जिन्ना का जिन्न

विभाजन के गड़े मुरदे मोहम्मद अली जिन्ना को, अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में लगे उन के चित्र को ले कर, उखाड़ा जा रहा है. एक व्यर्थ की बहस की शुरुआत की गई है कि 1947 में देश के विभाजन के लिए आखिर जिम्मेदार कौन था – मोहम्मद अली जिन्ना जो पाकिस्तान के कायदे आजम बने या कांग्रेस जिस ने उस के बाद दशकों तक राज किया?

विभाजन एक ऐसी बात थी जिस का 1947 से पहले चाहे अंदाजा था पर उसे इस बुरी तरह मारपीट की शक्ल मिलेगी, इस का अंदाजा नहीं था. भारत में नरसंहार के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराया जाता है और पाकिस्तान में हिंदुओं को. कोई भी यह कहने को तैयार नहीं है कि असल में जिम्मेदार कौन था और कितना गुनाहगार था. आज इस बात को न उठाया जाए तो ही अच्छा है, क्योंकि इस में बहुत सी कड़वी सचाइयां ही सामने नहीं आएंगी, बल्कि 1947 के विभाजन के कारण जो आज भी सामने हैं, दिखने लगेंगे.

आज जिस तरह भीमराव अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ा जा रहा है और गांधी की मूर्तियों पर कालिख पोती जा रही है उस से साफ है कि देश का एक वर्ग उन्हीं मूर्तियों को चाहता है जिन के जरिए वह पैसा उगाहने में सफल हो. देश के कोनेकोने में देवीदेवताओं की मूर्तियों को लगाया जा रहा है, क्योंकि उन के माध्यम से वे ही लोग पैसा कमा रहे हैं जो जिन्ना के फोटोग्राफ या अंबेडकर की मूर्तियों से चिढ़ रहे हैं.

1947 की बात याद दिला कर कट्टरपंथी असल में यह बात दोहरा रहे हैं कि देश में पौराणिक राज चलेगा और जिसे पौराणिक अभयदान नहीं है उस की देश में जरूरत नहीं है. इन लोगों ने अपनी गिनती कुछ को बहलाफुसला कर बढ़ा ली है वरना ये धर्म के पैरोकार रहते हुए भी बेचारे ही थे. अब हिंदूमुसलिम राग आलाप कर असल में वे जाति के घाव कुरेद रहे हैं जो वर्षों से ढके हुए हैं.

मोहम्मद अली जिन्ना की फोटो का अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में कोई खास औचित्य नहीं है और वैसे ही किसी देवीदेवता, मदन मोहन मालवीय, दयानंद, दीनदयाल उपाध्याय, जवाहरलाल नेहरू, मोहनदास कर्मचंद गांधी के चित्रों का भी कोई महत्त्व नहीं है. ये सब इतिहास की किताबों में शोभा देते हैं, दीवारों और सड़कों पर नहीं.

जातिवादी मानसिकता के सामने विफलता

नेपाल में कैलाली की सांसद कालू देवी बिश्वकर्मा ने संसद में तमाम मशक्कत के बावजूद काठमांडू में मकान न मिलने की पीड़ा का बयान कर सबको चौंका दिया. संघीय समाजवादी फोरम की सांसद दो महीने से राजधानी में किराए का फ्लैट तलाश रही हैं, पर जातिवादी मानसिकता के सामने विफल हैं. दुर्भाग्यपूर्ण है कि पांच दशक पूर्व जाति आधारित भेदभाव अपराध घोषित होने के बावजूद दलित आज भी इसके शिकार हैं. निर्वाचित जन-प्रतिनिधि तक इससे नहीं बचे हैं.

2011 की जनगणना के अनुसार, नेपाल की कुल जनसंख्या का 13.13 प्रतिशत दलित हैं, हालांकि शोधार्थियों की नजर में यह आंकड़ा भी हकीकत से कम है. 1990 के राजनीतिक संक्रमण, विशेषकर 2006 के बाद देश ने पहचान व प्रतिनिधित्व से जुड़े कई राजनीतिक-सामाजिक बदलाव देखे, लेकिन बहुत कुछ अब भी नहीं बदला है. दलित अब भी राजनीति और समाज के हाशिए पर ही हैं.

मधेसियों व जनजातीय समूहों की तुलना में इनका प्रतिनिधित्व नगण्य रहा है. प्रतिनिधित्व सार्वजनिक बहसों में भले ही मुद्दा हो, पर रहनुमाई के अभाव में इनकी आवाज वहां भी मुखर नहीं हो सकी. दलित महिलाएं तो आज भी सबसे ज्यादा उपेक्षित-उत्पीड़ित हैं. हालांकि वर्तमान संविधान के अनुच्छेद 40 में इनकेसशक्तीकरण और प्रतिनिधित्व के लिए कई प्रावधान हैं, जिसने इस समाज को उम्मीद बंधाई है. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार अब हर वार्ड में कम से एक दलित महिला प्रतिनिधि का होना अनिवार्य है और संसद में भी 13.8 प्रतिशत सीट दलितों के लिए आरक्षित हैं.

यह सब है, कानून भी हैं, लेकिन मानसिकता नहीं बदली है. और सच है कि इसे बदले बिना महज सांविधानिक प्रावधानों से कुछ नहीं होगा. इसके लिए वैयक्तिक साझेदारी और समझदारी विकसित करनी होगी. निचली इकाइयों, स्कूल-कालेज और पाठ्यपुस्तकों के जरिए जागरूकता लानी होगी. संवैधानिक संस्थाओं से लेकर राजनीतिक-सामाजिक तानेबाना सक्रिय किए बिना सारे तो प्रयास ही नाकाम होंगे.

इस बिजनेसमैन को डेट कर रही हैं अंकिता लोखंडे

धारावाहिक पवित्र रिश्ता से फैमस हुईं अंकिता लोखंडे अब फिल्म ‘मणिकर्णिका’ में कंगना रनौत के साथ काम कर रही है. अंकिता लोखंडे का लुक पिछले दिनों सामने आया था. अपनी डेब्यू फिल्म में अंकिता झलकारी बाई का अहम रोल निभा रही हैं. फिलहाल अंकिता ने अपने हिस्से की शूटिंग पूरी कर ली है जिसके बाद वो अपनी क्वालिटी टाइम किसी खास के साथ स्पेंड कर रही हैं.

सूत्रों की मानें तो अंकिता लोखंडे मुंबई के एक बड़े बिजनेसमैन विक्की जैन को डेट कर रही हैं.  दोनों की नजदीकियां पिछले साल तब बढ़ी थी जब ये साथ में होली सेलिब्रेशन पार्टी में पहुंचे थे.

दरअसल, अंकिता और विकी जैन दोनों एक ही सोसाइटी में रहते हैं और अक्सर साथ में हैंगआउट करते भी देखे जाते हैं. बता दें, विक्की जैन स्पोर्ट्स रियलिटी एंटरटेनमेंट शो ‘बौक्स क्रिकेट लीग’ की मुंबई टीम के को-ओनर हैं.

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गौरतलब है कि इससे पहले पहले अंकिता का अफेयर एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के साथ था. दोनों 6 साल तक लिव-इन में रहे थे. अंकिता और सुशांत को 2009 में जीटीवी के शो ‘पवित्र रिश्ता’ में लीड रोल मिला था. वहीं अंकिता के ब्वायफ्रेंड विक्की जैन भी इससे पहले एक्ट्रेस टिया वाजपेयी के साथ रिलेशनशिप में रह चुके हैं.

सफेद बाल मुरदाबाद : कैसे फंस गया मैं

जैसे ही उन के जनरल प्रोविडैंट फंड के कागज आए, वैसे ही वे दफ्तर की फाइलों की ओर से भी लापरवाह हो गए. ऐसी लापरवाही कि फाइलों से उन का जैसे कभी कोई रिश्ता ही न रहा हो. उन की मेज पर फाइलों का ढेर हर रोज उन के कद से ऊंचा होता जा रहा था, पर वे बेफिक्र. जो आएगा, वह उन के इकट्ठा किए गए गंद में सड़ता रहेगा.

वे सुबह ठुमकठुमक करते दोपहर के 12 बजे तक दफ्तर पहुंचते और जिस किसी को भी सीट पर तनिक गरदन उठाए देखते, उसी के पास गपें मारने हो लेते. किसी का उन के साथ गपें मारने का मन हो या न हो, इस से उन्हे कोई लेनादेना न होता.

जिन फाइलों की उलटापलटी की बदौलत उन्होंने बाबू होने के बाद भी शहर में 4-4 प्लौट खरीदे, बीसियों कंपनियों के हिस्से खरीदे, उन फाइलों से उन की बेरुखी देखने के काबिल थी.

जैसे ही 1 बजता, वे सब से पहले कैंटीन में आ जाते और इंतजार करते रहते कि कोई आए, तो वे उस को 4 बजे तक जैसेतैसे अपनी गपों में लगाए रखें.

आज उन के जाल में शायद मेरा फंसना लिखा था. दफ्तर आतेआते बिल्ली रास्ता काट गई थी, सो जान तो मैं पहले ही गया था कि आज दफ्तर में कुछ अनहोनी होगी, पर मेरे साथ इतना बुरा होगा, ऐसा मैं ने कभी नहीं सोचा था.

कैंटीन में फंसा मैं जब भी उन के पास से उठने की नाकाम कोशिश करता, तो वे कुछ खाने को मंगवा देते और सरकारी लालची कबूतर एक बार फिर पेट भरा होने के बाद भी दाने के लालच में उन के जाल में जा फंसता.

जब मेरा पेट हद से ज्यादा भर गया, तो और मेरे कान उन की बेहूदा बातें सुन कर पक गए, तो मैं ने कैंटीन के दरवाजे की ओर देखा कि कोई दफ्तर से चाय पीने आता, तो मैं उसे इन के हवाले कर इन से छुटकारा पाता.

पर जब दफ्तर से कोई आता न दिखा, तो सच कहूं कि पहली बार मुझे अपने हाल पर रोना आया और मैं ने उन को हद से ज्यादा झेलने के बाद उन से यों ही पूछ लिया, ‘‘मोहनजी, अब रिटायरमैंट के बाद आप का क्या करने का इरादा है? रिटायरमैंट के बाद आप को कोई याद आए या न आए, पर आप की सीट पर काम कराने आने वाले आप को बेहद याद आएंगे. बेचारों को आप ने इस तरह निचोड़ा है कि अगले कई जनमों तक अगर वे इसी देश में पैदा होंगे, तो किसी सरकारी दफ्तर में जाने से पहले सौ बार सोचेंगे.’’

‘‘करूंगा क्या? अब इश्कविश्क करने से तो रहा. घुटने तो घुटने, दिल तक को गठिया हो गया है. यह तो थोड़ाबहुत दफ्तर में…

अब बीवी की सेवा करूंगा, ताकि मरने से पहले उस के कर्ज से छुटकारा पा जाऊं. बेचारी ने किसी भी मन से सही, मेरी बहुत सेवा की है. कहीं ऐसा न हो कि अगले जनम में भी उसी से पाला पड़े,’’  कह कर उन्होंने ऐसा मुंह बनाया, मानो उन के मुंह में किसी ने नीम के पत्तों का गिलास भर रस उड़ेल दिया हो.

‘‘अगर बुरा न मानो, तो मैं आप को रिटायरमैंट के बाद एक बेहतर धंधे की सलाह दे सकता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘यार प्रदीप, बहुत कर लिया दफ्तर में रहते हुए धंधा. यह 35 सालों तक मैं ने धंधे के सिवा और किया ही क्या है?’’

‘‘मेरी मानो, तो अपने महल्ले में मोबाइल रीचार्ज की दुकान खोल लेना. सारा दिन आराम से कट जाएगा और इस बहाने जाती जवानी भी रुक जाएगी.’’

‘‘हमारे महल्ले में पहले से ही 4-4 रिटायरी इस धंधे में जमे हैं. ऐसे में मुझे नहीं लगता कि…’’

‘‘तो ऐसा करो कि हेयर डाई की दुकान खोल लेना. वैसे भी मैं ने नोट किया है कि ज्योंज्यों हम जैसों की उम्र के बंदों के गाल अंदर को धंसते जा रहे हैं, वे सिर से ऐसे दिखते हैं मानो उन के सिर पर अभीअभी बाल आने शुरू हुए हैं. आज के सिर हैं कि उन्हें अपने पर एक भी सफेद बाल पसंद ही नहीं.

‘‘आज के जमाने का कोई सब से बड़ा दुश्मन है, तो वे हैं सफेद बाल. आज का आदमी उतना परेशान किसी से नहीं, जितना इन सफेद बालों से है. वह मौत का सामना खुशी से कर सकता है, पर सफेद बालों के आगे अपनेआप को बहुत कमजोर पाता है.

‘‘आदमी को उतनी परेशानी रोटी न मिलने पर भी नहीं होती, जितनी परेशानी आईने के आगे खड़े हुए अचानक सिर पर एक सफेद बाल दिखने पर होती है. सिर में एक सफेद बाल दिखते ही उसे लगता है, मानो उस पर मुसीबतों का एक पहाड़ नहीं टूटा, बल्कि कई टूट पड़े हैं,’’ किसी बाबा की तरह उपदेश देते हुए मेरा गला सूख गया था, सो पानी का घूंट ले कर मैं ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘मोहनजी, इधर सफेद बाल सिर में दिखा और उधर डाई बनानेबेचने वालों की फसल कटनी शुरू. कई तो मैं ने ऐसे भी देखे हैं, जो सिर पर बाल न होने के बाद भी गंजे सिर पर ही कालिख मल लेते हैं.

‘‘ये अपने साहब देखे? सिर के तो सिर के, छाती तक के बाल काले कर के दफ्तर आने लगे हैं, ताकि अपनी शर्ट के बटन दिसंबर में भी खुले रख कर खुद को जवान होने के एहसास में डुबोए रहें. उन के दाढ़ीमूंछों के रंगे बालों को देख कर तो नौजवानों के ओरिजनल काले बालों तक को शर्म आ जाती है.

‘‘मैं जब आप की बेटी की शादी में गया था, तो अपनी दादी की उम्र की आप की महल्ले वालियों के रंगे बालों को देख कर दंग रह गया था. लगा था, आप का महल्ला तो जैसे जवानों का महल्ला हो. उन के बूढ़ी होने का पता तब चला था, जब वे कमर पर हाथ रख कर जैसेतैसे वरवधू को आशीर्वाद देने के लिए उठी थीं.

‘‘सच कहूं, आज के आदमी के पास रोटी के लिए पैसे हों या न हों, पर वह बाल डाई करने के लिए पैसे का जोड़तोड़ कर ही लेता है.

‘‘मेरा बस चले तो मैं टांगों तक के सफेद बाल रंग कर ही सांस लूं. आने वाले दिनों में देखना जो बिना डाई किए बालों के मरेंगे, उन्हें स्वर्ग के तो स्वर्ग के नरक तक के ताले नहीं खुलेंगे मिलेंगे. पता है पिछले हफ्ते अपने महल्ले में क्या हुआ था?’’

‘‘क्या हुआ था?’’ यह पूछते हुए मोहनजी का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘महल्ले के सौ साल के एक बुजुर्ग गुजर गए.’’

‘‘तो क्या डाक्टरों के मरा बताने के बाद भी वे दोबारा जिंदा हो उठे?’’

‘‘नहीं, अब हम डाक्टरों पर विश्वास कम ही करते हैं… जब उन्हें देवभूत लेने आए, तो उन के सफेद बालों को देख कर उन्हें ले जाने से साफ मुकरते हुए बोले, ‘माफ करना, हम इन्हें नहीं ले जा सकते.’

‘‘गाड़ी अपनी कर दें क्या भैया? तुम ऊपर बिल अपना दे देना,’’ हम ने उन के आगे गिड़गिड़ाते हुए कहा. सभी को अपनेअपने घर जाने को देर जो हो रही थी. अब यहां लोगों के पास जिंदों के लिए वक्त नहीं, तो मरे हुए के साथ कौन रहे?

‘‘देवभूतों ने चाय पीतेपीते कहा. ‘ये नहीं चलेंगे. नरक में भी नहीं,’

‘‘क्यों नहीं चलेंगे? सौ साल का बंदा ऊपर ही तो चलता है.’’

‘‘यह सुन कर वे बोले, ‘तो ऐसा करो, अगर तुम इन से छुटकारा पाना चाहते हो, तो पहले इन के सफेद बाल डाई कराओ. साहब तक को सफेद बाल वालों से सख्त नफरत है.

‘‘‘जब हम कोई सफेद बाल वाली आत्मा ले जाते हैं, तो वे हमें न सुनने लायक गालियां यह कहते हुए देने लग जाते हैं कि मृत्युलोक से क्या गंद उठा लाए. कितनी बार कहा कि खूबसूरती भी कोई चीज होती है कि नहीं?’’’

इतना सुन कर मोहनजी ने मेरी पीठ थपथपाई और खुद ही मेरे पास से उठ कर मंदमंद मुसकराते हुए घर की ओर हो लिए.

बुल्गारिया में जंगली सुअर के शिकार मामले में बुरे फंसे सैफ अली खान

काले हिरण शिकार मामले में कुछ समय पहले जोधपुर कोर्ट द्वारा बरी‍ किए गए एक्‍टर सैफ अली खान का शिकार के एक अन्य मामले में पुलिस ने बयान दर्ज कराया है. दरअसल ये मामला यूरोपीय देश बुल्‍गारिया में जंगली सुअर (Wild Boar) के शिकार से जुड़ा हुआ है. इस मामले में बुल्‍गारिया की पुलिस ने सैफ के एजेंट को पकड़ा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक बुल्‍गारिया की सरकार ने इस मामले में इंटरपोल (INTERPOL) से सैफ का बयान लेने का आग्रह किया था. उसके बाद सूत्रों के मुताबिक इंटरपोल के नोटिस पर पिछले दिनों मुंबई क्राइम ब्रांच ने सैफ अली खान का बयान दर्ज किया है.

इस रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से लिखा गया है कि सैफ अली खान का बयान गवाह के तौर पर दर्ज किया गया है. कहा जा रहा है कि इस महीने की शुरुआत में मुंबई क्राइम ब्रांच की बांद्रा यूनिट की एक टीम ने सैफ के घर जाकर बयान दर्ज किया. अभी यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि क्‍या इस बयान को सीबीआई के पास अभी भेजा गया या नहीं? ऐसा इसलिए क्‍योंकि भारत में सीबीआई ही इंटरपोल की नोडल एजेंसी है.

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इस संबंध में एक सूत्र ने बताया कि बुल्‍गारिया की पुलिस ने एक ऐसे एजेंट को पकड़ा है जिसने एक्‍टर के लिए इस तरह के हंटिंग प्रोग्राम का आयोजन कराया था, लेकिन इसके लिए जरूरी लाइसेंस और परमिट कथित रूप से नहीं लिए गए थे. इस सूत्र के मुताबिक, ”एजेंट को इस शिकार प्रोग्राम के आयोजन के आरोप में पकड़ा गया है…क्‍योंकि उसने जरूरती परमिट और लाइसेंस नहीं लिए थे. इसी मामले में इंटरपोल ने एक्‍टर से ब्‍योरा मांगा है.”

बुल्‍गारिया में जंगली सुअर के शिकार को ‘बिग गेम’ हंटिंग श्रेणी में रखा जाता है. वहां के स्‍थानीय नियमों के मुताबिक यदि किसी विदेशी के पास अपने मूल देश का शिकार का लाइसेंस होता है तो ऐसे सैलानियों को बुल्‍गारिया लघु अवधि के वीजा के साथ एक महीने की मियाद का लाइसेंस जारी कर सकता है. यदि विदेशी नागरिक के पास शिकार का लाइसेंस नहीं होता तो उनको इसके लिए शिकार का थ्‍योरी और प्रैक्टिकल एक्‍जाम देना होता है. इसके साथ ही हथियार के लिए अनुमति लेनी होती है.

काला हिरण केस

इसी अप्रैल में जोधपुर कोर्ट ने 1998 के काला हिरण शिकार मामले में एक्‍टर सलमान खान को पांच साल की सजा सुनाई थी और अन्‍य आरोपियों सैफ अली खान, सोनाली बेंद्रे, नीलम और तब्‍बू को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया.

किरकिरा न हो जाए ग्रुप टूर का मजा

व्यक्तिगत ट्रिप की तुलना में पैकेज्ड टूर कई मामलों में काफी सुविधाजनक होता है. पैकेज्ड टूर में सबकुछ टूर औपरेटर द्वारा मैनेज कर देने और गाइड उपलब्ध करवा देने से आसानी होती है और व्यक्तिगत ट्रैवल की तुलना में यह सस्ता भी पड़ता है. लेकिन किसी टूर औपरेटर के जरिए पर्यटन पर जाने से पहले कुछ बातें जान लें तो आप यात्रा में होने वाले कड़वे अनुभवों, कुढ़न या तनाव से बच जाएंगे और टूर का मजा किरकिरा नहीं होगा.

भ्रामक धारणा-1 :  मैं ने ट्रैवल इंश्योरैंस ले लिया, मेरे सभी बैगेज की सुरक्षा की पूरी टैंशन खत्म.

असलियत :  किसी अच्छी ट्रैवल इंश्योरैंस पौलिसी में मैडिकल, ऐक्सिडैंट कवर के अलावा ट्रिप की रद्दगी, फ्लाइट की देरी और बैगेज लौस कवर रहता है, लेकिन सारा बैगेज नहीं. इस में एयरलाइन चैक्डइन बैगेज का ही लौस कवर होता है, एयरपोर्ट से बाहर का नहीं यानी होटल या टूर बस से बैगेज खो जाने पर आप को यह कवरेज नहीं मिलेगा. हां, आप टूर औपरेटर की मदद से स्थानीय पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा सकते हैं. एयरपोर्ट पर सामान खोने की सूचना भी संबंधित एयरलाइंस को तुरंत देनी होगी और इस का लिखित प्रमाण आप को रखना होगा. इस विषय में अपने इंश्योरैंस एजेंट से जानकारी लेनी लाभकारी साबित हो सकती है.

भ्रामक धारण-2 :  भ्रमण संबंधी जो शैड्यूल ब्रोशर में है, वही फाइनल है.

असलियत :  ज्यादातर टूर औपरेटर नियम और शर्तों के तहत लिख देते हैं कि उन के नियंत्रण से बाहर ट्रैफिक समस्या, मौसम की गड़बड़ी, स्थानीय त्योहार, स्पोर्ट्स, हड़ताल, होटल बंद होना, होटल में या फ्लाइट में ओवरबुकिंग होना, ट्रेन या विमान का मार्ग बदलना आदि व अन्य कारणों से तय कार्यक्रम में कोई भी तबदीली संभव है. इसलिए टूर औपरेटर द्वारा हमेशा टूर पैकेज, ट्रैवल प्लान, साइटसीइंग आदि में अचानक या शौर्ट नोटिस पर बदलाव संभव है. इसलिए पेमैंट देने और औफर डौक्यूमैंट पर दस्तखत करने से पहले सबकुछ अच्छी तरह पढ़ लें और छोटेमोटे बदलावों के लिए तैयार रहें.

भ्रामक धारणा-3 :  ट्रिप खत्म होने दो, तब इस की कम्प्लेन कर के सबक सिखाएंगे.

असलियत :  आप ने आनंदपूर्वक छुट्टी बिताने के लिए मुंहमांगी कीमत दी है, फिर सेवा में कमी की कोई शिकायत टूर खत्म होने के बाद क्यों करेंगे. बीत गई, सो बात गई. टूर खत्म होने पर शिकायत करने से भी क्या फायदा? आप टूर के किसी भी चरण में अगर दिक्कत महसूस करते हैं, तो उसी वक्त टूर कंपनी को शिकायत करें क्योंकि वे स्थानीय होटल वालों और स्थानीय वैंडर्स के भरोसे टूर आयोजित करते हैं. आप की पुख्ता शिकायत मिलने पर वे उसी वक्त उन्हें टाइट कर के आप को बेहतर सेवाएं दिलवाएंगे. हां, मौखिक शिकायत के साथसाथ लिखित शिकायत भी जरूर दें. अपनी शिकायत स्पष्ट, सटीक और सही शब्दों में लिखें, गोलमोल नहीं.

भ्रामक धारणा-4 :  10-15 मिनट इधरउधर तो चलता है, यार.

असलियत : हम भारतीय 10-15 मिनट की कोई कीमत नहीं समझते. टूर में भी हम यही मान कर चलते हैं कि बरात की बस की तरह यहां भी हमारे आए बिना बस नहीं चलेगी. लेकिन यकीन मानिए, आप को यहां काफी मुसीबतें झेलनी पड़ सकती हैं. किसी भी गु्रप टूर में समय की पाबंदी होती है और यहां देरी करने की कोई गुंजाइश नहीं. अगर आप एकदो मिनट से ज्यादा की देरी करते हैं और तय समय पर किसी पर्यटन स्थल, होटल या शौपिंग मौल से अपनी बस तक नहीं पहुंचते हैं, तो गाड़ी छूट जाएगी. फिर अनजानी जगह आप को काफी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है.\

भ्रामक धारणा-5 :  मैं ने फीस दे दी, अब वीजा का पेपरवर्क करने का जिम्मा टूर औपरेटर का है

असलियत :  टूर औपरेटर वीजा आवेदन शुल्क के साथसाथ खुद की सर्विस फीस भी लेते हैं. वे आप के लिए आवेदन जरूर करते हैं, लेकिन इस पर उन का कोई बस नहीं चलता कि आप को वीजा समय पर मिल ही जाए. अगर आप का आवेदन रद्द हो जाता है, तो आप की फीस जब्त कर ली जाएगी. टूर औपरेटर से इस की वापसी की उम्मीद करना बेकार है.

जरूरत के आधार पर तय हो राजनेताओं की सुरक्षा

वीआर्ईपी संस्कृति, वीआईपी प्रोटोकॉल और वीआईपी सुरक्षा जैसे तमाम विषयों की बेशक समीक्षा होनी चाहिए. इसमें कोई शक-शुब्हा नहीं कि प्रोटोकॉल और सुरक्षा जैसे मसलों को देखने वाले ताकतवर लोग मुल्क के संसाधनों का बेजा इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि वे इसे रुतबे और हैसियत से जोड़कर देखते हैं. फिर भी, जरूरी सुरक्षा और गैर-जरूरी प्रोटोकॉल में फर्क है.

ज्यादा विकसित शासन-व्यवस्थाओं में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग विभिन्न सुविधाओं और विशेषाधिकारों का इस्तेमाल काफी सावधानी व पारदर्शिता के साथ करते हैं. लेकिन पाकिस्तान में भ्रष्ट नौकरशाही और रौब-रुआब का भूखा राजनीतिक नेतृत्व अक्सर व्यावहारिक समझ और वास्तविक सुरक्षा जरूरतों का अतिक्रमण कर डालता है.

प्रधान न्यायाधीश साकिब निसार की सदारत में सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल महीने में अपने एक अहम फैसले के जरिए मुल्क भर के उन तमाम लोगों को मिली सरकारी सुरक्षा को हटाने का आदेश दिया था, जिन्हें वाजिब प्रक्रिया को अपनाए बिना सुरक्षा दी गई है. मसले को आगे बढ़ाते हुए आला अदालत ने ऐसे लोगों को सरकारी वाहन तुरंत वापस करने को कहा और उसने यह भी साफ किया था कि आगामी चुनावी मुहिम के दौरान नेताओं को अपनी हिफाजत का इंतजाम खुद करना चाहिए. मगर इस फैसले के भयानक नतीजे निकल सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने महंगे सरकारी वाहनों के बेजा इस्तेमाल व सुरक्षाकर्मियों की गलत तैनाती का वाजिब संज्ञान लिया है. अगर ऐसा न हो रहा होता, तो अदालती आदेश की तामील में जुटे सरकारी महकमे इतनी जल्दी दर्जनों की तादाद में गाड़ियां न बरामद कर पाते. लेकिन चुनाव से पहले राजनेताओं की सरकारी सुरक्षा पर सामूहिक रोक का फैसला मुनासिब नहीं है.

पिछले दो आम चुनाव इस बात के गवाह हैं कि अनेक नेताओं व उम्मीदवारों की जान पर कितने खतरे आए थे. 2008 में बेनजीर भुट्टो के कत्ल का खामियाजा तो पाकिस्तान की सियासत अब भी भुगत रही है. इसलिए सामूहिक रोक की बजाय वास्तविक जरूरत के आधार पर यह तय होना चाहिए.

औषधीय नर्सरी : महिलाओं के लिए आय का जरिया

बदलते जमाने में औषधीय पौधों की मांग दुनियाभर में तेजी से बढ़ रही है. महिलाएं छोटी सी जगह पर औषधीय पौधों की खेती कर अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं. वे औषधीय पौधों की नर्सरी लगा कर खासा मुनाफा कमा सकती है. इन पौधों की खासीयत यह है कि ये बंजर और अकसर जलजमाव वाले इलाकों में खूब पनपते हैं. स्टीविया, गुग्गुल, खस, बेल, तुलसी, गुडची, पचौली, एलोवेरा, सतावर, सिट्रोनेला, लेमनग्रास, सर्पगंधा, जेट्रोफा, मेंथा, कलिहारी, ब्राह्मी, बच, आंवला आदि औषधीय पौधों की खेती कर या नर्सरी लगा कर महिलाएं खुद का कारोबार शुरू कर सकती हैं. इन की खेती से प्रति हैक्टेयर 50 हजार से 2 लाख रुपए तक की आमदनी हो सकती है.

ग्रामीण और शहरी महिलाएं थोड़ी सी ट्रेनिंग ले कर आसानी से औषधीय पौधों की नर्सरी का कारोबार शुरू कर सकती हैं. इस से जहां वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं वहीं वे परिवार की आमदनी भी बढ़ा सकती हैं. महिलाओं को नर्सरी लगाने के लिए प्रेरित करने वाली मोहम्मद कलाम तिब्बी बगीचा की संचालिका रजिया सुल्तान बताती हैं, ‘‘नर्सरी लगाने व चलाने में विशेष रकम व मेहनत की जरूरत नहीं होती है. जो महिलाएं नर्सरी लगाना चाहती हैं वे सब से पहले इस बारे में जानकारी हासिल करें. कृषि विभाग से लाइसैंस ले कर विधिवत ट्रेनिंग लेने के बाद काम शुरू करें. इस के लिए सरकार अनुदान भी देती है. इस का प्रपोजल बना कर आप अपने जिला कृषि पदाधिकारी के कार्यालय में जमा कर सकते हैं. जिन के पास कम जमीन है उन के लिए नर्सरी का कारोबार काफी फायदेमंद है.’’

रजिया कहती हैं, ‘‘एक मिर्च में 50 बीज होते हैं और उन बीजों से कम से कम 30 पौधे उगते हैं. बाजार में मिर्च के एक पौधे की कीमत 1 रुपया है. इस तरह एक मिर्च से कम से कम 30 रुपए की कमाई होती है, जिस में से 15 रुपए नैट प्रौफिट होता है. इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि नर्सरी लगाने का काम कितना फायदेमंद है.’’

देश के कई राज्यों समेत बिहार के मधुबनी, वैशाली, भागलपुर, सीवान शहरों में खस की काफी उम्दा खेती की जा सकती है. बंजर और बाढ़ग्रस्त इलाकों में भी खस की कामयाब खेती की जा सकती है. खस और पचौली इत्र बनाने के काम आते हैं और बाजार में खस की कीमत 25 से 30 हजार रुपए प्रति किलो है. शरबत और सुगंधित साबुन बनाने में भी इस का उपयोग होता है. इस के अलावा पटना, नालंदा और भोलपुर जिले की मिट्टी एलोवेरा की खेती के लिए काफी लाभकारी है. एलोवेरा के साथ आंवला की अंतरवर्ती खेती करने से कमाई को दोगुना किया जा सकता है.

एलोवेरा की खेती करने वाले असलम परवेज कहते हैं, ‘‘मैं बिहार के मसौढ़ी प्रखंड के कटका गांव में एलोवेरा की खेती 6 वर्षों से कर रहा हूं और हर साल खासा मुनाफा कमा रहा हूं.’’

हैरत की बात यह है कि लाखोंकरोड़ों रुपए खर्च कर औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने और किसानों को इन के प्रति जागरूक करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, पर इस की जानकारी ज्यादातर किसानों को नहीं है. महिलाएं और किसान औषधीय खेती के बारे में पूरी जानकारी जुटा कर इस की नर्सरी लगाएं या खेती करें तो वे अपनी मेहनत और पूंजी का कई गुना ज्यादा फायदा उठा सकते हैं.

बच, ब्राह्मी, कालामेघ, सतावर, सफेद मुसली, आंवला, गुड़मार, तुलसी, अश्वगंधा, दालचीनी आदि की खेती के लिए केंद्र सरकार 20 प्रतिशत और राज्य सरकार 70 प्रतिशत का अनुदान दे रही हैं. इस के अलावा बेग,

सर्पगंधा, कलिहारी, चित्रक की खेती के लिए सरकार 50 फीसदी और राज्य सरकार 40 फीसदी अनुदान देती हैं. गुग्गुल की खेती पर केंद्र सरकार 75 फीसदी और राज्य सरकार 15 फीसदी तक अनुदान देती हैं.

भगदड़ की वजह से शो बीच में छोड़ गईं सपना चौधरी

टीवी शो बिग बौस से अपनी पहचान बनाने वाली हरियाणवी डांसर सपना चौधरी इन दिनों काफी सुर्खियों में हैं. उन्हें लगातार बौलीवुड से औफर आ रहे हैं. इसी बीच सपना यूपी के बरेली में एक डांस शो के लिए पहुंची थी. लेकिन उनका ये शो हंगामे का शिकार हो गया. सपना चौधरी का प्रोग्राम शुरू होने के कुछ देर बाद ही वहां हंगामा शुरू हो गया. रात साढ़े दस बजे बेकाबू भीड़ मंच पर चढ़ गई. भीड़ और सपना के बाउंसरों में जमकर धक्का मुक्की हुई. इस दौरान हंगामा इतना ज्यादा बढ़ गया कि सपना किसी तरह खुद को बचाते हुए स्टेज से उतरीं और शो बीच में ही छोड़ गाड़ी में बैठ वहां से चली गईं.

ये हंगामा तब शुरू हुआ जब सपना के डांस के दौरान भीड़ स्टेज पर चढ़ गई और कभी सेल्फी, कभी ये तो कभी वो गाना बजाकर डांस की मांग की करने लगी. सपना के मंच से हटने के बाद लोग और ज्यादा हंगामे पर उतर आए. आयोजकों ने कार्यक्रम समाप्त करने की घोषणा की तो हंगामा खत्म करने के लिए पुलिस ने लाठियां चलानी शुरू कर दीं.

यहां पर सपना के साथ आई एक डांसर भीड़ में फंस गई जिसे मुश्किल से निकाला गया. रिपोर्ट के मुताबिक, सपना का डांस देखने को करीब दस हजार लोग जुट गए थे, लेकिन इतनी पब्लिक को संभालने के लिए पुलिस वहां नहीं थी. ऐसे में जब हंगामा शुरू हुआ तो भीड़ को संभालना बेहद मुश्किल हो गया.

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