मोहब्बत की परिणति

रविवार 21 जनवरी, 2018 का अलसाया हुआ दिन था. बसंत ऋतु ने दस्तक दे दी थी, लेकिन सूरज की किरणों में फिर भी तेजी नहीं आई थी. सिहराती सर्द हवाओं के बीच आसमान दिन भर मटमैले बादलों से ही अटा रहा. लेकिन मौसम की बदमिजाजी से लोगों की आमदरफ्त में कोई तब्दीली नहीं आई थी.

कोटा स्टेशन की बाहरी हदों से शुरू होने वाले बाजार में रोजमर्रा की रौनक जस की तस कायम थी. अगर कोई फर्क था तो इतना कि लोगों के चेहरों पर कशमकश के भाव थे और शौपिंग की बजाय उन की उत्सुकता चोपड़ा फार्म जाने वाली गली नंबर-2 की तरफ थी, जिसे पूरी तरह पुलिसकर्मियों ने घेर रखा था.

तेज होती खुसुरफुसुर से ही पता चला कि किसी ने एक महिला और उस के बेटे की हत्या कर दी है. यह वारदात वहां रहने वाले चर्चित भाजपा नेता नीरज पाराशर के परिवार में हुई थी. बदमाशों ने घर में घुस कर नीरज पाराशर की पत्नी सोहनी और 12 साल के बेटे पीयूष को गोली मार दी थी.

बेटी तान्या वारदात का शिकार होने से बच गई थी. दरअसल, गोली लगने से पहले ही सोहनी ने उसे घर से बाहर फेंक दिया था. शोर मचा तो आसपास के रहने वाले लोग फौरन मौके पर पहुंच गए, लेकिन बदमाश तब तक भाग चुके थे.

खबर मिलने पर भीममंडी के थानाप्रभारी रामखिलाड़ी पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए थे. इस दोहरे हत्याकांड की खबर जब उन्होंने आला अधिकारियों को दी तो एएसपी समीर कुमार, डीएसपी शिवभगवान गोदारा, राजेश मेश्राम भी वहां आ गए. 10 मिनट बाद आईजी विशाल बंसल और एसपी अंशुमान भोमिया भी वहां पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों के सामने जो चुनौती मुंह बाए खड़ी थी, उस से निपटना आसान नहीं था. क्योंकि कुछ ही दिनों पहले स्टेशन क्षेत्र में एक और भाजपा नेता की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी. इस के अलावा शहर में हत्या की और भी कई वारदातें अनसुलझी पड़ी थीं. इस सब को ले कर एसपी साहब के चेहरे पर तनाव साफ दिखाई दे रहा था.

केस बड़ा पेचीदा था. पुलिस इस बात पर भी हैरान थी कि इस चहलपहल वाले इलाके में नीरज पाराशर के मकान में बदमाश बेखौफ हो कर आए और मांबेटे को गोलियों से भून कर चले गए.

सोहनी की करपटी और उस के बेटे पीयूष के सीने में गोलियां लगी थीं. लग रहा था जैसे उन्हें गोली बहुत करीब से मारी गई थी. एक गोली कमरे की दीवार पर भी लगी थी, दीवार पर गोली टकराने का निशान बन गया था. पुलिस ने मौके से गोली का खोल भी बरामद कर लिया.

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सूचना मिलने पर पुलिस फोटोग्राफर, क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम, डौग स्क्वायड और एफएसएल की टीमें भी वहां पहुंच गई थीं. सभी टीमें अपनेअपने ढंग से काम कर के लौट गईं. थानाप्रभारी रामखिलाड़ी मीणा ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और आगे की जांच में जुट गए.

उन्होंने नीरज पाराशर से बात की तो उस ने बताया कि घटना के वक्त वह सब्जी लेने के लिए बाजार गया हुआ था. सरेआम हुई इस वारदात ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी थी. गोली चलाने वाले कौन थे, किस तरफ भागे थे, किसी को कुछ पता नहीं था. पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज भी खंगाले, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

पुलिस ने पड़ोसियों से बात की तो उन्होंने बताया कि हम ने गोलियां चलने की आवाज तो नहीं सुनी अलबत्ता मार दिया…मार दिया… की चीखपुकार जरूर सुनी थी. जिस के बाद वे लोग पाराशर के मकान की तरफ दौड़े. हालांकि कुछ लोगों ने पाराशर के मकान से एक आदमी को भागते देखा, लेकिन वह कौन था, कैसे आया और कहां गया, इस बाबत कुछ नहीं बता पाए.

पुलिस पूछताछ में रोताबिलखता नीरज ठीक से कुछ नहीं बता पा रहा था. टुकड़ों में जो कुछ वह कह रहा था, उस से पुलिस सिर्फ इतना समझ पाई कि उस की पत्नी सोहनी मुरैना की रहने वाली थी, जहां पड़ोस में रहने वाले चंद्रकांत पाठक उर्फ दिलीप से उस का अफेयर था. 2 महीने पहले सोहनी उस के साथ भाग गई थी, जिस की गुमशुदगी की सूचना उस ने थाना भीममंडी में दर्ज करा रखी थी.

पिछले दिनों उसे सोहनी के मुरैना में होने का पता चला तो वह मुरैना जा कर उसे ले आया. नीरज ने पुलिस को बताया कि वारदात करने वाला चंद्रकांत पाठक के अलावा कोई नहीं हो सकता. थानाप्रभारी ने यह सारी जानकारी एसपी अंशुमान भोमिया को दे दी.

इन सब बातों से अंशुमान भोमिया को लगा कि पूरे घटनाक्रम में सोहनी की कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका रही होगी. इसलिए उन का पूरा ध्यान उस के अतीत और उस के प्रेमी चंद्रकांत पाठक पर अटक गया.

नीरज ने एसपी साहब से मुलाकात की. उस ने उन्हें एक नई जानकारी यह दी कि चंद्रकांत पाठक ने चेतन शर्मा के नाम से एक फरजी फेसबुक आईडी बना रखी थी. चंद्रकांत एक उच्चशिक्षित युवक था, साथ ही अच्छा शूटर भी. मध्य प्रदेश में उसे शार्पशूटर का अवार्ड मिल चुका था.

पुलिस ने नीरज से इस बारे में विस्तार से जानकारी मांगी कि सोहनी कब और कैसे गायब हुई थी? इस पर नीरज ने बताया, ‘‘नवंबर, 2017 में मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अपनी ससुराल मुरैना गया था. वहां से 20 नवंबर को हम कोटा लौट आए थे. 22 नवंबर को मैं गोवर्धन परिक्रमा के लिए वृंदावन चला गया था.

मेरी गैरमौजूदगी में चंद्रकांत पाठक आया और जबरन पत्नी को ले कर चला गया. उस समय दोनों बच्चे भी घर पर थे, जो सो रहे थे. बाद में जब बेटा पीयूष सो कर उठा और उस ने मां को नहीं देखा तो उस ने मुझे फोन किया. तब मैं ने पत्नी की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कराई और अपने स्तर पर भी उस की तलाश करता रहा, लेकिन निराशा ही हाथ लगी.’’

उस ने आगे बताया, ‘‘सर, जनवरी, 2018 में अचानक मेरे पास पत्नी का फोन आया. उस ने किसी और के मोबाइल से फोन किया था. पत्नी ने मुझे बताया कि चंद्रकांत ने उसे कैद कर रखा है, आ कर उसे छुड़ा लें. यह जानने के बाद मैं मुरैना गया और पत्नी को साथ ले कर कोटा आ गया. चंद्रकांत पत्नी से कोई संपर्क न कर सके, इसलिए मैं ने पत्नी का फोन नंबर भी बदल दिया था. इस से खीझ कर एक दिन चंद्रकांत ने मुझे फोन पर ही धमकी दी कि सोहनी से बात करवा दो वरना पूरे परिवार को जान से मार देगा.’’

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नीरज से पूछताछ के समय एसपी अंशुमान भोमिया भी वहीं मौजूद थे. उन्होंने नीरज को तीखी नजरों से देखा, वह उन से आंखें नहीं मिला सका. नीरज के हावभाव और बातों से उन्हें उसी पर शक होने लगा था. लेकिन उन्होंने जानबूझ कर उसे ज्यादा कुरेदना उचित नहीं समझा. इसी बीच एक नई जानकारी ने पुलिस की तहकीकात का रुख मोड़ दिया.

पता चला कि चंद्रकांत पाठक शनिवार 20 जनवरी, 2018 की देर रात कोटा पहुंचा था और स्टेशन क्षेत्र के ही एक होटल में ठहरा था. पुलिस का मानना था कि निश्चित रूप से उस ने अगले रोज 21 जनवरी को दिन भर नीरज के घर के आसपास रेकी की होगी और जैसे ही उसे मौका मिला, वह वारदात को अंजाम दे कर भाग गया.

पुलिस ने नीरज और सोहनी की फेसबुक देखी तो इस प्रेम कहानी का काफी कुछ खुलासा हो गया. फेसबुक पर मोहब्बत और नफरत के जज्बात साथसाथ मौजूद थे. पत्नी के इस तरह छोड़ कर चले जाने से नीरज पाराशर इस हद तक परेशान था कि उस की यादें सहेजने के लिए पुराने फोटो शेयर करने के साथ मोहब्बत और हिकारत दोनों उगल रहा था.

15 दिसंबर, 2017 को नीरज ने अपनी फेसबुक पर लिखा, ‘आई हेट सोहनी पाराशर एंड माई लाइफ…’ 28 दिसंबर को सुर बदला तो उस के मन में सोहनी के लिए  तड़प पैदा हुई. उस ने लिखा, ‘आप कहां हो सोहनी, कम बैक प्लीज…’

31 दिसंबर को मोहब्बत ने जोर मारा तो नए साल की मुबारकबाद देते हुए लिखा, ‘विश यू ए हैप्पी न्यू ईयर सोहनी पाराशर’. 5 जनवरी को वैराग्य का भाव जागा तो कुछ अलग ही असलियत उजागर हुई, ‘सोहनी पैसे की दीवानी थी’. नीरज ने आगे लिखा, ‘इस दुनिया में कोई रिश्ता इंपोर्टेंट नहीं है, सब कुछ केवल पैसा है.’

पुलिस ने चंद्रकांत पाठक के फरजी नाम चेतन शर्मा की फेसबुक सर्च की तो चंद्रकांत और सोहनी की तूफानी मोहब्बत खुल कर सामने आ गई. 15 जनवरी को चंद्रकांत ने सोहनी के साथ करीब डेढ़ सौ फोटो शेयर किए थे, जो होटलों में मौजमस्ती और घूमनेफिरने की तस्दीक कर रहे थे.

17 जनवरी, 2018 को चंद्रकांत ने जो कुछ फेसबुक पर लिखा, उस ने उस के इरादों पर मुहर लगा दी. चंद्रकांत ने लिखा था, ‘इस दुनिया को अलविदा, मेरी जिंदगी यहीं तक थी. माफ कर देना, सभी का दिल दुखाया, बट गलत  मैं था. माफ कर देना… लव यू आल…सौरी.’

टूटे हुए दिल से निकले अल्फाज चंद्रकांत की उस मनोदशा की तसदीक कर रहे थे, जब कोई शख्स खुदकुशी का फैसला करता है जबकि सोहनी का कत्ल तो कुछ और ही कहानी की तरफ इशारा कर रहा था.

मामला काफी संदिग्ध था. नीरज अपनी बात पर अडिग था कि उस की पत्नी सोहनी की हत्या चंद्रकांत पाठक ने की है. लेकिन एसपी अंशुमान भोमिया के इस सवाल का उस के पास कोई जवाब नहीं था कि अगर तुम्हारी पत्नी से उस का अफेयर था तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि वह उस की हत्या करने पर आमादा हुआ और मासूम बच्चे से चंद्रकांत की क्या दुश्मनी थी जो उस ने उसे भी गोली मार दी?

नीरज इस बाबत भी चुप्पी साधे रहा. एसपी अंशुमान भोमिया ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार की अगुवाई में तेजतर्रार अफसरों डीएसपी शिवभगवान गोदारा, राजेश मेश्राम और भीमंडी नयापुरा और रेलवे कालोनी के थानाप्रभारियों को शामिल कर के एक पुलिस टीम बनाई और चंद्रकांत की तलाश में भेज दी. इस टीम ने उसे बिलासपुर, श्योपुर और देहरादून में तलाशा.

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पुलिस की यह कोशिश रंग लाई. चंद्रकांत को मध्य प्रदेश के श्योपुर से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो पता चला कि वह उच्चशिक्षित था. उस ने मैथ्स, कैमिस्ट्री और कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री प्राप्त की थी. पीजीडीए किए चंद्रकांत पाठक के पास मास्टर औफ फाइन आर्ट्स की भी डिग्री थी.

इतना ही नहीं, वह सटीक निशानेबाज भी था. उसे बेस्ट शूटर का प्रोसीडेंट अवार्ड भी मिल चुका था. वह एनसीसी का सी सर्टिफिकेट होल्डर भी था.

एसपी भोमिया ने उस से पूछा कि इतना क्वालीफाइड हो कर भी उस ने इतनी संगीन वारदात को अंजाम कैसे दिया. इस बारे में उस ने जो कुछ बताया, उस से पूरी कहानी मोहब्बत पर आ कर सिमट गई.

चंद्रकांत पाठक उर्फ दिलीप उर्फ चेतन शर्मा मूलरूप से मुरैना के दत्तपुरा का रहने वाला था. सोहनी का परिवार उस के घर के ठीक सामने ही रहता था. दोनों का बचपन एक साथ खेलतेपढ़ते बतियाते बीता था. बचपन की यह दोस्ती कब प्यार में बदल गई, दोनों ही नहीं समझ सके. अलबत्ता दोनों मोहब्बत में इस कदर डूबे थे कि एकदूसरे के बिना रहने की कल्पना करना भी उन्हें गवारा नहीं था.

लेकिन पारिवारिक बंदिशों के कारण यह मोहब्बत जीवनसाथी की डोर में नहीं बंध पाई. कालांतर में सोहनी का विवाह कोटा के नीरज पाराशर से हो गया और चंद्रकांत ने भी परिवार की जिद के आगे सिर झुका कर कहीं दूसरी जगह शादी कर ली.

दोनों अलगअलग रिश्तों की डोर में बंध तो गए, लेकिन आशिकी खत्म नहीं हुई. चंद्रकांत के पिता का मुरैना में डीजे का काम था. वह पिता के काम में ही हाथ बंटाने लगा. बाद में चंद्रकांत के भी एक बेटा हो गया और सोहनी भी 2 बच्चों की मां बन गई.

इस के बावजूद सोहनी और चंद्रकांत के संबंध बने रहे. सोहनी अपने मायके मुरैना आती तो वह चंद्रकांत से जरूर मिलती. किसी तरह नीरज को इस बात की भनक लग गई. इस के बाद दोनों ने मिलने में ऐहतियात बरतनी शुरू कर दी. चंद्रकांत का कहना था, ‘कोई 2 महीने पहले मैं बिलासपुर में था. सोहनी वहीं आ गई थी. सोहनी अपनी ससुराल वालों को बिना बताए आई थी. इस के बाद चंद्रकांत ने सोहनी के साथ रहना शुरू कर दिया था.

‘इसी दौरान चंद्रकांत ने 20 लाख रुपए में अपनी दुकान बेची थी. वह रकम उस के पास मौजूद थी. इस बीच सोहनी उस की गैरहाजिरी में अपने पति के साथ कोटा चली गई. जाते समय वह मेरे 2 लाख रुपए और गहने अपने साथ ले गई थी. सोहनी ने मेरे साथ फरेब किया था.’

‘‘सोहनी के कत्ल की नौबत क्यों आई? अगर फरेब की कोई वजह थी तो उस मासूम बच्चे को क्यों मारा?’’ एसपी भोमिया ने पूछा.

‘‘नहीं सर, मेरा इरादा ऐसा नहीं था. मैं नीरज की गैरमौजूदगी में ही सोहना से मिलना चाहता था. ऐसा मैं ने किया भी.’’ एक पल रुकते हुए चंद्रकांत ने कहना शुरू किया, ‘‘मैं ने अपनी रकम और जेवरात सोहनी से मांगे तो वह उल्टे मुझ पर ही बरस पड़ी. मैं ने उसे डराने के लिए पिस्टल दिखाई, लेकिन अचानक बच्चा मेरे ऊपर झपट पड़ा और पिस्टल छीनने की कोशिश करने लगा. इस छीनाझपटी में ही ट्रिगर दब गया और बच्चे को गोली लग गई.

‘‘सोहनी को तो मुझे मजबूरी में मारना पड़ा. उसे नहीं मारता तो वह बेटे की हत्या की गवाह बन जाती. बेटे की मौत से सोहनी को अपनी बेटी की जान भी खतरे में नजर आई तो उस ने बच्ची को दरवाजे की तरफ फेंक दिया. सोहनी पर मैं ने 2 गोलियां चलाईं. अफरातफरी में निशाना चूक गया और एक गोली दीवार में धंस गई. एक गोली उस की कनपटी पर लगी थी. उस के बाद मैं बुरी तरह दहशत में आ गया था. इस के बाद मैं पहले दिल्ली चला गया फिर श्योपुर आ गया.’’

पुलिस ने उस से पूछताछ करने के बाद उसे भादंसं की धारा 302 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 2 लाख की रकम और जेवरात अभी पुलिस बरामद नहीं कर पाई. कथा लिखे जाने तक चंद्रकांत जेल में बंद था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

रेप, रेप, रेप…नहीं संभल रही भाजपा से सत्ता

उन्नाव कांड और कठुआ कांड पर समूचा देश सकते में है. जो गुस्सा निर्भया बलात्कार मामले में देखा गया, वैसा ही आक्रोश देशभर में उबल रहा है. घटनाओं के विरोध में महिला संगठन, छात्र संगठन और सामाजिक संगठन सड़कों पर कैंडल मार्च कर रहे हैं. जगहजगह धरना दे कर पीडि़ताओं को न्याय दिलाने की मांग की जा रही है. दोनों अमानवीय घटनाओं में सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा अपराधियों के बचाव में खड़े हो कर न्याय की राह में आड़े आने का रवैया हैरान कर देने वाला था. अपराधियों के साथ भगवा सत्ता और हिंदू संगठनों के समर्थन का खतरनाक रूप सामने आया है.

शुरू में भाजपा सरकार की जिस तरह से जयजयकार हो रही थी, 4 वर्ष होतेहोते अब उस के प्रति लोगों में आक्रोश देखा जाने लगा है. सरकार कई मोरचों पर असफल रही है. क्या भाजपा से सत्ता संभल नहीं रही है? देश में अराजक तत्त्वों का बोलबाला बढ़ रहा है और सरकार उन के आगे असहाय बनी दिख रही है. तमाम मंत्रालय निकम्मे साबित हो रहे हैं.

कुकर्मियों का बचाव 

कठुआ की घटना को लें. जम्मूकश्मीर के कठुआ जिले के सरन गांव की 8 वर्षीया आमना (बदला हुआ नाम) का पहले अपहरण हुआ. उसे करीब एक सप्ताह तक एक मंदिर में बंधक बना कर रखा गया. उस का यौनशोषण किया गया और फिर बेरहमी से मार डाला गया. अबोध आमना अल्पसंख्यक गुर्जर बकरवाल समुदाय की लड़की थी. अपराध शाखा द्वारा दायर आरोपपत्र के अनुसार यह जघन्य कांड अल्पसंख्यक समुदाय को इलाके से हटाने के लिए रची गई सोचीसमझी साजिश थी.

मामले में 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. अफसोस और शर्म की बात है कि मामला सामने आने के बाद हिंदू संगठनों ने तिरंगा ले कर भारत माता की जय बोलते हुए अपराधियों के समर्थन में सड़कों पर जुलूस निकाला. जुलूस में राज्य सरकार में शामिल भाजपा के 2 मंत्री भी शरीक थे जिन के खिलाफ हल्ला मचने पर पार्टी द्वारा उन से इस्तीफा देने को कहा गया.

इस बर्बर कांड को ले कर सोशल मीडिया पर जो गुस्सा निकल रहा है, उस में क्या हिंदू, क्या मुसलमान, क्या सिख यानी इंसाफ के लिए उमड़े आक्रोश के सामने तमाम धर्मों की दीवारें ढह गईं. हर धर्म, वर्ग, जाति के लोगों द्वारा आमना के साथ हुए बर्बर अत्याचार के लिए दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिए जाने की मांग की जा रही है.

विधायक का खौफ

उन्नाव की घटना भी ऐसी ही है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक युवती के साथ बलात्कार के मामले में भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का नाम भी है. उन के अलावा 3 अन्य आरोपी हैं. मृतक की बेटी का आरोप है कि विधायक और उस के साथी लोगों ने उस के साथ गैंगरेप किया. दरअसल, ये लोग लड़की के परिवार से रंजिश रखते थे. उन को नीचा दिखाने व सबक सिखाने के लिए सालभर पहले रेप किया था.

अपने साथ हुए दुष्कर्म को ले कर लड़की मुकदमा लिखाने के लिए दरदर भटक रही थी. विधायक का नाम मुकदमे में लिखने को पुलिस तैयार नहीं हुई तो लड़की ने कोर्ट जा कर मुकदमा दर्ज कराया. जब कोर्ट के जरिए यह मुकदमा लिखा गया तो विधायक ने मुकदमा वापस लेने के लिए उस के पिता को पीटा और जेल भिजवा दिया, जहां उस की मौत हो गई. पूरे घटनाक्रम को देखें तो विधायक की धौंस पता चलती है.

पद का घमंड

लखनऊ से 56 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के माखी गांव की पीडि़ता (बदला हुआ नाम कविता) के पिता और दोनों चाचा 15 साल पहले कुलदीप सिंह सेंगर के करीबी हुआ करते थे. कविता की 3 बहनें और 1 भाई है. एक ही जाति के होने के कारण उन में आपसी तालमेल भी बेहतर था. वे एकदूसरे के सुखदुख में साझीदार होते थे. दोनों ही परिवार माखी गांव के सराय थोक इलाके के रहने वाले थे. कविता के ताऊ सब से दबंग थे. कुलदीप सिंह सेंगर ने कांग्रेस से अपनी राजनीति शुरू की. चुनावी सफर में कांग्रेस का सिक्का कमजोर था तो वे विधानसभा का पहला चुनाव बसपा यानी बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लड़े और 2002 में पहली बार उन्नाव की सदर विधानसभा सीट से विधायक बने.

कुलदीप के विधायक बनने के बाद कविता के परिवारजनों के साथ कुलदीप का व्यवहार बदलने लगा. जहां पूरा समाज कुलदीप को विधायकजी कहने लगा था, वहीं कविता के ताऊ कुलदीप को उन के नाम से बुलाते थे. कुलदीप अपनी छवि को बचाने के लिए इस परिवार से दूरी बनाने लगे. कविता के पिता और उन के दोनों भाइयों को यह लगा कि कुलदीप के भाव बढ़ गए हैं. वे किसी न किसी तरह से कुलदीप को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहे. यह मनमुटाव बढ़ता गया. एक तरफ जहां कविता का परिवार कुलदीप का विरोध कर रहा था वहीं कुलदीप अपना राजनीतिक सफर बढ़ाते गए.

कविता के ताऊ के ऊपर करीब एक दर्जन मुकदमे माखी और दूसरे थानाक्षेत्रों में दर्ज थे. करीब 10 वर्षों पहले उन्नाव शहर में भीड़ ने ईंटपत्थरों से हमला कर के कविता के ताऊ को मार दिया. कविता के परिवार के लोगों ने इस घटना का जिम्मेदार विधायक कुलदीप को ही माना था. कविता के ताऊ की मौत के बाद उस के चाचा उन्नाव छोड़ कर दिल्ली चले गए. वहां उन्होंने अपना इलैक्ट्रिक वायर का बिजनैस शुरू किया. उन के ऊपर 10 मुकदमे दर्ज थे. कविता के पिता अकेले रह गए. उन के ऊपर भी 2 दर्जन मुकदमे दर्ज थे. नशा और मुकदमों का बोझ उन को बेहाल कर चुका था.

कुलदीप ने 2007 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर बांगरमऊ विधानसभा से जीता और 2012 में भगवंतनगर विधानसभा से चुनाव जीता. 2017 के विधानसभा चुनाव में कुलदीप ने भाजपा का साथ लिया और बांगरमऊ से विधायक बन गए. विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के परिवार की कविता के परिवार से रंजिश बनी रही. उन्नाव जिले की पहचान दबंगों वाली है. यहां अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की बहुतायत है. माखी गांव बाकी गांवों में से संपन्न माना जाता है. यहां कारोबार भी दूसरों की अपेक्षा अच्छा चलता है.

योगी राज के लिए फांस 

विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के मामले को देखें तो पूरी बात साफ हो जाती है. सत्ता की हनक में अपना विरोध करने वाले के साथ विधायक कुलदीप सेंगर ने जो कुछ किया, वह अब योगी राज के गले में फांस बन गई है. उन्नाव से ले कर राजधानी लखनऊ तक केवल पुलिस ही नहीं, जेल और अस्पताल तक में जिस तरह से विधायक के विरोधी के साथ बरताव हुआ, वह किसी कबीले की घटना से कम नहीं है. पहले अपने विरोधी की पिटाई पानी डालडाल कर की जाती है. मरणासन्न अवस्था में उस के खिलाफ मुकदमा कायम करा कर पुलिस की मिलीभगत से जेल भेज दिया जाता है. घायल को ले कर पुलिस सरकारी अस्पताल जाती है जहां उस का इलाज करने के बजाय उसे जेल भेज दिया जाता है. घायल को जेल में सही इलाज नहीं मिलता जिस से वह तड़पतड़प कर मर जाता है.

विधायक की धौंस तो पूरे देश को सुनाई देने लगी. सरकार ने पहले बचाव किया. जब जनता से ले कर कोर्ट तक सरकार की नीयत पर सवाल उठने लगे तब दबाव में पूरा मामला सीबीआई को सौंपना पड़ा. सत्ता के आते ही योगी राज में भाजपाइयों की धौंस बढ़ गई है.

ऐसे सीन फिल्मों में देखने को मिल सकते हैं. पुलिस से ले कर जेल और अस्पताल तक के लोग विधायक की धौंस के आगे नतमस्तक बने रहे. जेल में जाने के दूसरे ही दिन घायल की मौत हो जाती है, मौत के बाद जागी सरकार के दबाव में पुलिस विभाग ने अपने कर्मचारियों को भले ही सस्पैंड कर दिया हो पर जिला जेल और अस्पताल के लोगों को कोई सजा नहीं दी गई है. अपना दामन बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी बना दी है.

बलात्कार का अनकहा सच

कविता के साथ हुए बलात्कार के मसले पर जो जानकारी सामने आई उस के अनुसार जून, 2017 में राखी (बदला हुआ नाम) नामक महिला कविता को ले कर विधायक कुलदीप के पास गई. विधायक ने उसे बंधक बना लिया उस के साथ बलात्कार किया गया. बलात्कार का आरोप विधायक के भाई और साथियों पर लगा. घटना के 8 दिनों के बाद कविता औरया जिले के पास मिली. कविता और उस  के पिता ने इस बात की शिकायत थाने में की. पुलिस ने 3 आरोपी युवकों को जेल भेज दिया. घटना में विधायक का नाम शामिल नहीं हुआ.

एकतरफा कार्यवाही

3 अप्रैल, 2018 को विधायक के छोटे भाई ने कविता के पिता के साथ मारपीट का मुकदमा वापस लिए जाने के लिए कहा. कविता और उस के परिवारजनों ने पुलिस में मुकदमा लिखाया. इस के साथ ही साथ विधायक के लोगों की तरफ से भी मुकदमा लिखाया गया. पुलिस ने क्रौस एफआईआर  दर्ज कीं और केवल कविता के पिता को जेल भेज दिया. कविता का आरोप है कि जेल में विधायक के लोगों ने उस के पिता की खूब पिटाई की.

8 अप्रैल को कविता अपने परिवारजनों के साथ राजधानी लखनऊ आई और सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कालीदास मार्ग स्थित आवास पर पहुंच गई. यहां उस ने आत्मदाह करने की कोशिश की. पुलिस ने उस को पकड़ लिया. गौतमपल्ली थाने में कविता को रखा गया.

वहां से पूरे मामले की जांच करने के लिए एसपी, उन्नाव से कहा गया. इस बीच जेल में ही कविता के पिता की मौत हो गई. पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में पिटाई और घाव में सैप्टिक हो जाने से मौत होने की पुष्टि हुई. पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर चोट के 14 निशान पाए गए.

योगी की मजबूरी

कविता के पिता की जेल में मौत के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई. विपक्षी दलों में समाजवादी पार्टी से ले कर कांग्रेस तक ने सरकार पर आरोप लगाने शुरू कर दिए. खुद विधायक कुलदीप सिंह सेंगर मुख्यमंत्री से मिलने गए. लेकिन उन्होंने विधायक से मुलाकात नहीं की. विधायक को यह संदेश दिया गया कि वे जांच में सहयोग करें. सरकार की सख्ती के बाद कविता के पिता से मारपीट के आरोपी विधायक के भाई अतुल सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. कविता ने इस के बाद भी अपनी लड़ाई जारी रखी है.

निकम्मी साबित होती सरकार

दोनों मामलों को ले कर पूरे देश में भाजपा की किरकिरी हो रही है. शुरू में भाजपा सरकार द्वारा विकास की जो योजनाएं पेश की गईं अब उन का जिक्र ही नहीं है. स्वच्छता अभियान फेल हो गया. राजधानी दिल्ली में चारों ओर बेशुमार गंदगी का आलम देखा जा सकता है. ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ नारे की धज्जियां उड़ रही हैं. विश्व के देशों की भ्रष्टाचार लिस्ट में भारत उसी जगह पर विराजमान है. बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ता जा रहा है. हिंदुत्व उन्माद देश के युवाओं को निगल रहा है. उन में नशाखोरी बढ़ती जा रही है.

कृषि में कोई सुधार होता नहीं दिखता. किसानों की आय दोगुनी करने की बात की जा रही है पर कैसे होगी, ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है, यह नहीं बताया जा रहा. उलटे, किसानों का गुस्सा और बढ़ रहा है. किसानों की आत्महत्याओं की दर घटने का नाम नहीं ले रही. युवा रोजगार के लिए सड़कों पर उतरे दिखाईर् पड़ रहे हैं. महिलाएं सुरक्षा के लिए आंदोलनरत हैं. विद्यार्थियों की परीक्षाओं के पेपर सुरक्षित नहीं हैं.

स्टार्टअप, स्टैंडअप इंडिया, न्यू इनोवेशन, प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना जैसी ललचाने वाली स्कीमों की अब चर्चा ही नहीं है.

इन सब के अलावा जिन चीजों का सब से अधिक विकास हुआ, वे हैं सामाजिक वैमनस्यता, जातीय व धार्मिक विभाजन और गहरा हुआ, घृणाहिंसा कभी गोरक्षा के नाम पर तो कभी वंदेमातरम के नाम पर. जातीय अस्मिता, धर्म, संस्कृति, लव जिहाद, आरक्षण विरोध, दलितों पर हिंसा जैसे मामलों को ले कर देश में नफरत का माहौल पैदा किया गया. ऐसे मामलों में सरकार कोई नियंत्रण नहीं कर पाई. उलटा, सरकार इन के समर्थन में खड़ी नजर आई.

अपराधियों को सत्ता का कवच

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि कठुआ से उन्नाव तक अन्याय की घटनाएं हावी हैं और सत्ता प्रतिष्ठान का अहंकार न्याय की राह रोक रहा है. बलात्कार मामलों को ले कर भाजपा सरकार और उस के हिंदू संगठन अपराधियों के बचाव में आ खड़े हुए. असल में समूची हिंदुत्व संस्कृति ही स्त्रियों के यौनशोषण की समर्थक और उस की स्वतंत्रता की विरोधी रही है. यकीन न हो तो प्राचीन गं्रथ उठा कर देख लीजिए.

धर्म अमानवीय अपराधों पर कवच बना हुआ है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यों ही पूर्व गृहराज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद को अपनी शिष्या के साथ बलात्कार का मामला वापस नहीं ले लिया. पीडि़त शिष्या राष्ट्रपति से आरोपी स्वामी के खिलाफ वारंट जारी करने की मांग करे तो करे, योगी सरकार तो धर्र्म की राह पर है. दोषी तो स्त्रियां हैं, उन्हें नरक का द्वार, पाप की गठरी, मर्द के लिए भोग्या करार दिया गया है. भाजपा इसी सोच की ही तो पोषक है.

मोदी और योगी के राज में गायों को बचाने के लिए मनुष्यों की जानें ले लेने और स्त्री की अस्मत व जान की तुच्छ कीमत मानने वाली संस्कृति की पैराकारी ही तो की जा रही है. असल में धर्मों में श्रम की नहीं, निकम्मेपन की पैरवी है. भाजपा सरकार वही कर रही है. रामराज्य का यूटोपिया प्रचारित किया जा रहा है

अक्षम मंत्रालय, अकर्मण्य मंत्री

सरकार के तमाम मंत्री निकम्मे साबित हो रहे हैं. वित्त मंत्री बीमार हैं. विदेश मंत्री लाचार हैं. बैंकों का अरबों रुपया ले कर फ्रौड कारोबारी देश से भागे जा रहे हैं. तिजोरी के रक्षक होने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक के बाद एक मामले सामने आने पर चुप्पी साधे हैं.

विदेश मंत्री का काम सिर्फ इतना दिखाई देता है कि वे विदेश में फंसे किसी भारतीय नागरिक को देश में बुलाने के साधन मुहैया करा दें. कानून मंत्री मजबूर दिखते हैं. उन के सामने पहली बार देश की सर्वोच्च न्याय संस्था में मतभेद उभर कर जगजाहिर हो रहे हैं. न्याय व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है. समूचा न्यायतंत्र भ्रष्टाचार में जकड़ चुका है. संवैधानिक न्याय व्यवस्था पर सरकार के नियंत्रण की मंशा उजागर हो रही है. न्यायाधीशों की नियुक्ति से ले कर फैसलों तक पर शक और सच उजागर हो रहे हैं.

सूचना प्रसारण मंत्री फेक न्यूज के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रस्ताव ला रही हैं. सरकार प्रैस नाम की संस्था को मजबूत करने के बजाय उसे सैंसर करना चाह रही है. पत्रकारिता के मूल्यों को रौंदा जा रहा है.

महिला रक्षा मंत्री की कोई कामयाबी अब तक कहीं प्रदर्शित नहीं हुई. गृहमंत्री से आंतरिक सुरक्षा नहीं संभल रही. वे केवल कड़ी कार्यवाही का आश्वासन देते सुनाई पड़ते हैं. फर्जी मुठभेड़ों के बल पर तमगे बांटे जा रहे हैं.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय से शिक्षक, छात्र, अभिभावक सब परेशान हैं. पेपर लीक हो रहे हैं. स्कूलों, कालेजों, यूनिवर्सिटियों में अध्यापक नहीं हैं, अध्यापक हैं तो पढ़ाईर् नहीं है. निचले वर्गों के साथ भेदभाव है. शिक्षा संस्थानों को 5 हजार साल पुरानी हिंदू गुरुकुल, आश्रमों की शिक्षा पद्धति का अड्डा बनाया जा रहा है. कहा जाता है कि तमाम मंत्रालयों का काम प्रधानमंत्री कार्यालय देखता है. पर लगता नहीं कि पीएमओ समूचे देश को संभाल पा रहा है. पीएमओ ने सारे मंत्रियों को अकर्मण्य बना दिया है.

वोट की खातिर

धर्म के एजेंडे के अनुसार ऐसे काम होते दिख रहे हैं जो देश और समाज के हित में नहीं हैं. भाजपा सीधेसीधे पौराणिक व्यवस्था थोपना चाहती है. वोटों की खातिर भाजपा पिछड़ों और दलितों को अपनाना तो चाहती है पर इन्हें वर्णव्यवस्था के तहत पिछड़ा और दलित बनाए रख कर. सामाजिक स्तर पर उसे जातियों और उपजातियों के विभाजित हिंदू ही स्वीकार्य हैं. हिंदू एकता उस के लिए राजनीतिक मुद्दा है, सामाजिक मुद्दा नहीं, इसलिए पिछड़ों और दलितों में राजनीतिक एका तो करा दिया जाता है पर सामाजिक एकता नहीं हो पाती. (देखें अगला लेख : दलित आक्रोश)

विकास कहां

देश में विकास इसलिए नहीं हो पा रहा क्योंकि भाजपा की संघी सोच श्रम को नीचा मानती आई है और जो श्रम करने वाला वर्ग है यानी पिछड़े और दलित, वे खुद भी ब्राह्मण बनना चाह रहे हैं. क्या हम वैसी संस्कृति पर गर्व कर सकते हैं जो इंसान को बांटती हो, उन्हें एकदूसरे से छोटा करार देती हो, जैंडर भेदभाव रखती हो और विकास से दूर जा रही हो.

भाजपा के सत्ता संभालनेचलाने में नाकाम होने के पीछे उस की सदियों पुरानी सडि़यल और निकम्मेपन की सोच है. नई और मेहनत करने की सोच सिकुड़ती जा रही है जबकि जाहिलों का जमावड़ा बढ़ रहा है. निठल्ले साधुओं को मंत्री बनाया जा रहा है जो इस देश के लिए घातक ही तो है. ऐसे में विकास कहां से होगा, सामाजिक समरसता कहां से आएगी.

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भाजपाई रक्षाकवच

भारतीय जनता पार्टी की तारीफ करनी चाहिए कि जम्मू के कठुआ और उत्तर प्रदेश के उन्नाव में अपने समर्थकों को बलात्कार जैसे आरोप से बचाने के लिए वह जीजान से जुटी रही. जिसे 2 गायों के अपनेआप मर जाने पर दलितों और मुसलमानों पर कहर ढाने में देर नहीं लगती उस पार्टी की अपनों को बचाने की संस्कृति ही भारतीय जनता पार्टी को ‘उत्तम’ पार्टी बना रही है.

2002 में नरेंद्र मोदी की गुजरात संहार में भूमिका की आज तक पार्टी पूरी तन्मयता से रक्षा कर रही है. जैसे ही यह मामला उठाया जाता है, तुरंत पार्टी के सारे नेताओं को 1984 के दंगे याद आ जाते हैं और वे कहने लगते हैं कि कांग्रेस द्वारा किसी को 1984 के दंगों में सजा न देने का अर्थ है कि देश का कानून ऐसा है कि जो सत्ता में है वह गलत कर ही नहीं सकता, वह गुनाहगार हो ही नहीं सकता.

यही जम्मू के कठुआ और उत्तर प्रदेश के उन्नाव के मामलों में हुआ. अगर आम लोगों ने यह कांड किया होता तो प्राथमिकी लिखने से पहले अभियुक्त गिरफ्तार हो चुका होता पर चूंकि इस मामले में अपराधियों ने भाजपाई रक्षाकवच धारण कर रखा था, सो, पार्टी, सरकार, पुलिस, अदालत सब चुप रहे.

अपनी सत्ता के दौरान कांग्रेस अपनों को यदाकदा गिरफ्तार होने देती थी, और तभी उस में इतने निष्ठावान सदस्य कहां हैं जो मरने तक पार्टी के साथ रहें. भाजपा तो कहती है कि जो एक बार भाजपाधर्म ग्रहण कर ले वह सब पापों से ऊपर

हो गया और गरीबअमीर, चोरीडकैती, किडनी खरीद, बैंक लोन, अपनों को टैंडर देने जैसे छोटे अपराध वैसे ही शुद्ध हो जाते हैं जैसे राम का बालि को पेड़ की आड़ से तीर मारना या भीम का कृष्ण के कहने पर दुर्योधन की जांघ पर गदा वार करना था.

जनता के दबाव में सरकार ने यदि इन बलात्कारों के अपराधियों को गिरफ्तार भी किया है तो वे अपने ‘पुण्यों’ के बल पर जरूर ही किसी न किसी तरह मुक्ति पा जाएंगे, गवाह मुकर जाएंगे, जमानतें मिल जाएंगी, जज बारबार बदल दिए जाएंगे. हमारे पुराणों में ये सब तरकीबें बाकायदा दी गई हैं जो हमारी धार्मिक धरोहर हैं. ये आज भी विधिवत प्रवचनों में, धारावाहिकों में, फिल्मों में, धार्मिक पुस्तकों में दोहराई जाती हैं.

राजनीति करनी है तो भारतीय जनता पार्टी में करो. इसी में सुरक्षा मिलती है. कुसमय में यही किसी शिखंडी को आगे खड़ा कर बचाती है. कांग्रेस में क्या रखा है, वह तो दबाव में झुक जाती है और गुनहगारों को सजा हो जाने देती है. पार्टी सही चुनें जो खाए व खाने दे.

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जिस की बीवी काली…

बीवी काली हो या गोरी, यह एक बहस का मुद्दा न हो कर खोज की बात होनी चाहिए, ऐसा खयाल मेरे एक करीबी दोस्त का है. उस की पिछले दिनों नईनई शादी हुई थी. जब भी वह इस मुद्दे पर बात करता है, काली रंगत की जरूरत से ज्यादा वकालत करता है.

एक बार मैं ने कहा, ‘‘यार, तुम भी कमाल के आदमी हो. सारी दुनिया गोरे रंग पर फिदा है और तुम हो कि कालीकलूटी पर जान छिड़कते हो.’’

इस पर वह दोस्त बोला, ‘‘भाई मेरे, काले रंग के कितने फायदे हैं, क्या तुम्हें मालूम है? काली बीवी पाना या ढूंढ़ कर लाना हमारे परिवार में सदियों से चला आ रहा है.

‘‘जब मेरी शादी की बात चली थी, तो पिताजी ने मुझे लड़की देखने के लिए मना कर दिया था. वह जानते थे कि मैं काली को नकार दूंगा.

‘‘शादी से एक महीना पहले ही मुझे काली लड़की की खूबियां सुनाना शुरू कर दिया गया. इस का नतीजा यह हुआ कि मुझे गोरे रंग से नफरत होने लगी.’’

मैं सोचने लगा कि कहीं यह दोस्त पागल तो नहीं हो गया है. ऐसे खयालों वाले कहीं दोचार और मिल जाएं, तो खूबसूरती का सामान बनाने वालों का दिवाला ही निकल जाएगा.

मैं बोला, ‘‘देख यार, काली बीवी को ब्याह कर घर लाने के बावजूद तुम्हें कोई फायदा तो हुआ नहीं. कहीं ऐसा तो नहीं कि अपना ऐब छिपाने के लिए डींगें हांके जा रहे हो?’’

मेरी बात पर वह दोस्त अपना सीना फुला कर बोला, ‘‘देखो भाई, सब से बड़ा फायदा तो यह है कि रोजरोज के फेस पाउडर, क्रीम वगैरह का झंझट ही खत्म हो गया है. नहाने के लिए किसी खास किस्म के साबुन की जरूरत ही नहीं पड़ती. वह तो कपड़े धोने के साबुन से कपड़ों के साथसाथ खुद को भी धो डालती है. काली रंगत पर कोई भी साड़ी मैच नहीं करती, इसलिए हम जो भी साड़ी खरीद कर ला देते हैं, वह चुपचाप पहन लेती है.

‘‘पार्टी में जाने या सैरसपाटे का सवाल ही नहीं उठता. इन्हें साथ ले जाने के खयाल से ही रूह कांपने लगती है. शादी के समय मेरे ससुर ने काफीकुछ दिया था, क्योंकि इस कोयल से कोई शादी ही नहीं कर रहा था.

‘‘जब भी मैं अपनी ससुराल जाता हूं, तो मेरी इतनी खातिरदारी होती है कि मैं एक दिन की जगह एक महीने तक टिका रहता हूं. वापसी के समय मेरा खाली पर्स नोटों से भरा रहता है.’’

थोड़ी देर के लिए वह दोस्त चुप हो गया और देखने लगा कि मैं उस की बातों पर गौर कर रहा हूं या नहीं.

जब उसे यकीन हो गया कि मैं दिल लगा कर उस की बातें सुन रहा हूं, तो उस ने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘तू मेरा असली दोस्त है. तुझे एक गूढ़ बात बता रहा हूं.

‘‘तुम तो खैर शादी कर चुके हो, इसलिए यह बात तुम्हारे बेटे के काम आएगी.

‘‘जरा सोचो, अगर किसी हसीना के चेहरे पर काला तिल हो, तो वह खूबसूरत कहलाती है और यही तिल सफेद हो, तो वह कोढ़ या सफेद दाग कहलाता है.

‘‘देखा, काले रंग का कमाल. तुम ने भी अमिताभ बच्चन की वह फिल्म तो देखी होगी, जिस में वह गाता है…

‘‘जिस की बीवी काली, उस का भी बड़ा नाम है.

आंखों में लगा लो, सुरमे का क्या काम है.’’

फिर उस दोस्त ने मुझे अपने पास बुलाया. मेरे कान में फुसफुसा कर उस ने कहा, ‘‘काली बीवी का सब से बड़ा फायदा तो यही है कि कोई भी उस से छेड़छाड़ नहीं करता और न ही कोई उसे बहलाफुसला कर भगा ले जाने की जुर्रत करता है.’’

इस तरह उस दोस्त ने मुझे इतनी सारी खूबियां गिनाईं कि मैं दंग रह गया और सोचने लगा कि मैं क्यों गोरी रंगत के चक्कर में पड़ कर उस से शादी कर बैठा. अगर ये सज्जन मुझे शादी से पहले मिले होते, तो यकीनन मैं भी अपनी शादी के लिए कालीकलूटी लड़की ही पसंद करता…

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समांथा के किसिंग सीन पर मचा बवाल

साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री की जानी मानी अभिनेत्रा और सुपरस्टार नागार्जुन की बहू समांथा अक्किनेनी इन दिनों अपनी फिल्म मर्सल और रंगस्थलम की शानदार सफलता का जश्न मना रही हैं. फिल्म को मिली सफलता से उन्हें कई बौलीवुड फिल्मों के औफर भी मिलने लगे हैं. हाल ही में एक हिन्दी समाचार पत्र को दिए अपने इंटरव्यू में समांथा ने अपनी निजी जिंदगी से जुड़े कई राज पर से पर्दा उठाया है.

समांथा ने शादी के बाद फिल्म में किसिंग सीन पर भी बात की. उन्होंने कहा कि फिल्म रंगस्थलम में मैंने लिपलौक नहीं किया. वह बस गाल पर छोटी सी किस थी. मुझे पता है कि उस सीन के लिए लोग मेरी काफी आलोचना कर रहे हैं. मगर मैं पूछना चाहती हूं कि अगर एक शादीशुदा हीरो ऐसा कुछ करता तो क्या तब भी लोग ऐसे ही सवाल पूछते? मुझसे क्यों- सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं एक महिला हूं?’

समांथा अक्किनेनी ने कहा कि उनका परिवार, खासकर ससुर नागार्जुन हमेशा उन्हें सपोर्ट करते हैं. एक एक्टर होने नाते वह भी यह बात समझते हैं कि किस करना सिर्फ मेरे काम का हिस्सा है. समांथा ने कहा कि ससुरालवालों की सपोर्ट की वजह से उन्हें शादी के बाद भी फिल्मों में काम करने में कोई परेशानी नहीं हो रही है.

समांथा ने कई बार बड़ी ही बेबाकी से बोल्ड स्टेटमेंट दिए हैं. समांथा से जब एक दिन संबंध को लेकर सवाल पूछा गया कि आप संबंध और खान में से किसे चुज करेंगी तो उन्होंने बड़ी बेबाकी से जवाब देते हुए कहा था कि वह एक दिन खाने के बगैर रह सकती हैं लेकिन संबंध बनाए बगैर नहीं.

बता दें कि पिछले साल 6 अक्टूबर को हुई नागा चैतन्य और समांथा की शादी सबसे महंगी शादियों में से एक थी. इस शादी में लगभग 10 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे. गोवा में हिंदू रीति-रिवाज से शादी करने के बाद दो रिसेप्शन-चेन्नई और गोवा में हुए थे. शादी के बाद दोनों ने लगभग 40 दिन हनीमून मनाया था.

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हर लड़की फिजिक एथलीट बने : श्वेता राठौड़

उज्बेकिस्तान में हुई ‘49वीं एशियन बौडी बिल्डिंग ऐंड फिजिक चैंपियनशिप’ में भारत की 27 साला श्वेता राठौड़ ने सिल्वर मैडल जीत कर पूरी दुनिया को चौंका दिया. भारत संचार निगम लिमिटेड में अफसर अनिल कुमार की बेटी श्वेता राठौड़ जयपुर की रहने वाली हैं. उन्होंने इंजीनियरिंग की डिगरी हासिल करने के बाद दिल्ली में कई बड़ी कारपोरेट कंपनियों में नौकरी की, पर मुंबई पहुंचने के बाद उन्होंने अपनी इवैंट मैनेजमैंट कंपनी शुरू की. साल 2014 में मुंबई में हुई ‘वर्ल्ड बौडी बिल्डिंग ऐंड फिजिक चैंपियनशिप’ ने श्वेता राठौड़ की जिंदगी बदल दी. आज वे बहुत बड़ी फिजिक सेलेब्रिटी बन चुकी हैं. इस के अलावा श्वेता राठौड़ ‘गौड्स ब्यूटीफुल चाइल्ड आर्गेनाइजेशन’ नामक एनजीओ के जरीए गरीब बच्चों, सिंगल मदर्स व आग से बुरी तरह जली औरतों को नई व बेहतर जिंदगी देने के काम को भी अंजाम दे रही हैं.

पेश हैं, श्वेता राठौड़ के साथ हुई लंबी बातचीत के खास अंश:

इंजीनियरिंग की डिगरी हासिल करने और कारपोरेट जगत में काम करने के बाद सब छोड़ कर फिटनैस जगत से जुड़ने का खयाल आप को कैसे आया

सबकुछ इतना अचानक नहीं हुआ. मैं स्कूल के दिनों से ही अपनी फिटनैस पर ध्यान देती रही हूं. जब मैं 10वीं जमात में पढ़ रही थी, तब से मैं ने जिम जाना शुरू कर रखा है. जिम करने के दौरान ही वेट लिफ्टिंग के प्रति मेरी दिलचस्पी बढ़ी. मैं ने हमेशा एडवांस वर्कआउट ही किया है, पर यह सब 2 साल पहले तक मैं खुद को फिट रखने के लिए करती थी.

‘फिजिक चैंपियन’ बनने का इरादा आप के मन में कैसे आया

साल 2014 में मुंबई के गोरे गांव इलाके में ‘इंडियन बौडी बिल्डिंग एसोसिएशन’ की तरफ से ‘फिजिक ऐंड बौडी बिल्डिंग वर्ल्ड चैंपियनशिप’ कराई गई थी. भारत में पहली बार यह आयोजन हो रहा था. मेरे मन में यह खयाल आ रहा था कि ‘फिजिक एथलीट’ बन कर मैं भी पूरे भारत की औरतों को इस के प्रति जागरूक करूं.

क्या ‘बौडी बिल्डिंग’ और ‘फिजिक एथलीट’ एक ही बात है

नहीं. बिलकुल नहीं. ‘बौडी बिल्डिंग’ और ‘फिजिक एथलीट’ दोनों में जमीनआसमान का अंतर है, पर दोनों प्रतियोगिताएं एकसाथ होती हैं. ‘बौडी बिल्डिंग’ में अपनी मसल्स को जरूरत से ज्यादा उभारना पड़ता है, जबकि ‘फिजिक एथलीट’ फिटनैस के क्षेत्र से जुड़ी हुई है. इस में डेढ़ से 2 मिनट की परफौर्मैंस देनी होती है, जो किसी गाने या डांस पर होती है. इतने कम समय में ही किक, स्लिप, वन हैंड पुशअप समेत जितने भी वर्कआउट होते हैं, करने पड़ते हैं. ‘फिजिक चैंपियनशिप’ में लड़की को फिट दिखना होता है, उस के मसल्स भी दिखने होते हैं, पर उस का औरत वाला रूप नजर आना चाहिए. यानी एक औरत के रूप में उसे खूबसूरत के साथसाथ फिट भी दिखना है. उस का स्टैमिना भी जबरदस्त होना चाहिए, तभी वह विजेता बन सकती है.

‘फिजिक एथलीट’ के रूप में किसी भी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए कितना खर्च आता है

हमारा बहुत खर्चा होता है. हमें एक खास तरह के खानपान के नियम का पालन करना होता है. हमें जिम की लंबीचौड़ी फीस देनी होती है. ट्रेनर को अच्छे पैसे देने पड़ते हैं. एक इंटरनैशनल चैंपियनशिप के लिए खुद को तैयार करने में तकरीबन 9 से 10 लाख रुपए खर्च होते हैं.

यह इतना खर्चीला क्षेत्र है, तो फिर आप इस से क्यों जुड़ीं

मैं फिटनैस के क्षेत्र में लड़कियों को आने के लिए प्रेरित करना चाहती हूं. मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि इंजीनियरिंग में डिगरी लेने व कारपोरेट जगत में अच्छी नौकरी करने के बावजूद मैं फिटनैस फिजिक के क्षेत्र से जुड़ी और भारत का नाम विदेशों में रोशन कर रही हूं.

‘फिजिक एथलीट’ से जुड़ने के लिए सरकार मदद क्यों नहीं करती है

जहां तक सरकार का सवाल है, तो सरकार जागरूक नहीं है. शायद इस की वजह यह रही है कि सरकार के सामने भी फिजिक फिटनैस के रूप में कोई चेहरा अभी तक नहीं आया है. जब मैं ने इस क्षेत्र में काम करना शुरू किया, तब मुझे सहारा देने वाला कोई नहीं था. लेकिन इस क्षेत्र से जुड़ने वाली लड़कियों की मदद करने के लिए हम ने ‘फिटनैस फौर एवर प्राइवेट लिमिटेड’ नामक एक अकादमी शुरू की. हमारी कंपनी उन्हें सही सलाह देने के साथसाथ कोचिंग भी देगी.

आम लड़की को फिट रहने के लिए क्या करना चाहिए

भारतीय औरतों में आयरन व कैल्शियम की कमी होती है, इसलिए इन्हें प्रोटीन वाला भोजन ज्यादा करना चाहिए. उन्हें दाल के साथसाथ हरी सब्जियां लेनी चाहिए. दूध के बने पदार्थ खाने चाहिए. दही बहुत जरूरी है. दही से शरीर के अंदर मैटाबोलिज्म बढ़ता है. पिज्जा, बर्गर जैसे जंक फूड का सेवन कतई नहीं करना चाहिए, बल्कि ब्राउन राइस खाना चाहिए. रोटी खानी है, तो सिर्फ गेहूं की न खाएं, बल्कि गेहूं के साथसाथ चना मिली रोटी खाएं या दूसरे कई अनाजों को मिला कर खाएं. इस के अलावा स्विमिंग या चहलकदमी या फिर साइकिल चलाना भी हर दिन करना चाहिए. जो लोग यह सब नहीं करते हैं, उन के अंदर चिड़चिड़ापन रहता है.

आप अपने एनजीओ ‘गौड्स ब्यूटीफुल चाइल्ड आर्गेनाइजेशन’ के जरीए क्या कर रही हैं

मेरा सारा ध्यान गरीब बच्चों पर है. एनजीओ शुरू करने से पहले मैं ने एक सर्वे किया था कि लोग अपराधी कैसे बनते हैं  90 फीसदी अपराधी बहुत गरीब परिवार से आने वाले लोग होते हैं. मैं ने एक बात को अनुभव किया कि तमाम एनजीओ गरीब बच्चों को मुफ्त में खाना खिला देते हैं या उन्हें स्कूल में पढ़ने भेज देते हैं. पर मैं अपने एनजीओ के जरीए गरीब बच्चों की पर्सनैलिटी को निखारने का काम कर रही हूं. इतना ही नहीं, हमारी संस्था सिंगल मदर्स की भी मदद कर रही है. मैं ने 10 ऐसी जरूरतमंद औरतों का इलाज करा कर उन्हें उन के पैरों पर खड़ा कराया, जो किसी हादसे में बुरी तरह से जल गई थीं.

VIDEO : समर स्पेशल कलर्स एंड पैटर्न्स विद द डिजिटल फैशन

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अंधविश्वास : मृत्युभोज में भी पंडों की मौज

गांव वालों के उस समूह में चर्चा का मुद्दा ऐसा था, जो पंडेपुजारियों के धंधे पर सीधे चोट करने वाला था. वे लोग तय कर रहे थे कि मृत्युभोज की सामाजिक बुराई को खत्म किया जाए. इस से लोगों पर दोहरी मार पड़ती है. वे पंडों का तो पेट भरते ही हैं, उन्हें आडंबरों का शिकार भी होना पड़ता है. प्रियजनों को खोने वालों के लिए ऐसी प्रथा मृत्युभोज न हो कर ‘मृत्युदंड’ बन जाती है.

घंटों हुई चर्चा के बाद आखिर में यह तय किया गया कि इस बुराई के खिलाफ सामाजिक आंदोलन छेड़ा जाएगा. गांव में न तो कोई किसी पंडे के कहने पर मृत्युभोज देगा और न ही कोई उस में शामिल होगा. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के विकासखंड धनीपुर इलाके में ऐसी बुराई के खिलाफ खड़ा हो रहा आंदोलन मौत के बाद परिजनों को तरहतरह के धार्मिक कर्मकांडों और डर दिखा कर जेबें भरने वाले पंडेपुजारियों को भले ही नागवार गुजरे, लेकिन सोचविचार के बाद 24 जनवरी को गांव वालों ने जो सामूहिक फैसला किया, उस की तारीफ भी हो रही है.

3 दर्जन से ज्यादा गांवों में इस प्रथा को लोग खुद ही खत्म कर देना चाहते हैं. वे शपथ ले रहे हैं कि न तेरहवीं में खाएंगे और न किसी को खिलाएंगे. दरअसल, किसी की मौत होने के बाद कर्मकांडी पंडेपुजारियों के कहने पर सामाजिक व धार्मिक परंपरा के नाम पर अनापशनाप पैसे खर्च होते हैं. दूसरे शब्दों में कहें, तो अंतिम संस्कार से ले कर तेरहवीं तक कमाई करने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा जाता है. दुख की बात तो यह है कि लोगों को मुंह भरने के लिए ऐसी प्रथाओं को निभाना पड़ता है. कोढ़ में खाज तब और बढ़ जाती है, जब बीमारी से किसी की मौत हो. इलाज कराने के खर्चों से ही परिवार खोखला हो चुका होता है. इस के बाद कर्मकांडियों का पेट भी भरना पड़ता है. गरीब आदमी सामाजिक व धार्मिक परंपरा निभाने के चक्कर में और भी गरीब हो जाता है.

हजामत कर के पेट पालने वाले दीपक का सामना कुछ ऐसे ही हालात से हुआ. उस के परिवार में एक साल में एक के बाद एक 3 मौतें हुईं. मां बीमार थीं. इलाज के दौरान डाक्टरों ने भी अपनी कमाई करने का पूरा फर्ज निभाया. हालात ऐेसे हुए कि मकान भी बेचना पड़ा. किसी तरह इलाज तो कराया, लेकिन बचा नहीं सके. उस के एक भाई की मौत एक हादसे में हो गई, जबकि दूसरे ने जिंदगी से दुखी हो कर खुदकुशी करने जैसा कदम उठा लिया था. दीपक बताता है कि 3 मौतों के बाद में होने वाली प्रथाओं के खर्चों में वह इतना टूट गया कि किसी तरह अब जिंदगी को संभाले हुए है. परिवार के सदस्य दिनरात मेहनत कर के किसी तरह कर्ज चुका रहे हैं. ऐसे मौके पर खर्च के मामले में जब पैसे की जरूरत होती है, तो नातेरिश्तेदार भी हाथ खींच लेते हैं.

किसी की मौत के बाद जब उसे गंगा घाट पर अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जाता है, तो पंडों को जिमाने के साथ समूह में साथ जाने वाले लोगों को वहीं खाना खिलाया जाता है. इस के लिए होटल, ढाबे बने होते हैं, जो आमतौर पर पूरीकचौड़ी, 2 सब्जी बनाते हैं. एक थाली की कीमत 40 से 60 रुपए तक होती है. तैयार पूरीसब्जियों के रेट भी तय होते हैं. हजारों रुपए का खर्च तो वहां खाना खिलाने में हो चुका होता है. इस के बाद किसी अपने की मौत का दर्द झेल रहे परिवार द्वारा तेरहवीं की रस्म अदा की जाती है, उन्हें दक्षिणा और दान किया जाता है. कर्मकांडों को मरने वाले के परिवार वालों से दान के नाम पर फोल्डिंग, खाट, बिस्तर, तकिया, पहनने के कपड़े, जूताचप्पल, 5, 11 या 21 बरतन का सैट, नहाने की बालटी समेत गेहूंचावल वगैरह दान में चाहिए होता है. अगर कोई शराब का शौकीन रहा हो, तो उसे अच्छे किस्म की बोतल दान करने की सलाह दी जाती है. इस सामाजिक बुराई को खत्म करने की सलाह कोई नहीं देता.

इस के बाद सभी गांव, पड़ोस, महल्ले के लोगों, जानपहचान वालों व रिश्तेदारों को जिमाया जाता है. देहात व पिछड़े इलाकों में ऐसे मौकों पर तो मेहमानों को शराब पिलाने कीपरंपरा भी देखी गई है. मौत के बाद धार्मिक परंपराओं पर होने वाले खर्चों का दौर यहीं नहीं थमता. साल में पड़ने वाले कुछ मौकों पर भी दान की परंपरा है. साधारण परिवारों की माली हालत ऐसी होती है कि वह बेचारे कर्ज ही चुका रहे होते हैं. न वे मौत भूलते हैं, न उस की कर्जदार करने वाली परंपराएं. कर्मकांड करने वाले पंडितों को इन बातों से कोई मतलब नहीं होता है. पिछड़े इलाकों में तो गरीबों को साहूकारोंसूदखोरों से कर्ज ले कर यह सब करना पड़ता है. सामाजिक तौर पर भी उसे यह परंपरा निभाने के लिए मजबूर किया जाता है. यह माना जाता है कि अगर कोई तेरहवीं कर के लोगों को भोज नहीं कराएगा, तो समाज क्या कहेगा. पापपुण्य का कुचक्र चलाया जाता है.

यह गरीबों के यहां ही होता हो, ऐसा नहीं है. समाज का कोई तबका इस से अछूता नहीं है, बल्कि तेरहवीं को भी अब बड़े आयोजनों के रूप में किया जाता है, जैसे कोई उत्सव हो. जिस की तेरहवीं में ज्यादा पकवान बनते हैं, ज्यादा लोग जुटते हैं, उसे ऊंचे दर्जे का आदमी समझा जाता है. कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठाने वाले क्षत्रिय महासभा से जुड़े योगेंद्र पाल सिंह कहते हैं, ‘‘ऐसा आयोजन लोगों के लिए मृत्युदंड बन जाता है. इस कुप्रथा को लोगों को खत्म करना चाहिए. बहुत से लोग ऐसी सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए सामाजिक आंदोलन में शामिल हो रहे हैं.’’

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पुलिस अधिकारी की मर्डर मिस्ट्री

आखिर महाराष्ट्र हाईकोर्ट और मीडिया के सक्रिय होते ही 18 महीने बाद महाराष्ट्र के नवी मुंबई, कलंबोली पुलिस थाने के अफसरों ने 7 दिसंबर, 2017 की शाम को करीब 8 बजे अपने विभाग के शातिर और ऊंची पहुंच वाले अफसर अभय कुरुंदकर को उस के मीरा रोड स्थित घर से गिरफ्तार कर लिया.

अभय कुरुंदकर जिला ठाणे, पालघर के नवघर पुलिस थाने में बतौर इंचार्ज तैनात था. उस पर अपने ही विभाग की एक महिला अधिकारी अश्विनी बेंद्रे के अपहरण और हत्या जैसे गंभीर आरोप थे. अश्विनी बेंद्रे नवी मुंबई कोमोठे स्थित ह्यूमन राइट्स कमीशन औफिस में असिस्टेंट पुलिस इंसपेक्टर के रूप में तैनात थी.

25 वर्षीय अश्विनी राजू बेंद्रे मूलरूप से कोल्हापुर, तालुका आंधले, गांव हातकणगे की रहने वाली थी. वह 2007 के बैच की पुलिस अधिकारी थी. उस के पिता 1988 में आर्मी से रिटायर होने के बाद काश्तकारी में व्यस्त हो गए थे. परिवार में उन की पत्नी के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा था. शिक्षा के साथ अश्विनी बेंद्रे हर काम में अपने छोटे भाई आनंद बेंद्रे और छोटी बहन से होशियार थी. चूंकि पिता आर्मी से थे, इसलिए वह बेटी की रुचि को देखते हुए उसे आर्मी या पुलिस सेवा में भेजना चाहते थे.

10वीं तक की शिक्षा अपने गांव के स्कूल से पूरी करने के बाद अश्विनी आगे की पढ़ाई के लिए अपने मामा के घर कोल्हापुर आ गई थी. उस के मामा कोल्हापुर में पुलिस अधिकारी थे. बीकौम करने के बाद वह एमपीएससी की तैयारी में जुट गई थी, लेकिन परीक्षा में शामिल होने से पहले ही उस के मातापिता ने राजकुमार उर्फ राजू गोरे से उस की शादी तय कर दी. 2005 में अश्विनी बेंद्रे विदा हो कर अपनी ससुराल चली गई.

सीधे और सरल स्वभाव का राजू गोरे अश्विनी बेंद्रे जैसी सुंदर पत्नी को पा कर बहुत खुश था. उसे जब यह मालूम हुआ कि अश्विनी बेंद्रे के मातापिता की इच्छा और अश्विनी की इच्छा पुलिस सेवा जाने की थी तो राजू गोरे ने पत्नी की इस इच्छा को पूरा करने के लिए हरसंभव सहयोग करने को कहा. पति के सहयोग से अश्विनी बेंद्रे ने एमपीएससी की परीक्षा में भाग लिया. यह परीक्षा उस ने अच्छे अंकों से पास की. इसी दौरान वह एक बेटी की मां भी बन गई.

नासिक में 6 माह की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद अश्विनी बेंद्रे की पहली नियुक्ति पुणे में सबइंसपेक्टर के पद पर हुई थी. उस के बाद उसे सांगली के पुलिस मुख्यालय में तैनात कर दिया गया था. सांगली मुख्यालय में अश्विनी बेंद्रे को अभी कुछ महीने ही हुए थे कि उस का ट्रांसफर सांगली की लोकल क्राइम ब्रांच में कर दिया गया, जहां उस की मुलाकात पीआई अभय कुरुंदकर से हुई. अभय कुरुंदकर एक शातिरदिमाग अफसर था.

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भले ही अफसर हो, अकेली औरत कई बार शातिर लोगों के जाल में फंस जाती है

अश्विनी बेंद्रे उस वक्त अपनी भावनाओं को दबाए पति से दूर अकेले ही जिंदगी का सफर तय कर रही थी. वैसे तो अश्विनी बेंद्रे एक सशक्त महिला थी. लेकिन पीआई अभय कुरुंदकर के फेंके गए जाल में वह बड़ी आसानी से फंस गई.

पीआई अभय कुरुंदकर मूलरूप से कोल्हापुर जिले के कराड़ गांव का रहने वाला था. उस का बचपन गरीबी और संघर्षों में बीता था. उस के बचपन में ही पिता का निधन हो गया था. परिवार में मां के अलावा 2 भाई और एक बहन थी. पिता के निधन के बाद जब परिवार वालों ने गांव से निकाल दिया तो मां अपने तीनों बच्चों को ले कर आजरा गांव में अपनी बहन के यहां रहने लगी थी. मेहनतमजदूरी कर के उन्होंने अपने तीनों बच्चों की परवरिश की.

दोनों भाई पढ़ाईलिखाई में जितने होशियार थे, उतने ही मेहनती भी थे. वे पूरा मन लगा कर पढ़ाई करते थे और बाकी समय में मां का हाथ बंटाते थे. उन के गांव के सारे दोस्त शराब, जुआ और राहजनी जैसे अपराधों में लिप्त रहते थे लेकिन ये दोनों भाई इन चीजों से दूर रहते थे. आखिरकार दोनों की मेहनत और पढ़ाई रंग लाई और दोनों भाइयों को पुलिस विभाग में नौकरी मिल गई.

पुलिस में नौकरी लग जाने के बाद अभय कुरुंदकर जब अपने पुश्तैनी घर और गांव गया तो पता चला कि उस के चचेरे भाइयों ने उस की पुश्तैनी जमीन पर कब्जा कर लिया है. इतना ही नहीं, उन्होंने उस के पिता की सारी संपत्ति भी अपने नाम करवा ली थी.

यह जान कर अभय कुरुंदकर काफी आहत हुआ, लेकिन उस ने अपने मन ही मन तय कर लिया था कि खूब पैसा कमा कर वह अपना घर अपने पुश्तैनी गांव में ही बनवाएगा. और उस ने ऐसा ही किया भी. उस ने पुलिस विभाग में अपना कद बढ़ाना शुरू किया. इस काम में उसे कामयाबी भी मिली. शीघ्र ही उस की पैठ कुछ बड़े अधिकारियों और राजनीतिज्ञों तक हो गई थी

तत्कालीन मंत्री एकनाथ खड़से के भांजे ज्ञानेश्वर पाटिल उर्फ राजेश पाटिल से अभय कुरुंदकर की गहरी दोस्ती हो गई थी. कानून और राजनीति के बीच दोस्ती होने के कारण अभय कुरुंदकर ने गैरकानूनी काम करने शुरू कर दिए. वह दोनों हाथों से पैसे कमाने लगा. वह अपनी पहुंच का फायदा उठा कर अपना ट्रांसफर उन थानों में कराता रहा, जहां अच्छी कमाई होती थी.

अभय कुरुंदकर ने थोड़े ही दिनों में इतना पैसा कमा लिया कि उस ने अपने गांव में 6 बिस्वा जमीन खरीद कर एक आलीशान घर बनवाया. उस मकान में उस का परिवार रहने लगा. इस के अलावा उस ने आजरा के आंबोली गांव में 7 एकड़ जमीन ले कर अपना फार्महाउस बनवाया. इस बीच उस का प्रमोशन और ट्रांसफर होते रहे.

29 मई, 2006 को उस का प्रमोशन कर के उसे कुछ दिनों के लिए कमिश्नर औफिस के नियंत्रण कक्ष भेज दिया गया. लेकिन अपनी पहुंच के कारण उस ने एक महीने के अंदर ही अपना ट्रांसफर कुपवाड़ा में करवा लिया. यहां पर वह लगभग ढाई साल रहा. यहीं से प्रमोशन पा कर वह मिर्ज के ट्रैफिक विभाग में चला गया.

2 जून, 2010 में अभय कुरुंदकर की बदली स्थानीय आर्थिक अपराध शाखा में पीआई के पद पर कर दी गई. यहीं पर अभय कुरुंदकर की मुलाकात एपीआई अश्विनी बेंद्रे से हुई और वह उस का पहली ही नजर में उस का दीवाना हो गया. कुछ ही दिनों में उसे अश्विनी बेंद्रे की कमजोरी पता लग गई.

वह उन दिनों जिस वियोग की ज्वाला में जल रही थी, उस पर अभय कुरुंदकर ने धीरेधीरे मरहम लगाना शुरू किया. उस का मरहम काम कर गया. दोनों को जब मालूम हुआ कि वह एक ही जिले के रहने वाले हैं तो नजदीकियां और बढ़ गईं. धीरेधीरे उन के बीच गहरी दोस्ती हो गई थी.

भ्रष्ट अफसर की सोच हमेशा गलत ही चलती है

उन दिनों अश्विनी बेंद्रे सांगली से रोजाना अपनी ड्यूटी के लिए अपडाउन किया करती थी, जिस के कारण उन्हें काफी परेशानी होती थी. अभय कुरुंदकर ने सहानुभूति दिखाते हुए क्राइम ब्रांच औफिस के करीब ही यशवंतनगर में अपनी पहचान के एक राजनैतिक कार्यकर्ता की मदद से अश्विनी बेंद्रे को एक मकान किराए पर दिलवा दिया और खुद भी पास के विश्राम बाग में रहने लगा. कुरुंदकर को सरकारी गाड़ी मिली हुई थी, लेकिन वह सरकारी गाड़ी का उपयोग न कर के अपनी खुद की कार से औफिस आताजाता था. वह अश्विनी को भी अपने साथ कार में बिठा कर औफिस ले आता था.

अपने से 14 साल छोटी अश्विनी बेंद्रे को 55 वर्षीय पीआई अभय कुरुंदकर ने बड़ी ही चतुराई से अपने प्रेमजाल में उलझा लिया था. शादी का वादा कर वह उस की भावनाओं से खेलने लगा. जबकि वह स्वयं एक शादीशुदा और 2 बेटोंबेटियों का पिता था. उधर अश्विनी बेंद्रे एक बच्ची की मां होते हुए भी परकटे परिंदे की तरह पीआई अभय कुरुंदकर की बांहों में गिर गई.

धीरेधीरे वह अपने पति राजू गोरे से विमुख होने लगी. कह सकते हैं कि वह अभय कुरुंदकर के साथ जिंदगी के नए ख्वाब देखने लगी थी. इस बात की जानकारी जब राजू गोरे को हुई तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. पहले तो राजू गोरे को इस बात का यकीन ही नहीं हुआ, क्योंकि वह अपनी पत्नी को काफी समझदार और सुलझी हुई मानता था, लेकिन जब सच्चाई सामने आई तो राजू गोरे और परिवार वालों के होश उड़ गए थे.

पहले तो राजू गोरे और अश्विनी बेंद्रे के परिवार वालों ने अश्विनी को काफी समझाया, लेकिन वह पीआई अभय कुरुंदकर  के प्यार में डूबी हुई थी. इसलिए उस पर ससुराल वालों की बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा. वह अभय कुरुंदकर से लवमैरिज करने के लिए तैयार थीं. बेटी पर मां के भटकने का कोई प्रभाव न पड़े, इसलिए राजू गोरे उस के पास से अपनी बेटी को ले गया. बेटी के जाने के बाद अश्विनी पूरी तरह आजाद हो गई.

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वह अपने प्रेमी अभय कुरुंदकर के साथ ही रहने लगी. उस के साथ वह खुश थी लेकिन उस की यह खुशी अधिक दिनों तक कायम नहीं रही. उसे शीघ्र ही इस बात का पता चल गया कि वह चालाक और मक्कार किस्म का व्यक्ति है. उस का प्यार और शादी का वादा केवल एक छलावा था. शादी के नाम से वह चिढ़ जाता था. कभीकभी तो वह अश्विनी बेंद्रे से मारपीट तक कर बैठता था. अश्विनी के विरोध करने पर वह उसे और उस के पति को गायब करवा देने की धमकियां देता था.

अभय कुरुंदकर टौर्चर करता था अश्विनी बेंद्रे को

सन 2013 में अश्विनी बेंद्रे को अभय कुरुंदकर के टौर्चर से थोड़ी राहत तब मिली, जब अश्विनी का ट्रांसफर रत्नागिरि हो गया. अभय कुरुंदकर भी ठाणे जिले के पालघर स्थित नवघर पुलिस थाने में चला गया. इस के बावजूद अभय कुरुंदकर ने अश्विनी का पीछा नहीं छोड़ा. उसे जब भी मौका मिलता, वह उस के पास पहुंच जाता था और उसे परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था.

अपने रसूख के दम पर वह अश्विनी और उस के परिवार के साथ कुछ भी कर सकता था. उस के डर से अश्विनी ने उस के खिलाफ सारे सबूत इकट्ठे करने शुरू कर दिए. अपने घर सीसीटीवी कैमरा भी लगवा लिया, जिस का सारा रिकौर्ड वह अपने लैपटाप में रखने लगी थी.

पालघर के नवधर पुलिस थाने में डेढ़ साल तक रहने के बाद अभय कुरुंदकर ने अपनी बदली क्राइम ब्रांच में करा ली थी. अब वह फिर से अश्विनी बेंद्रे के करीब आ गया था. अश्विनी उस के व्यवहार से तंग थी. वह उस से दूर रहने की कोशिश करने लगी. प्रमोशन होने के बाद वह भी एपीआई बन चुकी थी.

सन 2016 में अश्विनी बेंद्रे ने अपना ट्रांसफर ठाणे के नवी मुंबई कलंबोली स्थित कामोठे के ह्यूमन राइट्स कमीशन में करा लिया था. वह अपने परिवार वालों के बीच लौट आई थी. यह बात पीआई अभय कुरुंदकर को हजम नहीं हुई. वह अश्विनी से चिढ़ गया. इस का नतीजा यह हुआ कि एक दिन अचानक अश्विनी गायब हो गई.

18 अप्रैल, 2016 को अश्विनी बेंद्रे ने अपने परिवार वालों के साथ बाहर खाना खाने का प्रोग्राम बनाया. परिवार वाले उस का इंतजार करते रहे लेकिन वह नहीं आई. इस बीच उस का फोन भी बंद हो गया. लेकिन परिवार वालों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. उन का मानना था कि वह किसी इमरजेंसी काम में फंस गई होगी. लेकिन 15 दिनों के बाद घर वालों के पास ह्यूमन राइट्स कमीशन के औफिस से फोन आया. उन्होंने बताया कि अश्विनी बेंद्रे अपनी ड्यूटी पर नहीं आ रही है.

औफिस से अश्विनी के गायब होने की जानकारी मिलते ही पूरे परिवार में हड़कंप मच गया. अश्विनी बेंद्रे के पिता ने तुरंत नवी मुंबई कलंबोली पुलिस थाने में फोन कर के अश्विनी बेंद्रे की गुमशुदगी की सूचना दे दी.

उन्होंने कहा कि उन की पत्नी अस्पताल में भरती है और वह खुद थाने आने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए उन की बेटी की गुमशुदगी दर्ज कर के जरूरी काररवाई की जाए. यह जानकारी उन्होंने अपने बेटे आनंद बेंद्रे को भी दे दी. आनंद तुरंत अपनी गुमशुदा बहन की तलाश में जुट गया.

आनंद को उस की बहन अभय कुरुंदकर की ज्यादती के बारे में बताती रहती थी, इसलिए उस ने सीधेसीधे पीआई अभय कुरुंदकर पर बहन का अपहरण कर के उस की हत्या करने की आशंका जाहिर की. वह उस के खिलाफ सबूत भी इकट्ठा करने लगा. उस ने लैपटाप में रिकौर्डिंग और अन्य सबूत पुलिस को मुहैया करा दिए. चूंकि अभय कुरुंदकर पीआई था, इसलिए उस ने अपने प्रभाव से डेढ़ साल तक मामले को लटकवाए रखा.

ऊंची राजनीतिक पहुंच की वजह से अभय कुरुंदकर अपने वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों को भी नहीं मानता था. वह अपने मन की करता था. 2010 से 2013 के बीच पीआई अभय कुरुंदकर आर्थिक अपराध शाखा में रहा था, तब उस ने कई मामलों की गोपनीय जानकारी लीक कर दी थी. इस बात की जानकारी जब तत्कालीन डीसीपी दिलीप सावंत को हुई तो उन्होंने 9 मई, 2013 को अभय के खिलाफ कोल्हापुर के स्पैशल डीजीपी और डीजीपी को जांच के लिए एक रिपोर्ट भेजी. लेकिन उस का कोई असर नहीं हुआ था.

पीआई अभय कुरुंदकर की जांच होने के बजाय उस का ट्रांसफर सांगली के तांसगांव थाने में कर दिया गया. लेकिन वह वहां नहीं गया बल्कि तत्कालीन गृहमंत्री आर.आर. पाटील से मिल कर अपना ट्रांसफर रद्द करवा लिया. डीसीपी दिलीप सावंत के बारबार यह रिपोर्ट देने के बावजूद पीआई अभय कुरुंदकर द्वारा विभाग की महत्त्वपूर्ण जानकारी बाहर जाती रही. उस के खिलाफ कोई काररवाई नहीं हुई.

मामला एक सीनियर पुलिस अफसर का था, अत: कलंबोली के थानाप्रभारी पोकरे ने इसे गंभीरता से लिया. उन्होंने उस की जांच शुरू कर दी. उन्होंने काफी हद तक इस मामले को हल भी कर लिया था, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों के सहयोग के बिना मामला आगे नहीं बढ़ सका. 3 महीने का समय निकल जाने के बाद जब केस की जांच आगे नहीं बढ़ी तो अश्विनी बेंद्रे के घर वाले परेशान हो गए.

16 सितंबर, 2016 को आनंद बेंद्रे ने बहनोई राजू गोरे के साथ नवी मुंबई के कमिश्नर हेमंत नगराले से मुलाकात की. जरूरी काररवाई करने का आश्वासन देने के बजाय कमिश्नर हेमंत नगराले ने उन्हें यह कह कर डराया कि उन की जान को खतरा है, वे संभल कर रहें.

पुलिस कमिश्नर से उन्हें इस तरह की उम्मीद नहीं थी. उन की बातों से साफ जाहिर हो रहा था कि इस मामले को ले कर पुलिस गंभीर नहीं है. उन के इस रवैए से निराश हो कर अश्विनी बेंद्रे के घर वालों ने 8 अक्तूबर, 2016 को अदालत का दरवाजा खटखटाया.

अदालत का आदेश भी नहीं माना पुलिस ने

28 अक्तूबर, 2016 को अदालत ने पुलिस को आदेश दिया कि मामला काफी संगीन है, इस की जांच डीसीपी रैंक के अधिकारी से करवाई जाए. अदालत की पहल पर मामला डीसीपी पोखरे को सौंप दिया गया. डीसीपी पोखरे ने एसीपी राजकुमार चाफेकर के साथ मामले की जांच तो की, लेकिन उस पर कोई काररवाई नहीं हुई और देखतेदेखते 2 महीने गुजर गए. मामला ज्यों का त्यों रहा.

पहली जनवरी, 2017 को अदालत ने पुलिस प्रशासन को फटकार लगाते हुए मामले की जांच के लिए एसीपी प्रकाश निलेवाड़ की देखरेख में एक स्पैशल टीम गठित करने को कहा और पूछा कि मामले से संबंधित औडियो वीडियो का रिकौर्ड होने के बाद भी काररवाई क्यों नहीं की गई.

अदालत के आदेश पर एसीपी प्रकाश निलेवाड़ ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच की जिम्मेदारी पीआई संगीता अलफांसो को सौंप दी. पीआई संगीता अलफांसो ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया. उन्होंने एक महीने की जांच के बाद 31 जनवरी, 2017 को अश्विनी बेंद्रे के अपहरण का मामला दर्ज कर लिया.

इस के पहले कि पीआई संगीता अलफांसो अश्विनी बेंद्रे के अपहर्त्ताओं पर कोई काररवाई करतीं, पीआई अभय कुरुंदकर को अपनी गिरफ्तारी का अहसास हो गया और फरवरी, 2017 में वह अदालत चला गया, जिस की वजह से मामले में रुकावट आ गई. जब तक अदालत का कोई आदेश आता, तब तक पीआई संगीता अलफांसो का ट्रांसफर हो गया. उन के जाने के बाद इस मामले की जांच 9 महीने के लिए फिर अटक गई. अभय कुरुंदकर ने अदालत में यह अरजी लगाई कि उस के ऊपर लगाए गए सारे आरोप झूठे और बेबुनियाद हैं. उसे साजिश के तहत फंसाया जा रहा है.

पीआई संगीता अलफांसो के ट्रांसफर के बाद एक बार फिर अश्विनी बेंद्रे के परिवार वालों का धैर्य टूट गया. 9 महीने के इंतजार के बाद इस बार उन्होंने मीडिया से संपर्क किया. पहले तो 15 दिनों तक मीडिया में कोई हलचल नहीं हुई.

मीडिया ने बदला केस का रुख

16 जनवरी, 2017 को इलैक्ट्रौनिक मीडिया ने अश्विनी बेंद्रे के साथ पीआई अभय कुरुंदकर द्वारा मारपीट का एक वीडियो वायरल कर पूरे देश में सनसनी फैला दी. दूसरे दिन प्रिंट मीडिया ने भी इसे सुर्खियों में छापा. इस के बाद तो यह मामला हाईप्रोफाइल हो गया और प्रशासन में हड़कंप मच गया.

सवालों के जवाबों में नवी मुंबई पुलिस कमिश्नर हेमंत नगराले को झूठ बोलना पड़ा. उन्होंने एक प्रैस नोट जारी कर मामले को झूठा और बेबुनियाद बता दिया. पुलिस कमिश्नर के इस बयान पर अदालत नाराज हो गई, जिस के चलते एसीपी प्रकाश निलेवाड़ ने पीआई संगीता अलफांसो द्वारा तैयार की गई जांच रिपोर्ट के आधार पर पीआई अभय कुरुंदकर को औन ड्यूटी और उस के साथ ज्ञानेश्वर पाटिल को 8 दिसंबर, 2017 को हिरासत में ले लिया.

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पीआई संगीता अलफांसो ने अपनी रिपोर्ट में ज्ञानेश्वर पाटिल उर्फ राजेश पाटिल उर्फ राजू पाटिल को पीआई अभय कुरुंदकर का सहयोगी बताया था. राजू पाटिल अभय कुरुंदकर  के हर अच्छेबुरे काम में उस के साथ रहता था. ज्ञानेश्वर पाटिल तत्कालीन मंत्री एकनाथ खड़से का भांजा था. वह जिला जलगांव, तालुका भुसावल के गांव तलवेल का रहने वाला था. एक बिजनैसमैन के अलावा वह वहां के भाजपा युवामोर्चा का नेता था.

हकीकत आ ही गई सामने

जिस दिन अश्विनी बेंद्रे गायब हुई थी, उस दिन अश्विनी और राजू पाटिल के मोबाइल फोन की लोकेशन साथसाथ मीरा रोड की थी. अभय कुरुंदकर का मकान भी मीरा रोड पर ही था. इस से मामला स्पष्ट था कि घटना मीरा रोड पर अभय के मकान में घटी थी और सबूत भायंदर खाड़ी में ले जा कर नष्ट किया गया था.

पीआई संगीता अलफांसो ने जब थाने में उस से पूछताछ की तो उस ने अपना गुनाह तो स्वीकार नहीं किया, लेकिन उस का बयान भी विश्वसनीय नहीं था. उस ने बताया कि जिस दिन अश्विनी गायब हुई थी, उस दिन वह मुंबई के अंधेरी स्थित एक होटल में अपने दोस्तों के साथ बैठ कर शराब पी रहा था.

इस के बाद वह खाना खाने के लिए बाहर निकला था. लेकिन कोई अच्छा होटल न मिलने के कारण वह अपने दोस्त पीआई अभय कुरुंदकर के घर चला गया था. अभय कुरुंदकर के विषय में पीआई संगीता अलफांसो को जो बात मालूम पड़ी थी, वह सीधे पीआई के खिलाफ जा कर अश्विनी बेंद्रे की हत्या की तरफ इशारा कर रही थी.

भायंदर खाड़ी के मछलीमारों ने पीआई संगीता अलफांसो को बताया था कि पीआई अभय कुरुंदकर लगभग एकडेढ़ साल पहले अकसर सुबहसुबह इधर आते थे. उन से वह किसी महिला के शव के बारे में पूछताछ किया करते थे. उन का कहना था कि वह एक महिला की गुमशुदगी की जांच कर रहे हैं. यदि उस महिला की उन्हें डेडबौडी मिले तो पहले उन से संपर्क करें.

एक बात और यह पता चली कि अश्विनी बेंद्रे के गायब होने के दूसरे दिन ही अभय कुरुंदकर ने अपने मकान की पुताई करवाई थी. अपनी फोक्सवैगन कार को भी उन्होंने अपने मकान से हटवा दिया था. अदालत के आदेश पर जब पीआई संगीता अलफांसो ने अभय कुरुंदकर के मकान की जांच की तो उन्हें दीवारों पर काले रंग के कुछ धब्बे नजर आए, जो पुताई के बाद भी पूरी तरह से दबे नहीं थे. उन्हें खुरचवा कर डीएनए टेस्ट के लिए सांताकु्रज की लैब में भेज दिया गया. उस की रिपोर्ट आने के बाद ही पता लगेगा कि वे खून के छींटे किस के हैं.

पीआई अभय कुरुंदकर की गिरफ्तारी के बाद जांच अधिकारी ने अश्विनी बेंद्रे के मामले से जुड़ी संदिग्ध लाल रंग की फोक्सवैगन कार नंबर एमएच10ए एन5500 भी खोज निकाली. यह कार सांगली घामड़ी रोड के जिम्नेश्वर कालोनी में रहने वाले रमेश चारुदत्त जोशी के नाम रजिस्टर थी. पुलिस टीम को अश्विनी बेंद्रे द्वारा लिखा गया एक नोट भी मिला, जिस में लिखा था, ‘मेरे हाथपैर तोड़ने और मुझे मार कर तुम्हारी मनोकामना पूरी हो जाएगी.’

ऐसे कई सबूत थे, जो अभय कुरुंदकर को अश्विनी बेंद्रे के मामले में दोषी ठहरा रहे थे. लेकिन इस के बाद भी अभय कुरुंदकर अपना अपराध स्वीकार नहीं कर रहा था. उस का कहना था कि वह इस मामले में निर्दोष है. जांच टीम ने परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर उस के और ज्ञानेश्वर पाटिल उर्फ राजू पाटिल के खिलाफ भादंवि की धारा 323, 364, 497, 506(2), 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. धारा 302 डीएनए रिपोर्ट आने के बाद जोड़ दी जाएगी.

लेकिन इस के पहले पीआई अभय कुरुंदकर और ज्ञानेश्वर पाटिल उर्फ राजू पाटिल का इकबालिया बयान जरूरी है. इस के लिए पुलिस टीम ने अदालत से उन के नारको टेस्ट की इजाजत मांगी है, जिस पर उन के वकीलों ने ऐतराज किया है. बहरहाल, मामला अदालत में विचाराधीन है. दोनों आरोपी कथा लिखने तक सलाखों के पीछे थे.

पीआई अभय कुरुंदकर की गिरफ्तारी से एपीआई अश्विनी बेंद्रे के घर वालों को इंसाफ की आशा जागी है लेकिन मामला इतना लंबा खिंचा, इस बात का जिम्मेदार उन्होंने नवी मुंबई पुलिस कमिश्नर हेमंत नगराले को ठहराया है. उन्होंने प्रैस वार्ता कर के उन पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें भी सहअभियुक्त बनाने की मांग की है.

उन का कहना है कि पीआई अभय कुरुंदकर ने अपने पद का दुरुपयोग किया और तफ्तीश में सहयोग नहीं किया. इतना ही नहीं, उन्होंने जांच अधिकारी का ट्रांसफर कर अभियुक्त को बचाने की कोशिश की. यह एक ऐसा प्रश्न है जिस का जवाब उन्हें आने वाले समय में देना पड़ सकता है.

– कथा जनचर्चा और समाचार पर आधारित है

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कुंवारे थे, कुंवारे ही रह गए

हरियाणा के जिला सोनीपत के खरखौदा स्थित दिल्ली चौक पर अकसर गहमागहमी रहती है, लेकिन 27 दिसंबर को वहां कुछ अलग ही माहौल था. 40 से ज्यादा युवा और अधेड़ सजेधजे वहां इधरउधर टहल रहे थे. इन में किसी के हाथों पर मेंहदी लगी थी तो किसी के सिर पर सेहरा था. इन में से कुछ ऐसे लड़के भी थे, जिन्होंने ब्यूटीपार्लर जा कर फेशियल भी करवाया था, ताकि उन का चेहरा खूबसूरत लगे.

ज्यादातर क्लीनशेव्ड थे, वे चाहे अधेड़ थे या युवा. सभी के चेहरे खुशी से दमक रहे थे. उन के हावभाव और हरकतें देख कर यही लगता था कि इन्हें किसी का बेसब्री से इंतजार है. इन के साथ उन के एक या दो रिश्तेदार भी थे. सभी लोग दिल्ली की ओर से आने वाले वाहनों को टकटकी लगाए देख रहे थे.

दरअसल, ये सभी दूल्हे थे, जिन की शादी होनी थी. इन दूल्हों और उन के घर वालों से कहा गया था कि सुबह 9 बजे तक दिल्ली से एक बस आएगी, जिस में बैठ कर दूल्हों और उन के एकएक रिश्तेदार को दिल्ली स्थित तीसहजारी अदालत के पास पहुंचना है. वहीं बगल में स्थित अनाथ आश्रम में इन सब की एक साथ शादी कराई जाएगी.

ये सभी दूल्हे और उन के रिश्तेदार खरखौदा के दिल्ली चौक पर खड़े हो कर दिल्ली से आने वाली बस का इंतजार कर रहे थे. बस के आने का समय 9 बजे बताया गया था, इसलिए ये सभी दूल्हे 9 बजे से पहले ही वहां आ गए थे. क्योंकि उन्हें डर था कि अगर बस चली गई तो वे रह जाएंगे.

वहां आए ये सभी दूल्हे सोनीपत, जींद, रोहतक, झज्जर आदि जिलों के रहने वाले थे. बस को 9 बजे तक आ जाना था, लेकिन 10 बज गए. दिल्ली से बस नहीं आई. इस बीच दूल्हों के घरों से कभी भाई तो कभी मां तो कभी दोस्त का फोन कर के पूछता कि वे दिल्ली के लिए चल पडे़ या खरखौदा में ही खड़े हैं.

दूल्हे क्या जवाब देते. कुछ देर तो कहते रहे कि अभी बस नहीं आई है, थोड़ी देर में आ जाएगी. जैसे ही वे यहां से निकलेंगे, बता देंगे. लेकिन जब बस का इंतजार करतेकरते 11 बज गए और बस का कोई अतापता नहीं था. तो दूल्हों और उन के साथ आए रिश्तेदारों को बेचैनी होने लगी. घर वालों के फोन बारबार आ ही रहे थे, जिस से वे झुंझलाने लगे.

उन दूल्हों में से कुछ के रिश्तेदारों ने सुशीला को फोन किया. लेकिन उस का मोबाइल फोन बंद था. इस के बाद तो सब ने सुशीला को फोन करने शुरू कर दिए, लेकिन उस से बात नहीं हो सकी. ये सभी सुशीला को इसलिए फोन कर रहे थे, क्योंकि शादी कराने की जिम्मेदारी उसी ने ले रखी थी.

शादी की बातचीत करने के लिए उस के साथ मोनू भी आया था. कुछ लोगों के पास मोनू का भी फोन नंबर था. उसे भी फोन किया गया. उस का भी फोन बंद था, इसलिए उस से भी बात नहीं हो सकी. मोनू थाना कलां का रहने वाला था.

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शादी कराने के लिए सुशीला ने उन दूल्हों के घर वालों से अच्छेखासे पैसे लिए थे. किसी से 45 हजार रुपए तो किसी से 60 हजार रुपए तो किसी से 90 हजार रुपए. सुशीला ने ही सब से दिल्ली से बस आने और वहां जा कर अनाथालय में सभी की सामूहिक शादी कराने की बात कही थी. उसी के कहने पर ये सभी लोग खरखौदा में इकट्ठे हुए थे.

लेकिन अब सुशीला से बात नहीं हो पा रही थी. मोनू का भी कुछ अतापता नहीं था. सुशीला और मोनू के मोबाइल फोन बंद बता रहे थे. इन के पास सुशीला और मोनू के अलावा किसी अन्य का मोबाइल नंबर नहीं था. इसी तरह दोपहर के 12 बज गए. वहां एकत्र दूल्हे और उन के रिश्तेदार तरहतरह की चर्चाएं करने के साथ धोखा खाने यानी शादी के नाम पर ठगे जाने की आशंका जाहिर करने लगे.

सभी दूल्हे पहुंच गए सुशीला के घर

इंतजार करतेकरते थक चुके लोगों ने कहा कि सुशीला खरखौदा में ही तो रहती है, चलो उस के घर चलते हैं. उसी से पूछते हैं कि अभी तक बस क्यों नहीं आई? सभी सुशीला के घर पहुंचे तो वह घर पर ही मिल गई. मोनू भी सुशीला के ही घर पर था.

सभी ने सुशीला और मोनू से बस न आने के बारे में पूछा तो सुशीला ने कहा, ‘‘देखो मैं पता करती हूं. शादी कराने की बात दिल्ली में रहने वाली मेरी भाभी अनीता ने कही थी. उन्हीं के कहने पर मैं ने दिल्ली से बस आने की बात बताई थी.’’

इस के बाद सुशीला ने सब के सामने अनीता को फोन किया. पता चला कि उस का भी फोन बंद है. कई बार कोशिश करने के बाद भी जब अनीता से भी बात नहीं हो सकी तो दूल्हों और उन के रिश्तेदारों को गुस्सा आ गया. उन्हें यकीन हो गया कि शादी के नाम पर वे ठगे गए हैं.

कुछ लोग सुशीला से अपने पैसे वापस मांगने लगे. उन का कहना था कि उन्होंने कर्ज ले कर उसे पैसे दिए हैं. अब वह शादी नहीं करा रही है तो उन के पैसे वापस करे. कुछ दूल्हों का कहना था कि अब वे बिना दुलहन के कौन सा मुंह ले कर अपने घर जाएंगे. कुछ दूल्हे ऐसे भी थे, जिन के घर वालों ने बेटे की शादी की खुशी में बहूभोज के लिए मैरिज होम तक बुक करा लिया था. डीजे वगैरह का भी इंतजाम किया था.

कुछ दूल्हे ऐसे भी थे, जिन के घर वालों ने शादी की सारी रस्में करा का उन्हें यहां तक पहुंचाया था. जो खातेपीते घर के दूल्हे थे, उन्होंने अपने रिश्तेदारों से बताया था कि लड़की के घर वाले गरीब हैं. इसलिए शादी करने के बाद बहू के साथ घर आएंगे तो उन सब की खातिरदारी घर पर करेंगे.

पैसे मांगने पर सुशीला ने कहा कि पैसे तो वह अनीता को दे चुकी है. इसलिए पैसे नहीं दे सकती. 2-3 घंटे तक सुशीला के घर पर हंगामा होता रहा. जब लोगों को ना तो पैसे वापस मिले और ना ही शादी होने की कोई सूरत नजर आई तो वे सुशीला और मोनू को पकड़ कर थाना खरखौदा ले गए. शादी के नाम पर हुई ठगी को एक दूल्हे का पिता बरदाश्त नहीं कर सका और वह थाने में ही बेहोश हो कर गिर पड़ा. लोगों ने उसे संभाला.

दूल्हों और उन के रिश्तेदारों ने पुलिस को सारी बात बताई. कुछ ने लिखित शिकायत कर दी. थाना खरखौदा पुलिस ने अनीता, सुशीला और मोनू के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. थानाप्रभारी वजीर सिंह ने इस मामले की जांच एसआई नरेश कुमार को सौंपी. पुलिस ने सुशीला और मोनू को हिरासत में ले कर पूछताछ की. बाद में दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया.

गेम की मास्टरमाइंड निकली अनीता

28 दिसंबर को पुलिस ने खरखौदा के वार्ड नंबर 2 निवासी सुशीला और गांव थाना कलां निवासी मोनू को मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर पूछताछ के लिए 2 दिनों के रिमांड पर लिया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में सुशीला और मोनू ने बताया कि उन्हें पता नहीं  था कि शादी के नाम पर अनीता लोगों को ठग रही है.

अनीता ने उन्हें इस काम के लिए एक से 2 हजार रुपए ही दिए थे. बाकी रुपए उस ने खुद ही रख लिए थे. सुशीला के बताए अनुसार, अनीता दिल्ली के नरेला के लामपुर बौर्डर की रहने वाली थी. दिल्ली के अलावा झज्जर और अन्य जगहों पर भी उस के ठिकाने बताए.

थाना खरखौदा पुलिस ने अनीता की तलाश में दिल्ली और जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी, छापे मारे, लेकिन वह नहीं मिली. इस के बाद पुलिस ने 3 टीमें बना कर उस की तलाश शुरू की.

सुशीला और मोनू से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने कई अन्य लोगों से पूछताछ की, लेकिन अनीता के बारे में कुछ पता नहीं चला. रिमांड अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने सुशीला और मोनू को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

पुलिस की लगातार छापेमारी से घबरा कर अनीता ने 7 जनवरी, 2018 को सोनीपत की अदालत में आत्मसमर्पण किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस ने पूछताछ के लिए अदालत से उस का रिमांड मांगा तो उसे 5 दिनों की रिमांड पर सौंप दिया गया. 5 दिनों के बाद एक बार फिर 3 दिनों के रिमांड पर लिया गया.

अनीता से पूछताछ में पता चला कि कुंवारों से शादी के नाम पर ठगे गए पैसों का उपयोग अनीता के बेटे रोहित ने भी किया था. पुलिस ने 9 जनवरी को दिल्ली से रोहित को भी गिरफ्तार कर लिया. रोहित को 3 दिनों के रिमांड पर लिया गया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ और शादी के नाम पर ठगे गए लोगों से मिली जानकारी के आधार पर जो कहानी सामने आई है, वह इस प्रकार थी—

कुंवारों को ठगने की बनाई योजना

दिल्ली के नरेला के गांव लामपुर की रहने वाली अनीता के पति की मौत हो चुकी थी. उस के 2 बच्चे हैं, जिन की शादियां हो चुकी हैं. अनीता की हरियाणा में कई रिश्तेदारियां हैं. उसे पता था कि लड़कियों की कमी की वजह से हरियाणा के तमाम लड़कों की शादियां नहीं हो पाती हैं. शादी की उम्मीद में तमाम लड़के अधेड़ हो चुके हैं. इस तरह के लोग किसी भी तरह शादी करना चाहते हैं. इस के लिए वे पैसा दे कर दुलहन खरीदने को भी तैयार रहते हैं.

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अनीता ने इसी बात का फायदा उठाया. उस ने शादी कराने के नाम पर कुंवारों को ठगने की योजना बनाई. इस काम में उस ने अपनी जानकार खरखौदा की रहने वाली सुशीला की मदद ली. हालांकि उस ने सुशीला को अपनी पूरी योजना नहीं बताई थी. उसे केवल आसपास के गांवों में कुंवारों के बारे में पता करने और उन की शादी कराने की बात करने की जिम्मेदारी सौंपी थी.

इस के बाद अपने परिचित मोनू को मदद के लिए ले लिया. दोनों ने आसपास के गांवों और रिश्तेदारों में ऐसे लड़कों के बारे में पता किया, जिन की शादी नहीं हुई थी. सुशीला ने ऐसे लड़कों की शादी कराने की बात चलाई. हर गांव में एकदो परिवार ऐसे मिल गए, जिन के यहां लड़कों की शादी नहीं हुई थी. वे चाहते थे कि उन के लड़के की शादी हो जाए और घर में बहू आ जाए. इस के लिए वे पैसे भी खर्च करने को तैयार थे.

एक शादी के लिए 45 से 90 हजार रुपए

सुशीला के कहने पर तमाम लोग शादी के लिए तैयार हो गए. एकदूसरे के माध्यम से शादी करने वालों की संख्या बढ़ती गई. सुशीला ने यह बात अनीता को बताई. वह खरखौदा आ गई और सुशीला के साथ कुछ ऐसे लोगों के यहां गई भी, जो शादी के इच्छुक थे. उस ने कहा कि जिन लड़कियों से उन की शादी कराएंगी, वे लड़कियां अनाथ हैं और दिल्ली के अनाथालय में रहती हैं. इस के लिए उन्हें अनाथालय को चंदा देना होगा.

चंदे की राशि कम से कम 45 हजार होगी. उम्र के हिसाब से चंदे की यह रकम बढ़ती जाएगी. जब कई लोग शादी के लिए तैयार हो जाएंगे तो वह एकसाथ सब की शादियां करा देगी.

शादी कब और कहां होगी, यह वह बाद में बता देगी. उस ने यह भी कहा कि शादी से कुछ दिनों पहले दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट के पास स्थित आश्रम में पहले लड़कियां दिखाई जाएंगी, उन में वे जिस लड़की को पसंद करेंगे, उसी से उन की शादी कराई जाएगी. जिन के लड़कों की शादी नहीं हुई थी, उन्हें यह सौदा बुरा नहीं लगा.

वे चंदा देने के लिए तैयार हो गए. इस के बाद अनीता तो चली गई, सुशीला और मोनू शादी कराने वाले लड़कों के घर वालों से चंदा वसूल करने लगे.

कुछ जगह चंदा लेने के लिए सुशीला और मोनू के साथ अनीता भी गई थी. इन में कुछ लोग ऐसे भी थे, जो किसी तरह गुजरबसर कर रहे थे. ऐसे लोगों ने बेटे की शादी के लिए कर्जा ले कर सुशीला को पैसे दिए.

रोहतक के राजबीर और मोहन के गांव बोहर में सुशीला की रिश्तेदारी थी. सुशीला ने उन के गांव जा कर ऐसे लोगों के बारे में पता किया, जो शादी करना चाहते थे. गांव में रिश्तेदारी होने की वजह से सुशीला पर विश्वास कर के मोहन ने 45 हजार तो राजबीर ने 50 हजार रुपए उसे दे दिए. इसी तरह खरखौदा के संदीप ने शादी के लिए सुशीला को 45 हजार रुपए दिए थे. उस के पास पैसे नहीं थे तो घर वालों ने उधार ले कर उसे 45 हजार रुपए दिए थे.

खरखौदा के ही सुरेश, अंशरूप, पवन, राजेंद्र, मुनेश, जौनी, राकेश और साबू, सोनीपत के अमित, रोहतक के गांव हुमायूंपुर के संतोष और लक्ष्मी, निलौठी के असीक और रामवीर, मोहाना के राजू, बोहर के सत्यनारायण, कृष्ण, मोहन, राजवीर और कुलदीप, रोहतक के गांव निडाना के रमेश, अनिल, धनाना के शिवकुमार, जींद के अमरजीत, संजीव, झज्जर के बहराना गांव के जगवीर सहित कई लोगों ने शादी के लिए सुशीला को पैसे दिए.

ठगी के शिकार सब से ज्यादा खरखौदा के ही हुए हैं. इन की संख्या 25 से भी ज्यादा है. खरखौदा का रहने वाला सुरेश कुमार खेती करता था. उस का दूध का भी धंधा था. घर में बुजुर्ग विधवा मां थी.

आखिर बूढी मां पर वह कब तक बोझ बना रहता. सुशीला ने उस की मां से कहा कि वह सुरेश की शादी अनाथाश्रम की लड़की से करा देगी. इस के लिए 45 हजार रुपए दान देने पड़ेंगे. घर में 10 हजार रुपए ही थे. बाकी के 35 हजार रुपए उस ने ब्याज पर ले कर दिए.

खरखौदा का संदीप सब्जीमंडी में सब्जी बेचता था. बूढ़ी मां की इच्छा थी कि संदीप की शादी हो जाए. कई लोगों ने सुशीला को अनाथाश्रम की लड़की से शादी कराने के लिए पैसे दिए थे, इसलिए संदीप की मां भी उस के झांसे में आ गई. कुछ पैसे घर में थे और कुछ पैसे उधार ले कर सुशीला को दे दिए थे.

इसी तरह खरखौदा के वार्ड नंबर 3 निवासी स्कूटर रिपेयरिंग का काम करने वाले जौनी की दादी ने उस की दुलहन के लिए दान के रूप में पैसे दिए थे. दादी ने सोचा था कि पोते की बहू आ जाएगी तो दो जून की रोटी मिलने लगेगी.

सुशीला और अनीता ने सभी से 27 दिसंबर को शादी कराने के लिए कहा था. कुछ लोगों से यह भी कहा था कि शादी से 10-11 दिन पहले उन्हें दिल्ली में लड़कियां दिखा दी जाएंगी. उन में से शादी के लिए लड़की पसंद कर लेना.

कुंवारों को टालती रही अनीता

लड़की दिखाने के लिए मोहाना गांव के रोहताश ने 16 दिसंबर को अनीता को फोन किया तो उस ने कहा कि अनाथाश्रम की लड़कियों की शादी में मदद करने के लिए कुछ विदेशी आने वाले थे, लेकिन बर्फबारी होने की वजह से वे नहीं आए. इसलिए अब लड़की दिखाने का प्रोग्राम कैंसिल हो गया है. अब 27 दिसंबर को सीधे सामूहिक विवाह ही होगा.

जिन लोगों ने अनीता और सुशीला को लड़की दिखाने के लिए फोन किया था, सभी से यही कह दिया गया. लड़कों ने सोचा कि लड़की नहीं दिखाई जा रही, कोई बात नहीं शादी तो हो जाएगी.

इस के बाद सभी को फोन कर के बता दिया गया कि 27 दिसंबर को दिल्ली में शादी होगी. इस के लिए दिल्ली से खरखौदा बस आएगी. उस बस से सभी लोग दिल्ली पहुंच जाना, जहां तीसहजारी कोर्ट के पास स्थित एक अनाथाश्रम में सभी की शादी होगी. 27 दिसंबर को जो हुआ, वह बताया ही जा चुका है.

यह सारी योजना अनीता की थी. सुशीला और मोनू एजेंट के रूप में काम कर रहे थे. शादी के नाम पर चंदे के रूप में वसूली गई रकम अनीता लेती थी. उस में से कुछ पैसे सुशीला और मोनू को मिलते थे.

पुलिस ने हिसाब लगाया तो इन लोगों ने शादी के नाम पर 40 से ज्यादा लड़कों से 25 से 30 लाख रुपए वसूले थे. पुलिस यह भी पता कर रही है कि इन लोगों के साथ और लोग तो नहीं थे. थानाप्रभारी वजीर सिंह ने ठगे गए युवकों को आश्वासन दिया है कि उन लोगों से पैसे वसूल कर उन के पैसे वापस कराने की कोशिश की जाएगी.

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दरअसल, सोनीपत के खरखौदा में लड़कों के हिसाब से लड़कियां बहुत कम हैं. इसी वजह से यहां सभी लड़कों की शादियां नहीं हो रही हैं.

मजे की बात यह है कि चुनाव के दौरान जींद जिले में कुंवारा संगठन बना था. उन्होंने शादी की उम्र पार करने वाले लड़कों की शादियां कराने की मांग उठाई थी. तब एक नेता ने बिहार से लड़कियां ला कर उन की शादी करवाने का आश्वासन दिया था.

दुलहन के नाम पर अनोखी ठगी

उत्तराखंड के बनबसा में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) की प्रभारी एसआई मंजू पांडेय को एक दिन एक व्यक्ति ने खास सूचना दी. उस ने बताया कि ऊधमसिंह नगर के खटीमा इलाके में कुछ लोग विवाह की चाह रखने वाले युवकों की शादी कराने के लिए लड़कियां उपलब्ध कराते हैं.

इस के एवज में वह उन से मोटी रकम वसूलते हैं. बाद में लड़कियां मौका मिलने के बाद वहां से लौट जाती हैं या फिर ठग गिरोह द्वारा अन्यत्र भेज दी जाती हैं.

एसआई मंजू पांडे ने यह जानकारी सीओ (टनकपुर) आर.एस. रौतेला को दी. सीओ आर.एस. रौतेला ने मंजू पांडेय के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में हैडकांस्टेबल लक्ष्मणचंद, रवि जोशी, कांस्टेबल गणेश सिंह के अलावा स्थानीय लोग और एनजीओ के लोग शामिल थे.

साथ ही उन्होंने योजना बना कर उन्हें अपने हस्ताक्षरयुक्त कुछ नोट व चैक दे दिए. इस के बाद एसआई मंजू पांडेय ने ठग गिरोह से किसी लड़के की शादी कराने के बारे में बात की.

निश्चित तारीख को चकरपुर मंदिर परिसर में शादी कराने की तैयारियों का नाटक करते हुए सीओ के हस्ताक्षर वाले चैक और नोट ठग गैंग के सदस्य को दे दिए. कुछ देर बाद खटीमा की ओर से 2 महिलाएं एक बाइक से वहां पहुंचीं. फिर एक महिला बस में सवार हो कर आई.

वह टनकपुर से आई थी. उन के पहुंचते ही विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं. उसी दौरान एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की दूसरी टीम वहां पहुंच गई. टीम ने पुरुष और तीनों महिलाओं को हिरासत में ले कर उन के पास से हस्ताक्षरयुक्त चैक और नोट अपने कब्जे में ले लिए.

पूछताछ में पता चला कि गिरोह में कलक्टर फार्म खटीमा की रहने वाली रजवंत कौर अपने बेटे सतनाम के साथ ठगी का यह धंधा कर रही थी. अन्य 2 महिलाओं में थाना नानकमता के गांव दहला निवासी गुरमीत कौर और टनकपुर की विष्णुपुरी कालोनी निवासी आरती कपूर थी. इन सभी के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 120बी, 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर कोर्ट में पेश किया, जहां से इन चारों को जेल भेज दिया गया.

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दाढ़ी वाले बाबा बावरा बना कर छोड़ते

पूरी कालोनी शोर के चलते परेशान हो गई थी. कालोनी में एक सरकारी जमीन का टुकड़ा था. शर्माजी को उस पर कब्जा करना था. उन के मकान से लगालगाया वह टुकड़ा था. उन्होंने थोड़ी सी ईंटें और सीमेंट डलवा कर मंदिर बनवा लिया. आनेजाने वालों को दिक्कत हो रही थी. लेकिन किसी के बाप की हिम्मत जो भगवान के मंदिर के खिलाफ बोल दे. शर्माजी ने उसी मंदिर से लग कर एक दुकान खोल ली जहां मोटा पेट लिए वे सेठजी बन कर बैठ गए थे. लेकिन अभी उन का मन भरा नहीं था. उन्होंने विचार किया- भगवानजी तो स्वर्ग में रहते हैं, सो उन भगवानजी का ट्रांसफर एकमंजिला बना कर ऊपर कर दें और नीचे पूरा एक हौल निकल आएगा जिस में काफी जगह निकलेगी. उस का गोदाम के तौर पर उपयोग हो जाएगा.

जयपुर से एक पत्थर लाया गया. फिर एकमंजिला ऊंचा मंदिर निर्माण कर के नीचे वाले हिस्से पर शर्माजी ने दुकान और गोदाम निकाल लिया. 5-6 महीने बाद आधी दुकान किराए पर दे कर वे चांदी काटने लगे. लेकिन शर्माजी पूजापाठ करें या दुकानदारी-वे कुछ निर्णय नहीं कर पा रहे थे. इधर कालोनी वाले ईर्ष्या कर रहे थे, शिकायतें भी हो रही थीं. अभी दुकानों की लागत निकली नहीं थी और यदि यह अवैध कब्जा हट गया तो लाखों का नुकसान हो जाएगा. उन्होंने तरकीब भिड़ाई और आननफानन अपने गांव से एक अनाथ प्रौढ़ को बाबा बनवा कर बुलवा लिया. उस बाबा का प्रचारप्रसार कालोनी में हो जाए, इसलिए उन्होंने ध्वनि विस्तारक यंत्र लगा कर धार्मिक दोहों का वाचन रखवा दिया था. रातदिन चलने वाले इस पाठ का शोर इतना अधिक होता था कि कालोनी में सोने वाले जाग जाए और जागने वाले कालोनी छोड़ कर भाग जाए. लेकिन किसी की हिम्मत नहीं थी कि कोई भगवानजी के खिलाफ आवाज उठाए. शानदार तरीके से शर्माजी ने दुकानदारी जमा ली थी जिस के परिणामस्वरूप मंदिर का चढ़ावा, दुकान का किराया, किराने का फायदा मिला कर शर्माजी धन कूट रहे थे. कालोनी या उस में रहवासी जाए भाड़ में, उन्हें उस से कोई मतलब नहीं था.

इस बीच, शर्माजी ने अपने पुजारी महाराज के चमत्कारों का प्रचार कर दिया था. हवा से भभूत निकालना, पानी में दीपक जलाना, जबान पर कपूर को जलाना…एकदो नहीं पूरे आधा दर्जन से अधिक चमत्कारों को बतलाने के परिणामस्वरूप मंदिर में भीड़ बढ़ गई. चढ़ावा भी बढ़ गया. दुकान की बिक्री भी बढ़ गई. शर्माजी बहुत खुश थे. एक पसेरी उन का वजन और बढ़ गया था. जब दुकान चल निकली तो चमत्कारों को बढ़ाना तथा भक्तिरस में डूबा बताना भी कर्तव्य हो गया. शर्माजी का मंदिर ही उस जगह का नाम हो गया था और भीड़ बढ़ती जा रही थी. लोग अंधश्रद्घा में डूबे रहे. कोई प्रश्न खड़ा ही नहीं करे, इस के लिए शर्माजी ने भजनमंडल, पाठों का आयोजन पूरे डीजे साउंड के साथ शुरू कर दिया ताकि पूरी कालोनी में आवाज जाए. मैं ने सोचा कि अब कालोनी का मकान बेच कर चला जाऊं. सो, मैं ग्राहक खोजने लगा. जिस भी ग्राहक को मेरे घर बेचने का कारण पता चलता, वह मुझे अधर्मी कह कर मकान खरीदने से मना कर देता. मैं बहुत परेशान था.

तब ही हमारी एकमात्र सासूजी अचानक आ गईं. सुबहसुबह का समय था. इतना शोर था कि पक्षी भी कोलाहल करना भूल कर पेड़ छोड़ कर उड़ गए थे. सासूजी ने घर में प्रवेश किया और हमारी एकमात्र धर्मपत्नी का चेहरा देखा तो दंग हो गईं. दरअसल, वह पूरे एक महीने से शोर के चलते सो नहीं पाई थी. मेरे सिर के रहेसहे बाल भी उड़ गए थे और सिर खेल का मैदान हो गया था. सासूजी बहुत दुखी हुईं. यात्रा की थकान के चलते आराम करना चाहा, लेकिन दरवाजेखिड़की बंद कर लेने के बाद भी वे शोर से मुक्ति नहीं पा सकीं और सो नहीं पाईं. दोपहर वे कुछ नाराज हो कर खाने की टेबल पर आईं और बेटी से कह उठीं, मैं लौट कर जा रही हूं. हमारी पत्नीजी ने दुखी हो कर कहा, ‘मम्मीजी, आप के बुद्धि के चर्चे विदेशों में हैं और आप अगर ऐसी स्थिति में हमें छोड़ कर चली जाएंगी तो आखिर हमारा क्या होगा? उपाय करो, मम्मीजी. हम ने भी हाथ जोड़ लिए, प्लीज सासूजी, कुछ विचार तो करो, आखिर हमारे परिवार का ही नहीं, पूरी कालोनी वालों का सवाल है.’

‘ठीक है,’ कुछ सोचती हुईं सासूजी ने कहा.

हम तो खुशी से गुब्बारे की तरह फूल गए. जानते थे कि प्रत्येक स्थिति में सासूजी ही सब को कंट्रोल कर लेंगी. शाम को भगवे कपड़े पहन कर सासूजी अपनी पूर्व परिचित कालोनी की सहेलियों के साथ मंदिर में दर्शन करने गईं. प्रसाद चढ़ाया, चंदा दिया और हाथ जोड़ कर प्रसाद लिया और अपनी सहेलियों के साथ लौट आईं. अगली सुबह हम सो कर भी नहीं उठे थे कि सासूजी सहेलियों के साथ मंदिर चली गईं जहां भयानक ध्वनिप्रदूषण हो रहा था. उन्होंने तत्काल प्रौढ़ महाराज के हाथों में 500 रुपए का नोट रखा.

महाराज तो दंग रह गया कि आखिर इतना चंदा उसे ही क्यों दिया गया. उस ने खुश हो कर प्रश्न किया, ‘‘मैडमजी, बताइए यह 500 रुपए का चंदा मुझे क्यों दिया जा रहा है?’’ सासूजी की सहेली ने कमान संभाली और कहा, ‘‘पंडितजी, ये 500 रुपए तो कम हैं, इन की इच्छा तो 5,000 रुपए देने की थी.’’

‘‘आखिर क्यों भाई? ऐसी क्या बात हो गई थी?’’ ‘‘बात ही कुछ ऐसी थी. इन के पेट में पूरे 3 वर्षों से दर्द था, कल आप का प्रसाद ले गईं…सहेली अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाई कि पंडित ने कहा, ‘‘ओह, वो खा कर ये ठीक हो गईं?’’

‘‘नहीं जी.’’ ‘‘फिर क्या बात हो गई?’’

‘‘पंडितजी, उस प्रसाद में आप की दाढ़ी का एक बाल था. मैडमजी ने सोचा प्रसाद में बाल आया है, निश्चितरूप से इस का कोई महत्त्व तो होगा. बस, उन्होंने उस बाल को अपने पेट में बांध दिया और देखतेदेखते पेट का दर्द गायब हो गया.’’ ‘‘धन्य हो पंडितजी,’’ सब सहेलियों ने समवेत स्वर में कहा.

‘‘ऐसे बाल मैं विशेष लोगों को ही देता हूं, जिस को सौ प्रतिशत लाभ देना होता है,’’ पंडित ने आत्मप्रशंसा से भर कर कहा. ‘‘हम धन्य हो गए,’’ कह कर सब सहेलियों ने चरणस्पर्श किए और चली आईं.

बस फिर क्या था-एक ने दूसरे से, दूसरे ने तीसरी से पूरी बात पूरी कालोनी में 1 घंटे में फैला दी गई. लगभग 9 बजे तक वहां एक हजार लोगों की भीड़ जमा हो गई जो पंडितजी से सौ प्रतिशत लाभ लेना चाहते थे. मरता क्या न करता. पंडितजी ने एकएक व्यक्ति से दाढ़ी का बाल नुचवाया, सिर टकला हो गया तो जो श्रद्धालु (ग्राहक) थे उन्होंने सिर के बाल नोचने शुरू कर दिए और देखतेदेखते बिना भौंह, बिना पलकों के, टकले, दाढ़ीविहीन पंडित भूत जैसे लगने लगे. पीड़ा से बिलबिला रहे थे. अभी भीड़ और बढ़ गई थी जो उन की टांगों व बगलों तक के केशलोचन करने के लिए आमादा थी. शर्माजी 11 बजे तक बिजनैस करते रहे. भारी ग्राहकी से वे खुश थे. लेकिन जब ज्ञात हुआ कि गांव से लाया पंडित पीछे के दरवाजे से भागने की कोशिश कर रहा है तो वे उस की छाती पर आ कर डट गए. सैकड़ों लोग उन के सिर पर बाल उगने की प्रतीक्षा में नंबर लगा कर बैठ गए थे. पंडितजी शौचक्रिया के नाम से जो बाहर गए तो फिर दोबारा लौट कर नहीं आए. 2 दिनों में ही शर्माजी का मंदिर श्मशान की तरह सुनसान हो गया था.

जब कोई नहीं रहा तो ग्राहकों ने आना बंद कर दिया. ग्राहक नहीं तो ध्वनि विस्तारक यंत्र बंद हो गया. जब शोर बंद हो गया तो भीड़ लापता हो गई. चढ़ावा खत्म हो गया. मंदिर के देवता एक दिन चोर के हाथों चोरी हो गए. देखतेदेखते शर्माजी की दुकानदारी पूरी तरह से खत्म हो गई. शर्माजी आजकल हाथठेले पर सब्जी बेच रहे हैं और हमारी सासूजी उन से सब्जी खरीद कर मनपसंद खाना पकवा कर खा रही हैं. है न हमारी सासूजी बुद्धिमान? हम तो यही कामना करते हैं कि सब को ऐसी सास मिले.

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