़ा था कि तवायफ जिस्मफरोशी नहीं करती, वह सिर्फ अपना नाचगाने का हुनर दिखा कर पैसा कमाती है. समाज में उस की भी इज्जत और जगह होती है. इस वर्ग का एक चलताऊ तर्क यह था कि तवायफों के पास तो शहजादों और राजकुमारों को भी अदब, तमीज और तहजीब सीखने भेजा जाता था.

इसी दौर में हालांकि यह बात भी साफ होती जा रही थी कि आधुनिक युग में तवायफ और वेश्या में कहने भर का फर्क है. इतिहास और साहित्य तवायफों से भरा पड़ा है. हिंदू पौराणिक ग्रंथों में इस का पर्याय शब्द गणिका है. गणिका और तवायफ में कोई खास फर्क नहीं होता. दोनों को ही राजाश्रय मिला होता है. हिंदी और उर्दू के साहित्यकार इस सच पर तो सहमत थे कि तवायफ भी समाज का एक अभिन्न हिस्सा हैं और उस की अपनी एक अलग अहमियत और उपयोगिता है. लेकिन चूंकि साहित्य भी पुरुष प्रधान था, इसलिए हमेशा ही तवायफ, वेश्या या गणिका के चरित्र को उभार कर उस का अंत पलायन में ही दिखाया गया है.

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निस्संदेह यह संकीर्ण पुरुष मानसिकता थी, जो फिल्मों में लगातार देखने को मिली. सार रूप में यह स्वीकार कर लिया गया कि तवायफ ऐच्छिक ही सही जिस्मफरोशी भी करती है. लेकिन एक विशिष्ट वर्ग के पैसे और संरक्षण पर गुजर करने वाली सुंदर प्रतिभाशाली गणिका या तवायफ और आम आदमी की बाई, रंडी या वेश्या में एक सीमा रेखा खींची जाना जरूरी है.

यह वह दौर था, जब कोठे खत्म हो रहे थे. बनारस, कोलकाता और लखनऊ शहर 70 के दशक तक आबाद कोठों और मुजरों के लिए मशहूर थे, जहां देश भर के शौकीन मुजरे के लिए जाया करते थे. आपातकाल के बाद जो न दिखने वाले बदलाव समाज में आए, कोठों का लुप्त हो जाना भी उन में से एक था.

आपातकाल का कोठों और तवायफों से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था. लेकिन उन की जिंदगी और रोजीरोटी से एक कनेक्शन जरूर था. जो ठीक नोटबंदी के बाद जैसा था, जिस की मार बारबालाओं और कालगर्ल्स पर पड़ी थी. सियासी फैसलों के उपेक्षित वर्ग पर फर्कों के कोई मायने नहीं होते, इसलिए ऐसी दिक्कतें किसी को नजर नहीं आतीं.

सागर सरहदी निर्देशित ‘बाजार’ फिल्म नाम के मुताबिक तवायफों की बेबसी को दर्शाती हुई थी तो मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल की फिल्म ‘मंडी’ तमाम थिएटरी कलाकारों से सजी हुई थी. मंडी से कैरियर की शुरुआत करने वाली इला अरुण को तब कोई जानता भी नहीं था, लेकिन बेगम जान में वे मुख्य भूमिका में थीं.

इला अरुण नहीं मानतीं कि ‘बेगम जान’ और ‘मंडी’ की तुलना की जानी चाहिए. पर हकीकत यह है कि दोनों फिल्मों में देशकाल का फर्क भर है, नहीं तो ‘मंडी’ में भी राजनेता भूमाफिया और भ्रष्ट प्रशासन तवायफों के जरिए अपना स्वार्थ सिद्ध करते नजर आए थे. ‘मंडी’ की रूक्मिणी बाई यानी शबाना आजमी मुंह में पान की गिलोरी दबाए सौदेबाजी करती नजर आती हैं तो इस के उलट ‘बेगम जान’ की हुक्का गुड़गुड़ाती विद्या बालन जौहर या खुदकुशी करने को प्राथमिकता देती है. इन दोनों ही फिल्मों ने तवायफ और वेश्या शब्द के फर्क को मिटाने में सटीक भूमिका निभाई.

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श्याम बेनेगल के चतुराई भरे निर्देशन ने तवायफ और वेश्या में फर्क खत्म कर दिया था और इस मिथक को भी तोड़ा था कि तवायफ कोई मुसलमान औरत ही होती है. इस से पहले सन 1983 में प्रदर्शित फिल्म ‘उमराव जान’ ने भी हाहाकारी सफलता हासिल की थी. अभिनेत्री रेखा उमराव जान की भूमिका में थीं. ‘उमराव जान’ एक ऐसी किशोरी की कहानी पर आधारित फिल्म थी, जिसे बचपन में ही अगुवा कर कोठे पर बेच दिया जाता है.

मशहूर उपन्यासकार मिर्जा हादी रुस्वा के चर्चित उपन्यास उमराव जान अदा की वास्तविकता को ले कर आज तक संदेह व्याप्त है. इस से परे फिल्मी कोठों का एक कड़ा सच जरूर निर्देशक मुजफ्फर अली ने उजागर किया था कि एक तवायफ की दौड़ कोठे से शुरू हो कर कोठे पर ही खत्म होती है. यह अंत ही तवायफ की नियति है.

‘उमराव जान’ की रेखा ठीक ‘पाकीजा’ की मीना कुमारी की ही तरह सराही गई थीं और हर वर्ग के दर्शक द्वारा पसंद की गई थीं. यह अस्सी के दशक की वह फिल्म थी, जिस  ने तवायफों के बारे में लोगों को एक बार फिर नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया था. ‘उमराव जान’ के किरदार में अपने जीवंत अभिनय से जान डाल देने वाली रेखा ने एक तवायफ की जिंदगी और कशमकश को साकार कर अहसास करा दिया था कि वह आखिर रेखा क्यों हैं.

‘उमराव जान’ का गीत संगीत ‘पाकीजा’ से उन्नीस नहीं था. फिल्म की कहानी भी ‘पाकीजा’ से बहुत ज्यादा जुदा नहीं थी. उमराव जान भी जिंदगी भर प्यार को तरसती रही और शेरोशायरी के जरिए मशहूर हुई. समाज में उमराव जान की अपनी जगह थी, उस का अपना एक अलग प्रशंसक वर्ग था, जो तवायफ से ज्यादा शायरी को अहमियत देता था. लेकिन आखिरकार मुजफ्फर अली को फिल्म के अंत में दिखाना पड़ा कि उमराव जान अपनों के ठुकराए जाने से ज्यादा आहत हुई. वह कभी अपनी गलती नहीं समझ पाई और कोठों के पहरेदारों से ले कर एक डाकू और फिर एक नवाब तक में अपना प्यार तलाशती रही.

उमराव जान फिल्म एक हद तक व्यावसायिक थी, पर उस में समानांतर सिनेमा की छाप भी साफ दिखाई दी थी. फिल्म के अंत में प्रतीकात्मक तौर पर आईने से धूल पोंछती रेखा को दिखाया गया है, जिस से दर्शक समझ लें कि तवायफ कभी बीवी बहन या मां नहीं हो सकती. उमराव जान बन गई अमीरन को उस का सगा भाई न पहचान कर किस गुनाह की सजा दे रहा है, यह बात दर्शक तब समझे जब उन्हें यह अहसास हुआ कि क्यों तवायफ को गिरी नजर से देखा जाता है.

अस्सी का दशक रेखा के नाम था, ‘उमराव जान’ हिट हुई तो 3 साल बाद सन 1984 में वह शशि कपूर की महत्त्वाकांक्षी फिल्म ‘उत्सव’ में बसंत सेना की भूमिका में दिखीं, जो एक गणिका थी. उत्तेजक दृश्यों से भरपूर इस कथित कला फिल्म को दर्शकों ने बेरहमी से नकार दिया था. अभिनेता गिरीश कर्नाड के निर्देशन के जरिए शशि कपूर की इच्छा कामोत्तेजक दृश्यों को दिखा कर दौलत और शोहरत बटोरने की थी, जो पूरी नहीं हुई. ‘उत्सव’ असल में वात्स्यायन के कामसूत्र को चित्रण करने की कोशिश करने वाली फिल्म थी, पर इस के ऐतिहासिक पात्र और कहानी दर्शकों को पसंद नहीं आए थे.

‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘सुहाग’ जैसी व्यावसायिक फिल्मों में भी रेखा तवायफ की भूमिका में थीं. ‘मुकद्दर का सिकंदर’ में तवायफ की जिंदगी का छोटा सा हिस्सा दिखाया गया था, लेकिन वही हिस्सा पूरी फिल्म पर भारी पड़ा.

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दर्शकों को यह बात पसंद आई कि कोठे वाली जौहरा बाई (रेखा) सिकंदर (अमिताभ बच्चन) पर मरने लगती है, पर सिकंदर उसे नहीं चाहता. उलट इस के एक मवाली दिलावर (अमजद खान) जौहरा पर इस कदर जान छिड़कता है कि फिल्म के आखिर में सिकंदर को जौहरा से प्यार करने की गलतफहमी में मार डालता है.

निर्देशक प्रकाश मेहरा बहुत कम दृश्यों में कोठों की बंदिशें बताने में कामयाब रहे थे. साहिब जान, बेगम जान और उमराव जान की तरह जौहरा की जिंदगी भी एक बड़े कमरे में कैद बताई गई. यहां निर्देशकों की मजबूरी भी हो गई थी और जरूरत भी कि वे कैमरे की नजर गलियों, फूलों और कोठों की सीढि़यों से हटा कर कुछ इतर नहीं दिखा सके और जो दिखाया वह मुजरा था, घुंघरुओं की खनक के साथ तवायफ पर न्यौछावर होते नोट थे.

1987 में बी.आर. चोपड़ा ने ऋषि कपूर और रति अग्निहोत्री को ले कर ‘तवायफ’ शीर्षक से ही फिल्म बना डाली. केंद्रीय भूमिका में रति अग्निहोत्री थीं, जिन्हें यह समझ आ गया था कि बौलीवुड में कामयाबी के झंडे गाड़ने के लिए किसी चर्चित अभिनेत्री को तवायफ की भूमिका निभाना अनिवार्य होता है. ‘तवायफ’ फिल्म ठीक चली. यह कहानी पारिवारिक थी, इसलिए तवायफ जीवन और कोठे का चित्रण वैसा नहीं हो पाया, जैसा दर्शक पसंद करते रहे थे.

अस्सी के दशक में ही तवायफों पर कई और फिल्में भी बनीं, लेकिन मसाला ज्यादा होने के कारण वे बौक्स औफिस पर औंधे मुंह लुढ़कीं. सलमा आगा और राजबब्बर अभिनीत ‘पति पत्नी और तवायफ’ इन में प्रमुख थी. इस दौर में एक ही विषय पर लगातार फिल्में बनीं और अधिकांश कमजोर कहानी और लचर निर्देशन के चलते फ्लौप हुईं तो अरसे तक फिर किसी ने तवायफ प्रधान फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं की.

सन 1991 में निर्देशक महेश भट्ट ने फिल्म ‘सड़क’ में अपनी बेटी पूजा भट्ट को तवायफ के रोल में पेश किया था. नायिका को एक टैक्सी ड्राइवर चाहने लगता है और बड़े नाटकीय व करिश्माई तरीके से उसे गुंडों और दलालों से छुड़ा कर उस से शादी कर लेता है. महेश भट्ट जैसे तजुर्बेकार निर्देशक ही दर्शकों की कमजोर नब्ज पकड़ पाते हैं. वह जानते हैं कि कैसे कोठे की पृष्ठभूमि पर बनाई फिल्म देखने के लिए दर्शकों को खींचा जा सकता है. ‘सड़क’ में संजय दत्त बतौर हीरो थे.

‘सड़क’ फिल्म की खूबी यह थी कि इस में कोठों का आधुनिकीकरण दिखाया गया था. फिल्म में तवायफ तो थी, पर वह लहंगे में नहीं, बल्कि सलवारसूट में थी और फिल्म में परंपरागत मुजरा नहीं था. एक किन्नर महारानी के रोल में अभिनेता सदाशिव अमरापुरकर भी जमे थे. इस अलग किरदार के जरिए महेश भट्ट ने खूब वाहवाही बटोरी थी, साथ ही सदाशिव अमरापुरकर ने भी. ‘बेगम जान’ के शुरुआती दृश्यों में महेश भट्ट की यह शैली दिखी थी कि कैसे बेगम जान सदमे में आई लड़की को थप्पड़ मारमार कर उसे सदमे से उबारने का मनोवैज्ञानिक काम करती है.

फिर एक दशक तक तवायफों पर कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं बनी. यह सन्नाटा सन 2001 में मधुर भंडारकर की फिल्म ‘चांदनी बार’ से टूटा, जिस में एक तवायफ मुमताज की भूमिका में अभिनेत्री तब्बू थीं. फिल्म चली और तब्बू का अभिनय सराहा भी गया, पर इस से तब्बू के डूबते कैरियर को कोई सहारा नहीं मिला.

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सन 2002 में प्रदर्शित फिल्म ‘देवदास’ में तवायफ चंद्रमुखी की भूमिका में माधुरी दीक्षित थीं. ‘देवदास’ बड़े बजट की भव्य फिल्म थी, जिस में नायक शहरुख खान और अभिनेत्री ऐश्वर्या राय भी थीं. आम दर्शकों के लिए देवदास की कहानी हालांकि जिज्ञासा का विषय नहीं थी, लेकिन बड़े सितारों से सजी इस फिल्म के सेट दर्शकों को थिएटर तक खींचने में कामयाब रहे थे.

देवदास पर फिल्म पहले भी बन चुकी थी, पर इस देवदास में कहानी का इतना सरलीकरण कर दिया गया था कि दर्शक उसे आसानी से समझ पाए थे. बंगाली संस्कृति को छूती ‘देवदास’ में एक अलग हट कर बात यह थी कि तवायफें एकदम अछूत नहीं बताई गई थीं.

निर्देशक की यह कोशिश कामयाब रही थी कि तवायफों का भी समाज में सम्मानजनक स्थान होता है और यह एक स्वतंत्र व्यवसाय है. जिस का संबंध आम संपन्न परिवारों से भी होता है. धकधक गर्ल के नाम से मशहूर हो चुकीं माधुरी दीक्षित की अभिनय प्रतिभा भी ‘देवदास’ से उजागर हुई थी.

तवायफों की जिंदगी पर हर 10-12 साल के अंतर से लगातार फिल्में बनीं. ‘चांदनी बार’ और ‘देवदास’ के तुरंत बाद आई निर्देशक सुधीर मिश्रा की ‘चमेली’, जिस में मुख्य भूमिका में कपूर खानदान की बेटी करीना कपूर थीं. करीना कपूर ने भी साबित कर दिया कि एक तवायफ का चुनौतीपूर्ण किरदार वह सफलतापूर्वक निभा सकती हैं. इस फिल्म में करीना के हावभाव और लटकेझटके पेशेवर तवायफों सरीखे ही थे, जिन्हें दर्शकों ने सराहा था.

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अब तक यह साबित हो चुका था कि ‘पाकीजा’ और ‘बेगम जान’ जैसी ऐतिहासिक और कला फिल्मों के मुकाबले ‘चांदनी बार’ और ‘चमेली’ जैसी फिल्में एक अलग फ्लेवर की हैं. इस यानी नए दौर की तवायफ कोई शायरा या गायिका नहीं रह गई, लेकिन उस में अहसास और जज्बात आम औरतों सरीखे ही होते हैं.

कोठों की भव्यता भी सन 2000 के बाद की फिल्मों में नहीं दिखी. इन फिल्मों में तवायफ परंपरागत तवायफ कम वेश्या ज्यादा लगीं. जो तय है, बदलते वक्त की मांग और सच दोनों थे. ‘बेगम जान’ में मुद्दत बाद परंपरागत कोठों और तवायफों की झलक दिखी तो दर्शकों ने उसे फिर हाथोंहाथ लिया.

तवायफों पर बनी नई फिल्मों का पुरुष चरित्र भी भिन्न था. वह पहले की तरह नवाब, गुंडा या मालदार जमींदार नहीं था, बल्कि आम आदमी था, जिस का अपना एक अलग मध्यमवर्गीय द्वंद्व होता है.

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तवायफों का द्वंद ‘पाकीजा’ से ले कर ‘चमेली’ तक में ज्यों का त्यों था, बस इतिहास और वक्त के लिहाज से उस का प्रस्तुतीकरण बदल गया था. परदे की तवायफों ने हर दौर में दर्शकों को सोचने पर मजबूर तो किया कि क्यों उन की जिंदगी का स्याह पहलू उन के व्यक्तिगत आत्मसम्मान और स्वाभिमान पर भारी पड़ता है. समाज का नजरिया न ‘पाकीजा’ के दौर में बदला था, न ‘चमेली’ या ‘चांदनी बार’ के दौर में बदला. तवायफों से प्यार कोई भी करे, लेकिन सामाजिक और पारिवारिक दबावों के चलते उन्हें अपना नहीं पाता.

तवायफों पर बनी तमाम फिल्में स्त्री प्रधान मानी जाती हैं, जिन के अंत में उन की हताशा ही दिखती है. यह कहना मुश्किल है कि हालात और दुश्वारियों से परेशान तवायफों का पलायन और पराजय उन्हें पुरुष प्रधान समाज के सामने हथियार डालने को मजबूर क्यों करता है? स्त्री विमर्श तो उन में कहीं दिखता ही नहीं. एक तयशुदा संघर्ष के बाद तवायफ हार मान लेती है. लेकिन हम ‘मंडी’ को भी नहीं भूल सकते, जिस में दिखाया गया था कि पिंजरे में कैद पंछी आजाद हो जाता है, जो असल में तवायफ और कोठों का प्रतीकात्मक संबंध उजागर करता है.

इस देश में गांधी को ढूंढ़ना अब कठिन है

कभी आजादी की लडाई और आजादी के प्रतीक रहे गांधी जी की औकात मोदी सरकार के ‘स्वच्छता अभियान‘ में चश्में की हो गयी है. बड़े ही तरीके से उन्हें मारा जा रहा है. सोच और व्यक्तित्व के स्तर पर उन्हें वहां खड़ा किया जा रहा है जहां कूड़ा है, कूड़े का डब्बा है. हम गांधी जी की हत्या और हत्यारों की बातें नहीं करेंगे, सभी को पता है, और जो बदला जा रहा है, उसे सभी देख रहे हैं. यह खयाल है बीमार है, कि ‘‘गांधी चतुर बनिया था.‘‘

बनियों की बात करें तो सरकार बड़े-बड़े राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय बनियों की है, जो देश को ‘ब्राण्ड‘ बना कर मुक्त व्यापार के बाजार में खड़ा करते हैं, उसके प्राकृतिक, जन एवं बौद्धिक ‘सम्पदा‘ को खरीदते और बेचते हैं, सरकार को इन सबका जरिया बनाते हैं.

फिर, बनियों की सरकार ‘चतुर बनिये‘ की औकात क्यों घटा रही है? तयशुदा बात है, कि आज के संदर्भ में वह चतुर नहीं है, बनिया नहीं है. वह वैसा नहीं है, जैसा उसे होना चाहिये. वह उस पाली का भी नहीं है, जिस पाली की सरकार है. जो अपने को ‘देशभक्त‘ और ‘राष्ट्रवादी‘ कहती है. आंखों में अंगुली डाल-डाल कर दिखाती है, कि इस देश में हिंदू ‘राष्ट्रवादी‘ है. संघ, भाजपा और सेना ‘देशभक्त‘ है. बाकी जो बच गये, उन्हें राष्ट्रवादी, देशभक्त बनना है. देश की वर्तमान सरकार यही कर रही है. और ‘यह बकवास‘ निरर्थक नहीं है. सोची, समझी, तय की गयी कार्य योजना है. इसी को जरिया बना कर बनियों की सरकार देश की अर्थव्यवस्था को निजी कम्पनियों को सौंप रही है, भारतीय लोकतंत्र की ओट में राजनीतिक एकाधिकारवाद को बढ़ा रही है.

गांधी ने ऐसी चतुराई बिड़ला भवन में रह कर भी नहीं दिखायी. दक्षिण अफ्रीका में भी उनके आस-पास ऐसे पैसे वालों के होते हुए भी उन्होंने नस्लवाद के विरूद्ध लड़ाई लड़ी. गांधी के पास आम जनता की समझ थी और अपनी वर्गगत ऐसी प्रतिबद्धता थी, जो वर्गों के हितों में सामंजस्य की पक्षधर थी, वो कभी भी सिर्फ बनियों के लाभ से संचालित नहीं हुए, जबकि आज संघ, भाजपा और मोदी सरकार के पास सिर्फ बनियों का हित है. देश की आम जनता बहलावे में आयी चीज है.

इस सबके बीच गांधी जी कहां हैं? आपदा की तरह आये नोटबंदी और बदलते नोटों में? या ‘कैश लेस ट्रांजेक्शन‘ में असंदर्भित होते हुए? आत्म निर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सेंधमारी में? या कहीं और…?

तय नहीं कर पायेंगे आप. राजनीतिक सोच-विचार में गांधी कभी नहीं रहे. संसद के बाहर उन्हें बैठा दिया गया, संसद के बाहर वो बैठे हैं. गांधी को कहीं भी बैठाने से किसी को आपत्ति नहीं हुई. वो महात्मा से लेकर बापू और राष्ट्रपिता बने, आम जनता ने उन्हें यह दर्जा दिया, मगर राजसत्ता पर बैठे लोगों ने उन्हें ‘राजघाट‘ दिये. राजघाट यदि कांग्रेस के सरकार की देन है, तो गांधी को राजघाट किसने पहुंचाया, यह खुलेआम है.

इस देश में गांधी को ढूंढ़ना अब कठिन है. उनका अपहरण होता रहा है. उनके कद और दर्जे को घटाने की कोशिश अब हो रही है. कांग्रेस को मारने की साजिशों के तहत गांधी को भी मारा जा रहा है. कांग्रेस के मरने से राष्ट्रीय पूंजीपतियों के सरकार की सोच यदि मरती है, तो कोई बात नहीं, उसे कांग्रेस की -नेहरू-इंदिरा के बाद की- सरकारों ने ही मारा है, लेकिन गांधी के मरने से बात इसके आगे निकल जायेगी.

साभार : आलोकवर्द्धन

जीएसटी की असलियत को भी समझे जनता

जीएसटी गब्बर सिंह टैक्स तो है ही, यह गौरमैंट सेवा टैक्स (जीएसटी) भी है. सरकार का इरादा था कि विकास की चाशनी में लपेट कर इसे जनता को खिला दिया जाएगा, ताकि वह गुलाम सैनिक टट्टू (जीएसटी) बन कर गौरमैंट की सेवा करती रहे. इस टैक्स को इस तरह ढाला गया है कि हर जना इस की लपेट में आ जाए. देश के 125 करोड़ मित्रों, भाइयों और बहनों की जबरदस्त सफाई ट्रैप (जीएसटी) स्कीम का अपना अनूठापन है कि इस के फंदे से कोई नहीं बच सकता.

देश के किसान कर्जों से खुदकुशी कर रहे हैं, पर इस जबरन सरकारी टैक्स (जीएसटी) की बदौलत बैंकों से जिन धन्ना सेठों ने धंधों के नाम पर पैसा लिया था, उसे हड़प करने पर किसी एक को भी खुदकुशी नहीं करनी पड़ी. कुछ विदेशों में मौज कर रहे हैं, तो बाकी महलों में रह रहे हैं और उपदेश देने वाले महापंडित जनता स्वाहा तिकड़म (जीएसटी) भव: का मंत्र रातदिन बोल कर बहका रहे हैं. धन्ना सेठों ने जो पैसे बैंकों से हड़पे उन के लिए सरकार जो 2 लाख करोड़ रुपए (2000000000000 रुपए) दे रही है, वे इसी जीएसटी से आएंगे.

आम किसान, मजदूर, नौकरीपेशा, कारीगर, दिहाड़ी बेलदार, कुली, तांगे वाले, मोची, सफाईकर्मी, नौकरानी, धोबन से छीन कर जमा किया गया पैसा किसी विकासफिकास में नहीं लग रहा. इस से फरार्टे से गाड़ियां दौड़ सकें ऐसी सड़कें बनेंगी, हवाईअड्डे बनेंगे, बुलेट ट्रेनें चलेंगी, परमाणु बम बनेंगे, हैलीकौप्टर खरीदे जाएंगे, पुलिस फोर्स बनेगी, कंप्यूटरों का जाल बिछेगा. इस से न गांवों में सीवर डलेंगे, न नहरें बनेंगी, न नलकूप लगेंगे, न मंडियां बनेंगी, न बसें चलेंगी, न लोकल ट्रेनें ज्यादा बनेंगी, न दुकानें बनेंगी, न व्यापारी को राहत मिलेगी, न कारखाने चलाने वालों को सुकून मिलेगा.

यह टैक्स साफ दर्शाता है कि जैसा एक रात को लोगों की जमापूंजी पर गब्बर सिंह से ज्यादा जबरदस्त सनसनी तरीके से पैसा खींचने की ताकत बड़बोलो में है, वैसी ही जागो सरकार तंत्र (जीएसटी) को थोपने में है. इस की धार पैनी है, क्योंकि इस से पलते हैं नेता और धन्ना सेठ.

किसी भी सरकार को उतना टैक्स लेना चाहिए जितना जनता दे कर खुश रह सके. बिना उपज बढ़ाए टैक्स नाक से इधर से पकड़ कर या उधर से पकड़ कर वसूल कर सरकार ने जनता का हर काम धीमा कर दिया है. आज जनता सुस्ती टैक्स (जीएसटी) की वजह से बाजारों में सन्नाटा है, बेकारी बढ़ रही है, कारखाने बंद हो रहे हैं या आधेअधूरे काम कर रहे हैं. टैक्स का पैसा जनता की भलाई में नहीं लग रहा, उन बैंकों को दिया जा रहा है, जिन्होंने अमीरों को कर्ज दिया पर वापस वसूल नहीं कर पाए.

आबरू की खातिर कातिल बन गई रीना

उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में ग्रीन पार्क कालोनी का रहने वाला 50 साला सोमपाल

एक कालेज में गणित का टीचर था. उस के पास शिक्षा व गृहस्थी दोनों का तजरबा था. बाहरी तौर पर वह अच्छा दिखता था और लोगों से कम ही वास्ता रखता था. परिवार में पत्नी के अलावा 3 बच्चे थे, जिन में 2 बेटियां व सब से छोटा बेटा था. इन बच्चों में 16 साला रीना (बदला नाम) बड़ी थी. 11वीं क्लास में पढ़ने वाली रीना पढ़ाई में बेहद होशियार थी. क्लास में उस की अच्छी पोजीशन आती थी. उस का सपना आईएएस बनने का था.

सोमपाल खुद तो आसपड़ोस में कम ही रिश्ता रखता था, साथ ही उसे यह भी पसंद नहीं था कि उस की पत्नी या बच्चे किसी से ज्यादा वास्ता रखें. सोमपाल की ससुराल पक्ष से भी नहीं बनती थी. पत्नी के वहां जाने पर वह उस से झगड़ा किया करता था.

नहीं थे नेक इरादे

बेटी रीना को ले कर पिता सोमपाल के इरादे नेक नहीं थे. वह बहाने से उसे छूने की कोशिश करता था. जवान होती बेटी के जिस्म पर उस की नजरें अकसर फिसलती थीं.

जब बेटी बाथरूम आतीजाती थी, तो वह उसे अजीब नजरों से देखता था. कभी रात में वह जागता, तो भी रीना को अजीब नजरों से घूरता.

रीना ने शुरू में इन बातों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन पिता का बरताव उसे समय के साथ खटकने लगा. वह उम्र के उस पायदान पर थी, जहां मर्द की घूरती नजरों का मतलब समझने लगी थी.

कई दिन सोचनेसमझने के बाद उस ने अपनी मां से दबी जबान से पिता की इन आदतों की शिकायत की, लेकिन मां ने इसे बेटी की गलतफहमी समझा और उसे भी भविष्य में चुप रहने की हिदायत दी.

जनवरी महीने में एक दिन रीना की मां ने मायके जाने की बात कही, तो सोमपाल ने उसे इस की इजाजत दे दी. वह 2 बच्चों के साथ कुछ दिनों के लिए उत्तराखंड के पंतनगर में अपने मायके चली गई.

रीना भी मां के साथ जाना चाहती थी, लेकिन सोमपाल ने पढ़ाई का वास्ता दे कर उसे भेजने से मना कर दिया.

कत्ल की रात…

वाकिआ 2 जनवरी, 2017 की रात को हुआ. रात में दोनों ने साथ खाना खाया. तकरीबन 10 बजे दोनों सोने चले गए. पिता के कमरे में ही रीना दूसरे पलंग पर लेट गई.

रीना को पता नहीं था कि उस रात सोमपाल की नीयत में पूरी तरह से खोट आ चुका था. सोमपाल ने पहले तो बेटी रीना से इधरउधर की बातें कीं, फिर उस से अपने ही बैड पर आ कर सोने को कहा. वह सहज भाव से वहां आ कर सो गई.

रात के तकरीबन 2 बजे उस की आंख खुली, तो उस ने सोमपाल का हाथ अपने ऊपर रखा पाया. उस ने सोचा कि पिता का हाथ करवट लेते वक्त धोखे से उस के ऊपर आ गया होगा. उस ने हाथ हटा दिया, लेकिन कुछ देर बाद ही सोमपाल की हरकतें बढ़ती गईं. वह उस के नाजुक अंगों पर हाथ लगा कर सहलाने लगा.

रीना ने विरोध कर के बचने की कोशिश की, तो वह जबरन कब्जा कर उस से गलत काम करने की कोशिश करने लगा.

रीना ने अपनी इज्जत बचाने की ठान ली. वह उस के चंगुल से छूट कर बैड से उतरी, तो सोमपाल ने उसे फिर से दबोच लिया. कुछ नहीं सूझा, तो रीना इस बार उस से छूट कर ड्राइंगरूम में पहले से रखी लोहे की छड़ निकाल लाई और सोमपाल के सिर पर 2-3 वार कर दिए. सोमपाल लहूलुहान हो कर गिर पड़ा. रीना सिर थाम कर बैठ गई. बाद में उस ने अपनी मां को फोन से इस की सूचना दी.

सुबह की सनसनी

सोमपाल के ससुर ने तड़के पुलिस कंट्रोल को सूचना दी और तकरीबन 6 बजे खुद भी पहुंच गए. बैडरूम के दरवाजे पर सोमपाल की लाश पड़ी थी. बिस्तर पर खून के निशान थे. कमरे से बह कर खून बरामदे तक फैला हुआ था. पुलिस ने खून से सनी हत्या में इस्तेमाल की गई छड़ बरामद कर ली.

फोरैंसिक ऐक्सपर्ट टीम को भी मौके पर बुला लिया गया, जिस ने फिंगर प्रिंट व फुट प्रिंट समेत कई सुबूत इकट्ठा किए. मौके का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था. शक यह भी था कि रीना ने मनगढ़ंत कहानी न बनाई हो.

पुलिस ने उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल भी निकलवाई. उस के बयानों को सच की कसौटी पर परखा गया. परिवार वालों से भी गहन पूछताछ की गई.

रीना ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था. उस के मुताबिक, पिता की हरकतों से घर उस के लिए कैदखाना बन गया था. वह सनकी इनसान था. वह छड़ से पिता को डरा कर अपनी इज्जत बचाना चाहती थी.

अगर रीना ऐसा नहीं करती, तो खुद मारी जाती, क्योंकि सोमपाल ने उस के हाथ से छड़ छीन कर उस पर ही वार करने की कोशिश की, जिस के बाद हाथापाई कर के रीना ने छड़ छीन कर पिता पर ही वार कर दिया.

सोमपाल के परिवार वाले को रीना की कहानी पर भरोसा नहीं था, लेकिन उस की पत्नी ने स्वीकार किया कि रीना ने कई बार पिता की शिकायत उस से की थी. उस ने सोचा नहीं था कि कभी ऐसा भी हो सकता है. शिकायत को गंभीरता से लिया होता, तो शायद यह दिन नहीं देखना पड़ता.

रिश्ते को बदनाम करती इस वारदात ने समाज के सामने अहम सवाल छोड़ दिया. मनोवैज्ञानिक डाक्टर सुविधा शर्मा कहती हैं, ‘‘यह कोई साधारण बात नहीं है. डाक्टरी भाषा में इसे टास्क ओरिएंटिड रिऐक्शन कहा जाता है और इस में भी यह अटैक रिऐक्शन है. लड़की को फैमिली सपोर्ट की जरूरत थी. पिता परेशान कर रहा था और मां मदद नहीं कर रही थी. समझदारी वाला कोई कदम उठाया गया होता, तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती.’’

पिता के कत्ल की आरोपी रीना अब नारी सुधारगृह में है. उस के पक्ष में सामाजिक संगठन भी उतरे हैं.

लड़की का कहना था कि उस का इरादा हत्या करना नहीं था. बचाव में उस ने हमला किया, जिस से पिता की मौत हो गई. इस वारदात का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था.

लड़की के बयान और हालात के हिसाब से पुलिस ने जांच की. बकौल एसपी समीर सौरभ, ‘‘लड़की ने सैल्फ डिफैंस में पिता पर हमला किया, इसलिए गैरइरादतन हत्या के मद्देनजर जांचपड़ताल आगे बढ़ाई.’’

दूसरी तरफ कानून के जानकारों का यह मानना है कि रीना ने अपनी आबरू बचाने के लिए ऐसा सख्त कदम उठाया. उसे कानून की हमदर्दी तो मिलेगी ही, बशर्ते उसे यह साबित करना होगा कि यह हत्या उस ने सैल्फ डिफैंस में की थी. अगर वह ऐसा नहीं कर पाई, तो उस को सजा भी हो सकती है.

प्रिया प्रकाश वारियर का एक और वीडियो हो रहा है वायरल

एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश वारियर बहुत ही जल्द मलयालम फिल्म ‘उरु अदार लव (Oru Adaar Love)’ के जरिए बड़े पर्दे पर नजर आने वाली हैं. उनकी यह फिल्म इसी साल ईद पर रिलीज होगी, लेकिन उनकी फिल्म रिलीज होने से पहले ही वह पौपुलर हो गई हैं. बता दें, प्रिया के लोग ऐसे दीवाने हैं कि उनका वीडियो इंटरनेट पर आते है वायरल हो जाता है. पिछले कुछ दिनों से उनके कई वीडियो इंटरनेट पर लगातार वायरल हो रहे हैं और इस कड़ी में उनका एक और नया वीडियो हमारे बीच आ चुका है. इस वीडियो में वह मेकअप करवाती नजर आ रही हैं.

इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया है. वीडियो में उनका अंदाज पहले से काफी अलग नजर आ रहा है. वीडियो की शुरुआत में प्रिया अपनी निगाहों से खेलती हुई नजर आती हैं और फिर अगले ही पल वह मेकअप करवाती हुई दिखती हैं. बता दें, इससे पहले प्रिया पहली बार एक चौकलेट ब्रांड के ऐड में नजर आई थीं. लोगों के बीच ‘वायरल गर्ल’ के नाम से मशहूर प्रिया इस वीडियो में भी अपनी निगाहों से खेलती हुई नजर आ रही थीं.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार प्रिया ने अपने वीडियो के जरिए इंस्टाग्राम से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ दिया है. दरअसल, प्रिया प्रकाश के कई वीडियो वायरल होने के बाद उनके इंस्टाग्राम फौलोअर्स की संख्या 50 लाख से भी ज्यादा हो चुकी है. इतनी बड़ी संख्या में फौलोअर होने के बाद प्रिया ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कई बड़े ब्रैंड का प्रमोशन करना शुरू कर दिया है.

एक रिपोर्ट के अनुसार प्रिया प्रकाश एक इंस्टाग्राम पोस्ट के लिए 8 लाख रुपये चार्ज लेती हैं. खबरों की मानें तो प्रिया सोशल मीडिया के माध्मय से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ चुकी हैं. प्रिया प्रकाश की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इंटरनेट पर छाने के बाद उन्होंने गूगल सर्च के मामले में सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली सनी लियोनी और दीपिका पादुकोण को भी पीछे छोड़ दिया.

एक ही दिन में उनके 6 लाख से भी ज्यादा फौलोअर बने थे. फिलहाल उनके फौलोअर की संख्या 51 लाख तक पहुंच गई है. प्रिया फौलोअर के मामले में अमेरिकन रियल्टी टीवी स्टार काइली जेनर और फुटबौल स्टार क्रिस्टियानो रोनाल्डो की बराबरी कर ली है. यह दो सेलीब्रिटी ही एक दिन में 6 लाख से ज्‍यादा फैन्‍स बनाने में सफल रहे हैं.

प्रिया प्रकाश के इंटरनेट स्टार बनने के बाद जब मीडिया ने उनसे बात की थी तो उन्होंने कहा था, ‘मेरे लिए यह बहुत सुखद है. मुझे नहीं पता कि मैं अपनी खुशी का इजहार कैसे करूं. उन्होंने बताया इस कामयाबी के बाद खुशी मनाने के लिए मेरे कौलेज में एक इवेंट आर्गेनाइज किया गया था. यह मेरे लिए नया अनुभव है. मैं यही उम्मीद करती हूं कि सभी लोगों का सपोर्ट मेरे साथ बना रहे.’ बता दें कि वीडियो वायरल होने के बाद प्रिया को कई बड़ी फिल्मों के औफर की गईं, लेकिन उन्होंने उस फिल्म का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया.

ब्वौयफ्रेंड ने बनाया इस एक्ट्रेस का ऐसा वीडियो

हौलीवुड एक्ट्रेस मीशा बार्टन इन दिनों अपनी जिदंगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रही हैं. मीशा ने हाल ही में अपने एक्स ब्वौयफ्रेंड के बारे में चौंकाने वाला खुलासा किया है. उनके मुताबिक, एक्स ब्वौयफ्रेंड ने उनके साथ बिताए निजी पलों का वीडियो बनाकर पौर्न साइट्स को बेचने की कोशिश की. चर्चा तो ये भी है कि औनलाइन पौर्न कंपनियों ने इसके लिए बोली लगाना भी शुरू कर दी है. हालांकि मीशा अब उसके खिलाफ लीगल एक्शन लेने जा रही हैं.

हौलीवुड के वीडियो ब्रोकर केविन ब्लैट के मुताबिक, ‘मेरे पास एक शख्स इस वीडियो को लेकर आया था. फिलहाल यह वीडियो तेजी से सर्कुलेट किया जा रहा है.’ बता दें कि कुछ दिन पहले खबरें आई थीं कि मीशा बार्टन का सेक्स टेप पौर्नोग्राफिक साइट्स पर मौजूद है. इसके बाद मीशा ने अपनी अटौर्नी लीजा ब्लूम के साथ इस बारे में मीडिया से चर्चा की.

एक न्यूज एजेंसी के मुताबिक़, मीशा ने बताया- ”ये मेरे लिए काफी मुश्किल और बुरा दौर है. जब मुझे पता चला कि जिसे मैंने प्यार किया और उस पर भरोसा किया उसी ने मेरे साथ गुजारे निजी पलों को हिडन कैमरे से शूट किया. सबसे ज्यादा दुख वाली बात तो ये है कि उसने इन वीडियो को बेचने और उन्हें पब्लिकली करने की कोशिश कर रहा है.

24 जनवरी, 1986 को हैमरस्मिथ, लंदन में जन्मीं मीशा ब्रिटिश अमेरिकन फिल्म और टीवी एक्ट्रेस हैं. मीशा मौडलिंग भी करती हैं. 31 साल की मीशा ने टीवी पर अमेरिकन सोप ओपेरा ‘औल माय चिल्ड्रन’ से 1996 में डेब्यू किया. मीशा ने भोपाल गैस ट्रेजडी पर बनी फ़िल्म ‘भोपाल- ए प्रेयर फौर रेन’ में मीशा ने ईवा गैसकौन नाम की जर्नालिस्ट का रोल निभाया है.

मीशा की रोमांटिक कौमेडी ‘नौटिंग हिल’ और मनोज नाइट श्यामलन की साइकोलौजिकल थ्रिलर ‘द सिक्स्थ सेंस’ शामिल है. मीशा ने 1997 में फिल्म लौन डौग्स में लीड रोल किया है. इसके बाद उन्होंने पप्स, स्किप्ड पार्ट्स, ऑक्टेन और वर्जिन टेरिटरी जैसी फिल्मों में भी काम किया है.

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