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Hindi Story: परीक्षा – ईश्वर क्यों लेता है भक्त की परीक्षा

Hindi Story, लेखक- सुनीत गोस्वामी

भव्य पंडाल लगा हुआ था जिस में हजारों की भीड़ जमा थी और सभी की एक ही इच्छा थी कि महात्माजी का चेहरा दिख जाए. सत्संग समिति ने भक्तों की इसी इच्छा को ध्यान में रखते हुए पूरे पंडाल में जगह-जगह टेलीविजन लगा रखे थे ताकि जो भक्त महात्मा को नजदीक से नहीं देख पा रहे हैं वे भी उन का चेहरा अच्छी तरह से देख लें.

कथावाचक महात्मा सुग्रीवानंद ने पहले तो ईश्वर शक्ति पर व्याख्यान दिया, फिर उन की कृपा के बारे में बताया और प्रवचन के अंत में गुरुमहिमा पर प्रकाश डाला कि हर गृहस्थी का एक गुरु जरूर होना चाहिए क्योंकि बिना गुरु के भगवान भी कृपा नहीं करते. वे स्त्री या पुरुष जो बिना गुरु बनाए शरीर त्यागते हैं, अगले जन्म में उन्हें पशु योनि मिलती है. जब आम आदमी किसी को गुरु बना लेता है, उन से दीक्षा ले लेता है और उसे गुरुमंत्र मिल जाता है, तब उस का जीवन ही बदल जाता है. गुरुमंत्र का जाप करने से उस के पापों का अंत होने के साथ ही भगवान भी उस के प्रति स्नेह की दृष्टि रखने लगते हैं.

गुरु के बिना तो भगवान के अवतारों को भी मुक्ति नहीं मिलती. आप सब जानते हैं कि राम के गुरु विश्वामित्र थे और कृष्ण के संदीपन. सुग्रीवानंद ने गुरु महिमा पर बहुत बड़ा व्याख्यान दिया.

डर और लालच से मिलाजुला यह व्याख्यान भक्तों को भरमा गया. सुग्रीवानंद का काम बस, यहीं तक था. आगे का काम उन के सेक्रेटरी को करना था.

सेक्रेटरी वीरभद्र ने माइक संभाला और बहुत विनम्र स्वर में भक्तों से कहा, ‘‘महाराजश्री से शहर के तमाम लोगों ने दीक्षा देने के लिए आग्रह किया था और उन्होंने कृपापूर्वक इसे स्वीकार कर लिया है. जो भक्त गुरु से दीक्षा लेना चाहते हैं वे रुके रहें.’’

इस के बाद पंडाल में दीक्षामंडी सी लग गई. इसे हम मंडी इसलिए कह रहे हैं कि जिस तरह मंडी में माल की बोली लगाई जाती है वैसे ही यहां दीक्षा बोलियों में बिक रही थी.

गरीबों की तो जिंदगी ही लाइन में खड़े हो कर बीत जाती है. यहां भी उन के लिए लाइन लगा कर दीक्षा लेने की व्यवस्था थी. 151 रुपए में गुरुमंत्र के साथ ही सुग्रीवानंद के चित्र वाला लाकेट दिया जा रहा था. गुरुमंत्र के नाम पर किसी को राम, किसी को कृष्ण, किसी को शिव का नाम दे कर उस का जाप करने की हिदायत दी जा रही थी. ये दीक्षा पाए लोग सामूहिक रूप से गुरुदर्शन के हकदार थे.

दूसरी दीक्षा 1,100 रुपए की थी. इन्हें चांदी में मढ़ा हुआ लाकेट दिया जा रहा था. गुरुमंत्र और सुग्रीवानंद की कथित लिखी हुई कुछ पुस्तकें देने के साथ उन्हें कभीकभी सुग्रीवानंद के मुख्यालय पर जा कर मिलने की हिदायत दी जा रही थी.

सब से महंगी दीक्षा 21 हजार रुपए की थी. कुछ खास पैसे वाले ही इस गुरुदीक्षा का लाभ उठा सके. ऐसे अमीर भक्त ही तो महात्माओं के खास प्रिय होते हैं. इन भक्तों को सोने की चेन में सुग्रीवानंद के चित्र वाला सोने का लाकेट दिया गया. पुस्तकें दी गईं और प्रवचनों, भजनों की सीडियां भी दी गईं. इन्हें हक दिया गया कि ये कहीं भी, कभी भी गुरु से मिल कर अपने मन की शंका का निवारण कर सकते हैं. इस विभाजित गुरुदीक्षा को देख कर लगा कि स्वर्ग की व्यवस्था भी किसी नर्सिंग होम की तरह होगी.

जिस ने महात्माजी से छोटी गुरुदीक्षा ली थी वह मरने के बाद स्वर्ग जाएगा तो उस के लिए खिड़की खुलेगी. ऐसे तमाम लोगों को सामूहिक रूप में जनरल वार्र्ड में रखा जाएगा. विशिष्ट दीक्षा वालों के लिए स्वर्ग का बड़ा दरवाजा खुलेगा और ये प्राइवेट रूम में रहेंगे.

आज से लगभग 10 साल पहले रमेश एक प्राइवेट हाउसिंग कंपनी में अधिकारी था. एक बार भ्रष्टाचार के मामले में वह पकड़ा गया और नौकरी से निकाल दिया गया. बेरोजगार शातिर दिमाग रमेश सोचता रहता कि काम ऐसा होना चाहिए जिस में मेहनत कम हो, इज्जत खूब हो और पैसा भी बहुत अधिक हो. वह कई दिन तक इस पर विचार करता रहा कि ये तीनों चीजें एकसाथ कैसे मिलें. तभी उसे सूझा कि धर्म के रास्ते यह सहज संभव है. धर्म की घुट्टी समाज को हजारों वर्षों से पिलाई गई है. यहां अपनेआप को धार्मिक होना लोग श्रेष्ठ मानते हैं. जो शोधक है वह भी दान दे कर अपने अपराधबोध को कम करना चाहता है. यह सब सोेचने के बाद रमेश ने पहले अपनी एक कीर्तन मंडली बनाई और अपना नाम बदल सुग्रीवानंद कर लिया. कीर्तन करतेकरते सुग्रीवानंद कथा करने लगा. धीरेधीरे वह बड़ा कथावाचक बन गया. लोगों को बातों में उलझा कर, भरमा कर, बहका कर धन वसूलने के बहुत से तरीके भी जान गया. उस ने बहुत बड़ा आश्रम बना लिया.

इस तरह दुकानदारी चल पड़ी और धनवर्षा होने लगी तो सरकार से अनुदान पाने के लिए सुग्रीवानंद ने गौशाला और स्कूल भी खोल लिए.

सुग्रीवानंद इस मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझता था कि जो पूंजीपति शोषक और बेईमान होता है उस के अंदर एक अपराधबोध होता है और वह दान दे कर इस बोध से मुक्त होना चाहता है. सुग्रीवानंद जब भी अपने अमीर शिष्यों से घिरा होता तो उन्हें दान की महिमा पर जरूर घुट्टी पिलाता था.

सुरेश एक उद्योगपति था. उस ने भी सुग्रीवानंद से गुरुदीक्षा ली थी. अब वह उस का शिष्य था और शिष्य होने के नाते गुरु के आदेश का पालन करना अपना धर्म समझता था. एक दिन सुग्रीवानंद ने सुरेश से कहा, ‘‘वत्स, मैं ने आश्रम की तरफ से कुछ गरीब कन्याओं के विवाह का संकल्प लिया है.’’

‘‘यह तो बड़ा शुभ कार्य है, गुरुजी. मेरे लिए कोई सेवा बताएं.’’

‘‘वत्स, धर्मशास्त्र कहते हैं कि दान देने में ही मनुष्य का कल्याण है. दान से यह लोक भी सुधरता है और परलोक भी.’’

‘‘आप आदेश करें, गुरुजी, मैं तैयार हूं.’’

‘‘लगभग 2 लाख रुपए का कार्यक्रम है.’’

सुरेश इतनी बड़ी रकम सुन कर मौन हो गया.

शिकार को फांसने की कला में माहिर शिकारी की तरह सुग्रीवानंद ने कहा, ‘‘देखो वत्स, सुरेश, तुम मेरे सब से प्रिय शिष्य हो. इस शुभ अवसर का पूरा पुण्य तुम्हें मिले, यह मेरी इच्छा है. वरना मैं किसी और से भी कह सकता हूं, मेरी बात कोई नहीं टालता.’’

गुरुजी उस पर इतने मेहरबान हैं, यह सोच कर उस ने दूसरे दिन 2 लाख रुपए ला कर गुरुजी को भेंट कर दिए.

रुपए लेने के बाद सुग्रीवानंद ने कहा, ‘‘यह बात किसी दूसरे शिष्य को मत बताना. अध्यात्म के रास्ते पर भी बड़ी ईर्ष्या होती है. भगवान को पाने के लिए दान बहुत बड़ी साधना है और यह साधना गुप्त ही होनी चाहिए.’’

गुरु की आज्ञा का उल्लंघन धर्मभीरु सुरेश कैसे कर सकता था.

सुग्रीवानंद ने अपने सभी अमीर शिष्यों को अलगअलग समय में इसी तरह पटाया. सभी से 2-2 लाख रुपए वसूले और इन्हें दान की महान साधना को गुप्त रखने के आदेश दिए. इस तरह एक तीर से दो शिकार करने वाले सुग्रीवानंद के आश्रम में गरीब कन्याओं के विवाह कराए गए. उस ने मीडिया द्वारा तारीफ भी बटोरी लेकिन यह कोई नहीं जान पाया कि इस खेल में वह कितना पैसा कमा गया.

सुग्रीवानंद ने जगहजगह अपने आश्रम खोले थे लेकिन यह कोई नहीं जानता था कि इन आश्रमों को उस के परिवार व खानदान के लोग ही नहीं बल्कि रिश्तेदार भी चला रहे थे. धर्मभीरु जनता से धन ऐंठने के नएनए तरीके ढूंढ़ने वाले सुग्रीवानंद ने किसी पत्रिका में आदिवासियों पर एक लेख पढ़ लिया था. बस, लोगों से पैसा हड़पने का उसे एक और तरीका मिल गया, उस ने एक कथा में कहा कि आप के जो अशिक्षित बनवासी भाई हैं वे बहुत ही गरीबी में जी रहे हैं. हम सभी का धर्म है कि उन की सेवा करें. उन्हें शिक्षा के साधन उपलब्ध कराएं. मैं ने इस निमित्त जो संकल्प लिया है वह आप सभी के सहयोग से ही पूरा हो सकता है. सेवा ही धर्म है और सेवा ही भगवान की पूजा है. फिर दरिद्र तो नारायण होता है. इसलिए दरिद्र के लिए आप जितना अधिक दान देंगे, नारायण उतना ही खुश होगा.

सुग्रीवानंद ने आह्वान किया कि आइए, आगे आइए. इस शहर के धनकुबेर आगे आएं और आदिवासियों के लिए उदार दिल से दान की घोषणा करें. सुरेश ने पहली घोषणा की कि 1 लाख रुपए मेरी तरफ से. इस के बाद तो लोग बढ़चढ़ कर दान की घोषणाएं करने लगे. इस तरह सुग्रीवानंद के आश्रम के नाम लगभग 80 लाख रुपए की घोेषणा हो गई.

अभी तक सुरेश इस खुशफहमी में था कि गुरुजी की बातों को मान कर उसे अध्यात्म का लाभ प्राप्त होगा, परलोक का सुख मिलेगा मगर इस परलोक को सुधारने के चक्कर में वह मुसीबत में पड़ता जा रहा था. उस का सारा समय तो दीक्षा के बाद गुरुजी की बताई साधनाओं में ही व्यतीत हो जाता था और कमाई का अधिकांश धन गुरुजी को दान देने में.

परिणाम यह हुआ कि सुरेश का व्यापार डांवांडोल होने लगा. व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी सक्रिय हो गए. वह लाभ कमाने लगे और उस के हिस्से में घाटा आता गया. समय पर आर्डरों की सप्लाई न देने की वजह से बाजार में उस की साख गिरती गई. लाखों रुपए उधारी में फंस गए तब उसे हैरानी इस बात पर भी हुई कि दान का यह उलटा फल क्यों मिल रहा है जबकि गुरुजी कहते थे कि तुम जो भी दान दोगे, उस का कई गुना हो कर वापस मिलेगा. जैसे धरती में थोड़ा सा बीज डालते हैं तो वह कई गुना कर के फसल के रूप में लौटा देती है पर उस ने तो लाखों का दान दिया, फिर वह कंगाली के कगार पर क्यों?

सुरेश ने अपनी परेशानी गुरुजी के सामने रखी. सुग्रीवानंद ने तुरंत उत्तर दिया, ‘‘अरे बेटा, भगवान इसी तरह तो परीक्षा लेते हैं. भगवान अपने प्रिय भक्त को परेशानियों में डालते हैं और देखते हैं कि वह भक्त कितना सच्चा है.’’

सुरेश को यह जवाब उचित नहीं लगा. उस ने फिर पूछा, ‘‘गुरुजी भगवान तो अंतर्यामी हैं. वह जानते हैं कि भक्त कितना सच्चा है. फिर परीक्षा की उन्हें क्या जरूरत है?’’

सुग्रीवानंद को इस का कोई जवाब नहीं सूझा तो उस ने बात को टालते हुए कहा, ‘‘सुरेश, भगवान के विधान को कभी तर्कों से नहीं जाना जा सकता. यह तो विश्वास का मामला है. गुरु की बातों पर संदेह करोगे तो कुछ प्राप्त नहीं होगा.’’

सुरेश को उस के प्रश्न का सही उत्तर नहीं मिला. सुरेश की जो जिज्ञासा थी, उस का उत्तर आज भी किसी महात्मा या कथावाचक के पास नहीं है. महात्माओं के अनुसार ईश्वर घटघटवासी है. वह त्रिकालदर्शी है. करुणा का सागर है. अंतर्यामी है. व्यक्ति के मन की हर बात जानता है. वह कितना सच्चा है, कितना कपटी है, ईश्वर को सब पता रहता है. फिर वह भक्त की परीक्षा क्यों लेता है? यह प्रश्न आज भी उत्तर की प्रतीक्षा में है.

Hindi Story : ठेले वाला

Hindi Story : रमेश अपने परिवार के साथ तीर्थयात्रा पर गए थे. यात्रा के दूसरे दिन उन्हें परेशान देख कर बेटे तन्मय ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘पापा, आप इतना परेशान क्यों नजर आ रहे हैं? आप को पहली बार इतनी चिंता में देख कर मु झे घबराहट हो रही है.

‘‘चेहरे पर हमेशा मुसकान बिखेरने वाले मेरे पापा का यह तनाव भरा चेहरा कुछ अलग ही कहानी कह रहा है. कुछ तो बोलो पापा…’’

बेटे तन्मय के बारबार कहने पर रमेश बोले, ‘‘बेटा, जिंदगी में आज पहली बार मेरा पर्स गायब हुआ है. मु झे याद नहीं कि इस के पहले कभी इस 60 साल की जिंदगी में मेरा पर्स गायब हुआ हो. चिंता तो बनती है न…’’

रमेश के पर्स में तकरीबन 15,000 रुपए थे. यह जान कर परिवार के सभी सदस्य परेशान हो गए. पर्स कहां गायब हुआ होगा? जब इस पर बातचीत हुई, तो यह नतीजा निकला कि रास्ते में रमेश ने जहां अमरूद खरीदे थे, वहीं पर्स गायब हुआ होगा, पर अब तो 100 किलोमीटर आगे आ चुके थे.

बेटे तन्मय ने उस जगह पर जाने की जिद की, तो रमेश ने कहा, ‘‘बेटा, मेरे पर्स में रुपयों के अलावा आधारकार्ड, ड्राइविंग लाइसैंस और विजिटिंग कार्ड भी थे. अगर पाने वाले की नीयत अच्छी होती, तो विजिटिंग कार्ड से मोबाइल नंबर देख कर अब तक फोन आ गया होता.

‘‘फोन न आने का यह मतलब है कि पाने वाले की मंशा ठीक नहीं है, इसलिए वहां जाने से कोई फायदा नहीं होगा.’’

इस बारे में सब एकमत हो कर आगे की यात्रा के लिए निकल पड़े. सोमनाथ, पोरबंदर, द्वारका, बेट द्वारका, नागेश्वर जैसी जगहों पर घूम कर लौटते समय वे उसी रास्ते पर आगे बढ़े, जिस रास्ते से आए थे.

रास्ते में रमेश के मन में अनेक तरह के विचार आजा रहे थे. कभी उन के मन में आ रहा था कि इस जन्म में किसी का कुछ भी बिगाड़ा नहीं है, तो उन के पैसे रख कर कोई उन्हें कष्ट क्यों देगा? पर इस बात से वे शांत भी थे कि हो सकता है कि पिछले जन्म में किसी का कुछ कर्ज बाकी रहा हो और अब उस से मुक्ति मिली हो.

कभी वे यह सोचते कि अमरूद वाले की दिनभर की कमाई तकरीबन 1,000 रुपए होती होगी. पर्स मिलने के बाद हो सकता है कि उस ने अमरूद बेचने ही छोड़ दिए हों.

यह सब सोचने में रमेश इतने लीन थे कि उन्हें यह पता नहीं चला कि कब वे उस जगह पर पहुंच गए, जिस जगह उन्हें लग रहा था कि शायद पर्स खोया होगा.

तभी बेटा तन्मय चिल्लाया, ‘‘पापा देखो, वह अमरूद वाला कितनी शान से अमरूद बेच रहा है. पर्स चुराने की उस के चेहरे पर कोई शिकन तक दिखाई नहीं पड़ रही है.’’

कार से उतर कर रमेश जैसे ही अमरूद वाले के सामने पहुंचे, अमरूद वाला उन्हें एकटक देख रहा था.

रमेश ने उस अमरूद वाले से पूछा, ‘‘4 दिन पहले मैं ने आप से अमरूद खरीदे थे. आप के ध्यान में होगा ही…’’

अमरूद वाले ने जवाब दिया, ‘‘बिलकुल मेरे ध्यान में है.’’

‘‘तब तो यह भी ध्यान होगा कि मेरा पर्स आप के ठेले पर छूट गया था.’’

‘‘मेरे ठेले पर आप का पर्स… यहां तो कोई पर्स नहीं छूटा था. हां, जब आप अपनी कार में बैठ रहे थे, तब आप का पर्स नीचे गिरा था और मैं ने आवाज भी लगाई थी, पर आप लोग बिना सुने यहां से चले गए.

‘‘आप का पर्स मेरे पास रखा है. यह लीजिए आप अपना पर्स,’’ कहते हुए ठेले वाले ने रमेश को पर्स सौंप दिया.

खुशी के मारे रमेश यह नहीं सम झ पा रहे थे कि वे ठेले वाले का शुक्रिया कैसे अदा करें. उन्होंने ठेले वाले से पूछा, ‘‘भाई, इस पर्स में मेरा विजिटिंग कार्ड था, जिस में मेरा मोबाइल नंबर था. मु झे अगर फोन कर दिया होता, तो तुम्हारे बारे में मेरे मन में जो तरहतरह के बुरे विचार आ रहे थे, वे तो न आते.’’

रमेश की बात सुन कर वह ठेले वाला बोला, ‘‘साहब, पर्स मेरा नहीं था, तो किस हक से मैं इसे खोलता…’’

ठेले वाले की यह बात सुन कर रमेश और उस के परिवार के सभी सदस्य इतने हैरान हुए, जिस की कल्पना नहीं की जा सकती है. सभी को यही लग रहा था कि ईमानदारी अभी भी जिंदा है.

रमेश ने उस ठेले वाले को 500 रुपए देने चाहे, तो उस ने कहा, ‘‘मैं ने तो सिर्फ अपना फर्ज निभाया है.’’

जब उस ठेले वाले ने पैसे नहीं लिए, तो रमेश ने उस के ठेले पर रख दिए.

वह ठेले वाला बोला, ‘‘ठीक है साहब, ये पैसे मैं पास के सरकारी स्कूल में दे दूंगा और अगर आप एक महीने तक अपना पर्स लेने नहीं आते, तो यह पर्स भी मैं वहीं दे देता.’’

उस ठेले वाले की ईमानदारी से खुश हो कर रमेश ने वहां से कुछ ज्यादा ही अमरूद खरीदे और वहां से चल पड़े. रास्तेभर वे सोचते रहे, ‘काश, दुनिया के लोग इस ठेले वाले की तरह होते तो यह दुनिया कितनी अच्छी होती.’

लेखक – प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ‘रत्नेश’

Hindi Story : गणपति का जन्म – विकृत बच्चे को देख क्या हुआ

Hindi Story : फूलचंद ने फटा हुआ कंबल खींचखींच कर एकदूसरे के साथ सट कर सो रहे तीनों बच्चों को ठीक से ओढ़ाया और खुद राख के ढेर में तब्दील हो चुके अलाव को कुरेद कर गरमी पाने की नाकाम कोशिश करने लगा.

जाड़े की रात थी. ऊपर से 3 तरफ से खुला हुआ बरामदा. सांयसांय करती हवा हड्डियों को काटती चली जाती थी. गनीमत यही थी कि सिर पर छत थी.

अंदर कमरे में फूलचंद की बीवी सुरना प्रसव वेदना से तड़प रही थी. रहरह कर उस की चीखें रात के सन्नाटे को चीरती चली जाती थीं. पड़ोसी रामचरन की घरवाली और सुखिया दाई उसे ढाढ़स बंधा रही थीं.

मगर फूलचंद का ध्यान न तो सुरना की पीड़ा की ओर था, न ही उस के मन में आने वाले मेहमान के प्रति कोई उल्लास था. सच तो यह था कि अनचाहे बोझ को ले कर वह चिंतित ही था.

परिवार की माली हालत पहले से ही खस्ता थी. जब तक मिल चलती रही तब तक तो गनीमत थी. मगर पिछले 8 महीने से मिल में तालाबंदी चल रही थी और अब वह मजदूरी कर के किसी तरह परिवार का पेट पाल रहा था.

लेकिन रोज काम मिलने की कोई गारंटी न थी. कई बार फाकों की नौबत आ चुकी थी. कर्ज था कि बढ़ता ही जा रहा था. ऐसे में वह चौथा बच्चा फूलचंद को किसी नई मुसीबत से कम नजर नहीं आ रहा था. लेकिन समय के चक्र के आगे बड़ेबड़ों की नहीं चलती, फिर फूलचंद की तो क्या बिसात थी.

तभी सुरना की हृदय विदारक चीख उभरी और धीरेधीरे एक पस्त कराह में ढलती चली गई. फूलचंद ने भीतर की आवाजों पर कान लगाए. अंदर कुछ हलचल तो हो रही थी. मगर नवजात शिशु का रुदन सुनाई नहीं पड़ रहा था. अब फूलचंद को खटका हुआ, ‘क्या बात हो सकती है?’ कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई? मगर पूछूं भी तो किस से? अंदर जा नहीं सकता.

फूलचंद मन मार कर बैठा रहा. अब तो दोनों औरतों में से ही कोई बाहर आती, तभी कुछ पता चल पाता. हां, सुरना की कराहें उसे कहीं न कहीं आश्वस्त जरूर कर रही थीं.

प्रतीक्षा की वे घडि़यां जैसे युगों लंबी होती चली गईं. काफी देर बाद सुखिया दाई बाहर निकली. फूलचंद ने डरतेडरते पूछा, ‘‘सब ठीक तो है न?’’

‘‘हां, लड़का हुआ है,’’ सुखिया ने निराश स्वर में बताया, ‘‘मगर…’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ फूलचंद व्यग्र हो उठा.

‘‘अब मैं क्या कहूं. तुम खुद ही जा कर देख लो.’’

इस के बाद सुखिया तो चली गई, लेकिन फूलचंद की उलझन और बढ़ गई, ‘ऐसी क्या बात है, जो सुखिया से नहीं बताई गई? कहीं बच्चा मरा हुआ तो नहीं? मगर यह बात तो सुखिया बता सकती थी.’

कुछ देर बाद रामचरन की घरवाली भी यह कह कर चली गई, ‘‘कोई दिक्कत आए तो बुला लेना.’’

अब फूलचंद के अंदर जाने में कोई रुकावट नहीं थी. वह धड़कते दिल से अंदर घुसा. सुरना अधमरी सी चारपाई पर पड़ी थी. बगल में शिशु भी लेटा था.

सुरना ने आंखें खोल कर देखा. मगर फूलचंद की कुछ पूछने की हिम्मत न हुई. हां, उस की आंखों में कौंधती जिज्ञासा सुरना से छिपी न रह सकी. उस ने शिशु के मुंह पर से कपड़ा हटा दिया और खुद आंखें मूंद लीं.

आंखें तो फूलचंद की भी एकबारगी खुद ब खुद मुंद गईं. सामने दृश्य ही ऐसा था. नवजात शिशु का चेहरा सामान्य शिशुओं जैसा न था. माथा अत्यंत संकरा और लगभग तिकोना था. आंखें छोटीछोटी और कनपटियों तक फटी हुई थीं. कान भी असामान्य रूप से लंबे थे. सब से विचित्र बात यह थी कि शिशु का ऊपरी होंठ था ही नहीं. हां, नाक अत्यधिक लंबी हो कर ऊपरी तालू से जा लगी थी.

फूलचंद जड़ सा खड़ा था, ‘यह कैसी माया है? हुआ ही था तो अच्छाभला होता. नहीं तो जन्म लेने की क्या जरूरत थी. मुझ पर हालात की मार पहले ही क्या कम थी, जो यह नई मुसीबत मेरे सिर आ पड़ी. क्या होगा इस बच्चे का? अपना यह कुरूप ले कर इस दुनिया में यह कैसे जिएगा? क्या होगा इस का भविष्य?’

फूलचंद ने डरतेडरते पूछा, ‘‘इस की आवाज?’’

‘‘पता नहीं,’’ सुरना ने कमजोर आवाज में बताया, ‘‘रोया तक नहीं.’’

‘हैं,’ फूलचंद ने सोचा, ‘क्या यह गूंगा भी होगा?’

सुरना पहले ही काफी दुखी प्रतीत हो रही थी. इसलिए फूलचंद ने और कोई सवाल न किया. बस, अपनेआप को कोसता रहा और बाहर सोए तीनों बच्चों को ला ला कर अंदर लिटाता रहा. फिर खुद भी उन्हीं के साथ सिकुड़ कर लेटा रहा.

मगर उस की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. रहरह कर नवजात शिशु का चेहरा आंखों के आगे नाचने लगता था. तरहतरह की आशंकाएं मन में उठ रही थीं. फूलचंद ने सुना था कि उस तरह के बच्चे कुछ दिनों के ही मेहमान होते हैं. मगर वह बच्चा अगर जी गया तो…?

इसी तरह की उलझनों में पड़े हुए फूलचंद ने बाकी रात आंखों में ही काट दी.

सुबह होतेहोते रामचरन की घरवाली के माध्यम से यह बात महल्ले भर में जंगल की आग की तरह फैल गई कि फूलचंद के यहां विचित्र बालक का जन्म हुआ है.

बस, फिर क्या था. तमाशबीन औरतों के झुंड के झुंड आने शुरू हो गए. उन का तांता टूटने का नाम ही नहीं लेता था. वह एक ऐसी मुसीबत थी जिस की फूलचंद ने कल्पना तक नहीं की थी. मगर चुप्पी साधे रहने के सिवा कोई दूसरा चारा भी नहीं था.

तभी तमाशबीन औरतों के एक झुंड के साथ भगवानदीन की मां राधा आई. उस ने सारा वातावरण ही बदल कर रख दिया. राधा ने बच्चे को देखते ही हाथ जोड़ कर प्रणाम किया. फिर जमीन पर बैठ कर माथा झुकाया और साथ आई औरतों को फटकार लगाई, ‘‘अरी, ऐसे दीदे फाड़फाड़ कर क्या देख रही हो? प्रणाम करो. यह तो साक्षात गणेशजी ने कृपा की है सुरना पर. इस की तो कोख धन्य हो गई.’’

साथ आई औरतें अभी तक तो राधा के क्रियाकलाप अचरज से देख रही थीं. किंतु उस की बात सुनते ही जैसे उन की भी आंखें खुलीं. सब ने शिशु को प्रणाम किया. सुरना की कोख को सराहा और हाथ में जो भी सिक्का था, वही चारपाई के सामने अर्पित करने के बाद जमीन पर माथा टेक दिया.

अब राधा बाहर फूलचंद के पास दौड़ी आई. वह थकान और चिंता के कारण बाहर चबूतरे पर घुटनों में सिर डाले बैठा था. राधा ने उसे झिंझोड़ कर उठाया, ‘‘अरे, क्या रोनी सूरत बनाए बैठा है यहां. तुझे तो खुश होना चाहिए, भैया. सुरना की कोख पर साक्षात ‘गणेशजी’ ने कृपा की है. तेरे तो दिन फिर गए. और देख, वह तो माया दिखाने आए हैं अपनी. वह रुकेंगे थोड़ा ही. जब तक हैं, खुशीखुशी उन की सेवा कर. हजारों वर्षों में किसीकिसी को ही ऐसा अवसर मिलता है.’’

फूलचंद चमत्कृत हो उठा, ‘‘यह बात तो मेरे दिमाग में आई ही नहीं थी, काकी.’’

‘‘अरे, तुम लोग ठहरे उम्र व अक्ल के कच्चे,’’ राधा ने बड़प्पन झाड़ा, ‘‘तुम्हें ये सब बातें कहां से सूझें. और हां, लोग दर्शन को आएंगे तो किसी को मना न करना, बेटा. उन पर कोई अकेले तेरा ही हक थोड़ा है. वह तो साक्षात ‘परमात्मा’ हैं, वह सब के हैं, समझा?’’

फूलचंद ने नादान बालक की तरह हामी भरी और लपक कर अंदर पहुंचा. दरअसल, अब वह शिशु को एक नई नजर से देखना चाहता था. मगर चारपाई के पास पड़े पैसों को देख कर वह एक बार फिर चक्कर खा गया. सुरना से पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘वही लोग चढ़ा गए हैं,’’ सुरना ने बताया, ‘‘काकी कहती थीं, गणेशजी…’’

‘‘और नहीं तो क्या,’’ फूलचंद में जैसे नई जान पड़ने लगी थी, ‘‘न तो तेरी मति में यह बात आई, न ही मेरी. मगर हैं ये साक्षात गणेशजी ही.’’

‘‘हम लोग उन की माया क्या जान सकें. अपनी माया वही जानें.’’

फूलचंद को एकाएक शिशु की चिंता सताने लगी, ‘‘यह तो हिलताडुलता भी नहीं. देख सांस तो चलती है न?’’

सुरना ने कपड़ा हटा कर देखा. सांसें चल रही थीं.

फूलचंद को अब दूसरी चिंता हुई, ‘‘भला एकआध बार दूधवूध चटाया या नहीं?’’

सुरना ने तनिक दुखी स्वर में कहा, ‘‘दूध तो मुंह में दाब ही नहीं पाता.’’

‘‘ओह,’’ फूलचंद झल्लाया, ‘‘क्या इसे भूखा मारोगी? देखो, मैं रुई का फाहा बना कर देता हूं. तुम उसी से दूध इस के मुंह में टपका देना. गला सूखता होगा.’’

शिशु का गला सींचने का यह उपक्रम चल ही रहा था कि कुछ और लोग कथित गणेशजी के दर्शनार्थ आ पहुंचे. इस बार औरतों के अलावा मर्द भी आए थे. दूसरी खास बात यह थी कि कुछ लोगों के हाथों में फूल और फल भी थे. फूलचंद ने लपक कर प्रसन्न मन से सब का स्वागत किया, ‘‘आइए आइए, आप लोग भी दर्शन कीजिए.’’

दोपहर ढलतेढलते कथित गणेशजी के जन्म की खबर पासपड़ोस के महल्लों तक फैल गई. श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी. मिठाई, फल, मेवा, फूल आदि जो बन पाता, लिए चले आ रहे थे. उस के अलावा नकदी का चढ़ावा भी कम न था.

शाम को किसी पड़ोसी ने सलाह दी, ‘‘कुछ परचे छपवा कर बांट दिए जाएं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को खबर हो जाए और वे दर्शन का लाभ प्राप्त कर सकें.’’

फूलचंद को वह सलाह जंची. पता नहीं, कब उस की भी यह दिली इच्छा हो आई थी कि जितने ज्यादा लोग दर्शन का लाभ उठा लें, उतना ही अच्छा.

आननफानन मजमून बनाया गया और एक पड़ोसी ने खुद आगे बढ़ कर परचे छपवा कर अगले ही दिन मुहैया कराने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली.

रात करीब 10 बजे दर्शनार्थियों का तांता टूटा. तब फूलचंद ने दर्शन बंद होने की घोषणा की. उस रात फूलचंद के परिवार ने बहुत दिनों बाद तृप्ति भर सुस्वाद भोजन का आनंद उठाया था. दूसरे दिन परचे बंटे और एक स्थानीय अखबार के प्रतिनिधि आ कर बच्चे की तसवीर खींच ले गए. अखबार में बच्चे की तसवीर और विचित्र बालक के जन्म की खबर छपते ही, शहर में जैसे आग सी लग गई. दूरदराज के महल्लों से भी लोग दर्शन के लिए टूट पड़े.

फूलचंद के घर के सामने मेला सा लग गया. पता नहीं, कहां से फूल आदि ले कर एक माली बैठ गया. उस के अलावा महल्ले के हलवाई को दम मारने की फुरसत न थी. उस भीड़ को व्यवस्थित ढंग से दर्शन कराने के लिए फूलचंद को अपने कमरे का दूसरा दरवाजा (जो अभी तक बंद रखा जा रहा था) खोलना पड़ा. अब लोग कतार बांधे एक दरवाजे से अंदर आते थे और दर्शन कर के दूसरे दरवाजे से बाहर निकल जाते थे.

फूलचंद और उस के बच्चे सुबहसुबह ही नहाधो कर साफसुथरे कपड़े पहन लेते और दर्शन की व्यवस्था में जुट जाते. घर में अब न तो पहले जैसा तनाव था, न ही कुढ़न. सभी जैसे उल्लास की लहरों में तैरते रहते थे.

फूलचंद थोड़ीथोड़ी देर बाद सुरना के पास आ कर उस के कान में शिशु को रुई के फाहे से दूध चटाते रहने की हिदायत देता रहता था. इस बहाने वह अपनेआप को आश्वस्त भी कर लेता था कि शिशु अभी जीवित है.

रात को भी वह कई बार शिशु को देखता और उस की सांसें चलती देख कर चैन से सो जाता. सब कुछ सामान्य ढंग से चल रहा था. कहीं कोई समस्या न थी. हां, एक समस्या यह जरूर पैदा हो गई थी कि चढ़ावे में चढ़ी मिठाई का क्या किया जाए. उसे उपभोग के लिए ज्यादा दिन बचाए रखना संभव न था. यों फूलचंद ने महल्ले में अत्यंत उदारतापूर्वक प्रसाद बांटा था. फिर भी मिठाई चुकने में न आती थी.

लेकिन उस समस्या का हल भी निकल आया. रात में मिठाई फूलचंद के यहां से उठा कर हलवाई के हाथों बेच दी जाती, फिर सुबह श्रद्धालुओं के हाथों में होती हुई दोबारा फूलचंद के यहां चढ़ा दी जाती.

छठे दिन भोर में ही सुरना ने फूलचंद को जगाया और घबराई हुई आवाज में कहा, ‘‘देखो, इस को क्या हो गया?’’

फूलचंद ने हड़बड़ा कर शिशु को उघाड़ दिया. झुक कर गौर से देखा. उस की सांसें बंद हो चुकी थीं. हताश हो कर सुरना की ओर देखा, ‘‘खेल खत्म हो गया.’’ सुरना की रुलाई खुद व खुद फूट पड़ी. मगर फूलचंद ने उसे रोका, ‘‘नहीं, रोनाधोना बंद करो. इस को ऐसे ही लेटा रहने दो. देखो, किसी से जिक्र न करना. थोड़ी देर में लोग दर्शन के लिए आने लगेंगे.’’

सुरना ने रोतेरोते ही कहा, ‘‘मगर यह तो…’’

‘‘तो क्या हुआ?’’ फूलचंद ने कहा, ‘‘यह तो वैसे भी न तो रोता था, न ही हिलताडुलता था. लोगों को क्या पता चलेगा? हां, शाम को कह देंगे कि भगवान ने माया समेट ली.’’ और फिर जैसे सुरना को समझाने के बहाने फूलचंद अपनेआप को भी समझाने लगा, ‘कोई हम ने तो भगवान से यह स्वरूप मांगा न था. यह तो उन्हीं की कृपा थी. शायद हमारी गरीबी ही दूर करने आए थे. आज दिन भर लोग और दर्शन कर लेंगे तो कुछ बुरा तो नहीं हो जाएगा.’

सुरना घुटनों पर माथा टेके सिसकती रही. फूलचंद ने फिर समझाया, ‘‘देखो, अब ज्यादा दुख न करो. ज्यादा दिन तो इसे वैसे भी नहीं जीना था. और जी जाता तो क्या होता इस का. उठो, तैयार हो कर रोज की तरह बैठ जाओ. लोग आने ही वाले हैं.’’ सुरना बिना कुछ बोले तैयार होने के लिए उठ गई. थोड़ी देर बाद ही वहां दर्शनार्थियों का तांता लगना शुरू हो गया और भेंट व प्रसाद के रूप में फूलों, मिठाइयों एवं सिक्कों के ढेर लगने लगे.

Hindi Story : रिजैक्शन

Hindi Story : कितना खुश और जोश में था वीर अपनी सगाई में. उम्र के इस दौर में, जब जोबन उछाह भर रहा हो, यह होना भी था. कभी उस ने लड़कियों के लिए खास उत्सुकता नहीं दिखाई थी.

दरअसल, उसे जैसे इस के लिए समय ही नहीं मिला था या समय ने उसे इस लायक रख छोड़ा था कि उस की इस में कोई दिलचस्पी ही नहीं रही थी.

मां की मौत तो बचपन में ही हो गई थी. तब वीर चौथी क्लास में था. पापा ने दूसरी शादी की और उसे होस्टल में भेज दिया गया. शायद पापा के मन में यह भाव या डर रहा हो कि उन की दूसरी पत्नी पता नहीं अपने इस सौतेले बेटे के साथ कैसा बरताव करेगी. इस तरह वह अचानक ही प्यार जैसे भावों से दूर अपनी एकाकी जिंदगी काटते रह गया था.

ऐसी बात नहीं थी कि वीर बिलकुल ही अकेला था. एक तो वह शुरू से ही शांत स्वभाव का रहा था, मां की मौत के बाद वह और भी चुप रहने लगा था. रहीसही कसर उस के होस्टल के सख्त अनुशासन और कायदेकानूनों ने पूरी कर दी थी.

होस्टल में लड़कों के कई ग्रुप थे. उन से भी वीर का कोई खास लगाव नहीं था. वह बस पढ़ाई और खेल तक ही सिमटा रहा. वैसे भी पढ़ाई में वह बहुत तेज था और सभी उसे किताबी कीड़ा ही मान कर चलते रहे.

दरअसल, जब भी वीर छुट्टियों में घर आता, तो यहां भी उसे कुछ खास लगाव हो नहीं पाया. आगे चल कर उस की दूसरी मां से भाईबहन हुए, तब तो ये दूरियां कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थीं. यह अलग बात है कि अब वे उस के प्रति अपनेपन का भाव रखने लगे थे. सौतेली मां खासतौर पर उस के खानपान का खास खयाल रखती थीं, ताकि गांव में कोई कुछ आरोप न लगा दे.

यह इत्तिफाक की बात थी कि 12वीं जमात पास करने के बाद वीर इंजीनियरिंग डिप्लोमा में चुन लिया गया था. यहां भी उस ने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की बढि़या से पढ़ाई की और एक सरकारी नौकरी में लग गया. उस के पापा ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार उस से खुश था.

लेकिन वीर में एक यही कमी रह गई थी कि वह अपने डिप्रैशन से बाहर निकल नहीं पाया था. वह हमेशा खोयाखोया सा रहता था या खुद को उदास पाता. पापा ने इस के लिए उसे डाक्टर को दिखाया भी था.

डाक्टर ने कहा था कि चिंता की कोई बात नहीं है. यह समय के साथ ठीक हो जाएगा. शादी के बाद तो वीर बिलकुल ठीक हो जाएगा, इसलिए पापा ने उस की शादी की बात चलानी शुरू कर दी थी. कई जगह देखने के बाद बक्सर में एक जगह उस का रिश्ता तय हो गया था.

जैसा कि आमतौर पर नया चलन है, वीर की सगाई भी धूमधाम से कर दी गई. एक रिसौर्ट में दोनों परिवार अपने रिश्तेदारों के साथ जमा हुए और धूमधाम से सगाई की रस्म पूरी की गई थी. बिलकुल शादी जैसी धूमधाम. पहली बार वह किसी लड़की के करीब और साथसाथ बैठा था, उस से खुल कर बातें की थीं.

आज के इस जमाने में शादी का मतलब जब छोटेछोटे लड़के जानते हैं, तो वीर की तो बात ही अलग थी. फिर रूपा का तो कहना ही क्या. पहले उस ने उस के कंधे से सिर टिकाया, हाथों में हाथ लिया और बातें करने लगी. उसे भी यह सबकुछ अच्छा लग रहा था.

रूपा के सुखदुख की कहानियों में वीर दिलचस्पी लेते हुए पहली बार उसे महसूस हुआ कि सिर्फ वही दुखी नहीं है, बल्कि दूसरे लोग भी दुखी हैं और उन्हें भी किसी सहारे की जरूरत होती है. जब वह रूपा जैसी कोई लड़की हो, तो उसे सहारा देना उस का फर्ज बनता है. उस की तर्जनी में पड़ी सगाई की वह सोने की भारी अंगूठी जैसे उसे इस का अहसास भी दिलाती थी.

अकसर रूपा ही उसे फोन करती थी खासकर रात में तो यह उस का नियमित शगल था और फिर वे दोनों दुनियाजहान की बात करते थे. अपने मन को वीर ने पहली बार किसी अनजान के सामने खोला था.

रूपा को ले कर वीर के मन में अनेक भाव उपजते और एक अनकहे जोश और उछाह से वह भर उठता था. जिंदगी के रंगीन सपने उस के सामने पूरे से होने लगते थे.

आरा से बक्सर की दूरी कुछ खास नहीं है और जैसे ही वीर का डुमरांव ब्लौक में ट्रांसफर हुआ, तो यह दूरी और घट गई थी. अपने घर तो वह कभी रहा ही नहीं. जहां उस की नौकरी होती, वहीं उसे क्वार्टर भी मिल जाता था. यहां डुमरांव में रहते हुए वह एकाध बार बक्सर गया, तो उस ने रूपा को वहीं बुला कर बातें भी कर आता था.

दरअसल, यह रूपा की ही जिद थी कि वीर उस से मिले, तो उसे भी इस मेलजोल में कुछ गलत नहीं लगा था और इस के बाद तो जब भी उसे समय मिलता, अपनी मोटरसाइकिल उठा कर बक्सर चला आता था.

यहां वे किसी रैस्टोरैंट या पार्क में घंटों बैठ कर बातें करते, खातेपीते और घूमते थे और यह बात दोनों के ही परिवार में पता चल गई थी.

छोटे शहरों में ऐसी बातें छिपती भी कहां हैं. वीर के पापा और दूसरी मां ने उसे आगाह भी किया था कि शादी से पहले इस तरह मिलनाजुलना ठीक नहीं है, जिसे उस ने हंसी में उड़ा दिया था.

वीर ने इस बात की चर्चा रूपा से करते हुए पूछा था, ‘‘क्या तुम्हारे पापा भी हमारे मिलनेजुलने को गलत मानते हैं?’’

रूपा हंस कर बोली थी, ‘‘गलत, अरे वे तो इसे बहुत अच्छा मानते हैं कि इसी बहाने हम एकदूसरे को जानसम झ रहे हैं. जब भविष्य में शादी होनी ही है, तो अभी मिलनेजुलने पर रोकटोक क्यों करें.

‘‘हां, मां जरूर इसे ठीक नहीं मानती हैं, मगर पापा का कहना है कि वे दोनों एक हद में रहें, तो मिलनेजुलने में क्या बुराई है.’’

इस बीच वीर ने रूपा को कितने ही सस्तेमहंगे उपहार खरीद कर दे डाले थे. होटलरैस्टोरैंट में हजारों रुपए का बिल वह हंसतेहंसते भर जाता था कि अपनी मंगेतर के लिए इतना भी न कर सका, तो उस का नौकरी करना बेकार है.

मगर इस बीच वीर के साथ एक घटना हो गई. वीर के औफिस में कोई बड़े लैवल का खरीद घोटाला हुआ था, जिस में उस का नाम भी घसीट लिया गया था.

डिपार्टमैंटल इंक्वायरी में पटना के बड़े अफसर आए और उस से कड़ी पूछताछ की. चूंकि उस के कई जगह पर दस्तखत थे, सुबूत उसे ही कुसूरवार ठहराते थे.

साथी मुलाजिमों ने बड़े अफसरों से अलग चुगली कर रखी थी कि अपनी मंगेतर के यहां कोई अकसर जाएगा और पार्टियां करतेफिरते, महंगेमहंगे गिफ्ट भेंट में देगा, तो क्या यह तनख्वाह से मुमकिन है? उस के लिए तो कोई भी गलत रास्ता ही अख्तियार करेगा न. तनख्वाह के पैसे पर कौन फालतू के खर्च करता है?

एक साथी मुलाजिम ने तो हद कर दी, जब उस ने वीर को ‘मैंटल’ बता दिया. और इसी के साथ वह सस्पैंड कर दिया गया था.

ज्यों ही यह खबर फैली तो वाकई वीर की दिमागी हालत गड़बड़ा गई थी. उस के पापा आए और फिर उन्होंने ही उसे संभाला था. उसे साथ घर ला कर अपनी देखरेख में रखा. उस के भाईबहन भी उस का खयाल रखते और उसे खुश रखने की पूरी कोशिश करते और हंसाते थे.

पापा ने वीर को पटना में एक साइकियाट्रिस्ट को भी दिखाया और कुछ इलाज कराया. फिर वे उस के सस्पैंशन के मामले में पड़े कि क्या हो सकता है. इस के लिए वे वकीलों और बड़े अफसरों से भी मिले.

अगले 3 महीने वीर के लिए भारी पड़े थे. आखिरकार घोटाले का भेद खुला, तो उस में 2 मुलाजिमों की भागीदारी देखने को मिली.

दरअसल, वे दोनों जैसे ही जानते कि वीर बक्सर जाने की हड़बड़ी में है. उस से जाते समय कुछ दस्तावेजों पर दस्तखत ले लेते थे. अपने जाने की हड़बड़ी में वह ज्यादा ध्यान नहीं दे पाता था. इस तरह उन लोगों ने लाखों रुपए की हेराफेरी कर ली थी.

मगर यह भी सच है कि विभागीय खर्चे किसी एक के दस्तखत करने से नहीं होते. उस में 3 और मुलाजिम फंसे थे और उन लोगों ने भागदौड़ कर सही बात पता कर ली थी. उन लोगों की वजह से असली कुसूरवार पकड़े गए.

मगर वीर की जिंदगी में जैसे एक और तूफान इंतजार कर रहा था. रूपा के घर में उस के सस्पैंशन वाली बात का पता चल चुका था. उस से भी बड़ी बात यह कि उस के पापा ने इस रिश्ते के लिए इनकार कर दिया था, क्योंकि उन्हें एक बड़ा घराना मिल चुका था.

वीर ने रूपा को कई बार फोन किया. वह बक्सर आया और एक रैस्टोरैंट में रूपा को मिलने भी बुलाया. वह चुपचाप आई और एक कोने में बैठ गई.

‘‘कैसे हो तुम?’’ वीर ने पूछा.

रूपा ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘बहुत बुरा हुआ तुम्हारे साथ.’’

‘‘वह तो जो हुआ, सो हुआ,’’ वीर ने अपनी उंगली में पहनी सगाई की अंगूठी को घुमाते और देखते हुए नाराजगी दिखाई, ‘‘मगर, तुम ने भी नाता तोड़ लिया.’’

‘‘ऐसा न कहो. दरअसल, मेरे पापा को कुछ लोगों ने बहका दिया था कि लड़के में कुछ दिमागी परेशानी है, इसलिए वहां रिश्ता करना सही नहीं है. मगर, मैं तो एकदम से अड़ गई कि मु झे तुम्हारे साथ ही शादी करनी है.’’

थोड़ी देर तक मानमनुहार की बात चलती रही. चाय और नाश्ते का दौर चला. इस बीच रूपा अचानक बोली, ‘‘अरे हां, मैं तुम्हें एक बात बताना भूल गई. हम ने तुम्हें जो सगाई की अंगूठी पहनाई थी, उस के बारे में शक है कि उस में ज्यादा मिलावट तो नहीं है, इसलिए मां ने कहा है कि तुम से वह अंगूठी एक दिन के लिए ले लूं. उस की किसी दूसरे सुनार से जांच करवाने पर तसल्ली मिल जाएगी, इसलिए तुम वह अंगूठी मुझे दे दो.’’

‘‘यह क्या बात हुई. अब जैसी भी है, यह सगाई की अंगूठी है और मैं इसे अपनी उंगली से नहीं निकाल सकता. एक यही तो अंगूठी है, जिस की वजह से मु झे अपने तनाव को कम करने में मदद मिली थी. जब भी इसे देखता, तो तुम्हारी याद आती और मेरी हिम्मत बढ़ जाती थी.’’

‘‘सचमुच इस अंगूठी से मु झे भी बहुत ताकत मिलती है. मगर, एकाध दिन की ही तो बात है…’’ रूपा अपनी उंगली में फंसी सगाई की अंगूठी से खेलते हुए बोली, ‘‘यह हमारे पहले प्यार की निशानी है, तो ही ऐसा लगेगा.

मगर हमें थोड़ा प्रैक्टिकल हो कर भी सोचना चाहिए.

‘‘कोई हमें जानबू झ कर ठगे, यह भी तो कोई अच्छी बात नहीं है न, इसलिए अभी इसे दे दो. अगली बार आना, तो इसे ले लेना. आखिर मैं इसे ले कर क्या करूंगी?’’

वीर ने सगाई वाली अंगूठी रूपा को दे दी.

अगली बार जब वीर आया, तो तय जगह पर आने के लिए उस ने रूपा को फोन किया था. वह तो नहीं आई, मगर उस के पापा वहां आ गए. वह उन के सम्मान में उठ खड़ा हुआ.

‘‘ऐसा है बाबू कि रूपा की तबीयत थोड़ी खराब है, इसलिए वह नहीं आई…’’ थोड़ी देर ठहर कर वे उसे गौर से देखते हुए बोले, ‘‘और हां, अब हमें तुम्हारे साथ रूपा की शादी करने में कुछ दिक्कत महसूस हो रही है. यह लो सगाई की वह अंगूठी, जो तुम ने रूपा को पहनाई थी.’’

यह सुनते ही वीर को धरती घूमती नजर आई. वह बोला, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं. 4 महीने पहले हमारी सगाई हुई थी. 2 महीने बाद शादी होना तय था. और आप कुछ दूसरी ही बात कर रहे हैं,’’ वह अपनी उखड़ती हुई सांसों को काबू में करते हुए बोला, ‘‘इतने दिनों में हम एकदूसरे को बहुत जाननेसम झने और प्यार करने लगे हैं. और आप कहते हैं कि यह रिश्ता टूटेगा. ऐसा कैसे हो सकता है. रूपा इसे बरदाश्त नहीं कर पाएगी.’’

‘‘वह ऐसा है बाबू कि हमें काफीकुछ प्रैक्टिकल हो कर सोचना पड़ता है. तुम्हारे पापा औसत दर्जे के किसान ठहरे. घर में सौतेली मां और भाईबहन हैं. तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं रहती.

‘‘ऐसे में तुम्हारे छोटे से घर में रूपा का निबाह नहीं होगा. यह सब जानते हुए हम रूपा की शादी तुम्हारे साथ नहीं कर सकते. उसे भी यह रिश्ता मंजूर नहीं है.’’

रूपा के पापा अपनी रौ में बोले जा रहे थे. बिना यह जानेसम झे कि वीर के दिल पर क्या बीत रही होगी, ‘‘और रही बात रूपा की, तो उसे एक और अच्छा लड़का मिल गया है. बैंगलुरु में सौफ्टवेयर इंजीनियर है. तो रूपा को भी सब से अलग बैंगलुरु में अकेले रहने का चाव पूरा होगा.

‘‘लड़के के पिता की 30 बीघा की खेती है. उस के पिता अमीर किसान हैं और वह एकलौता लड़का है. एक बड़ी बहन है, जिस की शादी हो चुकी है. ऐसे में उसे और क्या चाहिए? इसलिए उस की तो बात ही मत करो.’’

‘‘यह आप से किस ने कह दिया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं रहती. ठीक है कि असमय मां के गुजर जाने के बाद मैं डिप्रैशन में आ गया था. पापा ने मु झे होस्टल में डाल दिया था. लेकिन होस्टल में रह कर पढ़ाई करना कोई गुनाह तो नहीं…’’ वीर अपनेआप को काबू में करता हुआ सा बोला, ‘‘और रही बात मेरी सौतेली मां और भाईबहनों की, तो यह आप की गलतफहमी है. वे मु झे सगी मां जैसा प्यार करती हैं. उन्होंने कभी भेदभाव नहीं किया.

‘‘और आप को भी थोड़ा सोचसम झ कर किसी के बारे में बोलना चाहिए. आखिर में वे सौतेली ही सही, पर मेरी मां हैं. उन्होंने मुझ में और अपने बेटों में कभी कोई फर्क नहीं किया.’’

‘‘वह सब तो ठीक है बाबू. मगर हम जानबू झ कर मक्खी नहीं निगल सकते न. मैं ने अपने शहर में ऐसे अनेक केस देखे हैं, जिस से घरपरिवार बिखर गया है, इसलिए तुम अपने पापा को बता देना.’’

‘‘मैं बताऊंगा कि आप बताएंगे…’’ वीर गुस्से में आ गया था, ‘‘आप को किसी की भावनाओं से खेलने का कोई हक नहीं है. मेरे परिवार को जब यह पता चलेगा, तो उस पर क्या बीतेगी?’’

‘‘अब तुम से बात क्या करना…’’ रूपा के पापा जाते हुए बोले, ‘‘ठीक है, मैं ही तुम्हारे पापा को बता दूंगा.’’

वीर पर जैसे बिजली सी गिरी थी. क्या ऐसे भी रिश्ता तोड़ा जाता है? मगर सबकुछ अपनी आंखों से देखने और कानों से सुनने के बाद अब बाकी क्या रहा था.

वीर के पापा ने सारी जानकारी लेने के बाद थोड़ी भागदौड़ की, उस के ठीक होने के कागजात तक उन्हें दिखाए, मगर रूपा का परिवार टस से मस नहीं हुआ. तब उन्होंने कहा कि जब उन की बेटी के लिए दूसरे लड़के मिल सकते हैं, तो उन्हें भी अपने बेटे के लिए दूसरी लड़कियां मिल जाएंगी.

मगर वीर के दिल में तो रूपा घर कर गई थी. उस ने उस से मिलने की कोशिश की, मगर वह नाकाम रहा था. यह तो तय था कि रूपा की भी इस सगाई को तोड़ने में रजामंदी थी, तभी तो उस ने बहाने से वीर की सगाई की अंगूठी वापस ले ली थी. फिर भी उस का दिल इस सच को मानने को तैयार नहीं होता था.

जब वीर पहली बार रूपा से एकांत में मिला था, तब वह उसे निहारती रह गई थी.

‘‘तुम्हारे इस सांवलेसलोने रूप पर तो लड़कियां मरमिट जाएंगी. मैं कितनी खुशकिस्मत हूं कि तुम मु झे मिले हो,’’ रूपा वीर के सीने पर अपना सिर रख कर उस की बांहों की मछलियों से खेलती हुई कह रही थी, ‘‘तुम्हारे जैसा बांका जवान तो मु झे पूरी दुनिया में नहीं मिलने वाला. अच्छीभली सरकारी नौकरी है तुम्हारी. छुट्टियों में हम आराम से एकाध साल में एकाध महीने के लिए बाहर घूमने जा सकते हैं.’’

रूपा का दूधिया रंग और मासूम चेहरा वीर के आगे घूम जाता था. लेकिन आज उसी रूपा ने वीर को अपने मन से दूध में गिरी मक्खी के समान निकाल फेंका था. मन के किसी कोने में यह बात भी उठती कि आज जब उस का रिजैक्शन हुआ, तब उसे अहसास हो रहा है कि इस रिजैक्शन से लड़कियों के दिल पर भी क्या गुजरती होगी.

वीर को अब भी यकीन नहीं होता था कि उस की सगाई टूट गई है. उस के साथी सामने तो कुछ कहते नहीं थे, पर पीठ पीछे हंसते थे. सचमुच अविश्वास की एक फांस तो लग ही गई थी कि कहीं कुछ तो गलत है ही उस में, जिस से उस की सगाई टूट गई है.

समय का चक्र नहीं रुकता और वीर के पापा भागदौड़ में लगे थे. सौतेली मां ने अपने भाइयों से कह कर उस के लिए अनेक जगह से रिश्ते की बात चला रखी थी. कुछ रिश्तों के प्रस्ताव उस के पास आ चुके थे और चुनाव अब उसे करना था, मगर रहरह कर उसे रूपा की याद आती, तो वह बेचैन हो जाता था.

फिर भी समय ने तो वीर को यह सिखा ही दिया था कि अब पिछला सब भूल कर आगे की ओर बढ़ जाना है. यही सब के फायदे में है.

Family Story : सवेरा

Family Story : उस गांव में पंडित बालकृष्ण अपने पुरखों द्वारा बनाए गए मंदिर में भगवान की पूजा में लीन रहते थे. रोजीरोटी के लिए 8 बीघा जमीन थी. बालकृष्ण बड़े ही सीधेसादे और विद्वान थे. उन की पत्नी गायत्री भी सीधीसादी, सुशील, पढ़ीलिखी और सुंदर औरत थीं. बालकृष्ण का ब्याह हुए 2 साल हो गए थे, फिर भी उन्हें कोई बच्चा नहीं हुआ था.

बालकृष्ण के पिता दीनदयाल काफी कट्टरपंथी थे. जातपांत और ऊंचनीच मानने के चलते उन्होंने छोटी जाति के लोगों को कभी मंदिर में घुसने नहीं दिया था.

गणेश पूजा के समय गांव के हर जाति के परिवार से बिना भेदभाव के चंदा लिया गया. बालकृष्ण ने सोचा कि इस पैसे द्वारा खरीदे गए प्रसाद और दूसरी चीजों का इस्तेमाल उस पूजा में लगे लोग नहीं करेंगे, पर उन्हें यह देख कर हैरानी हुई कि उन लोगों ने पूजा खत्म होने पर चंदे के पैसों से ही हलवापूरी बनाई और खुद खाई. उसी समय जब एक छोटी जाति का लड़का प्रसाद लेने आया, तो सभी ने उसे दुत्कार कर भगा दिया.

गांव के हरिजनों के लिए शासन सरकारी जमीन पर मकान बनवा रहा था. एक हरिजन जब इस सुविधा का फायदा उठाने के लिए पटवारी साहब और ग्राम पंचायत के सचिव से मिलने गया, तो बालकृष्ण उत्सुकता से पास ही खड़े हो कर बातचीत सुनने लगे.

हरिजन से 2,000 रुपए लेते हुए उस ने सचिव को देखा, तो उन्हें यकीन नहीं हुआ. इस के बाद इन रुपयों को उन्होंने पटवारी, सचिव और सरपंच को आपस में बांटते देखा, तो वे भौंचक्का रह गए. 101 रुपए उन के पुजारी पिता को भी बाद में दिए गए.

उन्होंने पिताजी से पूछा भी कि हरिजनों के अशुद्ध रुपए क्यों ले लिए, तो उन्होंने उसे बड़े प्यार से समझाया, ‘‘बेटा, लक्ष्मी कभी अशुद्ध नहीं होती.’’

बालकृष्ण के लिए यह एक अबूझ पहेली थी कि जब निचली जाति के लोगों से खेतों में काम करवा कर फसल तैयार करवाने में कोई हर्ज नहीं है, तो उन के द्वारा छुए गए अनाज को खाने में क्या हर्ज है?

बालकृष्ण जब गांव के बड़े लोगों जैसे पटवारी, ग्रामसेवक, सचिव और सरपंच को निचली जाति के लोगों से रुपए लेते देखते थे, तो यह समझ नहीं पाते थे कि क्या इसी पैसे से खरीदी गई चीजें अशुद्ध नहीं होतीं?

मंदिर में होने वाले किसी भी काजप्रयोजन के समय इन लोगों को अपनेअपने घर से एक बंधाबंधाया पैसा देने का आदेश दे दिया जाता था. उस से पूरे हो रहे उस काजप्रयोजन को देखना और उस का प्रसाद लेना इन के लिए बड़ा कुसूर माना जाता था.

बालकृष्ण ने जबजब इस तरह के सवालों के जवाब चाहे, तबतब उन से कहा गया कि ऐसा शास्त्रों में लिखा है और बहुत पहले से होता आ रहा है. इन बातों से धीरेधीरे बालकृष्ण के मन में ऊंचनीच और भेदभाव को मानने वाले इस समाज से घिन होती जा रही थी.

बालकृष्ण जातपांत के जबरदस्त खिलाफ थे. पिता दीनदयाल की मौत के बाद उन्होंने अछूत लोगों को गले लगा लिया और सभी भेदभाव भुला कर मंदिर के दरवाजे सभी के लिए खोल दिए. वे अछूतों को दया, क्षमा, परोपकार, अहिंसा की सीख देने लगे.

मंदिर में रोज पूजा के बाद बालकृष्ण छोटी जाति के लोगों को नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने और अंधविश्वास व दूसरे गलत रिवाजों को छोड़ने की सीख देते थे. साथ ही साथ नौजवानों को रोजगार के कई उपाय बताते थे.

इस से गरीब लोगों में एक नई जागरूकता आने लगी थी. वे अब अपनी माली हालत को सुधारने के लिए सचेत होने लगे थे. इस का नतीजा यह हुआ कि उन गरीबों के खून को चूसने वालों की आंखों में बालकृष्ण चुभने लगे.

बालकृष्ण अपने खेतों में सब्जी और अनाज उगाते थे और उन्हें बेचने के लिए मंडी जाते थे. एक दिन उन के विरोधी श्रीधर और महेंद्र सिंह मंडी में ही उन्हें मिल गए. इन लोगों ने बालकृष्ण से मीठीमीठी बातचीत की और ठंडाई पीने का मनौव्वल किया.

बालकृष्ण ने इन लोगों की बात मान ली. ठंडाई पीते समय श्रीधर और महेंद्र सिंह के होंठों पर शैतानी मुसकराहट फैल गई, क्योंकि अपने इस दुश्मन को मिटाने का अच्छा मौका उन्हें मिल गया था.

गांव वापस आते समय रास्ते में बालकृष्ण की तबीयत खराब हो गई. घर पहुंचने पर उन के अपने लोगों ने दवा की, लेकिन बालकृष्ण बच नहीं सके.

बालकृष्ण की मौत से गांव में कुहराम छा गया. गायत्री के लिए सारी दुनिया नीरस हो चुकी थी.

इधर बालकृष्ण के रिश्तेदारों ने पैसों के लालच में गायत्री के सती होने की खबर उड़ा दी. यह खबर जंगल की आग की तरह आसपास के गांवों में फैल गई. सती माता को देखने के लिए अनगिनत लोग आ रहे थे. मंदिर में अगरबत्ती, प्रसाद और रुपयों का ढेर लग गया था.

बालकृष्ण के रिश्तेदार इन सब को बटोरने में लगे हुए थे. कारोबारी लोग 10 रुपए की चीज 50 रुपए में बेच रहे थे. गांव में इतनी भीड़ इकट्ठी हो गई थी कि लोगों को पीने का पानी भी नहीं मिल पा रहा था.

गांव के स्कूल में छोटी जाति का एक मास्टर था, जिस का नाम मदनलाल था. बालकृष्ण से उस की गाढ़ी दोस्ती थी. अपने दोस्त की मौत से उस के मन को गहरा धक्का लगा था. वह भी मंदिर में गया, लेकिन कुछ लोगों ने उसे मंदिर में घुसने नहीं दिया.

तब मदनलाल को शक हो गया. उस ने कलक्टर से मदद करने की गुहार लगाई और फिर गायत्री को सती होने से रोक दिया. अंधविश्वासी लोग इस काम में बाधा खड़ी करने के चलते मदनलाल की खिंचाई कर रहे थे.

गायत्री निराशा के सागर में गोते लगा रही थीं. उन के सीधेपन का फायदा उठा कर बालकृष्ण के रिश्तेदार अपना मतलब साध रहे थे. जो लोग कल तक बालकृष्ण के खिलाफ थे, वे अब गायत्री के आसपास मंडरा रहे थे. कोई पैसों का लोभी था, तो कोई गायत्री की सुंदरता का. मदनलाल ने मौका पा कर गायत्री को दिलासा दिया और बालकृष्ण के अधूरे काम को पूरा करने की सलाह दी.

मदनलाल की मदद से गायत्री ने गांव में ‘बालकृष्ण स्मृति केंद्र’ खोला. वहां औरतोंमर्दों को पढ़ायालिखाया जाता था और कुटीर उद्योगों के बारे में भी बताया जाता था. पढ़ेलिखें लोगों को रोजगार के लिए बैंक से कर्ज दिलवाया जाता था.

गायत्री भी गांव के बड़े लोगों की आंखों में खटकने लगीं, क्योंकि अब गांव में बेगार करने वालों का टोटा पड़ने लगा था. वे लोग गायत्री को समझाने लगे कि निचली जाति के लोगों को सिर पर बैठाने से उस की हालत अपने पति जैसी ही होगी. गायत्री ने इन बातों की कोई परवाह नहीं की.

एक दिन एकांत पा कर कुछ लोग मंदिर में घुस गए और गायत्री के साथ मारपीट करने लगे. बाद में उन लोगों ने गायत्री को ‘पागल’ करार दिया और मंदिर से निकाल दिया. मदनलाल ने बीचबचाव किया और कानून की मदद से गायत्री को अपना हक वापस दिलवाया.

इस से गांव के बड़े लोग मदनलाल के दुश्मन हो गए. इन लोगों ने बड़े अफसरों को घूस दे कर मदनलाल
की बदली गांव से दूर एक स्कूल में करवा दी.

मदनलाल ने ऐसी बिगड़ी हालत में गायत्री को अकेला छोड़ना मुनासिब नहीं समझा. वह कुछ दिनों की छुट्टी ले कर अपने विरोधियों को सबक सिखाने की कोशिश करने लगा.

मदनलाल ने गायत्री की बहुत मदद की, इसलिए गायत्री उस की अहसानमंद हो गई.

मदनलाल अभी अनब्याहा था. दोनों की नजदीकी धीरेधीरे प्रेम में बदल गई. इन का प्रेम साफसुथरा था, फिर भी दोनों अपने प्रेम को किसी के सामने खुलासा करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे.

गायत्री विधवा विवाह करने से हिचक रही थीं. मदनलाल डर रहा था कि एक ब्राह्मण विधवा के साथ एक छोटी जाति के आदमी के ब्याह से कहीं बखेड़ा न खड़ा हो.

मदनलाल से गायत्री की नजदीकी के चलते समाज के रूढि़वादी लोग बिदकने लगे थे. इन लोगों का कहना था कि ‘पराए मर्द के साथ विधवा का रहना केरबेर की तरह होता है. केला अपने पत्तों को बेर के कांटों से बचा नहीं पाता है’.

इन सारी बातों के बावजूद गायत्री और मदनलाल की नजदीकी बढ़ती ही गई. इस से वे लोग कुढ़ने लगे, जो गायत्री की सुंदरता पर मोहित थे. गायत्री के रिश्तेदार भी उस के खिलाफ आग उगल रहे थे.

आखिरकार मंदिर के अहाते में ब्राह्मण जाति की पंचायत बुलाई गई. पंचों ने मदनलाल को बहुत कोसा.

हालांकि मदनलाल ने अपनी सफाई में बहुतकुछ कहा. लेकिन कई लोगों ने गायत्री के खिलाफ झूठी गवाही दी. तब गायत्री को यकीन हो गया कि पंचायत का फैसला उस के खिलाफ ही होगा.

उन्होंने मन ही मन पक्का निश्चय किया और पंचों के सामने आ कर बोलीं, ‘‘तुम लोग मुझे जाति से बाहर क्या निकालोगे, मैं खुद तुम जैसे घटिया और पाखंडी लोगों की जाति में रहना नहीं चाहती हूं. मैं मदनलाल को अपना पति मान रही हूं.’’

गायत्री की यह हिम्मत देख कर सभी हैरान रह गए. खुद मदनलाल भी भौंचक्का था. उस ने कांपते हाथों से गायत्री की सूनी मांग में सिंदूर भर दिया.

यह देख कर पंचों के चेहरे लटक गए. उन सभी के सामने गायत्री ने मदनलाल से कहा, ‘‘आज हमारी शादीशुदा जिंदगी का पहला सवेरा है. आओ, आज से हम एक नई पहल शुरू करें.’’

लेखक – जी. शर्मा

Hindi Story : नसीब

Hindi Story : पूरे महल्ले में यही सुगबुगाहट थी कि करीम की बेटी खुशबू का निकाह है, वह भी उस की बाप की उम्र के हमीदुल्ला मास्टर के साथ.

जब खुशबू को यह बात पता चली थी कि उस की शादी एक 50 साल के बूढ़े के साथ तय हो गई है, उस दिन वह पूरी रात रोई थी, लेकिन उस के बाद वह खामोश ही रही. वह सम झ चुकी थी कि बूढ़ा शौहर ही उस का नसीब है.

इस के बाद खुशबू एक जिंदा लाश में बदल गई थी, जो केवल देख और सुन सकती थी, लेकिन बोल नहीं सकती थी.

लेकिन इस रिश्ते का विरोध उस की अम्मी ने उस के अब्बू से किया था, मगर खुशबू ने खुद ही अम्मी को चुप करा दिया था.

खुशबू के अब्बू फलों का ठेला लगाते थे, जिसे बेच कर उन्हें मुश्किल से दो वक्त का खाना मिल पाता था, जिस के चलते खुशबू भी पड़ोस की शाहीन खाला के यहां से कढ़ाई करने के लिए साड़ी वगैरह ले आती थी, जिस से उसे भी कुछ पैसे मिल जाते थे और वह अपनी जरूरतें उन्हीं से पूरी कर लेती थी.

लेकिन इधर कुछ दिनों से खुशबू के अब्बू की तबीयत ठीक नहीं थी. सही से इलाज न होने के चलते वे धीरेधीरे बिस्तर से लग गए और फिर तो भूखों मरने की नौबत आ गई.

यह सब देख कर खुशबू की अम्मी आसपास के घरों में चौकाबरतन करने लगी थीं, जिस से अब्बू की दवा और जैसेतैसे घर का खर्च चलने लगा था.

खुशबू खूबसूरत ही नहीं, जहीन भी थी. उस ने घर पर रह कर ही अपनी सहेली गुलशन की मदद से हिंदी में भी पढ़नालिखना सीख लिया था. सभी उस की तारीफ करते नहीं थकते थे.

पहले तो खुशबू के अम्मीअब्बू को लगता था कि उन की बेटी को कोई न कोई रिश्तेदार अपना ही लेगा. अम्मी ने खाला के यहां उस के रिश्ते की बात चलाई थी, लेकिन उस की खाला ने अम्मी से साफ इनकार कर दिया था, क्योंकि उन्हें ऐसी बहू चाहिए थी, जो ढेर सारा दहेज ले कर आए.

अब्बू ने भी खुशबू के रिश्ते के लिए कई जगह कोशिश की थी, लेकिन उन के हालात को देख कर सब ने इनकार कर दिया था. आसपड़ोस और उस के ददिहाल वाले रमजान में हर रोजाइफ्तारी भिजवा कर सवाब कमाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे.

ऐसे ही एक बार ईद पर जब खुशबू के चाचा और बड़े अब्बू 5,000 रुपए फितरा व जकात निकाल कर उस के घर देने पहुंचे थे, तो अम्मी का गुस्सा फट पड़ा था और अम्मी ने जम कर चाचा और बड़े अब्बू को खरीखोटी सुनाई थी और रुपए भी उन के मुंह पर फेंक दिए थे.

अम्मी का गुस्सा देख कर खुशबू के चाचा और बड़े अब्बू चुपचाप वहां से चले गए थे.

खुशबू ने अम्मी को पहली बार इतने गुस्से में देखा था. लेकिन वह जानती थी कि अम्मी को मेहनतमजदूरी करना मंजूर है, लेकिन ऐसी मदद उन को नागवार थी.

ऐसे ही एक दिन जब अब्बू की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी, तब अम्मी ने सब रिश्तेदारों के पास जा कर 500 रुपए उधार मांगे थे, लेकिन किसी के पास से एक रुपया भी नहीं निकला था, जबकि सभी के अच्छेखासे कारोबार चल रहे थे.

तब खुशबू के अब्बू के एक दोस्त रमेश चाचा ने खुद ही घर पहुंच कर अम्मी को रुपए दिए थे और आगे किसी चीज की जरूरत पड़ने पर बेझिझक कहने के लिए बोल कर गए थे.

खुशबू की अम्मी अकसर कहा करती थीं, ‘‘खुशबू के लिए कोई ऐसा लड़का ही मिल जाए, जो मजदूरी करता हो, कम से कम वह दो वक्त की रोटी तो उसे खिला सकेगा.’’

पिछले दिनों महल्ले में ही शहरुद्दीन के एक रिश्तेदार हमीदुल्ला मास्टर आए हुए थे, जो अच्छेखासे पैसे वाले थे. उन का चूडि़यों का थोक का कारोबार था. एक दिन वे महल्ले के लोगों के साथ बैठ कर बातें कर रहे थे.

‘‘मास्टर साहब, और बताइए कि घर के हालचाल कैसे हैं?’’ मोबिन मियां ने मास्टर साहब से पूछा.

‘‘क्या बताएं मोबिन मियां, औरत के बिना घर कोई घर होता है. जब से रजिया का इंतकाल हुआ है, तब से सबकुछ बदल गया है. घर तो जैसे काटने को दौड़ता है,’’ हमीदुल्ला मास्टर मायूस हो कर बोले.

‘‘मास्टर साहब, आप करीम की लड़की खुशबू से निकाह कर लें,’’ वहां बैठे साजिद ने सलाह दी.

‘‘हां, बेचारा करीम बहुत ही गरीब है और फिर वह आएदिन बीमार ही रहता है. एक ही लड़की है, वह भी जवान हो गई है. उस के पास तो देने के लिए कुछ है भी नहीं और फिर बिना दहेज के उस की शादी होने से रही.

‘‘अगर साबिहा भाभी चौकाबरतन न करने जाएं, तो दो वक्त का खाना भी नसीब न हो,’’ मास्टर साहब कुछ बोलते, इस से पहले ही वहां बैठे नबीरुल ने अपनी बात रखी.

‘‘आप का भी घर बस जाएगा और बेचारे करीम और साबिहा के सिर का बो झ भी हट जाएगा,’’ मोबिन मियां ने भी मास्टर साहब से कहा.

‘‘आप लोगों के भी तो लड़के जवान होंगे, आप लोग करीम की बेटी को बहू बना कर क्यों नहीं ले आते?’’ मास्टर साहब धीरे से बोले.

‘‘आप अगर निकाह कर लेंगे, तो बेचारी खुशबू की जिंदगी सुधर जाएगी. बचपन तो गरीबी में कट गया, कम से कम जवानी में तो अच्छा खा और पहन लेगी,’’ नबीरुल ने मास्टर साहब की बात अनसुनी कर उन पर दबाव डालते हुए कहा.

‘‘अच्छा, ठीक है. लेकिन क्या वह लड़की निकाह के लिए राजी हो जाएगी?’’ मास्टर साहब ने सवाल किया. ‘‘अरे, मास्टर साहब, गरीब की लड़की की जबान कहां होती है. बस, आप हां करें, बाकी हम पर छोड़ दें,’’ मोबिन मियां ने कहा.

‘‘चलिए, तो फिर लड़की भी दिखा दीजिए. आए हैं तो रिश्ते की बात भी कर ली जाए,’’ मास्टर साहब बोले.
इस के बाद वे सभी करीम के घर की ओर चल दिए.

‘‘हमीदुल्ला मास्टर तुम्हारी लड़की से निकाह करना चाहते हैं. उन की बीवी का इंतकाल… और रोटीपानी के लिए भी परेशानी होती है, इसलिए वे दोबारा घर बसाना चाहते हैं,’’ करीम के घर पहुंचते ही मोबिन मियां ने कहा.

‘‘आप को कोई एतराज तो नहीं है?’’ हमीदुल्ला मास्टर ने करीम से पूछा.

‘‘मु झे क्या एतराज हो सकता है. आप चाहें तो आज ही खुशबू से निकाह कर अपने साथ ले जाएं,’’ करीम धीरे से बोला.

‘‘ठीक है, आने वाली 15 तारीख को 8-10 लोगों को ला कर निकाह पढ़वा कर ले जाऊंगा तुम्हारी लड़की को. और हां, इस में जो भी खर्च आएगा, वह मैं आप को घर पहुंचते ही भिजवा दूंगा,’’ हमीदुल्ला मास्टर करीम से बोले.

‘‘मास्टर साहब, आप परेशान न हों. निकाह का सारा इंतजाम मैं करवा दूंगा,’’ मोबिन मियां ने मास्टर साहब से कहा.

‘‘और खाने का इंतजाम मैं कर दूंगा,’’ नबीरुल बोले.

जल्द ही निकाह का दिन भी आ गया. खुशबू अपने अम्मीअब्बू को देख रही थी, जिन के चेहरों पर न खुशी दिखाई दे रही थी और न गम, बस यही लग रहा था कि वे अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश कर रहे थे.

खुशबू दुलहन बनी बैठी थी, लेकिन शादी जैसा कुछ लग ही नहीं रहा था. सहेलियां भी उस से किसी तरह की छेड़छाड़ या फिर किसी तरह का मजाक करने की हिम्मत नहीं कर रही थीं.

‘‘बरात आ गई,’’ गाडि़यों की आवाज सुन कर खुशबू की एक सहेली नजमा बोली और बाकी सभी सहेलियां बरात देखने के लिए उस के कमरे से बाहर चली गईं.

खुशबू ने एक बार फिर एक नजर आईने पर डाल कर खुद को देखा. वह बहुत ही खूबसूरत लग रही थी. लेकिन क्या फायदा ऐसी खूबसूरती का, जो उसे एक अच्छा शौहर न दिला सके.

बाहर 2 गाडि़यां करीम के दरवाजे पर आ कर रुकीं और गाड़ी से शेरवानी पहने हमीदुल्ला मास्टर और 4-5 लोग बाहर आए. उन के साथ मौलाना साहब भी थे, जिन्हें शायद मास्टर साहब निकाह पढ़वाने के लिए लाए थे.

बरात आने की खबर मिलते ही आसपड़ोस की औरतें और बच्चे अपनेअपने घरों से बाहर आ गए. सब को यही उत्सुकता थी कि क्या खुशबू इस निकाह से राजी है भी या नहीं?

‘‘आइए मास्टर साहब, आप लोग उधर चलिए,’’ मोबिन मियां ने सलाम कर मास्टर साहब से एक ओर इशारा करते हुए चलने की गुजारिश की.

‘‘अरे, रुकिए तो मोबिन मियां, अभी दूल्हे मियां और उन के दोस्तों को तो आने दीजिए,’’ मास्टर साहब हंसते हुए बोले.

‘‘मैं कुछ सम झा नहीं,’’ मोबिन मियां ने हैरानी से मास्टर साहब से पूछा.

मास्टर साहब कुछ बोलते, इस से पहले ही एक और कार वहां आ कर रुकी. कार फूलों से सजी हुई थी और उस में से सेहरा पहने हुए एक नौजवान गाड़ी से बाहर आया और उस के साथ 4 दोस्त और बाहर निकले.

‘‘दूल्हे मियां आ गए. चलिए, मोबिन मियां, अब कहां चलना है?’’ मास्टर साहब हंसते हुए बोले.

‘‘यह सब क्या है?’’ मोबिन मियां ने पूछना चाहा. वहां खड़े बाकी लोग भी हैरान थे कि यह क्या माजरा है.

‘‘यह मेरा बेटा समीर है और मैं अपनी शादी की नहीं, बल्कि अपने बेटे की शादी की बात कर रहा था. आप लोगों को क्या लगा कि इस बुढ़ापे में मैं अपनी शादी करता? मु झे बहू चाहिए थी, जो मेरे परिवार को सही से चला सके. दहेज का न मु झे लालच है और न ही मेरे बेटे को,’’ मास्टर साहब बोले.

उधर नौजवान दूल्हे को देख कर चारों ओर हलचल मच गई थी कि खुशबू का दूल्हा कोई बूढ़ा नहीं, बल्कि एक बांका जवान है.

आसपड़ोस के लोग तो खुश हुए, पर बहुत से दुखी नजर आ रहे थे कि इस गरीब की बेटी की तो किस्मत ही खुल गई, क्योंकि लड़का बड़ा ही हैंडसम था.

जब यह बात खुशबू को पता चली, तो खुशी से उस की आंखों में आंसू आ गए. उस ने देखा कि उस की अम्मी और अब्बू के चेहरे भी खुशी से खिल उठे थे.

Funny Story : भैयाजी का चुनावी कन्फैशन

Funny Story : मेरे मोबाइल फोन पर उन के मैसेज बारबार आ रहे थे कि मेरा वोट मेरी आवाज है. मैं अपनी आवाज को किसी के पास बिकने न दूं. पर दूसरी ओर भैयाजी बराबर कह रहे थे कि रे लल्लू, मेरा वोट केवल और केवल उन की आवाज है. वे मेरी आवाज खरीदने के बाद ही संसद में अपनी आवाज उठाने लायक हो पाएंगे. मैं ने उन के मैसेज को इग्नोर कर इस बार भी मान लिया कि मेरा वोट उन की ही आवाज है.

वैसे दोस्तो, मेरे पास बेचने को अब मेरी आवाज बोले तो मेरा वोट ही बचा है. बाकी तो मेरा सबकुछ बिक चुका है, देश की संपत्तियों की तरह. सो, चुनाव के दिनों में उसे बेच कर कुछ दिन मैं भी हलकीफुलकी मस्ती कर लेता हूं.

अब के फिर चुनाव के ‘ड्राई डे’ को भी मुझे तर रखने वाले भैयाजी को वोट डालने के बाद मैं उन के घर गया उन का धन्यवाद करने. धन्य हों ऐसे भैयाजी, जो ‘ड्राई डे’ को भी अपने वोटरों को ड्राई नहीं रहने देते. उन को तर रखने का इंतजाम वे पहले ही कर देते हैं.

ऐसे भैयाजी जनता को बहुत सत्कर्मों के बाद मिलते हैं. हम ने पिछले जन्म में पता नहीं ऐसे क्या सत्कर्म किए थे, जो इस जन्म में हमें ऐसे ही खानदानी भैयाजी मिले.

भैयाजी के ‘ड्राई डे’ का कर्ज उतारने मैं उन के घर गया, तो वे अंधेरे कमरे में बैठे थे. राजमुजरा या राजमुद्रा में, वे ही जानें. पहले तो मैं ने सोचा कि चुनाव की थकान निकाल रहे होंगे. चुनाव के दिनों में तो जो नेता लोहे का भी हो तो वह भी थकान से चूरचूर हो जाए.

अपने भैयाजी तो ठहरे हाड़मांस के. इतने दिनों तक न जागे, न नींद आई. सोएसोए भी जागते रहते, जागतेजागते ही सोए रहते. जितना नेता चुनाव के दिनों में दिनरात एक करते हैं, इतना जो कोई साधारण से साधारण जीव स्वर्ग पाने के लिए करे तो उसे मोक्ष प्राप्त करने से कोई न रोक पाए.

मैं ने उन के कमरे की दीवारों से आंखकान लगाए, तो भीतर अपने भैयाजी की आवाज सुनाई दी, भैयाजी दिखाई दिए. उन के चारों ओर मच्छर गुनगुना रहे थे. उन्होंने अपने आगे संविधान रखा था और खुद संविधान के आगे घुटने टेके क्षमायाचना की मुद्रा में.

तब पहली बार पता चला कि नेता भी किसी के आगे घुटने टेकते हैं, वरना मैं तो सोचता था कि नेता सभी को अपने आगे घुटने टिकवाते हैं.

भैयाजी हाथ जोड़े संविधान के आगे घुटने टेके कह रहे थे, ‘हे संविधान, चुनाव के दिनों में जो मैं ने अपने मौसेरे भाइयों को भलाबुरा कहा, मैं तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए उन से माफी मांगता हूं. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख न होती, तो मैं अपने मौसेरे भाइयों को जो मैं ने इस चुनाव में कहा, कभी न कहता. इस अपराध के लिए वे मुझे माफ करें.

‘चुनाव के दिनों में जो मैं ने दिवंगत नेताओं को भलाबुरा कहा, मैं तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए उन से माफी मांगता हूं. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख न होती, तो मैं अपने दिवंगत नेताओं को जो मैं ने इस चुनाव में कहा, कभी न कहता. इस अपराध के लिए वे मुझे माफ करें.

‘हे संविधान, चुनाव के दिनों में जो मैं ने जनता को लुभाने, रिझाने व पटाने के लिए उन को झूठे आश्वासन दिए, तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए मैं दिल की गहराइयों से जनता से माफी मांगता हूं. ये मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख न होती, तो मैं भोलीभाली जनता को जो मैं ने इस चुनाव में झाठी गारंटियां दीं, कभी न देता. इस अपराध के लिए झूठे आश्वासन हेतु मुझे माफ करें.

‘हे संविधान, झूठ बोलना हर पार्टी के, हर किस्म के नेता के अधिकार क्षेत्र में आता है. जनता से झूठ बोलना उस का मौलिक अधिकार है. जनता को छलना, दलना उस का पहला फर्ज है. पर चुनाव के दिनों में स्वयंमेव हर नेता को झूठ बोलने का विशेषाधिकार प्राप्त हो जाता है.

‘इस महापर्व में नेता के हजार झूठ भी माफी लायक होते हैं. दरअसल, इन दिनों उसे खुद पता नहीं होता कि वह जो बोल रहा है, क्या बोल रहा है. चुनाव के दिनों में जो मन में आए, बोलना उस का धर्म होता है, क्योंकि इन दिनों वह केवल और केवल अपने प्रचारी धर्म का पालन कर रहा होता है. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. इस अपराध के मेरा झूठ मुझे माफ करे.

‘हे संविधान, तुम मुझे समाज में जातिगत, धार्मिक, सांस्कृतिक प्रदूषण को फैलाने के दोष से दोषमुक्त करना.

मैं मानता हूं कि प्रदूषणों में सब से खतरनाक प्रदूषण जातिगत प्रदूषण होता है. पर क्या करूं, इन प्रदूषणों को समाज में फैलाने पर ही कोई अच्छा नेता बन पाता है.

‘समाज में जातिगत, धार्मिक और सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाए बिना स्वस्थ राजनीति हो ही नहीं सकती. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. इस अपराध के लिए जाति, धर्म मुझे माफ करे.

‘हे संविधान… हे संविधान…’  

Family Story : मरियम अब बड़ी हो गई थी

Family Story : जब वह छोटी थी, तो मां यह कह कर उसे बहला दिया करती थी कि पापा परदेश में नौकरी कर रहे हैं और उस के लिए ढेर सारा पैसा ले कर आएंगे. लेकिन मरियम अब बड़ी हो गई थी और स्कूल जाने लगी थी.

एक बार मरियम ने मां से कहा, ‘‘मम्मी, न तो पापा खुद आते हैं, न ही कभी उन का फोन आता है. क्या वे हम से नाराज हैं?’’

मरियम के इस सवाल पर फिरदौस कहतीं, ‘‘नहीं बेटी, तुम्हारे पापा तो दुनिया में सब से अच्छे पापा हैं. वे हम लोगों से बहुत प्यार करते हैं, लेकिन वे जहां नौकरी करते हैं, वहां छुट्टी नहीं मिलती है, इसीलिए आ नहीं पाते हैं.’’

मां की बातों से मरियम को तसल्ली तो मिल जाती, लेकिन पिता की याद कम नहीं हो पाती थी.

समय हवा के झोंके की तरह बीतता रहा. मरियम अब 5वीं जमात की एक समझदार बच्ची बन चुकी थी.

एक दिन स्कूल की छुट्टी के समय मरियम ने देखा कि उस के स्कूल की एक छात्रा सुमन ने दौड़ कर अपने पापा के गले से लिपट कर कहा कि आज हम पहले आइसक्रीम खाएंगे, उस के बाद घर जाएंगे.

यह देख कर मरियम को अपने पापा की याद बहुत आई. वह स्कूल से घर आई, तो बगैर कुछ खाएपीए सीधे अपने कमरे में जा कर लेट गई.

घर के काम निबटा कर फिरदौस मरियम के पास आ कर बैठ गईं और उस के काले खूबसूरत बालों में हाथ से कंघी करते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, आज हमारी बेटी कुछ उदास लग रही है?’’

फिरदौस का इतना पूछना था कि मरियम फफक कर रो पड़ी, ‘‘मम्मी, आप मुझ से झूठ बोलती हैं न कि पापा दुबई में नौकरी करते हैं? अगर वे दुबई में हैं, तो फोन पर हम लोगों से बात क्यों नहीं करते हैं?’’

अब फिरदौस के लिए सचाई को छिपा कर रख पाना बहुत मुश्किल हो गया.

‘‘अच्छा, पहले तुम खाना खा लो. आज मैं तुम्हें सबकुछ सचसच बता दूंगी,’’ कहते हुए फिरदौस मरियम के लिए खाना लेने चली गईं.

जब फिरदौस खाना ले कर कमरे आईं, तो मरियम ने उन से कहा, ‘‘मम्मी, आप को पापा के बारे में जोकुछ बताना है, बताती जाइए. मैं खाना खाती हूं.’’

‘‘बेटी, तुम्हारे पापा इंजीनियर थे और दुबई में नौकरी करते थे. मैं भी उन्हीं के साथ रहती थी.’’

‘‘मम्मी, आप बारबार ‘थे’ शब्द का क्यों इस्तेमाल कर रही हैं? क्या पापा अब इस दुनिया में नहीं हैं?’’ इतना कह कर वह रोने लगी.

‘‘नहीं बेटी, पापा जिंदा हैं.’’

मरियम तुरंत आंसू पोंछ कर चुप हो गई. उसे डर था कि कहीं मम्मी सचाई बताए बगैर चली न जाएं.

फिरदौस ने बात का सिलसिला फिर से शुरू करते हुए कहा, ‘‘12 साल पहले की बात है, जब तुम्हारे पापा और मैं दुबई से भारत आए थे. हम दोनों ही बहुत खुश थे, लेकिन हमें क्या पता था कि इस के बाद हम सब एक ऐसी मुसीबत में पड़ जाएंगे, जिस से छुटकारा पाना नामुमकिन हो जाएगा.’’

‘‘शहर में दंगा हो गया. हिंदू और मुसलमान एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए थे.

‘‘जैसेतैसे कर के जब फसाद थोड़ा थमा, तो हम दुबई जाने के लिए तैयार हो गए. यह भी एक अजीब इत्तिफाक था कि जिस दिन हमारी फ्लाइट थी, उसी दिन शहर में बम धमाके हो गए. इस में काफी लोगों की जानें चली गईं.

‘‘हम लोग दुबई तो पहुंच गए, लेकिन भारत से आने वाली हर खबर बड़ी संगीन थी. बम धमाकों के अपराधियों में तुम्हारे पापा का नाम भी आ रहा था.

‘‘तुम्हारे पापा को यह बात नामंजूर थी कि उन्हें कोई देशद्रोही या आतंकवादी समझे. उन्होंने किसी तरह भारत में रहने वाले अपने घरपरिवार और दोस्तों के जरीए पुलिस तक यह बात पहुंचाई कि वे बेकुसूर हैं और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए भारत आना चाहते हैं. कुछ दिनों के बाद तुम्हारे पापा भारत आ गए.

‘‘फिर वही हुआ, जिस का डर था. पुलिस ने हाथ आए तुम्हारे बेगुनाह मासूम पापा को उन बम धमाकों का मास्टरमाइंड बना कर जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया.

‘‘पिछले 12 सालों से तुम्हारे पापा जेल में हैं,’’ इतना कह कर फिरदौस फूटफूट कर रोने लगीं.

मरियम ने किसी संजीदा शख्स की तरह पूछा, ‘‘क्या मैं अपने पापा से मिल सकती हूं?’’

‘‘हां बेटी, जरूर मिल सकती हो,’’ फिरदौस ने जवाब दिया, ‘‘मैं हर रविवार को तुम्हारे पापा से मिलने जेल जाती हूं. अब तुम भी मेरे साथ चल सकती हो.’’

12 साल की बेटी जब सामने आई, तो शहजाद ने अपना चेहरा छिपा लिया. अपनी बेटी के सामने वे एक अपराधी की तरह जेल की सलाखों के पीछे खड़े हो कर जमीन में धंसे जा रहे थे.

‘‘पापा, क्या आप सचमुच अपराधी हैं?’’ मरियम के इस सवाल पर शहजाद घबरा गए.

‘‘बेटी, तुम्हारे पापा बेकुसूर हैं. उन्होंने कोई जुर्म नहीं किया है. बस, हालात ने जेल की सलाखों के पीछे ला कर खड़ा कर दिया है,’’ इतना कह कर शहजाद बेटी की तरफ देखने लगे.

‘‘पापा, आप निश्चिंत हो जाइए. चाहे सारी दुनिया आप को अपराधी समझे, पर बेटी की नजर में आप एक ईमानदार नागरिक और देशभक्त रहेंगे.’’

अब मरियम हर रविवार को अपने पापा से मिलने जेल जाने लगी. वह जब भी पापा से मिलने जाती, तो उन की पसंद की खाने की कोई न कोई चीज बना कर ले जाती और अपने हाथों से खिलाती.

बापबेटी की इस मुलाकात को 10 साल और गुजर गए. 22 साल की मरियम अब स्कूल से निकल कर कालेज में जाने लगी थी.

पिछले 10 सालों से जेल का पूरा स्टाफ पिता और बेटी का मुहब्बत भरा मेलमिलाप बड़े शौक से देखता चला आ रहा था.

शहजाद ने अपनी जिंदगी के 22 साल जेल में कुछ इस तरह बिता दिए कि दुश्मन भी दोस्त बन गए. अनपढ़ कैदियों को पढ़ाना, बीमार कैदियों की सेवा करना व जरूरतमंद कैदियों की मदद करने की आदत ने उन्हें जेल में मशहूर बना दिया था.

कानून अंधा होता है, यह सिर्फ कहावत ही नहीं, बल्कि सच भी है. वह उतना ही देखता है, जितना उसे दिखाया जाता है. कानून के रखवालों ने शहजाद को एक आतंकवादी बना कर पेश किया था. उन के खिलाफ जो तानाबाना बुना गया, वह इतना मजबूत था कि इस अपराध से छुटकारा पाना उन के लिए नामुमकिन हो गया.

वैसे भी जिस पर आतंकवाद का ठप्पा लग जाए, फिर उस की सुनता कौन है? शहजाद के साथ मुल्क के नामीगिरामी वकील थे, लेकिन सब मिल कर भी उन्हें बेगुनाह साबित करने में नाकाम रहे.

निचली अदालत से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक ने मौत की सजा को बरकरार रखा. मरियम और फिरदौस की दया की अपील को राष्ट्रपति महोदय ने भी ठुकरा दिया. फांसी की तारीख तय हो गई.

सुबह 4 बजे शहजाद को फांसी दी जानी थी. मरियम और फिरदौस के साथ जेल के कैदी भी उदास थे.

फिरदौस और मरियम आखिरी दीदार के लिए शहजाद की कोठरी में भेजे गए. बेटी और बीवी को देख शहजाद की आंखों की वीरानी और बढ़ गई.

मरियम ने बाप की हालत देख कर कहा, ‘‘पापा, आप की मौत का हम लोग जश्न मनाएंगे. लीजिए, आखिरी बार बेटी के हाथ की बनी खीर खा लीजिए.’’

शहजाद एक फीकी मुसकराहट के साथ करीब आए, तो मरियम ने अपने हाथों से उन्हें खीर खिलाई.

2 चम्मच खीर खाने के बाद ही शहजाद का चेहरा जर्द पड़ने लगा. मुंह से खून की उलटी शुरू हो गई.

शहजाद को उलटी करते देख जहां फिरदौस घबरा गईं, वहीं मरियम ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘पापा, आप की बेगुनाही तो साबित न करा सकी, लेकिन आप को फांसी से बचा लिया.

‘‘अब दुनिया यह न कह सकेगी कि आतंकवाद के अपराध में शहजाद को फांसी पर लटका दिया गया. आप को इज्जत की जिंदगी तो न मिल सकी, पर हां, इज्जत की मौत जरूर मिल गई.’’

फिरदौस की चीख सुन कर जब तक पहरेदार शहजाद की खबर लेते, तभी मरियम ने भी जहरीली खीर के 2 चम्मच खा लिए. जेल की उस काल कोठरी में अब 2 लाशें पड़ी थीं. एक को अदालत ने आतंकवादी होने की उपाधि दी थी, तो दूसरी को समाज ने आतंकवादी की बेटी करार दिया था. दोनों ही समाज और दुनिया से अब आजाद हो चुके थे.

Family Story : नरगिस

लेखक – मनोज शर्मा, Family Story : घर की दहलीज पर चांदनी हाथ बांधे खड़ी थी. सामने आतेजाते लोगों में अपनी शाम ढूंढ़ रही थी. कोई दूर से देख लेता तो एक पल के लिए दिल मचल जाता, पर उसे वापस लौटते देखते ही सारी उम्मीदें टूट जातीं.

लौकडाउन से पहले ही आखिरी बार कोई आया था शायद…वह बंगाली, जिस के पास पूरे पैसे तक नहीं थे, फिर अगली बार रुपए देने का वादा कर के सिर्फ 50 का नोट ही थमा गया था.

उस रोज ही नहीं, बल्कि उस से पहले से ही लगने लगा था कि अब इस धंधे में भी चांदनी जैसी अधेड़ औरतों के लिए कुछ नहीं रखा, पर उम्र के इस पड़ाव पर कहां जाएं? उम्र का एकतिहाई हिस्सा तो यहीं निकल गया. सारी जवानी, सारे सपने इसी धंधे में खाक हो चुके हैं. अब तो यही नरक उस का घर है.

कभी जब चांदनी कुछ खूबसूरत थी, सबकुछ जन्नत लगता था. हर कोई उस की गदराई जवानी पर मचल जाता था. पैसे की चाह में सब की रात रंगीन करना कितना अच्छा लगता था.

पर, अब तो जिंदगी जहन्नुम बन चुकी है. लौकडाउन में पहले कुछ दिन बीते, फिर हफ्ते और अब तो महीने. यहां कई दिनों से फांके हैं. कैसे जी रही है, चांदनी खुद ही जानती है. सरकार कुछ नहीं करती इस के लिए. न अनाज का दाना है अब और न ही फूटी कौड़ी. कोई फटकता तक नहीं है अब.

जब चांदनी नईनई आई थी, तब बात ही अलग थी. 12 साल पहले, पर ठीक से याद नहीं. वे भी क्या दिन थे, जब दर्जनों ड्रैस और हर ड्रैस एक से बढ़ कर एक फूलों से सजी. कभी गुलाबी, कभी सुनहरी और कभी लाल. कभी रेशमी साड़ी या मखमली लाल चमकीला गाउन.

रोजरोज भोजन में 3 किस्म की तरकारी, ताजा मांस, बासमती पुलाव, पूरीनान. क्या स्वाद था, क्या खुश थी. घर पर पैसा पहुंचता था, तो वहां भी चांदनी की तूती बोलती थी. नएनए कपड़े, साजोसामान के क्या कहने थे. बस राजकुमारी सी फीलिंग रहती थी.

हर ग्राहक की पहली पसंद उन दिनों चांदनी ही थी और दाम भी मनचाहा. जितना मांगो उतना ही. और कई बार तो डबल भी. हर शिफ्ट में लोग उस का ही साथ मांगते थे. सोने तक नहीं देते थे रातभर. और वह बूढ़ा तो सबकुछ नोच डालता था और फिर निढाल हो कर पड़ जाता था. वे कालेज के लड़के तो शनिवार की शाम ही आते थे, पर मौका पाते ही चिपट जाते थे. हां, पर एक बात तो थी, अगर शरीर चाटते थे तो पैसा भी मिलता था और फिर कुछ घंटों में ही हजारों रुपए.

आज देह भी काम की नहीं रही और एक धेला तक साथ में नहीं. शक्ल ही बदल गई, जैसे कोई पहचानता ही न हो. बूढ़ा बंगाली या गुटका खाता वह ट्रक ड्राइवर या 2-4 और उसी किस्म के लोग, बस वही दोचार दिनों में. सब मुफ्तखोर हैं. मुफ्त में सब चाहते हैं. अब यहां कुछ भी नहीं बचा. यह तो जिंदगी का उसूल है कि जब तक किसी से कोई गर्ज हो, फायदा हो, तभी तक उस से वास्ता रखते हैं, वरना किसी की क्या जरूरत.

अब तो कालेज के छोकरे चांदनी की सूरत देखते ही फूहड़ता से हंसने लगते हैं, पास आना तो दूर रहा. 100-50 में भी शायद अब कोई इस शरीर को सूंघे. आंखें यह सब सोचते हुए धरती में गढ़ गईं. चांदनी रेलिंग पर हथेली टिकाए सुनसान सड़क को देखती रहती है.

कितना बड़ा घर था, पर अब समय के साथसाथ इसे छोटा और अलहदा छोड़ दिया गया है. कभी यह बीच में होता था. जब सारी आंखें चांदनी को हरपल खोजती थीं, पर अब इसे काट कर या मरम्मत कर एक ओर कर दिया है, ताकि चांदनी जवान और पैसे वाले ग्राहकों के सामने न आ सके, शायद ही कभीकभार कोई आंखें इस ओर घूरती हैं.

और फिर गलती से यहां कोई पहुंच भी जाता है तो आधे पैसे तो दलाल ले जाता है. वह मुच्छड़ वरदी वाला या वह टकला वकील और छोटेमोटे व्यवसायी या दूरदराज से आए नौकरीपेशा लोग ही यहां आते हैं. इस शरीर की इतनी कम कीमत, यह सोच कर ही मन सहम जाता है.

टैलीविजन का स्विच औन करते हुए चांदनी खिड़की से बाहर सुनसान सड़क पर देखती है. 2-1 पियक्कड़ इस ओर घूर रहे हैं. जाने कभी आए हों यहां किसी रोज. अब तो याद भी नहीं.

आज चांदनी का उदास चेहरा और अलसाई सी आंखें उन्हें खींचने में पूरी तरह नाकाम हैं. शायद भूखा पेट किसी की हवस को पूरा करने में अब नाकाम है और शरीर का गोश्त भी ढल चुका है.

चांदनी ने चैनल बदलतेबदलते किसी न्यूज चैनल पर टीवी पर कोरोना के बढ़ते प्रकोप को देखा. मर्तबान से मुट्ठीभर चने निकाल कर धीरेधीरे चबाने लगी. कुछ ही देर में टैलीविजन बंद कर के वह पलंग पर लेट गई. उस की खुली आंखें छत पर घूमतेरेंगते पंखे की ओर कुछ देर देखती रहीं और फिर वह गहरी नींद में खो गई.

सुबह कमरे के बाहर से चौधरी के चीखने की सी आवाज सुनाई पड़ी. रात की चुप्पी कहीं खो गई और सुबह का शोर चल पड़ा.

जाने क्यों लगा, सींखचों से कोई कमरे में झांक रहा है. आवाज बढ़ने लगी और गहराती गई.

‘‘3 महीने हो गए भाड़ा दिए हुए…’’ चौधरी के स्वर कानों में पड़ने लगे, ‘‘तुम्हारे बाप का घर है? मुझे शाम तक भाड़ा चाहिए, कैसे भी दो.’’

वही पुरानी तसवीर, जो 10-12 बजे के आसपास 2-3 महीनों में अकसर उभरती है.

चांदनी ने सींखचों से झांक कर देखा चौधरी का रौद्र रूप. लंबातगड़ा गंजा आदमी, सफेद कमीज पर तहमद बांधे मूंछों पर ताव देता गुस्से में चीख रहा था. वह बारीबारी से हर बंद कमरे की ओर देख कर दांत पीसता और आंखें तरेरता.

उस के सामने कुरसी रख दी गई, पर वह खड़ा ही खड़ा सब को आतंकित करता रहा.

‘‘अरे चौधरी साहब, बैठ भी जाइए अब,’’ अमीना बानो ने कुरसी पर बैठने के लिए दोबारा इशारा किया.

एक बनावटी हंसी लिए अमीना कितने ही दिनों से चौधरी को फुसला रही है, ‘‘अच्छा बताइए, आप चाय लेंगे या कुछ और?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं चाहिए, केवल भाड़ा चाहिए.’’

8-9 साल की लड़की के कंधे को मसलते हुए अमीना ने चौधरी के लिए चाय बनवा कर लाने को बोला.

‘‘नहींनहीं, मैं यहां चाय पीने नहीं आया हूं. अपना भाड़ा लेने आया हूं.’’

छोटी लड़की झगड़ा देखते हुए तीसरे कमरे में घुस जाती है.

उसी कमरे के बाहर झड़ते पलस्तर की ओर देखते हुए चौधरी ने कहा, ‘‘घर को कबाड़खाना बना कर रख दिया है अमीना तुम लोगों ने… न साफसफाई, न लिपाईपुताई. देखो, हर तरफ बस कूड़ाकरकट और जर्जर होती दीवारें. सोचा था कि इस बार इस घर की मरम्मत करा दूंगा, पर यहां तो भाड़ा तक नहीं मिलता कभी टाइम से.

‘‘मैं 10 तारीख को फिर आऊंगा. मुझे भाड़ा चाहिए जैसे भी दो. घर से पैसा मंगवाओ या कहीं और से, मुझे
नहीं मालूम.’’

‘‘अरे चौधरी साहब, इन दिनों कोई नहीं आता यहां,’’ दूसरी कुरसी करीब सरका कर चौधरी को समझाने की कोशिश करते हुए अमीना ने कहा.

‘‘आप का भाड़ा क्यों नहीं देंगे… हाथ जोड़ कर देंगे. बहुत जल्दी सब ठीक हो जाएगा, टैंशन न लो आप. आप के चलते ही तो हम सब हैं यहां, वरना इस धरती पर हमारा कोई वजूद कहां.’’

सामने एक कमरे से एक जवान होती लड़की उठी. दरवाजा खोल कर अमीना के पास आई और ऊंघने लगी, ‘‘अम्मां क्या हुआ? कौन है ये बाबू? क्या कह रहे हैं?’’

इतना कह कर चौधरी की तरफ देख कर वह जबान पर जीभ फिरा कर हंसने लगी. उस लड़की की शक्लोसूरत पर अजीब सी मासूमियत है, पर उस की छाती पूरी भरी है, जिस पर इस अल्हड़ लड़की को खास गुमान है. उस के बदन पर एक टाइट मैक्सी है.

चेहरे पर गिरी जुल्फें उसे और खूबसूरत बना रही हैं. चौधरी की नजरें अमीना से हट कर उस ओर चली गईं और रहरह कर उस के गदराए बदन पर टिक जाती हैं.

अमीना की तरफ देखते हुए चौधरी बोला, ‘‘कौन है यह? नई आई है क्या? पहले तो इसे कभी नहीं देखा?’’

लड़की अपनी उंगलियों से बालों की लटों के गोले बनाती रही.

‘‘हां, यह कुछ दिन पहले ही यहां आई है. मुस्तफाबाद की जान है. अभी 17 की होगी, शायद दिसंबर में.’’

‘‘क्या नाम है तेरा?’’ लड़की को देखते हुए चौधरी बोला.

लड़की चुप रही, पर मुसकराती रही.

अमीना ने लड़की की कमर सहलाते हुए कहा, ‘‘बेटी, नाम बताओ अपना. ये चौधरी साहब हैं अपने. यह पूरा घर इन्हीं का है.’’

चौधरी किसी रसूखदार आदमी की तरह अपने गालों पर उंगली फिराने लगा.

लड़की गौर से देखती रही, कभी अमीना को तो कभी चौधरी को.

‘‘नरगिस है यह. नमस्ते तो करो साहब को.’’

लड़की हंसते हुए दोनों हथेलियां जोड़ कर सीने तक ले आई, पर चौधरी की आंखें अभी भी नरगिस के सीने पर थीं.

‘‘ओह नरगिस, कितना अच्छा नाम है,’’ एक भौंड़ी मुसकराहट लिए चौधरी बोला.

नरगिस अपनी तारीफ सुन कर चहकने लगी और अमीना की एक बांह पर लहर गई.

घड़ी में समय देखते हुए चौधरी कुछ सोचते हुए कुरसी से उठा. पहले इधरउधर देखा, पर जल्दी ही लौटने की बात कहता हुआ देहरी की ओर बढ़ने लगा.

अमीना ने कहा, ‘‘चाय की एक प्याली तो ले ही लेते?’’

मुंह पर मास्क लगाते हुए चौधरी ने नरगिस को भी मास्क लगाने की सलाह दी, ‘‘फिर आऊंगा. सब अपना खयाल रखना.’’

नरगिस के सीने पर नजर रखता और जबान पर होंठ फिराता हुआ चौधरी चला गया.

एकएक कर के कमरों की सांकलें खुलने लगीं. भूखेअलसाए चेहरे, जो अभी तक कमरों में बंद थे, बाहर दालान में इकट्ठा हो गए मानो किसी खास बात पर जिरह करनी हो.

‘‘कौन था? चौधरी?’’ एक अधेड़ उम्र की धंधे वाली ने अमीना से पूछा.

‘‘हां, चौधरी ही लग रहा था,’’ दूसरी ने बेमन से कहा.

‘‘और क्या हुआ तेरे सेठ का? कल भी नहीं आया क्या?’’ रोशनी की तरफ देखते हुए एक ने पूछा.

‘‘नहीं. लौकडाउन है न. फोन पर ही मजा लेता रहा, पर मैं ने भी पेटीएम से 500 रुपए झाड़ ही लिए.’’

‘‘अरे, यहां तो कोई ऐसा भी नहीं,’’ एक बोली और फिर वे एकदूसरे को देखते हुए बतियाने लगीं.

‘‘जैसे भी हो, अपनेअपने ग्राहकों को बुलाओ, नहीं तो चौधरी यहां से निकाल देगा,’’ अमीना ने नेता भाव से सब को इकट्ठा कर के कहा.

‘‘3 महीने हो गए हैं, एक धेला तक नहीं दे पाए उन को. वह महारानी कहां है? उसे यह सब दिखता नहीं क्या?’’ चांदनी के कमरे की तरफ देख कर अमीना ने आवाज दी, ‘‘चांदनी, ओ चांदनी.’’

चांदनी जैसे सपने से जाग गई हो.

एक बार तो दिल ने चाहा कि सांकल खोल कर सब की जबान पर लगाम लगा दे कि एक वक्त था, जब सारे उस की आमदनी पर जीते थे, पर आज मुश्किल घड़ी में ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं और यह चौधरी जब मूड करता था आ जाता था मुंह मारने, पर देखो तो आज कैसे सुर बदल गए हैं इस मरदूद के.

बाहर दालान में कुछ देर की बहस हुई. सब एकदूसरे को देखती रहीं, पर नतीजा कुछ नहीं निकला. सब को लगा कि अब नए सिरे से शुरुआत करनी होगी.

सुरैया पास ही खड़ी थी. चांदनी की रोंआसी सूरत देख और करीब आ गई. उस की ठुड्डी को सहलाते हुए बोली, ‘‘चांदनी दीदी, सब ठीक हो जाएगा.’’

सब अपनेअपने कमरे में लौट गईं. सुरैया न केवल शक्लोसूरत से खूबसूरत थी, बल्कि अच्छा गाती भी थी.

लौकडाउन से पहले सब से ज्यादा ग्राहक इसी के होते थे. कुछ तो केवल गायकी के फन को तराशने आते थे और 2-1 ने तो गाने के लिए बुलावा भी भेजा. जिस्म तो यहां सभी बेचती हैं, पर उस के सुर की बात ही अलग है. अगर वह यहां न आती और गायकी पर फोकस रखती तो जरूर ही नाम कमाती.

वह खाकी वरदी वाला रोज नई उम्मीद की किरण दे कर मुफ्त में सुरैया को नोच जाता है. बेचारी पढ़ीलिखी है. 10वीं तक स्कूल गई है, पर यहां आ कर सब एकसमान हो जाते हैं. आई तो यहां बाप के साथ कुछ बनने, पर इस खाकी वरदी वाले ने झूंठा झांसा दे कर इस धंधे में उतार दिया. अब खुद तो आता है 2-4 और भी आ जाते हैं. सुरैया न सही, मेरे जैसी अधेड़ ही मिल जाए.

सुरैया चांदनी का हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गई.

‘‘क्या हुआ? रो क्यों रही हो?’’ सुरैया ने चांदनी के बालों में उंगलियां फिराते हुए पूछा.

‘‘कुछ नहीं बस ऐसे ही. परसों देर रात तक तुम्हारे कमरे से आवाजें आ रही थीं,’’ चांदनी ने सुरैया से पूछा.

‘‘कब? अच्छा, परसों? वही वरदी वाला आया था. 3 और भी थे. मुंह पर मास्क बांधे थे. मैं ने जब पूछा कि दारोगा साहब कुछ बात बनी, मेरे गाने की तो वह हंसने लगा और मेरे सीने को छूने लगा. मैं ने उस से कुछ पैसे मांगे तो गाली देने लगा, पर एक धेला तक नहीं दिया…

‘‘उस का मुंह सूखे पान से भरा था. बीड़ी की राख फेंकते हुए बोला, ‘रानी, हो जाएगा सब. देखती नहीं कि अभी सब बंद है.’

‘‘और पीछे से उस ने आगोश में भर लिया. मैं ने कहा कि अच्छा दारोगा साहब थोड़े पैसे ही दे दो?’’

यह सुन कर उस का सारा नशा जाता रहा और गालीगलौज करने लगा.

‘‘चांदनी दीदी, आप ही बताओ कि अब कैसे चलेगा? सब मुफ्त में मजा चाहते हैं. कुत्ते कहीं के.’’

सुरैया बोलती रही, चांदनी सब ध्यान से सुनती रही.

‘‘पर, अब चारा भी क्या है. जब पेट की प्यास बुझाने को पैसा नहीं तो कोई क्या देह को दिखाए. वह रातभर के लिए अपने कमरे पर ले जाना चाहता था. बोलता था, ‘मेरी रानी, ऐश करवा दूंगा, चल तो बस एक बार.’

‘‘जब मैं ने मना किया तो मुझे घसीटने लगा. अमीना मैम ने समझाबुझा कर उसे चलता किया.’’

‘‘तुम ने बताया क्यों नहीं मुझे?’’ चांदनी बोली.

‘‘चांदनी दीदी, अब क्या किसी को तंग करूं. तुम्हें मैं अपना मानती हूं, फिर यह सब देख कर तुम और ज्यादा दुखी होगी.’’

सुरैया की रोती आंखें चांदनी को देखती रहीं, कुछ देर तक वे दोनों चुप रहीं.

‘‘सुरैया एक काम करोगी मेरे लिए?’’

‘‘हांहां, कहो न?’’

‘‘नरगिस… जो अभी नई लड़की आई है न…’’

‘‘हां…’’

‘‘उसे यहां से कहीं दूर भेज दो, जहां वह जिस्मबाजारी न कर सके.’’

‘‘अभी तो वह बच्ची है. मैं उस में अपनी सूरत देखती हूं. इस जुम्मेरात जब अमीना बाई 1-2 घंटे के लिए बाहर जाए, तब किसी भी तरह उसे वापस भिजवा दो. तुम्हारा एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी या तुम 500-600 रुपए का इंतजाम कर दो, मैं ही उसे घर छोड़ आऊंगी सुरैया.’’

‘‘अरे दीदी, अभी सब बंद है. तुम कैसे जाओगी? और उस लड़की को भी तो समझाना होगा. वह तो अभी नासमझ है. देह ही निखरी है अभी, दिमाग से तो नादान ही है?’’

‘‘मैं जानती हूं, पर मौका पाते ही उसे भी समझा दिया जाएगा. वह चौधरी ही कहीं 1-2 दिन में… उस की नजर ही गंदी है. अब तो उस का वह छोकरा भी…’’

‘‘नहींनहीं दीदी, ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘सुनो, एक बात बताऊं. यहां पास ही कालेज है. उस में पढ़ने वाला एक शरीफ लड़का है. उस से फोन पर बात करती हूं. वह कोई पढ़ाई कर रहा है धंधे वाली औरतों की जिंदगी पर. शायद, वह कुछ मदद कर दे.

‘‘जैसे भी हो, हम सब तो यहां बरबाद हो गईं अब और किसी नई को यहां न खराब होने दें.’’

‘‘ठीक है दीदी. आज दोपहर जब सब सोए होंगे, तब बात करते हैं. अच्छा, मैं भी अब चलती हूं. तुम से बतिया कर सच में सुकून पाती हूं. बहुत उम्मीद है तुम से.’’

‘‘अरे दीदी, ये बिसकुट तो खाती जाओ.’’

‘‘नहींनहीं, बस.’’

कमरे में लौट कर मानो चांदनी सब भूल गई. काम हो जाए. हमारा तो अब कोई नहीं हो सकता, पर उस की तो पूरी जिंदगी बन जाएगी. वह लड़का जरूर कुछ करेगा.

आज ही उस लड़के का फोन भी आना है. मेरी जिंदगी पर कुछ लिख रहा है वह. हां, रिसर्च कर रहा है. ये लोग काफी पढ़ेलिखे हैं, जरूर हमारी कुछ न कुछ मदद करेंगे.

चांदनी का दिल कहता है कि वह लड़का नरगिस के लिए कुछ करेगा. क्या नाम था उस का…?

जो भी हो, इस जहन्नुम भरी जिंदगी से इस लड़की को भेजना ही पहला काम होगा. सरकार और ग्राहकों के भरोसे भी कब तक बैठे रह सकते हैं. कोई किसी का नहीं इस नरक में.

अभी लौट गई तो कोई अपना भी लेगा. नहीं तो यह भी दूसरी धंधे वालियों जैसी हो जाएगी. जरूर कुछ होगा. अच्छा होगा, यकीनन.

3 महीने बाद…

‘‘ओह, कितना अच्छा लग रहा है आज 3 महीने बाद. नरगिस कैसी होगी? सुरैया, बात हुई कोई?’’

‘‘हां दीदी, कल रात हुई थी,’’ सुरैया चहकते हुए बोली.

चांदनी जैसे खुशी से झूम गई.

‘‘यह नया सूट कब लाई सुरैया? पहले तो कभी न देखा इस में.’’

‘‘दीदी, यह सूट उस पढ़ने वाले साहब ने दिया है. बहुत अच्छे हैं ये पढ़ने वाले लोग. हमारे जज्बात समझते हैं. कभी छुआ तक नहीं, पर हरमुमकिन मदद देते हैं. आप की बहुत तारीफ करता है वह.’’

‘‘कौन सा…?’’ चांदनी ने पूछा.

‘‘अरे वही, जिस ने नरगिस को यहां से उस के घर तक भिजवाया था. और न केवल भिजवाया था, बल्कि उस के घर वालों को अच्छे से समझाया भी था.’’

‘‘अच्छा…’’

‘‘हां, दीदी…’’

‘‘एक बात कहूं?’’

‘‘कहो न…’’

‘‘वे प्रोफैसर बन जाएंगे, कालेज में जल्दी ही.’’

‘‘अच्छा.’’

‘‘हां, वे बोलते हैं कि मेरे साथ घर बसाएंगे.’’

‘‘अरे वाह सुरैया, तेरा सपना अब पूरा हो जाएगा.’’

‘‘दीदी आप बहुत अच्छी हो, सब तुम्हारी बदौलत ही मुमकिन हुआ है. तुम सच में महान हो.’’

‘‘अरे नहीं सुरैया, मैं इस लायक कहां.’’

‘‘दीदी, अगर उन की किताब छप गई न, तो वे तुम्हें भी तुम्हारे घर पर भिजवा देगा.’’

‘‘अरे नहीं सुरैया, मेरा तो यही है सब स्वर्ग या नरक.’’

इस के बाद वे दोनों चहकते हुए घंटों तक बतियाती रहीं.

Short Story : मोम की गुड़िया

Short Story : जिंदगी में सबकुछ तयशुदा नहीं होता. कभी कुछ ऐसा भी हो जाता है, जिस की आप ने ख्वाब में भी उम्मीद नहीं की होती है. हालांकि अब मैं उस बुरे ख्वाब से जाग गई हूं. राशिद ने मेरी तकदीर को बदलना चाहा था. मु झे मोम की गुडि़या समझ कर अपने सांचे में ढालना चाहा था.

यों तो राशिद मेरी जिंदगी में दबे पैर चला आया था. वह मेरी बड़ी खाला का बेटा था. पहली बार वह तरहतरह के सांचे में ढली मोमबत्तियां ले कर आया था और एक दिन मु झ से कहा था, ‘‘इनसान को मोम की तरह होना चाहिए. वक्त जब जिस सांचे में ढालना चाहे, इनसान को उसी आकार में ढल जाना चाहिए.’’

राशिद का मोमबत्ती बनाने का बहुत पुराना कारोबार था. हमारे शहर में भी राशिद की बनाई मोमबत्तियों की काफी मांग बढ़ गई थी. अब वह दिल्ली से कुछ नए सांचे ले कर आया, तो हमारे ही घर पर रुका.

राशिद ने मेरे सामने मोम पिघला कर सांचे से मोमबत्तियां बनाईं. तब मु झे भी अपना वजूद मोम की तरह पिघला महसूस हुआ. मैं सोचने लगी, ‘काश, मु झे भी कोई पसंदीदा सांचा मिल जाता, जिस में मैं मनमुताबिक ढल जाती.’

एक दिन तपती दोपहर में राशिद ने मेरे दोनों बाजुओं को अपने हाथों से ऐसे जकड़ लिया मानो मैं मोम हूं और वह जैसे चाहेगा, मुझे सांचे में ढाल देगा.

राशिद बड़ी मासूमियत भरे अंदाज में फुसफुसाया, ‘‘मैं तुम से बेहद मुहब्बत करता हूं.’’

वह मेरे जवाब के इंतजार में था और मैं सोच में पड़ गई. उस ने फिर फुसफुसाना शुरू किया, ‘‘जेबा, तुम्हारे बगैर सुबह सूनी, दोपहर वीरान और शाम उदास नजर आती है.’’

मैं इतना सुनते ही न जाने क्यों बेतहाशा हंसने लगी और हंसतेहंसते मेरी आंखें भर आईं. राशिद हैरान सा मेरी ओर देखने लगा.

मैं ने अपनी बांहें छुड़ा कर राशिद से कहा, ‘‘मर्द की फितरत अजीब होती है. जब तक वह किसी चीज को पा नहीं लेता, उस पर जान छिड़कता है. मगर उसे पा लेने के बाद वह उसे भूल जाता है. मर्द हमेशा उस पहाड़ की चोटी पर चढ़ना चाहता है, जिसे अभी तक किसी ने छुआ न हो, मगर चोटी पर चढ़ने के बाद वह आगे बढ़ जाता है दूसरी अजेय पहाड़ की चोटी को जीतने के लिए.’’

राशिद न तो स्कूली तालीम ज्यादा ले पाया था और न ही जिंदगी की पाठशाला में होनहार था, जबकि मैं जिंदगी की पाठशाला में काफीकुछ सीख चुकी थी.

मर्द के सामने पूरी तरह खुल जाना औरत की बेवकूफी होती है. उसे हमेशा राज का परदा सा बनाए रखना चाहिए. ऐसी औरत मर्द को ज्यादा अपनी तरफ खींचती है. यह बात जिंदगी की पाठशाला में मैं सीख चुकी थी.

2 साल पहले मैं 12वीं जमात पास करने के बाद घर बैठ गई थी. मेरा आगे पढ़ने का मन ही नहीं हुआ. दुनिया बेरौनक सी लगती थी. कहीं किसी काम में मन नहीं लगता था. जी चाहता था कि दुनिया से छिप कर किसी अंधेरी कोठरी में बैठ जाऊं, जहां मु झे कोई देख न पाए.

फिर पता नहीं क्यों मेरे दिल ने एक करवट सी ली. मैं ने एक दिन अम्मी से आगे पढ़ने की बात की. वे खुश हो गईं. औरत ही औरत के दर्द को पहचान पाती है. वे चाहती थीं कि मैं पढ़ने में मन लगाऊं और खुश रहूं. मैं भी अब खुशीखुशी स्कूल से कालेज में पहुंची. बीएससी में जीव विज्ञान मेरा पसंदीदा विषय रहा. इनसान के भीतर देखने की चाह ने इस विषय में मेरी और दिलचस्पी पैदा कर दी थी. अब विषय के साथसाथ और भी बहुतकुछ बदल गया था.

जमात बढ़ने के साथसाथ स्टूडैंट में भी काफीकुछ बढ़ोतरी हो जाती है. दिमाग के जाले साफ हो जाते हैं. पुराने दोस्त काफी पीछे रह जाते हैं. नया माहौल, नए दोस्त हवा में नई खुशबू सी घोल देते हैं.

एक दिन मैं बायोलौजी का प्रैक्टिकल कर के घर पहुंची, तो घर में कुछ ज्यादा ही चहलपहल नजर आई. बड़ी खाला, खालू और राशिद घर पर दिखाई दिए. खाला, खालू को सलाम कर मैं अंदर अपने कमरे में चली गई.

रात का खाना खाने के वक्त मैं ने एक बात नोट की कि राशिद मु झे एक अलग तरह की मुसकान से देख रहा था.

खाना खाने के बाद मौका मिलने पर राशिद मेरे पास आया और बोला, ‘‘जेबा, अब वक्त आ गया है तुम्हें मेरे सांचे में ढलना होगा. तुम्हें तो मालूम है कि मेरे पास कितने सांचे हैं. मैं जब जिस सांचे में चाहूं, मोम पिघला कर नई शक्ल दे देता हूं.’’

मैं राशिद की सोच से काफी आगे बढ़ चुकी थी. उसे जवाब देना मैं ने मुनासिब नहीं सम झा.

सुबह कालेज जाते वक्त अम्मी मेरे पास आईं. कुछ देर तक वे मु झे देखती रहीं, फिर धीरे से बोलीं, ‘‘जेबा, बाजी तेरा रिश्ता मांगने आई हैं. तेरे अब्बा तो खामोश हैं, तू ही कि बता क्या जवाब दूं?’’

मैं ने अम्मी की तरफ देखा. वे अजीब से हालात में थीं. एक तरफ उन की बहन थी, तो वहीं दूसरी तरफ बेटी.

मैं ने अब अपनी जबान खोलना वक्त का तकाजा सम झा. मैं ने कहा, ‘‘अम्मी, अब वक्त काफी आगे बढ़ चुका है और ये लोग पुराने वक्त पर ही ठहरे हुए हैं. आप खुद बताइए कि क्या राशिद मेरे लायक है? वैसे भी मु झे आगे पढ़ना है, काफी आगे जाना है. मेरे अपने सपने हैं, जो मु झे पूरे करने हैं.

‘‘मैं पिंजरे में बंद मजबूर बेसहारा पक्षी की तरह नहीं हूं, जिस का कोई भी मोलभाव कर ले. मैं खुले आसमान में उड़ने वाला वह पक्षी हूं, जो अपनी मंजिल खुद तय करता है.’’

मेरे इनकार के बाद मुझ पर मेरे ही घर में राशिद ने तेजाब का एक भरा हुआ मग फेंका था. वह तो मैं समय पर पलट गई थी और सारा तेजाब मेरी पीठ और हाथ पर ही गिर सका था.

घर में कुहराम मच गया था. अब्बा घर पर नहीं थे. अम्मी ही फौरन मुझे अस्पताल ले गई थीं. एक महीने के इलाज के बाद मैं बेहतर हो सकी थी. मैं अपने विचारों में, इरादों में पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गई थी.

राशिद को तो उस के किए की सजा मिली ही, मगर मैं ने भी अपनी जीने की इच्छा को जिंदा रखा और आज एक कामयाब टीचर के तौर पर अपने पैरों पर खड़ी हूं.

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