मशहूर संगीतकार खय्याम ने इस ट्रस्ट को दिया डेढ़ लाख का चेक

‘कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है’, ‘तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती’, ‘दिल चीज क्या है’ जैसे फिल्मी गीतों को अपने मधुर संगीत में संवारने वाले पद्मभूषण से सम्मानित मशहूर संगीतकार खय्याम और उनकी पत्नी जगजीत कौर ने फिल्म इंडस्ट्री के जरूरतमंदों के लिए डेढ़ लाख का चेक अपने ‘खय्याम केपीजे चैरिटेबल ट्रस्ट’ की तरफ से ‘फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने इम्पलौइज’ के औफिस में 14 मई को आयोजित एक भव्य समारोह में  प्रदान किया.

इस अवसर पर ‘फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने इम्पलौइज’ के अध्यक्ष बी एन तिवारी, महासचिव अशोक दुबे और अन्य पदाधिकारी मौजूद थे. खय्याम साहब पिछले तीन वर्षों से हर वर्ष डेढ़ लाख रूपए का चेक अपने इस ट्रस्ट से देते आ रहे हैं.

इस भव्य समारोह में भजन सम्राट अनूप जलोटा, फिल्म स्टूडियोज सेटिंग एंड एलाइड मजदूर यूनियन के महासचिव गंगेष्वरलाल श्रीवास्तव उर्फ राजू, सिने एंड आर्टिस्ट्स एसोसिएशन के महासचिव सुशांत सिंह आदि मुख्य अतिथि थे. इसके अलावा बौलीवुड से जुड़ी सभी 22 यूनियनों के पदाधिकारियों ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम को सफल बनाया.

इस अवसर पर फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने इम्प्लाइज के अध्यक्ष बी एन तिवारी ने कहा – ‘‘ हम लोग खय्याम साहब के शुक्रगुजार हैं, जो कि फिल्म इंडस्ट्री के लोगों के बारे में सोचते हैं. ऐसी सोच सभी को भगवान दें. हम लोग चाहते हैं कि खय्याम साहब का आशीर्वाद हमेशा हम लोगों पर बना रहे और वह हमेशा यहां आकर हम लोगों का हौसला बढ़ाए, पैसे ना भी मिले तो भी चलेगा.’’

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जबकि खय्याम साहब ने कहा – ‘‘हमें फिल्म इंडस्ट्री ने इतना कुछ दिया है कि अब हम लोगों ने सोचा अब फिल्म इंडस्ट्री को वापस किया जाए. इसीलिए यह कदम उठाया है. हमारी तरफ से हर वर्ष ‘फेडरेशन’ को डेढ़ लाख रूपए का चेक मिलता रहेगा. हम लोग चाहते हैं कि अन्य लोग आगे आएं, और फिल्म इंडस्ट्री की भलाई के लिए कुछ करें. हम रहें या ना रहें, लेकिन हमारा ट्रस्ट चलता रहेगा. यह ट्रस्ट लोगों की मदद करता रहेगा.

हमारे निधन के बाद हमारी पूरी चल अचल संपत्ति को बेचकर नगद राशि के रूप में बदलकर ट्रस्ट के नाम पर बैंक में फिक्स डिपोजिट किया जाएगा. इससे जो फायदा होगा, उसमें से 5 लाख रूपए प्रधानमंत्री कोश में, पांच लाख रूपए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कोश में और इंडस्ट्री के जरूरतमंद लोगों को एक लाख रूपए की जीवन में एक बार मदद करेगा.

इस अवसर पर फिल्म स्टूडियोज सेटिंग एंड एलाइड मजबूर यूनियन के महासचिव गंगेश्वरलाल श्रीवास्तव और फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने इम्प्लाइज के महासचिव अशोक दुबे ने आश्वस्त किया कि वह फेडरेशन को फिर से मजबूत बनाने का प्रयास कर रहे हैं. इन्होने कहा-‘निर्माताओं को भी विश्वास दिलाया है कि हम लोग एक हैं और हम लोगों को साथ मिलकर चलना है. हम एक दूसरे के बिना अधूरे हैं.’’

खय्याम साहब व उनकी पत्नी द्वारा स्थापित ट्रस्ट ‘‘खय्याम केपीजे ट्स्ट’’ में अनूप जलोटा, तलत अजीज व राज शर्मा ट्रस्टी हैं.

इस अवसर पर खय्याम साहब और उनकी पत्नी जगजीत कौर, अनूप जलोटा, बी एन तिवारी, अशोक दुबे, किशन शर्मा, गंगेश्वरलाल श्रीवास्तव उर्फ संजू, सुशांत सिंह के अलावा फेडरेशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष फिरोज खान, उपाध्यक्ष संगम, मजदूर यूनियन के उपाध्यक्ष शरफुद्दीन मोहम्मद, राकेश मौर्या तथा फिल्म से संबंधित 22 यूनियनों के पदाधिकारियों में से राम चौधरी, राज सूर्य, पिंकी मोरे, फिरोज भाई, धर्म अरोड़ा, इमरान मर्चेंट, सुरेंद्र श्रीवास्तव, कुंदन गोस्वामी, अशोक पांडे, हिंमाशु भट्ट, आशफाक खोपेकर, हनीफ भाई, मुन्ना भाई सुलेखा इत्यादी लोगों ने कार्यक्रम को सफल बनाया.

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पत्नी व देश का संविधान

इस समय देश का हर नागरिक संवैधानिक हो गया है. अवैधानिक काम करने वाला भी बातबात में संविधान की बात कर रहा है. एक कहता है कि भारतमाता की जय बोलना संविधान में कहां लिखा है, तो दूसरा कहता है कि कहां लिखा है कि नहीं बोल सकते.

अब छोटीछोटी बात में भी लोग संविधान की आड़ ले रहे हैं.  हमारा एक दोस्त मैसेजेस का जवाब नहीं देता था. एक दिन हम ने मैसेज किया कि भाई, थोड़ा सा सोशल हो जा सोशल मीडिया में, तो उस का मैसेज आ गया कि कहां लिखा है संविधान में कि हर मैसेज का जवाब देना आवश्यक है. मैं ने कहा कि यार, तूने तो मिलियन डौलर का प्रश्न खड़ा कर दिया. तू सही कह रहा है कि नहीं, यह मैं कैसे सही या गलत ठहराऊं.

अब यह संविधान की आड़ लेने वाली बात छूत के रोग की तरह हर तरफ फैलती जा रही है. उस दिन मैं सब्जी बाजार में था. मैं ने मोलभाव करना चाहा, तो सब्जी वाला बोला, ‘साहब पढ़ेलिखे हो कर भी एक दाम की तख्ती आप ने नहीं पढ़ी. संविधान में मोलभाव करने का उल्लेख नहीं है. कहां लिखा है, यदि लिखा हो तो हमें बताएं.’ मैं बहुत देर तक उस का थोबड़ा देखता रहा कि अब तो सब्जी मंडी में भी सब्जी वाला सब्जीभाजी की कम, संविधान की ज्यादा जानकारी रखने लगा है.

संविधान गलीकूचेबाजार से होते हुए घर के किचन में कब घर कर गया, हमें वैसे ही भान ही नहीं हुआ जैसे दिल्ली में भाजपाकांग्रेस का सफाया होने का नहीं हुआ था. पिछले रविवार को मैं ने पत्नी के सामने इच्छा प्रकट की कि आज रविवार है, कुछ खास डिश हो जाए? तो उस ने आंखें तरेर लीं कि पत्नी रविवार को पति के लिए खास डिश तैयार करेगी, यह संविधान में कहां लिखा है.

मैं भौचक था इस संविधान के घर के रसोई तक आ पहुंचने से. मैं ने सोचा, यह बाहर जो हवा बह रही है, शायद उसी का परिणाम है. वैसे, इस देश में आजकल किसी भी बात की हवा के चहुंओर पहुंचने में समय नहीं लगता है. मेड 2 दिन नहीं आई. वैसे यह कोई नई बात नहीं है. मेड इस तरह से मेड है कि वह आकस्मिक रूप से कभी भी गायब हो जाती है. पत्नी ने पूछ लिया कि 2 दिन कहां रही, बिना बताए छुट्टी मार ली, ऐसे नहीं चलेगा? तो वह हाथ नचा कर बोली कि संविधान में कहां लिखा है कि 2 दिन मेड बिना बताए नहीं आ सकती? और मैडमजी, आप की यह पड़ताल गैरसंवैधानिक ढंग की लग रही है? मैं मेड के संविधान के प्रति अचानक उपज आई सजगता से अचंभित था.

गांवों में नईनवेली आई पत्नियों के शौचालय के अभाव में ससुराल छोड़ने के तो आप ने कई किस्से पढ़े होंगे. अब नईनवेली बहू को किसी ने ज्ञान देने की कोशिश की कि सुबह उठ कर सासससुर के पैर छूना चाहिए. तो वह बोली कि फिर कहना कि रात को सास के पैर दबाना चाहिए. उस ने आंख मार कर आगे कहा कि संविधान में ऐसा कुछ नहीं लिखा है, इसलिए वह बाध्य नहीं है. उस के आराध्य न पति है और न सास. उस का कैरियर ही उस का आराध्य है, उस का संविधान है.

महिला मंडल की किटी पार्टियों का यह मौसम है. हम ने एक दिन हिम्मत बटोर कर, पत्नी से कहा कि अब किटी पार्टियां बंद कर दो क्योंकि बच्चों की परीक्षा नजदीक आ रही है. तो वह बोली कि संविधान का अध्ययन कर लो, उस में ऐसा कहीं लिखा नहीं है. मैं ने कहा कि बहुत जवाब देने लगी हो? तो वह तपाक से बोली कि संविधान में यह कहां लिखा है कि पत्नी केवल सुन सकती है, पलट कर जवाब नहीं दे सकती. आगे वह बोली, ‘‘जब मोदीजी कह रहे हैं कि उन का धर्म देश का संविधान है तो फिर हम कैसे इस का सम्मान करने में पीछे रह सकते हैं.’’

बौस के घर में एक कार्यक्रम था. हम ने पत्नी से गुजारिश की कि चलना है तो वह तपाक से बोली कि संविधान में कहां लिखा है कि पत्नी का बौस के यहां के हर बोरिंग फंक्शन में जाना जरूरी है. बौस आप का होगा, हमें तो उस दिन किटी पार्टी में जाना है.

ये दोटूक बातें आजकल संविधान की बैकिंग के कारण हमें हर जगह सुनने को मिल रही हैं. सरकार ने डाक्टरों को प्राइवेट प्रैक्टिस करने से रोका क्या, कि उन की यूनियन खड़ी हो गई कि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया गया है कि डाक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं कर सकता. उस ने तो शपथ ली हुई है मरीज का इलाज करने की. इस के बदले में यदि स्वेच्छा से कोई मरीज कुछ दे जाता है तो इस के लिए डाक्टर कहां जिम्मेदार है?

शाम को पत्नी घर पर नहीं थी. चाय खुद बनानी पड़ी. वह 8 बजे घर में आई. हम पूछ बैठे कि कहां चली गई थी, हमें चाय भी आज खुद ही बनानी पड़ी? हमारा इतना कहना था कि वह बिफर गई, नहीं, सही कर लेता हूं कि वह भड़क पड़ी. ध्यान रहे पत्नियां अकसर भड़कती हैं पति नामक जीव पर. और पति की बोलती बंद हो जाती है, ले बच्चू अब ऊंट पहाड़ के नीचे आया है. वह बोली कि देश के संविधान में कहां लिखा है कि मैं कहीं जाऊंगी तो पूछ कर जाऊं और आगे भी कि यह कहां लिखा है कि चाय रोज मैं ही बना कर दूंगी. और संवैधानिक जानकारी लो, काम आएगी कि, संविधान में पति द्वारा चाय बना कर पत्नी को पिलाने की कोई रोक नहीं है? सो, तुम्हें तो अपनी चाय के साथ ही एक अदद चाय मेरे लिए भी बना कर थर्मस में रख देनी थी.

मैं अब निरुत्तर था. आप के पास कोई उपाय हो तो बताएं संविधान के घेरे से निकलने का. वैसे, आप की भी स्थिति मेरे से कम बदतर नहीं होगी, यह मैं जानता हूं, फिर भी आप से पूछ रहा हूं.

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अखंड भारत का खंड खंड समाज

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने का प्रस्ताव कैबिनेट से पारित कर केंद्र को मंजूरी के लिए भेजा है. इस पर हिंदू समाज के भीतर तो कोई हलचल नहीं हुई पर राजनीतिक दलों, खासतौर से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, में घमासान शुरू हो गया. भाजपा और संघ का कहना है कि कांग्रेस हिंदू समाज का विभाजन कर रही है, जबकि कांग्रेस भाजपा व संघ पर लोगों को बांटने का आरोप लगा रही है.

कर्नाटक में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं, इसलिए लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने का प्रस्ताव विशुद्ध राजनीतिक मुद्दा है. दोनों ही दलों के नेता कर्नाटक के दौरे में लिंगायत समुदाय के धर्मगुरुओं से जा कर मिल रहे हैं, उन के चरणों में लोट रहे हैं. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तुमकुर में लिंगायतों के सब से बड़े मठ सिद्धगंगा गए और धर्मगुरु श्रीश्री शिवकुमार स्वामी को दंडवत प्रणाम कर आशीर्वाद मांगा. इस के बाद वे शिवमोगा के बेक्कीनक्कल मठ भी गए.

उधर, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब तक 5 बार कर्नाटक का दौरा कर चुके हैं. वे गुजरात विधानसभा चुनावों के मंदिर परिक्रमा अभियान की तरह यहां अब तक 15 मंदिरों में दर्शन कर चुके हैं. उन्होंने अपने दौरे की शुरुआत लिंगायत मंदिर हुलीगेमा से की थी. मंदिरमठों में जाते समय राहुल गांधी बाकायदा लिंगायत साधुओं जैसे वस्त्र पहने नजर आते हैं.

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया लिंगायतों को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं. ऐन चुनाव के समय लिंगायतों को अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा देने का प्रस्ताव भाजपा के लिए परेशानी का सबब है. राज्य में 17 प्रतिशत लिंगायत मतदाता हैं. यह भाजपा का परंपरागत वोट माना जाता रहा है. राज्य के पूर्र्व मुख्यमंत्री और इस बार मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार वी एस येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय से हैं. राज्य की 224 विधानसभा सीटों में से 100 सीटों पर लिंगायत मतदाताओं का प्रभाव है और वर्तमान में 55 विधायक इसी समुदाय से हैं.

भाजपा का दावा है कि वह देश में विकास के बल पर राज्यदरराज्य विजय हासिल करती जा रही है. ऐसे में अगर भाजपा को अपने विकास पर भरोसा है तो उसे डर किस बात का है. उसे धर्मगुरुओं की शरण में जाने की क्या जरूरत है.

असल में कांग्रेस और भाजपा दोनों का धार्मिक एजेंडा एक ही है. दोनों के मुंह धर्म का खून लग चुका है. दोनों ही धर्म को भुना कर सत्ता का मजा चखती आई हैं. भाजपा को दिक्कत यह है कि वह समझती है (और असल में है भी) कि हिंंदुत्व की अधिकृत ठेकेदार तो वह ही है. धर्म के नाम पर घृणा, बैर, कलह, मारकाट और समाज को बांटने का जो काम उसे करना चाहिए वह कांग्रेस क्यों कर रही है, उन कामों में कांग्रेस क्यों टांग फंसा रही है. समाज को जाति, धर्म, वर्ग, गोत्र, उपगोत्र में विभाजित करने की मूल मिलकीयत भाजपा की है.

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सेंध लगाती कांग्रेस

कांग्रेस पिछले दिनों गुजरात विधानसभा चुनावों में भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे में सेंधमारी कर उसे छका चुकी है. राहुल गांधी गुजरात के मंदिरों, मठों में चक्कर लगाते दिखते थे. खुद को जनेऊधारी हिंदू और शिवभक्त प्रचारित करते घूम रहे थे. अब वही फार्मूला कर्नाटक में आजमाना शुरू कर दिया गया है. भाजपा को यह बुरी तरह अखर रहा है.

हिंदू समाज पहले ही पिछले 3 हजार वर्षों से विभाजित है. यह विभिन्न जातियों, वर्गों, पंथों और संप्रदायों में बंटा हुआ है. हिंदू समाज जातियों का एक ढेर है. समयसमय पर हिंदू समाज में सुधार के लिए नेता आगे आए और फिर कुछ समय बाद उन का अपना एक अलग पंथ बन गया. ब्रह्म समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, शैव, वैष्णव संप्रदाय, शाक्त, वल्लभ संप्रदाय, राम स्नेही, नाथ संप्रदाय, राधास्वामी, आनंदपुर, स्वामिनारायण, स्थानकवासी, कबीरपंथी, दादूपंथी, नामधारी, ब्रह्मकुमारी, निरंकारी, जयगुरुदेव, विश्नोई, अंबेडकरवादी जैसे सैकड़ों मत, पंथ और संप्रदाय समाज में अज्ञानता व द्वेष का बीज बो रहे हैं.

इन के अलावा पहले से सुधारक पंथ बने, बाद में धर्म बन गए व अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त जैन, बौद्ध, सिख धर्मों मे भी अलगअलग पंथ बन गए. जैनियों में श्वेतांबर और दिगंबर, बौद्धों में हीनयान और महायान, सिख धर्म में जटसिख और रविदासीय. इन के बीच एका नहीं है. आपस में अनबन, कलह चलती आईर् है. एक गुरु या देवता को मानते हुए भी आपस में बैर ही नहीं रहा, कट्टर दुश्मनी भी पनपती रही है.

धर्म एक मत अनेक

भारत के बाहर से आए दूसरे धर्मों में भी अलगअलग मत बने हुए हैं. इसलाम में शिया और सुन्नी, ईसाइयों में कैथोेलिक और प्रोटेस्टैंट. भारत के हिंदू धर्म में तो जो भी गुरु आया उस ने अपनी अलग दुकान खोल ली, अलग ग्राहक बना लिए, उन्हें अलग पहचान चिह्न दे दिए और अपनेअपने अनुयायियों को दूसरों से अलग रहने का आदेश दे दिया.

भारत का एक विशाल समूह स्वयं को किसी न किसी धर्म से संबंधित अवश्य बताता है.

शैव समाज की स्थापना बासवन्ना ने 12वीं शताब्दी में की थी. इसी मत के उपासक लिंगायत कहलाते हैं. बासवन्ना के अनुयायियों में अधिकतर दलित थे. हिंदू धर्म की भेदभाव वाली व्यवस्था के बीच उन्होंने समाज सुधार शुरू किया. उन्होंने जाति व्यवस्था में दमन के खिलाफ आंदोलन छेड़ा. वेदों को खारिज किया और मूर्तिपूजा का विरोध किया.

लिंगायत को अलग धर्म घोषित करने की मांग हमेशा से की जाती रही है. इस समुदाय के 2 वर्ग हैं. लिंगायत और वीरशैव. लिंगायत दक्षिण भारत के कर्नाटक, आंध्र प्रदेश की हिंदू धर्म की चातुर्वर्ण्य व्यवस्था की सताई निचली जातियां हैं जिन के साथ सदियों से छुआछूत, भेदभाव होता आया है. वे अब वेदों में विश्वास नहीं करते और हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार अपना जीवन नहीं जीते. इस के उलट, वीरशैव लिंगभाव वेदों में विश्वास करते हैं. वे चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को भी मानते हैं और सभी परंपराओं व मान्यताओं का दृढ़ता से पालन करते हैं जो ब्राह्मण कहते या करते हैं?.

आम मान्यता है कि लिंगायत और वीरशैव एक ही हैं पर कहा गया है कि एक हैं नहीं. वीरशैव लोगों का अस्तित्व बासवन्ना के आने से पहले था और  वे शिव की पूजा करते  हैं. उधर, लिंगायत समुदाय का कहना है कि वे शिव की पूजा नहीं करते, लेकिन अपने शरीर पर ईष्टलिंग धारण करते हैं. ईष्टलिंग एक गेंदनुमा आकृति होती है जिसे वे धागे से अपने शरीर से बांधते हैं.

हिंदू धर्म से जितने भी अलग पंथ, संप्रदाय बने हैं वे इस के भीतर की जातिगत भेदभाव, छुआछूत, ऊंचनीच जैसी बुराइयों को खत्म करने के नाम ले कर बने पर बाद में इन पंथों ने भी उसी तरह की बुराइयां अपना लीं.

हर पंथ अपने अनुयायियों के लिए आचारसंहिता बनाता है और जोर दिया जाता है कि वे अपनी जीवन पद्धति को उस के बताए अनुसार चलाएं. हर पंथ में किसी न किसी तरह की जाति व्यवस्था पिछले दरवाजे से कहीं न कहीं आ बैठी है.

गैरबराबरी का पेंच

समाज में विभाजन के भेदभाव के चलते एकता बाधित रही है. हिंदू वर्णव्यवस्था के प्रति बढ़ते आक्रोश के कारण हाल के दशकों में हजारों दलित, अछूत बौद्ध और ईसाई धर्म की शरण में चले गए.  इस की प्रतिक्रियास्वरूप भाजपा द्वारा शासित कई राज्यों द्वारा कानून बना कर इसलाम या ईसाई धर्म में धर्मपरिवर्तन करना मुश्किल बना दिया गया पर हिंदू धर्म में बराबरी पर ध्यान नहीं दिया गया. भेदभाव वाली व्यवस्था को अब भी जायज ठहराने की कोशिश की जाती है.

बासवन्ना जैसे समाजसुधारकों का उद्देश्य विभिन्न जातियों, वर्गों में बंटे समाज को भेदभाव से मुक्त कर समानता, एकता के सूत्र में बांधना था, पर राजनीतिक दल और धर्म के कारोबारी अपने स्वार्थों के लिए समाज को विभाजित कर फायदा उठा रहे हैं.

1980 के दशक में लिंगायतों ने कर्नाटक में ब्राह्मण रामकृष्ण हेगड़े पर भरोसा जताया था. जब  लोगों को लगा कि जनता दल स्थायी सरकार देने में विफल है तो उन्होंने कांग्रेस के वीरेंद्र पाटिल का समर्थन किया. 1989 में कांग्रेस की सरकार बनी और पाटिल मुख्यमंत्री चुने गए पर विवाद के चलते राजीव गांधी ने पाटिल को एयरपोर्ट पर ही मुख्यमंत्री पद से हटा दिया था. इस के बाद लिंगायत समुदाय ने कांग्रेस से मुंह मोड़ लिया और फिर से हेगड़े का समर्थन किया.

हेगड़े की मृत्यु के बाद लिंगायतों ने भाजपा के बी एस येदियुरप्पा को अपना नेता माना और 2008 में येदियुरप्पा राज्य के मुख्यमंत्री बने पर कुछ समय बाद उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण पद से हटाया गया तो 2013 के चुनाव में लोगों ने भाजपा से मुंह मोड़ लिया.

अब विधानसभा चुनावों में येदियुरप्पा को एक बार फिर से भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने की वजह है कि लिंगायत समाज में उन का मजबूत जनाधार है. कांग्रेस द्वारा लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा दे कर येदियुरप्पा के जनाधार को कमजोर करने की ही बड़ी कोशिश मानी जा रही है.

हिंदू समाज ने अपने धर्म के विभाजन से निकले बुरे नतीजों से कोई सबक नहीं सीखा. वह टुकड़ोंटुकड़ों में बंटता जा रहा है. जितना विभाजन बढ़ रहा है उतनी ही नफरत, संघर्ष और हिंसा बढ़ रही है.

हिंदू धर्म हजारों समाजों, पंथों, संप्रदायों और विचारधाराओं का कूड़ाघर है. इस के कमजोर बौद्धिक आधार वाले भारतीय समाज की प्रकृति मूर्खता से सराबोर यों ही नहीं है जिसे आसानी से किसी भी दिशा में हांका जा सकता है.

नेपाल, भूटान, अफगानिस्तान, म्यांमार, पाकिस्तान, बंगलादेश, मलयेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया के राजा अलगअलग थे, पर फिर भी मिथक रहा है कि यह अखंड भारतवर्ष था, वह टुकड़ेटुकड़े क्यों हुआ? वहां अब केवल अवशेष बचे हैं. 1947 में राजनीतिक कारणों से एक बड़ा भाग भारत बना और एक ही केंद्र के अंतर्गत है पर क्या यह आज भी एक ही समाज के लोगों का देश है?

विभाजन और हिंसा

एक ही धर्म में होने के बावजूद बराबरी न होना, समाज का अलगअलग विभाजन और इस विभाजन के कारण जंबूद्वीपे भारत का इतिहास विभाजनों के खून से सना हुआ है. मध्यकाल में शैव, शाक्त और वैष्णव आपस में लड़ते रहते थे. आर्यअनार्य के युद्ध, ब्राह्मणबौद्धों का संघर्ष इतिहास में दर्ज है. लिखित इतिहास के उदाहरणों में से 1310 महाकुंभ में महानिर्वाणी अखाड़े और वैष्णवों के बीच हुए खूनी संघर्ष में सैकड़ों जानें गईं. 1760 में शैव संन्यासियों और वैष्णव बैरागियों के बीच लड़ाई में सैकड़ों लोग मारे गए.

1984 सिख विरोधी दंगे इसी विभाजन से उपजी घृणा का परिणाम था. उस से पहले पंजाब में हिंदुओं की हत्याएं हुईं. सिखों में स्वयं आपसी ऊंचनीच के भेद पर दंगे, हिंसा आम हैं. देशभर में आएदिन दलितों के खिलाफ हिंसा जारी है.

यूरोपीय समाज ने अपने धर्म में फैलते पाखंड से सीख ली. वहां मध्यकाल में पुनर्जागरण आंदोलन शुरू हुआ. 14वीं से ले कर 17वीं शताब्दी तक आंदोलन चला. इस आंदोलन में ज्ञानार्जन ने जोर पकड़ा. शिक्षा में सर्वव्यापी सुधार हुआ. तकनीक का विकास हुआ और लोगों में दुनिया को समझने में आमूल परिवर्तन आया.

असल में जितने धर्म, पंथ, संप्रदाय होंगे उतनी ही संकीर्णता बढे़गी. कहने को हर धर्म कहता है कि वह प्रेम, सहिष्णुता, शांति और एकता का पाठ सिखाता है पर पंथों ने उसे बांट दिया. पंथ एक संकीर्ण विचारधारा है जिस ने सिर्फ बांटने का काम किया है. और धर्म तो एक गांव को भी एक शामियाने के नीचे नहीं ला पाता, देश तो बहुत दूर की बात है.

स्वार्थी व पाखंडी लोग अलग पंथ का निर्माण कर लेते हैं. किसी वाकपटु प्रचारक के उपदेशों के नाम पर ढेर सारी आचारसंहिताएं, नियम, आचरण संबंधी लंबी फेहरिस्त बना कर समाज पर थोप दी जाती है. उस के नाम पंथ बन जाता है और फिर पंथ के नाम पर अलग किताबें बनेंगी, नियम बनेंगे, मूर्तियां बनेंगी, ध्वजा बनेंगी. फिर अपनेअपने पंथ का प्रचार किया जाने लगेगा. अनुयायी बनाने की होड़ लगेगी, इस से पंथों के बीच स्पर्धा, ईर्ष्या उपजेगी. और आपस  में झगड़े होने लगेंगे.

हर पंथ कहता है मेरा पंथ बड़ा है, सच्चा है, असली है. मेरी ध्वजा ऊंची है. इस तरह पंथ और उस के अनुयायी दूसरे पंथों और उन के अनुयायियों से अलग हो जाते हैं. बंटवारे से अपनापन भूल कर नफरत का मिजाज बन जाता है. आपस में आस्था और विचारधाराओं का बंटवारा हो जाता है पर, दरअसल, यह मानवता का बंटवारा होता है. शांति, प्रेम, एकता खत्म हो जाती है. पंथ कई बार धर्म बन जाता है, दूसरों के खून का प्यासा.

अंधविश्वासी भीड़

चतुर, पाखंडी लोगों द्वारा गुरु बन कर अंधविश्वासी जनता को अपना अनुयायी बना कर नया मत पेश कर चलाना व्यवसाय हो गया है. हिंदू समाज खुद ही टुकड़ों में बंट कर अपनी अलग पहचान बनाए रखना चाहता है. वह बराबरी की बात तो करता है पर जब फायदे की बात आती है जो स्वयं को धर्म, जाति, वर्ग, गोत्र, उपगोत्र से मुक्त नहीं कर पाता. इसी का फायदा धर्मगुरु उठा रहे हैं और अपने स्वार्थ के लिए उसे बांट रहे हैं. पंथों ने जनता की उत्पादक सोच को कुंद कर दिया है. क्या यह वजह नहीं है कि पिछले दशकों में देश में कोई नया उद्योग नहीं आया, सिर्फ धंधे आए हैं.

जो भी व्यक्ति जिस भी देवता, अवतार, गुरु, संत, नेता को पूज रहा है वह देश के टुकड़े कर रहा है. ये जितने पंथ, संप्रदाय बने हुए हैं या बन रहे हैं वे समाज के भले के लिए नहीं बन रहे. कोई भी पंथ समाज के भले के लिए कुछ नहीं कर रहा है. अगर सुधार के लिए बने हैं तो समाज में सुधार दिखता क्यों नहीं.

अनगिनत पंथों, संप्रदायों के चलते चोरी, बेईमानी, अकर्मण्यता, अंधविश्वास, आडंबर, पाखंड कम नहीं हुआ. समाज में प्रेम, शांति कायम नहीं हुई है. इस के उलट, समाज, परिवार में कलह, अशांति बढ़ती जा रही है. पंथों, संप्रदायों की सत्ता में भ्रष्टाचार, ऐयाशी की गंगा मुहाने तोड़ रही है. आएदिन पंथों के गुरु बलात्कार, छेड़खानी के मामलों में जेल जा रहे हैं.

यह सब खंडखंड बंटते समाज के कारण है. यह भारतीय समाज के लिए एक चुना हुआ आत्मघात है. राजनीतिक दलों और धर्म के धंधेबाजों को हिंदुओं को बांट कर रखने में ही भलाई नजर आती है. कठिनाई यह है कि शिक्षित समाज भी कर्मठता से ज्यादा धर्मस्थलों की चिंता कर रहा है. कारखानों और प्रयोगशालाओं की जगह सदियों पुराने रीतिरिवाजों का मूर्खतापूर्ण पालन कर नए भारत की कल्पना की जा रही है. यह कमजोर नींव पर न होगा.

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मोती सा गांव चमकाती देहाती लड़कियां

52 साला लोकेश कुमार तोमर एक हुनरमंद माला कारीगर हैं. उन की बेटी नेहा ने हाल ही में गे्रजुएशन की पढ़ाई पूरी की है.

लोकेश कुमार तोमर मेरठ, उत्तर प्रदेश से 24 किलोमीटर दूर मुडाली गांव में रहते हैं. उन की बेटी नेहा मोतियों की बहुत उम्दा कारीगर है.

12 साल की उम्र से ही नेहा मोती के कंगन व माला बनाने में अपने पिता की मदद करने लगी थी. आज वह रोज 3 सौ से 4 सौ रुपए तक कमा लेती है.

लोकेश कुमार ऐसे अकेले शख्स नहीं हैं, जिन का पूरा परिवार इस कारोबार से जुड़ा है, बल्कि इस इलाके के 25 हजार लोगों में से 80 फीसदी आबादी मोतियों के काम में लगी हुई है. अब इस गांव को ‘मोती गांव’ के नाम से जाना जाने लगा है.

इसी इलाके की एक दबंग औरत निर्मल बालियान का कहना है, ‘‘इस इलाके की ज्यादातर औरतें व लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी हैं. ये औरतें खाली समय में काम कर के अपने परिवार की माली मदद करती हैं, जो पूरे दिन खेतों में मेहनतमशक्कत करते हैं.

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‘‘गांवभर का चलन है कि लड़कियों को कम उम्र में ही काम करने के लिए बढ़ावा दिया जाता है, जो खुशीखुशी अपने परिवार की मदद करने लगती हैं.’’

20 सालों से माला बनाने में लगी बिमला का कहना है, ‘‘काम में मसरूफ रहने से नौजवान पीढ़ी  गलत बातों की ओर सोचती तक नहीं.’’

मुडाली गांव के काफी असरदार शख्स रोहिल अहमद का कारोबार काफी बड़ा है. वे पूरे देश में अपना माल भेजते हैं. उन का कहना है, ‘‘बहुत सी औरतें इस काम में जल्दी ही माहिर हो जाती हैं. उन्हें मोतियों को नायलोन के धागे में पिरोने में कोई खास दिक्कत नहीं होती.’’

कुछ गांव वाले बताते हैं कि 27 साल पहले मोहम्मद सबरंग मुडाली गांव में माला पिरोने के लिए कुछ मोती ले कर आए थे. पूरे दिन काम करने के बाद वे हर माला का 10 रुपए का भुगतान करते थे. वह रकम गांव वालों द्वारा चरखे पर बनाए गए सूत की मजदूरी से 4 सौ गुना ज्यादा थी. आज यही कारोबार 12 करोड़ रुपए का है.

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मोतीजेवरों के कारोबारी वकील अहमद दूरदराज के कई खरीदारों से व्हाट्सऐप द्वारा मेलजोल बनाए रखते हैं. उन का कहना है, ‘‘हमारे मोतियों से बने गहने चेन्नई, बेंगलुरु, मुंबई के साथसाथ राजस्थान के कई शहरों में जाते हैं. हम उन्हें गहनों के नमूने के फोटो ह्वाट्सऐप पर ही मुहैया करा देते हैं.’’

वे आगे कहते हैं कि अगर सरकार ध्यान दे, तो यह कारोबार कई गुना ज्यादा बढ़ सकता है. क्योंकि नकद रकम का लेनदेन जोखिम भरा है, इसलिए ज्यादातर ग्राहक औनलाइन भुगतान करना चाहते हैं. बैंक की इस सुविधा की कमी में कच्चा माल खरीदने व समय पर बना माल पहुंचाने में कई मुश्किलें सामने आती हैं.

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पत्रकारिता की आड़ में देह व्यापार

कानपुर की क्राइम ब्रांच के आईजी आलोक कुमार सिंह को किसी व्यक्ति ने फोन पर जो जानकारी दी थी, वह वाकई चौंका देने वाली थी. एकबारगी तो आईजी साहब को भी खबर पर विश्वास ही नहीं हुआ. पर इसे अनसुना करना भी उचित नहीं था. अत: उन्होंने उसी समय क्राइम ब्रांच प्रभारी ऋषिकांत शुक्ला को फोन कर के अपने कैंप कार्यालय पर आने को कहा.

10 मिनट बाद क्राइम ब्रांच प्रभारी ऋषिकांत शुक्ला आईजी आलोक कुमार सिंह के निवास पर पहुंच गए. आईजी ने ऋषिकांत की ओर मुखातिब हो कर कहा, ‘‘शुक्लाजी, फीलखाना क्षेत्र के पटकापुर में कालगर्ल का धंधा होने की जानकारी मिली है. और शर्मनाक बात यह है कि फीलखाना थाना व चौकी के कुछ पुलिसकर्मी ही कालगर्लों को संरक्षण दे रहे हैं. तुम जल्द से जल्द इस सूचना की जांच कर के दोषी पुलिसकर्मियों की जानकारी मुझे दो. इस बात का खयाल रखना कि यह खबर किसी भी तरह लीक न हो.’’

ऋषिकांत शुक्ला कानपुर के कई थानों में तैनात रह चुके थे. उन के पास मुखबिरों का अच्छाखासा नेटवर्क था. अत: आईजी का आदेश पाते ही उन्होंने फीलखाना क्षेत्र में मुखबिरों को अलर्ट कर दिया.

2 दिन बाद ही 2 मुखबिर ऋषिकांत शुक्ला के औफिस पहुंचे. उन्होंने उन्हें बताया, ‘‘सर, फीलखाना थाना क्षेत्र के पटकापुर में सूर्या अपार्टमेंट के ग्राउंड फ्लोर के एक फ्लैट में हाईप्रोफाइल सैक्स रैकेट चल रहा है. इस रैकेट की संचालिका बरखा मिश्रा है. वह पत्रकारिता की आड़ में यह धंधा करती है. उस ने बचाव के लिए वहां अपना एक औफिस भी खोल रखा है. उसे कथित मीडियाकर्मी, पुलिस तथा सफेदपोशों का संरक्षण प्राप्त है.’’

क्राइम ब्रांच प्रभारी ऋषिकांत शुक्ला ने मुखबिर से मिली सूचना से आईजी आलोक कुमार सिंह को अवगत करा दिया. सूचना की पुष्टि हो जाने के बाद आईजी ने एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा को इस मामले में काररवाई करने के निर्देश दिए.

चूंकि मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए मीणा ने एसपी (पूर्वी) अनुराग आर्या के नेतृत्व में एक टीम गठित की. इस टीम में उन्होंने सीओ कोतवाली अजय कुमार, सीओ सदर समीक्षा पांडेय, क्राइम ब्रांच प्रभारी ऋषिकांत शुक्ला, फीलखाना इंसपेक्टर देवेंद्र सिंह, एसआई विनोद मिश्रा, रावेंद्र कुमार, महिला थानाप्रभारी अर्चना गौतम तथा महिला सिपाही पूजा व सरिता सिंह को शामिल किया.

3 जनवरी, 2018 की शाम को यह टीम पटकापुर पुलिस चौकी के सामने स्थित सूर्या अपार्टमेंट पहुंची. कांस्टेबल पूजा ने इस अपार्टमेंट के ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाली बरखा मिश्रा के फ्लैट का दरवाजा खटखटाया. चंद मिनट बाद एक खूबसूरत महिला ने दरवाजा खोला. सामने पुलिस टीम को देख कर वह बोली, ‘‘कहिए, आप लोगों का कैसे आना हुआ?’’

‘‘क्या आप का नाम बरखा मिश्रा है?’’ सीओ समीक्षा पांडेय ने पूछा.

‘‘जी हां, कहिए क्या बात है?’’  वह बोली.

‘‘मैडम, हमें पता चला है कि आप के फ्लैट में देह व्यापार चल रहा है.’’ समीक्षा पांडेय ने कहा.

इस बात पर बरखा मिश्रा न डरी न सहमी बल्कि मुसकरा कर बोली, ‘‘आप जिस बरखा की तलाश में आई हैं, मैं वह नहीं हूं. मैं तो मीडियाकर्मी हूं. क्या आप ने मेरा बोर्ड नहीं देखा. पत्रकार के साथसाथ मैं समाजसेविका भी हूं. मैं भ्रष्टाचार निरोधक कमेटी की वाइस प्रेसीडेंट हूं.’’ रौब से कहते हुए बरखा ने एक समाचारपत्र का प्रैस कार्ड व कमेटी का परिचय पत्र उन्हें दिखाया.

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बरखा मिश्रा ने पुलिस टीम पर अपना प्रभाव जमाने की पूरी कोशिश की, लेकिन पुलिस टीम उस के दबाव में नहीं आई. टीम बरखा मिश्रा को उस के फ्लैट के अंदर ले गई. वहां का नजारा कुछ और ही था. फ्लैट में 3 युवक, 3 युवतियों के साथ आपत्तिजनक स्थिति में थे. जबकि एक युवक पैसे गिन रहा था.

पुलिस को देख कर सभी भागने की कोशिश करने लगे. लेकिन पुलिस टीम ने उन्हें भागने का मौका नहीं दिया. सीओ सदर समीक्षा पांडेय ने महिला पुलिसकर्मियों के सहयोग से संचालिका सहित चारों युवतियों को कस्टडी में ले लिया, जबकि क्राइम ब्रांच प्रभारी ऋषिकांत शुक्ला ने चारों युवकों को अपनी कस्टडी में ले लिया.

फ्लैट की तलाशी ली गई तो वहां से 72,500 रुपए नकद, शक्तिवर्धक दवाएं, कंडोम तथा अन्य आपत्तिजनक चीजें मिलीं. पुलिस ने इन सभी चीजों को अपने कब्जे में ले लिया.

संचालिका बरखा मिश्रा के पास से प्रैस कार्ड, भ्रष्टाचार निरोधक कमेटी का कार्ड, आधार कार्ड व पैन कार्ड मिले, जो 2 अलगअलग नामों से बनाए गए थे. सभी आरोपियों को हिरासत में ले कर पुलिस थाना फीलखाना लौट आई.

एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा और एसपी (पूर्वी) अनुराग आर्या भी थाना फीलखाना आ पहुंचे. पुलिस अधिकारियों के सामने अभियुक्तों से पूछताछ की गई तो एक युवती ने अपना नाम प्रिया निवासी शिवली रोड, थाना कल्याणपुर, कानपुर सिटी बताया.

दूसरी युवती ने अपना नाम विनीता सक्सेना, निवासी आर्यनगर, थाना स्वरूपनगर तथा तीसरी युवती ने अपना नाम नेहा सेठी निवासी मकड़ीखेड़ा, कानपुर सिटी बताया. जबकि संचालिका बरखा मिश्रा ने अपना पता रतन सदन अपार्टमेंट, आजादनगर, कानपुर सिटी बताया.

अय्याशी करते जो युवक गिरफ्तार हुए थे, उन के नाम शेखर गुप्ता, गौरव सिंह, नवजीत सिंह और दीपांकर गुप्ता थे. सभी कानपुर सिटी के ही अलगअलग इलाकों के रहने वाले थे.

पुलिस ने संचालिका बरखा मिश्रा व अन्य आरोपियों के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं. पता चला कि बरखा मिश्रा का पूरा नेटवर्क औनलाइन चल रहा था.

उस ने कई वेबसाइटों पर युवतियों की फोटो व मोबाइल नंबर अपलोड कर रखे थे, जिन के जरिए ग्राहक संपर्क करते थे. इतना ही नहीं वाट्सऐप, फेसबुक के जरिए भी ग्राहकों को युवतियों की फोटो व मैसेज भेज कर संपर्क किया जाता था.

ग्राहकों की डिमांड पर वह दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, बनारस व मुंबई आदि शहरों के दलालों की मार्फत रशियन व नेपाली युवतियों को भी मंगाती थी. बरखा को कुछ मीडियाकर्मियों, पुलिस वालों, रसूखदार लोगों व प्रशासनिक अधिकारयों का संरक्षण प्राप्त था. समाजसेवा का लबादा ओढ़े कुछ सफेदपोश भी बरखा मिश्रा को संरक्षण दे रहे थे. ऐसे लोग खुद भी उस के यहां रंगरलियां मनाते थे.

पूछताछ में पुलिस ने बरखा की पूरी जन्मकुंडली पता कर ली. साधारण परिवार में पली बरखा के कालेज टाइम में कई बौयफ्रैंड थे, जिन के साथ वह घूमतीफिरती और मौजमस्ती करती थी.

समय आने पर बरखा के मांबाप ने उस की शादी कर दी. मायके से विदा हो कर बरखा ससुराल पहुंच गई. ससुराल में बरखा कुछ समय तक तो शरमीली बन कर रही पर बाद में वह धीरेधीरे खुलने लगी.

दरअसल, बरखा ने जैसे सजीले युवक से शादी का रंगीन सपना संजोया था, उसे वैसा पति नहीं मिला. उस का पति दुकानदार था और उस की आमदनी सीमित थी. वह न तो पति से खुश थी और न उस की आमदनी से उस की जरूरतें पूरी होती थीं. बरखा आए दिन उस से शिकायत करती रहती थी. फलस्वरूप आए दिन घर में कलह होने लगी.

पति चाहता था कि बरखा मर्यादा में रहे और देहरी न लांघे, लेकिन बरखा को बंधन मंजूर नहीं था. वह तो चंचल हिरणी की तरह विचरण करना चाहती थी. उसे घर का चूल्हाचौका करना या बंधन में रहना पसंद नहीं था. इन्हीं सब बातों को ले कर पति व बरखा के बीच झगड़ा बढ़ने लगा. आखिर एक दिन ऐसा भी आया कि आजिज आ कर बरखा ने पति का साथ छोड़ दिया.

पति का साथ छोड़ने के बाद वह कौशलपुरी में किराए पर रहने लगी. वह पढ़ीलिखी और खूबसूरत थी. उसे विश्वास था कि उसे जल्द ही कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी और उस का जीवन मजे से कटेगा. इसी दिशा में उस ने कदम बढ़ाया और नौकरी की तलाश में जुट गई.

बरखा को यह पता नहीं था कि नौकरी इतनी आसानी से नहीं मिलती. वह जहां भी नौकरी के लिए जाती, वहां उसे नौकरी तो नहीं मिलती लेकिन उस के शरीर को पाने की चाहत जरूर दिखती. उस ने सोचा कि जब शरीर ही बेचना है तो नौकरी क्यों करे.

लिहाजा उस ने पैसे के लिए अपना शरीर बेचना शुरू कर दिया. वह खूबसूरत भी थी और जवान भी, इसलिए उसे ग्राहक तलाशने में कोई ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पडी. यह काम करने में उसे शुरूशुरू में झिझक जरूर महसूस हुई लेकिन कुछ समय बाद वह देहधंधे की खिलाड़ी बन गई. आमदनी बढ़ाने के लिए उस ने अपने जाल में कई लड़कियों को भी फांस लिया था.

जब इस धंधे से उसे ज्यादा आमदनी होने लगी तो उस ने अपना कद और दायरा भी बढ़ा लिया. अब वह किराए पर फ्लैट ले कर धंधे को सुचारू रूप से चलाने लगी.

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वह नई उम्र की लड़कियों को सब्जबाग दिखा कर अपने जाल में फंसाती और देह व्यापार में उतार देती. उस के निशाने पर स्कूल कालेज की वे लड़कियां होती थीं, जो अभावों में जिंदगी गुजार रही होती थीं. बरखा खूबसूरत होने के साथसाथ मृदुभाषी भी थी. अपनी बातचीत से वह सामने वाले को जल्द प्रभावित कर लेती थी. इसी का फायदा उठा कर उस ने कई सामाजिक संस्थाओं के संचालकों, नेताओं, मीडियाकर्मियों, पुलिसकर्मियों तथा प्रशासनिक अधिकारियों से मधुर संबंध बना लिए थे. इन्हीं की मदद से वह बड़े मंच साझा करने लगी थी. पुलिस थानों में पंचायत करने लगी. यही नहीं, उस ने एक मीडियाकर्मी को ब्लैकमेल कर के प्रैस कार्ड भी बनवा लिया और एक सामाजिक संस्था में अच्छा पद भी हासिल कर लिया.

बरखा मिश्रा को देह व्यापार से कमाई हुई तो उस ने अपना दायरा और बढ़ा लिया. दिल्ली, मुंबई, आगरा व बनारस के कई दलालों से उस का संपर्क बन गया. इन्हीं दलालों की मार्फत वह लड़कियों को शहर के बाहर भेजती थी तथा डिमांड पर विदेशी लड़कियों को शहर में बुलाती भी थी.

कुछ ग्राहक रशियन व नेपाली बालाओं की डिमांड करते थे. उन से वह मुंहमांगी रकम लेती थी. ये लड़कियां हवाईजहाज से आती थीं और हफ्ता भर रुक कर वापस चली जाती थीं. बरखा के अड्डे पर 5 से 50 हजार रुपए तक में लड़की बुक होती थीं. होटल व खानेपीने का खर्च ग्राहक को ही देना होता था.

बरखा इस धंधे में कोडवर्ड का भी प्रयोग करती थी. एजेंट को वह चार्ली के नाम से बुलाती थी और युवती को चिली नाम दिया गया था. किसी युवती को भेजने के लिए वह वाट्सऐप पर भी चार्ली टाइप करती थी. मैसेज में भी वह इन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करती थी. चार्ली नाम के उस के दर्जनों एजेंट थे, जो युवतियों की सप्लाई करते थे. एजेंट से जब उसे लड़की मंगानी होती तो वह कहती, ‘‘हैलो चार्ली, चिली को पास करो.’’

लोगों को शक न हो इसलिए बरखा एक क्षेत्र में कुछ महीने ही धंधा करती थी. जैसे ही उस के बारे में सुगबुगाहट होने लगती तो वह क्षेत्र बदल देती थी. पहले वह गुमटी क्षेत्र में धंधा करती थी. फिर उस ने स्वरूपनगर में अपना काम जमाया. स्वरूपनगर स्थित रतन अपार्टमेंट में उस ने किराए पर फ्लैट लिया और सैक्स रैकेट चलाने लगी.

नवंबर, 2017 में बरखा ने फीलखाना क्षेत्र के पटकापुर स्थित सूर्या अपार्टमेंट में ग्राउंड फ्लोर पर एक फ्लैट किराए पर लिया. यह फ्लैट किसी वकील का था. उस ने वकील से कहा कि वह पत्रकार है. उसे फ्लैट में अपना औफिस खोलना है. इस फ्लैट में वह धंधा करती थी, जबकि रहने के लिए उस ने आजादनगर के सदन अपार्टमेंट में फ्लैट किराए पर ले रखा था.

दरअसल, एक मीडियाकर्मी ने ही बरखा को सुझाव दिया था कि वह समाचारपत्र का कार्यालय खोल ले. इस से पुलिस तथा फ्लैटों में रहने वाले लोग दबाव में रहेंगे. यह सुझाव उसे पसंद आया और उस ने फ्लैट किराए पर ले कर समाचार पत्र का बोर्ड भी लगा दिया. यही नहीं, उस ने धंधे में शामिल लड़कियों से कह रखा था कि कोई पूछे तो बता देना कि वह प्रैस कार्यालय में काम करती हैं.

इस फ्लैट में सैक्स रैकेट चलते अभी एक महीना ही बीता था कि किसी ने इस की सूचना आईजी आलोक कुमार सिंह को दे दी, जिस के बाद पुलिस ने काररवाई की.

पुलिस द्वारा गिरफ्तार की गई 19 वर्षीय विनीता सक्सेना मध्यमवर्गीय परिवार में पलीबढ़ी थी. इंटरमीडिएट पास करने के बाद जब उस ने डिग्री कालेज में प्रवेश लिया तो वहां उस की कई फ्रैंड्स ऐसी थीं जो रईस घरानों से थीं. वे महंगे कपड़े पहनतीं और ठाठबाट से रहती थीं. महंगे मोबाइल फोन रखतीं, रेस्टोरेंट जातीं और खूब सैरसपाटा करती थीं. विनीता जब उन्हें देखती तो सोचती, ‘काश! ऐसे ठाठबाट उस के नसीब में भी होते.’

एक दिन एक संस्था के मंच पर विनीता की मुलाकात बरखा मिश्रा से हुई. उस ने विनीता को बताया कि वह समाजसेविका है. राजनेताओं, समाजसेवियों, पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों में उस की अच्छी पैठ है.

उस की बातों से विनीता प्रभावित हुई, फिर वह उस से मिलने उस के घर भी जाने लगी. घर आतेजाते बरखा ने विनीता को रिझाना शुरू कर दिया और उस की आर्थिक मदद करने लगी. बरखा समझ गई कि विनीता महत्त्वाकांक्षी है. यदि उसे रंगीन सपने दिखाए जाएं तो वह उस के जाल में फंस सकती है.

इस के बाद विनीता जब भी बरखा के घर आती तो वह उस के अद्वितीय सौंदर्य की तारीफ करती. धीरेधीरे बरखा ने विनीता को अपने जाल में फांस कर उसे देह व्यापार में उतार दिया. घटना वाले दिन वह ग्राहक शेखर गुप्ता के साथ रंगेहाथ पकड़ी गई थी.

सैक्स रैकेट में पकड़ी गई 21 वर्षीय प्रिया के मातापिता गरीब थे. कालेज की पढ़ाई का खर्च व अपना खर्च वह ट्यूशन पढ़ा कर निकालती थी. प्रिया का एक बौयफ्रैंड था, जिस का बरखा मिश्रा के अड्डे पर आनाजाना था. उस ने प्रिया की मुलाकात बरखा से कराई. बरखा ने उसे सब्जबाग दिखाए और उस की पहुंच के चलते उसे नौकरी दिलाने का वादा किया.

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नौकरी तो नहीं मिली, बरखा ने उसे देह व्यापार में धकेल दिया. प्रिया की एक रात की कीमत 10 से 15 हजार रुपए होती थी. मिलने वाली रकम के 3 हिस्से होते थे. एक हिस्सा संचालिका बरखा का, दूसरा दलाल का तथा तीसरा हिस्सा प्रिया का होता था. घटना वाली शाम वह दीपांकर गुप्ता के साथ पकड़ी गई थी.

जिस्मफरोशी का धंधा करते रंगेहाथों पकड़ी गई 40 वर्षीय नेहा सेठी शादीशुदा व 2 बच्चों की मां थी. नेहा का पति शराबी था. वह जो कमाता, शराब पर ही उड़ा देता.

नेहा उस से शराब पीने को मना करती तो वह उस की पिटाई कर देता था. एक दिन तो हद ही हो गई. शराब के नशे में उस ने नेहा को पीटा फिर बच्चों सहित घर से निकाल दिया.

तब नेहा बच्चों के साथ मकड़ीखेड़ा में रहने लगी. उस ने बच्चों के पालनपोषण के लिए कई जगह नौकरी की. लेकिन जिस्म के भूखे लोगों ने नौकरी के बजाय उस के जिस्म को ज्यादा तवज्जो दी. नेहा ने सोचा जब जिस्म ही बेचना है तो नौकरी क्यों करे.

उन्हीं दिनों उसे बरखा मिश्रा के सैक्स रैकेट के बारे में पता चला. उस ने एक दलाल के मार्फत बरखा मिश्रा से संपर्क किया, फिर उस के फ्लैट पर धंधे के लिए जाने लगी. घटना वाले रोज वह ग्राहक गौरव सिंह के साथ पकड़ी गई थी.

अय्याशी करते पकड़ा गया शेखर गुप्ता धनाढ्य परिवार का है. उस के पिता का सिविल लाइंस में बड़ा अस्पताल है. शेखर बरखा का नियमित ग्राहक था. वह उसे ग्राहक भी उपलब्ध कराता था. इस के बदले में उसे मुफ्त में मौजमस्ती करने को मिल जाती थी. शेखर के संबंध कई बड़े लोगों से थे.

शेखर जब पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया तो इन्हीं रसूखदारों ने पुलिस को फोन कर के शेखर को छोड़ देने की सिफारिश की थी. लेकिन पुलिस ने यह कह कर मना कर दिया कि मामला उच्च अधिकारियों के संज्ञान में है, इसलिए कुछ नहीं हो सकता.

गिरफ्तार हुए नवजीत सिंह उर्फ टाफी सरदार के पिता एक व्यवसायी हैं. नवजीत की पहले कौशलपुरी में कैसेट की दुकान थी. वहां वह अश्लील सीडी बेचने के जुर्म में पकड़ा गया था. बरखा मिश्रा जब कौशलपुरी में सैक्स रैकेट चलाती थी, तभी उस की मुलाकात नवजीत से हुई थी. पहले वह बरखा के अड्डे पर जाता था. फिर वह उस का खास एजेंट बन गया. ग्राहकों को लाने के लिए बरखा उसे अच्छाखासा कमीशन देती थी.

दीपांकर गुप्ता तथा गौरव सिंह व्यापारी थे. बरखा के खास एजेंट टाफी सरदार से उन की जानपहचान थी. घटना वाले दिन टाफी सरदार ही उन्हें बरखा के अड्डे पर ले गया था. दोनों ने 15 हजार में सौदा किया था. उसी दौरान पुलिस की रेड पर पड़ गई. यद्यपि दोनों ने पुलिस को चकमा दे कर भागने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पाए.

थाना फीलखाना पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम की धारा 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से सभी को जिला कारागार भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

तमन्ना का डांस देख आप भी हो जाएंगे उनके दीवाने

बौलीवुड अदाकारा और साउथ की सुपरस्टार तमन्ना भाटिया का सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में अवंतिका का किरदार निभाने वाली तमन्ना बेहद खूबसूरत डांस करती नजर आ रही हैं.

इस वीडियो को तमन्ना ने खुद अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया है, जिसमें वह हौलीवुड सिंगर रैपर डीजे स्नैक के गाने मेजेंटा रिदिम पर थिरकती दिख रहा हैं.

तमन्ना ने डीजे को भी इस गाने को लेकर अपने जुनून के बारे में बताया था. इतना ही नहीं तमन्ना और डीजे स्नेक के बीच इस गाने को लेकर कई सारी बातें हुईं. जिसके बाद डीजे स्नेक ने उन्हें इस गाने पर डांस करने का चैलेंज दिया. जिसे तमन्ना ने अब बखूबी पूरा कर दिखाया है.

अब तमन्ना के इस डांस वीडियो को डीजे स्नेक ने भी अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया. वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि, “पेरिस से इंडिया तक. बाहुबली की एक्ट्रेस तमन्ना भाटिया को मजेंटा रिदिम की धुन पर देसी अंदाज में डांस करते देखना वाकई मजेदार है.”

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सभ्यता का चीरहरण आखिर करवा कौन रहा

जम्मू के कठुआ, उत्तर प्रदेश के उन्नाव, बिहार के सासाराम, गुजरात के सूरत में हुए कुछ बलात्कारों ने देश को दहला दिया है. ज्यादा बड़ी बात इन मामलों में यह रही कि बलात्कारियों को पकड़ने में पुलिस ने आनाकानी की. जब तक दबाव न पड़ा मामला लटका रहा, क्योंकि हर मामले में अभियुक्त सत्ताधारी पार्टी से जुड़ा था. जहां सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह कमजोरों को बचाएगी, इन सभी मामलों में यह साफ हुआ कि सत्ता के निकट हों तो आप का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता और किसी औरत, लड़की या बच्ची की जिंदगी सुरक्षित नहीं है.

मांएं अकसर लड़कियों की स्वच्छंदता पर रोना रोती हैं कि फैशन और आधुनिकता के चलते बलात्कार हो रहे हैं पर इन सब मामलों में कोई भी लड़की फैशनेबल नहीं थी. इन सब मामलों में बलात्कार का कारण अपना रोब जमाना था और दुनिया को यह बताना था कि पार्टी और सरकार उन के साथ हैं. वे जो चाहें कर सकते हैं.

सब से बड़ी बात यह रही कि स्मृति ईरानी, सुषमा स्वराज, मीनाक्षी लेखी, निर्मला सीतारमन, उमा भारती जैसी औरतों, जो पहले हर बलात्कार पर आसमान सिर पर उठा लेती थीं, इन मामलों में चुप ही रहीं यानी बलात्कार का रंग सत्ता के साथ बदल जाता है और बलात्कार तब छोटी सी बात होती है जब आप सत्ता में हों. जघन्य पाप है अगर आप सत्ता में न हों.

औरतों का यह दोगलापन ही उन के प्रति गुनाहों के लिए जिम्मेदार है. हर बेटी की मां रोना रोती है कि उस की बेटी को सास यातना देती है पर वही औरत अपने बेटे की पत्नी को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ती. हर औरत दूसरी लड़की पर होने वाले दुख के प्रति एक परपीड़न सुख महसूस करती है. हिंदी फिल्मों में ललिता पवार टाइप की सासों की भरमार रही है और इन को फिल्माया ही इसलिए जाता रहा है, क्योंकि ये घरघर की कहानी रही हैं और फिल्म निर्माता औरतों को इन्हीं के जरीए आकर्षित करते रहे हैं.

औरतों की मानसिकता उतनी ही जिम्मेदार है जितनी पुरुषों की बलात्कार को बदला लेने के एक हथियार की. जम्मू में 8 साल की लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के पीछे कहा यही जा रहा है कि इस से घुमंतू गड़रियों को भगाया जा सकेगा. औरतों को ढाल भी बनाया जाता है और उन पर अत्याचार पूरे परिवार, कौम या गुट का हथियार भी.

जौहर को जो सम्मान मिला है इसीलिए ताकि शत्रु के हाथों औरतें पड़ें ही नहीं. औरतों से कहा भी यही जाता है कि मर जाना पर बलात्कार के बाद मुंह नहीं दिखाना और यह कहने वाली सब से पहले मां ही होती है, क्योंकि वही जानती है कि वह अपने रिश्तेदारों, पासपड़ोस में कभी इज्जत से नहीं बैठ पाएगी.

इन बलात्कारों का अब जम कर राजनीतिकरण हो रहा है पर भारतीय जनता पार्टी शिकायत नहीं कर सकती, क्योंकि उसी की महिला नेताओं ने 2014 से पहले के हर बलात्कार को राजनीतिक हथियार बनाया था. औरतों की इज्जत का मामला पार्टियों के लिए सत्ता पाने की सीढि़यां बन गया है. उन्हें औरतों की सुरक्षा की चिंता कम है, अपना मौका ढूंढ़ने की फिक्र ज्यादा. कांग्रेस भी अब वही कर रही है जिस का रास्ता भारतीय जनता पार्टी ने दिखाया था.

बलात्कार पूरे समाज के खिलाफ अपराध है. यह सभ्यता को नष्ट करने वाला तेजाब है. अपराधी भी अपराध करते हुए कांपें माहौल ऐसा होना चाहिए. पर जिस निडरता से बलात्कार हो रहे हैं उस से यह स्पष्ट है कि हर बलात्कारी के दिमाग में रहता है

कि यह सबक बलात्कार की पीडि़ता व उस का परिवार वर्षों याद रखेंगे. उसे अपने पकड़े जाने का जरा भी भय नहीं होता वरना वह मारपीट का सहारा लेता, लूटता, लेकिन बलात्कार पर न उतरता. उसे मालूम है कि उस का अपना समाज, उस की पार्टी, उस का परिवार, उस का धर्म उसे मर्द होने का तमगा देगा.

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हिन्दू युवा वाहिनी में मचा घमासान

जिस हिन्दू युवा वाहिनी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ताकत माना जाता है वहीं से उनको चुनौती मिल रही है. 2017 के विधानसभा चुनावों के पहले हिन्दू युवा वाहिनी ने प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह को संगठन से बाहर निकाल दिया था. सुनील सिंह पर आरोप लगा कि उन्होंने संगठन के लोगों को चुनाव मैदान में उतार कर आदेश की अवहेलना की थी. हिन्दू युवा वाहिनी को योगी आदित्यनाथ के नाम से ही जाना जाता था. पहले सुनील सिंह उसके प्रदेश अध्यक्ष और योगी आदित्यनाथ उसके सरंक्षक थे.

सुनील सिंह अपने निष्कासन को गलत मानते हैं. उनका कहना है कि योगी जी उनके गुरू है. भाजपा ने उनको गुमराह किया है. सुनील सिंह ने अपनी बात रखने के लिये लखनऊ के वीवीआईपी गेस्ट हाउस में आनन फानन में एक बैठक का आयोजन किया और खुद को हिन्दू युवा वाहिनी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया.

योगी सरकार को यह काम सही नहीं लगा. बिना अनुमति के बैठक करने के आरोप में सरकार ने गेस्ट हाउस के व्यवस्थाधिकारी आरपी सिंह को निलंबित कर दिया. सुनील सिंह कहते है हिन्दू युवा वाहिनी का मैं प्रदेश अध्यक्ष हूं. मैं अपने संगठन का विस्तार करना चाहता हूं. इसलिये अब इसका राष्ट्रीय स्तर पर गठन किये जाने की जरूरत पर बल दिया और खुद को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया. हिन्दू युवा वाहिनी के प्रदेश महामंत्री पीके मल्ल का कहना है कि जो आदमी संगठन से पहले ही निकाला जा चुका है उसके दावों का कोई मतलब नहीं रह जाता है.बै ठक के बाद से सुनील ही पर्दे से गायब हैं.

योगी भले ही सुनील सिंह को अपने संगठन से निकाल चुके हों, पर सुनील सिंह आज भी योगी को ही अपना गुरु मानते हैं. उनका कहना है योगी जी मेरे लिये राम की तरह हैं. मैं उनका सेवक हनुमान हूं. भाजपा के कुछ लोग उनको लड़ाना चाहते हैं. जिस दिन योगी जी भाजपा के काले जादू से बाहर आयेंगे उस दिन उनको गले लगायेंगे. सुनील सिंह कहते हैं मैं भाजपा से अपने गुरु के अपमान का बदला लूंगा. भाजपा आज हमारे गुरु को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दे तो वह भाजपा कार्यालय में चाय पिलाना मंजूर कर लेंगे. सुनील सिंह खुद को हनुमान बताते कहते हैं कि हनुमान ने लंका में आग लगाने के लिये राम से इजाजत नहीं ली थी. मेरे लिये भी भाजपा लंका की ही तरह है.

भाजपा और हिन्दू युवा वाहिनी के लोग सुनील सिंह के कामों को विरोधी गतिविधियां मानते हुये विपक्षी दलों की रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं. दूसरी ओर राजनीति के जानकार यह मान रहे हैं कि हिन्दू युवा वाहिनी के विवाद को भड़का कर योगी को कमजोर करने की कोशिश में भाजपा के कुछ लोग भी लगे हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह चर्चा का विषय है कि भाजपा में योगी का भविष्य 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम पर निर्भर करेगा. ऐसे में अगर योगी ताकतवर रहेंगे तो उनके खिलाफ मनमानी करना आसान नहीं होगा. ऐसे में अगर हिन्दू युवा वाहिनी कमजोर रहेगी, तो योगी आदित्यनाथ पार्टी के हर फैसले को मान लेंगे.

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झूठ बोलना सीखें : ऐसी पुस्तकें जरूर पढ़ें

आप ने रेलवेस्टेशनों, बसअड्डों, पैसेंजर गाडि़यों और महानगरों के फुटपाथों पर 10 रुपए में इंगलिश सिखाने का दावा करने वाली पुस्तकें खरीदी भले ही न हों मगर देखी जरूर होंगी. इन्हें अपनी जेब के अनुकूल, अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप पा सर्वसाधारण अपनी जेब ढीली करने को उत्सुक नजर आता है. और इस तरह यह धंधा चलता रहता है. समय की मार खाए गरीब बेचारे कभी यों 10 रुपए में अंगरेजी तो नहीं सीख पाते किंतु अपनी तरफ से पूरी कोशिश करने की आत्मसंतुष्टि उन्हें जरूर मिल जाती है. उस पुस्तक ने उन का कितना अंगरेजी ज्ञान बढ़ाया, यह तो नहीं कहा जा सकता. यह शोध का विषय है लेकिन चिंतनमननमंथन द्वारा मानसिक वादविवाद का आयोजन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि दरअसल इस सर्वसाधारण के जीवन को उन्नत करने के लिए अंगरेजी नहीं झूठ बोलना कैसे सीखें नामक पुस्तक की सख्त आवश्यकता है. सर्वशिक्षा अभियान के तहत अगर इसे बढ़ावा मिले तो अतिउत्तम. अनिवार्य पठनीय पुस्तक का दरजा मिले तो वाहवाह.

सत्यं वद प्रियं. वद न वद सत्यम अप्रियम, यह पाठ हिंदुस्तान की हर पाठशाल में पढ़ाया जाता रहा है और इस के सदके में हमारे जैसे झूठ बोलने में अक्षम लोगों का जमावड़ा हिंदुस्तान की धरती पर हो गया, जिन्हें आजादी के सठिया जाने के बाद भी मिडिल क्लास कह कर खूब लताड़ा गया. अब तो सब से बड़ा अड़ंगा है हमारी प्रगति में, वह यही है, हमारी मिडिल क्लास सत्यवादी सोच. इसलिए शरीर पर टैटू सा गुदा मिडिल क्लास रहनसहन, मिडिल क्लास भाषा.

यह तो मानी बात है कि कोई आदमी सच बोल कर प्रिय नहीं बना रह सकता. सच तो प्रकृति से ही कड़वा होता है, एकदम करेला, ऊपर से नीम चढ़ा जैसा. करेला तो जानते हैं न, छिलका उतार भी दिया जाए तब भी कड़वाहट अंदर पोरपोर तक भरी ही रहती है.

अभी तक हम ने तो सुना नहीं कि करेले को चाशनी में डुबो कर किसी ने बारहमासी रसगुल्ला बनाने में सफलता प्राप्त की हो, किसी को यह कला आई भी हो तो खानदानी शाही दवाखाना की तरह निश्चित ही चांदनी चौक की किसी गली में चुपचाप चल रही होगी. यों पटरियों पर तो वह न बिक रही होगी. यह हमारा सच तो होली पर बनने वाली गुझिया सी साख भी नहीं जुटा पाया कि चलो, सालाना जलसे में ही उस का कुछ जलवा हो. मगर वहां भी बुरा न मानो होली है का वरक लपेटा जाए तब जा कर कुछ बात बने.

इधर, झूठ की दादागीरी एकदम निराली है, बासमती चावल सी उस की महक आ ह ह हा…एकएक दाना एकदम खिला हुआ ताजगी से भरपूर. सब को मजा देने वाला. सब की इज्जत बचाने वाला. झूठ की खासीयत है वह हमेशा आराम से मेजपोश की तरह बिछा रहता है, खूबसूरत परदे की तरह लटका रहता है. सब की नंगई ढकी रहती है. सो, सब को समझ लेना चाहिए कि झूठ बोलना कितना आवश्यक है.

दुनिया तो, जी, झूठ से चलती है, सामने वाले की झूठी तारीफ करिए, आराम से रहिए. हंसिए, बोलिए चैन की नींद सोइए. वरना धरती सुंघाऊ , पानी पिलाने वाले, धूल चटाने वाले, दिन में तारे दिखाने वाले, छठी का दूध याद दिलाने वाले, चारों खाने चित्त कर देने वाले सत्य की मार के लिए स्वयं भी तैयार रहिए क्योंकि सामने वाला व्यक्ति सांप काटे की तरह पहला मौका हाथ आते ही आप पर वार करने से चूकेगा नहीं. फिर चाहे वह कोई रामदेव हो या कोई बालकृष्ण.

जनाब, बात तो धार्मिक व दलीय भावनाओं की है और सच के साथ वही सब से पहले आहत होती है. अब देखिए आप अपनेआप चलते कहीं गिर पड़ते हैं ठोकर खा कर, तो न अफसोस होता है न दर्द, बस उठे और फिर चल दिए. किंतु, सत्य का कोड़ा पड़े तो पीठ पर उभार छोड़ जाता है. इसलिए जनाब जानिए और समझिए अब हम रह रहे हैं ग्लोबल विलेज में, और राजनीतिज्ञों की सफलता के पांव तले दबेदबे सांस ले रहे हैं. उन के सफल घोटालों की अनवरत दास्तान कानफोड़ू कीर्तन की तरह धाड़धाड़ बज रही है वातावरण में. यह किस का कमाल है, मिथ्या वचन ना.

जिस के आगे 10 रुपए की बांसुरी से सच की कितनी भी मीठी तान निकले, झूठ के औरकैस्ट्रा के आगे टिक नहीं पाती. इस पर भी अगर हम सत्य को पकड़ कर बैठे रहेंगे तो विलुप्त होते देर न लगेगी. सो, आवश्यक है कि हमारी संतानें, भावी पीढ़ी झूठ बोलना सीखें. यों तो यह कार्य पाठ्यक्रम में बदलाव कर के सरकार भी कर सकती है किंतु जैसे बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा इत्यादि के मामले में सरकार से हम सीख चुके हैं  आत्मनिर्भर रहना, वैसे ही हम इस में भी आत्मनिर्भर हो जाएं.

इसी अभियान के अंतर्गत हम ने ‘झूठ बोलना कैसे सीखें’ नामक पुस्तक बाजार में उतारी है, इस से हमारी चार पैसे की आमदनी हो जाएगी और आप झूठ बोलना बड़ी आसानी से सीख जाएंगे.

हमें यह जान लेना चाहिए कि कंप्यूटर की तरह इसे पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करना आवश्यक है लेकिन जब तक यह औपचारिक शक्ल अख्तियार करे तब तक प्राइवेट ट्यूशन से सफलता की ओर कदम बढ़ा देना चाहिए. वैसे भी यदि सभी सीख जाएंगे तो झूठ की सफलता के क्षेत्र में बड़ा कंपीटिशन हो जाएगा बिलकुल आईआईटी सा.

आज की तारीख में यह पाठ किसी पाठशाला की किसी पाठ्यपुस्तक में पढ़ाया नहीं जाता. बस, बच्चा अनुभव से फेल होहो कर इसे धीरेधीरे सीखता है. उस पर तुर्रा यह कि सच की जड़ बड़ी गहरी होती है, बेशरम के झाड़ की तरह बेतरतीब यहां से काटें तो वहां से सिर उठा लेगी. अमरबेल सी जीवन का सब रस चूस लेगी. बरसात में सड़ेगी, अकाल में सूखेगी, सर्दी में ठिठुरेगी मगर गले पड़ी रहेगी. इसलिए एक बार सच की लत पड़ जाए तो बीड़ीसिगरेटशराब की तरह इस के नशे में आदमी सबकुछ लुटा बैठता है राजा हरिश्चंद्र की तरह.

जीवन में सफलता का राज दरअसल आप की झूठ बोलने की क्षमता पर निर्भर करता है या यों कहिए कि गोलमाल करने के प्रतिबद्धता पर टिका रहता है तो कुछ अतिशयोक्ति न होगी. झूठ बोलना एक कला है जिसे कुंगफू जैसी मेहनत से आम आदमी को सीखना पड़ता है, कराटे किड की तरह रोजमर्रा के जीवन में सुबहसवेरे से देर शाम तक इस का अभ्यास करना पड़ता है तब जा कर कहीं यह आम आदमी के जीवन में उतरती है और उसे खास बनाती है. हां, राजनीतिज्ञों और पंडेपुजारियों के जीन में यह होती है वंशानुगत, पैदाइशी, कोयल की कूक सी जिसे संगीत सीखना नहीं पड़ता. वे झूठ की विरासत लिए होते हैं, पैदा होते ही नेता और पंडित बन जाते हैं.

झूठ अपनी संरचना में ही लुभावना व प्रिय लगने वाला होता है व रक्तबीज सा अपनी फसल धड़ाधड़ काटता है. एक झूठ से 100 झूठ पैदा होते देर नहीं लगती. उस की बेल अपनी गति से हौलेहौले परवान चढ़ने लगती है. जबकि सच न बढ़ता है, न घटता है. बस, उतने का उतना ही बना रहता है. सो, उस की प्रगति की संभावना भी स्थिर सी रहती है.

झूठा सहारा ही आप की जिंदगी को बेहद आसान बना देता है. आप का खड़ूस बौस आप से हंसहंस कर करने लगेगा बात. जैसे वजन कम करने के लिए कमर कसनी होती है वैसे ही झूठ बोलना सीखने के लिए तैयार होना पड़ता है. वरना आप झूठ बोल नहीं पाते. सच की इस बीमारी को शुरुआत में ही संभाल लेना चाहिए वरना सच का कैंसर बड़ा भयंकर दर्द देता है. न जीने देता है न मरने देता है. राजा हरिश्चंद्र सा डोम बना कर छोड़ता है जो अपने बेटे का भी दाह नहीं कर पाता. सो, सच से दूर रहें. सच डरने की चीज है, अपनाने की नहीं.

अब झूठ की तारीफों के पुल क्या बांधना. पूरा का पूरा तंत्र बाकायदा इस के सहारे चल रहा है. सच को खोजना पड़ता है भूसे के ढेर से सूई की तरह. समंदर में डूबे खजाने की तरह, सच अन्वेषण की चीज है, इसलिए आप कृपया इस का दैनिक सार्वजनिक उपयोग बंद करें. यह बातबात पर दन्न से उगलने वाली चीज नहीं. यह कीमती चीज है, इसे इस की कीमत मिलने पर ही उपलब्ध कराएं. बताओ भला, यह भी कोई बात हुई कि इधर घर में आया मेहमान, गले मिले नहीं, कि बोल पड़े, ‘कैसे बेढब लग रहे हो.’ आ गया पतीले में उबाल. लो, पकड़ो अपने सच का ढक्कन.

आज की तारीख में जो झूठ नहीं बोल पाता वह सफलता की सीढि़यां नहीं चढ़ पाता. झूठ के साथ बस यही बड़ी खराबी है कि यह दिल पर बोझ बन जाता है. एक सच्चा झूठ बोलने वाला वही होता है जो कैसा भी झूठ बोले मगर वह न तो उस के दिल पर बोझ बने न चेहरे पर शिकन डाले. बस, जिस दिन आप को यह तरीका आ गया, आप महान हो गए. सच तो एक पैदाइशी तत्त्व है खानापीनासोना जैसा, उस में क्या शिक्षा, क्या ज्ञान की आवश्यकता. झूठ बोलना एक फन है और सोचिए, आप कैसे फनकार हैं.

सच के बारे में ऐसी धारणा है कि वही अंतिम विजेता होता है. चलिए मान लिया. मगर अंत का क्या? रास्ते का महत्त्व नहीं. अंत तो मृत्यु भी है, फिर क्या जीवन, कुछ भी नहीं. मौत तो एक पल में हो जानी है. सांसें तो जीवनभर चलनी हैं. सो, मंजिल से अधिक रास्ते का महत्त्व है. झूठ बोलनासीखना परमआवश्यक पाठ है. इस से अधिक इस विषय में कहना झूठ की तौहीन खास है.

अब हम आप को बताने जा रहे हैं कि हमारी झूठ बोलना सीखें नामक पुस्तक की हाईलाइट्स क्या हैं. इंगलिश स्पीकंग कोर्स की तर्र्ज पर ही हम ने अपने यहां 3 तरह के  कोर्स मय कोर्स मैटीरयल व सीडी के उपलब्ध कराएं हैं. रैगुलर व कौरेस्पौंडैस कोर्र्स दोनों की सुविधाएं हैं. रैपीडेक्स क्रैश कोर्स, नियमित रैगुलर व सस्ता शौर्टकट भी आप की जेब व हस्ती के अनुसार आप की आकंक्षाओं व इच्छाओं के अनुरूप उपलब्ध हैं.

उपलब्ध पुस्तक के की नोट्स अर्थात कुछ टिप्स यानी कि कुछ मारक तत्त्व निम्नांकित हैं. कृपया वृहद वर्णन के लिए पुस्तक खरीदें. संपूर्ण पुस्तक के लिए मनीऔर्डर करें या इंटरनैट के जरिए कैश औन डिलीवरी सुविधा का उपयोग करें.

झूठ बोलना सीखने के लिए निम्नांकित 10 नियमों का पालन करें. आप 10 दिनों में ही झूठ बोलना सीख जाएंगे, फिर आप की पौ बारह –

–    झूठ बोलने की शुरुआत अपने घर से करें.

–    घर में भी उस व्यक्ति से करें जिसे आप अपने सब से करीब पाते हैं.  यह कठिन होगा मगर सचमुच कारगर होगा.

–    झूठ सकुचाते हुए नहीं, धड़ल्ले से बोलें.

–    झूठ आंखों में आंखें डाल कर बोलें.

–    झूठ बोलते समय चेहरे पर पसीना न आने दें, आ जाए तो उसे रूमाल से पोंछने की गलती न करें. आप को अभ्यास की आवश्यकता होगी.

–    झूठ बोलने का अभ्यास सुबह के पहले घंटे से ही करें जैसे रातभर सोने के बाद कहें, ‘रात नींद ही नहीं आई’ या ‘रात को एक सपना देखा’ और फिर दिल की बात एक सपने के माध्यम से बयान करें जिसे वास्तव में आप ने देखा ही नहीं.

–    अपने झूठ को दैनिक दैनंदिनी में लिखें.

–    एक दिन में कम से कम 5 झूठ बिना आवश्यकता के बोलें, जब आप लगातार 5 झूठ बोल लें तो एक सच बोलने की छूट है. शुरुआत खाने की तारीफ से भी की जा सकती है, यह आसान है.

–    दफ्तर में देर से पहुंचने पर बोला, हुआ झूठ या छुट्टी के आवेदन में लिखा गया झूठ इस अभ्यास में शामिल नहीं किया जाएगा.

–    यदि आप का झूठ पकड़ा जाए तो न गलती मानें, न माफी मांगें. पकड़े जाने पर मुल्ला नसीरुद्दीन की पनाह में जाएं यानी कोईर् तीसरी स्थिति पैदा करें, जहां न सच टिके, न झूठ यों आप को झूठ बोलने का सफर दिलचस्प होता जाएगा और पाठ आसान.

याद रखिए झूठ बोलना सीखें यानी झूठ स्पीकिंग कोर्स द्वारा यह सब संभव है मात्र 3 महीनों में. पुस्तक को पढ़ते ही बस 1 महीने में आप फर्राटेदार झूठ बोलने लग जाएंगे और अपना जिंदगीभर का सत्यवचन का पाठ भूल जाएंगे. इस के बाद आप हमेशा झूठ के पक्ष में झंडा उठाए दिखाई देंगे. गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिए कम मूल्य पर हमारा एक 15 दिनों का सस्ता व आसान कोर्स भी उपलब्ध है. जो आप की सोच बदल देगा, जीने का नजरिया बदल देगा. वह भी आज के जमाने में आप की सफलता सुनिश्चित करेगा. यह ऐसा कोर्स है जिस में बेहतरीन झूठ बोलना सिखाया जाता है जो बड़ेबड़े राजनीतिज्ञों को मात कर सकता है. बस, एक बार आजमाएं तो.

कृपया अपने बच्चों को सिखाएं, आज की दुनिया में सत्य जानलेवा बीमारी है जिस में आदमी सिर्फ दालरोटी खा सकता है, मक्खनमलाईर् का स्वाद कभी पहचान भी नहीं सकता. अगर भूले से कभी उस के आगे कोईर् रसगुल्ला पड़ जाए तो उस का हाजमा खराब हो जाता है, शौच करकर के वह बदहाल हो जाता है. तो फिर ऐसा शारीरिक सौष्ठव ले कर क्या करेंगे आप. 6 व 8 पैक्स छाती के जमाने में. क्या चुल्लूभर पानी में डूब मरेंगे. और डूबना भी चाहेंगे तो डूबेंगे कैसे. सच बोलने वाले के नसीब में पानी कहां? स्विमिंग पूल तो मिलने से रहा चार दिनों में आए टैंकर में.

आप के हिस्से में इतना जल कहां. हमारी पुस्तक इस रोग के प्रतिक्षक टीके की तरह है. ‘जिंदगी की दो बूंद’ का स्लोगन और पोलियो से छुटकारा जैसे. सो इसे अपनाएं, खुशहाली पाएं.

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संजय दत्त बना रहे है तेलगू फिल्म ‘‘प्रस्थानम’’ का हिंदी रीमेक

लगभग सात वर्ष के अंतराल के बाद संजय दत्त एक बार फिर फिल्म निर्माण में उतरने जा रहे हैं. संजय दत्त ने 2011 में डेविड धवन के निर्देशन में हास्य फिल्म ‘‘रास्कल’’ का निर्माण किया था. जिसे बौक्स औफिस पर सफलता नहीं मिली थी. उसके बाद से संजय दत्त ने कोई फिल्म नहीं बनाई. इस बीच उनकी जिंदगी कई उतार चढ़ाव से गुजरती रही. गत वर्ष वह फिल्म ‘भूमि’ में अभिनय करते हुए नजर आए थे.

पर अब संजय संजय दत्त एक बार फिर अपने प्रोडक्शन हाउस को नये सिरे से शुरू करते हुए पहली फिल्म बनाने जा रहे हैं. इस बार उन्होंने कई पुरस्कार जीत चुकी राजनीतिक कहानी वाली तेलगू भाषा की कल्ट फिल्म ‘‘प्रस्थानम’’ का हिंदी रीमेक बनाने का निर्णय लिया है.

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इसका निर्देशन तेलगू में ‘प्रस्थानम’ का निर्देशन करने वाले फिल्मकार देवा कट्टा ही करेंगे. इस फिल्म में संजय दत्त के साथ ही अली फजल व अमायरा दस्तूर की जोड़ी होगी. फिल्म की शूटिंग जून के पहले सप्ताह से शुरू होगी.

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फिल्म ‘‘प्रस्थानम’’ की कहानी एक अति ताकतवर राजनीतिक परिवार के ईर्द गिर्द घूमती है. इस परिवार के मुखिया का बेटा राजनीतिज्ञों व उद्योपतियों के बीच के गठजोड़ का भंडाभोड़ करने का निर्णय लेता है. हिंदी फिल्म में परिवार के मुखिया के किरदार में संजय दत्त और उनके बेटे के किरदार में ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ फेम अभिनेता अली फजल होंगे. जबकि उनकी प्रेमिका के किरदार में अमायरा दस्तूर होंगी.

हिंदी रीमेक फिल्म में निर्देशक देवा कट्टा ने कुछ बदलाव किए हैं, मगर मौलिक फिल्म की ही तर ही यह भी राजनीतिक व नाटकीय फिल्म ही होगी.

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