भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा चर्चा में हैं. दरअसल उनके चर्चा में आने का कारण आलिया भट्ट की फिल्म ‘राजी’ है. फिल्म ‘राजी’ में आलिया भट्ट ने एक कश्मीरी मुस्लिम लड़की का किरदार निभाया है, जिसकी शादी पाकिस्तान के एक लड़के से हो जाती है. जिसके बाद ऐसी खबरें सामने आईं कि फिल्म राजी की कहानी सानिया मिर्जा की रियल लाइफ से प्रेरित है. जिस पर कई लोगों ने अपना-अपना रिएक्शन देना शुरू कर दिया. हालांकि अब सानिया मिर्जा ने इस पूरे मामले पर चुप्पी तोड़ते हुए औफिशियल ट्विटर अकाउंट पर जवाब दिया है.
दरअसल एक ट्विटर अकाउंट यूजर ने ट्वीट किया, आलिया भट्ट की फिल्म राजी की कहानी एक ऐसी भारतीय लड़की की है जिसकी शादी एक पाकिस्तानी लड़के से हो जाती है, लेकिन फिर भी वह भारत के लिए ही काम करती है. कहा जा रहा है कि फिल्म सानिया मिर्जा की बायोपिक है. हैशटैग राजी ट्रेलर. इस ट्वीट का जवाब देते हुए सानिया मिर्जा ने लिखा, उम्ममम, मुझे लगता है कि नहीं. इसके साथ ही सानिया ने एक इमोजी का भी इस्तेमाल किया है.
धर्मा प्रोडक्शन और जंगली पिक्चर्स के बैनर तले बनीं फिल्म ‘राजी’ की कहानी हरिंदर सिक्का के उपन्यास कौलिंग सहमत पर आधारित एक कश्मीरी लड़की की रियल लाइफ पर आधारित है. फिल्म में आलिया भट्ट के साथ अभिनेता विक्की कौशल भी नजर आएंगे. फिल्म की डायरेक्टर मेघना गुलजार हैं. फिल्म की कहानी की बात करें तो फिल्म में आलिया भट्ट एक सहमत नाम की लड़की के किरदार में नजर आएंगी, जिसके पिता उसकी शादी पाकिस्तान के एक अधिकारी से करा देते हैं.
देखने में सीधी-साधी सी लगने वाली सहमत पाक में अपने देश के लिए बड़ी शातिर तरीके से जासूसी करती है. मंगलवार को फिल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ था जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया था, जिसके कारण फिल्म का ट्रेलर यू-ट्यूब पर ट्रेंडिग में नंबर एक भी रहा था. इसके अलावा आलिया भट्ट रणबीर कपूर के साथ फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ में नजर आएंगी और रणवीर सिंह के साथ ‘गली बौय’ की भी शूटिंग में बिजी हैं.
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किस्सा कुछ इस तरह से है कि जब मुख्यमंत्री कल्लू सिंह अपनी बीवी जलेबी देवी को अपना ताज दे कर तिहाड़ को गए, तो बहुत लोगों के मन में यह शक पैदा हो गया कि उन की पत्नी इतने बड़े पद को संभाल पाएंगी या नहीं. कल्लू सिंह 8वीं जमात से ज्यादा नहीं पढ़ सके थे, पर बोलचाल व वादविवाद में वे सब के गुरु थे.
जलेबी देवी अपने मिडिल पास शिक्षा मंत्री दुखहरन से भी कम पढ़ीलिखी थीं यानी प्राइमरी फेल थीं. पर वे बातव्यवहार, स्टाइल और अंगरेजी में दोनों से सुपीरियर पड़ रही थीं.
जनताजनार्दन या बड़े अफसरों का उन को ‘मैडम’ कहते कहते मुंह नहीं थकता था. वैसे, जलेबी देवी के इस बदलाव में आईएएस पीए संत तुषार देव यानी एसटीडी उर्फ संतू का बहुत बड़ा हाथ था.
पीए संतू जलेबी देवी को चक्करदार राजनीतिक भंवरों, नुकीली संवैधानिक चट्टानों और तूफानी विरोधी थपेड़ों से बचा कर निकाल लेता था. कम ही लोगों को पता था कि मैडम के पास ईयरफोन भी है, जिस से वे अपनी हिदायतें गाहेबगाहे डायल किया करती थीं.
फर्ज कीजिए, किसी सभा में मैडम का भाषण उबाल बिंदु पर उछाल लगाने वाला हो, तभी ईयरफोन में इंस्ट्रक्शन आ जाता ‘डाउनडाउन’ और वे तत्काल नोज डाइव मार कर नीचे आ जातीं. पर काफीकुछ रटाएसिखाए जाने के बावजूद ऐसा होता कि एसटीडी को ‘कटकट’ कह कर पैकअप कराना पड़ता.
जैसे उस दिन जब सरकारी अस्पताल के जच्चाबच्चा विंग के उद्घाटन के मौके पर जलेबी देवी ने यों कहना शुरू किया, ‘‘देवियो और सज्जनो, यहां मैटरनिटी अस्पताल खोल दिया गया है. जितने बच्चे चाहे पैदा कीजिए, कोई डर नहीं.
‘‘दाई से नाल कटवाने की जरूरत नहीं है. इन दाइयों ने हमारे 3 बच्चे मरवा दिए, नहीं तो इस समय हमारे 17 बच्चे होते. है कोई, जो आज के जमाने में इतने…’’ तभी एसटीडी को बड़े जोर से ‘कटकट’ कह कर उन के भाषण को खत्म कराना पड़ा.
शुरूशुरू में तो जलेबी देवी अपने चतुर पीए संतू की बातें मान लिया करती थीं, पर जैसेजैसे दिन बीतते गए और उन्हें अपनी पोजीशन और पावर का एहसास हुआ, तो वे उस की हिदायतें दरकिनार करने लगीं.
भला हो राज्य की भोलीभाली जनता का, जिस ने जलेबी देवी के कहे को कभी कान नहीं दिया. कान दिया तो उन के अच्छे कामों को, जिन में लगान माफी से ले कर तार काटे जाने की माफी भी शामिल थी.
तकरीबन 2 सौ लोगों को उन्होंने गबन, डकैती, बलात्कार, हत्या जैसे मामलों में जेल जाने से बचाया होगा. कितने अपढ़ बेरोजगारों को निगमों का चेयरमैन, कितने ही जाली डिगरी वालों को वाइसचांसलर बना दिया. क्या इन सब का कोई हिसाब है?
पर बुरा हो उन के विरोधियों का, जिन्हें उन के हर अच्छे काम में ऐब नजर आता. और तो और उन की अपनी पार्टी में भी पंचानन राय और तिलकुट यादव जैसे कई जयचंद थे, जिन्हें जलेबी देवी का दबदबा खाए जा रहा था.
पर धन्य हो भेड़ का दूध पीए जलेबी देवी के कलेजे का, जो सभी दांवपेंचों से बेखबर राज्य की खड़बडि़या मोटरगाड़ी को मर्सिडीज बैंज की शान से लहराए चली जा रही थीं.
जैसे आज ही अविश्वास प्रस्ताव के गहराए बादल को दरकिनार कर उन्होंने 3-4 उद्घाटन के फीते काट डाले और लच्छेदार भाषण दे डाले. हर जगह नियमपूर्वक ‘जब तक सूरज चांद रहेगा…’ वाले नारे के साथ तालियां पिटवा दीं.
भाई के दसलखी ‘ब्यूटी पार्लर’ के उद्घाटन के बाद तो उन्होंने बाकायदा अपना कायाकल्प ही करा डाला. पर ‘ब्यूटी पार्लर’ से निकलते ही एक दिक्कत आ गई. नदी पार गंजी गांव में 5 दलितों की हत्या की खबर आई.
यह सुन कर जलेबी देवी का मूड बिगड़ गया. शाम को बांगड़ू गवर्नर की इफ्तार पार्टी में बिरियानी उड़ानी थी. अब पहले गंजी गांव जाना पड़ेगा. वहां से लौटने पर पता नहीं कितना मेकअप बचा रह पाएगा.
वैसे, पुलिस महानिरीक्षक उन के वहां जाने के पक्ष में नहीं थे. पर पार्टी उपाध्यक्ष राम नगीना ने चेतावनी दी, ‘‘आप को हारना हो, तो मत जाइए.’’
जब जलेबी देवी ने अपने पीए संतू की राय ली, तो उस ने कहा, ‘‘वहां जाने में कोई हर्ज नहीं, पर मेकअप डाउन करना पड़ेगा.’’
जलेबी देवी बोलीं, ‘‘इतनी मेहनत से तो मेकअप कराया था, अब सब गंवा दें?’’
सो लेदे कर काफिला गंजी गांव की ओर बढ़ा. रास्ते में पीए संतू ने लाचारी के भाव के बावजूद जलेबी से ‘खून की आखिरी बूंद’ वाला डायलौग बारबार बुलवा कर चैक किया और कई दूसरी हिदायतें भी दीं, जैसे गले से भर्राई आवाज कैसे निकालनी चाहिए.
दोपहर बाद मुख्यमंत्री का दल घटना वाली जगह पर पहुंच गया. वहां हायतोबा मची हुई थी. प्रशासन के खिलाफ भीड़ नारे लगा रही थी. एक जगह माले नेता राम कटार माइक से आग उगल रहे थे.
भीड़ इतनी थी कि पुलिस कोई भी कार्यवाही करने से हिचक रही थी.
राम कटार ने अपना भाषण बीच में रोक कर गरजती आवाज में भीड़ से पूछा, ‘‘पहचानो… ये कौन हैं?
अरे, ये तो नूरजहां हैं.’’ भीड़ के बीच हंसी की एक लहर दौड़ गई.
‘‘बेगम नूरजहां यहां आई हैं, इंसाफ बांटने. समझे? जहांगीरी इंसाफ तो जानते ही हो, कितना मशहूर है. पहले भी नमूना देख चुके हो,’’ राम कटार चुनचुन कर जहर बुझे बाण जनता के दिल में उतार रहे थे.
‘जलेबी देवी हायहाय’ भीड़ ने नारा बुलंद किया. अफसर चौकन्ने हुए और पुलिस की एक टुकड़ी राम कटार को शांत कराने के लिए लपकाई गई, पर राम कटार लातघूंसों की मार के बावजूद माइक छीने जाने तक जलेबी देवी की अच्छी गत बना चुके थे.
‘‘बड़ी पीर है इन के जिगर में. देखते नहीं हो,’’ वे चिल्लाते रहे, ‘‘लिपस्टिकपाउडर सब गवाह हैं… मारे दुख के अपने आधे बाल कटा दिए हैं. जहांगीर होते, तो पूरा सिर मुंड़वा के आते. नूरजहां बीवी होने के नाते आधे पर काम चला रही हैं.’’
थोड़ी देर बाद राम कटार और उन के साथियों का बंदोबस्त हो जाने के बावजूद भीड़ में जोश बढ़ता जा रहा था.
पीए संतू ने राय दी कि मैडम का अब यहां रुकना ठीक नहीं. जल्द से जल्द इन्हें इस झंझट से निकाल बाहर करना चाहिए. पर राम नगीना ने जोर दिया कि यहां आ कर बिना बोले चले जाना ठीक नहीं है. जनता में गलत संदेश जाएगा.
मैडम के बोलते ही भीड़ शांत हो जाएगी, ऐसा उन्हें यकीन था. शोरगुल के बीच उन्होंने जलेबी देवी को माइक पकड़ा दिया और चिल्लाचिल्ला कर भीड़ को बता दिया कि मुख्यमंत्री आप लोगों से कुछ कहना चाहती हैं.
आखिरकार जलेबी देवी ने अभ्यास की गई भर्राई आवाज में कहना शुरू किया, ‘‘प्यारे भाइयो और बहनो…’’
कड़ी धूप में उन के ऊपर की गई कलाकारी का रंग दूरदूर तक चमक रहा था. एक किनारे पोस्टमार्टम के लिए तैयार की गई पांचों लाशें जमीन पर पड़ी थीं और दूसरी ओर…
अचानक एक जूता जलेबी देवी के सिर पर आ गिरा, जिस से उन का चश्मा दूर जा गिरा और बाल बिखर गए. जब तक वे संभलतीं, तब तक और कई जूतेचप्पलों ने उन का बाकी का हुलिया बदल दिया. पुलिस डंडा फटकारते हुए दंगाइयों की ओर बढ़ी.
गंदे नारों से आसमान गूंजने लगा. ‘हत्यारिन, चोर, पापिन…’ चोट और बेइज्जती से तिलमिलाई जलेबी देवी का सारा सब्र जाता रहा. वे गला फाड़ कर चीखीं, ‘‘मार के बिछा दो सबों को… फिर हम देख लेंगे… किसी को पहनेओढ़े नहीं देख सकते हैं… अच्छा हुआ मर गए. और भी मरे होते तो अच्छा था…’’
पीए संतू ने उन के हाथों से माइक छीन कर दूर फेंका और सिक्योरिटी वालों की मदद से उन्हें तत्काल बाहर निकाल कर रवाना किया. पर कई मीडिया वाले जलेबी देवी की चुनिंदा गालियों और उन के दलित प्रेम की बानगी अंत तक रेकौर्ड करते रहे.
शाम की खबरों में इस महाभारत की खबरें प्रसारित हो गईं और 2 सहयोगी पार्टियों की समर्थन वापसी से सरकार गिर गई.
यह अलग बात है कि 6 महीने बाद ही कल्लू सिंह की अद्भुत कुशलता के चलते जलेबी देवी फिर से पद पर आसीन हो कर जनकल्याण में जुट गईं.
लेकिन उन्होंने अपना मिस्टेक को नहीं दोहराया. अब वे खूनी घटना वाली जगहों पर बिना मेकअप वाले रूप में ही जाती हैं. गंजी गांव में तो 5 खून पर ही महाभारत मच गया था, पर अब 12-13 लाशों पर भी उतना कुहराम नहीं मचता. पीए संतू के डायरैक्शन में वे राज्य को और ज्यादा मजबूती और शांति की ओर बढ़ा रही थीं.
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पर्यावरण और प्रदूषण जैसे अहम व अति ज्वलंत मुद्दे पर बनी मूक रोमांचक फिल्म ‘‘मरक्यूरी’’ की प्रस्तुतिकरण की खामियों के चलते एक बेहतरीन विषय वाली अच्छी फिल्म आम दर्शकों तक नहीं पहुंच सकती. यह पूरी तरह से पटकथा लेखक व निर्देशक की विफलता ही कही जाएगी कि वह वर्तमान समय के ज्वलंत मुद्दे पर बनी अपनी फिल्म को आम दर्शकों तक पहुंचाकर जागरुकता नहीं ला पाए. और न ही जहर उगलती रासायनिक व धातु की फैक्टरियों के खिलाफ लोगो में रोष ही पैदा हो पाता है.
मूक फिल्म ‘मरक्यूरी’ की कहानी की पृष्ठभूमि में एक केमिकल फैक्टरी के अंदर मरक्यूरी एक्सपोर के चलते धातु की विषैली गैस की वजह से फैक्टरी के आस पास के कई गांवों के इंसान, जानवर, पक्षी आदि मारे जाते हैं. उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद फैक्टरी हमेशा के लिए बंद हो जाती है. उसके बाद भी उस क्षेत्र में जन्म लेने वाला हर बच्चा अंधा बहरा या गूंगा पैदा होता है. इन बच्चों की परवरिश के लिए एक सेवा भावी संस्था ‘होप स्कूल’ चलाती है. इसी होप स्कूल में अंधे व गूंगे प्रभू देवा बच्चों को संगीत सिखाते हैं, संगीत के कार्यक्रम करके लोगों का मनोरंजन करते हैं.
इसी होप स्कूल के छात्र रहे पांच युवक व युवती सनथ रेड्डी, दीपक परमेश, शशांक पुरूषोत्तम, अनीष पद्मनाभन, इंदुजा व गजराज इसी फैक्टरी वाले भुतहा शहर में आ जाते हैं. और एक मकान में रहते हुए शराब व सिगरेट पीते हैं और ऊंचा संगीत सुनते हैं. यह सभी छह साथी गूंगे हैं. इशारों में ही एक दूसरे से बात करते हैं. रात के अंधेरे में पार्टी के बाद पांच साथी कार से बाहर जंगल में घूमने निकलते हैं और बंद पड़ी फैक्टरी के पास भी जाते हैं. वापसी मे कार इंदुजा चला रही होती हैओर अपने प्रेमी के कहने पर काफी तेज गति से कार चलाती है.
उधर रात के अंधेरे में अचानक प्रभू देवा की नींद टूटती है तो वह अपनी पत्नी को सोता छोड़कर जंजीर में बंधे अपने कुत्ते को लेकर बाहर निकलते हैं. उसी वक्त यह पांचों साथी उधर से कार से गुजरते हैं, कार देखकर कुत्ता भौंकता है, इनकी कार का बैलेंस बिगड़ता है और लोहे की चैन से टकरा जाती है. जिससे कुत्ता उस जंजीर से अलग हो जाता है, पर जंजीर का एकसिरा कार के पहिए में फंस जाता है, दूसरा सिरा प्रभू देवा के हाथ में बंधा हुआ है.
यह लोग कुत्ते के डर से कार को और तेज गति से भगाते है, जंजीर के साथ ही प्रभु देवा भी जमीन पर घिसते रहते हैं और उनकी मौत हो जाती है. कुछ देर बाद वह कार रोक कर जंजीर को कार से अलग करना चाहते हैं. पर सफलता नहीं मिलती. तो वह प्रभू देवा के मृत शरीर को अपनी कार की डिक्की में डालकर आगे बढ़ते हैं और फिर फैक्टरी के पास पहुंचकर नदी के किनारे पहाड़ी पर पत्थर आदि की मदद से जंजीर को तोड़ने के बाद प्रभू देवा के मृत शरीर को दफना देते है, पर एक साथी का मोबाइल छूट जाता है.
यह सभी दूसरी रात में मोबाइल ढूढ़ने उसी स्थान पर जाते हैं, मोबाइल मिल जाता है, पर अब प्रभू देवा का भूत उनके पीछे पड़ जाता है. उसे अपनी मौत का बदला लेना है. वहां से यह सभी किसी तरह भागकर फैक्टरी के अंदर पहुंच जाते हैं, जहां प्रभू देवा का भूत एक एक कर सभी की हत्या कर देता है. जब वह इंदुजा के प्रेमी को मार रहा होता है, तब इंदुजा उसका हाथ पकड़कर बताती है कि जो कुछ हुआ अनजाने में हुआ. क्योंकि वह लोग बहरे व गूंगे हैं. होप स्कूल के साथी हैं. और यह युवक उसका प्रेमी है. तब वह भूत रुक जाता है.
भूत को अहसास होता है कि यह लोग भी उसी दर्द के मारे हुए हैं, जिस दर्द को वह सहता रहा है. यानी कि यह सभी इसी फैक्टरी की धातु के जहर के मारे हुए हैं. फिर वह भूत अपनी कहानी सुनाता है कि वह होप स्कूल में संगीत सिखाते हैं. तो इंदुजा को भी याद आ जाता है. फिर वह बताता है कि उसकी पत्नी ने उसकी आंखों का आपरेशन करवाने के लिए पैसा इकट्ठे कर लिए थे, आपरेशन होने वाले दिन से पहले की रात उसे कार चालकों ने सड़क पर घसीटते हुए मार डाला. पर प्रभू देवा के भूत को फैक्टरी की वजह से मारे गए लोग और उसके बाद पैदा हुई पीढ़ी के दर्द का ऐसा अहसास होता है कि वह इंदुजा को जिंदा छोड़ देता है.
पर उसके शरीर में प्रवेश कर अपने घर जाता है. देखता है कि उसकी पत्नी गुमुसम बैठी है. उसका कुत्ता उसे देखकर भौंकता भी है. पुलिस अपनी जांच पड़ताल मेंलगी हुई है. वह वापस कार के पास आती है और प्रभू देवा का भूत उसका शरीर छोड़ देता है. इसी के साथ इंदुजा बोलने व सुनने भी लगती है.
जहां तक अभिनय का सवाल है तो नृत्य करने वाले प्रभू देवा ने बहुत ही अच्छी परफार्मेंस दी है. इंदुजा भी अपनी परफार्मेंस से छाप छोड़ती हैं. बाकी कलाकार भी ठीक ठाक हैं.
पटकथा लेखक ने जिस अंदाज में इस मूक फिल्म की पटकथा लिखी है, उसके चलते यह फिल्म आम दर्शक की समझ से परे है. जब दर्शक बहुत ज्यादा दिमाग लगाएगा और इशारों की भाषा को समझना शुरू करेगा, तभी यह फिल्म उसकी समझ में आएगी. फैक्टरी से पैदा हुए जहर के चलते पूरे शहर/कई गांव के इंसानों,जानवर आदि के मारे जाने की कहानी तो सिर्फ अखबार की कतरनों को दिखाकर ही पेश किया गया है. बाकी पूरी फिल्म मूक है.
संवाद नहीं है, इसलिए भी दर्शक बोर होने लगता है. आज की पीढ़ी का दर्शक तेज गति से भागती फिल्म देखने का आदी है, जहां उसका ध्यान परदे पर कम, संवादों पर ही ज्यादा रहता है. आज का दर्शक टकटकी लगाकर फिल्म कम ही देखता है. दूसरी बात इंटरवल से पहले फिल्म बहुत ही शुष्क और धीमी गति से चलती है. लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म गति पकड़ती है और रोमांचक भी हो जाती है.
इंटरवल के बाद कुछ दृश्य कमाल के बन पड़े हैं, जिसके लिए निर्देशक बधाई के पात्र हैं. मगर फिल्म का मूल मुद्दा जहर उगलती फैक्टरियों से फैलते प्रदूषण और लोगों की तबाह होती जिंदगी का दर्द व मुद्दा भी उभर नहीं पाता है. लेखक व निर्देशक ने थोड़ी और संजीदगी के पटकथा पर काम किया होता तो एक बेहतर फिल्म बन सकती थी.
लगभग दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘मरक्यूरी’ का निर्माण कार्तिक सुब्बाराज और पेन कंपनी ने जयंतीलाल गाड़ा ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक कार्तिक सुब्बाराज, पार्श्वसंगीतकार संतोष नारायनन, कैमरामैन एस तिरू तथा कलाकार हैं-प्रभु देवा, सनथ रेड्डी, दीपक परमेश, शशांक पुरूषोत्तम, अनीष पद्मनाभन, इंदुजा व गजराज.
हौलीवुड में रंगभेद और नस्लवादी भावना के वजूद का इतिहास करीब 80 साल पुराना हो गया है और समय समय पर कलाकारों को इसका शिकार होना पड़ा है. ताजा मामले में हौलीवुड में प्रमुख भूमिका पाने वाली बौलीवुड और दक्षिण एशिया की पहली अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के नस्लवाद का शिकार होने की खबरें सामने आई है. प्रियंका ने खुद अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका को दिए इंटरव्यू में इस बात का खुलासा किया है. बौलीवुड की ‘देसी गर्ल’ प्रियंका चोपड़ा ने एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका को दिए इंटरव्यू में बताया कि रंग के आधार पर होने वाले भेदभाव के कारण उनके हाथ से एक हौलीवुड फिल्म फिसल गयी.
प्रियंका ने कहा, यह पिछले साल की बात है जब वह एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में बाहर गयी हुई थीं तब एक स्टूडियो से उनके मैनेजर से बातचीत हुई. उनके मैनेजर से कहा गया कि प्रियंका इस फिल्म के लिए उपयुक्त नहीं हैं और इसका कारण फिजिकैलिटी बताया गया. प्रियंका ने अपने मैनेजर से इस पूरे मामले को समझा, तो पता चला कि फिल्म मेकर्स का मतलब स्किन कलर से था. मेकर्स फिल्म में ऐसे कलाकार को चाहते थे जो ब्राउन न हो. प्रियंका ने कहा कि उन्हें यह सुनकर काफी हैरानी हुई और तकलीफ भी पहुंची.
बता दें कि यह पहला मामला नहीं है जब किसी सेलिब्रिटी को रंगभेद का शिकार होना पड़ा है. कुछ समय पहले शिल्पा शेट्टी भी रंगभेद और नस्लभेद की शिकार हुई थीं, जब वह एक अंतर्राष्ट्रीय टीवी शो बिग ब्रदर का हिस्सा बनी थीं.
यही वजह हो सकती है कि प्रियंका ने अब बौलीवुड कमबैक का मन बना लिया है. क्वांटिको के मेकर्स सीजन 4 की तैयारी में लगे हैं, लेकिन प्रियंका अब इसका हिस्सा नहीं होंगी. सूत्रों की मानें, तो प्रियंका अब कुछ नया करना चाहती हैं.
बता दें कि कुछ समय पहले प्रियंका ने क्वांटिको के तीसरे सीजन का पोस्टर जारी किया था. प्रियंका इन दिनों क्वांटिको आयरलैंड में इसकी शूटिंग कर रही हैं. इस शो का आयोजन इसी साल 26 अप्रैल से किया जाएगा. प्रियंका ने ट्विटर पर क्वांटिको सीजन 3 का फर्स्ट लुक पोस्टर साझा किया था, जोकि बेहद दमदार है इससे पहले क्वांटिको के दो सीजन में भी प्रियंका काफी प्रभावी अंदाज में दिखाई दी थीं.
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जब किसी लड़की को लगता है कि कोई लड़का या आदमी उस का लगातार पीछा कर रहा है, तो उस में एक गहरी दहशत छा जाती है. पहले तो यह संयोग लगता है पर जब पता चल जाए कि पीछा करने वाला घंटों सड़क पर इंतजार करता है, घर के सामने जमा रहता है, तो यह डर लाजिम ही है. इस से न सिर्फ लड़की के दिनरात खराब होते हैं वह पलपल सहमी भी रहती है.
अब सरकार ने एक नया कानून बना कर पीछा करने को भी गंभीर अपराधों की श्रेणी में डाल दिया है. पहले पीछा करना पर नुकसान न पहुंचाना कोई अपराध नहीं था. मगर 2013 में बने कानून में इंडियन पीनल कोड की धारा 354डी के अंतर्गत पीछा करने वाले को 3 साल तक की सजा हो सकती है भले उस पीछा करने वाले ने कोई नुकसान न पहुंचाया हो.
पर यह कानून बनाना एक बात है और इस का इस्तेमाल करवाना दूसरी. आमतौर पर घर वाले इस कदर डर जाते हैं कि वे पुलिस तक जाने की हिम्मत भी नहीं कर पाते. जो यदाकदा पीछा करते हैं वे तो माह 2 माह में अपना रास्ता बदल लेते हैं, पर जो जनून के शिकार हो जाते हैं वे गैंग बना लेते हैं और स्वभाव से अपराधी किस्म के होते हैं, उन से निबटना आसान नहीं होता.
पुलिस में शिकायत करो तो शुरू में पुलिस कानून के बावजूद कोई विशेष ध्यान नहीं देती. अगर पुलिस पीछा करने वाले को पकड़ कर धमका भी दे तो भी बात नहीं बनती. ऐसे में पीछा करने वाला जगह बदल लेता है. घर की जगह दफ्तर, बाजार, रिश्तेदार या फिर किसी के यहां भी पहुंच जाता है.
पीछा करने वाले शातिर के दोस्तयार भी बहुत होते हैं, क्योंकि जिस के पास पीछा करने का समय होता है उस के पास पैसा भी होता है और सड़कों पर घंटों धूप, सर्दी, बारिश में खड़े होने की शारीरिक ताकत भी. वह अपराध करने में सक्षम होता है. वह दूसरों से पीछा करने के अधिकार पर उलझ भी जाता है, क्योंकि एक लड़की का पीछा करने वाले को दूसरे लोग पहचानने लगते हैं. आसपास के घर वालों, दुकानदारों, चौकीदारों के कहने के बावजूद यदि वह पीछा करना न छोड़े तो लड़की के मन पर गहरा असर पड़ता है.
यह पीछा करने वाले का मानसिक रोग होता है पर लड़की को भी रोगी बना देता है. जब तक नुकसान न हो तब तक पुलिस में जाने का मतलब जगहंसाई कराना होता है. भारत में तो इस तरह के हर मामले में पहला आक्षेप लड़की पर ही लगता है कि उस ने ही कुछ ऐसा किया होगा कि कोई उस पर दीवाना हो गया.
आजकल पीछा करने वाले मोबाइल से भी तंग करने लगते हैं. वे मैसेज, प्रैंक काल, फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजभेज कर परेशान कर देते हैं. यह भी प्राइवेसी के हनन के आरोप में अपराध है पर ऐसे अपराधों पर सजाएं कम मिलती हैं. वैसे भी भारत में कानून बनाना आसान है पर सजा दिलाना मुश्किल. महीनों नहीं सालों मामले चलते रहते हैं.
दिल्ली में एक लड़की का एक शातिर 2008 से 2010 तक पीछा करता रहा. उस की स्कूटी के पीछे अपनी बाइक लगा देता था. वह इतना दुस्साहसी था कि एक बार रैड लाइट पर उस लड़की की स्कूटी पर ही बैठ गया और शादी करने की जिद करने लगा. उस के पास रिवौल्वर भी था. लड़की के मना करने पर उस ने उस की पीठ में गोली मार दी. यह घटना 2010 की है. वह लड़की अब लकवाग्रस्त है पर 2017 तक मामला अदालत में चल रहा है, क्यों?
जब तक मामला अदालत में होता है पीडि़ता को चैन नहीं होता, क्योंकि कितनी ही तारीखों पर उसे भी मौजूद रहना पड़ता है.
यह सामाजिक गुनाह है पर अफसोस है कि समाज के ठेकेदार, धर्म के दुकानदार, राजनीतिक दल व अदालतें इस तरह के मामलों को मक्खी के भिनभिनाने का सा मान कर नजरअंदाज कर देते हैं पर यह मक्खी नहीं ततैया होती है, जो दिनरात हराम करती है.
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सऊदी अरब का नाम सुनते ही एक ऐसे देश की छवि उभरती है जहां पिछड़ापन, हिंसा और भेदभाव का बोलबाला है. लेकिन अब यहां सुधार हो रहे हैं और इन सुधारों की वजह है सऊदी अरब के युवराज प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान. अब तक की उत्तराधिकार की परंपरा के तहत पूर्व शासक के पुत्रों में से ही एक के बाद एक सुलतान की गद्दी पर आसीन होते थे. नतीजतन, राजगद्दी संभालते समय उन की उम्र 80 वर्ष से ऊपर हो जाती थी जिस उम्र में कुछ नया करने का जज्बा नहीं होता.
पहली बार वर्तमान शासक ने अपने भाइयों की जगह अपने युवापुत्र को युवराज घोषित किया. उसी का परिणाम है कि नई सोच की सुधारवादी बयार, परंपरावादी व दकियानूसी सऊदी अरब जैसे समर्थ राष्ट्र का चेहरा बदलने की तैयारी में है.
देश में एक दशक के दौरान भयंकर भ्रष्टाचार हुआ है. भ्रष्टाचारियों में शाही परिवार के लोग, मंत्री और उद्यमी शामिल हैं. हो सकता है कि युवराज मोहम्मद बिन सलमान भ्रष्टाचार को बहाना बना कर तमाम विरोधियों का सफाया कर रहे हों. टीकाकारों का मानना है कि आले सऊद में सत्ता को ले कर लड़ाई शुरू हो चुकी है. बिन सलमान हर उस व्यक्ति को रास्ते से हटा देना चाहते हैं जो उन की सत्ता के मार्ग में थोड़ा सा भी रोड़ा अटका सकता है.
पिछले दिनों सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने समाज सुधार की ओर पहल करते हुए भ्रष्टाचार के आरोप को कुछ को बर्खास्त कर दिया और कुछ को गिरफ्तार कर लिया. शहजादे यानी युवराज सत्ता में आंतरिक असंतुष्टों की पहचान कर उन्हें बाहर कर रहे हैं.
विरोधाभास भी
अपनी सुधारवादी छवि के साथ शहजादे अपने राजनीतिक विरोधियों से लड़ रहे हैं. वहीं आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अन्य देशों के साथ मिल कर काम करने की बात करते हैं. जो सऊदी अरब को जानते हैं उन्हें यह बात सुन कर हंसी आई होगी, क्योंकि यह तो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. सऊदी अरब तो दुनियाभर में फैले इसलामी आतंकवाद का स्रोत है. अलकायदा के ओसामा बिन लादेन, तालिबान के मुखिया मुल्ला उमर, बोको हरम के नेता शेकाऊ, आईएसआईएस सरगना अबू बक अल बगदादी आदि हैं. दुनिया के सिरमौर आतंकवादियों में एक बात समान यह है कि यह सभी और इन के संगठन वहाबी हैं. इसलिए वहाबी इसलाम आज की दुनिया में इसलामी आतंकवाद का प्रतिनिधि चेहरा है. पैट्रो डौलर ही दुनियाभर में बहाबी विचारधारा को फैलाने का काम करते हैं. पिछले कुछ दशकों में फैले वहाबी आतंकवाद के पीछे सऊदी राजवंश की ताकत है. बता दें कि सऊदी राजशाही वहाबी विचारधारा की रही है.
धीरेधीरे अमेरिकी मीडिया में भी अब सऊदी अरब की तीखी आलोचना होने लगी है. दिग्गज अमेरिकी पत्रकार फरीद जकरिया ने एक लेख में लिखा, ‘‘सऊदियों ने इसलाम की दुनिया में राक्षस पैदा कर दिए हैं.’’ अब राजनीतिक नेता भी सऊदी को खलनायक मानने लगे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के दोनों उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप के नजरिए में पूरबपश्चिम जैसा अंतर था, लेकिन एक बात पर दोनों सहमत थे और वह बात थी सऊदी अरब की.
हिलेरी क्ंिलटन का आरोप था कि सऊदी अरब ने दुनियाभर में कई युवाओं को कट्टरपंथ की तरफ धकेलने के इरादे से कट्टरपंथी स्कूल और मसजिदें बनाने में मदद की. वहीं डोनाल्ड ट्रंप सऊदी अरब को आतंकवाद की वित्तीय मदद करने वाला सब से बड़ा देश करार दे चुके हैं. यह बात अलग है कि राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने सब से पहली विदेश यात्रा सऊदी अरब की ही की, क्योंकि अमेरिका ही सऊदी अरब का सब से बड़ा संरक्षक है.
राजनीतिक संकट
अब सऊदी अरब विशेषज्ञों का मानना है कि असल में सऊदी अरब का अंदरूनी राजनीतिक संकट गहरा रहा है जिस से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए आतंकवाद से लड़ने की बातें की जा रही हैं. सऊदी अरब का राजनीतिक ही नहीं, आर्थिक संकट भी गहरा रहा है. सऊदी अरब के पास दुनिया का
22 प्रतिशत कच्चा तेल है और अभी तक उस की अर्थव्यवस्था पूरी तरह तेल के निर्यात पर निर्भर थी. इस देश के पास आय का दूसरा स्रोत नहीं है. अब चूंकि कच्चे तेल के भावों में निरंतर गिरावट और विश्व में उस के उपयोग में हो रही गिरावट ने सऊदी अर्थव्यवस्था को चुनौती दे डाली है. ऐसे में सऊदी अरब को अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए आय के अन्य स्रोतों पर काम करना जरूरी था. युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने यही किया.
सऊदी युवराज ने देश को बाहरी निवेशकों के लिए खोला है जो कुछ अरसे पहले तक सोचना भी संभव नहीं था. मगर विदेशी निवेश तभी हो पाएगा जब सऊदी अरब की कट्टरतावादी छवि सुधरे. इसलिए शहजादा मजबूरी में सुधार करने में लगे हैं.
विश्व में सऊदी अरब के समाज को एक अति रूढि़वादी समाज के रूप में देखा जाता है जहां पर मानवाधिकारों का हनन एक सामान्य सी बात है. अपनी धूमिल होती छवि को ठीक करने के लिए सऊदी अरब ने नया हथकंडा अपनाया है जिसे महिलाओं की स्वतंत्रता की आड़ में प्रचारित किया जा रहा है.
दुनियाभर में सऊदी ऐसे देशों में शामिल है जहां महिलाओं पर सब से ज्यादा प्रतिबंध हैं. यहां खेल के मैदानों में महिलाओं को लंबे समय से दूर रखा गया है. लेकिन नए सऊदी प्रिंस महिला अधिकारों को ले कर अब काफी उदारता दिखा रहे हैं. नए आदेश के मुताबिक, महिलाएं भी आने वाले समय में खेलों के मैदान में जा सकेंगी. यह घोषणा शक्तिशाली क्राउन पिं्रस मोहम्मद बिन सलमान के महत्त्वपूर्ण महत्त्वाकांक्षी सुधारों में से एक है. कुछ समय पहले प्रिंस ने महिलाओं के ड्राइविंग करने पर लगे प्रतिबंध को भी हटा दिया. जून 2018 से महिलाएं भी सऊदी अब में ड्राइविंग कर सकेंगी.
महिलाओं के अधिकार
बता दें कि कुछ महीने पहले सैकड़ों महिलाओं को रियाद में एक स्पोर्ट्स स्टेडियम में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी कि ज्यादातर फुटबौल मैच के लिए थी, यह सऊदी अरब के राष्ट्रीय दिवस का मौका था. सऊदी की संरक्षकता प्रणाली के अंतर्गत परिवार का पुरुष सदस्य, जो आमतौर पर पिता, पति या भाई होता है, महिला को पढ़ने, यात्रा करने और अन्य गतिविधियों के लिए अनुमति देता है. लेकिन आर्थिक और सामाजिक सुधारों के मद्देनजर अपने ‘विजन 2030’ को पूरा करने के लिए अब महिलाओं को कुछ अधिकार दिए जा रहे हैं, जिन का उद्देश्य महिला रोजगार को बढ़ावा देना है.
महिलाओं के अधिकार बहुत ही सीमित हैं और उन की स्वतंत्रता कड़े परदे में है. 2015 में उन्हें पहली बार स्थानीय निकायों के चुनावों में वोट देने का अधिकार प्राप्त हुआ. वर्तमान युवराज युवा हैं और नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं. मगर यह सुधार भी दिखावे के ज्यादा हैं.
एक नारी अधिकार कार्यकर्त्ता के मुताबिक, अब महिलाएं गाड़ी चलाएंगी, लेकिन नारीविरोधी सभी कानून बदस्तूर जारी रहेंगे. दुष्कर्म की शिकार होने पर भी महिलाओं को ही सजा भुगतनी होती है, क्योंकि दुष्कर्म के 4 गवाह पेश करने पड़ते हैं. दुष्कर्म नामक कोई शब्द सऊदी अरब के संविधान में नहीं है. है तो व्यभिचार नामक शब्द. व्यभिचार में पकड़े जाने पर महिला व पुरुष दोनों को ही सजा मिलती है. दुष्कर्मी को तो सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन दुष्कर्म पीडि़ता को सजा क्यों?
परपुरुष के साथ यदि किसी महिला को देख लिया गया तो उस का अर्थ यह होता है कि महिला ने व्यभिचार किया है. लड़की को अगवा कर उस के साथ यदि दुष्कर्म किया गया है तो उसे 4 गवाह लाने होते हैं. यदि ऐसा नहीं हुआ तो दुष्कर्मी के साथ उसे भी सजा दी जाती है.
पीडि़ता को गवाह कहां मिलेंगे? सऊदी की महिलाएं अपने पति की अनुमति के बिना देश से बाहर घूमने के लिए नहीं जा सकतीं. इलाज कराने के लिए भी यदि वे बाहर जाती हैं तो घर के पुरुष अभिभावक से अनुमति लेनी होती है. पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना लड़कियों को शादी करना, तलाक, स्कूल व कालेज में दाखिला, नौकरी, व्यवसाय करना यहां तक कि बैंक में खाता खुलवाना भी संभव नहीं है.
वहां लड़कियों के लिए अभिभावक पिता, पति, भाई, चाचा या फिर पुत्र होता है. किसी भी अपरिचित पुरुष के साथ लड़कियों की बातचीत और किसी तरह का मिलनाजुलना प्रतिबंधित है. वर्ष 2013 में सड़क हादसे में जख्मी एक महिला का औपरेशन कर हाथ काटना था लेकिन ऐसा करना संभव नहीं हो सका, क्योंकि उक्त महिला का कोई अभिभावक नहीं था जो अनुमति दे सके. क्योंकि उसी हादसे में उस के पति की मौत हो गई थी.
आर्थिक सांस्कृतिक मोरचे पर
युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने देश में उदार इसलाम के पालन का संकल्प जताया है. 24 अक्तूबर, 2017 को रियाद में एक बड़ा आर्थिक सम्मेलन आयोजित किया गया जिस का मूल उद्देश्य तेल से होने वाली आय पर सऊदी अरब की निर्भरता को कम करना था. सलमान ने विजन 2030 पेश करते हुए कहा, ‘‘हम उस तरफ लौट रहे हैं जो हम पहले थे अर्थात उदार इसलाम वाला देश जोकि सभी धर्मों और दुनिया के लिए खुला हो. हम अपनी जिंदगी के आगामी 30 वर्ष विनाशकारी विचारों के साथ नहीं गुजारना चाहते. हम जल्द अतिवाद को खत्म करेंगे.’’
सऊदी अरब ने सिनेमा पर कई दशकों से जारी पाबंदी हटाने की घोषणा की है. सऊदी अरब ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के सामाजिक सुधारों के तहत यह कदम उठाया है. संस्कृति और सूचना मंत्रालय ने कहा, ‘35 वर्षों से ज्यादा समय बाद 2018 की शुरुआत में देश में व्यावसायिक सिनेमा के संचालन को मंजूरी दी जाएगी.’
एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब, परंपरावादियों के विरोध के बावजूद विजन 2030 के तहत मनोरंजन को समाज में व्यापक बदलाव के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है.
इस के अलावा 17 अक्तूबर, 2017 को शाही परिवार ने इसलामी विद्वानों के एक अंतर्राष्ट्रीय निकाय का गठन किया जो हदीसों (पैगंबर मोहम्मद द्वारा स्थापित) की समीक्षा कर उन की कट्टरवादी और फर्जी बातों को हटाएगा. इसे भी उदार इसलाम की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
समय बदल रहा है. सऊदी अरब को ले कर पश्चिम पहले से कहीं ज्यादा सतर्क हो चुका है. इलैक्ट्रिक गाडि़यों और सौर ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल के चलते तेल की मांग भी भविष्य में कम होगी. सऊदी अरब की समृद्धि का सूरज धीरेधीरे डूबने की राह पर है. राजशाही बाहर और भीतरी दबाव झेल रही है, लेकिन क्या वह वैचारिक सुधार का रास्ता अपनाने की हिम्मत कर सकेगी, यह सवाल अभी शेष है जिस का जवाब नए शहजादे की हुकूमत के भावी कदम देंगे.
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साल 2002 में टीवी शो “कहता है दिल” से टीवी पर अपने करियर की शुरुआत करने वाली एक्ट्रेस काम्या पंजाबी ने बोल्ड लुक में अपनी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर की है. काम्या ने यह तस्वीर अपने वैरिफाइड इंस्टाग्राम अकाउंट से शेयर की है. फोटो में वह स्विमिंग पूल में बिकिनी पहन कर मस्ती करती नजर आ रही हैं. आज कल सोशल मीडिया पर इस तरह की तस्वीरें अपलोड किए जाने पर ट्रोल होने का खतरा बना रहता है. शायद इसी वजह से काम्या ने फोटो शेयर करने के साथ ही उसके कैप्शन में ट्रोल्स को जवाब भी लिख दिया है.
काम्या ने फोटो के साथ कैप्शन में लिखा- मेरी गलती, मेरा चुनाव, कोई पछतावा नहीं. तस्वीर के कैप्शन पर रूपेश झा नाम के एक यूजर ने लिखा- पछतावा होना भी क्यों चाहिए जब आप चीजों को फेस करने के लिए तैयार हो तो, चाहे वो बुरी हों या अच्छी क्योंकि आप बहादुर हो. हालांकि ट्रोल करने वाले अपनी आदतों से बाज नहीं आते और इसी वजह से उनकी इस तस्वीर पर आपत्ति जताने वाले कई यूजर्स ने भी कमेंट कर ही दिए हैं. हितेन नाम के एक यूजर ने लिखा- इस उम्र में यह सब शोभा नहीं देता है. काम्या ने कई शोज में निगेटिव रोल प्ले किए हैं.
बता दें कि उन्होंने छोटे पर्दे पर तकरीबन 16 साल तक काम किया है. टीवी शो शक्ति अस्तित्व के अहसास की में वह प्रीतो का किरदार निभाती हैं और उन्होंने 16 साल के अपने लंबे करियर में अस्तित्व. एक प्रेम कहानी, बनूं मैं तेरी दुल्हन, परवरिश, बेइंतेहां, डोली अरमानों की और मर्यादा जैसे टीवी शोज में काम किया है. रिएलिटी शोज की बात करें तो काम्या कौमेडी सर्कस, बिग बौस सीजन-7 और बौक्स क्रिकेट लीग जैसे शोज का हिस्सा रह चुकी हैं. बड़े पर्दे पर भी काम्या ने थोड़ा बहुत काम किया है वह ऋतिक रोशन स्टारर फिल्म कहो ना प्यार है और ना तुम जानो ना हम में छोटे मोटे किरदार प्ले कर चुकी हैं.
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बेरोजगारी का फंदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गले में कसता जा रहा है. इसलिए अब अच्छे दिनों, 15 लाख रुपए हर खाते में, पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काट कर लाने जैसे झूठे वादों की तरह रेलवे में 90 हजार नौकरियों का विज्ञापन छपवाया गया है. यही नहीं, विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में भारतीयों को नौकरी देने के समाचार भी छपवाए जा रहे हैं. ये सब बातें लोकलुभावन हैं क्योंकि असली नौकरियों का अभी अकाल ही है.
वैसे जो अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है, जैसा वित्तमंत्री अरुण जेटली देश की अर्थव्यवस्था के बारे में सोतेजागते कहते रहते हैं, वहां नौकरियों की कमी नहीं होती. नौकरियों की कमी वहीं होती है जहां अर्थव्यवस्था संकुचित हो रही हो और व्यापार व उत्पादन कम हो रहा हो. सरकार घटते व्यापार व उत्पादन की वजह से ज्यादा टैक्स जमा कर के निठल्लों को नौकरियां नहीं दे पा रही. निजी सैक्टर पर कानूनों, नोटबंदी, जीएसटी और ऊपर से कंप्यूटरी युग थोपने की वजह से नौकरियां और भी कम हो रही हैं.
पहले के समय में अखबार नए उद्योगों, नई कंपनियों, नए उत्पादनों की खबरों से भरे रहते थे. लेकिन आजकल भगोड़ी कंपनियां ही सुर्खियों में हैं. हर रोज पता चलता है कि किसी गुमनाम सी कंपनी ने 250 से 3,000 करोड़ रुपए तक कर्ज लिया और उस के प्रमोटर्स भाग गए. ऐसी कंपनियों के चलते रोजगार कम होंगे, बढ़ेंगे नहीं.
कुछ सैक्टरों को छोड़ दें तो हर क्षेत्र में सन्नाटा सा है. कृषि मंडियों से ले कर आईटी कंपनियों तक एक तलवार लटकी है कि कल न जाने क्या होगा. सरकारी वादे असल में पंडों जैसे वादे साबित हो रहे हैं कि यजमान, बस, तुम दानपुण्य करते रहो, भगवान झोली भरेंगे. बेरोजगारों से कहा जा रहा है कि तुम एप्लीकेशनें और उन की फीस भरते रहो और ऊपर से नौकरियों के टपकने का इंतजार करते रहो.
सरकारी क्षेत्र में लगीबंधी, ऊपरी कमाई वाली नई नौकरियां बहुत कम होती जा रही हैं. सरकार के पास न पैसा है और न ही ऐसे क्षेत्र बचे हैं जिन में वह बेरोजगारों को नौकरी दे कर खपा सके. लाखों नौकरियां तो सरकार ने खुद कौंटै्रक्टरों को दे दी हैं जो युवाओं को रखते हैं, उन से काम लेते हैं पर उन्हें सरकारी नौकरी सा मजा नहीं देते. मेहनत से काम करने की आदत होती तो नौकरियों का अकाल ही क्यों होता?
कठिनाई यह है कि अब शिक्षा महंगी हो गई. पहले सस्ती सरकारी शिक्षा के बाद कम वेतन वाली नौकरी करने में दिक्कत नहीं होती थी. अब लगता है कि यदि लाखों रुपए खर्च कर ऊंची पढ़ाई करने के बाद भी कुछ विशेष नहीं मिला तो क्या लाभ? विदेशों में तो कुछ अवसर हैं पर वहां भारतीयों की महंगी शिक्षा भी काम नहीं आती. वे उस न्यूनतम ज्ञान से भी अनभिज्ञ होते हैं जिस को विदेशी सामान्य मानते हैं.
नौकरियों के अवसर देना किसी भी देश की सरकार के लिए टेढ़ी खीर होता है. भारत सरकार के लिए तो यह और ही कठिन है. हां, अगर पूजापाठ की नौकरियां चाहिए तो शायद बहुत अवसर हैं क्योंकि देश में कारखाने बने नहीं, मंदिर जरूर बनतेबढ़ते जा रहे हैं.
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आम आदमी पार्टी के 2 विधायकों प्रकाश जारवाल और अमानतुल्ला खान ने दिल्ली के चीफ सैक्रेटरी अंशु प्रकाश को मीटिंग में आधी रात को थप्पड़ मारे थे या नहीं, उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले विधानसभा चुनाव से पहले अदालत में इस बारे में कोई फैसला हो जाएगा.
असल फसाद आप बनाम एलजी और भाजपा है जो इस बवंडर में दब गया और बेचारे चीफ सैक्रेटरी साहब बेवजह बलि का बकरा बन गए, जिन पर आप का आरोप है कि वे आम लोगों के हितों से जुड़े सवालों व बातों पर गौर ही नहीं कर रहे थे. अपने साथी की बेइज्जती पर देशभर के आईएएस अधिकारी इकट्ठा हो गए. इस बाबत उन्हें गृहमंत्री राजनाथ सिंह की शह मिली हुई थी जिन्होंने इस कथित थप्पड़ को अफसरशाही के स्वाभिमान से जोड़ दिया था. रिपोर्ट दोनों पक्षों ने लिखाई लेकिन आम राय आप के पक्ष में जा रही है, तो इस की वजह यह थप्पड़ नहीं, बल्कि वे साहब लोग हैं जो सरकार को अपने इशारों पर नाचते देखने के आदी हो गए हैं.
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