क्या आपने देखा खेसारीलाल यादव और याशिका कपूर का यह वीडियो

भोजपुरी फिल्म जगत के सुपरस्टार खेसारीलाल यादव की फिल्म डमरूइसी साल अप्रैल में रिलीज हुई थी. इस फिल्म ने पूरे देशभर में अच्छा कलेक्शन भी किया था. अब इस फिल्म का एक गाना तर तर पसीनाइंटरनेट पर वायरल हो रहा है. 9 दिन पहले यूट्यूब पर अपलोड किए गए इस वीडियो को अब तक 55 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है. इस गाने में खेसारीलाल के साथ भोजपुरी एक्ट्रेस याशिका कपूर डांस करती हुई नजर आ रही हैं.

दबंग सरकार होगी खेसारीलाल यादव की अगली फिल्म

बता दें, एक अलग तरह के विषय पर बनी फिल्म डमरूने गुदगुदाने के साथ-साथ दर्शकों को खूब हंसाने में भी सफल साबित हुई थी. गौरतलब है कि इन दिनों खेसारी लाल यादव की कई भोजपुरी फिल्मे रिलीज होने के लिए तैयार है. खेसारीलाल की इन फिल्मों में सबसे ज्यादा चर्चा दबंग सरकार की हैं, क्योंकि इस फिल्म में खेसारी लाल यादव ने जबरदस्त बौडी बनाई है. बता दें, ‘दबंग सरकारको भोजपुरी सिनेमा की अब तक की सबसे महंगी फिल्म बताया जा रहा है.

दबंग सरकारके लिए बनाई बौडी

इस फिल्म के लिए खेसारीलाल यादव ने जमकर पसीना बहाया है और मस्कुलर बौडी बनाई है. आपको बता दें, ‘दबंग सरकारमें खेसारीलाल के साथ आकांक्षा अवस्थी और दीपिका त्रिपाठी लीड रोल में हैं. वहीं फिल्म के दो गानों में एक्ट्रेस काजल राघवानी स्पेशल अपीयरेंस देते हुए नजर आएंगी. हाल ही में काजल एक इंटरव्यू में कहा था, ‘मैंने अपना शत प्रतिशत उनको दिया. मुझे खुशी है कि वह एक लाजवाब फिल्‍म लेकर आ रहे हैं. उम्‍मीद करती हूं फिल्‍म दबंग सरकारसुपर डूपर हिट हो.

मालूम हो कि फिल्‍म दबंग सरकारका म्‍यूजिक और सेटेलाइट राइट यशी फिल्‍म्‍स ने खरीदा है. खेसारीलाल यादव की इस फिल्म का निर्देशन योगेश राज मिश्रा कर रहे हैं और फिल्म का निर्माण दीपक कुमार द्वारा किया जा रहा है. योगेश ने खेसारीलाल के बारे में बात करते हुए कहा, “खेसारीलाल यादव इंडस्‍ट्री के पावरफुल अभिनेता हैं. हमने उनकी मेहनत को दबंग सरकारकी शूटिंग के दौरान करीब से देखा, जिसके आधार पर हम कह सकते हैं कि वे आने वाले दिनों में काफी आगे जाने वाले हैं. उनमें काम के प्रति गजब का जुनून है, जो हमें हर शौट में देखने को मिला.”

समर्थन वापसी की व्याख्या

साढ़े तीन साल पहले भारतीय जनता पार्टी ने जम्मू-कश्मीर में राजनीति का जो एक अध्याय शुरू किया था, पिछले मंगलवार की दोपहर उसके समापन की घोषणा हो गई. तब सरकार चलाने के लिए पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से गठजोड़ की जितनी तरह की राजनीतिक व्याख्याएं हुई थीं, उतनी ही तरह की व्याख्याएं शायद इस संबंध-विच्छेद की भी होंगी. बहुत से लोगों को अभी से इसमें उम्मीद नजर आनी शुरू हो गई है.

यह मानने वालों की तादाद काफी बड़ी है कि अब ऑपरेशन ऑल आउट की सारी बाधाएं खत्म हो चुकी हैं. अब सुरक्षा बलों को अपना काम करने की खुली छूट दी जाएगी और वे आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने में पूरी तरह जुट जाएंगे. इस सोच के पीछे कहीं न कहीं यह धारणा भी है कि भाजपा और पीडीपी का गठजोड़ आतंकवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई में आड़े आ रहा है. लेकिन भाजपा के इस कदम की एक दूसरी व्याख्या भी है.

यह भी कहा जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर में सरकार से समर्थन वापस लेकर पार्टी ने अगले आम चुनाव की राजनीति शुरू कर दी है. इस व्याख्या में कुछ नया नहीं है. आम चुनाव जब पास आने लगता है, तो किसी भी पार्टी के हर कदम की सबसे सुगम व्याख्या यही हो सकती है. ऐसी व्याख्याएं अक्सर गलत भी नहीं होतीं.

यह भी सच है कि पिछले कुछ समय से जम्मू-कश्मीर में जो हो रहा है, उसमें केंद्र सरकार और भाजपा, दोनों के लिए ही कोई बड़ा कदम उठाना और साथ ही कुछ करते हुए दिखना जरूरी हो गया था. प्रदेश सरकार से समर्थन वापस लेकर इसकी शुरुआत कर दी गई है. यह भी तय है कि अगला कदम राष्ट्रपति शासन होगा. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस्तीफा देकर इसका रास्ता भी साफ कर दिया है. यह उम्मीद कम ही है कि वहां वैकल्पिक सरकार बनाने का कोई दावा सामने आए. ऐसे में, इस बदलाव का अर्थ होगा राज्य की बागडोर का केंद्र के हाथ में आ जाना.

केंद्र सरकार अब वहां अपने ढंग से आतंकवाद विरोधी अभियान चलाने को स्वतंत्र होगी. वैसे अभी भी यह अभियान केंद्रीय सुरक्षा बलों और सेना के जरिये ही चलाया जा रहा था. लेकिन इसमें केंद्र सरकार को एक सुविधा मिली हुई थी. वह सफलताओं को अपने खाते में दर्ज करा सकती थी और नाकामियों के आरोप राज्य के मत्थे मढ़ सकती थी. यह सुविधा अब खत्म हो जाएगी. महबूबा मुफ्ती के लिए भी अच्छा है कि वह केंद्र और भाजपा विरोध की राजनीति फिर जोर-शोर से शुरू कर सकेंगी. साझा सरकार का होना उन्हें अभी तक इससे रोक रहा था.

भाजपा ने जब पीडीपी को समर्थन दिया था, तब इसकी एक व्याख्या यह हुई थी कि पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस जैसी पार्टियां जम्मू-कश्मीर का राजनीतिक यथार्थ हैं और इस सच को स्वीकार करके ही वहां की राजनीति आगे बढ़ाई जा सकती है. भाजपा द्वारा पीडीपी को समर्थन देने को इस सच को स्वीकार करने के रूप में ही देखा गया था.

जाहिर है, पिछले साढ़े तीन साल में भाजपा को इस सच की सीमाएं भी नजर आ ही गई होंगी. फिलहाल केंद्र सरकार को बिना ज्यादा राजनीतिक सोच-विचार के कश्मीर घाटी में खुलकर आतंकवाद विरोधी अभियान चलाने का मौका मिल गया है. इससे काफी उम्मीदें भी हैं. लेकिन उसके आगे जब राज्य में फिर से राजनीतिक प्रक्रिया शुरू होगी, तो यह सच और इसकी सीमाएं फिर से सबके सामने खड़ी होंगी.

बकरा : डिंपल और कांता ने ऐसा क्या किया

सुनसान लंबा डग नदी में खूब तैरने के बाद डिंपल और कांता कपडे़ पहन कर जैसे ही शौर्टकट रास्ते से घर जाने लगीं, तो उन की नजर लोहारों के रास्ते चलते गुर, चेला और मौहता पर पड़ी. वे समझ गईं कि ये तीनों लोहारों की औरतों से आंख सेंकने के लिए ही इस रास्ते से आए थे. ‘‘कांता, ये गुर, चेला और मौहता जैसे लोग आज भी इनसान को इनसान से बांटे हुए हैं, ताकि इन का दबदबा बना रहे और इन की रोजीरोटी मुफ्त में चलती रहे. ये पाखंडी लोग औरतों को हमेशा इस्तेमाल की चीज बनाए रखना चाहते हैं.’’

‘‘सब से खास बात तो यह है कि ये लोग गरीबों और औरतों का शोषण करने के लिए देवीदेवता के गुस्से और कसमों के इतनी चालाकी से बहाने गढ़ते हैं कि लोगों में समाया देवीदेवता का डर उन के मरने तक भी कभी दूर नहीं होता,’’ डिंपल ने कहा.

‘‘हां डिंपल, तुम्हारा कहना एकदम सही है. ये राजनीति के मंजे खिलाड़ी आदमी को आदमी से बांटे ही रखना चाहते हैं. इन्होंने तो बड़ी होशियारी से रास्ते तक बांट दिए हैं, ताकि इन की चालाक सोच इन्हें मालामाल करती रहे,’’ कांता बोली. ‘‘बिलकुल सही कहा तुम ने कांता. इस पहाड़ी समाज को अंधेरे में रखने वाले इन भेडि़यों को सबक सिखाने के लिए हमें अपनी भूमिका अच्छे से निभानी होगी.

‘‘देवीदेवता के नाम पर ठगने वाले इन पाखंडियों की असलियत लोगों के सामने लाने के लिए हमें कुछ न कुछ करना ही होगा,’’ डिंपल ने गंभीर आवाज में कांता से कहा. ‘‘हां, यह बहुत जरूरी है डिंपल. मैं जीजान से तुम्हारे साथ हूं. जान दे कर भी दोस्ती निभाऊंगी,’’ कांता बोली.

इस के बाद उन दोनों ने एकदूसरे को प्यार से देखा और गले मिल गईं. ‘‘तुम मेरी सच्ची दोस्त हो कांता. देखो, आजादी के इतने साल बाद भी इस गांव के लोग अंधविश्वास में फंसे हुए हैं. इन्हें जगाने के लिए हम दोनों मिल कर काम करेंगी,’’ डिंपल ने अपनी बात रखी.

‘‘जरूर डिंपल, यही एकमात्र रास्ता है,’’ कांता ने कहा. डिंपल और कांता ने योजना बनाई और लटूरी देवता के मेले में मिलने की बात पक्की कर के तेजी से अपने घरों की ओर चल दीं.

डिंपल लोहारों की, तो कांता खशों की बेटी थी. कांता ने 23-24 साल की उम्र में ही घाटघाट का पानी पी रखा था. यह तो डिंपल की दोस्ती का असर था कि वह राह भटकने से बच गई थी. हमउम्र वे दोनों चानणा गांव की रहने वाली थीं. नैशनल हाईवे से मीलों दूर पहाड़जंगल, नदीनालों के उस पार कच्ची सड़क से पहुंचते थे. वह कच्ची सड़क लंबा डग नदी तक जाती थी. नदी तट से 2 मील ऊपर नकटे पहाड़ पर सीधी चढ़ाई के बाद चानणा गांव तक पहुंचते थे.

वहां ऊंचाई की ओर खशों और निचली ओर लोहारों की बस्ती थी. खशों को ऊंची जाति और लोहारों को निचली जाति का दर्जा मिला हुआ था. वहां चलने के लिए ऊंची और छोटी जाति के अलगअलग रास्ते थे. लोहारों को खशों के रास्ते चलने की इजाजत न थी. वे उन के घरआंगन तक को छू नहीं सकते थे, जबकि खशों को लोहारों के रास्ते चलने का पूरा हक था. वे उन के घरआंगन में बिना डरे कभी

भी आजा सकते थे. यहां तक कि उन के चूल्हों में बीड़ीसिगरेट तक भी सुलगा आते थे. पर गलती से भी कोई लोहार खशों के रास्ते या घरआंगन से छू गया, तो उस की शामत आ जाती थी. इस से गांव का देवता नाराज हो जाता था और उन्हें दंड में देवता को बकरे की बलि देनी पड़ती थी. मजाल है कि कोई इस प्रथा के खिलाफ एक शब्द भी कह सके.

लोहारों और खशों की बस्तियों के बीच तकरीबन 4-5 एकड़ का मैदान था, जहां बीच में लटूरी देवता का लकड़ी का मंदिर और गढ़ की तरह भंडारगृह था. देवता के गुर का नाम खालटू था. गुर में प्रवेश कर देवता अपनी इच्छा बताता था. लटूरी देवता गुर के जरीए ही शुभ और अशुभ, बारिश, सूखा, तूफान की बात कहता था. गांव और आसपास शादीब्याह, मेलाउत्सव, पर्वत्योहार सब देवता की इच्छा पर तय होते थे.

यहां तक कि फसल बोना, घास काटना भी देवता की इच्छा पर तय था. गुर खालटू को सभी पूजते थे. उसे खूब इज्जत मिलती थी. एक खास बात और थी कि देवता का बजंतरी दल भी था, जो देव रथ के आगेआगे चलता था. इन में ढोलनगाड़े, शहनाई तो लोहार बजाते थे, पर तुरही, करनाल वगैरह खश बजाते थे. देवता का रथ भी खश उठाते थे, लोहारों को तो छूने की इजाजत तक न थी.

लोहारों के रास्ते चलते गुर खालटू, चेला छांगू और मौहता भागू जैसे ही माधो लोहार के घर के पास पहुंचे, उस का मोटातगड़ा बकरा और जवान बेटी देख कर वे एकदम रुक गए. गुर खालटू के मुंह में आई लार को छांगू और भागू ने देख लिया था. चेला छांगू तो 3 साल से माधो की बेटी डिंपल पर नजर गड़ाए था, पर वह उस के हाथ न लगी थी.

तीनों की नजरें बारबार बकरे से फिसलती थीं और माधो की बेटी पर अटक जाती थीं. ‘‘ऐ माधो की लड़की, कहां है तेरा बापू?’’ गुर खालटू ने पूछा.

‘‘वे मेले में ढोल बजाने गए हैं,’’ तीनों को नमस्ते कर के डिंपल ने कहा. ‘‘आजकल कहां रहती हो? दिखाई नहीं देती हो?’’

डिंपल ने चेले छांगू की बात का कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि बकरे से बतियाते हुए उसे घासपत्ते खिलाती रही, जैसे उस ने कुछ सुना ही न हो.

‘‘बकरा बेचना तो होगा न माधो को?’’ ‘‘नहीं मौहताजी, छोटे से बच्चे को दूध पिलापिला कर बच्चे की तरह पालपोस कर बड़ा किया है. इसे हम नहीं बेचेंगे,’’ नजरें झुकाए डिंपल ने कहा और बकरे को पत्ते दिखाती दूसरी ओर ले गई. उस ने तीनों को बैठने तक को न बोला. तीनों बेशर्मी से दांत निकालते हुए मेले की ओर चल दिए.

माधो लोहार को सभी लोग पसंद करते थे. एक तो उस के घराट का आटा सभी को भाता था, दूसरे नगाड़ा बजाने में माहिर उस जैसा पूरे इलाके में कोई दूसरा न था. डिंपल माधो की एकलौती औलाद थी. गांव में पढ़ने के बाद वह शहर में बीएससी फाइनल के इम्तिहान दे कर आई थी. वह खेलों में भी कई मैडल जीत चुकी थी.

गुर, चेला, कारदार चानणा गांव के साथ आसपास के अनेक गांव में अपना डंका जैसेतैसे बजाए हुए थे. देवता के खासमखास कहे जाने वाले वे देव यात्रा के नाम पर शराबमांस की धामें करवाते और औरतों का रातरात भर नाच करवाते थे. गांव में खश व लोहार पूरे लकीर के फकीर थे और देवता पर उन्हें अंधश्रद्धा थी. यह श्रद्धा बढ़ाने का क्रेडिट गुर व चेला जैसे लोगों को ही जाता था. लटूरी देवता का मेला भरने लगा

था. गुर खालटू के पहुंचते ही प्रधान रातकू और गांव वालों ने उन की खूब आवभगत की. गुर ने मंदिर से लटूरी देवता की पिंडी निकाली. पिंडी को स्नान करा कर धूपदीप व चावल से पूजाअर्चना कर के भेड़ू और मुरगे की बलि दिलाई गई. फिर देवता का रथ निकाल कर पूरे मेले में घुमाया गया.

इस के बाद गुर खालटू ने लोगों को मेले में गाने का आदेश दिया. ढोलनगाड़े, शहनाईरणसींगे बजने लगे और मर्दऔरत लाइनों में गोलगोल नाचने लगे. गुर के आदेश पर प्रधान रातकू खशों द्वारा धाम भी इस मैदान पर दी जानी थी. केवल लोहारों को मैदान से हट कर निचले खेत में खिलानेपिलाने का इंतजाम था. शाम ढलने तक नाच और बाजे बंद हो गए थे. शराब का दौर शुरू हो गया था, जिस में मर्दऔरत बराबर शामिल थे. जिसे जितनी पीनी थी पीए, कोई रोक नहीं थी.

नशे में झूमते लोगों में मांसभात की धाम कोईकोई ही खा पाया था. वहां से लोग झूमतेगाते आधी रात तक अपनेअपने घर पहुंचते थे.

नाचगानों और प्रधान रातकू की धाम के साथ हलके अंधेरे में लोगों से दूर एकांत में घटी एक घटना बड़ी ही दिलचस्प थी, जिस का 3 के सिवाय चौथे को पता न चला था. हुआ यों था कि डिंपल अपनी सहेली कांता के साथ मेले में घूमने आई थी. मेले की जगड़ से कुछ दूर एक पेड़ के नीचे खड़ी हो कर वे आपस में बातें करने लगी थीं.

चेला छांगू भी कहीं से टपक कर चोरीछिपे उन की बातें सुनने लगा था. डिंपल पर उस की बुरी नजर से कांता पूरी तरह परिचित थी और वह उसे देख भी चुकी थी. उस ने चेले को बड़ी मीठी आवाज में पुकारा, ‘‘चेलाजी, चुपकेचुपके क्या सुनते हो… पास आ कर सुनो न.’’

छांगू था पूरा चिकना घड़ा. वह ‘हेंहेंहें’ करता हुआ उन के पास आ कर खड़ा हो गया. ‘‘दोनों क्या बातें कर रही हो, जरा मैं भी सुनूं?’’ उस ने कहा.

‘‘चेलाजी, हमारी बातों से आप को क्या लेनादेना. आप मेले में जाइए और मौज मनाइए,’’ डिंपल ने सपाट लहजे में कहा. उसे चेले का वहां खड़े होना अच्छा नहीं लगा था. ‘‘हाय डिंपल, तुम्हारी इसी अदा पर तो मैं मरता हूं,’’ छांगू चेले की ‘हाय’ कहने के साथ ही शराब पीए होने की गंध से एक पल के लिए तो उन दोनों के नथुने फट से गए थे, फिर भी कांता ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘चेला भाई, आप की उम्र कितनी हो गई होगी?’’

‘‘अजी कांता रानी, अभी तो मैं 40-45 साल का ही हूं. तू अपनी सहेली डिंपल को समझा दे कि एक बार वह मुझ से दोस्ती कर ले, तो फायदे में रहेगी. देवता का चेला हूं, मालामाल कर दूंगा.’’

‘‘क्या आप की बीवी और खसम करेगी?’’ ‘‘चुप कर कांता, ये लोहारियां हम खशकैनेतों के लिए ही हैं. जब चाहे इन्हें उठा लें… पर प्यार से मान जाए तो बात कुछ और है. तू इसे समझा दे, मैं देवता का चेला हूं. पूरे तंत्रमंत्र जानता हूं.’’

डिंपल के पूरे बदन में बिजली सी रेंग गई. उस के दिल में एक बार तो आया कि अभी जूते से मार दे, पर बखेड़ा होने से वह मुफ्त में परेशानी मोल नहीं लेना चाहती थी, तो उस ने सब्र का घूंट पी लिया. ‘‘पर तुम्हारी मोटी भैंस का क्या होगा? वह और खसम करेगी या किसी लोहार के साथ भाग जाएगी,’’ कांता ने ताना कसते हुए कहा, तो छांगू चेला भड़क गया.

‘‘चुप कर कांता, लोहारों की इतनी हिम्मत कि वे हमारी औरतों को छू भी सकें. पर तू इसे मना ले. इसे देखते ही मेरा पूरा तन पिघल जाता है. इस लोहारी में बात ही कुछ और है. पर याद रख कांता, मैं देवता का चेला हूं, जरा संभल कर बात करना… हां.’’ तभी डिंपल ने उस के चेहरे पर एक जोर का तमाचा जड़ दिया. दूसरा थप्पड़ कांता ने मारा. छांगू चेले का सारा नशा हिरन हो गया. उस की सारी गरमी पल में उतर गई. हैरानपरेशान सा गाल मलते हुए वह कभी डिंपल, तो कभी कांता को देखने लगा.

‘‘खबरदार, अगर डिंपल की तरफ नजर उठाई, तो काट के रख दूंगी. लोहारों की क्या इज्जत नहीं होती? लोहारों की औरतें औरतें नहीं होतीं? देवता के नाम पर तुम्हारे तमाशों को हम अच्छी तरह जानती हैं. चुपचाप रास्ता नाप ले, नहीं तो गरदन उड़ा दूंगी,’’ कमर से दरांती निकाल कर कांता ने कहा, तो छांगू चेला थरथर कांपने लगा. वह गाल मलता हुआ दुम दबा कर खिसक लिया. डिंपल और कांता खूब हंसी थीं. फिर काफी देर तक वे गांव के रिवाजों और प्रथाओं पर चर्चा करते रहने के बाद अपनेअपने घरों को लौटी थीं.

सुबह ही एक खबर जंगल की आग की तरह पूरे चानणा गांव में फैल गई कि माधो लोहार शराब के नशे में खशों के रास्ते चल कर उसे अपवित्र कर गया. उस की बेटी डिंपल ने लटूरी देवता के मंदिर को छू कर अनर्थ कर दिया. खश तो आग उगलने लग गए. वहीं माधो से खार खाए लोहार भी बापबेटी को बुराभला कहने लगे.

गुर खालटू ने कारदारों के जरीए पूरे गांव को मंदिर के मैदान में पहुंचने का आदेश भिजवा दिया. वह खुद छांगू, भागू और 3-4 कारदारों के साथ माधो के घर जा पहुंचा. आंगन में खड़े हो कर गुर खालटू ने रोब से पुकारा, ‘‘माधो, ओ माधो… बाहर निकल.’’

माधो की डरीसहमी पत्नी ने आंगन में चटाई बिछाई, लेकिन उस पर कोई न बैठा. इतने में माधो बाहर निकल आया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. डिंपल भी अपनी मां के पास खड़ी हो गई. उस ने किसी को भी नमस्ते नहीं किया. उसे देख कर छांगू चेले ने गरदन हिलाई कि अब देखता हूं तुझे.

‘‘माधो, तू ने रात खशों के रास्ते पर चल कर बहुत बड़ा गुनाह कर दिया है. तू जानता है कि तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. तेरी बेटी ने भी मंदिर को छू कर अपवित्र कर दिया है. अब देवता नाराज हो उठेंगे,’’ गंभीर चेहरा किए गुर खालटू ने जहर उगला. ‘‘गुरजी, यह सब सही नहीं है. न मैं खशों के रास्ते चला हूं और न ही मेरी बेटी ने मंदिर को छुआ है.’’

‘‘हां, मैं तो मंदिर की तरफ गई भी नहीं,’’ डिंपल ने निडरता से कहा, तो गुर थोड़ा चौंका. दूसरे लोग भी हैरान हुए, क्योंकि गुर और कारदारों के सामने बिना इजाजत कोई औरत या लड़की एक शब्द भी नहीं बोल सकती थी. डिंपल देवता के नाम पर होने वाले पाखंड और कानून के खिलाफ हो रहे भेदभाव पर बहुतकुछ कहना चाहती थी, पर अपनी योजना के तहत वह चुप रही.

‘‘तू चुप कर डिंपल, मैं ने तुझे मंदिर को हाथ लगाते देखा है,’’ छांगू चेले ने जोर से कहा. ‘‘हांहां, बिना हवा के पेड़ नहीं हिलता. तुम बापबेटी ने बहुत बड़ा गुनाह किया है, अब तो पूरे गांव को तुम्हारी करनी भुगतनी पड़ेगी. बीमारी, आग, तूफान, बारिश वगैरह गांव को तबाह कर सकती है. तुम लोगों को पूरे गांव की जिम्मेदारी लेनी होगी,’’ मौहता भागू गुस्से से बोला.

‘‘तुम दोनों चुपचाप अपना गुनाह कबूल करो. हां, देवता महाराज को बलि दे कर और माफी मांग कर खुश कर लो,’’ एक मोटातगड़ा कारदार बोला. ‘‘जब हम ने गुनाह किया ही नहीं, तो बलि और माफी किस बात की?’’ डिंपल ने गुस्से में कहा, पर माधो की बोलती बंद थी.

‘‘माधो, इस से पहले कि देवता गुस्सा हो जाएं, तू अपने बकरे की बलि और धाम दे कर लटूरी देवता को खुश कर ले. इस से पूरा गांव प्रकोप से बच जाएगा. तुम्हारा परिवार भी देवता की नाराजगी से बच जाएगा. देख, तुझे देव गुर कह रहा है.’’ ‘‘हांहां, बकरे की बलि दे कर ही रास्ते और मंदिर की शुद्धि होगी. लटूरी देवता खुश हो जाएंगे और गांव पर कोई मुसीबत नहीं आएगी,’’ छांगू चेले ने आंगन में बंधे बकरे और डिंपल को देख कर मुंह में आई लार को गटकते हुए कहा. उसे डिंपल और कांता के थप्पड़ भूले नहीं थे.

‘‘हां, धाम न लेने के लिए मैं देवता को राजी कर दूंगा, पर बकरे की बलि तो तय है माधो,’’ गुर ने फिर कड़कती आवाज में कहा. डिंपल और उस की मां ने बकरा देने की बहुत मनाही की, पर गुर खालटू और देव कारकुनों के डराने पर माधो को मानना पड़ा. उस ने एक बार फिर सभी को बताया कि वह अपने रास्ते चल कर ही घर आया था और उस की बेटी ने मंदिर छुआ ही नहीं, पर उस की बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

मौहता भागू ने झट बकरा खोला और मंदिर की ओर ले चला. फिर सभी मंदिर की ओर शान से चल दिए. चलतेचलते गुर खालटू ने माधो को बेटी समेत लटूरी देवता के मैदान में पहुंचने का आदेश दिया. लटूरी देवता के मैदान में पूरे गांव वाले इकट्ठा हो गए. देवता के गुर खालटू ने धूपदान में रखी गूगल धूप को जला कर एक हाथ में चंबर लिए मंदिर की 3 बार बड़बड़ाते हुए परिक्रमा की. देवता की पिंडी बाहर निकाल कर पालकी में रख दी गई.

सब से पहले गुर ने पिंडी की पूजा की, फिर दूसरे खास लोगों को पूजा करने को कहा गया. चेला और मौहता व दूसरे कारदार जोरजोर से जयकारा लगाते थे. ढोलनगाड़ातुरही बजने लगे थे. गुर खालटू कनखियों से चारों ओर भी देख लेता था और गंभीर चेहरा बनाए खास दिखने की पूरी कोशिश करता था.

माधो डिंपल के साथ मंदिर से थोड़ी दूर अपराधी की तरह खड़ा था. कांता भी अपनी दादी के साथ एक पेड़ के नीचे खड़ी थी. माधो के बकरे को पिंडी के पास लाया गया था. उस की पीठ पर गुर ने पानी डाला, तो बकरे ने जोर से पीठ हिलाई. चारों ओर से लटूरी देवता की जयजयकार गूंज गई.

छांगू चेले ने सींगों से बकरे को पकड़ा था. एक मोटे गांव वाले ने दराट तेज कर पालकी के पास रखा था. उसे बकरा काटने के लिए गुर के आदेश का इंतजार था.

अचानक कांता जोरजोर से चीखने. गरदन हिलाते हुए उछलने भी लगी. उस के बाल बिखर गए. दुपट्टा गिर गया था. सभी लोग उस की ओर हैरानी से देखने लगे थे. कांता की दादी बड़े जोर से बोली, ‘‘लड़की में कोई देवी या फिर कोई देवता आ गया है. अरे, कोई पूछो तो सही कि कौन लड़की में प्रवेश कर गया है?’’

गुर, चेला और दूसरे कारदार बड़ी हैरानी और कुछ डरे से कांता की ओर देखने लग गए. गुर पूजापाठ भूल गया था. एक बूढ़े ने डरतेडरते पूछा, ‘‘आप कौन हैं जो इस लड़की में आ गए हैं? कहिए महाराज…’’

‘‘मैं काली हूं. कलकत्ते वाली. लटूरी देवता से बड़ी. सारे मेरी बात ध्यान से सुनो. आदमी के चलने से रास्ते कभी अपवित्र नहीं होते, न कोई देवता नाराज होता है. मैं काली हूं काली. आज में झूठों को दंड दूंगी. माधो और उस की बेटी पर झूठा इलजाम लगाया गया है. सुनो, लटूरी देवता कोई बलि नहीं ले सकता. अभी मेरी बहन महाकाली भी आने वाली है. आज सब के सामने सच और झूठ का फैसला होगा,’’ कांता उछलतीकूदती चीखतीचिल्लाती पिंडी के पास पहुंच गई. अचानक तभी डिंपल भी जोर से चीखने और हंसने लगी. उस के बाल खुल कर बिखर गए. अब तो गांव वाले और हैरानपरेशान हो गए. इस गांव के ही नहीं, बल्कि आसपास के बीसियों गांवों में कभी ऐसा नहीं हुआ था कि किसी औरत में देवी आई हो.

डिंपल की आवाज में फर्क आ गया था. एक बुढि़या ने डरतेडरते पूछा, ‘‘आप कौन हैं, जो इस सीधीसादी लड़की में प्रवेश कर गए हो? हे महाराज, आप देव हैं या देवी?’’

डिंपल भी चीखतीउछलती लटूरी देवता की पिंडी के पास पहुंच गई थी. वह जोर से बोली, ‘‘मैं महाकाली हूं. आज मैं पाखंडियों को सजा दूंगी. अब काली और महाकाली आ गई हैं, अब दुष्टों को दंड जरूर मिलेगा,’’ कह कर उस ने पिंडी के पास से दराट उठाया और बकरे का सींग पकड़े छांगू के हाथ पर दे मारा. छांगू चेले की उंगलियों की 2 पोरें कट कर नीचे गिर गईं. वह दर्द के मारे चिल्लाने और तड़पने लगा.

‘‘बकरे, जा अपने घर, तुझे कोई नहीं काट सकता. जा, घर जा,’’ डिंपल ने उछलतेकूदते कहा. बकरा भी माधो के घर की तरफ दौड़ गया. यह सब देख कर लोग जयकार करने लगे. अब तक तो सभी ने हाथ भी जोड़ लिए थे. बच्चे तो अपने मांओं से चिपक गए थे.

डिंपल ने दराट लहराया फिर चीखते और उछलते बोली, ‘‘बहन काली, गुर और उस के झूठे साथियों से पूछ सच क्या है, वरना इन्हें काट कर मैं इन का खून पीऊंगी.’’ ‘‘जो आज्ञा. खालटू गुर, जो पूछूंगी सच कहना. अगर झूठ कहा, तो खाल खींच लूंगी. आज सारे गांव के सामने सच बोल.’’

डिंपल ने एक जोर की लात खालटू को दे मारी. दूसरी लात कांता ने मारी, तो वह गिरतेगिरते बचा. गलत आदमी भीतर से डराडरा ही रहता है. डर के चलते ही खालटू ने सीधीसादी लड़कियों में काली और महाकाली का प्रवेश मान लिया था. छांगू की कटी उंगलियों से बहते खून ने उसे और ज्यादा डरा दिया था, जबकि वह खुद में तो झूठमूठ का देवता ला देता था. लातें खा कर मारे डर के वह उन के पैर पड़ गया और गिड़गिड़ाया ‘‘मुझे माफ कर दीजिए माता कालीमहाकाली, मुझे माफ कर दीजिए.’’

दर्द से तड़पते छांगू चेले ने अपनी उंगलियों पर रुमाल कस कर बांध लिया था. गुर को लंबा पड़ देख कर डर और दर्द के मारे वह भी रोते हुए उन के पैर पड़ गया, ‘‘मुझे भी माफी दे दो माता.’’ डिंपल ने गुर की पीठ पर कस कर लात मारी, ‘‘मैं महाकाली खप्पर वाली हूं. सच बता रे खालटू या तेरी गरदन काट कर तेरा सारा खून पी जाऊं,’’ डिंपल ने हाथ में पकड़ा दराट लहराया, तो वह डर के मारे कांप गया.

‘‘बताता हूं माता, सच बताता हूं. गांव वालो, माधो का बकरा खाने के लिए हम ने झूठमूठ की अफवाहें फैला कर माधो और डिंपल पर झूठा आरोप लगाया था. मुझ में कोई देवता नहीं आता है. मैं, चेला छांगू, मौहता भागू, कारदार सब से ठग कर माल ऐंठते थे. हम सारे दूसरों की औरतों पर बुरी नजर रखते थे. मुझे माफ कर दीजिए. आज के बाद मैं कभी बुरे काम नहीं करूंगा. मुझे माफ कर दीजिए.’’ डिंपल और कांता की 2-4 लातें और खाने से वह रो पड़ा.

अब तो कारदार भी उन दोनों के पैरों में लौटने लगे थे. ‘‘तू सच बता ओ छांगू चेले, नहीं तो तेरा सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा,’’ कांता ने जोर की ठोकर मारी तो वह नीचे गिर पड़ा, फिर उठ कर उस के पैर पकड़ लिए.

‘‘गांव के भाईबहनो, मैं तो चेला बन कर तुम सब को ठगता था. कई लड़कियों और औरतों को अंधविश्वास में डाल कर मैं ने उन से कुकर्म किया, उन से रुपएपैसे ऐंठे. मुझे माफ कर दीजिए माता महाकाली. आज के बाद मैं कभी बुरे काम नहीं करूंगा.’’ गुर, चेले, मौहता और कारदारों ने सब के सामने सच उगल दिया. डिंपल और कांता ने उछलतेचीखते उन्हें लातें मारमार कर वहां से भागने पर मजबूर कर दिया.

एक नौजवान ने पेड़ से एक टहनी तोड़ कर कारदार और मौहता भागू को पीट दिया. डिंपल और जोर से चीखी, ‘‘जाओ दुष्टो, भाग जाओ, अब कभी गांव मत आना.’’

वे सिर पर पैर रख कर भाग गए और 2 मील नीचे लंबा डग नदी के तट पर जीभ निकाले लंबे पड़ गए. उन की पूरे गांव के सामने पोल खुल गई थी. वे एकदूसरे से भी नजरें नहीं मिला पा रहे थे. कांता ने उछलतेचीखते जोर की किलकारी मारते हुए गुस्से से कहा, ‘‘गांव वालो, ध्यान से सुनो. खशलोहार के नाम पर रास्ते मत बांटो, वरना मैं अभी तुम सब को शाप दे दूंगी.’’

‘माफी काली माता, शांत हो जाइए. आप की जय हो. हम रास्ते नहीं बांटेंगे. माफीमाफी,’ सैकड़ों मर्दऔरत एक आवाज में बोल उठे. बच्चे तो पहले ही डर के मारे रोने लगे थे. काली और महाकाली के डर से अब खशखश न थे और लोहार लोहार न थे, लेकिन वे सारे गुर खालटू, चेले, मौहता व कारदारों से ठगे जाने पर दुखी थे.

‘माफी दे दो महाकाली माता. आप दोनों देवियां शांत हो जाइए. हमारे मन का मैल खत्म हो गया है. शांत हो जाइए माता,’ कई औरतें हाथ जोड़े एकसाथ बोलीं. ‘‘क्या माफ कर दें बहन काली?’’

‘‘हां बहन, इन्हें माफ कर दो. पर ये सारे भविष्य में झूठे और पाखंडी लोगों से सावधान रहें.’’ ‘हम सावधान रहेंगे.’ कई आवाजें एकसाथ गूंजी. कुछ देर उछलनीचीखने और दराट लहराने के बाद डिंपल ने कहा, ‘‘काली बहन, अब लौट चलें अपने धाम. हमारा काम खत्म.’’

‘‘हां दीदी, अब लौट चलें.’’ डिंपल और कांता कुछ देर उछलींचीखीं, फिर ‘धड़ाम’ से धरती पर गिर पड़ीं. काफी देर तक चारों ओर सन्नाटा छाया रहा. सब की जैसे बोलती बंद हो गई थी.

जब काफी देर डिंपल और कांता बिना हिलेडुले पड़ी रहीं, तो कांता की दादी ने मंदिर के पास से पानी भरा लोटा उठाया और उन के चेहरे पर पानी के छींटे मारे. वे दोनों धीरेधीरे आंखें मलती उठ बैठीं. वे हैरानी से चारों ओर देखने लगी थीं. फिर कांता ने बड़ी मासूमियत से अपनी दादी से पूछा, ‘‘दादी, मुझे क्या हुआ था?’’ ‘‘और मुझे दादी?’’ भोलेपन से डिंपल ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं. आज सच और झूठ का पता चल गया है. लूट और पाखंड का पता लग गया है. जाओ भाइयो, सब अपनेअपने घर जाओ.’’ धीरेधीरे लोग अपने घरों को लौटने लगे. दादी कांता का हाथ पकड़ कर बच्ची की तरह उसे घर ले गईं. डिंपल को उस की मां और बापू घर ले आए.

शाम गहराने लगी थी और हवा खुशबू लिए सरसर बहने लगी थी. एक बार फिर डिंपल और कांता सुनसान मंदिर के पास बैठ कर ठहाके लगने लगी थीं. ‘‘बहन महाकाली.’’

‘‘बोलो बहन काली.’’ ‘‘आज कैसा रहा सब?’’

‘‘बहुत अच्छा. बस, अब कदम रुकेंगे नहीं. पहली कामयाबी की तुम्हें बधाई हो कांता.’’ ‘‘तुम्हें भी.’’

दोनों ने ताली मारी, फिर वे अपने गांव और आसपास के इलाकों को खुशहाल बनाने के लिए योजनाएं बनाने लगीं. आकाश में चांद आज कुछ ज्यादा ही चांदनी बिखेरने लगा था.

जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र

भक्तो, हमारे देश में सरकारी नौकरी में आज इतने ज्यादा खतरे बढ़ गए हैं कि अपने को तीसमार खां कहने वाले भी कुरसी पर बैठने से पहले सौ बार भगवान का नाम लेते हैं. क्या पता कब जनता से कुछ लेते हुए क्राइम ब्रांच वालों के हत्थे चढ़ जाएं. क्या पता कब कैसे तबादला हो जाए. क्या पता कब सस्पैंड हो जाएं. सरकारी नौकरी में बुरे दिन आते देर नहीं लगती, इसीलिए हम ने सरकारी नौकरी में काम कर रहे अपने भाइयों और बहनों के लिए शास्त्रोक्त विधि से अपने ही देश में तैयार किया है जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र, ताकि हमारा हर भाई मजे से कुरसी पर बैठे और अपनी दोनों टांगें मेज पर रख कर मौज कर सके. साहब तो साहब, भगवान तक उसे पूछने की हिम्मत न कर सके कि यार, दिन में ही यह क्या रात वाली लूटमार शुरू कर रखी है.

दोस्तो, दुनिया में साहब को पटाने का ऐसा कोई यंत्र नहीं है, जैसा यह चापलूस चालीसा यंत्र है. इस यंत्र का हर शब्द जाग्रत मंत्र है. इस यंत्र के आगे एक ऐसा लैंस लगा है, जिस में एक खास कोण से देखने पर संपूर्ण चापलूस चालीसा मंत्र के हर शब्द को साफसाफ पढ़ा जा सकता है. यह अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र शुद्ध चौबीस कैरेट गोल्ड प्लेटिड साहब मूरत पर लिखा गया है. यह यंत्र पसीने से खराब नहीं होता. इसे पहन कर मुलाजिम कुछ भी करे, उसे पसीना आता ही नहीं, बल्कि इस यंत्र को देख कर दूसरों को पसीने आने लगते हैं. इसे गले में जिसजिस ने डाला, आइए अब जानते हैं उन्हीं की जबानी इस अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र की रहस्यमयी कहानी :

मिस्टर राजेश : मैं ने जब से इस यंत्र को गले में डाला है, साहब मेरे वश में हो गए हैं. जब तक यह चमत्कारी यंत्र मेरे गले में नहीं था, तब तक साहब मेरी ओर देखते भी नहीं थे. साहब सामने आते थे, तो मेरे पसीने निकलने शुरू हो जाते थे. मैं उन के आगेपीछे दुम हिलाता हुआ थक जाता था, पर वे मुझ कुत्ते की ओर ध्यान तक न देते थे. सच कहूं, जब से मैं ने यह अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र गले में डाला है, तब से मैं साहब की बीवी से भी ज्यादा उन के नजदीक हो गया हूं. अब मैं नहीं, बल्कि वे मेरे आगेपीछे दुम हिलाते हैं. वे मुझे अपनी बीवी से भी ज्यादा प्यार करते हैं. जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र.

मिस्टर देवेंद्र : जब मेरे एक दोस्त ने मुझे इस अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र के बारे में बताया, तो मुझे जैसे जीने की नई राह मिली. पहले तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ था कि अपने देश में भी ऐसे आला दर्जे के चापलूस चालीसा यंत्र बन सकते हैं. सच कहूं, तो मेरे ऊपर रिश्वत लेते हुए हर समय सस्पैंड होने का खतरा मंडराता रहता था. अब पुरानी लत होने के चलते छोड़ी भी नहीं जा रही थी. दुविधा में था कि अब क्या करूं, क्या न करूं?

आखिरकार मेरी परेशानी को देख कर मेरे उस दोस्त ने मेरे गले में अपना श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र डाला, तो पहनते ही मेरी रिश्वत के बारे में नैगेटिव सोच एकदम बदल गई. मुझे ऐसा लगा कि रिश्वत लेना भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि यह तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है. देखते ही देखते मेरे मन से रिश्वत का डर जाता रहा और मैं ने यह अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र मंगवा कर अपने गले में डाल लिया. सच कहूं, जब से मैं ने इस अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र को गले में डाला है, तब से मेरे रिश्वत लेने के हौसले में सौ गुना इजाफा हुआ है.

अब मुझे महकमे के किसी मुलाजिम से कतई डर नहीं लगता. अब दफ्तर में लोग मुझे देवू नहीं, बल्कि रिश्वत का देवेंद्र कहने लगे हैं. जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र. भाइयो, इस देश में इन की ही तरह लाखों ऐसे मुलाजिम हैं, जो इस यंत्र को गले में डाल कर नौकरी में मजे कर रहे हैं. हमाम में नंगे नहा रहे हैं. भूख न होने के बाद भी बस खाए जा रहे हैं. अगर आप भी चाहते हैं कि दफ्तर में कदम फूंकफूंक कर रखने से छुटकारा मिले, तो आज ही हमारे इस चापलूस चालीसा यंत्र को मंगवाइए. कीमत केवल 5 हजार रुपए. डाक खर्च 2 सौ रुपए अलग.

और हां, अगर आप अभी और्डर करते हैं, तो अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र के साथ 24 कैरेट गोल्ड प्लेटिड चेन फ्री.

बंधुओ, हम अपने चापलूस चालीसा यंत्र का किसी अखबार में कोई इश्तिहार नहीं देते. नकली अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र से सावधान रहें. आप की सुविधा के लिए हम ने नकली यंत्र से बचने के लिए डब्बे पर आप के ही शहर के लोकप्रिय भ्रष्ट की तसवीर बनाई है, जो आंखें बंद कर के भी बिलकुल साफ दिखती है. कमाल का है यह जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र.

कानून जब गले का फंदा बन जाए

आयरलैंड ने जनमत संग्रह करा कर कैथोलिक कट्टर धार्मिक कानून, जिस के अनुसार गर्भपात कराना पाप है, बदल डाला है. दरअसल, 6 साल पहले सविता हलप्पनवार को अस्पताल में गर्भ के दौरान दाखिल होना पड़ा था और डाक्टरों की राय थी कि केवल गर्भपात के सहारे ही सविता की जान बचाई जा सकती है, पर कानून के कारण उन के हाथ बंधे थे. अदालत ने भी हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और कर्नाटक निवासी सविता की धर्म की गला घोट नीति के कारण मौत हो गई.

गनीमत है कि उस के बाद वहां मुहिम शुरू हो गई कि कानून बदला जाए और अब जनमत करा कर जनता की राय ली गई. कैथोलिक कट्टरवादियों के विरोध के बावजूद आयरलैंड की जनता ने सविता को सच्ची श्रद्धांजलि दी.

सरकार, समाज और धर्म लोगों के निजी फैसलों में आज भी निरर्थक दखलंदाजी ज्यादा कर रहे हैं. गर्भपात वैसा ही निजी फैसला है जैसा सैक्स करना. विवाह के बाद या बिना विवाह सैक्स संबंध भी पहले धर्म की वजह से कानूनी दायरे में आते थे पर धीरेधीरे स्वतंत्रता के रक्षकों ने उन्हें व्यक्ति की अपनी इच्छा मान लिया है.

कोई रात के 4 बजे सोता है या 8 बजे इस पर किसी का नियंत्रण नहीं हो सकता. उस की जो जिम्मेदारियां दूसरों के प्रति हैं, वे अगर पूरी हो रही हैं तो इस पर न किसी को आपत्ति होती है न होनी चाहिए. कुछ आश्रमों व होस्टलों

में इस पर भी आपत्ति होती है, क्योंकि वे अनुशासन के नाम पर असल में व्यक्ति को विवेकशून्य बनाने की कोशिश करते हैं. नाइट आउट का सिद्धांत इसी पर है. यह कहना कि सोने का समय नियत करना जरूरी है ताकि आप स्वस्थ रहें गलत है, क्योंकि यह निर्णय व्यक्ति का अपना है.

गर्भपात का निर्णय भी इसी तरह गर्भवती व डाक्टर के बीच का है. इस में कितने सप्ताह बीत गए हैं जैसा कानून भी गलत है जो भारत में आज भी चल रहा है और विशेष अनुमति लेने के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं. इन के पीछे मूल भावना वही है जो आयरलैंड के चर्च ने सरकार के सहारे जनता पर थोप रखी थी कि व्यक्ति नहीं जानता कि उस के हित में क्या है.

यह गुलाम मनोवृत्ति बनाए रखना सरकारों के लिए लाभदायक होता है और वे तरहतरह के नियंत्रण थोपना चाहती हैं.

आयरलैंड की जनता ने जनमत संग्रह से एक बात से छुटकारा पाया है पर न जाने अमीर, शिक्षित, समृद्ध देश में और कितने नियंत्रण हैं, जिन्हें लोग आंख मूंद कर मानते चले जा रहे हैं. शायद यह शुरुआत हो कि आम व्यक्ति को अपनी सरकार से आजादी मिलना उतना ही जरूरी है जितना कि दूसरे, विदेशियों की सरकारों से.

 

हैल्दी डाइट से दूर क्यों हो रहे हैं युवा

आज युवाओं में फास्टफूड की आदत तेजी से पनप रही है. इस से उन की सेहत को कितना नुकसान हो रहा है, इस बात का अंदाजा उन्हें तब लगता है जब उन का शरीर इस छोटी सी आयु में ही रोगग्रस्त होने लगता है. संतुलित भोजन के अभाव में शरीर कईर् तरह की बीमारियों से घिरने लगता है. इन बीमारियों में मुख्यरूप से मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप असमय आंखों में चश्मा लगना और बालों का सफेद होना शमिल है :

कैसे जिएं स्वस्थ जीवन

युवाओं को चाहिए कि वे युवावस्था से ही ताउम्र स्वस्थ जीवन जीने के लिए अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें.

  • सुबह साढ़े 5 से 6 बजे के बीच नियमित उठने की आदत डालें.
  • उठते ही रोज 2-3 गिलास कुनकुना पानी पिएं. इस से पेट साफ रहेगा और पूरे दिन शरीर में ताजगी बनी रहेगी.
  • नियमित रूप से दांत साफ करें और चेहरा अच्छी तरह धोएं. इस से रात को चेहरे पर आई मृत चमड़ी के साफ होने से चेहरे के रोमकूप खुल जाते हैं और चेहरा चमकने लगता है.
  • हर रोज सुबह व्यायाम करें.
  • व्यायाम के बाद थोड़ा आराम कर स्नान अवश्य करें, इस से शरीर के रोमकूप साफ हो कर खुलते हैं और दिनभर पसीने के रूप में शरीर की गंदगी के लिए बाहर निकलने का रास्ता बनता है. इस तरह त्वचा में ताजगी बनी रहती है.
  • जब भी समय मिले, 1-2 घंटे मैदान में जा कर खूब खेलें और पसीना बहाएं.
  • हमेशा संतुलित भोजन ही करें.

भोजन हमें स्वाद के लिए नहीं करना चाहिए बल्कि स्वस्थ रहने के लिए करना चाहिए, इसलिए बिना भूख के खाना न खाएं. मनुष्य यह आदत जानवरों से भी सीख सकता है. जानवरों का पेट भरा होने के बाद आप चाहे उन के सामने कितना ही अच्छा चारा क्यों न डालें, वे नहीं खाते. यही कारण है कि जानवर कभी मोटापे का शिकार नहीं होते.

भोजन के समय को हम 3 भागों में बांट सकते हैं:

  1. सुबह का नाश्ता, 2. दोपहर का भोजन, 3. रात्रि का भोजन.

नाश्ता : नाश्ते में दूध, अंडा, मक्खन, पनीर, अंकुरित अनाज, कच्चा सलाद, दलिया, उपमा, चपाती, हरी सब्जियां, सूखे मेवे, फल इत्यादि हर रोज अपनी इच्छानुसार बदलबदल कर ले सकते हैं. इन में से मनपसंद चीजें रोटी में डाल कर रोल बना कर खाया जा सकता है. इस तरह का पौष्टिक नाश्ता शरीर को स्वस्थ और तरोताजा रखता है.

society

कुछ लोग नाश्ता करना आवश्यक नहीं समझते जोकि सरासर गलत है. चूंकि हम रातभर लंबे समय तक बिना कुछ खाए रहते हैं इसलिए अगले दिन शरीर में ऊर्जा और स्फूर्ति बनाए रखने के लिए सुबह का नाश्ता अनिवार्य है. यदि हम अधिक शारीरिक परिश्रम करते हैं और भूख लगती है तो  दोपहर के भोजन से 2 घंटे पहले और शाम को जूस या अन्य हलका भोजन भी ले सकते हैं.

दोपहर का भोजन :  दोपहर का भोजन आवश्यकतानुसार भरपेट खाएं. इस समय हमारा भोजन कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, वसा, खनिज लवण विटामिनयुक्त संतुलित भोजन होना चाहिए.

रात्रि भोजन :  रात्रि का भोजन सोने से 2-3 घंटे पहले अवश्य कर लेना चाहिए. भोजन करने के तुरंत बाद सोने से भोजन ठीक से पचता नहीं है. रात्रि का भोजन संतुलित होने के साथसाथ दोपहर के भोजन से हलका और सुपाच्य होना चाहिए, क्योंकि इस समय हमारे शरीर को केवल आराम ही करना होता है.

संतुलित भोजन के स्रोत

कार्बोहाइड्रेट्स : यह शरीर को शक्ति देता है. शारीरिक परिश्रम करने वालों को इस की अधिक आवश्यकता होती है. यह हमें स्टार्च वाले खाद्य पदार्थों जैसे चावल, आटा, मैदा, आलू विभिन्न प्रकार के अनाजों, दालों आदि से प्राप्त होता है. यह मीठे फलों खजूर, गन्ना, शलजम, चुकंदर, मेवा, चीनी, गुड़, शक्कर, शहद इत्यादि से प्राप्त होता है. इस की कमी से शरीर में निर्बलता आती है और भोजन भी ठीक से पचता नहीं है.

प्रोटीन : शारीरिक शक्ति प्रदान करने, कोशिकाओं की टूटफूट में सुधार करने, नई कोशिकाएं बनाने, मानसिक शक्ति बढ़ाने, रोग निवारणशक्ति उत्पन्न करने और शारीरिक वृद्धि के लिए भोजन में प्रोटीन का सेवन बहुत आवश्यक है. प्रोटीन में नाइट्रोजन की मात्रा बहुत अधिक होती है जो शारीरिक वृद्धि के लिए बहुत जरूरी है. नाइट्रोजन प्रतिदिन मूत्र के साथ काफी मात्रा में हमारे शरीर से बाहर निकलता रहता है. इसलिए इस कमी को पूरा करने के लिए हमें प्रतिदिन प्रोटीन का सेवन अवश्य करना चाहिए.

यह हमें 2 प्रकार से प्राप्त होता है :

  1. वनस्पति प्रोटीन, 2. पशु प्रोटीन.

वनस्पति प्रोटीन हमें मटर, मूंग, अरहर, चना, अंकुरित अनाजों और हरी सब्जियों से प्राप्त होता है जबकि पशु प्रोटीन हमें दूध, मक्खन, पनीर, मांस, अंडे, मछली आदि से प्राप्त होता है जो उच्चकोटि का प्रोटीन माना जाता है.

इस की कमी से शारीरिक विकास रुक जाता है, त्वचा पर झाइयां पड़ जाती हैं, बाल झड़ जाते हैं, लिवर बढ़ जाता है. और बच्चों को सूखा रोग हो जाता है. इस की अधिकता से शरीर को कोई नुकसान नहीं होता.

वसा : भोजन में पोषक तत्त्वों में वसा का महत्त्वपूर्ण स्थान है. इस के प्रयोग से शरीर में गरमी और शक्ति उत्पन्न होती है. यह शरीर के ऊतकों की क्षय हुई चरबी को पूरा करती है, त्वचा में चमक बनी रहती है और कार्बोहाइड्रेट्स को पचाने में सहायता मिलती है.

यह हमें 2 प्रकार से प्राप्त होती है :

  1. वनस्पति वसा, 2. प्राणीजन्य वसा.

वनस्पति वसा हमें विभिन्न प्रकार के   खाद्य तेलों, बादाम, अखरोट, सोयाबीन, नारियल, काजू, पिस्ता, मूंगफली इत्यादि से प्राप्त होती है जबकि प्राणीजन्य वसा हमें घी, दूध, मक्खन, क्रीम, मछली के तेल आदि से प्राप्त होती है.

इस की कमी से त्वचा शुष्क हो जाती है और अधिकता से शरीर मोटा होने लगता है, पाचनक्रिया ठीक नहीं रहती, शरीर में बहुत अधिक मात्रा में वसा के एकत्रित होने से पित्ताशय में पथरी का डर रहता है.

खनिज लवण : हमारे शरीर में कैल्शियम, पोटैशियम, सोडियम, मैगनीशियम, फास्फोरस, लोहा, आयोडीन, क्लोरीन, सिलोकौन, सल्फर आदि अनेक क्षारीय पदार्थ पाए जाते हैं जो शरीर को रोग और निर्बलता से बचाते हैं. ये हमें विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों, हरी पत्तेदार

सब्जियों में पालक, चौलाई, सरसों का साग, मूली के पत्ते आदि से प्राप्त होता है. दूध से हमें कैल्शियम और फास्फोरस नामक खनिज लवण मिलते हैं.

कैल्शियम तथा फास्फोरस हड्डियों और दांतों का निर्माण व उन्हें मजबूत बनाते हैं. सोडियम, पोटैशियम, क्लोरीन और फास्फोरस घुलनशील लवण हैं जो शरीर को तरल द्रव पहुंचाते हैं.

इन की कमी से स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता. कैल्शियम की कमी से दांत और हड्डियां कमजोर होती हैं. बच्चों की वृद्धि रुक जाती है. लोहे की कमी से शरीर पीला पड़ जाता है जबकि आयोडीन की कमी से गलगंड नामक रोग हो जाता है. फास्फोरस की कमी से हड्डियों में विकार आ जाता है और मांसपेशियां दिखाई देने लगती हैं. पोटैशियम की कमी से हृदय की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और घबराहट होने लगती है.

विटामिन :  फल, दूध, कच्चे अंडे और हरी सब्जियों में अधिकता से पाए जाते हैं. ये ताप सहन नहीं कर सकते, इसलिए खाद्य पदार्थों को उबालने, तलने, गलने और सूखने से विटामिन नष्ट हो जाते हैं. विटामिन कई प्रकार के होते हैं :

विटामिन ‘ए’ :  यह ताजा घी, मांसाहारी पदार्थों, बंदगोभी, गाजर, मेथी के साग आदि में पाया जाता है. इस की कमी से रात को कम दिखाई देता है, लिवर में पथरी बनने लगती है, शरीर दुर्बल हो जाता है, दांतों में पायरिया नामक रोग हो जाता है.

विटामिन ‘बी’ :  यह ताजे फलों, सब्जियों, दूध, अनाज के ऊपरी छिलकों में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है. इस की कमी से बेरीबेरी नामक रोग होता है जबकि विटामिन ’बी 12‘ की कमी से एनीमिया हो जाता है.

विटामिन ‘सी’ :  यह आंवला, नीबू, संतरे, मौसमी, टमाटर, अंकुरित अनाज आदि में पाया जाता है. इस की कमी से स्कर्बी नामक रोग होता है.

विटामिन ‘डी’ :   यह सूर्य के प्रकाश से मानव शरीर में बनता है. इस के अतिरिक्त यह दूध, अंडे, मक्खन, पनीर, हरी पत्तेदार सब्जियों, मछली के तेल आदि में भी मिलता है. इस की कमी से रिकेट्स नामक रोग होता है जिस में हड्डियां विकृत और कमजोर हो जाती हैं.

स्वप्न नगरी के जहरीले सपने

9 मई, 2018, दिन बुधवार. उस दिन मुंबई की सेशन कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एस.जी. शेट्टी की अदालत में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी थी. वजह यह थी कि न्यायाधीश शेट्टी उस दिन अभिनेत्री मीनाक्षी थापा के अपहरण और हत्या के आरोपियों को दोषी, निर्दोष या संदेह का लाभ देने का फैसला सुनाने वाले थे.

अदालत सबूतों को देखने परखने के साथसाथ केस के 36 गवाहों की गवाही सुन चुकी थी. दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की ओर से बहस भी पूरी हो चुकी थी. इस केस में अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता थे विशेष लोक अभियोजक उज्जवल निकम, जो अपनी धारदार दलीलों के लिए महाराष्ट्र ही नहीं, देश भर में मशहूर हैं. उज्जवल निकम की दलीलों ने ही मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले के आरोपी पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब को फांसी के तख्ते तक पहुंचाया था.

न्यायाधीश एस.जी. शेट्टी 10 बजे ही अदालत में पहुंच गए थे. दोनों पक्षों के अधिवक्ता, दोनों आरोपी, मीनाक्षी थापा के परिवार वाले, कुछ मुख्य गवाहों और दर्शकों की अच्छीभली भीड़ अदालत में मौजूद थी. सुनवाई शुरू हुई तो बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कुछ दलीलें अदालत के सामने रखीं. फिर नंबर आया विशेष लोक अभियोजक उज्जवल निकम का.

उन्होंने अपनी अंतिम दलीलों से पहले मीनाक्षी थापा के दोस्त आलोक थापा को पुन: अदालत के सामने खड़ा किया. आलोक थापा ने पहले हुई गवाही की तरह अदालत को बताया, ‘‘12 मार्च, 2012 को मीनाक्षी ने मुझ से कहा था कि वह प्रीति एल्विन और अमित जायसवाल के साथ एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में गोरखपुर जा रही है. इतना ही नहीं, मीनाक्षी ने 12 मार्च, 2012 को लोकमान्य तिलक टर्मिनस स्टेशन पर मुझे प्रीति एल्विन और अमित जायसवाल से मिलवाया भी था.’’

आरोपी प्रीति एल्विन के पिता नवीन सुरीन ने अदालत को बताया, ‘‘मैं अदालत को पहले भी बता चुका हूं और अब फिर बता रहा हूं कि 14 मार्च, 2012 को प्रीति और अमित इलाहाबाद स्थित हमारे घर आए थे.’’

मीनाक्षी थापा की मां कमला थापा ने अपनी गवाही में बताया, ‘‘14 मार्च, 2012 को मीनाक्षी ने मुझे फोन कर के बताया था कि वह इलाहाबाद पहुंच चुकी है और प्रीति के घर जा रही है, रात का खाना वह उसी के घर खाएगी. इस के अगले दिन मीनाक्षी की भाभी ने मैसेज कर के मुझे बताया कि मीनाक्षी को ले कर घर के सब लोग चिंतित हैं और उस के लापता होने की शिकायत दर्ज कराने की तैयारी कर रहे हैं.’’

कमला थापा ने अपने बयान में आगे बताया, ‘‘इस के बाद अपहरणकर्ताओं की ओर से मैसेज आया कि मीनाक्षी को जिंदा देखना है तो उस के खाते में 15 लाख रुपए जमा कर दो. मैसेज पढ़ कर हम लोग घबरा गए और मुंबई के थाना अंबोली में एफआईआर दर्ज करा दी. बाद में दोनों आरोपियों को 14 अप्रैल, 2012 को गिरफ्तार कर लिया गया.’’

महत्त्वपूर्ण गवाहियां दोबारा हो जाने के बाद विशेष लोक अभियोजक उज्जवल निकम ने अपनी दलील देते हुए अदालत से कहा, ‘‘सर, इन गवाहियों और पेश किए गए सबूतों के बाद, साफ हो जाता है कि मीनाक्षी थापा के अपहरण और हत्या के गुनहगार प्रीति एल्विन और अमित जायसवाल ही हैं.

‘‘मैं अदालत से दरख्वास्त करूंगा कि दोनों आरोपियों को दोषी करार दे कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए, क्योंकि ऐसा नहीं हुआ तो इस तरह के अपराधी बचते रहेंगे और मीनाक्षी थापा, जो मुंबई में अपना कैरियर बनाने आई थी, जैसी लड़कियां छलावे में आ कर मारी जाती रहेंगी.’’

सुनवाई पूरी हो चुकी थी. न्यायाधीश एस.जी. शेट्टी ने एकएक पौइंट पर ध्यान देते हुए प्रीति एल्विन और अमित जायसवाल पर एक नजर डाली और अपना फैसला सुना दिया, ‘‘तमाम सबूतों को देखनेपरखने और गवाहों की बात सुनने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि मीनाक्षी थापा के अपहरण और हत्या के दोषी प्रीति एल्विन और अमित जायसवाल ही हैं. यह अदालत दोनों को दोषी करार देती है और साथ ही घोषणा करती है कि दोनों दोषियों को 11 मई शुक्रवार को सजा सुनाई जाएगी.’’

अमित जायसवाल और प्रीति एल्विन की किस्मत का फैसला क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए इस पूरे केस के बारे में जान लें.

मूलरूप से नेपाल की रहने वाली मीनाक्षी के पिता तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग (ओएनजीसी) देहरादून में पोस्टेड थे. वर्षों पहले वह देहरादून आ कर बस गए थे. उन की पत्नी कमला थापा भी फौरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में सरकारी नौकरी में थीं. परिवार में उन के 2 बेटे नवराज और विक्की के अलावा 2 बेटियां हेमू और मीनाक्षी थीं. हेमू की शादी अजय थापा से हो चुकी थी. नवराज मिलिट्री में था.

मीनाक्षी ने देहरादून के मशहूर दून स्कूल से शिक्षा ग्रहण की थी. इस के बाद उस ने फेंकसिन इंस्टीट्यूट से एविएशन में डिप्लोमा किया. मीनाक्षी खूबसूरत थी, इसलिए उस के मन में फिल्मों में काम करने की इच्छा जागृत हुई. इस के लिए उस ने विधिवत डांस सीखा और सेंट जोसेफ एकेडमी में डांस टीचर बन गई. लेकिन उस की मंजिल यह नहीं मुंबई थी.

मीनाक्षी को अभिनय का भी शौक था. इसलिए कुछ दिनों तक स्थानीय स्तर पर मौडलिंग करने के बाद वह फिल्मों में किस्मत आजमाने के लिए मुंबई चली गई. मुंबई में स्ट्रगल करने पर उसे फिल्म ‘बंगला नंबर 404 एरर नौट फाउंड’ में एक छोटा सा रोल मिला.

इस रोल का भले ही उसे मेहनताना ज्यादा नहीं मिला, लेकिन पहली बार फिल्म में काम मिलने पर वह बहुत खुश थी. उसे 1-2 फिल्मों में छोटीछोटी भूमिकाओं के अलावा कुछ विज्ञापन भी मिले. हालांकि मीनाक्षी को ग्लैमर की लाइन में आगे बढ़ने का सही मौका नहीं मिल पा रहा था, फिर भी वह अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए कोशिश कर रही थी.

मीनाक्षी मुंबई में रह जरूर रही थी, लेकिन वह लगभग रोजाना फोन पर अपनी मां कमला थापा से बात करती थी. कह सकते हैं कि वह फोन द्वारा बराबर मां के संपर्क में रहती थी. 12 मार्च, 2012 को मीनाक्षी ने मां को फोन कर के कहा कि वह 2-3 दिनों के लिए इलाहाबाद जा रही है.

मां के पूछने पर उस ने बताया कि उसे एक भोजपुरी फिल्म में काम मिलने की संभावना है, लेकिन इस के लिए उसे इलाहाबाद जा कर फिल्म निर्माता से बात करनी होगी. चूंकि मीनाक्षी को फिल्म लाइन में काम करना था और उस के बारे में वह खुद बेहतर जानती थी, इसलिए कमला थापा ने कुछ नहीं कहा. बाद में मीनाक्षी ने 14 मार्च, 2012 को मां को फोन कर के कहा कि वह इलाहाबाद पहुंच चुकी है और प्रीति के घर जा रही है.

अचानक लापता हुई मीनाक्षी

इस के बाद 2 दिनों तक कमला थापा के पास मीनाक्षी का कोई फोन नहीं आया तो उन्होंने उस का मोबाइल ट्राई किया. लेकिन उस का फोन बंद मिला. मीनाक्षी कभी भी अपना फोन बंद नहीं करती थी. यह पहला मौका था, जब कमला को बेटी का फोन बंद मिला. बेटी से बात न होने पर कमला थापा को चिंता हुई.

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उन्होंने कई बार मीनाक्षी का फोन ट्राई किया, लेकिन उस का फोन बंद ही मिला. तीसरे दिन कमला थापा का माथा तब घूम गया जब उन के मोबाइल पर एक मैसेज आया. मैसेज में लिखा था, ‘मीनाक्षी हमारे कब्जे में है, हम ने उस का अपहरण कर लिया है. अगर उसे जिंदा देखना चाहते हो तो उस के खाते में तुरंत 15 लाख रुपए जमा कर दो. अगर हमारी बात नहीं मानोगे तो हम उस की हत्या कर देंगे.’

उस एसएमएस को पढ़ कर कमला थापा को एक बारगी विश्वास नहीं हुआ कि यह बात सच भी हो सकती है. उन्होंने तुरंत बेटी के नंबर पर फोन मिला दिया. इस बार उस के फोन की घंटी बज रही थी. कमला थापा ने सोचा कि अब बात होने पर ही सच्चाई पता चलेगी. लेकिन काल रिसीव करने के बजाए किसी ने तुरंत फोन काट दिया. बात के बदले दूसरी ओर से फिर मैसेज आया, ‘‘जो भी बात करनी है, एसएमएस से करो.’’

इस से कमला थापा की चिंता बढ़नी स्वाभाविक ही थी. उन्हें कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने फोन कर के यह बात अपने बेटे नवराज को बताई. नवराज उस समय देहरादून में ही था. वह शाम तक घर आ गया. बहन के बारे में जान कर नवराज भी बहुत चिंतित हुआ.

उस ने भी मीनाक्षी के नंबर पर बात करने की कोशिश की, लेकिन दूसरी ओर फोन रिसीव नहीं किया जा रहा था. इस से परिवार के लोगों को लगा कि मीनाक्षी का सचमुच अपहरण हो चुका है और अपहर्त्ता फिरौती के लिए उसी का मोबाइल इस्तेमाल कर रहे हैं.

मीनाक्षी के अपहरण ने उस के घर वालों के होश उड़ा दिए. उन की माली हालात ऐसी नहीं थी कि अपहर्त्ताओं की मांग को पूरा किया जा सकता. चूंकि मीनाक्षी उन लोगों के कब्जे में थी. इसलिए वह कोई रिस्क भी नहीं लेना चाहते थे. अपहर्त्ताओं की बात मानने के अलावा उन के पास कोई दूसरा चारा नहीं था. लेकिन सवाल उस रकम का था, जो वे मांग रहे थे.

नवराज ने अपने हालातों का हवाला दे कर एसएमएस भेज कर कहा कि वह थोड़ाथेड़ा कर के पैसा दे सकते हैं. एसएमएस के जरिए ही तय हुआ कि फिरौती की रकम किस्तों में दी जा सकती है. अपहर्त्ता इस के लिए तैयार हो गए तो नवराज ने पहली किस्त के रूप में मीनाक्षी के बैंक में 30 हजार रुपए जमा कर दिए.

मीनाक्षी के घर वालों के लिए इस बात का पता लगाना बहुत मुश्किल था कि मीनाक्षी कहां है. और उस के फोन से कहां से मैसेज आ रहे हैं.

कोई रास्ता न देख नवराज ने देहरादून के थाना बसंत विहार जा कर पुलिस को पूरी बात बताई. साथ ही आए हुए मैसेज भी पुलिस को दिखाए. लेकिन देहरादून पुलिस ने यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया कि यह मामला मुंबई का है, इसलिए मुंबई पुलिस ही कुछ कर सकती है.

बहन की तलाश में नवराज पहुंचा मुंबई

नवराज किसी भी तरह बहन को बचाना चाहता था, सो वह उसी दिन मुंबई के लिए रवाना हो गया. मीनाक्षी मुंबई के अंधेरी स्थित अंबोली थानाक्षेत्र में रहती थी, इसलिए नवराज ने थाना अंबोली जा कर पुलिस को पूरी बात बताई.

फिरौती के एसएमएस पढ़ कर मुंबई पुलिस को यह मामला अपहरण का लगा. 18 मार्च को मुंबई पुलिस ने मीनाक्षी के अपहरण का मामला दर्ज तो कर लिया, लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया.

उसी दिन पैसे के लिए जब अपहर्त्ताओं का एसएमएस फिर आया तो नवराज ने मीनाक्षी के खाते में 10 हजार रुपए और जमा किए. तीसरी किस्त के तौर पर उस ने 20 हजार रुपए फिर जमा करा दिए. इस सब के चलते अपहर्त्ता एसएमएस के जरिए इस बात पर अड़े थे कि मीनाक्षी को छोड़ने की एवज में उन्हें पूरे 15 लाख रुपए ही चाहिए.

अपहर्त्ताओं को जिद पर अड़ा देख कर नवराज ने एसएमएस कर के कहा, ‘‘जब तक मेरी बात मीनाक्षी से नहीं कराई जाएगी, तब तक मैं कोई पैसा नहीं दूंगा.’’ इस के बाद अपहर्त्ताओं की ओर से कोई जवाब नहीं आया. उन्होंने मीनाक्षी के मोबाइल का स्विच भी औफ कर दिया. जब बातचीत का रास्ता बंद हो गया तो नवराज को बहन के साथ किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी.

अंबोली पुलिस द्वारा कोई काररवाई न करने पर नवराज ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से गुहार लगाई. इस पर यह मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया. इस बीच अपहर्त्ताओं से पूरी तरह संपर्क टूट चुका था. न उन का कोई एसएमएस आ रहा था और न ही फोन. मीनाक्षी ने जब आखिरी बार अपनी मां से बात की थी तो इलाहाबाद जाने की बात कही थी.

मोबाइल की काल डिटेल्स के सहारे क्राइम ब्रांच ने शुरू की जांच

क्राइम ब्रांच ने नवराज से पूछताछ के बाद इसी बात को ध्यान में रख कर अपनी जांच शुरू की. इस के लिए पुलिस ने सब से पहले मीनाक्षी के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. इस से यह तो साफ हो गया कि वह इलाहाबाद गई थी, लेकिन किस के साथ गई थी, यह पता नहीं लग सका.

मीनाक्षी के फोन की काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पुलिस को उस में 2 नंबर ऐसे मिले, जिन पर मीनाक्षी की ज्यादा देर तक बातें होती थीं. पुलिस ने उन नंबरों का पता लगाया तो वे नंबर अमित जायसवाल और प्रीति एल्विन सुरीन के निकले.

छानबीन करने पर पता चला कि अमित और प्रीति इलाहाबाद के रहने वाले थे और फिल्मों में काम करने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे. उन का इलाहाबाद का पता भी मिल गया.

अमित और प्रीति के बारे में जानकारी मिलते ही मुंबई क्राइम ब्रांच की एक टीम 29 मार्च को इलाहाबाद के लिए रवाना हो गई. अमित ममफोर्डगंज, निवासी सुरेंद्र जायसवाल का बेटा था. पता चला कि वह अपनी किस्मत आजमाने मुंबई गया था और मौडलिंग के साथसाथ फिल्मों में छोटीमोटी भूमिकाएं करता था.

प्रीति एल्विन उस की प्रेमिका थी, जिस के लिए उस ने अपना घर छोड़ दिया था. अमित न केवल विवाहित था, बल्कि 2 बच्चों का बाप भी था. उस की पत्नी का नाम भी प्रीति ही था. सुरेंद्र जायसवाल ने पुलिस को बताया कि अमित से उन का ज्यादा संपर्क नहीं है.

प्रीति एल्विन इलाहाबाद की ही दरभंगा कालोनी के दुर्गापूजा पार्क के सामने स्थित एक बंगले के सर्वेंट क्वार्टर में रहा करती थी. उस के पिता नवीन मूलत: झारखंड के रहने वाले थे और एक स्कूल में मामूली सी नौकरी करते थे. वह पिछले 30 साल से सपरिवार इलाहाबाद की दरभंगा कालोनी स्थित एक बंगले के सर्वेंट क्वार्टर में रह रहे थे.

प्रीति की मां कई साल पहले घर छोड़ कर चली गई थी. नवीन ने पुलिस को बताया   कि वह अपनी एकलौती बेटी प्रीति की हरकतों से परेशान थे. उस के सिर पर हीरोइन बनने का भूत सवार था और समझाने पर भी उस ने उन की बात नहीं मानी थी.

नवीन ने मुंबई क्राइम ब्रांच को बताया कि उन्हें बंगले के चौकीदार भोलाराम पांडे से पता चला था कि प्रीति 13 मार्च को अमित के साथ आई थी और एक रात वहां रुकी थी. उन दोनों के साथ खूबसूरत सी एक अन्य लड़की भी थी. वह लड़की कौन थी, इस बारे में न तो नवीन को पता था और न भोलाराम पांडे को.

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भोलाराम पांडे ने मुंबई क्राइम ब्रांच की टीम को अमित और प्रीति के साथ आई लड़की का हुलिया बताया तो क्राइम ब्रांच अफसरों ने पक्का यकीन हो गया कि वह लड़की मीनाक्षी ही रही होगी. पुलिस ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उन लोगों ने मीनाक्षी की हत्या कर के उस की लाश इधरउधर फेंक दी हो.

इसी आशंका की वजह से मुंबई क्राइम ब्रांच ने जिला पुलिस से अज्ञात शवों के बारे में जानकारी हासिल की. लेकिन इस तरह के किसी शव की जानकारी नहीं मिली. निराश हो कर मुंबई पुलिस वापस लौट गई.

मुंबई क्राइम ब्रांच की पहली सफलता

मुंबई पुलिस को अमित जायसवाल और प्रीति एल्विन पर ही शक था. उन दोनों के फोन भी बंद थे. कोई और रास्ता न देख क्राइम ब्रांच ने उन दोनों के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला कि 14 मार्च को उन दोनों की लोकेशन भी इलाहाबाद थी.

14 मार्च को अमित, प्रीति और मीनाक्षी के फोन की लोकेशन इलाहाबाद में ही थी. इस का मतलब अमित और प्रीति से बात कर के ही मीनाक्षी के बारे में जाना जा सकता था. इसलिए क्राइम ब्रांच अमित और प्रीति तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी.

इस के लिए अमित के मोबाइल की काल डिटेल्स में ऐसे नंबरों को जांचा गया, जिन पर वह ज्यादा फोन किया करता था. उन नंबरों में ज्यादातर उस के दोस्तों के थे. उन नंबरों पर संपर्क किया गया तो पुलिस को अमित का नया नंबर मिल गया. उस के साथ ही प्रीति का नंबर भी मिल गया.

दोनों के फोन नंबर मिल जाने के बाद पुलिस ने दोनों की लोकेशन सर्च की तो पता चला कि दोनों मुंबई में ही हैं. इस के बाद क्राइम ब्रांच की टीम ने 15 अप्रैल, 2012 को जाल बिछा कर दोनों को हिरासत में ले लिया और पूछताछ के लिए अंबोली पुलिस के हवाले कर दिया.

पुलिस ने उन से मीनाक्षी के बारे में पूछताछ की. शुरू में दोनों कहते रहे कि उन्हें मीनाक्षी के बारे में कोई पता नहीं है, लेकिन जब उन के साथ सख्ती बरती गई तो वे टूट गए. उन्होंने जो कुछ बताया, उसे सुन कर सब के रोंगटे खड़े हो गए. पता चला कि अमित और प्रीति ने मीनाक्षी को इलाहाबाद ले जा कर उस की हत्या कर दी थी और सिर व धड़ अलगअलग जगहों पर फेंक दिए थे.

पुलिस ने अमित और प्रीति के खिलाफ अपहरण व हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस मामले की जांच इंसपेक्टर सुजीत कुमार गोविस्कर को सौंपी गई. पुलिस पूछताछ में मीनाक्षी की हत्या की जो कहानी पता चली, वह चौंकाने वाली तो थी ही, उन युवाओं के लिए नसीहत भरी भी थी, जो बिना आगापीछा सोचे सपनों के पीछे भागते हैं.

मीनाक्षी के सपनों की उड़ान

देहरादून के एक मध्यमवर्गीय परिवार की मीनाक्षी थापा खूबसूरत और हुनरमंद लड़की थी. जवानी की दहलीज पर आतेआते उस की खूबसूरती ने उस के सपनों को पंख लगा दिए थे. जब वह इंटरमीडिएट में थी, तभी उस ने सोच लिया था कि वह फिल्मों में हीरोइन बनेगी.

इसी बात को ध्यान में रख कर उस ने स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाली सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू कर दिया था. इस के साथसाथ वह मौडलिंग भी करती थी.

चूंकि देहरादून में बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं, इसलिए उस ने मायानगरी मुंबई जाने का फैसला कर लिया. लेकिन बिना परिवार वालों की मरजी के वह मुंबई नहीं जा सकती थी. इस बारे में उस ने मां से बात की तो उन्होंने दो टूक मना कर दिया.

भैयाभाभी ने भी साफ कह दिया कि वह कहीं नहीं जाएगी. लेकिन मीनाक्षी फिल्म लाइन में जाने का फैसला कर चुकी थी, इसलिए उस ने घर वालों को समझाने की कोशिश की. जब उस की यह कोशिश कमयाब नहीं हुई तो उस ने जिद पकड़ ली.

अंतत: घर वालों को उस की जिद के सामने झुकना पड़ा. 2 साल पहले मीनाक्षी अपने एक परिचित के माध्यम से मुंबई चली गई. मायानगरी मुंबई में हजारों लोग फिल्मों में किस्मत आजमाने आते हैं. इन में से चंद खुशकिस्मत वालों की बात छोड़ दें तो ज्यादातर के सपने टूटते ही हैं.

लाखों की भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाना जंग जीतने से कम नहीं है. मीनाक्षी ने भी मुंबई में अपने पैर जमाने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिल सकी. देखतेदेखते 2 वर्ष गुजर गए. इन 2 सालों में उसे निम्न स्तर की एकाध फिल्म, मौडलिंग और कुछ विज्ञापनों में ही काम करने का मौका मिल पाया.

मीनाक्षी संघर्ष करना चाहती थी. उस ने आगे बढ़ने के लिए अपने सपने को मरने नहीं दिया था. उसे बी ग्रेड की फिल्मों में जूनियर आर्टिस्ट के छोटेमोटे रोल मिलने लगे थे. इस से वह इतना कमाने लगी थी कि अपनी जिंदगी आराम से चला सके. मुंबई की चकाचौंध भरी दुनिया में बने रहने के लिए स्टेटस की जरूरत होती है.

अपना स्टेटस बनाए रखने के लिए मीनाक्षी ब्रांडेड कपड़े पहनती थी. उस के लाइफस्टाइल में वह सब झलकता था, जो ऊंचे घराने की लड़कियों में होता है. इस सब के बीच वह अपने घर वालों से बराबर संपर्क बनाए रखती थी. सन 2010 में उसे हिंदी फिल्म ‘404: एरर नौट फाउंड’ में काम करने का मौका मिला.

अमित और प्रीति भी उसी की तरह फिल्मी दुनिया में संघर्ष करने मायानगरी आए थे. अमित व प्रीति की मीनाक्षी से मुलाकात मधुर भंडारकर की फिल्म ‘हीरोइन’ के सेट पर हुई थी, जिस की मुख्य भूमिका में करीना कपूर थीं. मीनाक्षी को इस फिल्म में छोटा सा रोल मिला था. फिल्म हीरोइन में अमित और प्रीति की भी छोटीछोटी भूमिकाएं थीं. अमित ने मीनाक्षी से खुद को भोजपुरी फिल्मों का फिल्म प्रोड्यूसर बताया और प्रीति को मौडल.

मीनाक्षी भी इस मामले में कहां पीछे रहने वाली थी, उस ने भी खुद को नेपाल राजघराने से संबंधित बता दिया. फलस्वरूप जल्दी ही तीनों की दोस्ती हो गई.

मुंबई आने के पीछे अमित व प्रीति की अपनी अलग कहानी थी. अमित इलाहाबाद के ममफोर्डगंज निवासी अधिवक्ता सुरेंद्र जायसवाल का बेटा था. सुरेंद्र चाहते थे कि अमित भी उन्हीं की तरह नामी वकील बने, इसीलिए उन्होंने उसे एलएलबी कराई थी.

पिता की बात मान कर अमित ने वकालत की पढ़ाई तो कर ली, लेकिन उस की ख्वाहिश थी कि वह फिल्मों में काम करे.

अमित के घर वालों ने 7 साल पहले उस का विवाह प्रतापगढ़ जिले के रहने वाले ओमप्रकाश जायसवाल की बेटी प्रीति जायसवाल के साथ कर दिया था. वह 1 बेटे और 1 बेटी का पिता भी बन गया था.

इस के बावजूद अमित की फिल्मों में काम करने की हसरत मरी नहीं थी. इसी चाह में वह हीरो की तरह बनठन कर रहता था और शरीर को फिट रखने के लिए रोजाना व्यायाम भी करता था. उस ने छिटपुट मौडलिंग भी की थी और अपना प्रोफाइल भी बनवा रखा था.

अमित की असलियत और चाहत

पूर्वी उत्तर प्रदेश में यदाकदा भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग होती रहती थी. अमित को अगर किसी भोजपुरी फिल्म की शूटिंग की जानकारी मिलती तो वह वहां पहुंच जाता और डायरेक्टरों को अपना हुनर दिखाने की कोशिश करता. लेकिन इस से बात नहीं बन पाती थी. फिर भी उस ने अपनी कोशिश जारी रखी. इसी बीच वह भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाले कुछ लोगों के संपर्क में आया तो उन की बदौलत उसे जूनियर आर्टिस्ट के रोल मिलने लगे.

ये छोटीछोटी भूमिकाएं न तो गुजारे लायक थीं और न ही उस की इच्छाओं के अनुरूप. वैसे तो अमित संपन्न परिवार से था. उस का परिवार फाफामऊ, इलाहाबाद के अपने मकान में रहता था. उन का ममफोर्डगंज वाला मकान खाली था. अपनी जीविका चलाने के लिए अमित ने उस मकान में डांस स्कूल खोल लिया था.

जब इस में भी उस का मन नहीं लगा तो उस ने उसी मकान में तिरुपति एकेडमी के नाम से कोचिंग सेंटर शुरू कर दिया. छात्रछात्राओं को वह खुद तो पढ़ाता ही था, साथ ही उस ने कुछ अन्य शिक्षकों को भी अपने यहां नौकरी पर रख लिया था.

अमित की एकेडमी में प्रीति एल्विन सुरीन भी पढ़ने के लिए आती थी. प्रीति गरीब परिवार की लड़की थी. जवानी की दहलीज तक पहुंचतेपहुंचते उसे गरीबी से नफरत होने लगी थी. वह महत्त्वाकांक्षी थी. उस ने मन ही मन ठान लिया था कि चाहे कुछ भी करना पड़े. वह अपनी तकदीर खुद लिखेगी. परिवार की हालत खस्ता होते हुए भी पिता नवीन सुरीन उसे पढ़ा रहे थे.

चूंकि प्रीति खूबसूरत थी, इसलिए उस ने मौडलिंग करने का फैसला कर लिया. यह बात अलग है कि इस काम में वह ज्यादा सफल नहीं हो पाई. प्रीति की इच्छा मुंबई जाने की थी. इस के लिए वह अपनी अंगरेजी में सुधार करना चाहती थी. अंगरेजी सीखने के लिए उस ने तिरुपति एकेडमी में दाखिला ले लिया था.

बाद में प्रीति को पता चला कि तिरुपति एकेडमी का मालिक अमित अच्छा डांसर है और भोजपुरी फिल्मों में भी काम करता है. प्रीति को लगा कि अमित के सहयोग से वह भी आगे बढ़ सकती है. इसलिए उस ने जल्दी ही अमित से नजदीकी बढ़ा ली.

अमित व प्रीति फिल्मों व मौडलिंग को ले कर अकसर बातें किया करते थे. बातोंमुलाकातों के इसी दौर में दोनों के दिलों में चाहत ने जन्म ले लिया. बातोंबातों में एक दिन अमित ने प्रीति के सामने अपने प्यार का इजहार कर दिया.

बन गई अमित और प्रीति एल्विन की जोड़ी

प्रीति को अमित की बात पर कोई हैरत नहीं हुई, बल्कि उस के दिल की कलियां खिल उठीं. उस ने भी मुसकरा कर जाहिर कर दिया कि वह भी उसे प्यार करती है. प्रीति जानती थी कि अमित शादीशुदा है, लेकिन हीरोइन बनने के सपने ने उस की आंखों पर पट्टी बांध दी थी.

आगे बढ़ने के लिए अमित बहुत बड़ा सहारा बन सकता था, इसलिए प्रीति ने उस के शादीशुदा होने की बात को नजरअंदाज कर दिया. अमित जो कमाता था, उस का ज्यादातर हिस्सा अपनी प्रेमिका प्रीति एल्विन सुरीन पर खर्च करने लगा. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के करीब आते गए.

दोनों प्यार के नाम पर एक नैया पर सवार तो हो गए थे, लेकिन जब उन की नैया जन सागर में उतरी तो उस पर लोगों की नजर पड़ गई. कानोंकान हो कर यह बात अमित की पत्नी तक भी पहुंची. पति की करतूत सुनते ही वह आगबबूला हो उठी. उस ने अमित को लताड़ा तो उस ने सफाई दी कि चूंकि प्रीति और वह एक ही पेशे में हैं, इसलिए दोनों में केवल दोस्ती है और कुछ नहीं.

लेकिन प्रीति जायसवाल के मन में संदेह घर कर चुका था. इसलिए परिवार में कलह रहने लगी. सुरेंद्र जायसवाल को भी बेटे की करतूत का पता चल गया था. उन्होंने भी उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन अमित ने अपनी सफाई दे कर बात खत्म कर दी.

प्रीति एल्विन के पिता को भी अमित और अपनी बेटी के चक्कर की बात पता चल चुकी थी. बेटी के बहकते कदमों से उन्हें चिंता हुई. उन्होंने उसे जमाने की ऊंचनीच समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ, पिता के बारबार समझाने पर भी वह अमित का साथ छोड़ने को तैयार नहीं हुई.

अमित और प्रीति की एक जैसी सोच थी. दोनों ने मिल कर तय किया कि वे उस शहर को ही छोड़ देंगे. जहां के लोग उन के प्यार, उन के सपनों की कीमत नहीं समझते. उन के सपनों का शहर मुंबई था.

सपनों की उस दुनिया में अपने हिस्से की जमीन तलाशने के लिए अगस्त, 2011 में दोनों इलाहाबाद छोड़ कर मुंबई चले गए और लिव इन रिलेशन में रहने लगे. काफी भागदौड़ के बाद दोनों को कुछ फिल्मों में छोटेमोटे रोल भी मिले, जिस के सहारे गुजरबसर होने लगी.

उधर अमित की पत्नी प्रीति जायसवाल को जब यह पता चला कि उस का पति प्रीति सुरीन के साथ मुंबई में रह रहा है तो उसे बहुत दुख हुआ. अमित अपने घर फोन करता रहता था. उस के पिता फोन पर उसे समझाते, लेकिन वह उन की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देता था. जब सुरेंद्र जायसवाल ने समझ लिया कि अमित नहीं आएगा तो उन्होंने ममफोर्डगंज वाला मकान किराए पर उठा दिया.

सितंबर, 2011 में अमित को जब पता चला कि उस के पिता बीमार हैं और अस्पताल में एडमिट हैं तो वह उन्हें देखने के लिए इलाहाबाद आया और 2 दिनों बाद मुंबई लौट गया. नवंबर के महीने में वह फिर घर लौटा तो पिता ने उस से पूछा, ‘‘तुम मुंबई में क्या करते हो?’’

‘‘पापा, मैं एक प्राइवेट बैंक में नौकरी करता हूं और मुझे 16 हजार रुपए सैलरी मिलती है.’’ अमित ने बताया.

‘‘मुंबई जैसे शहर में इतने पैसों में क्या होता होगा. तुम घर चले आओ. ममफोर्डगंज वाले मकान के किराए के जो 25 हजार रुपए मिलते हैं, उन पैसों को तुम ही लेते रहना. कम से कम तुम हमारी आंखों के सामने तो रहोगे.’’ सुरेंद्र ने अमित को समझाने की कोशिश की. लेकिन अमित पर पिता के समझाने का कोई असर नहीं हुआ और वह मुंबई लौट गया.

प्रीति के लिए तो पिता के मायने ही खत्म हो गए थे. मुंबई जा कर वह पूरी तरह आजाद खयाल हो चुकी थी. इसी दौरान अमित और प्रीति को मधुर भंडारकर की करिश्मा कपूर स्टारर मूवी ‘हीरोइन’ में काम मिल गया था, जहां मीनाक्षी भी काम कर रही थी.

मीनाक्षी से मुलाकात के बाद तीनों अच्छे दोस्त बन गए. तीनों का सपना एक था और सोच भी लगभग एक जैसी थी. इसलिए तीनों अकसर साथ घूमतेफिरते, खातेपीते. कुछ दिनों तक सब ठीक चला. फिर अचानक प्रीति को लगने लगा कि मीनाक्षी उस के मुकाबले सुंदरता में भी अव्वल है और काम में भी. इसलिए उसे मन ही मन उस से जलन सी होने लगी.

अमित अच्छा डांसर था, मीनाक्षी उस से डांस सीखती थी. उन दोनों को डांस करते देख प्रीति मन ही मन कुढ़ कर रह जाती थी. उन  दोनों का हंसनाबोलना भी उसे बिलकुल पसंद नहीं था. दोनों की नजदीकियों की वजह से कई बार मीनाक्षी से उस की तकरार भी हो जाती थी. एक तो वे दोनों आर्थिक तंगियों से जूझ रहे थे, ऊपर से अमित और मीनाक्षी की नजदीकी प्रीति को कांटे की तरह चुभती थी.

बंधने लगी भविष्य की खतरनाक भूमिका

प्रीति जानती थी कि मीनाक्षी खूबसूरती और अपने टैलेंट से कोई अच्छा मुकाम हासिल कर लेगी. ऐसे में अमित उस के प्यार में पड़ कर आगे बढ़ने के चक्कर में उसे छोड़ देगा. यही सोच कर उस ने मन ही मन एक खतरनाक योजना तैयार कर ली. वह अपनी इस योजना में किसी तरह अमित को भी शामिल करना चाहती थी.

अमित और प्रीति ने एकदूसरे का साथ पाने और कैरियर बनाने के लिए ही घर छोड़ा था. दोनों भले ही पैसे के लिए परेशान थे, लेकिन जब भी मीनाक्षी को देखते थे तो उस के रहनसहन, खानपान व पहनावे को देख कर जरूर चौंकते थे. उस का लाइफ स्टाइल बिलकुल मुंबईया और पैसे वालों जैसा था. मीनाक्षी ने उन्हें बता रखा था कि उस का परिवार भले ही देहरादून में रहता है, वह नेपाल के राजघराने से ताल्लुक रखती है.

साथ ही उस ने यह भी बताया था कि अनबन की वजह से उस के पिता उन के साथ नहीं रहते. एक बार बातोंबातों में इलाहाबाद का जिक्र आया तो मीनाक्षी ने कहा, ‘‘सुना है, इलाहाबाद बड़ा अच्छा शहर है. 3 नदियों का संगम होता है वहां. मेरा मन है, इलाहाबाद जा कर संगम देखूं.’’

मीनाक्षी के मुंह से अपने शहर की तारीफ सुन कर अमित को अच्छा लगा. उस ने बिना सोचेसमझे कह दिया, ‘‘जब चाहो चलो, मैं तुम्हें पूरा शहर घुमाऊंगा.’’

दरअसल, अमित मीनाक्षी के साथ मौजमस्ती करना चाहता था, जो प्रीति के रहते संभव नहीं था. इसलिए उस ने बिना सोचेसमझे उसे इलाहाबाद ले जाने की बात कह दी थी. लेकिन बाद में जब उस ने इस मुद्दे पर सोचा तो उसे लगा कि बिना प्रीति की सहमति के वह मीनाक्षी को इलाहाबाद नहीं ले जा सकता. सोचविचार कर एक दिन अमित ने प्रीति से कहा, ‘‘मैं सोच रहा हूं कि 1-2 दिन के लिए इलाहाबाद हो आऊं. पैसे की परेशानी है, घर से पैसे भी ले जाऊंगा.’’

पैसे की वाकई परेशानी थी. दोनों साथसाथ जाते तो आनेजाने में ज्यादा खर्च होता. इसलिए प्रीति ने उसे अकेले जाने की स्वीकृति दे दी, लेकिन जब अमित ने उसे बताया कि मीनाक्षी भी इलाहाबाद घूमने जाना चाहती है, तो उस के कान खड़े हो गए. वह जानती थी कि जब उस ने अमित को उस की पत्नी से छीन लिया है तो मीनाक्षी भी अमित को उस से छीन सकती है. मनचले आदमी का क्या भरोसा?

अगर वह उस के हाथ से निकल गया तो वह न घर की रहेगी न घाट की. इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए उस ने अमित से दो टूक कह दिया, ‘‘हम दोनों ने एकदूसरे का हाथ थाम कर घर छोड़ा था. अब हम साथ जिएंगे साथ मरेंगे. मैं तुम्हें मीनाक्षी के साथ जाने की छूट नहीं दे सकती. अगर तुम उसे साथ ले कर जाओगे तो मैं भी साथ चलूंगी.’’

अमित ने प्रीति को समझाया, खर्चे का वास्ता दिया, लेकिन प्रीति अपनी बात पर अड़ गई. परेशानी यह थी कि अमित मीनाक्षी को इलाहाबाद ले जाने का वायदा कर चुका था. जब बात खर्चे की आई तो प्रीति अपनी योजना के पहले हिस्से को ध्यान में रख कर बोली, ‘‘मीनाक्षी को इलाहाबाद घुमाना है न, कोई बात नहीं. हम अपना खर्च उसी से वसूल करेंगे.’’

‘‘मतलब, मैं कुछ समझा नहीं?’’ अमित ने पूछा तो प्रीति बोली, ‘‘तुम इलाहाबाद चलने की योजना बनाओ. मीनाक्षी पैसे वाले घर की लड़की है. हम उस का अपहरण कर के मोटी रकम वसूलेंगे.’’

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अमित प्रीति की बात सुन कर चौंका तो वह उसे समझाते हुए बोली, ‘‘देखो अमित, हम यहां कैरियर बनाने के लिए आए हैं. भावनाओं में बहने नहीं. कैरियर बनाने के लिए पैसा चाहिए, जो हमारे पास है नहीं. प्रीति का अपहरण कर के हम मोटी रकम वसूल करेंगे और फिर आराम से मुंबई में रह कर कैरियर बनाएंगे.’’

प्रीति की बात सुन कर अमित का दिमाग घूम गया. उसे भी लगा कि प्रीति जो कह रही है, वह सही है. जबकि प्रीति का मकसद मीनाक्षी के घर वालों से पैसा वसूलना ही नहीं, बल्कि उसे अमित की जिंदगी से पूरी तरह दूर करना था. चूंकि अमित को पैसों की जरूरत थी, इसलिए वह प्रीति की बातों में आ गया.

मीनाक्षी के मन में बोया हीरोइन बनने का सपना

जब दोनों एक मत हो गए तो उन्होंने मिल कर एक ऐसी योजना बनाई, जो बहुत ही खतरनाक थी. मीनाक्षी उन दोनों को अपना दोस्त मानती थी और उन पर हर तरह से विश्वास करती थी. इसी का फायदा उठा कर वे दोनों उसे अपने जाल में फांसना चाहते थे.

उन की योजना थी कि मीनाक्षी को इलाहाबाद ले जा कर मार डालेंगे और फिर उस के घर वालों से मनचाहा पैसा वसूलेंगे. वे दोनों सोच भी नहीं सकते थे कि जिस मीनाक्षी को वे किसी अमीर खानदान की समझ रहे हैं, वह एक मामूली घर की लड़की है.

जब योजना तैयार हो गई तो एक दिन अमित ने मीनाक्षी से कहा, ‘‘मीनाक्षी इलाहाबाद में एक भोजपुरी फिल्म की शूटिंग चल रही है. मेरे पास फोन आया था, मुझे वहां काम के सिलसिले में बात करने जाना है. मेरी जानपहचान के लोग हैं. तुम चाहो, तो मैं डायरेक्टर से कहसुन कर तुम्हें काम दिलवा सकता हूं. बाद में वह तुम्हें हीरोइन का रोल दे देगा.’’

मुंबई में जमे रहने के लिए मीनाक्षी को काम की जरूरत थी. स्ट्रगलर छोटामोटा काम कर के ही आगे बढ़ते हैं, इसलिए वह इलाहाबाद जाने के लिए तैयार हो गई.

मीनाक्षी के हां करते ही अमित और प्रीति के चेहरों पर चमक आ गई. वे दोनों पहले ही सारी योजना बना चुके थे. योजनानुसार 13 मार्च को तीनों इलाहाबाद के लिए रवाना हो गए.

अमित और प्रीति के सपनों को तब झटका लगना शुरू हुआ, जब सफर के दौरान मीनाक्षी ने उन्हें अपनी असलियत बताई. उस ने उन्हें बताया कि ग्लैमर की दुनिया में बने रहने के लिए कदमकदम पर झूठ बोलने पड़ते हैं. पेट भले ही खाली हो, पर दिखावे के लिए अच्छे कपड़े पहनने पड़ते हैं.

ऐसा न हो तो कोई पूछेगा ही नहीं. बातों के दौरान उस ने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति के बारे में भी बताया. यह सब मीनाक्षी ने इसलिए बताया था, जिस से अमित उस की मजबूरी को समझ कर उसे भोजपुरी फिल्म में काम दिला दे.

मीनाक्षी की हकीकत जानने के बाद अमित और प्रीति को वह सोने का अंडा देने वाली मुरगी की जगह बिना पंखों की चिडि़या दिखने लगी. उन्होंने सोचा था कि काम दिलाने के नाम पर भी मीनाक्षी के घर वालों से पैसा लेंगे, लेकिन यहां तो कहानी ही उलटी निकली. मीनाक्षी की सच्चाई जान कर उन दोनों को बहुत गुस्सा आया.

14 मार्च, 2012 की शाम तीनों इलाहाबाद पहुंच गए. रेलवे स्टेशन से वे दरभंगा कालोनी स्थित बंगले के उस सर्वेंट क्वार्टर में पहुंचे, जहां प्रीति के पिता रहते थे, लेकिन उस समय उस के पिता क्वार्टर में नहीं थे. क्वार्टर पर प्रीति का चचेरा भाई जौन सुरीन मिला.

कुछ देर रुक कर प्रीति ने जौन को गोरखपुर जाने के लिए चौरीचौरा ट्रेन के 2 साधारण टिकट लेने इलाहाबाद जंक्शन भेज दिया. उस ने जौन से कहा कि टिकिट ले कर वह जंक्शन के सामने ही मिले, वह वहीं पहुंच कर उस से टिकिट ले लेगी.

जौन के जाने के बाद जब अमित, प्रीति और मीनाक्षी अंदर बैठे थे तो प्रीति ने खिन्न हो कर कहा, ‘‘मीनाक्षी, तुम्हारी सारी बात तो हम ने सुन ली. अब मैं भी तुम्हें सच्चाई बता देना चाहती हूं. सच्चाई यह है कि तुम्हें भोजपुरी फिल्मों मे काम नहीं मिल पाएगा.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’ मीनाक्षी ने चौंक कर पूछा तो प्रीति बोली, ‘‘क्योंकि इस के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं, जो तुम्हारे पास नहीं हैं.’’

‘‘यह बात तो तुम मुझे मुंबई में भी बता सकते थे. मुझे पता होता, तो मैं यहां आती ही क्यों?’’

‘‘बताते कैसे, हम तो सोच रहे थे कि तुम रईस परिवार की हो. हमें क्या पता था कि तुम बिलकुल फटीचर हो.’’

‘‘तुम हद से आगे बढ़ रही हो प्रीति. रईस तो तुम भी नहीं हो, तुम्हारा फटीचरपन यहां साफ दिख रहा है. रही बात मेरी तो मैं चाहे जो भी हूं, मैं ने तुम लोगों पर इतने अहसान किए हैं, जिन्हें तुम लोग कभी नहीं उतार पाओगे. मीनाक्षी ने प्रीति को ही नहीं, अमित को भी खूब खरीखोटी सुनाई.

मौत आ खड़ी हुई मीनाक्षी के सिर पर

मीनाक्षी और प्रीति के बीच इतनी गरमागरमी हुई कि नौबत मारपीट तक पहुंच गई. किसी तरह अमित ने दोनों को समझाबुझा कर शांत किया. जब बात आई गई हो गई तो तीनों ने खाना खाया. खाना खा कर तीनों लेट गए. थोड़ी देर में मीनाक्षी तो सो गई, लेकिन अमित और प्रीति की आंखों से नींद कोसों दूर थी. वे दोनों उस के सोने का इंतजार कर रहे थे. जब उन्हें विश्वास हो गया कि मीनाक्षी सो गई है तो अमित ने उस के गले में दुपट्टे का फंदा कस दिया. सांसें रुकीं, तो मीनाक्षी की आंखें खुल गईं.

उस ने देखा कि अमित और प्रीति के रूप में उस की मौत सामने खड़ी है. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वे दोनों इस तरह उस की जान के दुश्मन बन जाएंगे. गले पर दबाव और बढ़ा तो मीनाक्षी ने छटपटाते हुए हाथपैर चलाए. कहीं वह बेकाबू न हो जाए, यह सोच कर प्रीति ने उस के दोनों हाथ पकड़ लिए. अमित उस के गले पर तब तक दबाव बनाए रहा, जब तक उस की सांसों की डोर नहीं टूट गई.

प्रीति और अमित मीनाक्षी की हत्या कर चुके थे. अब उन्हें उस की लाश को ठिकाने लगाना था. इस मुद्दे पर बात हुई तो तय हुआ कि चाहे जो भी करना पड़े, मीनाक्षी की लाश की शिनाख्त नहीं होनी चाहिए. जिस बंगले के सर्वेंट क्वार्टर में मीनाक्षी की हत्या की गई थी, उस के पीछे एक पतली नालीनुमा गली थी. वे दोनों मीनाक्षी की लाश को उठा कर वहां ले गए.

प्रीति रसोई से चापड़ उठा लाई थी. उसी गली में रख कर दोनों ने मीनाक्षी की गरदन काट कर अलग कर दी. उस वक्त प्रीति उस का सिर पकड़े हुए थी, ऐसा करते वक्त उस का दिल जरा भी नहीं कांपा. सिर काटने के बाद दोनों ने सीवर का ढक्कन खोल कर मीनाक्षी का धड़ उस में डाल दिया और उस का कटा सिर व चापड़ 2 अलगअलग पौलीथीन में रख लिए.

मीनाक्षी का पर्स, मोबाइल फोन व एटीएम कार्ड कमरे में ही रखा था. प्रीति और अमित को विश्वास था कि मीनाक्षी की लाश सीवर में गल जाएगी और उन तक कोई भी नहीं पहुंच पाएगा. उस के सिर को उन्होंने कहीं दूर जा कर ठिकाने लगाने का फैसला किया.

अमित और प्रीति दोनों थैला थामे इलाहाबाद जंक्शन पहुंचे. वहां प्रीति ने जौन से गोरखपुर जाने के रेलवे टिकट ले लिए. फिर जौन के वहां से जाने के बाद प्रीति ने गोरखपुर जाने का कार्यक्रम बदल कर रेलवे टिकिट वापस कर दिए और इलाहाबाद बसअड्डे की तरफ चल दिए.

बसअड्डे जा कर दोनों ने लखनऊ जाने वाली एसी बस पकड़ी. उन्होंने सोचा था कि रास्ते में कोई सुनसान जगह देख कर मीनाक्षी के सिर को फेंक देंगे लेकिन चाह कर भी वे ऐसा नहीं कर सके. क्योंकि एसी बस में शीशा खोलने की व्यवस्था नहीं थी. वह रात दोनों ने लखनऊ में ही बिताई. अगले दिन दोनों ने लखनऊ से बनारस जाने वाली बस पकड़ी. रास्ते में मीनाक्षी के सिर व चापड़ वाली पौलीथिन उन्होंने अलगअलग जगहों पर फेंक दीं, वह जगह इलाहाबाद से 108 किलोमीटर दूर थीं.

इस तरह मीनाक्षी की लाश को ठिकाने लगने के बाद अमित और प्रीति ने उस के ही मोबाइल से उस के घर वालों से फिरौती वसूलने के लिए मैसेज भेजने शुरू किए. मीनाक्षी के एकाउंट में पैसा डालने के लिए उन्होंने इसलिए कहा था, क्योंकि उन के पास उस का एटीएम कार्ड तो था ही, उस का पिन नंबर भी था. जब मीनाक्षी के भाई ने उस के एकाउंट में पैसे डाल दिए तो एटीएम से पैसे निकाल कर दोनों मुंबई के लिए रवाना हो गए.

मीनाक्षी का सिर या शव तो बरामद नहीं हुआ, यह जानने के लिए अमित और प्रीति 25 मार्च को फिर इलाहाबाद आए थे. इंटरनेट और समाचार पत्रों में भी दोनों इस मामले से जुड़ी खबरें देखते रहते थे.

जब मीनाक्षी का भाई उस से बात कराने के बाद ही फिरौती देने की जिद करने लगा तो अमित और प्रीति को लगा कि शायद अब बात आगे नहीं बढ़ पाएगी. इसलिए उन्होंने मीनाक्षी का मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया. इसी के साथ दोनों ने अपने फोन नंबर भी बदल दिए.

अपराध से पीछा छुड़ाने की कोशिश

हैवानियत भरा कृत्य कर के अमित और प्रीति अपने पाप से पीछा छुड़ाने के लिए फिरौती के पैसों से वैष्णो देवी व शिरडीधाम भी घूमने गए थे. कई शहरों में घूमने के बाद वे लोग मुंबई लौटे और जगह बदल कर रहने लगे. उन दोनों को लग रहा था कि मीनाक्षी के घर वाले मुंबई आ कर ज्यादा पूछताछ नहीं करेंगे. लेकिन उन की सोच गलत निकली और वे पुलिस के शिकंजे में फंस गए.

पुलिस के लिए मीनाक्षी का शव और वह हथियार बरामद करना जरूरी था, जिस से कत्ल हुआ था. इस के लिए मुंबई पुलिस ने दोनों हत्यारोपियों को इलाहाबाद ले जाने के लिए एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम के इलाहाबाद रवाना होने से पहले इलाहाबाद पुलिस से बात कर ली गई थी.

इंसपेक्टर सुजीत कुमार के नेतृत्व वाली मुंबई पुलिस की टीम में 2 सबइंसपेक्टर, 3 कांस्टेबल और 2 महिला कांस्टेबल शामिल थीं. 17 अप्रैल की दोपहर यह पुलिस टीम अमित और प्रीति को ले कर गोदान एक्सप्रेस से इलाहाबाद पहुंच गई. इस पुलिस टीम ने सब से पहले इलाहाबाद के तत्कालीन एसएसपी नवीन अरोड़ा से मुलाकात की. एसएसपी ने स्थानीय पुलिस की एक टीम मुंबई पुलिस के साथ लगा दी.

18 अप्रैल को मुंबई व स्थानीय पुलिस दोनों अभियुक्तों को ले कर उन के बताए स्थान पर पहुंची और सीवर से मीनाक्षी का धड़ बरामद कर लिया. उस का शव सड़गल चुका था. काररवाई के बाद पुलिस ने मीनाक्षी के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया. वीडियोग्राफी के बीच उसी दिन शव का पोस्टमार्टम कर दिया गया. पता चला मीनाक्षी की हत्या गला दबा कर की गई थी.

उस के दाएं पैर की हड्डी टूटी हुई थी. यह हड्डी संभवत: लाश सीवर में डालने के दौरान टूटी होगी. हालांकि शव की शिनाख्त मीनाक्षी के रूप में ही हुई थी, लेकिन सबूत पुख्ता करने के लिए डीएनए टेस्ट कराने का फैसला किया गया. इस के लिए उस के खून, बाल व हड्डी के नमूने ले कर डीएनए टेस्ट के लिए भेजे गए.

मीनाक्षी के शव को उस के भाई नवराज व जीजा अजय थापा के हवाले कर दिया गया. शव की हालत ऐसी नहीं थी कि उसे देहरादून ले जाया जा सकता, इसलिए उन्होंने पुलिस की मौजूदगी में इलाहाबाद के दारागंज घाट पर उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

पुलिस ने चापड़ रायबरेली के ऊंचाहार के पास झाडि़यों से बरामद कर लिया. मृतका का सिर बरामद करने के लिए पुलिस ने अमित और प्रीति को साथ ले कर गोरखपुर, लखनऊ व वाराणसी रोड के किनारे 2 दिनों तक तलाशी अभियान चलाया. लेकिन सिर बरामद नहीं हो सका. निराश हो कर पुलिस टीम मुंबई लौट गई.

बौलीवुड में सपने पूरे करने की चाह ले कर मुंबई आई मीनाक्षी की खूबसूरती और साथियों पर आंख मूंद कर किया गया विश्वास ही उस की जान का दुश्मन बन गया. महत्त्वाकांक्षा के चक्कर में उस की जान तो गई ही, साथ ही उस की तरह बौलीवुड के रुपहले परदे पर अपनी पहचान बनाने के सपने देखने वाले अमित और प्रीति भी कहीं के नहीं रहे.

मुंबई पुलिस ने विस्तृत पूछताछ के बाद दोनों आरापियों को अदालत पर पेश किया जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. जांच के बाद पुलिस ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में दोनों के खिलाफ आरोप पत्र पेश किया, जहां लंबी सुनवाई के बाद यह मामला फैसले के लिए सत्र न्यायालय पहुंचा.

सत्र न्यायालय में इस की सुनवाई करीब 5 साल चली. अभियोजन पक्ष की ओर से फोरैंसिक रिपोर्ट, मृतका की डीएनए रिपोर्ट और हत्या में इस्तेमाल हथियार के साथसाथ तमाम सबूत पेश किए गए. इस केस में 36 गवाहों की गवाहियां भी हुईं. न्यायाधीश महोदय ने इस केस को रेयरेस्ट औफ रेयर नहीं माना.

लंबी सुनवाई के बाद अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.जी. शेट्टी ने 9 मई, 2018 को अमित जायसवाल और प्रीति एल्विन सुरीन को अपहरण, हत्या और साजिश रचने का दोषी करार दिया. 11 मई, 2018 को न्यायाधीश जी.एस. शेट्टी ने अमित जायसवाल और प्रीति एल्विन सुरीन को आजन्म कारावास की सजा सुनाई. सजा सुनाने के बाद दोनों को जेल भेज दिया गया.

लेडी डौन बनने की चाहत

प्रिया सेठ. यही नाम है उस भोलीभाली और खूबसूरत चेहरे वाली लड़का का. वह चंद पलों में नौजवानों के दिल में उतर जाती है. अपनी इसी खूबसूरती से प्रिया हजारों लोगों को शिकार बना चुकी है. पुलिस के रिकौर्ड में प्रिया के खिलाफ  केवल 4 मामले दर्ज हैं. इन में एक हत्या, दूसरा एटीएम तोड़ने, तीसरा ब्लैकमेलिंग और चौथा पीटा एक्ट का.

वह पढ़ीलिखी है. राजस्थान के पाली जिले के छोटे से शहर फालना में नेहरू कालोनी की रहने वाली प्रिया के पिता अशोक सेठ सरकारी कौलेज में लेक्चरर हैं. मां अध्यापिका रही हैं. दादा सिरोही में प्रिंसिपल रहे. फूफा जोधपुर की यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. एक बहन और एक भाई है.

इंगलिश मीडियम से 82 प्रतिशत अंकों के साथ प्रिया ने फालना से 10वीं कक्षा पास की थी. फिर सीनियर सेकैंडरी में 78 प्रतिशत नंबर आए. मातापिता अपनी इस लाडली बड़ी बेटी को प्रोफेसर बनाना चाहते थे. इसलिए कौलेज की पढ़ाई के लिए 20 साल की उम्र में ही जयपुर भेज दिया. यह सन 2011 की बात है.

छोटे से शहर फालना से जयपुर आ कर प्रिया ने मानसरोवर कालोनी के एक निजी कौलेज में प्रवेश लिया तो उस की आंखों में प्रोफेसर बनने के सपने तैर रहे थे. पहले वह रिश्तेदार के घर पर ठहरी. कौलेज जाने के बाद जब भी मौका मिलता, वह जयपुर में घूमती. कभीकभी दिन ढले घर लौटती.

जल्दी ही वह जयपुर महानगर की चकाचौंध में खो गई और उन्मुक्त जीवन जीने के बारे में सोचने लगी, जिस में ना किसी की रोकटोक हो और ना ही कोई बंधन.

प्रिया की उन्मुक्तता में प्रोफेसर बनने का सपना धुंधला सा गया. वह रिश्तेदार का घर छोड़ कर मानसरोवर में ही पेइंगगेस्ट के रूप में रहने लगी. वैसे तो मातापिता उसे जयपुर में रहनेखाने और पढ़ाई के खर्च के लिए पैसे भेज देते थे, लेकिन उन पैसों से उस की मनचाही आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती थीं. अपने शौक पूरे करने के लिए प्रिया को पैसों की जरूरत महसूस होने लगी. अकेले रहते हुए दौलत की चाह में वह कब अनैतिक काम करते हुए अपराध की दलदल में उतर गई, उसे खुद पता नहीं चला.

आज प्रिया के हाथ खून से रंगे हुए हैं. उस ने जयपुर में रहते हुए 5 साल के दौरान हर तरह के हथकंडे अपनाए. आलीशान फ्लैट में रहना, लग्जरी कार में घूमना, महंगी शराब पीना, गांजे की सिगरेट का नशा और मौजमस्ती. उस ने सब तरह की ऐश की. अपने हुस्न की झलक दिखाने के लिए वेबसाइट भी बनाई.

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वह करोड़पति और अरबपति लोगों को अपने हुस्न के जाल में फांसने की फिराक में रहती थी. बहुत से नवधनाढ्य उस की अदाओं पर फिदा हुए. प्रिया ने उन को अपने गोरे बदन की चमक दिखाई और पैसे झटकने के बाद उन को ही झटक दिया.

पहली मुलाकात में ही अपनी मोहक मुस्कान दिखा कर वह 20-25 हजार रुपए आराम से झटक लेती थी. बीच में कुछ समय के लिए वह दिल्ली और नोएडा में जा कर रहने लगी थी, लेकिन वहां से जल्दी ही वापस जयपुर लौट आई.

अब वह जयपुर के व्यवसायी दुष्यंत शर्मा की हत्या के मामले में अपने बौयफ्रैंड और एक दोस्त के साथ सलाखों के पीछे है. 3 बार पहले भी वह गिरफ्तार हो चुकी है. उसे ना तो दुष्यंत की हत्या का मलाल है और ना ही कोई अपराधबोध.

प्रिया कुख्यात लेडी डौन बनना चाहती है. वह कहती है, ‘मैं ने दुनिया का कोई पहला मर्डर नहीं किया है.’ शायद उसे पता नहीं है कि कोई मर्डर पहला या आखिरी नहीं होता. प्रिया कहती है, ‘मुझे सिर्फ  दौलत चाहिए. मैं पैसे की बदौलत वे सब चीजें खरीदना चाहती हूं, जिस की मुझे ख्वाहिश है.’ वह यह भी कबूलती है कि 2 साल में उस ने डेढ़ करोड़ रुपया कमाया है.

प्रिया की घुमावदार राहें

प्रिया जितनी खूबसूरत है, उस की मेधावी लड़की से कातिल बनने और लेडी डौन बनने की तमन्ना रखने तक की कहानी उतनी ही घुमावदार है. अपनी तमन्नाओं को पूरा करने के लिए ही उस ने दुष्यंत का अपहरण कर लिया और फिरौती वसूलने के बाद भी उसे मौत के घाट उतार दिया.

जयपुर में शिवपुरी विस्तार झोटवाड़ा के रहने वाले रामेश्वर प्रसाद शर्मा सहकारिता विभाग में नौकरी करते हैं. उन का इकलौता बेटा दुष्यंत फ्लाई ऐश और बिल्डिंग मैटेरियल का काम करता था. दुष्यंत की शादी करीब 3 साल पहले विनीता से हुई थी. उन का करीब डेढ़ साल का एक बेटा है, जिस का नाम है कान्हा.

इसी 2 मई की शाम करीब 6 बजे दुष्यंत अपने घर पहुंचा था. इस के कुछ देर बाद ही उस के मोबाइल पर फोन आया तो वह परिवार वालों से यह कह कर कार में बैठ कर घर से निकला कि जरूरी काम है, निपटा कर आता हूं. दुष्यंत देर रात तक घर नहीं लौटा तो पिता रामेश्वर ने उस की तलाश की, लेकिन कुछ पता नहीं चला.

दुष्यंत अगले दिन सुबह भी घर वापस नहीं लौटा तो परिवार वाले चिंतित हो गए. वे उस के कारोबारी दोस्तों और अन्य लोगों से पता करने लगे. इस बीच, सुबह करीब सवा 10 बजे रामेश्वर प्रसाद शर्मा के मोबाइल पर दुष्यंत का फोन आया. दुष्यंत ने मोबाइल पर ही रोते हुए पिता से कहा, ‘ये लोग मुझे मार देंगे या रेप के केस में फंसा देंगे. इन को पैसे दे दो.’

रामेश्वर प्रसाद बेटे की बात समझ पाते, इस से पहले ही दुष्यंत से एक युवती ने फोन छीन लिया और रामेश्वर प्रसाद से कहा, ‘दुष्यंत हमारे कब्जे में है. अभी आधे घंटे में 10 लाख रुपए इस के खाते में जमा करा दो, पुलिस को बताया तो इस को मार डालेंगे.’

युवती की बात सुन कर रामेश्वर प्रसाद समझ गए कि बेटा दुष्यंत किसी संकट में है. वे दुष्यंत को मारने की धमकी दिए जाने से घबरा गए. उन्होंने युवती से फोन पर गिड़गिड़ाते हुए कहा कि इतने पैसे तो हमारे पास नहीं हैं. अभी मैं 3 लाख रुपए दे सकता हूं. इस पर वह युवती गालियां देने लगी और तुरंत पैसे जमा कराने को कहा.

रामेश्वर प्रसाद ने करीब एक घंटे में 3 लाख रुपए का इंतजाम कर दुष्यंत के खाते में डलवा दिए. फिर दुष्यंत के फोन पर उस युवती को 3 लाख रुपए जमा कराने की सूचना दी. इस पर युवती ने वाट्सऐप पर 3 लाख रुपए की रसीद मंगवाई और बाकी रुपए जल्दी से जल्दी डालने को कहा.

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इस बीच, दुष्यंत की पत्नी विनीता को पति के अपहरण और हत्या की धमकी की बात पता चली, तो उस ने अपने भाई को यह  बात बताई. विनीता के भाई ने पुलिस को सूचना दी.

दुष्यंत के अपहरण की सूचना पर पुलिस उपायुक्त (पश्चिम) अशोक कुमार गुप्ता ने अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (पश्चिम) रतन सिंह, झोटवाड़ा के सहायक पुलिस आयुक्त आस मोहम्मद, करघनी थानाप्रभारी अनिल जसोरिया, झोटवाड़ा थानाप्रभारी गुर भूपेंद्र सिंह, सबइंसपेक्ट हेमंत व मानसिंह और कांस्टेबल सुरेश, अमन एवं प्रवीण की एक टीम गठित की.

इस पुलिस टीम ने दुष्यंत की तलाश की. उस की मोबाइल लोकेशन और काल डिटेल्स निकलवाई गई. दुष्यंत के घरवालों, रिश्तेदारों, दोस्तों और कारोबारियों से पूछताछ की गई. दुष्यंत के मोबाइल की लोकेशन जयपुर में बजाजनगर, अनिता कालोनी के आसपास आ रही थी. इस पर पुलिस दोपहर करीब साढ़े 12 बजे अनिता कालोनी पहुंच गई और दुष्यंत व उस की कार को तलाशती रही, लेकिन कुछ पता नहीं चला.

पुलिस जांचपड़ताल में जुटी थी. उसे यह पता लग गया था कि दुष्यंत के अपहर्त्ताओं ने उस के बैंक खाते में रकम डलवाई है. इसलिए पुलिस उस के बैंक खाते पर भी नजर रखे हुए थी. इसी बीच, पता चला कि दुष्यंत के खाते से जयपुर में टोंक रोड पर नेहरू उद्यान के पास स्थित एक एटीएम से किसी युवती ने 20 हजार रुपए निकाले हैं.

एक तरफ  पुलिस की टीमें दुष्यंत को तलाश कर रही थीं. दूसरी ओर 3 मई की देर शाम जयपुर के ही आमेर थाना इलाके में दिल्ली बाईपास पर नई माता मंदिर के पास सुनसान जगह पर ट्रौली वाले सूटकेस में एक युवक की लाश बरामद हुई. मृतक के सिर पर चोट के निशान मिले. गले पर भी 4-5 निशान थे.

वह दुष्यंत ही था

जहां सूटकेस मिला, वहां एक कार के पहियों के निशान भी नजर आए. ट्रौली सूटकेस में लाश मिलने की सूचना पर पुलिस उपायुक्त (उत्तर) सत्येंद्र सिंह मौके पर पहुंचे. युवक के हाथपैर चुनरी व स्कार्फ से बंधे हुए थे. उस के कपड़ों की जेब में ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से उस की शिनाख्त होती.

दूसरी ओर, पुलिस की एक टीम ने दुष्यंत की काल डिटेल्स के आधार पर कुछ मोबाइल नंबरों पर संपर्क किया तो पता चला कि दुष्यंत ने उन से पैसे मांगे थे, लेकिन वह पैसे लेने नहीं आया. एक मोबाइल नंबर पर पुलिस की बात दुष्यंत के दोस्त महेश से हुई.

महेश ने पुलिस को बताया कि दुष्यंत का एक युवती से प्रेमप्रसंग चल रहा था. वह युवती बजाजनगर अनिता कालोनी के ईडन गार्डन अपार्टमेंट में रहती है.

दुष्यंत की प्रेमिका का पता चलते ही झोटवाड़ा पुलिस 3 मई की रात अनिता कालोनी के ईडन गार्डन अपार्टमेंट स्थित 402 नंबर के फ्लैट पर पहुंची. वहां एक युवती और एक युवक कहीं जाने की तैयारी करते मिले. पुलिस ने फ्लैट की तलाशी ली तो वहां खून फैला हुआ था. दोनों से पूछताछ की गई, तो युवती का नाम प्रिया सेठ और युवक का नाम दीक्षांत कामरा पता चला. उन्होंने दुष्यंत का अपहरण करने के बाद उस की हत्या करने की बात बता दी.

दुष्यंत की हत्या होने का पता चलने पर मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारी सन्न रह गए. उन्होंने दुष्यंत की लाश के बारे में पूछा तो प्रिया व दीक्षांत ने बताया कि उन्होंने दुष्यंत की लाश एक ट्रौली सूटकेस में बंद कर के आमेर

इलाके में फेंक दी है. इस पर पुलिस ने दुष्यंत के परिजनों से लाश की शिनाख्त कराई. दुष्यंत की लाश मिलने के बाद मामला बेहद संगीन हो गया था.

पुलिस ने दुष्यंत के अपहरण और हत्या के मामले में प्रिया सेठ व दीक्षांत कामरा से पूछताछ के बाद एक दूसरे युवक लक्ष्य वालिया को भी हिरासत में ले लिया. बाद में तीनों को भादंसं की धारा 364ए एवं 302 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया.

प्रिया के अपार्टमेंट में खड़ी दुष्यंत की कार भी बरामद कर ली गई. गिरफ्तार आरोपियों में दीक्षांत कामरा श्रीगंगानगर जिले के पदमपुर कस्बे में इंद्रा कालोनी और लक्ष्य वालिया श्रीगंगानगर के चावला चौक पुरानी आबादी का रहने वाला था.

ऊंचे सपनों की चाह वाले बने कातिल

दीक्षांत कामरा मुंबई में मौडलिंग करता था. वह आजकल प्रिया सेठ के साथ लिवइन रिलेशनशिप में जयपुर के ईडन गार्डन अपार्टमेंट में रह रहा था. दीक्षांत के पिता सरकारी स्कूल में हैडमास्टर हैं. लक्ष्य वालिया जयपुर में मालवीय नगर स्थित तनिश अपार्टमेंट में रहता था. उस के पिता जीवित नहीं हैं. मां सेल्स टैक्स विभाग में कर्मचारी है. प्रिया सेठ ने ईडन गार्डन अपार्टमेंट में करीब डेढ़ महीने पहले ही दिल्ली निवासी हर्ष कुमार यादव से 402 नंबर का फ्लैट किराए पर लिया था.

तीनों आरोपियों से पूछताछ में दुष्यंत के अपहरण और हत्या की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

प्रिया सेठ सोशल मीडिया टिंडर ऐप पर एक्टिव थी. इसी साल फरवरी-मार्च महीने में इसी ऐप पर दुष्यंत का प्रिया से संपर्क हुआ था. दुष्यंत ने खुद को दिल्ली निवासी विवान कोहली बता कर प्रिया से चैटिंग शुरू की थी. चैटिंग करते हुए दोनों के बीच दोस्ती हो गई. फिर मिलनाजुलना और घूमनाफिरना भी होने लगा.

दुष्यंत ने प्रिया से खुद को विवान कोहली के रूप में दिल्ली का अरबपति व्यापारी बताया था. उस ने प्रिया से कहा था कि उस के बिजनैस का सालाना टर्नओवर 25 करोड़ रुपए से ज्यादा का है. दुष्यंत का रहनसहन करोड़पति व्यापारी जैसा था भी.

विवान कोहली को अरबपति व्यापारी समझ कर प्रिया उसे अपने हुस्न के जाल में फांसना चाहती थी. दरअसल, प्रिया के बौयफ्रैंड दीक्षांत कामरा पर काफी कर्जा हो गया था. इसलिए प्रिया ने दीक्षांत का कर्ज उतारने के लिए अपने दोस्तों के साथ मिल कर विवान कोहली को फांसने की योजना बनाई.

योजना के अनुसार, प्रिया ने 2 मई को विवान कोहली बने दुष्यंत को फोन कर के जयपुर में अपने फ्लैट पर बुलाया. दुष्यंत उस दिन शाम को प्रिया के ईडन गार्डन अपार्टमेंट स्थित फ्लैट पर पहुंचा तो प्रिया ने अपने दोस्तों दीक्षांत कामरा और लक्ष्य वालिया के साथ मिल कर उसे बंधक बना लिया.

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दुष्यंत को बंधक बनाने के बाद प्रिया ने उस के कपड़ों की तलाशी ली, तो जेब में मिले दस्तावेजों से उसे पता चला कि वह दिल्ली का विवान कोहली नहीं, बल्कि जयपुर के झोटवाड़ा का रहने वाला दुष्यंत है. उस के बैंक खाते में भी ज्यादा रकम नहीं थी. इस पर तीनों ने मिल कर पहले दुष्यंत के परिजनों से फिरौती वसूलने की बात तय की. इसी के तहत 3 मई को सुबह करीब सवा 10 बजे दुष्यंत से उस के पिता रामेश्वर प्रसाद को फोन कर 10 लाख रुपए मांगे गए.

ऐसे लिखी गई खूनी स्क्रिप्ट

रामेश्वर प्रसाद ने बेटे दुष्यंत के खाते में 3 लाख रुपए डाल दिए, तो प्रिया सेठ ने कुछ देर बाद ही अपने फ्लैट से कुछ दूर स्थित एटीएम से 20 हजार रुपए निकाल भी लिए. बाद में प्रिया और उस के दोस्तों को यह डर लगा कि दुष्यंत को छोड़ देने से उन का भांडा फूट जाएगा.

इसलिए 3 मई की दोपहर में फ्लैट पर ही उन्होंने चाकू से गोद कर दुष्यंत को मार डाला. फिर उस के हाथपैर बांध दिए. इस के बाद ये लोग दुष्यंत के शव को एक ट्रौली सूटकेस में रख क र दुष्यंत की ही कार से उसी दिन दोपहर को आमेर इलाके में दिल्ली बाईपास पर फेंक आए.

प्रिया के लालच ने रामेश्वर प्रसाद शर्मा के घर का आखिरी चिराग भी बुझा दिया. 2 बेटों की अर्थियों को कंधा दे चुके रामेश्वर प्रसाद की आंखें पथरा गईं. उन का सबसे बड़ा बेटा हिमांशु 30 साल पहले महज डेढ़ साल की उम्र में ही चल बसा था. इस के बाद 2 बेटे दुष्यंत और पीयूष पैदा हुए, तो उन की जिंदगी फिर पटरी पर लौटने लगी.

लेकिन करीब 6 साल पहले सड़क दुर्घटना में पीयूष की मौत हो गई थी. दुखों का पहाड़ छंटा भी नहीं था कि इन लोगों ने दोस्त बन कर अपने लालच के लिए दुष्यंत को मौत की नींद सुला कर रामेश्वर के बुढ़ापे का आखिरी सहारा भी छीन लिया.

सन 2011 में कालेज की पढ़ाई करने जयपुर आई प्रिया अपनी रूममेट के साथ रहते हुए देह व्यापार से जुड़े गिरोह के संपर्क में आई थी. पहली बार जुलाई 2014 में जयपुर के श्याम नगर थाना इलाके में वह देह व्यापार में पकड़ी गई थी.

इस के 5 महीने बाद ही 30 नवंबर, 2014 की रात वह मानसरोवर इलाके में रजत पथ पर एक एटीएम तोड़ने के प्रयास में अपने साथी अनिल जांगिड़ के साथ पकड़ी गई. उस समय वह जयपुर में गजसिंहपुरा के सुंदर नगर में किराए पर रहती थी.

अनिल जांगिड़ अजमेर में किशनगढ़ के पास कासिर गांव का रहने वाला है. वह जयपुर में गजसिंहपुरा में रहता था और फर्नीचर का काम करता था. प्रिया ने एक दिन अनिल को अपने कमरे का फर्नीचर ठीक करने के लिए बुलाया था. इस के बाद दोनों मिलने लगे. प्रिया ने अनिल को मोटा पैसा कमाने का झांसा दिया और एटीएम लूटने की योजना बनाई.

कैसेकैसे खेल खेले प्रिया ने

योजनानुसार वे रैकी करने के बाद गैस कटर और जरूरी औजार ले कर टैक्सी से बैंक औफ  इंडिया का एटीएम लूटने रजतपथ पर पहुंचे.

टैक्सी उन्होंने दूर खड़ी कर दी. उन्होंने गैस कटर से एटीएम को काट भी दिया. इस दौरान पुलिस का मोटरसाइकिल गश्ती दल आ गया. पुलिस को देख कर प्रिया भाग गई. पुलिस ने अनिल जांगिड़ को मौके पर ही पकड़ लिया. कई घंटे बाद मोबाइल लोकेशन के आधार पर पुलिस ने प्रिया सेठ को भी गिरफ्तार कर लिया.

एटीएम लूटने के मामले में जमानत पर छूटने के बाद प्रिया जयपुर छोड़ कर दिल्ली चली गई. वहां नोएडा में रहते हुए जयपुर के रहने वाले गजराज सिंह से उस की जानपहचान हुई. इस दौरान प्रिया व गजराज सिंह आपस में मिलनेजुलने लगे. बाद में प्रिया सेठ वापस जयपुर आ गई.

इसी साल जनवरी में जयपुर के वैशाली नगर में रहने वाले गजराज सिंह ने प्रिया के खिलाफ  वैशाली नगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी. रिपोर्ट में कहा था कि 4 महीने पहले प्रिया ने गजराज को रेप केस में फंसाने की धमकी दे कर 10 लाख रुपए मांगे थे और कहा था कि पैसे नहीं दिए तो तेजाब फेंक कर जलवा भी दूंगी.

इस से घबरा कर गजराज ने प्रिया को साढ़े सात लाख रुपए दे दिए थे. पूरे 10 लाख रुपए नहीं मिलने पर वह आए दिन गजराज के घर आ कर हंगामा करने की धमकी देने लगी. तब गजराज ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई. गजराज की रिपोर्ट पर वैशाली नगर थाना पुलिस ने इसी साल 8 मार्च को प्रिया को गिरफ्तार किया था.

पुलिस की पूछताछ में सामने आया कि प्रिया अनैतिक काम के लिए औनलाइन एस्कौर्ट सेवा भी चलाती थी. इस के अलावा ऐप की मदद भी लेती थी.

औनलाइन संपर्क होने के बाद प्रिया कार से अपने ड्राइवर गणेश के साथ ग्राहक के पास पहुंचती और वहां अनैतिक काम का 10 से 50 हजार रुपए में सौदा कर पैसे ले लेती. इस के बाद पैसे गाड़ी में रख कर आने की बात कह कर वह ड्राइवर के साथ अपनी कार से भाग जाती थी.

प्रिया ने पैसे के लिए सोशल मीडिया को बनाया मीडियम

सोशल मीडिया के जरिए प्रिया लोगों से दोस्ती करती और मिलने के लिए फ्लैट पर बुलाती. वह पहले महंगी शराब पिला ती और आवभगत करने के बाद खुद ही अपने कपड़े फाड़ कर रेप केस में फंसाने की धमकी देती और पैसों की डिमांड करती. पीडि़त लोग मजबूरन उसे पैसे दे कर पीछा छुड़ाते. लोकलाज के भय से पुलिस में शिकायत भी नहीं करते.

प्रिया सेठ ने इस तरह की सैकड़ों वारदातें की हैं, लेकिन वे पुलिस के रिकौर्ड में कहीं दर्ज नहीं हैं, क्योंकि पीडि़त लोगों ने ऐसे मामलों की शिकायत ही नहीं की.

प्रिया इतनी शातिर है कि जब उस ने अपने साथियों के साथ मिल कर 3 मई को दुष्यंत की हत्या की थी, तभी उस के पास एक व्यक्ति का अनैतिक काम के लिए फोन आया. उस व्यक्ति ने प्रिया को रेलवे स्टेशन के पास नामचीन होटल में बुलाया. प्रिया कैब ले कर उस होटल में पहुंच गई और उस व्यक्ति से रुपए ले कर भाग आई.

पूछताछ में सामने आया कि प्रिया और दीक्षांत का एक महीने का खर्चा करीब 2 लाख रुपए है. खाने से पहनने तक उन के लग्जरी शौक हैं. दीक्षांत 80 हजार के विदेशी ब्रांड के जूते और 45 हजार की घड़ी पहनता है. कपड़े भी ऐसे ब्रांड के पहनता है, जिन के स्टोर राजस्थान में नहीं हैं. प्रिया भी 45 हजार रुपए कीमत के सैंडल पहनती थी. उसे महंगे कपड़े, परफ्यूम, सौंदर्य प्रसाधन के अलावा कीमती शराब व नशीली सिगरेटों का शौक था. वह हमेशा हवाई जहाज में सफर करती थी.

यह भी विडंबना है कि प्रिया और उस का बौयफ्रैंड दीक्षांत लोगों को ही नहीं, एकदूसरे को भी धोखा दे रहे थे. वैसे तो दोनों ने अपने हाथों पर एकदूसरे के नाम के टैटू बनवा रखे थे. दोनों के ही कई लोगों से संबंध थे. प्रिया ने दीक्षांत का पासपोर्ट भी छीन कर अपने पास रखा हुआ था.

एक बार दीक्षांत प्रिया को छोड़ कर गंगानगर चला गया, तो प्रिया ने उसे रेप केस में फंसाने की धमकी दे कर ब्लैकमेल भी किया था. बाद में दीक्षांत वापस जयपुर आ कर प्रिया के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगा था. प्रिया ही उस का खर्च उठाती थी.

लक्ष्य इन दोनों का दोस्त था. ये तीनों मिल कर शराब पार्टी करते थे. 2 मई को भी लक्ष्य वालिया शराब पीने प्रिया के फ्लैट पर आया था. वहां दुष्यंत से मोटी रकम वसूलने की योजना बनाई गई. बाद में अगले दिन प्रिया और दीक्षांत का साथ देते हुए उस ने दुष्यंत की हत्या में सहयोग किया. दुष्यंत की लाश ठिकाने लगाने भी वह कार से प्रिया और दीक्षांत के साथ गया था.

दीक्षांत का ईवौलेट अकाउंट है. आरोपियों का दुष्यंत के बैंक खाते से 3 लाख रुपए ईवौलेट में ट्रांसफर कराने का इरादा था. यह काम करने से पहले ही वे पुलिस की पकड़ में आ गए. आरोपियों का इरादा दुष्यंत की कार ले कर जयपुर से बाहर भाग जाने का भी था. इस के लिए उन्होंने फरजी नंबर प्लेट भी तैयार करवा ली थी, लेकिन वे पुलिस की गिरफ्त में आ गए.

पुलिस ने तीनों आरोपियों को 5 मई को अदालत में पेश कर 11 मई तक रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में पुलिस ने प्रिया के फ्लैट से बैग, चाकू, खून से सने कपड़े, चादर, रस्सियां और सूटकेस आदि बरामद किए. इस के अलावा शराब की बोतलें, कागज में लिपटी नशीली सिगरेट आदि भी मिलीं.

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