आप भी जा सकते हैं सनी लियोनी के साथ लंच डेट पर

बौलीवुड की खूबसूरत और ग्लैमरस अभिनेत्रियों में से एक सनी लियोनी के साथ कौन लंच डेट पर नहीं जाना चाहेगा. सनी ने खुद अपने साथ फैंस को लंच डेट के लिए ट्विटर पर इनवाइट किया है. सनी के साथ लंच डेट पर जाने के लिए फैंस को ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत नहीं है बस 2500 यूएसडी की भरपाई करनी होगी. सनी इस लंच डेट का आयोजन किसी जरूरी मकसद को पूरा करने के लिए कर रही हैं.

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दरअसल सनी ये रकम अपने पास नहीं रखेंगी बल्कि इसे किसी भले काम में इस्तेमाल करेंगी. सनी लियोनी के साथ इस लंच डेट पर जाने के लिए आपको सिर्फ बोली लगानी होगी और ये बोली 2500 यूएसडी से शुरू होगी. सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले फैन को सनी के साथ लंच पर दो घंटे बिताने का समय मिलेगा. सनी का मकसद है कि वे इस आक्शन से करीब 2500 डालर यानी 1.68 लाख रुपए कमाएं. विनर को लंच मुफ्त में मिलेगा, लेकिन वाइन के अलग से पैसे देने होंगे.

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सनी के साथ लंच करने वाला विनर एक तस्वीर और आटोग्राफ भी ले सकता है. ये मुलाकात लास एंजेल्स में होगी. आक्शन में भाग लेने वाला उम्मीदवार 18 साल से ऊपर का होना चाहिए.

भोजपुरी इंडस्ट्री में पायल रोहतगी ने दी दस्तक

‘बिग बौस’ और ‘नच बलिये’ फेम पायल रोहतगी अब भोजपुरी फिल्मों में अपना किस्मत आजमा रही हैं. आज (1 जून) एक भोजपुरी फिल्म ‘हल्‍फा मचाके गईल’ बिहार के 50 सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. इस फिल्म में पहली बार पायल रोहतगी, अपनी दमदार आवाज और सशक्‍त अभिनय के दम पर बौलीवुड में अपनी छाप छोड़ने वाले अभिनेता रजा मुराद, अंदाज फेम अभिनेता अमित वर्मा और अली खान पहली बार भोजपुरी पर्दे पर एक साथ नजर आने वाले हैं.

फिल्म रिलीज होने से एक दिन पहले बिहार की राजधानी पटना में पायल रोहतगी मीडिया बातचीत के दौरान कहा, “‘हल्‍फा मचाके गईल’ काफी अच्‍छी फिल्‍म है और मैं इस फिल्‍म में स्‍पेशल एपीयरेंस में नजर आ रही हूं. मगर मुझे पूरा भरोसा है कि यह फिल्‍म काफी अच्‍छी चलेगी. आज कल रीजनल सिनेमा ने अपने लिए एक अलग तरह का जगह बनाया है.”

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पायल रोहतगी ने कहा, ‘आज जमाना रीजनल सिनेमा का है. फिटनेस कौंसस पायल ने मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार को बिहार में शराब बंदी के लिए धन्‍यवाद भी दिया और कहा कि जो लोग शराबबंदी का विरोध करते हैं. मुझे उनकी समझ में नहीं आती. मगर यह बेहद सराहनीय कदम है.’

वहीं, फिल्म के अभिनेता अमित वर्मा ने कहा, ‘पटना से मेरा नाता पुराना है. बचपन में मेरा दो साल पटना में बीता है, इसलिए इस शहर से कुछ अपनापन सा लगाव है. जहां तक फिल्‍म की बात है तो यह बेहद शानदार फिल्‍म है. मुझे लगता है कि जितनी ज्‍यादा फिल्‍में बनेगी, उतना ही ज्‍यादा इंडस्‍ट्री समृद्ध होगी. यह फिल्‍म भी हिंदी फिल्‍मों के मुकाबले की है. इसलिए उम्‍मीद है कि दर्शकों को यह खूब पसंद आने वाली है.

सेंदरा : जान लेने देने का खूनी पर्व

कई आदिवासी मर्द अपनेअपने धनुष को घुमाफिरा कर देख रहे थे. उस की प्रत्यंचा की जांचपड़ताल कर रहे थे. वे तीरों के नुकीलेपन को मापते दिख रहे थे.

कुछ आदिवासी अपने तीरों को और नुकीला और मारक बनाने के लिए उन्हें पत्थरों पर घिस रहे थे. कोई तीरों के किनारों पर बेहोशी की दवा लगा रहा है.

मर्दों की इस गहमागहमी के बीच उन की बीवियां खामोशी के साथ उन्हें टुकुरटुकुर देख रही थीं. हर आदिवासी औरत की आंखें आंसुओं से तर थीं. वे अपने शौहरों को रोकना चाहती थीं, पर परंपराओं और अंधविश्वास की जंजीरें उन्हें ऐसा नहीं करने दे रही थीं. उन्हें पता था कि सेंदरा पर्व के लिए निकलने वाले मर्दों की टोली में से कई मर्द जिंदा लौट कर घर नहीं आएंगे.

जिन के शौहर जिंदा वापस नहीं आ सकेंगे, उन औरतों को अपनी मांग का सिंदूर पोंछना पड़ेगा, चूडि़यां तोड़नी पड़ेंगी. किसी अनहोनी के डर से आदिवासी औरतों ने कंघी करना छोड़ रखा था. वे सादा खाना बना रही थीं.

झारखंड की राजधानी रांची से तकरीबन 130 किलोमीटर दूर बसे जमशेदपुर के दलमा जंगल में हर साल आदिवासी सेंदरा पर्व मनाते हैं. इस पर्व के बहाने मासूम जानवरों को मारने का खूनी खेल खेला जाता है.

सेंदरा पर्व में आदिवासी दलमा की वनदेवी की पूजा करते हैं. वे मानते हैं कि जानवरों को मारने से वनदेवी खुश होती हैं और बारिश भी अच्छी होती है.

पहले केवल खतरनाक जानवरों का ही शिकार किया जाता था. इस के पीछे यह माना जाता था कि खतरनाक जानवरों को मार कर आदिवासी अपनी हिफाजत करते हैं, पर धीरेधीरे इस पर्व पर अंधविश्वास ने अपना कब्जा जमा लिया. आज आदिवासी खरगोश और मोर को मारने से भी हिचकते नहीं हैं.

जमशेदपुर शहर से तकरीबन 10 किलोमीटर दूर दलमा का घना जंगल है. वहां तकरीबन 125 गांवों में तकरीबन 6000 आदिवासी रहते हैं. सेंदरा उन का खास पर्व है. वे पूरे साल इस पर्व की तैयारी करते रहते हैं.

हर गांव से आदिवासी टोलियां बना कर जंगली जानवरों का शिकार करने निकलते हैं. खरगोश, हिरण, मोर वगैरह का शिकार तो वे आसानी से कर लेते हैं, पर मरनेमारने के हालात तब पैदा होते हैं, जब उन का सामना खतरनाक जंगली सूअरों से होता है.

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जान लेने और देने के इस खेल में हमेशा तीरधनुष और भालों से लैस आदिवासी कामयाब नहीं होते हैं. कई बार जंगली सूअर आदिवासियों की टोली पर भारी पड़ते हैं और जिस से कई आदिवासियों की जान चली जाती है.

2 दिनों तक चलने वाले इस खूनी खेल के बाद जो आदिवासी जिंदा लौट कर घर आ जाते हैं, उन का स्वागत किसी योद्धा की तरह किया जाता है. ढोल, मृदंग वगैहर बजते हैं. उन की बीवियां उन के माथे पर टीका लगाती हैं, आरती उतारती हैं.

जिस औरत का शौहर जिंदा नहीं लौट पाता है, उन के घर में मातम छा जाता है. एक ही गांव में जहां कई घरों में जीत की खुशियां मनाई जाती हैं, वहीं कई घरों में रोने, चिल्लाने और तड़पने का नजारा देखने को मिलता है. इस के बाद भी आदिवासी इस खतरनाक और जानलेवा खेल को परंपरा की दुहाई दे कर खेल रहे हैं.

इस साल 23 अप्रैल, 2018 को सेंदरा पर्व मनाया गया. झारखंड सरकार ने इस बार सेंदरा पर्व पर रोक लगाने का ऐलान कर रखा था, इस के बाद भी हजारों आदिवासी सेंदरा के लिए निकल पड़े थे.

सेंदरा पर रोक लगाने के लिए सैकड़ों पुलिस और वन महकमे के मुलाजिमों की तैनाती की गई थी. इस के बाद भी सरकार सेंदरा पर्व पर रोक लगा पाने में नाकाम रही क्योंकि बीहड़ जंगलों के अंदर तक पहुंच पाना सरकारी मुलाजिमों के लिए आसान नहीं था. आदिवासियों ने पुलिस को ठेंगा दिखाते हुए सेंदरा पर्व को अंजाम दे डाला.

जमशेदपुर प्रशासन ने सेंदरा पर्व पर रोक लगाने के लिए 15 जगहों पर चैकपोस्ट बनाई थीं और जानवरों को मारने वालों को वन प्राणी हत्या अधिनियम के तहत 12 साल की जेल और 25000 रुपए जुर्माने का ऐलान किया था, पर आदिवासियों ने प्रशासन को चकमा दे डाला.

अंधविश्वास में डूबे आदिवासियों का मानना है कि जानवरों के शिकार के बगैर सेंदरा पर्व का कोई मतलब नहीं है. इस में आदिवासियों की जान जाने के सवाल पर वे कहते हैं कि जंगल में तो आदिवासी हर पल खतरों से खेलते और उन से लड़ते हैं. आदिवासी जान की परवाह नहीं करते हैं.

दलमा बुरू सेंदरा समिति के राकेश हेम्ब्रम तैश में आ कर कहते हैं कि सेंदरा पर्व पर सख्ती से रोक लगाने का मतलब आदिवासियों और उन की परंपरा पर सीधा हमला है. सेंदरा पर्व पर लगी रोक को किसी भी तरह से कामयाब नहीं होने दिया जाएगा.

सेंदरा पर्व के मसले पर आदिवासी समाज 2 हिस्सों में बंटा दिखने लगा है. कुछ पढ़ेलिखे आदिवासी पोंगापंथ में डूबे इस खतरनाक और खूनी पर्व के विरोध में आवाजें उठाने लगे हैं.

सांसद रह चुके सालखन मुर्मू ने सेंदरा पर्व की आड़ में जानवरों को मारने के खिलाफ झंडा उठा लिया है. इस से उन्हें आदिवासियों के गुस्से का भी सामना करना पड़ रहा है.

सालखन मुर्मू सेंदरा पर्व के नाम पर जानवरों को मारने की परंपरा को सती प्रथा और बाल विवाह से भी खतरनाक करार देते हुए कहते हैं कि किसी पर्व या पूजा के नाम पर मासूम जानवरों को मारना ठीक नहीं है. इस के बहाने कुछ आदिवासी अपना उल्लू सीधा करते हैं और जंगली जानवरों की खाल और सींगों को बेचने के गैरकानूनी कारोबार में लगे हुए हैं. सरकार को इस परंपरा को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की दरकार है.

सड़क पर कोई शौक से नहीं रहता

पहले बसाई जाती है, फिर खाली कराई जाती है, झुग्गी बस्ती से कुछ ऐसे वफा निभाई जाती है.

यह खेल न जाने कितने सालों से बदस्तूर चल रहा है. अब तो अतिक्रमण को ले कर सुप्रीम कोर्ट के तेवर भी तीखे हैं. वह कहता है कि दिल्ली की सड़कें साफ चाहिए ताकि सड़क व फुटपाथों पर चलने वालों को राहत मिले.

अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक जगहों और अनऔथराइज्ड कालोनियों मे गैरकानूनी निर्माण पर फौरन रोक लगे.

सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी से दिल्ली की सियासत में एक तरह की लड़ाई चल रही है. भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस तीनों के बीच एकदूसरे पर आरोप लगाने का सिलसिला शुरू हो गया है.

आरोपप्रत्यारोप की इस राजनीति में गरीब लोगों का नुकसान होता है. बड़ी गाज तो उन गरीबों पर पड़ती है जो रहते भी कब्जाई जगह पर हैं और खातेकमाते भी कब्जाई जगह पर ही.

मान लीजिए कोई आदमी किसी झुग्गीझोंपड़ी बस्ती में रहता है, जहां उस पर यह तलवार हमेशा लटकती रहती है कि कब सिर से छत हट जाए. अगर किसी सड़क किनारे वह छोलेकुलचे बेचने का ठेला लगाता है, तो वहां भी उसे यही डर सताता रहेगा कि कब ‘कमेटी वाले’ अपनी गाड़ी लेकर आ धमकेंगे और उस का तामझाम फेंक कर सामान अपने साथ ले कर चलते बनेंगे या कभी ऐसा सरकारी फरमान ही न आ जाए कि भविष्य में कोई भी सड़क किनारे, फुटपाथ पर अपना?ठेला लगा कर सामान नहीं बेच पाएगा.

यहां पर ऐसे लोगों का कतई पक्ष नहीं लिया जा रहा है जो कानून या सरकार के बनाए कानून की धज्जियां उड़ा कर सड़कों पर अतिक्रमण करते हैं पर अगर सभी को रोजीरोटी कमाने, सिर पर छत होने का बुनियादी हक है, तो फिर ऐसे लोगों के साथ तो ज्यादती ही कही जाएगी जो मेहनत की कमाई से अपनी जिंदगी गुजरबसर करना चाहते हैं. उन का कुसूर बस इतना है कि उन्हें अपनी ईमानदारी की कमाई सड़क या फुटपाथ का एक छोटा सा हिस्सा घेर कर करनी पड़ रही है.

यहां एक और बात गौरतलब है कि सड़कों पर सामान बेचने वालों के ग्राहक भी गरीब या मिडिल क्लास होते हैं. इन में से बहुत से ऐसे होते हैं जो अपने घरगांव से आ कर दिल्ली जैसे बड़े शहर में छोटी नौकरी और कम तनख्वाह पर अपना परिवार पालते हैं. बहुत से तो रोजाना ऐसे ठेलों पर खाना खाते हैं, क्योंकि यहां से उन्हें खाना सस्ता जो पड़ता है.

मिसाल के तौर पर कोई आदमी सड़क किनारे छोलेभटूरे का ठेला लगाता है और एक प्लेट 30 रुपए की देता है. अगर कोई आदमी जिस की तनख्वाह 12 हजार रुपए महीना है, 25 दिन नौकरी करने आता है और रोजाना उसी आदमी से छोलेभटूरे खाता है तो वह 25 दिन में 30 रुपए प्लेट के हिसाब से 750 रुपए के छोलेभटूरे खाता है.

अब अगर सड़क पर से सभी ठेले वालों को हटा दिया जाए तो उस आदमी को किसी रैस्टोरैंट में जाना पड़ेगा जहां हो सकता है कि छोलेभटूरे की एक प्लेट की कीमत 60 रुपए हो यानी 25 दिन में वह आदमी 1500 रुपए का खाना खाएगा. मतलब उस का खर्चा दोगुना हो जाएगा.

अगर अपने दफ्तर से रैस्टोरैंट तक बस से आनेजाने में 20 रुपए खर्च होंगे तो 25 दिन के हिसाब से उस का 500 रुपए का ऐक्स्ट्रा खर्च बढ़ जाएगा. छोलेभटूरे वाला तो बेरोजगार हुआ ही इस गरीब ग्राहक का भी खर्चा बढ़ गया. 750 और 500 रुपए जोड़ लो तो 1250 रुपए महीना की चपत.

अब छोलेभटूरे का ठेला लगाने वाले की बात करते हैं. सड़क से ठेला उठा तो रोजगार गया. अगर वह किसी ऐसी झुग्गी बस्ती में रहता है जो सरकारी जमीन पर गैरकानूनी तौर पर बनी है तो उसे यह डर भी लगा रहेगा कि कल को झुग्गी खाली करने का सरकारी फरमान न आ जाए.

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झुग्गी बस्तियों की बदहाली

इस मुद्दे पर बात करने से पहले यह जान लें कि अतिक्रमण क्यों होता है. दरअसल, यह समस्या देश की तरक्की के मौडल में खामियों और उस से गांवदेहात के लोगों का अपना घरबार छोड़ने से जुड़ी है. आजादी के बाद से धीरेधीरे लोगों का शहरों की ओर भागना देखा गया है. आजादी के बाद यह कानून तो बना दिया गया कि हमारे देश के किसी भी नागरिक को कहीं भी बसने का हक है लेकिन जो गरीब पहले जंगली इलाकों में रहते थे उन को नैशनल पार्क या अभयारण्य घोषित करते वक्त यह तय नहीं किया गया कि अब वहां रहने वाले लोग कहां बसाए जाएंगे. ऐसे लोगों के पास जमीन का कोई पट्टा नहीं था, इसलिए न वे घर के रहे और न घाट के.

जंगलों का दोहन भी लोगों को शहरों की ओर भागने की वजह बना. ईंधन, फर्नीचर और घर बनाने के लिए शहरों में लकडि़यों की मांग बढ़ गई. इस से आदिवासियों को सब से ज्यादा नुकसान हुआ.

पिछले 20 सालों में तो गांवदेहात के लोगों का बड़े शहरों की ओर भागना हद से ज्यादा बढ़ा है. रोजगार की कमी, पढ़ाईलिखाई की बदहाली और डाक्टरी इलाज में खामियां इस की खास वजहें रही हैं.

जातिवाद के जहर की तो पूछिए ही मत. शहरों में जानवरों की तरह गंदी बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर लोग निचले तबके के होते हैं. वे गांव में भी सताए जाते हैं और शहरों में भी उन्हें इज्जत की जिंदगी नहीं मिल पाती है. इस की वजह यह रही है कि गांवदेहात में खेतीबारी महंगी होती गई तो इस के साथसाथ हस्तशिल्प, कुटीर व लघु उद्योग भी उजड़ते गए.

नतीजतन, लोग बसों, रेलों में लद कर, ठुंसठुंसा कर शहरों की ओर भागने लगे. वहां रहने की समस्या आई तो जिस को जहां जगह मिली उस ने वहां अपना तंबू तान दिया. नेताओं को ऐसे लोग पकेपकाए वोट लगे तो पुलिस और दूसरे सरकारी विभागों को आमदनी का आसान जरीया.

नौकरशाही ने तिकड़में लड़ा कर ऐसे लोगों को सरकारी जमीनों पर झुग्गियों के रूप में बसा दिया, तो नेताओं ने उन्हें अपनी सरपरस्ती में बेखौफ रहने की इजाजत दे दी. अमीरों को सस्ते में नौकर, सब्जी वाले, प्रैस वाले, चौकीदार, साफसफाई करने वाले मिलने लगे तो उन्होंने भी ऐसी बस्तियों पर कभी नाकभौं नहीं सिकोड़ी.

लेकिन जब बेतरतीब बसी ऐसी सड़ांध मारती बस्तियों की बदबू आसपास के इलाकों में फैलने लगी, लोग बीमार होने लगे, अपराध बढ़ने लगे, आबोहवा खराब होने लगी तो ये गरीब शहर पर कोढ़ की तरह दिखने लगे.

धरती पर अगर नरक देखना हो तो गैरकानूनी तौर पर बसी ऐसी झुग्गी बस्तियों में आप का स्वागत है. यहां के ज्यादातर परिवार चूंकि छोटी जाति के होते हैं इसलिए उन के सपने भी झुग्गी की टुच्ची औकात के बन कर रह जाते हैं. मर्द रोजीरोटी के लिए खोमचा लगाते हैं, दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, कहीं किस्मत अच्छी हुई तो ठेकेदारी या ड्राइवरी कर लेते हैं. औरतें बड़े घरों में बरतन मांजने, साफसफाई का काम करती हैं तो बच्चे सरकारी स्कूल में इसलिए भेज दिए जाते हैं ताकि सारा दिन आवारागर्दी करने से बच जाएं.

दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में जी ब्लौक की झुग्गी बस्ती बहुत पुरानी है. यह एक नाले के आसपास बसी है, जिस में बदहाली का आलम अपनी हद पर है. पहले जो झुग्गियां तिरपाल या कच्ची छत की बनी थीं अब पक्के घरों में तबदील हो चुकी हैं. किसी भी गली में घुस जाओ, दड़बों से बेतरतीब बने छोटेछोटे घर आप को घूरते नजर आएंगे. कुछ ने तो 3-4 मंजिलें भी खड़ी कर दी?हैं.

वहां तकरीबन 30-35 साल से रह रही एक माई ने बताया, ‘‘हम जब यहां आए, तब 2-3 झुग्गियां थीं. नाले की जमीन थी, इसलिए सड़क से 6-7 फुट नीची थी. बरसात के मौसम में पानी भर जाता था. एक तरह से जंगल ही था. हमारे गांव में जमीन नहीं थी. खाने के लाले पड़ने लगे तो काम की तलाश में यहां आ गए. अब तो यही हमारा घर है.’’

यहां तकरीबन सभी लोगों के आधारकार्ड बन चुके?

हैं. घरों में बिजलीपानी के मीटर हैं पर सीवर नहीं डाले गए हैं. शौचालय की समस्या है. पास में ही एक सार्वजनिक शौचालय जरूर है, जहां एक आदमी की ड्यूटी भी लगती है. पर औरतों की समस्या यह है कि देर रात में वे अपने बच्चों खासकर लड़कियों को कैसे वहां शौच के लिए भेजें.

अंधेरा होने के बाद तो वहां नशेडि़यों का जमघट लग जाता है. शौचालय की देखभाल करने वाला आदमी अगर उन्हें जाने को कहता है तो वे लड़ाईझगड़े पर उतारू हो जाते हैं.

एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने वाले दीपक ने बताया, ‘‘इस झुग्गी बस्ती में सब से बड़ी समस्या सीवर की है. कुछ लोगों ने बड़े नाले में कनैक्शन करा कर अपना शौचालय बनवा लिया तो ठीक, नहीं तो बाहर सार्वजनिक शौचालय में जाना पड़ता है. अगर घर के नीचे गड्ढा खुदवा कर बनवाना चाहें तो बाद में सफाई कराने में दिक्कत आती है.

‘‘अगर सरकार इसी जमीन पर यहां रहने वाले लोगों को 12-12 गज के प्लाट किसी कालोनी की तरह काट कर दे दे तो यहां का नक्शा बदल सकता है. स्मार्ट शहर से पहले स्मार्ट झुग्गी बस्तियां बनाना जरूरी है.’’

सरकारी लोगों के रवैए से गुस्साई एक औरत सरला देवी ने बताया, ‘‘अगर हम अपनी समस्याएं ले कर सरकारी विभाग में जाते हैं तो वे कहते हैं कि यह हमारा काम नहीं है. पहला दूसरे के पास और दूसरा तीसरे के पास भेज देता?

है. नेता के नुमांइदे आते हैं, नाले की भी सफाई के फोटो खींच कर सोशल मीडिया पर डाल कर वाहवाही बटोर लेते हैं, लेकिन गंदगी वहीं की वहीं रहती है.

‘‘हम औरतों ने अपनी मेहनत से कच्ची झुग्गियों को इन छोटेछोटे घरों में बदला है. अगर हमें यहां से हटा दिया गया तो हम कहीं के नहीं रहेंगे. गांव में जमीन नहीं है. यहां छत नहीं है. हम गरीबों की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती है.’’

भारत सरकार के सर्वे 2011 के मुताबिक, दिल्ली की तकरीबन 15 फीसदी आबादी झुग्गी बस्तियों में रहती है. आंकड़ों की बात करें तो दिल्ली में तकरीबन 7 सौ एकड़ एरिया में झुग्गियां हैं, जिन में 10 लाख के आसपास लोग रहते हैं. दिल्ली में तकरीबन 90 फीसदी झुग्गियां सरकारी जमीन पर बसी हैं, जिन में से 40 फीसदी दिल्ली नगरनिगम और लोक निर्माण विभाग, 28 फीसदी रेलवे और 16 फीसदी दिल्ली सरकार की जमीन पर कायम हैं.

इस तरह दिल्ली में तकरीबन 860 झुग्गी बस्तियां हैं. तकरीबन 1700 ऐसी कच्ची कालोनियां हैं जो हमेशा से सरकार की अनदेखी का शिकार रही हैं.

राजनीतिक दल इन लोगों की भलाई की तो छोडि़ए, इन के नाम पर अपनी सियासी रोटियां सेंकते हैं. भारतीय जनता पार्टी आरोप लगाती है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार केंद्र सरकार की योजनाओं का फायदा दिल्ली की पुनर्वास बस्तियों और झुग्गीझोंपड़ी में रहने वालों तक पहुंचने ही नहीं देती है.

इस पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार के अर्बन रिनुअल फंड से कई राज्यों के साथ ही नोएडा व गुड़गांव में भी झुग्गी बस्तियों में तरक्की के काम किए हैं या कराए जा रहे हैं, पर दिल्ली के झुग्गी वालों को इस फंड से कोई फायदा नहीं मिला है.

इस के उलट दिल्ली सरकार कहती है कि केंद्र सरकार और दिल्ली के उपराज्यपाल उसे कोई काम ही नहीं करने देते हैं. नगरनिगम पर विपक्ष

का कब्जा है जो उस के द्वारा किए जाने वाले काम खासकर गरीबों की भलाई के कामों में हमेशा अड़ंगा अड़ाता है.

ऐसे में जब कभी सुप्रीम कोर्ट अतिक्रमण को ले कर सख्त होता है तो आननफानन झुग्गी बस्तियों का वजूद मिटाने और वहां के बाशिंदों को कहीं दूसरी जगह बसाने की कवायद शुरू हो जाती है. लेकिन यह सब करना क्या आसान काम है?

यह एक कड़वी सचाई है कि दिल्ली में गैरकानूनी तरीके से बसाई गई झुग्गीझोंपड़ी बस्तियों को खाली कराने और वहां के बाशिंदों को दोबारा कहीं ओर बसाने का तरीका बड़ा पेचीदा है. इस में तमाम तरह की प्रशासनिक चुनौतियां होती हैं.

2 बड़ी समस्याएं इस तरह हैं. पहली, एक नोडल एजेंसी होने के बावजूद ऐसी बस्तियों को दोबारा बसाने का काम विभिन्न सरकारी एजेंसियों के जिम्मे होता है, जिन के बीच तालमेल की कमी दिखाई देती है, जिस से इस सब में तमाम तरह की रुकावटें पैदा होती हैं. दूसरी, इस तरह की झुग्गीझोंपड़ी बस्तियों में रहने वालों को अपने हकों का पता नहीं होता है. मसलन, हटाए गए लोगों में से किसकिस को दोबारा बसाया जाएगा? बस्ती खाली कराने का कानूनी तरीका क्या है? इन सब बातों की उन्हें जानकारी नहीं होती है.

सरकारी जमीन पर बसी झुग्गीझोंपड़ी बस्तियों को वहां से हटाने और कहीं ओर बसाने की जिम्मेदारी दिल्ली नगरनिगम, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड, लोक निर्माण विभाग, केंद्रीय लोक निर्माण विभाग जैसी सरकारी संस्थाओं पर होती है.

मान लीजिए सरकार को कोई सड़क चौड़ी करनी है और इस की जिम्मेदारी वह लोक निर्माण विभाग को सौंपती है. लेकिन वहीं पर एक ऐसी झुग्गीझोंपड़ी बस्ती है जिस का कुछ हिस्सा सड़क को चौड़ा करने में रुकावट पैदा कर रहा है तो लोक निर्माण विभाग उस हिस्से से अतिक्रमण हटाने के लिए क्या करेगा? क्या वह उन लोगों को कोई आधिकारिक नोटिस भेजेगा या किसी तरह का आदेश दिखाएगा या वहां जा कर इतना कह देगा कि हम यह हिस्सा ढहाने जा रहे हैं, आप अपना इंतजाम कर लो. अगर बस्ती वाले लोग समय मांगते हैं तो क्या उन्हें कानूनन समय दिया जाता?है या आपसी समझ से जगह खाली करने पर सहमति बन जाती है?

‘सैंटर फौर पौलिसी रिसर्च’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के आरके पुरम सैक्टर 7 इलाके में सोनिया गांधी कैंप झुग्गीझोंपड़ी बस्ती थी. 25 फरवरी, 2013 को लोक निर्माण विभाग के इंजीनियरों ने इस कैंप के बाशिंदों को बताया कि वे बस्ती का उत्तरपूर्वी हिस्सा ढहाने जा रहे?हैं.

लोगों को बताया गया कि बस्ती का यह हिस्सा लोक निर्माण विभाग की जमीन पर था और एक सड़क चौड़ी करने के लिए उन्हें उस की जरूरत थी.

हालांकि लोगों को न तो कोई आधिकारिक नोटिस और न ही किसी तरह का कोई आदेश दिखाया गया. जब इंजीनियरों ने कहा कि वे मकान ढहाने का काम फौरन शुरू करना चाहते हैं तो बस्ती के लोगों ने थोड़ा समय मांगा. इंजीनियर मान गए.

एक हफ्ते बाद यानी 6 मार्च, 2013 को इंजीनियर निर्माण ढहाने का काम शुरू करने के लिए कैंप पहुंचे. कुछ लोगों ने थोड़ा समय और मांगा तो 30 मार्च, 2013 तक साजोसामान हटाने वाली एक चिट्ठी पर उन के दस्तखत करा लिए गए. चिट्ठी में लिखा था कि अगर वे 30 मार्च तक ऐसा नहीं करेंगे तो लोक निर्माण विभाग उन के घरों को ढहा देगा.

यहां मामले में पेंच था कि बस्ती वालों के मुताबिक लोक निर्माण विभाग ने वह चिट्ठी खुद तैयार की थी और उन से दस्तखत करने को कहा था, जबकि विभाग के स्टाफ का दावा था कि बस्ती के लोग चिट्ठी तैयार करने में भागीदार थे.

बस्ती वालों ने यह भी बताया कि उन्होंने उस जमीन से, जिसे लोक निर्माण विभाग अपनी बता रहा था, 30 मार्च, 2013 तक अपना सामान हटा लिया था. पर न तो उस दिन लोक निर्माण विभाग की तरफ से झुग्गियां ढहाने के लिए कोई आया और न ही अप्रैल महीने के शुरुआती दिनों में ही कोई आया. लिहाजा, लोग अपनी झुग्गियों में वापस आ गए.

15 अप्रैल, 2013 को लोक निर्माण विभाग ने बिना कोई सूचना दिए तकरीबन 35 झुग्गियों को ढहा दिया. झुग्गियां तोड़े जाने के साथसाथ कैंप के बाशिंदों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शौचालयों में पानी की सप्लाई वाले पाइप हटा दिए गए. इस से शौचालय बेकार हो गए.

22 अप्रैल, 2013 को लोक निर्माण विभाग के 2 इंजीनियर आए और एक नई चौड़ी सड़क के लिए जमीन का सीमांकन कर गए. बस्ती वालों के कहने के बावजूद उन्हें सीमा दिखाने वाला कोई भी दस्तावेज या नक्शा नहीं दिखाया गया. तभी लोक निर्माण विभाग द्वारा किराए पर रखा हुआ एक प्राइवेट ठेकेदार कुछ मजदूरों और सामान के साथ वहां पहुंचा और उस ने तय की गई सीमा के साथसाथ एक दीवार बनानी शुरू कर दी. एक बुलडोजर और एक ट्रक में ढहाई हुई झुग्गियों का मलबा हटाने का काम भी शुरू कर दिया.

इस तरह झुग्गियां ढहाने के मामले में लोक निर्माण विभाग, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड और इलाके के विधायक की ओर से अलगअलग जवाब आए. लोक निर्माण विभाग के एक सीनियर इंजीनियर ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि उन के विभाग ने किसी झुग्गी को नहीं हटाया है, बल्कि सिर्फ ‘अतिक्रमण को हटाया’ है. उन्होंने आगे कहा कि विभाग की जमीन से अतिक्रमण हटाना उन का काम था.

जिस इंजीनियर की निगरानी में झुग्गियों को ढहाया गया था, वह इस बात पर कायम रहा कि उजड़े परिवारों को दोबारा बसाने में लोक निर्माण विभाग का कोई रोल नहीं है और इस की जिम्मेदारी दिल्ली विकास प्राधिकरण या दिल्ली नगरनिगम की थी.

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड के एक बड़े अफसर ने बताया कि अगर किसी सरकारी प्रोजैक्ट के लिए कोई बस्ती ढहाए जाने की जरूरत है तो जिस एजेंसी की जमीन पर वह बस्ती बसी है, उसे ऐसा कदम उठाने की ठोस वजह देनी पडे़गी. इस के साथ ही एजेंसी को बस्ती के बाशिंदों के रहने के लिए कोई औप्शनल इंतजाम करते हुए उन्हें दोबारा बसाना होगा.

लोक निर्माण विभाग के मुताबिक, ‘राइट औफ वे’ के आधार पर यह पूरी प्रक्रिया जायज थी. यह कदम मौजूदा सड़कों के अतिक्रमण हटाने की मंशा से उठाया गया था.

‘राइट औफ वे’ के नियमों के चलते झुग्गियों को हटाते वक्त वहां के लोगों और बाकी एजेंसियों को सूचित करना लोक निर्माण विभाग के लिए जरूरी नहीं था. अतिक्रमण हटाने के लिए विभाग को नोटिस देने की जरूरत नहीं, चाहे अतिक्रमण एक झुग्गी का हो या एक बंगले का. विभाग को सिर्फ इलाके के एसएचओ को पुलिस मुहैया कराने के लिए कहना पड़ता है, ताकि झुग्गियों को ढहाने के दौरान कोई हिंसा न भड़के.

इस के बाद विधायक ने लोगों की तोड़ी गई झुग्गियों की लिस्ट तैयार करने को कहा और लिस्ट के साथ अपनी पहचान से जुड़े दस्तावेज भी लगाने को कहा. कुछ दिन बाद कैंप से विस्थापित हुए लोगों ने ढहाई गई झुग्गियों का ब्योरा विधायक के दफ्तर जा कर जमा करा दिया. विधायक ने कहा कि किसी भी तरह की मदद मिलने में कुछ महीने का समय लग सकता है.

8 मई, 2013 को झुग्गी वाले विधायक के पास दोबारा पहुंचे. विधायक ने उन्हें आश्वासन दिया कि तोड़ी गई झुग्गियों के बदले उन्हें पुनर्वास नीति के तहत नरेला में फ्लैट दिए जाएंगे. 10 मई या 15 मई, 2013 को सोनिया गांधी कैंप में एक रजिस्ट्रेशन कैंप लगाया जाएगा जहां पर जिन लोगों की झुग्गियां तोड़ी गई हैं उन को ‘टाइम ऐलौटमैंट स्लिप’ दी जाएगी. लाभार्थी परिवार को फ्लैट लेने के लिए 72 हजार रुपए देने होंगे. फ्लैट हासिल करने के लिए तोड़ी गई झुग्गियों के मालिकों को अपने मतदान प्रमाणपत्र देने होंगे जो यह साबित कर सकें कि वे पिछले 8-10 सालों से सोनिया गांधी कैंप में रह रहे थे.

लेकिन बताई गई किसी तारीख पर कोई भी रजिस्ट्रेशन कैंप नहीं लगाया गया. झुग्गी वाले दोबारा विधायक की चौखट पर गए. विधायक ने बताया कि उन्होंने दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड से पूछा था कि जिन परिवारों की झुग्गियां तोड़ी गई हैं उन्हें पुनर्वास के तौर पर दूसरी जगह क्यों नहीं दी गई है?

विधायक के मुताबिक, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड ने जवाब में कहा था कि झुग्ग्यों को ढहाने का काम लोक निर्माण विभाग द्वारा किया गया और जिस के बारे में उस विभाग ने उन्हें कोई सूचना नहीं दी. इसी के चलते दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड ने प्रभावित परिवारों के लिए कोई पुनर्वास योजना तैयार नहीं की.

जब एक झुग्गीझोंपड़ी बस्ती की केवल 35 तोड़ी गई झुग्गियों को दोबारा बसाने में इतना झमेला था, तो सोचिए कि पूरी दिल्ली की ऐसी बस्तियों में रहने वाले लोगों को कहीं दूसरी जगह बसाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे.

सुप्रीम कोर्ट दिल्ली को खूबसूरत बनाना चाहता है, सड़कें साफसुथरी देखना चाहता है, वह सरकार को चेतावनी देते हुए यह भी कहता है कि दिल्ली के आम लोग मवेशी नहीं हैं पर दिल्ली की जो एकतिहाई जनता कब्जाई गई कालोनियों या झुग्गी बस्तियों में रहती है, क्या उसे एक झटके में दिल्ली से बाहर फेंक दिया जाए?

लोग अपना घरबार छोड़ कर शहरों में मस्ती मारने नहीं आते हैं. वहां उन्हें रोजगार नहीं मिलता इसलिए उन्हें कंक्रीट के जंगल में बंधुआ मजदूर बनना भी मंजूर होता है, ताकि उन के परिवार का पेट पल सके. शहर में जहां वे अपना छोटा सा आशियाना बसाते?हैं वहां उन्हें रोजमर्रा की चीजों की जरूरत होती है, सस्ती चीजों की, इसलिए शहरों में यह अतिक्रमण दिखाई देता है. गैरकानूनी बस्तियां बस रही?हैं, सरकार की नाक के नीचे. सड़कों पर ठेले वालों का मजमा लगता है, ताकि दूसरे गरीब भी अपनी जरूरतों का सामान कम दाम पर खरीद सकें, कम पैसों में वे अपने पेट की आग बुझा सकें.

ऐसे लाखों लोगों को शहर की खूबसूरती बढ़ाने के लिए बलि का बकरा बनाना कहां की अक्लमंदी है, जबकि इस देश में किसी को कहीं भी रहनेबसने का बुनियादी हक मिला हुआ है. क्या ऐसे लोगों की कीमत उस गमले से भी गईगुजरी है जो शहर की शान बढ़ाने के लिए सड़क किनारे फुटपाथ की शोभा बढ़ाता है.

एसएसपी की घूसलीला

कमाई की कुल रकम 80 लाख रुपए और नकदीगहने साढ़े  4 करोड़ रुपए से ज्यादा के. यह है आईपीएस और बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सीनियर सुपरिंटैंडैंट पुलिस विवेक कुमार की काली कमाई का आंकड़ा. इतने की तो नकदी, फिक्स्ड डिपौजिट और गहने मिले हैं.

आमदनी से ज्यादा धनदौलत होने के मामले में छापामारी के बाद एसएसपी विवेक कुमार को सस्पैंड कर दिया गया है. उन पर भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत विशेष निगरानी इकाई ने केस दर्ज किया है.

एसएसपी विवेक कुमार के ठिकानों पर छापामारी के बाद 4 करोड़, 35 लाख रुपए की चल संपत्ति का पता चला है. मुजफ्फरपुर के विजया बैंक के 2 लौकरों से 35 लाख, 97 हजार, 5 सौ रुपए नकद, 10 लाख, 75 हजार रुपए के फिक्स्ड डिपौजिट के कागजात और 9 लाख, 61 हजार रुपए के गहने बरामद किए गए.

मुजफ्फरपुर के यूको बैंक के 3 लौकरों से 18 लाख रुपए नकद, एक करोड़, 85 लाख रुपए के फिक्स्ड डिपौजिट के कागजात और 31 लाख, 75 हजार रुपए के गहने मिले. ओवरसीज बैंक के 2 लौकरों में 75 लाख, 49 हजार, 5 सौ रुपए नकद पाए गए.

केनरा बैंक के एक लौकर से 29 लाख, 38 हजार रुपए नकद बरामद किए गए. बैंक औफ बड़ौदा के एक लौकर से 480 ग्राम सोना, 570 ग्राम चांदी के गहने और विदेशी करंसी मिली.

एसएसपी विवेक कुमार के ठिकानों के बाद जब स्पैशल विजिलैंस यूनिट की टीम ने उन की ससुराल में छापा मारा वहां बैंक लौकर की 6 चाबियां मिलीं.

इस के साथ ही ससुर वेदप्रकाश कर्णवाल, सास उमा रानी और साले निखिल कर्णवाल के साथ विवेक कुमार द्वारा सौ से ज्यादा बार नकदी निकालने व जमा किए जाने का पता चला. विवेक कुमार इन लोगों के खातों में रकम जमा कर के निकाल लेते थे.

एसएसपी विवेक कुमार के खिलाफ आमदनी से ज्यादा संपत्ति होने के मामले में 22 पन्ने की एफआईआर दर्ज की गई. उन के ऊपर आमदनी से 30 गुना ज्यादा दौलत होने का खुलासा हुआ है.

एसएसपी विवेक कुमार और उन की पत्नी निधि कुमारी के पास तकरीबन एक करोड़, 6 लाख रुपए की दौलत होने और तकरीबन एक करोड़, 27 लाख रुपए के गैरकानूनी लेनदेन होने का पता चला है.

15 अप्रैल, 2018 को साल 2007 बैच के आईपीएस और मुजफ्फरपुर के एसएसपी विवेक कुमार के सरकारी आवास, दफ्तर, ससुराल और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के वरुण विहार महल्ले के घर समेत कुल 4 ठिकानों पर छापामारी की गई थी.

मुजफ्फरपुर के सरकारी आवास से 6 लाख, 25 हजार रुपए नकद, साढ़े 5 लाख रुपए के गहने, 45 हजार के पुराने नोट समेत जायदाद से जुड़े कई दस्तावेज मिले थे, जबकि ससुराल में तकरीबन 2 करोड़ रुपए के फिक्स्ड डिपौजिट के कागजात मिले. उन में से 22 लाख, 74 हजार रुपए के 23 फिक्स्ड डिपौजिट विवेक कुमार की पत्नी निधि कुमारी के नाम से हैं.

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विवेक कुमार की अब तक की आमदनी 80 लाख रुपए है, जिस में से 46 लाख, 48 हजार रुपए का खर्च दिखाया गया है.

इस हिसाब से विवेक कुमार की बचत 33 लाख, 31 हजार रुपए होती है, जबकि उन्होेंने बचत की रकम में एक करोड़, 6 लाख रुपए दिखाए हैं.

विवेक कुमार की सास उमा रानी और निधि कुमारी के नाम से 3 लाख रुपए के जौइंट फिक्स्ड डिपौजिट मिले हैं. विवेक कुमार के ससुर और सास के नाम से 46 लाख, 70 हजार रुपए के 29 फिक्स्ड डिपौजिट के कागजात मिले हैं. ससुर वेदप्रकाश के नाम से 14 लाख रुपए के 5 फिक्स्ड डिपौजिट हैं.

वेदप्रकाश और साले निखिल कर्णवाल के नाम से 35 लाख, 18 हजार रुपए के 27 फिक्स्ड डिपौजिट मिले हैं. निखिल कर्णवाल के नाम से डेढ़ लाख रुपए के फिक्स्ड डिपौजिट हैं.

विवेक कुमार ने अपने साले की पत्नी के नाम से भी 45 लाख रुपए के 2 फिक्स्ड डिपौजिट करवा रखे थे.

विवेक कुमार के ससुर रिटायर्ड सरकारी अफसर हैं और उन्हें महज 23 हजार रुपए बतौर पैंशन मिलती है और उन की सास हाउसवाइफ हैं. इस के बाद भी उन के नाम पर एक करोड़, 6 लाख रुपए निधि के फिक्स्ड डिपौजिट के कागजात मिले.

एसएसपी विवेक कुमार ने अपनी बीवी के नाम पर किए गए 5 फिक्स्ड डिपौजिट को ससुर से मिले गिफ्ट के तौर पर दिखाया गया. उसी दिन उतनी ही रकम सासससुर के अकाउंट में भी डाल दी.

एसएसपी विवेक कुमार ने पिछले दिनों अपनी संपत्ति का ऐलान करते हुए सरकार को यह जानकारी दी थी कि उन के और उन की पत्नी के पास 7 लाख रुपए के गहने हैं, लेकिन छापामारी में 60 लाख रुपए के गहने मिले.

सरकार को दी गई जानकारी में उन्होंने अपने पास 5 हजार रुपए और पत्नी के पास 36 हजार रुपए नकद होने की बात कही थी, पर छापा पड़ा तो पौने 2 करोड़ रुपए नकद मिले.

इस के अलावा 1685 कनाडाई डौलर, 498 अमेरिकी डौलर और 1468 मलेशियाई करंसी भी छापामारी में विवेक कुमार के घर से मिली.

विवेक कुमार की शराब माफिया से भी सांठगांठ के सुराग मिले हैं. निगरानी सूत्रों के मुताबिक, मुजफ्फरपुर के मारीपुर इलाके के एक होटल में एसएसपी विवेक कुमार के साथ शराब माफिया की मीटिंग भी हुई थी.

उस मीटिंग में बिहार के 4 शराब माफिया के अलावा हरियाणा के भी एक शराब कारोबारी ने हिस्सा लिया था.

उस मीटिंग के बाद जिले के 6 ऐसे थानेदारों को हटा दिया गया था जो शराबबंदी के लिए मुस्तैदी से काम कर रहे थे. उन थानों में एसएसपी विवेक कुमार ने अपने वफादारों को तैनात कर दिया था.

पुलिस हैडर्क्वाटर के सूत्रों के मुताबिक एसएसपी विवेक कुमार की पोस्टिंग जहां भी रही वहां वे विवादों में रहे. भागलपुर जिले में वे 28 जून, 2014 से ले कर 8 अप्रैल, 2016 तक एसएसपी रहे. वहां के थानेदारों की पोस्टिंग के मामले में वे कई बार विवादों में घिरे थे. जगदीशपुर थाने के थानेदार ने आईजी से विवेक कुमार की शिकायत की थी.

जगदीशपुर थाना बालू की गैरकानूनी खान से होने वाली कमाई के लिए बदनाम है. थानेदार ने एसएसपी विवेक कुमार पर बालू माफिया से संबंध होने का आरोप लगाया था.

इश्क के मामले में एक लड़की पर ही बाप की हत्या का आरोप लगाने के मामले में विवेक कुमार की जम कर किरकिरी हुई थी.

कोर्ट ने जब एसएसपी विवेक कुमार से पूछा कि केस डायरी में क्या कोई सुबूत है, जिस के आधार पर लड़की को बाप का कातिल बताया गया है, तो विवेक कुमार सही से जवाब नहीं दे सके थे.

दारोगा की खुदकुशी में विवेक का हाथ?

मुजफ्फरपुर जिले के कांटी थाना क्षेत्र के पानपुर करियात ओपी में तैनात दारोगा संजय कुमार गौड़ की मौत के बाद उन की पत्नी ने 3 जुलाई, 2017 को दरौली थाने में एसएसपी विवेक कुमार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए अर्जी दी थी. उस अर्जी में एसएसपी पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे.

दारोगा की पत्नी कल्याणी देवी दरौली थाना के मुड़ा कर्मवी गांव की रहने वाली हैं. उन्होंने कहा कि उन के पति खुदकुशी नहीं कर सकते हैं. उन की हत्या की गई है. पति इस बात से काफी परेशान थे कि एसएसपी ने उन से थानेदार बनाने के लिए 10 लाख रुपए मांगे थे, जिस के बाद साढ़े 6 लाख रुपए दिए गए. साढ़े 3 लाख रुपए बाद में देने के लिए कहा था.

साढ़े 6 लाख रुपए ले कर उन की पोस्टिंग थानेदार के तौर पर कर दी गई, पर तुरंत ही बकाया साढ़े 3 लाख रुपए देने का दबाव बनाने लगे. जब उन के पति ने बकाया रकम नहीं दी तो एक दिन बाद ही उन्हें थानेदार के पद से हटा दिया गया था. इस मामले में उस समय एसएसपी विवेक कुमार ने सफाई दी थी कि थानेदारी के लिए रुपए मांगने और सताने का आरोप झूठा है.

दारोगा संजय कुमार गौड़ की खुदकुशी के मामले की जांच का जिम्मा सीआईडी को सौंपा गया था. संजय कुमार ने 2 जुलाई, 2017 को खुदकुशी कर ली थी. पानपुर करियात ओपी में तैनात दारोगा मोहम्मद हारून की सर्विस रिवाल्वर से उन के ही कमरे में संजय ने अपने सिर में गोली मार ली थी. इस घटना के पिछले 5 महीने से उन की तनख्वाह रोक कर रखी गई थी.

साल 2009 बैच के दारोगा संजय कुमार गौड़ मुजफ्फरपुर से पहले वैशाली जिले में तैनात थे. एक दिन के लिए उन्हें गायघाट थाने का प्रभारी बनाया गया था.

बिहार पुलिस एसोसिएशन ने एडीजी हैडर्क्वाटर एसके सिंघल से मिल कर मुजफ्फरपुर के एसएसपी विवेक कुमार को हटाने की मांग की थी. एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह और महामंत्री दीनबंधु राम कहते हैं कि एसपी और एसएसपी अकसर दारोगा, जमादार और सिपाहियों को सताते रहते हैं. छुट्टी तक नहीं देते हैं. ठीक से बरताव नहीं करते हैं. 5 महीने तक तनख्वाह नहीं मिलने पर परिवार की क्या हालत हो सकती है, इस का अंदाजा लगाया जा सकता है.

पुलिस अफसरों से तंग आ कर पिछले कुछ महीनों में जमुई, आरा, नवादा, बक्सर जिलों के दारोगा खुदकुशी कर चुके हैं.

संजय कुमार गौड़ सिवान जिले के दरौली थाने के मुड़ा कर्मवीर गांव के रहने वाले थे. उन के पिता का नाम काशीनाथ गौड़ है.

एक वेश्या की कहानी

आप मुझे किसी भी नाम से बुला सकते हैं… धंधे वाली या वेश्या. समाज में मुझे कभी भी इज्जत की नजरों से नहीं देखा गया है. मेरे पास हर तरह के ग्राहक आते हैं, इसलिए मुझे थोड़ीबहुत अंगरेजी भी आती है.

मैं मुंबई के करीब ही 15 किलोमीटर के दायरे में एक जिले में रहती हूं. आप रेड लाइट एरिया नियर मुंबई शब्द डाल कर कंप्यूटर पर सर्च करेंगे तो मेरा यह इलाका आसानी से मिल जाएगा. यहां पर तकरीबन 800 औरतें इसी धंधे में लगी हैं.

यों तो हम समाज से अलगथलग रहती हैं पर हमें सब की खबर रहती है. सर्जिकल स्ट्राइक से ले कर ईवीएम घोटाले तक… कश्मीर में पत्थरबाजी से ले कर नक्सली इलाकों में औरतों से किए गए बलात्कार तक…

आप के साफसुथरे किरदार वाले समाज में हमारी जिंदगी के बारे में जानने की बड़ी इच्छा होती है, जैसे हमारा अतीत क्या था? हम कैसे इस दलदल में आईं? हमारी बातचीत का लहजा क्या है? हमारा पहनावा… हमारी अछूत सी जिंदगी… हमारे ग्राहक… और हमारे एचआईवी मरीज होने का डर… सबकुछ जानना चाहते हैं.

कुछ लोगों को लगता है कि यह धंधा आसानी से पैसा कमाने का सब से अच्छा तरीका है. लोगों को लगता है कि हम इस पेशे में मरजी से आई हैं.

मैं एक बात जानना चाहती हूं कि आप किसी भी साधारण औरत से पूछिए कि अगर कोई मर्द आप को गलत नजर से देखता है तो कितना गुस्सा आता है? आप कितना असहज महसूस करती हैं?

जब उस ने आप को छुआ नहीं सिर्फ देखा तो आप असहज हो जाती हैं, तो हमें यह सब कर के कैसे अच्छा लगता होगा? यह सोच जानबूझ कर बनाई गई है कि यह पेशा अच्छा लगने की वजह से फलफूल रहा है.

आप के सभ्य समाज ने इस चलन को मंजूरी सी दे दी है कि मर्द हमारे शरीर को नोचने, तोड़ने और काटने का हक रखते हैं. यह आसानी से पैसा कमाने वाली सोच बिलकुल गलत है. इस पेशे में आने वाली लड़कियां ज्यादातर मजबूर होती हैं, अनपढ़ होती हैं… उन का परिवार बेहद गरीब और लाचार होता है. उन का कोई सहारा नहीं होता है.

कोई उन का ही नजदीकी दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी उन की मजबूरी का फायदा उठाता है और पैसों के लिए ऐसे नरक में धकेल देता है. मेरे साथ काम करने वाली कुछ लड़कियां तो रद्दी से भी सस्ते दामों पर खरीदी गई हैं.

आमतौर पर 14 साल से 15 साल की लड़की 2,500 रुपए से ले कर 30,000 रुपए के बीच खरीदी जाती है. साल 2017 में एक 16 साल की और दूसरी 14 साल की 2 बहनों को सिर्फ 230 रुपए में खरीदा गया.

2 लड़कियां 230 रुपए में बिक गईं. अगर दोनों लड़कियों का कुल वजन 80 किलो भी था तो इस का मतलब 3 रुपए प्रति किलो… जरा याद कर के बताइए कि आप ने पिछली बार रद्दी अखबार किस भाव में बेचे थे?

शुरुआत के दिनों में खरीद कर लाई गईं लड़कियों को समझाने का काम हमें ही करना पड़ता है. कोई भी लड़की सिर्फ बात करने से नहीं मानती. फिर उसे खूब डरायाधमकाया जाता है. बहुत सारी लड़कियां डर के चलते मान जाती हैं और जो नहीं मानती हैं, उन के साथ बलात्कार करते हैं… मारतेपीटते हैं… बारबार, लगातार… जब तक वे इन जुल्मों के चलते टूट नहीं जातीं और काम करने के लिए हां नहीं कर देतीं.

पर कुछ लड़कियां फिर भी नहीं मानतीं. तब उन को बलात्कार करने के बाद बेहद बुरी तरह से सताया जाता है. कभीकभार उन की हत्या भी कर दी जाती है या वह लड़की खुदकुशी कर लेती है. ऐसी लड़कियों की लाश नदी किनारे या जंगल में पड़ी मिल जाती है जिसे लावारिस बता दिया जाता है.

मैं 18 साल से इस पेशे में हूं. मैं ने भी डर और जख्मों को भोगा है. हर पल मौत से भी बदतर रहा. दूसरी लड़कियों को इस दलदल में धकेले जाते हुए देखा है… और कोई कुछ नहीं कर पाता.

हम सिर्फ एक शरीर हैं. आप का साफसुथरा समाज सबकुछ देखता है और अपने काम में लग जाता है.

अब आइए बताती हूं… अपने ग्राहकों के बारे में.

पहले हमारे ग्राहक अधेड़ हुआ करते थे, पर अब नौजवान और यहां तक कि नाबालिग भी आते हैं.

इस पेशे का एक डरावना चेहरा यह भी है कि नाबालिग बहुत दरिंदे होते हैं. ये लड़के हम से अलगअलग डिमांड करते हैं. वे इंटरनैट पर जैसे सीन देखते हैं उन्हें दरिंदगी के साथ अपनाते हैं. हमारे मना करने पर खतरनाक हो जाते हैं क्योंकि पैसा दे कर मनमानी करना इन का हक है. ये लड़के काफी बेरहम होते हैं. पर हमारे पास चुनाव की गुंजाइश नहीं होती है. किसी तरह से उस वक्त को गुजारना होता है.

समाज में बैठे लोगों को लगता है कि हम बैठेबैठे मलाई खा रही हैं और हमारे पास बेतहाशा पैसे हैं. सच तो यह है कि हमारी हालत को देश के बजट जितना ही मुश्किल है समझना. हमें जब खरीदा जाता है तो वह रकम हमें ब्याज समेत चुकानी पड़ती है, जिसे हम 4 से 8 साल तक ही चुका पाती हैं.

क्या आप को पता है कि हमारी खरीद और बिक्री में लगी हुई पूंजी की ब्याज दरें कितनी होती हैं?

यह हमारा मालिक या दलाल तय करता है. लड़की की उम्र, खरीद की रकम, उस के चेहरेमोहरे… और आखिर में बिचौलिए होते हैं जिस में पुलिस और मानव अधिकार संस्थाएं चलाने वालों का भी हिस्सा होता है. सब मिल कर हमारी कीमत तय करते हैं.

यह भी एक बड़ा सच है कि एक धंधे वाली को मिलने वाले पैसे से बहुत से लोगों के घर पलते हैं. पर वह सभी लोग सभ्य समाज का हिस्सा बन जाते हैं और हम बदनाम गलियों की रोशनी…

शुरुआत के दिनों में सिर्फ हमें खाना और कपड़ा व मेकअप का कुछ सामान ही दिया जाता है. मुझे साल 1997 में महज 8,000 रुपए में खरीदा गया था. शुरू के 5 साल तक मुझे कभी कुछ नहीं मिला यानी 8,000 रुपए चुकाने के लिए मुझे 1000 से ज्यादा लोगों के साथ जिस्मानी संबंध बनाने पड़े.

मतलब प्रति ग्राहक मेरी लागत 8 रुपए थी. हालांकि अब इस समय हर लड़की को एक ग्राहक से 100 से 150 रुपए मिल रहे हैं.

आमतौर पर खुद का सौदा करने के लिए मजबूर एक लड़की महीने में 4,000 से 6,000 रुपए कमाती है. इस के बाद उसे घर का किराया 1,500 रुपए, खानापीना 3,000 रुपए, खुद की दवा 500 रुपए और बच्चों की पढ़ाईलिखाई अगर मुमकिन हो पाई तो 500 रुपए और सब से ज्यादा खर्च हमारे मेकअप का.

आप सोचते होंगे कि मेकअप की क्या जरूरत है? पर यदि मेकअप ही नहीं होगा तो ग्राहक हमारे पास नहीं आएगा.

पिछले 18 सालों में देशी और विदेशी तकरीबन 200 गैरसरकारी संस्थाएं देखी हैं. इन में से 7-8 को छोड़ कर बाकी सब फर्जी हैं.

ऐसा लगता है कि सरकारी और गैरसरकारी संस्थाएं मिल कर हमारी बस्तियों को बनाए रखने के लिए काम कर रही हैं.

हमारे लिए ऐसी संस्थाएं चंदा मांगती हैं, डौक्यूमैट्री फिल्में बनाती हैं… पर वह चंदा हमारे पास कभी नहीं पहुंचता.

अच्छी फिल्म बनने पर डायरैक्टर को और काम करने वाले कलाकारों को अवार्ड मिल जाता है, और हम जहां के तहां फंसी रहती हैं.

हम भी काम करना चाहती हैं. हम आलसी नहीं हैं. पर सच तो यह है कि हमें इस दलदल से निकलने ही नहीं देना चाहते समाज के ये ठेकेदार. हम जैसी औरतों का 2 बार जन्म होता है. एक बार मां के पेट से… और दोबारा समाज में धंधे वाली के रूप में.

हमारी सामाजिक जिंदगी भी आप की जैसी ही है. हम भी उत्सव मनाते हैं. जैसे ईद, दीवाली, क्रिसमस… सबकुछ… उस की बहुत बड़ी वजह है कि हमारे इलाके में सभी राज्यों से और विदेशी जैसे नेपाल, बंगलादेश, म्यांमार, रूस, आयरलैंड और भी बहुत से देश की लड़कियां इस चक्रव्यूह में फंसी हुई हैं.

हमारा रहनसहन पहले अलग था, पर अब नहीं… हमारी भाषा अलग है, हमारे धर्म अलग हैं, हमारी जाति अलग है… पर 18 साल से एकसाथ रहतेरहते हम लोगों ने एकदूसरे को अपना लिया है.

क्या आप ने कभी सुना है कि ऐसे इलाके में कभी दंगे हुए? झगड़े हुए? नहीं… क्योंकि हम एकदूसरे के दर्द के रिश्ते से जुड़ी हुई हैं.

मुझे कभीकभी फख्र महसूस होता है धंधे वाली होने पर… क्योंकि हम में बहुत एकता है, प्यार है, ईमानदारी है, इनसानियत है… हम में दर्द है और दर्द के होने का एहसास भी जिंदा है.

पर जिस समाज से आप आते हैं उस समाज में इन सारी बातों के लिए कहीं कोई जगह नहीं है और इसीलिए हमारे लिए भी आप के उस समाज में कहीं कोई जगह नहीं है. न दिल में, न समाज में.

अगर कुछ मिला है तो वह है नफरत और बातबात पर वेश्या की गाली… आप के लिए यह गाली होगी, पर यह हमारी जिंदगी है. एक ऐसी जिंदगी जिस को हम ने खुद नहीं चुना. हमें जबरन इस में धकेला गया और निकलने नहीं दिया जा रहा है.

एक बार दिल पर हाथ रख कर बताइए कि क्या आसान है एक धंधे वाली की जिंदगी?

हे! भैंसजी… : बनवारी ने पाली भैंस

बनवारी ने घर में लोन ले कर भैंस पाल रखी है. पर दूध के लिए नहीं, भैंस गोबर और भैंस मूत्र के लिए. आजकल न सरकार दूध देती है, न भैंस. पर भाई साहब, इस का मतलब यह बिलकुल नहीं हो जाता कि सरकार और भैंस को पालना बंद कर दो. कुछ काम नफेनुकसान की सोचने के बदले परंपरा निभाने के लिए भी करने पड़ते हैं.

वैसे, जब से बाजार में शुद्ध नकली दूध आया है, दूध हर जगह खत्म सा हो गया है. भैंस का गोबर बनवारी स्वदेशी अगरबत्तियां बनाने के लिए बेच देते हैं तो भैंस का मूत्र घर की शुद्धी के लिए फर्श क्लीनर बनाने के लिए.

आजकल देश में हर जगह स्वदेशी का परचम लहरा रहा है. जिसे देखो वही बाहर के माल पर स्वदेशी की छाप लगा कर लाखोंकरोड़ों रुपए कमा रहा है.

इसी परचम की नाक तले लोग शान से भैंस के गोबर को गाय का बता कर स्वदेशियों को उल्लू बनाते फिरें तो बनाते फिरें, इस से बनवारी को क्या. इस देश को कभी विदेशियों के तो कभी स्वदेशियों के हाथों उल्लू बनना ही लिखा है.

कल बनवारी ने अपने नहाने के पानी से खुद के नहाने के बजाय अपनी प्रिय भैंस नहलाधुला कर आंगन में बांधी ही थी कि कहीं से वे अचानक आ टपके.

बनवारी तो उस वक्त उन्हें पहचान नहीं पाए, पर भैंस उन को पहली ही नजर में पहचान गई. उन्हें सामने से आता देख वह इस तरह चारा खाने लगी जिस तरह नेता को आते देख जनता अपनी थाली का रूखासूखा दनादन खाने लगती है.

उन को सामने से आता देख भैंस अपने चारे को दबादब अपने पेट में छिपाने की कोशिश करने लगी मानो वह बरसों से जनता की तरह भूखी हो.

यह देख कर बनवारी परेशान, ‘हद है यार, इस भैंस को अपने मुंह का निवाला भी खिलाता हूं और यह उस के बाद भी भूखी की भूखी…’

भैंस को चारे के 4-4 ग्रासों का एक ग्रास करते देखा तो बनवारी ने भैंस से पूछा, ‘‘हे भैंस, यह क्या? इस देश में चारा खत्म तो नहीं हुआ जा रहा है जो तू इस तरह…’’

‘‘देखते नहीं सामने से कौन आ रहा है?’’ कह कर भैंस ने उसी तरह से चारा खाना जारी रखा तो बनवारी को बहुत गुस्सा आया, ‘हद है यार, इस देश में किसी को कितना भी खिला लो, पर उस का पेट है भरता ही नहीं.’

‘‘वह देखो मेरा चारा खाने वाला आ रहा है. डर है कि इस बार भी कहीं यह… इस से पहले कि यह आ कर मेरे मुंह का भी चारा न खा ले…’’ भैंस चिल्लाई.

भैंस की अक्ल तो बनवारी से भी बड़ी निकली. उन्होंने कुछ देर तक अपना दिमाग धुना, तब जा कर उन्हें पहचान पाए.

कल तक जो दूसरों की आंखों में आंसुओं का सैलाब रखते थे, आज उन की आंखों में लबालब आंसू.

बनवारी ने तो सोचा था कि सब की आंखों में आंसू हो सकते हैं, पर उन के कारनामों के चलते उन की आंखों में तो उन की आने वाली 7 पुश्तों तक की आंखों में आंसू नहीं आ सकते.

आते ही उन्होंने आव देखा न ताव और भैंस के पैर पकड़ लिए. बनवारी ने उन्हें भैंस के पैरों के पास से उठाने की बहुत कोशिश की, पर वे भैंस के पैरों से ऐसे चिपक गए जैसे भक्त भगवान के पैरों से चिपक जाता है.

तब बनवारी ने उन से कहा, ‘‘हे नेताजी, पैर पकड़ने हैं तो उन के पकड़ो. हो सकता है, सजा के चक्करों से भवसागर पार हो जाओ.

‘‘लोकतंत्र में भैंस के पैरों से ज्यादा जनता द्वारा गच्चा खा चुकों के पैर

होते हैं.’’

पर वे नहीं माने तो नहीं माने.

बस, भैंस के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहते रहे, ‘‘हे परमादरणीय

सुश्री भैंसजी, मैं थकाहारा तुम्हारे चरणों में आया हूं. लगातार हो रही सजाओं से मैं तंग आ गया हूं. अब तो मुझे माफ कर दो प्लीज. मैं ने तुम्हें बहुत कष्ट दिए हैं. तुम से छीन कर बहुत चारा खाया, पर अब इस

की सजा बहुत नहीं हो गई क्या? मैं तुम्हारे चरणों में पड़ कर अपने किए की तुम से माफी मांगता हूं.

‘‘अगले जन्म में तुम्हारा चारा खाना तो दूर अपना चारा भी तुम्हें ही दिया करूंगा. पर मुझे अब इन लगातार हो रही सजाओं से छुटकारा दिला दो…’’

शर्मनाक : लाठीतंत्र की ओर लौटता देश

देश में ऐसी बहुत सारी घटनाएं घट रही हैं जिन को देख कर यह साफ हो जाता है कि लोकतंत्र अब लाठीतंत्र की ओर बढ़ता जा रहा है. इस के पीछे धर्म के पाखंड को मजबूत करने की सोच साफतौर पर नजर आती है. इस को धार्मिक अंधविश्वास के डंडे के जोर पर तरहतरह से थोपा जा रहा है.

साल 2012 की एक घटना है. म्यांमार में बौद्धों और मुसलिम संघर्ष की प्रतिक्रिया उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में देखने को मिली थी. कट्टरपंथियों के उकसावे पर सैकड़ों की भीड़ लखनऊ के पक्का पुल पर जमा हुई थी. लोग लाठी, लोहे की छड़, छुरे और तमंचों से लैस हो कर आए थे.

लाठीतंत्र की अगुआ बनी भीड़ ने सब से पहले बुद्धा पार्क में महात्मा बुद्ध की मूर्ति को तोड़ा. इस के बाद शहीद स्मारक पर तोड़फोड़ हुई. वहां से लोग विधानसभा के पास आए और वहां धरना दे रहे बौद्ध समाज के अशोक चंद्र से मारपीट की.

देखा जाए तो म्यांमार की घटना में न तो लखनऊ के लोग शामिल थे, न ही यहां लाठीतंत्र अपनाने से म्यांमार में कोई असर पड़ने वाला था. पक्का पुल से विधान सभा भवन की दूरी महज 6 किलोमीटर है. भीड़ इतनी दूर बाजारों में तोड़फोड़ करते हुए बढ़ रही थी और प्रशासन मजबूर था.

भीड़ ने न केवल तोड़फोड़ की बल्कि पार्क में खेल रहे बच्चों और औरतों से बदतमीजी भी की. इस मामले के 6 साल बीत जाने के बाद भी कोई इंसाफ नहीं मिल सका है.

एससीएसटी आयोग का अध्यक्ष बनने के बाद बृज लाल ने इस घटना को संज्ञान में लिया और लखनऊ के एसएसपी से घटना के बाद उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी.

घटना के समय प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार थी. उन पर भी घटना को दबाने का आरोप है.

देखने वाली बात यह है कि अब इस मामले में क्या होता है? सरकार किसी की भी हो, लाठीतंत्र हमेशा हावी होता है. पूरे देश में ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं.

इस तरह की ज्यादातर घटनाओं में धार्मिक और जातीय वजह अहम होती हैं. 1-2 घटनाओं के घटने से बाकी लोगों के हौसले बढ़ते हैं जिस से धीरेधीरे अब ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं.

बढ़ता है हौसला

इतिहास गवाह है कि लाठीतंत्र के आगे सरकारें झुकती रही हैं. वे किए गए वादों से मुकर जाती हैं. कानून अपना राज स्थापित नहीं कर पाता और प्रशासन लाचार हो जाता है. इस तरह की घटनाओं में इंसाफ नहीं मिलता. अगर मिलता भी है तो आधाअधूरा.

साल 1992 के बाद राम मंदिर का आंदोलन इस तरह के भीड़तंत्र का एक उदाहरण है. उस समय की उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दे कर कहा था कि अयोध्या में कुछ नहीं होने पाएगा, पर भीड़तंत्र ने लाठीतंत्र के जोर पर विवादित ढांचा ढहा दिया.

26 साल बीत जाने के बाद भी इस का फैसला नहीं आ पाया है. ऐसी घटनाओं से लाठीतंत्र को बढ़ावा मिलता है. साल 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा इस का सब से बड़ा उदाहरण है जिस में उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को गुजरात के मुख्यमंत्री को ‘राजधर्म’ का पालन करने की सीख देनी पड़ी थी.

धीरेधीरे इस तरह की घटनाओं ने तेजी पकड़नी शुरू की. इन का दायरा बढ़ने लगा. लोग एकजुट हो कर इस तरह की घटनाआें को अंजाम देने लगे.

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में एक समुदाय को मारने की घटनाएं लाठीतंत्र का ही उदाहरण हैं. जहां पर एक समुदाय के खिलाफ हिंसा होती रही और बाकी समाज चुप्पी साधे रहा.

पहले इस तरह की गिनीचुनी घटनाएं घटती थीं, पर अब इन की तादाद बढ़ती जा रही है. गौरक्षा के नाम पर ऐसी तमाम घटनाएं घटी हैं जिन में लाठीतंत्र का असर देखने को मिला.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अखलाक की हत्या इस का प्रमुख उदाहरण है. उत्तर प्रदेश की ही तरह राजस्थान, हरियाणा और दूसरे प्रदेशों में भी इस तरह की घटनाएं घटी हैं. इन में सरेआम लोगों की पिटाई और हत्या तक की गई.

साल 2008 में गुर्जर समाज ने पिछड़े तबके के बजाय खुद को दलित जाति में शामिल किए जाने को ले कर आंदोलन किया था. तब पुलिस और आंदोलन करने वालों के बीच हिंसक झड़पों में तकरीबन 37 लोगों की मौतें हुई थीं.

साल 2015 में गुजरात में पाटीदार समाज ने आरक्षण पाने के लिए आंदोलन किया था. 25 अगस्त को अहमदाबाद में हुए सब से बड़े प्रदर्शन में जनजीवन ठप हो गया था.

अगस्त से सितंबर तक की घटनाओं में 14 लोगों की मौतें हो गई थीं. 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. बहुत सारी बसें जला दी गई थीं. केवल अहमदाबाद शहर में ही 12 करोड़ रुपए से ऊपर का नुकसान हुआ था.

आरक्षण पाने के लिए जाट समुदाय ने साल 2016 में आंदोलन किया था. हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में 340 अरब रुपए का नुकसान हुआ था. रेलवे का तकरीबन 60 करोड़ रुपए का घाटा हुआ था. तकरीबन ढाई दर्जन लोग मारे गए थे.

आंध्र प्रदेश में कापू आंदोलन हुआ. कापू समुदाय ने खुद को पिछड़ी जाति में शामिल किए जाने की मांग को ले कर आंदोलन छेड़ा और रेलवे लाइन और हाईवे को बंद कर दिया. ‘रत्नाचंल ऐक्सप्रैस’ रेलगाड़ी की कई बोगियों में आग लगा दी गई थी. इतना ही नहीं, सिक्योरिटी में लगे आरपीएफ के जवानों पर भी हमला किया गया.

अगस्त, 2017 में हरियाणा के पंचकूला में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरुमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद उपजी हिंसा में 29 लोगों की मौत और 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए.

इसी तरह फिल्म ‘पद्मावत’ के विरोध में राजस्थान में करणी सेना ने फिल्म के सैट पर तोड़फोड़ की. जनवरी, 2018 में जब यह फिल्म रिलीज हुई तो विरोध में हिंसक घटनाएं हुईं.

अप्रैल, 2018 में दलित ऐक्ट में संशोधन के विरोध में हिंसा हुई. वह भी लाठीतंत्र का ही उदाहरण है.

क्यों नहीं बदल रहे हालात

देश की आजादी के बाद भारत को एक लोकतांत्रिक देश का दर्जा मिला. शांति और अहिंसा को देश का मूल स्वरूप रखा गया. आजादी की लड़ाई के समय महात्मा गांधी ने अहिंसा का सहारा ले कर अंगरेजों को देश छोड़ने पर मजबूर किया था. गांधीजी ने कई ऐसे आंदोलन को वापस लिया जिस में हिंसा होने लगी थी.

आजादी के समय अहिंसा ने अपना काम किया और आजादी के बाद जब देश को ज्यादा संविधान का पालन करना चाहिए था तब हिंसक घटनाएं घटने लगीं. इन में देश में होने वाले चुनावों का रोल भी काफी असरदार होता है.

अगर 1977 और 1984 के चुनावों को छोड़ दें तो हर चुनाव में जातिधर्म का ही बोलबाला रहा है. राजनीति धर्म और जाति पर केंद्रित होती है. जीत के लिए जाति और धर्म का सहारा लिया जाने लगा. इस की वजह से खेमेबंदी शुरू हो गई और लाठीतंत्र के खिलाफ कदम उठाना मुश्किल हो गया.

धर्म की कहानियों से शिक्षा लेने वाले समाज को दिखता है कि धर्म में ऐसी बहुत सी घटनाएं घटी हैं जहां पर अपनी बात को मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लिया गया.

देश के सब से लोकप्रिय पौराणिक ग्रंथ ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ इस से भरे पड़े हैं. ‘रामायण’ में राजा बलि का उदाहरण देखें तो पता चलता है कि अपनी बात को मनवाने के लिए राम ने उस से युद्ध किया और उस को मार कर बलि का राज्य उस के छोटे भाई सुग्रीव को दे दिया. शूर्पणखा ने जब लक्ष्मण के सामने प्रणय निवेदन किया तो लक्ष्मण ने  सबक सिखाने के लिए उस की नाक काट ली.

धार्मिक ग्रंथों में कई ऐसी कहानियां हैं जिन में यह पता चलता है कि अपनी बात को मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है. इन कहानियों को पढ़ कर लोगों ने अब हिंसा का ही सहारा ले लिया है. उन को जब भी राज्य से शिकायत होती है वे हिंसा का सहारा लेते हैं.

यह बात और है कि हिंसा का सहारा ले कर चले आंदोलन कभी कामयाब नहीं होते. साल 2012 का अन्ना आंदोलन वर्तमान समय में इस का उदाहरण है.

कांग्रेस की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के समय में लोकपाल बिल को ले कर यह आंदोलन इतना प्रभावी हुआ कि कांग्रेस पूरी तरह से सरकार से बाहर हो गई. भाजपा कांग्रेस के विकल्प के रूप में सरकार बनाने में कामयाब हो गई.

सत्ता में आने के बाद भाजपा इस बात से अनजान है. उस के राज में ऐसी कई घटनाएं घटी हैं जिन में हिंसा का सहारा लिया गया था.

भाजपा चाहती तो इन को रोक सकती थी. पर उस ने वोट बैंक का फायदा लेने के लिए ऐसा नहीं किया. आज सोशल मीडिया का दौर है जिस में किसी भी घटना की प्रतिक्रिया बड़ी तेजी से सामने आती है. इस से हिंसा और भड़क जाती है. भीड़ और लाठीतंत्र एकदूसरे के पूरक हो गए हैं.

संविधान के मुताबिक, लोकतंत्र में सभी को इज्जत और इंसाफ मिलना चाहिए. इस की हिफाजत तभी मुमकिन है जब राज करने वालों की मनमानी पर रोक लगे या उन की नीयत साफ हो. जब तक वोट बैंक और उस से होने वाले नफानुकसान को देख कर फैसले होंगे तब तक इंसाफ नहीं मिलेगा. भीड़ लाठी ले कर आएगी और अपने हिसाब से काम करने को मजबूर कर देगी. ऐसा लाठीतंत्र किसी के भी फायदे में नहीं है.

उछला जातधर्म का मुद्दा

कर्नाटक चुनावों में भी जिस तरह दलितों, पिछड़ों व मुसलिमों का मुद्दा उछला उस से साफ है कि आजादी के 70 साल बाद भी देश की पहले नंबर की उलझनों में जातिधर्म ही है, पैसा, गरीबी, बिजली, पानी, नौकरी नहीं. अब तक भारतीय जनता पार्टी हिंदूमुसलिम मुद्दा उछाल कर काम चला लेती थी और दलितपिछड़ों का मुद्दा हिंदूमुसलिम झगड़े में छिप जाता था. अब भगवाधारी मुखर हो गए हैं कि उन के हाथों में हिंदू राजाओं की पेशवाई ताकत आ गई है और वे पौराणिक ग्रंथों के हिसाब से जाति के हिसाब से देश, सरकार व समाज को चलाएंगे.

उच्चतम न्यायालय के असर वाले फैसले के बावजूद कर्नाटक चुनावों में भाजपा को बारबार साफ करना पड़ा है कि वह दलितों के खिलाफ नहीं है पर देशभर में फैले खुद को भाजपाई कहने वाले दलितों पर दंगई करते रहे हैं और भाजपा सही सफाई न दे पाई. हार कर नरेंद्र मोदी को राहुल गांधी के पुरखों को कोसने की ऐसी ही जरूरत आ पड़ी जैसी पौराणिक कहानियों में शूद्र पुत्रों को कोसा जाता था.

दलित पिछड़ों को बराबरी की जगह न देने का ही देश को हजारों सालों से नुकसान भरना पड़ा है. हमारे यहां युद्ध के समय दलितों व पिछड़ों को हथियार नहीं दिए जाते थे कि कहीं वे बाद में सवर्णों के खिलाफ इस्तेमाल न हो जाएं. इसीलिए बारबार थोड़े से सैनिकों के साथ बीहड़ पहाडि़यों को पार कर आने वाले भी देश पर राज करते रहे हैं. देश पर उच्च हिंदू राज कब हुआ यह ढूंढ़ना ही मुश्किल है. यह सिर्फ पुराणों में लिखा मिलता है. ऐतिहासिक सुबूत नहीं दिखते.

आज जो लोग सपना देख रहे हैं कि दलित पिछड़ों के बगैर देश को चीन, जापान, यूरोप, अमेरिका बनाया जा सकता है, बेहद गलतफहमी में हैं. भारतीय जनता पार्टी की कर्नाटक जीत से साफ है कि देश अभी उसी वर्ण व्यवस्था के मुद्दे को सुलझाने में लगा है. प्रगति की बातें तो बस दिखावटी हैं.

कैदियों के अश्लील कमेंट्स ने इन्हें बना दिया मौडल

हर किसी कि तरक्की या कामयाबी के पीछे एक न एक कहानी जरूर जुड़ी होती है. वैसे तो दुनिया में कई ऐसे लोग है जिनकी जिंदगी की कहानी बड़ी मजेदार है. आज हम आपको हौलीवुड की एक ऐसी खूबसूरत मौडल की कहानी बताने जा रहे हैं जिसके बारे में जानकर आप भी हैरान रह जायेंगे!

जी हां, आज हम आपको मिस वर्ल्ड न्यूड ब्यूटी कौन्टेस्ट का टाइटल दो बार जीतने वाली औस्ट्रेलिया की इजाबेल डेल्टोर के बारे में और उनके मौडल बनने के पीछे की एक दिलचस्प कहानी के बारे में बताएंगे.

क्या आप जानते हैं कि इजाबेल डेल्टोर केवल एक कैदी के कहने पर अपना सब कुछ छोड़कर एक फैमस मौडल बन गईं. अगर नहीं तो आज उनके इस राज से पर्दा उठाने के लिए हम आपके लिए यह खबर लेकर आएं हैं. आइये जानते हैं इजाबेल के मौडल बनने के पीछे की कहानी.

इजाबेल डेल्टोर जो कि आज इक खूबसूरत मौडल बन चुकी हैं, वो कभी जेल में सिक्युरिटी गार्ड की नौकरी का काम किया करती थीं. उस समय लोग उनको दुनिया की सबसे खूबसूरत सिक्युरिटी गार्ड कहा करते थे. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इसाबेल 29 की उम्र तक औस्ट्रेलिया की एक हाई सिक्युरिटी जेल में गार्ड की जौब करती थीं.

आपने वो कहावत तो सुनी ही होगी कि हर सफल आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है लेकिन यहां कहावत जरा उल्टी पड़ गई. हां आप बिल्कुल सही समझ रहे हैं, यहां एक सफल औरत के पीछे एक मर्द का हाथ है और कोई ऐसा-वैसा मर्द नहीं बल्कि जेल का एक कैदी.

इसाबेल ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए अपने एक इंटरव्यू के दौरान बताया कि उनके सुपरमाडल बनने की वजह जैल में रहने वाले कैदी हैं. वह उन्हीं के कारण आज एक सुपरमाडल हैं. उन्होंने कहा कि वह जहां जौब करती थीं उस जेल के कैदी और कुछ साथी औफिसर उन्हें दिनभर घूरते रहते थे. इतना ही नहीं कुछ कैदी तो उनपर अश्लील और भद्दे कमेंट्स करते रहते थे जिस वजह से उनका वहां जौब करना मुश्किल हो गया था.

इस तरह के कमेंट रोज ही होते थे, पर एक बार एक कैदी ने उनपर अश्लील कमेंट करते हुए कहा कि तुम्हें माडलिंग करनी चाहिए. बस तभी इसाबेल के दिमाग में माडलिंग करने का आइडिया आया और उस दिन से उनकी जिंदगी बदल गई और उन्होंने माडलिंग करने की ठान ली.

इस बीच वह एक क्लब का हिस्सा बनी और वहां पर स्ट्रिप डांस किया. उन्होंने बताया कि जब वे पहली बार क्लब में स्ट्रिप डांस करने पहुंची तो उन्होंने एक ही दिन में इतने पैसे कमा लिए जितना वे अपनी जौब से दो हफ्ते में काम करके कमाती थीं. उसी रात 4 बजे उन्होंने अपनी जिन्दगी से जुड़ा एक अहम फैसला लिया और एक मेल करके अपनी सिक्युरिटी गार्ड की जौब से रिजाइन दे दिया. बस फिर क्या था वह पूरी तरह से अपने माडलिंग पर फोकस करने लगी और इसी वजह से आज वह माडल हैं.

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