न्याय के लिए दलित आक्रोश

आजादी के 70 वर्षों बाद आज भी दलित समुदाय जातिगत भेदभाव के खिलाफ न्याय पाने के लिए आक्रोशित है. अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को ले कर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित और आदिवासी संगठनों का गुस्सा पहली बार व्यापक स्तर पर सामने आया.

2 अप्रैल को आयोजित किया गया भारत बंद हिंसा में बदल गया. देशभर में प्रदर्शन हुए. इस दौरान उत्तर भारत के कई राज्यों में हुए उपद्रवों के दौरान एक दर्जन लोगों की जानें चली गईं और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ. राज्यों में फैली हिंसा पर काबू पाने के लिए सुरक्षा बल तैनात किए गए.

दलितों के इस आंदोलन के विरोध में दूसरी जातियां अब आरक्षण के विरोध में आंदोलन की तैयारी में हैं. ऐसे में दलितों, पिछड़ों और सवर्णों के बीच मौजूदा दरारें और चौड़ी दिखने लगी हैं.

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दरअसल, महाराष्ट्र में शिक्षा विभाग के स्टोरकीपर ने राज्य के तकनीकी शिक्षा निदेशक सुभाष काशीनाथ महाजन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि महाजन ने अपने मातहत 2 अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही किए जाने पर रोक लगा दी, जिन्होंने उस की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में जातिसूचक टिप्पणी की थी.

पुलिस ने जब दोनों अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए उन के वरिष्ठ अधिकारी महाजन से इजाजत मांगी तो वह नहीं दी गई. इस पर पुलिस ने महाजन पर भी केस दर्र्ज कर लिया.

5 मई, 2017 को काशीनाथ महाजन एफआईआर खारिज कराने कोर्ट पहुंचे पर हाईकोर्ट ने उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया. बाद में महाजन ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

सुप्रीम कोर्ट ने महाजन के खिलाफ दर्ज एफआईआर को हटाने का आदेश देते हुए अनुसूचित जाति/जनजाति एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक का आदेश भी दिया था. यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत की भी मंजूरी दे दी थी. महाजन का तर्क था कि अगर किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के खिलाफ ईमानदार टिप्पणी करना अपराध होगा तो इस से काम करना मुश्किल हो जाएगा.

गाइडलाइन जारी

सुप्रीम कोर्ट के जज ए के गोयल और यू यू ललित की पीठ ने गाइडलाइन जारी करते हुए कहा कि संसद में यह कानून बनाते समय यह विचार नहीं आया होगा कि अधिनियम का दुरुपयोग भी हो सकता है. देशभर में ऐसे कई मामले सामने आए जिन में अधिनियम का दुरुपयोग हुआ है.

नई गाइडलाइन के तहत सरकारी कर्मचारियों को भी रखा गया है. यदि कोई सरकारी कर्मचारी अधिनियम का दुरुपयोग करता है तो उस की गिरफ्तारी के लिए विभागीय अधिकारी की अनुमति लेनी जरूरी होगी. यदि कोई अधिकारी इस गाइडलाइन का उल्लंघन करता है तो उसे विभागीय कार्यवाही के साथ कोर्ट की अवमानना की कार्यवाही का भी सामना करना होगा. आम लोगों की गिरफ्तारी जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की लिखित अनुमति के बाद ही होगी.

इस के अलावा पीठ ने देश की सभी निचली अदालतों के मजिस्ट्रेटों को भी गाइडलाइन अपनाने को कहा है. उस में एससीएसटी एक्ट के तहत आरोपी की अग्रिम जमानत पर मजिस्टे्रट विचार करेंगे और अपने विवेक से जमानत मंजूर या नामंजूर करेंगे.

अब तक इस एक्ट में यह होता था कि अगर कोई जातिसूचक शब्द कह कर गालीगलौज करता है तो इस में तुरंत मामला दर्ज कर गिरफ्तारी की जा सकती थी. मामले की जांच अब तक इंस्पैक्टर रैंक के पुलिस अधिकारी ही करते थे. ऐसे मामलों में अदालत अग्रिम जमानत नहीं देती थी. नियमित जमानत केवल हाईकोर्ट द्वारा ही दी जाती थी.

सरकार की मंशा पर संदेह

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ विरोधप्रदर्शन शुरू हो गए. दलित संगठनों और कानूनी जानकारों ने कहा कि इस फैसले से वंचित समुदाय के लोगों की आवाज कमजोर होगी. दलित संगठनों और कई राजनीतिक दलों की ओर से केंद्र सरकार से इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की गई. मामले ने जब तूल पकड़ा तो सरकार जागी और मामले पर पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई.  पुनर्विचार याचिका पर कोर्ट ने तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया और आगे की तारीख मुकर्रर कर दी.

सरकार की मंशा पर संदेह हुआ कि अगर वह वास्तव में दलितों के साथ है तो हल्ला मचने से पहले ही क्यों नहीं उस ने पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की बात की.

दरअसल, सरकार ने इस मामले में एससीएसटी के पक्ष को नहीं रखा जो इस देश की आबादी का एकचौथाईर् है. इस केस में जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उस का पक्ष जानने की कोशिश की थी और इसे वरिष्ठ कानूनी अधिकारी की जगह एडिशनल सौलिसीटर जनरल मनिंदर सिंह को भेजा था तो उन्होंने मामले में सरकार के पक्ष या कानून का बचाव करने के बजाय एक केस के हवाले से यह कहा कि ऐसे मामले में अग्रिम जमानत दिए जाने में कोर्ट बाधा नहीं है.

यह बात कानून के प्रावधान के खिलाफ थी. यहां सरकार के प्रतिनिधि को कानून का बचाव करना चाहिए था. उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने की दर बहुत कम है. ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला देना पड़ा कि  अग्रिम जमानत मिलेगी और चूंकि सरकार कह चुकी है कि फर्जी मामले भी होते हैं, ऐसे में अदालत ने कहा कि प्रारंभिक जांच के बिना गिरफ्तारी नहीं होगी.

फैसले पर सवाल

फैसले पर सवाल उठ रहे हैं. केस दर्ज होने के बाद गिरफ्तारी से छूट मिली तो अपराधियों का निकलना आसान हो जाएगा. सरकारी अफसरों के मामले में अपौइंटिंग अथौरिटी की मंजूरी में भेदभाव होगा.

इस एक्ट के सैक्शन 18 के तहत

ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है. ऐसे में यह छूट दी जाती है तो फिर अपराधियों के लिए बच निकलना आसान हो जाएगा. इस के अलावा सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अपौइंटिंग अथौरिटी की मंजूरी को ले कर भी दलित संगठनों का कहना है कि उस में भेदभाव किया जा सकता है.

साफ है कि इस फैसले से एससीएसटी एक्ट 1989 के प्रावधान कमजोर हो जाएंगे. अदालत के आदेश से लोगों में कानून का भय खत्म होगा और कानून का उल्लंघन ज्यादा हो सकता है. भय खत्म हो जाएगा और न्याय नहीं मिल पाएगा. कैसे पता चलेगा कि मामले निष्पक्षता व ईमानदारी से निबटाए गए हैं.

पहले न्याय व्यवस्था पुराणों, स्मृतियों पर आधारित थी जो जातिगत भेदभाव से पूर्ण थी. आज संविधान बनने के 7 दशकों बाद भी न्यायिक फैसले एससीएसटी तबके को भेदभाव, छुआछूत का दंश झेलने से मुक्ति दिलाने वाले नहीं हो रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला भी ऐसा ही है.

दलित की शिकायत की जांच करने वाला पुलिस अधीक्षक क्या भेदभाव नहीं करेगा? जमानत पर फैसला लेने वाला जज क्या भेदभाव से रहित होगा? ऐसे में दलित को न्याय कहां मिलेगा? पुरानी व्यवस्था और मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में क्या फर्क रह जाएगा?

अदालत का कहना था कि दलित एक्ट का दुरुपयोग होता है. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में जातिसूचक गालीगलौज के 11,060 मामलों की शिकायतें सामने आई थीं. इन में से दर्ज हुई शिकायतों में केवल 935 झूठी पाईर् गईं.

इस के विपरीत, दहेज एक्ट, चोरी, लूटपाट, मानहानि, धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने जैसे कानूनों का अधिक दुरुपयोग होता है. अगर ऐसा है तो सभी मामलों में एकसमान आदेश होने चाहिए.

दलित आंदोलनों का इतिहास

वैसे तो दलित आंदोलन महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, बिहार में अलगअलग तौर पर चलता आया है पर दलितों की इतने व्यापक स्तर पर एकजुटता 1932 के बाद पहली बार दिखाईर् दी है. हालांकि इस से पहले 1927 में महाड में अछूतों द्वारा मनुस्मृति की प्रति जलाने की घटना बड़ी थी. मनुस्मृति जलाने के बाद महाड में अछूतों की सभा में संकल्प लिया गया कि न तो कोई अछूत हिंदुओं के मृत पशुओं की खाल उतारेगा और न ही उसे उठाएगा.

दक्षिण भारत में भी दलित आंदोलन की शुरुआत रामास्वामी नायकर पेरियार ने की थी. उन्होंने देखा कि ब्राह्मण दलितों का शोषण कर रहे हैं और उन्हें बदतर जीवन जीने पर मजबूर कर रहे हैं. पेरियार ने ईश्वर की समाप्ति, धर्म का खात्मा, ब्राह्मण का बहिष्कार करने का संदेश दिया था. दक्षिण भारत में उन का आंदोलन दलितों को राजनीतिक व सामाजिक अधिकार दिलाने में कामयाब माना गया. आजादी से पहले 1930 में ही उन्होंने कह दिया था कि भारत में समाजवादी गणतंत्र होना चाहिए.

इस से पहले महाराष्ट्र में हिंदू धर्म की व्यवस्था के खिलाफ ज्योतिराव फुले ने आंदोलन किया. महिला शिक्षा की शुरुआत फुले ने ही की. अंबेडकर ने उन्हीं से सीख ले कर दलित आंदोलन को ऊंचाई पर पहुंचाया.

समयसमय पर दलित आक्रोश उभर कर सामने आता रहा है. आज भी भेदभाव कम नहीं हुआ है. एक सामाजिक अध्ययन में कहा गया है कि दलित समुदाय आज भी छत्तीस तरह के बहिष्कारों का सामना कर रहा है. इन में विवाह में घोड़ी पर चढ़ना, मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक कुंओं, तालाबों, नलों से पानी भरना, ब्राह्मणों के बराबर आसन पर बैठना, मूंछें रखना, नाई से बाल कटवाना, चाय की दुकान पर अलग गिलास, स्कूलों में अलग पहचान जैसे मामले आएदिन सामने आते हैं.

पिछले दिनों हुए खैरलांजी, रोहित वेमुला, ऊना कांड, सहारनपुर कांड जैसे दलित उत्पीड़न के मामलों से यह साबित हुआ है कि संविधान बनने के 70 वर्षों बाद आज भी दलितों के साथ असमानता, अन्याय और भेदभाव वाला व्यवहार  कायम है. 1950 में जब हम ने संवैधानिक गणतंत्र को अपनाया था तब सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और धार्मिक रूप से बहिष्कृत जाति के लोगों को कुछ विशेष अधिकार मिले थे पर सामाजिक रूप से प्रताड़ना झेलने के साथ दलितों को सरकारी संस्थानों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

कई दशकों बाद 2 अप्रैल को दलित वर्गों का हजारों साल का गुस्सा सड़कों पर उतर आया. यह इतिहास का सब से बड़ा दलित आंदोलन माना जा रहा है. दलितों में स्वाभाविक रूप से सवर्ण तबकों का सामना करने का साहस नहीं है, लेकिन इस आंदोलन ने इस मिथक को तोड़ा है. यह आंदोलन पहले ही हो जाना चाहिए था. जो काम मुसलमान नहीं कर पाए, दलितों ने कर दिखाया. दलित आंदोलन से हिंदू समाज में दरारें और साफ उभर आईं. संघ ने जो सेना खड़ी की है उस का प्रतिफल तो निकलना ही था.

इन दशकों में संविधान ने दलितों को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक रूप से मजबूत किया है. सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला व इस तरह के फैसले दरअसल कानून को कमजोर करने की कवायद हैं.

शिक्षा व्यवस्था में संघी विचारधारा पूरी तरह से कामयाब दिख रही है. इतिहास से ले कर सिलेबस तक मनमुताबिक बदले जा रहे हैं. अब ज्यूडिशियरी में भी संघ की समान  विचारधारा वाले निर्णय नजर आने लगे हैं. बराबरी की व्यवस्था वाले संविधान पर धर्म की गैरबराबरी वाली भेदभाव की व्यवस्था थोपी जाती है, तो न्याय कहां होगा? सदियों से चले आ रहे भेदभाव के खिलाफ बने कानूनों को कमजोर करने की कोशिशें की जा रही हैं.

2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की जनसंख्या में 20.14 प्रतिशत आबादी दलितों की है. एससीएसटी  वगर्ोें के 131 सदस्य संसद में हैं. इस बड़े वर्ग से जुड़े इस मामले से हर दल का हित है. इसी कारण कांग्रेस समेत बड़े विपक्षी दलों ने इस आंदोलन को समर्थन दिया. भाजपा के सब से ज्यादा सांसद इन्हीं वर्गों से हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दलितों को पक्ष में करने के लिए पिछले कुछ समय से बहुत जतन कर रहे हैं. भाजपा द्वारा अंबेडकर की मूर्तियां लगाई जा रही हैं. दलितों को हिंदू मंदिरों में प्रवेश कराने के प्रयास किए जा रहे हैं पर भाजपा और संघ समर्थित लोगों की दलितों के प्रति अपनी कट्टर पौराणिक मानसिकता बदल नहीं पाई और समयसमय पर नफरत हिंसा के रूप में जाहिर होती रही है.

आज की दलित युवा पीढ़ी पढ़ रही है. उस में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक चेतना आई है. यह युवा पीढ़ी अब मानने को तैयार नहीं है कि वह सवर्णों के अधीन उसी तरह काम करे जैसा पुराणों में बताया गया है. वह अब खुल कर इस मानसिकता का विरोध करने लगी है. सीधेसीधे हिंदू धर्म के खिलाफ बगावत पर उतर आई है.

हिंदू समाज की भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते आज भी आएदिन अधिकांश दलित  बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हो रहे हैं. सवर्ण समाज आज दलितों को बराबरी का हक देने के पक्ष में नहीं है. आरक्षण के विरोध की आवाज इसलिए बुलंद की जा रही है क्योंकि सवर्र्ण और पिछड़े वर्ग की बराबरी पर अब दलित समाज आ रहा है. वह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तौर पर मजबूत बन रहा है

दलितों के लिए पैरवी

यूरोप में हुए पुनर्जागरण आंदोलन से कोई सबक न तो सवर्र्ण समाज ने लिया और न ही दलित वर्गों ने. पुनर्जागरण आंदोलन के बाद मानवीय मूल्यों का महिमामंडन हुआ. ज्ञानार्जन का प्रकाश फैला.  मानवीय मूल्य यूरोप की क्रांति के आदर्श बने. इन आदर्शों के जरिए ही यूरोप में एक ऐसे समाज की रचना की गई जिस में मानवीय मूल्योें को प्राथमिकता दी गई. यह अलग बात है कि औद्योगिकीकरण के चलते इन मूल्यों की जगह यूरोप में पूंजीवाद ने ले ली पर इस के बावजूद, मानवीय अधिकारों को सब से पहले कानूनी मान्यता दी गई.

इस का सीधा असर भारत पर पड़ा. भारतीय संविधान की प्रस्तावना से ले कर सभी अनुच्छेद इन्हीं अधिकारों की रक्षा करते नजर आते हैं. भारत में दलितों की कानूनी लड़ाई लड़ने का जिम्मा सब से मजबूत रूप में अंबेडकर ने उठाया. अंबेडकर ने सब से पहले दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की पैरवी की. अंबेडकर ने भारतीय समाज के तब के स्वरूप का विरोध और समाज के सब से पिछड़े व तिरस्कृत लोगों के अधिकारों की बात की. राजनीतिक और सामाजिक रूप से इस का विरोध हुआ. यहां तक कि महात्मा गांधी भी वंचित वर्गों के अधिकारों की मांगों के विरोध में उतर आए थे.

अंबेडकर ने मांग की थी कि दलितों को अलग प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. यह दलित राजनीति में आज तक की सब से सशक्त और प्रबल मांग थी. देश की आजादी का बीड़ा उठाने वाली कांग्रेस की सांसें भी इस मांग पर अटक गई थीं. कारण साफ था कि समाज के तानेबाने में लोगों का सीधा स्वार्थ निहित था और कोई भी इस तानेबाने में जरा सा भी बदलाव नहीं करना चाहता था.

महात्मा गांधी विरोधस्वरूप आमरण अनशन पर बैठ गए. उन के लिए यह सब से बड़ा हथियार था. अंबेडकर अपनी मांग से हटना नहीं चाहते थे पर उन पर हर ओर से दबाव पड़ा. गांधी भी टस से मस नहीं हुए. आखिर अंबेडकर को ही झुकने पर मजबूर किया गया. अंत में पूना पैक्ट के नाम से एक समझौते में दलितों के अधिकारों की मांग को धर्म की दुहाई दे कर खत्म कर दिया गया. बाद में आरक्षण की व्यवस्था की गई. यह आरक्षण सवर्णों और दलितों के बीच हुए पूना पैक्ट समझौते का परिणाम था.

असल में यह दलितों का हिंदू धर्र्म के खिलाफ वंचितों का विद्रोह जैसा है जो सैकड़ों साल बाद भी न्याय, सम्मान और बराबरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं पर खुद दलित वर्ग हिंदू धर्म के दलदल में घुसने के लिए लालायित है. उधर, सवर्ण लोग इन का न तो मंदिरों में प्रवेश स्वीकार करने को तैयार हैं, न बराबर का मानने को. संविधान में समानता के अधिकार के  बावजूद यह तबका सवर्णों की पौराणिक सोच से आजाद नहीं हो पाया है.

जातिव्यवस्था की यह जहरीली सोच खत्म नहीं होगी. इस की जड़ें किताबों में नहीं, दिमागों में गहरे तक हैं. देश की मौजूदा सरकार इन जड़ों को और सींच रही है.

दलितों को मुक्ति तभी मिलेगी जब वे धर्म से मुक्त हो जाएंगे. जिस हिंदू धर्म ने दलितों के साथ भेदभाव किया, उन्हें सम्मान, न्याय से वंचित रखा, दलित आज उसी दलदल में घुसने का प्रयास कर रहे हैं. यह उन का आत्मघाती रास्ता है.

धर्म के नाम पर देश में जो हालात बन रहे हैं वे तालिबान, इसलामिक स्टेट के जिहादियों से अलग नहीं हैं. देश में अलगअलग वर्गों में बंटे समाज का विभाजन और गहरा हो रहा है. इसे पाटने के बजाय दरारें और चौड़ी की जा रही हैं. देश आगे चलने के बजाय 400 साल पीछे लौट रहा है.

दलित अगर धर्म को पूरी तरह त्याग कर शिक्षा की ओर उन्मुख होंगे, तो ही उन का सही उद्धार हो पाएगा.

उत्तर कोरिया की सही दिशा

उत्तर कोरिया के सनकी, सिरफिरे, बमबारी में तेजी दिखाने वाले तीसरी पीढ़ी के युवा तानाशाह किम जोंग उन से यह आशा नहीं थी कि पहले वे ट्रेन से बीजिंग जाएंगे और उस के तुरंत बाद दक्षिण कोरिया पहुंच जाएंगे और वह भी बेहद परिपक्वता व गांभीर्य के साथ.

द्वितीय विश्वयुद्ध में कोरिया जापान के अधीन आ गया था पर 1945 में जापान की पराजय के बाद रूस व अमेरिका ने कोरिया को अकारण 2 भागों में बांट दिया था. एक का नेता बने किम इल सुंग और दूसरे के ली बिओम सियोक. दोनों ने कोरिया को एक करने की कोशिश की पर उत्तर कोरिया चीन व रूस समर्थक कोरिया चाहता था जबकि दक्षिण कोरिया अमेरिका समर्थक.

1953 में बंद हुई लड़ाई के बाद दोनों के बीच वाकयुद्ध चालू है और किम इल सुंग की तीसरी पीढ़ी के किम जोंग उन ने भी परंपरा को कायम रखा. उत्तर कोरिया इस बीच गुप्तरूप से दुनियाभर से हथियार खरीदता रहा और आणविक बम भी बनाता रहा. उस की आणविक क्षमता व अब तक की नीति के चलते तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ने के खौफ से दुनिया भयभीत रही है.

पिछले कुछ महीनों में या तो डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों के कारण या फिर चीन के बेहद कुशल डिप्लोमैट शासक शी जिनपिंग के समझाने पर उत्तर कोरिया ने अपने तेवर ही ढीले नहीं किए, किम ने नया इतिहास भी रच डाला.

वे उत्तर कोरिया व दक्षिण कोरिया की सीमा तक गए और पैदल चल कर दक्षिण कोरिया में पहला कदम रखा, जहां दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन इंतजार कर रहे थे. चौंकाने वाली बात यह रही कि बिगडै़ल किम जोंग उन ने हाथ मिलाने के बाद मून को 9 इंच की सीमा की पटरी पार कर उत्तर कोरिया में आने को कहा. वहां दोनों नेताओं ने हाथ मिलाए, फोटो खिंचवाए.

किम जोंग उन ने शांति संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद मून से न केवल हाथ मिलाया, बल्कि उन के गले लग कर उन का अभिवादन भी किया. ये दोनों काम स्क्रिप्टेड नहीं थे यानी पहले से तय नहीं थे, लेकिन बेहद संतोष व आशा वाले हैं.

कोरियाई विभाजन क्या समाप्त होगा, यह कहना तो गलत होगा पर दुनिया एक संभावित खतरे से दूर हो गई है. उत्तर कोरिया बेहद गरीब है, लगभग भारत जैसा, जबकि दक्षिण कोरिया जापान जैसा समृद्ध है. बहरहाल, कई बार सिरफिरे नेता भी इतिहास रच डालते हैं, यह किम जोंग उन ने साबित किया है. किम ने यह भी मान लिया है कि एक भूभाग में रहने वालों को एकदूसरे के दुश्मन होने से समस्या का हल नहीं निकलता, जैसे पश्चिम जरमनी, पूर्व जरमनी या भारत, पाकिस्तान. भारत व पाकिस्तान के भूखे देशवासियों का अरबोंखरबों रुपया हर साल सेना पर खर्च होता है जबकि दोनों जानते हैं कि न एकदूसरे को हरा सकते हैं और न हरा कर कुछ पा ही सकते हैं.

उत्तर कोरिया को इतने साल कम्युनिस्ट धर्म ने अलग रखा. अगर उत्तर कोरिया में लोकतंत्र जल्दी आ जाता तो वह कहीं का कहीं होता. अब 65 साल पीछे रहने के बाद वह दक्षिण कोरिया से हमेशा पिछड़ा रहेगा पर मरे नेताओं को कब्र से निकाल कर तो सजा दी नहीं जा सकती.

फालतू दवाएं न लें

आप ने ऐसे कई विज्ञापन देखे होंगे जिन में सैक्स समस्याओं को खत्म करने और सैक्स पावर बढ़ाने की दवाओं के बारे में बताया जाता है. यों तो सैक्स पावर बढ़ाने का दावा कई दवा कंपनियां करती हैं, लेकिन सवाल है कि इन पर कितना विश्वास किया जाए. इस पर विचार करें. लेकिन आंखें बंद कर के भरोसा न करें. आप को ऐसे विज्ञापनों से सावधान रहने  की जरूरत है.

बौडी पर बुरा प्रभाव : ऐसी दवाएं किसी मान्यताप्राप्त लैब में नहीं, बल्कि झोलाछाप नीमहकीमों द्वारा बनाई जाती हैं, जिन्हें दवा बनाने की कोई साइंटिफिक जानकारी नहीं होती. इधरउधर, गांव के बुजुर्गों से मिले अधकचरे ज्ञान के आधार पर वे इन्हें तैयार करते हैं. दवा में किस चीज की मात्रा कितनी होनी चाहिए और कौन सी 2 चीजें एक ही दवाई में होने पर रिएैक्ट करेंगी, इस बारे में भी इन लोगों को कोई जानकारी नहीं होती है.

ये दवाएं सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त भी नहीं होती हैं. यही वजह है कि जब इन का सेवन किया जाता है तो ये शरीर पर गलत असर डालती हैं. कई बार तो इन के सेवन से धीरेधीरे शरीर के अंग भी काम करना बंद कर देते हैं. इसलिए वही दवाएं लें जो आप की समस्या के अनुसार मान्यताप्राप्त डाक्टर द्वारा दी गई हों.

डोज का सही होना जरूरी

परेशानी चाहे तन से जुड़ी हो या मन से, उस का निवारण तभी हो सकता है जब उस की काट के लिए दवा सही मात्रा में ली जाए. इस के लिए जरूरी है कि सही डाक्टर से उचित देखरेख में ही यह काम किया जाए. लेकिन झोलाछाप, ओझा आदि पैसे बनाने के लिए और अधिक से अधिक दवा की बिक्री के लिए ज्यादा डोज लेने को कहते देते हैं. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि इस से मरीज की सेहत पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा. इन चक्करों में पड़ने से बचें.

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दवा के साइड इफैक्ट्स

कामोत्तेजना बढ़ाने वाली वियाग्रा जैसी कई दवाओं के भ्रामक विज्ञापन अखबारों की सुर्खियां बनते रहते हैं और युवा पीढ़ी इस ओर जल्द आकर्षित होती है और इन दवाओं का सेवन शुरू करती है. थोड़ा सा असर दिखने पर युवाओं को यह एक नशे के जैसा लगने लगता है और वे खुद ही इस की मात्रा बढ़ा देते हैं ताकि और मजे लिए जा सकें. मजे का तो पता  नहीं लेकिन इन दवाओं का साइड इफैक्ट होने लगते हैं और मरीज को थकान व कमजोरी जैसी समस्याएं महसूस होने लगती हैं.  ऐसी कोई भी दवा लेने से बचें और अगर ले रहे हैं तो उन दवाओं के बारे में इंटरनैट पर पूरी जानकारी लें और फिर सोचविचार के बाद ही उन्हें खरीदने के बारे में सोचें.

अति हर चीज की बुरी

सैक्स पावर बढ़ाने जैसी कई दवाओं के विज्ञापन आएदिन छपते रहते हैं, लेकिन ये सभी सही नहीं होते हैं. सैक्स की हर व्यक्ति की अपनी इच्छा और क्षमता होती है. इसे किसी दूसरे से कंपैरिजन नहीं किया जा सकता है. इसलिए कहीं  पढ़ कर ऐसा न सोचें कि आप भी ये दवाएं खा कर हृष्टपुष्ट हो जाएंगे.

यदि अगर वास्तव में कोई दिक्कत है तो अपने डाक्टर से कंसल्ट करें और अपने अच्छे खानपान और पूरी नींद जैसी बातों पर ध्यान दें. इन विज्ञापनों के बारे में सोच कर ज्यादा ऐक्साइटेड न हों क्योंकि अति हर चीज की बुरी होती है. अगर आप की सैक्सलाइफ बिना कुछ किए ही अच्छी चल रही है तो फिर इन दवाओं का सेवन करना बेकार है.

गर्भ निरोधक गोलियां

गर्भ रोकने वाली दवाओं को बारबार लेने के घातक परिणाम हो सकते हैं. स्त्रियों के प्रजन्न अंगों पर इन का विपरीत प्रभाव पड़ सकता है. उपयोग करने के इच्छुकों को चाहिए कि वे डाक्टर से दवाओं के साइड इफैक्ट, उन के असफल होने की आशंकाएं और गर्भाशय से बाहर गर्भधारण की संभावनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर लें. यदि अगला मासिकधर्म न आए या मासिकधर्म के समय बहुत अधिक खून बहने लगे, तो हकीमों के पास जाने के बजाय तुरंत डाक्टर से जांच करवाएं.

डाक्टर से जांच करवा कर यह सुनिश्चित कर लें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार महिला इस दवा को लेने के लिए सक्षम है या नहीं. आपात गर्भनिरोधक गोलियों का विज्ञापन जिस तरह से किया जा रहा है उस से समाज में और विशेषरूप से युवावर्ग में यह भ्रांति फैल रही है कि बिना किसी डर के यौन संबंध बनाओ, गोली है न. लेकिन ऐसा नहीं है. युवाओं को इस बात का खयाल रखना चाहिए कि इन गोलियों की जरूरत ही न पड़े.

ऐसा न हो कि आपात गोली आफत की गोली बन जाए. इसलिए डाक्टर से मिलें और किसकिस तरह के प्रोटैक्शन होते हैं और आप दोनों में से कौन सा प्रोटैक्शन लेना ज्यादा बेहतर होगा, आदि के बारे में बात कर के ही कोई प्रोटैक्शन यूज करें. सिर्फ इन विज्ञापनों में दी गई गोली का नाम पढ़ कर ही लेना शुरू न करें.

वियाग्रा का इस्तेमाल न करें

प्रिस्क्रिप्शन पर दी गई परफौर्मेंस बढ़ाने वाली दवाओं जैसे वियाग्रा का उपयोग कभी न करें, क्योंकि इन्हें पहले से ब्लडप्रैशर जैसी कंडीशन होने पर, लेना सुरक्षित नहीं होता, साथ ही, अगर आप शुगर की बीमारी से पीडि़त हैं तो भी यह दवा लेना सही नहीं है. यह आप के डाक्टर का काम है कि आप के लिए ऐसी दवा लिखें जो आप के लिए सुरक्षित हों और आप को बताएं कि आप को कितनी डोज से इन्हें लेने की शुरुआत करनी चाहिए. विशेषरूप से जब आप पहले से आप द्वारा ली जाने वाली दवाओं के साथ इन्हें लेने का प्लान बना रहे हों.

हर्ब्स और हर्बल मिश्रण से बनी दवाओं से सावधान

आप सैक्स की इच्छा बढ़ाने का दावा करने वाली हर्ब्स और हर्बल मिश्रण से बच कर रहें. इन में से कुछ के कारण असुविधाजनक इरैक्शन हो सकता है जो घंटों तक वापस नहीं आता और योहिम्बे जैसी हर्ब आप के हृदय की गति को बढ़ा कर कार्डियक अरैस्ट  की आशंका को बढ़ा देती है. इसलिए इन्हें लेने से पहले हमेशा अपने डाक्टर की सलाह लें.

स्टैरौयड न लें

गैरकानूनी स्टैरौयड आप की सैक्स इच्छा बढ़ा तो सकते हैं लेकिन बाद में आप को इस की महंगी कीमत चुकानी पड़ती है. ये आप के हृदय को नुकसान पहुंचा सकते हैं और शरीर में ऐसे अपरिविर्तनीय बदलाव ला सकते हैं जिन से आप कभी भी पूरी तरह से नहीं उबर नहीं सकते. बजाय इस के ऐसे प्राकृतिक और कानूनी रूप से वैध सप्लीमैंट का उपयोग करें जो स्टैरौयड के समान ही प्रभाव रखते हैं और आप को स्थायी रूप से कोई हानि भी नहीं पहुंचाते.

खानपान पर सरकारी पहरा

संविधान और कानून भले ही खानपान के मामले में कोई भेदभाव न करते हों, पर सरकारी एजेंसियों पर किसी का जोर नहीं चलता, जो तरहतरह के नियम की बिना पर आएदिन हैरान कर देने वाले न केवल फरमान जारी करती हैं, बल्कि उन पर अमल करते हुए यह भी जता देती हैं कि आम लोगों को खाना बेचने और खाने की भी उतनी आजादी नहीं है, जितनी वे संवैधानिक तौर पर समझते हैं.

देश के किसी भी शहर में फुटपाथ और सड़कों पर खोमचे, चाट या चाय बेचने वालों का दिखना आम है. इन में से ज्यादातर नाजायज तरीके से सामान बेचते हैं. आएदिन सरकारी लोग इन पर कार्यवाही करते हुए इन्हें खदेड़ते हैं, लेकिन हैरतअंगेज के तरीके से ये खोमचे, ठेले, गुमटी वाले 2-4 दिन बाद फिर उसी जगह पर दिखाई देने लगते हैं. यानी ये लोग धार्मिक जगहों की तरह पसरे हैं. इन के बगैर आम लोगों का भी काम नहीं चलता.

करोड़ों लोगों को खिलानेपिलाने वाले इन गुमटियों, खोमचे वालों की बसावट के लिए सभी शहरों में हौकर्स कौर्नर खोल दिए गए हैं, लेकिन इस के बाद भी समस्या जस की तस है, क्योंकि सभी को हौकर्स कौर्नर में जगह नहीं मिल पाती और इस का खर्च भी सभी दुकानदार उठा नहीं पाते हैं.

एक मुहिम ऐसी भी

मध्य प्रदेश में भोपाल नगरनिगम ने एक अनूठा और भेदभाव भरा फरमान जारी कर कार्यवाही करने की बात कही है, लेकिन यह सिर्फ चिकन कौर्नरों के खिलाफ है.

नगरनिगम ने उन्हीं चिकन कौर्नरों को हटाने का फैसला लिया है, जो रात 8 बजे से 12 बजे के बीच लगते हैं.

फरमान तानाशाही न लगे, इस बाबत नगरनिगम की दलीलें ये हैं कि चिकन का बिकना रात को शुरू होता है और इन के खिलाफ आएदिन शिकायतें मिलती रहती हैं. मतलब यह है कि चिकन कौर्नर लगने से रात में लोगों खासतौर पर औरतों का निकलना दूभर हो जाता है, क्योंकि चिकन कौर्नरों पर शराबियों की भरमार रहती है, इन से गंदगी होती है और ये किसी घर के पास हों, तो बदबू भी आती है.

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इस फरमान के बाद चिकन बेचने वालों में दहशत फैलना कुदरती बात थी, क्योंकि कइयों की रोजीरोटी इस से चलती है. दूसरे, चिकन और मांसाहार के उन शौकीनों की तादाद लगातार बढ़ रही है, जिन की जेब महंगे होटलों के  दाम नहीं चुका पाती.

भोपाल नगरनिगम ने चिकन की तकरीबन 6 सौ नाजायज दुकानें पहचानीं और उन के खिलाफ कार्यवाही करने का मन बना लिया और यह भी कहा कि ये चिकन कौर्नर नाजायज इस लिहाज से भी हैं कि मांस बेचने के लिए लाइसैंस जरूरी है, जो इन लोगों ने नहीं लिया है और न ही नगरनिगम दफ्तर में रजिस्ट्रेशन कराया है, जबकि चिकन या मांस बेचने का लाइसैंस और रजिस्ट्रेशन जरूरी है.

पहरा और भेदभाव

इन दलीलों में दम इस लिहाज से नहीं है कि भोपाल में ही हजारों नाजायज दुकानें हैं. चाय, चाट ठेले या गुमटी वालों ने भी न तो लाइसैंस लिया है, न ही कहीं कोई रजिस्ट्रेशन कराया है. लेकिन इन्हें माफी और छूट दे दी गई है और शिकंजा केवल चिकन बेचने वालों पर ही कसा जा रहा है.

दरअसल, ये नाजायज ठेले, खोमचे और कौर्नर में नगरनिगम के मुलाजिमों की आमदनी का एक बड़ा जरीया हैं, जिन से दैनिक घूस इंस्पैक्टर, सुपरवाइजर लेते हैं.

भोपाल में 10 हजार ऐसे विक्रेता हैं, जो औसतन 50 रुपए रोज घूस देते हैं यानी यह रकम 5 लाख रुपए रोज है. इन में से चिकन बेचने वालों की तादाद एक हजार भी नहीं है. इस के बाद भी गाज अकेले उन्हीं पर क्यों गिर रही है?

इस बात की पड़ताल करने पर पता चला कि ज्यादातर चिकन बेचने वाले मुसलिम हैं, इसलिए जानबूझ कर ऐसा किया जा रहा है.

बात में दम होता, अगर वाकई नगरनिगम नाजायज कौर्नरों और दुकानों को हटाने के मामले में गंभीरता दिखाते हुए चाट और चाय वालों पर भी बराबरी से कार्यवाही करता, क्योंकि भीड़ उन से भी बढ़ती है, कब्जा वे भी करते हैं और लाइसैंस भी नहीं लेते.

बात जहां तक शराबियों के जमावड़े की है, तो वह वही भोपाल है, जहां आएदिन रिहायशी इलाकों से शराब के ठेके हटाने के लिए आंदोलन होते रहते हैं. इन में औरतें सब से आगे रहती हैं, जिन्हें शराबियों की करतूत भुगतनी पड़ती है और जगहजगह सहूलियत से शराब की दुकानें होने से नए शराबी पैदा हो रहे हैं.

यह ठीक है कि शराब की दुकानें लाइसैंसशुदा और जायज होती हैं, पर इन से चिकन कौर्नर के मुकाबले कहीं ज्यादा परेशानी लोगों को उठानी पड़ती है, फिर इन्हें क्यों परेशानियों की बिना पर नहीं हटाया जाता? क्या परेशानी सिर्फ चिकन कौर्नर से ही होती है, चाट और चाय वालों से नहीं, जबकि वे भी चिकन कौर्नर वालों की तरह नाजायज हैं?

मंदिरों पर छूट क्यों

कोई भी नगरनिगम यह बात दावे से नहीं कह सकता कि शहर में कब्जे वाले मंदिर नहीं हैं. हर दूसरे चौराहे पर एक मंदिर है, जो गैरकानूनी तरीके से बना है. पर इन मंदिरों को हटाने की कोई पहल नहीं की जाती. अगर पहल की भी जाती है, तो भक्त और श्रद्धालु इतना विरोध करते हैं कि नगरनिगम अमला चुपचाप खिसकने में ही अपनी भलाई समझता है.

वैसे भी खुद उस के मुलाजिम मंदिरों और देवीदेवताओं से डरते हैं यानी नगरनिगम की नजर में नाजायज मंदिर भी नाजायज नहीं होता, बावजूद सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के कि देश के तमाम शहरों के गैरकानूनी तौर पर बने धर्मस्थलों की लिस्ट बना कर उसे भेजी जाए और ये नाजायज मंदिरमसजिद व चर्चगुरुद्वारे हटाए जाएं.

जब इस फैसले पर अमल नहीं हुआ, तो सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकारों को फटकार लगाई, तो इस पर कलक्टरों ने इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया था. भोपाल में गैरकानूनी रूप से बने मंदिरों की तादाद हजारों में पाई गई थी.

इन मंदिरों से एकसाथ जो भीड़ निकलती है, उस से भी ट्रैफिक जाम होता है. लेकिन बात और मामला चूंकि धर्म का है, इसलिए कोई इस पर ध्यान नहीं देता.

वैसे भी मंदिर और कौर्नरों में कोई खास फर्क नहीं, पैसा दुकानदारों की तरह पंडेपुजारी भी कमाते हैं और उसी पैसे से मंदिरों का प्रचार भी होता है.

बात अगर सिर्फ लोगों की परेशानियों की है, तो नगरनिगम की चिंता झांकियों के दिनों में भी करनी चाहिए, जो सड़कों पर लगती हैं और तरहतरह की परेशानियां लोगों को झांकियों से उमड़ती भीड़ से होती है. ये सार्वजनिक झांकियां किस आधार पर जायज होती हैं, शायद ही कोई बता पाए.

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तो फिर कार्यवाही सिर्फ हजार 5 सौ चिकन कौर्नरों के खिलाफ ही क्यों, खोमचे, चाय वालों और गैरकानूनी मंदिरों के खिलाफ भी क्यों नहीं? यह भेदभाव खानपान पर ही क्यों? क्यों न इसे शाकाहार को और बढ़ावा देने की साजिश समझी जाए?

मारवाड़ के लुटेरों पर पुलिस का दांव

राजस्थान का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है. मेवाड़ और मारवाड़ की धरती शूरवीरता के लिए जानी जाती है. रेतीले धोरों और अरावली पर्वतमालाओं से घिरे इस सूबे के लोगों को भले ही जान गंवानी पड़ी, लेकिन युद्ध के मैदान में कभी पीठ नहीं दिखाई. इस के इतर राजस्थान की कुछ जनजातियां अपराध के लिए भी जानी जाती रही हैं.

लेकिन अब समय बदल गया है. ऐसे तमाम लोग हैं, जो कामयाब न होने पर अपने सपने पूरे करने के लिए जनजातियों की तरह अपराध की राह पर चल निकले हैं. अन्य राज्यों के लोगों की तरह राजस्थान के भी हजारों लोग भारत के दक्षिणी राज्यों में रोजगार की वजह से रह रहे हैं.

मारवाड़ के रहने वाले कुछ लोगों ने अपने विश्वस्त साथियों का गिरोह बना कर तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में करोड़ों की चोरी, लूट और डकैती जैसे संगीन अपराध किए हैं. ये वहां अपराध कर के राजस्थान आ जाते हैं और अपने गांव या रिश्तेदारियों में छिप जाते हैं. कुछ दिनों में मामला शांत हो जाता है तो फिर वहां पहुंच जाते हैं. उन्हें वहां किसी तरह की परेशानी भी नहीं होती, क्योंकि वहां रहतेरहते ये वहां की भाषा भी सीख गए हैं. स्थानीय भाषा की वजह से ये जल्दी ही वहां के लोगों में घुलमिल जाते हैं.

मारवाड़ के इन लुटेरों ने जब वहां कई वारदातें कीं तो वहां की पुलिस इन लुटेरों की खोजबीन करती हुई उन के गांव तक पहुंच गई. लेकिन राजस्थान पहुंचने पर दांव उल्टा पड़ गया. इधर 3 ऐसी घटनाएं घट गईं, जिन में लुटेरों को पकड़ने आई तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की पुलिस खुद अपराधी बन गई. यहां तक कि चेन्नै के एक जांबाज इंसपेक्टर को जान से भी हाथ धोना पड़ा.

चेन्नै के थाना मदुरहोल के लक्ष्मीपुरम की कडप्पा रोड पर गहनों का एक काफी बड़ा शोरूम है महालक्ष्मी ज्वैलर्स. यह शोरूम मुकेश कुमार जैन का है. वह मूलरूप से राजस्थान के जिला पाली के गांव बावरा के रहने वाले हैं. वह रोजाना दोपहर के 1 बजे के करीब शोरूम बंद कर के लंच के लिए घर चले जाते थे. कुछ देर घर पर आराम कर के वह शाम करीब 4 बजे शोरूम खोलते थे.

16 नवंबर, 2017 को भी मुकेश कुमार जैन अपना जवैलरी का शोरूम बंद कर के लंच करने घर चले गए थे. शाम करीब 4 बजे जब उन्होंने आ कर शोरूम खोला तो उन के होश उड़ गए. शोरूम की छत में सेंध लगी हुई थी. अंदर रखे डिब्बों से सोनेचांदी के सारे गहने गायब थे. 2 लाख रुपए रकद रखे थे, वे भी नहीं थे. मुकेश ने हिसाब लगाया तो पता चला कि साढ़े 3 किलोग्राम सोने और 5 किलोग्राम चांदी के गहने और करीब 2 लाख रुपए नकद गायब थे.

दिनदहाड़े ज्वैलरी के शोरूम में छत में सेंध लगा कर करीब सवा करोड़ रुपए के गहने और नकदी पार कर दी गई थी. चोरों ने यह सेंध ड्रिल मशीन से लगाई थी. उन्होंने गहने और नकदी तो उड़ाई ही, शोरूम में लगे सीसीटीवी कैमरे भी उखाड़ ले गए थे.

मुकेश ने वारदात की सूचना थाना मदुरहोल पुलिस को दी. पुलिस ने घटनास्थल पर आ कर जांच की. जांच में पता चला कि शोरूम की छत पर बने कमरे से ड्रिल मशीन द्वारा छेद किया गया था.

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शोरूम के ऊपर बने कमरे में कपड़े की दुकान थी. वह दुकान नाथूराम जाट ने किराए पर ले रखी थी. वह भी राजस्थान के जिला पाली के गांव रामावास का रहने वाला था. उसी के साथ दिनेश और दीपाराम भी रहते थे. दिनेश थाना बिलाड़ा का रहने वाला था तो दीपाराम पाली के खारिया नींव का रहने वाला था. ये तीनों पुलिस को कमरे पर नहीं मिले. पुलिस ने शोरूम के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली तो पता चला कि मुकेश के ज्वैलरी शोरूम में नाथूराम और उस के साथियों ने ही लूट की थी.

लूट के 2 दिनों बाद चेन्नै पुलिस ने शोरूम के मालिक मुकेश जैन को साथ ले कर अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए राजस्थान के जिला पाली आ कर डेरा डाल दिया. पुलिस ने पूछताछ के लिए कुछ लोगों को पकड़ा भी, लेकिन नाथूराम जाट और उस के साथियों के बारे में कुछ पता नहीं चला तो चेन्नै पुलिस लौट गई.

11 दिसंबर, 2017 को एक बार फिर चेन्नै पुलिस पाली आई. इस टीम में इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन और इंसपेक्टर टी.एम. मुनिशेखर के अलावा 2 हैडकांस्टेबल अंबरोस व गुरुमूर्ति और एक कांस्टेबल सुदर्शन शामिल थे. यह टीम पाली के एसपी दीपक भार्गव से मिली तो उन्होंने टीम की हर तरह से मदद मरने का आश्वासन दिया. उन्होंने कहा कि जब भी उन्हें काररवाई करनी हो, बता दें. स्थानीय पुलिस हर तरह से उन की मदद करेगी.

इस के बाद चेन्नै से आई पुलिस अपने हिसाब से आरोपियों की तलाश करती रही. पुलिस ने नाथूराम के 2 नजदीकी लोगों को हिरासत में ले कर उन से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि नाथूराम पाली में जैतारण-रामवास मार्ग पर करोलिया गांव में खारिया नींव के रहने वाले दीपाराम जाट के बंद पड़े चूने के भट्ठे पर मिल सकता है.

इस सूचना पर चेन्नै पुलिस ने पाली पुलिस को बिना बताए 12 दिसंबर की रात करीब ढाई-तीन बजे करोलिया गांव स्थित दीपाराम के चूने के भट्ठे पर बिना वर्दी के छापा मारा. पुलिस की यह टीम सरकारी गाड़ी के बजाय किराए की टवेरा कार से गई थी.

टीम की अगुवाई कर रहे इंसपेक्टर पेरियापांडियन और इंसपेक्टर मुनिशेखर के पास सरकारी रिवौल्वर थी. पुलिस टीम के पहुंचते ही भट्ठे पर बने एक कमरे में सो रहे लोग जाग गए. उस समय वहां 3 पुरुष, 6 महिलाएं और कुछ लड़कियां थीं. उन सब ने मिल कर लाठीडंडों से पुलिस पर हमला बोल दिया.

पुलिस घबरा गई और हमलावरों का मुकाबला करने के बजाय वहां से भागने लगी. इसी बीच लोहे के गेट पर चढ़ रहे इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन को गोली लग गई, जिस से वह वहीं गिर गए. जबकि उन के साथी भाग गए थे. मौका पा कर हमला करने वाले सभी लोग वहां से भाग निकले. इस हमले में टीम के कुछ अन्य लोग भी घायल हो गए थे.

थोड़ी दूर जा कर जब पुलिस टीम को पता चला कि टी.वी. पेरियापांडियन साथ नहीं हैं तो सभी वापस लौटे. भट्ठे पर जा कर देखा तो टी.वी. पेरियापांडियन घायल पड़े थे.

उन्हें जैतारण के अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. अभी तक स्थानीय पुलिस को इस घटना की कोई जानकारी नहीं थी. स्थानीय पुलिस को जैतारण अस्पताल प्रशासन से इस घटना की जानकारी मिली. इस घटना की जानकारी एसपी दीपक भार्गव को भी मिल गई.

सूचना पा कर सारे पुलिस अधिकारी अस्पताल पहुंचे और चेन्नै पुलिस से घटना के बारे में पूछताछ की. पता चला कि छापा मारने के दौरान नाथूराम ने अपने 8-10 साथियों के साथ उन पर हमला किया था. इस हमले में इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन उन के बीच फंस गए थे. इन्होंने उन की सरकारी पिस्टल छीन ली और उसी से उन्हें गोली मार दी, जिस से उन की मौत हो गई.

पाली के पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो चेन्नै से आई पुलिस ने उन्हें जो कुछ बताया, वह उन के गले नहीं उतरा. फिर भी थाना जैतारण में चेन्नै पुलिस की ओर से नाथूराम जाट, दीपाराम जाट और दिनेश चौधरी व अन्य लोगों के खिलाफ हत्या, जानलेवा हमला करने और सरकारी काम में बाधा डालने का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पाली पुलिस को घटनास्थल पर गोली का एक खोखा मिला था, जो पुलिस की पिस्टल का था. एफएसएल टीम ने भी घटनास्थल पर जा कर जरूरी साक्ष्य जुटाए. पुलिस के लिए जांच का विषय यह था कि गोली किस ने और कितनी दूरी से चलाई. वह गोली एक्सीडेंटल चली थी या डिफेंस में चलाई गई थी. जैतारण पुलिस ने हमलावरों में से कुछ को पकड़ लिया, लेकिन नाथूराम नहीं पकड़ा जा सका था. पुलिस उस की तलाश में सरगर्मी से जुटी थी.

जोधपुर के मथुरादास माथुर अस्पताल में इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन की लाश का पोस्टमार्टम मैडिकल बोर्ड द्वारा कराया गया. इस के बाद 14 दिसंबर को हवाई जहाज द्वारा उन के शव को चेन्नै भेज दिया गया. चेन्नै में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीसामी, उपमुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम, डीजीपी टी.के. राजेंद्रन, पुलिस कमिश्नर ए.के. विश्वनाथन और विपक्ष के नेता एम.के. स्टालिन सहित तमाम राजनेताओं और पुलिस अफसरों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.

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इस मौके पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीसामी ने दिवंगत इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन के घर वालों को 1 करोड़ रुपए की राशि बतौर मुआवजा और घायल पुलिसकर्मियों को एकएक लाख रुपए देने की घोषणा की. इस के बाद टी.वी. पेरियापांडियन के शव को उन के पैतृक गांव जिला तिरुनलवेली के मुवेराथली ले जाया गया, जहां राजकीय सम्मान के साथ उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

14 दिसंबर को चेन्नै पुलिस के जौइंट पुलिस कमिश्नर संतोष कुमार जैतारण पहुंचे और डीएसपी वीरेंद्र सिंह तथा चेन्नै के पुलिस इंसपेक्टर मुनिशेखर से घटना के बारे में जानकारी ली. घटनास्थल का भी निरीक्षण किया गया. इस के बाद एसपी दीपक भार्गव ने भी पाली जा कर घटना के बारे में तथ्यात्मक जानकारी ली और आरोपियों की गिरफ्तारी और लूटी गई ज्वैलरी की बरामदगी के बारे में चर्चा की.

इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन की मौत की जांच के लिए पाली पुलिस के बुलाने पर जयपुर से पहुंचे बैलेस्टिक एक्सपर्ट ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. उन्होंने चेन्नै पुलिस के दोनों इंसपेक्टरों की पिस्टल, घटनास्थल तथा लाश के फोटोग्राफ और वीडियो फुटेज आदि राज्य विधिविज्ञान प्रयोगशाला जयपुर पर मंगवाए.

गोली की बरामदगी के लिए पाली पुलिस ने मेटल डिटेक्टर से घटनास्थल के आसपास जांच कराई, लेकिन गोली नहीं मिली. जबकि मृतक इंसपेक्टर की लाश में भी गोली नहीं मिली थी.

इस बीच 14 दिसंबर, 2017 को जोधपुर के थाना रातानाड़ा की पुलिस ने चेन्नै के महालक्ष्मी ज्वैलर्स के शोरूम में हुई सवा करोड़ रुपए के गहनों की लूट के मुख्य आरोपी नाथूराम के साथी जोधपुर के बिलाड़ा निवासी दिनेश जाट को गिरफ्तार कर लिया था. दिनेश जाट बिलाड़ा थाने का हिस्ट्रीशीटर था. उस के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज थे. पुलिस ने उस की गिरफ्तारी के लिए स्टैंडिंग वारंट भी जारी कर रखा था.

15 दिसंबर को जोधपुर रेंज के आईजी हवा सिंह घुमारिया भी जैतारण पहुंचे और घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस बीच पाली पुलिस ने घटनास्थल पर जा कर मृतक इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन की मौत का क्राइम सीन दोहराया.

चेन्नै एवं राजस्थान के पुलिस अधिकारियों और एफएसएल विशेषज्ञों की उपस्थिति में दोहराए गए क्राइम सीन में सामने आया कि जब टी.वी. पेरियापांडियन ने लोहे के गेट पर चढ़ कर भागने की कोशिश की थी, तब पहले गेट से बाहर निकल चुके चेन्नै पुलिस के इंसपेक्टर मुनिशेखर की पिस्टल से एक्सीडेंटल गोली चल गई थी. इसी गोली से पेरियापांडियन की मौत हुई थी.

चेन्नै पुलिस के इंसपेक्टर की मौत का सच सामने आने के बाद थाना जैतारण पुलिस ने 15 दिसंबर को हमलावर तेजाराम जाट, उस की पत्नी विद्या देवी और बेटी सुगना को गिरफ्तार कर लिया.

लेकिन उन्हें हत्या का आरोपी न बना कर भादंवि की धारा 307, 331 व 353 के तहत गिरफ्तार किया गया था. चूना भट्ठे के उस कमरे में तेजाराम का परिवार रहता था.

हमलावर तेजाराम और चेन्नै पुलिस टीम से की गई पूछताछ में पता चला कि 12 दिसंबर की रात चेन्नै पुलिस ने जब चूना भट्ठे पर छापा मारा था, तब दोनों इंसपेक्टरों ने अपनी पिस्टल लोड कर रखी थीं.

पुलिस टीम जैसे ही अंदर हाल के पास पहुंची, पदचाप सुन कर तेजाराम जाग गया. पुलिस वालों को चोर समझ कर वह चिल्लाया तो हाल में सो रही उस की पत्नी, बेटियां व अन्य लोग जाग गए और उन्होंने लाठियों से पुलिस पर हमला कर दिया.

उस समय नाथूराम भी वहां मौजूद था. वह समझ गया कि ये चोर नहीं, चेन्नै पुलिस है, इसलिए वह भागने की युक्ति सोचने लगा. अचानक हुए हमले से घबराई चेन्नै पुलिस भागने लगी. इंसपेक्टर मुनिशेखर और अन्य पुलिस वाले तो दीवार फांद कर बाहर निकल गए.

टी.वी. पेरियापांडियन दीवार फांदने के बजाय जब लोहे के गेट पर चढ़ कर कूदने का प्रयास कर रहे थे, तब गेट के बाहर खड़े इंसपेक्टर मुनिशेखर अपनी पिस्टल को अनलौक कर रहे थे कि अचानक एक्सीडेंटल गोली चल गई, जो टी.वी. पेरियापांडियन को लगी. वह गेट से गिर गए और उन की मौत हो गई. इसी बीच मौका पा कर नाथूराम फरार हो गया था.

दरअसल, चेन्नै पुलिस को अनुमान नहीं था कि वहां 9-10 लोग होंगे. उस का मानना था कि नाथूराम 1-2 लोगों के साथ छिपा होगा. चेन्नै के थाना मदुरहोल थाने के इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन दबंग और बहादुर पुलिस अफसर थे.  यह दुर्भाग्य ही था कि उन की मौत अपने ही साथी की गोली से हो गई.

पाली के एसपी दीपक भार्गव के अनुसार, चेन्नै पुलिस के इंसपेक्टर मुनिशेखर को चार्जशीट में भादंवि की धारा 304ए का आरोपी बनाया जाएगा. तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट चेन्नै पुलिस को भेजी जाएगी. चेन्नै पुलिस इंसपेक्टर मुनिशेखर पर विभागीय काररवाई करेगी.

17 दिसंबर को पुलिस ने चेन्नै में हुई ज्वैलरी लूट की वारदात के मुख्य आरोपी नाथूराम जाट की पत्नी मंजू देवी को गिरफ्तार कर लिया था. वह जोधपुर के पीपाड़ शहर के पास मालावास गांव में अपने धर्मभाई के घर छिपी हुई थी. मंजू को चेन्नै से आई पुलिस टीम पर हमले के आरोप में पकड़ा गया था.

कथा लिखे जाने तक नाथूराम और अन्य आरोपियों को पकड़ने के लिए पुलिस लगातार छापे मार रही थी. नाथूराम के खिलाफ पाली के थाना जैतारण में मारपीट के 4 और जोधपुर के थाना बिलाड़ा में एक मुकदमा पहले से दर्ज है. वह कई सालों से अपने गांव में नहीं रहा था. वह चेन्नै बेंगलुरु आदि शहरों में रहता था.

नाथूराम और दीपाराम के पकड़े जाने के बाद चेन्नै में महालक्ष्मी ज्वैलर्स के शोरूम में हुई सवा करोड़ रुपए के गहनों की लूट का मामला भले ही सुलझ जाए, लेकिन चेन्नै पुलिस के लिए माल की बरामदगी चुनौती रहेगी. जोधपुर में गिरफ्तार चोरी के आरोपी दिनेश जाट को चेन्नै पुलिस प्रोडक्शन वारंट पर चेन्नै ले गई.

इसी तरह 29 अगस्त, 2017 को विशाखापट्टनम में एक ज्वैलर से 3 किलोग्राम सोना लूट लिया गया था. लूट की इस वारदात में ज्वैलर के पास काम करने वाला राकेश प्रजापत शामिल था.

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वह राजस्थान के जिला पाली के रोहिट के पास धींगाणा का रहने वाला था. लूट के बाद वह पाली आ गया था. यहां बाड़मेर रोड पर होटल चलाने वाले हनुमान प्रजापत से उस की पुरानी जानपहचान थी. हनुमान के मार्फत राकेश ने लूट का सारा सोना श्रवण सोनी को बेच दिया.

मामले की जांच करते हुए आंध्र प्रदेश पुलिस जोधपुर पहुंची और 3 नवंबर को झालामंड मीरानगर निवासी रामनिवास जाट को गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद जोधपुर जिले के थाना बोरानाड़ा के गांव खारडा भांडू के रहने वाले ज्वैलर श्रवण सोनी को पकड़ा गया.

श्रवण सोनी को ले जाने पर उस के घर वालों ने थाना बोरानाड़ा में उस के अपरहण का मामला दर्ज करा दिया था. बोरानाड़ा पुलिस ने जांचपड़ताल की तो श्रवण सोनी के आंध्र प्रदेश पुलिस की कस्टडी में होने की बात पता चली.

आंध्र प्रदेश पुलिस ने रामनिवास, श्रवण सोनी, हनुमान प्रजापत और राकेश प्रजापत को हिरासत में ले कर सोना बरामद कर लिया था. लेकिन कागजों में न तो उन्हें गिरफ्तार दिखाया गया था और न ही सोने की बरामदगी दिखाई गई थी, जबकि राकेश प्रजापत को बाकायदा हथकड़ी लगा कर रखा गया था. लेकिन उसे गिरफ्तार नहीं दिखाया गया था.

आंध्र प्रदेश की पुलिस टीम द्वारा रामनिवास को लूट के मामले में आरोपी न बनाने और उस की कार जब्त न करने के लिए डेढ़ लाख रुपए मांगे गए थे, साथ ही मौजमस्ती के लिए लड़कियों का इंतजाम करने को भी कहा गया था. पुलिस टीम का कहना था कि उस ने यह कार विशाखापट्टनम से लूटे गए 3 किलोग्राम सोने को बेच कर खरीदी थी.

आंध्र प्रदेश पुलिस ने 5 नवंबर को रामनिवास और श्रवण सोनी को कुछ शर्तों पर छोड़ दिया था और श्रवण सोनी से 6 नवंबर को 2 लाख रुपए लाने को कहा था. इस से पहले आंध्र प्रदेश पुलिस ने रामनिवास के एटीएम से 20 हजार रुपए निकलवा कर रख लिए थे.

छूटते ही रामनिवास सीधे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के कार्यालय पहुंचा और आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा रिश्वत मांगने की शिकायत कर दी. एसीबी ने 80 हजार रुपए दे कर रामनिवास को आंध्र प्रदेश पुलिस के पास भेज कर शिकायत की पुष्टि की. इस के बाद 6 नवंबर को विशाखापट्टनम, आंध्र प्रदेश से आई 4 लोगों की पुलिस टीम को 80 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथों गिरफ्तार कर लिया गया.

इन में विशाखापट्टनम जिले की क्राइम ब्रांच के सबडिवीजन नौर्थ के इसंपेक्टर आर.वी.आर.के. चौधरी, विशाखापट्टनम के थाना परवाड़ा के एसआई एस.के. शरीफ, थाना एम.आर. पेटा के एसआई गोपाल राव और थाना वनटाउन के कांस्टेबल एस. हरिप्रसाद शामिल थे. ये चारों जोधपुर में बाड़मेर रोड पर बोरानाड़ा स्थित एक होटल में रुके हुए थे.

गिरफ्तारी के अगले दिन 7 नवंबर को चारों लोगों को अदालत में पेश किया गया, जहां से अदालत के आदेश पर सभी को जेल भेज दिया गया. पूरी टीम के गिरफ्तार होने की सूचना मिलने पर 3 किलोग्राम सोने की लूट के मामले की जांच के लिए विशाखापट्टनम से दूसरी टीम भेजी गई. यह टीम 7 नवंबर को जोधपुर पहुंची. इस टीम ने सोने की लूट के सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

मदद के नाम पर देह धंधा

उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी की रहने वाली सुनीता की मां अकसर बीमार रहती थी. उसे लगता था कि अगर कहीं उस की नौकरी लग जाती तो वह अपनी मां का ठीक से इलाज करा लेती. उस के पिता की मौत हो चुकी थी.

एक छोटा भाई जरूर था, लेकिन वह अभी पढ़ रहा था. एक दिन उस के फोन पर एक मिसकाल आई. उस ने पलट कर फोन किया तो पता चला वह नंबर लखनऊ की रहने वाली सोनी का था.

इस के बाद सोनी और सुनीता में बातचीत होने लगी. बाचतीत में एक दिन सुनीता ने सोनी से अपनी परेशानी कह सुनाई. सोनी बातचीत में काफी माहिर थी. मीठीमीठी बातें कर के उस ने सुनीता से दोस्ती गांठ ली. फोन के साथसाथ दोनों वाट्सऐप पर भी एकदूसरे को मैसेज करने लगी थीं.

सुनीता काफी सुंदर थी. उस की सुंदरता ने सोनी का मन मोह लिया. इसी वजह से सोनी के मन में लालच आ गया. उसे लगा कि अगर सुनीता उस के पास आ जाए तो उस का काम बन जाए.

सुनीता वाराणसी के लंका स्थित अपने घर में मां के साथ रहती थी. संयोग से एक दिन उस ने खुद ही सोनी को मौका दे दिया. उस ने कहा, ‘‘सोनी, मेरी मां की तबीयत खराब रहती है. उन का इलाज कराना है, घर में कोई मदद करने वाला नहीं है. मैं क्या करूं, कुछ समझ नहीं पा रही हूं. कोई नौकरी भी नहीं मिल रही है.’’

‘‘अगर तुम लखनऊ में होती तो मैं तुम्हारी मदद कर देती. यहां मैं कोई नौकरी दिला देती, जिस से तुम्हें आराम से 10 से 15 हजार रुपए महीना वेतन मिल जाता. अगर तुम बढि़या काम करती तो जल्दी ही तुम्हारा वेतन दोगुना हो जाता.’’ जवाब में सोनी ने सुनीता को समझाते हुए कहा.

‘‘अभी तो मैं मां को ले कर लखनऊ आ नहीं सकती. अगर नौकरी मिल जाए और महीने, 2 महीने में कुछ पैसे मिल जाएं तो मैं मां को ला कर वहीं रहने लगती.’’ सोनी की बात सुन कर सुनीता ने कहा.

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सुनीता की बातों से सोनी को लगा कि वह लखनऊ आ सकती है. उसे आकर्षित करने के लिए सोनी ने कहा, ‘‘सुनीता, तुम यहां आ जाओ और हम लोगों के साथ रह कर काम को देखसमझ लो. अगर काम पसंद आ जाए तो मां को ले आना. यहां रहने की कोई कमी नहीं है. मैं अपनी सहेली सुमन के साथ रहती हूं. हम से मिल कर तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा.’’

सुनीता जरूरतमंद थी ही, इसलिए उसे लगा कि एक बार लखनऊ जा कर सोनी से मिलने में कोई बुराई नहीं है. लखनऊ कोई बहुत दूर तो है नहीं, क्यों न एक बार जा कर उस के काम को देखसमझ ले. अगर काम अच्छा लगा तो करेगी, वरना वाराणसी लौट आएगी.

सोनी से हुई बातचीत के करीब 10 दिनों बाद सुनीता वाराणसी पैसेंजर ट्रेन से लखनऊ के लिए निकल पड़ी. सुमन और सोनी को उस ने अपने आने की बात पहले ही बता दी थी, इसलिए दोनों उसे लेने के लिए चारबाग रेलवे स्टेशन पहुंच गई थीं.

सोनी और सुमन से मिलने के बाद सुनीता ने कहा, ‘‘यार ट्रेन काफी लेट हो गई, जिस से यहां पहुंचने में काफी देर हो गई. चलो, पहले वहां चलते हैं, जहां नौकरी की बात करनी है. उस के बाद बैठ कर आराम से आपस में बातें करेंगे. अगर नौकरी पसंद आई तो रुक जाऊंगी, वरना रात की ट्रेन से वापस लौट जाऊंगी. तुम दोनों को नाहक परेशान नहीं होना पड़ेगा.’’

‘‘सुनीता, तुम जंगल में नहीं आई हो. हम दोनों तुम्हारे साथ हैं. आज तो देर हो गई है. औफिस बंद हो गया होगा. कल वहां चल कर बात कर लेंगे. अभी तुम हमारे साथ मेरे कमरे पर चलो. आज हम तीनों पार्टी कर के खूब एंजौय करेंगे.’’ सोनी ने कहा.

सुनीता को बहुत दिनों बाद घर से बाहर निकल कर तनावरहित कुछ समय गुजारने का मौका मिला था. सुमन और सोनी से मिल कर वह काफी खुश थी. दोनों उसे बहुत अच्छी लगी थीं. तीनों एक कार में बैठ कर लखनऊ के तेलीबाग स्थित सोनी के घर पहुंच गईं.

घर में सिर्फ सोनी का पति तौहीद था. वह देखने में काफी सीधासादा था. तीनों के घर पहुंचते ही वह घर से चला गया. उस समय शाम के करीब 6 बज रहे थे.

ठंडी का मौसम था. सुनीता का स्वागत चायपकौड़ों से किया गया. तीनों आपस में चाय पीते हुए बातें करने लगीं. चाय खत्म हुई तो सोनी ने कहा, ‘‘सुनीता, मैं तुम्हें कपड़े देती हूं. तुम फ्रैश हो कर कपड़े बदल लो.’’

‘‘सुनीता, सोनी के कपड़े तुम्हें एकदम फिट आएंगे. यह बहुत ही सैक्सी लुक वाले कपड़े पहनती है. उन्हें पहन कर तो तुम कयामत लगोगी.’’ सुमन ने कहा.

इस बीच सोनी कपड़े ले आई. न चाहते हुए भी सुनीता को सोनी की ड्रैस पहननी पड़ी. कपड़े पहन कर उस ने खुद को देखा तो सचमुच ही वह अलग दिख रही थी. वह खुश हो गई. बातें करतेकरते एकदूसरे के फोटो खींचे जाने लगे.

सोनी ने सुनीता के मौडलिंग वाले फोटो खींचतेखींचते बिना कपड़ों के भी फोटो खींचे. उस समय सुनीता की समझ में कुछ नहीं आया. वह सोच रही थी कि यह लड़कियों की दोस्ती है.

थोड़ी देर बाद सुमन अपने घर चली गई. अब सोनी और सुनीता ही रह गईं. रात में सोनी का पति तौहीद आया तो खाना खा कर सोनी अपने पति के साथ सोने चली गई. सुनीता भी अलग कमरे में सो गई. उसे नींद आने लगी थी, तभी उस के कमरे का दरवाजा खुला. सोनी एक आदमी के साथ उस के कमरे में आई.

सोनी उस आदमी को वहीं छोड़ कर बाहर निकल गई और बाहर से दरवाजा बंद कर दिया. अब कमरे में सुनीता और वह आदमी ही रह गए. सोनी के जाते ही उस ने कहा, ‘‘सुनीता, आज की रात के लिए सोनी ने तुम्हारा 6 हजार रुपए में सौदा किया है.’’

उस आदमी की बात सुन कर सुनीता के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस की आंखों के सामने लखनऊ से ले कर वाराणसी तक की दोस्ती, बातचीत और आवभगत की तसवीर घूमने लगी. सुनीता समझ गई कि वह फंस चुकी है. उस आदमी ने सुनीता को उस के वे निर्वस्त्र फोटो दिखाए, जो कुछ देर पहले ही सोनी और सुमन ने मजाकमजाक में खींचे थे. उस ने कहा, ‘‘अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो ये तुम्हारी इन तसवीरों को सार्वजनिक कर देंगी. तब लोग तुम्हें ही गलत समझेंगे.’’

सुनीता के सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं था. उसे पूरी रात उस आदमी की दरिंदगी का सामना करने को मजबूर होना पड़ा. सवेरा होते ही वह आदमी चला गया. उस के जाने के बाद सोनी कमरे में आई. सुनीता ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई.

सोनी चुपचाप सब सुनती रही. इस के बाद उस ने सुनीता को एक हजार रुपए देते हुए कहा, ‘‘सुनीता, आज से यही तुम्हारी नौकरी है. तुम्हारा खानापीना, कपड़े और मैकअप का सारा खर्च हम उठाएंगे. रहने के लिए हमारा घर है ही. इस सब के अलावा तुम्हें हर रात के एक हजार मिलेंगे. तुम 8-10 हजार रुपए की बात कर रही थी, मैं तुम्हें 20 से 25 हजार रुपए देने की बात कर रही हूं. अब तुम देख लो कि तुम्हें बदनाम होना है या मैं जो कह रही हूं, वह करना है.’’

चंगुल में फंस चुकी सुनीता को बचाव का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था. उसे लगा कि अगर उस ने लड़ाईझगड़ा किया तो वे उस के साथ और ज्यादा बुरा कर सकते हैं. इसलिए वह मजबूर हो गई. फिर उस के साथ यह सिलसिला सा चल निकला.

पहले रात को ही कोई आदमी आता था. कुछ दिनों बाद दिन में भी उस के पास ग्राहक आने लगे. सुनीता कुछ कहती तो सुमन, सोनी और दोनों के पति तौहीद और सुरजीत कहते, ‘‘सुनीता जाड़े के दिनों में कमाई ज्यादा होती है. अभी कमा कर रुपए जमा कर लो, गरमी में ग्राहक कम होंगे तो ये काम आएंगे.’’

कुछ ही दिनों में सुनीता को यह काम बोझ लगने लगा. 10 दिन साथ रहने के बाद उन लोगों को सुनीता पर भरोसा हो गया. वे उसे ग्राहकों के साथ बाहर भी भेजने लगे. सुनीता को बाहर जाना होता तो तौहीद और सुरजीत उसे पहुंचाने जाते. सवेरा होने पर वे जा कर उसे ले आते. इस तरह वह दिन में अलग और रात को अलग ग्राहकों को खुश करने लगी.

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एक दिन सोनी ने सुनीता से कहा, ‘‘सुनीता, मैं तुम्हें अपनी सहेली के यहां भेज रही हूं. तुम वहां जा कर काम करो. हम लोग एक जगह इस तरह का काम नहीं कर सकते. एक जगह ऐसा काम करने में पकड़े जाने का खतरा रहता है.’’

सोनी ने सुनीता को अपनी सहेली शोभा के यहां भेज दिया. शोभा जानकीपुरम में रहती थी. वहां सुनीता के साथ और ज्यादा बुरा सलूक होने लगा. शोभा के यहां दिन में 2 और रात में 2 ग्राहक उस के पास आने लगे. ज्यादा कमाई के चक्कर में शोभा ने ग्राहकों की संख्या बढ़ा दी थी. क्योंकि उसे पता था कि सुनीता एक सप्ताह के लिए ही उस के पास आई है.

वह लालच में फंस गई. ज्यादा काम करने से सुनीता की तबीयत खराब हो गई. इस के बाद भी शोभा ने उस के पास ग्राहकों को भेजना जारी रखा. एक दिन सवेरे सुनीता को भागने का मौका मिल गया.

बिना किसी बात की परवाह किए सुनीता सवेरे 4 बजे घर से भाग निकली. घर से बाहर आते ही उसे मौर्निंग वाक कर जाने वाले प्रदीप मिल गए. उन की मदद से वह थाना जानकीपुरम पहुंची, जहां उस की मुलाकात इंसपेक्टर अमरनाथ वर्मा से हुई. उन्होंने सुनीता को आराम से बैठाया और उस की पूरी बात ध्यान से सुनी.

इस के बाद उन्होंने महिला सिपाही कोमल और ज्योति के जरिए पूरी जानकारी प्राप्त की. सुनीता से पता चला कि उस की तरह तमाम लड़कियां इस जाल में फंसी हुई हैं. वाट्सऐप के जरिए लड़कियों के फोटो भेज कर उन का सौदा किया जाता है.

सौदा तय होने के बाद वे लड़कियों को ग्राहकों तक पहुंचाते थे. लड़की को ग्राहक के पास पहुंचा कर वे पैसा ले लेते थे. अगले दिन सुबह जा कर लड़की को ले आते थे.

सीओ अलीगंज डा. मीनाक्षी ने मामले की जांच कराई. इसी के साथ शोभा, मणिशंकर, सुरजीत, तौहीद, सुमन और सोनी के खिलाफ देहव्यापार कराने का मुकदमा दर्ज किया गया. पुलिस ने सुरजीत, तौहीद, सुमन और सोनी को तो गिरफ्तार कर लिया, लेकिन शोभा और मणिशंकर फरार होने में कामयाब रहे.

दरअसल, सुनीता के भागने का पता चलते ही वे भी घर छोड़ कर भाग गए थे. जांच में पता चला कि सुमन और सोनी मीठीमीठी बातें कर के लड़कियों को जाल में फंसाती थीं. इस के लिए वे कई बार रेलवे स्टेशन या बसअड्डे पर भी जाती थीं. इन का निशाना ऐसी लड़कियां होती थीं, जो नौकरी की तलाश में रहती थीं.

सुमन और सोनी महिलाएं थीं, इसलिए लड़कियां उन पर भरोसा कर लेती थीं. दोनों लड़कियों का भरोसा जीतने के लिए उन्हें अपने घर ठहराती थीं. वहां हंसीमजाक के दौरान उन की अश्लील फोटो खींच लेती थीं. इस के बाद उन्हीं फोटो की बदौलत वे उन्हें ब्लैकमेल कर के देहव्यापार में उतार देती थीं.

ये लड़की को बताते थे कि उन का ग्राहक बहुत बड़ा आदमी है. वह नौकरी दिलाएगा. इस के बाद बुकिंग और सप्लाई का धंधा शुरू हो जाता था. लड़की का पूरा खर्च यही लोग उठाते थे. ग्राहक के हिसाब से लड़की को हजार, 5 सौ रुपए दिए जाते थे.

ग्राहकों को लुभाने के लिए लड़कियों को आकर्षक कपड़े पहनने को दिए जाते थे, बढि़या मेकअप किया जाता था. जिस से ग्राहक मोटा पैसा दे सके. हर लड़की के एक रात के लिए 6 से 8 हजार रुपए लिए जाते थे.

कई बार ज्यादा कमाई के लिए ग्राहकों की संख्या बढ़ा दी जाती थी. बाद में यही लड़कियां दूसरी जरूरतमंद लड़कियों को यहां ले आती थीं. पुलिस ने सुनीता को उस के घर भेज कर बाकी आरोपियों को जेल भेज दिया है.

सुनीता का कहना है, ‘‘मुझे जरा भी अहसास नहीं हुआ कि मैं एक ऐसे जाल में फंसने जा रही हूं, जिस से मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. मैं ने उन लोगों का क्या बिगाड़ा था, जो उन्होंने मेरा भविष्य खराब कर दिया. मैं ने तो मदद मांगी थी, उन लोगों ने मदद के बहाने मुझे देह के बाजार में धकेल दिया.’’

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित तथा सुनीता परिवर्तित नाम है

आंसू छलक आए

‘‘देखो विनोद, अगर तुम कल्पना से शादी करना चाहते हो, तो पहले तुम्हें अपने पिता से रजामंदी लेनी पड़गी…’’ प्रेमशंकर ने समझाते हुए कहा, ‘‘शादी में उन की रजामंदी होना बहुत जरूरी है.’’

‘‘मगर अंकल, वे इस की इजाजत नहीं देंगे,’’ विनोद ने इनकार करते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं देंगे इजाजत?’’ प्रेमशंकर ने सवाल पूछा, ‘‘क्या तुम उन्हें समझाओगे नहीं?’’

‘‘मैं अपने पिता की आदतों को अच्छी तरह से जानता हूं. वे कभी नहीं समझेंगे और हमारी इस शादी के लिए इजाजत भी नहीं देंगे…’’ एक बार फिर इनकार करते हुए विनोद बोला, ‘‘आप उन्हें समझा दें, तो अच्छा रहेगा.’’

‘‘मेरे समझाने से क्या वे मान जाएंगे?’’ प्रेमशंकर ने पूछा.

‘‘हां अंकल, वे मान जाएंगे,’’ यह कह कर विनोद ने गेंद उन के पाले में फेंक दी.

विनोद प्रेमशंकर के मकान में किराएदार था. उसे अभी बैंक में लगे 2 साल हुए थे. इन 2 सालों में विनोद ने किराए के मामले में उन्हें कभी दिक्कत नहीं पहुंचाई थी. एक तरह से उन के घरेलू संबंध हो गए थे.

विनोद के बैंक में ही कल्पना काम करती थी. उसे भी बैंक में लगे तकरीबन 2 साल हुए थे. उम्र में वे दोनों बराबर के थे. दोनों कुंआरे थे. दोनों में कब प्यार पनपा, पता ही नहीं चला.

वे एकदूसरे के कमरे में घंटों बैठे रहते थे. दोनों ही तकरीबन 2 हजार किलोमीटर दूर से इस शहर में नौकरी करने आए थे.

कभीकभी कल्पना की मां जरूर उस के पास रहने आ जाती थीं. तब कल्पना मां से कोई बहाना कर के विनोद के कमरे में आती थी. प्रेमशंकर यह सब जानते थे.

जब कल्पना घंटों विनोद के कमरे में बैठी रहती, तब प्रेमशंकर को लगा कि उन दोनों में प्यार की खिचड़ी पक रही है.

एक दिन मौका देख कर उन्होंने विनोद से खुल कर बात की. नतीजा यही निकला कि विनोद के पिता इस शादी के लिए कभी राजी नहीं होंगे, क्योंकि वह ऊंची जाति का था, जबकि कल्पना निचली जाति की थी.

प्रेमशंकर बोले, ‘‘ठीक है विनोद, अगर तुम कल्पना से शादी करना चाहते हो, तो तुम्हें अपने मातापिता को भरोसे में लेना होगा.’’

मगर विनोद इनकार करते हुए बोला, ‘‘अंकल, वे इस शादी के लिए कभी इजाजत नहीं देंगे.’’

तब प्रेमशंकर ने कहा था, ‘‘आखिर वे भी तो इनसान हैं, कोई जानवर नहीं. तुम उन्हें बुलाओ. अगर वे नहीं आएंगे, तो मैं चलूंगा तुम्हारे साथ उन को समझाने…’’

इस तरह प्रेमशंकर बिचौलिया बनने को राजी हो गए.

विनोद के बुलाने पर पिता अरुण आ गए. साथ में उन की पत्नी मनोरमा भी थीं. प्रेमशंकर ने उन्हें अपने घर में इज्जत से बिठाया.

अरुण बोले, ‘‘बताइए प्रेमशंकर साहब, हमें किसलिए बुलाया है?’’

‘‘अरुण साहब, आप को खास वजह से ही यहां बुलाया है.’’

‘‘खास वजह… मैं समझा नहीं…’’ अरुण बोले, ‘‘जो कुछ कहना है, साफसाफ कहें.’’

‘‘ठीक है, पर इस के लिए आप को दिल थोड़ा मजबूत करना होगा.’’

‘‘मजबूत से मतलब?’’ अरुण ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘मतलब यह कि आप ने विनोद की शादी के बारे में क्या सोचा है?’’

‘‘उस के लिए मैं ने एक लड़की देख ली है प्रेमशंकरजी. अब विनोद की हां चाहिए और उस की हां के लिए मैं यहां आया हूं,’’ यह कह कर अरुण ने प्रेमशंकर को अजीब सी निगाह से देखा.

‘‘अगर मैं कहूं कि विनोद ने अपने लिए लड़की देख ली है, तो…’’

‘‘क्या कहा, विनोद ने अपने लिए लड़की देख ली है?’’

‘‘जी हां अरुण साहब, अब आप का क्या विचार है?’’

‘‘कौन है वह लड़की?’’ अरुण ने पूछा.

‘‘उस के साथ बैंक में ही काम करती है. उस का नाम कल्पना है. आप इस पर क्या कहना चाहते हैं?’’

‘‘मतलब, विनोद कल्पना से शादी करना चाहता है?’’

‘‘हां,’’ इतना कह कर प्रेमशंकर ने अरुण के दिल में हलचल पैदा कर दी.

‘‘वह किस जाति की है? क्या समाज है उस का?’’ अरुण जरा गुस्से से बोले.

‘‘वह निचली जाति की है,’’ प्रेमशंकर ने बिना किसी लागलपेट के कहा.

‘‘क्या कहा, वह एक दलित घर से है? मैं यह शादी कभी नहीं होने दूंगा…’’ अरुण ने गुस्से में साफ मना कर दिया, फिर आगे बोले, ‘‘अरे प्रेमशंकरजी, शादीब्याह अपनी ही बिरादरी में होते हैं.’’

‘‘हांहां, होते हैं अरुणजी, मगर आप जिस जमाने की बात कर रहे हैं, वह जमाना गुजर गया. यह 21वीं सदी है.’’

‘‘हां, मैं भी जानता हूं. मुझे समझाने की कोशिश न करें.’’

‘‘जब आप इतना जानते हैं, तब इस शादी के लिए मना क्यों कर रहे हैं?’’

‘‘मैं अपने बेटे की गैरबिरादरी में शादी करा कर बिरादरी पर दाग नहीं लगाना चाहता. मैं यह शादी हरगिज नहीं होने दूंगा.’’

प्रेमशंकर मुसकराते हुए बोले, ‘‘तो आप विनोद की शादी अपनी ही बिरादरी में करना चाहते हैं?’’

‘‘हां, क्या आप को शक है?’’

‘‘आप विनोद से तो पूछ लीजिए.’’

‘‘पूछना क्या है? वह मेरा बेटा है. मेरा कहना वह टाल नहीं सकता.’’

‘‘अपने बेटे पर इतना भरोसा है, तो पूछ लीजिए उस से कि वह आप की पसंद की लड़की से शादी करेगा या अपनी पसंद की लड़की से,’’ कह कर प्रेमशंकर ने भीतर की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘विनोद, यहां आ जाओ.’’

भीतर बैठे विनोद और कल्पना इसी इंतजार में थे. वे दोनों बाहर आ गए. अरुण कल्पना को देखते रह गए.

प्रेमशंकर बोले, ‘‘पूछ लो अपने बेटे से… यह वह कल्पना है, जिस से यह शादी करना चाहता है.’’

‘‘क्यों विनोद, यह मैं क्या सुन रहा हूं?’’ विनोद के पापा अरुण बोले.

‘‘जो कुछ सुन रहे हैं, सच सुन रहे हैं पापा,’’ विनोद ने कहा.

‘‘तुम इस कल्पना से शादी नहीं कर सकते,’’ अरुण ने कहा.

‘‘पापा, मैं शादी करूंगा, तो इस से ही,’’ विनोद बोला.

‘‘मैं तुम्हारी शादी इस लड़की से हरगिज नहीं होने दूंगा.’’

‘‘मैं शादी करूंगा, तो सिर्फ कल्पना से ही.’’

‘‘ऐसा क्या है, जो तुम इस की रट लगाए हुए हो?’’

‘‘कल्पना मेरा प्यार है.’’

‘‘प्यार… 2-4 मुलाकातों को तुम प्यार समझ बैठे हो?’’ चिल्ला कर अरुण बोले, ‘‘कान खोल कर सुन लो विनोद, तुम्हारी शादी वहीं होगी, जहां हम चाहेंगे.’’

‘‘पापा सच कर रहे हैं विनोद…’’ मां मनोरमा बीच में ही बात काटते हुए बोलीं, ‘‘यह लड़की हमारी जातबिरादरी की भी नहीं है. इस से शादी कर के हम समाज में अपनी नाक नहीं कटा सकते हैं, इसलिए इस के साथ शादी करने का इरादा छोड़ दे.’’

‘‘मां, मेरे इरादों को कोई बदल नहीं सकता है. शादी करूंगा तो कल्पना से ही, किसी दूसरी लड़की से नहीं.’’

अपना फैसला सुना कर विनोद कल्पना को ले कर घर से बाहर चला गया.

पलभर के सन्नाटे के बाद प्रेमशंकर बोले, ‘‘अब क्या सोचा है अरुण साहब? अब भी आप इस शादी से इनकार करते हैं?’’

‘‘यह सब आप लोगों की रची हुई साजिश है. आप ने ही मेरे बेटे को बरगलाया है, इसलिए आप उस का ही पक्ष ले रहे हैं,’’ कह कर अरुण ने अपनी बात पूरी की.

‘‘अरुण साहब सोचो, विनोद कोई दूध पीता बच्चा नहीं है…’’ प्रेमशंकर समझाते हुए बोले, ‘‘आप उसे डराधमका कर अपने वश में कर लेंगे, यह भी मुमकिन नहीं है. वह नौकरी करता है, अपने पैरों पर खड़ा है. वह अपना भलाबुरा समझता है.

‘‘वह मेरे यहां किराएदार बन कर जरूर रह रहा है, मगर मैं उस को पूरी तरह समझ चुका हूं कि वह समझदार है. वैसे, वह आप की भावनाओं को भी समझता है. मगर वह शादी करेगा, तो कल्पना से ही. इस के पहले मैं भी यह सब बातें उसे समझा चुका हूं, इसलिए आप उसे समझदार समझें.’’

‘‘क्या खाक समझदार है भाई साहब…’’ मनोरमा झल्ला कर बोलीं, ‘‘वह उस लड़की को अपने साथ ले गया है. कहीं वह गलत कदम न उठा ले. सुनो जी, उस की शादी वहीं करो, जहां हम चाहते हैं.’’

‘‘भाभीजी, विनोद ऐसावैसा लड़का नहीं है, जो गलत कदम उठा ले…’’ प्रेमशंकर समझाते हुए बोले, ‘‘अरुण साहब, अगर आप उस पर दबाव डाल कर शादी कर भी देंगे, तब वह बहू के साथ वैसा बरताव नहीं करेगा, जो आप चाहेंगे. दिनरात उन में कलह मचेगी और आपस में मनमुटाव होगा.

‘‘अगर आप उन की मरजी से शादी नहीं करोगे, तब वे कोर्ट में ही शादी कर सकते हैं, क्योंकि कोर्ट उन्हीं का पक्ष लेगा. इसलिए आप सोचिए मत. मेरा कहना मानिए, इन की शादी आप आगे रह कर करें और पिता की जिम्मेदारी से छुटकारा पा जाएं.’’

‘‘मगर इस शादी से समाज में हमारी कितनी किरकिरी होगी, यह आप ने सोचा है?’’ एक बार फिर अरुण अपनी बात रखते हुए बोले.

‘‘समाज तो दोनों हाथों में लड्डू रखता है. थोड़े दिनों तक समाज ताना दे कर चुप हो जाएगा. इस बात पर जितना विचार कर के गहराई में उतरेंगे, उतनी ही तकलीफ उठाएंगे.

‘‘आप अपनी हठ छोड़ दें. इस के बावजूद भी आप अपनी जिद पर अड़े हो, तो विनोद की शादी अपनी देखी लड़की से कर दो. मैं इस मामले में आप से कुछ नहीं बोलूंगा,’’ प्रेमशंकर के ये शब्द सुन कर अरुण के सारे गरम तेवर ठंडे पड़ गए.

वे थोड़ी देर बाद बोले, ‘‘ठीक है प्रेमशंकरजी, मैं अपनी हठ छोड़ता हूं. विनोद कल्पना से शादी करना चाहता है, तो इस के लिए मैं तैयार हूं.’’

‘‘ओह, शुक्रिया अरुण साहब,’’ कह कर प्रेमशंकर की आंखों में खुशी के आंसू छलछला आए.

मेरे पति ने मेरे साथ अप्राकृतिक संबंध बनाए : बौबी डार्लिंग

बौबी डार्लिंग (पाखी शर्मा) ने पिछले साल अपने पति रामणिक शर्मा पर उनके साथ घरेलू हिंसा करने और दहेज मांगने का अरोप लगाया था. बौबी ने ठान लिया था कि वह अपने पति को जेल की सलाखों के पीछे भेजकर ही दम लेंगी और ऐसा ही हुआ. अपने पति की हरकतों का दुनिया के सामने खुलासा करने के बाद आखिरकार अब बौबी ने अपने पति को जेल भेज कर ही राहत की सांस ली है.

‘स्‍पौटबौय’ से बात करते हुए बौबी ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा, ‘दिल्‍ली पुलिस ने उसे 11 मई को गिरफ्तार किया था. इसके बाद उसने दिल्‍ली कोर्ट में अपनी अर्जी लगाई थी, लेकिन वह कोर्ट ने रिजेक्‍ट कर दी. शुक्र है कि मुझे इंसाफ मिल पाया है.’ बता दें कि बैंकौक में सेक्‍सचेंज सर्जरी करा कर बौबी डार्लिंग, पाखी शर्मा बन गई थीं.

इसके बार बिग बौस की कंटेस्‍टंट रह चुकी बौबी ने 2016 में भोपाल के रोड़ कौन्‍ट्रेक्‍टर रमणिक शर्मा से शादी की थी. लेकिन शादी के लगभग डेढ़ साल बाद ही बौबी ने अपने पति और उसके माता-पिता के खिलाफ सितंबर, 2017 में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी.

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बौबी के अनुसार, ‘रमणिक सोसाइटी के सिक्योरिटी गार्ड को पैसे देते थे, ताकि वह मेरे बारे में उन्हें जानकारी दे सके. वह मेरे आने-जाने और बात करने पर नजर रखता था. मैंने आपसी सहमति से तलाक का सुझाव उन्हें दिया था, लेकिन उससे पहले उन्हें मेरी प्रौपर्टी वापस करनी होगी, क्योंकि मेरी वसीयत उसके पास ही है. मैं इसे बेचकर मुंबई शिफ्ट होना चाहती हूं.’ बता दें, रमणिक, बौबी डार्लिंग से 15 साल छोटे बताए जाते हैं.

बौबी डार्लिंग ने अपने पति पर लगाया अप्राकृतिक तरीके से संबंध बनाने का आरोप

वहीं दूसरी तरफ बौबी के पति रमणिक का दावा है कि बौबी यह सब सिर्फ पब्लिसिटी और पैसे के लिए कर रही है. इसके साथ ही रमणिक ने बौबी पर अपने ड्रग्‍स की लत और बच्‍चे पैदा कर सकने की बात से जुड़े झूठ बोले थे. हालांकि बाद की मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया था कि रमणिक, बौबी पर नजर रखता था और वह लगातार उसपर मुंबई वाले घर को बेच भोपाल में एक बंगला खरीदने का दबाव बना रहा था. बता दें कि बौबी डार्लिंग, ‘हंसी तो फंसी’ (2012), ‘क्‍या कूल हैं हम’ और ‘पेज 3’ जैसी फिल्‍मों में नजर आ चुकी हैं.

सरकारी दावों और वादों में फंसा कोढ़

बिहार के आरा रेलवे स्टेशन के पास ही एक छोटा सा इलाका बसा हुआ है अनाइठ. यह इलाका पटनामुगलसराय रेलवे लाइन के किनारे पर स्थित है और वहीं है कोढ़ के मरीजों की छोटी सी बस्ती ‘गांधी कुष्ठ आश्रम’.

कहने को तो यह कोढ़ के मरीजों के लिए आश्रम है, पर हर ओर अंधेरा, बेबसी, गंदगी और बदबू का आलम है. आश्रम के अंदर जाने की बात तो दूर उस के आसपास तकरीबन 25-30 मीटर पहले ही नथुने बदबूदार हवा से भभक उठते हैं. बजबजाती गंदगी के बीच कोढ़ से पीडि़त 68 परिवार रहते हैं, जिन की आबादी 152 है.

आश्रम के पास खड़े होने से यही महसूस होता है कि वहां तक सरकारी योजनाओं और दावोंवादों का रत्तीभर भी हिस्सा नहीं पहुंच सका है. बस्ती में गरीब कोढ़ के मरीजों को राहत और मदद देने की तमाम सरकारी योजनाओं और गैरसरकारी संस्थाओं की लूटखसोट की बानगी यहां साफ देखी जा सकती है. ऊपर से पोंगापंथ की वजह से भी मरीजों की हालत बद से बदतर होती जा रही है.

देश में कोढ़ के मरीजों की तकरीबन 850 कालोनियां हैं, जहां वे समाज के भेदभाव को झेलते हुए अपनी जिंदगी काट रहे हैं. सरकारी सुविधाओं और इलाज के नाम पर वहां कुछ नहीं पहुंच पाता है, जिस से मरीज तिलतिल कर मरने के लिए मजबूर हैं.

सेहत, पढ़ाईलिखाई, रोजगार वगैरह का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं होने की वजह से कोढ़ के मरीज भीख मांग कर गुजारा करते हैं और धीरेधीरे उन के बच्चे भी भिखारी बन रहे हैं.

कोढ़ के मरीजों के बारे में समाज में गलत बातें फैलाने की वजह से भी वे अलग रहने को मजबूर हैं. न तो उन को बेहतर इलाज और आम जिंदगी देने के उपाय किए जाते हैं और न ही समाज में उन के प्रति कोई जागरूकता फैलाने के लिए कदम उठाए जाते हैं.

कोढ़ को ले कर समाज में फैले कई तरह के अंधविश्वासों और अफवाहों की वजह से भी कोढ़ के मरीजों की हालत ऐसी है. इस के बारे में आम लोग यही कहते हैं कि गलत काम करने की वजह से यह बीमारी होती है.

बहुत से तो यह भी कहते हैं कि यह बीमारी पिछले जन्म के पापों का नतीजा है. इसे ले कर समाज में पोंगापंथियों ने जम कर भरम फैला रखा है. बाबाओं ने यह प्रचार कर रखा है कि गलत काम करने, गलत संबंध बनाने, खून गंदा होने या सूखी मछली खाने से कोढ़ होता है, जबकि ऐसा कुछ नहीं है.

इस सिलसिले में डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि जिस किसी को कोढ़ हो जाता है, उस मरीज को ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है. परिवार और समाज उस से नफरत करने लगता है और उसे ठुकरा कर दरदर भटकने के लिए छोड़ देता है.

यह बीमारी एक से दूसरे इनसान में पुरानी माइक्रो बैक्टिरियल लेप्री से फैलती है. यह आमतौर पर चमड़ी पर असर डालती है और उंगलियां समेत कई अंग धीरेधीरे गलने लगते हैं. इस बीमारी का सही तरीके से इलाज किया जाए, तो यह पूरी तरह ठीक हो जाती है. साल 1991 में आई एमडीटी दवा के सेवन से यह बीमारी ठीक हो जाती है.

भारत में तकरीबन 15 लाख से ज्यादा कोढ़ के मरीज हैं. इन में से 24 फीसदी बिहार में हैं. बिहार में ही ऐसे लोगों की 40 बस्तियां हैं. यहां प्रति 10 हजार की आबादी पर 1.12 लोग कोढ़ के मरीज हैं. बिहार के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में सब से ज्यादा कोढ़ के मरीज हैं.

बिहार अनुसूचित एवं पिछड़ी जाति संघर्ष मोरचा के संयोजक किशोरी दास कहते हैं कि गरीब और पिछड़ों के दर्द को सुनने और उसे दूर करने वाला कोई नहीं है. उन के नाम पर पटना से ले कर दिल्ली तक सत्ता की रोटियां सेंकी जाती रही हैं, पर उन के हालात में बदलाव नहीं हो सका है.

कोढ़ को जड़ से मिटाने के लिए साल 1955 में राष्ट्रीय कुष्ठ नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत की गई. उस के बाद साल 1983 में राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम शुरू किया गया और उसी साल मल्टी ड्रग थैरैपी की शुरुआत हुई.

साल 2005 में नैशनल लैवल पर इस बीमारी को जड़ से मिटाने का काम शुरू किया गया. साल 2012 में देश के 16 राज्यों और संघीय क्षेत्रों में विशेष कार्य योजना चालू की गई थी.

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भारत में कोढ़ के मरीजों की तादाद में इजाफा होने से यह साबित हो गया है कि देश में इस पर काबू पाने के तमाम उपाय नाकाम रहे हैं. अगर इसी कछुआ गति से इसे मिटाने की कवायद चलती रही, तो भारत से यह बीमारी खत्म करने में अभी भी 40 साल लगेंगे.

सरकार ने साल 2005 में दावा किया था कि देश से कोढ़ को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है. इस के बावजूद कोढ़ के मरीजों की तादाद में इजाफा होता जा रहा है, जिस से सरकार के दावों की पोल खुल गई है.

राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम ही कहता है कि कोढ़ के एक लाख, 27 हजार, 595 मामले हर साल भारत में होते हैं. अकेले दिल्ली में पिछले साल कुल 23 सौ नए मामले सामने आए हैं.

गांधी कुष्ठ आश्रम में रहने वाले बालेश्वर साव को उस के घर वालों ने घर से निकाल दिया. उसे कोढ़ हो गया था. गरीब होने की वजह से उस का समय पर इलाज नहीं हो सका. उस के जिस्म के कई हिस्सों में गहरे जख्म हो गए हैं, हाथपैरों की कई उंगलियां गल चुकी हैं. पिछले 20 सालों से वह सरकारी मदद के इंतजार में है, पर आज तक केवल भरोसे के अलावा उसे और कुछ नहीं मिल सका.

एनजीओ वाले कभीकभार बालेश्वर साव को खाने को कुछ अनाज और पहनने को कुछ कपड़े दे जाते हैं. इस से गुजारा नहीं चल पाता है. वह लकड़ी की गाड़ी पर बैठ कर दिनभर घूमता है. ‘माताबहन करिए दान, बाबू भइया करिए दान’ की गुहार लगालगा कर वह भीख मांगता है, तो दिनभर में 100-150 रुपए जमा हो जाते हैं.

पटना की सड़कों पर भीख मांगने वाले कोढ़ी शिवलाल यादव के झोंपड़े के अंदर घुसने पर हर ओर अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है. अंधेरे के बीच कुछ चमकती आंखों को देख कर एहसास होता है कि झोंपड़े में कुछ और लोग भी रह रहे हैं.

शिवलाल यादव बताता है कि उस के साथ 3 और कोढ़ी रहते हैं. वे भी दिनभर भीख मांगते हैं. कभीकभार जब तबीयत ज्यादा खराब हो जाती है, तो सौ रुपए कर्ज लेने पर 10 रुपए रोज के हिसाब से सूद चुकाना पड़ता है.

वह आगे कहता है, ‘‘सुनते हैं कि कोढ़ के मरीजों और गरीब लाचारों के लिए सरकार ने बहुत सी योजनाएं बनाई हैं, पर आज तक उस के पास एक पैसा भी नहीं पहुंच सका है. सारा पैसा तो अफसरों और बाबुओं के पेट में चला जाता है.’’

शिवलाल यादव बड़ी ही मासूमियत से अफसरशाही के मुंह पर करारा तमाचा जड़ देता है और सरकारी योजनाओं की पोलपट्टी भी खोल देता है.

झोंपड़ी में रहने वाले को बिजली का कनैक्शन लेने के लिए सरकारी बिजली महकमे के बजाय प्राइवेट जैनरेटर चलाने का धंधा करने वाले दबंगों की चिरौरी करनी पड़ती है. जैनरेटर के जरीए झोंपडि़यों में एक बल्ब का कनैक्शन देने पर हर महीने सौ रुपए वसूले जाते हैं. कनैक्शन लेने वालों की मरजी न भी हो, तब भी जबरन कनैक्शन दे दिया जाता है.

बालेश्वर, मुन्ना, सुदन, लाल बिहारी और प्रभु ने जैनरेटर का कनैक्शन लेने से इनकार कर दिया था, तो उन सब पर बिजली चोरी करने का आरोप लगा कर मुकदमे में फंसा दिया गया. पिछले 9 साल से वे लोग बिजली चोरी के आरोप में थाने और कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं.

पटना के पास खगौल इलाके की रेलवे क्रौसिंग के पास बसी कोढ़ के मरीजों की बस्ती प्रेम नगर में रहने वाली कोढ़ से पीडि़त ललिता बेगम बताती हैं कि लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के राज में उन जैसे मरीजों के रहने के लिए थोड़ी सी जमीन मुहैया कराने के लिए अर्जी दी थी. उस के बाद नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद भी पिछले 8-9 साल में तकरीबन 50 बार से ज्यादा अर्जी दी जा चुकी है. मुखिया, बीडीओ, एसडीओ, डीएम, विधायक से ले कर मंत्री और मुख्यमंत्री को अर्जी दी गई, पर अभी तक कुछ भी नहीं हो सका है. हर कोई जमीन देने का भरोसा दे कर चलता कर देता है.

गंदी झोंपड़ी में रहने से और भी कई तरह की बीमारियां हो गई हैं. किसी को टीबी हो गई है, तो किसी की आंत में अल्सर हो गया है. किसी का लिवर खराब हो चुका है, तो किसी की आंखों की रोशनी ही चली गई है.

कालोनी में हर झोंपड़ी के चारों ओर पूरे साल गंदा पानी भरा रहता है. बांस के टुकड़े, पौलीथिन, जूट के बोरे और फटेपुराने कपड़ों को जोड़ कर बनाई गई झोंपडि़यों की दीवारें हर समय गीली रहती हैं. भिनभिनाती मक्खियों के झुंड, बजबजाते कीचड़ में अपनी थूथन घुसेड़े सूअरों की फौज, बिलों से झांकते मोटेमोटे चूहे आश्रम को नरक बनाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते हैं.

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एक मरीज प्रभु मुसहर कहता है कि आधी से ज्यादा जिंदगी तो इसी गंदगी में कट गई, बाकी जिंदगी भी कट जाएगी. समाज ने हम लोगों को ठुकरा दिया है. ऐसे में किस से मदद की उम्मीद करें?

समाजसेवी आलोक कुमार बताते हैं कि बिहार सरकार की नजर इस कुष्ठ आश्रम पर नहीं पड़ सकी है, पर जरमनी की लिबेल और लेप्रा की कोशिश से कुष्ठ रोगियों को थोड़ी ही सही, पर मदद मिल रही है.

अच्छी बात यह है कि अनपढ़ मरीजों को पढ़ाने के लिए एक टीचर का इंतजाम किया गया है और सिलाई मशीनें दी गई हैं, जिस से काम सीख कर कोढ़ी भीख मांगने के बजाय दो वक्त की रोटी खाकमा सकें.

भारत में इस समय दुनिया का सब से बड़ा कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम चल रहा है. इस कार्यक्रम के तहत तकरीबन एक लाख, 20 हजार मरीजों के नए मामले दर्ज हुए हैं. गरीबी इस बीमारी के पनपने की सब से बड़ी वजह है.

इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके डाक्टर अजय कुमार कहते हैं कि आज मल्टी ड्रग थैरैपी के जरीए इस बीमारी का आसान इलाज मुमकिन है. पर समाज और परिवार द्वारा ठुकराए जाने की वजह से मरीज का इलाज नहीं हो पाता है और वे तिलतिल कर मरने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

अगर कोढ़ का शुरुआती दौर में ही पता लग जाए और सही इलाज चालू कर दिया जाए, तो उस के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है और  अंगों को गलने से बचाया जा सकता है.

सरकार, समाज और परिवार के साथसाथ कानून भी कोढ़ के मरीजों के साथ भेदभाव करता रहा है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में स्थानीय चुनावों में ऐसे मरीजों के हिस्सा लेने पर मनाही है.

साल 1939 में ही कोढ़ के मरीजों को ड्राइविंग लाइसैंस देने और साल 1990 से उन के रेलगाडि़यों में सफर करने पर रोक लगा दी गई है.

भारत में 16 ऐसे कानून हैं, जो कोढ़ के मरीजों के साथ भेदभाव करता है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से दूर करता है. उस के बाद करेले पर नीम की तरह अंधविश्वास, कलंक वगैरह से इस बीमारी को जोड़ दिया गया है.

कोढ़ पर काबू पाने के लिए बना टीका

भारत ने कोढ़ के इलाज के लिए दुनिया का पहला टीका ईजाद करने में कामयाबी हासिल की है. बिहार और गुजरात के 5 जिलों में इसे ट्रायल के तौर पर शुरू किया गया है.

डाक्टर विमल कारक कहते हैं कि भारत पहला देश है, जहां कोढ़ के लिए टीका लगाने के लिए कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है. इस के टैस्ट में पाया गया है कि कोढ़ के मरीजों के करीब रहने वालों को यह टीका दिया जाए, तो 3 साल के अंदर ही कोढ़ के मामलों में 60 फीसदी तक की कमी आ सकती है. इतना ही नहीं, अगर कोढ़ की वजह से किसी की चमड़ी जख्मी हुई हो, तो यह टीका उस के ठीक होने की रफ्तार को बढ़ा देगा.

इस टीके को नैशनल इंस्टीट्यूट औफ इम्यूनोलौजी के फाउंडर डायरैक्टर जीपी तलवार ने ईजाद किया है. ड्रग कंट्रोलर जनरल औफ इंडिया और अमेरिका के एफडीए ने भी इसे मंजूरी दे दी है.

केंद्र सरकार ने देशभर के सब से ज्यादा कोढ़ के असर वाले 50 जिलों में घरघर जा कर मरीजों की पहचान करने और टीका लगाने का काम शुरू किया है. अब तक तकरीबन साढ़े 7 करोड़ लोगों की जांच की जा चुकी है और तकरीबन 6 हजार लोगों को कोढ़ होने का पता चला है.

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