संजू की तरह ही है मंजू की कहानी

राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘संजू’ पिछले काफी वक्त से सुर्खियों में हैं. इस फिल्म में रणबीर कपूर लीड रोल निभा रहे हैं और फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच अभी से ही काफी उत्साह है. फिल्म के 2 गानें भी रिलीज कर दिए गए हैं और इन्हें भी फैन्स का अच्छा रिस्पौन्स मिला है. संजय दत्त की जिंदगी को बखूबी बयां करती इस फिल्म को देखने का फैन्स बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. संजू को मिल रही इस पौपुलेरिटी के बीच मंजू का भी एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है.

‘मंजू’ के इस वीडियो को 1 दिन पहले ही यूट्यूब पर अपलोड किया गया है और सोशल मीडिया पर यह वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है. इसकी कहानी संजू से मिलती जुलती है लेकिन मंजू एक कामवाली की कहानी है, जिसने अपनी मालकिनों का जीना मुश्किल किया हुआ है. हालांकि, इस वीडियो को देखने के बाद आप भी हंसी नहीं रोक पाएंगे और हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाएंगे. बता दें, यह वीडियो संजू का स्पूफ है लेकिन इस वीडियो में कई सारे बदलाव किए गए हैं.

गौरतलब है कि, संजू का निर्देशन राजकुमार हिरानी ने किया है. फिल्म में रणबीर कूपर के अलावा दीया मिर्जा, सोनम कपूर, अनुष्का शर्मा, विक्की कौशल, करिश्मा तन्ना और मनीषा कोइराला जैसे  सितारे लीड रोल में है. फिल्म 29 जून को रिलीज होगी. फिल्म में संजय दत्त के करियर की शुरुआत से लेकर अब तक की कहानी को हूबहू दिखाया जाएगा और फिल्म में रणबीर भी हूबहू संजय दत्त ही लग रहे हैं. फैन्स फिल्म के रिलीज होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

सवालों के घेरे में रीलौंचिंग

रीलौंचिंग होती है, होने दें. प्रोडक्ट की रीलौंचिंग होती रहनी चाहिए. गाडि़यों की होती है. बिल्डर फ्लैटों की करते हैं. साहित्य, कला, संस्कृति इन से अलग नहीं हैं. संगीत के साथसाथ सभी कलाओं में भी रीलौंचिंग की परंपरा है. अरे भाई, नेताओं की या पार्टियों की रीलौंचिंग हो, तो हायतोबा मचाने की क्या जरूरत आ पड़ी. सरकारों का भी एक रूप बहुरुपियों का होता है. इधर भूमि अधिग्रहण विधेयक को ग्रहण लगा हुआ है, फिर भी वह नएनए विधेयक या अध्यादेश के रूप में लौंच होता रहता है. लोकतंत्र को चलाए रखने के लिए यह सब होता रहना जरूरी है.

लौंचिंग से फसलों पर पड़े ओलों की भरपाई नहीं हो सकती. बाउंस होते सरकारी चैकों से रकम नहीं आ जाएगी. किसानों की आत्महत्या के आंकड़े भी कम नहीं होंगे. लेकिन किसानों को कंगाल बना देने वाली अधिग्रहण बिल की साजिश देश के लोगों को जरूर समझ में आएगी. कारपोरेट घराना एक नए भारत का सपना संजोए हुए है. उस में किसानों को अभी से हाशिए पर डालने की कोशिश का नाम है भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, ताकि किसानों की बेशकीमती जमीन पर अरबपति अपने सपनों के आशियाने को और मजबूती दे सकें.

लौंचिंग हो तो दमदार हो, जानदार हो. जैसे बराक ओबामा के साथ 10 लाख के सूट का दमखम दिखा. पूरे देश में तहलका मचा. सोशल मीडिया में सूट छा गया. उन दिनों देश के पास सूट के सिवा और था ही क्या? कोई कीमत आंकने लगा, कोई दर्जी की तलाश में निकल पड़ा.

भद्रजन सूट के होने पर सवालिया निशान दागने लगे. करोड़ोंअरबों के वारेन्यारे को छोड़ कर देश का मीडिया हाथ धो कर सूट के पीछे पड़ा रहा. कीमती सूट के साथ प्राइम मिनिस्टर की लौंचिंग होती है, तो इतने बवाल की क्या जरूरत? देश के स्वाभिमान के सामने 10 लाख की क्या औकात? वैसे भी इतिहास को दोबारा लिखा जा रहा है. नए इतिहास में एकाध अध्याय सूट व सूट माहिरों पर भी हो जाए, तो बिल्ली के भाग्य से. सूट बड़ा भाग्यशाली निकला. नीलामी में अपनी ऊंची बोली लगवा कर सुर्खियों में आ गया. इसे कहते हैं अपनाअपना भाग्य. आजकल कुछ नेता बिलकुल नई तरह से अपनी लौंचिंग कराने लगे हैं.

वे न्यूज चैनलों में आएदिन बहस के लिए आते हैं. बहस का जवाब देते हैं. सवालजवाब करते हैं. एकाएक इमोशनल हो जाते हैं. इतने इमोशनल कि फूटफूट कर रो पड़ते हैं, फफकने लगते हैं. चैनलों की टीआरपी बढ़ाते हैं. एक हद तक दर्शकों की हमदर्दी भी बटोर ले जाते हैं.

यह एक नए किस्म का पैतरा है. देखें, कितने दिन चलता है. जनता भी अब इतनी गंवार और जाहिल नहीं रही. ऊलजलूल टिप्पणी करना. जो मुंह में आए, बेलगाम बोलना. या फिर संवैधानिक भावनाओं के उलट आचरण करते हुए भी नेता व मंत्री अपनी लौचिंग कराने लगे हैं.

यह लौचिंग का सस्ता, सुंदर व टिकाऊ तरीका है. जब देशभर में आलोचना के स्वर उभरते हैं, निंदा होने लगती है, तो फिर ये अपने बयान से मुकर जाते हैं. माफी मांग लेते हैं. फटकार पड़ने पर रोनेधोने का नाटक भी कर लेते हैं. देश लौंचिंग के नए दौर से गुजर रहा है. अभी बहुतकुछ देखना है. देखते चलिए. मुसकराते हुए. महल्ले का लड़का पंच बनता है, तो उस की लौंचिंग जरूरी हो जाती है. ऐसे मौके पर पटाखों का शोरगुल और ढोलनगाड़ों की थाप आम बात है. वही लड़का सरपंच बन जाए, तो फिर रीलौंचिंग. पूरा कसबा मस्ती में. बोतलों की बहार. सब के अपनेअपने राम और रहीम.

एक नेता के मंत्री बनते ही कृष्णावतार हो जाता है. लौंचिंग पर लौंचिंग. मंत्री शहर का हुआ, तो समझो कि शहर की ऐसीतैसी. दर्जनों गेट. बैनरपोस्टर और फ्लैक्स. ये सब उसी जगह दिखते हैं, जहां इन को लगाने की मनाही है. मीलभर लंबे जुलूस और डीजे की कानफोड़ू आवाज के साथ ही मंत्री की लौंचिंग होती है. मंत्री भी कौन? वही घिसापिटा पुराना पापी, जिस की सारी बत्तीसी नकली. उम्र के असर में लहरा कर चलते हैं. यही लहरा कर चलना उन की खास अदा में शामिल है. कमर में दर्द का स्थायी भाव. सिर पर हिमाचली टोपी नया लुक देती है. थोड़ा झुकने लगे हैं, पीसा की मीनार की तरह. लेकिन रोब एक नंबर का. खानेकमाने में वही जोश. पूरे शहर के नामीगिरामियों को जुलूस में शामिल रखने की हैसियत रखते हैं.

सत्ता के गलियारे में भटकते ऐसे चरित्रों को जनता बखूबी पहचानने लगी है. अब यह शोरगुल और नकली जयजयकार उन्हें पीड़ा पहुंचाने लगी है. चारों तरफ असुरक्षा है, चुनौतियां हैं. वह जिंदा रहने की जद्दोजेहद से गुजर रही है. खयालों की एक पूरी दुनिया उस के साथ है. लेकिन भविष्य की तमाम उम्मीदें धुंधली नजर आती हैं, क्योंकि उस की जद्दोजेहद की आवाज सुनाई नहीं पड़ती. ऐसे माहौल में तरहतरह की लौंचिंग कई सवाल खड़े करती है.

विनोद राठौड़ की वापसी

अपने समय के मशहूर गायक व संगीतकार पंडित चतुर्भुज के बेटे विनोद राठौड़ ने बौलीवुड में बतौर पार्श्वगायक काफी बेहतरीन काम किया है. विनोद राठौड़ ने लता मंगेशकर, सुरेश वाड़ेकर, अलका याज्ञनिक, साधना सरगम, अनुराधा पौड़वाल, कविता कृष्णमूर्ति सहित कई दिग्गज गायकों के साथ तमाम गीत गाए हैं. उन्हें दो बार सर्वश्रेष्ठ गायक का फिल्मफेअर सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं. इतना ही नही विनोद राठौड़ उन गायकों में से रहे हैं, जिनके लिए भाषा की कभी कोई बंदिश नहीं रही. वह हिंदी के अलावा उड़िया, मराठी, तेगलू, गुजराती,अंग्रेजी, पंजाबी, सिंधी, तमिल, कन्नड़, राजस्थानी व भोजपुरी के साथ साथ फारसी भाषा में भी गीत गाकर शोहरत बटोर चुके हैं.

पर विनोद राठौड़ लंबे समय से गायब थे. अब विनोद राठौड़ एक बार फिर सक्रिय हुए हैं. विनोद राठौड़, निर्माता पी अभय कुमार की, डी. के. बरनवाल के निर्देशन में बन रही हत्या व रहस्य प्रधान फिल्म‘‘वह कौन थी’’से पुनः वापसी कर रहे हैं. हाल ही में विनोद राठौड़ ने फिल्म ‘‘वह कौन थी’’ के लिए संगीतकार संजय राज के निर्देशन में मुंबई स्थित कुमार सानू के स्टूडियो में एक गाने की रिकार्डिंग की.

विनोद राठौड़ कहते हैं- ‘‘मैं कहीं गायब नहीं हुआ था. मैं सदैव बेहतरीन रचनात्मक काम करने में यकीन करता हूं. मैंने कभी भी भेड़चाल का हिस्सा बनने व सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए काम नहीं किया. जब अच्छे गाने नहीं आ रहे थे, तो भी मैं संगीत की साधना में रत था. मेरे संगीत के शो लगातार हो रहे थे. अब एक अच्छा मौका मिला, तो मैंने ‘वह कौन थी’के लिए गाना गाया है.’’

धराशायी हो रहा क्योटो का सपना

उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के बारे में कहा जाता है कि यह भगवान शिव की नगरी है. धार्मिक कहानियों में बताया जाता है कि वाराणसी यानी काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है. धार्मिक नगरी होने के कारण यहां लोग मोक्ष प्राप्त करने के लिए आते हैं.

यहां से पूरी दुनिया को आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है. यहीं पर संकटमोचक हनुमान का मंदिर है. 15 मई को जब चौकाघाटलहरतारा फ्लाईओवर का एक हिस्सा गिर जाने से 20 लोगों की मौत हुई तो कुछ भी पुण्यप्रताप, पूजापाठ काम नहीं आया. घरों से निकले लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि रास्ते में मौत उन का इंतजार कर रही है.

धर्म की राजनीति का लाभ लेने के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया. चुनावप्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने बारबार इस बात को अपने भाषणों में दोहराया कि वे यहां खुद नहीं आए हैं उन को मां गंगा ने बुलाया है. गंगा की सफाई से ले कर काशी को क्योटो जैसा आधुनिक शहर बनाने का वादा जनता से किया.

लोकसभा चुनाव में जीत के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए पर काशी का क्योटो बनने का सपना पूरा नहीं हो सका. गंगा की सफाई को ले कर दिए गए तमाम तरह के दावे फेल हो गए. केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं. इस के बाद भी यहां विकास और भ्रष्टाचार का तानाबाना विफलता की कहानी कह रहा है.

कैसे हुआ हादसा

15 मई को शाम करीब 5 बजे का समय रहा होगा. चौकाघाट फ्लाईओवर को बनाने का काम चल रहा था. फ्लाईओवर के लहरतारा वाले छोर पर गार्डर को ऊपर रखे जाने का काम चल रहा था. 2 पिलरों के बीच करीब 28 मीटर लंबाई और 15 मीटर चौड़ाई में 5 गार्डर रखे जाने थे. दोनों पिलरों के बीच रखे जाने के बाद पांचों गार्डरों को एकदूसरे से जोड़ दिया जाना था. पिलर के शिखर पर गार्डर को तुरंत न रख कर पहले बेयरिंग पर रखा जाता है. इस के बाद धीरेधीरे बेयरिंग को हटा कर गार्डर को पिलर पर सैट कर दिया जाता है.

घटना के समय पिलर पर गार्डर यानी बीम को टिकाने के लिए बेयरिंग को हटाने का काम चल रहा था.

2 गार्डरों से बेयरिंग हटाई जा चुकी थीं. बाकी का काम चल रहा था. शाम को 5 बज कर 20 मिनट पर गार्डर का संतुलन बिगड़ गया. वह नीचे गिरने लगा. गार्डर लड़खड़ाते हुए कुछ सैकंड्स के लिए रुका, फिर नीचे सड़क पर गिर गया.

नीचे सड़क पर खड़े और चल रहे लोगों को इस का आभास नहीं हो सका. जिस से उस के नीचे तमाम गाडि़यां और लोग दब गए. बचाव काम के लिए सब से अधिक परेशानी क्रेन को यहां तक लाने और गार्डर को हटा कर नीचे दबे लोगों को निकालने की थी. गार्डर इतने भारी थे कि 3-3 क्रेन मिल कर एक गार्डर का केवल कुछ हिस्सा ही उठा कर लोगों को बचा पा रही थीं. 10 क्रेनों को इस काम में लगाया गया.

सरकारी अफसरों से ले कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य रात 10 बजे से पहले वहां पहुंच गए और मदद के लिए मुआवजे का ऐलान शुरू हो गया. विपक्ष ने मुआवजा बढ़ाने की मांग शुरू कर दी. सरकार ने घटना के तुरंत बाद चीफ प्रोजैक्ट मैनेजर सहित कुछ लोगों को सस्पैंड कर दिया. मुख्यमंत्री ने 48 घंटे में घटना की रिपोर्ट मांगी. फौरीतौर पर यही हो सका.

सरकार की लापरवाही

भाजपा के समर्थक और नेता इसे अपनी सरकार की नाकामी नहीं मानते. उसे कभी कांग्रेस तो कभी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की विफलता करार दे देते हैं. गोरखपुर, कुशीनगर और वाराणसी में हुई दुर्घटनाओं ने केंद्र और प्रदेश सरकार की पोल खोल दी है. वाराणसी में फ्लाईओवर बनने के दौरान बीम गिरने से 20 लोगों के मरने और 30 से अधिक लोगों के घायल होने की दुखद घटना घटी.

वाराणसी में राष्ट्रीय राजमार्ग-2 पर चौकाघाटलहरतारा फ्लाईओवर का काम बेहद धीमी गति से चल रहा है. ढाई साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद अभी तक महज 53 फीसदी काम ही हो सका है. इस काम को जून तक पूरा हो जाना था. काम समय पर पूरा न होने के कारण इस की समयावधि दिसंबर तक बढ़ा दी गई थी.

चौकाघाटलहरतारा फ्लाईओवर इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वाराणसी के कैंट स्टेशन के पास स्थित है. इस फ्लाईओवर को बनाने का काम उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम कर रहा है, जो सरकार की संस्था है. इस संस्था की लापरवाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रोडवेज से रेलवे स्टेशन के आगे तक रोड के किनारे लोहे के स्क्रैप रखे हैं. जिन से टकरा कर अकसर लोग घायल होते रहते हैं.

शिकायतों के बाद भी सेतु निगम ने कोई हल नहीं निकाला. कैंट रेलवे स्टेशन के सामने तो सालों से लोहे की सीट लगा कर रास्ता बंद कर दिया गया है. यहां आने वालों के लिए सड़क पार करना बेहद मुश्किल होता है.

करीब 6 माह पहले जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वाराणसी के दौरे पर आए थे तो उन्होंने फ्लाईओवर का निरीक्षण भी किया था. मुख्यमंत्री काम की धीमी प्रगति से नाराज थे. साथ ही, काम के प्रति लापरवाह अफसरों को उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि काम को समय पर पूरा किया जाए. फ्लाईओवर का निर्माण कर रही संस्था के अफसरों पर इस चेतावनी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा.

सचाई यह है कि यहां पर आधे से ज्यादा काम ठेकेदारों द्वारा कराया जा रहा है. रौ मैटरियल और लेबर का काम इस में प्रमुख है. ठेकेदार पैसा बचाने के चलते सही काम नहीं करते. कम मजदूरों से काम चलाने के कारण यह फ्लाईओवर समय पर तैयार नहीं हो सकता.

केवल मुख्यमंत्री ही नहीं, जिले के डीएम योगश्वर राम मिश्र भी 6 माह में कई बार फ्लाईओवर का निर्माण कार्य देखने गए थे. इस के बाद भी निर्माण मानकों और सुरक्षा मानकों पर ध्यान नहीं दिया गया. सड़क के दोनों तरफ किसी भी तरह की बैरीकेटिंग नहीं की गई, जिस से आनेजाने वालों को परेशानी होती थी. निर्माण काम कर रही संस्था अपनी मनमानी से काम कर रही थी.

इस फ्लाईओवर का निर्माण 2015 में शुरू हुआ, जिस के तहत 1,710 मीटर का निर्माण होना था. 30 माह में इस काम को पूरा किया जाना था. इस की लागत 77.41 करोड़ रुपए रखी गई थी. फ्लाईओवर को बनाने में 63 पिलर बनने हैं. जून तक काम पूरा होना था. अभी तक 45 पिलर ही तैयार हुए. ऐसे में काम के निर्माण की तारीख को दिसंबर तक बढ़ा दिया गया था.

उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम को लखनऊ में मैट्रो का निर्माण कर रही संस्था से सीखना चाहिए था. प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मैट्रो का निर्माण कार्य बेहद भीड़भाड़ वाले इलाकों में चल रहा है. यह कार्य बहुत ही सावधानी से ट्रैफिक को रोक कर किया जा रहा है. इस का 24 घंटे काम चलता है. यही नहीं, समय से काम चल रहा है. मैट्रो निर्माण का काम निजी संस्था मिल कर कर रही है. ऐसे में सेतु निगम और पीडब्लूडी जैसी संस्थाओं को मैट्रो निर्माण करने वाली निजी संस्था से सीखना चाहिए.

वाराणसी से पहले यहां से कुछ ही दूरी पर स्थित गोरखपुर और कुशीनगर में ऐसे ही लापरवाहीपूर्ण हादसे हो चुके हैं. गोरखपुर के अस्पताल में औक्सिजन की कमी से बच्चों की मौत हो गई तो कुशीनगर में स्कूली वैन रेलगाड़ी से टकरा गई.

गोरखपुर और वाराणसी में एक समानता और है कि एक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का शहर है तो दूसरा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है और कुशीनगर भगवान बुद्ध की नगरी है. ऐसे में इन जगहों पर हुए हादसे बताते हैं कि वीवीआईपी जिले भी किस हद तक भ्रष्टाचार व लापरवाही के शिकार हैं. हर घटना में निचले स्तर पर कार्यवाही की गई जबकि मंत्री स्तर पर किसी को जिम्मेदार नहीं माना गया.

भूल जाते हैं लोग

इन तीनों ही घटनाओं में मुख्य जिम्मेदार सरकारी महकमे हैं. कुशीनगर में रेलवे प्रशासन ने मानवरहित क्रौसिंग को सुधारा नहीं था. गोरखपुर में हादसा सरकारी अस्पताल में हुआ और अस्पताल की लापरवाही से बच्चे मरे. ऐसे में कहीं न कहीं जरूरत इस बात की थी कि मंत्री और सरकार के स्तर पर अपनी भूल को स्वीकार किया जाता. तभी सुधार की संभावना नजर आती.

मौजूदा सरकार हर मुद्दे पर राजनीतिक अंदाज में बयानबाजी कर दूसरे दलों और सरकारों की नजीर दे कर खुद बचाने की कोशिश करती है. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा कि मैं उम्मीद करता हूं कि सरकार केवल मुआवजा दे कर अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागेगी, बल्कि ईमानदारी से जांच कर दोषियों को सजा भी देगी.

घातक है स्वास्थ्य सेवा का व्यापारीकरण

आप की सेहत पर कंपनियां अब मोटा नहीं बहुत मोटा पैसा बना रही हैं. देश में अपोलो, मैक्स और फोर्टिस जैसे मल्टी स्पैश्यलिटी अस्पतालों पर खरीदार 5,000 करोड़ से 10,000 करोड़ खर्चने को तैयार बैठे हैं और उन के मूल प्रमोटर अब बापदादाओं की मेहनत का बहुत मोटा मुनाफा कमा रहे हैं.

अब स्वास्थ्य सेवा स्वास्थ्य सेवा नहीं रह गई है, कमाऊ गाय बन गई है जिसे आधुनिक तकनीक व नित नए शोधों से भरपूर खिलायापिलाया जा रहा है.

इन स्वास्थ्य कंपनियों को पैसा उन आम लोगों की जेबों से आता है जो अपनी या अपने अजीजों की जान बचाने के लिए अपनी आखिरी कौड़ी तक कुरबान करने को तैयार हो जाते हैं. बढ़ते प्रदूषण और बदलते लाइफस्टाइल से नित नई बीमारियां पैदा हो रही हैं. इन की वजह से लोगों को पहले से कई गुना ज्यादा पैसा खर्चना पड़ रहा है और इसी की वजह से अस्पतालों की चेनें बन रही हैं, जिन्हें खुले बाजार में बेचा जा रहा है.

फोर्टिस अस्पतालों को खरीदने के लिए देशीविदेशी कंपनियां 2,500 करोड़ तक लगाने को तैयार हैं और 10-20 दिन में जब यह डील हो जाएगी तो इन अस्पतालों के कर्ताधर्ता एक बार फिर बदल जाएंगे.

स्वाभाविक है कि अब अस्पतालों के नए मालिकों को अपनी लगाई पूंजी का लाभ चाहिए होगा, मरीजों का हित नहीं.

स्वास्थ्य तो असल में सरकार यानी समाज के हाथों में रहना चाहिए ताकि हर मरीज को इलाज मिल सके और बीमारियों के कारण लोग न मरें. इन महंगे अस्पतालों ने तो लाखों की आखिरी आस भी छीन ली.

सरकारी अस्पतालों में धांधलियों, निकम्मेपन और लापरवाही के कारण लोगों का इन पर से विश्वास ही उठ गया है. निजी अस्पताल कंपनियां अच्छे डाक्टरों को मोटा वेतन व कमीशन दे कर आकर्षित कर लेती हैं और इसीलिए सरकारी अस्पतालों के योग्य डाक्टर भी उन की शरण में चले जाते हैं. सरकारी अस्पतालों में योग्य डाक्टर कम ही रह जाते हैं, जिन्हें या तो ऊपरी कमाई के अवसर मिल जाते हैं या सरकारी तंत्र जिन्हें मकानों, यात्राओं की सुविधा दे देते हैं.

फोर्टिस के बिकने का मामला इसलिए चिंता की बात है कि इस से सारे देश के अस्पतालों को फर्क पड़ेगा. जहां भी डाक्टर निजी छोटे अस्पताल सफलता से चला रहे हैं उन का अस्तित्व अब खतरे में है. बड़े अस्पताल उन्हें लपकने को दौड़ेंगे.

चिकित्सा का प्रबंध अब डाक्टरों के हाथों से निकल कर काले कोटधारी अकाउंटैंटों के हाथों में आ जाएगा जिन्हें सिर्फ पैसे से मतलब होगा.

सरकार लाख कोशिश कर ले कि इन अस्पतालों की कुछ आय गरीबों को इलाज के रूप में मिले पर यह संभव नहीं दिखता. सरकार ने अपने कर्मचारियों को ही अपने खर्च पर इन अस्पतालों में भेजना शुरू कर दिया है.

सरकार पर असल गरीबों का दबाव फिर कौन कराएगा? गरीबों को तो फिर से झाड़फूंक वालों के पास जाना पड़ेगा.

इतना पक्का है कि गायों और कुत्तों की चिकित्सा सुविधाओं की कमी नहीं रहेगी, गरीबों को नहीं मिलेगी.

फिल्मों में अंग प्रदर्शन आम बात है : शगुन दूबे

भोजपुरी सिनेमा में रोजाना नएनए कलाकार ऐक्टिंग में अपने हाथ आजमा रहे हैं. इसी कड़ी में एक और नई कलाकार शगुन दूबे का नाम भी जुड़ गया है. वे जल्दी ही भोजपुरी सिनेमा के रुपहले परदे पर अपनी अदाओं और नजाकत का जलवा बिखरने वाली हैं. उन की पहली भोजपुरी फिल्म ‘दीवाने’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है, जो जल्दी ही सिनेमाघरों में दिखाई जाएगी.

पेश हैं, शगुन दूबे से की गई बातचीत के खास अंश:

आप कहां से हैं और आप के फिल्मी सफर की शुरुआत कैसे हुई?

मैं उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से हूं. मेरा पालनपोषण और मेरी पढ़ाईलिखाई यहीं से ही हुई है. बचपन से ही मैं स्कूल और फिर कालेज में हर सांस्कृतिक कार्यक्रम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी.

पापा के जिगरी दोस्त और फिल्मकार इम्तियाज खान ने कई फिल्में बनाई हैं. जब उन की भोजपुरी फिल्म ‘पंचायत’ बन रही थी, तब उन्होंने मुझे हीरोइन के रोल के लिए औफर दिया था, मगर उस समय मेरी पढ़ाई चल रही थी. मम्मी और पापा ने कहा था कि पहले पढ़ाई पूरी हो जाए, फिर देखा जाएगा.

entertainment

जब मेरी पढ़ाई पूरी हो गई, तो इम्तियाजजी ने दोबारा औफर दिया. मैं ने तुरंत हां कह दिया और बन गई फिल्म ‘दीवाने’ की हीरोइन.

इस फिल्म के पहले सीन की शूटिंग के समय आप के मन में क्या चल रहा था?

इस फिल्म की शूटिंग को ले कर मैं बहुत जोश में थी, पर कैमरे के सामने ऐक्शन बोलते ही पहली बार थोड़ा नर्वस थी. लेकिन जब पहला शौट ओके हो गया, तो सभी ने तालियां बजा कर मेरा हौसला बढ़ाया.

इस फिल्म में अपने किरदार के बारे में कुछ बताएं?

इस फिल्म में मेरा किरदार एक ऐसी लड़की का है, जो अपने प्रेमी से बेइंतिहा मुहब्बत करती है, मगर समय आने पर खुद ही अपने प्यार का बलिदान दे कर अपने प्रेमी की शादी किसी और लड़की से करा देती है.

यह किरदार मेरे दिल के बहुत करीब है. मुझे यह रोल निभा कर बहुत ही मजा आया. उम्मीद है कि हमारी रोमांटिक जोड़ी दर्शकों को खूब पसंद आएगी.

आप के आदर्श कौन हैं?

मैं मम्मीपापा को अपना आदर्श मानती हूं. मेरे भाई अभिषेक दूबे ने भी काफी सहयोग किया है. फिल्मकार इम्तियाज खान तो मेरे लिए गौडफादर जैसे हैं.

entertainment

ग्लैमर वर्ल्ड में हीरोइनों में हौट दिखने की एक होड़ सी लगी रहती है. इस बारे में आप क्या कहेंगी?

जहां तक हौट दिखने या अंग प्रदर्शन की बात है, तो फिल्म जगत में यह आम है. मैं फिल्मों में कहानी के मुताबिक जो सीन की डिमांड होगी, वह करूंगी, मगर मैं किसी इमेज में बंधना नहीं चाहती हूं. मैं हर तरह के किरदार निभाना चाहती हूं.

मैं एक बात और कहना चाहती हूं कि भोजपुरी फिल्मों को ले कर लोगों के मन में फूहड़ता का भरम कुछ ज्यादा ही घर कर गया है, जबकि बौलीवुड व हौलीवुड की फिल्मों में जिस तरह से फिल्म हीरोइनों को पेश किया जाता है, उस तरह भोजपुरी फिल्मों की हीरोइनों को नहीं पेश किया जाता है. पहले के बजाय अब भोजपुरी फिल्में भी करोड़ों रुपए के बजट में बनने लगी हैं.

अंतर्जातीय शादी व पिछड़ा तबका

आजकल अंतर्जातीय शादियां खूब हो रही हैं. इन में से कई मामलों में परिवार वालों द्वारा इंटरनैट से रिश्ते तय किए जाते हैं और कई मामले प्रेमविवाह के होते हैं.

90 फीसदी भारतीय परिवार तो अंतर्जातीय शादी के लिए तैयार नहीं होते हैं और तब तो और भी समस्या पैदा होती है, जब वर या वधू में से कोई एक पिछड़े तबके का हो.

ये पिछड़े तबके के बच्चे पढ़ेलिखे, अच्छे परिवार से हों, तो अगड़े तबके के मांबाप हां तो कह देते हैं, पर हंगामा शादी की विधि से शुरू होता है.

हिंदुओं की शादियों की रस्में पंडितों के मंत्रों, फेरों और पैसे मांगने से शुरू होती हैं और पैसे ऐंठने की रस्म से ही खत्म होती हैं. पिछड़ी जाति में जो हिंदू हैं, वहां रीतिरिवाजों की उतनी परेशानी नहीं है. रस्में मिलतीजुलती ही हैं.

सवाल वहां खड़ा होता है, जहां पिछड़े तबके ने बौद्ध धर्म स्वीकारा है, क्योंकि दोनों धर्मों की शादी प्रथा में काफी फर्क है. वहां न कोई पंडित होता है, न ही थोड़ीथोड़ी देर में वधू पक्ष से पैसे ऐंठे जाते हैं और न ही वहां आधी रात तक की जाने वाली लंबी व थका देने वाली रस्में होती हैं, बल्कि अग्नि को साक्षी नहीं माना जाता, वहां सारे समाज के सामने सब को साक्षी मान कर शादी होती है. छोटी सी रीति से शादी होती है, आडंबर और ढकोसलों से परे.

जब ऐसे जोड़ों में एक सामान्य जाति और दूसरा बौद्ध जाति से होता है, तो सामान्य तबका अपनी ही रीतियों से शादी कराने के लिए दूसरे पक्ष को मजबूर करता है.

इन में से कई परिवार अपनी ही रीति से शादी कराने के लिए अड़ जाते हैं या फिर अलगअलग मंडप में शादी कराने के लिए दूसरे पक्ष को मजबूर करते हैं.

शायद कहीं न कहीं उन्हें पिछड़े तबके से रिश्तेदारी जोड़ने में शर्म महसूस होती है और वे अपने समाज को यह बात बताना नहीं चाहते हैं. ऐसे भी परिवार होते हैं, जो दोनों रीतियों से शादी के लिए खुशीखुशी तैयार होते हैं.

society

वर और वधू को चाहिए कि जब उन्होंने अपना जीवनसाथी अपनी पसंद से चुना है, तो उस की सचाई समाज के सामने लाने में कैसी शर्म? ऐसा न कर के आप यह साबित करते हैं कि हमें अपने दामाद या बहू से लेनादेना है, उन के परिवार या उन के समाज से नहीं. और यहीं आप सब से बड़ी गलती करते हैं. वजह, शादी 2 परिवारों का मिलन है, यह बात भूलनी नहीं चाहिए.

एक मराठा परिवार, जो अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं, के बेटे को एक बौद्ध लड़की से प्रेमविवाह करना था. वर के मातापिता हिंदू रीति से शादी कराने पर अड़े हुए थे. उन का कहना था कि बौद्ध रीति से शादी हुई, तो उन के समाज को पता चल जाएगा कि बहू निचली जाति की है और समाज उन्हें जाति से बाहर कर देगा. उन्होंने आखिर तक बौद्ध रीति से शादी कराने की रजामंदी नहीं दी.

मजे की बात यह है कि उन की बेटी ने भी बौद्ध लड़के से शादी की थी. शादी को 5-6 साल हो गए हैं, सासससुर (दोनों पक्षों के) अपने दामादबहू से खुश हैं. पर लड़की वालों के रिश्तेदारों को वे दर्दनाक शूल तो चुभा गए, जिस का दर्द हमेशा उन के अंदर उन की इस गिरी हुई सोच की याद दिलाता रहेगा.

अगर वे तभी दोनों रीतियों से शादी करने के लिए मान जाते, तो रिश्तेदारों की इस टीस को खत्म कर देते और दोनों के बीच बराबरी के संबंध होते.

दूसरा उदाहरण एक और परिवार का है, जो बौद्ध है. लड़के की शादी एक मराठा लड़की से तय हुई. लड़के की मां को बौद्ध रीति से शादी करने में शर्म महसूस हुई और उन्होंने कट्टर हिंदू रीति से शादी कर के अपनेआप को बहुत बड़ा समझने का दंभ भरा.

इस के उलट एक और उदाहरण बताते हैं. एक ईसाई लड़के की शादी पिछड़े तबके की लड़की से तय हुई. लड़के के घर वालों ने चर्च में शादी नहीं कराई, क्योंकि ऐसा करने से लड़की को पहल ईसाई बनाना पड़ता.

उन्होंने लड़की के रीतिरिवाजों से शादी की और छोटा सा रिसैप्शन दे डाला. हमारे समाज में ऐसी खुली सोच वाले लोग भी हैं, पर उन की तादाद गिनती में है.

जिस पिछड़े तबके ने बौद्ध पद्धति को स्वीकारा है, वे तो सोच में हिंदुओं की सोच से कई गुना ऊपर हैं. शादी में वहां न कोई मुहूर्त होता है, न खोखली विधियां हैं, न समय की पाबंदी है और न आधी रात को नींद हराम करने वाली रस्में हैं. दानदहेज का तनाव भी नहीं है.

यहां लोग बेटियों के जन्म पर दुख नहीं मनाते, न ही बेटों के जन्म पर खुशी मनाते हैं. दोनों का जन्म मातापिता को एक सी खुशियां देता है. दोनों की एक सी परवरिश और पढ़ाईलिखाई होती है. दोनों की ही शादियों में बराबरबराबर सा खर्च होता है.

बेटियों के ससुराल वालों के साथ कोई लेनदेन नहीं होता है. दहेज मांगने वालों की समाज में कोई जगह नहीं होती. न ही बेटियों के जन्म से ही उस के ब्याह के लिए पैसे जोड़ने की प्रक्रिया शुरू होती है. न तो वे दहेज देते हैं, न दहेज लेते हैं.

न यहां कोई पंडित होता है, जो कन्या पक्ष से पैसों की मांग करता है. ऐसा पिछड़ा वर्ग, जो अब बौद्ध बन चुका है, से सवर्ण क्यों अपना संबंध बनाने से कतराते या शरमाते हैं?

असल में पिछड़ा कौन है? सारी कुरीतियों से अलगथलग निडर पिछड़ा वर्ग या कुरीतियों के दलदल में फंसा  उच्च वर्ग?

निजी स्कूलों पर सरकारी नकेल

निजी स्कूलों में फीस को घटाने की मांग कुछ वैसी ही है जैसे फाइवस्टार होटल से अपने फूड मैन्यू के  रेट को कम करने के लिए कहा जाए. वोट के लिए सरकार पेरैंट्स के साथ खड़ी दिखना चाहती है. स्कूल प्रबंधक इसे इंस्पैक्टरराज की वापसी की तरह से देख रहे हैं जिस से निजी स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है. ऐसे में डर इस बात का है कि कहीं निजी स्कूलों का हाल भी सरकारी स्कूलों की तरह न हो जाए.

पूरे देश में अभिभावक निजी स्कूलों की बढ़ रही फीस से परेशान हैं. ऐसे में वे उसी सरकार से उम्मीद भी कर रहे हैं जिस के स्कूलों से बचाने के लिए अपने बच्चों के निजी स्कूलों में दाखिले कराए थे. अभिभावकों के एकजुट होने से सरकार ने निजी स्कूलों के लिए नियमकानून बनाने शुरू कर दिए हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषित स्वतंत्र विद्यालय (शुल्क निर्धारण) अध्यादेश बनाया है. इस में तमाम तरह के ऐसे प्रावधान हैं जिन से स्कूल संचालक बच्चों की फीस मनमाने तरीके से बढ़ा नहीं पाएंगे. फौरीतौर पर अभिभावकों को लग रहा है कि सरकार के हस्तक्षेप से उन को राहत मिलेगी.

शिक्षा के जानकार लोगों का कहना है कि सरकारी हस्तक्षेप का प्रभाव निजी स्कूलों की गुणवत्ता पर भी पडे़गा. निजी स्कूलों में इंस्पैक्टरराज शुरू होगा, भ्रष्टाचार बढे़गा. जिस से निबटने के लिए निजी स्कूल अपनी गुणवत्ता से समझौता करेंगे. धीरेधीरे निजी स्कूलों का हाल भी सरकारी स्कूलो सा हो जाएगा.

ज्यादातर निजी स्कूलों को सरकार किसी भी तरह की कोई सुविधा नहीं देती है. स्कूल संचालक स्कूल प्रबंधन पर खर्च होने वाला एकएक पैसे का प्रबंध खुद करता है. उस के पास केवल फीस ही अकेला जरिया होता है जिस से वह पैसों का प्रबंध कर सकता है. स्कूल आजकल चमचमाती दुकानों की तरह हो गए हैं. अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला कराने के समय स्कूलों की गुणवत्ता से अधिक बाहरी चमकदमक देखते हैं. शायद ही कोई अभिभावक हो जिसे यह पता हो कि स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर कितने योग्य हैं.

हर अभिभावक स्कूलबस, फर्नीचर, स्विमिंग पूल, एसी और ड्रैस की खूबसूरती को देखते हैं. स्कूल बच्चों के लिए हर सुविधा जुटा दे, हर अभिभावक यही चाहता है. जब स्कूल इस के बदले फीस बढ़ाता है तो पेरैंट्स परेशान होने लगते हैं. विरोध करते समय पेरैंट्स यह भूल जाते हैं कि स्कूल भी एक तरह का बिजनैस है. जितनी सुविधाएं बढ़ेंगी, फीस भी उतनी बढे़गी. फीस अगर घटेगी तो दूसरे बिजनैस की तरह स्कूल भी सुविधाओं से समझौते करने लगेंगे.

कम फीस वाले सरकारी स्कूल

आज सरकारी स्कूलों को देखें तो बहुत सारे स्कूलों का आधारभूत ढांचा पहले से अच्छा हो गया है. वहां फीस भी कम है और किताबें, भोजन सरकारी मिलता है. निजी स्कूलों से अच्छे टीचर सरकारी स्कूलों में हैं. वे ज्यादा टैलेंटेड हैं. उन का वेतन भी ज्यादा है. पेरैंट्स वहां बच्चों को नहीं भेजना चाहते हैं. इस की बड़ी वजह यह है कि वहां उन को माहौल अच्छा नहीं दिखता है. निजी स्कूलों की व्यवस्था सरकारी स्कूलों से बेहतर है क्योंकि वहां स्कूल संचालक पूरी तरह से स्कूलों पर ही ध्यान देता है. सरकारी स्कूलों में सरकार शिक्षा सुधार की बातें तो बहुत करती है पर वह अपने स्कूलों पर नियंत्रण नहीं रख पाती है. सरकार की नीतियों और सही से स्कूलों का ख्याल न रख पाने से सरकारी स्कूल धीरेधीरे बरबाद हो गए. जबकि प्रति बच्चा खर्च सरकारी और गैरसरकारी स्कूलों में बराबर सा ही होगा. सरकारी स्कूलों के चलाने के लिए मंत्रालय तक का खर्च जोड़ना होगा.

सरकारी स्कूलों को छोड़ कर निजी क्षेत्र के स्कूलों में बच्चों का दाखिला पेरैंट्स ने इसी कारण कराना शुरू किया था क्योंकि ये बेहतर थे. यहां पर बच्चों को पढ़ाना एक तरह से सफलता की गांरटी मानी जाने लगी है. धीरेधीरे निजी स्कूलों में अब पढ़ाई का स्तर गिरने लगा है. वहां भी बच्चे अब सही से पढ़ नहीं पा रहे हैं.

स्कूलों में आपराधिक घटनाएं भी होने लगी हैं. ऐसे में सरकारी नियंत्रण में रहने के कारण अब निजी स्कूलों की दशा भी खराब हो सकती है. स्कूल प्रबंधक मानते हैं कि हर स्कूल अपनी तरह से सुविधाएं जुटाता है. हर सुविधा के लिए बजट का प्रबंध करना पड़ता है ़ऐसे में अगर स्कूलों पर नकेल कसी गई तो परेशानी हो सकती है. स्कूलों की गुणवत्ता खराब हो सकती है.

सरकारी हस्तक्षेप

शिक्षा अधिकार कानून के तहत गरीब बच्चों का प्रवेश प्राइवेट स्कूलों में सरकार कराती है. इस की फीस सरकार देती है. निजी स्कूलों के प्रबंधक बताते हैं कि शिक्षा अधिकार कानून के तहत जिन बच्चों का प्रवेश सरकार ने कराया है, उन की फीस समय पर स्कूल में नहीं जमा होती. यही कारण है कि निजी स्कूल इस कानून के तहत बच्चों का प्रवेश अपने यहां करने से बचते हैं. ऐसे में सरकार उस प्राइवेट स्कूल में बच्चों को भेज देती है जहां बच्चे नहीं होते हैं. अगर सरकार सही तरह से योजना का संचालन करे तो ही जरूरतमंद बच्चों को लाभ होगा वरना यह योजना मजाक बन कर रह गई है.’’ निजी स्कूलों की फीस हर साल अलगअलग तरह से बढ़ती है. इस में 8 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की जाती है. निजी स्कूलों के अपने अलग तर्क हैं.

स्कूल प्रबंधन कहता है कि लगातार महंगाई बढ़ रही है. स्कूलों में काम करने वालों का वेतन बढ़ रहा है. ऐसे में स्कूल प्रबंधन अपने खर्च कैसे निकाले? अभिभावक फीस कम करने की बात तो करते हैं पर सुविधाओं में एक भी कटौती नहीं चाहते. वे स्कूलबस से ले कर क्लास तक पूरी तरह से फिट चाहते हैं.

स्विमिंग पूल, प्लेग्राउंड, स्मार्टक्लास और साफसुथरा बाथरूम सभी को चाहिए. एक भी शिकायत होने पर पेरैंट्स हंगामा खड़ा कर देते हैं. जहां स्कूल प्रबंधन की गलती नहीं होती वहां भी वे उसी को जिम्मेदार ठहराते हैं.  ऐसे में स्कूलों के लिए अच्छी व्यवस्था करना संभव नहीं रह जाता. ऐसे में गुणवत्ता के साथ समझौता करने का प्रभाव स्कूल पर पडे़गा. पेरैंट्स देरसवेर इस बात को समझेंगे.

यह बात सच है कि कुछ स्कूल कौपी, किताब और ड्रैस तक स्कूलों से ही बेचने लगे हैं. इस के लिए मुख्यरूप से जिम्मेदारी पेरैंट्स की है जिन्हें लगता है कि सरकार के हस्तक्षेप से सब सरल हो सकता है. सरकार अगर खुद में ही इतना सक्षम होती तो उस के स्कूल खराब क्यों होते? जो सरकार लगातार प्रयास के बाद भी अपने स्कूलों में सुधार नहीं कर पा रही, वह निजी स्कूलों को केवल परेशान कर सकती है, उन में सुधार नहीं.

अपना खुद का चक्रव्यूह

21 मार्च, 2018 की प्रात: 9 बजे कानपुर के बर्रा थाने के प्रभारी भास्कर मिश्रा को गहोई निवासी बबलू भदौरिया ने सूचना दी कि पांडु नदी पर बने काठ पुल के नीचे एक युवक की लाश तैर रही है. मिश्रा को मामला गंभीर लगा. अपने उच्चाधिकारियों को लाश की जानकारी दे कर वह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

पांडु नदी (काठ पुल) थाना बर्रा से करीब 3 किलोमीटर दूर है. भास्कर मिश्रा को वहां पहुंचने में आधा घंटा लगा. उस समय वहां भीड़ जुटी थी. लोग पुल से झांकझांक कर नदी में तैरते शव को देख रहे थे. कोई कह रहा था कि युवक की मौत डूबने से हुई है तो कोई आत्महत्या करने की बात कह रहा था. कुछ लोग ऐसे भी थे, जो हत्या की आशंका भी जता रहे थे.

थानाप्रभारी भास्कर मिश्रा ने युवक के तैरते हुए शव को गौर से देखा तो गले में बंधे दुपट्टे से वह समझ गए कि युवक की हत्या की गई है. साथी पुलिसकर्मियों ने भी उन की हां में हां मिलाई. मिश्रा अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी (साउथ) अशोक कुमार वर्मा तथा सीओ (गोविंदनगर) सैफुद्दीन बेग भी वहां आ गए. उन्होंने मौके पर फोरेंसिक टीम को भी बुला लिया.

पुलिस अधिकारियों ने नदी से लाश बाहर निकलवा कर उस का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतक की उम्र करीब 30 वर्ष रही होगी. वह नीले रंग की शर्ट व पैंट पहने था. युवक का गला रेतने के अलावा उस के सीने को किसी नुकीली चीज से गोदा गया था. सिर पर भी कई घाव थे और उस के गले में स्टोल (दुपट्टा) बंधा था.

एसपी (साउथ) अशोक कुमार वर्मा ने मृतक की जामातलाशी कराई तो उस के पास से कुछ भी बरामद नहीं हुआ. थानाप्रभारी को यह देख कर जरूर ताज्जुब हुआ कि मृतक उल्टा अंडरवियर पहने था. उन्हें लगा कि संभवत: यह प्रेमिल संबंधों में हुई हत्या का मामला रहा होगा. उस की हत्या कहीं और की गई होगी और शव को यहां फेंक दिया गया होगा.

अब तक शव को सैकड़ों लोग देख चुके थे, लेकिन कोई भी मृतक की शिनाख्त नहीं कर पाया था. इस से यही लगा कि मृतक युवक यहां का नहीं है. शिनाख्त न होने पर पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर लाश को मोर्चरी में रखवा दिया. साथ ही अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उस के हुलिए की सूचना वायरलैस से कानपुर नगर व कानपुर देहात के थानों को दे दी.

उसी रोज शाम 4 बजे थानाप्रभारी भास्कर मिश्रा थाने में आए तो 2 लोग उन की प्रतीक्षा में वहां बैठे मिले. उन में से अधेड़ उम्र का व्यक्ति बोला, ‘‘सर, मेरा नाम महेंद्र सिंह है और यह मेरा बड़ा बेटा कुलदीप है. मैं घाटमपुर कस्बा के जवाहर नगर मोहल्ले में रहता हूं. मेराछोटा बेटा संदीप सिंह दिल्ली में नौकरी करता है और अपनी पत्नी व बच्चों के साथ वहीं रहता है.

‘‘संदीप 19 मार्च को दोपहर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन द्वारा कानपुर के लिए रवाना हुआ और रात 10 बजे कानपुर स्टेशन पर उतरा था. इस बीच वह बराबर वीडियो कालिंग द्वारा अपनी पत्नी रेनू के संपर्क में रहा. नौबस्ता थाना के अंतर्गत आशानगर में हमारा मकान बन रहा है. इसी मकान में संदीप को आना था. लेकिन जब वह मकान में नहीं पहुंचा और उस का मोबाइल भी बंद हो गया तो हम ने उस की खोजबीन शुरू की.

crime

‘‘बहू को जानकारी दी तो वह भी घबरा कर दिल्ली से कानपुर आ गई. जब संदीप का कुछ भी पता नहीं चला तो हम संदीप की गुमशुदगी दर्ज कराने थाना नौबस्ता गए. वहां से पता चला कि बर्रा थाना क्षेत्र में एक युवक की लाश मिली है. हम उस लाश का फोटो देखना चाहते हैं कि वह किस की है.’’

थानाप्रभारी ने पांडु नदी से जो लाश बरामद की थी, उस के फोटो उन के मोबाइल फोन में थे. उन्होंने वे फोटो महेंद्र सिंह को दिखाए तो फोटो देखते ही वह फफक कर रो पड़े. उन्हें देख कर उन का बेटा कुलदीप सिंह भी रोने लगा. वह लाश संदीप की ही थी. संदीप की हत्या की खबर जैसे ही घर पहुंची तो घर में कोहराम मच गया. घर पर रिश्ते नातेदारों की भीड़ जुटने लगी.

थानाप्रभारी ने संदीप सिंह की हत्या के बाबत महेंद्र सिंह से पूछा तो वह बोले, ‘‘सर, हमारी किसी से कोई रंजिश नहीं है. मुझे तो लगता है कि संदीप की हत्या लूट के इरादे से हुई है.’’

लुटेरों द्वारा लूट की बात थानाप्रभारी को हजम नहीं हुई, क्योंकि लुटेरे इस तरह निर्मम हत्या नहीं करते. हत्या का कारण उन्हें कुछ और ही नजर आया.

एसपी (साउथ) अशोक कुमार वर्मा के निर्देश पर पुलिस ने सब से पहले मृतक संदीप की पत्नी रेनू सिंह से पूछताछ की. रेनू ने बताया, ‘‘वह 19 मार्च की दोपहर पौने एक बजे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से कानपुर जाने के लिए ट्रेन में बैठे थे. उन के पास 25 हजार रुपए नकद, गले में सोने की चेन, सोने की 2 अंगूठियां तथा महंगा मोबाइल फोन था.

‘‘शाम साढ़े 4 बजे उन्होंने मुझे वीडियो कालिंग की और बताया कि वह गाजियाबाद से आगे हैं. रात 9.55 बजे उन्होंने मुझे बताया कि वह कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर उतर गए हैं और टैंपो से आशानगर जा रहे हैं.

‘‘रात पौने 12 बजे उन्होंने फिर मुझे वीडियो काल कर के बताया कि वह नौबस्ता सब्जीमंडी पहुंच गए हैं. सवारी न मिलने से पैदल ही आशानगर स्थित निर्माणाधीन मकान की ओर जा रहे हैं. इस के बाद उन से कोई बातचीत नहीं हुई.’’

रेनू सिंह ने आगे बताया, ‘‘मैं ने फिर सुबह के समय उन से बात करनी चाही तो उन का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद मैं ने ससुरजी को सारी जानकारी दी तो उन्होंने बताया कि संदीप न तो घर पहुंचा है और न ही बन रहे मकान पर. बेचैनी बढ़ी तो मैं कानपुर आ गई. यहां आ कर पता चला कि उन की किसी ने हत्या कर दी है’’

रेनू ने यह भी बताया कि वह पति के साथ सुखमय जीवन बिता रही थी. उस के पति की हत्या किस ने और क्यों की, उसे इस की जानकारी नहीं है.

काल डिटेल्स ने दिखाई जांच की राह

मृतक संदीप की पत्नी व परिवार के अन्य सदस्य रंजिश से इनकार कर रहे थे. लूट की घटना थानाप्रभारी को हजम नहीं हो रही थी. हकीकत जानने के लिए उन्होंने संदीप के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि उस दौरान संदीप की अपनी पत्नी के अलावा एक और नंबर पर बात हुई थी.

पुलिस ने उस नंबर का पता लगाया तो वह नंबर तिलसड़ा (घाटमपुर) की नेहा सिंह का निकला. यह पता चलते ही थानाप्रभारी को कहानी में प्रेमप्रसंग वाली बात नजर आने लगी.

इस के बाद पुलिस ने नेहा सिंह के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस से पता चला कि 19 मार्च, 2018 की शाम नेहा ने एक नंबर पर एसएमएस भेजा था, जिस में उस ने लिखा था, ‘आ जाना, आज उसे उल्टा करूंगी.’

जिस नंबर पर उस ने वह एसएमएस भेजा था, वह नंबर पटेलनगर, कालपी (उरई) निवासी प्रवीण कुमार श्रीवास्तव का निकला. थानाप्रभारी भास्कर मिश्रा ने पुलिस टीम के साथ 22 मार्च, 2018 की रात प्रवीण कुमार के यहां दबिश दे कर उसे हिरासत में ले लिया.

कालपी से कानपुर आतेआते प्रवीण कुमार ने रास्ते में ही सच्चाई बता दी. उस ने संदीप की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. प्रवीण ने बताया कि बर्रा विश्व बैंक निवासी नेहा सिंह के कहने पर उस ने अपने दोस्त देवेंद्र नागर के साथ मिल कर नेहा सिंह के घर पर ही संदीप की हत्या की थी और शव को कार में रख कर पांडु नदी में फेंक दिया था.

प्रवीण कुमार की निशानदेही पर पुलिस ने नेहा सिंह और देवेंद्र नागर को उन के बर्रा स्थित घर से हिरासत में ले लिया. नेहा सिंह की निशानदेही पर पुलिस ने आला कत्ल हंसिया, लूटी गई नकदी, मोबाइल फोन, सोने की चेन, 2 अंगूठियां तथा बैग भी बरामद कर लिया.

संदीप से लूटे गए पैसों में से प्रवीण कुमार ने 3 पैंटशर्ट खरीदी थी. पुलिस ने वह भी बरामद कर लीं. हत्या में प्रयुक्त कार को भी पुलिस ने बरामद कर लिया. पुलिस द्वारा अभियुक्तों से की गई पूछताछ में नाजायज रिश्तों की सनसनीखेज कहानी प्रकाश में आई.

हंसतेखेलते परिवार के दरवाजे पर मौत की दस्तक

उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर से करीब 30 किलोमीटर दूर एक बड़ी आबादी वाला कस्बा घाटमपुर है. तहसील होने के कारण हर रोज यहां खूब चहलपहल रहती है. इसी कस्बे के जवाहरनगर मोहल्ले में महेंद्र सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी मालती के अलावा 2 बेटे संदीप, कुलदीप और 2 बेटियां थीं.

महेंद्र सिंह प्रतिष्ठित और धनाढ्य व्यक्ति थे. राजनैतिक लोगों में भी उन की अच्छी पहुंच थी. दोनों बेटियों की वह अच्छे परिवारों में शादी कर चुके थे.

भाईबहनों में संदीप सब से छोटा था. वह पढ़ाईलिखाई में तेज था. इंटरमीडिएट पास करने के बाद उस ने इलैक्ट्रिकल से पौलिटेक्निक का डिप्लोमा किया था. इस के बाद उस ने सरकारी नौकरी की कोशिश की लेकिन असफल रहा.

जब नौकरी नहीं मिली तो संदीप ने अपने पिता से कानपुर में कोई दुकान खोलने की इच्छा जाहिर की. थोड़े प्रयास के बाद उन्हें नौबस्ता के चित्रा डिग्री कालेज के पास एक दुकान किराए पर मिल गई. चूंकि संदीप ने इलैक्ट्रिकल से डिप्लोमा किया था, अत: उस ने बिजली के सामान की दुकान खोल ली. कुछ ही समय में उस की दुकान ठीकठाक चलने लगी.

दुकान पर ही एक रोज उस की मुलाकात रेनू से हुई. उस रोज वह दुकान पर अपनी प्रैस ठीक कराने आई थी. 20 वर्षीय रेनू बेहद खूबसूरत थी. पहली ही नजर में वह संदीप के दिल में रचबस गई. वह संदीप की दुकान से कुछ ही दूर स्थित कच्ची बस्ती में रहती थी. उस के मातापिता की मौत हो चुकी थी. उस का एक भाई अजय था, वह उसी के साथ रहती थी. अजय टैंपो चलाता था.

crime

संदीप ने रेनू का फोन नंबर ले लिया, जिस के बाद वह किसी न किसी बहाने उस से बात करता रहता था. लगातार बात होने से संदीप और रेनू के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. संदीप भी सजीला व हृष्टपुष्ट युवक था. रेनू भी उसे चाहने लगी थी. चाहत दोनों ओर से बढ़ी तो दोनों घूमनेफिरने भी जाने लगे. एक दिन बाजार बंदी के दिन संदीप रेनू को मोतीझील पार्क ले गया. वहीं पर बातचीत के दौरान संदीप ने रेनू से अपने प्यार का इजहार कर दिया.

रेनू संदीप के चेहरे पर एक गहरी नजर डाल कर बोली, ‘‘संदीप, प्यार तो मैं तुम से करती हूं, लेकिन मुझे डर लग रहा है.’’

‘‘कैसा डर?’’ संदीप ने पूछा.

‘‘यही कि तुम मुझे मंझधार में तो नहीं छोड़ दोगे?’’

‘‘कैसी बात करती हो रेनू, तुम तो मेरे दिल में बसी हो. मैं वादा करता हूं कि मैं तुम्हारे हर सुखदुख में साथ दूंगा और जीवन भर साथ निभाऊंगा.’’

रेनू और संदीप का प्यार परवान चढ़ ही रहा था कि उसी दौरान किसी तरह उन के घर वालों को इस की भनक लग गई. यह रिश्ता न तो रेनू के भाई अजय को मंजूर था और न ही संदीप के पिता महेंद्र सिंह को.

पर संदीप और रेनू एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे, इसलिए घर वालों के विरोध के चलते दोनों भाग गए. इस पर रेनू के भाई अजय ने इस की रिपोर्ट थाना नौबस्ता में दर्ज करा दी.

नौबस्ता पुलिस संदीप के पिता और भाई को पकड़ लाई. इस की भनक जब संदीप और रेनू को लगी तो दोनों थाने में हाजिर हो गए. उन के आने पर पुलिस ने दोनों पक्षों का समझौता करा दिया. इस के बावजूद दोनों ने आर्यसमाज पद्धति से विवाह कर लिया. विवाह के बाद दोनों हंसीखुशी जीवन व्यतीत करने लगे.

प्यार की मिठास बदलने लगी कड़वाहट में

रेनू की शादी को अभी एक साल ही बीता था कि संदीप के जीवन में एक और लड़की नेहा सिंह आ गई. नेहा सिंह मूलरूप से हमीरपुर के बंडा गांव की रहने वाली थी. 3 भाईबहनों में वह सब से बड़ी थी. नेहा के पिता हाकिम सिंह खेतीकिसानी करते थे. वह साधारण परिवार से थे. उन की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी.

इसी बंडा गांव में संदीप का ननिहाल था. संदीप कभीकभी ननिहाल जाता था. उस के मामा और नेहा का घर अगलबगल था. दोनों परिवारों में घनिष्ठता भी थी. इसलिए नेहा का आनाजाना बना रहता था. एक बार जब संदीप ननिहाल गया तो सजीधजी नेहा से उस की आंखें चार हुईं. नेहा भी संदीप को देख कर प्रभावित हुई. फिर दोनों में बातचीत होने लगी. जल्द ही बातचीत प्यार में बदल गई. बाद में उन्होंने अपनी हसरतें भी पूरी कर लीं.

इधर संदीप और नेहा के प्यार की भनक हाकिम सिंह को लगी तो उन्होंने आननफानन में नेहा का विवाह कानपुर के तिलसड़ा गांव निवासी रणवीर सिंह के साथ कर दिया. लेकिन शादी के बाद भी संदीप ने नेहा का पीछा नहीं छोड़ा और वह उस की ससुराल भी जाने लगा. नेहा के पति रणवीर सिंह ने विरोध जताया तो नेहा ने उसे रिश्तेदार बता कर पति का विरोध दबा दिया.

उन्हीं दिनों संदीप सिंह की दिल्ली में रिलायंस कंपनी में इलैक्ट्रिशियन के पद पर नौकरी लग गई. वह पत्नी रेनू के साथ पुरानी दिल्ली (दाईवाड़ा) में किराए के मकान में रहने लगा. दूर व व्यस्त रहने के कारण संदीप का नेहा से मिलना बंद हो गया. दिल्ली में संदीप व रेनू हंसीखुशी से रहने लगे. अब तक रेनू 2 बच्चों की मां बन चुकी थी.

इधर नेहा ने भी शादी के एक साल बाद एक बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म के बाद नेहा ने पति रणवीर सिंह पर दबाव डाला कि वह शहर जा कर कोई नौकरी करे ताकि पैसा आए. रणवीर सिंह ने पत्नी की बात मान कर कोशिश की तो एक दोस्त की मार्फत उसे गाजियाबाद की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई. कुछ महीने बाद नेहा भी पति के साथ गाजियाबाद में रहने लगी.

बाद में संदीप को जब पता चला कि नेहा अपने पति के साथ गाजियाबाद में रह रही है, तो उस की बांछें खिल उठीं. एक रोज वह नेहा के कमरे पर जा पहुंचा. दोनों एकदूसरे को देख चहक उठे. पुरानी यादें ताजा हो गईं. मिलन की प्यास जागी तो दोनों खुद को रोक नहीं सके.

इस के बाद तो यह आए दिन का सिलसिला बन गया. रणवीर ड्यूटी पर जाता तो संदीप आ जाता. फिर दोनों मौजमस्ती करते. इसी दरम्यान एक रोज संदीप ने धोखे से नेहा का अश्लील वीडियो बना लिया और आपत्तिजनक स्थिति के फोटो भी मोबाइल में कैद कर लिया.

कुछ समय बाद नेहा को संदीप का आनाजाना खलने लगा. उस ने विरोध जताया तो संदीप ने उस का अश्लील वीडियो सार्वजनिक करने की धमकी दी. इस पर नेहा डर गई और संदीप उस का शारीरिक शोषण करता रहा. रणवीर ने लगभग 4 साल तक गाजियाबाद में नौकरी की. बाद में उस की नौकरी छूट गई तो वह अपने गांव तिलसड़ा आ गया.

नेहा का बेटा 5 साल का हो चुका था. वह उसे गांव के प्राइमरी स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहती थी. बेटे को शहर में पढ़ाने के लिए नेहा ने पति पर दबाव डाला तो रणवीर ने कानपुर शहर में बर्रा विश्व बैंक के बी ब्लौक में एक कमरा किराए पर ले लिया और नेहा के साथ रहने लगा.

यह मकान सपा नेता वैभव मिश्रा का था. वह बर्रा में ही अपने दूसरे मकान में परिवार सहित रहते थे. किराए के मकान में आ कर नेहा ने अपने बेटे का दाखिला इंग्लिश मीडियम स्कूल में करा दिया. किराए के इसी मकान में नेहा की मुलाकात प्रवीण कुमार श्रीवास्तव से हुई. वह मूलरूप से पटेलनगर, कालपी का रहने वाला था और डी ब्लौक बर्रा में किराए पर रहता था. प्रवीण कुमार सपा नेता वैभव मिश्रा का ड्राइवर था. इस के अलावा वह मकान का किराया भी वसूलता था.

नेहा को मिला नया प्रेमी

चंचल व हंसमुख नेहा से प्रवीण की जल्द ही दोस्ती हो गई. दोस्ती प्यार में बदली, फिर दोनों के बीच नाजायज रिश्ता बन गया. इस के बाद वह नेहा की हर तरह से मदद करने लगा. नेहा का पति रणवीर सिंह किसान था. कभी वह नेहा के साथ रहता तो कभी महीनों तक गांव में, जिस से प्रवीण को नेहा से मिलने में कोई बाधा नहीं होती थी.

संदीप सिंह नेहा की टोह में लगा रहता था. वह अय्याश प्रवृत्ति का था. उसे जब पता चला कि नेहा अब बर्रा विश्व बैंक कालोनी में रहने लगी है तो वह वहां भी आने लगा और नेहा का शारीरिक शोषण करने लगा. नेहा जब उस का फोन रिसीव नहीं करती तो वह विभिन्न नंबरों से काल करता. नेहा जब फोन रिसीव कर लेती तो वह उसे भद्दीभद्दी गालियां देता और अश्लील फोटो नातेरिश्तेदारों व घर वालों को भेजने की धमकी देता.

दरअसल नेहा के पास स्मार्टफोन नहीं था. संदीप ने फेसबुक पर उस के नाम की आईडी बना रखी थी, जिसे वह खुद ही अपडेट करता था. अकसर वह सोशल साइट पर नेहा की फोटो के साथ किसी न किसी रिश्तेदार का फोन नंबर डाल कर घर वालों को परेशान करता रहता था. संदीप ने नेहा के मौसेरे भाई को नेहा की अश्लील फोटो भेज भी दी थी.

शारीरिक शोषण और संदीप की गंदी हरकतों से आजिज आ कर नेहा ने अपने नए प्रेमी प्रवीण कुमार श्रीवास्तव को अपनी व्यथा सुनाई और संदीप से निजात दिलाने की बात कही. इस पर प्रवीण ने नेहा को बातचीत के जरिए समस्या को सुलझाने की सलाह दी.

पहली मार्च को होली थी. संदीप होली मनाने पत्नी और बच्चों के साथ दिल्ली से अपने घर घाटमपुर आया. इन दिनों संदीप के पिता महेंद्र सिंह नौबस्ता (कानपुर) के आशानगर में नया मकान बनवा रहे थे. संदीप इसी निर्माणाधीन मकान में कई रोज रह कर देखरेख करता था.

8 मार्च को संदीप ने नेहा सिंह से बात करने के लिए उस का फोन नंबर मिलाया. लेकिन नेहा ने फोन रिसीव नहीं किया. कई बार प्रयास के बाद नेहा ने फोन रिसीव किया तो वह नाराज हुआ और कर्रही (बर्रा) में मिलने को कहा. नेहा मिलने आई तो संदीप ने उसे गालियां दीं और फोन न उठाने तथा मिलने से इनकार करने पर 2 थप्पड़ भी जड़ दिए. नेहा तमतमा कर घर चली गई और संदीप पत्नीबच्चों के साथ दिल्ली चला गया.

चोट खाई नागिन बन गई नेहा अपमानित नेहा ने प्रेमी प्रवीण कुमार से संपर्क किया और संदीप द्वारा बेइज्जत करने और थप्पड़ मारने की बात बताई. नेहा ने कहा कि संदीप की ज्यादतियां अब बरदाश्त नहीं होतीं. अत: उसे रास्ते से हटाना ही होगा, जिस के लिए तुम्हें साथ देना होगा.

अगर तुम ने साथ नहीं दिया तो आज के बाद मुझ से बात नहीं करना. प्रेमिका की जिद पर प्रवीण कुमार संदीप को रास्ते से हटाने को राजी हो गया. साथ देने के लिए उस ने अपने दोस्त बर्रा निवासी देवेंद्र नागर को भी राजी कर लिया.

18 मार्च, 2018 को संदीप ने दिल्ली से नेहा को फोन किया कि वह 19 मार्च को कानपुर आ रहा है, उसे मिलना होगा. इस पर नेहा ने जवाब दिया कि बेटे शुभम के पेपर 15 मार्च को खत्म हो गए हैं. अब वह अपनी ससुराल तिलसड़ा (घाटमपुर) में है, इसलिए मिलना संभव नहीं है. इस पर संदीप ने उस के फोटो और वीडियो वायरल करने की धमकी दी. धमकी से नेहा डर गई और बर्रा विश्व बैंक कालोनी स्थित मकान में मिलने का वादा कर लिया.

crime

संदीप के शहर आने की जानकारी पर नेहा 19 मार्च की दोपहर ससुराल से कानपुर आ गई. किराए के मकान पर पहुंचने के बाद नेहा ने प्रवीण कुमार को मैसेज किया कि संदीप आ रहा है. आ जाना, आज उसे उल्टा करना है. मैसेज पढ़ कर प्रवीण अपने दोस्त देवेंद्र के साथ रात 9 बजे नेहा के कमरे पर पहुंच गया. नेहा ने दोनों को छत पर बैठा दिया.

इधर 19 मार्च को संदीप रात 10 बजे दिल्ली से कानपुर आया. इस बीच वह पिता, पत्नी व प्रेमिका के संपर्क में रहा. रास्ते में उस ने खाने का सामान व शराब की बोतल खरीदी, फिर रात 12 बजे के आसपास नेहा के घर पहुंच गया.

नेहा ने संदीप के साथ खाना खाया और उसे शराब पिलाई. इस के बाद संदीप ने बदन से सारे कपड़े उतारे और नेहा के शरीर से खेलने लगा. शारीरिक भूख मिटाने के बाद संदीप अंडरवियर में ही पलंग पर लेट गया और कुछ ही देर में खर्राटे भरने लगा.

उचित मौका देख कर नेहा ने छत पर बैठे प्रवीण व उस के दोस्त देवेंद्र नागर को कमरे में बुला लिया. तीनों मिल कर संदीप का गला स्टोल (दुपट्टे) से कसने लगे तो वह हाथपैर चलाने लगा. तभी नेहा हंसिया ले आई और उस ने संदीप के सिर, गले व दिल पर कई वार किए. प्रवीण ने भी संदीप को हंसिए से गोदा जिस से उस की मौत हो गई.

संदीप को मौत के घाट उतारने के बाद नेहा और उस के प्रेमी प्रवीण ने उस के गले से सोने की चेन और अंगुलियों से दोनों अंगूठियां उतार लीं. पैंट की तलाशी ली तो जेब में पैसे मिले, जो निकाल लिए. फिर संदीप को अंडरवियर पहनाया जो जल्दबाजी में उल्टा पहना दिया गया. फिर पैंटशर्ट पहनाई और लाश चादर में लपेट दी.

शव को ठिकाने लगाने के लिए प्रवीण कुमार रात 3 बजे अपने मालिक वैभव मिश्रा के घर पहुंचा और बताया कि उस की बहन की तबीयत ज्यादा खराब है, उसे अस्पताल पहुंचाना है. अत: कार की चाबी चाहिए. वैभव मिश्रा ने पहले तो इनकार किया. लेकिन पत्नी के कहने पर कार की चाबी दे दी. कार ले कर प्रवीण कुमार नेहा के कमरे पर आया और संदीप के शव को कार में रख कर तीनों पांडु नदी के काठ पुल पर पहुंचे और शव को पुल के नीचे फेंक दिया. लाश फेंक कर वे वापस लौट आए.

इधर 21 मार्च को गहोई निवासी बबलू भदौरिया ने पांडु नदी में एक युवक की लाश पानी पर तैरती देखी तो उस ने बर्रा थानाप्रभारी को सूचना दे दी.

थानाप्रभारी भास्कर मिश्रा ने तीनों अभियुक्तों से पूछताछ के बाद 23 मार्च, 2018 को कानपुर कोर्ट में सीएमएम की अदालत में पेश किया, जहां से तीनों को जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उन की जमानत नहीं हुई थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बिना ईमान की औरत

6 जनवरी, 2018 को महानगर मुंबई से सटे ठाणे जनपद के तालुका भिवंडी स्थित कसाईवाड़ा का रहने वाला शादाब कुरैशी अपना धंधा बंद कर जब घर पहुंचा तो उसे जो खबर मिली, उसे सुन कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

फोन पर उस की बुआ के बेटे रिजवान कुरैशी ने बताया कि 3-4 दिन पहले 4-5 लोगों ने उस के बहन बहनोई के घर में घुस कर उन के साथ मारपीट की और उस के बहनोई की हत्या कर के उस की बहन गुलशबा को अगवा कर ले गए.

मैं मौके पर मौजूद था. मैं ने जब उन का विरोध किया तो उन्होंने मारपीट कर मुझे भी घायल कर दिया. गुलशबा अपने पति मनोज सोनी उर्फ कैफ के साथ नायगांव परिसर स्थित बिट्ठलनगर के फ्लैट में रहती थी.

इस के पहले कि शादाब कुरैशी रिजवान से इस बारे में कोई बात पूछता, फोन कट गया. कई बार कोशिश के बाद भी जब रिजवान से संपर्क नहीं हो पाया तो सच्चाई जानने के लिए शादाब बहन के फ्लैट पर पहुंच गया.

फ्लैट के बाहर लोगों की भीड़ जमा थी, अंदर से थोड़ी बदबू भी आ रही थी. पड़ोसियों ने बताया कि यह फ्लैट 3-4 दिनों से बंद पड़ा है. उन्होंने फोन कर के उस फ्लैट के मालिक को बुला लिया था. मामला संदिग्ध था, इसलिए मकान मालिक ने मामले की जानकारी स्थानीय पुलिस थाने को दे दी थी.

रात करीब एक बजे थाना शांतिनगर के थानाप्रभारी किशोर जाधव अपने सहायक पीआई मनजीत सिंह बग्गा, एसआई जी.के. वाघ, दिनेश लोखंडे, एएसआई डी.के. सोनवणे, सिपाही सुनील इंथापे, टी.बी. वड़ को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने देखा कि गुलशबा के फ्लैट पर ताला लटका हुआ था. चूंकि उस ताले की चाबी किसी के पास नहीं थी, इसलिए पुलिस ने ताले को तोड़ दिया. दरवाजा खुलते ही अंदर से तेज बदबू का झोंका आया, जिस से वहां खड़े लोगों का सांस लेना मुश्किल हो गया.

नाक पर रूमाल रख कर पुलिस टीम जब कमरे में गई तो वहां का नजारा देख कर स्तब्ध रह गई. फर्श पर खून के जमे हुए धब्बे नजर आ रहे थे, जो सूख कर काले पड़ गए थे.

दरवाजे के पीछे कपड़ों का एक पुलिंदा रखा हुआ था, जिस से ढेर सारा खून निकल कर बाहर आ गया था. उस पुलिंदे को खोला गया तो उस में एक आदमी की लाश थी. लाश का धड़ और सिर दोनों अलगअलग थे. शादाब कुरैशी ने उस लाश की शिनाख्त अपने बहनोई मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ के रूप में की.

लाश देख कर लग रहा था कि उस की हत्या 3-4 दिन पहले की गई होगी,जिस से शव में सड़न पैदा हो गई थी. थानाप्रभारी किशोर जाधव ने इस की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. खबर पाते ही ठाणे जिले के डीसीपी मनोज पाटिल, एसीपी मुजावर तत्काल मौकाएवारदात पर आ गए. उन्होंने भी मृतक के साले शादाब और अन्य लोगों से पूछताछ की.

घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भिवंडी के आईजीएस अस्पताल भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने शादाब कुरैशी की तरफ से हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर के मामले की जांच सहायक पीआई मंजीत सिंह बग्गा को सौंप दी. शादाब ने शक अपनी बुआ के बेटे रिजवान पर ही जताया था. फुफेरे भाई के अलावा रिजवान रिश्ते में शादाब का साला भी था.

संदेह के दायरे में रिजवान कुरैशी

शुरुआती जांच में रिजवान कुरैशी पुलिस के रडार पर आ गया था. उस ने जिस प्रकार से मामले की जानकारी शादाब कुरैशी को दी थी, वह आधीअधूरी थी. इस के अलावा मृतक के तीनों बच्चे अपने नानी के घर सहीसलामत थे. बच्चों की मां गुलशबा खुद उन्हें बच्चों को मायके छोड़ कर आई थी. ऐसे में गुलशबा के अपहरण का तो सवाल नहीं उठता था. एपीआई मंजीत सिंह बग्गा के निर्देशन में पुलिस टीम उस के घर गई तो वह घर से गायब मिला.

पुलिस ने जब रिजवान कुरैशी के बारे में गहराई से जांचपड़ताल की तो पता चला कि रिजवान कुरैशी का चरित्र ठीक नहीं है. मृतक की पत्नी के साथ उस के अवैध संबंध थे. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने गुलशबा को भी जांच के घेरे में शामिल कर लिया.

इस के बाद पुलिस ने रिजवान के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स में यह जानकारी मिल गई कि रिजवान की किनकिन लोगों से बात होती थी. पुलिस ने उन लोगों से पूछताछ शुरू कर दी. इस पूछताछ के बाद पुलिस को रिजवान के बारे में महत्त्वपूर्ण सूचना मिल गई.

इस के बाद एपीआई मंजीत सिंह बग्गा ने एसआई दिनेश लोखंडे, कांस्टेबल सुनील इंथापे, टी.बी. वड़, के.टी. मोहिते की एक टीम बना कर उन्हें रिजवान कुरैशी और गुलशबा की गिरफ्तारी के लिए रवाना कर दिया.

10 जनवरी, 2018 को यह टीम उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली पहुंच गई. वहां दबिश दे कर पुलिस ने रिजवान और गुलशबा को गिरफ्तार कर लिया. वे दोनों अपने एक जानकार के यहां छिपे हुए थे. पुलिस उन्हें ट्रांजिट रिमांड पर ले कर थाना शांतिनगर ले आई.

crime

थानाप्रभारी किशोर जाधव ने उन दोनों से मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने थोड़ी सख्ती के बाद कैफ की हत्या करने की बात स्वीकारते हुए जो कहानी बताई वह एहसान फरामोशी की सारी हदें पार कर देने वाली थी—

इंसानियत का तकाजा

करीब 10 साल पहले 28 वर्षीय गुलशबा कुरैशी मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ को उत्तर प्रदेश के आगरा दिल्ली हाईवे पर काफी दयनीय हालत में भटकती हुई मिली थी. मनोज उस हाइवे पर कटलरी की दुकान लगाता था. उस समय गुलशबा की स्थिति बहुत खराब थी, उस के मुंह से आवाज तक नहीं निकल पा रही थी. लग रहा था जैसे वह कई दिनों से भूखी है.

वह मनोज कुमार सोनी के पास आ कर ऐसे गिर गई, जैसे बेहोश हो गई हो. उस की हालत देख मनोज कुमार घबरा गया. उस ने उसे अपनी दुकान के पास ही लिटाया और उस के मुंह पर पानी के छींटे मारे. कुछ देर बाद गुलशबा को होश आया तो उस ने उसे पानी पिलाया. पानी पीते ही उस की चेतना धीरेधीरे लौट आई.

इस के बाद गुलशबा ने मनोज को अपनी आपबीती बताई. गुलशबा ने उसे बताया कि वह मुंबई की रहने वाली है और वहीं के एक युवक से प्यार करती थी. वह युवक उसे घुमाने के लिए दिल्ली लाया था. दिल्ली के एक होटल में वे दोनों कई दिनों तक साथ रहे.

फिर वह युवक उसे होटल में छोड़ कर कहीं चला गया. होटल वालों ने उसे धक्के मार कर निकाल दिया. किसी तरह वह भटकती हुई यहां तक पहुंची है. अब वह अपने घर वापस नहीं लौट सकती क्योंकि घर वाले उस से बहुत नाराज हैं.

गुलशबा की आपबीती सुनने के बाद मनोज कुमार को उस से सहानुभूति हो गई. उस ने उसे धीरज बंधाया और अपनी दुकान बंद कर के खाना खिलाने के लिए एक होटल पर ले गया. बाद में वह उसे ले कर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन आया और कहा, ‘‘देखो, अब तुम जहां जाना चाहती हो, चली जाओ. मैं तुम्हारी टिकट का बंदोबस्त कर दूंगा. अच्छा यही होगा कि तुम अपने मांबाप के पास लौट जाओ. उन से माफी मांग लेना. मुझे यकीन है कि वे तुम्हें माफ कर देंगे.’’

लेकिन गुलशबा ने मनोज कुमार सोनी की बात नहीं मानी. वह बोली, ‘‘मैं अब क्या मुंह ले कर उन के पास जाऊंगी. शायद वे मुझे माफ कर भी दें लेकिन समाज में हमारी क्या इज्जत रहेगी. ऐसी स्थिति में मैं वहां नहीं जाऊंगी.’’

गुलशबा की यह बात सुन कर मनोज कुमार थोड़ा गंभीर हो गया. उस ने कहा, ‘‘ठीक है, अगर तुम वहां नहीं जाना चाहती हो तो यह बताओ कि तुम्हारा और कोई रिश्तेदार है, जिस के यहां तुम जाना चाहोगी. मैं वहां जाने का बंदोबस्त कर दूंगा.’’

‘‘अब मेरा कोई नहीं है. मैं कहीं नहीं जाना चाहती. मेरे नसीब में जो लिखा है, वह होगा.’’ कहते हुए गुलशबा ने अपना सिर झुका लिया.

गुलशबा के इस उत्तर से मनोज कुमार सोनी एक अजीब स्थिति में फंस गया था. अगर वह कहीं जाना नहीं चाहती तो उस का क्या होगा. एक अकेली अंजान औरत के लिए शहर सुरक्षित नहीं था. उस के साथ कुछ भी हो सकता था.

काफी समझाने के बाद भी जब गुलशबा कहीं जाने के लिए राजी नहीं हुई तो मजबूरन मनोज कुमार यह सोच कर उसे अपने घर ले आया कि मौका देख कर उसे उस के मातापिता के पास भेज देगा. लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

मनोज कुमार के घर आने के बाद गुलशबा कुछ दिनों तक तो उदास रही फिर धीरेधीरे उस के चेहरे की उदासी घटने लगी. वक्त के साथ मनोज कुमार के साथ घुलमिल गई. मनोज कुमार अपने घर में अकेला रहता था. गुलशबा ने मनोज के घर के सारे कामकाज संभाल लिए थे.

30 वर्षीय मनोज कुमार सोनी राजस्थान के रहने वाले जगदीश प्रसाद सोनी का बेटा था. रोजीरोटी के लिए वह दिल्लीआगरा हाइवे पर कटलरी की दुकान चलाता था. वह दुकान का सारा सामान मुंबई से लाता था और आगरा घूमने आने वाले सैलानियों को बेचता था, जिस से उसे अच्छीखासी कमाई हो जाया करती थी.

गुलशबा को अपने प्रति समर्पित देख कर अविवाहित मनोज कुमार सोनी का भी झुकाव उस की तरफ हो गया. वे दोनों अब एकदूसरे की जरूरतें महसूस करने लगे थे, जिस के चलते उन के दिलों में एकदूसरे के प्रति चाहत पैदा हो गई. मन के साथसाथ तन का भी मिलन हो जाने के बाद दोनों अब सोतेजागते अपने जीवन के सतरंगी सपने सजाने लगे. मनोज गुलशबा से शादी करना चाहता था. लेकिन उन के बीच समाज और धर्म की दीवार खड़ी थी.

गुलशबा की तरफ से तो रास्ता साफ था लेकिन मनोज कुमार सोनी के घर वालों को यह रिश्ता पसंद नहीं था. उन की भी समाज में इज्जत थी. मनोज ने घर वालों की बातों को दरकिनार करते हुए खुद मुसलिम धर्म अपना कर गुलशबा से निकाह कर लिया. उस ने अपना नाम बदल कर कैफ रख लिया था.

गुलशबा से शादी कर के मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ खुश था. गुलशबा को भी अचानक में ही सही, पर एक ऐसा पति मिल गया था जो उस का हर तरह से पूरा ध्यान रख रहा था. मनोज रातदिन मेहनत कर के पत्नी को अपनी क्षमता के अनुसार सुखसुविधाएं दे रहा था.

पति के प्यार में गुलशबा भी अपनी बीती जिंदगी के पलों को भुला कर अपनी गृहस्थी में रम गई थी. दोनों के जीवन के 8 साल कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला. इस बीच गुलशबा 2 बच्चों की मां बन गई. कुल मिला कर उस की गृहस्थी की गाड़ी हंसीखुशी से चल रही थी.

समय अपनी गति से चल रहा था. मनोज के कहने पर गुलशबा ने अपने मायके वालों से भी बातचीत करनी शुरू कर दी थी, जिस से उस के उन से भी संबंध सामान्य हो गए थे. बेटी खुश थी, उस का जीवन सुखी था, इस से ज्यादा एक मातापिता को और क्या चाहिए. मायके वालों का उस के पास आनाजाना शुरू हो गया.

8 सालों तक एक ही जगह पर रह कर जब गुलशबा का मन भर गया तो वह कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली गई. गुलशबा चाहती थी कि उस का पति मुंबई में ही अपना धंधा शुरू कर के वहीं रहे तो वह मायके वालों के करीब आ जाएगी.

यही सोच कर उस ने एक दिन कैफ को समझाते हुए कहा, ‘‘जो काम तुम आगरा में करते हो, वही काम मुंबई में भी कर सकते हो. और फिर तुम सामान तो मुंबई से ही लाते हो. सामान लाने में खर्च भी होता है. मुंबई में काम करने से यह खर्चा भी बचेगा.’’

मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ को पत्नी का सुझाव अच्छा लगा. फिर वह सन 2016 में आगरा वाली दुकान किराए पर दे कर अपने परिवार के साथ मुंबई चला गया और अपनी ससुराल के नजदीक नायगांव में किराए का घर ले कर रहने लगा.

बेटी के नजदीक आने पर मायके वाले भी खुश हुए क्योंकि उन का जब भी मन होता गुलशबा से मिलने के लिए आते रहते थे. मुंबई में गुलशबा ने एक बच्ची को जन्म दिया, जिस का नामकरण काफी धूमधाम से हुआ. जहां गुलशबा अपने मायके वालों के करीब रह कर खुश थी, वहीं मनोज उर्फ कैफ थोड़ा चिंतित और परेशान था. इस की वजह यह थी कि मुंबई में उस का कारोबार ठीक नहीं चल पा रहा था. आगरा की दुकान भी बंद हो चुकी थी.

मनोज चाहता था लौटना पर गुलशबा नहीं मानी

यह सब सोच कर मनोज ने आगरा वापस लौटने का फैसला कर लिया पर गुलशबा मुंबई छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी. उस ने पति को कह दिया कि वह अपने तीनों बच्चों के साथ अकेली ही मुंबई में रह लेगी, क्योंकि उस के मायके वाले पास में हैं. मनोज ने भी उस की बात मान ली. पत्नी और बच्चों की तरफ से चिंतामुक्त हो कर मनोज आगरा लौट आया. वापस लौट कर उस ने अपना व्यवसाय फिर से जमा लिया.

कुछ दिनों बाद उस का धंधा पहले की तरह चलने लगा. वह अपने धंधे में व्यस्त हो गया तो गुलशबा अपनी गृहस्थी में. लेकिन वक्त का पहिया कुछ इस प्रकार से घूमा कि उन का सुखमय परिवार तिनके की तरह बिखर गया. अपने कारोबार में मनोज कुमार उर्फ कैफ कुछ इस तरह उलझा कि अपनी पत्नी गुलशबा के लिए वक्त ही नहीं निकाल पाता था. वह साल में 2-4 बार ही गुलशबा को वक्त दे पाता था, जिस के कारण उस के और पत्नी के बीच की दूरियां बढ़ गई थीं.

मनोज कुमार का समय तो उस के कामों में निकल जाता था, लेकिन गुलशबा को उस की याद आती थी. वह अधिक दिनों तक पति की इन दूरियों को बरदाश्त नहीं कर पाई, लिहाजा 27 वर्षीय रिजवान कुरैशी से उस के नाजायज संबंध बन गए. रिजवान गुलशबा के भाई शादाब कुरैशी का साला था, जिस का गुलशबा के यहां आनाजाना लगा रहता था.

रिजवान से अवैध संबंध बन जाने के बाद गुलशबा ने पति की चिंता करनी बंद कर दी. बल्कि जब कभी पति से फोन पर बात होती तो वह उस से कह देती कि यहां की कोई चिंता मत करो और अपने काम पर ध्यान दो. पत्नी की चहकती बातों से मनोज को लगता कि गुलशबा खुश है. इस तरह गुलशबा पति के भरोसे का खून करती रही.

पत्नी के अवैध संबंधों की खबर किसी तरह मनोज के पास पहुंची तो उस के होश उड़ गए. उस ने सोचा भी न था कि जिस गुलशबा को वह रोड से उठा कर अपने घर लाया, जिस की खातिर उस ने अपना धर्म बदला, अपने घर वालों तक से बगावत की, जिसे उस ने जीने का सहारा दिया, उसे सारे ऐशोआराम दिए, वह उस के एहसानों का बदला इस प्रकार से चुकाएगी.

इस बात की सच्चाई की तह में जाने के लिए मनोज कुमार जब मुंबई गया तो उसे पत्नी का व्यवहार कुछ अजीब सा लगा. उस के पहुंचने पर पत्नी जिस तरह खुश हो जाती थी, उसे उस के चेहरे पर वह खुशी देखने को नहीं मिली. पत्नी के हावभाव से वह इतना तो समझ ही गया था कि उस के पास पत्नी और रिजवान कुरैशी के बारे में जो खबर पहुंची थी, वह कोई कोरी अफवाह नहीं थी.

इस के बाद वह खबर की पुष्टि में लग गया. इस के लिए वह सूत्र तलाशने लगा. उस ने पड़ोसियों और अपने बच्चों से बात की तो इस बात की पुष्टि हो गई कि रिजवान गुलशबा से मिलने अकसर आता रहता है. कभीकभी तो वह उस के फ्लैट पर भी रुक जाता था.

इस बारे में उस ने गुलशबा से बात की तो वह सरासर झूठ बोल गई. उस ने कहा कि उस की पड़ोसियों से बनती नहीं है, इसलिए वे सब उसे बदनाम कर रहे हैं. रिजवान तो उस का भाई जैसा है.

अपनी नौटंकी से कुछ समय के लिए तो गुलशबा ने पति को अपने झांसे में ले लिया. लेकिन 2-4 दिन में ही उस की हकीकत मनोज के सामने आ गई. मनोज ने पत्नी को रिजवान के साथ रंगेहाथों पकड़ लिया. तब मनोज ने गुलशबा की जम कर पिटाई की.

पोल खुल जाने के बाद गुलशबा को बेइज्जती महसूस हुई. यह बात उस के मायके वालों को भी पता लग गई. इस सच्चाई का पता लग जाने के बाद मनोज पत्नी को मुंबई में अकेले नहीं छोड़ना चाहता था. उस ने गुलशबा और बच्चों को आगरा ले जाने का फैसला कर लिया.

उस ने पत्नी से कहा कि अब हम आगरा में रहेंगे. पर गुलशबा ने मुंबई छोड़ कर जाने से मना कर दिया. इस बात पर दोनों में झगड़ा भी हुआ. मनोज उसे ले जाने की जिद पर अड़ा था.

crime

गुलशबा ने रिजवान को फोन कर बता दिया कि मनोज उसे आगरा ले जाने की जिद कर रहा है और वह यहां से जाना नहीं चाहती. इस बारे में वह कुछ करे. रिजवान भी नहीं चाहता था कि गुलशबा वहां से जाए, इसलिए गुलशबा को ले कर वह परेशान हो उठा.

लिखी गई हत्या की पटकथा

किसी तरह से उस ने गुलशबा से मुलाकात की और मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ को अपने बीच से हटाने की योजना तैयार कर ली. फिर अपनी योजना के अनुसार 2 जनवरी, 2018 की दोपहर में वह मनोज कुमार सोनी के फ्लैट पर पहुंच गया. जिस समय वह फ्लैट में आया, उस समय मनोज खाना खा कर सो रहा था. बच्चे घर के बाहर खेलने के लिए गए हुए थे.

मौका अच्छा था. वह गुलशबा के साथ उस के कमरे में गया और उस पर हमला कर दिया. लेकिन वह कामयाब नहीं हो सका. अपनी जान बचाने के लिए मनोज रिजवान से भिड़ गया, जिस में रिजवान कुरैशी जख्मी हो गया.

अपने पति को रिजवान कुरैशी पर भारी होते देख गुलशबा ने रिजवान कुरैशी की मदद की. उस ने पति के दोनों हाथ पकड़ लिए, तभी झट से रिजवान ने मनोज का गला रेत दिया. मनोज नीचे गिर गया तो रिजवान ने उस का सिर काट कर धड़ से अलग कर दिया. इस के बाद दोनों ने उस के धड़ और सिर को कपड़ों के पुलिंदे में बांध कर दरवाजे के पीछे छिपा दिया. फिर उन्होंने कमरे की सफाई की.

शाम होतेहोते गुलशबा अपने तीनों बच्चों को अपने मायके में छोड़ कर फ्लैट पर आ गई. फिर घर के दरवाजे पर ताला लगा कर वह रिजवान कुरैशी के साथ उत्तर प्रदेश निकल गई, जहां पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. लेकिन इस के पहले रिजवान कुरैशी ने पुलिस और घर वालों का ध्यान भटकाने के लिए शादाब कुरैशी और अपने सारे रिश्तेदारों को एक मनगढ़ंत कहानी सुना दी थी.

थानाप्रभारी किशोर जाधव और एपीआई मंजीत सिंह बग्गा ने गिरफ्तार रिजवान कुरैशी और गुलशबा से विस्तृत पूछताछ के बाद उन के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें तलोजा जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक दोनों अभियुक्त न्यायिक हिरासतऌ में थे. आगे की जांच एपीआई मंजीत सिंह बग्गा कर रहे थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें