जीएसटी गब्बर सिंह टैक्स तो है ही, यह गौरमैंट सेवा टैक्स (जीएसटी) भी है. सरकार का इरादा था कि विकास की चाशनी में लपेट कर इसे जनता को खिला दिया जाएगा, ताकि वह गुलाम सैनिक टट्टू (जीएसटी) बन कर गौरमैंट की सेवा करती रहे. इस टैक्स को इस तरह ढाला गया है कि हर जना इस की लपेट में आ जाए. देश के 125 करोड़ मित्रों, भाइयों और बहनों की जबरदस्त सफाई ट्रैप (जीएसटी) स्कीम का अपना अनूठापन है कि इस के फंदे से कोई नहीं बच सकता.
देश के किसान कर्जों से खुदकुशी कर रहे हैं, पर इस जबरन सरकारी टैक्स (जीएसटी) की बदौलत बैंकों से जिन धन्ना सेठों ने धंधों के नाम पर पैसा लिया था, उसे हड़प करने पर किसी एक को भी खुदकुशी नहीं करनी पड़ी. कुछ विदेशों में मौज कर रहे हैं, तो बाकी महलों में रह रहे हैं और उपदेश देने वाले महापंडित जनता स्वाहा तिकड़म (जीएसटी) भव: का मंत्र रातदिन बोल कर बहका रहे हैं. धन्ना सेठों ने जो पैसे बैंकों से हड़पे उन के लिए सरकार जो 2 लाख करोड़ रुपए (2000000000000 रुपए) दे रही है, वे इसी जीएसटी से आएंगे.
आम किसान, मजदूर, नौकरीपेशा, कारीगर, दिहाड़ी बेलदार, कुली, तांगे वाले, मोची, सफाईकर्मी, नौकरानी, धोबन से छीन कर जमा किया गया पैसा किसी विकासफिकास में नहीं लग रहा. इस से फरार्टे से गाड़ियां दौड़ सकें ऐसी सड़कें बनेंगी, हवाईअड्डे बनेंगे, बुलेट ट्रेनें चलेंगी, परमाणु बम बनेंगे, हैलीकौप्टर खरीदे जाएंगे, पुलिस फोर्स बनेगी, कंप्यूटरों का जाल बिछेगा. इस से न गांवों में सीवर डलेंगे, न नहरें बनेंगी, न नलकूप लगेंगे, न मंडियां बनेंगी, न बसें चलेंगी, न लोकल ट्रेनें ज्यादा बनेंगी, न दुकानें बनेंगी, न व्यापारी को राहत मिलेगी, न कारखाने चलाने वालों को सुकून मिलेगा.
यह टैक्स साफ दर्शाता है कि जैसा एक रात को लोगों की जमापूंजी पर गब्बर सिंह से ज्यादा जबरदस्त सनसनी तरीके से पैसा खींचने की ताकत बड़बोलो में है, वैसी ही जागो सरकार तंत्र (जीएसटी) को थोपने में है. इस की धार पैनी है, क्योंकि इस से पलते हैं नेता और धन्ना सेठ.
किसी भी सरकार को उतना टैक्स लेना चाहिए जितना जनता दे कर खुश रह सके. बिना उपज बढ़ाए टैक्स नाक से इधर से पकड़ कर या उधर से पकड़ कर वसूल कर सरकार ने जनता का हर काम धीमा कर दिया है. आज जनता सुस्ती टैक्स (जीएसटी) की वजह से बाजारों में सन्नाटा है, बेकारी बढ़ रही है, कारखाने बंद हो रहे हैं या आधेअधूरे काम कर रहे हैं. टैक्स का पैसा जनता की भलाई में नहीं लग रहा, उन बैंकों को दिया जा रहा है, जिन्होंने अमीरों को कर्ज दिया पर वापस वसूल नहीं कर पाए.
उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में ग्रीन पार्क कालोनी का रहने वाला 50 साला सोमपाल
एक कालेज में गणित का टीचर था. उस के पास शिक्षा व गृहस्थी दोनों का तजरबा था. बाहरी तौर पर वह अच्छा दिखता था और लोगों से कम ही वास्ता रखता था. परिवार में पत्नी के अलावा 3 बच्चे थे, जिन में 2 बेटियां व सब से छोटा बेटा था. इन बच्चों में 16 साला रीना (बदला नाम) बड़ी थी. 11वीं क्लास में पढ़ने वाली रीना पढ़ाई में बेहद होशियार थी. क्लास में उस की अच्छी पोजीशन आती थी. उस का सपना आईएएस बनने का था.
सोमपाल खुद तो आसपड़ोस में कम ही रिश्ता रखता था, साथ ही उसे यह भी पसंद नहीं था कि उस की पत्नी या बच्चे किसी से ज्यादा वास्ता रखें. सोमपाल की ससुराल पक्ष से भी नहीं बनती थी. पत्नी के वहां जाने पर वह उस से झगड़ा किया करता था.
नहीं थे नेक इरादे
बेटी रीना को ले कर पिता सोमपाल के इरादे नेक नहीं थे. वह बहाने से उसे छूने की कोशिश करता था. जवान होती बेटी के जिस्म पर उस की नजरें अकसर फिसलती थीं.
जब बेटी बाथरूम आतीजाती थी, तो वह उसे अजीब नजरों से देखता था. कभी रात में वह जागता, तो भी रीना को अजीब नजरों से घूरता.
रीना ने शुरू में इन बातों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन पिता का बरताव उसे समय के साथ खटकने लगा. वह उम्र के उस पायदान पर थी, जहां मर्द की घूरती नजरों का मतलब समझने लगी थी.
कई दिन सोचनेसमझने के बाद उस ने अपनी मां से दबी जबान से पिता की इन आदतों की शिकायत की, लेकिन मां ने इसे बेटी की गलतफहमी समझा और उसे भी भविष्य में चुप रहने की हिदायत दी.
जनवरी महीने में एक दिन रीना की मां ने मायके जाने की बात कही, तो सोमपाल ने उसे इस की इजाजत दे दी. वह 2 बच्चों के साथ कुछ दिनों के लिए उत्तराखंड के पंतनगर में अपने मायके चली गई.
रीना भी मां के साथ जाना चाहती थी, लेकिन सोमपाल ने पढ़ाई का वास्ता दे कर उसे भेजने से मना कर दिया.
कत्ल की रात…
वाकिआ 2 जनवरी, 2017 की रात को हुआ. रात में दोनों ने साथ खाना खाया. तकरीबन 10 बजे दोनों सोने चले गए. पिता के कमरे में ही रीना दूसरे पलंग पर लेट गई.
रीना को पता नहीं था कि उस रात सोमपाल की नीयत में पूरी तरह से खोट आ चुका था. सोमपाल ने पहले तो बेटी रीना से इधरउधर की बातें कीं, फिर उस से अपने ही बैड पर आ कर सोने को कहा. वह सहज भाव से वहां आ कर सो गई.
रात के तकरीबन 2 बजे उस की आंख खुली, तो उस ने सोमपाल का हाथ अपने ऊपर रखा पाया. उस ने सोचा कि पिता का हाथ करवट लेते वक्त धोखे से उस के ऊपर आ गया होगा. उस ने हाथ हटा दिया, लेकिन कुछ देर बाद ही सोमपाल की हरकतें बढ़ती गईं. वह उस के नाजुक अंगों पर हाथ लगा कर सहलाने लगा.
रीना ने विरोध कर के बचने की कोशिश की, तो वह जबरन कब्जा कर उस से गलत काम करने की कोशिश करने लगा.
रीना ने अपनी इज्जत बचाने की ठान ली. वह उस के चंगुल से छूट कर बैड से उतरी, तो सोमपाल ने उसे फिर से दबोच लिया. कुछ नहीं सूझा, तो रीना इस बार उस से छूट कर ड्राइंगरूम में पहले से रखी लोहे की छड़ निकाल लाई और सोमपाल के सिर पर 2-3 वार कर दिए. सोमपाल लहूलुहान हो कर गिर पड़ा. रीना सिर थाम कर बैठ गई. बाद में उस ने अपनी मां को फोन से इस की सूचना दी.
सुबह की सनसनी
सोमपाल के ससुर ने तड़के पुलिस कंट्रोल को सूचना दी और तकरीबन 6 बजे खुद भी पहुंच गए. बैडरूम के दरवाजे पर सोमपाल की लाश पड़ी थी. बिस्तर पर खून के निशान थे. कमरे से बह कर खून बरामदे तक फैला हुआ था. पुलिस ने खून से सनी हत्या में इस्तेमाल की गई छड़ बरामद कर ली.
फोरैंसिक ऐक्सपर्ट टीम को भी मौके पर बुला लिया गया, जिस ने फिंगर प्रिंट व फुट प्रिंट समेत कई सुबूत इकट्ठा किए. मौके का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था. शक यह भी था कि रीना ने मनगढ़ंत कहानी न बनाई हो.
पुलिस ने उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल भी निकलवाई. उस के बयानों को सच की कसौटी पर परखा गया. परिवार वालों से भी गहन पूछताछ की गई.
रीना ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था. उस के मुताबिक, पिता की हरकतों से घर उस के लिए कैदखाना बन गया था. वह सनकी इनसान था. वह छड़ से पिता को डरा कर अपनी इज्जत बचाना चाहती थी.
अगर रीना ऐसा नहीं करती, तो खुद मारी जाती, क्योंकि सोमपाल ने उस के हाथ से छड़ छीन कर उस पर ही वार करने की कोशिश की, जिस के बाद हाथापाई कर के रीना ने छड़ छीन कर पिता पर ही वार कर दिया.
सोमपाल के परिवार वाले को रीना की कहानी पर भरोसा नहीं था, लेकिन उस की पत्नी ने स्वीकार किया कि रीना ने कई बार पिता की शिकायत उस से की थी. उस ने सोचा नहीं था कि कभी ऐसा भी हो सकता है. शिकायत को गंभीरता से लिया होता, तो शायद यह दिन नहीं देखना पड़ता.
रिश्ते को बदनाम करती इस वारदात ने समाज के सामने अहम सवाल छोड़ दिया. मनोवैज्ञानिक डाक्टर सुविधा शर्मा कहती हैं, ‘‘यह कोई साधारण बात नहीं है. डाक्टरी भाषा में इसे टास्क ओरिएंटिड रिऐक्शन कहा जाता है और इस में भी यह अटैक रिऐक्शन है. लड़की को फैमिली सपोर्ट की जरूरत थी. पिता परेशान कर रहा था और मां मदद नहीं कर रही थी. समझदारी वाला कोई कदम उठाया गया होता, तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती.’’
पिता के कत्ल की आरोपी रीना अब नारी सुधारगृह में है. उस के पक्ष में सामाजिक संगठन भी उतरे हैं.
लड़की का कहना था कि उस का इरादा हत्या करना नहीं था. बचाव में उस ने हमला किया, जिस से पिता की मौत हो गई. इस वारदात का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था.
लड़की के बयान और हालात के हिसाब से पुलिस ने जांच की. बकौल एसपी समीर सौरभ, ‘‘लड़की ने सैल्फ डिफैंस में पिता पर हमला किया, इसलिए गैरइरादतन हत्या के मद्देनजर जांचपड़ताल आगे बढ़ाई.’’
दूसरी तरफ कानून के जानकारों का यह मानना है कि रीना ने अपनी आबरू बचाने के लिए ऐसा सख्त कदम उठाया. उसे कानून की हमदर्दी तो मिलेगी ही, बशर्ते उसे यह साबित करना होगा कि यह हत्या उस ने सैल्फ डिफैंस में की थी. अगर वह ऐसा नहीं कर पाई, तो उस को सजा भी हो सकती है.
एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश वारियर बहुत ही जल्द मलयालम फिल्म ‘उरु अदार लव (Oru Adaar Love)’ के जरिए बड़े पर्दे पर नजर आने वाली हैं. उनकी यह फिल्म इसी साल ईद पर रिलीज होगी, लेकिन उनकी फिल्म रिलीज होने से पहले ही वह पौपुलर हो गई हैं. बता दें, प्रिया के लोग ऐसे दीवाने हैं कि उनका वीडियो इंटरनेट पर आते है वायरल हो जाता है. पिछले कुछ दिनों से उनके कई वीडियो इंटरनेट पर लगातार वायरल हो रहे हैं और इस कड़ी में उनका एक और नया वीडियो हमारे बीच आ चुका है. इस वीडियो में वह मेकअप करवाती नजर आ रही हैं.
इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया है. वीडियो में उनका अंदाज पहले से काफी अलग नजर आ रहा है. वीडियो की शुरुआत में प्रिया अपनी निगाहों से खेलती हुई नजर आती हैं और फिर अगले ही पल वह मेकअप करवाती हुई दिखती हैं. बता दें, इससे पहले प्रिया पहली बार एक चौकलेट ब्रांड के ऐड में नजर आई थीं. लोगों के बीच ‘वायरल गर्ल’ के नाम से मशहूर प्रिया इस वीडियो में भी अपनी निगाहों से खेलती हुई नजर आ रही थीं.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार प्रिया ने अपने वीडियो के जरिए इंस्टाग्राम से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ दिया है. दरअसल, प्रिया प्रकाश के कई वीडियो वायरल होने के बाद उनके इंस्टाग्राम फौलोअर्स की संख्या 50 लाख से भी ज्यादा हो चुकी है. इतनी बड़ी संख्या में फौलोअर होने के बाद प्रिया ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कई बड़े ब्रैंड का प्रमोशन करना शुरू कर दिया है.
एक रिपोर्ट के अनुसार प्रिया प्रकाश एक इंस्टाग्राम पोस्ट के लिए 8 लाख रुपये चार्ज लेती हैं. खबरों की मानें तो प्रिया सोशल मीडिया के माध्मय से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ चुकी हैं. प्रिया प्रकाश की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इंटरनेट पर छाने के बाद उन्होंने गूगल सर्च के मामले में सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली सनी लियोनी और दीपिका पादुकोण को भी पीछे छोड़ दिया.
एक ही दिन में उनके 6 लाख से भी ज्यादा फौलोअर बने थे. फिलहाल उनके फौलोअर की संख्या 51 लाख तक पहुंच गई है. प्रिया फौलोअर के मामले में अमेरिकन रियल्टी टीवी स्टार काइली जेनर और फुटबौल स्टार क्रिस्टियानो रोनाल्डो की बराबरी कर ली है. यह दो सेलीब्रिटी ही एक दिन में 6 लाख से ज्यादा फैन्स बनाने में सफल रहे हैं.
प्रिया प्रकाश के इंटरनेट स्टार बनने के बाद जब मीडिया ने उनसे बात की थी तो उन्होंने कहा था, ‘मेरे लिए यह बहुत सुखद है. मुझे नहीं पता कि मैं अपनी खुशी का इजहार कैसे करूं. उन्होंने बताया इस कामयाबी के बाद खुशी मनाने के लिए मेरे कौलेज में एक इवेंट आर्गेनाइज किया गया था. यह मेरे लिए नया अनुभव है. मैं यही उम्मीद करती हूं कि सभी लोगों का सपोर्ट मेरे साथ बना रहे.’ बता दें कि वीडियो वायरल होने के बाद प्रिया को कई बड़ी फिल्मों के औफर की गईं, लेकिन उन्होंने उस फिल्म का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया.
हौलीवुड एक्ट्रेस मीशा बार्टन इन दिनों अपनी जिदंगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रही हैं. मीशा ने हाल ही में अपने एक्स ब्वौयफ्रेंड के बारे में चौंकाने वाला खुलासा किया है. उनके मुताबिक, एक्स ब्वौयफ्रेंड ने उनके साथ बिताए निजी पलों का वीडियो बनाकर पौर्न साइट्स को बेचने की कोशिश की. चर्चा तो ये भी है कि औनलाइन पौर्न कंपनियों ने इसके लिए बोली लगाना भी शुरू कर दी है. हालांकि मीशा अब उसके खिलाफ लीगल एक्शन लेने जा रही हैं.
हौलीवुड के वीडियो ब्रोकर केविन ब्लैट के मुताबिक, ‘मेरे पास एक शख्स इस वीडियो को लेकर आया था. फिलहाल यह वीडियो तेजी से सर्कुलेट किया जा रहा है.’ बता दें कि कुछ दिन पहले खबरें आई थीं कि मीशा बार्टन का सेक्स टेप पौर्नोग्राफिक साइट्स पर मौजूद है. इसके बाद मीशा ने अपनी अटौर्नी लीजा ब्लूम के साथ इस बारे में मीडिया से चर्चा की.
एक न्यूज एजेंसी के मुताबिक़, मीशा ने बताया- ”ये मेरे लिए काफी मुश्किल और बुरा दौर है. जब मुझे पता चला कि जिसे मैंने प्यार किया और उस पर भरोसा किया उसी ने मेरे साथ गुजारे निजी पलों को हिडन कैमरे से शूट किया. सबसे ज्यादा दुख वाली बात तो ये है कि उसने इन वीडियो को बेचने और उन्हें पब्लिकली करने की कोशिश कर रहा है.
24 जनवरी, 1986 को हैमरस्मिथ, लंदन में जन्मीं मीशा ब्रिटिश अमेरिकन फिल्म और टीवी एक्ट्रेस हैं. मीशा मौडलिंग भी करती हैं. 31 साल की मीशा ने टीवी पर अमेरिकन सोप ओपेरा ‘औल माय चिल्ड्रन’ से 1996 में डेब्यू किया. मीशा ने भोपाल गैस ट्रेजडी पर बनी फ़िल्म ‘भोपाल- ए प्रेयर फौर रेन’ में मीशा ने ईवा गैसकौन नाम की जर्नालिस्ट का रोल निभाया है.
मीशा की रोमांटिक कौमेडी ‘नौटिंग हिल’ और मनोज नाइट श्यामलन की साइकोलौजिकल थ्रिलर ‘द सिक्स्थ सेंस’ शामिल है. मीशा ने 1997 में फिल्म लौन डौग्स में लीड रोल किया है. इसके बाद उन्होंने पप्स, स्किप्ड पार्ट्स, ऑक्टेन और वर्जिन टेरिटरी जैसी फिल्मों में भी काम किया है.
डकैती के ज्यादातर किस्से ‘चंबल’ के ‘जंगलों’ और ‘बीहडों’ के ही सुनने को मिलते थे. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चंबल जैसे बीहड और जंगल भले न हों, पर डकैतों के कारनामें लोगो को दहला रहे हैं. अब तक लखनऊ की नवनिर्मित कालोनियों को अपना शिकार बनाने वाले डकैत अब शहर की सबसे पौश और सुरक्षित माने जाने वाली कालोनियों को अपना शिकार बनाने में सफल हो रहे हैं.
घर के मालिकों को बुरी तरह से मारपीट कर लहूलुहान करने के बाद उनके हाथ और पांव बांध कर कमरे में बद कर घर में लूट कर फरार हो जाते हैं. कई घटनाओं में तो घर की महिलाओं के साथ बदसलूकी और गाली गलौज तक की जाती है. दो दिन के अंदर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की साउथ सिटी कालोनी और गोमती नगर कालोनी के विवेक खंड में डकैतों ने अपना हौसला दिखा कर पुलिस और प्रशासन को बौना साबित कर दिया है.
गोमतीनगर का विवकेखंड इलाका सबसे सुरक्षित माना जाता है. बिजली विभाग के रिटायर इंजीनियर गिरीश चन्द्र पांडेय के घर 2 घंटे तक डकैत घुस कर लूटपाट करते रहे. इन सबने गिरीश के साथ उनकी पत्नी, बेटे और बहू को मारपीट कर घायल कर दिया. गिरीश के घर के ठीक सामने रिटायर पुलिस महानिदेशक एमसी द्विवेदी का घर है. इससे पता चलता है कि यह जगह कितनी सुरिक्षत थी. इसके बाद भी डकैत साहस दिखाने में सफल रहे. डकैतों ने 8 लाख से अधिक की लूटपाट की.
गोमती नगर की ही तरह साउथ सिटी लखनऊ की दूसरी सबसे पौश कालोनी है. यहां एचएएल के चीफ सुपर वाइजर देवेन्द्र सिंह नेगी के घर डकैती पड़ गई. विरोध को देखते हुये राज्यमंत्री स्वाति सिंह यहां पहुंची. तो लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा. गोमतीनगर में इसके पहले भी एसएम रिजवी और चमन लाल दिवाकर के घर डकैती पड़ चुकी है.
असल में डकैती की घटनायें शहरों में कम देखने को मिलती थी. हाल के कुछ दिनों में राजधानी लखनऊ ही नहीं वाराणसी और मथुरा तक में बड़ी डकैतियां पड़ चुकी हैं. मथुरा में डकैतों ने हत्या को भी अंजाम दिया था और वाराणसी में 12 करोड़ के सोने की लूट हुई. लखनऊ में पहले कई डकैतियां पड़ चुकी हैं. पुलिस दबाव में आकर आनन फानन में जो खुलासे करती है, वह पूरी तरह से सही नहीं होते. असल डकैतों के बच निकलने से उनके हौसले बुलंद हो जाते हैं. ऐसे में वह एक के बाद एक घटनाओं को अंजाम देते हैं.
कानून व्यवस्था पर किसी भी तरह का समझौता न करने की घोषणा करने वाली योगी सरकार पूरी तरह से असफल हो रही है. पुलिस विभाग में तमाम तबादले करने के बाद भी प्रदेश की कानून व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो रहा है. सरकार के लोग इस तरह की घटनाओं को विरोधियों की साजिश मानकर अपना बचाव करने की कोशिश कर रहे हैं. हकीकत यह है कि सरकार प्रदेश की कानून व्यवस्था को संभालने में असफल हो रही है. इससे साफ है कि अपराध रोकने की बात करने वाली सरकार अपराध रोक कर प्रदेश के लोगों को भयमुक्त माहौल देने में पूरी तरह से असफल हो रही है.
अपना मकान हो, यह सपना सब देखते हैं पर देशभर में बिल्डरों से मकान खरीदना जोखिमभरा काम है. यह लौटरी के महंगे टिकट लेने की तरह का कदम हो गया है जिस में पैसे तो लगाने पड़ते हैं पर मकान मिले या न मिले, कुछ नहीं कहा जा सकता. दिल्ली के आसपास नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम आदि में सैकड़ों बिल्डरों ने मकान बनाने के वादे कर पैसे तो ले लिए पर जो काम 2 वर्षों में होना चाहिए था, 5-7 वर्षों में भी नहीं किया.
बहुत से लोगों ने इस लालच में अपनी जमापूंजी लगाई कि बाद में या तो रहने को मिलेगा या महंगे में बेच कर मोटा पैसा मिलेगा. बहुतों ने कर्ज भी लिया और वे किस्तें भी भर रहे हैं और किराए के मकान में भी रह रहे हैं. अदालतें आजकल बिल्डरों पर सख्त हो रही हैं पर सच यह है कि न केवल बिल्डर, सरकारें और जनता भी दोषी हैं.
कई मामलों में सरकार द्वारा किसानों की अधिग्रहित जमीन पर मकान बन रहे हैं जिसे बिल्डरों ने महंगे दामों पर लिया था. पर किसानों ने मुआवजों आदि पर मुकदमा किया तो मकान बनाने का काम रुक गया. कुछ मामलों में फ्लैट या प्लौट खरीदार मुकदमे ठोक देते हैं कि जो वादा किया था उस से ज्यादा फ्लैटप्लौट बन रहे हैं और काम रुक जाता है. कई दफा पर्यावरण वाले अनुमति नहीं देते.
कई बार आसपड़ोस के रहने वाले बिल्डर का काम रोक देते हैं इसलिए कि उन के नए प्लौटोंफ्लैटों से उनकी सुविधाएं कम हो जाएंगी. जिन्होंने फ्लैटप्लौट बुक कराए थे, उन में से कुछ पूरा पैसा एडवांस न दें तो बिल्डरों के पास पैसे की कमी हो जाती है और काम रुक जाता है.
एक बिल्डर एक जगह गंभीर रूप से फंस जाए तो नई जगह उस का काम चल भी रहा हो तो वह धीमा हो जाता है या रुक जाता है. मुकदमों के निबटने में लगने वाले समय व पैसे के कारण भी काम रुक जाता है. आजकल अदालतें मामले हाथ में तो ले लेती हैं पर व्यावहारिकता को ताक पर रख कर आदेश जारी कर देती हैं. लेकिन आदेशों से फ्लैट तो नहीं उपज सकते.
बिल्डरों की जमात दूध की धुली नहीं है पर वह उतनी ही बेईमान है जितने नेता, अफसर, पंडे, शिक्षक, दुकानदार, उत्पादक या आम कामगार हैं. बेईमानी हमारी रगरग में भरी है. पर हर किसी ने सफेद कपड़े पहन कर मानो दूसरों की कालिख की बातें करने के ठेके लिए हों.
ऐसे माहौल में बिल्डरों को जेल में भेजने या उन पर मोटा फाइन लगाने की धमकी देना निरर्थक है. यह काउंटर प्रोडक्टिव है. या तो इस से लोग उस क्षेत्र में आएंगे ही नहीं या फिर इस जोखिम की कीमत फ्लैटोंप्लौटों की कीमत में जोड़ देंगे.
अच्छी बात तो यह होगी कि बिल्डरों को मजबूर किया जाए कि वे सपने न बेचें, बनेबनाए मकान बेचें. केवल नक्शों पर बेचने की जो परंपरा चली है, उसे बंद कर दिया जाए ताकि तैयार मकान बिकें और पूरा पैसा उसी समय लिया जाए जब रहने योग्य फ्लैट या मकान का निर्माण करने योग्य प्लौट दिया जा रहा हो. इस से उस क्षेत्र की बहुत सी तकलीफें कम हो जाएंगी.
अगर आप भी भोजपुरी एक्ट्रेस आम्रपाली दुबे के फैन हैं तो इस साल आप बैक टू बैक लगातार उनकी फिल्में देखने वाले हैं. मजेदार बात ये है कि इस साल उनकी दिनेश लाल यादव के साथ अकेले उनकी सात फिल्में आएंगी तो एक और फिल्म भोजपुरी इंडस्ट्री के दूसरे सुपरस्टार खेसारी लाल यादव के साथ आएगी.
भोजपुरी फिल्मों की सबसे पौपुलर एक्ट्रेस आम्रपाली दुबे की अच्छी खासी फैन फौलोइंग है. उनके अपने को-स्टार्स दिनेश लाल यादव और पवन सिंह के साथ केमेस्ट्री पसंद की जाती है. इतना ही नहीं आम्रपाली भोजपुरी फिल्मों की सबसे अधिक फी चार्ज करने वाली एक्ट्रेस भी हैं. अगर रिपोर्ट्स की मानें तो वो एक फिल्म के लिए लगभग 8 से 9 लाख तक चार्ज करती हैं.
आम्रपाली ने अपने करियर की शुरुआत टीवी इंडस्ट्री से की थी लेकिन फिल्मों में उन्होंने 2014 में डेब्यू किया था. आपको जानकर शायद हैरानी होगी कि महज 4 साल के करियर में आम्रपाली का स्टारडम कुछ ऐसा है कि इस साल उनकी लगभग 8 फिल्में रिलीज होने वाली हैं. कहना गलत नहीं होगा कि वो फिलहाल भोजपुरी इंडस्ट्री की सबसे बैंकेबल एक्ट्रेस हैं.
दिनेश लाल यादव के साथ आम्रपाली दुबे की निरहुआ चलल लंदन, वीर योद्धा महाबली, निरहुआ चलल अमेरिका, निरहुआ चलल ससुराल 3, बौर्डर, पटना जंक्शन और तुझको रखे राम तुझको अल्लाह रखे रिलीज होगी. वहीं उनकी आठवीं फिल्म दुल्हन गंगा पार के में उनके साथ खेसारी लाल यादव नजर आएंगे.
इसके पहले भी आम्रपाली पटना से पाकिस्तान, निरहुआ रिक्शावाला 2, जिगरवाला, बागी भइले सजना, राजा बाबू, काशी अमरनाथ, तुझको राखे राम, तुझको अल्लाह रखे जैसी सुपरहिट फिल्मों में रिलीज हो चुकी हैं. भोजपुरी दर्शकों के बीच उनकी अच्छी खासी पहचान है और लोग आम्रपाली को काफी पसंद भी करते हैं.
VIDEO : नेल आर्ट डिजाइन – टील ब्लू नेल आर्ट
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कपिल शर्मा का नया शो ‘फैमिली टाइम विद कपिल शर्मा’ का प्रसारण शुरू होने के कुछ दिन बाद ही बंद हो गया. इसी बीच उन्होंने एक वेबपोर्टल के खिलाफ ट्विटर पर आपत्तीजनक शब्द लिखे थे. इसके कुछ ही दिन बाद कपिल ने उसी पोर्टल के एक रिपोर्टर को फोन पर गालियां दी और उनके द्वारा फोन पर की गई यह बातचीत सोशल मीडिया पर लीक हो गई. इन सारी चीजों को लेकर वह दिन पर दिन विवादों पर घिरते चले गए.
जिसके चलते उनकी काफी आलोचना हुई. वहीं उनके करीबी दोस्त उनके समर्थन में आ खड़े हुए. उन्होंने कपिल को बचाने के लिए डिप्रेशन का हवाला देते हुए लोगों से उन्हें स्पेस देने की अपील की. इतने विवादों के बीच कपिल शर्मा ने अपनी पूर्व मैनेजर प्रीति सिमोस, उनकी बहन नीति और रिपोर्टर विकी लालवानी के खिलाफ उन्हें बदनाम करने की शिकायत दर्ज कराई. यह शिकायत मराठी भाषा में लिखी गई है. उनके द्वारा की गई यह शिकायत भी सोशल मीडिया पर लीक हो गई.
शिकायत में कपिल ने लिखा है कि उन्होंने प्रीति सिमोस को 2 लाख सैलरी में बतौर मैनेजर रखा था. ‘उनके शो कौमेडी नाइट्स विद कपिल’ शो की पूरी रूपरेखा प्रीति ही तय करती थीं. प्रीति के काम से खुश होकर उन्होंने उनकी बहन नीति को भी रख लिया. उनपर विश्वास करके कपिल ने व्यक्तिगत जिंदगी से लेकर आर्थिक लेनदेन की सभी बातें उनको बताया करते थे.
उन्होंने प्रीति और नीति के कहने पर ही प्रोडक्शन हाउस की टैलेंट मैनेजर अनुश्री को काम से निकाल दिया. प्रीति ने उन्हें बताया था कि वह उनके पीठ पीछे कुछ घोटाला कर रही हैं. कपिल ने अपनी शिकायत में लिखा है कि जब वे एक कार्यक्रम में अनुश्री से मिले तो उन्होंने कपिल को बताया कि वो नहीं बल्कि प्रीति खुद शो में बतौर दर्शक बुलाए जाने वाले लोगों से पैसे लेती हैं. अनुश्री ने यह भी बताया कि वह दोनों उनके दूसरे साथी कलाकारों को भी भड़काने का काम भी करती हैं. जिसकी वजह से उनके बिजनस को काफी नुकसान झेलना पड़ रहा है.
कपिल ने कहा है कि उन्होंने जिन लोगों पर विश्वास किया उन्हीं ने उन्हें धोखा दिया. बाद में कपिल ने प्रीति और नीति को निकाल दिया. इसके बाद प्रीति ने एक वेबपोर्टल के साथ मिलकर उन्हें काफी बदनाम किया. जब कपिल के करीबी दोस्त गुरजोत ने प्रीति को ऐसा करने से मना किया तो उसके बदले उनसे 25 लाख रुपये मांगे. इन सबसे तंग आकर फरवरी, 2018 में कपिल खुद प्रीति से मिलने गए. वहां उन्होंने कपिल से कहा कि उनके बगैर वह इंडस्ट्री में काम नहीं कर सकते हैं और वह उन्हें छोड़ेगी नहीं. उन्होंने उनसे भी 25 लाख रुपये मांगे.
कपिल ने 6 अप्रैल को फिर प्रीति को फोन किया पर उन्होंने फोन नहीं उठाया. फिर उन्होंने नीति को फोन करके पोर्टल के रिपोर्टर का नंबर मांगा और उन्हें फोन किया. फोन पर ही दोनों का झगड़ा हो गया. इसके बाद वकील से बात करके उन्होंने शिकायत दर्ज कराने का मन बनाया.
VIDEO : नेल आर्ट डिजाइन – टील ब्लू नेल आर्ट
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अभिनेता कमल हासन जल्द ही तमिलनाडु में अपनी राजनीतिक पार्टी का आगाज करने वाले हैं. सियासत को लेकर उनके दोस्त और सहकर्मी रजनीकांत भी पिछले दो दशक से गंभीर रहे हैं और पिछले कुछ महीनों से हवा का रुख भांपने की कोशिश में हैं. तमिलनाडु में सियासत और सिनेमा के बीच हमेशा से करीबी रिश्ता रहा है. यह सही है कि कुछ सिने अदाकारों ने राजनीति में खासी लोकप्रियता कमाई और अपना एक प्रभावशाली मुकाम बनाया, पर कई ऐसे भी हैं, जिनके हिस्से असफलताएं आईं. शिवाजी गणोशन इसका उदाहरण हैं.
तमिलनाडु की राजनीति में अभी जो शून्य दिख रहा है, उसकी वजह जे जयललिता जैसी नेता का पिछले वर्ष निधन होना और उम्र संबंधी दिक्कतों के कारण एम करुणानिधि की सक्रिय राजनीति से बढ़ती दूरी है. बावजूद इसके तमिलनाडु की राजनीति में कमल हासन या रजनीकांत के लिए वह मुकाम हासिल करना आसान नहीं, जो कभी एमजीआर को हासिल था. एमजीआर यानी एमजी रामचंद्रन अन्नाद्रमुक के संस्थापक थे और उन्हें सूबे में अपार जन-समर्थन हासिल था. वह ऐसा नेता बनकर उभरे, जिसने गरीबों, हाशिये के लोगों और वंचितों की कल्पनाओं को मूर्त रूप दिया. उन्होंने अपनी एक ऐसी सजग छवि बनाई, जिसने द्रविड़ आंदोलन को मजबूती दी और बाद में तमिल जनता ने जिसे अपना आदर्श माना.
हालांकि, ऐसे सूबे में, जहां द्रविड़ राजनीति तमिल पहचान और भाषा को समेटे हुए हो, वहां थियेटर और सिनेमा लोगों को एकजुट करने व प्रभावित करने के प्रभावशाली उपकरण बन चुके हैं. लेखक व अनुवादक आजी सेन्थिलनाथन कहते हैं, ‘सिनेमा या थियेटर संचार का माध्यम थे. अतीत में इसे एक कारगर औजार की तरह इस्तेमाल किया गया था. राजनीति में महज सेलिब्रिटी स्टेटस का जादू नहीं चल पाता’.आलोचकों की नजर में कमल हासन और रजनीकांत, दोनों अभिनेता अवसरवादी हैं. इन्होंने वर्षो चुप्पी साधे रखी और अब जाकर अपना मुंह खोला, जब तमिलनाडु बीते कई दशकों में अब तक की सबसे कमजोर सरकार के हवाले है. लेकिन हाल में ‘मुख्यमंत्री की कुरसी संभालने को तैयार’ होने की इच्छा जताने वाले कमल हासन का दावा है कि वह तो ‘हमेशा से राजनीति में रहे हैं’.
इस पर प्रतिक्रियाएं भी हुई हैं. मत्स्य मंत्री डी जयकुमार कहते हैं कि सिर्फ ट्विटर पर सक्रियता से कोई अभिनेता मुख्यमंत्री नहीं बन जाता, ‘उसे जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होना चाहिए, इसलिए पहले उन्हें (कमल हासन) विधायक तो बनने दीजिए.’ सेन्थिलनाथन भी रजनीकांत को घेरते हैं कि वह ‘राजनीति का इस्तेमाल अपनी फिल्मों की मार्केटिंग रणनीति के तौर पर करते रहे हैं’.
इस सूबे ने वर्ष 2005 में विजयकांत को भी राजनीति में उतरते देखा. वह दो प्रमुख खिलाड़ियों के विकल्प के तौर पर सियासत में उतरे और एक साल के भीतर उनकी पार्टी डीएमडीके ने आठ फीसदी वोट हासिल कर लिए. मगर बाद में वह विफल रहे. सेन्थिलनाथन कहते हैं कि ‘दस साल पहले, जब विजयकांत राजनीति में उतरे थे, तब उन्होंने अपनी एक जमीन तैयार की थी. उनके पास बाकायदा पार्टी का झंडा और निशान भी था. मगर हासन और रजनीकांत अब तक अपना कोई सियासी ढांचा तक तैयार नहीं कर सके हैं’.
एमजीआर की बात करें, तो बकौल सेन्थिलनाथन, ‘द्रमुक समर्थकों में एक बड़ा हिस्सा एमजीआर के प्रशंसकों या फैन्स क्लबों का था. एमजीआर बाद में जब द्रमुक से अलग हुए, तो तमाम प्रशंसक और फैन्स क्लब समर्थक में तब्दील हो गए. करुणानिधि की राजनीति से नाराज रहने वालों के लिए वह उनकी टक्कर के नेता बनकर सामने आए.’1936 से लेकर 1978 तक एमजीआर ने 133 फिल्मों में काम किया और कमोबेश एक चौथाई फिल्में द्रविड़ विचारधारा के इर्द-गिर्द थीं. इसी तरह, करुणानिधि फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखते रहे, क्योंकि वह इसी विचारधारा का प्रसार करना चाहते थे. जयललिता भी पार्टी की मुखिया बनने से पहले अन्नाद्रमुक की प्रचार सचिव और राज्यसभा सदस्य रही थीं. स्पष्ट है, सिनेमा और सियासत में चोली-दामन सा रिश्ता होने के बावजूद फिल्मी कलाकारों ने राजनीति को पूरी तरह से शायद ही प्रभावित किया. सच तो यह है कि दक्षिण में राजनीति ही सिने अभिनेताओं को प्रभावित करती आई है.
(साभार : धरानी थांगवेलू)
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आज लाइफ भी फास्ट फूड जैसी बनती जा रही है. इंतजार, मेहनत और सब्र जैसे कहीं गायब होते चले जा रहे हैं. प्रेम भी फास्ट फूड जैसा होता जा रहा है. कहीं किसी किताब में रखा बरसों पुराना सूखा गुलाब, किसी उपन्यास के पन्ने पर सूख चुके आंसुओं के निशान कहीं उस पल को, उस लमहे को न तो पुराना होने देते हैं न ही भूलने देते हैं. कितने खुशनुमा पल होते होंगे वे जब अलसाई दोपहर में किसी की यादों में खोए समय को जीना, किसी घने वृक्ष की छाया में लेटेलेटे बादलों की मदहोशी में अपने को मदहोश कर लेना कितना अच्छा लगता है. नजदीक से ही चिडि़या का फुर्र से उड़ जाना कितना प्यारा एहसास होता है.
फिल्म ‘परदेश’ की नायिका नायक शाहरुख खान से कहती है कि मुझे ऐसा प्यार चाहिए जैसा तुम करते हो. शाहरुख कहता है कि मुझे भी ऐसा ही प्यार चाहिए जिस में शरारत हो, भोलापन हो, मस्ती हो, लेकिन उस में लालच और बनावट न हो. दिखावा, महंगे कपड़े, लिपेपुते चेहरे वाली युवतियां जो कपड़ों की तरह प्रेमी बदलती हैं, जिन के लिए प्रेम एक अराधना हो, एक तड़प हो, एक प्यास हो, एक मीठी कसक हो, एक नाजुक सा समर्पण हो. लेकिन कब तक इंतजार करूं, कहां हो तुम जिस की तलाश है मुझे. मेरे वे सब सपने अधूरे हैं. मैं उन सब सपनों में रंग भरना चाहता हूं.
यात्रा तो मैं ने फिरोजपुर जनता ऐक्सप्रैस से शुरू की थी, बोरीवली और बांद्रा तक, पर फिर तो लोकल ट्रेन से ही मेरा सफर पूरा हुआ.
चर्चगेट से बांद्रा और बोरीवली आतेजाते सफर का आनंद तो न जाने कहां उड़न छू हो गया, बस एक रूटीन सा बनता चला गया. ये सब मेरे जौब लगने के बाद हुआ, उस के पहले ऐसा नहीं था. बांद्रा में मेरा घर है. जब शुरुआती दिन थे तो बड़ा मजा आता था, कभी लोकल ट्रेन में जगह मिल जाती थी तो कभी खड़े हो कर ही सफर पूरा करना पड़ता था. लोकल ट्रेन में युवतियों को घूरने का अपना ही आनंद होता है.
कभीकभी ऐसे वाकेए होते थे, लगता था अफेयर हो रहा है, पर फिर टांयटांय फिस्स. युवती कहीं और बुक है, उस की कहीं और सैटिंग है, इसलिए समझ में नहीं आता कि यह पता कैसे चले कि युवती का कोई लवर नहीं है. बौयफ्रैंड और गर्लफ्रैंड वाली परिपाटी मेरी तो समझ में नहीं आती. इस में लव कहां से टपक पड़ा?
ऐसा ही एक वाकेआ है. एक युवती मुझे हमेशा टकराती थी. मुझे भी हर दिन जब वह नहीं दिखती थी तो उस का इंतजार रहता था. ऐसा कई बार हुआ कि वह नहीं मिली तो मैं दूसरे दिन उस का इंतजार करता रहा.
जब वह मिलती तो एकटक हम दोनों एकदूसरे को देखते रहते. मेरे व्हाट्सऐप पर भी सैकड़ों फ्रैंड थे. बीचबीच में उस युवती से ध्यान हटा कर मैं व्हाट्सऐप पर आए मैसेज पढ़ने में बिजी हो जाता, फिर मैसेज पढ़ने के बाद उस युवती की तरफ ध्यान देता, तो पाता कि वह भी अपने मोबाइल पर बिजी है. मोबाइल पर उस की उंगलियां बड़ी तेजी से चल रही हैं.
यही तो रोना है, वाट लगा दी फेसबुक और व्हाट्सऐप ने. समझ नहीं आता किस के व्हाट्सऐप पर कितने फ्रैंड्स हैं. कितनी देर और कबकब चैटिंग हो रही है. मेरे एक फ्रैंड ने बताया कि उस के 2 हजार फ्रैंड्स हैं. मैं ने बड़े आश्चर्य से उसे देखा और पूछा, ‘‘2 हजार?’’
‘‘हां, 2 हजार, फ्रैंड्स,‘‘ उस ने बड़े गर्व से बताया.’’
मैं ने उस से पूछा, ‘‘2 हजार में से मुलाकात कितनों से होती है?’’
‘‘मुलाकात, कैसी मुलाकात? लाइक करो, शेयर करो, कमैंट्स करो, हो गई मुलाकात. यदि कोई पसंद नहीं है तो उसे डिलीट कर दो या फिर ब्लौक कर दो,’’ कह कर वह जोरजोर से हंसने लगा.
मुझे आज अपने उस दोस्त की याद आई और मैं सोचने लगा कि यह युवती भी या तो मैसेज कर रही है या फिर मैसेज पढ़ कर डिलीट मार रही होगी. मैं भी तो ऐसा ही करता हूं न. आज के युग में, आज के समय के साथ चल रहा हूं, फिर यह दिमागी टैंशन क्यों? क्या चाहता हूं मैं, समझ नहीं आता?
यह दोस्ती यानी फ्रैंडशिप भी क्या चीज हो गई है लाइक करते रहो, कमैंट्स करते रहो, शेयर करो, कभीकभार कोई पट जाए तो फ्रैंडशिप, मिलने के लिए गोते लगाते रहो. कहीं मुलाकात हो गई तो ठीक है
नहीं तो डिलीट मारते रहो. इंटरनैट की फ्रैंडशिप फ्रैंडशिप नहीं बल्कि भाजीतरकारी खरीदनेबेचने जैसी हो गई है.
हां, तो मैं बता रहा था कि कभी तो वह युवती बिजी मिलती और कभी मैं बिजी हो जाता. हम दोनों उड़ती नजर एकदूसरे पर डालते और दोनों चर्चगेट पर उतर कर अपनीअपनी राह पकड़ लेते. ये सब तब होता जब लोकल ट्रेन में जगह मिल जाती अन्यथा खड़ेखड़े ही सफर करना पड़ता.
एक दिन मैं हमेशा की तरह लोकल टे्रन में चढ़ा ही था कि मेरी नजरें कहीं कोई टिकने की जगह तलाश रही थीं. दूर तक नजर डाली, लेकिन कहीं कोई चांस नहीं दिखा. नजर जैसे ही नजदीक वाली सीट पर पड़ी वही युवती सीट पर विराजमान थी. मैं ने उसे रिक्वैस्ट भरी नजरों से देखा. एक मधुर मुसकराहट से उस की तरफ देखा. उस ने उस रिक्वैस्ट का सम्मान करते हुए मुझे आंखों से इशारा किया और थोड़ी सी जगह बना दी. अंधा क्या चाहे दो आंखें. मैं तुरंत जा कर उस के साथ बैठ गया.
लोकल ट्रेन ने अपनी स्पीड पकड़ी. मैं ने उस युवती से बातों का सिलसिला जारी रखने की कोशिश में अपना मोबाइल निकाला और बिजी दिखाने की कोशिश करने लगा, लेकिन मुझे लग रहा था कि जैसे शरीर में कान उग आए हों. आखिर मैं ने ही बात शुरू की.
‘‘आप चर्चगेट तक जाएंगी?’’ मैं ने थोड़ा फ्रैंडली होने की कोशिश की.
‘‘हां, चर्चगेट तक. लगभग रोज ही देखते हैं आप,’’ युवती मुसकराते हुए बोली.
‘‘आप?’’ युवती ने सवाल किया.
‘‘चर्चगेट, जौब है वहां,’’ मैं ने अपने हाथ की खूबसूरत घड़ी देखते हुए कहा. इतनी देर में उस के मोबाइल पर लगातार कई मैसेज आ गए और मेरी बातें बीच में ही छोड़ कर वह फोन पर मैसेज देखने में बिजी हो गई.
मैं ने भी अपना मोबाइल निकाला और व्हाट्सऐप में बिजी हो गया. इतनी देर में चर्चगेट आ गया. हम दोनों वहीं उतर गए. उतरतेउतरते मैं ने उस से पूछा, ‘‘आप का नाम?’’
‘‘नीरा,’’ जवाब मिला. फिर वह भीड़ में कहीं गुम हो गई. मेरे नाम में उसे इंट्रैस्ट नहीं था शायद.
कुछ दिन बाद फिर वह मुझे मिली. मैं ने उस से पूछा, ‘‘नीराजी आप, इतने दिन बाद?’’
‘‘नहीं, मैं रैगुलर आ रही हूं,’’ फिर वह पर्स से छोटा सा आईना निकाल कर अपनी लिपस्टिक ठीक करने लगी.
‘‘अरे, मैं ने आप का नाम तो पूछा ही नहीं.’’
‘‘जितेंद्र.’’
‘‘ओह… उस ने अपने होंठों को गोल घुमाया. अगर मैं आप को जीतू कहूं तो,’’ नीरा ने मस्ती भरे स्वर में कहा.
‘‘और मैं आप को नीरू…’’ मैं कहां पीछे हटने वाला था.
‘‘ओके जीतू.’’
‘‘ओके नीरू.’’
फिर क्या था. हमारी मुलाकात लोकल ट्रेन में रोज होने लगी.
हम दोनों अकसर अब शाम को जौब से लौटने के बाद चर्चगेट पर एकदूसरे का इंतजार करने लगे. वहां से साथसाथ ही वापसी के लिए लोकल ट्रेन में बैठते. वह बोरीवली उतरती और मैं दादर.
मुझे एहसास होने लगा था कि मैं उसे चाहने लगा हूं, लेकिन वह भी मुझे चाहती है या नहीं यह कैसे पता चले? इसी कशमकश में रोज उस के साथ बंधता चला जा रहा था. कभीकभी चर्चगेट पर हम दोनों किसी रेस्तरां में जा कर स्नैक्स, कौफी व आइसक्रीम जम कर ऐंजौय करते.
मुझे वह अब अच्छी लगने लगी थी. उस का व्यवहार देख कर मुझे लगता कि वह भी मुझे चाहती है. उस का जीतूजीतू कह कर बोलने का अंदाज मुझे भाने लगा था, लेकिन कभीकभी बीच में बातों के दौरान जब वह व्हाट्सऐप पर बिजी हो जाती, तब मैं खुद को ठगा सा महसूस करता. लगता था कि जैसे जबरदस्ती आ गया हूं, लेकिन मैं कर भी क्या सकता था.
अकसर लोकल ट्रेन में मुझे एक युवती इधरउधर घूमती दिखती थी. उस के बिखरे बाल, कुछकुछ फटेपुराने कपड़े. हम लोग अकसर हर फ्राइडे को नाश्तापार्टी करते थे तो वह युवती भी हमारे आसपास मंडराने लगती थी. हम उसे भी नाश्ता करवा देते थे, तो वह बहुत खुश हो जाती थी.
उस के कपड़े व हावभाव देख कर उस के पागल होने का भ्रम होता था, इसलिए मैं ने उस का नाम ही बावली रख दिया था. उस की बड़ीबड़ी काली आंखें जो अकसर खोईखोई रहती थीं. मासूमियत से भरा सांवला चेहरा, चेहरे पर बालसुलभ चंचलता, उम्र होगी यही कोई 24-25 वर्ष.
पकौडि़यों की सुगंध हो या समोसे की, बावली समोसे और पकौडि़यां ले कर खुश हो कर चली जाती. बावली का ध्यान एक फेरी वाला रखता था, जो अकसर लोकल ट्रेन में बावली के पीछेपीछे घूमता रहता था. उस फेरी वाले को देखते ही बावली खुश हो जाती थी.
खुशी के मारे उस के अंगअंग में बिजली सी दौड़ने लगती थी. खुशी के जो भाव उस की आंखों में देखने को मिलते थे. उन में एक जनून सा दिखता था. एक प्रेम करने वाले की आंखों में ही ऐसा जनून होता है, क्या बावली फेरी वाले से प्रेम करती है?
वह जनून, वह नशा, मुझे कब मिलेगा? प्रेम के इस बावलेपन का न जाने कब से मैं इंतजार कर रहा हूं. क्या पता नीरू मुझे इस बावलेपन के साथ चाहने लगे? यह सोच कर मैं ने सामने बैठी नीरू को देखा पर वह व्हाट्सऐप पर बिजी थी. मैं ने अपनी नजरें फेर लीं.
चर्चगेट आने का अनाउंसमैंट हो चुका था. मैं अपना बैग लिए गेट पर आ गया था. मैं ने देखा कि नीरू भी ठीक मेरे साथ ही आ कर खड़ी हो गई थी.
चर्चगेट आते ही हम दोनों उतर पड़े.
‘‘ओके जीतू, अभी अपनेअपने औफिस चलते हैं शाम को यहीं मिलेंगे.’’
‘‘ओके नीरू,’’ मैं ने कहा.
‘‘बायबाय,’’ कहती हुई नीरू अपनी मंजिल की तरफ चली गई और मैं अपनी मंजिल की तरफ. चलतेचलते मैं सोच रहा था कि अच्छा सा मौका देख कर नीरू को अपने प्यार का इजहार कर ही दूंगा, लेकिन कब? कल शाम को. औफिस के बाद मेरिन ड्राइव का प्रोग्राम बनाता हूं.
औफिस पहुंच कर टेबल पर फैली डाक को समेटा, फिर कंप्यूटर खोल कर ईमेल चैक करने लगा, लेकिन मन था कि नीरू की तरफ ही दौड़ कर पहुंच रहा था. काम में मन नहीं लग रहा था, रहरह कर मन उचट रहा था. जैसेतैसे शाम हुई, मैं ने नीरू को मैसेज किया, ‘‘कल शाम को डिनर हम साथ करेंगे और मेरिन ड्राइव भी चलेंगे.’’
‘‘ओके जीतू,’’ नीरू की स्वीकृति आ गई.
वापसी में नीरू नहीं दिखाई दी. मैं ने उस का इंतजार भी किया, जहां वह अकसर मिलती थी, लेकिन जब वह दिखी नहीं तो मैं लोकल ट्रेन में बैठ गया और सोचने लगा कि हो सकता है वह निकल गई हो या देर से आए. कुछ सोच कर मैं ने मैसेज किया कि तुम कहां पर हो?
‘‘ओह… सौरी जीतू मैं तो घर आ गई.‘‘ नीरू का कुछ देर बाद जवाब आ गया.
‘‘क्या तुम औफिस से जल्दी निकल गई थी?’’ मैं ने मैसेज किया.
‘‘ हां. मेरा एक फ्रैंड आ गया था, उस के साथ मैं मौल गई थी और फिर घर आ गई. डौंटवरी हम कल मेरिन ड्राइव पर मिलेंगे. बायबाय,’’ नीरू का मैसेज आ गया.
‘‘ओके नीरू,’’ मैं ने मैसेज पढ़ कर जवाब दे दिया.
फिर वही रूटीन, दूसरे दिन मैं लोकल ट्रेन में खड़ा हो गया, बैठने तक की कहीं जगह नहीं मिली. इसलिए व्हाट्सऐप वगैरा भी देख नहीं पाया. सिर्फखयालों में वही लोकल ट्रेन में घूमने वाली बावली आ रही थी, उस की आंखों में छाया प्यार का जनून क्या कभी मुझे नसीब होगा. जब कहीं सचाई होती है तो शरीर के पोरपोर से टपकने लगती है. आंखों में उस प्रेम का नशा हमेशा बना रहता है, व्यक्ति भीड़ में भी खुद को अकेला महसूस करता है. वह खोयाखोया रहता है.
आज कहीं बावली दिखी भी नहीं, लेकिन नीरू में रहरह कर मुझे वह बावली दिखने लगती. खयालों के इसी भंवर में उलझताउलझता मैं औफिस पहुंच गया. फाइलों के हर पेज पर मुझे नीरू और बावली की शक्ल दिखती. कभीकभी दोनों चेहरे एक होने लगते तो कभी अलगअलग. कंप्यूटर पर भी मुझे नीरू और बावली की ही शक्लें दिखतीं. जैसेजैसे शाम नजदीक आ रही थी मेरे दिल की धड़कनों का ग्राफ बढ़ता जा रहा था.
जैसे ही ड्यूटी का समय खत्म होने को आया, मैं ने मैसेज छोड़ दिया, ‘‘नीरू, कहां हो तुम?’’
‘‘मैं चर्चगेट पर हूं,’’ नीरू का मैसेज आया.
फिर क्या था मैं ने जल्दीजल्दी अपने बालों को ठीक किया और चर्चगेट की तरफ चल दिया.
ठीक 10 मिनट बाद मैं नीरू के सामने था. हम दोनों ने एकदूसरे को देखा और टैक्सीस्टैंड की तरफ बढ़ गए. कुछ समय बाद हमारी टैक्सी मैरिन ड्राइव की तरफ जा रही थी. मैं हसरत भरी नजरों से नीरू की तरफ देखने लगा. नीरू ने आज पिंकग्रीन कलर का सूट पहना था. ग्रीन लैगिंग्स, पिंक शौर्ट स्लीवलैस कुरती और ग्रीन दुपट्टा गले में मफलर की तरह लपेट रखा था. कुरती में शरीर के अंदर की झलक साफसाफ दिख रही थी. मैं ने नजरें फेर लीं. मुझे आधुनिक ड्रैस पसंद है, लेकिन भोंड़ापन मैं सहन नहीं कर पाता. जब अफेयर है तो भोंड़ापन चलेगा.
मैरिन ड्राइव पर भीड़ उस दिन बाकी दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही थी, लेकिन मुंबईवासियों के लिए यह आम बात है. हम ने अपनी जगह निश्चित की. हमारे सामने विशाल समुद्र अपनी ताकत पर गुमान करता हुआ हिलौरे भर रहा था. हम दोनों उस शोर में अपनी दोस्ती को प्रेम का रूप देने वाले थे.
समझ में नहीं आ रहा था कि मैं बात कहां से शुरू करूं. इतने में नीरू के मोबाइल पर मैसेज की लाइन लग गई और वह व्हाट्सऐप में बिजी हो गई. मैं ने भी अपना मोबाइल निकाला और फेसबुक देखने लगा, पर दिल नहीं लगा. आखिर मैं ने झल्ला कर फोन बंद कर दिया. सोच लिया कि एक बार तो बात कर ली जाए. मैं ने देखा नीरू अभी भी व्हाट्सऐप पर ही उलझी हुई है.
मैं ने कहा, ‘‘नीरू छोड़ो भी मोबाइल, हम यहां बात करने आए हैं कि मोबाइल व्हाट्सऐप देखने.’’
‘‘ओके जीतू, सिर्फ 2 मैसेज और बचे हैं. बस, फिर में फ्री हूं.’’
मैं ने मन को समझाया कि 5-10 मिनट और सही.
आखिर 10 मिनट बाद नीरू फ्री हुई, ‘‘बोलो न, तुम कुछ बोलना चाहते थे,’’ नीरू ने मोबाइल पर्स में रखा और मुझ से बोली.
‘‘नीरू, देखो, मैं साफसाफ बात करना चाहता हूं, घुमाफिरा कर बात करना मुझे नहीं आता.’’
‘‘बोलो न यार, कह कर नीरू ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया.’’
मुझ में थोड़ी हिम्मत आई. मैं ने उस के हाथ को महसूस किया, नौर्मल था, लेकिन मुझे मेरा हाथ बेहद गरम महसूस हो रहा था. दिल में हलकी सी घबराहट भी महसूस कर रहा था.
‘‘देखो, नीरू, हम अच्छे दोस्त हैं, क्या हम लाइफ पार्टनर नहीं बन सकते? एकदूसरे को हम समझते भी हैं. हमारे विचार और पसंद भी काफी मिलतेजुलते हैं, तुम क्या सोचती हो?’’ मैं ने कहा.
वह बड़े ध्यान से मेरा चेहरा देखने लगी. फिर खिलखिला कर जोर से हंस दी. मेरा कलेजा मुंह को आने लगा. मैं खुद को हताश सा महसूस करने लगा.
‘‘क्यों, क्या मैं ने कोई गलत बात कही?’’ मैं ने पूछा.
‘‘नहीं भोलूराम, नहीं. तुम ऐसा कैसे सोच सकते हो?’’ नीरू ने कहा.
‘‘क्या मतलब?’’ मैं ने आश्चर्य से देखा.
‘‘अरे यार, फेसबुक, व्हाट्सऐप पर मेरे लगभग हजार फ्रैंड्स हैं, कई फ्रैंड्स से अकसर मिलती रहती हूं, उस दिन जो औफिस से जल्दी गई थी वह मेरा फेसबुक फ्रैंड था, जिस के साथ मुझे शौपिंग भी करनी थी और उसी की गाड़ी में चली गई थी. इस में प्रेम वाली बात कहां से आ गई? तुम भी इन्हीं में से एक फ्रैंड हो,’’ नीरू ने बिंदास हो कर कहा.
मेरे पांवों के नीचे की जमीन ने खिसकना शुरू कर दिया था. मैं गूंगा बन गया था.
‘‘और, जीतू, तुम्हारे कितने फ्रैंड्स हैं व्हाट्सऐप पर,’’ नीरू ने मेरा कंधा पकड़ कर झकझोरा.
मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.
‘‘यही कोई 15-20 युवक युवतियां कुल मिला कर,’’ मैं ने बड़ी मुश्किल से कहा.
‘‘15-20,’’ नीरू ने जो हंसना शुरू किया तो उस की हंसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी.
‘‘क्या फायदा इतनी फ्रैंडलिस्ट से. क्या सभी से दोस्ती हो जाती है,’’ मैं ने फिर समझाने की कोशिश की.
‘‘काहे की दोस्ती, कुछ लोगों से मिलतेजुलते रहो, बाकी को मैसेज भेजते रहो,’’ नीरू ने कहा.
‘‘चलें, आप की बात खत्म हो गई हो तो,’’ नीरू ने कहा और पूछा ‘‘डिनर कहां लेंगे?’’
‘‘डिनर, हां याद आया मुझे, डैडी के साथ एक फंक्शन में जाना है, डिनर मैं वहीं करूंगा,’’ मैं ने झूठ बोला.
‘‘क्या बकवास करते हो?’’ नीरू गुस्से से भड़क गई, ‘‘फालतू में टाइम खराब किया.’’
जब मैं घर पहुंचा तो मेरे शरीर में जान तो बची नहीं थी. यह दूसरी युवती थी, जिस ने मेरे दिल को इस कदर तोड़ा था. मुझे संभलने में महीनों लग गए, पर मैं ने व्हाट्सऐप और फेसबुक पर दायरा सीमित कर लिया. कसम खा ली व्हाट्सऐप और फेसबुक पर दोस्ती नहीं करूंगा.
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