

हिंदी फिल्मों में एक दौर था, जब राज कपूर राज करते थे. वह ‘शोमैन’ कहलाते. एक्टिंग-डांस करते, तो लाखों दिल फिदा हो जाते, वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. वहीं 1950 से लेकर 1970 तक बौलीवुड पर राज करने वाली एक्ट्रेस थीं वहीदा रहमान.
वहीदा रहमान ने उस दौर कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया है. चलिए आज हम वहीदा रहमान और राज कपूर से जुड़ा एक रोचक किस्सा बताते हैं जब वहीदा रहमान के लिए भीड़ से लड़ने के लिए राज कपूर निकल पड़े थे और उन्हें रोकने के लिए वहीदा उनके ऊपर तक बैठ गई थीं.
यह वाकया साल 1966 में रिलीज हुई फिल्म तीसरी कसम में के दौरान का है. इस फिल्म में राज कपूर और वहीदा रहमान लीड रोल में थे. दरअसल इस फिल्म की शूटिंग मध्यप्रदेश के बीना में हुई थी और फिल्म शूटिंग खत्म हो चुकी थी. बीना से मुंबई के लिए फ्लाइट्स न होने के वजह से सभी ट्रेन से सफर कर रहे थे जिनमें राज कपूर, उनके दो दोस्त, वहीदा रहमान उनकी बहन सईदा और हेयर ड्रेसर भी शामिल थीं.

सभी अपने-अपने एसी रूम में बैठे थे ट्रेन बीना से निकली लेकिन 5 मिनट बाद ही रुक गई. ट्रेन के बाहर से भीड़ की आवाजें आने लगी कि बाहर आना पड़ेगा, बाहर आना पड़ेगा. राज कपूर ने जब इस बारे में पूछा तो उन्हें बताया गया कि कौलेज स्टूडेंट्स ने ट्रेन को रोक दिया है आपसे और वहीदा रहमान से मिलने की जिद पर अड़ गए हैं. यह सुन राज कपूर ट्रेन से उतरे और उनसे मिलने पहुंच गए.
राज कपूर तो स्टूडेंट्स से मिल लिए लेकिन अब स्टूडेंट्स वहीदा से मिलने की जिद करने लगे. भीड़ को देखकर राज कपूर को लगा कि यहां वहीदा को नहीं आना चहिए उन्होंने वहीदा के न आने की बात कही और वापस ट्रेन में आ गए. इससे स्टूडेंट्स गुस्सा हो गए और जिद करने लगे. यहां तक कि स्टूडेंट्स की भीड़ ने ट्रेन पर पत्थराव करना शुरू कर, ट्रेन के शीशे से भी टूट गए.
अब राज कपूर को भी गुस्सा आ गया वह वापस बाहर उन्हें सबक सिखाने जाने लगे तब उनके दोस्तों ने राज कपूर को बाहर जाने से रोका और वहीदा रहमान के रूम में बैठा दिया. दोस्तों ने वहीदा और बाकी लोगों से कहा कि वे राज कपूर को पकड़कर रखें उन्हें बाहर जाने न दें लेकिन राज कपूर भी बाहर जाने की जिद पर अड़ गए. तब वहीदा राज कपूर को रोकने के लिए तपाक के उनके ऊपर बैठ गई इससे राज कपूर और भी गुस्सा हो गए थे. वहीदा लगातार उन्हें बाहर जाने से रोक रही थीं. खैर, जबतक राज कपूर वहीदा के कब्जे से निकल पाते तब तक पुलिस वहां पहुंच गई और स्टूडेंट्स की भीड़ को वहां से हटाकर हालात पर काबू पा लिया. वहीदा रहमान ने इस पूरे वाकये को अपनी एक किताब में लिखा था.
यूं तो शादी वादी की खरीददारी अंत तक चलती रहती है, मगर इस काम के लिए समय का सदुपयोग कैसे किया जाए, यह दीपिका पादुकोण बेहतर जानती हैं. तभी तो जब उनके पास कोई फिल्म नहीं है यानी कि फिलहाल उन्हें किसी फिल्म की शूटिंग नहीं करनी है, तो वह अपनी होने वाली शादी की खरीददारी करने में व्यस्त हैं.

सूत्रों का दावा है कि दीपिका पादुकोण ने अपनी शादी के लिए आवश्यक ज्वेलरी की खरीददारी तो कर ली है, पर इन दिनों वह बंगलौर की दुकानो पर अन्य खरीददारी करती हुई नजर आयी.

सूत्रों की माने तो वह शादी से जुड़े हर समारोह के लिए अलग अलग तरह की आउटफिट/पोषाक खरीद रही हैं. इतना ही नहीं सूत्र दावा कर रहे हैं कि दीपिका पादुकोण इन दिनों अपने प्रेमी रणवीर सिंह के माता पिता के साथ भी दुकानों पर देखी जा रही हैं.

सूत्र बताते हैं कि शादी की खरीददारी में दीपिका पादुकोण, रणवीर सिंह के माता पिता का हाथ बंटा रही हैं. जबकि रणवीर सिंह, जोया अख्तर की फिल्म ‘‘गली ब्वाय’’ की शूटिंग करने में व्यस्त हैं.
हवाई यात्राओं में अकसर हवाई जहाजों का घंटों देर से उड़ान भरना या हवाई जहाज में तकनीकी खराबी आने के कारण फ्लाइट कैंसिल होना आम बात है. मौसम या प्राकृतिक कारणों से फ्लाइट कैंसिल होना तो समझा जा सकता है पर एयरपोर्टों पर घंटों बेकार घूमना जेल के समान ही है. मजेदार बात यह है कि एयरलाइंस, जो यात्रियों की कठिनाइयों के बारे में अब बिलकुल निष्ठुर हो गई हैं, और थोड़ी देर से आने या थोड़ा सामान ज्यादा होने पर पिघलती नहीं, अपनी गलती के लिए ‘वी रिगरेट टू अनाउंस…’ के अलावा कुछ नहीं कहतीं. इन पर नकेल कसने के लिए सरकार अब एयरलाइंस पर फाइन लगाने की भी सोच रही है और इंतजार कर रहे यात्रियों को खाने, रहने, घर लौटने आदि के पैसे दिलवाने की सोच रही है. यात्रियों को अचानक फ्लाइट कैंसिल होने पर जो कठिनाई होती है, उस का अंदाजा लगाना आसान नहीं है. अब चूंकि एयरलाइनों को यात्रियों को नो फ्लाइ लिस्ट में डालने तक का प्रावधान बन गया है जिस से वे किसी भी एयरलाइन के जहाज में यात्रा नहीं कर पाएंगे, फाइन या मुआवजा देने का नियम सही लगता है.
कठिनाई यह है कि आज सेवा देने वाले एकतरफा नियमों, कैसे भी नियम हों, की आड़ में बच निकलते हैं. ग्राहकों में कुछ ही ऐसे होते हैं जो अदालतों में जा पाते हैं और सेवा देने वाले की नाक में दम कर देते हैं. एयरलाइंस पर नकेल कसी जानी चाहिए क्योंकि अब वे जरा सा ज्यादा वजन, बीच की या किनारे की सीट, लैगरूम वाली सीट आदि के लिए भी पैसे चार्ज करने लगी हैं. वे हर दी जाने वाली विशेष सुविधा को कमाई का साधन बनाने लगी हैं. सो, असुविधा के लिए उन्हें हर्जाना भी यात्रियों को देना चाहिए.
पर होगा क्या, सारी कंपनियां एकजुट हो जाएंगी और सरकार को मजबूर कर देंगी कि वह ऐसा कोई कदम न उठाए कि पहले से लड़खड़ाती चल रही हवाई कंपनियों को नुकसान होने लगे. जब इन कंपनियों को हजारों यात्रियों को लानालेजाना होता है तो वे निष्ठुर हो जाती हैं. अमेरिका, जहां ग्राहक को राजा माना जाता था, में सीट पर बैठे यात्री को जबरन मारतेपीटते उतारने के कई मामले बहुप्रचारित हुए पर फिर भी एयरवेज कंपनियों का रवैया वैसे का वैसा ही है. एयरलाइंस कंपनियां जानती हैं कि उन के बिना न जनता रह सकती है, न सरकार. आज कंपनियां राजा बन गई हैं. वे नीतियों को बदल सकती हैं, वे तो शासकों को बदलने की ताकत भी रखती हैं. जनता चाहे वोटर के रूप में हो या ग्राहक के रूप में, खुद के बनाए शासक या धन्नासेठ की गुलाम बनने को मजबूर है.
एयरलाइंस पर बनने वाले नए नियम तब ही कारगर हो सकते हैं जब वे सब पर लागू हों. रेलों, बसों, बिजली कंपनियों, मोबाइल कंपनियों, बैंकों किसी को भी न छोड़ें, और यह तो संभव ही नहीं है. ऐसे में क्या होगा, नतीजा आप निकालें.
39 साल की देविका की त्वचा संवेदनशील है. एक दिन उस ने अपनी जांघ पर छोटेछोटे लाल रंग के चकत्ते देखे जिन में दर्द हो रहा था. उस ने इन चकत्तों को अनदेखा कर दिया. वैसे भी 2 बच्चों की मां की व्यस्त दिनचर्या में खुद के लिए वक्त कहां मिलता है. मगर धीरेधीरे देविका ने महसूस किया कि वह अकसर थकीथकी सी रहने लगी है. कुछ हफ्तों बाद एक दिन जब वह सोफे पर आराम कर रही थी तो उस ने अपने कूल्हे के पास एक गांठ देखी. वह घबरा गई और यह सोच कर रोने लगी कि उसे कैंसर हो गया है.
पति के कहने पर वह अस्पताल गई और वहां जांच कराई. तब डाक्टर ने बताया कि उसे शिंगल्ज नाम का चर्मरोग है और गांठ बनना इस बीमारी का एक लक्षण है जो लिंफ नोड की सूजन के कारण था. तुंरत डाक्टर के पास जाने से देविका जल्दी ठीक हो गई. ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है. जब भी त्वचा से जुड़ी कोई परेशानी दिखे तो डाक्टर से सलाह लें. ध्यान रखें कि ऐसी बहुत सी छोटीछोटी बीमारियां हैं जो घातक नहीं, मगर कभीकभी कैंसर जैसे घातक रोग का कारण भी हो सकती हैं. सो, इन बीमारियों के बारे में जानना जरूरी है.
सोरायसिस
यह एक त्वचा रोग है जिस में त्वचा पर लाल, परतदार चकत्ते दिखाई देते हैं. इन में खुजली व दर्द का एहसास भी होता है. हालांकि यह रोग शरीर के किसी भी हिस्से पर हो सकता है किंतु ज्यादातर यह सिर, हाथपैर, हथेलियों, पांव के तलवों, कुहनी तथा घुटनों पर होता है. अकसर यह 10 से 30 वर्ष की आयु में शुरू होता है. यह बीमारी बारबार हो सकती है. कभीकभी यह पूरी जिंदगी भी रहती है.
कैसे होता है : शरीर के इम्यून सिस्टम यानी रोगप्रतिरोधक प्रणाली की गड़गड़ी से यह बीमारी होती है. जिस से त्वचा की बाहरी परत यानी एपिडर्मिस कोशिकाएं बहुत तेजी से बनने लगती हैं. बाद में चकत्ते दिखने लगते हैं. हालांकि, यह छूत की बीमारी नहीं है. शोधकर्ताओं का मानना है कि इस रोग के पीछे आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारक जिम्मेदार होते हैं. सोरायसिस होने का एक कारण तनाव, धूम्रपान और अधिक शराब का सेवन भी है. शरीर में विटामिन ‘डी’ की कमी व उच्च रक्तचाप की दवाइयां खाने से भी यह हो सकता है. इस के अलावा यदि घर में कोई इस बीमारी से पीडि़त है तो यह आप को भी हो सकती है.
सोरायसिस के लक्षण प्रत्येक व्यक्ति में अलगअलग दिखाई देते हैं. ये लक्षण इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि व्यक्ति को किस तरह का सोरायसिस है. इलाज : सोरायसिस पर काबू पाने के लिए पहले स्टैप के तौर पर टौपिकल स्टीरौयड एक से 2 सप्ताह तक लगाया जा सकता है. जिस से चकत्ते घटने लगते हैं. हलकी धूप लेने से भी आराम मिलता है. विटामिन ‘डी’ सिंथेटिक फौर्म में, मैडिकेटेड शैंपू आदि भी तकलीफ घटाते हैं.
ध्यान रखें : सोरायसिस के लगभग 10 से 30 प्रतिशत मरीजों में गठिया होने की आशंका रहती है. इस के अलावा टाइप 2 डायबिटीज और कार्डियो वैस्कुलर डिजीज भी सोरायसिस की वजह से हो सकती हैं.
शिंगल्ज
शिंगल्ज एक त्वचा संक्रमण है. यह आमतौर पर जोड़ों में होता है. इस के अलावा यह पेट, चेहरे अथवा त्वचा के किसी भी हिस्से में हो सकता है. आम बोलचाल की भाषा में इसे दाद भी कहा जाता है. शिंगल्ज के कारण : यह रोग तब होता है जब चिकनपौक्स फैलाने वाला वायरस शरीर में दोबारा सक्रिय हो जाता है. जब आप चिकनपौक्स से उबर जाते हैं तो यह वायरस आप के शरीर की तंत्रिका प्रणाली में सुप्तावस्था में चला जाता है. कुछ लोगों में यह आजीवन इसी अवस्था में रहता है. वहीं कुछ व्यक्तियों में अधिक उम्र के
कारण प्रतिरक्षा प्रणाली में होने वाली कमजोरी के चलते यह फिर सक्रिय हो जाता है. कुछ मामलों में दवाएं भी इस वायरस को जागृत करने में अहम भूमिका निभाती हैं और व्यक्ति को श्ंिगल्ज की शिकायत हो जाती है.
शिंगल्ज का इलाज : अगर शिंगल्ज के लक्षण नजर आएं तो तुरंत डाक्टर के पास जाना चाहिए. इसे दवाओं से ठीक किया जा सकता है. इन दवाओं में एंटीवायरल मैडिसिन और दर्दनिवारक दवाएं शामिल होती हैं. लगभग 72 घंटे के अंदर एंटीवायरल दवाएं लेने से रेशेज जल्दी ठीक हो जाते हैं और दर्द भी कम हो जाता है. इसे अनदेखा करने पर रिकवरी में 3 माह से 1 साल तक का समय लग सकता है. एक्जिमा
यह ऐसा चर्मरोग है जिस में त्वचा लाल, शुष्क व पपड़ीदार हो जाती है. त्वचा की ऊपरी सतह पर नमी की कमी हो जाने के कारण रोगी को, खासतौर पर रात में, बहुत खुजली महसूस होती है. एक्जिमा के रैशेज आमतौर पर कुहनी, टखने के पास और घुटने के पीछे, जोड़ों के पास होते हैं. अगर इन का इलाज न किया जाए तो त्वचा खुरदरी होने लगती है. त्वचा के रंग में भी परिवर्तन आ जाता है. एक्जिमा के कारण : यदि मातापिता इस बीमारी से पीडि़त हों तो संतान में भी एक्जिमा होने की आशंका बढ़ जाती है. इस के अलावा किसी चीज की एलर्जी से भी एक्जिमा हो सकता है. आप के आहार में भी कुछ तत्त्व एक्जिमा को ट्रिगर कर सकते हैं. यदि आप के मातापिता को अस्थमा, फीवर जैसी कोई बीमारी है तब भी आप को एक्जिमा होना संभव है.
उपाय : हर दिन स्नान करने के बाद तथा सोने से पहले अपनी त्वचा को मौइश्चराइज करना न भूलें. गंभीर स्थिति में टौपिकल कोर्टिको स्टेराइड क्रीम का उपयोग करें. जिद्दी एक्जिमा के उपचार हेतु फोटोथेरैपी जैसी तकनीक अपनाई जाती है, जिस में यूवीबी लाइट से गंभीर सूजन का इलाज होता है. याद रखें : एक्जिमा भी त्वचा के कैंसर का लक्षण हो सकता है. त्वचा पर यदि 4 सप्ताह से अधिक समय तक धब्बे हों तो ये त्वचा के कैंसर का संकेत हो सकते हैं.
पित्ती
पित्ती (आर्टिकारिया) त्वचा रोग है जिस में शरीर पर खुजली वाले लाल चकत्ते निकल आते हैं. ये चकत्ते शरीर पर कुछ घंटों से ले कर कुछ हफ्ते तक रह सकते हैं. हलके पड़ने पर ये किसी नई जगह पर निकल आते हैं. पित्ती को आमतौर पर 2 भागों में बांटा जाता है. पहला, एक्यूट या अल्पकालिक जो कुछ समय के लिए रहती है और शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकती है. दूसरा, क्रोनिक या दीर्घकालिक पित्ती 6 हफ्ते से अधिक रहती है. पित्ती के कारण : पित्ती निकलने के बहुत से कारण हो सकते हैं लेकिन ये अधिकतर शरीर से निकलने वाले हिस्टामिन्स से प्रतिक्रिया होने के कारण होते हैं जो आप को किसी खाद्य पदार्थ, दवा या अन्य किसी चीज की एलर्जी के कारण रिलीज होते हैं. हालांकि पित्ती होने के ज्यादातर मामलों में वजह का पता नहीं चलता. इस के कारणों में वायरल संक्रमण तथा अंदरूनी बीमारियां भी मानी जाती हैं.
पित्ती का इलाज : पित्ती के लक्षणों को कम करने और उस की रोकथाम के लिए ओवर द काउंटर एंटीहिस्टमीन का सेवन करना चाहिए. यदि आप को दीर्घकालिक पित्ती की समस्या है तो डाक्टर आप को एंटीहिस्टमीन की स्ट्रौंग डोज तथा एंटीइनफ्लैमेटरी दवाओं की सलाह देते हैं.
रौसेसिया
यह एक त्वचा संबंधी रोग है जो चेहरे की त्वचा पर दिखाई देता है. चेहरे की रक्त नलिकाएं जब लंबे समय तक बड़ी हो कर उसी अवस्था में रहती हैं तो यह स्थिति रौसेसिया कहलाती है. इस की वजह से चेहरे की त्वचा पर लालिमा के साथ दर्द भी रहता है जो पिंपल की तरह दिखाई देते हैं. कई बार यह छोटे लाल दानों की तरह भी निकल आता है. रौसेसिया से पीडि़त व्यक्ति की नाक के पास की त्वचा मोटी हो जाती है जिस की वजह से नाक उभरी हुई दिखाई देने लगती है. रौसेसिया के कारण : एक्जिमा की ही तरह यदि मातापिता रौसेसिया से पीडि़त हों तो संतान में भी इस के होने की आशंका बढ़ जाती है. इस के अलावा सूरज की तेज किरणों के संपर्क में आने से भी यह रोग हो सकता है. कुछ दवाओं के गलत प्रभाव से भी रक्त नलियां आकार में बड़ी हो जाती हैं. आमतौर पर ये गुलाबी मुंहासे हलकी त्वचा के रंग वालों में 35 वर्ष की आयु में आरंभ होने लगते हैं और उम्र बढ़ने के साथ गंभीर रूप धारण कर लेते हैं.
रौसेसिया का इलाज : इस के इलाज के लिए कुछ ओरल एंटीबायोक्टिस व कुछ स्किन क्रीम वगैरह दी जाती हैं. छोटी रक्त वाहिकाओं से हुई त्वचा की लाली का सब से अच्छा उपचार लेजर द्वारा किया जा सकता है.
त्वचाशोथ या कौंटेक्ट डर्मेटाइटिस त्वचाशोथ या त्वचा की सूजन और एक्जिमा दोनों को त्वचा की एक ही तरह की समस्या माना जाता है, क्योंकि दोनों ही बीमारियों में जलन, सूजन, खुजली तथा त्वचा लाल होने जैसे लक्षण देखे जाते हैं. वास्तव में डर्मेटाइटिस एक्जिमा की तरह कोई गंभीर समस्या नहीं है. यह रोग दाने के रूप में केवल उन हिस्सों में होता है जो हिस्से वैसी चीजों के संपर्क में आते हैं जिन से त्वचा को एलर्जी होती है.
कारण : पौयजनस आईवी के पौधे, गहने, इत्र, फेसक्रीम या अन्य सौंदर्य उत्पादों से एलर्जी आदि त्वचाशोथ के मुख्य कारण हैं. इलाज : यदि रोगी को सूजन है और साथ में अन्य कोई सक्रमण है तो उस के लिए एंटीबायोटिक दवा की आवश्यकता होती है. एक्जिमा की भांति त्वचाशोथ भी त्वचा के कैंसर का लक्षण हो सकता है. इसलिए सही उपचार हेतु विशेषज्ञ डाक्टर से संपर्क करें.
दशकों से दुनिया को इस बात की जानकारी है कि जल पर लगातार जलवायु का, तथाकथित विकास का और जीवनशैली का संकट मंडरा रहा है. इस के बावजूद इस जानकारी व समझदारी का कोई सार्थक या सकारात्मक नतीजा नहीं निकल पा रहा है. दरअसल, हम सब जल बचाने, उस के प्रति संवेदनशील होने का उपदेश दूसरे को तो देते हैं लेकिन खुद को इस सब से परे समझते हैं. इसी होशियारी का यह नतीजा है कि सबकुछ जानने, समझने के बावजूद हर गुजरते दिन के साथ ही धरती का जल संकट गहराता जा रहा है.
घर में नईनई बहू आई थी, गांव में बरसात को छोड़ कर पूरे साल पानी की किल्लत रहती थी. अधेड़ सास बड़ी दूर से ढोढो कर पानी लाती, लेकिन बारबार कहने के बावजूद बहू पानी खर्चने में जरा भी नहीं हिचकचाती. सास ने बहुत समझाया, यहां की रीत बताई, पर बहू हर दूसरे दिन बालों में शैंपू करती, कपड़े साबुन, डिटर्जेंट पाउडर से धोती. पानी की टोकाटोकी को ले कर सास के साथ ताने से ले कर नोकझोंक और लड़ाई तक की नौबत आ गई. बहू ने भी जिद में अपनी आदत नहीं बदली. पानी पर कलह का पानी जब नाक से ऊपर चला गया तो एक दिन बहू ने थोड़े से पानी के साथ जहर खा लिया. बिहार के एक गांव की यह सच्ची घटना मीडिया में थोड़ी सी जगह पा सकी और घंटे दो घंटे की चर्चा, बस.
असल में पानी की बरबादी को ले कर हमारी नई कसबाई व शहरी जीवनशैली जिद्दी और आत्महंता प्रवृत्ति वाली है. ‘जल ही जीवन है,’ ‘जल है तो कल है,’ ‘कल के लिए आज बचाएं जल,’ जैसे न जाने कितने स्लोगन, नारों, जुमलों की बरसात रोज होती है, लेकिन हम हैं तो चिकने घड़े ही. नतीजा, पर उपदेश कुशल बहुतेरे. पानी की परवा करना हमारी आदत नहीं बन पाती.
टीवी पर उभरती वह तसवीर अंदर तक झकझोर देती है, एक आदमी जोहड़ के सडे़, मटमैले हरे पानी को पीने के लिए कटोरा भरता है. दूसरी तसवीर अरबों के खेल मेले आईपीएल के लिए बेतहाशा पानी बहा कर तैयार किए जा रहे क्रिकेट स्टेडियम और इस कृत्य के विरोध की है. ब्रेक में एक विज्ञापन दिखता है, जिस में लोग झमाझम बरसात के दौरान बालटी, बोतल तो क्या, छाते में भी पानी इकट्ठा कर रहे हैं. संदेश साफ है, जल बेशकीमती है. यह दुर्लभ होने वाला है. समय से पहले सचेत हों, इसे बचाएं.
हैरानी यह है कि यह सब देखते हुए भी बहुत से लोग नल को खुला छोड़ कर शेविंग कर रहे होते हैं या नल के बहते पानी के नीचे सब्जी धो रहे होते हैं. अगर वे किसी पानी वाले इलाके में रहते हैं तो यह सब देखते हुए भी उन्हें जल संकट का कोई एहसास नहीं होता. वे या तो अनजान बने रहते हैं जैसे यह सब किसी और ग्रह पर हो रहा है या फिर रस्मअदायगी वाले अफसोस के बाद वे सोच लेते हैं कि यह सबकुछ उन के साथ नहीं होने वाला.
इन में से बहुत से लोगों के सामने ही सरकारी नलों, प्याऊ, छबील, सार्वजनिक हैंडपंपों का विलोपीकरण हुआ है. बोतलबंद पानी बिकने लगा और आज इस का अरबों का व्यापार हो गया. गांव तक में वाटर कंटेनर बिकने लगे हैं. देश में बीते 4 दशकों में पानी की खपत चार गुना ज्यादा हो गई. आज एशिया के जो 27 शहर पानी की किल्लत से सब से ज्यादा ग्रस्त हैं उन में ऊपरी 4 नाम चेन्नई, दिल्ली, कोलकाता और मुंबई हैं.
हम हैं जिम्मेदार
अंधाधुंध पानी खर्चते हुए कभी हम ने सोचा कि पानी का परिदृश्य इस कदर क्यों बदला? कमी हमारी थी या पानी की? पानी के मामले में अमेरिका और चीन के बाद हमारा ही नंबर है. दुनिया का केवल 4 प्रतिशत ताजा जल अपने देश में है और संसार की 16 प्रतिशत से ज्यादा की आबादी यहीं रहती है, फिर भी हम जलधनाढ्य गिने जाते हैं. कारण, यहां के अनगिनत जलस्रोत, प्राचीन जल संस्कृति और पानी की स्वस्थ परंपरा है.
ऋ ग्वेद के अध्वर्यु सूक्त में, अध्वर्यु को राष्ट्र के योजनाकार के रूप में जिन 10 कर्तव्यों का निर्देश दिया गया है उन में दूसरा कर्तव्य वर्षाजल का संरक्षण है. देवताओं को जलदान के लिए रामेश्वरम से गंगोतरी तक की यात्रा, कांवड़ उठाने का कठिन प्रण, जगहजगह जलाभिषेक. पूजापाठ हो या शौच निबटान अथवा किसी भी तीजत्योहार में पानी का समुचित इस्तेमाल. नहानस्नान में समूचे संसार में हमारा कोई सानी नहीं.
पानी के मामले में एक तो हमारी जीवनशैली पहले ही खुलेहाथ वाली थी तिस पर हम ने पाश्चात्य जीवनशैली का अंधानुकरण कर लिया. बीते 2-3 दशकों से हम ने पानी की परवा करनी ही छोड़ दी है. बाजार ने धावा बोला तो हम उस के प्रवाह में बह गए. जल को प्रकृति का उपहार मानने वाले उसे बिकाऊ उत्पाद साबित करने वालों के सामने हार गए.
आज हम जरूरत से कई गुना ज्यादा कपड़े रखते हैं. धोबी जो एक तालाब में बरसों से हजारों कपड़े धो डालता था, हफ्ते में आता था, सप्ताहभर के कपड़े इकट्ठे धुलते थे. अब रोज कपड़े धोते हैं. कम पानी खर्चने वाले रीठेमजीठे का इस्तेमाल अब कहां? साबुन, डिटर्जेंट, वाशिंग पाउडर और मशीन, शैंपू पहले से चौगुना पानी खा जाते हैं. शौच और स्नान में हम पहले से दस गुना पानी बरबाद करने लगे हैं. शावर, फ्लश, बाथटब आम हो गए हैं.
तमाम मशीनों, उत्पादों, गैजेट्स का दखल बढ़ गया. हम पहले से कई गुना ज्यादा डीजलपैट्रोल फूंकने लगे हैं. बर्गर, चिकन, पास्ता और चिप्स जैसे ढेरों फास्टफूड खाने लगे हैं. देश में हर दिन 10 करोड़ से ज्यादा पानी की बोतलें बिकती हैं. कोल्डड्रिंक की 6 करोड़ बोतलें हम गटक जाते हैं बिना यह जाने कि कोल्डड्रिंक की एक केन तैयार करने में 20 लिटर पानी लगता है और ठंडा पेय पीने के बाद शरीर को लगभग 9 गुना अतिरिक्त पानी की आवश्यकता पड़ती है.
बरतन, फर्नीचर, साफसफाई के सरंजाम, कागज का अतिशय इस्तेमाल, ऊर्जा व्यय सबकुछ बढ़ा और इस ने परोक्ष तौर पर पानी की खपत पर असर डाला. विकास जीवन का अंग है पर इस की कीमत पानी से चुकाना हमें सस्ता लग रहा था, सो, हम इस के प्रति लापरवाह रहे. तब जबकि हम पानी के संतुलित उपयोग को बहुत पहले से जानते थे. रेगिस्तानी इलाकों में महज राख और रेत से जूठे बरतन साफ करते देखे जा सकते हैं. पानी की दिक्कत वाली जगहों पर लोग बरतन जूठा नहीं करते, न अंजुली से पानी पीते हैं बल्कि पानी सीधा मुंह में डालते हैं. एक लोटे से पूरा घर पानी पी लेता है. एक बरतन में सामूहिक भोजन करते हैं. जहां पानी सामान्य है, वहां 2 हाथों और जहां पानी भरपूर है, वहां 1 हाथ की अंजुली से पानी पीने की परंपरा है.
गांवों में कुएं समाप्तप्राय हैं और पानी के लिए हैं नल, हैंडपंप या फिर कोई मशीनी उपाय. शहरों में सार्वजनिक बंबे लुप्त हो चुके हैं. उत्तर प्रदेश के मेरठ जैसे शहर में 30 हजार से ज्यादा तालाब थे. हजारों तालाब वाले सभी शहरों में ये दहाई में भी नहीं बचे. नई जीवनशैली ने बाजार के साथ मिल कर इन्हें विकास से पाट डाला. गांवगांव में पक्के मकान बने और जहां चाहा वहां जमीन की छाती भेद कर भूजल का दोहन शुरू कर दिया. लोटे, बालटी, ढेंकली, रहट से निकलने वाला पानी अनवरत मोटी धार वाले पाइप से निकलने लगा.
पानी बिना अतिरिक्त श्रम के सुलभ हुआ तो अंधाधुंध दुरुपयोग शुरू हो गया, क्योंकि लोगों को कुएं से पानी निकालने के लिए मेहनत नहीं करनी थी, न सार्वजनिक जलस्रोत, बंबे, नल की सीमाएं थी. घरघर नल लगे तो इफरात से पानी खर्च होने लगा. अमेरिका में 1990 के बाद ऐसा ही हुआ था. वहां तब प्रति परिवार जल खपत औसतन 10 घनमीटर थी जो वर्ष 2000 तक 200 घनमीटर तक पहुंच गई. भारत में प्रतिव्यक्ति ताजा पानी की जो उपलब्धता 1955 में थी वह 1990 में घट कर आधी रह गई.
आबादी बढ़ने की मौजूदा रफ्तार को देखते हुए 2020 में पानी की उपलब्धता प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 40 लिटर से भी कम रह जाने का अनुमान है. देश में हर व्यक्ति को मौजूदा जीवनशैली में रोजमर्रा के लिए कम से कम 100 लिटर पानी चाहिए. हम कृषिप्रधान देश कहे जाते हैं और बाढ़सुखाड़ से मरने के बावजूद हम ने सिंचाई व्यवस्था के आधुनिकीकरण की कभी परवा नहीं की. हमारी कृषिदक्षता महज 35 फीसदी है जो विश्व की औसत 70 फीसदी की आधी है. इस के चलते हम कुल उपलब्ध पानी के आधे का उपयोग और उस पानी के आधे हिस्से को कच्ची नाली, वाष्पीकरण और दूसरे कुप्रबंधन में बरबाद कर देने पर कोई अफसोस नहीं करते.
कुल मिला कर सवाल यह है कि जन जागरूकता के लिए करोड़ों खर्च करने के बावजूद न पानी की बरबादी में कमी आ रही है न भूजल स्तर बढ़ रहा है. तमाम प्रचार और जल संकट की भयावह तसवीरें देखने के बाद, दुखभरी कहानियां सुनने के बावजूद हमारे कानों पर जूं तक नहीं रेंगती और योजनाओंअभियानों को आपेक्षिक सफलता नहीं मिलती तो
उस की एक ही वजह है कि हम ने जल को जीवन से नहीं जोड़ा है. पानी की किफायतदारी, जलबुद्धिमत्ता हम से अभी दूर है. हमारी नई जीवनशैली जल संकट की जननी है.
जब तक हम में यह समझने वाली जलजागृति नहीं आएगी और हम अपनी जीवनशैली में आपेक्षिक बदलाव कर उस पर अमल नहीं करते, जलसंग्रह और संरक्षण के सारे प्रयास बेमानी हैं. पानी के उपभोग में प्रभावी अंतर लाना कठिन नहीं है, जीवनशैली में कुछ छोटेमोटे बदलावों के साथ हम जल, ऊर्जा, धन और धरती बचा सकते हैं.
ऐसे बचा सकते हैं जीवन जल
– किचन में खाना बनाने के लिए जरूरत के हिसाब से कड़ाही या पैन चुनें, बड़े बरतन में अधिकतर जरूरत से ज्यादा पानी इस्तेमाल हो जाता है.
– फ्रिज से निकाली ठंडी चीजों को सामान्य तापमान पर लाने के लिए चलते नल का इस्तेमाल न करें, बल्कि किसी बरतन में पानी भर कर उस में रखें.
– हाथ से आइसक्यूब गिर जाए तो उसे डस्टबिन में नहीं, गमले में डालें
– चीजें कम पानी में उबालें, आलू वगैरह के लिए उन का बस डूब जाना ही बहुत है. उबले वाले पानी को ठंडा कर पौधों में डालें.
– फल, सब्जी चलते नल के नीचे रगड़ कर धोने के बजाय टब में पानी ले कर धोएं और दालचावल इत्यादि का धोवन गमले में डालें.
– बाथरूम में बाथटब से नहाना पानी की बरबादी है. इस्तेमाल ही करना है तो बाथटब को आधा भरें, शावर भी कम देर के लिए चलाएं, शावर ऐसा लगाएं जो कम पानी फेंके. बेहतर है बालटी और मग से नहाएं.
– कपड़े हर दिन न धोएं. वाशिंग मशीन तभी इस्तेमाल करें जब उस के लिए पर्याप्त कपड़े इकट्ठे हों. मशीन में वाशिंग पाउडर कम डालें.
– रंगीन कपड़े ठंडे पानी से धोएं. बेवजह पानी गरम करना वाटर फुटप्रिंट बढ़ा देगा.
– ब्रश, शेविंग, हाथ धोने से पहले साबुन लगाते समय नल बंद रखें. इस दौरान 15 लिटर पानी बरबाद हो सकता है.
– फ्लश के सिस्टम टैंक में पानीभरी बड़ी बोतल डाल दें.
– लौन में पौधों को पानी अलसुबह या देर शाम को दें. अपने बगीचे में स्थानीय पौधे लगाएं, ये कम पानी लेते हैं.
– पौधों के थाले में थोड़ी सड़ीगली सब्जियां बिखरा दें या सूखी पत्तियों से ढक दें. नमी देर तक बनी रहेगी और पानी भी कम लगेगा.
– कार बालटी, मग, स्पंज से धोएं. पाइप प्रयोग करें तो उस में पिस्टल नोजेल लगाएं ताकि पानी के प्रवाह को रोका और शुरू किया जा सके.
– शाकाहारी बनें, स्थानीय बाजार से ही फलसब्जीअनाज खरीदें. जितनी दूर से ये सब आएगा उतना ही वाटर फुटप्रिंट बढ़ेगा.
– पानी का बिल हर महीने चैक करें, खर्च की समीक्षा करें. रात में मीटर को देखें लीकेज तो नहीं हो रहा. रिसाव तुरंत ठीक कराएं. अगर एक बूंद पानी प्रति सैकंड टपका तो हर महीने 800 लिटर से ज्यादा पानी व्यर्थ हो सकता है.
जून की दहकती दोपहर का दहला देने वाला दृश्य था. बीहड़ सरीखे सघन जंगल के बीच बने विशाल मंदिर के बाहर लंबेचौड़े दालान में एकत्र सैकड़ों स्त्रीपुरुषों की भीड़ टकटकी लगाए उस लोमहर्षक मंजर को देख रही थी. सुर्ख अंगारों की तरह दहकती आंखों और शराब के नशे में धुत अघोरी जैसे लगने वाले 2 भोपे (ओझा) बेरहमी के साथ 4 युवतियों की जूतों से पिटाई कर रहे थे.
अंगारे सी बरसती धूप की चुभन और दर्द से बेहाल युवतियां चीखतीचिल्लाती तपते आंगन में लोटपोट हुई जा रही थीं. धूप से बचने के लिए तमाशाई आंगन के ओसारों की छाया में सरक आए थे. जिस निर्विकार भाव से लोग इस जल्लादी जुल्म का नजारा देख रहे थे, उस से लगता था कि यह सब उन के लिए नया नहीं था.
लगभग एक घंटे तक अनवरत चलने वाली इस दरिंदगी से युवतियां बुरी तरह लस्तपस्त और निढाल हो चुकी थीं. उन पर गुर्राते और गंदी गालियों की बौछार करते भोपे उन्हें बालों से घसीटते हुए फिर से खड़ा करने की मशक्कत में जुट गए.
नारकीय यातना का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा, अब उन्हें पीठ के बल रेंगतेघिसटते मंदिर की तपती सुलगती 200 सीढि़यां तय करनी थी.
जल्लादी जुल्म ढाने वाले आतताइयों को भी मात करने वाले इन दरिंदों की चाबुक सरीखी फटकार के आगे बेबस युवतियों ने यह काम भी किया. तब तक उन के कपड़े तारतार हो चुके थे, पीठ और कोहनियां छिलने के साथ बुरी तरह लहूलुहान हो गई थीं. हांफती, कराहती, बिलखती युवतियों पर कहर अभी थमा नहीं था.
यातना का दुष्चक्र उन्हें मारे जाने वाले जूतों के साथ आगे बढ़ता रहा. पांव उठाने तक में असमर्थ इन युवतियों को जूते सिर पर रख कर और मुंह में दबा कर 2 किलोमीटर नंगे पांव चलते देखना तो और भी भयावह था. और इस से भी कहीं ज्यादा दर्दनाक और दयनीय दृश्य था, उन जूतों में भर कर पीया जाने वाला जलकुंड का गंदा पानी.
आतंक और भय से थर्राई हुई युवतियों को जूतों में भर कर पानी पिलाया जाने वाला पानी कैसा था, इस की कल्पना मात्र ही विचलित करने वाली थी. बांक्याराणी मंदिर परिसर में ही बना है हनुमान मंदिर. इस के निकट बने जलकुंड में दिन भर में लगभग 300 से ज्यादा महिलाएं स्नान करती हैं.
समझा जा सकता है कि कुंड का पानी कितना मैला रहा होगा. इसी गंदे पानी को युवतियों को जूतों में भर कर पीने को बाध्य किया गया और वह भी एक बार नहीं लगातार 7 बार.
मंदिर की जिन सीढि़यों पर महिलाओं को पीठ के बल रेंग कर उतरना होता है, वह सफेद संगमरमर की है, जो गर्मियों में भट्ठी की तरह सुलगती हैं. नतीजतन औरतों की पीठ न केवल छिल जाती है, बल्कि उस पर फफोले भी पड़ जाते हैं.
जुल्म की इंतहा तो तब होती है, जब सीढि़यां उतर चुकने के बाद भोपा उन्हें अपने सामने ज्वाला मंदिर में बिठाता है और लहूलुहान और निढाल युवतियों पर एक बार फिर जूते बरसाता है. पीड़ा से रोतीबिलखती युवतियों की दहला देने वाली चीखपुकार जब वहां मौजूद उन के परिजन ही नहीं सुनते तो और कौन सुनेगा?
भोपों के रूप में अंधविश्वास का क्रूर चेहरा
राजस्थान में अंधविश्वास का यह वीभत्स और क्रूर चेहरा सिर्फ भीलवाड़ा जिले के बांक्याराणी मंदिर का ही नहीं है, बल्कि राजसमंद, बांसवाड़ा और चित्तौड़गढ़ भी महिलाओं को डायन घोषित कर के उन के कथित निवारण के नाम पर असहनीय अत्याचार के अड्डे बन गए हैं.
अंधविश्वास की वजह से किसी को डायन बता कर भयानक यातनाएं देना और मार डालना सिद्ध करता है कि राजस्थान के पूर्वोत्तर समाज का एक बड़ा हिस्सा आदिम युग में जी रहा है.
इस सूबे का आदिवासी समुदाय आज भी आधुनिकता और बर्बरता के बीच असहज अस्तित्व में फंसा हुआ है. आदिवासी बहुल इलाकों में स्त्रियों को डायन घोषित कर उन्हें प्रताडि़त करना, यहां तक कि मार डालना सदियों पुराना चलन है.
प्रेत निवारण की परंपरा का मूल स्वरूप क्या था और उस की शुरुआत कैसे हुई? यह जानने के लिए हमें राजस्थान के आदिवासी बहुल बांसवाड़ा के गांवों में अपने दिवंगत पूर्वजों के नाम पर पत्थर गाड़ने की परंपरा को जानना होगा, जिसे ‘चीरा’ कहा जाता है. गाजेबाजे के साथ गाड़े गए ‘चीरे’ पर लोकदेवता की तसवीर उकेरी जाती है और विधिवत परिवार के पूर्वज का नाम अंकित किया जाता है.
ये चीरे आमतौर पर खुली जगहों में होते हैं, लेकिन कहींकहीं टापरों में स्थापित किए जाते हैं. चीरे मृत स्त्रियों के नाम पर भी गाड़े जाते हैं, लेकिन बहुत कम. इन को ‘मातोर’ कह कर पूजा जाता है. ऐसे कई शिलाखंडों पर तो साल, नाम आदि भी खुदे होते हैं. जिस गांव में चीरा स्थापित किया जाना होता है, उस स्थान पर गांव की कुंवारी कन्या दूध, जल आदि से ‘बावजी’ को स्नान कराती है और कुमकुम आदि से पूजा करती है.
संभवत: ‘बावजी’ शब्द लोक देवता के लिए इस्तेमाल किया जाता है. गांव के बाहर निर्धारित स्थल ‘गोदरा’, जहां चीरे स्थापित किए जाने होते हैं, उस जगह के जानकार को खत्री कहा जाता है. खत्री चीरे के भूतवंश की पूरी जानकारी कवितामय लहजे में सुनाता है. शिलाखंडों में कथित रूप से रह रही आत्मा के आह्वान की अलग प्रक्रिया है.
खत्री ही मृतात्माओं से संवाद स्थापित करता है. उस समय खत्री के हावभाव और बोली असामान्य हो जाती है, फिर शुरू होता है भविष्य कथन और कष्ट निवारण का क्रम. मृतात्मा, जिसे खाखरिया देव माना जाता है, खत्री उस का इन शब्दों के साथ आह्वान करता है, ‘कूंकड़ो बोल्यो, नेकालू साल्यो, कालू देवती, सोनावाला ने भला, वैसे हैं भाई कारूदेव, जोड़ी रा हुंकार है…’
इस अवसर पर निकट बैठे भोपों द्वारा कांसे की थाली और ढोलमजीरों से विशेष तरह का संगीत पैदा किया जाता है, जिस की सम्मिलित ध्वनि वातावरण को अजीब माहौल में बदल देती है. आदिवासियों की प्रचलित परंपराओं को समझें तो इन देवरों के भोपे अपनी जानकारी के मुताबिक लोगों की समस्याओं के निवारण के लिए विशेष गणित का सहारा लेते हैं. यही है आदिवासियों की अपने पुरखों को ‘देव स्वरूप’ में सम्मानित करने की परंपरा.
लेकिन अब ये सारी परंपराएं नष्ट हो चुकी हैं और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने भोपों का रूप धारण कर नशे के उन्माद में लूटखसोट और यौनाचार को अपना कारोबार बना लिया है. अन्यथा आदिवासियों में चीरा प्रथा व्याधियों का उपचार करने, समस्याओं का निवारण करने और पूर्वजों की मृत आत्माओं का आह्वान करने की है.
बावजी आदिवासियों के लोकदेवता को कहा जाता है. कुछ अरसा पहले बांसवाड़ा के पड़ारिया गांव में तैनात एक शिक्षक ने चीरे की परंपरा को वृक्षारोपण से जोड़ दिया था, लेकिन यह सब तभी तक चला, जब तक शिक्षक का दूसरी जगह स्थानांतरण नहीं हो गया. चीरों के निकट काफी संख्या में दरख्त बन चुके फलदार पेड़ इस बात की तसदीक करते हैं. दूसरी ओर सरकार ने यहां कुछ भी संवारने की पहल तक नहीं की.
डायन के नाम पर मौत का नंगा नाच
आदिवासी जिलों में अब तक 105 स्त्रियों को डायन का बाना पहना कर अभिशप्त घोषित किया जा चुका है, जबकि 8 महिलाओं की पीटपीट कर हत्या की जा चुकी है. साथ ही 2 दरजन महिलाओं को मारपीट कर गांवों से निकाला जा चुका है.
स्वस्थ महिलाओं को डायन बनाने के ये आंकड़े पिछले 4 साल के हैं, लेकिन क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े 4 तक भी नहीं पहुंचते. काला जादू के नाम पर भोपे आज भी आदिवासी इलाकों में अपना सिक्का जमाए हुए हैं. आस्था यहां अकसर बदला लेने का हथियार बन चुकी है.
प्रेतों से मुक्ति पाने की कहानी जहां से शुरू होती है, उसे देखना ही दहशत पैदा करता है. पीडि़त महिलाओं के परिजन ही मंदिर पहुंच कर उन्हें भोपों के हवाले कर देते हैं. भोपा इन्हें उलटे पांवों चला कर मंदिर परिसर में ले आता है. महिला को पीठ मंदिर की तरफ रखनी होती है तथा हथेलियों को प्रणाम की मुद्रा में रखना होता है.
महिला को सुलगती जमीन पर नंगे पांव चलना होता है. भोपों के बारे में कहा जाता है कि निर्दयता और दुर्दांतता में इन का कोई सानी नहीं होता. अपने जल्लादी काम में ये प्रोफेशनल की तरह पारंगत होते हैं. इन की फीस कोई निश्चित नहीं होती, हालांकि 5 सौ से हजार रुपए में ये अपनी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं. इन भोपों को नकदी के साथ दारू भी देनी होती है, अपना काम ये नशे में धुत्त हो कर ही करते हैं. भोपों के कारोबार में मर्द और औरतें दोनों शामिल होते हैं.
बांक्याराणी मंदिर एक ट्रस्ट के अधीन है, लेकिन इस वीभत्स कारोबार में ट्रस्ट के अध्यक्ष की कोई भूमिका नहीं होती. अलबत्ता ट्रस्ट के अध्यक्ष नारायणलाल गुर्जर की मजबूरी चौंकाती है. उन का कहना है, ‘भोपों की मनमानी मंदिर ट्रस्ट के लिए मुसीबत बनी हुई है.’
नारायणलाल कहते हैं, ‘महिलाओं को इतनी दारूण यातना देना पूरी तरह अमानवीय और शैतानी कृत्य है. ट्रस्ट पूरी तरह इस के खिलाफ है. लेकिन फिर भी ये लोग डराधमका कर मनमानी पर उतारू हैं.’
बांक्याराणी मंदिर में प्रेत बाधा निवरण के नाम पर स्त्रियों के भयावह उत्पीड़न की खबरें मीडिया में सुर्खियां बनीं तो राजस्थान महिला आयोग की अध्यक्ष सुमन शर्मा बांक्याराणी मंदिर पहुंचीं भी, लेकिन पुलिस अधिकारियों को फटकार लगाने के अलावा वह कुछ नहीं कर सकीं. भोपों की भयावह कारस्तानियों का खुलासा होने पर हाईकोर्ट ने संज्ञान ले कर पुलिस प्रशासन को फटकार लगाते हुए जवाब मांगा कि बताएं कितने भोपों पर काररवाई की गई.
हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ के न्यायाधीश गोपालकृष्ण व्यास ने इस बात पर हैरानी जताई कि महिलाओं को कोई डायन कैसे बता सकता है? कानून होने के बाद भी इस तरह के मामले क्यों हो रहे हैं?
विद्वान न्यायाधीश ने तो यहां तक कहा, ‘भोपे किसी महिला को डायन न बना पाएं और उन्हें प्रताडि़त न कर सकें, इस के लिए जागरुकता अभियान चलाया जाए.’ लेकिन हाईकोर्ट की इस हिदायत पर अमल नहीं हुआ.
नतीजतन भोपों के हौसले आज भी बुलंद हैं और महिलाएं आज भी जूते मुंह में दबाए उत्पीड़न का दर्द सहने को मजबूर हैं. घिनौनी आस्था के मल कुंड में डूबे लोगों का रूझान तब बुरी तरह चौंकाता है, जब नवरात्रों में भोपों के दरबार में लोगों की भीड़ का सैलाब उमड़ने लगता है.
हाईकोर्ट की सख्ती और पुलिस की दबिश का भोपों की मनमानी पर कोई असर तो क्या होता, इस के उलट वे और बेलगाम हो गए. अब तक प्रदेश के आदिवासी इलाकों में ही अंधविश्वास की परत मोटी करने वाले इन भोपों को फिल्म ‘पद्मावत’ विवाद से उफान में आए चेतन मृत्यु प्रकरण ने शहरी इलाकों में घुसपैठ करने का अवसर दे दिया.
खबरिया चैनलों ने टीवी स्क्रीन पर जो फुटेज दिखाए, उस का वर्णन करें तो नशे की तरंग और उन्माद में डूबे उन्मत्त भोपे पूरे दबदबे के साथ लोगों को डरा रहे थे और सूबे पर अंधविश्वास की काली चादर फैलाने में जुटे थे. तांत्रिकों का उत्पात और हवा में तलवारें भांजते हुए उन का डरावना अट्टहास. बदहवास लोग खबरिया चैनलों पर चकित भाव से देख रहे थे. इशारा साफ था कि भोपों को चेतन की घटना ने मौत का नाच दिखाने का अवसर दे दिया था.
भोपे अपना उन्मादी चेहरा तब दिखा रहे थे, जब तत्कालीन पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह यह कह कर हटे ही थे कि हम ने भोपों के गिर्द शिकंजा सख्त कर दिया है. लेकिन कथित तांत्रिक चेतन के आत्मघात की घटना पर उन्मत्त भोपों ने भयाक्रांत करने वाली उछलकूद मचा कर इस बात को हवा में उड़ा दिया.
सवाल है कि भीलवाड़ा जिले के गांव निंबाहेड़ा जाटान की महिला भोपी झूमरी जीभ लपलपाते हुए कैसे तलवार चमकाने का दुस्साहस कर रही थी? सिगरेट के धुआंधार कश लगाती हुई झूमरी अपने आप को 9 देवियों का अवतार बता रही थी. कांता भोपी तो निरंतर भाला घुमाते हुए अपना दरबार लगाए हुए थी. जाहिर है कि कानून इन के ठेंगे पर था.\

आतंक का गहराता साया
डायन बता कर उत्पीड़न की ज्यादातर घटनाएं भीलवाड़ा और राजसमंद जिलों में हुई हैं. भीलवाड़ा के भोली गांव के दबंगों की बेटी बीमार हुई तो रामकन्या को डायन घोषित कर दिया गया. लगभग एक महीने तक दबंगों की कैद में रहने के बाद बमुश्किल छुड़ाई गई रामकन्या को 6×4 फीट की अंधेरी कोठरी में बंद कर के रखा गया था. गांव के दबंग जाट शिवराज की 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी पूजा बीमार हुई तो भोपे के कहने पर नजला रामकन्या पर गिरा.
भोपे का कहना था, ‘इसे डायन खा रही है.’ भोपे की बात पर शिवराज का शक रामकन्या पर गया, जिस का घर पूजा के स्कूल के पास ही था. नतीजतन रामकन्या को डायन करार दे दिया गया.
जिस बदतर हालत में रामकन्या को दबंगों की कैद से छुड़ाया गया, उसे देख कर डाक्टर का कहना था कि ये जिंदा कैसे बच गई? इस की हालत तो बहुत खराब है.
भीलवाड़ा में महिलाओं की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां 20 साल में डायन प्रताड़ना के 87 मामले आ चुके हैं और इन में एक दरजन से ज्यादा महिलाओं की मौत हो चुकी है. तंत्रमंत्र की ओट में इन भोपों की व्यभिचारी मानसिकता को समझें तो चित्तौड़गढ़ जिले के पुरोली गांव का बाबा सिराजुद्दीन महिलाओं के शरीर से डायन निकालने के करतबी तरीकों में निर्लज्जता के साथ उन के प्राइवेट पार्ट्स को टटोलता है.
भीलवाड़ा जिले के भुवास गांव के भोपा देवकिशन की दरिंदगी तो देखने वालों के शरीर में सिहरन पैदा कर देती है. यह भोपा महिलाओं की पीठ पर पूरी निर्ममता से कोड़े बरसाता है और देखने वाले उफ्फ भी नहीं करते.
भीलवाड़ा जिले की सुहाणा तहसील के आगरपुरा गांव की विधवा महिला रामगणी के पति और 2 बेटों की मौत के बाद उस की पुश्तैनी जमीन हथियाने के लिए पड़ोसियों ने रामगणी समेत परिवार की सभी महिलाओं को डायन घोषित कर दिया था.

कितने ही मामले संपत्ति के लिए
राजसमंद जिले के रणका गांव के दबंग परिवार में एक मौत क्या हुई, डोलीबाई को डायन बता कर उसे जगहजगह गरम सलाखों से दागा गया. राजसमंद के थाली का तलागांव की केशीबाई को डायन बता नंगा कर के गधे पर बिठा कर पूरे गांव में घुमाया गया. दबंगों की नजर उस की संपत्ति पर थी.
भीलवाड़ा जिले के बालवास गांव की नंदू देवी का पूरा परिवार पिछले साढ़े 4 साल से गांव के बाहर रहने को मजबूर है. पड़ोसी डालू का बेटा क्या बीमार हुआ, भोपे ने इस का इलजाम नंदू देवी पर डाल दिया. इस के बाद तो पूरे गांव ने मिल कर उसे पीटा और गांव से बाहर कर दिया. नंदू देवी गांव आने वाले हर अजनबी से पूछती है, ‘मैं डायन होती तो क्याआज मेरा पूरा परिवार जीवित रहता?’
भीलवाड़ा की करेड़ा तहसील के ऊदलपुरा गांव की गीता बलाई की जिंदगी उसी के परिजनों ने छीन ली. पति के मंदबुद्धि होने के कारण घर और खेती का सारा काम गीता ही संभाल रही थी, जो उस की जेठानी को बरदाश्त नहीं हुआ.
गीता पर डायन होने का आरोप लगा कर जेठानी उसे घनोप माता मंदिर ले गई, जहां नवरात्रों में उसे 11 दिनों तक भूखाप्यासा रखा गया. बाद में गीता जब कुएं से पानी निकाल रही थी तो जेठानी ने उसे धक्का दे दिया. कुएं में एक पेड़ पर गीता का शव 10 दिनों तक लटका रहा.
चाहे भोपा हो या भोपी, शराब के नशे में धुत्त ये डरावने चेहरे डायन निकालने के नाम पर पूरी हैवानियत पर उतारू रहते हैं. भोपों के ठौरठिकानों को अंधविश्वास की अदालतों का नाम दिया जाए तो गलत नहीं होगा.
अंधविश्वास की परत दर परत दबे इन आदिवासी इलाकों में यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि आखिर महिलाएं ही डायन क्यों बनती हैं? और ऐसी कौन सी वजह होती है कि महिलाओं को सामान्य जीवनयापन करतेकरते एकाएक डायन करार दे दिया जाता है? सूत्र बताते हैं कि डायन प्रताड़ना के अधिकांश मामलों में संपत्ति और जमीन हड़पने के लिए उन के नातेरिश्तेदार ही ऐसी साजिश रचते हैं. कई मामलों में लोगों ने अदावत और रंजिश के चलते महिलाओं को डायन करार दे दिया.
अलबत्ता यह एक कड़वी सच्चाई यह है कि डायन बनने का नजला अधिकांशत: उन्हीं महिलाओं पर गिरता है, जो गरीब, निराश्रित या दलित वर्ग से होती हैं. स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों इन आदिवासी इलाकों में अंधविश्वास का अंधेरा इतना घना हो गया है कि डायन से निजात पाने के लिए आने वाली महिलाओं की कतार नहीं थमती और न ही उन के परिजन उन्हें दहशत के तंदूर में धकेलने से बाज आते हैं?
एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि कुछ मामलों में तो डायन बता कर की गई हत्याएं भूमाफिया का काम है. बेइंतहा दर्द की ऐसी ढेरों अंतहीन कथाएं हैं, जिन में भोपों का कहर टूटा और सामान्य जीवनयापन करने वाली औरतों को यातनाएं भुगतने के लिए छोड़ दिया गया. वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीचंद पंत कहते हैं, ‘इन घटनाओं से अगर हमारी नसें नहीं चटखीं और दिल बेचैन नहीं हुआ तो मानवीय रिश्तों की बंदिशें कैसे बच पाएंगी?’
आमतौर पर यह माना जाता है कि ससुराल में बहू पर ही अत्याचार होता है. यह अत्याचार कभी ससुर करता है कभी सास. लखनऊ के माल थाना क्षेत्र के नबीपनाह गांव की रहने वाली बहू पर उसकी ससुराल वालों ने कोई अत्याचार नहीं किया बल्कि खुद उसने ही करोडों की जायदाद के लालच में अपने ससुर की हत्या चचेरे देवर और उसके दोस्त के साथ मिलकर कर दी और हत्या के आरोप में अपने पति और सगे देवर को फंसाने की कोशिश की, पर अपराध छिपाये नही छिपता और बहू को अपने डेढ साल के बच्चे के साथ जेल जाना पड़ा.
नबी पनाह गांव में मुन्ना सिंह अपने दो बेटो संजय और रणविजय सिंह के साथ रहते थे. 60 साल के मुन्ना सिंह की आम कह बाग और दूसरी जायदाद थी. जिसकी कीमत करोडो में थी. मुन्ना के बडे बेटे संजय की शादी रायबरेली जिले की रहने वाली सुशीला के साथ 5 साल पहले हुई थी.
सुशीला के 2 बच्चे 4 साल की बडी लडकी और डेढ साल का बेटा था. सुशीला पूरे घर पर कब्जा जमाना चाहती थी. इस कारण उसने अपने सगे देवर रणविजय से संबंध बना लिये. जिससे वह अपनी शादी न करे. सुशील को डर था कि देवर की शादी के बाद उसकी पत्नी और बच्चों का भी जायदाद में हक लगेगा. यह बात जब मुन्ना सिह को पता चली तो वह अपने छोटे बेटे की शादी कराने का प्रयास करने लगे. सुशीला को जायदाद की चिन्ता थी. वह जानती थी कि देवर रणविजय ससुर को राह से हटाने में उसकी मदद नहीं करेगा.
तब उसने अपने चचेरे देवर शिवम को भी अपने संबंधों से जाल में फंसा लिया. जब शिवम पूरी तरह से उसके काबू में आ गया तो उसने ससुर मुन्ना सिंह की हत्या की योजना पर काम करने के लिये कहा. शिवम जब इसके लिये तैयार नहीं हुआ तो सुशीला ने शिवम को बदनाम करने का डर दिखाया और बात मान लेने पर 20 हजार रूपये देने का लालच भी दिया. डर और लालच में शिवम सुशीला का साथ देने को तैयार हो गया.
12 जून की रात सुशीला के सुसर बुजुर्ग किसान मुन्ना सिंह चैहान आम की फसल बेचकर अपने घर आये. इसके बाद खाना खाकर आम की बाग में सोने के लिये चले गये. वह अपने पैसे भी हमेशा अपने साथ ही रखते थे. सुशीला ने शिवम को फोन गांव के बाहर बुला लिया. शिवम अपने साथ राघवेन्द्र को भी ले आया था. तीनों एक जगह मिले और फिर मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली. मुन्ना सिंह उस समय बाग में सो रहे थे. दबे पांव पहुंच कर तीनो ने उनको दबोचने के पहले चेहरे पर कंबल ड़ाल दिया. सुशीला ने उनके पांव पकड लिया और शिवम,राघवेन्द्र ने उनको काबू में किया. जान बचाने के संघर्ष में मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गये. वही पर दोनो ने गमझे से गला दबा कर उनकी हत्या कर दी.
मुन्ना सिंह की जेब में 9 हजार 2 सौ रूपये मिले. शिवम ने 45 सौ रूपये राघवेन्द्र को दे दिये. सुशीला ने आलमारी और बक्से की चाबी ले ली. सबलोग अपने घर चले आये. सुबह पूरे गांव मे मुन्ना सिह की हत्या की खबर फैल गई. मुन्ना सिंह के बेटे संजय और रणविजय ने हत्या का मुकदमा माल थाने में दर्ज कराया. एसओ माल विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की. पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. मुन्ना सिंह की बहु सुशीला बारबार पुलिस को यह समझाने की कोशिश में थी कि ससुर मुन्ना के संबंध अपने बेटो से अच्छे नहीं थे. पुलिस ने जब मुन्ना सिंह के दोनो बेटो संजय और रणविजय से पूछताछ शुरू की तो दोनो बेकसूर नजर आये. इस बीच गांव में यह पता चला कि मुन्ना सिंह की बहू सुशीला के देवर से संबंध है. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ शुरू की तो उसकी कुछ हरकते संदेह प्रकट करने लगी.
पुलिस ने सुशीला के मोबाइल की काल डिटेल देखनी शुरू की तो उनको पता चला कि सुशीला ने शिवम से देर रात तक उस दिन बात की थी. पुलिस ने शिवम के फोन को देखा तो उसमें राघवेन्द्र का फोन मिला. इसके बाद पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला से सबसे पहले अलग अलग बातचीत शुरू की. सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उसके देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था. सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे तो वह अकेली पूरे जायदाद की मालकिन बन जायेगी. पर पुलिस को सच का पता चल चुका था. पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला तीनो को आमने सामने बैठाया.तो सबने अपना जुर्म कबूल कर लिया.
14 जून को माल पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला को मजिस्ट्रेट के समाने पेश किया. वहां से तीनो को जेल भेज दिया गया. सुशीला अपने साथ डेढ साल के बेटे को भी जेल ले गई. उसकी 4 साल की बेटी को पिता संजय और चाचा रणविजय ने अपने पास रख लिया. जेल जाते वक्त भी सुशीला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं था. वह बारबार शिवम और राघवेंद्र पर इस बात से नाराज हो रही थी कि उन लोगों ने यह क्यों बताया कि मारने के समय उसने ससुर मुन्ना सिंह के पैर पकड रखे थे.
धीरेधीरे ही सही कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी मंजे हुए नेता बनते जा रहे हैं. इस में उन की सियासी काबिलीयत का कितना योगदान है, इस पर बात करना थोड़ी जल्दबाजी होगी, लेकिन जब से हालिया केंद्र सरकार के 2 सियासी दांवों नोटबंदी और जीएसटी ने बैकफायर किया है, तब से वे बड़े विपक्षी नेता के रूप में बड़ी तेजी से उभरे हैं.
यह सब हुआ है गुजरात के विधानसभा चुनावों की वजह से जहां वर्तमान सरकार से नाराज जनता सड़कों व गलियों में उतर कर केंद्र सरकार तक की चूलें हिला रही है.
राहुल गांधी ने जनता की इस नब्ज को सही पकड़ा है. बेरोजगारी के मुद्दे पर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर हमला करते हुए कहा, ‘‘चीन में हर रोज 50000 नौकरियां पैदा होती हैं और भारत में केवल 450. ‘मेक इन इंडिया’ के बावजूद ये हालात हैं. किसान और गरीब को पानी नहीं मिलता, पूरा पानी चंद अमीरों को दिया जा रहा है.’’

एसोसिएशन फौर डैमोक्रेटिक रिफौर्म्स के एक सर्वे के मुताबिक गुजरात के वोटरों ने रोजगार, सार्वजनिक परिवहन सेवा, महिला सशक्तीकरण और सुरक्षा को ऊपर रखा है.
गांवदेहात के वोटरों ने भी रोजगार, फसलों की सही कीमत, खेती के लिए बिजली और सिंचाई सुविधा को बेहतर करने की मांग रखी.
केवल गुजरात की बात की जाए तो इस बार पाटीदार आरक्षण का मुद्दा बहुत बड़ा मुद्दा बन कर उभरा है. हार्दिक पटेल समेत पाटीदार समाज के कई नेता भारतीय जनता पार्टी से खासा नाराज हैं.
लेकिन राहुल गांधी ने गुजरात में नोटबंदी और जीएसटी के नुकसान को ले कर उन मुद्दों को हवा दी जो ज्यादातर जनता के गले की फांस बन चुके हैं.
इस के अलावा राहुल गांधी यह भी साबित करना चाहते हैं कि कांग्रेस उन वंचितों के साथ खड़ी है, जिसे ‘गुजरात मौडल’ की तथाकथित कामयाबी के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ है. लेकिन इस बार गुजरात चुनावी घमासान के दौरान कुछ खास भी हुआ है, जो है जनता की एकजुटता.
केंद्र सरकार की तानाशाही नीतियों के चलते एक बात जो सामने आई है वह यह है कि जनता सरकारों के खुद पर थोपे गए मुद्दों से परेशान हो गई है. उसे मंदिरमसजिद, हिंदूमुसलिम, गौरक्षा, पाकिस्तान, कश्मीर वगैरह से कोई मतलब नहीं है, बल्कि वह तो केंद्र सरकार के ऊलजलूल फैसलों नोटबंदी और जीएसटी के कहर से एकजुट हो कर तिलमिलाई सी अपने सवालों के जवाब नरेंद्र मोदी और उन के सिपहसालारों से मांग रही है. कम से कम राहुल गांधी, हार्दिक पटेल आदि की सभाओं से तो ऐसा लगा.
पहले नोटबंदी पर बात करते हैं. भारत के 500 और 1000 रुपए के नोटों को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को रात के 8 बजे अचानक चलन में नहीं रहने का ऐलान किया था. मीडिया ने जनता को समझाने के लिए इसे आसान भाषा में ‘नोटबंदी’ शब्द दिया था.
इस नोटबंदी का मकसद न केवल काले धन पर काबू पाना था, बल्कि देशभर में चल रहे जाली नोटों से छुटकारा पाना भी था. लेकिन क्या नोटबंदी से सरकार के ये दोनों मकसद पूरे हो पाए
नोटबंदी होते ही जनता में अफरातफरी मच गई. बैंकों, डाकखानों के आगे नोट बदलवाने की लंबीलंबी लाइनें लग गईं. घंटों सड़कों पर खड़े रहने के बावजूद नोट बदलने की कोई गारंटी नहीं होती थी.
इतना ही नहीं, 18 नवंबर, 2016 को कारोबार चलाने के लिए पैसे नहीं होने की बात कहते हुए मणिपुर राज्य में अखबारों ने अपने दफ्तर बंद कर दिए थे.
इस सब के बावजूद भक्तों ने नरेंद्र मोदी के इस कड़े फैसले की तारीफ की थी, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि कुछ दिनों की परेशानी के बाद देश में रामराज्य आ जाएगा.
नोटबंदी के जरीए सरकार को भी पूरी उम्मीद थी कि नोटबंदी से बैंकों में जो पैसा आएगा वह सफेद होगा और जो बचा रहेगा यानी जमा न होगा उसे काला धन मान लिया जाएगा.
लेकिन ऐसा न हो पाया. सब से बड़ा नुकसान लोगों को लेनदेन के रूप में देखने को मिला. छोटेबड़े कारोबारी इस वजह से किसी तरह का लेनदेन नहीं कर पाए. जो कारोबारी नकद पर कारोबार करते थे, जब वे बेरोजगार हो गए, तो उन के यहां काम करने वाले लोग भी काम से हाथ धो बैठे.
यही हाल किसानों का भी हुआ. वे तो सरकार के इस फैसले के खिलाफ धरनेप्रदर्शन करते नजर आए. सरकार के सामने जनता द्वारा पूछा गया लाख टके का सवाल यह था कि नोटबंदी के एक साल बाद भी क्या काला धन वापस लौटा बैंकों में कितना पैसा आया सरकार ऐसे सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं देना चाह रही और इस संबंध में ठोस आंकड़े नहीं दिखा रही है.
इस का नतीजा यह हुआ कि सभी विपक्षी दल पूरी एकजुटता से सरकार के नोटबंदी के फैसले को नाकाम और देश को पीछे धकेलने वाला साबित करने की कोशिश में लग गए.
सरकार को नोटबंदी के फैसले से कोई फायदा होता तो नहीं दिखा, पर उस ने फिर भी दूसरा दांव गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स का खेलना शुरू कर दिया जिस का छोटा नाम है जीएसटी.
1 जुलाई, 2017 को यह टैक्स लागू होते ही देश में अलगअलग जगहों पर लगने वाले 18 टैक्स खत्म कर दिए गए. मतलब 1 जुलाई, 2017 से पहले हम किसी भी सामान को खरीदते या सेवा को लेते समय अलगअलग तरह के टैक्स सरकार को देते थे जैसे कि सेल्स टैक्स, औक्ट्रौय सर्विस टैक्स वगैरह. 1 जुलाई, 2017 के बाद सिर्फ जीएसटी ही रहा. पर यह जितना आसान दिख रहा था उतना था नहीं.
वजह, यह एक भ्रामक शब्द था. एक टैक्सेशन के नाम पर 2 तरह का टैक्स लगा. एक सैंट्रल टैक्स और दूसरा स्टेट टैक्स.
इतना ही नहीं, भारत जैसे देश में जहां हर जगह कंप्यूटर मुहैया नहीं हैं, वहां जीएसटी जैसी कंप्यूटरीकृत व्यवस्था लागू कर डाली गई. बहुत से छोटे कारोबारियों को कंप्यूटर की एबीसी भी नहीं मालूम थी. वे तो सिर धुनते दिख रहे हैं.
किसानों के लिए यह नुकसान का सौदा रहा. कहने को तो खाद्यान्न चीजों पर जीएसटी लागू नहीं किया गया, लेकिन इन को उगाने में इस्तेमाल किए जाने वाले हर कैमिकल व कीटनाशक जैसी चीजों पर यह टैक्स जम कर लगा, जिस से खेतीबारी में आने वाला खर्च बढ़ गया.
जीएसटी का गड़बड़झाला धीरेधीरे इस कदर बढ़ता गया कि राहुल गांधी ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स का नया नाम दे दिया. गब्बर सिंह हिंदी फिल्म ‘शोले’ का वह दुर्दांत डाकू था जो अपने और खुद के गुरगों को पालने के लिए आसपास के गांवों से डाकू टैक्स वसूलता था.
उस का कहना था कि वह उन सब का रखवाला है और इस के लिए अगर वह गांव वालों से खानेपीने का सामान लेता है तो इस में गलत क्या है मतलब जनता की गाढ़ी कमाई पर हाथ की सफाई. ऐसे मेहनती लोगों, जिन में छोटे कारोबारी, किसान, मजदूर और सब्जी बेचने वाले थे, को लूट कर गब्बर सिंह खुद को उन का मसीहा कहता था.
नोटबंदी और जीएसटी से वर्तमान सरकार की इमेज उस गब्बर सिंह जैसी हो गई है, जो भारत की जनता की गाढ़ी कमाई बैंकों में भर रही है जबकि लोगों को रोजमर्रा की चीजें खरीदने में परेशानी हो रही है. उसे अपना ही पैसा मांगने के लिए सरकार का मुंह ताकना पड़ रहा है.
गुजरात में विधानसभा चुनाव होने के मद्देनजर सरकार ने पेचीदा जीएसटी में नवंबर में काफी बदलाव किए हैं, लेकिन इस का फायदा होता नहीं दिख रहा है, क्योंकि राहुल गांधी ने गुजरात के चुनावों को नया मोड़ दे दिया है.
उन्होंने इसे देशभर के कारोबारियों, किसानों, मजदूरों, कारखानेदारों की मुसीबतों का चुनाव साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. पहली बार जनता सरकार की नाकामी पर उस से सवाल कर रही है.

अब तक के हुए 16 लोकसभा चुनावों की बात की जाए तो इन में ‘गरीबी हटाओ’, ‘भ्रष्टाचार’, ‘रिजर्वेशन’, ‘राममंदिर’, ‘गौरक्षा’, ‘पाकिस्तान’, ‘कश्मीर’, ‘मुसलिम’ वगैरह बेबुनियादी मसलों पर चुनाव लड़े जाते रहे. जनता को समझ में ही नहीं आता था कि उस की तरक्की की बात कब की जाएगी.
लेकिन नरेंद्र मोदी के नोटबंदी और जीएसटी वाले बेतुके फैसलों ने जनता को एकजुट कर दिया है. कारोबारी हों या मजदूर अब सब समझ गए हैं कि वे एकदूसरे के पूरक हैं. अगर वे एकजुट हो जाएं तो देश में बेरोजगारी की समस्या खुदबखुद खत्म हो जाएगी.
वे सभी सरकार से सवाल कर रहे हैं कि उन की गाढ़ी कमाई की सरकार छीनाझपटी क्यों कर रही है लोग अपना पैसा घर में नहीं रख सकते. क्यों सरकार ने तो जैसे हर पैसे वाले को कालाबाजारी साबित कर दिया है.
जनता का यह गुस्सा अगले लोकसभा चुनावों में नया रंग ला सकता है. अगर कारोबारी, किसान, मजदूर, कारखानेदार एक हो गए तो नेता, चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, उन्हें फालतू के हवाहवाई मुद्दों में नहीं उलझा पाएंगे.
भले ही गुजरात के विधानसभा चुनाव लोकसभा जितने बड़े नहीं हैं, लेकिन वहां की जनता ने सरकार से जो सवाल पूछे हैं, उन के जवाब भारत का हर वह नागरिक जानना चाहता है, जो 18 साल से ऊपर का हो गया है और सही उम्मीदवार को वोट दे कर देश का भविष्य बदल सकता है.
15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ था. अगर चुनावों खासकर लोकसभा चुनावों की बात करें तो अब तक देश में 16 लोकसभा चुनाव हो चुके हैं. इन सभी चुनावों में नेताओं द्वारा जानबूझ कर ऐसे मुद्दे हवा में उछाले जाते थे, ताकि लोग उन के भ्रामक नारोंवादों में उलझ कर अपनी समस्याओं के बारे में जबान ही न खोल पाएं.
साल 1952 और 1957 में हुए पहले व दूसरे लोकसभा चुनाव कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अच्छी इमेज के चलते आसानी से जीत लिए थे. पाकिस्तान बनने के बाद भारत खुद संभल रहा था. जनता अंगरेजों से मिले जख्मों पर मरहम ही लगा रही थी.
लेकिन साल 1962 में हुए तीसरे लोकसभा चुनावों से पहले जवाहरलाल नेहरू ने विकास के क्षेत्रों में देश के एक नए रूप की कल्पना की थी.
पंचवर्षीय योजना का उदय भी इसी समय हुआ था, जिस का मसकद कुदरती संसाधनों का सही तरीके से इस्तेमाल कर के लोगों की जिंदगी में सुधार लाना था.
जनता ने भी जवाहरलाल नेहरू की शख्सीयत से ऊपर उठ कर मुद्दों को तरजीह दी थी. आजादी की लड़ाई की खुमारी अब उतर चुकी थी.
उस समय भारत के पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध नहीं थे. अक्तूबर, 1962 में भारत और चीन की लड़ाई भी एक नए मुद्दे के रूप में उभरी थी. इस से कांग्रेस की साख को नुकसान हुआ था.
साल 1966 में इंदिरा गांधी को जब देश का प्रधानमंत्री बनाया गया, तब कांग्रेस में भीतरी कलह बहुत ज्यादा थी. चीन और पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाइयों से भारत की अर्थव्यवस्था भी हिली हुई थी. इस से कुछ नए मुद्दे सामने आए थे, जिन में मिजो आदिवासी बगावत, अकाल, श्रमिक अशांति खास थे. रुपए में गिरावट के चलते भारत में गरीबी का आलम था. पंजाब में धार्मिक अलगाववाद के लिए भी आंदोलन चल रहा था.
5वीं लोकसभा के चुनाव कई माने में अहम थे. वे अपने समय से एक साल पहले 1971 में हो गए थे. इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ नारा दे कर चुनाव प्रचार किया था और 352 सीटों पर जीत हासिल की थी.
1971 में भारतपाकिस्तान की लड़ाई हुई थी और पाकिस्तान के 2 टुकडे़ हो कर बंगलादेश नया देश बन गया था. 12 जून, 1975 को चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1971 के चुनाव को गैरकानूनी करार दिया था.
‘गूंगी गुडि़या’ कही जाने वाली इंदिरा गांधी ने इस्तीफा नहीं दिया, बल्कि उन्होंने देश में इमर्जैंसी लगा कर पूरे विपक्ष को ही जेल में डाल दिया था.
इस का नतीजा साल 1977 में हुए छठे लोकसभा चुनावों में देखने को मिला. कांग्रेस की इमर्जैंसी इन चुनावों में मुख्य मुद्दा थी. 4 विपक्षी दलों कांग्रेस (ओ), भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल और समाजवादी पार्टी ने जनता पार्टी के रूप में मिल कर चुनाव लड़ने का फैसला किया था.
जनता को इमर्जैंसी में की गई ज्यादतियों की याद दिलाई गई थी. ‘गरीबी हटाओ’ के बजाय ‘इंदिरा हटाओ’ के नारे लगाए गए. विपक्ष की एकजुटता रंग लाई और कांग्रेस को पहली बार हार का सामना करना पड़ा.
जनता पार्टी ने यह चुनाव तो जीत लिया था, पर उस की सत्ता पर पकड़ अच्छी नहीं थी. इस से कांगे्रस दोबारा मजबूत होने लगी थी. वह इंदिरा की इमेज को दोबारा बनाने में जुट गई.
चुनाव प्रचार में कांग्रेस ने महंगाई, सामाजिक समस्या और कानून व्यवस्था को तरजीह दी. उस का नारा ‘काम करने वाली सरकार को चुनिए’ काम कर गया और 1980 के मध्यावधि लोकसभा चुनाव में उसे लोकसभा में 353 सीटें मिलीं.
31 अक्तूबर, 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई थी. इस से कांग्रेस के पक्ष में हमदर्दी की लहर बन गई थी. जब चुनाव हुए तो राजीव गांधी की अगुआई में कांग्रेस ने रिकौर्ड 404 लोकसभा सीटें जीतीं और राजीव गांधी की ‘मिस्टर क्लीन’ नेता की इमेज बनी. पर वे जल्दी ही बोफोर्स कांड, पंजाब के आतंकवाद, लिट्टे और श्रीलंका सरकार के बीच गृहयुद्ध जैसी समस्याओं से जूझने लगे.
90 के दशक में भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा राम जन्मभूमि व बाबरी मसजिद के मुद्दे पर रथयात्रा शुरू की गई.
10वीं लोकसभा में 1991 के चुनाव मध्यावधि चुनाव थे. इस के 2 खास मुद्दे मंडल आयोग की सिफारिशों का लागू करना और राम जन्मभूमि व बाबरी मसजिद विवाद थे. इन चुनावों को ‘मंडलमंदिर’ चुनाव भी कहा गया.
मंडल और राम मंदिर मुद्दे पर देश में एक तरह से दंगे हो गए थे. वोटरों का जाति और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण किया गया था.

1996 के 11वें लोकसभा चुनावों तक हर्षद मेहता घोटाला, राजनीति के अपराधीकरण पर वोहरा की रिपोर्ट, जैन हवाला कांड और ‘तंदूर कांड’ मामलों ने पीवी नरसिंह राव सरकार की किरकिरी कर दी थी. कांग्रेस ने आर्थिक सुधारों की बात की, तो भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व व राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर वोटरों को रिझाया.
साल 1998 में 12वीं लोकसभा के चुनाव हुए. पिछले लोकसभा चुनावों के महज डेढ़ साल बाद. अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने.
कारगिल की लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में सकारात्मक हवा बना रही थी. अटल बिहारी वाजपेयी 13 अक्तूबर को फिर प्रधानमंत्री बने. इस के बाद भारत में ‘फील गुड फैक्टर’ की लहर बनाई गई. ‘भातर उदय’ का नारा जोर पकड़ रहा था.
भारतीय जनता पार्टी को लग रहा था कि वह साल 2004 के लोकसभा चुनावों में दोबारा सत्ता पा लेगी. यह टकराव सीधा अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी के बीच था. वैसे, जनता अपने आसपास के मुद्दों जैसे पानी की कमी, सूखे वगैरह के बारे में ज्यादा चिंतित दिख रही थी.
कांग्रेस ने अपने सहयोगी दलों की मदद और सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में 543 में से 335 सदस्यों का बहुमत हासिल किया. चुनाव के बाद इस गठबंधन को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का नाम दिया गया. सोनिया गांधी ने खुद प्रधानमंत्री बनना स्वीकार नहीं किया और वित्त मंत्री रह चुके डाक्टर मनमोहन सिंह को यह जिम्मेदारी दी गई.
साल 2009 में 15वीं लोकसभा के हुए चुनावों में कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को दोबारा सरकार बनाने का मौका मिला. डाक्टर मनमोहन सिंह दोबारा प्रधानमंत्री बने.
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने आपसी विरोधों के बावजूद नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा बना कर चुनाव लड़ने की ठानी. उस ने कांग्रेस के राज में हुए भ्रष्टाचार को सब से बड़ा मुद्दा बनाया. ‘अच्छे दिन आएंगे’ का नारा दिया.
भारतीय जनता पार्टी की यह रणनीति काम कर गई. 330 सीटों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सब से बड़ा घटक और 282 सीटों के साथ भारतीय जनता पार्टी सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी. इस सरकार के पिछले 3 सालों के काम और फैसले सब के सामने हैं.
भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह की फिल्म ‘वांटेड’ पिछले ही महीने सिनेमाघरों में रिलीज हुई है. फिल्म में दमदार डायलौग से लेकर जबरदस्त एक्शन दिखाया गया है. साथ ही साथ फिल्म के सभी गाने भी काफी हिट हुए हैं. बता दें, इस फिल्म के लिए पवन सिंह की हर तरफ तारीफ हो रही है. फिल्म समीक्षकों ने भी फिल्म को बेहतरीन बताया है. इसी बीच पवन सिंह के स्टेज शो का एक वीडियो इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है.
बहुत दिल से गाते हैं पवन सिंह
इस वीडियो में पवन सिंह भोजपुरी की कई अभिनेत्रियों के साथ स्टेश शो करते हुए नजर आ रहे हैं. पवन सिंह के बारे में कहा जाता है कि वह जो भी गाना गाते हैं तो बहुत दिल से गाते हैं और कई बार वह गाना गाते-गाते भावुक भी हो जाते हैं. कुछ ऐसा ही पवन सिंह के साथ इस स्टेज शो के दौरान जब वह अपनी एक गीत गा रहे थे. जब पवन सिंह के आंखों में अक्षरा सिंह ने आंसू देखा, तो वह अपने हाथों से उसे पोछने लगी. अब यह वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहा है. महज कुछ दिनों में यूट्यूब पर इस वीडियो को 8 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है.
‘लोहा पहलवान’ में नजर आएंगे पवन सिंह
बता दें, फिल्म ‘वांटेड’ के बाद भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह अपनी एक और नई फिल्म ‘लोहा पहलवान’ के साथ तैयार हैं. हाल ही में इस फिल्म का ट्रेलर भी रिलीज किया जा चुका है. ट्रेलर इतना दमदार है कि अब दर्शक इस फिल्म को देखने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. ट्रेलर में पुलिस औफिसर के किरदार में पवन सिंह जबरदस्त एक्शन करते नजर आ रहे हैं. इस फिल्म का निर्माण उच्च तकनीकी के साथ हर एक पहलू पर बहुत ही बारीकी से ध्यान देकर किया गया है. फिल्म ‘लोहा पहलवान’ के ट्रेलर की एक और खास बात यह भी है कि इसके कुछ दृश्य बौलीवुड के ‘दबंग’ सलमान खान की फिल्म ‘सुल्तान’ से मिलती जुलती है, जैसे कुश्ती अखाड़े का दृश्य दोनों फिल्मों में काफी मेल खाता है.
ट्रेलर की बात करें तो इसमें पवन सिंह अपने दुश्मनों से लोहा ले रहे हैं. इस फिल्म की खास बात यह है कि इसमें पवन सिंह पहली बार पहलवानी करते हुए नजर आने वाले हैं. उनका एंग्री यंग मैन हैरतअंगेज रूप दर्शकों में रोमांच भर देगा. इसमें पवन सिंह एक पुलिस वाले का किरदार निभा रहे हैं, जो अपना कार्य पूरी ईमानदारी के साथ करते हैं और जनता की सुरक्षा लिए दुश्मनों से लोहा लेते नजर आएंगे. फिल्म ‘लोहा पहलवान’ का ट्रेलर सुप्रसिद्ध म्यूजिक कंपनी ‘वर्ल्डवाइड रिकार्ड्स भोजपुरी’ द्वारा रिलीज किया गया है. फिल्म रोमांस से भरपूर होगी, जिसमें पवन सिंह के साथ पायस पंडित नजर आने वाली हैं.