नकदी की एक बार फिर कमी ने जनता की जान आफत में डाल दी है. एटीएमों के बाहर लाइनें लगने लगी हैं और व्यापार ढीला पड़ गया है क्योंकि नकदी की कमी में लेनदेन कम होने लगा है. जब लोगों को काम करने के बजाय लाइन में अपना ही पैसा निकालने के लिए खड़ा होने की मुसीबत झेलनी पड़े तो सरकार को कोसने के अलावा बचता ही क्या है. ‘नो कैश’ के बोर्डों का मतलब है ‘नो सरकार’.
नकदी की कमी का कारण वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक की गलती है. वित्त मंत्री लगातार कोशिश कर रहे हैं कि देश में सारा व्यापार, लेनदेन, जमा कैशलैस हो, चाहे इस से आम आदमी को जो मरजी कठिनाई हो. उन को लगता है कि अगर कैशलैस अर्थव्यवस्था होगी तो काला धन न होगा, बेईमानी न होगी.
वे यह याद ही नहीं रखना चाहते कि बैंकों के मारफत ही नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विजय माल्या जैसे बीसियों धन्ना सेठों ने पैसे निकाले ही नहीं, विदेश भी ले गए. कम नकदी असल में आम व्यापारी, किसान, मजदूर, छोटे कर्मचारी को परेशान करती है जिसे हर खर्च के लिए बैंक का मुंह ताकना पड़ता है.
जेब में नकदी हो तो सामान खरीदा और मामला खत्म. चैक, क्रैडिट कार्ड से खरीद का मतलब है कि महीने के आखिर तक इंतजार करो कि लेनदेन का ब्योरा आए और फिर एकएक खर्च को जांचो. कोई गड़बड़ी हो तो सिर धुनो, क्योंकि बैंक तो आप की सुनने वाला नहीं है. बैंक क्रैडिट कार्ड देते समय आप को लुभावने सपने दिखाएगा पर बाद में वह आप को दिन में तारे गिनवा देगा. कोई बैंक न अपने किसी अधिकारी का नाम बताने को तैयार होता है न नंबर.
कैश की कमी बताती है कि सरकार अब संभल ही नहीं रही है और देश धीरेधीरे अराजकता की ओर बढ़ रहा?है. यहां कैसे भी बलात्कार, मारपीट, जातीय झगड़ों का माहौल बन गया है. अच्छे दिन तो भूलिए, आम दिन भी दिख नहीं रहे.
आप का कैश आप का हक है. इसे किसी को जबरन रखने का हक नहीं है. सरकार हर बार आप को बैंकों के सामने कतार लगाने को मजबूर नहीं कर सकती. एक निकम्मी जनता ही इस तरह का अन्याय सह सकती है. जिस कौम को अपने ही लूट ले जाते हैं वह कभी भी देश को नहीं बना सकती, देश को नहीं बचा सकती. अगर जनता इस जबरन लूट पर चुप है तो इस का मतलब है कि वह बेजबान जानवरों की भीड़ ही है.
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आज के समय में सोशल मीडिया के जरिए लोग खुद को लाइमलाइट में रखते हैं. अक्सर ही बौलीवुड अभिनेत्रियां सोशल मीडिया पर खुद की हौट तस्वीरें और वीडियोज डालने से जरा भी नही कतराती. इसका एक कारण यह भी है कि इन अदाकाराओं को सुर्खियों में रहना पसंद है. आपने देखा होगा कि किस तरह से बौलीवुड अभिनेता संजय दत्त की बेटी त्रिशाला दत्त सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरों के माध्यम से अक्सर छाई रहती हैं. त्रिशाला आए दिन अपनी नई नई तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं.
त्रिशाला दत्त ने भले ही बौलीवुड में एंट्री नहीं की है. लेकिन उनकी पौपुलैरिटी सोशल मीडिया पर किसी स्टार से कम नहीं है. हाल ही में त्रिशाला दत्त ने समर लुक की एक तस्वीर इंस्टाग्राम पर शेयर की हैं. इस तस्वीर में वो व्हाइट टु पीस और नेट गाउन में नजर आ रही हैं. उनका ये तस्वीर काफी तेजी से वायरल हो रहा है. उन्होंने तस्वीर के साथ कैप्शन लिखा है, I can’t wait for summer.
फिट बौडी और बोल्ड अवतार के लिए जानी जाने वाली त्रिशाला को उनके ट्रान्सफौर्मेशन के बाद से काफी नोटिस की जाने लगा है. त्रिशाला दत्त को लेकर खबरें थीं कि जल्द संदय दत्त की बेटी बौलीवुड में डेब्यू कर सकती हैं. त्रिशाला को फैंस उनके बौलीवुड एंट्री का इंतजार कर रहे हैं. लेकिन इस एंट्री पर उनके पापा संजय दत्त ने रोक लगा रखी है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक संजय नहीं चाहते कि उनकी बेटी इस लाइन में आएं.
बता दें कि त्रिशाला संजय दत्त की पहली पत्नी रिचा शर्मा की बेटी हैं जो कि विदेश अपने नाना-नानी के साथ रहती हैं. त्रिशाला ने न्यूयौर्क के कौलेज औफ क्रिमिनल जस्टिस से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की है. वहीं संजय दत्त और ऋचा शर्मा की बेटी त्रिशाला इस वक्त फैशन डिजाइनिंग में अपना हाथ आजमा रही हैं.
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एक लड़की और एक लड़का साइबर कैफे के काउंटर पर पहुंचे. लड़के की उम्र 18 से 20 साल के बीच की थी. लड़की ने दुपट्टे से अपना चेहरा ढक रखा था. लड़का भी कैप और बड़ा सा काला चश्मा लगाए हुए था.
काउंटर पर बैठे शख्स ने उन्हें देखा और पूछा, ‘‘कितने घंटे?’’
लड़का बोला, ‘‘एक घंटा.’’
इस के बाद लड़के ने अपनी जेब से सौ रुपए का एक नोट उसे थमाया और वह जोड़ा एक छोटे से कमरे में दाखिल हो गया और अंदर से किवाड़ बंद कर लिया.
काउंटर पर बैठे आदमी ने उस जोड़े से न तो पहचानपत्र लिया और न ही रजिस्टर में उन का नामपता दर्ज किया, जबकि आईटी ऐक्ट के तहत यह जरूरी है.
हर साइबर कैफे के नोटिस बोर्ड पर पहचानपत्र की फोटोकौपी जमा करने, पोर्न साइट नहीं देखने और न डाउनलोड करने की हिदायत लिखी रहती है, लेकिन उस पर शायद ही अमल किया जाता हो.
बिहार की राजधानी पटना समेत हर शहर में ज्यादातर साइबर कैफे में सैक्स का खेल धड़ल्ले से चल रहा है. अगस्त महीने में एक लड़की के साथ हुए गैंग रैप के मामले में एक साइबर कैफे को चलाने वाले अनिल कुमार की गिरफ्तारी हो चुकी है.
पटना में कंकड़बाग, एक्जिबिशन रोड, अशोक राजपथ, राजेंद्र नगर, राजा बाजार के तकरीबन 15 साइबर कैफे का मुआयना करने के बाद यह साफ हो गया कि कैफे संचालक रुपयों के लालच में साइबर कैफे के बंद केबिनों में रंगरलियां मनाने की खुली छूट दे रहे हैं.
आमतौर पर साइबर कैफे में एक घंटे की फीस 20 रुपए होती है, लेकिन जोड़े एक घंटे के लिए केबिन में बंद होने के सौ रुपए तक दे देते हैं.
पटना में तो पुलिस की सख्ती की वजह से ज्यादातर कैफे वालों ने केबिनों से दरवाजे और परदे तो हटा दिए हैं, पर बाकी शहरों में ऐसा नहीं हो सका है.
पटना कालेज में पढ़ने वाले एक प्रेमी जोड़े का दर्द है कि बड़े शहरों में तो प्रेमी जोड़े पार्कों, मैट्रो, मल्टीप्लैक्सों, सुपर मार्केट वगैरह में 2-3 घंटे साथ गुजार लेते हैं. लेकिन पटना जैसे छोटे शहरों में इस तरह की सुविधा नहीं है.
छोटा शहर होने की वजह से किसी न किसी गली, सड़क, मार्केट में जोड़ों के पहचान वाले या रिश्तेदार घूमते मिल जाते हैं. इस डर से प्रेमी बेखौफ हो कर साथ समय नहीं गुजार पाते हैं.
कुछ जोड़ों से पूछा गया कि पुलिस की रोक के बाद भी वे क्यों साइबर कैफे के केबिनों में बैठते हैं और उस में क्या करते हैं?
इस सवाल पर एक छात्र तैश में आ कर बोला कि लड़का और लड़की साइबर कैफे में जाते हैं, तो पुलिस को इस से क्यों एतराज है? यह जरूरी नहीं है कि साइबर कैफे में जाने वाला हर नौजवान जोड़ा प्रेम करने के लिए ही वहां जाता है. कई जोड़ों के घरों पर कंप्यूटर और इंटरनैट की सुविधा नहीं है, तो वे किसी इम्तिहान का नतीजा देखने, नौकरियों के बारे में पता करने या पढ़ाई से जुड़ी किसी भी तरह की जानकारी हासिल करने के लिए साइबर कैफे जाते हैं, पर पुलिस छापामारी के दौरान कैफे में मौजूद हर जोड़े को एक ही डंडे से हांकने लगती है.
इस बारे में पटना के सिटी एसपी चंदन कुशवाहा कहते हैं कि आईटी ऐक्ट (सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000) के तहत साइबर कैफे में सैक्स करने, सैक्स वीडियो या आपत्तिजनक सामग्री डाउनलोड या अपलोड करने पर कानूनी कार्यवाही की जाती है. इस ऐक्ट की धारा 78 के तहत इंस्पैक्टर लैवल के अफसर को जांच का हक मिला हुआ है. धारा 80 के तहत आईटी ऐक्ट का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ पुलिस को बगैर वारंट के किसी को गिरफ्तार करने या छापा मारने का अधिकार मिला हुआ है.
आईटी मामलों के जानकार मयंक बताते हैं कि आईटी ऐक्ट की धाराएं इतनी लचीली और पेचीदा हैं कि पुलिस किसी भी साइबर मामले को अपराध बता कर उस के खिलाफ कार्यवाही कर सकती है.
मगध महिला कालेज की बीए सैकंड ईयर की एक छात्रा पुलिस के इस रवैए पर तैश में कहती है कि पुलिस बड़े और खतरनाक अपराधियों को तो पकड़ नहीं पाती है, जिस की भड़ास वह साइबर कैफे या पार्कों में बैठे जोड़ों पर निकालती है.
अपराधियों को पकड़ने में अकसर नाकाम रहने वाली पुलिस साथ घूम रहे या पार्कों या कैफे में बैठे जोड़ों के साथ अपराधियों से भी बदतर सुलूक करती है. यह क्या गैरकानूनी नहीं है?
बालिग लड़का और लड़की अगर एकसाथ घूम रहे हैं, तो पुलिस को क्या परेशानी है? किसी पब्लिक प्लेस पर बैठ कर किसी तरह का भोंड़ा या भड़काऊ प्रदर्शन गैरकानूनी है. साइबर कैफे के केबिन में अगर कोई जोड़ा प्यार के गीत गा रहा हो, तो पता नहीं पुलिस को क्या परेशानी होने लगती है?
साइबर कैफे के केबिन में बैठना किसी भी नजर से गैरकानूनी नहीं है. आईटी ऐक्ट के तहत कैफे में बैठने वाले हर किसी से उस के पहचानपत्र की फोटोकौपी रिकौर्ड में रखना जरूरी है. अमूमन कैफे चलाने वाले लोगों से न तो उन के पहचानपत्र की फोटोकौपी लेते हैं और न ही उन का नामपता रजिस्टर में लिखते हैं.
रिटायर्ड पुलिस अफसर एके सिंह कहते हैं कि साइबर कैफे में आए हर आदमी से उस का पहचानपत्र लेना संचालक का काम है. अगर किसी का पहचानपत्र नहीं लिया गया है, तो इस के लिए संचालक खुद ही जिम्मेदार है, न कि ग्राहक. पैसों के लालच में संचालक पहचानपत्र नहीं लेते हैं.
पुलिस अफसरों का कहना है कि अपराधी किसी भी साइबर कैफे से किसी शख्स को जान से मारने की धमकी देने, रंगदारी वसूलने और किसी भी तरह के अपराध से जुड़ा ईमेल कर सकते हैं.
पहचानपत्र की फोटोकौपी और उन के आनेजाने का समय रिकौर्ड में नहीं रखने पर कैफे संचालक भी फंस सकते हैं. सभी तरह का रिकौर्ड रखने पर कैफे संचालक तो कानून के फंदे में फंसेंगे ही, साथ ही पुलिस को भी मुजरिम तक पहुंचने में आसानी होती है.
पुलिस ने सभी साइबर कैफे संचालकों को केबिन और परदे हटाने का आदेश दिया है, इस के बाद भी केबिन के अंदर और परदों के पीछे इश्कबाजी का खेल बेधड़क चल रहा है.
एक साइबर कैफे के स्टाफ ने बताया कि पुलिस साइबर कैफे के संचालकों को नियमकायदों पर अमल करने की घुट्टी तो पिलाती है, लेकिन करारे नोट की चमक के आगे खुद ही कानून को भूल जाती है. हर कैफे वाले को हर महीने ‘चढ़ावा’ चढ़ाने के लिए मजबूर किया जाता है और इस के लिए इलाके के हिसाब से ‘चढ़ावा’ भी फिक्स कर रखा है.
पहले मैं इस भरम में जीता था कि हर इनसान इज्जत के साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहता है लेकिन बाद में मेरी इस सोच में बदलाव तब आया जब मुझे अपनी खुद की आंखों से बेइज्जती के साथ जीनेमरने की कसमें खाने वाले धुरंधरों के दर्शन करने का मौका मिला.
भारत की खोज बड़े ही मौज के साथ वास्को डी गामा ने की थी, लेकिन बेइज्जती के बोझ की खोज किस रोज और किस ने की थी, यह बता पाना उतना ही मुश्किल है जितना मुश्किल आम आदमी के लिए बिना रीचार्ज किए स्मार्ट फोन की बैटरी को पूरा दिन चलाना है.
कुछ लोग बेइज्जत होने को अपना बुनियादी हक मानते हैं और इसे पाने के लिए वे लगातार अपनी इज्जत को तारतार करते हुए इसी जद्दोजेहद में लगे रहते हैं. ‘बेइज्जती पिपासु’ लोगों को अपनी पूरी उम्र इज्जत की प्राणवायु हजम नहीं होती है. इज्जत भरी जिंदगी की इच्छा से ही ‘बेइज्जती प्रिय’ लोग सहम जाते हैं और इज्जत जैसी नुकसान पहुंचाने वाली और मारक चीज से उचित दूरी बना कर चलते हैं. बेइज्जत होना इन के लिए रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों में शुमार होता है.
बेइज्जती के नशेड़ी उलट हालात में भी बेइज्जती का हरण कर उस का वरण करने में कामयाब हो जाते हैं. आम का सीजन हो या केले का, ये लोग हमेशा से ही सरेआम बेइज्जती से गले मिलना पसंद करते हैं ताकि सार्वजनिक जिंदगी में ट्रांसपेरैंसी बनी रहे.
इसी ट्रांसपेरैंसी और ईमानदारी के चलते ये जल्द ही बेइज्जती के वामन रूप से विराट रूप धर लेते हैं. हर देश, काल और हालात में ‘बेइज्जती उपासक’ अपनी निष्ठा और निष्ठुरता से बेइज्जती हासिल कर ही लेते हैं.
बेइज्जती के इस धंधे में कभी मंदी नहीं आती है क्योंकि बेइज्जती में हमेशा नकद से ही आप का कद बढ़ता रहता है और उधार से बेइज्जती की धार कुंद होती चली जाती है.
विजय माल्या और नीरव मोदी ने भले ही बैंक से कर्ज ले कर बैंक को चूना लगा दिया हो, लेकिन देश से भाग कर, बेइज्जत होने की दौड़ में सब को पछाड़ कर ‘बेइज्जती उद्योग’ को चार चांद लगा दिए हैं.
कुछ लोगों में बेइज्जत होने का जुनून ही उन के सुकून की वजह होता है. बेइज्जती का घूंट वे कहीं से भी लूट लेते हैं. गलती से मिली इज्जत की वाह, इन की धमनियों में होने वाली बेइज्जती के नियमित बहाव को नहीं रोक पाती है.
बेइज्जती प्रदेश के मूल निवासी, चाहे अपने निवास पर हों या दूसरी किसी जगह के प्रवास पर, वे बेइज्जती की लौजिंग बोर्डिंग हमेशा अपने शरीर पर धारण किए रहते हैं.
इस प्रदेश के मूल निवासी हमेशा बेइज्जत होने के नएनए मौके और तरीके खोजने की कोशिश करते रहते हैं ताकि बेइज्जती की बोरियत से बचा कर इसे समाज की मुख्यधारा में लाया जा सके.
लगातार बेइज्जत होना भी एक ऐसी कला है जिसे आम आदमी के लिए अंजाम देना मुश्किल होता है. बेइज्जती के फील्ड में पेशेवर फील्डिंग करने वालों की कमी महसूस की जाती रही है.
डिमांड के मुकाबले सप्लाई न होने से बैलैंस गड़बड़ा रहा?है. लेकिन फिर भी देख कर संतोष और कुछकुछ होता है कि कुछ लोगों ने बेइज्जत होने को अपनी जिंदगी का मिशन और सहारा बना लिया है और वे बेइज्जती के सामने मुसाफिर की तरह ट्रैफिक के नियमों का पालनपोषण कर, इस रास्ते पर दांडी मार्च रहे हैं.
इन्हीं लोगों द्वारा उपजी क्वालिटी के चलते क्वांटिटी की कमी महसूस नहीं हो पाती है और क्वांटिटी की कमी के खिलाफ उठने वाली संगठित आवाज बेइज्जती के बोझ के नीचे दब जाती है.
बेइज्जती उद्योग में अभी भी बहुत उम्मीदें हैं जिन पर बेइज्जत हो कर गंभीरता से विचार करना जरूरी है. समाज के फायदे के लिए इस क्षेत्र में लोगों को बढ़ावा देने की जरूरत है क्योंकि आज की गलाकाट होड़ में जहां लोगों को इज्जत और नाम के लिए दरदर भटकने के बाद भी बेइज्जती ही हाथ लगती है, वहीं अगर उन्हें सीधे ही बेइज्जत होने के लिए बढ़ावा दिया जाए तो उन का यह भटकाव काफी हद तक कम होगा और नतीजतन समाज में इज्जत पाने की अंधी दौड़ में भागने वाले, उसेन बोल्ट जैसे धावक की आवक भी कम हो जाएगी.
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अदाकारा शिल्पा शिंदे और कौमेडियन सुनील ग्रोवर इन दिनों कौमेडी शो ‘धन धना धन’ से दर्शकों को गुदगुदा रहे हैं. इसी बीच शिल्पा और सुनील के बीच फिल्माया गया रोमांटिक डांस वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. बता दें कि सैफ अली खान-रानी मुखर्जी की फिल्म ‘हम-तुम’ के टाइटल ट्रैक ‘सांसों को सांसों में’ पर ये दोनों रेन डांस करते हुए नजर आ रहे हैं.
वीडियों में लाल रंग की शिफौन साड़ी और हल्टर नेक ब्लाउज में शिल्पा काफी ग्लैमरस नजर आरही हैं. तो वहीं काले रंग के कपड़ो में सुनील ग्रोवर काफी स्मार्ट और रोमांटिक अंदाज में दिख रहे हैं.
आपको याद होगा कि रानी और सैफ ने किस तरह से ‘सांसों को सांसों में’ गाने पर रोमांटिक डांस किया था. उनके बीच की केमेस्ट्री आज भी हमारे दिमाग में है. ठीक इसीतरह सुनील और शिल्पा के बीच की केमेस्ट्री भी जबरदस्त है. शिल्पा के एक्सप्रेशन कमाल के हैं.
गौरतलब है कि शिल्पा और सुनील का नया कौमेडी शो ‘धन धना धन’ क्रिकेट पर आधारित शो है. शो में सुनील ग्रोवर प्रोफेसर एलबीडब्ल्यू तो वहीं शिल्पा गुगली भाभी के रोल में न
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बचपन से ही सुनते आ रहे हैं कि पुलिस की न तो दोस्ती अच्छी, न दुश्मनी. ज्यादातर लोग मानते हैं कि पुलिस भरोसे लायक नहीं है, फिर भी उस पर भरोसा किया, पर उस का नतीजा मनमाफिक नहीं रहा.
दरअसल, कुछ दिन पहले ही दिल्ली रोड पर बने हमारे फार्महाउस पर हम ने आम का बाग लगाने के मकसद से गजरौला की एक नर्सरी से आम के 50 पौधे खरीदे थे. 5000 रुपए में सौदा तय हुआ. नर्सरी वाला 3000 हजार रुपए एडवांस लेगा और 2000 हजार रुपए पौधे लगाने के बाद उसे दिए जाएंगे.
अभी उस नर्सरी वाले ने 30 ही पौधे लगाए थे कि वह हंगामा करने लगा कि उसे पूरे 5000 रुपए चाहिए, जबकि वह पहले ही 3000 रुपए ले चुका था.
आपस में बहस होने लगी, जिस पर उस ने पुलिस को बुला लिया.
हम ने पुलिस वालों को पूरी बात समझाई. लेकिन पुलिस वाले उलटा हमें ही समझाने लगे, ‘इतने बड़े आदमी हो… इतने पैसे वाले हो कर आप जरा से रुपयों के लिए लड़ रहे हो. आप इसे पूरे पैसे दे दो न.’
आनाकानी करने पर हमारे खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई. हमें नर्सरी वाले और पुलिस की मिलीभगत समझ आ रही थी. कोई दूसरा भी हमारा साथ देने को तैयार नहीं था. वजह थी, एक तरफ पुलिस वाले और निम्न वर्ग (नर्सरी वाला), दूसरी तरफ हम बेकुसूर.
नर्सरी वाले ने तो रुपए झटके ही, पुलिस वालों ने भी हम से रुपए झटक लिए. हमें मन मार कर रुपए देने पड़े. लेकिन हैरानी की बात यह थी कि 2 दिन बाद जब हम फार्महाउस पर गए तो वहां आम का एक भी पौधा नहीं था. उस आदमी ने रात को सारे पौधे चुरा लिए थे.
साफ दिख रहा था कि पुलिस वाले उस नर्सरी वाले से मिल गए थे. बिना पुलिस वालों की सरपरस्ती के ऐसा करना मुमकिन नहीं था.
अब हमारी बारी थी एफआईआर दर्ज कराने की, पर पुलिस वालों ने केस पर हाथ ही नहीं रखा. कोई सुबूत न होने की वजह से हम किसी भी तरह की कार्यवाही नहीं कर पाए.
जब हम ने अपने कुछ परिचितों को बुलाया तो उन लोगों ने कहा कि मामला लेदे कर निबटा लो. पुलिस वालों और इन लोगों से पंगा लेना सही नहीं है.
इस तरह की धोखाधड़ी और सीनाजोरी से हम जैसे सामान्य वर्ग के लोगों में हर समय अनजान डर का साया और सवालों का घेरा जीने के अहसास को और भी मुश्किल कर देता है. ऐसा लगता है जैसे मिडिल क्लास या सामान्य वर्ग होने का मतलब नए दौर के भारत में डर और खौफ के साए में जीना ही हो गया है.
हमारे देश के संविधान ने सभी वर्गों के लोगों को समान अधिकार दिए गए हैं. लेकिन सामान्य वर्ग के लिए इन अधिकारों का अहसास भी अलग है. मध्यमवर्गीय लोग सरकार से ले कर समाज और व्यवस्था तक कहीं भी और किसी भी वक्त अपना अधिकार खो सकते हैं.
आज हालात बद से बदतर हो गए हैं. लेकिन फिर भी देश में रह रहे एक बड़े वर्ग को हमारी कानून व्यवस्था में पक्का भरोसा है. लेकिन सब से बड़ी परेशानी यह है कि वे अपने अधिकारों के बारे में जागरूक नहीं हैं.
जागरूकता का सब से पहला सबक यह है कि पुलिस जोरजुल्म करती है, जबकि वह तानाशाह नहीं है, बल्कि सेवक है और लोगों की हिफाजत के लिए उसे बहाल किया गया है.
जनता की हिफाजत करना और दूसरे अपराधों के बारे में समझ पैदा करना और उन की रोकथाम के लिए असरदार उपाय करना पुलिस की कानूनन जिम्मेदारी है. इस से अलग अगर पुलिस कुछ भी करती है तो उस पर सवाल उठाने चाहिए.
अकसर कहा जाता है कि पुलिस की पकड़ में आने पर गूंगे के मुंह में भी जबान आ जाती है, अच्छेअच्छे बोलने लगते हैं, बेकुसूर गुनाहगार हो जाते हैं.
इस बात को इतनी बार कहा गया है कि अब यही अंतिम सत्य लगता है, जबकि सचाई कुछ और है. पुलिस बेगुनाहों को गुनाहगार बनाने के लिए नहीं बल्कि बेगुनाहों को बचाने के लिए बनाई गई है.
इसी तरह उत्तर प्रदेश में रामपुर जिले में कुछ लोगों द्वारा पीडि़त की जमीन पर गैरकानूनी निर्माण कराने की शिकायत करना पीडि़त को ही महंगा पड़ गया. पुलिस में शिकायत करने पर उसे ही हवालात में डाल दिया गया. इस पुलिसिया जोरजुल्म से तंग आ कर फरियादी ने मुख्यमंत्री से इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई.
वैसे, पुलिस की काली करतूतों की घटनाओं से न जाने कितने ही पन्ने काले किए जा सकते हैं लेकिन इन घटनाओं से सबक लेते हुए अब कोशिश यह है कि अगर गलती से भी पुलिस ऐसे मामलों में किसी बेकुसूर को धकेलती है तो सावधान बरती जाए. अब हमें अपने अधिकारों को समझना होगा, उन्हें याद रखना होगा.
इस बात में कोई शक नहीं कि हमारे देश में बहुत से बेकुसूर पुलिस की पकड़ में आ कर गुनाहगार हो गए हैं. न उन्हें पुलिस ने माफ किया, न समाज ने. इस में पुलिस की गलती है लेकिन इस से बड़ी गलती हम सब की है क्योंकि हम चुप बैठ जाते हैं. हमारी चुप्पी हम से बहुतकुछ छीन लेती है. अब हमें अपनी आवाज बुलंद करनी ही होगी.
अगर कोई बेकुसूर पुलिस की पकड़ में आता है तो वह चुप नहीं बैठे, हर मुमकिन तरीके से अपनी आवाज उठाए क्योंकि कानून सो सकता है, लेकिन बहरा नहीं हो सकता. हमारी बुलंद आवाज को उसे सुनना ही पड़ेगा.
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अपनी लच्छेदार बातों और जुमलेबाजी से लोगों को सब्जबाग दिखाते रहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रोजगार के मोरचे पर कितने नाकाम साबित हुए हैं, यह बात अब किसी सुबूत की मुहताज नहीं रह गई है. उन के 4 साल के राज में बेरोजगारों की फौज में नौजवानों की तादाद 15 करोड़ का आंकड़ा छू रही है.
बढ़ती बेरोजगारी और बेकारी के इस दौर ने एक और नई बीमारी को जन्म दिया है कि जिस दाम पर भी मिले नौकरी खरीद लो. इस की एक मिसाल 31 मार्च, 2018 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में दिखी थी. इस दिन मुखबिरी की बिना पर ग्वालियर पुलिस ने शहर के पड़ाव इलाके के एक नामी होटल सिद्धार्थ पैलेस पर छापा मारते हुए तकरीबन 50 लड़कों को गिरफ्तार किया था. इन सभी की उम्र 25 साल से कम थी.
1 अप्रैल, 2018 को एफसीआई यानी फूड कारपोरेशन औफ इंडिया के वाचमैन पदों के लिए लिखित परीक्षा होनी थी. 271 पदों के लिए एक लाख से भी ज्यादा बेरोजगार नौजवानों ने इस पद के लिए फार्म भरे थे. यह परीक्षा अलगअलग राज्यों में अलगअलग तारीखों पर हो रही थी.
इतनी ज्यादा तादाद में अगर नौजवान वाचमैन जैसी छोटी नौकरी के लिए लाइन में लगे थे तो साफ दिख रहा है कि बेरोजगारी की जमीनी हकीकत क्या है. एक वक्त में वाचमैन के इसी पद के लिए न केवल एफसीआई बल्कि केंद्र सरकार की दूसरी एजेंसियां भी उम्मीदवारों के लिए तरस जाती थीं.
एक पद के मुकाबले 3 उम्मीदवारों का आना भी बड़ी बात समझी जाती थी. लिहाजा, मुंहजबानी इंटरव्यू, तालीम और कदकाठी देख कर ही उम्मीदवारों को नौकरी पर रख लिया जाता था.
पर अब हालात उलट हैं. उम्मीदवारों के हुजूम में से काबिल उम्मीदवारों को छांटने के लिए लिखित परीक्षा ली जाने लगी है जो कतई हर्ज की बात नहीं है. हर्ज की बात है इस परीक्षा के पेपरों की बिक्री और सौदेबाजी होना जिस से वे लोग नौकरी झटक ले जाते हैं जिन की जेब में पैसा होता है.
ग्वालियर शहर में पुलिस ने 48 उम्मीदवारों और 2 दलालों को दबोचा था जो दूसरे दिन होने वाली परीक्षा के प्रश्नपत्र हल करवा रहे थे. पकड़े गए उम्मीदवारों ने यह खुलासा किया था कि उन्होंने पेपर के लिए 5-5 लाख रुपए में सौदा किया था और बेचने वालों को 50-50 हजार रुपए एडवांस में भी दे दिए थे. बाकी बची रकम नौकरी मिलने के बाद देना तय हुई थी.
उम्मीदवार इस से मुकर न जाएं इसलिए दलालों ने उन के आधारकार्ड और मार्कशीटों की मूल प्रतियां अपने पास रख ली थीं.
हरीश और अभिषेक कुमार नामक जो दलाल पकड़े गए उन्हें प्रश्नपत्र मुहैया कराने वाले दिल्ली के मास्टरमाइंड किशोर कुमार ने 30-30 हजार रुपए दिए थे. धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के इस एक और उजागर मामले में गिरोह ने सौदा तो 135 लोगों से किया था.
पकड़े गए महज 48 लोग तो सहज समझा जा सकता है कि दूसरे शहरों में कइयों ने यह पेपर खरीदा था पर कानून के बहुत लंबे हाथों की पकड़ से वे बाहर हैं. एफसीआई भी इस घोटाले पर लीपापोती करने में जुटी हुई है.
बदला कुछ खास नहीं
48 उम्मीदवारों में से 35 अकेले बिहार के और 13 दूसरे राज्यों के थे. जब उन्हें होटल से पकड़ा गया तो उन के पास कुछ खास सामान नहीं था. मसलन, न सूटकेस, न ब्रांडेड कपड़े और न ही वे नाइट डै्रस पहने हुए थे. नकल की सहूलियत के लिए गिरोह ने पूरा होटल ही बुक करा रखा था.
दरअसल, उन में से ज्यादातर उम्मीदवार छोटी जाति के और मामूली खातेपीते घरों के थे जिन्होंने पक्की सरकारी नौकरी के लालच में 5 लाख रुपए का दांव खेलना घाटे का सौदा नहीं समझा था. पहले भी छोटी जाति और गरीब तबके के ही लोग वाचमैन यानी चौकीदार की नौकरी करते थे और आज भी करते हैं. फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब उन्हें भी लाखों रुपए की घूस देनी पड़ रही है.
जिंदगी का गुणाभाग
ऐसा भी नहीं है कि इन 48 या इन जैसे लाखों उम्मीदवारों के पास 5 लाख रुपए जैसी गैरमामूली रकम जमा होती है, बल्कि नौकरी के लालच में इस पैसे का जुगाड़ इन्हें तरहतरह से करना पड़ता है. कोई घर की औरतों के गहने बेचता है तो कई जमीन तक बेच देते हैं.
वाचमैन पद का पे स्केल 8100 रुपए है यानी शुरुआत में ही उसे महंगाई और दूसरे भत्तों समेत तकरीबन 20 हजार रुपए महीने मिलते हैं.
लालच या सुकून देने वाली बात यह भी रहती है कि हर 6 महीने में महंगाई भत्ता बढ़ता है यानी एक साल में पगार में तकरीबन 900 रुपए का इजाफा होता है.
वक्त गुजरते 5-6 साल में 30 हजार रुपए महीना तक हो जाती है. इतमीनान की एक और बात सरकारी नौकरियों में दूसरी सहूलियतों का मिलना भी रहती है.
मिसाल एफसीआई की ही लें तो वाचमैन को भी रहने के लिए घर या इस का भत्ता मिलता है और इलाज के लिए भी पैसा मिलता है.
एफसीआई भोपाल के एमपी नगर जोन 2 के दफ्तर में काम कर रही 56 साला एक वाचमैन का कहना है कि उसे 28 साल पहले महज 4 हजार रुपए पगार मिलती थी जो अब बढ़तेबढ़ते 56 हजार रुपए हो गई है. इतनी तगड़ी पगार नए क्लर्कों और अफसरों को भी शुरू में नहीं मिलती.
इस वाचमैन के मुताबिक, हर साल पगार इन्क्रीमैंट के जरीए भी बढ़ती है और बोनस भी मिलता है. तकरीबन 30 छुट्टियां सीएल और ईएल की शक्ल में भी मिलती हैं.
इस वाचमैन के भविष्य निधि खाते में 18 लाख रुपए जमा हो चुके हैं जो रिटायरमैंट होतेहोते 20 लाख रुपए से भी ज्यादा हो जाएंगे. इस के बाद पैंशन मिलेगी सो अलग.
सरकारी नौकरी के फायदे गिनाते हुए इस वाचमैन ने एक दिलचस्प दलील यह भी दी कि अगर वह प्राइवेट नौकरी में होता तो पगार किसी भी सूरत में 15 हजार रुपए से ज्यादा नहीं होती. उस पर भी कभी भी नौकरी से हटाए जाने का डर बना रहता और बुढ़ापा फाका करते काटना पड़ता.
इस लिहाज से 48 उम्मीदवारों ने गलत हिसाबकिताब नहीं लगाया था कि नौकरी खरीदने के लिए दिया गया पैसा 2 साल में ही वसूल हो जाएगा इसलिए सरकारी नौकरी जो एक बेफिक्र व महफूज जिंदगी की गारंटी होती है जिस को हासिल करने के लिए अगर खुद को भी बेचना पड़े तो भी सौदा घाटे का नहीं.
इन्हीं वजहों के चलते अब सरकारी नौकरियों के लिए मारामारी बढ़ रही है तो बात महज इस लिहाज से चिंता की है कि ये बिकने लगी हैं यानी बेरोजगारी के साथसाथ भ्रष्टाचार भी बढ़ रहा है.
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भारत की एक मात्र प्लेब्वौय मौडल और बौलीवुड एक्ट्रेस शर्लिन चोपड़ा कई बार कौन्ट्रोवर्सी के चलते सुर्खियों में रह चुकी हैं लेकिन इस बार वह काफी अलग कारण से चर्चाओं में हैं. दरअसल, शर्लिन ने हाल ही में खुद को एक कार गिफ्ट की है. उनके द्वारा किया गया यह काम वाकई में सराहनीय है.
शर्लिन ने अपने लिए जो कार खरीदी है उसकी कीमत 87 लाख रुपए है. शर्लिन ने अपनी नई कार के साथ कई सारी फोटो और वीडियो शेयर की हैं.
शर्लिन द्वारा शेयर की गई एक वीडियो में इस कार को खरीदने के बाद उनकी खुशी का साफ पता चल रहा है. इस वीडियो में जब एक रिपोर्टर उनसे कार को लेकर सवाल करती हैं तो वह जवाब देने से पहले ही नाचने लगती हैं और कहती हैं कि मैं ऐसा पूरा दिन कर सकती हूं.
बता दें, शर्लिन चोपड़ा का जन्म 11 फरवरी 1984 को हैदराबाद में हुआ था. वह भारत की पहली ऐसी मौडल है जिन्होंने प्लेब्वौय मेगजीन के लिए न्यूड फोटोशूट करवाया था. उन्होंने अपने बौलीवुड करियर की शुरुआत फिल्म टाइमपास से की थी. जिसके बाद उन्होंने कई क्षेत्रिय फिल्मों में भी काम किया. हालांकि, उन्हें बौलीवुड में सफलता नहीं मिली.
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कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी का असर अब देशभर में खत्म सा हो गया है. केरल में इस की सरकार है पर त्रिपुरा में हार के बाद लगता नहीं कि 20 साल पहले के दिन लौटेंगे. फिर भी कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी काफी समय तक गरीबों, मजदूरों, दलितों, पिछड़ों की मसीहा होने का दावा करती रही है. अब सीताराम येचुरी ने बड़ी मुश्किल से पार्टी को मनाया है कि उस कांग्रेस के साथ हाथ जोड़ा जाए जिस की वह बरसों खिलाफत करती रही है क्योंकि उस के बिना धर्म की बातें करने वाली भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला नहीं करा जा सकता.
कम्यूनिस्ट आंदोलन दुनियाभर में अब इतिहास की बात रह गया है. चीन में कम्यूनिस्ट पार्टी का राज है पर उस पार्टी में कम्यूनिज्म नाम का सा है. चीन दुनिया का बड़ा कैपिटलिस्ट देश बनता जा रहा है और जिस तेजी से उस का विकास हो रहा है वह कल सेठ देशों को पीछे छोड़ देगा. चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी बहुत ही जमीनी है और उसे उत्पादन से मतलब है, कौनकैसे कर रहा है, से कम.
भारतीय कम्यूनिस्टों को भी यही सोचना होगा. देश के गरीबों, जिन में मजदूर, पिछड़े और दलित ही नहीं अच्छेखासे सवर्ण भी शामिल हैं, को असल में उत्पादन कर के ही गरीबी से निकाला जा सकता है. यह सोचना कि पैसे का बंटवारा सही है, सपनों की बात?है. बांटोगे तो तब जब होगा. कम्यूनिस्ट पार्टी ही इस में कुछ कर सकती है क्योंकि कांग्रेस पर तो अभी भी राज करने के पुश्तैनी हक का सुरूर छाया हुआ है और भारतीय जनता पार्टी सोचती है कि जब तक यज्ञ, हवन, पूजापाठ, मंदिर, आश्रम चल रहे हैं, सब ठीक है. आम गरीब की कहीं कोई सोच ही नहीं रहा.
कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी को चीनी रास्ते से सबक लेना चाहिए और गरीबों को मेहनत करना और अपनी मेहनत के पैसे का सही इस्तेमाल सीखना चाहिए. गरीबी तब दूर होगी जब लोग ज्यादा काम करेंगे, ज्यादा उगाएंगे, ज्यादा बनाएंगे.
भारत के गरीब नारों से नहीं कारखानों से खुशहाल होंगे. उन्हें पूजापाठ नहीं, नई तकनीक चाहिए. उन्हें सड़कों पर जुलूस नहीं, नए कारखाने चाहिए, नई खेती की मशीनें चाहिए. उन्हें कर्ज नहीं सही बाजार चाहिए.
कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी ही अकेली पार्टी है जो कहने के लिए ही सही, है तो गरीब कामगारों की पार्टी जिस में धर्म, जाति, भाषा, मूल क्षेत्र का कोई मतलब नहीं, वही कर्मठता का पाठ पढ़ा सकती है.
यह बात दूसरी है कि पूरी कम्यूनिस्ट पार्टी ऊंची जातियों के लोगों के हाथों में है जो गरीबों की बात तो करते हैं पर उत्पादन बढ़ाने में अड़चनें लगाते हैं. वे हड़तालों पर भरोसा करते हैं, नई तकनीक पर नहीं. वे गरीबों को गरीब बने रहने देते हैं ताकि उन को लाल झंडे उठाने वाले मिलते रहें. आज बदलाव की जरूरत है.
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सुरभि अग्रवाल (बदला नाम) को साल 1990 में एक दलित नौजवान केदार (बदला नाम) से प्यार हो गया तो उस ने जातपांत, नातेरिश्तेदारी, घरपरिवार और समाज की परवाह न करते हुए केदार से शादी कर साबित कर दिया कि सच्चा प्यार वाकई ऊंचनीच नहीं देखता है.
लेकिन सुरभि यह भूल गई कि महज उस के देखने न देखने से कुछ नहीं होता, धर्मकानून और समाज कभी यह गवारा नहीं करता कि ऊंची जाति का कोई लड़का या लड़की छोटी जाति के लड़के या लड़की से शादी कर धर्म के बनाए नियमों को तोड़े. लिहाजा, ऐसे लोगों का पीछा शादी के बाद भी नहीं छोड़ा जाता.
शादी के बाद पति की जाति ही पत्नी की जाति हो जाती है इसलिए अकसर लड़कियां अपना सरनेम बदल कर पति का सरनेम अपना लेती हैं जो उन की नई पहचान बन चुका होता है.
केदार से शादी करने के बाद सुरभि ने बुलंदशहर के कलक्टर दफ्तर में पति की तरह अपने दलित होने का सर्टिफिकेट मांगा जो उन्हें दे भी दिया गया. इस सर्र्टिफिकेट की बदौलत सुरभि को सैंट्रल स्कूल में टीचर की नौकरी मिल गई.
अब चूंकि वे अनुसूचित जाति की हो चुकी थीं इसलिए उन्हें कोेटे के तहत प्रमोशन भी मिले और वे सैंट्रल स्कूल की वाइस प्रिंसिपल तक बन गईं.
सुरभि तो दुनिया की चालबाजियों से अनजान घरगृहस्थी में रम गई थीं लेकिन जलने वालों के कलेजे में ठंडक नहीं पड़ रही थी कि एक ऊंची जाति की लड़की दलित लड़के के साथ शादी कर धर्म और समाज के उसूल तोड़े.
उन्होंने स्कूल मैनेजमैंट से शिकायत कर दी कि सुरभि ने नाजायज तरीके से शैड्यूल कास्ट का सर्टिफिकेट हासिल किया है इसलिए वे नौकरी और प्रमोशन की हकदार नहीं हैं.
स्कूल वालों ने इस शिकायत पर कार्यवाही करते हुए सुरभि का जाति प्रमाणपत्र रद्द कर दिया तो वे इस के खिलाफ अदालत चली गईं. इलाहाबाद हाईकोर्ट में उन्हें अधूरा इंसाफ यह मिला कि उन की नौकरी तो कायम रहेगी लेकिन जाति प्रमाणपत्र फर्जी है.
सुरभि ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की. 20 जनवरी, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए यह कहा कि किसी भी औरत की जाति उस के जन्म से तय होती है न कि इस बात से कि उस ने दूसरी जाति के मर्द से शादी की है यानी एक अग्रवाल लड़की ने अनुसूचित जाति के लड़के से शादी की है इसलिए उसे अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट नहीं दिया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि सुरभि का नौकरी का रिकौर्ड बेहतर है इसलिए उन्हें नौकरी से बरखास्त न किया जाए. रिटायरमैंट दे दी जाए.
यह है गड़बड़झाला
दूसरी जाति में शादी करना अब बेहद आम बात है लेकिन ऐसा बराबरी की जाति वालों में ही हो रहा है. हजारों नहीं बल्कि करोड़ों में से एकाध मामला ऐसा सामने आता है जिस में किसी ऊंची जाति वाले ने दलित से शादी की हो.
हालात वही हैं जो आजादी और उस के पहले थे इसलिए संविधान बनाने वालों का ध्यान इस तरफ नहीं गया था कि अगर कभी किसी ऊंची जाति वाले लड़के या लड़की ने दलित से शादी की तो उस की जाति बदलेगी या नहीं और बच्चों की जाति क्या होगी और क्या उन्हें भी रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा.
सुरभि के मामले में आए फैसले से एक बात तो साफ हो गई कि कोई ऊंची जाति की लड़की किसी दलित लड़के से शादी करती है तो वह रिजर्वेशन की हकदार नहीं होगी लेकिन चूंकि पिता दलित है इसलिए उन से पैदा हुए बच्चे को रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा.
इस के उलट अगर ऊंची जाति का लड़का किसी दलित लड़की से शादी करता है तो उन के बच्चे को रिजर्वेशन का फायदा नहीं मिलेगा, फिर भले ही बच्चे की मां दलित तबके की क्यों न हो.
मतलब औरत या मां होने के कोई माने नहीं हैं. सरकार औरतों के लिए तरहतरह की योजनाएं ला रही है. बच्चे की मार्कशीट और तमाम सरकारी दस्तावेजों में मां का नाम लिखा जाना भी जरूरी कर दिया गया है पर साफ दिख रहा है कि यह एक बेतुकी और बेवजह ही पीठ थपथपाने वाली बात है. समाज पर मर्दों का दबदबा है इसलिए बच्चा भी उन्हीं की जाति का माना जाता है.
औंधे मुंह गिरी योजना
दलित व ऊंचे तबके की खाई पाटने के मकसद से सरकार ने साल 2013 में एक योजना शुरू की थी. इस योजना का नाम था ‘डाक्टर अंबेडकर स्कीम फौर सोशल इंटीगे्रशन टू इंटरकास्ट मैरिज स्कीम 2013’.
इस योजना के तहत अगर कोई गैरदलित किसी दलित से शादी करता है तो उसे सरकार की तरफ से ढाई लाख रुपए दिए जाएंगे. सालाना 500 जोड़ों को यह रकम देने का टारगेट रखा गया था.
इस योजना में एक बंदिश यह थी कि शादी करने वाले जोड़े की सालाना आमदनी 5 लाख रुपए से ज्यादा नहीं होनी चाहिए जिसे नरेंद्र मोदी की सरकार ने खत्म कर दिया है. पर जातपांत कितने गहरे तक जड़ें जमाए बैठी है, यह बात पहले ही साल में उजागर हो गई थी जब सवा सौ करोड़ की आबादी वाले हमारे देश मेें महज 5 जोड़ों को ही यह रकम मिली. साल 2015-16 में 72 और फिर साल 2016-17 में भी 72 जोड़ों को ही यह रकम मिली. साल 2017 में 74 जोड़ों को यह रकम मिली.
हमारे देश में किसी सरकारी योजना में अगर एक हजार रुपए भी मिल रहे हों तो लोग उस के लिए मधुमक्खी की तरह टूट पड़ते हैं. लेकिन दलितों से शादी करने की योजना में अगर सौ लोग भी ढाई लाख रुपए की तगड़ी रकम लेने को तैयार नहीं हैं तो आसानी से समझा जा सकता है कि कोई भी ऊंची जाति वाला छोटी जाति वालों से शादी नहीं करना चाहता.
ऐसा हो तो बात बने
केंद्र में सत्तारूढ़ होने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी और उसे हांकने वाले हिंदूवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक बराबरी का राग अलापा था जिस का मकसद जैसे भी हो दलितों को अपने पाले में करना था क्योंकि उस पर ऊंची जाति की पार्टी होने का ठप्पा लगा हुआ था.
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में दलित समुदाय ने भाजपा के विकास के नारे पर भरोसा जताते हुए उसे वोट दिया जिस की दूसरी अहम वजह उस के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का छोटी जाति का होना था. नरेंद्र मोदी साहू तेली समुदाय से हैं जिस की हैसियत दलितों से थोड़ी ही ऊपर है.
दलितों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी दलित तबके पर ध्यान देंगे, पर हुआ उलटा. नोटबंदी पर उन के फैसले से सब से ज्यादा परेशानियां इसी तबके के लोगों को झेलनी पड़ीं. सामाजिक बराबरी का टोटका दिल्ली और बिहार में नहीं चला लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में चला तो इस राग की ढपली गुजरात में भी जोरशोर से बजाई गई लेकिन वहां भाजपा को कोई खास फायदा नहीं हुआ. वह सत्ता मेें तो आ गई लेकिन सियासत के जानकारों को समझ आ गया कि दलित आदिवासी तबके के लोगों का जी अब भाजपा से उचट रहा है.
जातिगत बराबरी के नाम पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उज्जैन कुंभ में एक दलित संत उमेशनाथ के साथ क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई थी और इस के पहले भी जगहजगह दलितों के घर जा कर उन के साथ खाना खाया था.
बराबरी के इन टोटकों की हकीकत अब दलितों को समझ आ रही है कि इन से उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ है उलटे उन पर होने वाले जुल्मोसितम और बढ़ने लगे हैं. ऊना के दलितों की धुनाई की तरह जगहजगह गाय के चमड़े की आड़ में दलितों की ठुकाईपिटाई अब आम बात हो चली है. भीमा कोरेगांव के हादसे के बाद तो दलित और सहम गए हैं कि आखिर जाति के नाम पर यह हो क्या रहा है.
हकीकत यह है कि धर्म के बाद अब सत्ता की डोर भी पूरी तरह से ऊंची जाति वालों के हाथों में आ गई है. गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को अंजाम देने के लिए दलितों को अपने साथ लाने की बातें तो कर रहा है पर ऐसा कोई काम नहीं कर रहा जिस से दलितों को लगे कि यह उन के भले की बात है.
संघ और भाजपा से जुड़े दलित हिंदुओं को इस बाबत राजी किया जा रहा है कि वे वर्ण व्यवस्था को मंजूरी देते हुए उन की हिंदू राष्ट्र की मुहिम का हिस्सा बन जाएं यानी ऊंची जाति वालों की पालकी ढोएं.
ये बातें दलित जागरूकता के मद्देनजर भी काफी अहम हैं जो सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन हटाने को ले कर भी डरे हुए हैं. दलितों से शादी की योजना ढाई लाख रुपए की इमदाद मिलने के बाद भी परवान नहीं चढ़ रही है और सुरभि जैसी लड़कियां दलित से शादी करने का कानूनी खमियाजा रिटायरमैंट ले कर भुगत रही हैं तो जरूरी है कि अगर वाकई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा बराबरी चाहते हैं तो वे दलितों से रोटीबेटी के रिश्ते पर फोकस करें.
15 जनवरी, 2018 को उज्जैन में महाकाल सेना के मुखिया महेश पुजारी ने अपने दर्जनभर साथियों समेत सवर्ण संत अवधेशानंद और भाजपा नेताओं के साथ कुंभ की डुबकी लगाने वाले दलित संत उमेशनाथ से मिल कर साफसाफ कहा कि दलितों के घर खाना खाने और उन की झोंपड़ी में रात गुजारने से देश में बराबरी नहीं आने वाली. देश का माहौल तेजी से बिगड़ रहा है और सवर्णदलित संघर्ष बढ़ रहा है. ऐसे में इस परेशानी से बचने का एकलौता रास्ता यही है कि ऊंचे तबके के लोग दलितों के बेटेबेटियों से शादी की पहल करें.
ऐसा हो पाएगा यह कहने की कोई वजह नहीं पर यह मांग पहली दफा उठी है इसलिए इसे हर लैवल पर समर्थन मिलना जरूरी है. जब तक ऊंची जाति वाले दलितों से रोटीबेटी के संबंध कायम करना शुरू नहीं करेंगे तब तक समरसता के नाम पर धर्म और राजनीति की ढपली, जो खोखली हो चली है, बजती रहेगी.
सुरभि के मामले से अहसास होता है कि दलितों से शादी की योजना भी परवान चढ़ सकती है बशर्ते इन बातों को लागू करने की हिम्मत सरकार दिखाए और इस के बाबत दलित तबका भी सरकार पर दबाए बनाए:
* कोई भी गैरदलित अगर दलित तबके के लड़के या लड़की से शादी करता है तो उसे भी रिजर्वेशन का इस शर्त पर फायदा मिलना चाहिए कि वह अगर जीवनसाथी को छोड़ेगा तो यह सहूलियत उस से छिन जाएगी.
* दलितों से शादी करने वाली योजना की रकम बढ़ाई जानी चाहिए.
* अगर दलित से शादी करने पर सुरभि अग्रवाल जैसी लड़कियों की जाति नहीं बदली जा सकती तो उन के पति को ऊंची जाति का माना जाना चाहिए लेकिन उन से रिजर्वेशन की सहूलियत नहीं छीनी जानी चाहिए.
* जाति वाले तमाम संबोधनों पर कानूनी रोक लगनी चाहिए.
* दलितों के साथ हिंसा करने वाले और उन्हें बेइज्जत करने वालों पर तुरंत कार्यवाही होनी चाहिए और फैसला आने तक उन्हें जमानत भी नहीं मिलनी चाहिए.
ऐसी बातें धर्म के ठेकेदारों को नागवार गुरजेंगी जिन की रोजीरोटी ही जातपांत फैलाने और जातिगत भेदभाव से चलती हैं पर हर लैवल पर बराबरी का दर्जा देने वाले लोकतंत्र में अगर जाति की बिना पर ज्यादती होती है जिस से संविधान और लोकतंत्र दोनों ही खतरे में पड़ते हों और देश में जातिगत लड़ाई का माहौल बने तो धर्म की परवाह और लिहाज करना दलितों के साथ सब से बड़ी ज्यादती है.
देश की तरक्की धर्म से नहीं बल्कि जातिगत बराबरी से ही होना मुमकिन है जिस की राह में सब से बड़ा रोड़ा मनुवादी वर्ण व्यवस्था है जो ऊंची जाति वाले लोगों के दिलोदिमाग में दलितों के प्रति नफरत पैदा करती है. इसे दूर करने के लिए जरूरी है कि ऊंची जाति वाले दलित तबके से रोटीबेटी का रिश्ता कायम करें और इस बाबत उन्हें रिजर्वेशन समेत जो सहूलियतें चाहिए वे दी जाएं, ठीक उसी तरह जिस तरह दलितों कोे दी जाती हैं.
उज्जैन की महाकाल सेना ने मांग नहीं की है बल्कि कट्टर हिंदूवादियों के सामने एक चुनौती पेश कर दी है कि अगर उन की मंशा वाकई जातिगत बराबरी की है तो वे दलित तबके से रोटीबेटी के संबंध बना कर दिखाएं, नहीं तो उन्हें ठगने और छलने की गरज से बराबरी के नाम पर बहाना बनाना बंद करें.
सुरभि के मामले से भी हालात साफ नहीं हो रहे कि अदालतें आखिर चाहती क्या हैं. अगर उन का अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र वाकई फर्जी था तो उन्हें नौकरी क्यों करने दी गई और सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें फर्जीवाड़े का कुसूरवार मानते हुए सजा क्यों नहीं दी.
जाहिर है कि अदालतें भी इस मसले पर चकराई हुई हैं कि ऊंची जाति की ऐसी लड़कियों को दलित मानें या न मानें जिन्होंने दलित लड़के से शादी की हैं.
यह तय कर पाना भी मुश्किल है कि अगर कोई दलित लड़की ऊंची जाति के लड़के से शादी करती है तो उस की जाति क्या होगी? वह जो जन्म से है या फिर वह जो शादी के बाद हो गई है?
लगता ऐसा है कि कानून भी नहीं चाहता कि दलितसवर्ण शादी कर गैरबराबरी की खाई पाटें. अगर दलित लड़की की औलाद को रिजर्वेशन का फायदा न मिले तो उस की गिनती ऊंची जाति वालों में की जाएगी क्योंकि उस का पति ऊंची जाति का है. ऐसे में औलाद का गुनाह क्या है जिसे रिजर्वेशन से महरूम रखा जा रहा है?
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