बहू भी कराती है हत्या

आमतौर पर यह माना जाता है कि ससुराल में बहू पर ही अत्याचार होता है. यह अत्याचार कभी ससुर करता है कभी सास. लखनऊ के माल थाना क्षेत्र के नबीपनाह गांव की रहने वाली बहू पर उसकी ससुराल वालों ने कोई अत्याचार नहीं किया बल्कि खुद उसने ही करोडों की जायदाद के लालच में अपने ससुर की हत्या चचेरे देवर और उसके दोस्त के साथ मिलकर कर दी और हत्या के आरोप में अपने पति और सगे देवर को फंसाने की कोशिश की, पर अपराध छिपाये नही छिपता और बहू को अपने डेढ साल के बच्चे के साथ जेल जाना पड़ा.

नबी पनाह गांव में मुन्ना सिंह अपने दो बेटो संजय और रणविजय सिंह के साथ रहते थे. 60 साल के मुन्ना सिंह की आम कह बाग और दूसरी जायदाद थी. जिसकी कीमत करोडो में थी. मुन्ना के बडे बेटे संजय की शादी रायबरेली जिले की रहने वाली सुशीला के साथ 5 साल पहले हुई थी.

सुशीला के 2 बच्चे 4 साल की बडी लडकी और डेढ साल का बेटा था. सुशीला पूरे घर पर कब्जा जमाना चाहती थी. इस कारण उसने अपने सगे देवर रणविजय से संबंध बना लिये. जिससे वह अपनी शादी न करे. सुशील को डर था कि देवर की शादी के बाद उसकी पत्नी और बच्चों का भी जायदाद में हक लगेगा. यह बात जब मुन्ना सिह को पता चली तो वह अपने छोटे बेटे की शादी कराने का प्रयास करने लगे. सुशीला को जायदाद की चिन्ता थी. वह जानती थी कि देवर रणविजय ससुर को राह से हटाने में उसकी मदद नहीं करेगा.

तब उसने अपने चचेरे देवर शिवम को भी अपने संबंधों से जाल में फंसा लिया. जब शिवम पूरी तरह से उसके काबू में आ गया तो उसने ससुर मुन्ना सिंह की हत्या की योजना पर काम करने के लिये कहा. शिवम जब इसके लिये तैयार नहीं हुआ तो सुशीला ने शिवम को बदनाम करने का डर दिखाया और बात मान लेने पर 20 हजार रूपये देने का लालच भी दिया. डर और लालच में शिवम सुशीला का साथ देने को तैयार हो गया.

12 जून की रात सुशीला के सुसर बुजुर्ग किसान मुन्ना सिंह चैहान आम की फसल बेचकर अपने घर आये. इसके बाद खाना खाकर आम की बाग में सोने के लिये चले गये. वह अपने पैसे भी हमेशा अपने साथ ही रखते थे. सुशीला ने शिवम को फोन गांव के बाहर बुला लिया. शिवम अपने साथ राघवेन्द्र को भी ले आया था. तीनों एक जगह मिले और फिर मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली. मुन्ना सिंह उस समय बाग में सो रहे थे. दबे पांव पहुंच कर तीनो ने उनको दबोचने के पहले चेहरे पर कंबल ड़ाल दिया. सुशीला ने उनके पांव पकड लिया और शिवम,राघवेन्द्र ने उनको काबू में किया. जान बचाने के संघर्ष में मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गये. वही पर दोनो ने गमझे से गला दबा कर उनकी हत्या कर दी.

मुन्ना सिंह की जेब में 9 हजार 2 सौ रूपये मिले. शिवम ने 45 सौ रूपये राघवेन्द्र को दे दिये. सुशीला ने आलमारी और बक्से की चाबी ले ली. सबलोग अपने घर चले आये. सुबह पूरे गांव मे मुन्ना सिह की हत्या की खबर फैल गई. मुन्ना सिंह के बेटे संजय और रणविजय ने हत्या का मुकदमा माल थाने में दर्ज कराया. एसओ माल विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की. पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. मुन्ना सिंह की बहु सुशीला बारबार पुलिस को यह समझाने की कोशिश में थी कि ससुर मुन्ना के संबंध अपने बेटो से अच्छे नहीं थे. पुलिस ने जब मुन्ना सिंह के दोनो बेटो संजय और रणविजय से पूछताछ शुरू की तो दोनो बेकसूर नजर आये. इस बीच गांव में यह पता चला कि मुन्ना सिंह की बहू सुशीला के देवर से संबंध है. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ शुरू की तो उसकी कुछ हरकते संदेह प्रकट करने लगी.

पुलिस ने सुशीला के मोबाइल की काल डिटेल देखनी शुरू की तो उनको पता चला कि सुशीला ने शिवम से देर रात तक उस दिन बात की थी. पुलिस ने शिवम के फोन को देखा तो उसमें राघवेन्द्र का फोन मिला. इसके बाद पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला से सबसे पहले अलग अलग बातचीत शुरू की. सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उसके देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था. सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे तो वह अकेली पूरे जायदाद की मालकिन बन जायेगी. पर पुलिस को सच का पता चल चुका था. पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला तीनो को आमने सामने बैठाया.तो सबने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

14 जून को माल पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला को मजिस्ट्रेट के समाने पेश किया. वहां से तीनो को जेल भेज दिया गया. सुशीला अपने साथ डेढ साल के बेटे को भी जेल ले गई. उसकी 4 साल की बेटी को पिता संजय और चाचा रणविजय ने अपने पास रख लिया. जेल जाते वक्त भी सुशीला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं था. वह बारबार शिवम और राघवेंद्र पर इस बात से नाराज हो रही थी कि उन लोगों ने यह क्यों बताया कि मारने के समय उसने ससुर मुन्ना सिंह के पैर पकड रखे थे.

जनता के मुद्दे, सरकार दे जवाब

धीरेधीरे ही सही कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी मंजे हुए नेता बनते जा रहे हैं. इस में उन की सियासी काबिलीयत का कितना योगदान है, इस पर बात करना थोड़ी जल्दबाजी होगी, लेकिन जब से हालिया केंद्र सरकार के 2 सियासी दांवों नोटबंदी और जीएसटी ने बैकफायर किया है, तब से वे बड़े विपक्षी नेता के रूप में बड़ी तेजी से उभरे हैं.

यह सब हुआ है गुजरात के विधानसभा चुनावों की वजह से जहां वर्तमान सरकार से नाराज जनता सड़कों व गलियों में उतर कर केंद्र सरकार तक की चूलें हिला रही है.

राहुल गांधी ने जनता की इस नब्ज को सही पकड़ा है. बेरोजगारी के मुद्दे पर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर हमला करते हुए कहा, ‘‘चीन में हर रोज 50000 नौकरियां पैदा होती हैं और भारत में केवल 450. ‘मेक इन इंडिया’ के बावजूद ये हालात हैं. किसान और गरीब को पानी नहीं मिलता, पूरा पानी चंद अमीरों को दिया जा रहा है.’’

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एसोसिएशन फौर डैमोक्रेटिक रिफौर्म्स के एक सर्वे के मुताबिक गुजरात के वोटरों ने रोजगार, सार्वजनिक परिवहन सेवा, महिला सशक्तीकरण और सुरक्षा को ऊपर रखा है.

गांवदेहात के वोटरों ने भी रोजगार, फसलों की सही कीमत, खेती के लिए बिजली और सिंचाई सुविधा को बेहतर करने की मांग रखी.

केवल गुजरात की बात की जाए तो इस बार पाटीदार आरक्षण का मुद्दा बहुत बड़ा मुद्दा बन कर उभरा है. हार्दिक पटेल समेत पाटीदार समाज के कई नेता भारतीय जनता पार्टी से खासा नाराज हैं.

लेकिन राहुल गांधी ने गुजरात में नोटबंदी और जीएसटी के नुकसान को ले कर उन मुद्दों को हवा दी जो ज्यादातर जनता के गले की फांस बन चुके हैं.

इस के अलावा राहुल गांधी यह भी साबित करना चाहते हैं कि कांग्रेस उन वंचितों के साथ खड़ी है, जिसे ‘गुजरात मौडल’ की तथाकथित कामयाबी के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ है. लेकिन इस बार गुजरात चुनावी घमासान के दौरान कुछ खास भी हुआ है, जो है जनता की एकजुटता.

केंद्र सरकार की तानाशाही नीतियों के चलते एक बात जो सामने आई है वह यह है कि जनता सरकारों के खुद पर थोपे गए मुद्दों से परेशान हो गई है. उसे मंदिरमसजिद, हिंदूमुसलिम, गौरक्षा, पाकिस्तान, कश्मीर वगैरह से कोई मतलब नहीं है, बल्कि वह तो केंद्र सरकार के ऊलजलूल फैसलों नोटबंदी और जीएसटी के कहर से एकजुट हो कर तिलमिलाई सी अपने सवालों के जवाब नरेंद्र मोदी और उन के सिपहसालारों से मांग रही है. कम से कम राहुल गांधी, हार्दिक पटेल आदि की सभाओं से तो ऐसा लगा.

पहले नोटबंदी पर बात करते हैं. भारत के 500 और 1000 रुपए के नोटों को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को रात के 8 बजे अचानक चलन में नहीं रहने का ऐलान किया था. मीडिया ने जनता को समझाने के लिए इसे आसान भाषा में ‘नोटबंदी’ शब्द दिया था.

इस नोटबंदी का मकसद न केवल काले धन पर काबू पाना था, बल्कि देशभर में चल रहे जाली नोटों से छुटकारा पाना भी था. लेकिन क्या नोटबंदी से सरकार के ये दोनों मकसद पूरे हो पाए

नोटबंदी होते ही जनता में अफरातफरी मच गई. बैंकों, डाकखानों के आगे नोट बदलवाने की लंबीलंबी लाइनें लग गईं. घंटों सड़कों पर खड़े रहने के बावजूद नोट बदलने की कोई गारंटी नहीं होती थी.

इतना ही नहीं, 18 नवंबर, 2016 को कारोबार चलाने के लिए पैसे नहीं होने की बात कहते हुए मणिपुर राज्य में अखबारों ने अपने दफ्तर बंद कर दिए थे.

इस सब के बावजूद भक्तों ने नरेंद्र मोदी के इस कड़े फैसले की तारीफ की थी, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि कुछ दिनों की परेशानी के बाद देश में रामराज्य आ जाएगा.

नोटबंदी के जरीए सरकार को भी पूरी उम्मीद थी कि नोटबंदी से बैंकों में जो पैसा आएगा वह सफेद होगा और जो बचा रहेगा यानी जमा न होगा उसे काला धन मान लिया जाएगा.

लेकिन ऐसा न हो पाया. सब से बड़ा नुकसान लोगों को लेनदेन के रूप में देखने को मिला. छोटेबड़े कारोबारी इस वजह से किसी तरह का लेनदेन नहीं कर पाए. जो कारोबारी नकद पर कारोबार करते थे, जब वे बेरोजगार हो गए, तो उन के यहां काम करने वाले लोग भी काम से हाथ धो बैठे.

यही हाल किसानों का भी हुआ. वे तो सरकार के इस फैसले के खिलाफ धरनेप्रदर्शन करते नजर आए. सरकार के सामने जनता द्वारा पूछा गया लाख टके का सवाल यह था कि नोटबंदी के एक साल बाद भी क्या काला धन वापस लौटा  बैंकों में कितना पैसा आया  सरकार ऐसे सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं देना चाह रही और इस संबंध में ठोस आंकड़े नहीं दिखा रही है.

इस का नतीजा यह हुआ कि सभी विपक्षी दल पूरी एकजुटता से सरकार के नोटबंदी के फैसले को नाकाम और देश को पीछे धकेलने वाला साबित करने की कोशिश में लग गए.

सरकार को नोटबंदी के फैसले से कोई फायदा होता तो नहीं दिखा, पर उस ने फिर भी दूसरा दांव गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स का खेलना शुरू कर दिया जिस का छोटा नाम है जीएसटी.

1 जुलाई, 2017 को यह टैक्स लागू होते ही देश में अलगअलग जगहों पर लगने वाले 18 टैक्स खत्म कर दिए गए. मतलब 1 जुलाई, 2017 से पहले हम किसी भी सामान को खरीदते या सेवा को लेते समय अलगअलग तरह के टैक्स सरकार को देते थे जैसे कि सेल्स टैक्स, औक्ट्रौय सर्विस टैक्स वगैरह. 1 जुलाई, 2017 के बाद सिर्फ जीएसटी ही रहा. पर यह जितना आसान दिख रहा था उतना था नहीं.

वजह, यह एक भ्रामक शब्द था. एक टैक्सेशन के नाम पर 2 तरह का टैक्स लगा. एक सैंट्रल टैक्स और दूसरा स्टेट टैक्स.

इतना ही नहीं, भारत जैसे देश में जहां हर जगह कंप्यूटर मुहैया नहीं हैं, वहां जीएसटी जैसी कंप्यूटरीकृत व्यवस्था लागू कर डाली गई. बहुत से छोटे कारोबारियों को कंप्यूटर की एबीसी भी नहीं मालूम थी. वे तो सिर धुनते दिख रहे हैं.

किसानों के लिए यह नुकसान का सौदा रहा. कहने को तो खाद्यान्न चीजों पर जीएसटी लागू नहीं किया गया, लेकिन इन को उगाने में इस्तेमाल किए जाने वाले हर कैमिकल व कीटनाशक जैसी चीजों पर यह टैक्स जम कर लगा, जिस से खेतीबारी में आने वाला खर्च बढ़ गया.

जीएसटी का गड़बड़झाला धीरेधीरे इस कदर बढ़ता गया कि राहुल गांधी ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स का नया नाम दे दिया. गब्बर सिंह हिंदी फिल्म ‘शोले’ का वह दुर्दांत डाकू था जो अपने और खुद के गुरगों को पालने के लिए आसपास के गांवों से डाकू टैक्स वसूलता था.

उस का कहना था कि वह उन सब का रखवाला है और इस के लिए अगर वह गांव वालों से खानेपीने का सामान लेता है तो इस में गलत क्या है  मतलब जनता की गाढ़ी कमाई पर हाथ की सफाई. ऐसे मेहनती लोगों, जिन में छोटे कारोबारी, किसान, मजदूर और सब्जी बेचने वाले थे, को लूट कर गब्बर सिंह खुद को उन का मसीहा कहता था.

नोटबंदी और जीएसटी से वर्तमान सरकार की इमेज उस गब्बर सिंह जैसी हो गई है, जो भारत की जनता की गाढ़ी कमाई बैंकों में भर रही है जबकि लोगों को रोजमर्रा की चीजें खरीदने में परेशानी हो रही है. उसे अपना ही पैसा मांगने के लिए सरकार का मुंह ताकना पड़ रहा है.

गुजरात में विधानसभा चुनाव होने के मद्देनजर सरकार ने पेचीदा जीएसटी में नवंबर में काफी बदलाव किए हैं, लेकिन इस का फायदा होता नहीं दिख रहा है, क्योंकि राहुल गांधी ने गुजरात के चुनावों को नया मोड़ दे दिया है.

उन्होंने इसे देशभर के कारोबारियों, किसानों, मजदूरों, कारखानेदारों की मुसीबतों का चुनाव साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. पहली बार जनता सरकार की नाकामी पर उस से सवाल कर रही है.

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अब तक के हुए 16 लोकसभा चुनावों की बात की जाए तो इन में ‘गरीबी हटाओ’, ‘भ्रष्टाचार’, ‘रिजर्वेशन’, ‘राममंदिर’, ‘गौरक्षा’, ‘पाकिस्तान’, ‘कश्मीर’, ‘मुसलिम’ वगैरह बेबुनियादी मसलों पर चुनाव लड़े जाते रहे. जनता को समझ में ही नहीं आता था कि उस की तरक्की की बात कब की जाएगी.

लेकिन नरेंद्र मोदी के नोटबंदी और जीएसटी वाले बेतुके फैसलों ने जनता को एकजुट कर दिया है. कारोबारी हों या मजदूर अब सब समझ गए हैं कि वे एकदूसरे के पूरक हैं. अगर वे एकजुट हो जाएं तो देश में बेरोजगारी की समस्या खुदबखुद खत्म हो जाएगी.

वे सभी सरकार से सवाल कर रहे हैं कि उन की गाढ़ी कमाई की सरकार छीनाझपटी क्यों कर रही है  लोग अपना पैसा घर में नहीं रख सकते. क्यों  सरकार ने तो जैसे हर पैसे वाले को कालाबाजारी साबित कर दिया है.

जनता का यह गुस्सा अगले लोकसभा चुनावों में नया रंग ला सकता है. अगर कारोबारी, किसान, मजदूर, कारखानेदार एक हो गए तो नेता, चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, उन्हें फालतू के हवाहवाई मुद्दों में नहीं उलझा पाएंगे.

भले ही गुजरात के विधानसभा चुनाव लोकसभा जितने बड़े नहीं हैं, लेकिन वहां की जनता ने सरकार से जो सवाल पूछे हैं, उन के जवाब भारत का हर वह नागरिक जानना चाहता है, जो 18 साल से ऊपर का हो गया है और सही उम्मीदवार को वोट दे कर देश का भविष्य बदल सकता है.

15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ था. अगर चुनावों खासकर लोकसभा चुनावों की बात करें तो अब तक देश में 16 लोकसभा चुनाव हो चुके हैं. इन सभी चुनावों में नेताओं द्वारा जानबूझ कर ऐसे मुद्दे हवा में उछाले जाते थे, ताकि लोग उन के भ्रामक नारोंवादों में उलझ कर अपनी समस्याओं के बारे में जबान ही न खोल पाएं.

साल 1952 और 1957 में हुए पहले व दूसरे लोकसभा चुनाव कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अच्छी इमेज के चलते आसानी से जीत लिए थे. पाकिस्तान बनने के बाद भारत खुद संभल रहा था. जनता अंगरेजों से मिले जख्मों पर मरहम ही लगा रही थी.

लेकिन साल 1962 में हुए तीसरे लोकसभा चुनावों से पहले जवाहरलाल नेहरू ने विकास के क्षेत्रों में देश के एक नए रूप की कल्पना की थी.

पंचवर्षीय योजना का उदय भी इसी समय हुआ था, जिस का मसकद कुदरती संसाधनों का सही तरीके से इस्तेमाल कर के लोगों की जिंदगी में सुधार लाना था.

जनता ने भी जवाहरलाल नेहरू की शख्सीयत से ऊपर उठ कर मुद्दों को तरजीह दी थी. आजादी की लड़ाई की खुमारी अब उतर चुकी थी.

उस समय भारत के पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध नहीं थे. अक्तूबर, 1962 में भारत और चीन की लड़ाई भी एक नए मुद्दे के रूप में उभरी थी. इस से कांग्रेस की साख को नुकसान हुआ था.

साल 1966 में इंदिरा गांधी को जब देश का प्रधानमंत्री बनाया गया, तब कांग्रेस में भीतरी कलह बहुत ज्यादा थी. चीन और पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाइयों से भारत की अर्थव्यवस्था भी हिली हुई थी. इस से कुछ नए मुद्दे सामने आए थे, जिन में मिजो आदिवासी बगावत, अकाल, श्रमिक अशांति खास थे. रुपए में गिरावट के चलते भारत में गरीबी का आलम था. पंजाब में धार्मिक अलगाववाद के लिए भी आंदोलन चल रहा था.

5वीं लोकसभा के चुनाव कई माने में अहम थे. वे अपने समय से एक साल पहले 1971 में हो गए थे. इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ नारा दे कर चुनाव प्रचार किया था और 352 सीटों पर जीत हासिल की थी.

1971 में भारतपाकिस्तान की लड़ाई हुई थी और पाकिस्तान के 2 टुकडे़ हो कर बंगलादेश नया देश बन गया था. 12 जून, 1975 को चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1971 के चुनाव को गैरकानूनी करार दिया था.

‘गूंगी गुडि़या’ कही जाने वाली इंदिरा गांधी ने इस्तीफा नहीं दिया, बल्कि उन्होंने देश में इमर्जैंसी लगा कर पूरे विपक्ष को ही जेल में डाल दिया था.

इस का नतीजा साल 1977 में हुए छठे लोकसभा चुनावों में देखने को मिला. कांग्रेस की इमर्जैंसी इन चुनावों में मुख्य मुद्दा थी. 4 विपक्षी दलों कांग्रेस (ओ), भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल और समाजवादी पार्टी ने जनता पार्टी के रूप में मिल कर चुनाव लड़ने का फैसला किया था.

जनता को इमर्जैंसी में की गई ज्यादतियों की याद दिलाई गई थी. ‘गरीबी हटाओ’ के बजाय ‘इंदिरा हटाओ’ के नारे लगाए गए. विपक्ष की एकजुटता रंग लाई और कांग्रेस को पहली बार हार का सामना करना पड़ा.

जनता पार्टी ने यह चुनाव तो जीत लिया था, पर उस की सत्ता पर पकड़ अच्छी नहीं थी. इस से कांगे्रस दोबारा मजबूत होने लगी थी. वह इंदिरा की इमेज को दोबारा बनाने में जुट गई.

चुनाव प्रचार में कांग्रेस ने महंगाई, सामाजिक समस्या और कानून व्यवस्था को तरजीह दी. उस का नारा ‘काम करने वाली सरकार को चुनिए’ काम कर गया और 1980 के मध्यावधि लोकसभा चुनाव में उसे लोकसभा में 353 सीटें मिलीं.

31 अक्तूबर, 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई थी. इस से कांग्रेस के पक्ष में हमदर्दी की लहर बन गई थी. जब चुनाव हुए तो राजीव गांधी की अगुआई में कांग्रेस ने रिकौर्ड 404 लोकसभा सीटें जीतीं और राजीव गांधी की ‘मिस्टर क्लीन’ नेता की इमेज बनी. पर वे जल्दी ही बोफोर्स कांड, पंजाब के आतंकवाद, लिट्टे और श्रीलंका सरकार के बीच गृहयुद्ध जैसी समस्याओं से जूझने लगे.

90 के दशक में भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा राम जन्मभूमि व बाबरी मसजिद के मुद्दे पर रथयात्रा शुरू की गई.

10वीं लोकसभा में 1991 के चुनाव मध्यावधि चुनाव थे. इस के 2 खास मुद्दे मंडल आयोग की सिफारिशों का लागू करना और राम जन्मभूमि व बाबरी मसजिद विवाद थे. इन चुनावों को ‘मंडलमंदिर’ चुनाव भी कहा गया.

मंडल और राम मंदिर मुद्दे पर देश में एक तरह से दंगे हो गए थे. वोटरों का जाति और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण किया गया था.

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1996 के 11वें लोकसभा चुनावों तक हर्षद मेहता घोटाला, राजनीति के अपराधीकरण पर वोहरा की रिपोर्ट, जैन हवाला कांड और ‘तंदूर कांड’ मामलों ने पीवी नरसिंह राव सरकार की किरकिरी कर दी थी. कांग्रेस ने आर्थिक सुधारों की बात की, तो भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व व राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर वोटरों को रिझाया.

साल 1998 में 12वीं लोकसभा के चुनाव हुए. पिछले लोकसभा चुनावों के महज डेढ़ साल बाद. अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने.

कारगिल की लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में सकारात्मक हवा बना रही थी. अटल बिहारी वाजपेयी 13 अक्तूबर को फिर प्रधानमंत्री बने. इस के बाद भारत में ‘फील गुड फैक्टर’ की लहर बनाई गई. ‘भातर उदय’ का नारा जोर पकड़ रहा था.

भारतीय जनता पार्टी को लग रहा था कि वह साल 2004 के लोकसभा चुनावों में दोबारा सत्ता पा लेगी. यह टकराव सीधा अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी के बीच था. वैसे, जनता अपने आसपास के मुद्दों जैसे पानी की कमी, सूखे वगैरह के बारे में ज्यादा चिंतित दिख रही थी.

कांग्रेस ने अपने सहयोगी दलों की मदद और सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में 543 में से 335 सदस्यों का बहुमत हासिल किया. चुनाव के बाद इस गठबंधन को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का नाम दिया गया. सोनिया गांधी ने खुद प्रधानमंत्री बनना स्वीकार नहीं किया और वित्त मंत्री रह चुके डाक्टर मनमोहन सिंह को यह जिम्मेदारी दी गई.

साल 2009 में 15वीं लोकसभा के हुए चुनावों में कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को दोबारा सरकार बनाने का मौका मिला. डाक्टर मनमोहन सिंह दोबारा प्रधानमंत्री बने.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने आपसी विरोधों के बावजूद नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा बना कर चुनाव लड़ने की ठानी. उस ने कांग्रेस के राज में हुए भ्रष्टाचार को सब से बड़ा मुद्दा बनाया. ‘अच्छे दिन आएंगे’ का नारा दिया.

भारतीय जनता पार्टी की यह रणनीति काम कर गई. 330 सीटों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सब से बड़ा घटक और 282 सीटों के साथ भारतीय जनता पार्टी सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी. इस सरकार के पिछले 3 सालों के काम और फैसले सब के सामने हैं.

गाना गाते वक्त भावुक हुए पवन सिंह, अक्षरा सिंह ने पोंछे आंसू

भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह की फिल्म ‘वांटेड’ पिछले ही महीने सिनेमाघरों में रिलीज हुई है. फिल्म में दमदार डायलौग से लेकर जबरदस्त एक्शन दिखाया गया है. साथ ही साथ फिल्म के सभी गाने भी काफी हिट हुए हैं. बता दें, इस फिल्म के लिए पवन सिंह की हर तरफ तारीफ हो रही है. फिल्म समीक्षकों ने भी फिल्म को बेहतरीन बताया है. इसी बीच पवन सिंह के स्टेज शो का एक वीडियो इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है.

बहुत दिल से गाते हैं पवन सिंह

इस वीडियो में पवन सिंह भोजपुरी की कई अभिनेत्रियों के साथ स्टेश शो करते हुए नजर आ रहे हैं. पवन सिंह के बारे में कहा जाता है कि वह जो भी गाना गाते हैं तो बहुत दिल से गाते हैं और कई बार वह गाना गाते-गाते भावुक भी हो जाते हैं. कुछ ऐसा ही पवन सिंह के साथ इस स्टेज शो के दौरान जब वह अपनी एक गीत गा रहे थे. जब पवन सिंह के आंखों में अक्षरा सिंह ने आंसू देखा, तो वह अपने हाथों से उसे पोछने लगी. अब यह वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहा है. महज कुछ दिनों में यूट्यूब पर इस वीडियो को 8 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है.

लोहा पहलवान’ में नजर आएंगे पवन सिंह

बता दें, फिल्म ‘वांटेड’ के बाद भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह अपनी एक और नई फिल्म ‘लोहा पहलवान’ के साथ तैयार हैं. हाल ही में इस फिल्म का ट्रेलर भी रिलीज किया जा चुका है. ट्रेलर इतना दमदार है कि अब दर्शक इस फिल्म को देखने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. ट्रेलर में पुलिस औफिसर के किरदार में पवन सिंह जबरदस्त एक्शन करते नजर आ रहे हैं. इस फिल्म का निर्माण उच्च तकनीकी के साथ हर एक पहलू पर बहुत ही बारीकी से ध्यान देकर किया गया है. फिल्म ‘लोहा पहलवान’ के ट्रेलर की एक और खास बात यह भी है कि इसके कुछ दृश्य बौलीवुड के ‘दबंग’ सलमान खान की फिल्म ‘सुल्तान’ से मिलती जुलती है, जैसे कुश्ती अखाड़े का दृश्य दोनों फिल्मों में काफी मेल खाता है.

ट्रेलर की बात करें तो इसमें पवन सिंह अपने दुश्मनों से लोहा ले रहे हैं. इस फिल्म की खास बात यह है कि इसमें पवन सिंह पहली बार पहलवानी करते हुए नजर आने वाले हैं. उनका एंग्री यंग मैन हैरतअंगेज रूप दर्शकों में रोमांच भर देगा. इसमें पवन सिंह एक पुलिस वाले का किरदार निभा रहे हैं, जो अपना कार्य पूरी ईमानदारी के साथ करते हैं और जनता की सुरक्षा लिए दुश्मनों से लोहा लेते नजर आएंगे. फिल्म ‘लोहा पहलवान’ का ट्रेलर सुप्रसिद्ध म्यूजिक कंपनी ‘वर्ल्डवाइड रिकार्ड्स भोजपुरी’ द्वारा रिलीज किया गया है. फिल्म रोमांस से भरपूर होगी, जिसमें पवन सिंह के साथ पायस पंडित नजर आने वाली हैं.

जिन्ना पर जंग, धार्मिक उन्माद का राजनीतिक रंग

दिल्ली से 130 किलोमीटर दूर स्थित अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी का जिन्ना विवाद 1,920 किलोमीटर दूर कनार्टक के चुनावी समर का प्रमुख अस्त्र बना. जिन्ना पर जंग ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि सांप्रदायिक मुद्दों को भड़का कर लाभ उठाने में भाजपा का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है. कर्नाटक चुनाव में धार्मिक मुद्दों की राजनीति से भाजपा वहां सब से ज्यादा सीटें जीतने में सफल हो गई. जिन्ना पर जंग में खास बात यह थी कि  इस में पाकिस्तान और जिन्ना का तड़का लगा हुआ था, जो सांप्रदायिक रसोई का सब से तड़केदार मसाला है. ऐसे में कट्टरपंथियों को इस का स्वाद बेहद पसंद आया. जो तसवीर 80 साल से विश्वविद्यालय की पुरानी दीवार पर लटकी थी, अचानक चर्चा के केंद्रबिंदु में आ गई.

जिन्ना पर जंग का असर उत्तर प्रदेश में होने जा रहे उपचुनाव के दौरान धार्मिक धुव्रीकरण के रूप में दिखेगा. भाजपा इस बहाने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलितमुसलिम गठजोड़ को तोड़ना चाहती है, कैराना और नूरपुर के उपचुनाव इस का एसिड टैस्ट साबित होंगे.

भड़काऊ मुद्दे की तलाश

किसी भी मुद्दे को कैसे धार्मिक रंग दे कर भड़काया जाता है, फिर उस के नाम पर सियासत की जाती है, अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी का जिन्ना विवाद इस का जीताजागता उदाहरण है. जिन्ना के नाम पर जंग उस समय शुरू हुई जब दक्षिणभारत में कर्नाटक विधानसभा का महत्त्वपूर्ण चुनाव चल रहा था.

कर्नाटक विधानसभा का चुनाव भाजपा के लिए कितना महत्त्वपूर्ण था, इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 41 जनसभाएं कीं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कनार्टक विधानसभा चुनाव में सब से बड़े स्टारप्रचारक बन कर उभरे. नरेंद्र मोदी ने जहां देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ले कर तमाम विवादित बयान दिए, वहीं योगी आदित्यनाथ भाजपा के धार्मिक रंग को गहरा करते रहे.

कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद इसी महीने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के उपचुनाव होने हैं. भाजपा उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर जैसी महत्त्वपूर्ण लोकसभा सीटें उपचुनाव में हार चुकी है. ऐसे में कैराना और नूरपुर के लिए उसे धार्मिक धु्रवीकरण की बेहद जरूरत थी. अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी का जिन्ना विवाद इस के लिए सब से मुफीद जरिया बन सकता था. सो, भाजपा ने इस के लिए रणनीति तैयार की. सब से पहले भाजपा के सांसद सतीश गौतम ने अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी यानी एएमयू के कुलपति को पत्र लिखा. पत्र में सांसद सतीश गौतम ने कहा कि अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ कार्यालय में लगी मोहम्मद अली जिन्ना की फोटो को हटाया जाए. अप्रैल में लिखे गए इस पत्र पर बहुत चर्चा नहीं हो पाई.

विवाद को हवा

पहली मई को उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य कानपुर में सामूहिक विवाह समारोह में हिस्सा लेने आए तो जिन्ना को ‘भारत का महापुरुष’ कह दिया. स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा के मूल वर्ग से नहीं आते हैं. भाजपा से पहले वे बहुजन समाज पार्टी में थे. स्वामी प्रसाद मौर्य डाक्टर भीमराव अंबेडकर, कांशीराम और मायावती के विचारों के पोषक रहे हैं. ऐसे में वे भाजपा के ‘कोर हिंदुत्व’ से दूर माने जाते हैं.

पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की फोटो हटाने के बयान पर अपनी राय देते उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम और सेवायोजन विभाग के कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि महापुरुषों के बारे में अनर्गल बयान देने वाले नेता चाहे उन की पार्टी के हों या दूसरे दलों के, वे उन की निंदा करते हैं. जब उन से यह पूछा गया कि क्या वे मोहम्मद अली जिन्ना को भारत का महापुरुष बता रहे हैं? तो उन्होंने ने कहा कि अंगरेजों के खिलाफ लड़ाई में जिन्ना का बड़ा योगदान रहा है. वे भारत के भी महापुरुष हैं. अगर उन पर कोई उंगली उठाता है तो हम सोचते हैं कि वह घटिया सोच है.

एक तरफ भाजपा के अलीगढ़ से ही सांसद सतीश गौतम जिन्ना की तसवीर के विवाद की जड़ में हैं वहीं दूसरी तरफ भाजपा की उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने जिन्ना को भारत का महापुरुष बता दिया. मीडिया में चल रहे इस विवाद को हवा देने का काम हिंदू जागरण मंच ने किया. हिंदू जागरण मंच के कार्यकताओं ने अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के परिसर में घुस कर कुलपति का पुतला फूंका और सुरक्षाकर्मियों के साथ मारपीट की. ये लोग विश्वविद्यालय से जिन्ना की तसवीर हटाने की मांग कर रहे थे. यहां हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं और अलीगढ़ छात्रसंघ के पदाधिकारियों का टकराव हो गया. इस के बाद बवाल, लाठीचार्ज और धरनाप्रदर्शन शुरू

हो गया. अलीगढ़ के कमिश्नर अजय दीप सिंह को सोशल मीडिया और इंटरनैट सेवाओं को कुछ समय के लिए रोकना पड़ा.

राजनीतिक रंग

अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के छात्रों ने सर सैयद गेट पर धरना देना शुरू किया. यह कई दिनों तक जारी रहा. यूनिवर्सिटी में शुरू हुई जिन्ना पर जंग कर्नाटक चुनाव के संगसंग चलती रही. यह जंग फौरीतौर पर शांत भले दिख रही हो पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस घटना ने हिंदूमुसलिम के बीच फिर से दूरियां बढ़ाने का काम किया है. उत्तर प्रदेश के कैराना और नूरपुर के उपचुनावों में जिन्ना पर जंग का राजनीतिक रंग दिखाई देगा. कैराना और नूरपुर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर और सहारनपुर जिले की प्रमुख सीटें हैं. यहां जाट, मुसलिम टकराव सियासी नफानुकसान का बड़ा जरिया होता है. सहारनपुर में दलित, सवर्ण विवाद के प्रभाव को कम करने के लिए भी जिन्ना वि?वाद का सहारा लिया जा रहा है. दलित-सवर्ण विवाद के कारण भाजपा को नूरपुर उपचुनाव जीतना कठिन है. सहारनपुर सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों की अगुआई करने वाली भीमसेना ने भाजपा से दलितों को अलग कर दिया है.

अपना दल की प्रदेश अध्यक्ष पल्लवी पटेल ने जिन्ना की जंग को धार्मिक उन्माद बढ़ाने वाली घटना बताया. पल्लवी पटेल की बहन अनुप्रिया पटेल भाजपा की केंद्र सरकार में मंत्री हैं. पहले वे अपना दल में ही थीं, बाद में अपना दल के 2 हिस्से हो गए. अनुप्रिया पटेल ने अपना दल एम के नाम से अलग पार्टी बना कर भाजपा का साथ जारी रखा है. दूसरी तरफ अपना दल पल्लवी पटेल की अगुआई में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है.

पल्लवी पटेल ने कहा कि भाजपा की केंद्र और प्रदेश की सरकारें जनता से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज कर सिर्फ जुमलों की राजनीति कर रही हैं. विकास के मुद्दे से जनता का ध्यान हटाने के लिए धार्मिक उन्माद को बढ़ावा दिया जा रहा है. भाजपा ने एएमयू से जिन्ना की तसवीर हटाने की मांग की है, जबकि महाराष्ट्र में जिन्ना हाउस की देखभाल भाजपा की ही सरकार कर रही है. पश्चिम उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए कमजोर कड़ी है. 2019 के लोकसभा चुनावों में यहां दलित भाजपा से हट सकते हैं. ऐसे में जिन्ना की तसवीर जैसे विवाद धार्मिक धु्रवीकरण के लिए मुफीद हो सकते हैं.

राजनीतिक  नफानुकसान के लिए किसी भी घटना को रस्सी से सांप कैसे बनाया जा सकता है, जिन्ना विवाद इस की मिसाल है. जिन्ना को 1938 में अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में लाइफटाइम मैंबरशिप दी गई थी तभी से वहां उन की तसवीर लगी है. औल इंडिया मुसलिम पर्सनल लौ बोर्ड के अध्यक्ष जफरयाब जिलानी कहते हैं, ‘‘जिन्ना की तसवीर 80 साल पुरानी है. ऐसे मेें अब इस की याद क्यों आई? यह केवल चुनावी मुद्दा है और राजनीति के लिए उठाया गया है.’’

जफरयाब जिलानी अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के छात्र रहे हैं. उन का कहना है कि यह उन की अपनी राय है. ऐसे मुद्दे बारबार समयसमय पर चुनावी लाभ के लिए खूब उठाए जाते हैं. सरकार का मकसद भी जिन्ना की तसवीर को हटाना  नहीं, बल्कि मुद्दे को केवल हवा देना है.

अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के अध्यक्ष मशकूर अहमद ने कहा, ‘‘सरकार जनता का ध्यान भटकाने के लिए जिन्ना मुद्दे को तलाश कर लाई है. पहले जेएनयू, डीयू, बीएचयू और अब एएमयू को निशाने पर लिया जा रहा है.

‘‘सरकार एक नोटिस भेजे तो हम एएमयू के यूनियन हौल में लगी मोहम्मद अली जिन्ना की तसवीर को उतार कर फेंक देंगे.’’ दरअसल, सरकार केवल मुद्दे को उठाना चाहती है, उसे जिन्ना की तसवीर को हटाने या न हटाने से लेनादेना नहीं है.

सरकार बनाम सुप्रीम कोर्ट

सरकार और उच्चतम न्यायालय के बीच खाई बढ़ती जा रही है. हालांकि कई न्यायाधीशों को सरकारी इशारे पर चलने के खुले संकेत दिए जा रहे हैं, सभी न्यायाधीशों की सामूहिक आवाज के कारण सरकारपसंद न्यायाधीश भी चुपचुप हैं और न्यायाधीशों के मामले में बहुमत का आदर करने को विवश हैं.

भारतीय जनता पार्टी जानबूझ कर ऐसे न्यायाधीशों को उच्चतम न्यायालय में भेजना चाहती है जो उस की नीतियों का समर्थन करते हैं. अमेरिका में यह खुल्लमखुल्ला चर्चा होती है कि कौन सा न्यायाधीश किस राष्ट्रपति ने नियुक्त किया था और वह किस मसले पर कैसा निर्णय देगा. हमारे न्यायाधीश पिछले 3-4 दशकों से खासे स्वतंत्र रहे हैं और वे खुद ही नए न्यायाधीश नियुक्त करते रहे हैं और इस प्रक्रिया को सरकार भी मानती रही.

न्यायाधीशों की नियुक्ति यदि न्यायाधीश खुद करें तो अच्छा है, क्योंकि वे फिर किसी तरह से भी मनमानी नहीं कर सकते. न्यायाधीश दक्षिणपंथी हों या वामपंथी, उन के पास चूंकि सरकार की शक्तियां नहीं होतीं, वे गलत फैसले नहीं ले सकते. वे डाक्टरों की तरह हैं जो फैसले मरीज को देख कर करते हैं और डाक्टरों की नियुक्ति चाहे वरिष्ठ डाक्टर करें या सरकार. सरकारी नीतियों को तो इलाज में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

इसी तरह न्याय सामाजिक, पारिवारिक, व्यावसायिक, सरकारी बीमारियों का इलाज है और सरकार या लिटिगैंट खुद न्यायाधीश नियुक्त करेंगे तो गलत निर्णय होंगे ही. न्याय नहीं चाहता कि मरीज बेमौत मारा जाए.

उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसेफ से केंद्र की भाजपा सरकार चिढ़ी हुई है, क्योंकि उन्होंने कुछ वर्षों पहले भारतीय जनता पार्टी को विधायकों की खरीदफरोख्त के बल पर सत्ता में आने से रोक दिया था. सरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त करने पर सहमत नहीं हो रही है और न्यायाधीश उन्हें नियुक्त करने की सिफारिश भेज चुके हैं.

न्यायपालिका और कार्यपालिका का यह द्वंद्व पुराना है पर अब तक काम चल रहा था. अब डर लग रहा है कि चुनाव आयोग की तरह यह संस्था भी सरकारी नकाब न पहन ले और इंदिरा गांधी का युग वापस न आ जाए जब न्यायाधीश बनते ही प्रधानमंत्री की सिफारिश पर थे.

यह खतरनाक होगा क्योंकि  आजकल फिर देश खेमों में बंटने लगा है. विकास के सपने देखने वाला देश एक रहे और गृहयुद्ध जैसी स्थिति न आ जाए, यह डर लगने लगा है. देश में उदारपंथियों के साथसाथ दलितों और मुसलिमों को निशाना बनाया जा रहा है. और ऐसे में पूर्व मुख्य न्यायाधीश मदन मोहन पुंछी की तरह न्यायाधीश कट्टर होने लगे तो देश का रंग लाल, हरे, काले की तरह भगवा हो जाएगा.

व्यावहारिक और सरल हिंदी आज की जरूरत

हिंदी के सफर को आगे बढ़ाने में हिंदी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्री महादेवी वर्मा की ‘हाट बाजार’ की भाषा ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हाट बाजार ने हिंदी को जनजन तक पहुंचाने का प्रयास किया है. वास्तव में हिंदी एक भाषा होने के साथसाथ एक सफर भी है. एक लंबे सफर में हिंदी कई पड़ावों और मोड़ों से गुजरी है. एक नदी की यात्रा है हिंदी, जिस ने अपने प्रवाह में कई धाराओं को जोड़ा है.

हिंदी ने अपने संपर्क में आई हर बोलीभाषा को अपने में समाया है और इस तरह से हिंदी एक समृद्ध और लोकप्रिय भाषा बनती गई. हिंदी ने असहजता को त्याग कर सहजता को स्वीकारा है, यह हिंदी की विशेषता भी है. ‘रंग महल’ सुनने व बोलने में सहज और स्वाभाविक लगता है, इसीलिए ‘रंग महल’ ने ‘रंग अट्टालिका’ शब्द को स्वीकार नहीं किया है.

सहज अभिव्यक्ति भाषा की विशेषता होती है. इसी सहजता की शृंखला में वर्णमाला में अभूतपूर्व परिवर्तन आते गए हैं, जिस से हिंदी लिखनापढ़ना आसान हो गया, इस के बारे में विस्तृत बातें निम्न पंक्तियों में साफ होती हैं :

पूर्व में ‘ख’ का ‘रव’ लिखा जाता था. इस से कई बार समझने व पढ़ने में भ्रम हो जाता था. इस के लिए कराची में आयोजित हिंदी सम्मेलन में यह निश्चय किया गया कि अगर ‘ख’ में ‘र’ के नीचे के हिस्से को ‘व’ के नीचे मिला कर लिखा जाए तो इस से ‘ख’ के संबंध में उत्पन्न भ्रम दूर हो जाएगा और इस तरह से ‘ख’ अस्तित्व में आ गया जो एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचायक था. अब ‘रवाना’ और ‘खाना’ में स्पष्ट अंतर नजर आने लगा.

इस सम्मेलन में मौजूद बेढव बनारसी ने हास्य चुटकी लेते हुए कहा था : ‘‘वाकई अब तक हम ‘सखा’ को ‘सरवा’ ही समझते रहे थे.’’ यहां ‘सखा’ का मतलब ‘मित्र’ से है और ‘सरवा’ का अर्थ ‘पत्नी का भाई’ यानी ‘साले’ से है.

इसी प्रकार ‘घ’ और ‘म’ भी काफी समय तक भ्रम पैदा करते रहे. पहले सभी जगह ‘घ’ और ‘म’ का ही उपयोग होता था और वाक्यविन्यास के अनुसार उस के अर्थ ‘ध’ और ‘भ’ के लिए निकाला जाता था. जैसे ‘धन’ को भी ‘घन’ ही लिखा जाता था और ‘भान’ को ‘मान’. काफी विचारविमर्श के बाद इस का हल निकाला गया कि ‘घ’ में घुंडी बना कर ‘ध’ बनाया गया और ‘म’ में घुंडी लगा कर ‘भ’ बनाया गया. अब ‘मान’ और ‘भान’ में स्पष्ट अंतर दिखाई देने लगा तथा ‘घन’ और ‘धन’ अलगअलग हो गए.

पूर्व में ‘झ’ लिखने के लिए ‘भ’ में ‘क’ के आखिरी अर्धांश ‘क्त’ को मिला कर लिखा जाता था, इसे लिखने में समय अधिक लगता था और यह कठिन भी था. इसलिए आगे चल कर इसे ‘झ’ लिखा जाने लगा जो सर्वस्वीकार्य और सरल हो गया.

एक वर्ण ‘रा’ को इस तरह लिखा जाता था जो अवैज्ञानिक तथा भ्रम पैदा करने वाला था. आगे चल कर इसे ‘ण’ के रूप में लिखा जाने लगा, जिस से हिंदी वाक्यांश बनाना, पढ़ना और लिखना आसान व स्पष्ट हो गया.

जटिलता में कमी

पुरानी हिंदी में वर्णमाला के स्वरों में दीर्घ ‘ऋ’ और ‘लृ’ का भी अस्तित्व था जिस में से बाद में लृ को हटा दिया गया और हिंदी का भारीपन कम हो गया. शायद आगे जा कर ‘ऋ’ को भी खत्म किया जा सकता है क्योंकि ‘ऋतु’ और ‘रितु’ के उच्चारण में कोई भेद नहीं रह गया है.

इसी तरह पूर्व में ‘क्ष’ को ‘क्शा’, ‘त्र’ को ‘त्र’ और ‘ज्ञ’ को ‘ज्’ की तरह लिखा जाता था, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए इस में आवश्यक सुधार किए गए और ‘क्ष’ और ‘त्र’ को सर्वसहमति से स्वीकारा गया.

वर्तमान समय में हिंदी को सरल, सुलभ व सर्वसाधारण की भाषा बनाने पर जोर दिया जा रहा है, क्योंकि हिंदी विश्वस्तरीय भाषा बन गई है. इसी क्रम में ऐसी वर्तनी को अपनाना न्यायोचित होगा जिस में स्पष्टता अधिक हो और भ्रम नहीं हो.

इस क्रम में ‘ड़’ अथवा ‘ढ़’ में से एक अक्षर का उपयोग किया जा सकता है क्योंकि लगभग दोनों ही अक्षर एकसा संकेत देते हैं. हम ‘्र’ का उपयोग ‘रकार’ के लिए करते हैं, अब इसे आसान बनाने के लिए ‘प्र’ का उपयोग किया जाना ज्यादा सुविधाजनक होगा जैसे ‘प्रकार’ की जगह ‘प्रकार,’ ‘क्रम और भ्रम’ को ‘करम और भरम’ लिखना आसान रहेगा.

हिंदी को आसान बनाने के लिए इस तरह के प्रयोगों को किया जा सकता है, जो आज के कौर्पोरेट समय में काफी लोकप्रिय होगा. आज फेसबुक और ईमेल पर अंगरेजी वर्णमाला का उपयोग देवनागरी उच्चारण करते हुए हिंदी लिखने में किया जा रहा है, जिसे ‘हिंगलिश’ कहा जा रहा है. आज यह बहुत लोकप्रिय हो रही है और अनेकानेक लोग इस का उपयोग कर रहे हैं. इसी क्रम में हिंदी देवनागरी में भी नए प्रयोग स्वागतयोग्य होने चाहिए. इसी तरह ‘ र्’ का उपयोग जैसे ‘गर्म’, ‘शर्म’ में किया जाता है, उस की जगह ‘गरम’, ‘शरम’ भी लिखा जाने लगा है. यह प्रचलन में भी है. इस से भी हिंदी लिखने व समझने में आसानी होगी.

अब शब्द संबंध को लें, जो हिंदी के जानकार हैं वे तो एक बिंदी ‘ ं’ को ‘म्’ और दूसरी बिंदी ‘ ं’ को ‘न्’ समझ लेंगे लेकिन जब हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की बात करते हैं तब ऐसा ‘संबंध’ लिखने में कोई दिक्कत नहीं है और यह सर्वमान्य भी होगा. इसी तरह अन्य शब्दों का भी सरलीकरण किया जा सकता है, जिस से अर्थ स्पष्ट हो और उपयोग में आसानी हो.

‘संभवत:’ शब्द को यदि ‘सम्भवतह’ लिखेंगे तब भी अर्थ में अंतर नहीं आएगा, बल्कि यह समझने में आसान होगा. इस तरह के प्रयोगों से लेखन में विस्तार अवश्य होगा और भारत के सभी राज्यों व विदेशों में इसे लिखने व समझने में आसानी भी होगी.

यह जान कर आश्चर्य होगा कि पहले हिंदी वर्णमाला में 63 वर्ण थे. इस में गैरजरूरी ध्वनियों को हटा कर और समान ध्वनि को मिला कर 33 व्यंजन तथा 11 वर्ण चलन में रखे गए हैं. इसी के साथ वर्तमान समय में क वर्ग के आखिरी वर्ण (ङ) को और च वर्ग के आखिरी वर्ण (ञ) को प्रयोग से हटा दिया गया है.

जैसी बोली वैसी लिखावट

हिंदी की विशेषता है कि यह जैसी बोली जाती है, वैसी ही लिखी भी जाती है. इस की वर्तनी में कोई भ्रम पैदा नहीं होता है, जबकि अंगरेजी की वर्तनी और उच्चारण में बहुत अंतर होता है. यह हिंदी की महानता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदी अपना स्वरूप बदलती गई है, लेकिन हर हिंदुस्तानी के मुंह में हिंदी जरूर समाई हुई है, अपनी प्रांतीय और स्थानीय भाषा के समावेश से हिंदी में मिठास एवं अपनापन आता गया है. हर 12 किलोमीटर की दूरी पर बदलने वाली भाषाएं भी हिंदी से सराबोर हैं.

आज के उदारीकरण, भूमंडलीकरण तथा बाजारवादी दृष्टिकोण के कारण भाषाएं अपनी सीमाएं लांघ रही हैं और एकदूसरे देश में समाने के लिए लालायित हैं. हाल में चीन ने भारत में अपना बाजार फैलाने के लिए हिंदी की उपयोगिता समझी और वह अपने देश में इस के लिए अपने नागरिकों को प्रेरित कर रहा है, लगभग यही स्थिति यूरोपीय व अफ्रीकी देशों की भी है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में हिंदी और सरल एवं व्यावहारिक बनेगी और इस के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाएगा.

खतरनाक स्थिति में पहुंचा साइबर क्राइम

घटना -1

कपड़ों के शोरूम के मालिक प्रशांत कुमार दोपहर में ग्राहक न होने की वजह से शोरूम के सेल्समैनों से बात कर रहे थे कि उन के मोबाइल की घंटी बजी. अनजान नंबर था, इसलिए उन्होंने लापरवाही से फोन रिसीव कर जैसे ही कान से लगाया, दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘जी, मैं स्टेट बैंक से बोल रहा हूं.’’

प्रशांत कुमार का सारा लेनदेन भारतीय स्टेट बैंक से ही होता था इसलिए उन्हें लगा कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं है. इसलिए सचेत होते हुए उन्होंने कहा, ‘‘जी कहिए, क्या बात है.’’

‘‘दरअसल आप के डेबिट कार्ड का पिन ब्लौक हो गया है इसलिए आप उस का नंबर, एक्सपायरी डेट और सीवीवी नंबर बता देते तो उस का नया पिन नंबर जेनरेट कर देते.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

प्रशांत कुमार को पता था कि बैंक की ओर से अकसर इस तरह के मैसेज आते रहते हैं कि ‘आप किसी को अपने डेबिट/के्रडिट कार्ड का नंबर, एक्सपायरी डेट और सीवीवी नंबर न बताएं, क्योंकि बैंक किसी से यह सब नहीं पूछता.’ प्रशांत कुमार तुरंत जान गए कि फोन करने वाला कोई ठग है. उन्होंने तुरंत कहा, ‘‘भाई साहब, बेवकूफ समझते हो क्या?’’

उन का इतना कहना था कि दूसरी ओर से फोन काट दिया गया. दरअसल, फोन करने वाला ठग था. अगर प्रशांत कुमार उस के द्वारा मांगी गई जानकारी बता देते तो वह ठग समझ जाता कि यह आदमी बेवकूफ है. इस के बाद वह ओटीपी नंबर पूछ कर उन के खाते से पैसे निकाल लेता.

प्रशांत कुमार समझदार आदमी थे, इसलिए बच गए. लेकिन ये ठग इसी तरह न जाने कितने लोगों से कार्ड नंबर, एक्सपायरी डेट, सीवीवी नंबर, पूछ कर रोजाना ठगते हैं. लोगों को ठगी से बचने के लिए ही बैंक अब मैसेज भेजने लगे हैं कि आप किसी को अपने डेबिट/क्रेडिट कार्ड का नंबर, एक्सपायरी डेट और सीवीवी नंबर न बताएं. इस के बावजूद लोग ठगी का शिकार बन रहे हैं.

घटना-2

प्रशासनिक नौकरी की तैयारी करने वाले राजेश शर्मा को सोशल मीडिया इसलिए पसंद था, क्योंकि इस से उसे थोड़ीबहुत जानकारी तो मिलती ही थी, पढ़ाई करतेकरते थक जाने पर फेसबुक या चैट साइट खोल कर दोस्तों से थोड़ीबहुत चैट कर के मूड फ्रैश हो जाता था. राजेश युवा तो था ही कुंवारा भी था, दूसरे घर वालों से दूर अकेला रह रहा था. राजेश के ऐसे दोस्त भी थे, जिन से वह हर तरह की चैट कर लेता था. इस में अश्लील चैट भी शामिल था. इस तरह की चैट करने वालों में ज्यादातर अधेड़ उम्र के लोग थे.

अधेड़ लोगों से अश्लील चैट कर के राजेश अपना मूड जरूर फ्रैश कर लेता था. लेकिन इस में उसे वह आनंद नहीं आता था, जो वह चाहता था. उस का मन करता था कि कोई लड़की हो, जिस से वह इस तरह का चैट करे. इस के लिए उस ने चैट साइट ऐप टिंडर डाउनलोड किया और लड़कियों को मैसेज भेजने लगा. मैसेज का किसी ने जवाब दिया तो किसी ने टाल दिया. किसी का जवाब आता तो उसे खुशी होती कि शायद अब बात बन जाएगी. क्योंकि ज्यादातर लड़कियों के जवाब नकारात्मक होते थे.

राजेश भी हिम्मत हारने वालों में नहीं था. उस की कोशिश जारी थी. जो लड़कियां जवाब देतीं थीं, वे भी 2-4 दिन जवाब दे कर शांत हो जाती थीं. किसी ने बात आगे बढ़ाई भी तो बाद में कहने लगती थी कि अब बात तभी होगी, जब उस का फोन रिचार्ज कराओगे. चैट करने के लालच में राजेश ने एक बार एक लड़की का फोन रिचार्ज कराया भी.

लेकिन फोन रिचार्ज होते ही उस लड़की ने राजेश को ब्लौक कर दिया. इस से राजेश को निराशा तो हुई लेकिन एक सीख यह मिल गई कि दुनिया बहुत चालाक है.

SOCIETY

इस घटना के बाद कुछ दिनों तक तो राजेश शांत रहा, लेकिन उस का मन नहीं माना और वह फिर पहले की ही तरह लड़कियों को मैसेज भेजने लगा. आखिर उस की कोशिश रंग लाई और उसे एक लड़की मिल गई, जो उस के मैसेज के वैसे ही जवाब देने लगी, जैसा वह चाहता था. राजेश रोज रात में उस लड़की से चैटिंग करने लगा. दोनों के मैसेज ऐसे होते थे, जिन्हें पतिपत्नी या प्रेमीप्रेमिका ही भेज सकते थे.

कुछ ही दिनों में मैसेज के आदानप्रदान के साथ एकदूसरे को फोटो भी भेजे जाने लगे. फिर एक दिन लड़की ने राजेश से अपने निर्वस्त्र यानी नग्न फोटो भेजने को कहा. राजेश को उस लड़की पर इतना भरोसा हो चुका था कि उस ने बिना कुछ सोचे लड़की को अपने नग्न फोटो भेज दिए. राजेश ने जब लड़की से उसी तरह के अपने फोटो भेजने को कहा तो उस ने बहाना बना कर फोटो भेजने से मना कर दिया. राजेश ने उस की बात पर विश्वास कर के उस पर दबाव भी नहीं डाला.

लड़की ने राजेश को अपनी बातों के जाल में फंसा कर उस के कई नग्न फोटो मांग लिए. इस के बाद एक दिन लड़की ने जो रंग दिखाया, उसे देख राजेश परेशान हो उठा. लड़की ने राजेश के फोटो सोशल मीडिया पर डालने की धमकी दे कर उस से पैसे मांगे. राजेश को अपनी इज्जत बचानी थी, सो किसी तरह रुपयों का इंतजाम किया.

जब वह लड़की को रुपए देने पहुंचा तो पता चला वह लड़की नहीं, 45-46 साल का आदमी था. राजेश ने अपने वे फोटो डिलीट कराने के लिए अपनी हैसियत के हिसाब से रुपए तो दिए ही उसे उस की मनमानी भी सहनी पड़ी.

अच्छा यह हुआ कि वह आदमी एक बार में ही मान गया, वरना पता नहीं राजेश को कब तक उस की दुर्भावना का शिकार होना पड़ता. हो सकता है, उस ब्लैकमेलर ने सोचा हो कि जो मिलता है, ले कर किनारे हो जाओ. क्योंकि उसे यह डर भी था कि ज्यादा लालच करने पर राजेश पुलिस के पास भी जा सकता है.

मजे लेने के चक्कर में राजेश ने इधरउधर से इंतजाम कर के पैसे तो दिए ही, उस आदमी की मनमानी भी झेली. उस के साथ जो हुआ शायद ही वह जीवन में इसे भूल पाए. अब वह मोबाइल देख कर डर जाता है.

राजेश ही नहीं सोशल मीडिया के नाम से सुष्मिता भी घबराने लगी है क्योंकि उस के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है. लेकिन उस का मामला राजेश के मामले से कुछ अलग है.

घटना-3

सुष्मिता भी सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय थी. लेकिन फेसबुक हो या चैटसाइट टिंडर, उस की फ्रैंडलिस्ट में जो भी लोग थे, सभी उस की जानपहचान वाले थे. इन में ज्यादातर उस के कालेज के मित्र थे. फालतू लोगों को न तो वह फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजती थी और न ही रिक्वेस्ट आने पर स्वीकार करती थी.

चैटिंग भी वह कुछ ही दोस्तों से करती थी, जिस में पढ़ाई से संबंधित बातें ज्यादा होती थीं. किसी वजह से वह 15-20 दिन सोशल मीडिया से दूर रही. एक दिन उस ने अपनी चैट साइट खोली तो उस में एक दोस्त का मैसेज पढ़ कर दंग रह गई. उस ने दोस्त को लताड़ना चाहा तो उस ने कहा कि उसी ने तो इस तरह की फूहड़ चैटिंग की थी. उस ने तो केवल उस के मैसेज के जवाब भर दिए थे.

इस से सुष्मिता की हैरानी और बढ़ गई, क्योंकि 15-20 दिनों से उस ने किसी से चैटिंग की ही नहीं थी. उस ने दोस्त को झूठा साबित करना चाहा तो उस ने चैटिंग के स्क्रीन शौट ले कर भेज दिए. चैटिंग के फोटो देख कर सुष्मिता परेशान ही नहीं हुई बल्कि डिप्रेस हो गई. क्योंकि वह चैटिंग इतनी अश्लील थी कि उस तरह की चैटिंग करने की कौन कहे, सुष्मिता सोच भी नहीं सकती थी. इस डिप्रेशन से उबरने में उसे काफी समय लगा.

सुष्मिता ने सचमुच वह चैटिंग नहीं की थी. उस के चैटरूम में घुस कर किसी ने उस के दोस्त से उस की ओर से चैटिंग की थी. पहले तो सुष्मिता के उस दोस्त को भी हैरानी हुई थी कि सुष्मिता को यह क्या हो गया है? लेकिन उस ने सोचा कि जब वह ही इस तरह की फूहड़ चैटिंग कर रही है तो उसे क्यों परेशानी होगी. मजे लेने के लिए उस ने भी उसी तरह के जवाब देने शुरू कर दिए थे. लेकिन जब असलियत खुली कि वह चैटिंग सुष्मिता ने नहीं, बल्कि उस की ओर से किसी और ने की थी तो वह काफी शर्मिंदा हुआ था.

घटना-4

ऐसा ही कुछ हुआ प्रदीप के साथ. 15 साल का प्रदीप भी सोशल मीडिया पर खूब सक्रिय था. मौका मिलते ही वह फेसबुक खोल कर बैठ जाता और यह देखता कि उस के फोटो और पोस्ट को कितने लोगों ने लाइक किया और उस पर किस ने क्या कमेंटस लिखे. उस की अपने कुछ दोस्तों से चैटिंग भी होती थी. प्रदीप सोशल मीडिया पर सक्रिय जरूर था. लेकिन अपनी उम्र को देखते हुए वह सावधानी भी बरतता था. उस की फ्रैंडलिस्ट में ज्यादा लोग नहीं थे, जो थे वे पढे़लिखे और समझदार लोग थे.

इतनी सावधानी बरतने के बावजूद प्रदीप के साथ गड़बड़ हो गई. एक दिन उस के साथ पढ़ने वाली एक लड़की अपनी मम्मी के साथ उस के घर आई और अपने फोन पर मैसेंजर में उस का मैसेज दिखाते हुए बोली, ‘‘प्रदीप, मैं तो तुम्हें बहुत अच्छा लड़का समझती थी, पर तुम ने मुझे यह कैसा मैसेज भेजा है?’’

प्रदीप उस मैसेज को देख कर हैरान रह गया, क्योंकि उस ने वैसा मैसेज भेजा ही नहीं था. उस ने लाख सफाई दी, लेकिन न तो लड़की ने उस की बात पर विश्वास किया न ही उस की मां ने. दरअसल वह मैसेज था, ‘आई लव यू’. लड़की और उस की मां इसी मैसेज से खफा थीं.

उन से जो बना, वह तो उन्होंने कहा है, जातेजाते धमकी भी दे गईं कि फिर कभी ऐसा मैसेज भेजा तो प्रिंसिपल से उस की शिकायत कर देंगी. इस बार वे उसे इसलिए छोड़ रही हैं, क्योंकि उस की मां ने उन से हाथ जोड़ कर उस की गलती के लिए माफी मांगी है.

इस मामले में भी कुछ वैसा ही हुआ था, जैसे ऊपर की घटनाओं में हुआ था. प्रदीप ही नहीं उस की मां को भी इस गलती के लिए शर्मिंदा ही नहीं होना पड़ा था, बल्कि हाथ जोड़ कर माफी भी मांगनी पड़ी. दरअसल किसी और ने प्रदीप की ओर से वह मैसेज उस के साथ पढ़ने वाली उस लड़की को भेज दिया था.

इस बात को न वह लड़की समझ पाई थी, न ही उस की मां. उन्हें ही नहीं, इस बात का पता तो प्रदीप और उस की मां को भी नहीं चला था. प्रदीप सिर्फ इतना जानता था कि उस ने यह मैसेज नहीं भेजा था. यह सब कैसे हुआ, उसे पता भी नहीं था.

दरअसल, यह सब एक तरह का साइबर अपराध है, जो धीरेधीरे आम होता जा रहा है. लेकिन इस के बारे में बहुत कम लोगों को पता है. इंटरनेट के तेजी से हो रहे प्रचारप्रसार के साथ अब साइबर अपराध भी उसी तेजी से बढ़ रहा है. युवा और महिलाएं ही नहीं, बच्चे भी औनलाइन चैटिंग, डेटिंग ऐप के चक्कर में फंस कर प्रभावित हो रहे हैं. बैंकिंग, इनफोर्मेशन, बीमा कंपनियां और शेयर मार्केट ही नहीं, सरकारें तक इस अपराध से खासा प्रभावित हैं.

एक लिंक से ठगी

किसी की निजी जानकारी प्राप्त कर के धोखाधड़ी, डेबिट/के्रडिट कार्ड का ब्यौरा पता कर के चूना लगाना तो आम हो गया. लगभग रोज ही अखबारों में इस तरह की ठगी की खबरें आती रहती हैं. इस साइबर क्राइम से आम लोगों के साथसाथ कारपोरेट जगत और सरकारें भी परेशान हैं. क्योंकि इस की वजह से अन्य लोग ही नहीं, बड़ीबड़ी कंपनियों के साथ सरकारें भी लुट रही हैं.

अभी पिछले दिनों आम लोगों के लुटने की बड़ी खबर आई थी, जिस में क्लिक से पैसा कमाने की ललक ने लाखों लोगों को चूना लगा दिया. ऐसा करने वाली ‘सोशलट्रेड डौट बिज’ अकेली कंपनी नहीं थी. इसी तरह की एक कंपनी और थी ऐडकैश. दोनों ही कंपनियों के कारोबार का पैटर्न एक जैसा था. पहले इन्होंने विज्ञापन दिया कि ‘घर बैठे लाइक करें और पैसे कमाएं.’ इस तरह का विज्ञापन देख कर फटाफट पैसा कमाने की होड़ में लाखों लोग इन कंपनियों के झांसे में आ गए.

दरअसल, सोशल मीडिया के बढ़ते क्रेज में सभी चाहते हैं कि उन के फालोअर्स की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़े. इसी बात को ध्यान में रख कर पहले इन कंपनियों ने नेताओं और सेलिब्रेटी को जोड़ा यानी ग्राहक बनाया. उन के साथ ईमानदारी से डील हुई. इस तरह कंपनियों ने फालोअर्स बढ़ाए और बदले में फीस ली. लेकिन असली खेल तो आम लोगों के साथ शुरू हुआ.

सेलिब्रिटी को जोड़ने के बाद कंपनियों ने लिंक्स को अपना मार्केटिंग हथियार बनाया. आम लोगों को नेता और सेलिब्रिटी के लिंक दिखा कर कंपनियों ने उन्हें जोड़ा. इस स्कीम के तहत लोगों को मेंबर बनाया गया. यहीं से शुरू हुआ असली खेल. 10 हजार रुपए फीस ले कर उन्हें मेंबर बनाया गया और बिजनैस मौडल के अनुसार, उस के लिंक को बूस्ट किया गया. मेंबरशिप के लिए ग्राहक को अपना पैन नंबर देना पड़ता था.

जबकि परदे के पीछे दूसरी डील हो रही थी, जिस के तहत कंपनियां मेंबरशिप लेने वाले ग्राहक से 5 लिंक क्लिक करवाती थीं और एक क्लिक का 5 रुपए देती थीं. अगर कोई मेंबर 2 नए मेंबर जोड़ता था तो उस के लिंक डबल हो जाते थे. लिंक डबल होने का मतलब मिलने वाला पैसा भी डबल. इस तरह मेंबर जितने मेंबर जोड़ता था, उस के लिंक बढ़ते जाते थे.

ये कंपनियां खुद को कानूनी रूप से सही साबित करने के लिए 10 प्रतिशत टीडीएस काट कर पैसे देती थीं. शुरूशुरू में ये कंपनियां रोज के हिसाब से पैसे देती थीं. कंपनी के सदस्यों की संख्या लाखों में होने की वजह से बैंक सवाल उठाने लगे कि आखिर इन्हें इतने अधिक पैसे क्यों दिए जा रहे हैं.

इस के बाद कंपनियां हफ्ते में, फिर महीने में पैसे देने लगीं. बैंकों ने फिर सवाल उठाया तो कंपनियां रुपए के बदले प्वाइंट देने लगीं. मेंबर जब चाहे प्वाइंट के बदले पैसे ले सकता था.

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घर बैठे कमाई का मौका देख कर लोगों ने एक पैन कार्ड पर कईकई आईडी बना लीं. इस के लिए उन्हें सालाना 11 हजार रुपए की फीस देनी पड़ती थी. लेकिन बदले में उन्हें ज्यादा लिंक्स मिल रहे थे. बाद में कपंनियां सख्ती बरतते हुए एक पैन कार्ड पर एक ही मेंबर बनाने लगीं. इस पर लोगों ने अपने घर के अन्य लोगों के नाम आईडी बना डालीं.

अगर ऐडकैश कंपनी की बात की जाए तो उस से करीब 6-7 लाख लोग जुड़ चुके थे. एडकैश का विज्ञापन तो व्हाट्सऐप पर भी धड़ल्ले से चल रहा था.

शुरूशुरू में वे कंपनियां वादे के अनुसार लाइक करने के लिए लिंक्स और बदले में नियमित पैसे देती रहीं. शनिवार और रविवार छुट्टी होती थी. इन दोनों दिन लिंक्स नहीं मिलते थे. धीरेधीरे सर्वर खराब होने का बहाना बना कर लिंक्स देना कम कर दिया गया, जिस से लोग नाराज हुए. जबकि नए मेंबर बनाने का काम उसी तरह चलता रहा. कंपनी फीस तो जमा कर लेती थी, लेकिन आईडी बनाने में आनाकानी करने लगी थी.

बात यहीं तक सीमित नहीं रही, आगे चल कर कंपनियां पौइंट पर पैसे देने से आनाकानी करने लगीं. इस के बाद लोगों ने पुलिस में शिकायत की तो पता चला कि यह एक तरह की साइबर ठगी थी, जिस में इन कंपनियों ने लोगों को खरबों का चूना लगाया था. यह तो रही आम लोगों की ठगी की बात, जो यह नहीं जानते कि ऐसा भी हो सकता है.

डेबिट कार्ड के पिन की चोरी

इस का सब से बड़ा उदाहरण है 4 महीने पहले हुई आम आदमी के डेबिट कार्ड के पिन की चोरी. बैंक को इस बात की जानकारी हो गई थी, इस के बावजूद बैंकों ने यह बात ग्राहकों को नहीं बताई. एक तरह से देखा जाए तो साइबर क्राइम से बड़ा अपराध वित्त मंत्रालय, रिजर्व बैंक और बैंकिंग प्रबंधन ने किया. डेबिट कार्ड की ही बात क्यों की जाए, आम आदमी के तमाम तथ्य आधार नंबर से चुराए जा चुके हैं. देश भर में करीब 65 लाख डेबिट कार्डों का डाटा चुराए जाने की आशंका है. लेकिन संबंधित बैंकों ने अपना कारोबार बचाने की गरज से इस का खुलासा नहीं किया.

भारतीय स्टेट बैंक तो अब किसी तरह खुलासा कर रहा है. जबकि निजी बैंकों में उस से कहीं बड़ा संकट होने के बावजूद वे अपने व्यावसायिक हितों को देखते हुए जब तक संभव है, कोई जानकारी देने से बचेंगे. फिलहाल बैंकों ने अपने ग्राहकों से पिन बदलवाने या फिर पुराना कार्ड ब्लौक कर नया कार्ड देना शुरू कर दिया है.

ताज्जुब की बात तो यह है कि अभी तक किसी बैंक ने इस मामले में एफआईआर तक दर्ज नहीं कराई है. यही नहीं, इस मामले में सरकार को भी कोई सूचना नहीं दी गई है. जबकि महाराष्ट्र पुलिस की साइबर सेल ने बैंकों को पत्र लिखा है.

4 महीने से आम आदमी के डेबिट कार्ड के पिन चोरी हो रहे थे, बैंकों को इस बात की जानकारी भी थी, लेकिन वे चुप्पी साधे थे. एक तरह से देखा जाए तो यह साइबर अपराध से बड़ा अपराध हमारे वित्त मंत्रालय रिजर्व बैंक और बैंकिंग प्रबंधन का है.

जबकि बैंकिंग के नियमों और आरबीआई के ड्राफ्ट के अनुसार, खाताधारकों द्वारा धोखाधड़ी की सूचना दिए जाने पर बैंक को 10 कार्य दिवसों के अंदर ग्राहक के खाते से गायब हुआ पैसा वापस करना होता है. इस के लिए ग्राहक को 3 दिन के अंदर धोखाधड़ी की सूचना देनी होगी और उसे यह दिखाना होगा कि उस की तरफ से कोई लेनदेन नहीं किया गया और बिना उस की जानकारी के पैसा गलत तरह से गायब हुआ है.

संकट सिर्फ यही नहीं है कि 32 लाख डेबिट कार्ड साइबर अपराधियों के कब्जे में हैं, बल्कि वीसा, मास्टर कार्ड समेत विदेश से संचालित एटीएम और डिजिटल लेनदेन में वायरस संक्रमण से जमापूंजी भी खतरे में है. भारतीय स्टेट बैंक ने लाखों डेबिट कार्ड बदल दिए हैं. अन्य बैंकों ने सुरक्षित लेनदेन के लिए ग्राहकों को निर्देश जारी कर दिए हैं, लेकिन क्या एटीएम या नेट बैंकिंग से पिन बदल देने से आप की जमापूंजी की सुरक्षा की गारंटी है. क्योंकि पुराना पिन लीक हो सकता है तो नया पिन भी तो लीक हो सकता है.

इंटरनेट औफ थिंग्स और साइबर क्राइम

इंटरनेट नित नई तरक्की कर रहा है, जिस से यह जिंदगी का एक जरूरी अंग बन गया है. इस से न सिर्फ संचार जगत में क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं, बल्कि जीवनशैली ही बदल गई है. शिक्षा, मैडिकल, हेल्थ, मनोरंजन, सभी क्षेत्रों में इंटरनेट अपने कारनामे दिखा रहा है. इंटरनेट औफ थिंग्स के जरिए ऐसे कारनामे करने को तैयार हैं, जिस के बारे में हम सोच भी नहीं सकते. वैसे यह कंप्यूटर आधारित तकनीक रही है, लेकिन स्मार्ट फोन के आने से यह धारणा खत्म हो गई है.

स्मार्ट फोन के आने से इंटरनेट के वे सारे काम अब फोन पर किए जा सकते हैं, जो पहले कंप्यूटर पर किए जाते थे. स्मार्ट फोन से कई मूलभूत बदलाव आए हैं. अब फोन ही नहीं, घर गाड़ी और किचन भी स्मार्ट होंगे. मसलन घर के बाहर रहते हुए भी घर की देखभाल की जा सकेगी. आप घर पहुंचने से पहले ही एसी चला सकते हैं. यानी जो काम पहले हम मैनुअली करते थे, अब वही काम औटो मोड पर होंगे. इस के लिए वहां किसी के मौजूद रहने की जरूरत नहीं होगी और यह सब होगा इंटरनेट औफ थिंग्स के जरिए. लेकिन जिस तरह हर मांबाप को बच्चों की अच्छाईबुराई का डर होता है, उसी तरह फादर आफ इंटरनेट कहे जाने वाले विंट सर्फ भी इंटरनेट औफ थिंग्स (आईओटी) को ले कर थोड़ा डरे हुए हैं. चूंकि आईओटी अप्लायंसेज और साफ्टवेयर से मिल कर बना है, इसलिए साफ्टवेयर को ले कर उन्हें डर है, क्योंकि साफ्टवेयर को हैक किया जा सकता है. यही एक तरह का साइबर अपराध होगा.

साइबर क्राइम आज एक बढ़ती हुई वैश्विक समस्या है. इस में किसी व्यक्ति की निजी जानकारी पता कर के धोखाधड़ी करना, क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड के बारे में पता कर के चूना लगाना, अहम सूचनाओं की चोरी करना, ब्लैकमेलिंग, कौपीराइट और ट्रेडमार्क फ्रौड, पोर्नोग्राफी डिटेल या अन्य एकाउंट हैक करना, वायरस भेज कर धमकी भरे मैसेज भेजना शामिल है.

इस तरह के अपराध कोई अकेले नहीं, बल्कि संगठित गिरोह बना कर किए जाते हैं. पिछले साल साइबर क्राइम से लगभग एक खरब डौलर का चूना लगाया गया है. जबकि इस के शिकार हुए लोगों को पता नहीं कि वे खुद को कैसे सुरक्षित बनाएं. पुलिस के पास भी कोई ऐसी आधारभूत सुविधाएं नहीं हैं कि वह कुछ मदद कर सकें. जबकि दिनोंदिन साइबर अपराध बढ़ता ही जा रहा है.

साइबर आतंकवाद और साइबर युद्ध

साइबर आतंकवाद का मतलब आतंकवादी गतिविधियों में इंटरनेट आधारित हमले यानी कंप्यूटर वायरस जैसे साधनों के माध्यम से कंप्यूटर नेटवर्क में जानबूझ कर बडे़ पैमाने पर किया गया व्यवधान, विशेष रूप से इंटरनेट से जुड़े निजी कंप्यूटर पर. इसी तरह साइबर युद्ध भी इंटरनेट और कंप्यूटर के माध्यम से लड़ा जाता है.

अनेक विकासशील देश लगातार साइबर आतंकवाद या युद्ध चलाते हैं, यही नहीं वे किसी संभावित साइबर हमले के लिए तैयार भी रहते हैं. लगातार तकनीक पर बढ़ती जा रही निर्भरता के कारण अब लगभग सभी देशों को साइबर हमले की चिंता सताने लगी है. ऐसे हमलों में वायरस की मदद से वेबसाइटें ठप कर दी जाती हैं और सरकार एवं उद्योग जगत को पंगु बना दिया जाता है.

साइबर युद्ध में तकनीकी उपकरणों एवं अवसंरचना को भारी नुकसान होता है. कुशल साइबर योद्धा किसी भी देश की विद्युत ग्रिडों में हैकिंग द्वारा घुस कर अत्यधिक गोपनीय सैन्य और अन्य जानकारियां प्राप्त कर सकता है. यही नहीं, हैकर किसी कंपनी के कंप्यूटरों पर वायरस द्वारा कब्जा कर के तमाम डाटा एनक्रिप्ट (कूटरचित) कर देते हैं. बाद में डाटा को वापस काम लायक बनाने यानी डीक्रिप्ट करने के लिए ये कंपनी की हैसियत के हिसाब से फिरौती वसूलते हैं. कंपनियां अपनी साख बचाने के लिए चुपचाप फिरौती दे भी देती हैं.

यह फिरौती हैकर डालर में नहीं, बल्कि बिटकौइन में लेते हैं. बिटकौइन साइबर जगत की पसंदीदा डिजिटल क्रिप्टोकरेंसी है. इंटरनेट पर लेनदेन के लिए पूरी तरह सुरिक्षत, गुप्त और अनामी रूप से रह कर लेनदेन हेतु ही इस करेंसी को डिजाइन किया गया है. इस का कोई भौतिक रूप नहीं है, इसलिए इसे डिजिटल करेंसी कहा जाता है.

इस करेंसी की कीमत मांग और सप्लाई के आधार पर रोज निर्धारित होती है. इस पर किसी का अधिकार नहीं है. एक बार साइबर संसार में आ जाने के बाद जिस के पास जितनी बिटकौइन होती है, वही उस का मालिक होता है. संक्षेप में यह समझ लें कि बिटकाइन के जरिए किया गया इंटरनेटी व्यापार, खरीदबिक्री, भुगतान का किसी को पता नहीं चलता. इसीलिए हैकर बिटकौइन में भुगतान मांगते हैं, ताकि उन तक पहुंचना किसी भी सूरत में संभव न हो. हैकर पूरी दुनिया को अपना शिकार मानते हैं. इसलिए पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय होते हुए भी विविध क्षेत्रों में क्षेत्रीय भाषाओं में बातचीत करते हैं. इस के लिए ये स्वचालित गूगल अनुवादक का उपयोग करते हैं.

दुनिया में बढ़ते साइबर खतरे

इंटरनेट की व्यापकता और आम लोगों तक इस की आसान पहुंच के कारण औनलाइन कारोबार या कामकाज का दायरा दुनिया भर में तेजी से बढ़ा है. लेकिन इस सुगमता के साथ साइबर अपराध में आई नई चुनौती भी लगातार विकराल हो रही है. अन्य अपराधों की तरह साइबर अपराधों में अपराधी अपराध स्थल पर खुद मौजूद नहीं होता.

इस में मुख्य रूप से तकनीक का इस्तेमाल होता है. भारत में जहां ज्यादातर इंटरनेट उपयोगकर्ता नए हैं, उन्हें आसानी से शिकार बनाया जा सकता है. कभी लुभावने विज्ञापनों से तो कभी आकर्षक उपहारों और इनामी योजनाओं के ईमेल या वेबसाइट पर भड़कीले विज्ञापन डाल कर. चूंकि इस्तेमाल करने वाला इन की बारीकियों को ज्यादा नहीं जानता, इसलिए आसानी से शिकार बन जाता है.

छोटीछोटी कंपनियां व्यवसाय बढ़ाने के लिए औनलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं, पर लागत खर्च को कम करने के लिए औनलाइन सुरक्षा पर ध्यान नहीं देतीं. ऐसे में उन के लिए हमेशा खतरा बना रहता है. साइबर अपराध अब सोशल नेटवर्किंग हैकिंग तक ही नहीं रह गया है, इस ने भी अपना बिजनैस बढ़ा लिया है. अब यह बिजनैस सिर्फ बैडरूम और एक सिस्टम तक नहीं रहा, इस का भी दायरा काफी बड़ा है.

सरकारें भी शामिल हैं इस अपराध में

क्योंकि इस अपराध में अब कई देशों की सरकारें, औनलाइन गैंग और बड़े अपराधी शामिल हैं, जिन का साथ दे रहे हैं औनलाइन फोरम. दरअसल, औनलाइन फोरम एक तरह का बाजार है, जहां पर अपराधी चोरी किया हुआ डेटा खरीद या बेच सकते हैं.

भारत के किसी भी शहर से ले कर विदेशों तक साइबर क्राइम करवाने में एक कम्युनिटी मदद कर रही है. बस एक क्लिक में कहीं का भी डेटा आप के पास हाजिर हो जाएगा. इतना ही नहीं, कई ऐसी भी साइट्स हैं, जो ऐसे कामों को अंजाम देने की ट्रेनिंग देती हैं. माना जा रहा है कि देश में चलने वाले काल सेंटर भी भीतरी धोखाधड़ी में लगे हैं. भारत समेत चीन, रूस और ब्राजील जैसे देश इस साइबर अपराध से परेशान हैं.

हालांकि भारत में इस मामले में जागरूकता बढ़ी है और सरकार ने सन 2000 में आईटी एक्ट बनाया और सन 2008 में उसे संशोधित भी किया, लेकिन साइबर अपराध पर इस से कुछ खास फर्क नहीं पड़ा. देश में साइबर अपराध से निपटने के लिए जो आईटी एक्ट बना है, उस में वेबसाइट ब्लौक करने तक का प्रावधान है, लेकिन यह एक्ट देश के अंदर भी पूरी तरह से लागू नहीं हो पा रहा है.

कानूनी प्रावधानों के बावजूद अकसर लोग किसी के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट कर देते हैं. लगातार डेबिट/क्रेडिट कार्डों से धोखाधड़ी हो रही है. नियमानुसार पुलिस आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले से पोस्ट हटाने को कहती है, अगर वह हटा लेता है तो ठीक, नहीं तो उसे 3 साल तक की सजा हो सकती है. कंप्यूटर द्वारा किया गया कोई भी अपराध साइबर क्राइम में आता है. जिस में 7 साल की जेल हो सकती है. लेकिन इंटरनेट से धोखा देने और रकम उड़ाने की खबरें रोज आ रही हैं. क्योंकि यहां डेबिट/क्रेडिट कार्ड की डिटेल्स को हैक करना आसान है.

भारत में साइबर क्राइम से निपटने के लिए कानून तो बने हैं, लेकिन साइबर अपराध से जुड़े कानून ज्यादा कारगर नहीं हैं. क्योंकि एक तो जल्दी लोग शिकायत नहीं करते, अगर करते भी हैं, तो सबूत नहीं दे पाते. फिर कड़ी सजा न होने की वजह से अपराधी डरते भी नहीं हैं. इस की एक वजह यह भी है कि इस में तुरंत जमानत मिल जाती है. इसलिए साइबर अपराध से बचने के लिए खुद ही ऐहतियात बरतें तो ज्यादा ठीक रहेगा.

इस की एक वजह यह भी है कि पुलिस वालों को खुद ही पता नहीं कि जिस अपराध की शिकायत उन से की जा रही है, वह किस धारा के अंतर्गत आता है. इस के अलावा उन के पास साइबर अपराध करने वाले तक पहुंचने का कोई उपाय भी नहीं है. इस के लिए उन्हें दूसरों का ही सहारा लेना पड़ता है.

तरह तरह के साइबर क्राइम

अपराध अपराध होता है. फिर भी हम अपनी सुविधा के लिए उस के तौरतरीकों के आधार पर कुछ नाम दे देते हैं. कुछ प्रमुख साइबर अपराध इस तरह से होते हैं—

  साइबर स्टाकिंग: इंटरनेट या इलेक्ट्रौनिक माध्यम से व्यक्ति अथवा संगठन को विविध तरीकों से परेशान करना.

  परिचय चोरी: इंटरनेट या इलेक्ट्रौनिक माध्यम से दूसरों की व्यक्तिगत जानकारियों की चोरी कर उस का उपयोग अपने लाभ के लिए करना.

  हैकिंग: इंटरनेट या इलेक्ट्रौनिक माध्यम से दूसरों के कंप्यूटर पर अनधिकृत कार्य करना व हैक सिस्टम से जानकारी चुरा कर उन्हें फायदे के लिए बेचना.

बैकिंग चोरी: बैंकों व वित्तीय संस्थाओं के सिस्टम में इंटरनेट या इलेक्ट्रौनिक माध्यम से सेंध लगा कर उन के इलेक्ट्रौनिक फंड ट्रांसफर के सिस्टम के जरिए फंड की हेराफेरी व चोरी करना.

  रैंसमवेयर: इंटरनेट व इलेक्ट्रौनिक माध्यम से कंप्यूटरों के बहुमूल्य डेटा पर कब्जा कर उस के एवज में फिरौती वसूल करना.

डीडीओएस अटैक: किसी औनलाइन इंटरनेट सेवा को अत्यधिक ट्रैफिक बाट से बंबार्डिंग कर उस का प्रचालन बाधित करना.

स्पैम फिशिंग और स्पीयर फिशिंग: साइबर जगत में बहुतायत किए जाने वाले अपराध स्पैम यानी अवांछित ईमेल मैसेज भेजना, फिशिंग यानी ईमेल के जरिए लोगों को लालच दे कर फांसना और स्पीयर फिशिंग यानी लक्षित हमला कर विशिष्ट उद्देश्यों के लिए फांसना.

ड्राइव-बाई-डाउनलोड: मैलवेयर, वायरस युक्त ऐसी साइटें बनाना, जिस में केवल विजिट मात्र से कंप्यूटर पर स्वचालित मैलवेयर डाउनलोड हो जाए और उसे संक्रमित कर दे.

  रिमोट एडमिनिस्ट्रेशन टूल: इंटरनेट या इलेक्ट्रौनिक माध्यम के जरिए दूसरों के कंप्यूटर पर कब्जा जमा कर उस में गैरकानूनी गतिविधियां करना.

डार्क वेब अपराध: डार्कवेब (गुप्त वेबसाइटों) के जरिए ड्रग, आर्म्स व अवैध वस्तुओं की तस्करी व भुगतान आदि की व्यवस्था करना.

  साइबर युद्ध या आतंकवाद: शत्रु देशों के विविध शासकीय उपक्रमों की वेबसाइटों पर प्रत्यक्ष, परोक्ष, गुप्त हमले कर बंद करना, जानकारियां चुराना आदि.

औनलाइन जुआ, चाइल्ड पोनौग्राफी

  कार्डिंग: क्रेडिट/डेबिट कार्डों की जानकारियां चुरा कर उन्हें बेचना.

  ईमेल बौंबिंग: किसी व्यक्ति के ईमेल पर इतना ज्यादा मेल भेजना कि उस का एकाउंट बंद हो जाए.

  डाटा डिडलिंग: इस हमले में कंप्यूटर के कच्चे डाटा को प्रोसेस होने से पहले ही बदल दिया जाता है. जैसे ही पूर्ण होता है, डाटा फिर मूलरूप में आ जाता है.

  सलामी अटैक: इस में गुपचुप तरीके से आर्थिक अपराध को अंजाम दिया जाता है.

लौजिक बम: यह स्वतंत्र प्रोग्राम होता है. इसे इस तरह बनाया जाता है कि यह तभी एक्टिवेट हो, जब कोई विशेष तारीख या घटना आती है.

ट्रोजन हार्स: यह एक अनधिकृत प्रोग्राम है, जो अंदर से ऐसे काम करता है जैसे अधिकृत प्रोग्राम है.

कैसे बचें साइबर अपराध से

कुछ लोगों को जिस तरह शराबसिगरेट का नशा होता है, उसी तरह सोशल साइट भी एक नशा है. लोगों की जिंदगी में सोशल साइट का दखल इस कदर बढ़ चुका है कि इन से दूर रहने पर उन्हें लगता है कि जैसे वे कुछ मिस कर रहे हैं.

कुछ लोग जब तक अपना फेसबुक चैक नहीं कर लेते, उन के फोटो को कितने लाइक मिले हैं, उन के दोस्तों ने क्या कमेंट किए हैं, क्या अपडेट किए हैं, उन्हें चैन नहीं मिलता. फोटो पर लिखे कमेंट ब्यूटीफुल, अमेजिंग, सैक्सी आदि से उत्साहित हो कर कुछ महिलाएं हर दिन अपनी फोटो अपडेट करती रहती हैं.

उन्हें इस बात का इल्म नहीं होता कि कोई उन की फोटो से छेड़छाड़ कर के उन की जिंदगी में तूफान खड़ा कर सकता है. सोशल मीडिया से जुडे़ अपराधों का एक प्रमुख कारण है लोगों द्वारा अपनी निजी जिंदगी के हर पल सोशल साइट्स पर अपडेट करना, जिस की बदौलत अपराधी आसानी से ऐसे लोगों को अपना निशाना बना लेते हैं. फिर भी आज के युग में खुद या बच्चों को साइबर वर्ल्ड से पूरी तरह दूर रखना नामुमकिन है. लेकिन कुछ बातों को ध्यान में रख कर साइबर अपराधियों का निशाना बनने से बचा जा सकता है—

सोशल साइट्स का इस्तेमाल करते समय जरूरी है कि सिक्योरिटी सिस्टम को एक्टिवेट करें, किसी भी अंजान व्यक्ति की फ्रैंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट न करें.

किसी के बेहूदा मैसेज का जवाब न दें. अपने फोटो या पर्सनल डिटेल को रिस्ट्रिक्ट कर दें, ताकि गिनेचुने दोस्तों को छोड़ कर कोई अन्य व्यक्ति उस तक न पहुंच सके.

औनलाइन निजी जानकारी ‘फोन नंबर, बैंक डिटेल आदि’ किसी से शेयर न करें.

उत्तेजक स्क्रीन नाम या ईमेल एड्रेस का इस्तेमाल न करें.

अपना पासवर्ड किसी से शेयर न करें.

किसी अंजान व्यक्ति से औनलाइन फ्लर्ट या बहसबाजी न करें.

एक अच्छे एंटी वायरस प्रोग्राम का इस्तेमाल करें.

अपनी पूरी बातचीत को कंप्यूटर में सेव रखें.

औनलाइन लौटरी जीतने वाले ईमेल का जवाब न दें.

कोई अनजान व्यक्ति इंटरव्यू, नौकरी या कोई गिफ्ट देने के बहाने अगर आप की बैंक डिटेल्स मांगता है तो ऐसे ई-मेल का जवाब न दें.

समयसमय पर पासवर्ड बदलते रहें.

सोशल नेटवर्किंग साइट पर दोस्तों की संख्या सीमित रखें.

सोशल साइट्स पर पर्सनल फोटो अपलोड करने से बचें.

यदि आप के कंप्यूटर में वेबकैम लगा है तो ध्यान रखें कि इस्तेमाल न होने पर उसे अनप्लग कर दें.

भरती घोटाला : इम्तिहान में फेल हुई पुलिस

मार्च के दूसरे सप्ताह की बात है. राजस्थान  पुलिस के स्पैशल औपरेशन ग्रुप यानी एसओजी के आईजी दिनेश एम.एन. को मिली एक सूचना ने उन्हें चिंता में डाल दिया. दरअसल, सूचना ही ऐसी थी कि आईजी साहब का चिंतित होना स्वाभाविक था. उन्हें सूचना मिली कि पुलिस कांस्टेबल भरती की औनलाइन परीक्षा में हाईटेक गिरोह परीक्षा केंद्रों के कंप्यूटर हैक कर दूसरी जगह से अभ्यार्थियों को नकल करा रहा है. भरती की प्रक्रिया के तहत सब से पहले औनलाइन परीक्षा होनी थी. इस के लिए पुलिस मुख्यालय ने परीक्षा कार्यक्रम जारी कर दिया था. यह औनलाइन परीक्षा पहले चरण में 7 मार्च को प्रारंभ हो गई थी जो 45 दिनों तक अलगअलग तारीखों को आयोजित की जानी थी.

परीक्षा के लिए प्रदेश में 10 जिलों जयपुर, जोधपुर, अजमेर, अलवर, बीकानेर, झुंझनूं, कोटा, सीकर, गंगानगर व उदयपुर में 34 विभिन्न इंस्टीट्यूट में केंद्र बनाए गए थे. इन में 19 परीक्षा केंद्र जयपुर में थे.

आईजी दिनेश एम.एन. जानते थे कि बौलीवुड फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस की तर्ज पर देश में होने वाली प्रत्येक बड़ी परीक्षा में आजकल बडे़ पैमाने पर नकल होने लगी है और तो और शिक्षा व कालेजों की परीक्षा में भी बड़े स्तर पर नकल होती है.

सरकारी नौकरियों के लिए भरती और औल इंडिया तथा राज्य स्तर पर होने वाली प्रवेश परीक्षाओं में नकल कराने वाले अनेक गिरोह सक्रिय हो गए हैं. ये गिरोह पैसे ले कर अत्याधुनिक उपकरणों से अभ्यर्थी को दूर बैठ कर नकल कराते हैं.

चिंता की वजह से आईजी ने जांच का काम सौंपा एसओजी को आईजी साहब के सामने चिंता की बात यही थी कि लोग कहेंगे कि पुलिस अपनी ही भरती परीक्षा में फेल हो गई. उन्होंने अपने आला अफसरों को सूचना की जानकारी दी. फिर एसओजी के 5-6 तेजतर्रार अफसरों को बुलाया. इन पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक कर आईजी साहब ने कांस्टेबल भरती परीक्षा में हाईटेक गिरोह की ओर से नकल कराने की सूचना की सच्चाई का पता लगाने को कहा.

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एसओजी के अफसर अपने तरीके से जांचपड़ताल में जुट गए. प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आ गई कि सूचना सही है. इतना पता लगने पर पुलिस अधिकारी गिरोह के सदस्यों की तलाश और उस की कार्यप्रणाली का पता लगाने में जुट गए.

सभी जरूरी जानकारियां और सबूत जुटाने के बाद 12 मार्च, 2018 को एसओजी ने जयपुर के मालवीय नगर स्थित सरस्वती इंफोटैक सेंटर पर छापा मारा. पुलिस ने यहां से 5 लोगों और इंफोटैक सेंटर के एक पार्टनर को हिरासत में ले लिया.

ये लोग दिल्ली, हरियाणा व महाराष्ट्र के रहने वाले थे. पता चला कि ये अभ्यर्थियों के कंप्यूटर हैक कर पेपर हल करते थे. सरस्वती इंफोटैक पुलिस कांस्टेबल भरती परीक्षा का एक औनलाइन परीक्षा केंद्र था. इस केंद्र पर एक पारी में 300 अभ्यर्थियों के बैठने की व्यवस्था थी. इन के लिए 300 कंप्यूटर लगाए गए थे. इन से पूछताछ के आधार पर एसओजी ने दूसरे ही दिन एक परीक्षार्थी और दिल्ली निवासी एक दलाल को गिरफ्तार कर लिया. एसओजी इस मामले में गिरोह के अन्य सदस्यों को पकड़ने और नकल से पेपर देने वाले अभ्यथियों की तलाश में जुटी हुई थी. गिरफ्तार किए गए अभियुक्तों को पुलिस ने रिमांड पर ले रखा था.

उन से की गई पूछताछ में 13 मार्च को पता चला कि जयपुर के ही हरमाड़ा स्थित डौल्फिन किड्स इंटरनैशनल स्कूल में गिरोह ने कंप्यूटर सिस्टम को रिमोट एक्सेस के जरिए हैक कर जयपुर से 300 किलोमीटर दूर हरियाणा के भिवानी शहर में औपरेट कर के पुलिस कांस्टेबल भरती के पेपर हल कर दिए थे. डौल्फिन किड्स इंटरनैशनल स्कूल में प्रत्येक पारी में 200 अभ्यर्थी परीक्षा दे रहे थे.

यह जानकारी मिलने पर एसओजी की टीम ने उसी रात दबिश दे कर इस स्कूल के संचालक सहित 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. ये चारों राजस्थान के रहने वाले थे. जयपुर से एसओजी की एक टीम हरियाणा के भिवानी शहर भेजी गई. लेकिन पुलिस के पहुंचने से पहले आरोपी फरार हो गए.

पुलिस को 2 परीक्षा केंद्रों पर नकल कराए जाने की पुष्टि हो चुकी थी. पुलिस कांस्टेबल भरती परीक्षा आयोजित कराने का ठेका एप्टेक कंपनी ने लिया था. डीजीपी ओ.पी. गल्होत्रा ने 14 मार्च को पुलिस अधिकारियों और परीक्षा आयोजित करने का ठेका लेने वाली एप्टेक कंपनी के अधिकारियों की बैठक बुलाई.

कोई एक गिरोह नहीं लगा था नकल कराने में, कुछ अंदर वाले थे कुछ बाहर वाले  इस में उन 10 जिलों के एसपी शामिल हुए, जहां परीक्षा हो रही थी. बैठक में डीजीपी ने सभी अधिकारियों को परीक्षा केंद्र अपनी निगरानी में लेने और अभ्यर्थियों पर नजर रखने के निर्देश दिए. बैठक में परीक्षा रद्द करने पर भी विचार किया गया. इस पर तय किया गया कि एसओजी की जांच के बाद ही परीक्षा के बारे में आगे का फैसला लिया जाएगा.

एसओजी को जांचपड़ताल में नकल कराने वाले दूसरे गिरोह के सक्रिय होने और अंगूठे के निशान की क्लोनिंग करने की भी चौंकाने वाली नई जानकारी मिली. एसओजी की टीम ने 15 मार्च को जयपुर में डौल्फिन किड्स इंरटनैशनल स्कूल में ही थंबप्रिंट क्लोन के जरिए असली परीक्षार्थी की जगह परीक्षा दे रहे नकली परीक्षार्थी को पकड़ा.

वह सरकारी कर्मचारी ग्रामसेवक निकला. उस की निशानदेही पर परीक्षा केंद्र के बाहर से हरियाणा निवासी असली परीक्षार्थी और भरतपुर निवासी एक दलाल को गिरफ्तार कर लिया.

उसी दिन एसओजी ने सरस्वती इंफोटैक के हरियाणा निवासी फरार संचालक को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के अलावा 15 मार्च को ही अलवर के अजरका निवासी एक परीक्षार्थी को गिरफ्तार किया गया. उस ने 10 मार्च को जयपुर के डौल्फिन किड्स इंटरनैशनल स्कूल में परीक्षा दी थी. नकल कराने वाले गिरोह से सौदा करने के बाद परीक्षा के दौरान वह अपनी सीट पर डमी की तरह बैठा रहा था. उस का कंप्यूटर हैक कर हरियाणा के भिवानी से पेपर हल किया गया था.

उसी दिन अजमेर में भी कांस्टेबल भरती में नकल का मामला सामने आया. पुलिस ने कायड़ रोड घूघरा स्थित टैक्निकल संस्थान अजमेर इंफोटैक के 2 संचालकों और एक अभ्यर्थी सहित 8 लोगों को धोखाधड़ी और आईटी एक्ट में गिरफ्तार किया. यह गिरोह एएमएमवाईवाई एडमिन सौफ्टवेयर टूल से कंप्यूटर सिस्टम हैक कर लेता था. फिर एक्सपर्ट से पेपर हल करवाया जाता था.

16 मार्च को एसओजी ने थंबप्रिंट का क्लोन बनाने वाले गिरोह के भरतपुर निवासी मास्टरमाइंड और उस के जीजा को भी गिरफ्तार कर लिया. इन के अलावा सरस्वती इंफोटैक नकल गिरोह मामले में हरियाणा के 2 लेगों को गिरफ्तार किया.

कांस्टेबल भरती परीक्षा में हाईटेक नकल करने के रोजाना एक से बढ़ कर एक चौंकाने वाले तरीके सामने आने से परीक्षा की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठने लगे थे. इस के विरोध में 17 मार्च को जयपुर कैलगिरि रोड पर सैकड़ों अभ्यर्थियों ने जाम लगा दिया.

इन अभ्यर्थियों ने परीक्षा में नकल करने और कराने वालों पर सख्त काररवाई करने और परीक्षा की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की. इस के अलावा यह परीक्षा औफलाइन कराने की मांग भी की गई.

नकल के नएनए पैंतरे सामने आने पर दूसरे चरण की परीक्षाएं स्थगित करने की घोषणा कर दी गई. डीजीपी का कहना है कि 5390 पदों के लिए राज्य के बजट में की गई घोषणा के अनुसार, 15 हजार 291 पदों पर कांस्टेबलों की भरती भी इसी के साथ कराई जाएगी. इस तरह अब 20 हजार से ज्यादा कांस्टेबलों की भरती होगी. यह भरती परीक्षा नए सिरे से औफलाइन कराई जाएगी.

20 से 31 मार्च तक दूसरे चरण की होने वाली परीक्षा में करीब 3 लाख अभ्यर्थियों को भाग लेना था, जबकि इतने ही अभ्यर्थी पहले चरण की परीक्षा दे चुके थे.

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एसओजी ने नकल के मामले में 17 मार्च को डाक्टर व इंजीनियर सहित 5 अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया. ये लोग बिहार, हरियाणा व राजस्थान के रहने वाले थे.

6 दिन में 4-5 अलगअलग गिरोह के सामने आने और करीब 3 दरजन बदमाशों की गिरफ्तारी के बाद आखिर 20 मार्च को नकल कराने वाले गिरोह के गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ की गई. उस के बाद जो कहानियां सामने आई हैं, वह इस प्रकार हैं—

एसओजी ने 12 मार्च को सरस्वती इंफोटैक सेंटर से गिरफ्तार किए गए 6 लोगों, रोहतक के रहने वाले और सरस्वती इंफोटेक के पार्टनर विकास मलिक, नासिक के रहने वाले अमोल महाजन, बहादुरगढ़ के रहने वाले अभिमन्यु सिंह और संजय छिंकारा, सोनीपत के अंकित शेरावत और दिल्ली के अमित जाट से पूछताछ की तो पता चला कि गिरोह के लोगों ने 5 मार्च को ही परीक्षा केंद्र से करीब 500 मीटर दूर एक बिल्डिंग किराए पर ले कर वहां समानांतर सेंटर खोल लिया था.

इस समानांतर सेंटर से पेपर हल कर सबमिट किए जा रहे थे. इस गिरोह ने 8 मार्च को 6 और 10 मार्च को 3 अभ्यर्थियों के पेपर हल कर के सबमिट करने की बात बताई. छापे के दौरान सरस्वती इंफोटैक के 2 पार्टनर मुख्तियार और कपिल फरार हो गए थे. गिरफ्तार किए गए आरोपियों में अभिमन्यु सिंह और संजय छिंकारा आईटी एक्सपर्ट हैं. इन दोनों को इंफोटैक के पार्टनर ने 10-10 हजार रुपए प्रतिदिन के हिसाब से हायर किया था.

पता चला कि इस गिरोह का मास्टरमाइंड विकास मलिक राजस्थान पुलिस कांस्टेबल की भरती निकलने के साथ ही सक्रिय हो गया था. उस ने अपना गिरोह बना कर नकल कराने का तानाबाना बुनना शुरू कर दिया था. इस के लिए सब से पहले उस ने सरस्वती इंफोटैक में पार्टनरशिप की.

फिर उस ने जुगाड़बाजी से पास होने की इच्छा रखने वाले अभ्यर्थी तलाशने शुरू कर दिए. थोड़ी कोशिश के बाद उसे कई अभ्यर्थी मिल गए. इस के बाद उस ने परीक्षा केंद्र के पास किराए पर बिल्डिंग ली और 2 एक्सपर्ट अभिमन्यु और संजय छिंकारा को हायर किया.

राजस्थान पुलिस मुख्यालय ने कांस्टेबल भरती परीक्षा आयोजित करने की जिम्मेदारी दिल्ली की एप्टेक कंपनी को सौंपी थी. इस कंपनी ने भरती परीक्षा के सेंटर संचालकों से ही कंप्यूटर आदि संसाधन उपलब्ध कराने को कहा.

विकास मलिक ने इस का फायदा उठाया और हायर किए गए 2 आईटी एक्सपर्ट अभिमन्यु सिंह तथा संजय छिंकारा को अपना कर्मचारी बता कर सिस्टम में घुसपैठ करा दी. विकास ने इंफोटैक की बिल्डिंग पर वायरलैस एंटीना लगा दिया. परीक्षा केंद्र में लगे कंप्यूटर सर्वर को वायरिंग से जोड़ कर एंटीना से कनेक्ट कर दिया था.

टेक्नोलौजी के इस्तेमाल से रची गई नकल कराने की साजिश गिरोह ने परीक्षा सेंटर के पास किराए पर ली दूसरी बिल्डिंग की छत पर राउटर और अन्य उपकरण लगा दिए. इसी बिल्डिंग के एक कमरे में लैपटाप और अन्य उपकरणों के साथ प्रश्नपत्र हल करने वाले एक्सपर्ट किताबों  के साथ बैठा दिए. जिस अभ्यर्थी से गिरोह का सौदा हुआ था, उस के कंप्यूटर में पहले ही पैन ड्राइव से सौफ्टवेयर इंस्टाल कर दिया गया था.

इस के बाद आरोपी फोन पर अभ्यर्थी के कंप्यूटर का आईपी एड्रेस नकल कराने वाले कंट्रोलरूम में बैठे अपने साथियों को बता देते थे. कंट्रोलरूम में बैठे गिरोह के लोग अभ्यर्थी का कंप्यूटर रिमोट एक्सेस पर ले लेते थे. यानी उस का कंप्यूटर दूर बैठ कर भी अपने कब्जे में ले लेते थे.

रिमोट एक्सेस लेने के बाद अभ्यर्थी तो सेंटर पर बैठा हुआ केवल माउस हिलाता रहता था और दूसरी बिल्डिंग में बैठे गिरोह के एक्सपर्ट किताबें पढ़ कर पेपर हल कर वहीं से सबमिट भी कर देते थे.

पूछताछ में पता चला कि गिरोह ने नकल कराने के एवज में प्रत्येक अभ्यर्थी से 5 से 7 लाख रुपए तक का सौदा किया था. एसओजी ने गिरोह के कंट्रोलरूम में लैपटौप, राउटर, किताबें वगैरह जब्त कीं.

हाईटेक नकल के इस मामले में एसओजी ने दूसरे दिन एक परीक्षार्थी नागौर के डेगाना निवासी रामदेव खींचड़ और दिल्ली के दलाल राजीव डबास को गिरफ्तार किया. इन में रामदेव खींचड़ ने एसओजी अधिकारियों को बताया कि वह नागौर में एक कोचिंग क्लासेज में कोचिंग करता था. कोचिंग संचालक ने उसे गारंटी से कांस्टेबल परीक्षा पास कराने का वादा कर एक लाख रुपए एडवांस लिए थे.

बाकी रकम लिखित परीक्षा पास होने पर कोचिंग संचालक को दी जानी थी. इस कोचिंग क्लासेज से 60 अभ्यर्थियों ने कांस्टेबल भरती परीक्षा की तैयारी की थी. दलाल राजीव डबास नकल के लिए अभ्यर्थी तलाशता था. सरस्वती इंफोटैक के फरार 2 संचालक कपिल और मुख्तियार नकल कराने के लिए कोचिंग संचालकों से संपर्क करते थे.

एसओजी इस मामले में गिरोह के अन्य सदस्यों को पकड़ने और नकल से पेपर देने वाले अभ्यर्थियों की तलाश में जुटी हुई थी. एसओजी टीम ने उसी रात दबिश दे कर डौल्फिन किड्स इंटरनेशनल स्कूल के संचालक नागौर निवासी रामनिवास के अलावा जयपुर के चौमूं निवासी मुकेश कुमार जयपुर के ही आमेर निवासी रामरतन शर्मा और राजू उर्फ राजेंद्र जाट को गिरफ्तार कर लिया.

इन में स्कूल संचालक रामनिवास का एक आईटीआई कालेज होने का भी पता चला, जयपुर से एसओजी की एक टीम हरियाणा के भिवानी शहर भेजी गई. लेकिन वहां बैठे आरोपी प्रमोद फोगट और उस के साथी पहले ही फरार हो गए. गिरफ्तार हुए संजय छिकारा का मौसेरा भाई है. प्रमोद फोगट का डौल्फिन किड्स इंटरनैशनल स्कूल संचालक रामनिवास से संपर्क था. प्रमोद ने रामनिवास को एक अभ्यर्थी से 5 लाख रुपए तक मिलने का आश्वासन दे कर नकल कराने के लिए तैयार किया था.

रामनिवास ने कंप्यूटर हैक कर पेपर हल करने के लिए स्कूल के पास जो किराए की बिल्डिंग ली थी. प्रमोद ने स्कूल के परीक्षा केंद्र में लगे कंप्यूटरों को उस बिल्डिंग में लगे इंटरनेट से जोड़ दिया. फिर इंटरनेट के जरिए ही भिवानी में कंप्यूटर से हैकिंग सौफ्वेयर के जरिए सेंटर के कंप्यूटर को हैक कर लिया था.

इन में स्कूल संचालक रामनिवास ने खुद नकल करने वाले अभ्यर्थियों से सौदा किया और फिर हरियाणा के विकास मलिक के गिरोह से मिल गया. मुकेश कुमार परीक्षा का पर्यवेक्षक था. परीक्षा की पूरी मानिटरिंग की जिम्मेदारी उसी की थी. लेकिन वह भी नकल गिरोह से मिल गया. रामरतन शर्मा आईटी का एक्सपर्ट है. यह कंप्यूटर को रिमोट एक्सेस पर लेने के लिए डार्क कौंबैट सौफ्टवेयर डाउनलोड करता था. राजू उर्फ राजेंद्र स्कूल में टेक्नीशियन था.

गिरोह ने इस परीक्षा शुरू होने से पहले 7 मार्च को स्कूल के कक्ष के 100 कंप्यूटर पास वाले कमरे के कंप्यूटरों से ही जोड़ दिए. सभी कंप्यूटरों को ट्रांसमीटर लगा कर वाईफाई से जोड़ा गया ताकि इंटरनेट से भिवानी में हैक किए जा सकें. कंप्यूटर में डार्क कौंबैट सौफ्टवेयर डाउनलोड कर एक्सेस किया गया. छापा पड़ने का पता चलने पर रामनिवास ने रामरतन के साथ मिल कर स्कूल के कंप्यूटरों में डाउनलोड सौफ्टवेयर डिलीट कर सिस्टम फार्मेट कर दिए.

पहली बार सामने आया थंबप्रिंट क्लोन का मामला

इस बीच, एसओजी को मुन्ना भाइयों द्वारा अंगूठे के निशान की क्लोनिंग करने की चौंकाने वाली जानकारी मिली. इस पर 15 मार्च को डौल्फिन किड्स इंटरनैशनल स्कूल में ही थंबप्रिंट क्लोन के जरिए असली परीक्षार्थी की जगह परीक्षा दे रहे भरतपुर के एक ग्रामसेवक नरेश कुमार प्रजापति को गिरफ्तार किया गया.

उस की निशानदेही पर एसओजी ने परीक्षा केंद्र के बाहर से असली परीक्षार्थी हरियाणा के पलवल निवासी देवेंद्र कुमार और भरतपुर जिले में डीग निवासी दलाल नरेश जाट को भी गिरफ्तार कर लिया. इस गिरोह का मुख्य आरोपी डीग के पास अउ दरवाजा का रहने वाला जितेंद्र सिंह सिनसिनवार उस दिन एसओजी की गिरफ्त में नहीं आ सका.

गिरफ्तार दलाल नरेश जाट ने एसओजी को बताया कि उस ने थंबप्रिंट क्लोन के जरिए अलवर में भी आधा दर्जन अभ्यर्थियों की जगह दूसरे लोगों को परीक्षा देने के लिए भेजा था, लेकिन पुलिस के पहुंचने के कारण फरजी परीक्षार्थी केंद्र पर नहीं पहुंचे.

नरेश ने हरियाणा निवासी परीक्षार्थी देवेंद्र से ढाई लाख रुपए में परीक्षा में पास कराने का सौदा किया था. इस के लिए 1 लाख रुपए एडवांस लिए थे. इस के बाद नरेश ने भरतपुर जिले के ग्रामसेवक नरेश प्रजापति को देवेंद्र की जगह परीक्षा देने के लिए तैयार किया और उसे जयपुर में परीक्षा देने भेज दिया. ग्रामसेवक नरेश प्रजापति ने उस दिन मेडिकल अवकाश लिया था.

पूछताछ में पता चला कि फरार जितेंद्र सिनसिनवार सहित इन आरोपियों ने थंबप्रिंट का क्लोन बनाने का तरीका यूट्यूब से सीखा था. इस के लिए सब से पहले ये लोग गर्म मोम को किसी सतह पर डालते थे. फिर अभ्यर्थी के अंगूठे पर मछली का तेल लगा कर मोम पर उस का थंब इंप्रेशन लेते थे. इंप्रेशन आने पर मोम की परत पर फेविकोल की हलकी परत बिछाते.

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इस से इंप्रेशन फिक्स हो जाता था और इस तरह थंबप्रिंट का क्लोन बन जाता था. थंबप्रिंट का क्लोन बनाने के बाद आरोपियों ने परीक्षा से पहले टेस्टिंग के लिए आधार कार्ड वेरिफाई करवाया था. इस के लिए उन्होंने अभ्यर्थी का थंबप्रिंट क्लोन दूसरे व्यक्ति के अंगूठे पर लगा कर आधार कार्ड का पंजीयन कराया. इस थंबप्रिंट क्लोन को बायोमेट्रिक मशीन भी नहीं पकड़ पाती है.

आरोपियों ने इसी तरीके से देवेंद्र के अंगूठे का क्लोन बना कर ग्रामसेवक नरेश प्रजापति को दिया. नरेश प्रजापति अपने अंगूठे पर देवेंद्र के अंगूठे का  क्लोन चिपका कर परीक्षा देने गया था.

इसी दिन एसओजी ने सरस्वती इंफोटैक के एक फरार संचालक मुख्तियार को भी गिरफ्तार कर लिया. वह हरियाणा के गुनाहा क्षेत्र का रहने वाला है. वह पहले दिल्ली में औनलाइन परीक्षा करवाता था. बाद में उस ने जयपुर आ कर सरस्वती इंफोटैक में पार्टनरशिप कर ली थी.

पुलिस की जांच में पता चला कि अजमेर इंफोटैक का मालिक विकास जाट और हनुमान भाकर सेंटर में लगे कंप्यूटरों में आईटी एक्सपर्ट इंतजार अली और मोहम्मद जकी के जरिए प्रोक्सी आईडी बना कर उस कंप्यूटर सिस्टम का आईपी एड्रेस बाहर बैठे साथियों को मुहैया कराते थे.

सेंटर से बाहर बैठे लोग अपने सिस्टम पर पेपर को लौगइन कर एक्सपर्ट से हल कराते थे. गिरफ्तार आरोपी रणजीत, सुरेश व जितेंद्र गोदारा नकल के इच्छुक अभ्यर्थियों को तलाशते थे. इस गिरोह ने नकल कराने के लिए अभ्यर्थियों से 4-4 लाख रुपए लिए थे.

जीजासाले का कमाल

थंबप्रिंट का क्लोन बनाने वाले गिरोह के मास्टरमाइंड जितेंद्र सिंह सिनसिनवार और उस के जीजा शिशुपाल जाट को एसओजी ने 16 मार्च को गिरफ्तार कर लिया. इन से पूछताछ में पता चला कि जितेंद्र सिंह सिनसिनवार 3 बार कांस्टेबल भरती परीक्षा में पास हो चुका था, लेकिन एक आपराधिक मामले में चालानशुदा होने के कारण सिपाही नहीं बन सका. इस के बाद उस ने थंबप्रिंट क्लोन बना कर फरजी अभ्यर्थी को भरती परीक्षाओं में बैठा कर मोटी रकम लेने का धंधा शुरू कर दिया.

जितेंद्र की कुछ विषयों पर अच्छी पकड़ थी. इसीलिए वह अपने जीजा शिशुपाल का भी थंबप्रिंट बना कर उस के नाम से परीक्षा दे चुका था.

जितेंद्र अपने जीजा के साथ अभी जयपुर में मालवीय नगर में किराए पर रह कर कांस्टेबल की परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों से संपर्क कर उन के थंबप्रिंट क्लोन बना कर फरजी परीक्षार्थी से परीक्षा दिलवाते थे. जितेंद्र इस से पहले एसएससी और पोस्टमैन भरती परीक्षा में भी इसी तरह थंबप्रिंट क्लोन बना कर दूसरे परीक्षार्थियों की जगह परीक्षा दे चुका है.

एसओजी ने सरस्वती इंफोटैक नकल गिरोह मामले में हरियाणा के भिवानी निवासी संदीप कुमार और झज्जर निवासी सज्जन सिंह को भी 16 मार्च को गिरफ्तार कर लिया.

एसओजी ने इस मामले में 17 मार्च को डाक्टर व इंजीनियर सहित 5 अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया. इन में बीटेक उत्तीर्ण बिहार के पटना निवासी अतुल वत्स, भागलपुर निवासी बैंक परीक्षा की तैयारी में जुटा संदीप जाट, हरियाणा के हिसार का रहने वाला एमबीबीएस में अध्ययनरत योगेश यादव, नागौर के चितावा का रहने वाला अभ्यर्थी हीरालाल जाट और हरियाणा का सोनीपत निवासी सरस्वती इंफोटैक का कर्मचारी रविकिरण जाट शामिल थे.

इन्होंने कांस्टेबल भरती के पहले चरण की परीक्षा में कई अभ्यर्थियों के पेपर हल किए थे. इन में अतुल वत्स ने पटना एनआईटी से बीटेक किया है. वह दिल्ली में इसी तरह कंप्यूटर हैकिंग कर नीट प्रीपीजी परीक्षा में भी नकल करते पकड़ा जा चुका है. योगेश यादव रोहतक कालेज से एमबीबीएस अंतिम वर्ष का छात्र है.

इतने सारे मुन्नाभाई पकड़े जाने पर आखिर 20 मार्च, 2018 को पुलिस मुख्यालय ने कांस्टेबल भरती की औनलाइन परीक्षा रद्द कर दी. अब 20 हजार से ज्यादा कांस्टेबल पदों के लिए नई भरती औफलाइन तरीके से होगी. राजस्थान पुलिस के लिए पद बढ़ जाने की वजह से अब एक बार फिर आवेदन लिए जाएंगे. इस बार करीब 25 लाख तक आवेदन आने की उम्मीद है.

तलाश है फरार अपराधियों की

पुलिस अफसर इस बार भरती प्रक्रिया को पूरी तरह बदलना चाहते हैं ताकि फिर नकल की स्थिति सामने न आए. इस के लिए आईजी का नया पद सृजित कर आईजी प्रशाखा माथुर को पुलिस भरती की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

कांस्टेबल भरती परीक्षा के लिए जिस कंपनी एप्टेक को जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उस की भूमिका की भी जांच की जा रही है. इस संबंध में कंपनी के अधिकारियों से भी पूछताछ की गई है. पुलिस इस कंपनी को परीक्षा के लिए दी गई एडवांस राशि भी वापस वसूल करेगी.

परीक्षा के लिए करीब 16 लाख अभ्यर्थियों से फीस के रूप में पुलिस को 60 करोड़ रुपए से ज्यादा मिले थे. टेंडर की शर्तों के मुताबिक एप्टेक कंपनी को 220 रुपए प्रति अभ्यर्थी यानी करीब 30 करोड़ रुपए का भुगतान पुलिस मुख्यालय को करना था. इस में करीब 3 करोड़ रुपए से ज्यादा की एडवांस राशि कंपनी को दे दी गई थी. कंपनी ने 140 रुपए प्रति अभ्यर्थी के हिसाब से 34 सेंटरों को 15 फीसदी एडवांस राशि दे दी थी.

कांस्टेबल भरती परीक्षा में नकल के मामले में फरार आरोपियों को राजस्थान पुलिस और एसओजी तलाश कर रही है. साथ ही उन अभ्यर्थियों को भी चिन्हित किया गया है जिन्होंने परीक्षा में नकल की थी.

सरकारी नौकरियों की भरती एजेंसियां और पुलिस भले ही कितने ही व्यापक प्रबंध कर लें, लेकिन आमतौर पर हरेक दूसरी बड़ी परीक्षा में कोई ना कोई नकल माफिया अपने मंसूबों में कामयाब हो ही जाते हैं.

दिल्ली के यूसुफ सराय मार्केट और टैगोर नगर सहित कई अन्य जगहों पर नकल के लिए 7 हजार से ले कर 25 हजार रुपए तक में कई तरह की डिवाइस मिल जाती हैं. इन में जैमर प्रूफ बनियान, कान में लगाए जाने वाले माइक्रो ईयरफोन और शर्ट की कौलर में लगने वाली डिवाइस आदि उपकरण शामिल हैं.

माफिया ब्लूटूथ से भी अभ्यर्थियों को नकल कराता है. कंप्यूटर हैक कर रिमोट एक्सेस पर लेने और बायोमेट्रिक को धोखा देने वाले थंबप्रिंट का क्लोन बनाने के मामले पहली बार सामने आए हैं. नकल माफिया के ये मुन्नाभाई जब तक रहेंगे, तब तक परीक्षाओं पर आंच आती ही रहेगी.

VIDEO : ट्रांइगुलर स्ट्रिप्स नेल आर्ट

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इस एक्ट्रेस का लिपलौक वीडियो हुआ वायरल

विक्रम भट्ट जल्द ही अपनी वेब सीरीज माया का दूसरा पार्ट लेकर आ रहे हैं. हाल ही में इसका एक प्रमोशनल गाना रिलीज किया गया है. बता दें कि इस सीरीज में कुमकुम भाग्य में तनुश्री की भूमिका निभाने वालीं लीना जुमानी अहम रोल में नजर आएंगी. वे इसमें अभिनेत्री प्रियल गौर के अपोजिट दिखाई देंगी.

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जानकारी के अनुसार, इस वेब सीरीज में दोनों अभिनेत्री लेस्ब‍ियन की भूमिका निभा रही हैं. प्रियल और लीना सिम्मी और रूही के किरदार में नजर आएंगी. प्रियल ने जो वीडियो शेयर किया उसमें ये लीड अभिनेत्रियां एक-दूसरे को किस करते हुए नजर आ रही हैं. इस वीडियो को कुछ ही घंटो में एक लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है. ये वीडियो काफी वायरल हो रहा है.

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प्रियल ने वीडियों शेयर कर लिखा, ‘आधुनिक विश्व में भी हमारे और एलजीबीटी समुदाय के बीच का अंतर खत्म नहीं हुआ है. हम अभी भी कभी-कभी उनके आसपास अजीब महसूस करते हैं, लेकिन आप किसी को पूरी तरह समझें तो अजीब महसूस नहीं कर सकते हैं. मैंने अपकमिंग वेब सीरीज माया 2 की शूटिंग के दौरान अपने किरदार का हर एक लम्हा एंज्वाय किया है.

Life never ceases to amaze me ♥️ #Maaya2 . . Pc : @mohit.sethi777

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बता दें कि विक्रम भट्ट की ‘माया’ अबतक की सबसे बोल्ड सीरीज है. इस सीरीज को पहला पार्ट काफी हिट हुआ था. अब इस सीरीज का पार्ट 2 के वीडियो को देखकर कहा जाए कि यह फिर से उतना ही सफल साबित होगा. ये सीरीज 30 मई को रिलीज होगी. पहली सीरीज में शमां सिकंदर लीड रोल में थी.

अधूरे रह गए अरमान

6 जनवरी, 2018 को मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के बेरछा थाने के थानाप्रभारी उदय सिंह अपने औफिस में बैठे थे. तभी मालीखेड़ी की आदर्श कालोनी का रहने वाला मुकेश नाम का युवक उन के पास आया. उस ने बताया कि उस के छोटे भाई रमेश का 10 महीने का बेटा अनमोल घर से अचानक गायब हो गया है.

उस ने कहा कि शाम 6 बजे तक अनमोल घर पर ही था. उस की मां शीला खाना बना रही थी. खाना बनाने के बाद जब वह बच्चे को दूध पिलाने के लिए आई तो वह बिस्तर से गायब मिला. घर में जितने भी लोग थे, सभी से पूछा पर बच्चे का पता नहीं चला.

मुकेश की बात सुन कर थानाप्रभारी भी चौंक गए कि 10 महीने का बच्चा घर वालों के बीच से आखिर कैसे गायब हो गया. वह अपने आप तो कहीं जा नहीं सकता था और घर में कोई बाहरी व्यक्ति आया नहीं तो वह कहां चला गया.

बहरहाल, उन्होंने मुकेश की तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज कर सूचना आला अधिकारियों को दे दी.

एसपी शैलेंद्र सिंह चौहान ने अपहरण के इस केस को सुलझाने के लिए रात में ही एसडीपीओ रवि सिंह अंब की अध्यक्षता में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी उदय सिंह, आरक्षक विनोद शर्मा, महेश यादव, अनिल मंडलोई, विक्रम धनवाल, निलेख क्षोत्रिय, सोहन पटेल, महिला आरक्षक मंजू कुमारी, साइबर सेल के भूपेंद्र सिंह आदि को शामिल किया गया. टीम के निर्देशन की जिम्मेदारी एडीशनल एसपी ज्योति ठाकुर को दी गई. यह टीम रात में ही अनमोल की खोज में जुट गई.

एसडीपीओ रवि सिंह अंब ने जब परिवार वालों से विस्तार से बात की तो मुकेश ने बताया कि शाम के लगभग 6 बजे अनमोल झूले में सो रहा था. 3 दिन पहले उस की बहन का बेटा राकेश सिंह देवास से उन के घर आया हुआ है. वह अनमोल को झूले से उठा कर ऊपर गैलरी में ले गया. गैलरी में मेरा छोटा भाई राकेश भी था. भांजा और भाई दोनों अनमोल को काफी देर तक खेलाते रहे.

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इस के बाद भांजा राकेश सिंह यह कहते हुए अनमोल को ले कर नीचे आ गया कि ऊपर बहुत ठंड बढ़ गई है, इसे नीचे मामी को दे कर आता हूं. फिर वह अनमोल को ले कर नीचे आया. इस के कुछ देर बाद दूध पिलाने के लिए जब अनमोल की मां शीला कमरे में आई तो अनमोल वहां नहीं मिला.

जाहिर है कि आखिरी बार अनमोल मुकेश के भांजे राकेश सिंह की गोद में था, इसलिए पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि छत से नीचे आने के बाद उस ने अनमोल को झूले में सुला दिया था. अनमोल को सुलाने के बाद वह वापस गैलरी में चला गया था.

राकेश सिंह की यह बात एसडीपीओ रवि सिंह अंब के गले नहीं उतरी. दूसरे सब से बड़ी बात यह थी कि राकेश सिंह जब अनमोल को गैलरी से लाया था, तब अनमोल जाग रहा था. उसे झूले में सुलाते हुए घर के किसी सदस्य ने नहीं देखा था.

अगर मान भी लिया जाए कि उस ने ऐसा किया था तो गौर करने वाली बात यह थी कि 10 महीने का अनमोल खुद तो झूले से नीचे उतर नहीं सकता था. दूसरे झूला घर के अंदर ऐसी जगह पर था, जहां आ कर कोई बाहरी इंसान आसानी से उसे ले कर घर से बाहर नहीं जा सकता.

एसडीपीओ आर.एस. अंब ने राकेश सिंह का मोबाइल फोन चैक किया तो पता चला कि उस ने अपनी सारी काल हिस्ट्री डिलीट कर दी थी. इस से राकेश सिंह पूरी तरह से पुलिस के शक के घेरे में आ गया. एसडीपीओ रवि सिंह अंब ने एडीशनल एसपी ज्योति ठाकुर को यह सारी बात बताई तो उन्होंने राकेश सिंह की काल डिटेल्स निकलवाने के अलावा उस से सख्ती से पूछताछ करने को कहा.

पुलिस टीम राकेश सिंह को थाने ले आई. जब राकेश सिंह से गंभीरता से पूछताछ की तो वह ज्यादा देर तक नहीं टिक सका. उस ने अनमोल के अपहरण की बात स्वीकार करते हुए बता दिया कि इस समय अनमोल देवास में अमृता शर्मा के पास है. अमृता उस के साथ ही काम करती है.

एसडीपीओ रवि सिंह अंब के निर्देश पर थानाप्रभारी उदय सिंह के नेतृत्व में पुलिस देवास के लिए निकल गई. टीम ने राकेश सिंह को भी अपने साथ ले लिया था.

अमृता शर्मा घर पर ही मिल गई. उस की निशानदेही पर पुलिस ने 10 महीने के अनमोल को सुरक्षित बरामद कर लिया. पुलिस ने अमृता के पति गगन शर्मा को भी हिरासत में ले लिया. बेरछा थाने ले जा कर जब उन सब से विस्तार से पूछताछ की गई तो अनमोल के अपहरण की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार थी—

मालीखेड़ी निवासी मुकेश कारपेंटर के परिवार की गिनती क्षेत्र के अच्छे परिवारों में होती थी. मुकेश अपने छोटे भाई राकेश के साथ रहता था. संयुक्त परिवार में दोनों ही खुश थे. मुकेश की बहन का एक बेटा था राकेश सिंह, जो देवास में स्थित रैनबैक्सी कंपनी में नौकरी करता था.

राकेश सिंह की संगत ठीक नहीं थी. वह आवारा, नशेड़ी किस्म का था, इसलिए अनेक रिश्तेदार उस से दूरी बना कर रहते थे. लेकिन बहन का बेटा होने के कारण मुकेश के परिवार में राकेश को भांजे की तरह मानसम्मान और प्यार दिया जाता था. इसलिए राकेश अपने मामा के घर आताजाता रहता था.

राकेश जिस रैनबैक्सी कंपनी में काम करता था, उसी में अमृता शर्मा भी नौकरी करती थी. वह बेहद सुंदर थी, इसलिए राकेश उस से दोस्ती बनाने के चक्कर में लगा रहता था. इसी कारण उस ने अमृता के पति गगन से भी गहरी दोस्ती कर ली थी. गगन इंदौर के एक निजी अस्पताल में काम करता था.

अमृता राकेश की नीयत व हावभाव को समझती थी, इसलिए वह राकेश से हद में रह कर बात करती थी. जबकि राकेश को विश्वास था कि एक न एक दिन अमृता के साथ हुई उस की दोस्ती प्यार में बदल जाएगी.

इस दौरान अमृता ने इंदौर में एक मकान खरीद लिया, जिस से उस पर काफी कर्ज हो गया था. राकेश तो था ही अय्याश प्रवृत्ति का. अमृता को पाने के चक्कर में वह उस के ऊपर काफी पैसे बरबाद कर चुका था. इस से उस पर भी लाखों रुपए का कर्ज हो चुका था.

राकेश भले ही कर्ज में था पर उस के दिमाग पर यही चढ़ा हुआ था कि वह अमृता का कर्ज उतारने में उस की किस तरह मदद कर सकता है. उसे उम्मीद थी कि अगर ऐसा हो गया तो अमृता उस के करीब आ सकती है. इसलिए वह अमृता की मदद करने की योजना बनाने लगा.

अब वह यही सोचने लगा कि इतनी मोटी रकम वह कहां से लाए. तभी उस के दिमाग में आया कि यदि वह अपने छोटे मामा राकेश कुमार के बेटे अनमोल का अपहरण कर ले तो उस के दोनों मामा मिल कर आसानी से 20-25 लाख रुपए की फिरौती तो दे ही देंगे.

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उस ने यह बात अमृता को बताई. अमृता खुश हो गई. उस ने राकेश सिंह से कहा, ‘‘अगर तुम किसी तरह से मेरे ऊपर चढ़े कर्ज से छुटकारा दिलवा दोगे तो तुम मुझ से जो कहोगे, मैं करने को तैयार हूं.’’

‘‘सोच लो, बाद में बदल मत जाना.’’ राकेश ने अपना मतलब सीधा होते देख अमृता से कहा.

‘‘देखो, मैं अपने वादे से पीछे नहीं हटूंगी और मैं योजना को अंजाम देने में भी तुम्हारा हर तरह से सहयोग करने को तैयार हूं.’’

अमृता द्वारा अनमोल के अपहरण में साथ देने की बात सुन कर राकेश खुश हो गया. इस के बाद दोनों अनमोल के अपहरण की योजना बनाने में जुट गए. इस बारे में अमृता ने पति गगन से बात की तो वह भी साथ देने को तैयार हो गया.

योजना में तय हुआ कि राकेश अपने छोटे मामा राकेश कुमार के 10 महीने के बेटे अनमोल का अपहरण कर के अमृता को दे देगा. फिर अमृता पति के साथ अनमोल को कार से देवास ले जाएगी. जिस के बाद तीनों मिल कर अनमोल के बदले 25 लाख की फिरौती वसूल कर लेंगे. यह भी तय हो गया कि फिरौती की रकम राकेश अकेला खुद ले कर आएगा.

योजना के अनुसार, राकेश सिंह कुछ दिन पहले अपने साथ अमृता को ले कर अपने मामा राकेश कुमार के यहां बेरछा आ गया.

मामा से उस ने कहा कि वे दोनों भोपाल से लौटते हुए काफी थक गए हैं, इसलिए रात में यहीं रहेंगे. इस पर मामामामी को भला क्या ऐतराज हो सकता था. इसलिए उन्होंने अपने भांजे राकेश व उस के साथ आई अमृता की खूब खातिरदारी की.

इस दौरान अमृता राकेश के छोटे बेटे अनमोल को खूब खेलाती रही, ताकि वह उसे अच्छी तरह से पहचानने लगे. अमृता और राकेश 2 दिन बेरछा में रहे और लगातार अनमोल को लाड़प्यार करते रहे.

अमृता ने राकेश कुमार के घर के आगेपीछे के रास्तों को भी अच्छी तरह से देख लिया था.

इस के बाद घटना से 3 दिन पहले योजना बना कर राकेश बेरछा आ गया. फिर 6 जनवरी, 2018 को गगन और अमृता अपनी मारुति कार ले कर देवास से निकले.

बेरछा पहुंच कर गगन कुछ दूरी पर कार ले कर खड़ा हो गया, जबकि अमृता अंधेरा होने पर पैदल चल कर राकेश के मामा के घर के पिछवाड़े पहुंच कर खड़ी हो गई.

उस के बाद उस ने राकेश को मिस काल की तो राकेश गैलरी से अनमोल को ले कर नीचे आ गया और उसे अमृता को सौंप दिया. जहां से अमृता उसे पति के साथ ले कर देवास आ गई.

25 लाख रुपए मिलने के सपने देखते हुए वह कार में पति को प्यार करते हुए लिपट गई. दोनों को उम्मीद थी कि अब उन का कर्ज जल्द उतर जाएगा. इधर राकेश अमृता से प्यार के सपने देख रहा था.

उसे उम्मीद थी कि इस अहसान के बदले अमृता उसे किसी बात के लिए इंकार नहीं करेगी. परंतु पुलिस ने अनमोल को सकुशल बरामद कर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर के उन के अरमानों पर पानी फेर दिया.

एसपी शैलेंद्र सिंह ने इस केस को सुलझाने वाली पुलिस टीम के कार्य की सराहना की. पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

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