बाप की शराबखोरी ने ली जान

डाक्टर बन कर लोगों को सेहतमंद जिंदगी देने का सपना देखने वाले एक होनहार लड़के ने शराब जैसी सामाजिक बुराई से हार कर अपनी जान दे दी. तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में रहने वाले दिनेश ने बुधवार, 2 मई, 2018 को वन्नारपेट्टई में एक पुल से लटक कर खुदकुशी कर ली.

दिनेश का घर कुरुक्कलपट्टी में है. वह 12वीं जमात की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैडिकल प्रवेश परीक्षा ‘नीट’ की तैयारी में लगा हुआ था. दरअसल, दिनेश के पिता शराब पीने के आदी हैं. इस वजह से परिवार को कई सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था.

दिनेश ने अपने सुसाइड लैटर में लिखा, ‘अप्पा, मेरे मरने के बाद आप को शराब नहीं पीनी चाहिए. आप मेरी चिता को आग नहीं लगाएंगे, क्योंकि आप शराब पीते हैं. ‘आप अपना सिर भी न मुंडवाएं क्योंकि आप को इस का हक नहीं है. यह मेरी आखिरी इच्छा है, उस के बाद ही मेरी आत्मा को शांति मिलेगी. कम से कम अब तो शराब पीना बंद कर दीजिए.’

इतना ही नहीं, दिनेश ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीस्वामी को उस सुसाइड लैटर में लिखा, ‘देखते हैं कि अब मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी राज्य में शराबबंदी करते हैं कि नहीं. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो मेरी आत्मा दोबारा लौटेगी और यह काम कर के जाएगी.’ दिनेश के पिता मजदूरी करते हैं पर खूब शराब पीते हैं. दिनेश की मां की काफी पहले मौत हो चुकी है.

एक शराबी मजदूर का बेटा इस तरह शराबी बाप से तंग आ कर अपनी जान दे देगा, यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि इस तरह की सामाजिक बुराइयां कैसी भयंकर हो रही हैं. हमारे देश में शराब की खपत लगातार बढ़ती ही जा रही है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में साल 2005 में प्रति व्यक्ति 106 लिटर शराब की खपत के मुकाबले साल 2012 में यह खपत 38 फीसदी बढ़ कर 202 लिटर हो गई थी.

शराब के एक सिंगल पैग यानी 25 मिलीलिटर को एक यूनिट माना जाए तो एक दिन में 7.5 यूनिट से ज्यादा शराब पीने को विश्व स्वास्थ्य संगठन ओवर ड्रिंकिंग यानी ज्यादा शराब पीना मानता है, जो सेहत के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक है.

लंबे समय तक कोई शख्स ज्यादा शराब पीता है तो उस में कई किस्म की जिस्मानी बीमारियां घर कर लेती हैं. डाक्टरों के मुताबिक, लिवर से जुड़ी बीमारियों की अहम वजह शराब है. ज्यादा शराब पीने से अलकोहल शरीर के कई हिस्सों पर बुरा असर डालता है. इस से 200 से ज्यादा बीमारियां पैदा हो सकती हैं. शराब मुंह और गले में कफ झिल्ली को नुकसान पहुंचाती है. ब्रैस्ट कैंसर और आंत के कैंसर के लिए भी अलकोहल ही जिम्मेदार होता है.

ज्यादा शराब पीने से पेट में अल्सर हो सकता है. यह दिमाग को सुस्त कर देती है जिस से याददाश्त कमजोर हो जाती है. शराब से होने वाले इतने नुकसानों के बावजूद हमारे गांवदेहातों में शराब पीने का चलन बहुत पुराना है. साल 2016 में आई ‘क्रोम डाटा ऐनालिटिक्स ऐंड मीडिया’ की सर्वे रिपोर्ट में बताया गया था कि गांवदेहात के लोग सेहत के लिए दवाओं के मुकाबले नशे की चीजों पर ज्यादा पैसा खर्च करते हैं. ग्रामीण भारत में एक शख्स इलाज पर तकरीबन 56 रुपए खर्च करता है, जबकि शराब पर 140 रुपए. देश में हर साल तकरीबन 10 लाख लोगों की मौत शराब पीने से होती है. नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में शराब का सेवन करने से प्रति 96 मिनट में एक और एक दिन में 15 लोगों की मौत होती है.

महाराष्ट्र ऐसी मौतों में नंबर वन है. साल 2013 में महाराष्ट्र में शराब पीने से मरने वालों की तादाद 387 थी जो साल 2014 में बढ़ कर 1699 हो गई थी. इस के बाद मध्य प्रदेश और तमिलनाडु का नंबर आता है. और राज्यों का भी कमोबेश यही हाल है.

हां, गुजरात, नागालैंड, मिजोरम के बाद बिहार में शराब पीने पर बैन जरूर लगा हुआ है, पर वहां भी चोरीछिपे तस्कर की गई शराब जम कर लोगों को परोसी जाती है. शराब पीने से सिर्फ शराबी को नुकसान होता है, ऐसा नहीं है. दुख की बात तो यह है कि औरतों के प्रति होने वाले अपराधों और जोरजुल्म की ज्यादातर वजह शराबखोरी ही है. शराब पीने की लत के चलते जहां छोटे किसान अपनी जमीन से बेदखल हो रहे हैं, वहीं चोरी, छीनाझपटी, लूटमार और राहजनी की वारदातें भी लगातार बढ़ रही हैं.

निचले तबके की समस्या और ज्यादा बड़ी है. उस के पास खाने को पैसे नहीं होते और अगर ऐसे में किसी को खासकर घर के मुखिया को शराब पीने की लत लग जाए तो वह बेकाबू हो कर अपने परिवार वालों से लड़ाईझगड़ा करता है. नतीजतन, परिवार के परिवार बिखर जाते हैं. बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं, इसलिए वे गरीबी की दीवार को तोड़ नहीं पाते हैं. दिनेश के सुसाइड नोट ने हमारे समाज, शासन और प्रशासन पर करारा तमाचा मारा है. वह पिता की शराबखोरी से तो परेशान था ही, उस ने मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी को राज्य में शराबबंदी लागू करने के लिए भी कड़ी बात कह दी. उस ने लिखा कि अगर वे प्रदेश में शराबबंदी लागू नहीं करेंगे तो उस की आत्मा दोबारा लौटेगी और यह काम कर के जाएगी.

आत्मा लौटेगी यह तो गलतफहमी है जो पंडों ने फैलाई है पर यह कहना उस के गुस्से को जताता है. दिनेश की यह चेतावनी इशारा करती है कि शराबखोरी हमारे देश के लिए कितनी ज्यादा घातक है, जबकि इस के प्रति कोई भी गंभीर नहीं दिखाई देता है.

मुनीश बना मिसाल

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिला हैडक्वार्टर से तकरीबन 50 किलोमीटर दूर खुदागंज ब्लौक के जल्लापुर भुडि़या गांव के मुनीश चंद्र गंगवार ने ऐसा कारनामा किया है कि लोग उस की करतूतों को भूल गए हैं. दरअसल, मुनीश चंद्र गंगवार आज से 4 साल पहले एक शराबी के तौर पर जाना जाता था. गलत सोहबत के चलते उसे शराब पीने की लत लग गई थी. परिवार वाले उस से परेशान रहते थे. उस का खर्चापानी तक बंद कर दिया था ताकि वह शराब न पी सके.

मुनीश चंद्र गंगवार शायद खुद भी अपनी लत से तंग हो गया था इसलिए वह इस से छुटकारा पा कर कुछ करना चाहता था. साल 2013-14 में वह अपने एक दोस्त के साथ नियामपुर गांव में बने कृषि विज्ञान केंद्र पहुंचा. वहां उस ने कुछ किसानों को अवार्ड लेते देखा. वहीं 10वीं पास इस शख्स ने ठान लिया कि जिंदगी में कुछ बेहतर कर के दिखाएगा. मुनीश चंद्र गंगवार ने अपने भाई की मदद से ढाई बीघा खेत किराए पर ले कर उस में सतावर की खेती शुरू की. पहली बार में घाटा हुआ लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी और उस घाटे को देखते ही देखते मुनाफे में बदल दिया.

आज मुनीश चंद्र गंगवार के पास 50 बीघा खेत हैं, जिन में वह सतावर, कालमेघ, सर्पगंधा और एलोवेरा उगाता है. साथ ही वह हरी मिर्च, शिमला मिर्च, गोभी व प्याज की भी खेती करता है और दूसरे किसानों को नई तकनीक की खेतीबारी करने के लिए बढ़ावा देता है.

कास्टिंग काउच : कालिख या काम की गारंटी

आज देश में जो माहौल है, उस में यकीनी तौर पर कहा जा सकता है कि औरतें कहीं भी महफूज नहीं हैं. नवजात बच्ची से ले कर बूढ़ी औरतें तक रेप का शिकार हो रही हैं. अखबार, खबरिया चैनल की खबरों और सोशल मीडिया पर औरतों व लड़कियों को सताए जाने के वायरल होते वीडियो दहशत पैदा करते हैं. कठुआ, उन्नाव, सासाराम और न जाने कौनकौन से रेप कांड हैं जो रोजाना सुर्खियां बन कर सिर भन्ना देते हैं. जब भी कोई रेप कांड होता है तो उस की खिलाफत में फिल्म इंडस्ट्री के लोग भी खूब कमर कसते हैं, जबकि वहां से भी कास्टिंग काउच के चलते महिला कलाकारों के शोषण की खबरें सरेआम आती रहती हैं.

हौलीवुड की फिल्म इंडस्ट्री में हाल ही में ‘मी टू’ नाम से एक कैंपेन चलाया गया था, जिस में कई हीरोइनों ने कास्टिंग काउच को ले कर आपबीती सुनाई थी. बहुतों ने अपने जख्म हरे किए तो कुछ ने कहा कि अगर उन्होंने इस बुराई के खिलाफ कुछ बोला तो उन का कैरियर खत्म हो जाएगा. इस का असर भारत में भी पड़ा. यहां पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी की एक फिल्म ‘मिस लवली’ का वह हसीन याद आता है जिस में नवाजुद्दीन अपने एक फिल्म मैनेजर दोस्त के केबिन में बैठा होता है. नाटे कद और भद्दी शक्ल का वह फिल्म मैनेजर अभी उस से कुछ बात कर ही रहा होता है कि एक गदराए बदन की अधेड़ उम्र की औरत वहां आ कर उस मैनेजर से फिल्म में रोल मांगती है.

वह औरत छोटा सा रोल पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखती है, जिस का फायदा वह ठिगना केबिन में ही उठाता है. नवाजुद्दीन सिद्दीकी वहीं बैठा रहता है, लेकिन मुंह फेर लेता है. अब उस औरत को अपनी देह के जरीए आगे किसी फिल्म में रोल मिला या नहीं, पता नहीं, लेकिन उस मैनेजर की असलियत सामने आ गई थी जो वहीं केबिन में दारू का इंतजाम भी रखता है.

इसी तरह फिल्म ‘दिल्ली 6’ में फिल्मों में काम करने का सपना देखने वाली सोनम कपूर भी लोकल फोटोग्राफर के चंगुल में फंस ही चुकी होती है. लेकिन चूंकि वहां फिल्म का प्लौट दूसरा था, इसलिए वह उस धूर्त की दरिंदगी का शिकार नहीं बन पाती है. कहने का मतलब है कि ग्लैमर वर्ल्ड में जितनी चुंधिया देने वाली रोशनी दिखाई देती है, वह खुद में कास्टिंग काउच का कालापन समेटे होती है.

डेजी का खुलासा

डेजी ईरानी ने अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव में एक सनसनीखेज खुलासा किया. उन्होंने बताया कि जब वे 6 साल की थीं तब उन के साथ किसी ने गलत काम किया था. उन्होंने यह भी कहा कि आज की लड़कियां इस बारे में बात नहीं कर सकतीं. अगर वे बोलती हैं और रेप की चीखें सुनाती हैं तो कोई उन्हें काम नहीं देगा.

कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जिन को इस के लिए मजबूर किया गया हो या जिन्होंने अपनी मरजी से ऐसा किया हो, पर अगर वे नाम जाहिर करती हैं तो फिल्म इंडस्ट्री उन से किनारा कर लेगी. डेजी ईरानी ने फिल्मों में साल 1950 में बतौर बाल कलाकार काम करना शुरू किया था. घुंघराले बालों वाली मासूम चेहरे की इस बच्ची ने तब अपनी शानदार अदाकारी से जल्दी ही फिल्म दीवानों का दिल जीत लिया था. वे फिल्मों में कभी लड़की बनती थीं तो कभी लड़का. लोगों को अंदाजा भी नहीं हो पाता था कि बड़ीबड़ी आंखों वाली चपरचपर करती यह लड़की है या लड़का.

उसी बेबी डेजी ने अपनी उम्र के 67वें पड़ाव पर बताया कि जब वे 6 साल की थीं तब उन का रेप किया गया था. उस वक्त वे मद्रास (अब चेन्नई) में फिल्म ‘हम पंछी एक डाल के’ की शूटिंग कर रही थीं.

डेजी ईरानी के मुताबिक, रेप करने वाला वह शख्स उन की जानपहचान का था. वह उन्हें एक होटल में ले गया था और बैल्ट से मारा था. यही नहीं, उस शख्स ने उन्हें धमकाया था कि अगर यह बात किसी को बताई तो वह उन्हें जान से मार देगा. डेजी ईरानी ने दिल दहलाने वाली इस सचाई से परदा हटाते हुए कहा, ‘‘उस वक्त मैं काफी छोटी थी, लेकिन वह दर्द आज भी मुझे याद है कि किस तरह उस ने मुझे बैल्ट से मारा था. उस आरोपी की मौत हो चुकी है. उस का नाम नजर था. वह मशहूर गायिका जोहराबाई अंबाले वाली का रिश्तेदार था और फिल्म इंडस्ट्री में उस की काफी जानपहचान थी. इस वजह से मैं डर गई थी.’’

इतना ही नहीं, डेजी ईरानी ने एक और किस्सा सुनाया. जब वे 15 साल की थीं तब उन की मां उन्हें एक फिल्मकार मालिकचंद कोचर के यहां छोड़ कर आई थीं. मां चाहती थीं कि उन की बेटी रातोंरात स्टार बन जाए और उस फिल्मकार की फिल्म ‘मेरे हुजूर’ में काम मिल जाए. इस के लिए मां ने उन्हें साड़ी पहना कर भेजा था. डेजी ईरानी ने बताया, ‘‘मैं जब उस फिल्मकार से मिलने पहुंची तो उस ने मुझे सोफे पर बिठाया और यहांवहां छूना शुरू कर दिया. मुझे पता था कि उस के दिमाग में क्या चल रहा है. इस के बाद मैं किसी तरह वहां से भागी और बाहर आ गई. मैं अपना दर्द अपनी मां को भी नहीं बता पाई थी.’’

डेजी ईरानी एकलौती कलाकार नहीं हैं जिन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच को ले कर अपनी बात रखी है. हाल ही में स्वरा भास्कर ने बताया कि एक बार किस तरह एक डायरैक्टर उन के कमरे में घुस आया था और नशा करने के बाद उन्हें गले लगाने की जिद की थी. इतना ही नहीं, डायरैक्टर ने एक रोल के बदले में उन से जिस्मानी रिश्ता बनाने की मांग की थी. टैलीविजन पर आने वाले एक मशहूर कौमेडी सीरियल ‘भाभीजी घर पर हैं’ से मशहूर हुई शिल्पा शिंदे ने शो के प्रोड्यूसर संजय कोहली के खिलाफ सैक्स संबंधी छेड़छाड़ का केज दर्ज कराया था. उन्होंने अपनी शिकायत में कहा था कि संजय ने उन्हें ‘सैक्सी’ कहा था और जबरदस्ती गले लगाने की कोशिश की थी. इतना ही नहीं, उन की कमर और छाती को भी छूने की कोशिश की थी.

यहां फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ का विद्या बालन का वह डायलौग याद आता है कि फिल्म 3 चीजों से चलती है ऐंटरटेनमैंट, ऐंटरटेनमैंट और ऐंटरटेनमैंट. लेकिन क्या वही विद्या बालन या फिल्म इंडस्ट्री की कोई भी महिला कलाकार यह चाहेगी कि उसे ही ‘ऐंटरटेनमैंट’ का जरीया बना कर मजा किया जाए?

ऐसे सिखाया सबक

साल 2014 में हीरोइन प्रीति जिंटा ने अपने बौयफ्रैंड रह चुके बड़े कारोबारी नैस वाडिया के खिलाफ छेड़छाड़ का मामला दर्ज कराया था. तब प्रीति ने अपनी शिकायत में कहा था कि नैस ने वानखेड़े स्टेडियम में उन से छेड़खानी की थी. कोएना मित्रा ने भी एक अनजान शख्स के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. वह शख्स कोएना को फोन पर बेहूदा बातें कर के वन नाइट स्टैंड का औफर दे रहा था.

कोएना मित्रा ने उस आदमी के खिलाफ आईपीसी की धारा 509 के तहत मामला दर्ज कराया था. इसी तरह हीरोइन राधिका आप्टे ने बताया था कि दक्षिण भारत के एक मशहूर ऐक्टर ने सैट पर आ कर उन के साथ बदतमीजी की थी. वह उन के पैर सहलाने लगा था. राधिका को उस की यह हरकत पसंद नहीं आई और उन्होंने उसे तमाचा जड़ दिया.

इन को अनजान ने सताया

कभी सलमान खान की प्रेमिका रह चुकी सोमी अली ने बताया कि जब वे महज 5 साल की छोटी बच्ची थीं तब घर में काम करने वाले एक नौकर ने उन के साथ यौन हिंसा की थी. इसी तरह अनिल कपूर की बेटी और खूबसूरत हीरोइन सोनम कपूर ने एक इंटरव्यू में बताया था, ‘‘जब मैं 13-14 साल की थी तब फिल्म देखने जाते समय एक शख्स ने मुझे पीछे से आ कर दबोच लिया था. तब मैं बहुत डर गई थी. 2-3 साल तक तो मैं ने इस बारे में किसी को बताया भी नहीं था.’’

अक्षय कुमार की पत्नी ट्विंकल खन्ना ने टीवीएफ के सीईओ अरुणम कुमार पर सैक्सुअल हैरासमैंट का आरोप लगाया था. ट्विंकल ने तब बताया था कि उन्हें जब फोन पर एक गंदा संदेश भेजा गया तो वे अपनी गाड़ी में फूटफूट कर रोने लगी थीं. इस तरह की फेहरिस्त बड़ी लंबी है जब सुनहरे परदे या टैलीविजन की महिला कलाकारों को अपने ही साथी कलाकारों या अनजानों से बेइज्जत होना पड़ा. कई चुप्पी साध गईं तो कुछ ने अपनी भड़ास निकाली.

सरोज के अलग सुर कास्टिंग काउच पर हीरोइनें या दूसरी महिला कलाकार जितना भी खुल कर बोल रही हैं, उस के उलट इसी इंडस्ट्री से जुड़ी मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान ने दूसरी ही नई बात छेड़ कर मामले को अलग ही एंगल दे दिया है.

अपने हालिया बयान में सरोज खान ने फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच और रेप के मुद्दे पर कहा कि अगर फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच होता है तो रोटी भी मिलती है. जिस के साथ गलत हुआ है उसे छोड़ नहीं दिया जाता, बल्कि उसे काम दिया जाता है. जब इस बयान पर विवाद उठता दिखा तो सरोज खान ने कहा, ‘‘अब मैं ने क्या गलत कह दिया है. जो सच है वही कहा है. मेरी बात को लोग गलत ले रहे हैं तो क्या कर सकते हैं. मैं रेप जैसे अपराधों को सही नहीं कह रही हूं. मेरा कहना है कि लोग फिल्म इंडस्ट्री पर ही उंगली क्यों उठाते हैं? क्या यह सब फिल्म इंडस्ट्री के बाहर दूसरी जगहों पर नहीं होता है?’’

सरोज खान ने आगे कहा, ‘‘हर लड़की के ऊपर कोई न कोई हाथ साफ करने की कोशिश करता है. सरकार के लोग भी करते हैं, फिर लोग फिल्म जगत के पीछे क्यों पड़े हैं? फिल्म जगत कम से कम रोटी तो देता है, रेप कर के छोड़ तो नहीं देता. यह लड़की के ऊपर है कि वह क्या चाहती है. अगर वह चाहती है कि किसी के हाथ न आना तो न आए.’’ सरोज खान के बयान से सवाल उठता है कि क्या कास्टिंग काउच वाकई जबरदस्ती होता है या यह एक तश्तरी में परोसा गया वह गिफ्ट होता है कि आप हमारी तमन्नाएं पूरी कीजिए, हम आप को सिल्वर स्क्रीन का चमकता सितारा बना देंगे? जब सुविधा होती है तब तो बहुत सी हीरोइनें इस गिफ्ट को स्वीकार कर लेती हैं. उन्हें काम भी मिलता है और सरोज खान के मुताबिक उन का पेट भी पलता है.

मुसलिम दलित एकता है जरूरी

15 अप्रैल, 2018 को पटना में गांधी मैदान में हुए ‘दीन बचाओ, देश बचाओ’ सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जम पर निशाना साधा गया. मुसलिमों के इस सम्मेलन में पहली बार मुसलिम और दलित एकता का नारा दिया गया.

राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के माय यानी मुसलिमयादव समीकरण से आगे बढ़ कर मुसलिमदलित एकता का नारा बुलंद किया गया.

देशभर में मुसलिमदलित समाज को एकजुट करने की कवायद शुरू हो चुकी है. साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव को ले कर यह कोशिश जोर पकड़ने लगी है.

तकरीबन 30 करोड़ दलित और तकरीबन 18 करोड़ मुसलिमों की आबादी पर राजनीतिक दलों ने अपनी निगाहें टिका दी हैं. इन दोनों को मिलाने की राह में कई रोड़े हैं लेकिन इस के बाद भी नेताओं को उम्मीद है कि मुसलिमदलित एकता बनेगी और अगले चुनाव में अपना रंग दिखाएगी.

‘इमारत ए शरिया’ के इस सम्मेलन में बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के मुसलिम शामिल हुए. ‘इमारत ए शरिया’ की बुनियाद मौलाना अबुल कलाम आजाद और मौलाना सज्जाद ने साल 1921 में रखी थी. इस संस्था का मकसद सामाजिक सुधार, कल्याणकारी काम, तालीम का प्रसार और गरीबों की मदद करना है.

इस सम्मेलन की अगुआई करते हुए ‘इमारत ए शरिया’ के अमीर शरीअत और आल इंडिया मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के महासचिव हजरत मौलाना सैयद वली रहमानी ने कहा कि देश के हालात पिछले कुछ सालों से ठीक नहीं हैं. संविधान में दिए गए बुनियादी हकों को खत्म करने की साजिशें चल रही हैं. सुप्रीम कोर्ट तक पर दबाव बनाया जा रहा है.

इस सम्मेलन की खासीयत यह रही कि इस में मुसलिमों और दलितों की एकता पर जोर दिया गया.

पिछले कुछ समय से कई राजनीतिक दल दलितमुसलिम एकता का नारा बुलंद करने लगे हैं. मुलायम सिंह यादव, मायावती, ममता बनर्जी को तो छोडि़ए, भारतीय जनता पार्टी के पिछलग्गू नीतीश कुमार भी अब मुसलिमदलित एकता की रट लगा रहे हैं.

लालू प्रसाद यादव ने अपने माय यानी मुसलिमयादव समीकरण के दम पर 16 सालों तक बिहार पर राज किया था. उन के इस कामयाब समीकरण की तोड़ के लिए अब नीतीश कुमार एमडी यानी मुसलिमदलित समीकरण के बूते नई सियासी जमीन बनाने में लगे हुए हैं, जबकि उन की आका पार्टी भारतीय जनता पार्टी मुसलिमों को देशद्रोही घोषित करने की कोशिश कर रही है और दलितों को पौराणिक गुलाम.

पिछले दिनों बिहार विधानपरिषद के चुनाव में नीतीश कुमार ने अनजान से मुसलिम चेहरे खालिद अनवर को परिषद का टिकट दे कर इस समीकरण को मजबूत बनाने की कवायद की.

अरब देशों से खूब पैसा कमाने के बाद जब खालिद अनवर बिहार लौटे तो उन्होंने राजनीति में पैठ बनाने की कोशिश शुरू की. पहले तो वे लालू प्रसाद यादव के दरबार में घूमे, लेकिन वहां मुसलिम नेताओं की भरमार होने की वजह से उन्हें कोई खास भाव नहीं मिला. इस के बाद वे नीतीश कुमार के चारों ओर चक्कर काटने लगे.

नीतीश कुमार ने उन्हें अपनी ताकत दिखाने के लिए कहा. इस के बाद खालिद अनवर पटना के गांधी मैदान में मुसलिमों को जमा करने की कवायद में लग गए और ‘दीन बचाओ, देश बचाओ’ रैली करा कर अपनी ताकत दिखा दी. उसी दिन शाम होते ही खालिद अनवर के घर पर विधानपरिषद का टिकट पहुंच गया.

इस से पहले जनता दल (यूनाइटेड) का कोई नेता खालिद अनवर को जानता तक नहीं था. पटना के कुम्हरार इलाके में सुन्नी वक्फ बोर्ड की वक्फ संख्या-1048 की 5300 वर्गफुट जमीन पर उन का प्रिंटिंग प्रैस चलता है. इस जमीन पर उन्होंने जबरन कब्जा जमा रखा है.

पिछले साल जद (यू) के कुछ नेता कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा करने के विरोध में खालिद अनवर के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे. इस मामले में इतनी तीखी झड़प हुई थी कि जद (यू) के नेताओं ने खालिद अनवर की पिटाई कर दी थी और थाने में केस भी दर्ज कराया था.

खालिद अनवर पर यह भी आरोप है कि उन्होंने पटना के ही चितकोहरा इलाके में कब्रिस्तान की 63 डिसमिल जमीन पर कब्जा जमा रखा है.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत में दलितों की कुल आबादी 20 करोड़, 14 लाख थी. यह तब की कुल आबादी का 16.6 फीसदी था. उत्तर प्रदेश में सब से ज्यादा दलित हैं. वहां कुल दलित आबादी में से 20 फीसदी दलित हैं. इस के बाद बिहार में 7.2 फीसदी दलित आबादी है.

कई दलित संगठन अपनेअपने सर्वे के हिसाब से यह दावा करते हैं कि दलितों की कुल आबादी आज 32 करोड़ के आसपास है. उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा दलित बसते हैं. उन से ऊपर शूद्रों यानी अन्य पिछड़ी जातियों में भी बहुत सी जातियां हैं. जो हैं तो दलितों के बराबर, पर उन्हें मंडल आयोग ने ऊंची जमात में रख दिया जहां उन्हें हिकारत से देखा जाता है.

वहीं 2011 की जनगणना रिपोर्ट बताती है कि देश में 17 करोड़, 22 लाख मुसलिम रहते हैं. वे देश की कुल आबादी का 14.23 फीसदी हैं. इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद भारत मुसलिम आबादी के लिहाज से तीसरा सब से बड़ा देश है.

भारत में सब से ज्यादा मुसलिम आबादी उत्तर प्रदेश में है. वहां 3 करोड़, 7 लाख मुसलिम रहते हैं. इस के बाद पश्चिम बंगाल का नंबर आता है, जहां 2 करोड़, 2 लाख मुसलिम हैं. बिहार में एक करोड़, 37 लाख मुसलिम हैं. देश की कुल मुसलिम आबादी में से 47 फीसदी आबादी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में ही रहती है.

सियासत के जानकार हेमंत राव कहते हैं कि मुसलिमों के साथ दलितों को मिला कर साझा राजनीति करने का सपना मुसलिम के साथ हिंदू नेता भी देख रहे हैं. राजनीति में मुसलिम की खास पैठ नहीं है, इसलिए वे दलितों के कंधे पर सवार हो कर राजनीति में अपनी कमजोर हालत को मजबूत बनाने की कवायद में लगे हैं.

गौरतलब है कि मुसलिमों का एक बड़ा हिस्सा वे लोग हैं जो हिंदुओं की निचली और सताई गई जातियों से धर्म बदल कर मुसलिम हुए हैं. भारत के 18 करोड़ मुसलिमों में से ज्यादातर हिंदू दलित ही हैं, जिन्होंने हिंदुओं की ऊंची जातियों के जोरजुल्म से बचने के लिए इसलाम धर्म कबूल कर लिया था.

वैसे, हिंदू दलितों और मुसलिमों की बदहाली के लिए अलगअलग वजहें हैं. दोनों की समस्याएं और जरूरतें अलगअलग हैं. हिंदू दलित जहां ब्राह्मणवाद के शिकार हैं, वहीं मुसलिम सांप्रदायिकता नाम की बीमारी से पीडि़त हैं. इन दोनों समस्याओं को राजनीतिक दलों ने अपने फायदे के लिए पैदा किया और कायम रखा है.

मुसलिमों के पैरोकार और सांसद ऐजाज अली कहते हैं कि हर दल मुसलिमों की तरक्की की बात तो करता है, पर उस की कोशिश यही रही है कि मुसलिमों की तरक्की न हो. वे पढ़ेलिखे नहीं है. पढ़लिख जाने पर उन्हें समझदारी आ जाएगी और फिर वे अपने दिमाग से वोट डालेंगे. सियासी दलों का मकसद बस मुसलिमों को वोट बैंक बना कर रखना है, न कि उन की तरक्की करना.

मुसलिमों को टिकट देने में हर दल आनाकानी करता रहा है. मुसलिम नेता कहते हैं कि अगर मुसलिमदलित की राजनीतिक एकता मजबूत बनाने के पहले मुसलिमों को उन के हक दिए जाएं.

अगर इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि साल 1936 से साल 1950 तक मुसलिमों के दलित तबके को हिंदू दलितों की तरह ही रिजर्वेशन का फायदा मिलता था. साल 1950 में संविधान की धारा 34(1) में यह आदेश जारी किया गया था कि कोई भी शख्स जो हिंदू धर्म के अलावा किसी धर्म को मानता हो, उसे अनुसूचित जाति के दायरे से बाहर माना जाएगा. इस फरमान के बाद मुसलिमों में जो दलित थे, उन्हें रिजर्वेशन का फायदा मिलना पूरी तरह से बंद हो गया था, जबकि हिंदू दलितों को इस का फायदा मिलता रहा.

कुछ मुसलिम नेता दबी जबान में कहते हैं कि दलित मुसलिमों को आरक्षण का फायदा देने से वंचित करने के इस फरमान पर डाक्टर भीमराव अंबेडकर भी चुप्पी साधे रहे.

गौरतलब है कि अंबेडकर उस समय केंद्र सरकार में कानून मंत्री थे. मुसलिमों के साथ हुई इस नाइंसाफी और बेईमानी के खिलाफ उन्होंने जरा भी आवाज नहीं उठाई. इस से आम मुसलिम हिंदू दलितों के साथ कंधे से कंधा मिलाने के नाम पर कन्नी काटते रहे हैं.

राज्यसभा के सदस्य रह चुके पिछड़े मुसलिमों के नेता अली अनवर कहते हैं कि हर चुनाव से पहले मुसलिमों को ले कर सियासत शुरू हो जाती है पर उन्हें टिकट देने की बात उठते ही सब बगलें झांकने लगते हैं.

बिहार की ही बात करें तो वहां मुसलिमों की आबादी 16.5 फीसदी है और कुल 243 विधानसभा क्षेत्रों में से 60 में वे फैसला करने के रोल में हैं. मुसलिम नेता मानते हैं कि 243 विधानसभा सीटों में से 60 सीटों में मुसलिमों के वोटों से किसी भी उम्मीदवार को जिताया जा सकता है. उन क्षेत्रों में मुसलिमों के वोट 18 से 74 फीसदी तक हैं. इस के अलावा 50 ऐसी सीटें हैं जहां 10 से 17 फीसदी मुसलिम वोट हैं. इस के बाद भी सियासी दल मुसलिमों को टिकट देने में आनाकानी करते रहे हैं.

बिहार विधानसभा के 10 साल तक (2005-2015) अध्यक्ष रहे जद (यू) नेता उदय नारायण चौधरी ने जद (यू) पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी है. वे कहते हैं कि बिहार में नीतीश सरकार दलितों को सता रही है. जद (यू) में पैसे वालों और बाहरी लोगों को तरजीह दी जा रही है. दलितों पर होने वाले जोरजुल्म के मसले पर सरकार ने चुप्पी साध ली है. दलितों को केवल सत्ता पाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

दलितों और अल्पसंख्यकों को ठगा गया है : जीतनराम मांझी

बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके जीतनराम मांझी का मानना है कि केंद्र से ले कर राज्य सरकारें दलितों को केवल ठगने का ही मायाजाल बिछाती रही हैं. अगर सरकार को दलितों का खयाल है तो वह सभी थानों में एससीएसटी ऐक्ट की तरह एफआईआर दर्ज कराने का फरमान जारी करे और इस काम के लिए दलित अफसर को ही बहाल करे. अल्पसंख्यक बरहुज थानों का थानाध्यक्ष भी अल्पसंख्यक समाज का ही होना चाहिए. इतना ही नहीं, इस ऐक्ट का केस देखने के लिए अलग से कोर्ट भी बनाया जाए.

एससीएसटी ऐक्ट के तहत दर्ज केस में कनविक्शन रेट महज 1.86 फीसदी ही है. पिछले साल तक इस ऐक्ट के तहत दर्ज 25 हजार, 943 केस पैंडिंग थे. इन में से 1443 केसों का ही फैसला आया और केवल 89 केसों में ही सजा मिली.

जीतनराम मांझी बेपेंदे के लोटे की तरह हैं जो कभी इधर की और कभी उधर की हांकते हैं.

97 करोड़ की पुरानी करेंसी का खेल

आनंद खत्री का नाम पूरे कानपुर क्या देश भर के कारोबारी लोगों के बीच जानापहचाना है. उन की कई पीढि़यां कपड़ा कारोबार से जुड़ी रही हैं. कपड़ा व्यापार के साथ आनंद ने होटल और रियल एस्टेट का बिजनैस भी शुरू कर दिया था.

बीती 16 जनवरी की सुबह जब आनंद के सभी ठिकानों पर पुलिस की टीम के साथ आयकर और रिजर्व बैंक के अधिकारियों ने छापेमारी की तो पूरा कानपुर सकते में रह गया. शहर भर में यह बात तेजी से फैली.

हर आदमी यही सोच रहा था कि ऐसा क्या हो गया, जिस से आनंद खत्री के यहां पुलिस ने इतनी बड़ी काररवाई की है. कानपुर वासियों की आंखें तब खुली की खुली रह गईं, जब उन्हें पता चला कि आनंद खत्री के यहां से 97 करोड़ की पुरानी करेंसी वाले नोट मिले हैं. पुलिस ने जब गाडि़यों में बक्से लादने शुरू किए तो छापे का सच सामने आ गया.

नोटबंदी के एक साल बाद उत्तर प्रदेश की आर्थिक राजधानी कानपुर में 97 करोड़ की पुरानी करेंसी मिलना आश्चर्य की बात थी, क्योंकि पूरे देश में इतनी बड़ी संख्या में पुराने नोट बरामद होने का यह पहला मामला था.

नोटबंदी लागू होने के दिन 500 रुपए के 1716.6 करोड़ नोट और 1 हजार के 8 करोड़ नोट बाजार में थे. इस तरह से 15.44 लाख करोड़ के नोट प्रचलन में थे. इन में से 15.28 लाख करोड़ के नोट रिजर्व बैंक के पास वापस आ गए पर करीब 1 फीसदी नोट वापस नहीं आए. मतलब 16050 करोड़ रुपए के हजार और 5 सौ के नोट वापस नहीं आए.

रिजर्व बैंक इन नोटों को कालाधन मान कर चल रही थी. रिजर्व बैंक, आयकर विभाग सहित कुछ दूसरे विभागों के साथ मिल कर इन पैसों को तलाशने का काम कर रही है. मनी चेंजर व मल्टीनेशनल कंपनियों पर नजर रखने के दौरान आयकर विभाग को पता चला कि हैदराबाद और कानपुर में एनआरआई के जरिए पुरानी करेंसी को बदलने का काम हो रहा है.

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यह जानकारी मिलने के बाद रिजर्व बैंक के 4 अफसरों की अगुवाई में आयकर और पुलिस विभाग ने कानपुर में खोजबीन शुरू की. पुलिस को यह पता चल गया था कि मनी चेंजर के इस गेम में कानपुर के नामी उद्योगपति आनंद खत्री की भूमिका संदेह के घेरे में है.

आनंद खत्री कानपुर के बड़े उद्योगपति हैं. कपड़े के बिजनैस के अलावा वह होटल संचालन और बिल्डर का काम भी करते हैं. प्रभावशाली आनंद खत्री के ऊपर हाथ डालना आसान नहीं था. ऐसे में पुख्ता जानकारी मिलनी जरूरी थी.

आनंद खत्री का परिवार कई पीढि़यों से कानपुर में कपड़ों का कारोबार करता आ रहा है. उन के पिता श्यामदास खत्री कानपुर में कपड़ा कमेटी के सदस्य रह चुके थे. उन का विभिन्न तरह के कपड़ों का थोक कारोबार था.

आनंद खत्री के 6 भाई हैं. आनंद अपने 3 भाइयों गोवर्धन, तुलसीदास और हरीश के साथ मिल कर काहू कोठी में कपड़ों का कारोबार देखते हैं. यहीं से वह प्रौपर्टी रीयल एस्टेट और होटल का कारोबार भी देखते हैं. पुलिस पूरे मामले में पक्की खबर होने के बाद ही आनंद खत्री पर हाथ डालने का साहस कर सकी.

आयकर विभाग के पास पुख्ता सबूत थे कि आनंद खत्री अपने साथियों के साथ मिलीभगत से मनी चेंजर का काम करते हैं. आनंद खत्री के नेटवर्क में कई ऐसे ब्रोकर थे, जो कमीशन ले कर उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश में रीयल एस्टेट कारोबारियों और बिजनैसमैन से पुराने नोट ले कर उन्हें नए नोटों में बदलने का काम कर रहे थे. इस के बदले वह मनी चेंजर ब्रोकर को कमीशन देते थे.

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दिल्ली और हैदराबाद से भी पुराने नोटों को नए में बदला जाना था. पुराने नोटों को दिल्ली और हैदराबाद ले जाने के 3 रास्ते थे. पहला रूट कानपुर से वाराणसी-कोलकाता-हैदराबाद का था, दूसरा रास्ता वाराणसी-बागपत-मीरजापुर वाया दिल्ली का था और तीसरा रूट दिल्ली से कोलकाता का.

पुलिस ने बताया कि नोट बदलने के इस खेल में नेपाल का कनेक्शन भी सामने आया है. पुलिस को आनंद खत्री के साथ काम करने वाले हैदराबाद निवासी कुटेश्वर के मोबाइल संदेश भी मिल गए, जिस में नोट बदलवाने संबंधी कई मैसेज थे. अब पुलिस के पास पुख्ता सबूत थे कि मनी चेंज का बड़ा खेल कानपुर में खेला जा रहा है.

16 जनवरी, 2018 को कानपुर पुलिस, आयकर विभाग और रिजर्व बैंक की टीम ने संयुक्त रूप से आनंद खत्री के कई ठिकानों पर छापेमारी की तो 96.44 करोड़ के पुराने नोट पकड़ में आ गए. ये नोट 80 फीट रोड और गुमटी नंबर 5 स्थित होटलों और आनंद खत्री के घर में बक्सों में भरे मिले.

पुलिस टीम की अगुवाई आईजी आलोक कुमार, एसएसपी अखिलेश कुमार, एसपी पश्चिम डा. गौरव ग्रोवर, एसपी पूर्व अनुराग आर्या सहित कई अधिकारियों ने की. पुलिस ने स्वरूपनगर थाने को अपना औफिस बना लिया था.

टीम को पुरानी करेंसी का तो पता चल चुका था, पर यह बात समझ नहीं आ रही थी कि इस करेंसी को कहां और कैसे खपाया जा रहा था. ऐसे में पुलिस ने नेपाल पुलिस के साथ मिल कर इस मामले को हल करने का प्रयास किया. पुलिस को लग रहा था कि नेपाल के जरिए ही पुरानी करेंसी नई करेंसी में बदली जा रही होगी.

आनंद खत्री के पास 40 से ज्यादा प्रौपर्टीज के दस्तावेज मिले. जबकि कैश में 3 करोड़ की जगह केवल 2 लाख रुपए ही मिले. शोरूम में कपड़े का भारी स्टौक मिला, जिस का मिलान करना कठिन काम था.

पुलिस ने आनंद खत्री के परिवार के लोगों से भी पूछताछ की. प्रौपर्टी के 40 दस्तावेज में से कई दूसरों के नाम पर निकले. पुलिस को बताया गया कि आनंद प्रौपर्टी की खरीदफरोख्त का काम करते हैं. ये दस्तावेज उन लोगों के हैं, जिन्होंने अपनी प्रौपर्टी बेचने के लिए दस्तावेज उन्हें दिए थे. पुलिस को यह बात समझ नहीं आई, इसलिए वह इस की तहकीकात में लग गई.

पुलिस ने इस मामले में 16 लोगों को गिरफ्तार किया. इन में आंध्र प्रदेश की रहने वाली महिला राजेश्वरी सहित लखनऊ के अनिल यादव, आनंद, मोहित, संतोष, संजय, संतकुमार, ओंकार, अनिल, रामाश्रय, संजय कुमार, धीरेंद्र गुप्ता, संजीव अग्रवाल, मनीष अग्रवाल और अली हुसैन प्रमुख थे.

अनिल यादव लखनऊ में रहता था. उस ने खुद को समाजवादी पार्टी के एक बडे़ नेता का करीबी बताया. वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था. ये लोग आपस में मिल कर इस खेल को अंजाम देते थे. नोटों की गिनती करना और कहानी का राजफाश करना सरल नहीं था.

ऐसे में नोटों की गिनती के काम को पूरा करना पहली जरूरत थी. मंगलवार 16 जनवरी से रिजर्व बैंक के 4 बड़े अधिकारियों के साथ यह काम शुरू हुआ.

2 बड़ी मशीनों से 4 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद नोटों की गिनती शुरू हुई, जिस में कुल 96 करोड़ 62 लाख रुपए के नोट निकले. सीओ कोतवाली अजय कुमार ने सारे नोट अलगअलग बक्सों में बंद करा दिए. पकड़े गए लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी, षडयंत्र रचने की धारा और एबीएन एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज की गई. आरोपी 17 जनवरी की शाम कोर्ट में पेश किए गए, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

आरक्षण की अनसुलझी गुत्थी

आरक्षण के खिलाफ ऊंची जातियों ने अपनी मुहिम को तेज कर दिया है. आरक्षण कट्टर व हिंदूवादियों की आंखों में खटकने वाला सब से बड़ा मुद्दा है. हिंदू कट्टरपंथी जनता न मुसलमानों से गुस्सा है न पाकिस्तान से. यह केवल बहाना है. उसे तो असल में उन शूद्रों व अछूतों से नाराजगी है जो आरक्षण के सहारे सदियों से बनी वर्ण व्यवस्था के किनारों पर बाहर से सीढि़यां लगा कर चढ़ रहे हैं. वे उस पर चौतरफा हमला कर रहे हैं और समाज के हर उस वर्ग को जमा कर रहे हैं जिसे आरक्षण से फायदा नहीं मिल रहा या जो आरक्षण की गुत्थी को मंदिरों के पूजापाठ के धुएं की वजह से समझ नहीं पा रहा है.

आरक्षण जन्म से नीचे कहे जाने वाले लोगों के लिए कच्चे धागे की तरह ही है, यह हाल में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में मान लिया है. मामला थोड़ा रोचक है. सुनीता अग्रवाल पैदा तो बनियों में हुई पर उस ने प्रेम विवाह उस वीर सिंह से कर लिया जो जाटव जाति का है. 1991 में सुनीता को एक सर्टिफिकेट मिल गया कि वह जाटव है और उसे पठानकोट, पंजाब के एक स्कूल में आरक्षण के आधार पर पोस्ट ग्रेजुएट टीचर की नौकरी मिल गई. 2013 में किसी ने शिकायत कर दी कि वह तो ऊंची जाति की है.

तहसीलदार ने 2013 में 1991 में जारी किया सर्टिफिकेट कैंसिल कर दिया और सुनीता सिंह (अग्रवाल) को सर्टिफिकेट लौटाने को कहा. 2015 में केंद्रीय विद्यालय संगठन ने उस की नौकरी खत्म कर दी. मामला अदालतों में गया. गनीमत है न्याय में देर है, अंधेर है का फार्मूला उस पर लागू नहीं हुआ और 2016 में मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया जिस ने 19 जनवरी, 2018 को अपना फैसला भी सुना दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम बात जो कही वह यह है कि इस बारे में कोई विवाद नहीं है कि जाति जन्म से तय होती है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी मान लिया कि जाति का सवाल हिंदू वर्ण व्यवस्था, पुराणों, स्मृतियों के हिसाब से तो पैदाइश पर है. नीची जाति में जन्मे हो तो नीचे ही रहोगे. जो लोग लीपापोती करते हैं कि जाति तो कर्म से होती है वह उन्हीं इशारों पर चल रहे सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘जाति विवाह से नहीं बदल सकती और चूंकि सुनीता ‘अग्रवाल’ परिवार में जन्मी थी जो जनरल कैटेगरी में आती है शैड्यूल्ड कास्ट में नहीं, उसे शैड्यूल्ड कास्ट का प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता.’

सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं बताया कि 2013 में शिकायत किस ने की, क्यों की. 21 साल तक भलीभांति काम करने के बाद भी और वाइस प्रिंसिपल बनने के बाद भी सुनीता न तो जनरल कैटेगरी के लायक मानी गई और न ही विवाह कर लेने के बाद शैड्यूल्ड कास्ट. उसे सुप्रीम कोर्ट ने बिन जाति का बना दिया, उस का दोष न होते हुए भी. यानी अच्छे कर्म करने के बावजूद वह लोगों को मंजूर नहीं थी कि लोगों ने उस की फाइल 2013 में कुरेद कर जाति प्रमाणपत्र को गलत करने की सोच भी ली.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उस के सैकड़ों एजेंट जो मंदिरों, आश्रमों, मठों, कुंडलियों की दुकानों, सरकारी ओहदों पर बैठे हैं एक बार फिर रामायण और महाभारत का युग लाना चाह रहे हैं जहां शंबूक और एकलव्यों की कोई जगह नहीं थी. पुराण आज के दलितों की, अछूतों की तो बात भी बहुत कम करते हैं. अफसोस यह है कि सुप्रीम कोर्ट भी उन के मनसूबों का हिस्सा बन गया है.

जाति की पहचान अब ऐसी है कि सुप्रीम कोर्ट के हिसाब से, कि शादी से भी नहीं धुल सकती. कोई बड़ी बात नहीं कोई फैसला आ जाए कि जनरल कास्ट और शैड्यूल्ड कास्ट विवाह के बाद पैदा हुए बच्चे का जन्म भी सवालों के घेरे में आ जाए. सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर मुहर लगाई है कि भैंस को चाहे जितना धो लो वह गऊ माता तो नहीं बन सकती.

मां बाप की शादी की गवाह बनी बेटी

25 अक्तूबर, 2017 को धौलपुर के आर्यसमाज मंदिर में एक शादी हो रही थी. इस शादी में हैरान करने वाली बात यह थी कि वहां न लड़की के घर वाले मौजूद थे और न ही लड़के के घर वाले. इस से भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि जिस लड़के और लड़की की शादी हो रही थी, उन की ढाई साल की एक बेटी जरूर इस शादी में मौजूद थी.

इस शादी में लड़की के घर वालों की भूमिका बाल कल्याण समिति धौलपुर के अध्यक्ष अदा कर रहे थे तो इसी संस्था के अन्य सदस्य लड़के के घर वालों तथा बाराती की भूमिका अदा कर रहे थे. इस के अलावा कुछ अन्य संस्थाओं के कार्यकर्ता भी वहां मौजूद थे.

दरअसल, इस के पीछे जो वजह थी, वह बड़ी दिलचस्प है. राजस्थान के भरतपुर का रहने वाला 19 साल का सचिन धौलपुर के कोलारी के रहने वाले अपने एक परिचित के यहां आताजाता था. उसी के पड़ोस में अनु अपने मांबाप के साथ रहती थी. लगातार आनेजाने में सचिन और अनु के बीच बातचीत होने लगी.

15 साल की अनु को सचिन से बातें करने में मजा आता था. चूंकि दोनों हमउम्र थे, इसलिए फोन पर भी उन की बातचीत हो जाती थी. इस का नतीजा यह निकला कि उन में प्यार हो गया. मौका निकाल कर दोनों एकांत में भी मिलने लगे.

जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी अनु सचिन पर फिदा थी. उस ने तय कर लिया था कि वह सचिन से ही शादी करेगी. ऐसा ही कुछ सचिन भी सोच रहा था. जबकि ऐसा होना आसान नहीं था. इस के बावजूद उन्होंने हिम्मत कर के अपनेअपने घर वालों से शादी की बात चलाई.

सचिन ने जब अपने घर वालों से कहा कि वह धौलपुर की रहने वाली अनु से शादी करना चाहता है तो उस के पिता ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘कमाताधमाता कौड़ी नहीं है और चला है शादी करने. अभी तेरी उम्र ही क्या है, जो शादी के लिए जल्दी मचाए है. पहले पढ़लिख कर कमाने की सोच, उस के बाद शादी करना.’’

सचिन अभी इतना बड़ा नहीं हुआ था कि पिता से बहस करता, इसलिए चुप रह गया.

दूसरी ओर अनु ने अपने घर वालों से सचिन के बारे में बता कर उस से शादी करने की बात कही तो घर के सभी लोग दंग रह गए. क्योंकि अभी उस की उम्र भी शादी लायक नहीं थी. उन्हें चिंता भी हुई कि कहीं नादान लड़की ने कोई ऐसावैसा कदम उठा लिया तो उन की बड़ी बदनामी होगी. उन्होंने अनु को डांटाफटकारा भी और समझाया भी. यही नहीं, उस पर घर से बाहर जाने पर पाबंदी भी लगा दी गई.

घर वालों की यह पाबंदी परेशान करने वाली थी, इसलिए अनु ने सारी बात प्रेमी सचिन को बता दी. उस ने कहा कि उस के घर वाले किसी भी कीमत पर उस की शादी उस से नहीं करेंगे. जबकि अनु तय कर चुकी थी कि उस की राह में चाहे जितनी भी अड़चनें आएं, वह उन से डरे बिना सचिन से ही शादी करेगी.

घर वालों के मना करने के बाद कोई और उपाय न देख सचिन और अनु ने घर से भागने का फैसला कर लिया. लेकिन इस के लिए पैसों की जरूरत थी. सचिन ने इधरउधर से कुछ पैसों का इंतजाम किया और घर से भागने का मौका ढूंढने लगा.

दूसरी ओर अनु के घर वालों को लगा कि उन की बेटी बहक गई है, वह कोई गलत कदम उठा सकती है. हालांकि उस समय उस की उम्र महज 15 साल थी, इस के बावजूद उन्होंने उस की शादी करने का फैसला कर लिया. इस से पहले कि वह कोई ऐसा कदम उठाए, जिस से उन की बदनामी हो, उन्होंने उस के लिए लड़का देखना शुरू कर दिया.

यह बात अनु ने सचिन को बताई. सचिन अपनी मोहब्बत को किसी भी सूरत में खोना नहीं चाहता था, इसलिए योजना बना कर एक दिन अनु के साथ भाग गया. अनु को घर से गायब देख कर घर वाले समझ गए कि उसे सचिन भगा ले गया है. अनु के पिता अपने शुभचिंतकों के साथ थाने पहुंचे और सचिन के खिलाफ अपहरण और पोक्सो एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

मामला नाबालिग लड़की के अपहरण का था, इसलिए पुलिस ने तुरंत काररवाई शुरू कर दी. धौलपुर के कोलारी का रहने वाला सचिन का जो परिचित था, उस से पूछताछ की गई. उसे साथ ले कर पुलिस भरतपुर स्थित सचिन के घर गई, लेकिन वह वहां नहीं मिला.

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पुलिस ने उस के घर वालों से भी पूछताछ की, पर उन्हें सचिन और अनु के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. सचिन की जहांजहां रिश्तेदारी थी, पुलिस ने वहांवहां जा कर जानकारी हासिल की. सभी ने यही बताया कि सचिन उन के यहां नहीं आया है.

सचिन का फोन नंबर भी स्विच्ड औफ था. पुलिस के पास अब ऐसा कोई जरिया नहीं था, जिस से उस के पास तक पहुंच पाती. इधरउधर हाथपैर मारने के बाद भी पुलिस को सफलता नहीं मिली तो वह धौलपुर लौट आई.

अनु के गायब होने से उस के मातापिता बहुत परेशान थे. उन्हें चिंता सता रही थी कि उन की बेटी पता नहीं कहां और किस हाल में है. पुलिस में रिपोर्ट वे करा ही चुके थे. जब पुलिस उसे नहीं ढूंढ सकी तो उन के पास ऐसा कोई जरिया नहीं था कि वे उसे तलाश पाते. महीना भर बीत जाने के बाद भी जब अनु के बारे में कहीं से कोई खबर नहीं मिली तो वे शांत हो कर बैठ गए.

पुलिस को भी लगने लगा कि सचिन और अनु किसी दूसरे शहर में जा कर रह रहे हैं. पुलिस ने राजस्थान और उत्तर प्रदेश के सभी थानों में दोनों का हुलिया भेज कर यह जानना चाहा कि कहीं उस हुलिए से मिलतीजुलती डैडबौडी तो नहीं मिली है.

सचिन उत्तर प्रदेश के इटावा का मूल निवासी था और उस के ज्यादातर रिश्तेदार उत्तर प्रदेश में ही रहते थे. इसलिए वहां के थानों को भी सूचना भेजी गई थी. इस से भी पुलिस को कोई सफलता नहीं मिली.

समय बीतता रहा और पुलिस की जांच अपनी गति से चलती रही. थानाप्रभारी ने हिम्मत नहीं हारी. वह अपने स्रोतों से दोनों प्रेमियों के बारे में पता करते रहे. एक दिन उन्हें मुखबिर से जानकारी मिली कि सचिन अनु के साथ इटावा में रह रहा है.

यह उन के लिए एक अच्छी खबर थी. अपने अधिकारियों को सूचित करने के बाद वह पुलिस टीम के साथ मुखबिर द्वारा बताए गए इटावा वाले पते पर पहुंच गए. मुखबिर की खबर सही निकली. सचिन और अनु वहां मिल गए. लेकिन उस समय अनु 7 महीने की गर्भवती थी. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया और उन्हें धौलपुर ले आई.

पुलिस ने दोनों को न्यायालय में पेश किया, जहां अनु ने अपने प्रेमी सचिन के पक्ष में बयान दिया. अनु के मातापिता को बेटी के मिलने पर खुशी हुई थी. वे उसे लेने के लिए कोर्ट पहुंचे. बेटी के गर्भवती होने की बात जान कर भी उन्होंने अनु से घर चलने को कहा. पर अनु ने कहा कि वह मांबाप के घर नहीं जाएगी. वह सचिन के साथ ही रहेगी.

चूंकि सचिन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज थी, इसलिए न्यायालय ने उसे जेल भेजने के आदेश दे दिए थे. घर वालों के काफी समझाने के बाद भी जब अनु नहीं मानी तो कोर्ट ने उसे बालिका गृह भेज दिया. अनु 7 महीने की गर्भवती थी, इसलिए बालिका गृह में उस का ठीक से ध्यान रखा गया. समयसमय पर उस की डाक्टरी जांच भी कराई जाती रही. वहीं पर उस ने बेटी को जन्म दिया. बेटी के जन्म के बाद भी अनु की सोच नहीं बदली, वह प्रेमी के साथ रहने की रट लगाए रही.

सचिन जमानत पर छूट कर जेल से बाहर आ गया था. उसे जब पता चला कि अनु ने बेटी को जन्म दिया है और वह अभी भी बालिका गृह में है तो उसे बड़ी खुशी हुई. वह उसे अपने साथ रखना चाहता था. इस बारे में उस ने वकील से सलाह ली तो उस ने कहा कि जब तक अनु की उम्र 18 साल नहीं हो जाएगी, तब तक शादी कानूनन मान्य नहीं होगी. अनु ने तय कर लिया था कि जब तक वह बालिग नहीं हो जाएगी, वह बालिका गृह में ही रहेगी.

अनु अपनी बेटी के साथ वहीं पर दिन बिताती रही. उस के घर वालों ने उस से मिल कर उसे लाख समझाने की कोशिश की, पर वह अपनी जिद से टस से मस नहीं हुई. उस ने साफ कह दिया कि वह सचिन को हरगिज नहीं छोड़ सकती.

बाल कल्याण समिति, धौलपुर के अध्यक्ष बिजेंद्र सिंह परमार को जब अनु और सचिन के अटूट प्रेम की जानकारी हुई तो वह इन दोनों से मिले. इन से बात करने के बाद उन्होंने तय कर लिया कि वह इन की शादी कराएंगे, ताकि इन की बेटी को भी मां और बाप दोनों का प्यार मिल सके. वह भी अनु के बालिग होने का इंतजार करने लगे.

16 अक्तूबर, 2017 को अनु की उम्र जब 18 साल हो गई तो उसे आशा बंधी कि लंबे समय से प्रेमी से जुदा रहने के बाद अब वह उस के साथ रह सकेगी. अब तक उस की बेटी करीब ढाई साल की हो चुकी थी. उसे भी पिता का प्यार मिलेगा.

अनु के बालिग होने पर धौलपुर की बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष बिजेंद्र सिंह परमार ने उन के विवाह की तैयारियां शुरू कर दीं. इस बारे में उन्होंने भरतपुर की बाल कल्याण समिति और सामाजिक संस्था प्रयत्न के पदाधिकारियों से बात की. वे भी इस काम में सहयोग करने को तैयार हो गए.

अनु धौलपुर की थी और बिजेंद्र सिंह परमार भी वहीं के थे, इसलिए उन्होंने तय किया कि वह इस शादी में लड़की वालों का किरदार निभाएंगे. जबकि सचिन भरतपुर का था, इसलिए बाल कल्याण समिति, भरतपुर के पदाधिकारियों ने वरपक्ष की जिम्मेदारियां निभाने का वादा किया.

हैरान करने वाली इस शादी का आयोजन धौलपुर के आर्यसमाज मंदिर में किया गया. इस मौके पर विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों के अलावा कुछ गणमान्य लोग भी मौजूद थे. तमाम लोगों की मौजूदगी में सचिन और अनु की शादी संपन्न हुई. शादी में उन की ढाई साल की बेटी भी मौजूद थी.

सामाजिक संस्था प्रयत्न के एडवोकेसी औफिसर राकेश तिवाड़ी ने बताया कि उन का मकसद था कि ढाई साल के बच्चे को उस के मातापिता का प्यार मिले और अनु को भी समाज में अधिकार मिल सके.

सचिन और अनु दोनों वयस्क थे. वे अपनी मरजी से जीवन बिताने का अधिकार रखते हैं. इसलिए यह शादी सामाजिक दृष्टि से भी उचित थी.

अब वे अपना जीवन खुशी से बिता सकते हैं. खास बात यह रही कि इस शादी में वर और कन्या के घर का कोई भी मौजूद नहीं था.

वहां मौजूद सभी लोगों ने वरवधू को आशीर्वाद दिया. शादी के बाद सचिन अनु को अपने घर ले गया. सचिन के घर वालों ने अनु को अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया. अनु भी अपनी ससुराल पहुंच कर खुश है.

भावेश जोशी : खोदा पहाड़ निकली चुहिया

साधारण इंसान के असाधारण करतब के कारण उसे सुपर हीरो के रूप में पेश करने वाली तमाम फिल्में बौलीवुड में बन चुकी हैं. मगर विक्रमादित्य मोटावणे की एक्शन प्रधान फिल्म‘भावेश जोशी’ तो एक सुपर हीरो की कहानी है. फिल्म का मकसद भ्रष्टाचार के खिलाफ बात करने के साथ ही आम इंसान को न्याय दिलाना है, मगर फिल्मकार व लेखक अपने इस मकसद में पूरी तरह से विफल हुए हैं. फिल्म में युवा शक्ति की बात की गयी है, जो कि उनसे लड़ता है, जो कि हम सभी को तकलीफ पहुंचाते हैं. पर यह बात भी दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती.

फिल्म ‘‘भावेश जोशी’’ की कहानी मुंबई के मालाड़ इलाके से शुरू होती है, जहां सिकंदर खन्ना (हर्षवर्धन कपूर) अपने दो दोस्तों भावेश जोशी (प्रियांशु पैन्युली) और रजत (आशीष वर्मा) के साथ रहता है. इसी बीच सिकंदर खन्ना के दोस्त की हत्या हो जाती है. तब वह दोस्त की हत्या का बदला लेने के लिए सुपर हीरो का रूप धारण करता है. यह तीनों दोस्त समाज से बुराईयों को खत्म करने की मुहिम में लग जाते है. कभी सिग्नल तोड़ने वालों के खिलाफ, कभी गंदगी फैलाने वालों के खिलाफ तो कभी भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए लड़ते हैं.

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यानी कि यह तीनो दोस्त सदैव सच्चाई व ईमानदारी की राह पर चलते रहते हैं. अचानक इनका सामना पानी की चोरी करने वाले पानी माफिया से होता है. इस दौरान भावेश जोशी के उपर कई तरह के आरोप भी लग जाते हैं. उधर कारपोरेटर पाटिल और राज्य के मंत्री राणा (निशिकांत कामत) पुरजोर कोशिश करते हैं कि वह किसी तरह भावेश जोशी को खत्म कर दें. उसके बाद फिल्म की कहानी कई उतार चढ़ाव से होकर गुजरती है.

बेहतरीन मकसद वाली कहानी अति घटिया पटकथा लेखन के चलते तहस नहस हो गयी है. लेखक ने इस फिल्म के माध्यम से बहुत कुछ कहने की कोशिश की है, पर अफसोस वह कुछ भी कह नहीं पाए. फिल्म को बेवजह लंबी बनाया गया है. फिल्म सिर्फ बोर करती है. फिल्म को एडीटिंग टेबल पर कांट छांट किए जाने की जरुरत को नजरंदाज कर फिल्मकार ने अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारी है. फिल्म के संवाद भी प्रभावहीन हैं. आम आदमी की बात करने वाली इस फिल्म के साथ एक भी आम आदमी खुद को जोड़ नहीं पाता. फिल्म में इस बात को रेखांकित करने का असफल प्रयास किया गया है कि यदि हम स्वार्थ से परे निडरता से काम करे तो हम असली सुपर हीरो बन सकते हैं. फिल्म का आइटम नंबर भी फिल्म को देखने योग्य नहीं बनाता.

फिल्म ‘भावेश जोशी’ देखकर कहीं से भी यह अहसास नहीं होता कि इस फिल्म के निर्देशक विक्रमादित्य मोटावणे हैं, जो कि अतीत में राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत फिल्म ‘‘उड़ान’’ के अलावा ‘‘लुटेरा’’ जैसी फिल्म निर्देशित कर चुके हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो पहली फिल्म ‘‘मिर्जिया’’ के बाद अब दूसरी फिल्म ‘‘भावेश जोशी’’ में भी हर्षवर्धन कपूर ने निराश किया है. निशिकांत कामत का अभिनय भी आकर्षित नहीं करता. हर्षवर्धन कपूर के मुकाबले प्रियांशु पैन्युली व आशीष वर्मा उम्मीद जगाते हैं.

दो घंटे पैंतिस मिनट की अवधि वाली फिल्म‘ ‘भावेश जोशी’’ का निर्माण ‘ईरोज इंटरनेशनल’, ‘रिलायंस इंटरटेनमेंट’, विकास बहल, मधु मेंटेना व अनुराग कश्यप ने किया है. फिल्म के लेखक विक्रमादित्य मोटावणे, अनुराग कश्यप व अभय कोराणे, निर्देषक विक्रमादित्य मोटावणे, संगीतकार अमित त्रिवेदी तथा कलाकार हैं – हर्षवर्धन कपूर, प्रियांशु पैन्युली, निशिकांत कामत, राधिका आप्टे, आशीष वर्मा, श्रियाह सभरवाल व अन्य.

मुंबई में हुआ पहला ‘उतराखंड फिल्म अवार्ड 2018’ का आयोजन

देश में सभी भाषाओं के फिल्म अवौर्ड समारोह होता रहता है, लेकिन अभी तक उत्तराखंड फिल्म अवौर्ड नहीं हो पाया था. कई वर्षों से उत्तराखंड में उत्तराखंडी फिल्में बनती चली आ रही हैं, लेकिन फिल्मों का अवौर्ड अभी तक नहीं हुआ था. आपको उत्तराखंड की सबसे पहली फिल्म के बारे में बता दें, साल 1982 में पहली उत्तराखंडी फिल्म ‘जगवाल’ और 1986 में पहली कुमाउनी फिल्म ‘मेघा आ’ की शुरुआत हुई, जिसके निर्माता परिसर गौड़ और एनएस विस्ट थे.

36 साल बाद मुंबई में 27 मई को ‘उत्तराखंड फिल्म अवौर्ड 2018’ विनोद गुप्ता द्वारा आयोजित किया गया. बता दें, एबी5 मल्टिमीडिया के प्रेसिडेंट विनोद गुप्ता ने साल 2005 में “भोजपुरी फिल्म अवौर्ड” का आगाज कर भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को एक नया मुकाम दिलाया था और आज भोजपुरी फिल्मों को दर्शक, देश और विदेश में क्षेत्रीय भाषा के रूप में जानते हैं.

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ठीक उसी तरह विनोद गुप्ता ने ‘उत्तराखंड फिल्म अवौर्ड’ का आयोजन किया ताकि उत्तराखंडी भाषाओं की फिल्मों को क्षेत्रीय भाषा की तरह लोग जाने और उत्तराखंडी फिल्मों और उनके कलाकारों को दर्शक बखूबी से जान पाएं. इस अवौर्ड शो में बौलीवुड के मशहूर प्लेबैक सिंगर उदित नारायण, पूर्व मंत्री कुंवर विरेंद्र प्रताप सिंह, पहली उत्तराखंडी फिल्म के निर्माता पारेसर गौड़ मुख्य रूप से उपस्थित थे.

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वहीं, हिंदी व उत्तराखंडी फिल्मों के अभिनेता हेमंत पांडेय, अभिनेता रतन मायल, रमेश नौडियाल, अभिनेत्री त्विशा भट्ट, आशिमा पांडेय व गायक प्रेम प्रकाश दुबे” ने अपने परफौर्मेंस से ‘उत्तराखंड फिल्म अवार्ड’ की शाम को और खास बनाया. इस अवौर्ड शो में मौजूद अभिनेता शैलेन्द्र श्रीवास्तव, निर्माता राहुल कपूर, पहली उत्तराखंड फिल्म “जगवाल” के अभिनेता विनोद बलोदी, गायक विक्की नागर भी शामिल हुए.

नई बहू लाई पेट में बच्चा

यह दिलचस्प और हैरान कर देने वाला वाकिआ मध्य प्रदेश में भोपाल के परवलिया थाना इलाके का है. 9 जुलाई, 2016 को एक नौजवान जीवनलाल (बदला हुआ नाम) 20 साला सविता (बदला हुआ नाम) को गाजेबाजे के साथ ब्याह कर लाया था.  जिस ने भी बहू का मुंह देखा, वह उस की तारीफ किए बगैर नहीं रह सका.

मेहमानों की आवाजाही हफ्तेभर तक चली और बाकायदा सारे नेगदस्तूर भी हुए. जीवनलाल के घर वालों की थकान अभी पूरी तरह उतरी भी नहीं थी कि शादी के ठीक 10 दिन बाद यानी 19 जुलाई, 2016 को सविता के पेट में दर्द होने लगा.

बहू की हालत देख घबराए घर वाले उसे अस्पताल ले गए, तो पता चला कि यह कोई मामूली पेट दर्द नहीं था, बल्कि सविता मां बनने वाली थी. इस बात पर जीवनलाल और उस के घर वालों के पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गई.

सविता ने अस्पताल में एक बेटे को जन्म दिया, तो बजाय बधाइयों के उसे ताने सुनने पड़े.

गुस्साए ससुराल वालों ने सविता के मायके वालों को शादी के महज 10 दिन बाद बच्चा होने की खबर इस चेतावनी के साथ भेजी कि तुरंत आ कर बात करो, तो सविता के घर वाले भागेभागे यह सोचते हुए आए कि यह चमत्कार कैसे हो गया.

ज्यादती कहें या…

अब एक सविता ही थी, जो इस राज से परदा हटा सकती थी. लिहाजा, दोनों के घर वालों ने उस से कड़ाई से पूछा, तो उस ने सच उगल दिया.

तकरीबन एक साल पहले गांव के कांशीराम नाम के शख्स ने उस से ज्यादती की थी और धौंस दी थी कि अगर किसी को बताया तो खैर नहीं. उस ने सविता को बदनाम करने और जान से मारने की धमकी भी दी थी.

डरीसहमी सविता चुप रही, तो कांशीराम उस के साथ ज्यादती करने लगा. पर अपने पेट से हो जाने की बात सविता नहीं समझ पाई. इसी दौरान उस की सगाई जीवनलाल से हो गई और सालभर बाद शादी भी हो गई, तो वह ससुराल परवलिया चली आई.

बात पुलिस तक पहुंची, तो उस ने सविता के बयान के बिना पर कांशीराम को बलात्कार के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया. पर इधर जीवनलाल की हालत खस्ता थी, जो शादी के 10 दिन बाद ही बाप बन बैठा था.

इस दिलचस्प वाकिए में एक और मोड़ सविता ने यह कहते हुए भी पैदा कर दिया कि सगाई के बाद अकसर जीवनलाल भी उस से मिलने आता रहता था. चूंकि वह उस का होने वाला पति था, इसलिए वह उसे भी सैक्स करने से मना नहीं कर पाती थी.

लिहाजा, एक उम्मीद इस बात की भी उस ने पैदा कर दी कि मुमकिन है कि बच्चे का बाप कांशीराम नहीं, बल्कि जीवनलाल ही हो.

चूंकि सविता दोनों के साथ एक ही वक्त में सैक्स कर रही थी, इसलिए यह तय कर पाना मुश्किल हो गया था कि आखिरकार बच्चे का असली बाप कौन है?

बीच का रास्ता पुलिस वालों ने यह निकाला कि बेहतर होगा कि सविता और कांशीराम का डीएनए टैस्ट कराया जाए, जिस से यह साबित हो सके कि आखिरकार बच्चा है किस का? उन दोनों के खून का सैंपल जांच के लिए पुलिस वालों ने लैबोरेटरी भेज दिया.

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अगर और मगर

जांच रिपोर्ट जब आएगी, तब आएगी, जिस में अगर बच्चे का पिता वह नहीं निकला, तो भी वह इस बात पर कलपता रहेगा कि उस की बीवी अपने ही पड़ोसी की ज्यादती का शिकार हुई थी और उस ने यह बात सगाई के बाद भी छिपा कर रखी थी, यानी होने वाले पति पर भरोसा नहीं किया था.

लेकिन अगर बच्चा कांशीराम का निकला, तो भी वह कहीं का नहीं रह जाएगा. वजह, मुकदमा तो कांशीराम पर चलेगा, लेकिन अदालत का फैसला आने तक एक तरह से सजा उसे ही भुगतनी पड़ेगी.

शादी के 10 दिन बाद ही बच्चा हो जाने पर लोग और नातेरिश्तेदार उस पर हंस रहे हैं. इस पर सविता ने यह खुलासा कर नया सस्पैंस पैदा कर दिया कि वह तो होने वाले पति के साथ भी हमबिस्तर होती थी.

चूंकि पुलिस ने कांशीराम के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज किया है, इसलिए जीवनलाल सविता पर बदचलनी का इलजाम भी नहीं लगा सकता. यानी तलाक की वजह बीवी से शादी के 10 दिन बाद ही बच्चा पैदा होना वह बताएगा तो भी तलाक की राह आसान नहीं होगी, क्योंकि सविता की इस में कोई कानूनन गलती नहीं मानी जाएगी.

ऐसी सूरत में जीवनलाल के वकील की दलील अगर यह रहेगी कि सविता और कांशीराम के संबंध रजामंदी से बने थे, तो यह बात कांशीराम के फायदे की होगी और वह इस बाबत जीवनलाल की हां में हां ही मिलाएगा, ताकि बलात्कार के इलजाम से बरी हो सके.

होती है सौदेबाजी

इस मामले का पूरा सच सामने आने में अभी वक्त है, लेकिन भोपाल के एक वकील विजय श्रीवास्तव की मानें तो ऐसे मामले कभीकभार सामने आते हैं, जिन में सजा बेगुनाह पति को भुगतनी पड़ती है.

भोपाल की जिला अदालत में इस अनूठे केस की चर्चा बड़े दिलचस्प तरीके से हो रही है, जिस का एक पहलू यह भी है कि गांवदेहात तो दूर की बात है, शहरों में भी पेट से हो आई लड़कियों की शादी आम बात है. जिस के बाबत तगड़ी कीमत दहेज की शक्ल में लड़की वाले लड़के वालों को देते हैं.

उन का मकसद लड़की की गलती छिपाना और अपनी इज्जत बचाना रहती है, क्योंकि बिनब्याही लड़की के मां बनने पर जो बदनामी होती है, वह पैसे से कहीं ज्यादा अहम होती है.

कई मामलों में तो पहले ही लड़के और उस के घर वालों को पेट से होने की बात बता दी जाती है, जिस से लड़की को बाद में परेशानी न उठानी पड़े. इस बाबत मुंहमांगी कीमत लड़के को दे दी जाती है.

आमतौर पर पेट से हुई ऐसी लड़कियों को अपनाने वाले लड़के निकम्मे या जरूरतमंद बेरोजगार या फिर किसी ऐब की गिरफ्त में आए हुए होते हैं. जिन के लिए शादी का मकसद एक घरवाली होना भर है.

कुछ मामलों में कमजोरी और नामर्दी के शिकार भी आंखों देखी मक्खी निगलने की कीमत वसूलते हैं.

लेकिन जीवनलाल जैसे आम पतियों की आफत किसी सुबूत की मुहताज नहीं. जिन के लिए शादी जी का जंजाल बन जाती है और जो किसी तरह की दरियादिली दिखाने में भरोसा नहीं करते. इस के बाद भी तलाक के लिए उन्हें अदालत के चक्कर काटने पड़ें और बीवी को गुजारा भत्ता देना पड़े, तो यह उन के साथ ज्यादती ही कही जाएगी.

निशाने पर हैं मुसलिम

यह सचमुच हैरानी की बात है कि कभी इसलाम पर खतरे की बातें करने वाले लोगों ने आज खुद पूरी मुसलिम कौम को ही खतरे में डाल दिया है. इसलाम न कल खतरे में था और न आज खतरे में है. सचाई यह है कि खतरे में धर्म नहीं, लोग होते हैं. इतिहास इस बात का गवाह है कि लाखों यहूदी मौत के घाट उतारे गए, पर उन का धर्म जिंदा है. लाखों ईसाई मारे गए, पर ईसाई धर्म जिंदा है. लाखों बौद्धों का कत्लेआम हुआ, उन के मठ और विहार तोड़ दिए गए, पर बौद्ध धर्म खत्म नहीं हुआ. हिंदुओं पर भी कम जोरजुल्म नहीं हुए, पर हिंदू धर्म अपनी तमाम परंपराओं के साथ जिंदा है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यह सारा खूनखराबा धर्म के नाम पर हुआ और आज भी धर्म के नाम पर लोगों को मारा जा रहा है.

आज मुसलिम पूरी दुनिया में निशाने पर हैं. उन्हें शक की निगाह से देखा जा रहा है. हवाईअड्डों पर उन की कड़ी चैकिंग की जाती है और अगर किसी सार्वजनिक जगह पर कोई जालीदार टोपी पहने काली दाढ़ी वाला नौजवान दिख जाता है, तो लोगों में दहशत भर जाती है. अमेरिका में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने तो मुसलिमों के अमेरिका में दाखिल होने पर बैन तक लगाने का ऐलान कर दिया है. यह संकट सिर्फ बाहर ही नहीं है, बल्कि खुद मुसलिमों के भीतर भी है.

खुद मुसलिम देशों में वे महफूज नहीं हैं. वे शिया के नाम पर मारे जा रहे हैं, सुन्नी के नाम पर मारे जा रहे हैं. बाजारों में मारे जा रहे हैं, रैस्टोरैंटों में मारे जा रहे हैं. बसों और ट्रेनों में मारे जा रहे हैं. स्कूलों में मारे जा रहे हैं. मसजिदों में मारे जा रहे हैं. यहां तक कि अल्लाह की हुजूरी में इबादत करते हुए मारे जा रहे हैं. यह कैसा जिहादी जुनून है कि जिन मुसलिमों को दुनिया में ज्ञानविज्ञान में तरक्की करनी थी, वह आज उन की ही आबादी का दुश्मन बना हुआ है?

दहशतगर्दी के समर्थक कहते हैं कि इस का जिम्मेदार अमेरिका है. अमेरिका ने ही आतंकवाद पैदा किया है और वही उस को पालपोस रहा है. कुछ समर्थक मानते हैं कि इराक की लड़ाई और सद्दाम हुसैन को फांसी दिए जाने के बाद मुसलिमों का गुस्सा आतंकवाद के रूप में उभरा है. अगर ऐसा है, तो यह बड़ा दिलचस्प है कि इसलाम के नाम पर आतंक फैलाने वाले मुसलिम अपने ही धर्म भाइयों को मार रहे हैं. वे उन मुसलिमों को मार रहे हैं, जिन का इराक की लड़ाई से कुछ लेनादेना नहीं है. वे स्कूलों में घुस कर पढ़ने वाले बच्चों का खून बहा रहे हैं, जिन्होंने ठीक से अभी दुनिया में कदम भी नहीं रखा है. वे जिस तरह से लोगों को अंधाधुंध मार रहे हैं, जो एकदम बेकुसूर और बेगुनाह हैं, उस से पता चलता है कि उन का मकसद सिर्फ दहशत फैलाना है और कुछ भी नहीं.

हैरत होती है कि वे न तो अपने आकाओं से सवाल करते हैं और न ही अपने दिल से पूछते हैं कि जिन मासूमों का खून बहाने का मिशन उन्हें दिया गया है, उस से इसलाम या मुसलिमों या फिर उन के आकाओं का कौन सा मकसद पूरा हो रहा है? अजीब बात है कि इस आतंक के खिलाफ मुसलिमों की आवाज बहुत दबीदबी सी है. हालांकि यह इस बात का सुबूत नहीं है कि वे अलकायदा या इसलामिक स्टेट जैसे खूंख्वार आतंकी संगठनों को पसंद करते हैं.

इस की वजह शायद यह है कि भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश समेत पूरी दुनिया के आम मुसलिमों की धार्मिक बागडोर उन धर्मगुरुओं के हाथों में है, जो अपनेअपने तरीके से उन्हें इसलाम समझाते हैं और अपने फायदे के लिए उन का इस्तेमाल करते हैं. मिसाल के तौर पर बरेलवी और देवबंदी संप्रदायों के धर्मगुरु अकीदतमंदों को इस तरह टे्रनिंग देते हैं कि नमाज पढ़ने के तौरतरीके तक पर वे एकदूसरे का सिर फोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं. बरेलवी संप्रदाय के एक मौलाना ने देवबंदी मजलिस में शिरकत की, जो मुसलिम एकता के लिए कराई गई थी, तो बरेलवी अकीदे के मुसलिम मौलाना के खिलाफ हो गए. मौलाना ने माफी मांग कर मामले को खत्म किया. इस तरह की जमातों और धर्मगुरुओं की जबरदस्त जकड़बंदी को तोड़ना अकीदतमंद मुसलिमों के लिए एक नामुमकिन सा काम है. ऐसे मुसलिम आतंकवाद के खिलाफ किसी बड़ी मुहिम या तहरीक में अपने धर्मगुरुओं की मरजी के खिलाफ कैसे भाग ले सकते हैं?

यह सही है कि आतंकवाद के खंडन में कुछ उलेमाओं के बयान आते रहते हैं और ज्यादातर इसे इसलाम विरोधी भी मानते हैं, पर इस के खिलाफ दुनियाभर के मुसलिमों को एकजुट करने वाले किसी भी आंदोलन की अगुआई वे नहीं करते.

अभी बंगलादेश के एक पत्रकार सैयद बदरुल अहसन ने अपने एक लेख में, जो 8 जुलाई, 2016 को हिंदी के अखबार ‘अमर उजाला’ में छपा था, लिखा था कि ढाका, पैरिस, ब्रसेल्स, इस्ताम्बुल, बगदाद और मदीना समेत दुनियाभर में इसलामी स्टेट के ये तथाकथित जिहादी नास्तिक हैं. अभी तक इन्हें इसलाम का दुश्मन तो कहा जाता रहा है, पर इन्हें नास्तिक किसी ने नहीं कहा था. आज पहली बार किसी ने इन्हें नास्तिक कहा है. दिलचस्प है कि यह नास्तिक शब्द  नया है. इनसानियत में यकीन करने वाले नास्तिकों के लिए यह बेइज्जती वाला हो सकता है कि वे बेगुनाहों का खून भी बहाते हैं, पर यह सचमुच तीखा मजाक है.

इसलाम के नजरिए से देखें, तो मुसलिम भाईचारा उस का सब से बड़ा सामाजिक फलसफा है, पर इसलामी स्टेट के जिहादी इसी फलसफे को तारतार कर रहे हैं. उस की दूसरी सब से बड़ी ताकत फलसफा ए तौहीद (एकेश्वरवाद) है, जिस का मतलब सिर्फ यही नहीं है कि एक ईश्वर के सिवा दूसरा कोई ईश्वर नहीं है, बल्कि यह भी है कि मुसलिम वह श्रेष्ठ समुदाय है, जिसे अल्लाह के बंदों की भलाई की जिम्मेदारी सौंपी गई है और जिस का काम बुरे कामों को रोक कर भलाई के कामों को अंजाम देना है.

इस लिहाज से अल्लाह के बेगुनाह बंदों का कत्ल करने वाले ये तथाकथित इसलामी जिहादी मुसलिम तो कतई नहीं हो सकते. अगर मुसलिम भाईचारा और फलसफा ए तौहीद में उन का अकीदा होता, तो वे यकीनन इस गुनाह से बचते. कुरान, जिसे मुसलिम पाक और आसमानी किताब मानते हैं, में कहा गया है कि (3:138) ‘यह मानव जाति के अधिकारों का घोषणापत्र और अल्लाह से डरने वालों के लिए मार्गदर्शन और हिदायत है’.

साल 1990 में इसलामिक फाउंडेशन ट्रस्ट, मद्रास ने जो ‘यूनिवर्सल इसलामिक डिक्लेरेशन औफ ह्यूमन राइट्स’ छापा था, उस में भी इस आयत को मुख्य आधार बनाया गया था, तो क्या बेगुनाहों का खून बहाना, मासूम बच्चों को गोलियों से भूनना और शहरों को तबाह करना अल्लाह की हिदायत और ऐलान है? जाहिर है कि नहीं है, इसलिए इन तथाकथित जिहादियों को इस माने में नास्तिक कहा भी जा सकता है कि उन्हें अल्लाह का खौफ नहीं है. शायद ये जानते हैं कि अगर अल्लाह सच में है, तो वह अपने बंदों को इन शैतानों से जरूर बचाता. शायद यही वजह है कि मुसिलम भाईचारा और फलसफा ए तौहीद उन के लिए कोई अहमियत नहीं रखता है.

एक डाक्टर जाकिर नाईक हैं, जो प्रवीण तोगडि़या की तरह डाक्टर का पेशा छोड़ धर्म के उपदेशक बन गए हैं. वे इसलामी रिसर्च फाउंडेशन के संस्थापक हैं और पीस टीवी पर इसलाम पर तुलनात्मक तकरीरें करते हैं. इसलाम के मौजूदा तमाम फिरकों में एक फिरका उन का भी है डाक्टर जाकिर नाईक 30 से भी ज्यादा देशों में 2 हजार से ज्यादा सभाएं कर चुके हैं, जिन्हें सुनने के लिए हजारों की तादाद में पढ़ेलिखे नौजवान आते हैं. उन के ट्विटर और फेसबुक अकाउंट को भी लगभग सवा करोड़ लोग फौलो करते हैं. एक तरह से देखा जाए, तो पढ़ेलिखे मुसलिमों पर डाक्टर जाकिर नाईक का असर दूसरे इसलामी धर्मगुरुओं से ज्यादा पड़ता है, इसलिए इसलामिक स्टेट के जिहादियों को मुख्यधारा से जोड़ने की कूवत इस इनसान में सब से ज्यादा है. पर यह अजीब बात है कि डाक्टर जाकिर नाईक की तकरीरें और इसलामी बातें पढ़ेलिखे मुसलिम नौजवानों को और भी ज्यादा उग्र और जिहादी बनाती हैं. सवाल है कि क्या मानव जाति के लिए इसलाम के घोषणापत्र को डाक्टर जाकिर नाईक जैसे तथाकथित धर्मगुरु जिहादी मुसलिमों में क्यों नहीं भरते?

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