परिवार में अपराध : हादसे का दर्द, मुकदमे का बोझ

पारिवारिक अपराध घरपरिवार पर दोहरी मुसीबत ले कर आते हैं. एक तरफ परिवार को नुकसान उठाना होता है, तो वहीं दूसरी तरफ जेल में बंद परिवार के सदस्य को सजा से बचाने के लिए जेल से ले कर कचहरी तक परिवार के बचे लोगों को दौड़ना पड़ता है. वकील और पुलिस के चक्कर में फंस कर केवल पैसा ही नहीं,  समय भी बरबाद होता है. कितने गरीब परिवारों को अपने घर और जमीन तक बेचने या गिरवी रखने पड़ते हैं. परिवार का जेल गया सदस्य जब तक जेल से बाहर आता है, तब तक उस का बचा हुआ परिवार टूट कर बिखर चुका होता है. देश की न्याय प्रणाली की भारीभरकम कीमत ने ज्यादातर भारतीयों की पहुंच से इस को दूर कर दिया है. बहुत से मामलों में सजा पाए लोग लोअर कोर्ट से आगे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जाने की बात सोच ही नहीं सकते.

बेंगलुरु के गैरसरकारी संगठन ‘एक्सेस टू जस्टिस’ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 90 फीसदी अपील करने वाले वे लोग हैं, जो साल में 3 लाख रुपए से कम कमाते हैं. अपील पर आने वाला उन का औसत खर्च एक बार का 16 हजार रुपए हो जाता है.

आंकड़ों से अलग कचहरी में आने वाले खर्च और परेशानियों की हकीकत बहुत अलग होती है. परेशानी की बात यह है कि परिवार में बढ़ते तनाव, जरूरतों और इच्छाओं के चलते अपराध की वारदातें बढ़ रही हैं.

ऐसी वारदातें 25 साल से 35 साल की उम्र में ज्यादा होती हैं. इस समय  नौजवान अपने कैरियर में कामयाबी की तरफ बढ़ रहा होता है. यहां पर अपराध की वारदातों में फंस कर पूरा परिवार तबाह हो जाता है. घरों में होने वाले ऐसे अपराध की सब से बड़ी वजह नाजायज संबंध या पारिवारिक तनातनी होती है.

पिता की मौत, मां को जेल

लखनऊ, उत्तर प्रदेश की बक्शी का तालाब तहसील के इंटौजा थाने के गोहनाखुर्द गांव में रामस्वरूप रावत अपनी पत्नी कुसुमा, मां बिट्टो, 5 साल के बेटे संजय और 3 साल की बेटी रीना के साथ रहता था. रामस्वरूप रावत की शादी 7 साल पहले रामधीन पुरवा की रहने वाली कुसुमा से हुई थी.

इसी गांव में भानुप्रताप सिंह भी रहता था. वह ईंटभट्ठा का मालिक था. उस के 2 ईंटभट्ठे थे. उस का एक भट्ठा प्रताप ब्रिक फील्ड के नाम से गोहनाखुर्द गांव में था और दूसरा बिसवा में था.

रामस्वरूप भानुप्रताप के यहां काम करता था. इस वजह से उस की पत्नी कुसुमा का भी वहां पर आनाजाना होता रहता था.

कुसुमा देखने में खूबसूरत थी. उस में कुछ ऐसा खिंचाव था, जो भानुप्रताप को पसंद आ गया. वह जिस अंदाज से कुसुमा को देखता था, वह अंदाज कुसुमा को पसंद था. जब दोनों तरफ से रजामंदी हो, तो रिश्ता बनते देर नहीं लगती.

अब भानुप्रताप कुसुमा के पति की ओर कुछ ज्यादा ही ध्यान देने लगा था. उस ने आम का 2 बीघा बाग खरीदा और उस की रखवाली करने का काम रामस्वरूप को दे दिया.

नतीजतन, रामस्वरूप दिनरात घर से बाहर ही रहता. भानुप्रताप भी रामस्वरूप की माली मदद करने लगा था.

रामस्वरूप को यह पता नहीं था कि कुसुमा और भानुप्रताप के बीच संबंध हैं. इधर मौके का फायदा उठा कर कुसुमा और भानुप्रताप अब रोज ही संबंध बनाने लगे थे.

एक दिन रामस्वरूप ने कुसुमा और भानुप्रताप को आपत्तिजनक हालत में देख लिया था, पर भानुप्रताप के डर और झिझक के चलते उस ने उन से कुछ नहीं कहा. पर अब वह इन दोनों पर नजर भी रखने लगा था.

एक दिन रामस्वरूप गांव से बाहर था, तब कुसुमा और भानुप्रताप मिले. कुसुमा ने बताया कि किस तरह से उस का पति उसे अब परेशान करने लगा है. कुसुमा और भानुप्रताप ने तय कर लिया कि अब रामस्वरूप को रास्ते से हटाना ही पड़ेगा.

एक दिन भानुप्रताप ने अपने 2 साथियों और कुसुमा को साथ ले कर रामस्वरूप की उस समय हत्या कर दी, जब वह आम के बाग में सो रहा था, लेकिन बहुत से उपाय करने के बाद भी पुलिस से यह अपराध छिपा नहीं.

पुलिस ने रामस्वरूप की लाश को गड्ढे से खोद कर बरामद कर लिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबा कर हत्या करने का मामला सामने आया.

पुलिस ने धारा 302 के तहत कुसुमा, भानुप्रताप, बबलू और लल्लू के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया. कुसुमा, भानुप्रताप और बबलू को पुलिस ने फौरन पकड़ लिया, जबकि लल्लू फरार हो चुका था. पुलिस की पूरी छानबीन और पुख्ता सुबूतों के आधार पर ही तीनों आरोपियों को जेल भेज दिया. पिता की मौत और मां के जेल चले जाने के बाद 5 साल का बेटा संजय और 3 साल की बेटी रीना अनाथ हो गए.

केवल कुसुमा का परिवार ही नहीं, बल्कि भानुप्रताप का परिवार भी तबाह हो गया. उस ने अपनी मेहनत और लगन से ईंटभट्ठे के जिस कारोबार को जमाया था, वह बरबाद हो गया. अब उस की जमानत से ले कर मुकदमे तक में लाखों रुपए बरबाद हो रहे हैं.

10 साल की सजा

बक्शी का तालाब, लखनऊ के रहने वाले वंशीलाल ने अपनी बेटी शिवदेवी की शादी सत्यपाल के साथ की थी. शादी के बाद ही सत्यपाल और उस के घर वालों ने शिवदेवी से मोटरसाइकिल और सोने की चेन की मांग शुरू कर दी.

दहेज की मांग पूरी न होने पर 8-9 अक्तूबर, 2015 को उन लोगों ने शिवदेवी को सोते समय जला दिया. 13 अक्तूबर को इलाज के दौरान अस्पताल में शिवदेवी की मौत हो गई.

शिवदेवी के पिता ने अपनी बेटी के पति सत्यपाल और जेठ सत्यवान के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कराया.

अदालत ने सत्यवान के खिलाफ कोई सुबूत नहीं पाया, तो उसे मुकदमे से बरी कर दिया और पति सत्यपाल को 10 साल की सजा और 15 हजार रुपए का जुर्माना देने का फैसला सुनाया.

अदालत ने यह भी कहा कि जुर्माने में से 10 हजार रुपए वादी यानी शिवदेवी के पिता को दिए जाएं.

हत्या की इस वारदात में 2 परिवार तबाह हो गए. बेटी की मौत का दर्द लिए जी रहा पिता इस फैसले से खुश नहीं था. उसे लग रहा है कि उस की बेटी की हत्या करने वालों को वैसी सजा नहीं मिली, जैसी उस की बेटी ने भोगी.

वह इस मामले को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ले जाना चाहता है, पर माली तौर पर मजबूर है. सोने की चेन और मोटरसाइकिल से ज्यादा कीमत शिवदेवी की हत्या में फंसे उस के पति सत्यपाल के परिवार ने थाना और कचहरी के चक्कर में खर्च कर डाली.

लखनऊ के ही थाना गोसाईंगंज क्षेत्र में रहने वाले महादेव ने 9 मई, 2015 को अपनी बेटी रानी की शादी हरिश्चंद्र से की थी. एक लाख रुपए के दहेज की मांग को ले कर हरिश्चंद्र अपनी पत्नी रीना को तंग करता था. इस से परेशान हो कर महादेव अपनी बेटी को ससुराल से मायके ले आया. कुछ दिन बाद हरिश्चंद्र अपनी ससुराल आया और पत्नी को विदा करा कर ले गया. उस ने कहा कि वह उसे दोबारा परेशान नहीं करेगा.

14 फरवरी, 2016 को रीना की हत्या हो गई. रीना की लाश रस्सी से लटकी मिली. उस के घर वालों का आरोप था कि रीना को मार कर रस्सी से लटकाया गया है.

पुलिस ने हत्या के आरोपी पति की जमानत की अपील खारिज कर दी और उसे सुनवाई तक जेल में रहना होगा.

इस तरह दहेज कानून के तहत लोग सालोंसाल से जेलों में बंद हैं. पैरवी में हर पेशी पर घर वालों को वकीलों से ले कर जेल मुलाजिमों तक को पैसा देना पड़ता है.

जायदाद की जगह जेल

लखनऊ के माल थाना क्षेत्र के नबी पनाह गांव में मुन्ना सिंह अपने 2 बेटों संजय और रणविजय के साथ रहते थे. 60 साल के मुन्ना सिंह का आम का बाग था, जिस की कीमत करोड़ों में थी.

मुन्ना के बड़े बेटे संजय की शादी रायबरेली जिले की रहने वाली सुशीला के साथ 5 साल पहले हुई थी. सुशीला के 2 बच्चे, 4 साल की बेटी और डेढ़ साल का बेटा थे. वह पूरे घर पर कब्जा जमाना चाहती थी. इसलिए उस ने सगे देवर रणविजय से संबंध बना लिए, जिस से वह शादी न करे.

सुशीला को डर था कि देवर की शादी के बाद उस की पत्नी और बच्चों का भी जायदाद में हक हो जाएगा.

यह बात जब मुन्ना सिंह को पता चली, तो वे अपने छोटे बेटे की शादी कराने की कोशिश करने लगे. सुशीला को जायदाद की चिंता थी. वह जानती थी कि देवर रणविजय ससुर को राह से हटाने में उस की मदद नहीं करेगा. तब उस ने अपने चचेरे देवर शिवम को भी अपने संबंधों से जाल में फंसा लिया.

जब शिवम पूरी तरह से उस के काबू में आ गया, तो उस ने ससुर मुन्ना सिंह की हत्या की योजना पर काम करने के लिए कहा. शिवम जब इस के लिए तैयार नहीं हुआ, तो सुशीला ने शिवम को बदनाम करने का डर दिखाया और बात मान लेने पर 20 हजार रुपए देने का लालच भी दिया. डर और लालच में शिवम सुशीला का साथ देने को तैयार हो गया.

12 जून की रात मुन्ना सिंह आम की फसल बेच कर घर आए. इस के बाद खाना खा कर आम के बाग में सोने के लिए चले गए. वे अपने पैसे हमेशा साथ ही रखते थे.

सुशीला ने शिवम को फोन कर के गांव के बाहर बुला लिया. शिवम अपने साथ राघवेंद्र को भी ले आया था. तीनों एक जगह मिले और फिर मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली.

मुन्ना सिंह उस समय बाग में सो रहे थे. दबे पैर पहुंच कर तीनों ने उन को दबोचने के पहले चेहरे पर कंबल डाल दिया. सुशीला ने उन के पैर पकड़ लिए और शिवम व राघवेंद्र ने उन को काबू में किया, जान बचाने के संघर्ष में मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गए. वहीं पर दोनों ने गमछे से गला दबा कर उन की हत्या कर दी.

मुन्ना सिंह के बेटे संजय और रणविजय ने हत्या का मुकदमा माल थाने में दर्ज कराया. एसओ विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की.

पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. सुशीला बारबार पुलिस को यह समझाने की कोशिश में थी कि ससुर मुन्ना सिंह के संबंध अपने बेटों से अच्छे नहीं थे.

इस बीच गांव में यह पता चला कि सुशीला का देवर रणविजय और चचेरे देवर शिवम से संबंध है. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ शुरू की.

पुलिस ने सुशीला के मोबाइल फोन की काल डिटेल देखनी शुरू की, तो पता चला कि सुशीला ने उस दिन शिवम से देर रात तक बात की थी.

पुलिस ने शिवम का फोन देखा, तो उस में राघवेंद्र का नंबर मिला. इस के बाद पुलिस ने राघवेंद्र, शिवम और सुशीला से अलगअलग बात की.

सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उस के देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था.

सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे, तो वह अकेली पूरी जायदाद की मालकिन बन जाएगी, पर पुलिस को सच का पता चल चुका था.

जायदाद के लालच में फंसी बहू जेल चली गई. उस के डेढ़ साल के बेटे को बिना कुसूर जेल जाना पड़ा.

जिस जायदाद को पा कर वह ऐश की जिंदगी जीना चाहती थी, उसी को बेच कर घर वाले थानाकचहरी के चक्कर लगाएंगे.

एक नजर में मुकदमों का खर्च

बेंगलुरु के एक गैरसरकारी संगठन ‘एक्सैस टू जस्टिस’ की एक रिपोर्ट में मुकदमों पर होने वाले खर्चों को दिखाने का काम किया गया है. औसतन मुकदमों में इंसाफ मिलने में एक से 5 साल तक का समय लग जाता है. तमाम लोगों के पास अपनी जमानत देने का भी पैसा नहीं होता, जिस वजह से वे जेल में ही पड़े रहते हैं. पैसे की कमी में लोग लोअर कोर्ट से हाईकोर्ट में नहीं जा पाते हैं. कई बार पैसों का इंतजाम करने में घरजमीन तक बिक जाते हैं. सब से बड़ी परेशानी यह है कि मुवक्किल के प्रति वकीलों में जवाबदेही की कमी होती है.

24 राज्यों की 305 जगहों पर 9329 लोगों के बीच किए गए सर्वे में पता चलता है कि 48 फीसदी परिवार 3 लाख सालाना कमाई करने वाले मध्यम वर्ग के होते हैं. एक लाख से कम कमाई वाले 43 फीसदी परिवार मुकदमेबाजी में उलझे हैं. 3 लाख से ज्यादा सालाना आमदनी वाले केवल 10 फीसदी परिवार ही मुकदमेबाजी में उलझे हैं.

सर्वे में यह भी पता चला है कि 66 फीसदी मामलों में जमीन और जायदाद के मुकदमे होते हैं. 80 हजार करोड़ रुपए हर साल खर्च होते हैं. 84 फीसदी मुकदमे मर्दों की तरफ से होते हैं, जबकि 15 फीसदी मुकदमे औरतों की ओर से होते हैं.

44 फीसदी सामान्य वर्ग के लोग मुकदमा दर्ज करते हैं. 34 फीसदी पिछड़ा वर्ग और 14 फीसदी दलित जातियों के लोग मुकदमा दर्ज करते हैं.

सालाना एक लाख रुपए से कम आमदनी वाले मुकदमे पर 10 हजार रुपए, एक लाख से 3 लाख सालाना आमदनी वाले 16 हजार रुपए, 3 लाख से 5 लाख सालाना आमदनी वाले 26 हजार रुपए और 5 लाख से 10 लाख सालाना आमदनी वाले 25 हजार रुपए मुकदमों पर खर्च करते हैं.

‘बम डिगी डिगी’ गाने पर इस लड़की का डांस वीडियो हो रहा वायरल

जैक नाइट एक्स जैस्मिन वालिया का पंजाबी गाना ‘बम डिगी डिगी’ लोगों को बेहद पसंद आया है. इतना ही नहीं इस गाने का क्रेज इतना ज्‍यादा युवाओं में बढ़ गया कि कइयों ने तो इस गाने के डांस स्‍टेप को फौलो करके अपने डांस का वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया. बता दें, यही गाना फिल्म ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ में भी हमें देखने को मिला था.

बेहद पसंद किया जा रहा है वीडियो

इन दिनों इंटरनेट पर ऐसा ही एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसे Sagnika Dance School नाम के एक यू-ट्यूब चैनल ने अपलोड किया है. बता दें, इस वीडियो में एक लड़के साथ एक लड़की ‘बम डिगी डिगी’ गाने पर जबरदस्त डांस करती हुई नजर आ रही है. एक महीने के अंदर इस वीडियो को अब तक 6 लाख से ऊपर बार देखा जा चुका है और साथ ही काफी प्रतिक्रियाएं भी मिली हैं. इस वीडियो को 29 अप्रैल 2018 को अपलोड किया गया था.

इस वीडियो में एक कपल को शानदार डांस करते हुए देखा जा सकता है. इस वीडियो में डांस कर रही लड़की का नाम सग्निका और लड़के का नाम रजनीकांत बताया गया है. इस 3.12 मिनट के शौर्ट वीडियो में परफौर्म कर रहे इस कपल ने ‘बम डिगी डिगी’ में डांस को एक अलग एंगल से पेश किया है. इसलिए लोगों को इनका डांस काफी पसंद आ रहा है. गौरतलब है कि आज सोशल मीडिया पर आए दिन देश के युवाओं का टैलेंट देखने को मिल रहा है. उन्होंने अपना हुनर दिखाने के लिए इंटरनेट को अपना माध्यम बनाया है.

धार्मिक जगहों से सड़कों पर भीड़

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के जस्टिस विक्रम नाथ और अब्दुल मोईन ने वकील मोतीलाल की याचिका पर फैसला देते हुए 20 दिसंबर, 2017 को धार्मिक जगहों व शादी समारोहों पर बिना इजाजत के लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर सख्त एतराज जताया.

कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या ऐसी जगहों पर लाउडस्पीकर लगाने को ले कर लिखित इजाजत ली गई है? अगर इजाजत नहीं ली गई तो इन के खिलाफ क्या कार्यवाही की गई है? कोर्ट ने यह भी पूछा है कि प्रदेश में शोर प्रदूषण रोकने के लिए क्या कोई मशीनरी बनी है?

कोर्ट ने यह भी पूछा है कि जब कानून बना है तो अफसर उस का कड़ाई से पालन क्यों नहीं कराते हैं? शोर प्रदूषण से आजादी और शांतिपूर्ण नींद को संविधान के अनुच्छेद में होने की बात को दोहराते हुए कोर्ट ने कहा कि बारबार इस मुद्दे पर याचिकाएं दाखिल होने से एक बात तो तय है कि या तो संबंधित अफसरों के पास 2000 के रूल्स के प्रावधान को लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं है या उन की जवाबदेही तय नहीं है.

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के अफसरों को जवाब देने का सख्त आदेश दिया है. नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने अमरनाथ में दर्शन करने वालों से कहा है कि वहां पर जयकारे नहीं लगाए जाएं. समझने वाली बात यह है कि कोर्ट के ऐसे बहुत सारे आदेशों को दरकिनार कर के धार्मिक जगहों पर काम हो रहे हैं.

धार्मिक जगहों पर भीड़

सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि हाईवे सड़क के किनारे मंदिर न बनाए जाएं. तमाम सरकारों ने धार्मिक जगहों को हटाने की जगह पर सड़क को ही हाईवे कैटेगरी से बाहर कर दिया. देश में शायद ही ऐसी कोई सड़क होगी जहां पर मंदिर या दूसरी धार्मिक जगहें न बनी हों. सड़क पर ही नहीं शहरों में भी भीड़ को देखें तो सब से ज्यादा कब्जा पूजा वाली जगहों के पास ही दिखता है.

सड़कों पर भीड़ के लिए मंदिरों में दर्शन करने आने वाले ही जिम्मेदार होते हैं. यहां पर ट्रैफिक पुलिस भी कभी गाडि़यों का चालान नहीं करती है. केवल दर्शन करने वाले ही नहीं बल्कि मंदिरों के आगे फूल वाले, प्रसाद की दुकानों, दर्शन के लिए लाइनोें, गाडि़यों वगैरह का रुकना भी भीड़ को बढ़ाता है.

मंदिरों में आने वाले भक्त तो यह सहन कर लेते हैं, पर आम आदमी को क्यों सहन करें? यह बात अदालत समझती है पर अफसरशाह, नेता और जनता नहीं समझती है. इस की 2 वजहें हैं. एक तो नेताओं पर वोट बैंक का दबाव होता है. ज्यादातर पार्टियां धर्म के नाम पर वोट लेती हैं. ऐसे में वे धर्म के नाम पर कानून में हुए बदलाव को लागू करने की कोशिश में नहीं रहती हैं. इसी वजह से कोर्ट को दखल देना पड़ता है.

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दूसरी, नौइज पौल्यूशन रैज्यूलेशन ऐंड कंट्रोल रूल्स 2000 को बने हुए इतने साल का समय हो गया, पर यह ठीक से लागू नहीं हो पाया है.

लखनऊ हाईकोर्ट ने इस बात को महसूस करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया है. देखने वाली बात यह है कि अब सरकार इस को कैसे लागू करती है. शोर प्रदूषण को ले कर इस के पहले भी कई जगहों पर बात उठती रहती है. मंदिरों के बाहर होने वाले कब्जों को ले कर लोग कम सवाल करते हैं.

कानून का नहीं होता पालन

धार्मिक जगहों के बाहर भीड़ के लिए केवल मंदिर ही दोषी नहीं हैं, बल्कि मसजिद, चर्च और गुरुद्वारे भी भीड़ के लिए जिम्मेदार होते हैं. ऐसे में सड़क पर चलने वाले हर किसी को तकलीफ होती है. जरूरी है कि धार्मिक जगहों के सामने होने वाली भीड़ को रोका जाए.

त्योहारों और दूसरे मौकों पर यह परेशानी ज्यादा बढ़ जाती है. दर्शन करने वालों को भी सड़क पर लगे जाम से रूबरू होना पड़ता है. इस के बाद भी वे धर्म के नाम पर सहन करते हैं.

धार्मिक मसलोें को ले कर सब से ज्यादा सड़क पर जाम होता है. जाम लगाने वाले दूसरों की सुविधा का ध्यान नहीं रखते हैं. इस वजह से परेशानी और बढ़ जाती है.

गायक सोनू निगम ने मसजिद में लगे लाउडस्पीकर पर सवाल उठाया था. ऐसे में उन का विरोध होने लगा. दरअसल, धर्म को ले कर कायम अंधविश्वास को ले कर सभी एकमत हैं. मंदिर के समर्थकों को लगता है कि अगर मसजिद के लाउडस्पीकर पर सवाल उठेंगे तो मंदिर के लाउडस्पीकर भी हटाने पड़ेंगे.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने बयान में कहा था कि जब हम सड़क पर होने वाली नमाज को नहीं रोक सकते तो हमें कांवड़ यात्रा को रोकने का हक नहीं है.

कांवड़ यात्रा के समय कुछ शहरों में यातायात इतना प्रभावित होता है कि वहां सड़कों पर लोगों के चलने पर बैन लगा दिया जाता है. कई शहरों में तो कईकई दिनों तक वहां का जनजीवन प्रभावित हो जाता है. स्कूलकालेज, बाजार बंद करने और दूसरे काम रोकने पड़ते हैं. पहले धर्म के नाम पर जुटने वाली भीड़ कम होती थी. तब ये बातें जिंदगी को इतना प्रभावित नहीं करती थीं. अब भीड़ के बढ़ने से मामला गंभीर हो गया है.

बढ़ती आस्था जिम्मेदार

धर्म के नाम पर बढ़ती भीड़ केवल आस्था के चलते ही नहीं होती, बल्कि धार्मिक जगहों में भीड़ की आड़ में कई तरह के रोजगार भी बढ़ जाते हैं. ऐसी जगहों पर दुकान लगाने वाले मंदिर से जुड़े लोग होते हैं. दरगाह के सामने भी ऐसी भारी भीड़ जुटने लगी है. वहां भी फूल से ले कर चादर और दूसरे सामान बिकने लगे हैं.

इन दुकानों से पुलिस से ले कर जिला प्रशासन तक कोई वसूली नहीं कर पाता है. इस वजह से वहां दुकान लगाने वालों को आसानी रहती है. धर्म के नाम पर किसी तरह का भी संरक्षण मिल जाता है. ऐसे में अब धार्मिक जगहें किसी न किसी तरह से दुकानों के अड्डे बनती जा रही हैं.

धार्मिक जगहों पर होने वाली भीड़ में चोरीचकारी, धक्कामुक्की और छेड़खानी तक होती है. यही वजह है कि हर मंदिर में यह नोटिस लिखा दिख जाता है कि चोरउचक्कों से सावधान रहिए. यह बताता है कि भीड़ में होने वाले अपराध मंदिरों में भी होते हैं.

धर्म के नाम पर लोग हर तरह की बातें स्वीकार कर लेते हैं. ऐसे में केवल उन लोगों को भुगतना पड़ता है जो ऐसी जगहों के पास रहते हैं.

अयोध्या में राम मंदिर के पास रहने वाले किशन कुमार कहते हैं, ‘‘मंदिर में जब भीड़ बढ़ती है तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पर असर पड़ता है. कई बार तो हम घरों में ही कैद हो कर रह जाते हैं. हमें अपने घरों में कई तरह के सुधार तक करने की छूट नहीं होती है. हरबात के लिए प्रशासन की इजाजत लेनी पड़ती है.’’

ऐसी परेशानियां बहुत से लोगों को सहन करनी पड़ती हैं. सड़क नागरिकों के चलने के लिए होती है. यहां पर लगने वाली भीड़ से नागरिक अधिकारों का हनन होता है. ऐसे में जरूरी है कि धार्मिक जगहों के बाहर होने वाली भीड़ को रोका जाए.

जर, जोरू से आगे जमीन…

धर्मनिरपेक्षता की आड़ ले कर देशभर में धार्मिक आजादी का सब से ज्यादा गलत इस्तेमाल जमीनों पर कब्जा करने के लिए हो रहा है. अगर कमाई का जरीया या रहने को जगह चाहिए तो हरी चुन्नी की एक तसवीर या खंभे की जरूरत है. मंदिरमसजिद की आड़ में करोड़ों की जमीनें हड़पी जा रही हैं. बड़ेबड़े आश्रम बनाए जा रहे हैं.

आसाराम जब रेप के आरोपों के बाद गिरफ्तार हुआ तो 60 हजार करोड़ रुपए की जमीन का मालिक निकला. गुरमीत राम रहीम को जब जेल भेजा गया तो वह भी हजारों करोड़ रुपए की जमीन का मालिक निकला. मोहमाया से दूर रहने का ज्ञान बांटने वाले ये ढोंगी अरबों रुपए की जमीनें हड़प रहे हैं.

राजस्थान सरकार ने पिछले दिनों पुष्कर में करोड़ों रुपए मंदिरों को चमकाने के लिए आवंटित किए तो कई सवाल खड़े हुए.

एक तरफ बरबादी की कगार पर खड़े किसान सरकार की तरफ राहत की उम्मीद लगा कर जगहजगह धरनाप्रदर्शन कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ बेरोजगार नौजवान अपराध के दलदल में फंस रहे हैं.

सरकार किसानों की कर्जमाफी व बेरोजगारों को रोजगार देने की बात करती है, पर दूसरी ओर वह पैसे की तंगहाली का रोना रोना शुरू कर देती है. धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़ कर चल रही सरकार के पास धार्मिक जगहों पर खर्चा करने के लिए पैसों की कोई कमी नहीं है.

आप के सामने 2 सरकारी फैसलों का ब्योरा रखते हैं. पहला फैसला राजस्थान में भैरोंसिंह शेखावत सरकार के समय लिया गया था, जिस में जितने भी पुराने गढ़किले थे, उन को ठीक करने के नाम पर करोड़ों रुपए बांटे गए थे. पर्यटन को बढ़ावा देने का हवाला दिया गया था. और अब यही काम वसुंधरा राजे की सरकार कर रही है.

जबकि किलों का मालिकाना हक सरकार ने अपने पास नहीं लिया, बल्कि पुराने सामंतों को ही ट्रस्ट की आड़ में मालिक बना दिया गया. जनता के खूनपसीने की कमाई से भरे टैक्स के पैसों को सामंतों की भलाई में खर्च कर दिया गया.

आप अपने आसपास के किलों को देख लीजिए, कौन मालिक है व पर्यटन की आड़ में जो पैसा कमाया जा रहा है, वह किस की जेब में जा रहा है? इस का हिसाबकिताब किसी के पास नहीं है.

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राजस्थान की जनता के दिलोदिमाग में बैठे पुराने जोरजुल्मों के खौफ को हरा करते ये गढ़किले कमाई के पैसे किस को दे रहे हैं?

इस एक फैसले ने किसान सभा व प्रजामंडल द्वारा आजादी के समय लड़ी लड़ाई पर पानी फेर दिया.

ऐसा ही एक फैसला मध्य प्रदेश की सरकार ने लिया है. अब शिवराज सरकार मंदिरों की जमीनें पुजारियों के नाम करेगी. वैसे तो हमें यह बताया जाता है कि मंदिर सार्वजनिक स्थल होते हैं, पर उस के अघोषित मालिक तो पंडेपुजारी ही होते हैं. अब बाकायदा मध्य प्रदेश सरकार कब्जाई जमीनों पर बने मंदिरों को अपनी तरफ से मंजूरी दे कर उस जमीन की रजिस्ट्री पुजारी के नाम करेगी.

होना तो यह चाहिए था कि सरकारी जमीनों पर हुए इन कब्जों को हटा कर गरीबों के लिए घरों की सुविधा मुहैया कराई जाती, लेकिन सरकार इस के उलट जमीनों पर कब्जे की इस गलत चलन को बढ़ावा देगी.

थोड़े दिनों पहले राजस्थान की वसुंधरा सरकार गांवदेहात में सदियों से घर बना कर रह रहे लोगों को जमीन का आवासीय पट्टा मुहैया करवाने का प्रस्ताव लाई थी, लेकिन वो प्रस्ताव पता नहीं कहां खो गया? अब वसुंधरा सरकार भी पुष्कर में करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद इसी तरफ बढ़ेगी.

भारतीयों की सदियों से मानसिक गुलामी की प्रतीक बनी हुई मंदिरमसजिद की मीनारों के गैरकानूनी मालिक जब पट्टे हासिल करने लगेंगे तो एकाएक नए धार्मिक स्थलों के बनने में तेजी आएगी. लोग धड़ाधड़ जमीनों पर कब्जा कर के मंदिर बनाएंगे.

तसवीरोंमूर्तियों की बिक्री बढ़ने की उम्मीद जागी है. सभी लोग खेतों की रखवाली करते रहना. कहीं ऐसा न हो कि रात को घर में सो कर सुबह खेत में पहुंचो तो पुजारी मंदिर का पट्टा ले कर आप के खेत में बैठा मिले.

सब मिल कर अपने घरों को मंदिर घोषित कर के तहसील में पट्टे की अर्जी भेज दो व खेतों में लट्ठ ले कर बैठ जाओ. जमीन रहेगी तो जर, जोरू की कमी नहीं रहेगी.

आज सबकुछ जमीन ही है. मोरचा संभाल लेना, नहीं तो सरकारी मुलाजिमों के रूप में पुराने सामंतों वाले कणवारिए आएंगे और ये पंडेपुजारी के रूप में तुम्हारा शोषण दोबारा शुरू करेंगे.

ये हैं दुनिया की बेहतरीन जासूसी एजेंसियां

हम ने कई फिल्मों में रा और आईएसआई के एजेंटों के बारे में देखा है. टीवी पर भी इस से संबंधित कई सीरियल आए हैं.

जैसे अनिल कपूर का मशहूर शो ‘24’ भी काफी लोकप्रिय हुआ था. इस में अनिल कपूर ने एक रा एजेंट की भूमिका निभाई थी. आज के किशोर आधुनिक तकनीकी के साथ हर चीज से अपडेट रहना चाहते हैं तो क्यों न उन्हें दुनिया की खासखास और बेहतरीन खुफिया एजेंसियों के बारे में जानकारी दी जाए.

किसी भी देश में सुरक्षा और चौकसी बनाए रखने के लिए कई तरह की सेनाओं, एजेंसियों और अन्य माध्यमों का प्रयोग किया जाता है. इन में से एक महत्त्वपूर्ण कार्य है जासूसी करना. यह काम सरकारी जासूसी एजेंसी से कराया जाता है. खुफिया एजेंसियों का काम दूसरे देशों और संगठनों में सेंध लगा कर उन की जानकारी अपने देश के लिए निकालना होता है.

यही कारण है कि हर देश अपनी सुरक्षा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए खुफिया एजेंसियों पर निर्भर रहता है. वह खुफिया जानकारी ही होती है, जो किसी भी वारदात को अंजाम तक पहुंचने से पहले रोक सकती हैं.

दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियों के असर को काटने के लिए अपनी खुफिया एजेंसी को ज्यादा कारगर बनाना जरूरी होता है. इन एजेंसियों में काम करने वाले लोग और इन के तरीके आम लोगों को पता नहीं होते. इन का सार्वजनिक रूप से कभी खुलासा भी नहीं किया जाता. इन के काम का भी कोई सेट फार्मूला नहीं होता है. यहां कुछ खुफिया एजेंसियों के बारे में बताया जा रहा है, जिन के काम करने की शैली आम लोगों के लिए हमेशा राज ही रहती है.

रा (रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग, भारत)

खुफिया एजेंसी किसी भी देश की सुरक्षा में अपना अलग महत्त्व रखती है. रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रा) का गठन 1962 के भारतचीन युद्ध और 1965 के भारतपाक युद्ध के बाद तब किया गया, जब इंदिरा गांधी सरकार ने भारत की सुरक्षा की जरूरत को महसूस किया. इस की स्थापना सन 1968 में की गई थी. इसे दुनिया की ताकतवर खुफिया एजेंसी माना जाता है.

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इस पर खासतौर से विदेशी धरती से भारत के खिलाफ रची जाने वाली साजिशों, योजनाओं का पता लगाने, अपराधियों और आतंकवादियों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने और उस के हिसाब से देश के नीति निर्माताओं को जानकारी मुहैया कराने की जिम्मेदारी है, ताकि देश और यहां के लोगों की सुरक्षा संबंधी नीतियों को बेहतर बनाया जा सके.

इस का मुख्यालय दिल्ली में स्थित है. यह एजेंसी भारत के प्रधानमंत्री के अलावा किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है. यह विदेशी मामलों, अपराधियों, आतंकियों के बारे में पूरी जानकारी रखती है. रा अपने खुफिया औपरेशंस के लिए जानी जाती है. इस ने अपनी कार्यकुशलता के जरिए कई बडे़ आतंकी हमलों को नाकाम किया है.

इस के सभी मिशन इतने सीक्रेट होते हैं कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती. यहां तक कि एजेंसी में काम करने वालों के परिजनों तक को पता नहीं होता कि वह किस मिशन पर काम कर रहा है. यह एजेंसी इतनी खुफिया है कि किसी भी अखबार को इस के बारे में छापने की अनुमति नहीं है.

आईएसआई (इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस, पाकिस्तान)

यह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी है जो आतंकवाद और उपद्रव को बढ़ाने के लिए भी बदनाम रही है. आईएसआई की स्थापना सन 1948 में की गई थी. 1950 में पूरे पाकिस्तान की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा का जिम्मा आईएसआई को सौंप दिया गया था.

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इस में सेना के तीनों अंगों के अधिकारी मिल कर काम करते हैं. अमेरिका क्राइम रिपोर्ट के मुताबिक आईएसआई को सब से ताकतवर एजेंसी बताया गया था. हालांकि आईएसआई पर आए दिन आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं. भारत में हुए कई आतंकी हमलों में भी आईएसआई के एजेंटों की भूमिका उजागर हो चुकी है. इस का मुख्यालय इस्लामाबाद में है.

सीआईए (सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी, अमेरिका)

यह अमेरिका की बहुचर्चित खुफिया एजेंसी है. इस की स्थापना सन 1947 में तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने की थी. सीआईए 4 भागों में बंटी हुई है. इस का मुख्यालय वर्जीनिया में है. सीआईए सीधे डायरेक्टर औफ नैशनल इंटेलिजेंस को रिपोर्ट करती है. 2013 में वाशिंगटन पोस्ट ने सीआईए को सब से ज्यादा बजट वाली खुफिया एजेंसी बताया था. साइबर क्राइम, आतंकवाद रोकने समेत सीआईए देश की सुरक्षा के लिए काम करती है. कहा जाता है कि अमेरिका को सुपर पावर का दरजा सीआईए के खुफिया कार्यक्रमों की वजह से ही मिल पाया है.

वैसे भारत में ही नहीं, दुनिया के कई देशों में सीआईए की गतिविधियों को ले कर सदैव प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं. हालांकि ओसामा बिन लादेन को मार गिराने में सीआईए की सफलता एक लंबे अरसे के बाद मिली ऐतिहासिक विजय मानी गई थी. सीआईए के पास दूसरे देशों से खुफिया जानकारी जुटाने के अलावा आतंकवाद, परमाणु हथियार और देश के बड़े नेताओं की सुरक्षा का भी जिम्मा है.

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मौजूदा समय में सीआईए के सामने आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है. कहा जाता है कि सीआईए का बजट अरबों डौलर का होता है. इसे मिलने वाले पैसे की जानकाररी को वैसे तो गुप्त रखा जाता है पर माना जाता है कि 2017 में इस के लिए अमेरिकी सरकार ने 12.82 अरब डौलर का बजट दिया था.

एमआई-6 (मिलिट्री इंटेलिजेंस सेक्शन-6, ब्रिटेन)

जेम्स बौंड सीरीज की फिल्मों में बौंड के किरदार को इसी इंटेलिजेंस एजेंसी का सीक्रेट एजेंट बताया जाता है. अब आप समझ ही गए होंगे कि तकनीक और बहादुरी में इस का कोई मुकाबला नहीं है. इस की स्थापना सन 1909 में की गई थी. यह सब से पुरानी खुफिया एजेंसियों में से एक है. माना जाता है कि इस एजेंसी ने अपनी सेवाएं प्रथम विश्वयुद्ध में भी दी थीं और हिटलर को हराने में इस की मुख्य भूमिका थी.

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इस एजेंसी की खास बात यह भी है कि यह दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियों को भी उन के मिशन में मदद करती है. इसे यूनाइटेड किंगडम की सुरक्षा का गुप्त मोर्चा भी कहा जाता है. एमआई-6 जौइंट इंटेलिजेंस, डिफेंस सरकार के साथ जानकारी साझा करने जैसे काम करती है.

एमएसएस (मिनिस्ट्री औफ स्टेट सिक्योरिटी, चीन)

यह चीन की एकलौती खुफिया एजेंसी है, जो आंतरिक और बाहरी दोनों मामलों पर नजर रखती है. इस का मुख्यालय बीजिंग में है. यह एजेंसी चीन को विश्व की गतिविधियों से अवगत कराती है. इस एजेंसी के जिम्मे काउंटर इंटेलिजेंस औपरेशंस और विदेशी खुफिया औपरेशंस को चलाना है. इस का गठन सन 1983 में हुआ था.

यह एजेंसी देश के आंतरिक मामलों में दखल बस कम्युनिस्ट पार्टी की लोकप्रियता बनाए रखने के लिए देती है. चीन जैसे कम्युनिस्ट देश में कई बार सूचनाओं पर भी प्रतिबंध लग जाते हैं.

वैसे भी यहां की कम्युनिस्ट सरकार को अगर कोई गुप्त सूचना या दुश्मन के बारे में जानना होता है तो वह एमएसएस को ही याद करती है. यह चीनी सरकार की सब से भरोसेमंद एजेंसी है. इस एजेंसी का एक ही मकसद है चीनी जनता की रक्षा और कम्युनिस्ट पार्टी का शासन बरकरार रखना.

पिछले 2 दशकों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह तेजी से उभरी है. इस की खासियत यह है कि जितनी बारीकी से यह अपने देश के नागरिकों की हर गतिविधि का रिकौर्ड रखती है, उतना ही मजबूत तंत्र इस का विदेशों में भी है.

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चीन ने जिस तरह से आर्थिक क्षेत्र में पूरी दुनिया में अपना दबदबा बनाया है और उस से महाशक्ति अमेरिका तक परेशान है, ठीक इसी तरह उस की खुफिया एजेंसी भी काफी मजबूत हो गई है. उस के स्लीपर सेल आज दुनिया के कोनेकोने में फैले हुए हैं.

एएसआईएस (आस्ट्रेलियन सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस, आस्ट्रेलिया)

यह आस्ट्रेलिया की खुफिया एजेंसी है. पिछले 2 दशकों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह तेजी से उभरी है. इस का मुख्यालय कैनबरा में है. इस का सहयोग व्यापार और विदेशी मामलों में भी लिया जाता है. 13 मई, 1952 को इस जांच एजेंसी का गठन किया गया था. इस की इंटेलिजेंसी काफी कुशल है जो अब तक इसे अंतरराष्ट्रीय खतरों से बचाए हुए है. इस का कार्यक्षेत्र एशिया और प्रशांत महासागर के क्षेत्र हैं.

यह खुफिया एजेंसी आस्ट्रेलियाई सरकार की एक तरह से वाचडौग है और यह चौबीसों घंटे देश की सेवा में लगी रहती है. पिछले कुछ सालों में इस ने कई घरेलू और बाहरी अपराधियों को गिरफ्तार करवाया है.

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मोसाद (इजराइल)

यह खुफिया एजेंसी दुनिया की सब से बेहतरीन खुफिया एजेंसी मानी जाती है. इस एजेंसी का अरब के देशों में काफी दबदबा है. इस की स्थापना सन 1949 में की गई थी. इस के बारे में खास बात यह है कि ये अपना काम बहुत ही क्रूरता के साथ करती है.

अगर इजराइल या फिर उस के नागरिकों के खिलाफ कोई साजिश रची जा रही हो तो जानकारी मिलने पर मोसाद के खूंखार एजेंट ऐसे साजिशकर्ताओं को दुनिया के किसी भी कोने से ढूंढ कर मौत के घाट उतार देते हैं.

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यह दुनिया की सब से खतरनाक खुफिया एजेंसी है. कहा जाता है कि इस का कोई भी औपरेशन आज तक फेल नहीं हुआ. मोसाद मुख्यत: आतंक विरोधी औपरेशंस को अंजाम देती है और सीक्रेट औपरेशंस चलाती है, जिस का उद्देश्य देश की रक्षा करना होता है. वैसे तो मोसाद काम इजराइल में अन्य एजेंसियों के साथ मिल कर करती है, लेकिन उस की जवाबदेही केवल प्रधानमंत्री को ही है.

डीजीएसई (डायरेक्टोरेट जनरल फौर एक्सटर्नल सिक्योरिटी, फ्रांस)

इस एजेंसी को सन 1982 में बनाया गया था, जिस का मकसद फ्रांस सरकार के लिए विदेशों से खुफिया जानकारी एकत्र करना है. इस का मुख्यालय पेरिस में है. यह एजेंसी अन्य देशों की खुफिया एजेंसी से काफी अलग है. डीजीएसई सिर्फ देश के बाहरी मामलों पर नजर रखती है. इस का मुख्य काम सरकार को आईएसआई की गतिविधियों से आगाह कराना है.

यह लोकल पुलिस के साथ मिल कर भी काम करती है. इस एजेंसी के द्वारा सेना और पुलिस को रणनीति बनाने में बहुत सहयोग दिया जाता है. कुछ देशों की तरह यह एजेंसी भले ही शक्तिशाली न हो लेकिन 9/11 के बाद इस ने 15 आतंकवादी घटनाएं होने से बचाई है. संसाधनों की कमी के बावजूद इस के हजारों जासूस दुनिया भर में फैले हुए हैं.

बीएनडी (फेडरल इंटेलिजेंस सर्विस, जर्मनी)

जर्मनी की बीएनडी को बेहतरीन और आधुनिक तकनीकों से लैस खुफिया एजेंसी माना जाता है. इस का मुख्यालय म्यूनिख के पास पुलाच में है. इस एजेंसी की खास बात यह है कि यह दुनिया भर की फोन काल्स पर खास नजर रहती है. इस एजेंसी के बारे में बहुत कम लोगों को ही पता है.

इस की निगरानी प्रणाली इतनी शानदार है कि शायद ही कोई इंटेलिजेंस एजेंसी इसे मात दे पाए. खतरे को पहले ही भांप कर यह उसे खत्म कर देती है. इस का गठन सन 1956 में हुआ था. बीएनडी योजनाबद्ध अपराध, प्रौद्योगिकी के अवैध हस्तांतरण, हथियारों और नशीली दवाओं की तस्करी, मनी लांड्रिंग और गैरकानूनी ढंग से देश से आनेजाने वालों का भी मूल्यांकन करती है.

समय के साथसाथ इस एजेंसी ने अपने कदम काफी आगे बढ़ा लिए हैं, इस एजेंसी की सब से बड़ी ताकत इस के जासूस होते हैं. अपने जासूसों के बल पर ही यह एजेंसी जान पाती है कि दुनिया में क्या चल रहा है. कहते हैं कि मौजूदा समय में बीएनडी के पास लगभग 4 हजार जासूसों का नेटवर्क है.

देश की सुरक्षा से संबंधित इस एजेंसी के पास बहुत से अधिकार भी हैं जैसे कि सुरक्षा की बात हो तो यह कभी भी किसी का भी फोन टेप कर सकती है. किसी की निजी जानकारी लेने पर भी वह किसी भी प्रकार की बाधा में नहीं फंसते हैं.

एफएसबी (फेडरल सिक्योरिटी सर्विस, रूस)

1995 में स्थापित एफएसबी खुफिया एजेंसी का लोहा पूरी दुनिया मानती है. इस का मुख्यालय मौस्को में है. माना जाता है कि सूचना देने और सुरक्षा पहुंचाने में एफएसबी का कोई जवाब नहीं है. खुफिया से जुड़े मामलों के अलावा एफएसबी बौर्डर से जुड़े मामलों पर भी गहरी नजर रखती है. यह गंभीर अपराधों और संघीय कानूनों के उल्लंघन की जांच भी करती है. ऐसा रूस के शीर्ष सुरक्षा बलों का मानना है.

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यूं तो पिछले कई सालों तक जब सोवियत संघ का पतन नहीं हुआ था, तब रूस में खुफिया एजेंसी केजीबी का दबदबा था और राष्ट्रपति पुतिन उस के चीफ रह चुके हैं. लेकिन एफएसबी ने पिछले कुछ सालों से आतंकवाद के खात्मे के लिए जो कार्यक्रम चलाए हैं, उस से यह रूस की नंबर एक खुफिया एजेंसी बन गई है.

इस एजेंसी ने ही रूस को एक बार फिर सुपरपावर देशों के लिए एक बड़ी चुनौती बना दिया है वरना केजीबी के बंद होने के बाद रूस की परेशानी बढ़ गई थी. देश के बाहर ही नहीं, बल्कि देश में आतंकवाद की संभावित घटनाओं को रोकने के लिए यह मशहूर है.

श्रीश्री 108 चाटुकाराय नम:

श्री चाटुकार चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि. बरनउं चाटुकार बिमल जसु जो दायक फल चारि.
बुद्धिहीन खुद को जानिके सुमिरौं चाटुकार कुमार. संबल, साहब का प्यार देहु मोहिं, मैं हूं निपट गंवार.

मतलब, इस जगत के सभी क्लास के चाटुकारो, आप पर कुछ लिखने से पहले आप को मेरा कोटिकोटि प्रणाम. उम्मीद है कि आप मुझे इस गुस्ताखी के लिए माफ करेंगे.

आप पर मैं तो क्या, व्यासजी होते तो भी लिखने से पहले सौ बार दंडबैठक निकाल लेते. उस के बाद भी आप पर लिखने की शायद ही हिम्मत कर पाते. यह तो मेरा गुरूर है कि हजार शब्दों का मजाक लिखने वाला टुच्चा सा दिशाहीन, दशाहीन आप पर लिखने की हिमाकत कर रहा है.

आप मेरी इस गुस्ताखी को माफ करेंगे, क्योंकि आप पर लिखना तो जैसे केतु पर थूकना है. पर क्या करूं, अगर चार दिन न लिखूं, तो उपवास रखने के बाद भी 5वें दिन लिखे बिना मुझे कब्ज हो जाती है. और आप तो जानते ही हो कि कब्ज हर बीमारी की जड़ है.

हे कणकण में समाए चाटुकारो, मेरी आप से कोई दुश्मनी नहीं है. आदमी में जरा भी अक्ल हो, तो वह सब से सीना तान कर दुश्मनी ले सकता है, पर आप से सपने में भी दुश्मनी ले तो जब तक इस धरती पर जन्ममरण का चक्कर चलता रहे, तब तक वह नरक में ही रहे, चाहे कितने ही व्रत या तीर्थ क्यों न कर ले. मेरे प्रिय चाटुकारो, साहब जितना आप से प्यार करते हैं, उतना तो अपनी बीवी से भी नहीं करते होंगे. मैं तो बस अपनी कब्ज को दूर रखने के लिए आप पर लिख रहा हूं.

आप काम न करने वाले को साहब की नजरों में चढ़ा सकते हो, तो दिनरात जिंदगीभर दफ्तर में काम करने वाले किसी शख्स को आप एक ही धक्के में नजर से गिरवा सकते हो. हे वंदनीय चाटुकारो, इस संसार में

2 तरह के जीव हैं. एक तो वे, जो अपना काम करने के बाद भी दफ्तर में साहब से जूते खाते हैं, तो दूसरे वे, जो आठों पहर चौबीसों घंटे साहब की चाटुकारी करते हुए हाथ पर हाथ धरे बड़े मजे के साथ छप्पन भोगों का लुत्फ उठाते हैं. आप के पास चाटुकारी के ऐसेऐसे हथियार हैं कि आप के सामने इंद्र भी लड़ने आ जाएं, तो भी आप का बाल न बांका कर सकें.

आप की जबान में इतनी मिठास होती है, जितनी दिनरात फूल पर मंडराने के बाद शहद इकट्ठा करने वाली मधुमक्खी के शहद में भी नहीं होती. साहब के पैरों में आप अपने अंगअंग को इस तरह तोड़मरोड़ कर रख देते हो कि बड़े से बड़ा नट भी आप के इस हुनर को देख कर आप के आगे सिर झुकाने को मजबूर हो उठे.

हे साहबों के प्रिय चाटुकारो, आप की हर युग में चांदी रही है. दस भुवनों में कोई खुश हो या न हो, पर आप हर भुवन में औरों को धुआं देने, दिलवाने के बाद हमेशा खुश रहे हो. इस धरती पर हर युग बदला. सतयुग गया, तो त्रेता आया. त्रेता गया, तो द्वापर आया. द्वापर गया, तो कलियुग आया. पर हे चाटुकारो, आप हर युग में रहे.

अब मेरे युग को ही देखिए. मेरे दफ्तर में चपरासी हथेली पर तंबाकू रगड़ता छोटे क्लर्क की चाटुकारी में मस्त है, तो छोटे बाबू बड़े बाबू की चाटुकारी में उन के आसपास सारी फाइलें बंद किए जुटे हैं. फाइलें तो बाद में भी होती रहेंगी, पर अगर चाटुकारी का यह मौका हाथ से छूट गया, तो पता नहीं फिर कब मिले? असल में भूखे को बिना रोटी खाए नींद आ सकती है, पर चाटुकार जिस दिन साहब की चाटुकारी न करे, वह रातभर करवटें ही बदलता रहता है.

साहब की चाटुकारी करने में बड़े बाबू घर के सारे काम छोड़ कर जुटे हैं, तो साहब मंत्रीजी की चाटुकारी में. वे उन की चाटुकारी से खुश हो जाएं, तो स्वर्ग सा सुख भोगते रहें. मंत्रीजी दिनरात मुख्यमंत्री की चाटुकारी में लगे हैं. मुख्यमंत्री खुश रहें, तो क्या मजाल कि कोई उन को कुछ भी करने से रोक सके.

मुख्यमंत्री राजधानी के चक्कर लगा रहे हैं. हाईकमान की चाटुकारी करतेकरते जीभ का थूक है कि औरों से उधार पर ला रहे हैं. हाईकमान खुश, तो बाकी सब जाएं भाड़ में. हे मेरे परम पूजनीय चाटुकारो, आप हर लोक का सच हैं, बाकी सब झूठ है. आप ने अपनी चाटुकारी हरकतों से हर दफ्तर में अपने से ऊपर के हर बौस को हराभरा रखा है. अब आप की तारीफ में और क्या लिखूं–चाटुकार अनंत, चाटुकारी अनंता… साहब चरन, साहब खुश करन, चाटुकारी मूरति रूप. चाटुकारी का भंडार लिए हर मन बसो, हे साहब के धूप.

वालमार्ट की हुई फ्लिपकार्ट

पहले लोग कंपनी सामान बनाने या सेवा बेचने के लिए बनाते थे पर अब सामान बनाने और सेवा देने के अलावा कंपनी को बेचने के लिए भी बनाते हैं. सचिन बंसल और बिन्नी बंसल ने 11 वर्षों पहले बनाई फ्लिपकार्ट कंपनी को वालमार्ट कंपनी, जो अमेरिका में बड़ेबड़े स्टोर चलाती है, को 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा में बेच डाला है. मुनाफा कंपनी ने अर्जित किया, बंसल बंधुओं ने फायदा उठाया. जब तक फ्लिपकार्ट बिन्नी व सचिन बंसलके हाथों में थी, लगातार नुकसान हुआ पर इन्वैस्टरों के सहयोग से व्यवसाय खूब फैला.

फ्लिपकार्ट ने 17 करोड़ ग्राहकों को सामान बेचा था और यही कंपनी का असली उत्पादन है. इन 17 करोड़ ग्राहकों के नाम, पते, बैंक अकाउंट, खरीद की पसंद आज बहुत कीमती हो गए हैं. अगर यह डेटा भारतीय जनता पार्टी को इस्तेमाल करने को मिल जाए (क्या पता वह कर भी रही हो) तो नरेंद्र मोदी को भी जैकेटों, मोबाइलों के साथ बेचा जा सकता है.

ई कौमर्स आज के युग का नया बाजार बन गया है जिस में आप को घर बैठे चीजें या सेवाएं मिल सकती हैं. पर इस ई कौमर्स के कारण देश के छोटे व्यापारी कितना नुकसान सह रहे होंगे, इस का अंदाजा नहीं. आज युवाओं को इस तरह की कंपनियों के सामान को पीठ पर ढोने का काम तो मिल गया है पर वे अपनी छोटी दुकान नहीं चला सकते. सचिन व बिन्नी बंसल ने कमाल किया है पर अपने लिए कंपनी नहीं रखी, सिर्फ बैंक बैलेंस जमा किया है.

ददुआ का मंदिर जातीयता की राजनीति

उत्तर प्रदेश का फतेहपुर जिला 4 हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा इलाके में फैला हुआ है. चित्रकूट और बांदा बौर्डर से लगे होने की वजह से यहां अपराध का हमेशा से बोलबाला रहा है. 3 तहसील और 13 ब्लौक वाले इस जिले में तकरीबन 30 लाख की आबादी रहती है.

तकरीबन 70 फीसदी साक्षरता वाले इस जिले में एक लोकसभा और 6 विधानसभा क्षेत्र हैं. राज्य हैडक्वार्टर से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर चित्रकूट और कौशांबी बौर्डर पर नरसिंहपुर कबरहा गांव है. इस गांव तक धाता से रोडवेज की बसों से सफर कर के पहुंचा जा सकता है.

धाता से नरसिंहपुर कबरहा गांव तक का सफर तय करने के लिए साढे़ 3 किलोमीटर दूर का रास्ता टैंपो या दूसरी सवारी गाडि़यों के जरीए भी तय किया जा सकता है.

नरसिंहपुर कबरहा गांव में ही 2 सौ हत्याओं के आरोपी दस्यु सरगना ददुआ का मंदिर बनाया गया है.

नरसिंहपुर कबरहा गांव के शिवहरे रामजानकी मंदिर को बनाने का काम खुद ददुआ ने किया था.

साल 1992 में पुलिस ने ददुआ को फतेहपुर जिले के हरसिंहपुर कबरहा गांव के पास मार गिराया था. एक पुलिस मुठभेड़ में ददुआ बुरी तरह से फंस गया था. उस के बचने की उम्मीद नहीं थी. उस समय ददुआ ने मन्नत मांगी थी कि अगर वह इस मुठभेड़ से जिंदा बच गया, तो कबरहा में हनुमान मंदिर को विशाल बनाएगा.

ददुआ पुलिस मुठभेड़ में बच गया. इस के बाद उस ने यहां मंदिर बनवाया था. साल 2007 में मारे गए ददुआ की मूर्ति इसी मंदिर में उस के भाई बालकुमार ने फरवरी, 2016 में लगवाई. इस मंदिर में ददुआ को देखने वालों की भीड़ जुटने लगी है.

गांव के लोग मंदिर में ददुआ की मूर्ति पर अपने जेवर और पैसे चढ़ा रहे हैं. इस में ज्यादातर लोग उस की ही जाति के हैं.

उत्तर प्रदेश में पहली बार किसी डकैत का मंदिर बना कर उस का महिमामंडन शुरू किया जा रहा है. अब एक दूसरे डकैत निर्भय गुर्जर का मंदिर बनाने की मांग भी उठ रही है.

ददुआ के भाई बालकुमार कहते हैं कि मंदिर उन की निजी संपत्ति है. ऐसे में किसी तरह का विवाद ठीक नहीं है. वे अपने पुरखों की मूर्तियां लगा रहे हैं. इस में किसी को एतराज नहीं करना चाहिए.

ददुआ डकैत भले ही था, पर वह इस इलाके में गरीबों की मदद भी करता था. कई लड़कियों की शादियां भी उस ने कराई थीं.

डकैतों के मंदिर केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी बनते रहे हैं. कई गांवों में इन के स्वागत द्वार तक बने हैं. डकैत मान सिंह और उस की साथी रूपा की मूर्तियां आगरा से 60 किलोमीटर दूर खेड़ा राठौर गांव में आज भी बनी हुई हैं.

चंबल के दूसरे डकैतों मोहर सिंह, माधो सिंह, तहसीलदार सिंह और मलखान के गांव में भी उन के स्मारक बने हैं. जिस भव्य तरीके से ददुआ की मूर्ति मंदिर में लगा कर उस का महिमामंडन किया जा रहा है, वह इन सब की आगे की कड़ी मात्र है.

ददुआ के मंदिर के बाद इस मुद्दे पर नई बहस शुरू हुई है, जिस से पता चलता है कि जातीय राजनीति में मंदिरों का प्रयोग किसी हथियार से कम नहीं है. जिस तरह से ददुआ के मंदिर को गरीब तबके का समर्थन मिल रहा है, उस से साफ पता चलता है कि वह इस इलाके लिए किसी रौबिनहुड से कम नहीं था. मरने के 8 साल बाद भी लोग उस को उतना ही प्यार करते हैं.

ऊंची जातियों से हिफाजत की उम्मीद करने वाली कमजोर जातियों के लिए ऐसे लोग ही सहारा बनते रहे हैं, जो जातीय नाइंसाफी के खिलाफ उन का साथ देते थे. इसी वजह से डकैत भी मंदिर में पूजे जाने लगे हैं.

भैंस की चोरी से…

देश में जातीय भेदभाव की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इस का दबदबा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है. जातीय गोलबंदी के जरीए वोट हासिल करने की सोच को समझते हुए चंबल के डकैत शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ ने अपने जीतेजी राजनीतिक सरपरस्ती हासिल कर ली थी.

साल 1978 में कौशांबी जिले के पश्चिम सरीरा इलाके में पहली बार ददुआ पर डकैती डालने का मुकदमा दर्ज हुआ था. इस के पहले उस के जेल जाने की शुरुआत साल 1975 में हुई थी, जब उस पर भैंस चोरी जैसा छोटा आरोप लगा कर जेल भेजा गया था.

साल 1985 के करीब ददुआ का नाम चंबल के बडे़ डकैतों में शामिल होने लगा था. अपनी ताकत को राजनीतिक शक्ल देने के लिए ददुआ ने अब तक नेताओं को संरक्षण देना शुरू कर दिया था. उस के नाम पर वोट डाले जाने लगे थे.

ददुआ का चित्रकूट और फतेहपुर की राजनीति में अच्छा दबदबा बन गया था. साल 1985 में कांग्रेस के उम्मीदवार ने बाकायदा चुनाव आयोग को इस बारे में शिकायत भी की थी.

ददुआ दलित और कमजोर जातियों की मदद करता था. ऐसे में उस ने इन्हीं तबकों के नेताओं को मदद देनी शुरू की. ददुआ खुद कुर्मी बिरादरी का था. उत्तर प्रदेश में कुर्मी बिरादरी पिछड़े तबके में शुमार की जाती है.

ददुआ फतेहपुर का रहने वाला था. जहां खेती की जमीन थी, पर वहां बहुत अच्छी खेती नहीं होती थी. ऐसे में पिछड़ी जातियों में शुमार की जाने वाली कुर्मी जाति के लोग भी दलितों सरीखी जिंदगी जीते थे.

ददुआ ने सब से ज्यादा बहुजन समाज पार्टी के सांसदों और विधायकों को चुनाव जितवाने में मदद की या बसपा के पक्ष में ददुआ का खुला नारा होता था, ‘वोट पड़ेगा हाथी पर, वरना गोली खाओ छाती पर’.

नेताओं को वोट दिलाने वाले ददुआ को जल्दी ही पता चल गया था कि वोट ले कर नेता बदल जाते हैं. ऐसे में उस ने अपनी ताकत का फायदा अपने भाई और बेटों को देने की योजना बनाई.

यही वह दौर था, जब पंचायती राज कानून लागू हुआ था और ग्राम प्रधानों को गांव की तरक्की के लिए बड़ा बजट दिया जाने लगा था.

मौके का फायदा उठाने के लिए ददुआ ने अपने करीबियों को कई गांवों में प्रधानी का चुनाव लड़ाया और उन में से तमाम लोगों को चुनाव जितवा भी दिया था.

बडे़ नेता ददुआ का फायदा चोरीछिपे लेते थे. ददुआ इस बात को समझ रहा था. वह चाहता था कि नेता उस के पक्ष में खडे़ नजर आएं. ऐसे में नेताओं पर उस ने दबाव डालना शुरू किया था.

साल 2000 में ददुआ ने अपने बेटे वीर सिंह की शादी कराई और उस में कई दलों के बडे़ नेताओं को बुलाया था.

साल 2005 में ददुआ के प्रभाव से ही उस का बेटा वीर सिंह निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष चुना गया था.

साल 2007 में ददुआ के भाई बालकुमार ने प्रतापगढ़ की पट्टी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था. वे 4 सौ वोटों से चुनाव हार गए थे. बाद में बालकुमार मिर्जापुर से सांसद चुने गए थे.

ददुआ जब तक नेताओं के संरक्षण में काम कर रहा था, तब तक उस पर कोई खतरा नहीं था. बाद में उस ने राजनीतिक दलबदल भी शुरू कर दिया था. बसपा के बाद उस ने सपा यानी समाजवादी पार्टी से हाथ मिला लिया था. यही खेल ददुआ पर भारी पड़ा था.

साल 2007 में उत्तर प्रदेश में पूरे बहुमत से बसपा की सरकार बनी थी. उस समय की मायावती सरकार ने ददुआ को मारगिराने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स यानी एसटीएफ को लगा दिया था.

सरकार बनने के 3 महीने के अंदर ही एसटीएफ ने एसपी अमिताभ यश की अगुआई में ददुआ को चित्रकूट जिले के कुशमही गांव में मुठभेड़ में मार गिराया.

वोट की राजनीति

ददुआ का चित्रकूट और फतेहपुर में दबदबा तो था ही, चंबल इलाके से लगे इलाकों में भी उस का पूरा असर था. इस की वजह से वहां वही नेता चुनाव जीतता था, जिसे ददुआ चाहता था.

जब तक ददुआ नेताओं की मदद करता रहा, तब तक नेता उस की हिफाजत का काम करते रहे थे. जैसे ही ददुआ ने अपने परिवार के लोगों को नेता बनाना शुरू किया, वह नेताओं के निशाने पर आ गया.

फतेहपुर और चित्रकूट जिले में कुर्मी वोटर तकरीबन 3 लाख के आसपास हैं. सपाबसपा सहित बाकी दलों की निगाह इन के वोटों पर लगी रहती हैं. समाजवादी पार्टी आने वाले चुनावों में कुर्मी वोटों को हासिल करने के लिए ददुआ के नाम का सहारा लेना चाहती है.

फतेहपुर जिले के खागा तहसील के गांव नरसिंहपुर करबहा में रामजानकी मंदिर की स्थापना ददुआ ने साल 1995 में की थी. ददुआ के मारे जाने के बाद साल 2016 में तकरीबन 8 साल के बाद ददुआ के भाई बालकुमार ने रामजानकी मंदिर में ही ददुआ और उस की पत्नी केतकी की मूर्ति लगवाई है.

ददुआ की मूर्ति स्थापना कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव के जाने की संभावना थी, पर राजनीतिक दबाव में वे वहां नहीं गए, पर रामजानकी मंदिर में ददुआ और उस की पत्नी केतकी की मूर्ति लग गई. इस मंदिर में ददुआ की पत्नी केतकी के अलावा ददुआ के मातापिता की मूर्तियां भी लगाई गई हैं.

राजस्थान के जयपुर में रहने वाले मूर्तिकार ने इन मूर्तियों को बनाया है. मूर्तियों को बनाने में तकरीबन 80 लाख रुपए का खर्च बताया जाता है. पुलिस या समाज के दूसरे लोगों के पास ददुआ का कोई नया फोटो नहीं था. एक बहुत पुराने फोटो के आधार पर ही लोग उस की शक्ल का अंदाजा लगाते थे.

ददुआ के भाई बालकुमार अब बांदा, फतेहपुर, चित्रकूट और आसपास के इलाकों में अपना राजनीतिक जनाधार बढ़ाना चाहते हैं.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में फतेहपुर से भाजपा की साध्वी निरंजन ज्योति सांसद चुनी गई थीं. केंद्र सरकार में वे राज्यमंत्री हैं. उन्होंने सपा के पूर्व उम्मीदवार राकेश सचान को यहां से हराया था.

राकेश सचान की कुर्मी वोटों पर पकड़ कमजोर पड़ते देख ददुआ के भाई बालकुमार यहां अपना इलाका तैयार करना चाहते हैं.

दलित और कमजोर तबके में ददुआ का अपना असर है और बड़ी जातियों में ददुआ का डर है. ददुआ की इसी पहचान का फायदा उस के भाई बालकुमार पटेल उठाना चाह रहे हैं.

बिकिनी फोटोज शेयर करने पर ट्रोलर्स ने मंदिरा बेदी पर किए भद्दे कमेंट

टीवी शो शांति से प्रसिद्धि पाने वाली अभिनेत्री मंदिरा बेदी अपनी लाइफ में फिटनेस और एक्सरसाइज को बहुत महत्व देती हैं. वह आए दिन मेरथान्स और फिटनेस इवेंट्स में भी भाग लेती रहती हैं. कई बार तो मंदिरा को साड़ी पहनने के बावजूद पुशअप्स मारते देखा गया है. इसके अलावा मंदिरा अपने कपड़ों को लेकर आए दिन सोशल मीडिया पर ट्रोल होती रहती हैं.

वैसे तो मंदिरा अपनी कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं. इस बार उन्होंने बिकिनी में अपनी एक तस्वीर इंस्टाग्राम अकाउंट से शेयर की है. मंदिरा ने तस्वीर में ब्लू कलर की बिकिनी पहनी हुई है. सेल्फी में मंदिरा काफी कान्फिडेंस के साथ खड़ी हैं. मंदिरा की ये तस्वीर सामने आने पर लोगों ने उनपर काफी भद्दें कमेंट करने शुरू कर दिए. कुछ ने मंदिरा को बुड्ढी कहा तो कुछ ने पब्लिसिटी स्टंट बताया. एक यूजर ने लिखा कि आपको एक्सपोज करने की जरूरत नहीं है.

ऐसा पहली बार नहीं है जब मंदिरा को लोगों का इस तरह का व्यवहार सहना पड़ा है. इससे पहले भी मंदिरा सोशल मीडिया पर ट्रोल्स के भद्दे कमेंट्स का शिकार हो चुकी हैं. लेकिन मंदिरा को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. वो समय समय पर ऐसे लोगों को अपनी नई नई तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कर जवाब देती रहती हैं. पिछले दिनों एक्ट्रेस एक शो में पहुंच गई थीं. ट्रोल पुलिस में उन्होंने ट्रोल करने वालों को तीखे जवाब दिए. बेवजह गालीगलौच करने वाले लोगों को भी मंदिरा ने अपने जवाब से सबक सिखाया.

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