बौलीवुड अदाकारा और साउथ की सुपरस्टार तमन्ना भाटिया का सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में अवंतिका का किरदार निभाने वाली तमन्ना बेहद खूबसूरत डांस करती नजर आ रही हैं.
इस वीडियो को तमन्ना ने खुद अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया है, जिसमें वह हौलीवुड सिंगर रैपर डीजे स्नैक के गाने मेजेंटा रिदिम पर थिरकती दिख रहा हैं.
तमन्ना ने डीजे को भी इस गाने को लेकर अपने जुनून के बारे में बताया था. इतना ही नहीं तमन्ना और डीजे स्नेक के बीच इस गाने को लेकर कई सारी बातें हुईं. जिसके बाद डीजे स्नेक ने उन्हें इस गाने पर डांस करने का चैलेंज दिया. जिसे तमन्ना ने अब बखूबी पूरा कर दिखाया है.
अब तमन्ना के इस डांस वीडियो को डीजे स्नेक ने भी अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया. वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि, “पेरिस से इंडिया तक. बाहुबली की एक्ट्रेस तमन्ना भाटिया को मजेंटा रिदिम की धुन पर देसी अंदाज में डांस करते देखना वाकई मजेदार है.”
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जम्मू के कठुआ, उत्तर प्रदेश के उन्नाव, बिहार के सासाराम, गुजरात के सूरत में हुए कुछ बलात्कारों ने देश को दहला दिया है. ज्यादा बड़ी बात इन मामलों में यह रही कि बलात्कारियों को पकड़ने में पुलिस ने आनाकानी की. जब तक दबाव न पड़ा मामला लटका रहा, क्योंकि हर मामले में अभियुक्त सत्ताधारी पार्टी से जुड़ा था. जहां सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह कमजोरों को बचाएगी, इन सभी मामलों में यह साफ हुआ कि सत्ता के निकट हों तो आप का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता और किसी औरत, लड़की या बच्ची की जिंदगी सुरक्षित नहीं है.
मांएं अकसर लड़कियों की स्वच्छंदता पर रोना रोती हैं कि फैशन और आधुनिकता के चलते बलात्कार हो रहे हैं पर इन सब मामलों में कोई भी लड़की फैशनेबल नहीं थी. इन सब मामलों में बलात्कार का कारण अपना रोब जमाना था और दुनिया को यह बताना था कि पार्टी और सरकार उन के साथ हैं. वे जो चाहें कर सकते हैं.
सब से बड़ी बात यह रही कि स्मृति ईरानी, सुषमा स्वराज, मीनाक्षी लेखी, निर्मला सीतारमन, उमा भारती जैसी औरतों, जो पहले हर बलात्कार पर आसमान सिर पर उठा लेती थीं, इन मामलों में चुप ही रहीं यानी बलात्कार का रंग सत्ता के साथ बदल जाता है और बलात्कार तब छोटी सी बात होती है जब आप सत्ता में हों. जघन्य पाप है अगर आप सत्ता में न हों.
औरतों का यह दोगलापन ही उन के प्रति गुनाहों के लिए जिम्मेदार है. हर बेटी की मां रोना रोती है कि उस की बेटी को सास यातना देती है पर वही औरत अपने बेटे की पत्नी को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ती. हर औरत दूसरी लड़की पर होने वाले दुख के प्रति एक परपीड़न सुख महसूस करती है. हिंदी फिल्मों में ललिता पवार टाइप की सासों की भरमार रही है और इन को फिल्माया ही इसलिए जाता रहा है, क्योंकि ये घरघर की कहानी रही हैं और फिल्म निर्माता औरतों को इन्हीं के जरीए आकर्षित करते रहे हैं.
औरतों की मानसिकता उतनी ही जिम्मेदार है जितनी पुरुषों की बलात्कार को बदला लेने के एक हथियार की. जम्मू में 8 साल की लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के पीछे कहा यही जा रहा है कि इस से घुमंतू गड़रियों को भगाया जा सकेगा. औरतों को ढाल भी बनाया जाता है और उन पर अत्याचार पूरे परिवार, कौम या गुट का हथियार भी.
जौहर को जो सम्मान मिला है इसीलिए ताकि शत्रु के हाथों औरतें पड़ें ही नहीं. औरतों से कहा भी यही जाता है कि मर जाना पर बलात्कार के बाद मुंह नहीं दिखाना और यह कहने वाली सब से पहले मां ही होती है, क्योंकि वही जानती है कि वह अपने रिश्तेदारों, पासपड़ोस में कभी इज्जत से नहीं बैठ पाएगी.
इन बलात्कारों का अब जम कर राजनीतिकरण हो रहा है पर भारतीय जनता पार्टी शिकायत नहीं कर सकती, क्योंकि उसी की महिला नेताओं ने 2014 से पहले के हर बलात्कार को राजनीतिक हथियार बनाया था. औरतों की इज्जत का मामला पार्टियों के लिए सत्ता पाने की सीढि़यां बन गया है. उन्हें औरतों की सुरक्षा की चिंता कम है, अपना मौका ढूंढ़ने की फिक्र ज्यादा. कांग्रेस भी अब वही कर रही है जिस का रास्ता भारतीय जनता पार्टी ने दिखाया था.
बलात्कार पूरे समाज के खिलाफ अपराध है. यह सभ्यता को नष्ट करने वाला तेजाब है. अपराधी भी अपराध करते हुए कांपें माहौल ऐसा होना चाहिए. पर जिस निडरता से बलात्कार हो रहे हैं उस से यह स्पष्ट है कि हर बलात्कारी के दिमाग में रहता है
कि यह सबक बलात्कार की पीडि़ता व उस का परिवार वर्षों याद रखेंगे. उसे अपने पकड़े जाने का जरा भी भय नहीं होता वरना वह मारपीट का सहारा लेता, लूटता, लेकिन बलात्कार पर न उतरता. उसे मालूम है कि उस का अपना समाज, उस की पार्टी, उस का परिवार, उस का धर्म उसे मर्द होने का तमगा देगा.
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जिस हिन्दू युवा वाहिनी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ताकत माना जाता है वहीं से उनको चुनौती मिल रही है. 2017 के विधानसभा चुनावों के पहले हिन्दू युवा वाहिनी ने प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह को संगठन से बाहर निकाल दिया था. सुनील सिंह पर आरोप लगा कि उन्होंने संगठन के लोगों को चुनाव मैदान में उतार कर आदेश की अवहेलना की थी. हिन्दू युवा वाहिनी को योगी आदित्यनाथ के नाम से ही जाना जाता था. पहले सुनील सिंह उसके प्रदेश अध्यक्ष और योगी आदित्यनाथ उसके सरंक्षक थे.
सुनील सिंह अपने निष्कासन को गलत मानते हैं. उनका कहना है कि योगी जी उनके गुरू है. भाजपा ने उनको गुमराह किया है. सुनील सिंह ने अपनी बात रखने के लिये लखनऊ के वीवीआईपी गेस्ट हाउस में आनन फानन में एक बैठक का आयोजन किया और खुद को हिन्दू युवा वाहिनी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया.
योगी सरकार को यह काम सही नहीं लगा. बिना अनुमति के बैठक करने के आरोप में सरकार ने गेस्ट हाउस के व्यवस्थाधिकारी आरपी सिंह को निलंबित कर दिया. सुनील सिंह कहते है हिन्दू युवा वाहिनी का मैं प्रदेश अध्यक्ष हूं. मैं अपने संगठन का विस्तार करना चाहता हूं. इसलिये अब इसका राष्ट्रीय स्तर पर गठन किये जाने की जरूरत पर बल दिया और खुद को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया. हिन्दू युवा वाहिनी के प्रदेश महामंत्री पीके मल्ल का कहना है कि जो आदमी संगठन से पहले ही निकाला जा चुका है उसके दावों का कोई मतलब नहीं रह जाता है.बै ठक के बाद से सुनील ही पर्दे से गायब हैं.
योगी भले ही सुनील सिंह को अपने संगठन से निकाल चुके हों, पर सुनील सिंह आज भी योगी को ही अपना गुरु मानते हैं. उनका कहना है योगी जी मेरे लिये राम की तरह हैं. मैं उनका सेवक हनुमान हूं. भाजपा के कुछ लोग उनको लड़ाना चाहते हैं. जिस दिन योगी जी भाजपा के काले जादू से बाहर आयेंगे उस दिन उनको गले लगायेंगे. सुनील सिंह कहते हैं मैं भाजपा से अपने गुरु के अपमान का बदला लूंगा. भाजपा आज हमारे गुरु को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दे तो वह भाजपा कार्यालय में चाय पिलाना मंजूर कर लेंगे. सुनील सिंह खुद को हनुमान बताते कहते हैं कि हनुमान ने लंका में आग लगाने के लिये राम से इजाजत नहीं ली थी. मेरे लिये भी भाजपा लंका की ही तरह है.
भाजपा और हिन्दू युवा वाहिनी के लोग सुनील सिंह के कामों को विरोधी गतिविधियां मानते हुये विपक्षी दलों की रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं. दूसरी ओर राजनीति के जानकार यह मान रहे हैं कि हिन्दू युवा वाहिनी के विवाद को भड़का कर योगी को कमजोर करने की कोशिश में भाजपा के कुछ लोग भी लगे हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह चर्चा का विषय है कि भाजपा में योगी का भविष्य 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम पर निर्भर करेगा. ऐसे में अगर योगी ताकतवर रहेंगे तो उनके खिलाफ मनमानी करना आसान नहीं होगा. ऐसे में अगर हिन्दू युवा वाहिनी कमजोर रहेगी, तो योगी आदित्यनाथ पार्टी के हर फैसले को मान लेंगे.
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आप ने रेलवेस्टेशनों, बसअड्डों, पैसेंजर गाडि़यों और महानगरों के फुटपाथों पर 10 रुपए में इंगलिश सिखाने का दावा करने वाली पुस्तकें खरीदी भले ही न हों मगर देखी जरूर होंगी. इन्हें अपनी जेब के अनुकूल, अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप पा सर्वसाधारण अपनी जेब ढीली करने को उत्सुक नजर आता है. और इस तरह यह धंधा चलता रहता है. समय की मार खाए गरीब बेचारे कभी यों 10 रुपए में अंगरेजी तो नहीं सीख पाते किंतु अपनी तरफ से पूरी कोशिश करने की आत्मसंतुष्टि उन्हें जरूर मिल जाती है. उस पुस्तक ने उन का कितना अंगरेजी ज्ञान बढ़ाया, यह तो नहीं कहा जा सकता. यह शोध का विषय है लेकिन चिंतनमननमंथन द्वारा मानसिक वादविवाद का आयोजन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि दरअसल इस सर्वसाधारण के जीवन को उन्नत करने के लिए अंगरेजी नहीं झूठ बोलना कैसे सीखें नामक पुस्तक की सख्त आवश्यकता है. सर्वशिक्षा अभियान के तहत अगर इसे बढ़ावा मिले तो अतिउत्तम. अनिवार्य पठनीय पुस्तक का दरजा मिले तो वाहवाह.
सत्यं वद प्रियं. वद न वद सत्यम अप्रियम, यह पाठ हिंदुस्तान की हर पाठशाल में पढ़ाया जाता रहा है और इस के सदके में हमारे जैसे झूठ बोलने में अक्षम लोगों का जमावड़ा हिंदुस्तान की धरती पर हो गया, जिन्हें आजादी के सठिया जाने के बाद भी मिडिल क्लास कह कर खूब लताड़ा गया. अब तो सब से बड़ा अड़ंगा है हमारी प्रगति में, वह यही है, हमारी मिडिल क्लास सत्यवादी सोच. इसलिए शरीर पर टैटू सा गुदा मिडिल क्लास रहनसहन, मिडिल क्लास भाषा.
यह तो मानी बात है कि कोई आदमी सच बोल कर प्रिय नहीं बना रह सकता. सच तो प्रकृति से ही कड़वा होता है, एकदम करेला, ऊपर से नीम चढ़ा जैसा. करेला तो जानते हैं न, छिलका उतार भी दिया जाए तब भी कड़वाहट अंदर पोरपोर तक भरी ही रहती है.
अभी तक हम ने तो सुना नहीं कि करेले को चाशनी में डुबो कर किसी ने बारहमासी रसगुल्ला बनाने में सफलता प्राप्त की हो, किसी को यह कला आई भी हो तो खानदानी शाही दवाखाना की तरह निश्चित ही चांदनी चौक की किसी गली में चुपचाप चल रही होगी. यों पटरियों पर तो वह न बिक रही होगी. यह हमारा सच तो होली पर बनने वाली गुझिया सी साख भी नहीं जुटा पाया कि चलो, सालाना जलसे में ही उस का कुछ जलवा हो. मगर वहां भी बुरा न मानो होली है का वरक लपेटा जाए तब जा कर कुछ बात बने.
इधर, झूठ की दादागीरी एकदम निराली है, बासमती चावल सी उस की महक आ ह ह हा…एकएक दाना एकदम खिला हुआ ताजगी से भरपूर. सब को मजा देने वाला. सब की इज्जत बचाने वाला. झूठ की खासीयत है वह हमेशा आराम से मेजपोश की तरह बिछा रहता है, खूबसूरत परदे की तरह लटका रहता है. सब की नंगई ढकी रहती है. सो, सब को समझ लेना चाहिए कि झूठ बोलना कितना आवश्यक है.
दुनिया तो, जी, झूठ से चलती है, सामने वाले की झूठी तारीफ करिए, आराम से रहिए. हंसिए, बोलिए चैन की नींद सोइए. वरना धरती सुंघाऊ , पानी पिलाने वाले, धूल चटाने वाले, दिन में तारे दिखाने वाले, छठी का दूध याद दिलाने वाले, चारों खाने चित्त कर देने वाले सत्य की मार के लिए स्वयं भी तैयार रहिए क्योंकि सामने वाला व्यक्ति सांप काटे की तरह पहला मौका हाथ आते ही आप पर वार करने से चूकेगा नहीं. फिर चाहे वह कोई रामदेव हो या कोई बालकृष्ण.
जनाब, बात तो धार्मिक व दलीय भावनाओं की है और सच के साथ वही सब से पहले आहत होती है. अब देखिए आप अपनेआप चलते कहीं गिर पड़ते हैं ठोकर खा कर, तो न अफसोस होता है न दर्द, बस उठे और फिर चल दिए. किंतु, सत्य का कोड़ा पड़े तो पीठ पर उभार छोड़ जाता है. इसलिए जनाब जानिए और समझिए अब हम रह रहे हैं ग्लोबल विलेज में, और राजनीतिज्ञों की सफलता के पांव तले दबेदबे सांस ले रहे हैं. उन के सफल घोटालों की अनवरत दास्तान कानफोड़ू कीर्तन की तरह धाड़धाड़ बज रही है वातावरण में. यह किस का कमाल है, मिथ्या वचन ना.
जिस के आगे 10 रुपए की बांसुरी से सच की कितनी भी मीठी तान निकले, झूठ के औरकैस्ट्रा के आगे टिक नहीं पाती. इस पर भी अगर हम सत्य को पकड़ कर बैठे रहेंगे तो विलुप्त होते देर न लगेगी. सो, आवश्यक है कि हमारी संतानें, भावी पीढ़ी झूठ बोलना सीखें. यों तो यह कार्य पाठ्यक्रम में बदलाव कर के सरकार भी कर सकती है किंतु जैसे बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा इत्यादि के मामले में सरकार से हम सीख चुके हैं आत्मनिर्भर रहना, वैसे ही हम इस में भी आत्मनिर्भर हो जाएं.
इसी अभियान के अंतर्गत हम ने ‘झूठ बोलना कैसे सीखें’ नामक पुस्तक बाजार में उतारी है, इस से हमारी चार पैसे की आमदनी हो जाएगी और आप झूठ बोलना बड़ी आसानी से सीख जाएंगे.
हमें यह जान लेना चाहिए कि कंप्यूटर की तरह इसे पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करना आवश्यक है लेकिन जब तक यह औपचारिक शक्ल अख्तियार करे तब तक प्राइवेट ट्यूशन से सफलता की ओर कदम बढ़ा देना चाहिए. वैसे भी यदि सभी सीख जाएंगे तो झूठ की सफलता के क्षेत्र में बड़ा कंपीटिशन हो जाएगा बिलकुल आईआईटी सा.
आज की तारीख में यह पाठ किसी पाठशाला की किसी पाठ्यपुस्तक में पढ़ाया नहीं जाता. बस, बच्चा अनुभव से फेल होहो कर इसे धीरेधीरे सीखता है. उस पर तुर्रा यह कि सच की जड़ बड़ी गहरी होती है, बेशरम के झाड़ की तरह बेतरतीब यहां से काटें तो वहां से सिर उठा लेगी. अमरबेल सी जीवन का सब रस चूस लेगी. बरसात में सड़ेगी, अकाल में सूखेगी, सर्दी में ठिठुरेगी मगर गले पड़ी रहेगी. इसलिए एक बार सच की लत पड़ जाए तो बीड़ीसिगरेटशराब की तरह इस के नशे में आदमी सबकुछ लुटा बैठता है राजा हरिश्चंद्र की तरह.
जीवन में सफलता का राज दरअसल आप की झूठ बोलने की क्षमता पर निर्भर करता है या यों कहिए कि गोलमाल करने के प्रतिबद्धता पर टिका रहता है तो कुछ अतिशयोक्ति न होगी. झूठ बोलना एक कला है जिसे कुंगफू जैसी मेहनत से आम आदमी को सीखना पड़ता है, कराटे किड की तरह रोजमर्रा के जीवन में सुबहसवेरे से देर शाम तक इस का अभ्यास करना पड़ता है तब जा कर कहीं यह आम आदमी के जीवन में उतरती है और उसे खास बनाती है. हां, राजनीतिज्ञों और पंडेपुजारियों के जीन में यह होती है वंशानुगत, पैदाइशी, कोयल की कूक सी जिसे संगीत सीखना नहीं पड़ता. वे झूठ की विरासत लिए होते हैं, पैदा होते ही नेता और पंडित बन जाते हैं.
झूठ अपनी संरचना में ही लुभावना व प्रिय लगने वाला होता है व रक्तबीज सा अपनी फसल धड़ाधड़ काटता है. एक झूठ से 100 झूठ पैदा होते देर नहीं लगती. उस की बेल अपनी गति से हौलेहौले परवान चढ़ने लगती है. जबकि सच न बढ़ता है, न घटता है. बस, उतने का उतना ही बना रहता है. सो, उस की प्रगति की संभावना भी स्थिर सी रहती है.
झूठा सहारा ही आप की जिंदगी को बेहद आसान बना देता है. आप का खड़ूस बौस आप से हंसहंस कर करने लगेगा बात. जैसे वजन कम करने के लिए कमर कसनी होती है वैसे ही झूठ बोलना सीखने के लिए तैयार होना पड़ता है. वरना आप झूठ बोल नहीं पाते. सच की इस बीमारी को शुरुआत में ही संभाल लेना चाहिए वरना सच का कैंसर बड़ा भयंकर दर्द देता है. न जीने देता है न मरने देता है. राजा हरिश्चंद्र सा डोम बना कर छोड़ता है जो अपने बेटे का भी दाह नहीं कर पाता. सो, सच से दूर रहें. सच डरने की चीज है, अपनाने की नहीं.
अब झूठ की तारीफों के पुल क्या बांधना. पूरा का पूरा तंत्र बाकायदा इस के सहारे चल रहा है. सच को खोजना पड़ता है भूसे के ढेर से सूई की तरह. समंदर में डूबे खजाने की तरह, सच अन्वेषण की चीज है, इसलिए आप कृपया इस का दैनिक सार्वजनिक उपयोग बंद करें. यह बातबात पर दन्न से उगलने वाली चीज नहीं. यह कीमती चीज है, इसे इस की कीमत मिलने पर ही उपलब्ध कराएं. बताओ भला, यह भी कोई बात हुई कि इधर घर में आया मेहमान, गले मिले नहीं, कि बोल पड़े, ‘कैसे बेढब लग रहे हो.’ आ गया पतीले में उबाल. लो, पकड़ो अपने सच का ढक्कन.
आज की तारीख में जो झूठ नहीं बोल पाता वह सफलता की सीढि़यां नहीं चढ़ पाता. झूठ के साथ बस यही बड़ी खराबी है कि यह दिल पर बोझ बन जाता है. एक सच्चा झूठ बोलने वाला वही होता है जो कैसा भी झूठ बोले मगर वह न तो उस के दिल पर बोझ बने न चेहरे पर शिकन डाले. बस, जिस दिन आप को यह तरीका आ गया, आप महान हो गए. सच तो एक पैदाइशी तत्त्व है खानापीनासोना जैसा, उस में क्या शिक्षा, क्या ज्ञान की आवश्यकता. झूठ बोलना एक फन है और सोचिए, आप कैसे फनकार हैं.
सच के बारे में ऐसी धारणा है कि वही अंतिम विजेता होता है. चलिए मान लिया. मगर अंत का क्या? रास्ते का महत्त्व नहीं. अंत तो मृत्यु भी है, फिर क्या जीवन, कुछ भी नहीं. मौत तो एक पल में हो जानी है. सांसें तो जीवनभर चलनी हैं. सो, मंजिल से अधिक रास्ते का महत्त्व है. झूठ बोलनासीखना परमआवश्यक पाठ है. इस से अधिक इस विषय में कहना झूठ की तौहीन खास है.
अब हम आप को बताने जा रहे हैं कि हमारी झूठ बोलना सीखें नामक पुस्तक की हाईलाइट्स क्या हैं. इंगलिश स्पीकंग कोर्स की तर्र्ज पर ही हम ने अपने यहां 3 तरह के कोर्स मय कोर्स मैटीरयल व सीडी के उपलब्ध कराएं हैं. रैगुलर व कौरेस्पौंडैस कोर्र्स दोनों की सुविधाएं हैं. रैपीडेक्स क्रैश कोर्स, नियमित रैगुलर व सस्ता शौर्टकट भी आप की जेब व हस्ती के अनुसार आप की आकंक्षाओं व इच्छाओं के अनुरूप उपलब्ध हैं.
उपलब्ध पुस्तक के की नोट्स अर्थात कुछ टिप्स यानी कि कुछ मारक तत्त्व निम्नांकित हैं. कृपया वृहद वर्णन के लिए पुस्तक खरीदें. संपूर्ण पुस्तक के लिए मनीऔर्डर करें या इंटरनैट के जरिए कैश औन डिलीवरी सुविधा का उपयोग करें.
झूठ बोलना सीखने के लिए निम्नांकित 10 नियमों का पालन करें. आप 10 दिनों में ही झूठ बोलना सीख जाएंगे, फिर आप की पौ बारह –
– झूठ बोलने की शुरुआत अपने घर से करें.
– घर में भी उस व्यक्ति से करें जिसे आप अपने सब से करीब पाते हैं. यह कठिन होगा मगर सचमुच कारगर होगा.
– झूठ सकुचाते हुए नहीं, धड़ल्ले से बोलें.
– झूठ आंखों में आंखें डाल कर बोलें.
– झूठ बोलते समय चेहरे पर पसीना न आने दें, आ जाए तो उसे रूमाल से पोंछने की गलती न करें. आप को अभ्यास की आवश्यकता होगी.
– झूठ बोलने का अभ्यास सुबह के पहले घंटे से ही करें जैसे रातभर सोने के बाद कहें, ‘रात नींद ही नहीं आई’ या ‘रात को एक सपना देखा’ और फिर दिल की बात एक सपने के माध्यम से बयान करें जिसे वास्तव में आप ने देखा ही नहीं.
– अपने झूठ को दैनिक दैनंदिनी में लिखें.
– एक दिन में कम से कम 5 झूठ बिना आवश्यकता के बोलें, जब आप लगातार 5 झूठ बोल लें तो एक सच बोलने की छूट है. शुरुआत खाने की तारीफ से भी की जा सकती है, यह आसान है.
– दफ्तर में देर से पहुंचने पर बोला, हुआ झूठ या छुट्टी के आवेदन में लिखा गया झूठ इस अभ्यास में शामिल नहीं किया जाएगा.
– यदि आप का झूठ पकड़ा जाए तो न गलती मानें, न माफी मांगें. पकड़े जाने पर मुल्ला नसीरुद्दीन की पनाह में जाएं यानी कोईर् तीसरी स्थिति पैदा करें, जहां न सच टिके, न झूठ यों आप को झूठ बोलने का सफर दिलचस्प होता जाएगा और पाठ आसान.
याद रखिए झूठ बोलना सीखें यानी झूठ स्पीकिंग कोर्स द्वारा यह सब संभव है मात्र 3 महीनों में. पुस्तक को पढ़ते ही बस 1 महीने में आप फर्राटेदार झूठ बोलने लग जाएंगे और अपना जिंदगीभर का सत्यवचन का पाठ भूल जाएंगे. इस के बाद आप हमेशा झूठ के पक्ष में झंडा उठाए दिखाई देंगे. गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिए कम मूल्य पर हमारा एक 15 दिनों का सस्ता व आसान कोर्स भी उपलब्ध है. जो आप की सोच बदल देगा, जीने का नजरिया बदल देगा. वह भी आज के जमाने में आप की सफलता सुनिश्चित करेगा. यह ऐसा कोर्स है जिस में बेहतरीन झूठ बोलना सिखाया जाता है जो बड़ेबड़े राजनीतिज्ञों को मात कर सकता है. बस, एक बार आजमाएं तो.
कृपया अपने बच्चों को सिखाएं, आज की दुनिया में सत्य जानलेवा बीमारी है जिस में आदमी सिर्फ दालरोटी खा सकता है, मक्खनमलाईर् का स्वाद कभी पहचान भी नहीं सकता. अगर भूले से कभी उस के आगे कोईर् रसगुल्ला पड़ जाए तो उस का हाजमा खराब हो जाता है, शौच करकर के वह बदहाल हो जाता है. तो फिर ऐसा शारीरिक सौष्ठव ले कर क्या करेंगे आप. 6 व 8 पैक्स छाती के जमाने में. क्या चुल्लूभर पानी में डूब मरेंगे. और डूबना भी चाहेंगे तो डूबेंगे कैसे. सच बोलने वाले के नसीब में पानी कहां? स्विमिंग पूल तो मिलने से रहा चार दिनों में आए टैंकर में.
आप के हिस्से में इतना जल कहां. हमारी पुस्तक इस रोग के प्रतिक्षक टीके की तरह है. ‘जिंदगी की दो बूंद’ का स्लोगन और पोलियो से छुटकारा जैसे. सो इसे अपनाएं, खुशहाली पाएं.
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लगभग सात वर्ष के अंतराल के बाद संजय दत्त एक बार फिर फिल्म निर्माण में उतरने जा रहे हैं. संजय दत्त ने 2011 में डेविड धवन के निर्देशन में हास्य फिल्म ‘‘रास्कल’’ का निर्माण किया था. जिसे बौक्स औफिस पर सफलता नहीं मिली थी. उसके बाद से संजय दत्त ने कोई फिल्म नहीं बनाई. इस बीच उनकी जिंदगी कई उतार चढ़ाव से गुजरती रही. गत वर्ष वह फिल्म ‘भूमि’ में अभिनय करते हुए नजर आए थे.
पर अब संजय संजय दत्त एक बार फिर अपने प्रोडक्शन हाउस को नये सिरे से शुरू करते हुए पहली फिल्म बनाने जा रहे हैं. इस बार उन्होंने कई पुरस्कार जीत चुकी राजनीतिक कहानी वाली तेलगू भाषा की कल्ट फिल्म ‘‘प्रस्थानम’’ का हिंदी रीमेक बनाने का निर्णय लिया है.
इसका निर्देशन तेलगू में ‘प्रस्थानम’ का निर्देशन करने वाले फिल्मकार देवा कट्टा ही करेंगे. इस फिल्म में संजय दत्त के साथ ही अली फजल व अमायरा दस्तूर की जोड़ी होगी. फिल्म की शूटिंग जून के पहले सप्ताह से शुरू होगी.
फिल्म ‘‘प्रस्थानम’’ की कहानी एक अति ताकतवर राजनीतिक परिवार के ईर्द गिर्द घूमती है. इस परिवार के मुखिया का बेटा राजनीतिज्ञों व उद्योपतियों के बीच के गठजोड़ का भंडाभोड़ करने का निर्णय लेता है. हिंदी फिल्म में परिवार के मुखिया के किरदार में संजय दत्त और उनके बेटे के किरदार में ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ फेम अभिनेता अली फजल होंगे. जबकि उनकी प्रेमिका के किरदार में अमायरा दस्तूर होंगी.
हिंदी रीमेक फिल्म में निर्देशक देवा कट्टा ने कुछ बदलाव किए हैं, मगर मौलिक फिल्म की ही तर ही यह भी राजनीतिक व नाटकीय फिल्म ही होगी.
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‘बेटी और बहू में कोई फर्क नहीं होता. शादी के बाद बेटी घर से विदा होती?है तो घर में बहू के रूप में बेटी आ जाती है.’
यह एक आदर्श परिवार की आदर्श सोच है. पर ऐसा कितने घरों में होता है, यह देखने की बात है, क्योंकि जब कोई लड़की किसी घर में बहू बन कर जाती है तो यह पाया गया है कि वहां सासससुर, ननददेवर, जेठजेठानी उस पर हुक्म बजाते नजर आते हैं.
गीता के साथ भी ऐसा हुआ. उस की शादी मुकेश के साथ कुछ दिन पहले ही हुई थी. एक शाम को जब मुकेश घर लौटा तो देखा कि गीता का मूड उखड़ा हुआ था.
वजह पूछी तो गीता सुबकने लगी और बताया, ‘‘आज सुबह आप के छोटे भाई को चाय देने में थोड़ी देर हो गई तो सासू मां मुझ पर बरस पड़ीं. उन की देखादेखी देवरजी भी मुझ पर राशनपानी ले कर चढ़ गए. अब बताओ इस में मेरी क्या गलती है?’’
महेश कुढ़ कर रह गया. उस ने गीता को ही समझाने की कोशिश की कि इतनी छोटीछोटी बातों को दिल से मत लगाया करो लेकिन उस ने गीता के इस सवाल को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि घर की बहू पर हर छोटेबड़े का हुक्म चलाना कहां तक जायज है?
महेश का फर्ज बनता था कि देवर के चाय मांगने को ले कर अपनी मां की नाराजगी को उसे हलके में नहीं लेना चाहिए था क्योंकि यही छोटीछोटी बातें बाद में बड़ी तकरार की वजह बन जाती हैं.
अजीब सा लगता है पर बेटे की बीवी पर ससुराल वालों खासकर सास का हुक्म चलने की एक अहम वजह रसोई होती है. यहां वास्तुदोष की बात नहीं हो रही है कि रसोई को किस दिशा में करने से इस तरह के झगड़े नहीं होंगे, बल्कि जब कोई लड़की ब्याह कर अपनी ससुराल आती है तो वह रसोई को अपने तरीके से चलाना चाहती है. अगर कहीं गलती से वह लजीज खाना बनाना जानती है तो सास को लगता है कि गई रसोई हाथ से. इस से वह बहू के खाने में कमी निकालने की कोशिश करती है ताकि उस का मनोबल टूट जाए. जब कभी कोई दूसरा बहू के खाने में कमी बताता है तो सास की पौबारह हो जाती है. वह हुक्म भी ताने देदे कर सुनाती है जिस से शह पा कर देवरननद या कभीकभी तो ससुर भी इस तकरार में शामिल हो जाते हैं.
रसोई से ही एक और चीज जुड़ी होती है, घर का बजट. बजट यानी पैसे का लेनदेन. बेटे की कमाई, जो कल तक मां के हाथ में जा रही होती है, वे बंट जाती है. बहू के हाथ में बेटे की आधी कमाई का जाना सास को अपनी हार लगती है. लिहाजा, वह छोटीछोटी बातों को मुद्दा बनाने लगती है. खुद का बस नहीं चलता तो अपने पति या बेटे के कान भरने लगती है. चूंकि कई घरों में बहू भी कमाती है तो सास को वह अपने से अमीर लगने लगती है.
प्रिया एक कंप्यूटर इंजीनियर है. उस का पति राजन भी एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करता है. चूंकि उन की लव मैरिज हुई थी इसलिए राजन ने बिना दहेज के शादी की थी जो उस के मांबाप को रास नहीं आई.
कुछ दिन तो घर का माहौल ठीक रहा पर बाद में प्रिया को लगने लगा कि उस के सासससुर उस पर बेवजह के हुक्म चलाते हैं. एक बार तो हद हो गई. प्रिया दफ्तर से लेट हो गई थी. सास ने ताना दे मारा, ‘‘अगर तुम ही घर देर से लौटोगी तो राजन की शादी से मुझे क्या फायदा हुआ. इस बुढ़ापे में घर का सारा कामकाज मुझे ही देखना पड़ता है. तुम नौकरी छोड़ कर घर बैठो और मुझे मुक्ति दो.’’
प्रिया ने झुंझलाते हुए कहा, ‘‘मांजी, आज मैं पहली बार लेट हुई हूं और आप ने यह तुगलकी फरमान सुना दिया. अगर आप से घर का काम नहीं होता तो मैं एक नौकरानी लगा देती हूं जो आप का हाथ बंटा दिया करेगी.’’
इतना सुनते ही सास बिफर पड़ी, ‘‘अब कल की आई लड़की हमें समझाएगी कि इस घर में कौन क्या काम करेगा. घर में बैठ नहीं तो अपनी रसोई अलग कर ले.’’
बात आगे न बढ़े इसलिए प्रिया चुप्पी साध गई. राजन के आने पर उन दोनों ने मां से फिर बात की लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा. इस के बाद वे दोनों उसी कालोनी में किराए के एक घर में रहने लगे.
आज के जमाने में बहू अगर नौकरी नहीं करती है तो इस का मतलब यह कतई नहीं है कि वह पढ़ीलिखी नहीं है या वह अपने मांबाप के घर से कुछ भी सीख कर नहीं आई है. अगर कोई सास या ससुर अपने बच्चों पर हुक्म नहीं चलाते हैं तो उन्हें बेटे की बीवी पर हुक्म चलाने का भी कोई हक नहीं है. इस से परिवार में कलह बढ़ती है जो उसे तोड़ने का काम करती है.
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उत्तर प्रदेश में लखीमपुर के एक गांव में रहने वाली देविका की शादी देवेश से तय हो गई. देवेश सरकारी नौकरी करता था. ऐसे में देविका के घर वालों ने उस की तकरीबन हर डिमांड पूरी की थी. दोनों ने एकदूसरे को देखा था और पसंद भी किया था. सभी को जोड़ी अच्छी लग रही थी.
देविका अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर रही थी. अपने भविष्य को ले कर उस ने सपने देखे थे. शादी के दिन जब फेरे हो रहे थे, उस समय देवेश नशे की हालत में था. उस के पैर लड़खड़ा रहे थे और मुंह से बदबू आ रही थी.
देविका को अच्छा नहीं लगा. उस ने आगे के फेरे लेने बंद कर दिए और अपने परिवार को बुला कर फैसला सुना दिया कि वह नशा करने वाले लड़के के साथ शादी नहीं करेगी.
देविका के लिए यह फैसला लेना आसान नहीं था. घरपरिवार, नातेरिश्तेदार सभी उस को समझाने में लग गए. हर तरह से समझाया पर देविका ने अपने फैसले को बदलना ठीक नहीं समझा.
देविका ने कहा, ‘‘अगर आप लोग नहीं माने तो मैं मुकदमा दर्ज करा दूंगी.’’
देविका के दबाव के आगे सभी को झुकना पड़ा. देवेश को शादी किए बिना ही अपने घर वापस आना पड़ा.
यह घटना एक उदाहरण भर है. ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जहां लड़की ने शादी करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उस का होने वाला पति नशा करता था.
नशे की लत
गांव में खेतीकिसानी ही अहम पेशा होता है. हाल के कुछ सालों में खेतीकिसानी बेहाल होती जा रही है. गांव के आसपास शहरों का विकास होने लगा है. गांव की जमीन महंगी होती जा रही है. गांव के आसपास सड़क बनने से सरकार गांव से जमीन खरीद कर अच्छाखासा मुआवजा देने लगी है. घर और रिसोर्ट बनाने वाले भी गांवों की जमीन की खरीदारी कर रहे हैं. शहरों में रहने वाले लोग भी गांव की जमीनें खरीदने लगे हैं. ऐसे में गांव के लोगों के पास जमीन बेचने के बाद पैसा आने लगा है. पैसा आने के बाद ये लोग उस का इस्तेमाल ऐशोआराम में करने लगे हैं. ऐेसे में नशे की आदत सब से ज्यादा बढ़ती है.
गांवों में रहने वाले नौजवान उम्र के 90 फीसदी लोग नशे के शिकार हैं. वे शराब, भांग और गांजा समेत तंबाकू का सेवन करने लगे हैं. पढ़नेलिखने से दूर ऐसे बेराजगार नौजवानों से लोग अपनी लड़की की शादी नहीं करना चाहते हैं.
नशे के आदी इन नौजवानों की इमेज बेहद खराब है. लड़कियों को लगता है कि ये लोग शादी के बाद मारपीट और गालीगलौज ज्यादा करते है. ऐसे में इन के पास जमीनजायदाद होते हुए भी लड़कियां शादी के लिए तैयार नहीं होती हैं. कई बार अगर मातापिता के दबाव में लड़की शादी करने को राजी हो भी जाए तो शादी टूट जाती है. नशे और स्वभाव के चलते गंवई लड़के लड़कियों को पसंद नहीं आते. गांव के माहौल में पली लड़कियां तो किसी तरह से अपने को ढाल भी लें पर शहर की रहने वाली लड़की तो कभी भी ऐसा नहीं कर पाती है.
बेरोजगारी से बड़ा दाग
अब लड़कियां लड़कों से ज्यादा पढ़ीलिखी होने लगी हैं. ऐसे में वे लड़कों की बेरोजगारी से तो समझौता कर भी लेती हैं पर नशेड़ी होने की हालत में समझौता करने को तैयार नहीं होती हैं.
कविता नामक लड़की कहती है, ‘‘रोजगार नहीं होगा तो कोई भी धंधा किया जा सकता है. आज गांवों में हर तरह की सुविधा और साधन हो गए हैं पर अगर पति में नशे की लत होगी तो वह हमेशा परेशान करेगा. नशे के लिए पैसा चाहिए. पैसे का इंतजाम करने के लिए वह जमीनजायदाद और गहने तक बेचने की कोशिश करता है. नशे के हावी होने से शादी के बाद की खुशनुमा जिंदगी बरबाद हो जाती है.’’
नशे के शिकार नौजवान उम्र से पहले ही बूढ़े हो जाते हैं. तमाम बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. एक तरफ गरीबी होती है तो दूसरी तरफ पैसा जो पहले नशे पर खर्च होता है और बाद में नशेड़ी के इलाज में. ऐसे में अगर पहले से नशेड़ी लोगों को सबक मिले तो भविष्य में गांव के नौजवान नशे से दूर रहेंगे.
ज्यादातर नौजवानों को नशे की लत आपस के लोगों से ही लगती है. कई बार यह भी होता है कि अगर आप का कोई दुश्मन है तो वह आप के लड़के को नशे की लत लगा देगा, जिस से पूरी पीढ़ी बरबाद हो जाती है.
कई बार नशा करने वाला यह स्वीकार ही नहीं करता कि वह नशा करता है. ऐसे में समस्या को हल करने का कोई जरीया ही नहीं बचता है. गांव में रहने वालों को खुद का भविष्य सुधारना है तो नशे के खिलाफ खड़ा होना होगा.
नशे से बढ़ते हैं घरेलू झगड़े
नौजवान पीढ़ी नशे की सब से ज्यादा शिकार बनती जा रही है. नशे की लत और मात्रा बढ़ती जा रही है. पहले गांव में गिनेचुने लोग ही नशा करते थे, अब आप गिन नहीं सकते कि कितने लोग नशा कर रहे हैं. अपनी मेहनत से कमाया गया पैसा नशे में उड़ा रहे हैं. इस से पैसा और शरीर दोनों खराब हो रहे हैं. गांव में स्कूल के बच्चों से बात करने पर पता चलता है कि पिता बच्चे के स्कूल से ज्यादा अहमियत अपने नशे को देता
है. जिस घर में नशा करने वाले लोग होते हैं वहां लड़ाई जरूर होती है. नशे के खिलाफ सामाजिक जागरूकता बढ़नी चाहिए.
– आईपी सिंह, समाजसेवी टीचर.
बीमारियों की वजह है नशा
पिछले कुछ सालों में कैंसर, टीबी जैसी बीमारियों ने गांवों में तेजी से पैर पसार लिए हैं. हम लखनऊ के मैडिकल कालेज में कैंसर पीडि़त परिवारों की मदद करते समय यह समझ पाते हैं कि हालात बहुत खराब हैं. ऐसी बीमारियां केवल नशा करने वाले को ही नहीं होतीं, बल्कि उस के परिवार में दूसरों को भी होती हैं. परिवार में कोई एक बीमारी का शिकार हो गया तो पूरा परिवार बरबाद हो जाता है.
अगर नशे का विरोध हो और इस को बंद किया जा सके तो समाज और परिवार का बहुत भला हो सकता है. बीमारी के बाद इलाज में लगने वाला पैसा घरपरिवार की खुशहाली में लग सकता है.
– सपना उपाध्याय, ईश्वर चाइल्ड केयर फाउंडेशन
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बिहार में हथियारों के शौकीनों का एक नया गैरकानूनी शौक सामने आया है. वे लाइसैंसी हथियारों के डिजाइन में फेरबदल कर उसे नया रूप देने लगे हैं. यह एक महज शौक नहीं बल्कि रुपए कमाने का नया तरीका भी बन चुका है.
गृह विभाग का मानना है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान जब्त हथियारों को देखने के बाद यह पता चला है कि हथियारों में फेरबदल करने का शौक खतरनाक हद तक बढ़ चुका है.
30 मार्च, 2018 को पटना के ऐक्जीबिशन रोड चौराहे के पास पकड़े गए लोगों के पास से 10 हथियार बरामद किए गए. इन में से 3 हथियारों के मूल डिजाइन को बदल दिया गया था.
तड़के सुबह साढ़े 3 बजे गाडि़यों की चैकिंग के दौरान पुलिस ने एक गाड़ी से इन हथियारों को बरामद किया. इन में .315 की 5 राइफलें, 12 बोर की 2 एसबीबीएल राइफलें और 12 बोर की 3 डीबीबीएल राइफलें थीं.
मामले की छानबीन करने वाले डीएसपी एसए हाशिमी ने बताया कि लाइसैंसी हथियारों के डिजाइन में किसी भी तरह का बदलाव करना गैरकानूनी है जबकि कई लोग पुराने हथियारों को नया रंगरूप दे कर रोब गांठते हैं.
सब से ज्यादा .315 बोर की राइफल के मूल डिजाइन में बदलाव करने का मामला देखने को मिला है. यह राइफल मूल रूप से और्डिनैंस फैक्टरी में बनाई जाती है और इस की एक ही डिजाइन मार्केट में है.
इस मौडल की राइफल में पूरा बट लकड़ी का होता है. कुछ लोग लकड़ी के बट को हटा कर छोटा बट लगा देते हैं. इस से राइफल का साइज छोटा हो कर एके-47 जैसा लगने लगता है. बट को बदलवाने में ढाई हजार रुपए और उस में दूरबीन लगवाने के लिए 15 हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं.
आर्म्स ऐक्ट-1959 कहता है कि किसी भी हथियार के मूल डिजाइन में किसी भी तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता है. इस से हथियार गैरकानूनी हो जाता है. ऐसे हथियारों को पुलिस जब्त कर सकती है और आरोपी को 7 साल की कैद हो सकती है.
पुलिस सूत्रों के मुताबिक कानपुर के स्टैंड रोड पर पुराने हथियारों को नया डिजाइन और लुक देने का काम धड़ल्ले से होता है. इस के अलावा बिहार की राजधानी पटना के अलावा मुंगेर, गया, भागलपुर, बेतिया, मुजफ्फरपुर वगैरह जिलों में भी हथियारों को नया रंगरूप देने का धंधा खूब फलफूल रहा है.
इस मामले में गिरफ्तार किए गए 13 लोगों से जब पुलिस ने पूछताछ की तो हथियारों और सिक्योरिटी एजेंसी चलाने वालों के एक नए ही खेल का खुलासा हुआ है. बाजार में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ एजेंसियां कई तरह के गैरकानूनी काम करती हैं. इन में पुराने हथियारों के मूल डिजाइन में बदलाव कर उन्हें मौडर्न लुक देने का खेल धड़ल्ले से चलाया जाता है.
मौडर्न हथियारों के नाम पर कंपनी के गार्ड को अच्छीखासी रकम मिलने लगती है. साधारण राइफल वाले गार्ड मुहैया कराने के लिए जहां एजेंसी 12 से 15 हजार रुपए वसूलती है, वहीं मौडर्न हथियारों से लैस गार्ड मुहैया कराने के नाम पर 20 से 30 हजार रुपए तक की वसूली की जाती है.
वैसे, एजेंसी संचालक गार्ड को तनख्वाह के नाम पर महज 8 से 10 हजार रुपए ही देती है, बाकी रकम एजेंसी की जेब में जाती है.
गांधी मैदान थानाध्यक्ष दीपक कुमार ने बताया कि गिरफ्तार गार्डों से पूछताछ के बाद यह भी खुलासा हुआ कि सिक्योरिटी एजेंसियां जमीन विवाद को निबटाने का भी ठेका लेती हैं. किसी जमीन पर विवाद के निबटारे के लिए कोई जमीन मालिक किसी सिक्योरिटी एजेंसी से संपर्क करता है तो संचालक उस से मोटी रकम ले कर 15-20 हथियारबंद गार्डों को मौके पर भेज देता है और ताबड़तोड़ आसमानी फायर कर के जमीन पर दावा करने वालों को डराधमका कर भगा देता है, जबकि ऐसा करना पूरी तरह से गैरकानूनी है.
इस के अलावा बड़ी शादियों या बड़ी पार्टियों में मौडर्न हथियारों से लैस गार्डों को बुलाना हाईप्रोफाइल लोगों का शगल बन गया है. पार्टियों में गार्डों से अंधाधुंध आसमानी फायर करवा कर आसपास के लोगों और अपने परिवार वालों के बीच रोब गांठने का काम किया जाता है. इस के लिए भी सिक्योरिटी एजेंसियां मोटी रकम वसूलती हैं.
सरकारी बंदूक का गैरकानूनी इस्तेमाल
प्रदेश के कई इलाकों में सरकारी हथियारों को भाड़े पर अपराधियों को दे कर मोटी कमाई की जाती है. पटना से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर मनेर के दियारा इलाके की एक बड़ी खासीयत यह है कि वहां के तकरीबन हर घर में एक फौजी है. फौज में रहने के दौरान उन की पोस्टिंग जब जम्मूकश्मीर में होती है तो वे वहां अपने नाम से राइफल या बंदूक का लाइसैंस जारी करवा लेते हैं. हथियार ले कर वे बड़ी आसानी से अपने गांव आ जाते हैं और इस की सूचना वे लोकल थाने में नहीं देते हैं.
बालू के गैरकानूनी खनन में लगे अपराधी गिरोहों को वे 3 हजार के मासिक किराए पर हथियार दे देते हैं. बालू घाटों पर कब्जा करने में ज्यादातर ऐसे ही हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है. पुलिस का कहना है कि जम्मूकश्मीर में जारी हथियारों के लाइसैंस का बगैर बिहार में ऐंट्री कराए इस्तेमाल करना गैरकानूनी है. इस के बाद भी पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठा पाती है.
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नवीन को बाजार में बेकार घूमने का शौक कभी नहीं रहा, वह तो सामान खरीदने के लिए उसे मजबूरी में बाजारों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. घर की छोटीछोटी वस्तुएं कब खत्म होतीं और कब आतीं, उसे न तो कभी इस बात से सरोकार रहा, न ही दिलचस्पी. उसे तो हर चीज व्यवस्थित ढंग से समयानुसार मिलती रही थी.
हर महीने घर में वेतन दे कर वह हर तरह के कर्तव्यों की इतिश्री मान लेता था. शुरूशुरू में वह ज्यादा तटस्थ था लेकिन बाद में उम्र बढ़ने के साथ जब थोड़ी गंभीरता आई तो अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझने लगा था.
बाजार से खरीदारी करना उसे कभी पसंद नहीं आया था. लेकिन विडंबना यह थी कि महज वक्त काटने के लिए अब वह रास्तों की धूल फांकता रहता. साइन बोर्ड पढ़ता, दुकानों के भीतर ऐसी दृष्टि से ताकता, मानो सचमुच ही कुछ खरीदना चाहता हो.
दफ्तर से लौट कर घर जाने को उस का मन ही नहीं होता था. खाली घर काटने को दौड़ता. उदास मन और थके कदमों से उस ने दरवाजे का ताला खोला तो अंधेरे ने स्वागत किया. स्वयं बत्ती जलाते हुए उसे झुंझलाहट हुई. कभी अकेलेपन की त्रासदी यों भोगी नहीं थी. पहले मांबाप के साथ रहता था, फिर नौकरी के कारण दिल्ली आना पड़ा और यहीं विवाह हो गया था.
पिछले 8 वर्षों से रुचि ही घर के हर कोने में फुदकती दिखाई देती थी. फिर अचानक सबकुछ उलटपुलट हो गया. रुचि और उस के संबंधों में तनाव पनपने लगा. अर्थहीन बातों को ले कर झगड़े हो जाते और फिर सहज होने में जितना समय बीतता, उस दौरान रिश्ते में एक गांठ पड़ जाती. फिर होने यह लगा कि गांठें खुलने के बजाय और भी मजबूत सी होती गईं.
सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए नवीन ने फ्रिज खोला और बोतल सीधे मुंह से लगा कर पानी पी लिया. उस ने सोचा, अगर रुचि होती तो फौरन चिल्लाती, ‘क्या कर रहे हो, नवीन, शर्म आनी चाहिए तुम्हें, हमेशा बोतल जूठी कर देते हो.’
तब वह मुसकरा उठता था, ‘मेरा जूठा पीओगी तो धन्य हो जाओगी.’
‘बेकार की बकवास मत किया करो, नाहक ही अपने मुंह की सारी गंदगी बोतलों में भर देते हो.’
यह सुन कर वह चिढ़ जाता और एकएक कर पानी की सारी बोतलें निकाल जूठी कर देता. तब रुचि सारी बोतलें निकाल उन्हें दोबारा साफ कर, फिर भर कर फ्रिज में रखती.
जब बच्चे भी उस की नकल कर ऐसा करने लगे तो रुचि ने अपना अलग घड़ा रख लिया और फ्रिज का पानी पीना ही छोड़ दिया. कुढ़ते हुए वह कहती, ‘बच्चों को भी अपनी गंदी आदतें सिखा दो, ताकि बड़े हो कर वे गंवार कहलाएं. न जाने लोग पढ़लिख कर भी ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं?’
बच्चों का खयाल आते ही उस के मन के किसी कोने में हूक उठी, उन के बिना जीना भी कितना व्यर्थ लगता है.
रुचि जब जाने लगी थी तो उस ने कितनी जिद की थी, अनुनय की थी कि वह बच्चों को साथ न ले जाए. तब उस ने व्यंग्यपूर्वक मुंह बनाते हुए कहा था, ‘ताकि वे भी तुम्हारी तरह लापरवाह और अव्यवस्थित बन जाएं. नहीं नवीन, मैं अपने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती. मैं उन्हें एक सभ्य व व्यवस्थित इंसान बनाना चाहती हूं. फिर तुम्हारे जैसा मस्तमौला आदमी उन की देखभाल करने में तो पूर्ण अक्षम है. बिस्तर की चादर तक तो तुम ढंग से बिछा नहीं सकते, फिर बच्चों को कैसे संभालोगे?’
नवीन सोचने लगा, न सही सलीका, पर वह अपने बच्चों से प्यार तो भरपूर करता है. क्या जीवन जीने के लिए व्यवस्थित होना जरूरी है?
रुचि हर चीज को वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करने की आदी थी.
विवाह के 2 वर्षों बाद जब स्नेहा पैदा हुई थी तो वह पागल सा हो गया था. हर समय गोदी में लिए उसे झुलाता रहता था. तब रुचि गुस्सा करती, ‘क्यों इस की आदत बिगाड़ रही हो, गोदी में रहने से इस का विकास कैसे होगा?’
रुचि के सामने नवीन की यही कोशिश रहती कि स्नेहा के सारे काम तरतीब से हों पर जैसे ही वह इधरउधर होती, वह खिलंदड़ा बन स्नेहा को गुदगुदाने लगता. कभी घोड़ा बन जाता तो कभी उसे हवा में उछाल देता.
वह सोचने लगता कि स्नेहा तो अब 6 साल की हो गई है और कन्नू 3 साल का. इस साल तो वह कन्नू का जन्मदिन भी नहीं मना सका, रुचि ने ही अपने मायके में मनाया था. अपने दिल के हाथों बेबस हो कर वह उपहार ले कर वहां गया था पर दरवाजे पर खड़े उस के पहलवान से दिखने वाले भाई ने आंखें तरेरते हुए उसे बाहर से ही खदेड़ दिया था. उस का लाया उपहार फेंक कर पान चबाते हुए कहा था, ‘शर्म नहीं आती यहां आते हुए. एक तरफ तो अदालत में तलाक का मुकदमा चल रहा है और दूसरी ओर यहां चले आते हो.’
‘मैं अपने बच्चों से मिलना चाहता हूं,’ हिम्मत जुटा कर उस ने कहा था.
‘खबरदार, बच्चों का नाम भी लिया तो. दे क्या सकता है तू बच्चों को,’ उस के ससुर ने ताना मारा था, ‘वे मेरे नाती हैं, राजसी ढंग से रहने के अधिकारी हैं. मेरी बेटी को तो तू ने नौकरानी की तरह रखा पर बच्चे तेरे गुलाम नहीं बनेंगे. मुझे पता होता कि तेरे जैसा व्यक्ति, जो इंजीनियर कहलाता है, इतना असभ्य होगा, तो कभी भी अपनी पढ़ीलिखी, सुसंस्कृत लड़की को तेरे साथ न ब्याहता, वही पढ़ेलिखे के चक्कर में जिद कर बैठी, नहीं तो क्या रईसों की कमी थी. जा, चला जा यहां से, वरना धक्के दे कर निकलवा दूंगा.’
वह अपमान का घूंट पी कर बच्चों की तड़प मन में लिए लौट आया था. वैसे भी झगड़ा किस आधार पर करता, जब रुचि ने ही उस का साथ छोड़ दिया था. वैसे उस के साथ रहते हुए रुचि ने कभी यह नहीं जतलाया था कि वह अमीर बाप की बेटी है, न ही वह कभी अपने मायके जा कर हाथ पसारती थी.
रुचि पैसे का अभाव तो सह जाती थी, लेकिन जब जिंदगी को मस्त ढंग से जीने का सवाल आता तो वह एकदम उखड़ जाती और सिद्धांतों का पक्ष लेती. उस वक्त नवीन का हर समीकरण, हर दलील उसे बेमानी व अर्थहीन लगती. रुचि ने जब अपने लिए घड़ा रखा तो नवीन को महसूस हुआ था कि वह चाहती तो अपने पिता से कह कर अलग से फ्रिज मंगा सकती थी पर उस ने पति का मान रखते हुए कभी इस बारे में सोचा भी नहीं.
नवीन ने रुचि की व्यवस्थित ढंग से जीने की आदत के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश की पर हर बार वह हार जाता. बचपन से ही मां, बाबूजी ने उसे अपने ऊपर इतना निर्भर बना कर रखा था कि वह अपनी तरह से जीना सीख ही न पाया. मां तो उसे अपनेआप पानी भी ले कर नहीं पीने देती थीं. 8 वर्षों के वैवाहिक जीवन में वह उन संस्कारों से छुटकारा नहीं पा सका था.
वैसे भी नवीन, रुचि को कभी संजीदगी से नहीं लेता था, यहां तक कि हमेशा उस का मजाक ही उड़ाया करता था, ‘देखो, कुढ़कुढ़ कर बालों में सफेदी झांकने लगी है.’
तब वह बेहद चिढ़ जाती और बेवजह नौकर को डांटने लगती कि सफाई ठीक से क्यों नहीं की. घर तब शीशे की तरह चमकता था, नौकर तो उस की मां ने जबरदस्ती कन्नू के जन्म के समय भेज दिया था.
सुबह की थोड़ी सब्जी पड़ी थी, जिसे नवीन ने अपने अधकचरे ज्ञान से तैयार किया था, उसी को डबलरोटी के साथ खा कर उस ने रात के खाने की रस्म पूरी कर ली. फिर औफिस की फाइल ले कर मेज पर बैठ गया. बहुत मन लगाने के बावजूद वह काम में उलझ न सका. फिर दराज खोल कर बच्चों की तसवीरें निकाल लीं और सोच में डूब गया, ‘कितने प्यारे बच्चे हैं, दोनों मुझ पर जान छिड़कते हैं.’
एक दिन स्नेहा से मिलने वह उस के स्कूल गया था. वह तो रोतेरोते उस से चिपट ही गई थी, ‘पिताजी, हमें भी अपने साथ ले चलिए, नानाजी के घर में तो न खेल सकते हैं, न शोर मचा सकते हैं. मां कहती हैं, अच्छे बच्चे सिर्फ पढ़ते हैं. कन्नू भी आप को बहुत याद करता है.’
अपनी मजबूरी पर उस की पलकें नम हो आई थीं. इस से पहले कि वह जीभर कर उसे प्यार कर पाता, ड्राइवर बीच में आ गया था, ‘बेबी, आप को मेम साहब ने किसी से मिलने को मना किया है. चलो, देर हो गई तो मेरी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी.’
उस के बाद तलाक के कागज नवीन के घर पहुंच गए थे, लेकिन उस ने हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया था. मुकदमा उन्होंने ही दायर किया था पर तलाक का आधार क्या बनाते? वे लोग तो सौ झूठे इलजाम लगा सकते थे, पर रुचि ने ऐसा करने से मना कर दिया, ‘अगर गलत आरोपों का ही सहारा लेना है तो फिर मैं सिद्धांतों की लड़ाई कैसे लड़ूंगी?’
तब नवीन को एहसास हुआ था कि रुचि उस से नहीं, बल्कि उस की आदतों से चिढ़ती है. जिस दिन सुनवाई होनी थी, वह अदालत गया ही नहीं था, इसलिए एकतरफा फैसले की कोई कीमत नहीं थी. इतना जरूर है कि उन लोगों ने बच्चों को अपने पास रखने की कानूनी रूप से इजाजत जरूर ले ली
थी. तलाक न होने पर भी वे दोनों अलगअलग रह रहे थे और जुड़ने की संभावनाएं न के बराबर थीं.
नवीन बिस्तर पर लेटा करवटें बदलता रहा. युवा पुरुष के लिए अकेले रात काटना बहुत कठिन प्रतीत होता है. शरीर की इच्छाएं उसे कभीकभी उद्वेलित
कर देतीं तो वह स्वयं को पागल सा महसूस करता. उसे मानसिक तनाव घेर लेता और मजबूरन उसे नींद की गोली लेनी पड़ती.
उस ने औफिस का काफी काम भी अपने ऊपर ले लिया था, ताकि रुचि और बच्चे उस के जेहन से निकल जाएं. दफ्तर वाले उस के काम की तारीफ में कहते हैं, ‘नवीन साहब, आप का काम बहुत व्यवस्थित होता है, मजाल है कि एक फाइल या एक कागज, इधरउधर हो जाए.’
वह अकसर सोचता, घर पहुंचते ही उसे क्या हो जाया करता था, क्यों बदल जाता था उस का व्यक्तित्व और वह एक ढीलाढाला, अलमस्त व्यक्ति बन जाता था?
मेजकुरसी के बजाय जब वह फर्श पर चटाई बिछा कर खाने की फरमाइश करता तो रुचि भड़क उठती, ‘लोग सच कहते हैं कि पृष्ठभूमि का सही होना बहुत जरूरी है, वरना कोई चाहे कितना पढ़ ले, गांव में रहने वाला रहेगा गंवार ही. तुम्हारे परिवार वाले शिक्षित होते तो संभ्रांत परिवार की झलक व आदतें खुद ही ही तुम्हारे अंदर प्रकट हो जातीं पर तुम ठहरे गंवार, फूहड़. अपने लिए न सही, बच्चों के लिए तो यह फूहड़पन छोड़ दो. अगर नहीं सुधर सकते तो अपने गांव लौट जाओ.’
उस ने रुचि को बहुत बार समझाने की कोशिश की कि ग्वालियर एक शहर है न कि गांव. फिर कुरसी पर बैठ कर खाने से क्या कोई सभ्य कहलाता है.
‘देखो, बेकार के फलसफे झाड़ कर जीना मुश्किल मत बनाओ.’
‘अरे, एक बार जमीन पर बैठ कर खा कर देखो तो सही, कुरसीमेज सब भूल जाओगी.’
नवीन ने चम्मच छोड़ हाथ से ही चावल खाने शुरू कर दिए थे.
‘बस, बहुत हो गया, नवीन, मैं हार गई हूं. 8 वर्षों में तुम्हें सुधार नहीं पाई और अब उम्मीद भी खत्म हो गई है. बाहर जाओ तो लोग मेरी खिल्ली उड़ाते हैं, मेरे रिश्तेदार मुझ पर हंसते हैं. तुम से तो कहीं अच्छे मेरी बहनों के पति हैं, जो कम पढ़ेलिखे ही सही, पर शिष्टाचार के सारे नियमों को जानते हैं. तुम्हारी तरह बेवकूफों की तरह बच्चों के लिए न तो घोड़े बनते हैं, न ही बर्फ की क्यूब निकाल कर बच्चों के साथ खेलते हैं. लानत है, तुम्हारी पढ़ाई पर.’
नवीन कभी समझ नहीं पाया था कि रुचि हमेशा इन छोटीछोटी खुशियों को फूहड़पन का दरजा क्यों देती है? वैसे, उस की बहनों के पतियों को भी वह बखूबी जानता था, जो अपनी टूटीफूटी, बनावटी अंगरेजी के साथ हंसी के पात्र बनते थे, पर उन की रईसी का आवरण इतना चमकदार था कि लोग सामने उन की तारीफों के पुल बांधते रहते थे.
शादी से पहले उन दोनों के बीच 1 साल तक रोमांस चला था. उस अंतराल में रुचि को नवीन की किसी भी हरकत से न तो चिढ़ होती थी, न ही फूहड़पन की झलक दिखाई देती थी, बल्कि उस की बातबात में चुटकुले छोड़ने की आदत की वह प्रशंसिका ही थी. यहां तक कि उस के बेतरतीब बालों पर वह रश्क करती थी. उस समय तो रास्ते में खड़े हो कर गोलगप्पे खाने का उस ने कभी विरोध नहीं किया था.
नींद की गोली के प्रभाव से वह तनावमुक्त अवश्य हो गया था, पर सो न सका था. चिडि़यों की चहचहाहट से उसे अनुभव हुआ कि सवेरा हो गया है और उस ने सोचतेसोचते रात बिता दी है.
चाय का प्याला ले कर अखबार पढ़ने बैठा, पर सोच के दायरे उस की तंद्रा को भटकाने लगे. प्लेट में चाय डालने की उसे इच्छा ही नहीं हुई, इसलिए प्याले से ही चाय पीने लगा.
शादी के बाद भी सबकुछ ठीक था. उन के बीच न तो तनाव था, न ही सामंजस्य का अभाव. दोनों को ही ऐसा नहीं लगा था कि विपरीत आदतें उन के प्यार को कम कर रही हैं. नवीन भूल से कभी कोई कागज फाड़ कर कचरे के डब्बे में फेंकने के बजाय जमीन पर डाल देता तो रुचि झुंझलाती जरूर थी पर बिना कुछ कहे स्वयं उसे डब्बे में डाल देती थी. तब उस ने भी इन हरकतों को सामान्य समझ कर गंभीरता से नहीं लिया था.
अपने सीमित दायरे में वे दोनों खुश थे. स्नेहा के होने से पहले तक सब ठीक था. रुचि आम अमीर लड़कियों से बिलकुल भिन्न थी, इसलिए स्वयं घर का काम करने से उसे कभी दिक्कत नहीं हुई.
हां, स्नेहा के होने के बाद काम अवश्य बढ़ गया था पर झगड़े नहीं होते थे. लेकिन इतना अवश्य हुआ था कि स्नेहा के जन्म के बाद से उन के घर में रुचि की मां, बहनों का आना बढ़ गया था. उन लोगों की मीनमेख निकालने की आदत जरूरत से ज्यादा ही थी. तभी से रुचि में परिवर्तन आने लगा था और पति की हर बात उसे बुरी लगने लगी थी. यहां तक कि वह उस के कपड़ों के चयन में भी खामियां निकालने लगी थी.
उन का विवाह रुचि की जिद से हुआ था, घर वालों की रजामंदी से नहीं. यही कारण था कि वे हर पल जहर घोलने में लगे रहते थे और उन्हें दूर करने, उन के रिश्ते में कड़वाहट घोलने में सफल हो भी गए थे.
काम करने वाली महरी दरवाजे पर आ खड़ी हुई तो वह उठ खड़ा हुआ और सोचने लगा कि उस से ही कितनी बार कहा है कि जरा रोटी, सब्जी बना दिया करे. लेकिन उस के अपने नखरे हैं. ‘बाबूजी, अकेले आदमी के यहां तो मैं काम ही नहीं करती, वह तो बीबीजी के वक्त से हूं, इसलिए आ जाती हूं.’
नौकर को एक बार रुचि की मां ले गई थी, फिर वापस भेजा नहीं. तभी रुचि ने यह महरी रखी थी नवीन के बाबूजी को गुजरे 7 साल हो गए थे. मां वहीं ग्वालियर में बड़े भाई के पास रहती थीं. भाभी एक सामान्य घर से आई थीं, इसलिए कभी तकरार का प्रश्न ही न उठा. उस के पास भी मां मिलने कई बार आईं, पर रुचि का सलीका उन के सरल जीवन के आड़े आने लगा. वे हर बार महीने की सोच कर हफ्ते में ही लौट जातीं. वह तो यह अच्छा था कि भाभी ने उन्हें कभी बोझ न समझा, वरना ऐसी स्थिति में कोई भी अपमान करने से नहीं चूकता.
वैसे, रुचि का मकसद उन का अपमान करना कतई नहीं होता था, लेकिन सभ्य व्यवहार की तख्ती अनजाने में ही उन पर यह न करो, वह न करो के आदेश थोपती तो मां हड़बड़ा जातीं. इतनी उम्र कटने के बाद उन का बदलना सहज न था. वैसे भी उन्होंने एक मस्त जिंदगी गुजारी थी, जिस में बच्चों को प्यार से पालापोसा था, हाथ में हर समय आदेश का डंडा ले कर नहीं.
रुचि के जाने के बाद उस ने मां से कहा था कि वे अब उसी के पास आ कर रहें, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया था, ‘बेटा, तेरे घर में कदम रखते डर लगता है, कोई कुरसी भी खिसक जाए तो…न बाबा. वैसे भी यहां बच्चों के बीच अस्तव्यस्त रहते ज्यादा आनंद आता है. मैं वहां आ कर क्या करूंगी, इन बूढ़ी हड्डियों से काम तो होता नहीं, नाहक ही तुझ पर बोझ बन जाऊंगी.’
रुचि के जाने के बाद नवीन ने उस के मायके फोन किया था कि वह अपनी आदतें बदलने की कोशिश करेगा, बस एक बार मौका दे और लौट आए. पर तभी उस के पिता की गर्जना सुनाई दी थी और फोन कट गया था. उस के बाद कभी रुचि ने फोन नहीं उठाया था, शायद उसे ऐसी ही ताकीद थी. वह तो बच्चों की खातिर नए सिरे से शुरुआत करने को तैयार था पर रुचि से मिलने का मौका ही नहीं मिला था.
शाम को दफ्तर से लौटते वक्त बाजार की ओर चला गया. अचानक साडि़यों की दुकान पर रुचि नजर आई. लपक कर एक उम्मीद लिए अंदर घुसा, ‘हैलो रुचि, देखो, मैं तुम्हें कुछ समझाना चाहता हूं. मेरी बात सुनो.’
पर रुचि ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहती. तुम अपनी मनमानी करते रहे हो, अब भी करो. मैं वापस नहीं आऊंगी. और कभी मुझ से मिलने की कोशिश मत करना.’
‘ठीक है,’ नवीन को भी गुस्सा आ गया था, ‘मैं बच्चों से मिलना चाहता हूं, उन पर मेरा भी अधिकार है.’
‘कोई अधिकार नहीं है,’ तभी न जाने किस कोने से उस की मां निकल कर आ गई थी, ‘वे कानूनी रूप से हमारे हैं. अब रुचि का पीछा छोड़ दो. अपनी इच्छा से एक जाहिल, गंवार से शादी कर वह पहले ही बहुत पछता रही है.’
‘मैं रुचि से अकेले में बात करना चाहता हूं,’ उस ने हिम्मत जुटा कर कहा.
‘पर मैं बात नहीं करना चाहती. अब सबकुछ खत्म हो चुका है.’
उस ने आखिरी कोशिश की थी, पर वह भी नाकामयाब रही. उस के बाद कभी उस के घर, बाहर, कभी बाजार में भी खूब चक्कर काटे पर रुचि हर बार कतरा कर निकल गई.
नवीन अकसर सोचता, ‘छोटीछोटी अर्थहीन बातें कैसे घर बरबाद कर देती हैं. रुचि इतनी कठोर क्यों हो गई है कि सुलह तक नहीं करना चाहती. क्यों भूल गई है कि बच्चों को तो बाप का प्यार भी चाहिए. गलती किसी की भी नहीं है, केवल बेसिरपैर के मुद्दे खड़े हो गए हैं.
‘तलाक नहीं हुआ, इसलिए मैं दोबारा शादी भी नहीं कर सकता. बच्चों की तड़प मुझे सताती रहेगी. रुचि को भी अकेले ही जीवन काटना होगा. लेकिन उसे एक संतोष तो है कि बच्चे उस के पास हैं. दोनों की ही स्थिति त्रिशंकु की है, न वापस बीते वर्षों को लौटा सकते हैं न ही दोबारा कोशिश करना चाहते हैं. हाथ में आया पछतावा और अकेलेपन की त्रासदी. आखिर दोषी कौन है, कौन तय करे कि गलती किस की है, इस का भी कोई तराजू नहीं है, जो पलड़ों पर बाट रख कर पलपल का हिसाब कर रेशेरेशे को तौले.
वैसे भी एकदूसरे पर लांछन लगा कर अलग होने से तो अच्छा है हालात के आगे झुक जाएं. रुचि सही कहती थी, ‘जब लगे कि अब साथसाथ नहीं रह सकते तो असभ्य लोगों की तरह गालीगलौज करने के बजाय एकदूसरे से दूर हो जाएं तो अशिक्षित तो नहीं कहलाएंगे.’
रुचि को एक बरस हो गया था और वह पछतावे को लिए त्रिशंकु की भांति अपना एकएक दिन काट रहा था. शायद अभी भी उस निपट गंवार, फूहड़ और बेतरतीब इंसान के मन में रुचि के वापस आने की उम्मीद बनी हुई थी.
वह सोचने लगा कि रुचि भी तो त्रिशंकु ही बन गई है. बच्चे तक उस के खोखले सिद्धांतों व सनक से चिढ़ने लगे हैं. असल में दोषी कोई नहीं है, बस, अलगअलग परिवेशों से जुड़े व्यक्ति अगर मिलते भी हैं तो सिर्फ सामंजस्य के धरातल पर, वरना टकराव अनिवार्य ही है.
क्या एक दिन रुचि जब अपने एकांतवास से ऊब जाएगी, तब लौट आएगी? उम्मीद ही तो वह लौ है जो अंत तक मनुष्य की जीते रहने की आस बंधाती है, वरना सबकुछ बिखर नहीं जाता. प्यार का बंधन इतना कमजोर नहीं जो आवरणों से टूट जाए, जबकि भीतरी परतें इतनी सशक्त हों कि हमेशा जुड़ने को लालायित रहती हों. कभी न कभी तो उन का एकांतवास अवश्य ही खत्म होगा.
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अब तक पंडेपुजारी शादी की तारीख निकालने से ले कर शादी कराने तक का काम करते थे पर अब उत्तर प्रदेश सरकार यह काम कर रही है. शादी की तारीख सरकार के हिसाब से निकलेगी. अगर आप ने अपने पंडित द्वारा निकाले गए मुहूर्त के मुताबिक शादी कर ली तो ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ का लाभ आप को नहीं मिलेगा. आप की अर्जी रद्द कर दी जाएगी.
उत्तर प्रदेश सरकार ने हर जिले में तकरीबन 10 हजार शादियां कराने का टारगेट रखा है. पूरे प्रदेश में 75 हजार शादियों के हिसाब से बजट बनाया गया है. ये शादियां नगरनिगम और ब्लौक लैवल पर होंगी.
सामूहिक शादी में सब से पहले आप को समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में जा कर अपने आधारकार्ड और आय प्रमाणपत्र के जरीए अर्जी देनी होगी. अर्जी के बाद अनुदान की प्रक्रिया शुरू होगी.
लखनऊ नगरनिगम के पास 28 जोड़ों ने सामूहिक विवाह के लिए अर्जी दी थी. पहले जनवरी महीने में सामूहिक विवाह की तारीख तय हुई. शादी में भी सरकारी लेटलतीफी चलने लगी. सरकार ने बाद में 9 मार्च को सामूहिक विवाह की तरीख तय की. शादी के लिए अर्जी देने वाले 11 जोड़ों ने 9 मार्च का इंतजार नहीं किया. उन सब ने पहले ही शादी कर ली. इन लोगों ने शादी के सरकारी मुहूर्त का इंतजार नहीं किया.
नगरनिगम ने ऐसे जोड़ों का नाम ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ से बाहर कर दिया. ऐसे में ये लोग सरकारी विवाह योजना का लाभ नहीं ले पाए.
सरकारी मुहूर्त
‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ में लाभ लेने के लिए शादी करने वाले को अपने पंडित के बताए मुहूर्त पर नहीं सरकारी मुहूर्त के हिसाब से शादी करनी होगी. इस योजना में उन लोगों को ही शामिल किया जा सकेगा, जिस के शहरी परिवार की सालाना आमदनी 54,460 रुपए और गांवदेहात के परिवारों की आमदनी 46,080 रुपए सालाना होगी. आवेदक का खाता नैशनल लैवल के बैंक में होना चाहिए.
‘सामूहिक विवाह योजना’ में रिश्ता घर वालों को खुद तय करना होता है. उस के बाद शादी के लिए अर्जी देनी होगी. सरकार एक तय तारीख पर शादी की योजना तैयार करती है.
‘सामूहिक विवाह योजना’ में सरकार 35 हजार रुपए खर्च करेगी. इस में से 20 हजार रुपए लड़की के खाते में जाते हैं. 10 हजार रुपए का घरेलू सामान और 5 हजार रुपए का टैंट व भोजन में हुए खर्च के लिए दिया जाता है. इस का भुगतान शादी कराने वाली संस्था को किया जाता है. एक बार में जब 10 जोड़ों की एकसाथ शादी होगी, तब उस को ही ‘सामूहिक विवाह योजना’ ही माना जाएगा.
उत्तर प्रदेश समाज कल्याण विभाग के डायरैक्टर जगदीश प्रसाद ने कहा, ‘‘हर जिले में 10,000 शादियां कराने का टारगेट रखा गया है. इस की तादाद ज्यादा होने पर भी सरकार मदद करेगी. इस सामूहिक विवाह योजना का मकसद माली तौर से कमजोर परिवारों की लड़कियों की शादी कराना है.’’
इस योजना में सभी धर्मों के लोगों को शामिल किया गया है. लखनऊ में 9 मार्च को ‘सामूहिक विवाह योजना’ के तहत 8 मुसलिम जोड़ों ने भी अपने जीवनसाथी को चुना था.
पूरे उत्तर प्रदेश में चली ‘सामूहिक विवाह योजना’ में भ्रष्टाचार की शिकायतें भी आईं. शादी में दिए जाने वाले गहनों और बरतनों में क्वालिटी का खयाल नहीं रखा गया. ऐसे में घटिया किस्म के बरतन और जेवर दिए गए.
विधवा विवाह में…
विवाह की इस योजना में जहां 35 हजार रुपए खर्च करने हैं, वहीं विधवा और तलाकशुदा मामले में यह खर्च 25 हजार खर्च का ही बजट रखा गया है. विवाह संस्कार के लिए पहली बार वाली शादी में 10,000 रुपए का जरूरी सामान, जिस में कपड़े, बिछिया, चांदी की पायल और 7 बरतन दिए जाते हैं. विधवा और तलाकशुदा में यह सामान 5 हजार का रखा गया है.
इस योजना में शामिल हुए लोगों के लिए जरूरी है कि वे गरीब हों. कन्या के मातापिता उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हों. अभिभावक निराश्रित, निर्धन और जरूरतमंद हों. विवाह का पंजीकरण और विवाह प्रमाणपत्र जारी करने का काम सहायक महानिबंधक स्टांप को करना है.
सरकार की योजना में सब से बड़ी खामी यह है कि जहां तलाकशुदा और विधवा विवाह को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है वहीं दूसरी ओर इन को कम मदद दी जा रही है.
शादी में मुहूर्त की अपनी अलग अहमियत होती है. ‘सामूहिक विवाह योजना’ में सरकार एक दिन शादी के लिए तय करती है. ऐसे में कम लोग ही सरकारी मुहूर्त पर शादी करने को तैयार होते हैं. सरकारी सहायता लेने के लिए लोग अपने मुहूर्त के हिसाब से पहले शादी कर लेते हैं. इस के बाद सरकारी सामूहिक शादी योजना में शादी करने चले जाते हैं.
बिचौलियों की चांदी
सरकार का काम शादी कराना नहीं होना चाहिए. शादी योजना के जरीए सरकार पंडों वाला काम कर रही है. सरकार अब अपना दखल परिवारों के अंदर तक बढ़ाना चाहती है जिस से शादी, बच्चे, जन्म, मृत्यु सब पर सरकार का दखल रहे. परोक्ष रूप से पैसा पंडों को मिलता रहे.
इस योजना के जरीए शादी में बिचौलियों का रोल बढ़ रहा है जिस से सरकारी अमले और बिचौलियों की आमदनी शुरू हो रही है.
‘सामूहिक विवाह योजना’ में नाम शामिल कराने के लिए आय प्रमाणपत्र बनवाने से ही सरकारी अमले का शोषण शुरू हो जाता है. आय प्रमाणपत्र बनवाने के लिए तहसील जाना पड़ता है. वहां लेखपाल की रिपोर्ट के बाद आय प्रमाणपत्र मिलता है. इस के लिए पैसा देना पड़ता है.
हर जिले में एक सीमित तादाद में शादी के लिए जोड़ों का चयन किया जाता है. ऐसे में अर्जी देने के बाद अपना नाम लिस्ट में शामिल कराना मुश्किल काम होता है. सरकारी अमले के दखल में एक भी काम बिना किसी चढ़ावे के नहीं होता है.
‘सामूहिक विवाह योजना’ में धार्मिक रीतिरिवाजों के मुताबिक शादी होती है. ऐसे में बिना दहेज के होने वाली कोर्ट मैरिज को दरकिनार किया जा रहा है.
बेहतर होता कि बिना दहेज और आडंबर के शादी करने वालों को मदद दी जाती. वैसे, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ के जरीए पंडावाद को बढ़ावा दे रही है.
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