देवर के प्रेम में पति की आहुति

16 जुलाई, 2017 की सुबह की बात है. लोग रोजाना की तरह उठ कर अपने दैनिक कामों में लग गए थे. उसी दौरान कुछ लोग स्टोन पार्क की ओर गए, तभी किसी व्यक्ति की नजर वहां पड़ी लाश की ओर गई. इस के बाद जल्दी ही यह बात आग की तरह पूरे पुरानी छावनी थानाक्षेत्र में फैल गई. जहां लाश पड़ी थी, वह क्षेत्र पुरानी छावनी थानाक्षेत्र के अंतर्गत आता था.

स्टोन पार्क में लाश पड़ी होने की खबर सुन कर स्टोन पार्क के आसपास रहने वाले लोगों का घटनास्थल पर जमघट लग गया. इसी बीच किसी ने यह सूचना थाना पुरानी छावनी को दे दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी प्रीति भार्गव पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गईं. उन्होंने देखा, मृतक 50-55 साल का था और उस की लाश लहूलुहान पड़ी हुई थी.

थानाप्रभारी ने लाश का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतक की छाती, गले, हाथ व सिर पर किसी तेजधार हथियार के घाव थे. उस की लाश के पास ही शराब की खाली बोतल और 2 गिलास पड़े हुए थे. इस से अनुमान लगाया गया कि हत्या से पहले हत्यारे ने मृतक के साथ शराब पी होगी. घटनास्थल पर काफी भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी.

थानाप्रभारी ने भीड़ से मृतक की शिनाख्त कराई तो किसी ने उस का नाम अंगद कडेरे बताते हुए कहा कि यह स्टोन पार्क की करीबी बस्ती का रहने वाला है और पेशे से हलवाई है. थानाप्रभारी ने एसआई रामसुरेश को अंगद के घर भेज कर उस की हत्या की खबर भिजवा दी. अंगद की पत्नी गीता को जैसे ही पति की हत्या की खबर मिली, उस का रोरो कर बुरा हाल हो गया.

मृतक की पत्नी और बच्चे एसआई रामसुरेश के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस ने उन से संक्षिप्त पूछताछ कर के घटनास्थल की काररवाई पूरी की और लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

मृतक अंगद की पत्नी गीता की तरफ से पुलिस ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. एसपी डा. आशीष ने थानाप्रभारी प्रीति भार्गव को हत्या के शीघ्र खुलासे के निर्देश दिए. थानाप्रभारी ने सब से पहले मृतक अंगद के घर जा कर उस के घर वालों से पूछताछ की. उन लोगों ने बताया कि अंगद की किसी से कोई रंजिश नहीं थी, वह बहुत सीधेसादे इंसान थे. बस उन्हें शराब पीनेपिलाने की आदत थी.

society

15 जुलाई, 2017 की रात उन के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. फोन पर बात करने के बाद वे यह कह कर घर से निकल गए थे कि उन्हें जरूरी काम है, बस थोड़ी देर में लौट कर आते हैं. लेकिन जाने के बाद वह वापस लौट कर नहीं आए. सुबह को उन की हत्या की जानकारी मिली.

प्रीति भार्गव ने अंगद कडेरे की पत्नी गीता से विस्तार से बातचीत की, लेकिन उस का इतना भर कहना था कि यह सब कैसे हो गया, इस बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है. गीता से बातचीत करते वक्त प्रीति भार्गव की नजर उस के हावभाव पर टिकी हुई थी.

पति के मरने का जो गम होना चाहिए, वह उस के चेहरे पर दिखाई नहीं दे रहा था. गीता थानाप्रभारी से बातचीत करने तक में डर रही थी. यहां तक कि उन से नजरें चुरा रही थी. थानाप्रभारी ने अपने अनुभव से अनुमान लगाया कि कहीं न कहीं दाल में काला जरूर है. लेकिन बिना ठोस सबूत के गीता पर हाथ डालना उन्होंने ठीक नहीं समझा. लिहाजा वे गीता से यह कह कर थाने लौट आईं कि अगर किसी पर संदेह हो तो फोन कर के मुझे बता देना.

इस के बाद थानाप्रभारी ने गीता के मोबाइल नंबर की कालडिटेल्स निकलवाई. कालडिटेल्स से उन्हें पता चला कि घटना वाले दिन गीता के मोबाइल पर देर रात जो आखिरी काल आई थी, वह बंटी जाटव की थी. उन्होंने बिना देरी किए थाने के तेजतर्रार एसआई रामसुरेश और कुछ पुलिसकर्मियों को मुरैना भेजा. पुलिस ने बंटी जाटव के सुभाषनगर स्थित घर से उसे पकड़ लिया और पूछताछ के लिए उसे पुरानी छावनी थाने ले आए.

उस से अंगद कडेरे की हत्या के बारे में गहनता से पूछताछ की तो पहले तो वह खुद को निर्दोष बताता रहा, लेकिन जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गया. बंटी ने अपना अपराध कबूल करते हुए बताया कि अंगद कडेरे की हत्या उस ने ही की थी. उस ने अंगद की हत्या की जो कहानी बताई, वह अवैध संबंधों पर आधारित थी.

अंगद कडेरे पुरानी छावनी थाने के अंतर्गत आने वाले स्टोन पार्क के पीछे बसी बस्ती में रहता था. वह जवान हुआ तो अपनी आजीविका चलाने के लिए हलवाई का काम करने लगा. उस की पहली पत्नी से 4 बच्चे सपना, गजेंद्र, भारती और विकास थे.

दरअसल, अंगद ने पहली पत्नी मीरा की मौत के बाद गीता से दूसरी शादी कर ली थी. इस से पहले अंगद अपनी दूसरी पत्नी गीता के साथ मुरैना के सुभाषपुरा में रहता था. वहीं उस के पड़ोस में बंटी जाटव रहा करता था. गीता से शादी के बाद उस के यहां 2 बेटे दुर्गेश और आकाश पैदा हुए. बंटी का अंगद के यहां काफी आनाजाना था. उस की गीता से बहुत पटती थी. गीता रिश्ते में उस की भाभी लगती थी, इस नाते वह उस से हंसीमजाक कर लेता था.

अंगद हलवाई था. दिन भर अपनी दुकान और कभीकभी रात में शादीविवाह में काम करने की वजह से वह देर रात को थकामांदा घर लौटता तो पत्नी को ज्यादा वक्त नहीं दे पाता था. खाना खाने के बाद वह शराब पी कर सो जाता था. यह बात गीता को काफी अखरती थी. पति की इस उदासीनता के चलते गीता का झुकाव बंटी की ओर हो गया.

भाभी के इस आमंत्रण को बंटी भांप गया. अंगद के काम पर निकलते ही वह उस के घर पहुंच जाता और अपनी लच्छेदार बातों से गीता का मन बहलाता. जल्दी ही एक दिन ऐसा आया, जब दोनों ने अपनी सीमाएं लांघ कर अपनी हसरतें पूरी कर लीं. दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. घर में अंगद के साथ उस के आधा दरजन बच्चे और पत्नी रहती थी. अंगद के काम पर निकलते ही गीता घर में अकेली रह जाती थी. बंटी इसी का फायदा उठा कर उस के घर पहुंच जाता था. इस तरह काफी दिनों तक दोनों ऐश करते रहे.

जाहिर है, अवैध संबंध छिपाए नहीं छिपते. बस्ती की औरतों को इस बात का शक हो गया कि बंटी अंगद की गैरमौजूदगी में ही उस के घर क्यों आता है. किसी तरह यह बात अंगद के कानों तक पहुंच गई. इस से अंगद का माथा ठनका. उस ने गीता से दोटूक कह दिया कि उस की गैरमौजूदगी में बंटी घर पर कतई न आया करे. लेकिन गीता की शह की वजह से बंटी ने अंगद के घर आना बंद नहीं किया.

यह पता चलते ही अंगद ने खुद ही बंटी से सख्त लहजे में कह दिया कि वह उस की गैरमौजूदगी में घर पर न आया करे, वरना इस का अंजाम बुरा होगा. उधर उस ने अपनी पत्नी गीता को भी जम कर खरीखोटी सुनाई. आखिर बंटी ने अंगद के यहां उस की गैरमौजूदगी में आना बंद कर दिया.

अंगद की रोकटोक की वजह से गीता और बंटी की मुलाकात नहीं हो पा रही थी. दोनों ही बहुत परेशान थे. ऐसे में दोनों को अंगद अपनी राह का कांटा दिखाई देने लगा.

society

एक दिन मौका मिलते ही गीता ने बंटी से मुलाकात की. उस ने बंटी से कहा कि अंगद को हमारे संबंधों की जानकारी हो चुकी है. उस ने मेरे ऊपर जो सख्ती की है, उस हालत में मैं नहीं रह सकती. मुझे तुम इस घुटनभरी जिंदगी से निकालो. बेहतर होगा, किसी तरह अंगद को ठिकाने लगा दो. इस के बाद ही हम दोनों सुकून से रह सकेंगे. गीता की बातों में आ कर वह अंगद की हत्या करने को तैयार हो गया.

15 जुलाई की रात अंगद खाना खाने बैठा ही था कि उस के मोबाइल पर बंटी जाटव का फोन आया. उस ने यह सोच कर उस का फोन रिसीव किया कि उसे कोई काम होगा, इसी वजह से इतनी रात गए फोन कर रहा है.

बंटी बोला, ‘‘अंगद भाई, तुम्हारे लिए एक अच्छी खबर है. मेरे एक रिश्तेदार को बेटे के जन्मदिन पर बड़ी पार्टी देनी है. ऐसा करते हैं हम दोनों मिल कर ठेके पर कैटरिंग का काम ले लेते हैं. पैसे मैं लगा दूंगा. पार्टी से आज ही बात कर लेते हैं. अगर आज बात नहीं की तो पार्टी किसी दूसरे को कैटरिंग का ठेका दे सकती है. तुम जल्दी आ जाओ, मैं स्टोन पार्क के पास तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं. अगर बात बन गई तो आज ही पार्टी से एडवांस ले लेंगे.’’

अंगद बंटी की बातों में आ गया. वह गीता से यह कह कर घर से निकल गया कि थोड़ी देर में लौट कर खाना खाएगा. जब वह स्टोन पार्क के करीब पहुंचा तो बंटी वहां शराब की बोतल लिए खड़ा था. अंगद को देखते ही वह बोला, ‘‘चलो, पार्टी के पास चलने से पहले एकदो पैग लगा लेते हैं.’’

दोनों ने वहीं बैठ कर शराब पी. शराब पीने के बाद बंटी ने क हा, ‘‘अब रात भी काफी हो गई है. गीता भाभी खाने के लिए इंतजार कर रही होंगी. हम पार्टी से सुबह बात कर लेंगे. मैं ऐसा करता हूं कि पहले तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देता हूं, उस के बाद अपने घर चला जाऊंगा.’’

उस के बाद अंगद उस की बाइक के पीछे बैठ गया. कुछ दूर चल कर बंटी ने स्टोन पार्क के निकट अपनी बाइक रोक दी और बाइक की डिक्की में रखी कुल्हाड़ी निकाल ली.

अंगद बंटी की योजना से पूरी तरह अनभिज्ञ था. उसे क्या पता था कि अंगद ने डिक्की से कुल्हाड़ी उस की हत्या करने के लिए निकाली है. उस ने अंगद से कहा, ‘‘भाईसाहब, अभी एक बोतल और रखी है मेरी डिक्की में, 2-2 पैग और ले लेते हैं.’’

अंगद बंटी की बात टाल नहीं सका. दोनों जिस जगह पर खड़े हो कर बातचीत कर रहे थे, वहां बैठ कर शराब पीना ठीक नहीं था. लिहाजा वे वहां से कुछ दूर चले और स्टोन पार्क में झाडि़यों के पास बैठ कर शराब पीने लगे.

अंगद एक तो पहले से ही ज्यादा पिए हुए था. 2 पैग और लगाने के बाद उसे ज्यादा नशा हो गया, जिस से उस के कदम लड़खड़ाने लगे. ठीक उसी समय बंटी ने उस पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ प्रहार करने शुरू कर दिए.

नशे की हालत में अंगद को संभलने तक का अवसर नहीं मिला. वह निढाल हो कर नीचे गिर पड़ा. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. बंटी ने उसे हिलाडुला कर देखा तो वह मर चुका था. वह वहां से अपने घर मुरैना चला गया. उस ने मुरैना पहुंचते ही गीता को उस के मोबाइल पर अंगद की हत्या की सूचना दे दी.

उस ने बतौर ऐहतियात गीता से कहा कि जब उसे पुलिस द्वारा अंगद की हत्या की खबर मिले तो वह रोने का नाटक करे, जिस से किसी को योजना पर संदेह न हो. पुलिस ने बंटी से पूछताछ के बाद गीता को भी गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी बिना नानुकुर के स्वीकार कर लिया कि पति की हत्या की साजिश में वह भी शामिल थी. बंटी की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त वह कुल्हाड़ी भी बरामद कर ली, जोकि गीता ने उसे धार लगा कर दी थी.

उस के बाद दोनों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. उधर हत्याकांड के खुलासे पर पुलिस अधीक्षक डा. आशीष ने सीएसपी जादौन, टीआई पुरानी छावनी प्रीति भार्गव, एसआई रामसुरेश सिंह कुशवाह को 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

खुशी के लिए मासूम खुशी का खून

दोपहर का एक बज चुका था, लेकिन खुशी अभी तक घर नहीं आई थी. घर के कामकाज निपटाने के बाद मिथिलेश की नजर घड़ी पर पड़ी तो वह चौंकी, क्योंकि खुशी एक बजे तक स्कूल से लौट आती थी. परेशान सी मिथिलेश भाग कर यह देखने दरवाजे पर आई कि शायद बेटी स्कूल से आ रही हो, लेकिन वह दूरदूर तक दिखाई नहीं दी तो वह और ज्यादा परेशान हो गई.

मिथिलेश मां थी, इसलिए उस का चिंतित होना स्वाभाविक था. खुशी स्कूल छूटने के बाद सीधे घर आ जाती थी. मिथिलेश सोच रही थी कि क्या किया जाए कि तभी उस के ससुर रामसावरे आते दिखाई दिए. उन के नजदीक आते ही मिथिलेश ने कहा, ‘‘बाबूजी, एक बज गया, खुशी अभी तक स्कूल से नहीं आई.’’

रामसावरे चौंके, ‘‘खुशी अभी तक नहीं आई? कोई बात नहीं बहू, बच्ची है, सखीसहेलियों के साथ खेलनेकूदने लगी होगी. तुम चिंता मत करो, मैं स्कूल जा कर देखता हूं.’’ कह कर रामसावरे खुशी के स्कूल की ओर निकल गए. यह 12 अक्तूबर, 2017 की बात है.

उत्तर प्रदेश के जिला फैजाबाद की कोतवाली बाकीपुर का एक गांव है असकरनपुर. मास्टर विजयशंकर यादव इसी गांव में रहते थे. वह शिक्षामित्र थे. उन के परिवार में पत्नी मिथिलेश, बेटा संजय कुमार, बेटी खुशी तथा उस से छोटा बेटा शिवा था. रामसावरे भी उन्हीं के साथ रहते थे.

उन का भरापूरा परिवार था. अध्यापक होने के नाते विजयशंकर की गांव में इज्जत थी. वह भले ही शिक्षामित्र थे, लेकिन उन्हें सब मास्टर साहब कहते थे.

विजयशंकर का बड़ा बेटा संजय बीएससी कर रहा था. उन की बेटी खुशी गांव से ही 2 किलोमीटर दूर कोछा बाजार स्थित एमडीआईडीयू स्कूल में कक्षा 4 में पढ़ती थी. वह औटो से स्कूल आतीजाती थी, इसलिए घर वालों को उसे स्कूल से लाने या पहुंचाने का कोई झंझट नहीं था.

विजयशंकर के यहां सब ठीक चल रहा था. लेकिन 12 अक्तूबर, 2017 का दिन उन के परिवार के लिए विपत्ति ले कर आया. खुशी का पता करने रामसावरे स्कूल पहुंचे तो वहां सन्नाटा पसरा हुआ था.

सभी बच्चे अपनेअपने घर जा चुके थे. स्कूल में 2-4 मास्टर बचे थे, वह भी जाने की तैयारी कर रहे थे. रामसावरे ने उन से खुशी के बारे में पूछा तो पता चला कि छुट्टी होते ही खुशी घर चली गई. उन्होंने यह भी बताया कि खुशी औटो से जाने के बजाय स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिका विमलेश कुमारी के साथ गई थी.

विमलेश के साथ जाने की बात सुन कर रामसावरे के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. वजह यह थी कि खुशी रोजाना औटो से स्कूल आतीजाती थी. फिर वह विमलेश के साथ क्यों गई? जबकि बच्चों को लाने ले जाने वाला औटो अपने समय पर स्कूल आया था और बच्चों को ले गया था.

society

रामसावरे तेज कदमों से चलते हुए सीधे विमलेश के घर पहुंचे, पता चला कि विमलेश घर में नहीं है. वह स्कूल तो गई पर लौट कर नहीं आई. यह जानने के बाद रामसावरे को चिंता होने लगी. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर विमलेश खुशी को ले कर कहां चली गई?

खुशी के गायब होने की खबर पा कर खुशी के पिता विजयशंकर भी गांव आ गए. गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर वह खुशी की तलाश में निकल पड़े. सब से पहले वह खुशी के स्कूल गए. इस बार स्कूल के कर्मचारियों ने उन्हें बताया कि खुशी घर जाने के लिए स्कूल के औटो के बजाए स्कूल की अध्यापिका विमलेश कुमारी के साथ निकली थी. स्कूल के बाहर एक लड़का मोटरसाइकिल लिए खड़ा था, विमलेश खुशी को ले कर उसी के साथ गई थी.

सवाल यह था कि उस लड़के के साथ विमलेश खुशी को ले कर कहां गई? वह लड़का कौन था? इस से लोगों को आशंका हुई कि कुछ गड़बड़ जरूर है, वरना खुशी को मोटरसाइकिल से क्यों ले जाया जाता. तब तक शाम हो गई थी. अब विजयशंकर के सामने पुलिस के पास जाने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं बचा था. वह गांव वालों के साथ कोतवाली बीकापुर की ओर चल पड़े.

अभी वे रास्ते में ही थे कि पता चला, विमलेश खुशी को मोटरसाइकिल से मोहम्मद भारी तक आई थी. उस के बाद वहां खड़ी सफेद रंग की एक पुरानी मार्शल जीप में बैठ कर कहीं चली गई थी. इसी के साथ ही यह भी पता चला कि विमलेश खुशी को जिस लड़के की मोटरसाइकिल से मोहम्मद भारी तक लाई थी, वह लड़का मुमारिजनगर के रहने वाले सुबराती का बेटा मोहम्मद अनीस था.

इस के बाद रामसावरे ने अपनी 10 वर्षीय पोती खुशी के अपहरण की तहरीर कोतवाली प्रभारी सुनील कुमार सिंह को दे दी. उन के आदेश पर उसी दिन अपराध संख्या 436/2017 पर भादंवि की धारा 363 के तहत विमलेश और मोहम्मद अनीस के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो गया.

मुकदमा दर्ज होते ही सुनील कुमार सिंह ने इस मामले की जांच एसआई घनश्याम पाठक को सौंप दी. जब इस मामले की जानकारी एसपी (ग्रामीण) संजय कुमार को मिली तो उन्होंने इस केस में दिलचस्पी लेते हुए एसओजी टीम को भी खुशी के बारे में पता लगाने की जिम्मेदारी सौंप दी.

14 अक्तूबर, 2017 को पुलिस को मुखबिर से पता चला कि अनीस और विमलेश थाना कुमारगंज के गांव बवां में ठहरे हैं और वहां से कहीं जाने की फिराक में हैं. सूचना मिलते ही पुलिस टीम थाना कुमारगंज पुलिस को साथ ले कर बवां पहुंच गई. लेकिन पुलिस के पहुंचने से पहले ही विमलेश और मोहम्मद अनीस वहां से निकल चुके थे.

फलस्वरूप पुलिस को खाली हाथ लौटना पड़ा. इस बीच पुलिस को विमलेश और अनीस के मोबाइल नंबर मिल गए थे. पुलिस ने उन्हें सर्विलांस पर लगा दिया था. सर्विलांस से उन के हरियाणा के गुरुग्राम में होने का पता चला.

इस पर घनश्याम पाठक के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गुरुग्राम भेज दी गई. लेकिन वहां भी पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा. वहां पुलिस टीम को पता चला कि वे दिल्ली चले गए हैं. पुलिस टीम दिल्ली पहुंची, लेकिन वे दोनों वहां भी नहीं मिले.

विमलेश और अनीस की तलाश में पुलिस दिल्ली में भटकती रही, लेकिन वे पकड़े नहीं जा सके. पुलिस टीम दिल्ली में ही थी कि वे दोनों फैजाबाद आ गए. इस के बाद दिल्ली गई पुलिस टीम भी फैजाबाद आ गई.

दूसरी ओर खुशी के बारे में पता न चलने से दुखी घर वाले अधिकारियों के यहां चक्कर लगा रहे थे. इस से स्थानीय लोगों का गुस्सा बढ़ता गया. पुलिस पर दबाव भी बढ़ रहा था. परिणामस्वरूप रविवार 22 अक्तूबर, 2017 को सुनील कुमार सिंह ने मोहम्मद अनीस और विमलेश को फैजाबाद रेलवे स्टेशन से उस वक्त गिरफ्तार कर लिया, जब दोनों ट्रेन पकड़ कर कहीं भागने की फिराक में थे.

दोनों को गिरफ्तार कर के कोतवाली बीकापुर लाया गया. पूछताछ में पहले तो दोनों खुद को बेकसूर बताते रहे, लेकिन जब पुलिस ने उन के सामने सबूत रखे तो दोनों ने सच्चाई उगल दी.

विमलेश ने बताया कि मोहम्मद अनीस, जो उस का प्रेमी था, की मदद से उस ने खुशी को ठिकाने लगा दिया है. उस की लाश को उन्होंने जंगल में फेंक दिया था. उन्होंने खुशी की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला फैजाबाद के कोछा बाजार में वैसे तो कई निजी स्कूल हैं, लेकिन एमडीआईडीयू की अपनी अलग पहचान है. यही वजह है कि इलाके के ज्यादातर बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते हैं. खुशी के ही गांव असकरनपुर की रहने वाली 24 साल की विमलेश कुमारी इस स्कूल में अध्यापिका थी. खुशी वहां कक्षा-4 में पढ़ती थी. गांव के रिश्ते से खुशी विमलेश की भतीजी लगती थी.

society

कुंवारी विमलेश मोहम्मद अनीस से प्यार कर बैठी थी. जबकि वह शादीशुदा ही नहीं, एक बच्चे का बाप भी था. एमडीआईडीयू स्कूल में पढ़ाने से पहले विमलेश एक अन्य स्कूल में पढ़ाती थी. मोहम्मद अनीस वहां बस चलाता था. साथ आनेजाने में दोनों में प्यार हो गया. जब इस बात की जानकारी स्कूल वालों को हुई तो दोनों को नौकरी से निकाल दिया गया ताकि स्कूल का माहौल खराब न हो.

वहां से निकाले जाने के बाद विमलेश एमडीआईडीयू स्कूल में पढ़ाने लगी, अनीस वहां  भी अकसर उस से मिलने आता था. अनीस से मिलने के लिए ही विमलेश स्कूल खुलने से पहले आ जाती थी, इसलिए उसे अनीस से मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी.

एक दिन खुशी ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया तो यह बात उस ने अपने घर वालों को बता दी. इस के बाद तो विमलेश और अनीस के संबंधों की जानकारी पूरे गांव वालों को हो गई.

इस से विमलेश की काफी बदनामी हुई. इसी बात से नाराज हो कर विमलेश ने खुशी को सबक सिखाने का मन बना लिया. इस के बाद उस ने अनीस से सलाह की.

उसी सलाह के अनुसार गुरुवार 12 अक्तूबर, 2017 को विमलेश ने मार्शल गाड़ी बुक कराई. यह गाड़ी अनीस के मामा साकिर की थी. स्कूल से छुट्टी होने के बाद विमलेश खुशी को बरगला कर अनीस की मोटरसाइकिल से मार्शल तक ले आई.

वहां वह खुशी को ले कर उस में बैठ गई. अनीस उस के साथ ही था. अनीस खुशी को ले कर थाना कुमारगंज के गांव बवां पहुंचा, जहां वह अपनी एक रिश्तेदार जुलेखा के यहां पहुंचा. जुलेखा के घर के बगल में ही उस के बहनोई का पुराना मकान खाली पड़ा था. खुशी को ले कर वह उसी मकान में छिपा रहा.

शाम होते ही दोनों खुशी को बवां गांव के जंगल में ले गए और वहां उस की हत्या कर के उस की लाश वहीं एक गड्ढे में फेंक दी.

खुशी को ठिकाने लगा कर विमलेश और अनीस रुदौली रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली चले गए. दिल्ली से दोनों गुरुग्राम गए, जहां इधरउधर घूमते रहे. 22 अक्तूबर को दोनों फैजाबाद लौटे तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

विमलेश और अनीस से पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों की मदद करने वाली जुलेखा और मार्शल गाड़ी लाने वाले अनीस के मामा साकिर को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने अनीस की मोटर साइकिल तथा उस के मामा साकिर की मार्शल गाड़ी भी बरामद कर ली थी.

विमलेश और अनीस की निशानदेही पर पुलिस ने बवां के जंगल से खुशी का कंकाल और स्कूल ड्रेस बरामद कर ली थी. खुशी की लाश को शायद जंगली जानवर खा गए थे. पुलिस ने कंकाल को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद पहले से दर्ज मुकदमे में धारा 367, 302, 201 दफा 34 भी जोड़ दी गई थी. सारी काररवाई निपटा कर पुलिस ने चारों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया था.

– कथा पुलिस तथा मीडिया सूत्रों पर आधारित

इन अदाकाराओं ने सिर मुंडाकर लगाया बोल्डनेस का तड़का

बौलीवुड में बहुत सी अभिनेत्रियां ऐसी भी हैं जिन्होंने फिल्मों में सिर मुंडाने वाले किरदार में भी बेहद बोल्ड सीन दिए. सिर मुंडावाने के बाद भी इन अभिनेत्रियों की खूबसूरती ऐसे ही बरकरार रही. तो आइए देखते हैं बौलीवुड की उन हीरोइनों को जो सिर मुंडावाने के बाद भी दिखी इतनी सुंदर.

प्रियंका चोपड़ा

प्रियंका चोपड़ा के फिल्म मैरी कौम का रोल हर किसी को याद होगा. इस फिल्म में देसी गर्ल बोल्ड नजर आई थी. निजी और प्रोफेशनल लाइफ की परेशानियों से उभर रहीं प्रियंका चोपड़ा को एक बोल्ड चैंपियन के रोल में दिखाया गया था. यह फिल्म सुपरहिट रही और लोगों ने उनके रोल को काफी पंसद भी किया.

शिल्पा शेट्टी

फिल्म ‘द डिजायर’ में शिल्पा शेट्टी बोल्ड नजर आई थीं. ये फिल्म विवादों में रही लेकिन शिल्पा के रोल को काफी सराहना मिली थी.

अनुष्का शर्मा

अनुष्का शर्मा अपने लव-ब्रेकअप से फिल्म ऐ दिल है मुश्किल में परेशान रहती हैं. फिर भी वह बोल्ड होकर अपनी पार्टियां करती रहती हैं घूमने जाती हैं और खूब मस्ती करती है. बता दें कि इस फिल्म में उन्हें कैंसर पीड़ित दिखाया गया था. अनुष्का का ये रोल लोगों को काफी अच्छा लगा.

अंतरा माली

फिल्म ‘वंस अगेन’ में अंतरा माली ने दमदार रोल प्ले किया था. ये फिल्म भी खूब चली. इस फिल्म में अंतरा माली सिक्किम की एक भिक्षु के रोल में दिखी थीं. उनके रोल को काफी सराहना मिली थी.

ऐसे बचेगी दिल्ली

दिल्ली में सीलिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट का लचीला न होना एक अच्छा संकेत है. दिल्ली की ही नहीं हर शहर की हालत बुरी हो रही है. बाबुओं और नेताओं को अपनी जेबें भरने की चिंता है, नागरिकों, औरतों, बच्चों, बूढ़ों की नहीं. शहरों में रोजगार मिलने और सिर पर साए की तलाश में आए लोगों ने पहले से रह रहे लोगों का जीवन तो नर्क बना ही डाला, अपने लिए भी कूड़े के ढेरों पर रहने, खाने, काम करने का अभ्यास कर लिया.

ऐसा लगता है कि दिल्ली जैसे शहरों में सिर्फ जानवर रहते हैं और इन जानवरों में भी गंदगी पसंद सूअर ही ज्यादा हैं.

दुकानदारों और मकानदारों की मांग के आगे झुकते चले जाते खुद को कामदार कहने वाले नेताओं को तो भजनपूजन व प्रवचन से ही फुरसत नहीं है और उन के मातहतों को हलवापूरी खाने और हर नागरिक, दुकानदार और अतिक्रमण करने वाले से पैसा वसूलने से.

दिल्ली जैसे शहरों को सुधारा नहीं जा सकता यह बेमतलब की बात है. दुनिया के कितने ही गरीब देशों की राजधानियां दिल्ली से कहीं ज्यादा अच्छी हैं और हमारे यहां तो प्रधानमंत्री कार्यालय के 1 किलोमीटर के दायरे में सड़कों पर कच्ची दुकानें, बड़े दफ्तरों के आगे टिन के गार्डरूम, पटरियों पर पंप हाउस, आड़ेतिरछे पेड़पौधे दिख जाएंगे.

लगता ही नहीं कि नागरिक सेवाओं की चिंता इस 1 किलोमीटर में भी म्यूनिसिपल कौरपोरेशन, दिल्ली सरकार या मोदी सरकार को है. यह 1 किलोमीटर स्वच्छ भारत अभियान की पोल खोलने के लिए काफी है. चूंकि सुप्रीम कोर्ट के कई जजों के घर इस दायरे में हैं, उन की चिंता सही है.

दिल्ली को सुधारने के लिए थोड़ा लचीलापन, थोड़ी दूरदर्शिता व थोड़ी सूझबूझ चाहिए जो हमारे नौकरशाहों और नेताओं दोनों में ही नहीं है.

दिल्ली को सुधारने के लिए एक तो इसे बहुमंजिला बनाना होगा, दोहरेतीहरे बेसमैंटों में पार्किंग हो और ऊपर वर्टिकल गार्डन से लगते 20-25 मंजिला मकान. 2-3 मंजिलों में दुकानें, दफ्तर हों ताकि लोगों को दूर न जाना पड़े. बड़े प्लाटों पर तो 2-3 मंजिलों में स्कूल तक खोले जा सकते हैं ताकि लिफ्ट का उपयोग बढ़े, सड़कों और वाहनों का नहीं.

दिल्ली को साफ करने के लिए बड़े सीवरों का प्लान करना होगा, इतने बड़े कि उन में आदमी चल सकें. यह 2-3 सदी पहले यूरोप के कई शहरों में बन चुके हैं. तकनीक कोई कठिन नहीं है. अब जब मैट्रो बनाना आ सकता है, तो सीवर क्यों नहीं बन सकते?

सड़कों पर भीड़ कम करने के लिए अतिक्रमण तो हटे ही, मल्टी लेवल सड़कें भी प्लान की जाएं. चौड़ी सड़कें इतनी लाभदायक नहीं होतीं जितनी दोमंजिला या तीनमंजिला. यह तकनीक भी उपलब्ध है और शहरी जमीन के अधिग्रहण के मुआवजे से शायद सस्ती पड़ेगी.

लोगों पर कानून लादने की जगह सरकार अपने लिए नियम बनाए. हर कानून में यह प्रोवीजन हो कि सरकारी कर्मचारी पर क्या करने और क्या न करने पर क्या जुरमाना लगेगा. शहर तब ठीक होगा जब उस से मलाई खा रहे लोगों को भी अदालतों के चक्कर काटने पड़ें. केवल नागरिकों को दंड देना अदालतों का काम नहीं है.

हर बार भाजपा को दोष देना ठीक नहीं

हर खराब चीज के लिए भाजपा सरकार को दोष देना तो ठीक न होगा पर जब मोदी हर अच्छी बात के लिए अपनी पीठ खुद थपथपा सकते हैं, तो उन के शासनकाल में होने वाली कमी, कमजोरी या खराबी के लिए उन्हें ही गाल आगे करने होंगे.

शहरों का प्रदूषण आज देश के लिए सब से भयंकर बीमारी है. यह भूख की तरह की है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया के 15 सब से गंदे शहरों में से 14 भारत में हैं. इन 14 (बाकी की तो छोडि़ए) की औरतों को बीमारियों, मैले कपड़ों, कीच होती दीवारों, चिटकते फर्शों, कीटों, मच्छरों व मक्खियों के लिए सरकार को ही कोसना होगा.

2014 में दुनिया के सब से गंदे 15 शहरों में से भारत के 3 ही शहर थे. स्वच्छता अभियान की पोल खोलती यह रिपोर्ट बताती है कि अब 4 सालों में 11 शहर और जुड़ गए हैं. गंगा किनारे बसा कानपुर सब से गंदा है. यमुना किनारे बसा फरीदाबाद 2 नंबर पर है, तो गंगा के किनारे बसा वाराणसी शहर 3 नंबर पर. तीर्थस्थान गया जहां 4 नंबर पर है, वहीं गंगा किनारे बसा पटना 5 नंबर पर. नरेंद्र मोदी की सीट दिल्ली 6 नंबर पर है और योगी आदित्यनाथ का आश्रम लखनऊ 7 नंबर पर है.

वृंदावन मथुरा से थोड़ा दूर आगरा 8 नंबर पर है. श्रीनगर जो कहते नहीं अघाता था कि स्वर्ग यहीं है 10 नंबर पर है. दक्षिण भारत के किसी भी राज्य में गंदे 15 शहरों में कोई भी शहर नहीं है. 15 में से 14 के 14 भारतीय जनता पार्टी की सरकारों के हाथों में हैं.

यह चाहे सही है कि गंदगी पिछली सरकारों की भी देन है पर जब वाहवाही लूटने के लिए पिछली सरकार के अच्छे योगदान को अनदेखा करोगे तो थूथू भी सुनोगे.

बच्चों के अच्छे नंबर आए हैं, तो तारीफ पत्नी को मिलेगी, खराब नंबर आए हैं, तो उन के दादादादी को तो नहीं कोसा जाएगा न.

ये शहर गंदे इसलिए हैं कि गंद को उठाना हमारे यहां आज भी बेहद गंदा काम समझा जाता है. भारत में अब दलित भी यह काम करने में आनाकानी करने लगे हैं, क्योंकि इस काम का आर्थिक ही नहीं सामाजिक असर भी है. दूसरे देशों में यह काम वहां के अनपढ़, गरीब या बाहर के आए लोग कर रहे हैं पर इस काम को करने वाले सामाजिक बहिष्कार के शिकार नहीं होते.

यहां का सफाई कर्मचारी इस काम को जन्मजात बोझ समझता है. उस का मन ही नहीं है इस में और हो भी क्यों? घर में रह रही विधवा को यदि सफेद कपड़े पहना कर सीढ़ियों के नीचे वाली कोठरी दोगे तो वह घर की रक्षा तो करेगी नहीं, मन मार कर काम करेगी, केवल जीने भर के लिए.

गंदगी ऊंचे फैलाते हैं, तो उस के निबटान का जिम्मा भी उन्हें ही उठाना होगा. हाथ से नहीं उठाना तो मशीनें हैं न आज. पर ऊंचे तो कूड़ा फैलाना जन्मजात पौराणिक हक मान कर चल रहे हैं और यही दुर्दशा की वजह है.

भूल जाइए कि हम सुधरने वाले हैं. हम और भी गंदे होंगे और अस्थमा, स्किन डिजीज, इन्फैक्शन, कैंसर आदि रोग सुरसा की तरह बढ़ेंगे ही. जो अंधविश्वासी हैं वे भले महा हवन करा लें, पर होगा तभी कुछ जब हर जना दस्ताने पहन कर अपना व दूसरों का कूड़ा उठाने को तैयार होगा.

वीरे दी वेडिंग : घटिया लेखन व निर्देशन

यदि आप मानते हैं कि नारी की प्रगतिशीलता के मायने ड्रग्स का सेवन करना, खुलेआम शराब व सिगरेट पीना, अपने पति को गंदी गंदी गालियां देना, खुलेआम सेक्स व आर्गज्म पर बेबाक बातें करना है, तो फिल्म ‘‘वीरे दी वेडिंग’’ आपके लिए है, अन्यथा कहानी के नाम पर यह फिल्म शून्य है.

जी हां! रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘‘वीरे दी वेडिंग’’ तमाम सामाजिक मान्यताओं व सोच को तोड़ने वाली बोल्ड फिल्म होते हुए भी विचलित करती है. पूरी फिल्म एकता कपूर की कंपनी ‘बालाजी टेलीफिल्मस’ मार्का सीरियल व कई तरह के विज्ञापनों का मुरब्बा है. फिल्मकार शशांक घोष ने अपनी इस फिल्म में नारी पात्रों के मार्फत विवाह को मूर्खता, दोस्ती को जीवन उद्धारक, शराब को पानी का पर्याय, यौन संबंध को स्वास्थ्यवर्धक, सिगरेट को तनाव भगाने का आसान उपाय, बदनामी को अति आवश्यक और फैशन को हर समय की जरुरत बताया है.

movie review Veere Di Wedding

फिल्म की कहानी के केंद्र में दिल्ली में रह रही हाई स्कूल के दिनों की चार सहेलियां कालिंदी पुरी (करीना कपूर), अवनी शर्मा (सोनम कपूर), साक्षी सोनी (स्वरा भास्कर) और मीरा सूद (शिखा तलसानिया) हैं. इनकी सूत्रधार कालिंदी पुरी है. फिल्म शुरू होती है हाई स्कूल की परीक्षा के समापन का जश्न मनाते हुए, इन लड़कियों की हरकतों यानी कि इनके बियर्ड प्वाइंट पर पहुंचने पर इनके एटीट्यूड का अहसास होता है. फिर कहानी दस साल बाद शुरू होती है.

अवनी शर्मा फैमिली कोर्ट में मेट्रोमोनियल एडवोकेट हैं और अपनी मां (नीना गुप्ता) के साथ रहती है. दिल से काफी रोमांटिक है, उसे स्कूल के दिनों से ही शादी कर बच्चे पैदा करने की इच्छा रही है. इसी के चलते वह अर्जुन, निर्मल, भंडारी सहित कई युवकों के  संपर्क में आती रहती है, मगर उसे सही जीवन साथी नहीं मिलता, जबकि उसकी मां भी उसके लिए लड़का तलाश रही है. अवनी को सच्चे प्यार की तलाश है.

कालिंदी बिखरे हुए माता पिता की अकेली औलाद है. वह ‘कमिटमेंट फोबिया’ की शिकार है. वह रिषभ मल्होत्रा (सुमित व्यास) के संग आस्ट्रेलिया में दो वर्ष से भी अधिक समय से लिव इन रिलेशनशिप में रह रही है, मगर अपने माता पिता के वैवाहिक जीवन के झगड़ों की गवाह रही कालिंदी को शादी व रिश्तों से डर लगता है. पर वक्त के साथ बहते हुए वह रिषभ मल्होत्रा के संग शादी के लिए हामी भर देती है. उसकी शादी दिल्ली में पंजाबी रीतिरिवाजों के संग होनी है, जिसमें उसकी अन्य तीनों सहेलियां भी शामिल होती हैं, पर रिश्ते निभाते निभाते वह रिषभ से बीच में ही शादी न करने का फैसला ले लेती है. पर अंत में एक ऐसा मोड़ आता है कि वह रिषभ के साथ शादी के बंधन में बंध जाती है.

movie review Veere Di Wedding

मीरा सूद एक युवा विद्रोही है, जिसने अपने बड़े पापा के विरोध के बावजूद एक अमरीकन से शादी की है, उसका एक कबीर नामक बेटा है, पर शादीशुदा जिंदगी से खुश नहीं है. वहीं साक्षी सोनी एक अति अमीर औरत है, वह विनीत से शादी कर लंदन रहने लगती है, पर सेक्स संतुष्टि के लिए ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ में यकीन करने वाली साक्षी सोनी जल्दी ही विनीत से तलाक लेकर वापस अपने करोड़पति माता पिता के पास रहने आ गयी है. अब वह दिन भर क्लब व ड्रग्स आदि मे डूबी रहती है. बात बात पर गंदी गंदी गालियां बकना उसकी आदत का हिस्सा है. यह चारों सहेलियां भावनात्मक रूप से काफी जटिल स्वभाव की हैं. इन चारों अति आधुनिक व स्वतंत्र सहेलियों की जिंदगी, पुरुष, सेक्स, प्यार, शादी, दिल टूटने सहित औरतों से जुड़े हर मुद्दे पर अपनी एकदम अलग सोच व राय है. इनके अंदर इतना गट्स है कि यह सभी अपनी सोच के साथ ही जिंदगी जीती हैं. यह शादी से पहले सेक्स पर भी बातें करती हैं. इन्हे किसी का कोई डर नही है.

भारतीय सिनेमा जगत में स्वतंत्र व आधुनिक नारी के इस रूप व इस तरह की हरकतों वाली फिल्म अब तक नहीं बनी है. इस तरह ‘वीरे दी वेडिंग’ सिने जगत में एक नए अध्याय की शुरुआत है. यह चारों नारी पात्र अपनी सफलता, अपनी असफलता व अपने हर कदम को अपने लिए एक सम्मानजनक तमगा समझती हैं. यह सभी अपनी गलतियों के साथ निरंतर आगे बढ़ती रहती हैं. भारतीय परिवेश व भारतीय सोच के तहत इन्हें पवित्र परिभाषित नहीं किया जा सकता. जब वासना व प्यार की बात आती है, तो यह चारों लड़कियां भारतीय सामाजिक मूल्यों व सोच के तहत असहनीय मानी जाएंगी.

यूं तो कहानी व कहानी के मोड़ जीवन को बदलने वाले या चौंकाने वाले नहीं हैं. अपनी अपनी जिंदगी से जूझना व दिल के टूटने के कथानक पर सैकड़ों फिल्में बन चुकी हैं, पर पहली बार इस कथानक पर नारी पात्रों के साथ फिल्म बनायी गयी है. मगर लेखक व निर्देशक किसी भी किरदार को गहराई के साथ पेश नहीं कर पाए. पटकथा लेखक बुरी तरह से असफल हुए हैं. सभी पात्र काफी सतही व उथले छोर से हैं. परिणामतः दर्शक इन किरदारों की यात्रा का सहभागी नहीं बन पाता. इनके साथ जुड़ नहीं पाता.

चारों सहेलियों की गप्पबाजी के चलते फिल्म एक ही जगह ठहरी हुई सी लगती है. फिल्म पर निर्देशक शशांक घोष की कोई पकड़ नजर नहीं आती. फिल्म बार बार एकता कपूर मार्का टीवी सीरियल की याद दिलाती रहती है. फिल्म कई जगह आपको  विचलित करती है. युवा पीढ़ी खासकर टीनएजर उम्र के दर्शकों को अहसास हो सकता है कि फिल्म उनके मन की बात करती है. प्यार व शादी को लेकर यह फिल्म उत्साहित नहीं करती. जिन्होंने विदेशी सीरियल ‘सेक्स एंड द सिटी’ या ‘‘ब्राइड्समैड’’ देखा है, उन्हे यह फिल्म इनका अति घटिया रूपांतरण नजर आएगी.

फिल्म में बेवजह कालिंदी के पिता (अंजुम राजाबली) व उनकी दूसरी पत्नी परोमिता (एकावली खन्ना) तथा कालिंदी के समलैंगिक चाचा (विवेक मुश्रान) की कहानी को बेवजह जोड़ा गया है, यह फिल्म की कहानी को अवरूद्ध ही करते हैं. फिल्म को संवारने की बजाय तहस नहस करने में पार्श्वसंगीत की अहम भूमिका है. फिल्म की एडीटिंग भी काफी गड़बड़ है.

शादी के नाम से डरी हुई महिला कालिंदी पुरी के किरदार में करीना कपूर ने काफी बेहतर अभिनय किया है. स्वरा भास्कर ने काफी स्वाभाविक अभिनय किया है. अवनी शर्मा के किरदार में एक बार फिर सोनम कपूर ने साबित कर दिखाया कि कलाकार के तौर पर वह निरंतर विकास कर रही हैं. मगर परदे पर इन चारों की दोस्ती बनावटी नजर आती है.

दो घंटे पांच मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘वीरे दी वेडिंग’’ का निर्माण अनिल कपूर, रिया कपूर, निखिल द्विवेदी और एकता कपूर ने किया है. फिल्म के लेखक निधि मेहरा व मेहुल सूरी, निर्देशक शशांक घोष, संगीतकार विशाल मिश्रा, शाश्वत सचदेव, करण, पार्श्वसंगीतकार अर्जित दत्ता, कैमरामैन सुधाकर रेड्डी यकांती व कलाकार हैं- सोनम कपूर, करीना कपूर,स्वरा भास्कर, शिखा टलसानिया, सुमित व्यास, विश्वास किनी, आएशा रजा, विवेक मुश्रान, मनोज पाहवा, नीना गुप्ता, गेवी चहल, शीबा चड्ढा, अलका कौशल व अन्य.

2 महीने में बाबा बनिए

कनाट प्लेस पर लगे एक छोटे से होर्डिंग ने मेरा ध्यान खींचा, ‘नवीनतम कोर्स: 2 महीने में बाबा बनिए’. जोशजोश में मैं होर्डिंग पर दिए पते पर जा पहुंचा. रिसैप्शन पर भगवा कपड़े पहने, माथे पर जुल्फें बिखराए नेल पौलिश लगाती एक लड़की बैठी थी. मुझे देखते ही उस लड़की ने होंठों को बड़ी अदा से गोल करते हुए हिंग्लिश यानी हिंदीइंगलिश मिक्स में बाबा के कोर्सों की जानकारी देनी शुरू कर दी, ‘‘सर, द फर्स्ट कोर्स इज बाबा, ओनली बाबा यू नो, सैकंड इज श्री 1008 बाबा श्री और तीसरा श्रीश्री 25008 बाबा श्रीश्री है…

‘‘पहले कोर्स की फीस ओनली 25 थाउजंड बक्स है. सर, सैकंड कोर्स की 50 थाउजंड और तीसरे कोर्स की वन लाख रुपए है.’’ उस के सर…सर कहने से मेरा मन खुश तो बहुत हुआ, मगर मैं ने अपने मध्यमवर्गीय मुंह को बिसुरते हुए कहा, ‘‘बहुत ज्यादा फीस है.’’

‘गुड मौर्निंग मुंबई’ वाली विद्या बालन की तरह अपनी उंगली से लटों को गोल करते हुए उस लड़की ने समझाया, ‘‘आप तो बस बाबा वाला कोर्स कर लीजिए. आप के भक्त ही आने वाले समय में आप के नाम के आगे गिनती के साथ श्री वगैरह लगाते जाएंगे.’’ मेरी गुजारिश पर और मुझ में एक भावी छात्र को देखते हुए उस रिसैप्शनिस्ट बाला ने मुझे प्रिंसिपल बाबा से मिलवा दिया. मैं ने प्रिंसिपल बाबा के मठाफिस में घुसते ही उन के पैर छू कर आशीर्वाद लिया और अपनी जिज्ञासा शांत करने को कहा. प्रिंसिपल बाबा मुझे समझाते हुए बोले, ‘‘वक्त बदलते देर नहीं लगती बच्चा. कमल बाबा का नाम तो तुम ने सुना ही होगा? वह अपना ही शिष्य है. उस के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, तुम्हारी तरह वह भी पूछतेपूछते हमारे पास आया था.

‘‘जानते हो, कल तक उस छोटे से शहर की एक छोटी सी कालोनी में रहने वाले कमल का नाम जिसे वहां शायद ही कोई जानता होगा, अचानक हर किसी की जबान पर आ गया, सिर्फ हमारे कोर्स की वजह से.

‘‘12वीं जमात पास कमल के पास सिर्फ एक ही गुण था कि वह बातें करते नहीं थकता था, सब्जैक्ट चाहे जो हो. बातूनी कमल के बारे में बताया जाता है कि वह रौंग नंबर फोन आने या लग जाने पर भी 25-30 मिनट बात कर के ही दम लेता था.

‘‘हम कमल को देखते ही समझ गए थे कि इस में बाबा बनने के सारे गुण हैं. हम ने कमल को ट्रेंड किया और एक चैनल पर सुबह प्रवचन देने का कांट्रैक्ट भी दिलाया. दूरसंचार माध्यम की महिमा के चलते देखते ही देखते गली का कमल सारे देश का कमल बाबा बन गया. ‘‘अब उस चैनल पर हर रोज सुबह कमल बाबा अपने भक्तों को संबोधित करते हैं, उन की समस्याओं का निदान करते हैं. लोगों की समस्याएं तो लोग जानें, मगर बेकार कमल को अब अच्छा काम मिल गया है और चैनल वाले को भी प्रवचन के समय पर ढेर सारे इश्तिहार मिलने लगे हैं. इस तरह बाबा और चैनल वाला दोनों माल बटोर रहे हैं.’’

‘‘सर…’’ मैं ने कुछ पूछना चाहा, मगर प्रिंसिपल बाबा अपने पुराने शिष्य कमल बाबा को छोड़ने को तैयार ही नहीं थे.

‘‘अपनी 25-30 साला जिंदगी में कमल ने परचून की दुकान चलाने से मकानों की दलाली तक सबकुछ कर के देख लिया था, मगर कहीं कामयाबी हाथ न आई और अब देखो, लाखों रुपए रोज उस के अकाउंट में जमा हो रहे हैं, सिर्फ हमारे कोर्स की बदौलत.’’ कमल बाबा से उन्हें मूल मुद्दे पर लौटाते हुए मैं ने हैरानी से पूछा, ‘‘आप प्रवचन देना भी सिखाते हैं सर?’’

‘‘सच बोले बच्चा, प्रवचन देना मतलब और कुछ नहीं, बस बड़बड़ करना है. किस्सेकहानियां मजेदार ढंग से सुनाना और बीचबीच में भजन गाना, यही तो प्रवचन है,’’ प्रिंसिपल बाबा अपने धंधे के राज मुझ पर खोले जा रहे थे.

‘‘लेकिन मुझे भजन गाना नहीं आता. मेरी आवाज कुछ ज्यादा ही मोटी है सर,’’ मैं ने सकुचाते हुए कहा.

‘‘नो प्रौब्लम. एक भजन मंडली तुम्हारे साथ बैठा करेगी. तुम बस भजन शुरू करना और सुर वगैरह वे लोग संभाल लेंगे,’’ प्रिंसिपल बाबा ने अपना तोड़ बताया.

‘‘बाबा बन जाने के बाद लोग अपनी समस्याएं भी तो मेरे पास लाएंगे, तब मैं क्या करूंगा?’’ मैं ने जानना चाहा.

‘‘लोग अपनी समस्याएं ले कर तुम्हारे पास आएंगे, तो जो तुम्हें अच्छा लगे, वह बकते जाना. मेरे कहने का मतलब है कि बताते जाना. बस, ध्यान रखना बातचीत रुके नहीं,’’ प्रिंसिपल बाबा ने समझाते हुए कहा.

‘‘जो अच्छा लगे, वह बताते जाना? मतलब…?’’ मैं ने अपनी जिज्ञासा जाहिर की.

‘‘मसलन, कोई तुम्हें कहे कि उस की बीमारी ठीक नहीं हो रही, तो उस से पूछो कि डाक्टर की दवा किस दिशा में मुंह कर के लेते हो? अब कोई दिशा देख के तो दवा लेता नहीं. बस, तुम उस से कहना कि यही तो गलती करते हो. पूर्व दिशा में मुंह कर के दवा लिया करो और रोज गाय को एक ताजा रोटी खिलाया करो, तुम्हारी तबीयत ठीक हो जाएगी.’’ ‘‘लेकिन क्या पूर्व दिशा में मुंह कर के दवा लेने से वह ठीक हो जाएगा? और अगर वह ठीक न हुआ, तो सर?’’ मैं ने फिर पूछा.

‘‘बौड़म हो यार तुम तो. अरे, डाक्टर की दवा खाएगा, तो ठीक क्यों न होगा. अगर वह न भी हुआ, तो तुम उस के किए में फिर कोई खोट निकालना. मसलन, दवा पीते ही एकदम पश्चिम या उत्तर दिशा की ओर तो नहीं घूमे थे? या गाय को जो रोटी दी थी, उस का आटा ज्यादा पुराना तो नहीं था… वगैरह.

‘‘खैर, छोड़ो. हम तुम्हें इतना ट्रेंड कर देंगे कि अपने दरबार में तुम ऐसी सिचुऐशन को खुद ही संभाल लोगे.’’

‘‘सर, मैं काफीकुछ तो समझ गया हूं, पर…’’ मैं ने कहा.

‘‘अब पर वगैरह छोड़ो और यह, सरसर कहना भी छोड़ो और ‘बेटा’, ‘बच्चा’, ‘वत्स’ कहने की आदत डाल लो,’’ प्रिंसिपल बाबा ने समझाया और अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बोले, ‘‘तुम्हारे लिए एक मेकअपमैन को बुला लेते हैं और तुम्हें कुछ इंगलिश भी सिखा देते हैं. तुम्हारी दाढ़ी और बाल भी अच्छेखासे बढ़ सकते हैं, सो तुम्हें अब बाबा बनने से कोई नहीं रोक सकता.’’

‘‘सर, आप मेरे दरबार के बारे में कुछ कह रहे थे? कैसा होगा मेरा दरबार सर?’’ मैं ने लडि़याते हुए पूछा.

‘‘चल, तुझे तेरा दरबार दिखाता हूं. सुन, तेरे दरबार में आने के लिए हजार रुपए का टिकट लेना पड़ता है और आगे की लाइन में बैठने के लिए 2 हजार रुपए का. तू बाबा बन गया है. सो, बाबा से सवाल पूछने के 5 सौ रुपए अलग से लगते हैं. अरे भाई, अलग से इसलिए कि सवाल पूछने वाला भी तो टैलीविजन पर दिखता है.’’

‘‘वैसे, टैलीविजन पर बाबा को यानी तुझे देख लेने भर से, तेरी बातें सुन लेने भर से मनोकामना पूरी हो सकती है, मगर उस के लिए महज 250 रुपए बाबा के यानी तेरे बैंक अकाउंट में जमा करवाने पड़ते हैं,’’ प्रिंसिपल बाबा मुझे ख्वाब दिखाए जा रहे थे. ‘‘अगर कोई इतना खर्च भी न करना चाहे तो एक और स्कीम है बाबा के पास, यानी तुम्हारे पास. दरबार के बाहर लगे स्टौल से बाबा का फोटो और तावीज खरीद ले, जो महज 101 रुपए का है. अपने ममेरेचचेरे भाइयों को फोटो और तावीज बेचने के कामधंधे पर लगा देना. कोई सालावाला हो, तो तुम्हारे भजनोंप्रवचनों की किताबें छाप कर और कैसेट सीडी बना कर बेचने के काम पर लगा दो समझे?’’ प्रिंसिपल बाबा मुझे भविष्य में लगने वाले मेरे दरबार का सीन दिखा रहे थे.

वाह, क्या विराट मेला लगा है. राजेंद्र बाबा के भक्त, बाबा की एक झलक पाने को आकुलव्याकुल हैं. बालकनी, स्टौल और आगे की लाइन के सभी टिकट बिक चुके हैं. जो लोग महंगे टिकट नहीं ले पाए हैं, वे बाहर मात्र 101 रुपए में बाबा के तावीज खरीद कर अपनी किस्मत संवार रहे हैं. अब बाबा यानी खुद मैं मंच पर अपनी जगह ले चुका हूं और बाबा के चेले यानी मेरे चेले उन लोगों के हाथ में माइक दे रहे हैं, जिन्होंने टैलीजिवन पर दिखने के लिए 5 सौ रुपए दिए हैं. एक हजार का टिकट व 5 सौ रुपए अलग से चुकाने वाला पहला भक्त बोलता है, ‘‘बाबा, पिछले महीने से मेरा पूरा परिवार टैलीविजन पर आप का कार्यक्रम देख रहा है और कार्यक्रम देख कर ही मुझे नौकरी में प्रमोशन मिल गया है. बस, अब महल्ले की मुन्नी से शादी हो जाए बाबा. आप की कृपा चाहिए.’’ विराट मंच के विराट सिंहासन पर विराजमान बाबा यानी मैं अपना धीरगंभीर चेहरा भक्त की ओर घुमाते हुए उसे अपने हाथ उठा कर आशीष देते हुए कहता हूं, ‘‘मुन्नी से शादी करने के लिए तुझे रोज सुबह एक आलू बड़ा खुद खाना है और कम से कम 4 आलू बड़े अपने यारदोस्तों या पड़ोसियों को खिलाने हैं. आलू बड़ा कहीं से भी खरीद सकते हैं. वैसे, गुल्लू हलवाई की दुकान देखी है? उसी से खरीदो, तो ज्यादा कृपा आती है.’’

अपने भक्त का भला करते हुए मैं अपने ममेरे साले गुल्लू के रोजगार की जुगत जमाने में लगा हूं, तभी श्रीमतीजी आवाज देती हैं, ‘‘अजी सुनते हो, अब उठो भी. सुबह के 7 बजने वाले हैं. आज दफ्तर नहीं जाना क्या?’’ राजेंद्र बाबा यानी हम अपने सपने से बाहर आ कर वाशबेसिन की ओर चल देते हैं. हम मन ही मन हाथ जोड़ते हैं कि यह सब सपना था. भला हो हमारे देश का कि इस के भोलेभाले लोग एक और शातिर बाबा के चंगुल में आने से बच गए.

मकान मालिकों के हथकंडे

गांव में रहने वाले दिनेश के पास खेतीबारी के लिए अच्छीखासी जमीन व बड़ा सा घर था. उस के गांव के आसपास कोई अच्छा स्कूल नहीं होने की वजह से उस ने अपने बच्चे को अच्छी तालीम दिलाने के लिए शहर के एक नामीगिरामी स्कूल में यह सोच कर दाखिला दिलाया कि वहां उसे पढ़ने के लिए समय से बिजली मिलेगी. दिनेश ने अपने 5 साला बेटे का दाखिला शहर के एक स्कूल में करा दिया था, लेकिन उस के पास शहर में रहने के लिए कोई अपना निजी मकान नहीं था, इसलिए उसे किराए के एक मकान की जरूरत आ पड़ी. बेटे को पढ़ाने के लिए दिनेश ने 2 कमरे का मकान किराए पर लिया. उस का किराया 4 हजार रुपए महीना था. मगर जैसे ही दिनेश ने वहां रहना शुरू किया, तो मकान मालिक ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया. उस ने दिनेश के ऊपर अपनी तमाम तरह की शर्तें लादनी शुरू कर दीं.

मकान मालिक ने कहा कि उस के घर पर ज्यादा लोगों का आनाजाना नहीं होना चाहिए. मकान का मेन गेट रात के 9 बजे के बाद किसी भी हालत में नहीं खुलेगा, इसलिए 9 बजे के पहले घर आ जाना होगा. बिजली और पानी का बिल भी अलग से देना होगा. दिनेश ने जल्दबाजी में किराए का मकान ले तो लिया था, लेकिन मकान मालिक से किसी तरह का कोई एग्रीमैंट नहीं किया गया था, इसलिए वह न चाहते हुए भी फंस सा गया था. मकान मालिक की रोजरोज की नईनई शर्तों से तंग आ कर वह नया मकान ढूंढ़ने में लग गया, लेकिन मकान मालिकों की गैरजरूरी शर्तों के चलते उसे अपने मनमाफिक मकान नहीं मिल पा रहा था. आखिरकार 2 महीने की भागदौड़ के बाद उसे एक ऐसा मकान मिल पाया, जहां पहले से ही नियम व शर्तों का एक एग्रीमैंट किया गया था और वह उस मकान में शिफ्ट हो गया. इस के बावजूद उस मकान मालिक ने भी तमाम शर्तें लादनी शुरू कर दीं. दिनेश ने कोर्ट में जाने की धमकी दी और कहा कि एग्रीमैंट के तहत किए गए नियम व शर्तों को तोड़ने की दशा में वह उस के ऊपर केस करेगा. इस के बाद उस मकान मालिक द्वारा दिनेश को किसी तरह से परेशान नहीं किया गया.

कुछ यही हाल एक प्राइवेट स्कूल में टीचर सुनीता का भी था. वह 2 साल से शहर में रह रही थी, लेकिन मकान मालिक के रोजरोज के नए हथकंडों की वजह से 2 साल में 8 बार मकान बदलने को मजबूर हुई थी. सुनीता का कहना है कि अकसर हम अपने घरों से दूर अच्छी तालीम, नौकरी व कारोबार के लिए शहरों में चले आते हैं, जहां हमें रहने के लिए किराए के मकान की जरूरत होती है. ऐसे में जब हम कोई भी किराए का मकान लेते हैं, तो उसे मकान मालिक द्वारा हमारे ऊपर ऐसे नियम व शर्तें लाद दी जाती हैं, जिन्हें पूरा करना मुमकिन नहीं होता है. सुनीता के मुताबिक, मकान मालिकों द्वारा मकान के किराए के साथ बिजली का बिल भी अलग से लिया जाता है, उस के बावजूद मेन स्विच से अकसर बिजली काट दी जाती है, जिस से कभीकभी अंधेरे में ही गुजारा करना पड़ता है. दोपहिया, चारपहिया गाड़ी रखने वालों के लिए पार्किंग के लिए रोज की किचकिच से दोचार होना पड़ता है.

शहर में रह कर प्राइवेट नौकरी करने वाले अनिल किराए के एक मकान में रहते हैं. उन का कहना है कि मकान लेने के पहले उन्होंने मकान मालिक को 10 हजार रुपए एडवांस पगड़ी के रूप में दिए, लेकिन जब उन्होंने उस रकम की रसीद मांगी, तो मकान मालिक द्वारा देने से इनकार कर दिया गया. बाद में उस मकान को छोड़ते समय मकान मालिक द्वारा पगड़ी के रूप में जमा की गई रकम को वापस करने से मना कर दिया गया.

मकान मालिक ने साफतौर पर कह दिया कि उसे कोई भी रकम पगड़ी के रूप में नहीं दी गई थी. अनिल ने बताया कि उन के यहां आने वाले दोस्तों को ले कर अकसर मकान मालिक द्वारा एतराज जताया जाता था, जबकि मकान मालिक के यहां हर रोज आनेजाने वालों की भीड़ लगी रहती थी, जिस से उन के कमरे से होने वाली बातचीत व होहल्ला की वजह से उन के बच्चों को पढ़नेलिखने में परेशानी होने लगी. जब इस बात की शिकायत उन्होंने मकान मालिक से की, तो उस ने कहा कि वह कमरा छोड़ दे या तो इसी तरह के माहौल में रहना सीख जाए. अकसर शहरों में किराए पर उठने वाले मकानों की हालत जर्जर होती है. उस के हिसाब से मकान मालिकों द्वारा किराए के रूप में भारीभरकम रकम की मांग की जाती है.

किराए पर मकान दिलाने का काम करने वाले संजय ने बताया, ‘‘हम जब भी किराए पर मकान लें, तो मकान मालिक से यह तय कर लें कि किराए की रकम की या तो वे रसीद देंगे या उस रकम का भुगतान मकान मालिक के बैंक खाते में किया जाएगा.

‘‘अगर मकान मालिक द्वारा इस तरह की शर्तों में हीलाहवाली की जाती है, तो इस की शिकायत आप नगरनिगम, नगर पालिका, नगर पंचायतों के दफ्तर में कर सकते हैं, क्योंकि अकसर मकान मालिकों द्वारा नगरनिगमों या नगर पालिकाओं से यह बात छिपाई जाती है कि वे अपने मकान को किराए पर देने का काम करते हैं. वजह, नगरीय इलाकों में नगर निकायों द्वारा किराए पर उठने वाले मकानों के हाउस टैक्स, वाटर टैक्स और उस पर लगने वाले तमाम तरह के टैक्स की दर ज्यादा होती है.

‘‘इसी टैक्स की चोरी के मकसद से मकान मालिकों द्वारा नगर निकायों में मकान किराए पर उठाने की बात दर्ज नहीं कराई जाती है. ‘‘इस के अलावा नगर निकायों में दर्ज किराए पर उठने वाले मकानों के मासिक किराए की रकम को नगर निकायों द्वारा ही तय किया जाता है. ‘‘अगर आप किराए पर मकान लेने जा रहे हैं, तो नगर निकाय के दफ्तर से यह जरूर साफ कर लें कि आप के द्वारा किराए पर लिया जाने वाला मकान नगर निकाय में दर्ज है कि नहीं. अगर वह मकान दर्ज है, तो नगर निकाय द्वारा तय किराए की रकम के बारे में पता कर लें और उस से ज्यादा रकम मांगने की दशा में आप इस की शिकायत नगर निकाय के दफ्तर में कर सकते हैं.’’ संजय ने यह भी बताया कि अगर मकान मालिक द्वारा आप के साथ किसी तरह की बदसुलूकी या नियमशर्तों का उल्लंघन किया जाता है, तो भी आप इस की शिकायत करने से न हिचकें.

दिशा पटानी ने शेयर की बिकिनी पोस्ट

एक्‍ट्रेस दिशा पटानी अक्‍सर सोशल मीडिया पर अपने फोटो और वीडियो शेयर करती रही हैं. इन दिनों दिशा मालद्वीप में हैं और वहां से उनके द्वारा शेयर किए जा रहे फोटो इंस्‍टाग्राम पर धमाल मचा रहे हैं. दिशा का यह अंदाज कई यूजर्स को जबरदस्‍त फिटनेस गोल दे रहा है. अपने इस मालद्वीप वेकेशन के कई खूबसूरत फोटो दिशा इंस्‍टाग्राम पर शेयर कर रही हैं. इन फोटोज में बीच पर मस्‍ती करती दिशा स्‍विमसूट्स और बिकिनी में नजर आ रही हैं.

सोशल मीडिया पर अक्‍सर सितारों को उनके बोल्‍ड अंदाज के लिए ट्रोल करने वाले कम नहीं है, लेकिन दिशा के इन फोटोज में लोग उनके फिटनेस अंदाज के दीवाने हुए जा रहे हैं. दिशा पटानी डांस से लेकर जिम सेशल तक, कई फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर करती हैं.

entertainment

सिर्फ दिशा ही नहीं, उनके कथित बौयफ्रेंड और फिल्‍म ‘बागी 2’ के को-स्‍टार टाइगर श्रौफ ने भी मजेदार वीडियो शेयर किया है.

बता दें कि टाइगर और दिशा पटानी के ‘बागी 2’ की सफलता के बाद साथ में वेकेशन मनाने की खबरे सामने आई थीं. खबरें थीं कि यह दोनों एक प्राइवेट रिजौर्ट में अपना वेकेशन मनाने वाले हैं और यहां एक विला बुक किया गया है. दरअसल ‘बागी 2’ की रिलीज के तुरंत बाद जहां टाइगर श्रौफ अपनी फिल्‍म ‘स्‍टूडेंट औफ द ईयर 2’ की शूटिंग में लग गए तो वहीं दिशा अपने ब्रांड प्रमोशंस में बिजी हो गई थीं. तो अब य‍ह जोड़ी साथ में एक साथ क्‍वालिटी टाइम बिता रही है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें