कोचिंग सैंटर बना रहे हैं मोटा पैसा

देश में बढ़ती बेरोजगारी ने मातापिता को अपने बच्चों के कैरियर के प्रति सचेत कर दिया है. यही वजह है कि आज हर मातापिता अपने बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं.

अपनी जिंदगीभर की खूनपसीने की कमाई से वे अपने बच्चों को अच्छे कोचिंग सैंटरों में दाखिला दिला कर आईआईटी और मैडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करा रहे हैं.

देश में इलाहाबाद, दिल्ली, कोटा जैसे शहरों के अलावा मध्य प्रदेश के भोपाल, जबलपुर, इंदौर, ग्वालियर और छत्तीसगढ़ के रायपुर, भिलाई जैसे बड़े शहरों में पीएससी, यूपीएससी, बैंक, रेलवे जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ ही साथ आईआईटी और मैडिकल की प्रवेश परीक्षा की कोचिंग देने वाले दर्जनों बड़े सैंटर हैं जो छात्रों व बेरोजगारों से मोटी फीस ले कर अपना कारोबार चमका रहे हैं.

इस के अलावा जिला और तहसील लैवल पर भी संविदा शिक्षक और पटवारी परीक्षा की तैयारी के लिए कुकुरमुत्ते की तरह कोचिंग सैंटर खुल गए हैं जो नौजवानों की जेब ढीली कर मोटा पैसा बनाने का काम कर रहे हैं.

बताया जाता है कि कैसे तथाकथित कोचिंग सैंटरों में उन लोगों द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है जो खुद कभी किसी परीक्षा में पास नहीं हुए.

सरकारी नौकरी के साथसाथ मैडिकल और इंजीनियरिंग में अच्छी रैंक पाने को बेताब हजारों नौजवान मजबूरन इन कोचिंग सैंटरों में जा कर परीक्षा की तैयारी करने में जुटे हुए हैं.

सपने बिकते हैं कोटा में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज से 3 साल पहले शिक्षा नीति में बदलाव लाने की बात कही थी पर 3 साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी शिक्षा नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

देश के पढ़ेलिखे नौजवानों के लिए कैरियर गाइडैंस के लिए सरकारी कोशिशों का नतीजा सिफर ही रहा है. निजी क्षेत्रों ने इस का फायदा उठा कर कोचिंग के नाम पर बड़ेबड़े सैंटर खोल कर अपना धंधा जमा लिया है.

राजस्थान का कोटा शहर सपने बेचने वालों का शहर बन गया है. सौ से ज्यादा कोचिंग सैंटर यहां इंजीनियर और डाक्टर बनाने का सपना बेचते हैं.

कोटा में देशभर के तकरीबन एक लाख बच्चे पढ़ रहे हैं. इन कोचिंग सैंटरों में पढ़ाई के अलावा बच्चों के रहनेखाने तक का खर्च हर साल 2 लाख रुपए से ज्यादा होता है.

इन कोचिंग सैंटरों से कोटा के रियल ऐस्टेट कारोबार ने भी पंख लगा कर ऊंची उड़ान भरी है. पूरे कोटा में होस्टलों की तादाद भी 500 से कम नहीं है. इस के अलावा बड़ी तादाद में छात्र पेइंग गैस्ट बन कर भी रह रहे हैं.

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मैडिकल और आईआईटी की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोटा में बने इन कोचिंग सैंटरों का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है. यही वजह है कि देशभर के मातापिता अपने बच्चों को 8वीं क्लास के बाद ही कोटा में कोचिंग के लिए भेजने लगे हैं.

दिल्ली भी कम नहीं

यूपीएससी, पीएससी की तैयारी के लिए इलाहाबाद, मेरठ के अलावा देश की राजधानी नई दिल्ली में भी कई सारे कोचिंग सैंटर हैं, जो होनहार नौजवानों को कलक्टर बनाने का सपना दिखाते हैं.

छोटेछोटे कमरों में चलने वाले इन कोचिंग सैंटरों में भी 2 लाख रुपए की मोटी फीस में 9 महीने के क्रैश कोर्स के जरीए आईएएस परीक्षा की तैयारी कराने का दावा किया जाता है.

दिल्ली में रह कर आईएएस की तैयारी कर रहे मध्य प्रदेश के एक छात्र सिद्धार्थ दुबे कहते हैं कि दिल्ली में 100 वर्गफुट का एक कमरा 8,000 से 10,000 रुपए तक मासिक किराए पर मिलता है. कोचिंग सैंटरों की फीस और महंगा किराया गरीब तबके के होनहार छात्रों के लिए टेढी खीर साबित होता है.

इन कोचिंग सैंटरों में पढ़ने वाले छात्र यह बात मानते हैं कि अकेले कोचिंग सैंटर के दम पर कोई नौजवान प्रतियोगी परीक्षा पास नहीं कर सकता जब तक कि वह खुद मेहनत न करे.

आज कोचिंग सैंटरों में जाना छात्रों की मजबूरी हो गई है, क्योंकि देशभर के कोनेकोने से आए और छात्रों के संपर्क में रहने से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए मनमुताबिक माहौल मिल जाता है.

शासनप्रशासन और कारपोरेट की तिकड़ी मिल कर देश में लागू वर्तमान दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली को जानबूझ कर बदलना नहीं चाहती है. ऐसे में मजबूर हो कर छात्रों को कोचिंग सैंटरों के जाल में उलझना पड़ता है.

पैसे लेकर फर्जीवाड़ा

2 दिसंबर, 2017 को कर्मचारी चयन बोर्ड एसएससी की परीक्षा में मेरठ के डीएवी स्कूल में मोबाइल फोन के साथ पकड़े गए बागपत के रहने वाले सौरभ धामा ने पूछताछ में कई चौंकाने वाले राज खोले.

उस ने बताया कि मेरठ में एक कोचिंग के संचालक पंकज धामा ने उसे एसएससी की परीक्षा पास कराने के बदले मोटी रकम मांगी थी. सौरभ ने खुद और अपने भाई की नौकरी के लिए अपनी पुश्तैनी 7 बीघा जमीन भी गिरवी रख दी थी, जिस के बाद पंकज ने उसे पेपर के साथ आंसरशीट भी मुहैया करा दी थी.

नकल करते पकड़े गए अभ्यर्थी ने बताया कि मेरठ में कोचिंग सैंटर चलाने वाला पंकज धामा अब तक कई नौजवानों से मोटी रकम ले कर नौकरी लगा चुका है. इस परीक्षा में कई ऐसे अभ्यर्थी भी हैं जो पंकज के संपर्क में थे.

मेरठ की यह घटना बताती है कि कोचिंग सैंटर मोटी रकम ले कर देश की परीक्षा प्रणाली से खिलवाड़ कर के काबिल बेरोजगार नौजवानों का हक भी मारते हैं.

कोटा, दिल्ली, भोपाल और इंदौर के कोचिंग सैंटर तो आईआईटी और मैडिकल प्रवेश परीक्षा की कोचिंग लेने वाले छात्रों को 10वीं और 12वीं क्लास की परीक्षा में नियमित परीक्षार्थियों के रूप में शामिल कराने का काम भी करते हैं.

बताया जाता है कि ये कोचिंग सैंटर अपने यहां दर्ज बच्चों को उसी शहर के निजी स्कूलों से सांठगांठ कर उन को उन स्कूलों में दाखिला दिला देते हैं. निजी स्कूल इन छात्रों की हाजिरी लगाते रहते हैं जबकि ये छात्र उन स्कूलों में कभी पढ़ने जाते ही नहीं हैं.

कोचिंग और सरकार

वर्तमान समय में जब नौजवान तबका अपने कैरियर के लिए मोटी रकम खर्च कर कोचिंग सैंटरों में जाने को मजबूर है तो सरकार क्यों इस दिशा में कोशिश नहीं करती? हर स्कूल, कालेज में कैरियर गाइडैंस देने वाले शिक्षकों की नियुक्ति की जाए, क्योंकि उचित मार्गदर्शन की कमी में स्कूल में पढ़ रहे छात्र को हायर सैकेंडरी पास करने के बाद कौनकौन से अवसर उपलब्ध हैं, इस की जानकारी भी नहीं रहती है.

कालेज के उबाऊ सिलेबस से हट कर क्यों न उन्हें प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कराई जाए, जिस से ये नौजवान किसी कोचिंग सैंटर के मकड़जाल में न फंस कर अपने कैरियर को बना सकें? आखिर कब तक सरकारी तंत्र निजी संस्थानों के हाथों की कठपुतली बना रहेगा?

देश में विकासखंड लैवल पर शुरू हुए कौशल विकास केंद्रों में अच्छी तादाद में प्रशिक्षक और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और उन्हें मजबूत बनाने की कोशिश की जाए तो शायद बेरोजगारों का भविष्य संवर सके.

मुनाफे की हवस में मरते मजदूर

दिल्ली देश की राजधानी है जहां पर देश के नियमकानून बनाने वाले और उन को लागू कराने वाले रहते हैं. देश के दूसरे हिस्सों में यह समझा जाता है कि दिल्ली में कानून व्यवस्था के हालात बेहतर हैं. पर कुछ घटनाओं पर हम नजर डालें तो यह सब खयाली पुलाव ही लगता है.

दिल्ली में आएदिन होती लूट और बलात्कार की घटनाएं तो रोजमर्रा की बात बन चुकी हैं, मुनाफे की हवस के चलते मजदूरों की आग में जल कर मरने की घटनाएं भी तेजी से बढ़ती जा रही हैं.

इन दोनों घटनाओं में यह भी एक फर्क है कि जहां पर लूट (सड़क पर छीन लेना या घर में घुस कर डकैती करना) पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा की गई समस्या है, वहीं बलात्कार पूंजीवादी व बाजारवादी संस्कृति की देन है. मजदूरों का फैक्टरी में आग में जल कर मर जाना पूंजीवादी मुनाफे की हवस का नतीजा है.

9 अप्रैल, 2018 को सुलतानपुरी के राज पार्क में 4 मजदूर जल कर मर गए. सुलतानपुरी का यह इलाका एक मिडिल क्लास रिहाइशी इलाका है जहां पर तकरीबन 500 घर हैं. इन में से 100 से भी ज्यादा घरों में जूतेचप्पल, सिलाई और दूसरे कामों की फैक्टरियां चलती

हैं. इन में से ज्यादातर फैक्टरियों में जूतेचप्पल का काम होता है जिन में पेस्टिंग से ले कर सिलाई तक का काम होता है.

यहां पर काम करने वाले मजदूरों से न्यूनतम मजदूरी के आधे में 10 से 12 घंटे काम कराया जाता है. यहां पर ज्यादातर मजदूर पीस रेट या 5-7 हजार रुपए प्रति महीने पर काम करते हैं. मजदूरों को लालच दिया जाता है कि उन्हें रहने की जगह दी जाएगी.

शहर में रहने की समस्या से जूझ रहे मजदूरों के लिए रहने की जगह मिलना बहुत बड़ी राहत जैसी होती है जिस के चलते वे कम पैसे में भी काम करने को राजी हो जाते हैं.

मालिकों के लिए यह सोने पे सुहागा जैसे हो जाता है. उन को 24 घंटे का मुफ्त में मजदूर मिल जाता है जो किसी भी समय फैक्टरी में लोडिंग, अनलोडिंग, चौकीदार का काम करता है. इस के बदले इन को छत पर एक कमरा मिल जाता है जिस में 8 से 10 लोग रहते हैं और बनातेखाते हैं.

मालिक घर जाते समय फैक्टरी में बाहर से ताला लगा देते हैं. इस की 2 वजहें हैं. एक तो यह कि नए मजदूर कहीं काम अच्छा नहीं लगने के चलते भाग न जाएं, दूसरा यह कि मजदूर रात में चोरी न कर लें.

10 अप्रैल को सुलतानपुरी के राज पार्क में बने ए-197 मकान, जहां पर एक दिन पहले आग लगी थी की गली में सन्नाटा था. ए-197 के बगल वाले घर के सामने प्लास्टिक की 3-4 कुरसियां रखी थीं और गली के एक मुहाने पर कुछ लोग आपस में बातचीत कर रहे थे.

ए-197 मकान को देख कर पूछने की जरूरत नहीं थी कि इसी फैक्टरी ने एक दिन पहले 4 जिंदगियों को निगल लिया था. यह मकान चारमंजिला था. नीचे वाली मंजिल पर एक 4 फुट का गेट था. इस के अलावा ऊपर 2 रोशनदान लगे थे जो आग लगने से काले हो चुके थे.

लोगों ने बताया कि यह फैक्टरी बृजेश गुप्ता की है जो ए-83 में रहते हैं. ए-197 में चप्पल बनाने का काम होता है जिस में तकरीबन 30-35 मजदूर काम किया करते थे.

इस इलाके में रविवार को छुट्टी का दिन होता है लेकिन बहुत सी कंपनियों में काम होता है.

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एक बड़े अखबार में छपी खबर के मुताबिक कारखाने में काम करने वाले मोहम्मद अली ने बताया कि यह फैक्टरी 15 सालों से चल रही थी और 8-9 अप्रैल की रात 2 बजे तक मजदूरों ने काम किया था. 9 तारीख की सुबह उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के अस्मदा गांव के मजदूर परिवारों के लिए बुरी खबर ले कर आई.

अस्मदा गांव के रहने वाले 18 साला मोहम्मद वारिस, 17 साला मोहम्मद अय्यूब, 20 साला मोहम्मद राजी व 17 साला मोहम्मद शान 10 तारीख की सुबह नहीं देख पाए और जल कर फैक्टरी के अंदर ही मर गए. कई लोग जान बचाने के लिए छत से कूदे जिस में उन को चोटें लगीं.

मोहम्मद वारिस और मोहम्मद अय्यूब दोनों सगे भाई थे जबकि मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान चचेरे भाई थे.

सुलतानपुरी में आग लगने की यह कोई पहली घटना नहीं है. इस से पहले भी कई फैक्टरियों में आग लग चुकी है लेकिन कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हो पाने के चलते खबर नहीं बन सकी.

आसपास के लोगों के मुताबिक, इस फैक्टरी में सुबह के 6.30 बजे आग लगी. दमकल महकमे और पुलिस को सूचना 6.35 पर मिल चुकी थी.

लोगों का कहना है कि महल्ले के काफी लोग इकट्ठा हो गए थे, लेकिन बिजली कटी नहीं थी इसलिए लोगों ने आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं की.

दमकल की दर्जनों गाडि़यों ने मिल कर तकरीबन 2 घंटे में आग पर काबू पा लिया. आग की चपेट में आए लोगों को संजय गांधी अस्पताल पहुंचाया गया, जिस में से 4 लोगों को डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया.

जनवरी, 2018 में ही बवाना के सैक्टर 5 में आग लगने से 17 मजदूरों की जान चली गई थी. इस घटना में भी कहा जाता है कि काफी तादाद में मजदूरों की मौत हुई, लेकिन फैक्टरी में जो मजदूर रहते थे उन का पता नहीं चल पाया.

इस से पहले पीरागढ़ी, मंडोली, शादीपुर, शाहपुर जाट वगैरह जगहों पर दर्जनों मजदूरों की जानें जा चुकी हैं.

बवाना, सुलतानपुरी, नरेला के बाद नवादा की क्रौकरी फैक्टरी में लगी आग ने 3 मजदूरों को निगल लिया है और 4 मजदूर लापता हैं. मालिक बाहर से ताला लगा कर काम करा रहे थे और दिल्ली व केंद्र सरकार सो रही थी.

सुलतानपुरी जैसे रिहायशी इलाके में इस तरह की घटना होती है तो किसी भी तरह के मजदूर से मिल कर कुछ पता करना तकरीबन नामुमकिन बात होती है.

राज पार्क में जाने पर वही लोग मिलते हैं जो आसपास फैक्टरियों के मालिक हैं. ये मालिक हर आनेजाने वाले बाहरी शख्स पर निगाह रख रहे होते हैं और अपनी बात सुनाते हैं कि मालिक की किस्मत खराब थी, जो वे फंस गए.

मीडिया वाले गलत बयान छाप देते हैं जैसे लड़के तो काम ही नहीं करते थे, वे तो घूमने आए थे, बाहर से कोई ताला बंद नहीं रहता था वगैरह. जब तक कोई बाहरी शख्स उस इलाके में रहता है ये लोग नजर बनाए रखते हैं कि वह कहां जा रहा है, किस से बात कर रहा है.

पास में खड़े एक आदमी ने इस मुद्दे को अलग रूप देने के लिए कहा कि हिंदुस्तान एक नहीं हो रहा है लेकिन सऊदी अरब एक करना चाहता है. उस आदमी का इशारा हिंदूमुसलिम मुद्दा उठाने का था.

इस से हम जान सकते हैं कि इस तरह की सोच रखने वाले शख्स मोहम्मद वारिस, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान की मौत पर किस तरह सोचते होंगे?

गांधी नगर रेडीमेड कपड़ों का जानामाना बाजार है. इस बाजार में खबरें एक कोने से दूसरे कोने तक नहीं पहुंच पाती हैं. 22-23 अप्रैल, 2018 की रात में लगी आग और 2 लोगों की मौत का पता तो बहुत लोगों को नहीं था कि यहां  पर आग भी लगी है.

कुछ लोगों को मीडिया से पता भी चला तो उन को यह मालूम नहीं था कि आग किधर लगी है और कितना नुकसान हुआ है. काफी लोगों से पूछने के बाद एक नौजवान ने बताया कि गुरुद्वारे वाली गली की तरफ आग लगी है.

गुरुद्वारे वाली गली में जाने के बाद एक जूस विक्रेता ने एक गली की तरफ इशारा करते हुए बताया कि उस घर में आग लगी है.

मकान नंबर 2490 का तो माहौल देख कर लग ही नहीं रहा था कि इसी मकान में 2 दिन पहले 2 लोगों की जिंदगी खत्म हो चुकी है. उस घर को देखने पर आग लगने का पता जरूर चल रहा था. बाकी सबकुछ सामान्य सा लग रहा था.

इस मकान के बगल में एक औरत ने बताया कि यहां पर 2-4 घर छोड़ कर हर घर में फैक्टरी व गोदाम हैं. 2490 नंबर मकान भी एक संकरी गली में है, जिस में चारपहिया वाहन भी मुश्किल से जा सकता है. यह मकान चारमंजिला है, जिस की 3 मंजिलों में फैक्टरी चलती है. सब से ऊपर वाली मंजिल पर मकान मालिक खुद रहते हैं.

इन इलाकों में श्रम कानून का पालन नहीं हो रहा है. मजदूरों को 8-10 हजार रुपए प्रति महीने दे कर काम कराया जाता है.

साप्ताहिक छुट्टी के अलावा और कोई छुट्टी नहीं दी जाती है. यहां तक कि इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी इस मकान को जांच के लिए सीलबंद करना उचित नहीं समझा गया. इस इलाके में चलने वाली हर फैक्टरी में रिहायश भी है, जो कभी भी दुर्घटना की एक बड़ी वजह बन सकती है.

किसी भी फैक्टरी में सुरक्षा मानकों का ध्यान नहीं रखा गया है. यहां तक कि इन मकानों के अंदर एक ही दरवाजा होता है और आग से बचाव के लिए कोई उपाय नहीं किया गया है.

दिल्ली में इतने बड़े पैमाने पर रिहायशी इलाकों में फैक्टरियां चल रही हैं जहां पर मालिक मनमाने तरीके से काम करते हैं और किसी तरह के श्रम कानून को लागू नहीं करते हैं.

दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार, दिल्ली नगरनिगम, प्रशासन चुप बैठे हुए हैं. क्या इस तरह की घटना प्रशासन और सरकार की मिलीभगत के बिना हो सकती है? इस तरह की घटना होने के बाद केवल मुआवजा दे कर सरकार अपनी जिम्मेदारी को पूरा होना मान लेती है.

क्या मुआवजा देने से ही मोहम्मद वारिस, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान जैसे लाखों मजदूरों को इंसाफ मिल पाएगा? सरकारें कब तक ऐसी फैक्टरियों को चलते रहने देंगी, जो श्रम कानूनों को ताक पर रख कर चल रही हैं? कब तक मजदूरों की आवास की मांग को श्रम कानून में एक अधिकार

के रूप में जोड़ा जाएगा? क्या इसी तरह मजदूर मरते रहेंगे और मजदूर, कर्मचारी यूनियनें हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेंगी?

रुद्राक्ष के हत्यारे को सजा-ए-मौत

26 फरवरी, 2018 की बात है. कोटा शहर की अदालत में उस दिन आम दिनों से कुछ ज्यादा ही भीड़ थी.  अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण प्रकरण न्यायालय के विशिष्ट न्यायाधीश गिरीश अग्रवाल की अदालत के बाहर सब से ज्यादा भीड़ मौजूद थी. भीड़ में शहर के आम लोगों के अलावा वकील भी शामिल थे.

अदालत में भीड़ जुटने का कारण यह था कि उस दिन कोटा के बहुचर्चित रुद्राक्ष अपहरण हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था. इसलिए रुद्राक्ष के मातापिता के अलावा उन के कई परिचित भी अदालत में आए हुए थे.

भीड़ में इस बात को ले कर खुसरफुसर हो रही थी कि अदालत क्या फैसला सुनाएगी. कोई कह रहा था कि आरोपियों को फांसी होगी तो कोई उम्रकैद होने का अनुमान लगा रहा था. दरअसल, इस मामले से कोटा की जनता का भावनात्मक जुड़ाव रहा था, इसलिए पूरे कोटा शहर की नजरें फैसले पर टिकी हुई थीं.

विशिष्ट न्यायाधीश गिरीश अग्रवाल समय पर अदालत पहुंच गए. जज साहब ने पहले अदालत के जरूरी काम निपटाए. फिर उन्होंने रुद्राक्ष हत्याकांड की फाइल पर नजर डाली और इस मामले के चारों आरोपियों को दोपहर 2 बजे अदालत में पेश होने का संदेश भिजवा दिया. अदालत के बाहर जमा लोगों को जब पता लगा कि जज साहब ने दोपहर 2 बजे आरोपियों को अदालत में पेश करने को कहा है तो वहां से धीरधीरे भीड़ कम होने लगी.

लंच के बाद अदालत के बाहर फिर से लोग जमा होने लगे. दोपहर 2 बजे पुलिस ने रुद्राक्ष हत्याकांड के आरोपी अंकुर पाडिया और उस के भाई अनूप पाडिया को कोर्टरूम में पेश किया. दोनों भाइयों को जेल से अदालत लाया गया था. तीसरा आरोपी महावीर शर्मा जमानत पर चल रहा था, वह भी कोर्टरूम में आ चुका था. इन तीनों आरोपियों को कटघरे में खड़ा किया गया.

इस बीच विशिष्ट न्यायाधीश गिरीश अग्रवाल अपने चैंबर से निकल कर कोर्टरूम में अपनी कुरसी पर बैठ गए. कुरसी पर बैठते ही उन्होंने एक नजर कोर्टरूम में मौजूद लोगों पर डाली, फिर अपने साथ लाई फाइल पर नजर दौड़ाने लगे.

इस केस का चौथा आरोपी करणजीत सिंह दिल्ली से नहीं आया था. उस के वकील सतविंदर सिंह ने जज साहब के सामने उस की हाजिरी माफी का प्रार्थनापत्र पेश करते हुए कहा कि करणजीत सिंह के दादा की मृत्यु होने के कारण वह अदालत में हाजिर नहीं हो सका. इस पर जज साहब कुछ नहीं बोले.

जज साहब ने सामने रखी फाइल खोल कर कुछ पन्ने पलटे और रुद्राक्ष की हत्या के चारों आरोपियों अंकुर पाडिया, अनूप पाडिया, महावीर शर्मा और चरणजीत सिंह को दोषी घोषित कर दिया. उन्होंने सजा के आधार बिंदु भी सुनाए.

तभी आरोपियों की पैरवी करते हुए उन के वकीलों ने कहा कि उन्हें कम से कम सजा दी जाए. विशिष्ट लोक अभियोजक कमलकांत शर्मा ने उन की बात का विरोध करते हुए कहा कि यह रेयरेस्ट औफ रेयर मामला है, इसलिए आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए. इन्हें कम से कम फांसी की सजा दी जाए. अपनी दलीलें पेश करते हुए लोक अभियोजक ने अदालत के सामने 3 रूलिंग भी पेश कीं.

वकीलों की दलीलें सुनने के बाद जज साहब ने शाम 5 बजे दोषियों को सजा सुनाने की बात कही. इस के बाद वह फिर से अपने चैंबर में चले गए.

रुद्राक्ष कौन था और उस का अपहरण व हत्या क्यों की गई, इस के लिए हमें करीब सवा 3 साल पीछे जाना होगा.

दरअसल रुद्राक्ष कोटा शहर की तलवंडी कालोनी के रहने वाले पुनीत हांडा का बेटा था. पुनीत हांडा एक बैंक में मैनेजर थे. 7 साल का रुद्राक्ष रोजाना की तरह 9 अक्तूबर, 2014 की शाम करीब 5-साढ़े 5 बजे अपने घर के पीछे हनुमान पार्क में खेलने गया था.

आमतौर पर वह करीब एक घंटे पार्क में खेल कर वापस घर लौट आता था, लेकिन उस दिन वह नहीं लौटा तो परिवार वालों ने उसे पार्क में जा कर ढूंढा. लेकिन वह वहां नहीं मिला.

उसी दिन शाम करीब साढ़े 7 बजे पुनीत हांडा के लैंडलाइन पर फोन आया. फोन करने वाले ने कहा कि तुम्हारा बेटा किडनैप हो गया है. पुनीत ने पहले तो इसे मजाक समझा, लेकिन फोन करने वाले ने गालीगलौज के साथ अपना नाम जफर मोहम्मद बताते हुए कहा कि बच्चे को कश्मीर भेज दिया है. अगर बच्चे को सहीसलामत वापस चाहते हो तो 2 करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो.

पुनीत हांडा ने 2 करोड़ रुपए की रकम देने में असमर्थता जताई तो फोन करने वाले ने कहा, ‘‘तू बैंक मैनेजर है और तेरी बीवी टीचर. जितनी भी रकम हो सकती है, इकट्ठी कर ले. बाकी बात सुबह फोन कर के बताऊंगा और अगर पुलिस को बताने की होशियारी दिखाई तो बच्चे से हाथ धो बैठोगे.’’ कहते हुए उस आदमी ने फोन काट दिया.

फोन सुन कर पुनीत ने सिर थाम लिया. उन की समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें. वह सोचने लगे कि उन की तो किसी से दुश्मनी भी नहीं है.

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बेटे के अपहरण होने की बात जब पुनीत की पत्नी श्रद्धा हांडा को पता चली तो वह रोने लगीं. पुनीत ने पत्नी को ढांढस बंधाते हुए कहा कि यह समय रोने का नहीं, बल्कि सोचने का है कि हमें अब क्या करना चाहिए. वह रोते हुए बोलीं, ‘‘मेरे जितने भी गहने हैं, सब बाजार में बेच दो पर मेरे रुद्राक्ष को ले आओ.’’

पुनीत ने पत्नी को हौसला रखने को कहा. बाद में उन्होंने फैसला किया कि पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए. इस के बाद पुनीत ने अपने कुछ परिचितों को फोन कर के बुलाया. परिचितों के साथ उसी रात करीब पौने 9 बजे वह कोटा के जवाहरनगर पुलिस थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी को उन्होंने सारी बातें बताईं. पुलिस ने उसी समय भादंवि की धारा 364ए के तहत रिपोर्ट दर्ज कर जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी.

पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया. पूरे शहर में नाकेबंदी करा दी गई. पुलिस ने उस पार्क के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज भी देखे, जिस में रुद्राक्ष खेलने गया था. फुटेज में सफेद रंग की निसान माइक्रा कार नजर आई, जिस का नंबर साफ नहीं दिख रहा था. पुलिस उस कार की तलाश में जुट गई. रुद्राक्ष और अपहर्त्ताओं की तलाश के लिए रात भर पुलिस का अभियान चलता रहा, लेकिन कोई सुराग नहीं लगा.

अगले दिन 10 अक्तूबर, 2014 को कोटा के तालेडा थाना इलाके के जाखमुंड स्थित नहर में एक बच्चे की लाश बरामद हुई. बाद में उस की शिनाख्त 7 वर्षीय रुद्राक्ष के रूप में हुई. जवाहरनगर थाना पुलिस ने बच्चे की लाश को जरूरी काररवाई के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और केस में हत्या की धारा भी जोड़ दी.

थोड़ी सी देर में रुद्राक्ष की हत्या की खबर पूरे शहर में फैल गई. जिस के बाद लोग आक्रोश में आ गए. विरोध जताने के लिए लोगों ने बाजार बंद रखे. जगहजगह पुलिस के खिलाफ धरनाप्रदर्शन भी शुरू हो गए. कैंडल मार्च, मौन जुलूस निकाले गए. मानव शृंखला बना कर भी विरोध जताया गया. एक तरह से पूरा शहर इस आंदोलन से जुड़ गया था.

भारी जनाक्रोश को देखते हुए जयपुर से आए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (क्राइम) अजीत सिंह कई दिनों तक कोटा में इसलिए डेरा डाले रहे कि कहीं स्थिति विस्फोटक न हो जाए.

पुलिस ने रुद्राक्ष के अपहर्त्ता और हत्यारोपियों की तलाश में कई टीमें गठित कीं. पुलिस ने रुद्राक्ष के साथ पार्क में खेल रहे बच्चों से भी पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि कई दिन से एक अंकल पार्क में खेल रहे बच्चों को चौकलेट बांटने आते थे. उस दिन भी वह आए. उन के पास की चौकलेट खत्म हो गई थीं. रुद्राक्ष ही चौकलेट के लिए रह गया था. तब वह चौकलेट देने के लिए रुद्राक्ष को अपनी कार के पास ले गए.

पुलिस ने बच्चों के बताए हुलिए के आधार पर अपहर्त्ता के स्केच बनवा कर जारी कर दिए. सीसीटीवी फुटेज के आधार पर संदिग्ध कार के मालिक का भी पुलिस ने पता लगा लिया. इस के अलावा पुनीत हांडा के घर के लैंडलाइन टेलीफोन पर जिस फोन नंबर से फिरौती की काल आई थी, उस फोन नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई गई.

5 दिन की लगातार जांचपड़ताल के बाद कोटा शहर के अनंतपुरा थाना इलाके के ओम एनक्लेव के रहने वाले अंकुर पाडिया का नाम सामने आया. पुलिस ने अंकुर पाडिया को तलाशा तो पता चला कि वह कोटा शहर में है ही नहीं. अंकुर के कोटा शहर में ही अलगअलग जगहों पर कई फ्लैट हैं.

पुलिस 14 अक्तूबर को ओम एनक्लेव में स्थित अंकुर के फ्लैट पर पहुंची. लोगों की मौजूदगी में फ्लैट का ताला तोड़ कर तलाशी ली तो वहां एक मोबाइल फोन, अंकुर का पासपोर्ट, वोटर आईडी कार्ड मिले.

फ्लैट के नीचे एक निसान माइक्रा कार भी खड़ी मिली. लोगों से पता चला कि वह कार अंकुर की ही है. कार में एक कंबल, कपड़े, चौकलेट, बिसकुट, कैंची, सेलोटेप, नायलौन की डोरी मिली.

अंकुर की बंसल क्लासेज के नजदीक ही स्टेशनरी की दुकान भी है. दुकान की तलाशी लेने पर वहां से एक लैपटाप, हार्डडिस्क, पेन ड्राइव, डोंगल, 2 मोबाइल फोन बरामद हुए. इस के अलावा उस के महालक्ष्मीपुरम स्थित फ्लैट से 3 लाख रुपए नकद, डायरी, मोबाइल फोन आदि जब्त किए. यह वही फोन था, जिस से फिरौती के लिए रुद्राक्ष के घर वालों को काल की गई थी.

जांच में पता चला कि रुद्राक्ष के घर फिरौती के लिए बीएसएनएल की सिम से काल की गई थी. उस की काल डिटेल्स से पुलिस को रिलायंस कंपनी का एक नंबर मिला. जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि वह सिम दिल्ली से लिया गया था.

दिल्ली में करणजीत सिंह नाम के व्यक्ति ने एक साथ 8-10 सिम कार्ड बेचे थे. इन में से एक सिमकार्ड का प्रयोग कर के गुजरात से क्लोरोफार्म मंगाने के लिए ईमेल किया गया था. आईपी एड्रेस से अंकुर का नाम सामने आ गया था.

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पुलिस ने अंकुर का नंबर सर्विलांस पर लगा दिया. जांच में पता चला कि अनूप पाडिया का फरजी नाम संतोष सिंह है. अनूप की एक नए नंबर पर बारबार बात हो रही थी. उस नए नंबर का मूवमेंट कानपुर स्टेशन के आसपास आ रहा था. उस मोबाइल की आईडी उड़ीसा की थी. कानपुर में तलाश की गई तो पता चला कि अंकुर पाडिया उड़ीसा के किसी व्यक्ति की आईडी पर कानपुर के एक होटल में कमरा ले कर रह रहा है.

लंबी भागदौड़ के बाद पुलिस ने 27 अक्तूबर, 2014 को कानपुर से अंकुर पाडिया और लखनऊ से उस के भाई अनूप पाडिया को गिरफ्तार कर लिया. अनूप पाडिया रुद्राक्ष के अपहरण और हत्या मामले में अंकुर का सहयोगी था.

पूछताछ में पता चला कि अंकुर पाडिया को क्रिकेट मैचों का सट्टा लगाने का शौक था. इस शौक में कुछ समय पहले उस ने लाखों रुपए गंवा दिए थे, जिस से उस पर लाखों रुपए का कर्ज हो गया था, जिस की वजह से उसे कोटा में महालक्ष्मीपुरम का अपना फ्लैट गिरवी रखना पड़ा था.

बैंक का उस पर 39 लाख रुपए का कर्ज था. उस ने गोपाल से 65 लाख रुपए ले रखे थे. इस के अलावा निखिल शर्मा से भी 10 लाख रुपए ले रखे थे. कई अन्य लोगों से भी उस ने मोटी रकम ले रखी थी.

कर्ज से उबरने के लिए अंकुर ने रुद्राक्ष के अपहरण की योजना बनाई. उसे पता था कि रुद्राक्ष का पिता पुनीत हांडा बूंदी सेंट्रल कोऔपरेटिव बैंक में मैनेजर है और मां कौन्वेंट स्कूल में टीचर, इसलिए अंकुर को उम्मीद थी कि उन के बेटे रुद्राक्ष का अपहरण करने पर फिरौती के रूप में मोटी रकम मिल सकती है.

अंकुर ने रुद्राक्ष का अपहरण करने के लिए कई दिन तक पार्क के चक्कर लगाए. वहां खेलने वाले बच्चों को वह चौकलेट देता था. 9 अक्तूबर, 2014 को वह पार्क से रुद्राक्ष को चौकलेट के बहाने ले गया और उसे अपनी सफेद माइक्रा कार में बैठा कर क्लोरोफार्म सुंघा कर बेहोश कर दिया.

बेहोश रुद्राक्ष को ले कर वह कोटा शहर में घूमता रहा. वह कोटा के दशहरा मेले में भी गया. इस के अलावा उस ने उम्मेद क्लब के सिल्वर जुबली कार्यक्रम में भाग लिया. उसी रात अंकुर ने रुद्राक्ष की हत्या कर दी और उस का शव तड़के नहर में फेंक दिया. रुद्राक्ष की हत्या के बाद वह कोटा से भाग कर कई राज्यों में घूमता हुआ कानपुर पहुंचा.

बाद में 30 अक्तूबर को पुलिस ने दिल्ली के तिलकनगर थाना इलाके में कृष्णापुरी के रहने वाले करणजीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया. करणजीत सिंह दिल्ली के गफ्फार मार्केट में मोबाइल का काम करता था.

उस ने पुलिस को बताया कि उसे एक जगह 10 सिम कार्ड लावारिस हालत में मिले थे. इन में से एक सिमकार्ड उस ने खुद रख लिया और बाकी 9 सिम 23 सितंबर, 2014 को एक आदमी को 1100 रुपए में बेच दिए. पुलिस ने अंकुर पाडिया के नौकर महावीर शर्मा को 7 नवंबर, 2014 को बूंदी जिले के केशोराय पाटन से गिरफ्तार कर लिया.

अंकुर पाडिया ने रुद्राक्ष के अपहरण की योजना पूरी तरह सोचसमझ कर बनाई थी. पुलिस को उस के लैपटाप की जांच के बाद पता चला कि उस ने सितंबर, 2014 में इंटरनेट के द्वारा क्लोरोफार्म मिलने के स्थानों की तलाश की. इस के अलावा एक अंगरेजी अखबार की वेबसाइट पर किडनैपिंग से संबंधित वेबपेज भी देखे.

अंकुर के लैपटाप की एफएसएल जांच रिपोर्ट से पता चला कि पहली सितंबर, 2014 से 14 अक्तूबर, 2014 के बीच उस ने अपराध के लिए इंटरनेट पर कई तरह की खोजबीन की थी. डेढ़ महीने में उस ने 188 तरह के कीवर्ड सर्च किए. इन में वेयर कैन बी गेट क्लोरोफार्म, वेयर कैन बी गेट मेकअप मटीरियल सरदारजी गेटअप, हाउ टू चेंज योर वाइस ओवर द फोन, रिच परसन इन कोटा प्रमुख थे.

अंकुर इतना शातिर था कि उस ने 16 अक्तूबर, 2014 की रात सुशांत राजगंधा नामक व्यक्ति का वोटर आईडी कार्ड चुरा लिया. सुशांत राजगंधा ट्रेन द्वारा बलसाड से राजगंधा जा रहा था. रुद्राक्ष की हत्या के बाद कोटा से फरार हो कर अंकुर भी उसी ट्रेन से कहीं जा रहा था.

इसी दौरान मौका पा कर अंकुर ने सुशांत राजगंधा का वोटर आईडी कार्ड व अन्य दस्तावेज चुरा लिए. सुशांत राजगंधा के वोटर आईडी कार्ड के आधार पर अंकुर कानपुर में होटल में रुका हुआ था. अंकुर के शातिराना दिमाग का अंदाज इस से भी पता चलता है कि जब कानपुर में उसे पकड़ा गया था तो उस के पास उस का लिखा 2 पन्नों का सुसाइड नोट भी था.

इस सुसाइड नोट पर उस के दस्तखत भी थे. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि अंकुर इस सुसाइड नोट को प्रचारित कर दुनिया की नजर में मर जाता, लेकिन असल में वह नाम बदल कर अपने भाई अनूप पाडिया की तरह कहीं अन्यत्र रहने लग जाता.

पुलिस को यह भी पता चला कि अनूप पाडिया पर कोटा शहर व कई अन्य जगहों पर धोखाधड़ी के मामले दर्ज हैं. कई प्रकरण एनआई एक्ट के विचाराधीन हैं. वह सन 2009 में जयपुर जिले से पुलिस अभिरक्षा से फरार हो गया था. तब से वह फरार चल रहा था. बाद में उसे रुद्राक्ष के मामले में लखनऊ से गिरफ्तार किया गया, जहां वह संतोष सिंह के नाम से रह रहा था.

पुलिस की जांच में यह बात सामने आई कि दोनों भाई पैसों के लिए मिल कर अपराध कर रहे थे. रुद्राक्ष की हत्या के तुरंत बाद 12 अक्तूबर, 2014 को अंकुर सीधा अपने भाई अनूप उर्फ संतोष सिंह के पास गया था.

इस मामले में आमजनों की भावना को देखते हुए कोटा के वकीलों ने 2 आरोपियों अंकुर पाडिया और अनूप पाडिया की पैरवी नहीं की थी. इतना ही नहीं, बार असोसिएशन ने परिवादी पुनीत हांडा की तरफ से नि:शुल्क पैरवी के लिए एडवोकेट हरीश शर्मा को नियुक्त कर दिया था.

व्यापक जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने अंकुर पाडिया के खिलाफ भादंसं की धारा 364ए, 302, 379, 419, 420, 120बी व सूचना प्रौद्योगिकी की धारा 65 व 66क, ख, ग, घ के तहत, अभियुक्त अनूप पाडिया उर्फ संतोष सिंह के खिलाफ भादंसं की धारा 364ए, 302, 419, 420, 212, 120बी और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ख, ग, घ के अंतर्गत आरोपपत्र पेश किया. अभियुक्त करणजीत सिंह के खिलाफ भादंसं की धारा 109, 364ए एवं 302 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66बी तथा अभियुक्त महावीर शर्मा के खिलाफ भादंसं की धारा 201 एवं 212 के तहत 23 जनवरी, 2015 को अदालत में आरोपपत्र पेश किया. पुलिस ने 1464 पेज और 10 सीडी में चालान पेश किया था.

कोर्ट में करीब 3 सालों तक इस बहुचर्चित मामले की काररवाई चलती रही, जिस में 110 गवाहों के बयान भी दर्ज किए गए. न्यायालय में पेश हुए साक्ष्यों के आधार पर ही न्यायाधीश गिरीश अग्रवाल ने आरोपियों को दोषी ठहराया.

सजा सुनाने के लिए जज साहब शाम 5 बजे कोर्ट में पहुंच गए. उस समय आरोपियों के अलावा मामले से जुड़े सभी वकील व रुद्राक्ष के मातापिता भी कोर्टरूम में मौजूद थे.

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जज साहब ने बिना कोई भूमिका बनाए सीधे फैसला सुनाते हुए कहा, ‘अभियुक्त अंकुर ने क्रूरतम, अमानवीय तथा हृदयविदारक जघन्य अपराध किया था. अभियुक्त की अपराध प्रवृत्ति को देखते हुए वह समाज की मुख्यधारा से जुड़ने के योग्य नहीं है. अभियुक्त अंकुर समाज के लिए खतरा है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘ऐसे हालात में अभियुक्त अंकुर के साथ नरमी का रुख अपनाए जाने का कोई औचित्य नहीं हो सकता. 7 साल के बच्चे की बर्बरतापूर्वक हत्या के इस मामले को रेयरेस्ट औफ रेयर माना जाना न्यायोचित प्रतीत होता है. इसलिए अभियुक्त अंकुर पाडिया को मृत्युदंड से कम कुछ भी दिया जाना न्यायोचित नहीं है.’

इतना कह कर जज साहब ने एक सरसरी नजर कटघरे में खड़े अभियुक्त अंकुर पाडिया के चेहरे पर डाली.

कुछ क्षण रुक कर जज साहब ने कहा, ‘अभियुक्त अनूप ने नियोजित तरीके से षडयंत्रपूर्वक अपराध किया था. इस तरह के अपराधों में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के लिए नरमी का रुख अपनाया गया तो यह समाज के लिए घातक होगा. पिछले 5 सालों से वह नाम बदल कर और अपनी पहचान छिपा कर संतोष सिंह के नाम से रहता रहा और इसी नाम से आईडी, परिवार कार्ड बनवा लिए, जो उस की आपराधिक प्रवृत्ति को दर्शाता है. अभियुक्त अनूप का अपराध अतिगंभीर और हृदय विदारक है. उस के खिलाफ नरमी का रुख अपनाया जाना न्यायोचित नहीं होगा.’

जज साहब ने इतना कह कर कटघरे में खड़े अभियुक्त अनूप पाडिया और कोर्टरूम में मौजूद लोगों पर सरसरी नजर डाली. कुछ पलों की चुप्पी के बाद जज साहब ने आगे कहा, ‘अभियुक्त महावीर और करणजीत पर भी आरोपित अपराध गंभीर प्रकृति के हैं. महावीर ने फिरौती के लिए अपहरण व हत्या जैसे गंभीर अपराध में साक्ष्य नष्ट करने और आरोपी अंकुर को बचाने के लिए सहयोग किया. आरोपी चरणजीत ने फरजी सिम बेचने का अपराध किया. ये परिवीक्षा के प्रावधानों के लाभ पाने के अधिकारी नहीं हैं. उन्हें भी समुचित दंड से दंडित किया जाना न्यायोचित होगा.’

इस के बाद जज साहब ने टेबल पर रखे गिलास से पानी पिया. फिर उन्होंने दंडादेश सुनाते हुए कहा, ‘मुख्य आरोपी अंकुर पाडिया को दोषसिद्ध आरोप के अंतर्गत धारा 302 भादंसं में मृत्युदंड और 50 हजार रुपए के अर्थदंड से दंडित किया जाता है. इस के अलावा उसे 364ए में मृत्युदंड व 50 हजार रुपए के अर्थदंड से भी दंडित किया जाता है.’

अंकुर पाडिया को कई अन्य धाराओं में सजा व अर्थदंड सुनाने के बाद जज साहब ने अभियुक्त अनूप पाडिया को दोषी मानते हुए धारा 302 एवं 120बी और 364ए एवं 120बी भादंसं में आजीवन कारावास की सजा सुनाई. फिर अभियुक्त महावीर शर्मा को 4 साल और करणजीत सिंह को 2 साल की सजा सुनाई.

अदालत ने अंकुर पाडिया को फांसी की सजा के साथ कुल 3 लाख 60 हजार रुपए, अनूप पाडिया को उम्रकैद के साथ 3 लाख 20 हजार रुपए, महावीर शर्मा को 4 साल की कठोर कैद के साथ 25 हजार रुपए और करणजीत सिंह को 2 साल की कठोर कैद के साथ 1 लाख रुपए के अर्थदंड से दंडित किया.

सजा के अन्य बिंदुओं को सुनाने के बाद जज साहब ने फाइल को बंद करते हुए एक बार फिर कोर्टरूम में मौजूद लोगों पर नजर डाली और कुरसी से उठ कर अपने चैंबर में चले गए.

फैसला सुन कर कोर्टरूम में मौजूद रुद्राक्ष की मां श्रद्धा हांडा फफक पड़ीं. फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद भी कटघरे में खड़े अंकुर पाडिया के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. उस के भाई अनूप पाडिया के चेहरे पर भी मलाल के कोई भाव नहीं थे.

रुद्राक्ष के पिता पुनीत हांडा ने कहा कि मेरी कैसी जीत और कैसी हार. मेरा बेटा तो वापस नहीं मिल सकता. 3 साल तक अदालत की चौखट पर आतेआते मैं खुद को अपराधी समझने लगा था. आरोपी पेशी पर आए या न आए, मैं तो हर बार पेशी पर पहुंचता था.

जेल से जब अंकुर व अनूप कोर्ट में आते तो लगता कि वे किसी ऐशगाह या फाइवस्टार होटल से निकल कर आ रहे हैं. ब्रांडेड जूते, जींस, टीशर्ट, चेहरे पर शिकन तक नहीं. ऐसे में मैं कई बार हैरान हो जाता कि जेल में आखिर चल क्या रहा है. मैं सिस्टम के आगे खुद को अपराधी और हत्यारों को फरियादी समझने लगा था.

अदालत का फैसला आने से करीब एक महीने पहले ही रुद्राक्ष के दादा मदनमोहन हांडा का स्वर्गवास हो गया था. पिता के ड्यूटी पर चले जाने और मां के स्कूल चले जाने के बाद रुद्राक्ष का सब से ज्यादा समय अपने दादाजी के साथ ही बीतता था.

रुद्राक्ष की मौत ने दादा मदनमोहन को भी तोड़ दिया था. जिस पार्क से रुद्राक्ष का अपहरण हुआ था, वहां दादाजी ने पोते की याद में 2 पौधे रोपे थे. वे इन्हीं पौधों को पालपोस कर रुद्राक्ष को याद करते थे.

रुद्राक्ष हत्याकांड में मुख्य आरोपी अंकुर पाडिया को गिरफ्तार कराने में तकनीकी जांच के जरिए सब से अहम भूमिका निभाने वाले हेडकांस्टेबल प्रताप सिंह को फैसला आने के दिन ही एएसआई के पद पर गैलेंटरी पदोन्नति दे दी गई. प्रताप सिंह की विशेष पदोन्नति की सिफारिश तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ने की थी.

फैसला सुनाए जाने के बाद कोर्टरूम में मौजूद तीनों मुजरिमों को पुलिस कोटा जेल ले गई.

जेल में भी अनूप पाडिया अपनी फितरत दिखाने से नहीं चूका. उस ने जेल में ही कैदियों से वसूली शुरू कर दी. किसी ने इस की शिकायत भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से कर दी तो ब्यूरो ने 10 अप्रैल, 2017 को प्रोडक्शन वारंट पर कोटा जेल से गिरफ्तार कर लिया.

इस मामले में कोटा जेल के जेलर बत्तीलाल मीणा और 2 दलालों को भी गिरफ्तार कर लिया. कोर्ट के आदेश पर अनूप पाडिया को अजमेर जेल भेज दिया गया था.

पत्रकार विवाद मामले में रानी ने दिया निरहुआ का साथ

भोजपुरी सुपर स्‍टार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ दो दिन पहले हुए अपनी एक टिप्‍पणी के चलते विवादों में हैं. दरअसल ‘निरहुआ’ के खिलाफ मुंबई में एक पत्रकार द्वारा क शिकायत दर्ज कराई गई है जिसमे कहा गया है कि निरहुआ फोन पर पत्रकार को गाली-गलौच और जान से मारने की धमकी दे रहे हैं. लेकिन इस शिकायत के खिलाफ भोजपुरी सितारे निरहुआ के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. भोजपुरी सिनेमा की रानी कही जाने वाली रानी चटर्जी ने भी निरहुआ का साथ देते हुए उनके समर्थन में उतर आई हैं.

रानी ने एक फेसबुक पोस्ट के जरिये अपनी बात कही रानी ने तो ये तक कह डाला की दिनेश लाल यादव ने जो कुछ भी उस पत्रकार को कहा है बिल्कुल ठिक किया है क्योंकि अगर निरहुआ ये नहीं करते तो शायद कुछ दिन बाद रानी खुद उस पत्रकार के साथ ऐसा ही बर्ताव करतीं. रानी ने अपने फेसबुक पर निरहुआ के समर्थन में यह वीडियो पोस्‍ट किया है, जिसमें वह कहती नजर आ रही हैं कि उनकी तबियत खराब है लेकिन फिर भी उनका यह वीडियो काफी जरूरी है. रानी ने इस वीडियो में कहा, ‘तुम होते कौन हो मुंबई में बैठ कर कुछ भी लिखने वाले. रानी ने कहा कि पत्रकार के नाम पर आप कुछ भी नहीं लिख सकते. आपको पर्सनल लाइफ या फिल्‍म पर अटैक करने का कोई हक नहीं है.

गौरतलब है कि ईद के मौके पर दिनेशलाल यादव निरहुआ की फिल्‍म ‘बौर्डर’ को बिहार – यूपी में शानदार शुरूआत मिली. मगर मुंबई में कुछ पत्रकारों ने ‘बौर्डर’ के बारे में अपने फेसबुक पोस्‍ट पर जो लिखा, उससे दिनेशलाल यादव निरहुआ भड़क गए और उन्‍हें खरी – खरी सुना दी थी. इस वीडियो में रानी ने ये भी कहा कि ये लोग पत्रकारिता के नाम पर जानबूझ कर किसी को भी नीचा दिखाने का काम करते हैं और इसे वो समीक्षा कहते हैं. क्‍या फिल्‍म की समीक्षा किसी का चरित्र हनन करके होती है.

रानी ने इस वीडियो में भड़कते हुए कहा, ‘ये होते कौन हैं किसी की लाइफ के बारे में फैसला सुनाने वाले. इन्‍हें किसने अधिकार दे दिया कि ये कहें किसे काम करना है, किसे नहीं. पत्रकारिता के अपने कायदे और नियम भी होते हैं, क्‍या वो इन्‍हें पता है. इसलिए ऐसे लोगों का बहिष्‍कार होना चाहिए. मैं इस मामले में निरहुआ के साथ हूं.’

इस मामले में निरहुआ और पत्रकार के बीच हुए बातचीत की एक रिकौर्डिंग भी वायरल हो रही है जिसमें साफ साफ सुना जा सकता है की निरहुआ बेहद ही गंदे तरीके से पत्रकार को गालियां दे रहे हैं तथा पत्रकार के बार बार कहने पर की फोन में रिकौर्डिंग हो रही है बावजूद इसके निरहुआ कह रहे हैं कि जो करना है कर लो और भी तमाम प्रकार की बाते कहते हम उन्हें इस रिकौर्डिंग में सुन सकते हैं.

हालांकि अब यह बहुत आम हो चला है क्योंकि कुछ दिन पहले ऐसे ही मशहूर कमेडियन कपिल शर्मा की भी एक कौल रिकौर्डिंग वायरल हुई थी जिसमें वो एक मुंबई स्थित पत्रकार के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करते दिखे थें.

नोटबंदी की बेवकूफी, फायदा बिचौलियों का

भोपाल के नजदीक मिसरोद इलाके की भारतीय स्टेट बैंक की शाखा में एक किसान पद्म सिंह ने 20 अप्रैल, 2018 को डेढ़ लाख रुपए जमा कराए थे. मई के पहले हफ्ते में इस बैंक की मैनेजर मालविका धगत ने मिसरोद पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि पद्म सिंह द्वारा जमा कराए गए नोटों में 200-200 रुपए के 8 नोट नकली हैं.

पुलिस ने पद्म सिंह के खिलाफ मामला दर्ज करते हुए उन से पूछताछ शुरू की तो उन्होंने बताया कि ये नोट उन्होंने कोऔपरेटिव बैंक से निकाले थे.

पुलिसिया छानबीन में कोई ऐसी सनसनीखेज बात सामने नहीं आई कि पद्म सिंह का संबंध जाली नोट चलाने वाले किसी गिरोह से है जो देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर बनाने की साजिश रच रहा है. यह बात जरूर समझ आई कि नोटबंदी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फैसला एक धार्मिक कर्मकांड, यज्ञ, हवन जैसा था जिस का खमियाजा पद्म सिंह जैसे कई लोग अभी तक भुगत रहे हैं.

अगर पद्म सिंह यह साबित नहीं कर पाए कि ये नोट उन्होंने वाकई कोऔपरेटिव बैंक से निकाले थे तो मुद्दत तक थाने और अदालतों के चक्कर काटते हुए वे भी दूसरे करोड़ों लोगों की तरह नोटबंदी के फैसले को कोसते रहेंगे.

यह दलील भी किसी लिहाज से गले उतरने वाली नहीं है कि कोई किसान महज 1600 रुपए के नकली नोट चलाने के लिए डेढ़ लाख रुपयों में उन्हें मिलाएगा. वे उन्हें एकएक कर के कहीं भी खपा सकते थे, क्योंकि उन की तरह किसी को भी नए असली और नकली नोटों की पहचान करने का तरीका नहीं मालूम है.

सार यह है कि बड़े पैमाने पर नकली नोट चलन में आ चुके हैं और सरकार का यह दावा भी खोखला साबित हुआ है कि नोटबंदी से नकली नोटों का चलन बंद हो जाएगा.

नकदी की किल्लत

जाली नोट आम लोगों की समस्या नहीं है. उन की समस्या है नकदी का गहराता संकट जो अब आमतौर पर एटीएम से निकाली जाती है.

18 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर देशभर में लाखों शादियां थीं. शादी वाले घरों में नकदी की जरूरत किसी सुबूत की मुहताज नहीं जहां कदमकदम पर नकद पैसों की जरूरत होती है.

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, गुजरात समेत कर्नाटक और तेलंगाना में लाखों लोगों की भीड़ एटीएम के आगे लगी थी. लोग शादी की खुशियां मनाना तो दूर नकदी के लिए तरस रहे थे. कई लोग दर्जनों एटीएम पर भटके और भागे, पर हर जगह ‘नकदी नहीं है’ की तख्तियां नोटबंदी के फैसले के मकसद का बखान कर रही थीं.

भोपाल के शाहपुरा इलाके के नौकरीपेशा राकेश सक्सेना की मानें तो उन की बेटी की शादी थी पर उन्हें नकदी के लिए इतना भटकना पड़ा कि वे दूसरी तैयारियों पर ध्यान नहीं दे पाए.

18 एटीएम खंगालने के बाद राकेश सक्सेना जैसेतैसे 20 हजार रुपए ही निकाल पाए, जो नाकाफी थे. बैंक गए तो मैनेजर ने भी मुंह की तख्ती से उगल दिया कि नकदी तो यहां भी नहीं है.

हालत 70-80 के दशक के सिनेमाघरों जैसी थी जब लोग फिल्म देखने के लिए लाइन में लगते थे और टिकट खिड़की तक पहुंचने के पहले ही हाउसफुल की तख्ती टंग जाती थी.

पर फिल्म और शादी में बड़ा फर्क है. फिल्म तो कभी भी देखी जा सकती है और न भी देखी जाए तो कोई हर्ज नहीं, पर शादी जो एक बार होती है, उस में नकदी जेब में न हो तो लोगों का आत्मविश्वास डगमगाना लाजिमी बात है. तब कहीं लोगों को जा कर समझ आया कि उन का जमा पैसा भी उन का नहीं है. पर क्या करें सिवा इस के कि समधियाने वालों से कहें कि साहब, यह नेग या रस्म उधारी में कर लो, नकदी आते ही भुगतान कर देंगे.

टैंट हाउस, कैटरिंग, पंडित समेत बैंडबाजे और ढोल वाले चैक नहीं लेते. इस से कैशलैस इंडिया की हवाहवाई सोच की पोल तो खुली ही, साथ ही करोड़ों और बद्दुआएं सरकारी खाते में जमा हो गईं लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी.

कर्नाटक में तो इसलिए भी हालत बदतर थी कि वहां चुनाव के चलते लोग धड़ल्ले से नकदी निकाल रहे थे. पर दूसरे राज्यों में नकदी का संकट क्यों था, इस सवाल पर सरकार गोलमोल जवाब दे कर अपना पल्ला झाड़ती नजर आई.

जब नकदी संकट को ले कर हल्ला मचा तो सरकार बजाय सफाई देने के मुंह छिपाती नजर आई. अर्थशास्त्र की सरकारी भाषा से आम लोगों को कोई सरोकार नहीं था. एसबीआई की एक रिसर्च रिपोर्ट में यह कहा गया कि नकदी की कमी 70,000 करोड़ रुपए की है. यह रकम एटीएम से मासिक निकासी की एकतिहाई है.

एक और रिपोर्ट में कहा गया था कि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 9.8 फीसदी हो तो मार्च, 2018 तक जनता के पास मौजूद नकदी 19,400 अरब रुपए की है. इस रिपोर्ट में ईमानदारी से माना गया था कि डिजिटल लेनदेन का आकार 1200 लाख रुपए है जो नोटबंदी के तुरंत बाद के महीनों से काफी कम है.

नकदी को ले कर त्राहि इतनी थी कि अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ (एआईबीईए) ने तो परेशान हो कर रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के सिर नकदी संकट का ठीकरा फोड़ते हुए उन्हें पद से हटाने की मांग कर डाली.

संघ का आरोप था कि केंद्रीय बैंक के अनदेखी वाले रवैए के चलते देशभर में एटीएम खाली पड़े हुए हैं.

एआईबीईए के महासचिव एच. वेंकटचलम ने तो यह बयान तक दे डाला कि आरबीआई अप्रासंगिक बन गया है क्योंकि वह सरकार का पिछलग्गू बना हुआ है और अपनी ताकतों का इस्तेमाल नहीं करता है इसलिए हर मसले पर कमजोर साबित हो रहे आरबीआई गवर्नर को अपनी गलती मानते हुए इस्तीफा दे देना चाहिए या उन्हें पद से हटा देना चाहिए.

नकदी की किल्लत को अर्थशास्त्र की भाषाई चादर से ढकने की नाकाम सरकारी कोशिशों से राकेश सक्सेना जैसे करोड़ों पीडि़तों और भुक्तभोगियों को न तो कोई मतलब था और न ही उन की परेशानियां इस से दूर हो रही थीं. वे तो बस नरेंद्र मोदी को कोस कर अपनी भड़ास निकाल रहे थे.

मुसीबत सहो, छुटकारा पाओ

नोटबंदी के वक्त पहले सख्त होते और बाद में रोतेगाते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से वादा किया था कि इस से भ्रष्टाचार, आतंक, जाली नोटों का चलन वगैरह बंद हो जाएंगे. इस से थोड़ी सी परेशानी उठाने के बाद लोगों को राहत मिलेगी और देश बुलेट ट्रेन की तरह सरपट दौड़ेगा.

हकीकत सामने है कि भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों है, नकली नोटों का चलन आएदिन पद्म सिंह जैसे हजारों मामलों से उजागर होता रहता है, घूसखोरी का सूचकांक चरम पर है और आतंकवाद और फलाफूला है. अब भला किस की हिम्मत कि मोदीजी से पूछे कि क्या हुआ आप का वादा.

विपक्ष जरूर थोड़ा हमलावर हुआ जिस पर सरकार की तरफ से बयान आ गया कि हालत सुधर रही है. एटीएम में नोट पहुंचाए जा रहे हैं यानी स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है जैसी करार दे दी गई क्योंकि लोगों ने मान लिया है कि वे अपने पापों के चलते नकदी संकट की मुसीबत उठा रहे हैं. इन्हीं मुसीबतों को भोगने से पापों से छुटकारा मिलेगा इसलिए खामोशी से नोटबंदी को धार्मिक कर्मकांड मानते हुए स्वीकार लो, इस के सिवा और कोई चारा है भी नहीं.

लाख टके का सवाल यह उठ खड़ा हो रहा है कि नकदी की किल्लत हो या फिर कोई और परेशानी, लोग क्यों उन्हें चुपचाप अपने कर्मों की सजा मानते हुए स्वीकार कर रहे हैं? अभावों भरी और तकरीबन जानवरों सरीखी जिंदगी जीते भी वे खुश होने की ऐक्टिंग क्यों कर रहे हैं?

लोकतंत्र में अपने ही पैसों के लिए लोग तरसें इस से ज्यादा अलोकतांत्रिक बात और कोई हो भी नहीं सकती. पर चूंकि सरकारी ज्यादतियों और मनमानी को उन्होंने धर्म के रीतिरिवाजों की तरह स्वीकार लिया है और अपनी बदतर होती हालत और रोजमर्रा जिंदगी की परेशानियों को भी अपने कर्मों का फल मान लिया है, इसलिए जागरूकता और हकों की बात करना अभी बेमानी है.

मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी लोकप्रिय कृति ‘मधुशाला’ में एक जगह लिखा है कि ‘पीड़ा में आनंद जिसे हो आए मेरी मधुशाला…’ यही हालत आम लोगों की है. वे सरकार द्वारा दी जा रही पीड़ा से आनंदित हो रहे हैं कि चलो,  पाप कट रहे हैं. इस के बाद तो कभी अच्छे दिन आएंगे.

धर्म भी यही कहता है कि कष्ट भुगत लो, फिर मोक्ष मिलेगा. अब सरकार भी यही कर रही है और लोग मान भी रहे हैं. रही बातें लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों वगैरह की तो वे इस नश्वर संसार में मिथ्या हैं, इसलिए गुलामों की तरह जिए जाओ, यही असली आनंद है.

पति पत्नी के नाजायज संबंध

शादी के बाद पतिपत्नी का एकदूसरे पर पूरा भरोसा करना जरूरी है, पर बदलते माहौल में यह मजबूत बंधन टूटने लगा है. समाज में नाजायज संबंध देखने को मिल रहे हैं. इन के जोखिम भरे नतीजे भी सामने आ रहे हैं. एकदूसरे की हत्या तक कर दी जाती है.

राजू की शादी एक 12वीं जमात पास लड़की से हुई थी. राजू किराना दुकान चलाता था. राजू की पत्नी पढ़ने में काफी तेज थी. वह खूबसूरत भी थी.

राजू ने पत्नी का बिहार पुलिस में नौकरी के लिए फार्म भरवाया. उसे तैयारी करवाने के लिए पटना में कोचिंग दिलवाई. पत्नी की नौकरी बिहार पुलिस में लग गई. राजू बहुत खुश हुआ.

राजू अपने गांव में किराना दुकान चलाता रहा. वह समय निकाल कर अपनी पत्नी से मिलने भी चला जाया करता था.

कुछ दिनों के बाद जब राजू अपनी पत्नी से मिलने गया तो उस ने राजू को फटकार लगा कर भगा दिया और बोली, ‘‘तुम अपना रास्ता देखो. मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूंगी. मैं ने किसी दूसरे के साथ शादी कर ली है.’’

राजू ने कुछ लोगों से पता किया तो उसे मालूम हुआ कि उस की पत्नी ने एक सबइंस्पैक्टर के साथ शादी रचा ली थी. राजू निराश हो कर घर लौट गया.

इरफान की उम्र तकरीबन 35 साल थी. उस की शादी 18 साला शबाना के साथ हुई थी. शबाना इरफान की ज्यादा उम्र की वजह से नाराज रहती थी. लेकिन इरफान उसे दिलोजान से प्यार करता था. वह उस की हर फरमाइश पूरी करता था. पर शबाना को अपने बहनोई के भाई से प्यार हो गया था.

इरफान नौकरी करने कोलकाता चला गया. शबाना पूरी तरह आजाद हो गई और अपने बहनोई के भाई के साथ रंगरलियां मनाती रही.

जब इरफान कुछ दिनों के लिए अपने घर आया तो शबाना ने दूध में जहर दे कर उसे मार डाला और उस की मौत के एक साल बाद शबाना ने अपने बहनोई के भाई के साथ शादी रचा ली.

कौशल एक सरकारी स्कूल में टीचर था. उस की शादी जिस औरत के साथ हुई थी, वह सांवले रंग की और बहुत मोटी थी.

कौशल का संबंध अपनी बहन की ननद के साथ हो गया. वह अपनी बहन के परिवार वालों को पूरे भरोसे में ले कर जहां रहता था वहां उसे भी रखने लगा. कौशल ने उस लड़की के साथ कोर्ट में शादी भी रचा ली.

पहली बीवी को जब मालूम हुआ तो घर में कुहराम मच गया. कौशल को एक चाल सूझी. उस ने पैसे दे कर एक अपराधी से अपनी पहली बीवी की हत्या करवा दी.

पुलिस ने हत्या के मामले की तहकीकात की तो पता चला कि कौशल कुसूरवार है. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. कोर्ट ने उसे ताउम्र कैद की सजा सुनाई.

राजकिशोर रोजगार की तलाश में मुंबई चला गया और एक कपड़ा दुकान में बतौर सेल्समैन काम करने लगा. उसे कपड़ा दुकानदार की बेटी चाहने लगी. मौका पा कर वह उस से जिस्मानी संबंध भी बनाने लगा.

राजकिशोर की पत्नी गांव से जब फोन करती तो वह बेमन से बात करता. एक दिन लड़की की मां ने उन्हें संबंध बनाते देख लिया. उस ने अपने पति को बताया.

लड़की के पिता ने राजकिशोर की हत्या करवा दी. राजकिशोर के घर वाले आज भी इस इंतजार में हैं कि वह घर जरूर आएगा, पर उन्हें पता ही नहीं कि वह तो अब इस दुनिया में ही नहीं है.

इस तरह के सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं. अपने पति या पत्नी के रहते भी लोग दूसरे के साथ नाजायज जिस्मानी संबंध बना रहे हैं. क्या है इस की वजह:

* आजकल केवल मर्द ही नहीं, बल्कि औरतें भी छोटेमोटे लालच में दूसरे के साथ नाजायज जिस्मानी संबंध बनाने से परहेज नहीं कर रही हैं.

* कुछ मर्द अपनी पत्नी को बेवजह शक की नजर से देखते रहते हैं. औरतें चाहती हैं कि वे अपने पति से खूब बातें करें. लेकिन जब बातचीत नहीं हो पाती है तो रिश्तों में दरार आ जाती है और धोखा देने का डर बढ़ जाता है.

* शादी के बाद घर में अगर रोज झगड़ा हो रहा है, तूतूमैंमैं से बात मारपीट तक पहुंच जाती है, तो पतिपत्नी का एकदूसरे से विश्वास उठ जाता है. उन से हमदर्दी रखने वाले के प्रति उन का खिंचाव बढ़ता चला जाता है.

* अगर कोई मर्द या औरत अपने सैक्स पार्टनर से संतुष्ट नहीं हो पाता है तो दूसरे के साथ जिस्मानी संबंध बनाने का जोखिम बढ़ जाता है.

* शादी से पहले किसी लड़के को किसी लड़की के साथ या किसी लड़की को किसी लड़के के साथ प्यार है, वे एकदूसरे को भुला नहीं पाते हैं और उन का मिलनाजुलना जारी रहता है. कई मामलों में पहले प्यार की वजह से पति या पत्नी की हत्या तक करवा दी जाती है.

* आपस में विचारों का सही ढंग से तालमेल नहीं बैठने की वजह से भी झगड़े होते हैं. इस से बचने के लिए कई औरतें दूसरे मर्दों को अपनी परेशानियां बताती हैं. यह लगाव दोस्ती में बदल जाता है और जिस्मानी संबंध तक बन जाता है.

* बहुत से लोगों को दूसरों के साथ संबंध बनाने में ज्यादा मजा आता है.

* अचानक कोई दूसरा खूबसूरत दिखने लगता है. उस के बात करने का अंदाज या फिर उस के बरताव से उस की ओर खिंच जाते हैं. नजदीकियां बढ़ने लगती हैं. बाद में वे एकदूसरे को जिस्म सौंपने में गुरेज नहीं कर पाते हैं.

* पत्नी अपने बच्चों पर ज्यादा ध्यान देने लगती है. इस का नतीजा यह होता है कि पति नए रिश्ते की तलाश में दूसरी औरत के साथ संबंध बना लेता है.

* पति अपने काम में इतना मसरूफ रहता है कि अपनी पत्नी को वह समय ही नहीं दे पाता. इस की वजह से भी पत्नी का संबंध दूसरे के साथ बनने का जोखिम बढ़ जाता है.

* शादी के बाद बहुत से नौजवान काम की तलाश में अपनी पत्नी को छोड़ कर दूसरी जगह चले जाते हैं. कुछ तो शादी के बाद विदेश तक चले जाते हैं और कम से कम 3 साल बाद लौटते हैं. आपस में न मिल पाने के चलते किसी दूसरे के साथ संबंध बनने का डर मजबूत हो जाता?है.

शादी के बाद पतिपत्नी का एकदूसरे के प्रति वफादार रहना उन का फर्ज है, पर फैशन के दौर में किसी दूसरे के साथ नाजायज संबंध बनने का चलन बढ़ता जा रहा है जो समाज, परिवार और देश के लिए खतरनाक है.

पोर्न स्टार से रियलिटी शो को मिलती है टीआरपी!

सनी लियोनी को जिस तरह से भारतीय फिल्मों में कैरियर बनाने में कामयाबी मिली है, उस के बाद से कई पोर्न स्टार लड़कियां भारतीय इंडस्ट्री में आ कर कैरियर बनाना चाहती हैं.

रशियन पोर्न स्टार मिया मालकोवा हिंदी फिल्मों के जानेमाने फिल्मकार व डायरैक्टर रामगोपाल वर्मा की वैब सीरीज ‘गौड, सैक्स ऐंड ट्रुथ’ में काम कर चुकी हैं.

सोशल मीडिया पर इस के फोटो वायरल होने के बाद लोगों की बढ़ी दिलचस्पी से साफ है कि मिया मालकोवा को भी सनी लियोनी जैसी लोकप्रियता हासिल हो सकती है.

इस की सब से बड़ी वजह यह है कि भारतीय समाज अब पोर्न स्टार को ले कर अपनी पुरानी दकियानूसी सोच से बाहर निकल रहा है. सनी लियोनी को कलाकार के रूप में पैसा और शोहरत दोनों मिल रहे हैं.

सनी लियोनी को जब टैलीविजन के एक शो ‘बिग बौस’ में लाया गया था तो शो बनाने वालों पर आरोप लगा था कि वे अपने कार्यक्रम की टीआरपी बढ़ाने के लिए सनी लियोनी का सहारा ले रहे हैं. उस समय पहली बार हिंदुस्तानी दर्शकों को पता चला था कि सनी लियोनी पोर्न फिल्मों की बहुत बड़ी कलाकार हैं.

पोर्न फिल्मों और उस के कलाकारों को हिंदुस्तानी दर्शक पसंद करेंगे, इस बात को लेकर एक शक सा सभी के मन में था. फिल्मी दुनिया के जानकार मान रहे थे कि पोर्न फिल्मों का विरोधी देश सनी लियोनी को कभी पसंद नहीं करेगा. खुद सनी लियोनी को भी यही लगता था.

कनाडा में पैदा हुई सनी लियोनी भारतीय मूल की पंजाबी लड़की हैं. 5 फुट, 4 इंच लंबी सनी लियोनी गोरे रंग की 50 किलो वजन की हैं. पोर्न फिल्मों में आने से पहले वे जरमन बेकरी में काम करती थीं. इस के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए एक टैक्स फर्म में काम किया था. फिर उन की मुलाकात एक फोटोग्राफर से हुई जो पोर्न फोटो खींचता था.

उस फोटोग्राफर के कहने पर सनी लियोनी ने पोर्न फोटो शूट कराए, फिर यहीं से उन की पोर्न फिल्मों का सफर शुरू हो गया.

साल 2011 में सनी लियोनी ने डेनियल वेबर से शादी की. भारतीय फिल्म उद्योग में आने के बाद उन्हें भारी कामयाबी मिली.

पोर्न का देशी बाजार

सनी लियोनी के बाद भारतीय दर्शकों में पोर्न फिल्मों का क्रेज तेजी से बढ़ा है. विदेशों में पोर्न फिल्मों का उद्योग हिंदी फिल्मों जैसा ही है. इन फिल्मों के भी कलाकार होते हैं, जो दूसरे कलाकारों  जैसे होते हैं. उन का अपना घरपरिवार होता है.

अमेरिका के लौस एंजिल्स में पोर्न फिल्मों की शूटिंग के लिए पूरी तरह से कानूनी इजाजत दी जाती है. वहां साल में जितनी फिल्मों की शूटिंग के लिए इजाजत ली जाती है उन में से 5 फीसदी पोर्न फिल्में होती हैं.

भारत में भले ही पोर्न फिल्में बनाने के लिए कानूनी इजाजत न हो, पर चोरीछिपे पिछले 20 सालों से ऐसी फिल्मेंबनती रही हैं.

टैक्नोलौजी में बदलाव के साथसाथ पोर्न फिल्मों के कारोबार में भी बदलाव आया है. आज इंटरनैट, सीडी और मोबाइल फोन के जरीए पोर्न फिल्मों का मजा देश के हर तबके के लोग ले रहे हैं.

एक सर्वे के मुताबिक, इंटरनैट का इस्तेमाल करने वाले 80 फीसदी लोग कभी न कभी पोर्न फिल्में जरूर देखते हैं. 60 फीसदी लोग इस के पक्के दर्शक हैं. 20 फीसदीलोग इंटरनैट से पोर्न फिल्मों की खरीदारी करते हैं.

ज्यादातर लोग इंटरनैट पर ऐसी फिल्में देखते हैं, जिन के लिए उन को अलग से पैसा देने की जरूरत नहीं पड़ती है.

ज्यादातर हिंदुस्तानी दर्शक विदेशी पोर्न फिल्मों को पसंद करते हैं. कुछ ऐसे लोग भी हैं जो देशी पोर्न फिल्में देखने के आदी हैं. यही वजह है कि इंटरनैट पर देशी पोर्न फिल्मों की अलग साइटें तैयार होने लगी हैं.

विदेशों में बनती देशी पोर्न

अभी तक ज्यादातर देशी पोर्न फिल्में चोरीछिपे बनती थीं, जिन की फोटोग्राफी अच्छी नहीं होती थी. अब हिंदुस्तानी लड़केलड़कियों को ले कर विदेशों में फिल्में बनने लगी हैं. इन को सीडी और इंटरनैट के जरीए बेचा जा रहा है.

मुंबई में चोरीछिपे पोर्न फिल्में बनाने वाले भारतीय फिल्मकारों के लिए अब विदेशों में यह काम करना आसान हो गया है.

एक ऐसे ही फिल्मकार का कहना है, ‘‘अब पोर्न फिल्मों में काम करनेसे देशी लड़कियों को कोई परहेज नहीं है. कुछ शादीशुदा लड़कियां भी इस के लिए तैयार होती हैं.

‘‘देश के तमाम हिस्सों से मुंबई में काम की तलाश में आने वाली कुछ लड़कियां ऐसी फिल्मों में काम कर के पैसे कमाना चाहती हैं. सनी लियोनी के बाद इन को लगता है कि देश के लोग इन्हें भी इज्जत की नजर से देख सकते हैं. ये लड़कियां विदेशों में पोर्न फिल्मों की शूटिंग को तवज्जुह देती हैं.’’

देशी पोर्न फिल्मों में कालगर्ल भी काम करने को तैयार हो जाती हैं. इन में से ज्यादातर को अपना चेहरा दिखाने से कोई गुरेज भी नहीं होता है. ये विदेशी पोर्न फिल्में देख कर देशी पोर्न फिल्में तैयार कर लेती हैं.

देशी पोर्न फिल्मों का एक बड़ा क्षेत्र बैंकौक बन गया है. वहां पर देशी लड़कियों को ले कर पोर्न फिल्में तैयार हो रही हैं. इन लड़कियों को केवल शूटिंग करने के लिए ही बैंकौक भेजा जाता है. ऐसी पोर्न फिल्मों की बड़ी मांग अपने देश के अलावा पाकिस्तान, अरब देशों और नेपाल में होती है.

अरब देशों में पोर्न फिल्मों की शूटिंग भले ही न होती हो, पर वहां पर भी पोर्न फिल्मों की मांग सब से ज्यादा है. वे लोग पोर्न फिल्में खरीदने के लिए पैसा भी खर्च करते हैं.

कौमार्य भंग होती पोर्न फिल्मों की ज्यादा मांग अरब देशों में होती है. इस के साथ ही वहां सैक्स के दूसरे क्रूर तरीके दिखाने वाली फिल्में भी देखी जाती हैं.

ऐसे में अरब देश की औरतों के किरदार निभाने के लिए भी भारतीय लड़कियों का सहारा लिया जाता है. इन को मेकअप और कपड़ों से अरब देश की औरतों का लुक भी देने की कोशिश की जाती है.

भारतीय लड़कियां टूरिस्ट वीजा ले कर विदेशों में जाती हैं. वहां पोर्न फिल्मों की शूटिंग कर के वापस चली आती हैं.

इंटरनैट पर पोर्न फिल्मों के सहारे तमाम तरह के दूसरे सैक्स के सामान बेचने का सहारा भी लिया जाता है. इन के लिए पोर्न फिल्मों की साइटें सब से बड़ा सहारा बन गई हैं. इन सैक्सी इतिश्हारों में मर्द के अंग को लंबा और मोटा करने के लिए दवा, सैक्सी बातचीत करने वाली लड़कियों का प्रचार, पोर्न फिल्मों के कुछ सीन दिखा कर पूरी फिल्में और सैक्सी खिलौने बेचने का काम खूब होता है.

हर उम्र को लुभाती हैं

नैट बैंकिंग के शुरू होने के बाद इस क्षेत्र में भुगतान करना आसान हो गया है. इन फिल्मों का सब से बड़ा दीवाना आज का नौजवान तबका है.

इस के अलावा 40 साल के बाद की उम्र के लोग भी पोर्न फिल्मों का पूरा मजा लेते हैं. अब लड़के ही नहीं लड़कियां भी इन को खूब देखती हैं.

वैसे तो भारत में सैक्स को ले कर ज्यादा भरोसे लायक सर्वे नहीं होते हैं, फिर भी जो होते हैं उन में से एक सर्वे से पता चलता है कि 30 फीसदी लड़कियां पोर्न फिल्में देखने का शौक रखती हैं. 38 फीसदी शादीशुदा लड़के और 20 फीसदी लड़कियां पोर्न फिल्मों को देखते हैं.

गांव और शहर के आधार पर जब इस का सर्वे किया गया तो पता चला कि शहरों के 35 फीसदी और गांव के 26 फीसदी लड़के पोर्न फिल्में देखते हैं.

लड़के जहां शादी से पहले अपने साथियों के साथ पोर्न फिल्में देखने की शुरुआत करते हैं, वहीं लड़कियां शादी के बाद पतियों की पहल पर पोर्न फिल्में देखती हैं.

शादीशुदा लड़कियों ने सर्वे में बताया कि उन के  पतिउन्हें पोर्न फिल्में सैक्स में बढ़ावा देने के लिए दिखाते हैं.

सर्वे से यह भी पता चलता है कि गांव के 17 फीसदी और शहरों में रहने वाले 10 फीसदी लड़के शादी से पहले सैक्स का अनुभव ले चुके थे.

गांव में रहने वाली 4 फीसदी लड़कियां और शहरों में रहने वाली 2 फीसदी लड़कियां शादी से पहले ही सैक्स का अनुभव कर चुकी होती हैं.

गांव हो या शहर, पोर्न फिल्मों का चलन बढ़ाने में मोबाइल फोन का सब से अहम रोल रहा है. मोबाइल फोन पर ऐसी फिल्में लोड करने का अलग कारोबार चल पड़ा है. 1,500 से 2,000 रुपए की कीमत में ऐसे मोबाइल फोन बाजार में आ गए हैं जिन में 2 जीबी से ले कर 10 जीबी तक के मैमोरी कार्ड लगते हैं. ये कार्ड 200 रुपए की कीमत में मिल जाते हैं. इस कार्ड में ऐसी पोर्न फिल्में आसानी से लोड कराई जा सकती हैं.

जिन लोगों के पास कंप्यूटर या लैपटौप जैसे महंगे साधन नहीं हैं उन के लिए मोबाइल फोन सब से अच्छा साधन बन गया है. पहले कुछ लोग साइबर शौप पर जाते थे, पर वहां परेशानी होती थी. अब जिन लोगों के मोबाइल फोन में इंटरनैट चलाने की सुविधा है वे सीधे पोर्न फिल्में देख सकते हैं.

जागरूक करतीं पोर्न फिल्में   

पोर्नोग्राफी और सैक्स ऐजूकेशन की किताबों के बीच एक बहुत ही महीन सी दीवार होती है. इस तरह की जानकारी काफी हद तक पतिपत्नी के बीच जिस्मानी संबंधों को ले कर फैली हुई भ्रांतियों को दूर करती है. इस को गलत तब कहा जा सकता है जब इस को गलत लोग देखें या फिर जबरदस्ती किसी लड़की या लड़के को दिखाएं.

पहले बड़ा परिवार होता था. इन में भाभी, बड़ी ननद, बूआ और बड़ी बहन जैसे तमाम रिश्ते होते थे जो लड़की को शादी के बाद जिस्मानी संबंधों के बारे में बताती थीं.

अब इस तरह के रिश्ते कम हो गए हैं. लड़कियां अपने कैरियर और दूसरे मसलों में इतना उलझी हुई होती हैं कि वे अपने परिवार के लोगों से इतना नहीं घुलमिल पाती हैं कि उन से जिस्मानी संबंधों पर बात कर सके. इस के चलते शादी के बाद जिस्मानी संबंधों को ले कर वे अनजान ही बनी रहती हैं.

जिन दोस्तों या सहेलियों के जरीए उन को पता चलता है, वह भी सही जानकारी नहीं दे पाते हैं. कभीकभी इन जानकारियों की कमी में लड़कियों को कुंआरी मां बनने तक की नौबत आ जाती है.

आमतौर पर अपने देश में इस तरह की सैक्स ऐजूकेशन को गलत माना जाता है. इस की कमी में लड़कियां सैक्स से जुड़ी बीमारियों का शिकार हो जाती हैं.

अपने देश में भले ही सैक्स सिखाने वाली किताबों को पोर्नोग्राफी माना जाता हो लेकिन दूसरे देशों में इस को इलाज के रूप में लिया जाता है.

एक डाक्टर बताते हैं, ‘‘जब मेरे पास कोई लड़का इस बात की शिकायत ले कर आता है कि वह नामर्दी का शिकार है, उस के अंग में तनाव नहीं आता है तो यह देखना पड़ता है कि यह तनाव हमेशा नहीं आता या फिर कभीकभी आता भी है.

‘‘जब लड़का कहता है कि सैक्स की किताबें पढ़ कर या फिर ब्लू फिल्में देख कर तनाव आता है, तब यह पता चलता है कि उस लड़के की नामर्दी केवल मन का वहम है. अगर इस हालत में भी तनाव नहीं आता है तो उस का इलाज थोड़ा मुश्किल हो जाता है.’’

विदेशों में पोर्नोग्राफी को ले कर कई तरह की रिसर्च होती रहती हैं. इसी तरह की एक रिसर्च बताती है कि ब्लू फिल्में देखने से आदमी के शुक्राणुओं की गति तेज हो जाती हैं.पोर्नोग्राफी को विदेशों में  एक कला की तरह देखा जाता है. कुछ कलाकार तो दूसरी फिल्मों में भी काम कर के अपना नाम कमाते हैं.

सैक्स संबंधों की काउंसलिंग करने वाले कुछ डाक्टरों का कहना है कि अपने देश में भी पोर्न फिल्मों को दिखा कर नामर्दी का इलाज करना कानूनी रूप से सही माना जाना चाहिए. कानून को इस बात की इजाजत देने के बारे में सोचना चाहिए. जब नामर्दी दूर करने के लिए दवाएं बनाई जाती हैं तो उन का असर देखने के लिए भी ब्लू फिल्मों का इस्तेमाल किया जाता है.

पोर्नोग्राफी का इस्तेमाल जब पतिपत्नी आपसी समझदारी के साथ करते हैं तो उन के रिश्ते रोचक हो जाते हैं. सैक्स संबंध शादीशुदा जोड़ों की बड़ी जरूरत होते हैं. कभीकभी जब ये संबंध टूटते हैं तो इन का असर शादीशुदा जिंदगी पर भी पड़ता है.

हमारे समाज में औरतों को सैक्स के बारे में अपनी बात कहने से रोका जाता है. इस के उलट आदमी सैक्स को ले कर हर तरह का प्रयोग करना चाहता है.

जब पतिपत्नी के बीच इस तरह की परेशानी आती है तो पति दूसरी औरत की तरफ भागने लगता है. अगर दूसरी औरत वाले मामले को देखें तो उस की सब से बड़ी वजह सैक्स ही है.

हमारे समाज में औरतों को कभी बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया. कभी उस को देवी बना दिया गया तो कभी कोठे पर बिठा दिया गया. उस को अपनी जिंदगी जीने के बारे में सिखाया ही नहीं गया.

आज भी सैक्स को ले कर पत्नी में एक झिझक रहती है. उस को लगता है कि अगर सैक्स को ले कर उस ने पहल की तो उसे ही बदचलन मान लिया जाएगा. इसलिए वह चुप ही रहती है.

इस तरह के जोड़ों में तनाव और लड़ाईझगड़ा ज्यादा होता है. जिन लोगों की सैक्स जिंदगी ठीक होती है, वे हंसीखुशी व तालमेल के साथ रहते हैं.

पिंकी के साथ सफदर ने क्या किया

25 वर्षीय पिंकी चंदा हैदराबाद में पुरानी सिटी के मलकजगिरी इलाके में अपने परिवार के साथ रहती थी. वह शेखर चंदा की एकलौती संतान थी. शेखर चंदा का अपना छोटा सा घरसंसार था. वह अच्छाभला कमाते थे, इसलिए उन के पास हर तरह की भौतिक सुखसुविधा थी. इन सब से अलग उन में जो खासियत थी, वह यह थी कि वे स्वच्छंद विचारों वाले जीवंत इंसान थे. इसी परिपाटी पर उन का परिवार भी चलता था.

शेखर चंदा का सपना था कि वह अपनी एकलौती बेटी को पढ़ालिखा कर इस काबिल बना दें कि वह कोई बड़ी अफसर बन जाए. पिंकी का भी यही सपना था कि वह कुछ ऐसा करे, जिस से मांबाप का नाम इज्जत से लिया जाए.

पिंकी बातचीत करने और पढ़नेलिखने में अव्वल थी. वह मन लगा कर पढ़ती रही. ग्रैजुएशन करने के बाद पिंकी चंदा को हैदराबाद के सोमाजुगुडा क्षेत्र की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी मिल गई. वह उस कंपनी के कंप्यूटर सैक्शन में थी. यह सन 2013-14 की बात है.

जिस बहुराष्ट्रीय कंपनी में पिंकी जौब करती थी, उसी कंपनी के कंप्यूटर सैक्शन में दारुलशफा का रहने वाला सफदर अब्बास खलीम अख्तर जैदी नाम का युवक भी नौकरी करता था. वह सौफ्टवेयर इंजीनियर था. सफदर जैदी बेहद ईमानदार, मेहनती और लगनशील युवक था. वाकपटुता उस की रगरग में भरी हुई थी. अपनी कलात्मक बातों से वह किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने में माहिर था.

पिंकी चंदा सफदर जैदी के बगल वाली सीट पर बैठती थी. उस की बातों की वह भी मुरीद थी. सफदर जब भी फुरसत में होता या उसे मौका मिलता तो वह अपनी बातों से सभी को गुदगुदाता रहता था.

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हंसीठिठोली के बीच पिंकी चंदा और सफदर जैदी जल्द ही आपस में घुलमिल गए और अच्छे दोस्त बन गए. खास बात यह थी कि दोनों ही खुले विचारों के थे और उन के विचार आपस में काफी मिलतेजुलते थे.

एक दिन बातोंबातों में पिंकी सफदर से पूछ बैठी, ‘‘सफदर, मैं तुम से एक बात पूछूं, बुरा तो नहीं मानोगे?’’

‘‘नहीं, बिलकुल भी बुरा नहीं मानूंगा. पूछो.’’ सफदर ने जवाब दिया.

‘‘हर वक्त हंसीठिठोली करते तुम्हारा मुंह नहीं थकता?’’ पिंकी ने कहा.

‘‘जी नहीं मैडम, मेरा बस चले तो मैं 24 घंटे टेपरिकौर्डर बना रहूं. लेकिन कोई ऐसा होने दे तब न.’’ सफदर जैदी ने कहा, ‘‘एक बात और बताऊं मैडम, जब मैं घर पर इस तरह की बातें करता हूं तो सभी लोग एंजौय करते हैं. मेरी बातों से उन का एंटरटेनमेंट होता है.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ, ये मैडममैडम क्या लगा रखा है.’’ पिंकी चंदा तुनक कर बोली, ‘‘तुम मेरा नाम ले कर नहीं बुला सकते क्या?’’

‘‘जो हुकूम मल्लिका-ए-आला.’’

‘‘क्या? क्या कहा तुम ने?’’ वह मुसकरा कर बोली.

‘‘मेरे कहने का मतलब है कि आज से मैं तुम्हें पिंकी कह कर बुलाऊंगा, पिंकी…पिंकी… पिंकी.’’ सफदर ने अपने स्टाइल में कहा.

शाम को छुट्टी के बाद औफिस से निकलते वक्त सफदर ने पिंकी को अपनी कार में बैठने का औफर दिया तो वह इनकार नहीं कर पाई. दोनों एक ही राह के मुसाफिर थे. पिंकी का घर रास्ते में पहले पड़ता था.

उस दिन के बाद से सफदर औफिस से निकल कर पिंकी को उस के घर छोड़ कर जाने लगा. धीरेधीरे सफदर का पिंकी के घर भी आनाजाना शुरू हो गया. अपनी वाकपटुता से उस ने पिंकी के मांबाप के दिलों में जगह बना ली. पिंकी के मांबाप सफदर के व्यवहार से काफी खुश थे.

चूंकि शेखर चंदा भी खुले विचारों के इंसान थे, इसलिए सफदर की कंपनी उन्हें अच्छी लगती थी. जब भी सफदर पिंकी को औफिस से घर छोड़ने आता, शेखर चंदा उसे घर में बुला लेते थे और चाय पिलाने के बाद ही घर से जाने देते थे. रोजमर्रा के साथ से पिंकी चंदा और सफदर जैदी की दोस्ती प्यार में बदल गई.

पिंकी और सफदर दोनों बालिग थे. दोनों समाज के रीतिरिवाजों और ऊंचनीच के भेदभाव को बखूबी जानते और समझते थे. उन के बीच में सिर्फ समुदाय का फर्क था. दोनों अलगअलग समुदाय से थे. प्यार में उन के बीच यह भेद भी मिट गया था कि वे 2 भिन्नभिन्न समुदायों के हैं. धीरेधीरे पिंकी और सफदर के घर वालों को उन के प्रेमप्रसंग की बातें पता चल गई थीं.

पिंकी के पिता शेखर चंदा और मां श्रेया चंदा को बेटी के प्रेमप्रसंग की बात पता चली तो वे हैरान रह गए. वे भले ही लाख खुले विचारों के थे, भले ही सफदर को सम्मान देते थे लेकिन यह बात पसंद नहीं थी कि उन की बेटी किसी दूसरे धर्म के लड़के से प्यार करे.

उन्होंने पिंकी को समझाया कि सफदर का साथ छोड़ दे. इस बात पर पिंकी मांबाप से लड़ बैठी. उस ने साफ शब्दों में कह दिया कि वह सफदर से प्रेम करती है और उसी से शादी करेगी. यही हाल सफदर का था.

उस के अब्बू खलीम अख्तर जैदी और चाचा हैदर जैदी को उस के प्रेम के बारे में पता चला तो वे आगबबूला हो गए. उन्होंने उस से कहा कि वह पिंकी से मिलना बंद कर दे. लेकिन सफदर बगावत पर उतर आया. उस ने कह दिया कि वह किसी कीमत पर पिंकी को नहीं छोड़ेगा, बल्कि निकाह भी उसी से करेगा.

इस के बाद सफदर ने पिंकी के घर जाना बंद कर दिया. वह उसे घर से कुछ देर पहले ही छोड़ कर अपने घर चला जाता था. जिस दिन से मांबाप ने पिंकी को हिदायत दी थी, तब से वह अपने प्यार को ले कर परेशान रहती थी. इसी चिंता में एक दिन उस ने सफदर से पूछा, ‘‘सफदर, प्यार तो हम दोनों एकदूसरे से करते ही हैं. तुम यह बताओ कि मुझे धोखा तो नहीं दोगे?’’

‘‘ये कैसी बेतुकी बात कर रही हो पिंकी, मैं वादा करता हूं कि जीवन भर मैं तुम्हारा साथ निभाऊंगा.’’ सफदर बोला, ‘‘एक बात और है.’’

‘‘वो क्या?’’ पिंकी चौंकी.

‘‘हम दोनों के धर्म अलगअलग हैं. मेरे मन में एक सवाल उठ रहा है कि क्या तुम्हारे घर वाले इस के लिए तैयार होंगे?’’ सफदर ने गंभीर हो कर कहा.

‘‘देखो सफदर, मेरे घर वाले राजी हों न हों, मैं ने जो फैसला ले लिया उस से मैं हरगिज पीछे नहीं हटूंगी.’’ पिंकी दृढ़ता से बोली.

‘‘पिंकी, जब तुम मेरे लिए अपने घर वालों से बगावत करने को तैयार हो तो मैं भी तुम्हारी खातिर कुछ भी करने को तैयार हूं.’’

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प्रेमी के ये शब्द सुनते ही पिंकी उस के सीने से लग गई. उस का स्पर्श पाते ही सफदर के तनबदन में आग लग गई. कुछ ही देर में दोनों एकदूसरे में खो गए. उन के बीच एक तूफान आ कर गुजर गया.

उस दिन के बाद से उन दोनों के बीच जो भी दूरियां रहीं, वो सब मिट गईं. अब तो जब भी उन्हें मौका मिलता, दोनों दो जिस्म एक जान हो जाते. धीरेधीरे पिंकी और सफदर के मांबाप जान चुके थे कि दोनों एक दूसरे को बहुत मोहब्बत करते हैं. फिर एक दिन पिंकी ने अपने मांबाप को अपने प्यार के बारे में बता दिया.

पिंकी के मांबाप नहीं चाहते थे कि वह उस की शादी दूसरे धर्म के लड़के के साथ करें. लेकिन पिंकी उन की बहुत लाडली थी, इसलिए बेटी की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा.

यही हाल सफदर के घर वालों का भी था. सफदर के अब्बू खलीम जैदी और चाचा हैदर जैदी इस शादी के खिलाफ थे लेकिन बेटे के फैसले के आगे आखिर उन्हें भी विवश होना पड़ा.

बच्चों की खुशी की खातिर दोनों परिवारों के सदस्यों ने सोच कर अपने खयालातों से समझौता कर लिया. उन की खुशी में ही उन्होंने अपनी खुशी समझी. मांबाप की तरफ से हरी झंडी मिलते ही उन की मुराद पूरी हो गई. इसी बीच सफदर की जिंदगी से एक और खुशी आ कर जुड़ गई.

सफदर को दुबई की एक कंपनी में नौकरी मिल गई. नौकरी मिलने के बाद वह दुबई जाने की तैयारी करने लगा तो पिंकी उस के साथ जाने की जिद पर अड़ गई. इस पर न तो पिंकी के मांबाप ने ऐतराज किया और न ही सफदर के मांबाप ने.

पिंकी की जिद पर सफदर उसे दुबई ले जाने के लिए तैयार हो गया. उस का पासपोर्ट भी बनवा दिया. सब कुछ होने के बाद सफदर और उस के परिवार वालों ने पिंकी के सामने एक शर्त रख दी कि वह दुबई तभी जा सकती है, जब वह इसलाम कबूल करेगी. यह सुन कर पिंकी और उस के मांबाप अवाक रह गए. उन के लिए यह अप्रत्याशित शर्त रख दी.

लेकिन सफदर के प्यार में पागल पिंकी धर्म परिवर्तन के लिए भी तैयार हो गई. पिंकी के इस फैसले से उस के मांबाप को काफी दुख हुआ, लेकिन वे कर भी क्या सकते थे. औलाद के सामने वे हारे हुए थे, इसलिए उन्होंने उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

हैदराबाद हज हाउस में पिंकी का धर्म परिवर्तन करा दिया गया. हिंदू धर्म छोड़ कर पिंकी ने इसलाम कबूल कर लिया. उस का नाम पिंकी चंदा से फातिमा जेहरा रखा गया. उस ने मुसलिम रवायतों को अपनाया, इबादत की. सफदर के कहे मुतातिब हिजाब पहनना भी शुरू कर दिया. यह सन 2013-14 की बात है.

सफदर पिंकी को ले कर दुबई चला गया. जिस कंपनी में सफदर की नौकरी लगी थी, उस ने वहीं पर फातिमा जेहरा उर्फ पिंकी की नौकरी भी लगवा दी. कंपनी की ओर से दोनों के रहने का इंतजाम अलगअलग हौस्टलों में किया गया था. वे एकदूसरे से मिलते रहे. धीरेधीरे पिंकी और सफदर को दुबई में रहते 4 साल बीत गए.

इस बीच पिंकी सफदर से पूछती रही कि वह निकाह कब करेगा, इस पर सफदर कोई तवज्जो नहीं देता था, बल्कि यह कह कर बात टालने की कोशिश करता था कि अभी जल्दी क्या है, शादी भी कर लेंगे, थोड़ा और सब्र करो.

एक ही जवाब सुनतेसुनते पिंकी के कान पक गए थे. पिंकी जो पहले सफदर पर पागलों की तरह मरती थी, अब वह अपने लिए गए फैसले पर सोच कर तनाव में रहने लगी.

सफदर के हावभाव में भी काफी बदलाव आ गया था. न तो वह पहले की तरह पिंकी से बात करता था और न ही उसे लिफ्ट देता था. सफदर के ये हावभाव पिंकी को अच्छे नहीं लग रहे थे. पता नहीं क्यों सफदर को ले कर उस के मन में नकारात्मक भावनाएं हावी होती जा रही थीं.

अब पिंकी को महसूस होने लगा था कि उस ने मांबाप से बगावत कर के अच्छा नहीं किया. उस ने सोचा कि यदि सफदर ने उसे सचमुच में धोखा दे दिया तो उस की तो जिंदगी बरबाद हो जाएगी. कहीं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी. इसी तरह की चिंता में उस का बुरा हाल हो रहा था.

जिस बात का पिंकी को डर था, वह बात उसे सच होती दिख रही थी. प्यार के चक्कर में उस ने अपना सब कुछ गंवा दिया था. जब वह शादी के लिए सफदर पर दबाव डालती तो वह परेशान हो जाता था.

सफदर की सोच सचमुच बदल चुकी थी, उस का मुख्य उद्देश्य उस के जिस्म से खेलना था. अब वह यह सोच रहा था कि उस से किस तरह पीछा छुड़ाए.

वह उस से पीछा छुड़ाने के उपाय खोजने लगा. इस के बाद तो वह छोटीछोटी बातों पर पिंकी से कलह करने लगा. पिंकी की छोटी सी बात भी उसे कांटे की तरह चुभने लगी थी. रोजरोज की कलह से तंग आ कर एक दिन पिंकी उस से पूछ बैठी, ‘‘पिछले कुछ दिनों से देख रही हूं कि तुम बदलेबदले से नजर आ रहे हो. बात क्या है सफदर?’’

‘‘मैं नहीं बदल रहा बल्कि तुम्हारे तेवर ही बदल गए हैं.’’ सफदर ने झल्ला कर जवाब दिया.

‘‘तुम ने मुझ में ऐसा क्या देख लिया कि तुम्हें मेरे तेवर बदले नजर आने लगे?’’ वह बोली.

‘‘छोड़ो यार, क्या बताऊं?’’ सफदर ने कहा.

‘‘नहीं, तुम बता दो कि मुझ में ऐसा क्या देख लिया कि तुम्हें मेरे तेवर बदले नजर आ रहे हैं?’’

॒‘‘सच बताऊं, तुम्हारा यही एटीट्यूड मुझे अच्छा नहीं लगता. तुम किसी भी बात को पकड़ कर जिद पर अड़ जाती हो.’’ सफदर ने बताया.

‘‘अब तो तुम्हें मेरी बात बुरी लगेगी ही. सच्ची बात जो कह दी मैं ने. शादी के लिए 4 सालों से आजकलआजकल कर के टरका रहे हो. इसी से तुम्हारी नीयत का पता चलता है.’’ वह गुस्से में बोली.

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‘‘हां, टरका रहा था मैं.’’ सफदर ने भी गुस्से में जवाब दिया, ‘‘जाओ, जो करना है, कर लो. अब मैं तुम से निकाह नहीं करूंगा.’’

‘‘क्यों? जरा मैं भी तो जानूं कि तुम मुझ से निकाह क्यों नहीं करोगे?’’

‘‘इसलिए कि तुम ने इसलाम धर्म का ईमानदारी से पालन नहीं किया है. न तो तुम 5 वक्त की नमाजी बन पाई और न हिजरा का पालन किया, इसलिए मैं तुम से निकाह नहीं कर सकता, समझी.’’ सफदर ने बताया.

‘‘धोखेबाज, मक्कार.’’ पिंकी सफदर पर फट पड़ी, ‘‘मेरी जिंदगी तो खराब हो ही गई, पर मैं तुम्हें भी चैन से नहीं जीने दूंगी. मैं इतनी आसानी से तुम्हें छोड़ने वाली नहीं हूं. तुम पर यकीन कर के मैं ने बहुत बड़ी गलती की. तुम्हारे ही कारण मैं अपने मांबाप से बगावत कर बैठी और तुम कहते हो कि मैं ने तुम्हारे धर्म का पालन नहीं किया. अरे 5 वक्त नमाज पढ़ती थी मैं. बुरका पहन कर बाहर निकलती थी मैं. तुम्हारे लिए मैं वह सब करती थी जो तुम ने कहा. इतने पर भी तुम कहते हो कि शादी नहीं करूंगा. तुम्हें मैं तुम्हारी औकात बता कर रहूंगी. इस की सजा जरूर दिलाऊंगी, तभी मुझे सुकून मिलेगा.’’

पिंकी को कुछ समझ में नहीं आया तो उस ने अपने वतन लौट जाने का फैसला कर लिया. वह जान चुकी थी कि दुबई में रही तो उस की जान को खतरा हो सकता है. सफदर राज छिपाने के लिए उसे जान से भी मार सकता है. यह सोचते ही पिंकी चुपके से जनवरी, 2018 के दूसरे सप्ताह में अपने घर हैदराबाद लौट आई और मांबाप से अपनी आपबीती कह डाली.

रोती हुई पिंकी मां से बोली, ‘‘मां, मुझ से बहुत बड़ी भूल हुई, जो मैं ने आप सब की बातें नहीं मानीं. सफदर ने मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है. शादी के नाम पर उस ने मेरा धर्म परिवर्तन कराया और मेरे जिस्म से खेलता रहा. अब कहता है कि मैं तुम से शादी नहीं करूंगा, क्योंकि तुम ने मेरे हिसाब से मेरा धर्म कबूल नहीं किया. मां, मुझे माफ कर दो. काश, मैं ने तुम्हारी बात मान ली होती तो आज ये दिन देखने को नहीं मिलते.’’ कह कर पिंकी मां के सीने से लिपट कर रोने लगी तो श्रेया चंदा का मन पिघल गया.

बेटी की यह पहली गलती थी, सो मां ने एक ही झटके में उस की गलती माफ कर दी. अब सवाल यह था जिस ने बेटी की जिंदगी बरबाद की है, उसे सजा कैसे दिलाई जाए.

31 जनवरी, 2018 को श्रेया चंदा पिंकी को ले कर मलकजगिरी थाना पहुंची. थाने के इंसपेक्टर जानकी रेड्डी से मिल कर उन्होंने सारी बात बताई. साथ ही बेटी के साथ हुए धोखे के संबंध में एनआरआई सफदर अब्बास जैदी के खिलाफ लिखित तहरीर भी दी. तहरीर के साथ वे सभी दस्तावेज भी संलग्न किए जो पिंकी के पास मौजूद थे.

मामला हाईप्रोफाइल और एनआरआई से जुड़ा देख कर थानाप्रभारी चौंक गए. उन्होंने तत्कालीन एसीपी जी. संदीप को फोन कर के इस बारे में अवगत कराया. मामला लव जिहाद से जुड़ा हुआ था. प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए एसीपी जी. संदीप ने जांचपड़ताल कर के एनआरआई सफदर के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया.

जांचपड़ताल में मामला सही पाया गया. इंसपेक्टर जानकी रेड्डी ने आरोपी एनआरआई सफदर अब्बास जैदी के खिलाफ भादंवि की धाराओं 376, 417 और 420 के तहत केस दर्ज कर लिया है.

कथा लिखे जाने तक आरोपी सफदर अब्बास जैदी गिरफ्तार नहीं किया जा सका था. उसे गिरफ्तार करने के लिए भारत सरकार की ओर से दुबई सरकार को पत्र भेजे.

– कथा में पीडि़ता का नाम परिवर्तित है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

गोवा बीच पर नोरा फतेही ने किया गजब का डांस

फिल्म ‘बाहुबली’ में प्रभास के साथ एक आइटम नंबर पर डांस कर चुकीं एक्ट्रेस नोरा फतेही इन दिनों सुर्खियों में हैं. एक बार फिर से नोरा के डांस को काफी पसंद किया जा रहा है. उनका एक बैले डांस वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहा है. इसमें कोई शक नहीं कि नोरा एक अच्छी डांसर हैं और आए दिन वह पौपुलर गाने पर डांस करती हुई नजर आती हैं. यूट्यूब पर उनके नाम से एक अकाउंट है, जहां वह अपने डांस का वीडियो अपलोड करती रहती हैं. उनके वीडियो को वायरल होने में ज्यादा वक्त भी नहीं लगता.

इस बार नोरा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया, जिसमें वह गोवा में समुद्र किनारे बैले डांस करती हुई नजर आ रही हैं. सोशल मीडिया पर इस वीडियो को काफी सराहा जा रहा है. इतना ही नहीं, महज 17 घंटों के अंदर इस वीडियो 276,613 बार देखा भी जा चुका है. इससे पहले नोरा का एक डांस का वीडियो लोगों को बेहद पसंद आई थी, जिसमें वह सलमान खान की फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ के गाने ‘स्वैग से स्वागत’ के अरेबिक वर्जन पर जबरदस्त डांस किया था. इस वीडियो को नोरा अपने यूट्यूब चैनल Nora Fatehi पर अपलोड किया गया, जिसे अब तक 5,836,751 बार देखा गया और साथ ही काफी प्रतिक्रियाएं भी मिली.

You asked for it! Here it is!!!!!A preview of My dance cover to Ghazali by @saadlamjarred1 💃🏾🇲🇦🇮🇳 (Click the Youtube link in my bio to watch the full video) you don’t wana miss the cute kids dancing! 🤗😍 —————————— Introducing Moroccan dance “chaabi” with a mix of Afro and freestyle Bollywood ! Shot by @advait_vaidya Edited by @ady907 Choreographed by @rajitdev and Nora Fatehi. Special thanks to the children of St Cathrine orphanage Mumbai and the lovely tourists and boat men in Goa #norafatehi #ghazali #dance #saadlamjarred #dancecover #choreography #morocco #india #mumbai #toronto #goa #love #style #afro #chaabi #bollywood #freestyle #lit #swag #new #music #musicvideo #entertainment

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बता दें कि नोरा ‘बिग बौस 9’ में भी कंटेस्टेंट के तौर पर हिस्सा ले चुकी हैं. इस रियलिटी शो में कुछ वक्त तक उनका नाम सीजन 9 के विजेता प्रिंस नरूला से जुड़ा था, लेकिन शो में दोनों केवल अच्छे दोस्त थे. इसके अलावा वह कुछ वक्त पहले पंजाबी सिंगर हार्डी संधु के साथ सौन्ग ‘न’ में नजर आईं थी. इस गाने को यूट्यूब पर कई लोगों द्वारा देखा गया है और दर्शकों को उनका यह गाना काफी पसंद भी आया.

साथ ही उनको हाल ही में फिल्म ‘माइ बर्थडे सौन्ग’ में लीड एक्ट्रेस के रूप में देखा गया था. ‘रौकी हैंडसम’ और ‘बाहुबली: द बिगनिंग’ में अतिथि भूमिका निभाने वाली नोरा का कहना है कि डिजिटल मनोरंजन मंचों के उद्भव ने कलाकारों को अपनी प्रतिभा को उभारने के अधिक अवसर दिए हैं.

जाति आधारित नतीजे सरकार की सोचीसमझी चाल

मध्य प्रदेश अपनेआप में अजबगजब प्रदेश है. यहां एक तरफ इस की कुदरती खूबसूरती अपनी ओर खींचती है, तो वहीं दूसरी तरफ प्रदेश में होने वाले निराले काम पूरे देश में किसी अजूबे से कम नहीं होते.

हाल ही में धार जिले में हुई आरक्षक भरती चर्चा का मुद्दा रही और उस के बाद एमपीबीएसई ने जब 10वीं और 12वीं जमात के इम्तिहानों के नतीजों का ऐलान किया, तो वे भी सुर्खियों में रहे. इस के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बड़े से पंडाल में छात्रों और मीडिया के सामने नतीजों का ऐलान कर के वाहवाही लूटी.

यहां भी मध्य प्रदेश ने पूरे देश के राज्यों से अलग हट कर काम किया. उस ने बोर्ड परीक्षा का नतीजा ही सामान्य, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग बना कर जारी कर दिया. इस में प्रदेश सरकार की क्या मंशा है, यह तो वही बता सकती है, लेकिन जानकारों की मानें तो यह सोचीसमझी चाल के तहत किया गया काम है. इसी साल के आखिर में मध्य प्रदेश में विधानसभा के लिए चुनाव होने हैं, ऐसे में शिवराज सिंह चौहान चाहते हैं कि एक बार फिर उन्हीं के सिर प्रदेश के सरताज होने का ताज सजे.

एक तरफ सरकार बारबार यह जताने की कोशिश करती है कि यहां सभी को बराबर के मौके दिए जा रहे हैं, किसी के साथ नाइंसाफी नहीं की जाएगी, लेकिन जाति आधारित नतीजा जारी करने की क्या जरूरत आ पड़ी, इस बारे में कोई कुछ नहीं बोल रहा है.

इस फैसले पर फजीहत होते देख सरकार ने यह कहना शुरू कर दिया कि इस के पीछे मंशा साफसुथरी है. सरकार चाहती है कि प्रदेश के अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के छात्रों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव न हो और उन्हें कल्याणकारी योजनाओं का फायदा आसानी से मिल सके.

अब यहां सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अभी तक उन की भलाई के लिए शिवराज सरकार कुछ नहीं कर रही थी? क्या जाति आधारित इम्तिहान के नतीजों से ही उन की भलाई की जा सकती है? इस मुद्दे ने विपक्षी पार्टी कांग्रेस को बैठेबिठाए नया हथियार दे दिया है, जिसे विपक्ष ने सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.

मध्य प्रदेश में अपनी जमीन तलाशती कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने सरकार की जम कर खिंचाई की. उन्होंने ट्विटर पर अपनी मंशा जाहिर की, ‘भाजपा प्रदेश को जातिगत आधार पर बांटने का काम कर रही है. धार में एससीएसटी गुदवाने के बाद अब हाईस्कूल के नतीजों को जातिगत आधार पर घोषित करना भाजपा की निम्नस्तरीय सोच को दिखाता है.’ इस फैसले के बाद सरकार चौतरफा घिरती नजर आ रही है. इस के बचाव में वह जो तर्क दे रही है, वे उसी पर भारी पड़ रहे हैं.

प्रदेश के स्कूल शिक्षा राज्यमंत्री दीपक जोशी ने भी इस कदम की आलोचना की और कहा कि इस तरह के आंकड़ों को सार्वजनिक रूप से जारी नहीं किया जाना चाहिए. इस से समाज में वर्ग विभेद की खाई और ज्यादा गहरी होगी. जो भी जिम्मेदार हैं उन सभी के खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए. यह पहली बार नहीं है कि मध्य प्रदेश बोर्ड ने जाति आधारित नतीजों का ऐलान किया. बोर्ड साल 2016 से ऐसा कर रहा है. स्कूल शिक्षा राज्यमंत्री दीपक जोशी भी इस बात से अनजान थे कि बोर्ड ने जाति आधारित नतीजे साल 2016 और साल 2017 में जारी किए थे.

स्कूल शिक्षा राज्यमंत्री दीपक जोशी ने सफाई देते हुए कहा कि सरकार की मंशा में किसी तरीके का खोट नहीं था. दरअसल, हम चाहते थे कि प्रदेश के जो मेधावी छात्रों को लैपटौप 85 फीसदी अंक में दिया जाता है, एससी और एसटी छात्रों को 75 फीसदी अंक लाने पर इस का फायदा मिल सके. कमलनाथ के ट्वीट पर दीपक जोशी ने कहा, ‘कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ द्वारा लगाए गए आरोप निराधार हैं और भाजपा का ऐसा करने का कोई इरादा नहीं है. यह एक मानवीय त्रुटि के चलते हुआ होगा.’

यहां एक बात और बताते चलें कि कुछ दिनों पहले प्रदेश के धार जिले में पुलिस आरक्षक की भरतियां चल रही थीं, जिन में धार जिला अस्पताल में एक अजीब वाकिआ देखने में आया जो हर जगह चर्चा की बात बन गया. पुलिस भरती में चयन के लिए स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है. यही प्रक्रिया यहां भी अपनाई गई, लेकिन कुछ अनोखा कर के. स्वास्थ्य परीक्षण में अभ्यर्थियों की पहचान के लिए उन के सीने पर उन का वर्ग लिख दिया गया, जिन की तसवीरों ने सोशल मीडिया पर बहस करने के लिए बैठेबिठाए लोगों को गरमागरम मुद्दा दे दिया. ऐसी तसवीरें सामने आईं जहां अभ्यर्थियों के सीने पर एससीएसटी लिखा गया था.

दरअसल, यह पूरा मामला आगामी विधानसभा चुनाव में एसटीएसटी के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए सोचीसमझी चाल है. हैरानी की बात यह है कि स्कूल शिक्षा राज्यमंत्री दीपक जोशी को पिछले 2 साल से इस की भनक तक नहीं लग पाई. क्या ऐसा मुमकिन हो सकता है?

आंखें खोलने वाले आंकड़े

आज के दौर की राजनीति में जाति के नाम पर जो जहर घोला जा रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है पर आजकल सोशल मीडिया पर जाति के आधार पर मिलने वाले आरक्षण को ले कर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों पर जिस तरह निशाना साधा जा रहा है वह भी अपनेआप में शर्मनाक है.

माध्यमिक शिक्षा मंडल, मध्य प्रदेश, भोपाल ने साल 2016 से अब तक जाति के आधार पर इम्तिहान के जो नतीजे दिए हैं, उन को ध्यान से देखने पर कुछ दिलचस्प बातें सामने आती हैं. साल 2018 के हायर सैकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट के इम्तिहान में अनुसूचित जाति के 92669, अनुसूचित जनजाति के 78438 और अन्य पिछड़ा वर्ग के 303388 छात्रों का रजिस्टे्रशन हुआ था जबकि सामान्य वर्ग के 125261 छात्र रजिस्टर किए गए थे.

यहां फर्स्ट डिविजन लाने वाले छात्रों के आंकड़े बड़े रोचक थे, क्योंकि अमूमन ऐसा माना जाता है कि जो छात्र आरक्षण की बैसाखी पर चलते हैं, वे जानबूझ कर पढ़ाई नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि कैसे भी नंबर हों, आगे जा कर उन्हें सरकारी नौकरी तो मिल ही जाएगी. स्कूल के लैवल तक आरक्षित छात्रों को फीस कम होने का फायदा जरूर मिलता होगा, लेकिन अगर यह कहा जाए कि उन्हें नंबर देने में भी आरक्षण काम आता है तो ज्यादती होगी.

अनुसूचित जाति के 92669 छात्रों में से 31237, अनुसूचित जनजाति के 78438 छात्रों में से 21178 और अन्य पिछड़ा वर्ग के 303388 छात्रों में से 125916 छात्रों ने फर्स्ट डिविजन हासिल की, जबकि सामान्य वर्ग के 125261 छात्रों में से 55764 छात्रों ने यह कारनामा किया. फर्स्ट डिविजन मतलब इम्तिहान में 60 या 60 फीसदी से ज्यादा नंबर लाना. आरक्षण का फायदा लेने वाले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के कुल 474495 छात्रों में से 178331 छात्रों ने फर्स्ट डिविजन का आंकड़ा छुआ या उसे पार किया, जो किसी लिहाज से कम नहीं है, क्योंकि सामान्य वर्ग के 125261 छात्रों में से 55764 छात्र फर्स्ट डिविजन लाए थे. मतलब 37.58 फीसदी आरक्षित छात्रों ने, जबकि सामान्य वर्ग के 44.51 फीसदी छात्रों ने फर्स्ट डिविजन हासिल की, जिस में तकरीबन 7 फीसदी का ही अंतर है.

इन आंकड़ों से देशभर के 12वीं जमात के छात्रों के इम्तिहान नतीजों का अंदाजा लगाया जा सकता है. कहने का मतलब यह है कि स्कूली लैवल पर आरक्षित छात्र भी अब मेहनत कर रहे हैं. वे खूब फर्स्ट डिविजन ला रहे हैं जो भारत के भविष्य के लिए अच्छे संकेत हैं.

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