धर्म का ठेला मेला ही मेला

मैंने बहुत से कारोबार किए, पर कामयाब न हुआ. थकाहारा मैं एक ग्राहक के लिए एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम गोभी तोल रहा था कि एकाएक कहीं से प्रकट हुए बाबा ने मुझ से पूछा, ‘‘सब्जी के ठेले पर एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम तोल कर अपना यह लोक तो छोड़ो, परलोक तक क्यों खराब कर रहे हो कामपाल?’’ मैं ने उन के पैरों में गिर कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं कामपाल? मैं तो… प्रभु, और क्या करूं? अगर मैं एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम न तोलूं, तो शाम को कमेटी वालों को, इस इलाके के हवलदार को, इनकम टैक्स वाले अफसर को 4-4 किलो मुफ्त सब्जी कहां से दूंगा? अगर न दूंगा, तो कल यहां ठेला कौन लगाने देगा?

‘‘बाबा, अपना तो नसीब ही ऐसा है कि जब भी सिर मुंड़वाने बैठता हूं, तो साफ मौसम में भी पता नहीं कहां से ओले पड़ने लगते हैं. ‘‘जवानी में पहली दफा प्यार के चक्कर में सिर मुंड़वाने बैठा ही था कि शादी कर के वह मेरे गले पड़ गई. और फिर कमबख्त आज तक पता ही नहीं चल पाया कि प्यार किस बला का

नाम है. ‘‘अब आप ही बताइए कि ऐसे में मैं एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम न तोलूं, तो और क्या करूं?’’

‘‘तो सुनो कामपाल, अब तुम्हारे शक्तिवर्धक कैप्सूल खाने के दिन आ गए हैं. कल से तुम्हें यह देश कामपाल के नाम से जानेगा. बाबा का हुक्म है कि कल से तुम सब्जी का पंचर टायरों वाला ठेला लगाना बंद कर के धर्म का ठेला लगाओ.’’ ‘‘धर्म ठेले पर भी बिकता है क्या बाबा? मैं ने तो आज तक धर्म के मौल ही देखे हैं. ऐसे में ठेले पर कौन मुझ से धर्म खरीदने आएगा? ऐसा न हो कि मैं दो वक्त की रोटी से भी जाता रहूं.’’

बाबा मेरी अक्ल पर गुस्सा होते हुए बोले, ‘‘मूर्ख, लगता है कि बीवी ने तुम्हारे दिमाग को चाटचाट कर साफ कर दिया है. इस देश में जितना धर्म बिकता है, उतना और कोई माल नहीं बिकता. धर्म के खरीदार यहां हर तबके के लोग हैं. जिन लोगों के पास आटादाल खरीदने तक को पैसे नहीं हैं, वे भी आटेदाल की परवाह किए बिना धर्म जरूर खरीदते हैं. ‘‘रही बात ठेले पर धर्म बेचने की, तो आज धर्म के जितने भी मौल सजे देख रहे हो न, सब ने ठेले से ही धर्म बेचना शुरू किया था. यह धंधा वह धंधा है, जो दिन दूनी रात सौ गुनी तरक्की करता है. जिस ने भी यह धंधा किया है, वह गंगू तेली से राजा भोज हो गया है.

‘‘मेरा तुझे आदेश है कि जनता में धर्म की स्थापना के लिए तू भी धर्म का ठेला लगा और ठेले से मौल तक पहुंच कर करोड़पति हो जा.’’ ‘‘पर बाबा, मेरे पास तो सब्जी बेचने की ही पुश्तैनी कला है. ऐसे में मैं धर्म को कैसे बेच पाऊंगा? सड़ी सब्जी की गंध मेरी नसनस में बस चुकी है,’’ मैं ने अपने भीतर का दर्द कहा.

बाबा मेरी पीठ थपथपाते हुए बोले, ‘‘धर्म बेचना सब्जी बेचने से कहीं ज्यादा आसान है. न तराजू, न बट्टे. न लंगोट, न कच्छे. न तेल लगा कर चमकाई गई सड़ी शिमला मिर्च, न ग्रीस मले मुरझाए भुट्टे. कोशिश कर के तो देख. इस धंधे में न गला फाड़ने की जरूरत, न सड़ी बंदगोभी को ताजा बनाए रखने के लिए उस के सड़े पत्ते उखाड़ने की.’’ बाबा की बातों से हैरानपरेशान हो कर मैं गश खा कर गिरतेगिरते बचा. मैं ने टूटी तराजू और सील निकाले बट्टों को परे फेंकते हुए पूछा, ‘‘पर बाबा…’’

‘‘जानता हूं. तुम बरवाला वाले का केस देख कर डर रहे हो. पर बेटा, चांदनी चौक की एक दुकान बंद होने का मतलब पूरे चांदनी चौक का बाजार बंद होना तो नहीं? गरीबी की सौ बरस की जिंदगी से अच्छे हैं मौल के 2-4 दिन. घोर कलियुग है, घोर कलियुग. अब धर्म का झंडा उठाने वालों के साथ यहां ऐसा ही होगा, पर तुम डरना मत.’’ ‘‘पर बाबा…’’

‘‘पर क्या… सब्जी का ठेला छोड़ कर कल से धर्म का ठेला लगा और चंद दिनों में ही इसरो से भी कम

लागत में चांद पर पहुंच जा,’’ इतना कह कर बाबा अंतर्ध्यान हो गए.

मुझे बाबा की बात जंच गई. लिहाजा, शाम को ठेले की बची सब्जी के भरभर झोले कमेटी वालों को, इलाके के हवलदार को, इनकम टैक्स वाले अफसर को दे कर घर पर ही धर्म का ठेला लगाने की बात पत्नी से की, तो 10-20 दिन न नहाने वाली बीवी खोली में ही स्विमिंग पूल में तैरने के सपने लेने लगी. खुले में शौच जाने वाली मेरी आंखों के सामने एयरकंडीशंड वाशरूम सज उठा. इधरउधर से गत्ते की पेटियां चुन कर लाने वाली मेरी बीवी की आंखों के आगे मौड्यूलर किचन नाचने लगा. देखते ही देखते मैं ने देखा कि जैसे मैं नामीगिरामी बाबा हो गया हूं.

कुछ भी बकने के लिए मेरे भक्तों ने मेरे लिए सोने का सिंहासन बनवा दिया है. भक्त मेरी बकवास सुनने को बेचैन हैं.

मेरे पास स्वर्ग तक जाने के लिए लिफ्ट मौजूद है. भीतर ही भीतर आई फील दैट स्वर्ग के देवता तक मुझ से चिढ़ने लगे हैं. हजारों की तादाद में मेरे दिमाग और बिना दिमाग वाले भक्त हैं. घर के खाली दालचावल के डब्बों में सोने के गहने, हीरेजवाहिरात भरे पड़े हैं. कल तक जिन्हें मैं हफ्ता दिया करता था, वे सब मेरे पैरों में ‘डेली’ चढ़ाने आ रहे हैं.

जब प्रेग्नेंसी के बावजूद करना पड़ा रेप सीन

स्टार बन जाना बहुत आसान है लेकिन सीन में ढलना और कहेनुसार सीन करना वाकई टेढ़ा काम है. कई बार शूट करने में सितारों को चोट लग जाती है और कई बार वो असहज हो जाते हैं लेकिन शूटिंग नहीं रुकती. ऐसा ही एक वाक्या अपने जमाने की टॉप की हीरोइन मौसमी के साथ घटा था. मौसमी चटर्जी उस वक्त टॉप की हीरोइनों में शुमार थीं और इसकी वजह थी हर किरदार को तल्लीनता के साथ निभाना. लेकिन अपने करियर में उन्हें एक ऐसा सीन करने को मिला जिसने उन्हें रुला ही दिया.

फिल्म थी ‘रोटी कपड़ा और मकान’. मनोज कुमार के लीड रोल वाली इस फिल्म में मौसमी के साथ एक रेप सीन शूट होना था. उस वक्त मौसमी चटर्जी प्रेग्नेंट थीं और तबियत भी ठीक नहीं रहती थी. इसलिए मौसमी इस बात को लेकर चिंता में थीं कि आखिर ये रेप सीन वो शूट कैसे करेंगी. चूंकि सीन फिल्म के लिए बहुत जरूरी था इसलिए मना भी नहीं कर सकतीं थी. इसलिए मौसमी चटर्जी ना चाहकर भी उस रेप सीन को करने के लिए तैयार हो गईं. लेकिन इस सीन की वजह से उनकी हालत खराब हो गई थी.

दिन भी आ गया और माहौल भी तैयार किया गया. इस सीन को आटे के एक गोदाम में शूट किया जाना था. सीन के मुताबिक विलेन को मौसमी चटर्जी का ब्लाउज उतारना था जबकि बाकी गुंडे उन्हें पकड़कर रखने वाले थे. इसी खींचा-तानी के दौरान मौसमी के पूरे शरीर पर खूब सारा आटा गिर गया. आटा ना सिर्फ उनके मुंह में भर गया बल्कि बालों में भी चिपक गया.

अब जैसे-तैसे सीन तो शूट हो गया और निर्देशक को भी खूब पसंद आया, लेकिन इसके बाद मौसमी घर जाकर खूब रोईं. आटा मुंह में जाने की वजह से उनकी तबियत बिगड़ गई और खूब उल्टियां हुईं. देर रात तक मौसमी चटर्जी की नौकरानी उनके बालों में चिपके आटे को ही निकालती रही. मौसमी चटर्जी की हालत इतनी बिगड़ गई थी कि फिल्म का जो गाना उन पर फिल्माया जाना था उसे जीनत अमान पर फिल्माया गया. हालांकि मौसमी चटर्जी की मानें तो उनके प्रेग्नेंट होने की वजह से उस गाने में जीनत को लिया गया.

छोटे पर्दे की यामी गौतम हैं बेहद ही हौट

बदलापुर, सनम रे और कबिल जैसी फिल्मों में अपनी दमदार एक्टिंग और खूबसूरती से लाखों दिलो पर राज करने वाली यामी गौतम को आज कौन नही जनता है. आज हर कोई उनकी खूबसूरती का दीवाना है.

आप यामी गौतम को तो जानती हैं पर क्या उनकी तरह दिखने वाली उनकी हमशक्ल और छोटे पर्दे की यामी गौतम को जानती हैं. जी हां, छोटे पर्दे की वही यामी जिसने अपनी अदाओं और हौट अंदाज से हर किसी को उनकी तारीफ करने पर मजबूर कर दिया है.

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चलिए आज हम आपको यामी गौतम की हमशक्ल विदिशा श्रीवास्तव के बारें में बताते हैं, जो इन दिनों अपने फोटोशूट के चलते सोशल मीडिया पर जमकर सुर्खिया बटोर रही हैं.

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दरअसल यहां हम बात कर रहे हैं स्टार प्लस के पौपुलर टीवी शो ‘ये हैं मोहब्बतें’ में रोशनी का किरदार निभा रहीं विदिशा श्रीवास्तव की. जो इन दिनों अपनी बोल्ड फोटोज की वजह से इंटरनेट पर ट्रेंड हो रही हैं.

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सोशल मीडिया पर ज्यादातर समय एक्टिव रहने वाली विदिशा आए दिन हौट तस्वीरें शेयर करती रहती है. विदिशा अपने इस फोटोशूट में इतनी खूबसूरत और हौट लग रहीं है कि कोई भी खुद को उनका दिवाना बनने से रोक नहीं पाएगा.

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यामी इन फोटोज में बेहद ही अलग अंदाज में नजर आ रही हैं, वो इसमें काफी हौट और बोल्ड लग रही हैं.

सीरियल ‘ये हैं मोहब्बतें’ से फैमस हुई विदिशा शो में तो बिल्कुल गांव की सीधी सादी और देसी अवतार में दिखती हैं, लेकिन असल जिन्दगी में वे काफी बोल्ड हैं. जिसका अंदाजा आप उनकी उन बोल्ड फोटोशूट से लगा सकती हैं, जो उन्होंने हाल ही में कराया है.

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विदिशा ने 2005 में तेलुगु फिल्म ‘अभिमानी’ से फिल्मों में डेब्यू किया था. साउथ इंडियन एक्ट्रेस विदिशा श्रीवास्तव ने सीरियल ये हैं मोहब्बतें से टीवी इंडस्ट्री में डेब्यू किया है.

विदिशा ने तेलुगू फिल्मों के अलावा कन्नड़ और मलयालम फिल्मों की लगभग 10 फिल्मों में काम किया है. विदिशा साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री का जाना-माना चेहरा हैं.

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राजनीति में कास्टिंग काउच

कास्टिंग काउच को ले कर केवल फिल्मों पर ही चर्चा होती है. लेकिन सचाई यह है कि कास्टिंग काउच केवल फिल्मों में ही नहीं बल्कि राजनीति और दूसरे क्षेत्रों में भी होता है. समयसमय पर हर क्षेत्र में काम करने वाले लोग इस पर अपनी राय देते हैं.

फिल्मों की तरह राजनीति भी अब कास्टिंग काउच से अछूती नहीं है. यहां लोग इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं. गौसिप के रूप में तमाम नेताओं के महिलाओं से संबंधों की चर्चा होती रहती है. इन में राजनीति के अलावा फिल्मी महिलाएं भी शामिल होती हैं.

राजनीति में कास्टिंग काउच नहीं होता तो समयसमय पर नेताओं के संबंधों की कहानियां सामने नहीं आतीं. आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव और उत्तर प्रदेश में नारायण दत्त तिवारी के नाम चर्चित रहे हैं. दूसरे भी बहुत सारे ऐसे नेता हैं जिन के नाम समयसमय पर महिलाओं के साथ सामने आए हैं. यह बात और है कि ये बातें आसानी से दबा दी जाती हैं.

अभिनेत्री श्रीरेड्डी के बयान के बाद कांगे्रस नेता और पूर्व राज्यसभा सदस्य रेणुका चौधरी ने भी कहा कि कास्टिंग काउच केवल फिल्मों में ही नहीं है, यह सभी कार्यस्थलों की कड़वी सचाई है. यहां तक कि संसद भी इस से अछूती नहीं है. विदेशों में अभिनेत्रियों ने इस बात को स्वीकार कर ‘मी टू’ कहने में काफी समय लिया. अब समय आ गया है कि भारत में भी लोग सामने आ कर  ‘मी टू’ कहें.

चुप रहती हैं पीडि़ताएं

भारत में ‘मी टू’ अभियान के तहत कई औरतों ने बताया कि वे भी कभी न कभी इव टीजिंग का शिकार हुई हैं. कास्टिंग काउच को अभी लोगों ने स्वीकार नहीं किया है. फिल्मी दुनिया में भी वही अभिनेत्रियां सामने आई हैं जो कास्टिंग काउच की शिकार होने के बाद फिल्मों में काम नहीं पा सकी हैं.

दक्षिण भारत में एम जी रामचंद्रन और जयललिता का मामला ऐसे उदाहरणों में शामिल है. आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव और लक्ष्मी पार्वती का उदाहरण भी इन में से एक है. एन टी रामाराव और जयप्रदा पर भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेसी नेता एन डी तिवारी के तमाम संबंध चर्चा में रहे हैं. एन डी तिवारी राज्यपाल के पद पर रहते हुए भी सैक्स स्कैंडल को ले कर चर्चा में आए. जिस के बाद उन का राजनीतिक कैरियर खत्म हो गया.

इमेज की चिंता

कई नेताओं के सैक्स स्कैंडल चर्चा में रहे हैं. अमरमणि त्रिपाठी मधुमिता हत्याकांड के चलते जेल में हैं. मधुमिता और अमरमणि का मसला ऐसा ही था. मधुमिता की हत्या का गुनाहगार अमरमणि को माना गया और उन को उम्रकैद की सजा दी गई. भाजपा के एक बड़े नेता का एक महिला के साथ संबंध चर्चा में रहा. राजनीति में ऐसे मामलों की फेहरिस्त लंबी है जिन में नेताओं के दूसरी महिलाओं से संबंध रहे. नेता महिलाओं को राजनीति में स्थापित करने का लोभ दिखा कर उन का शारीरिक शोषण करता है. भारत में राजनीति को दूध का धुला माना जाता है. किसी घटना के उजागर होने के बाद हर संभव प्रयास कर के उस को दबा दिया जाता है. इसलिए ऐसे मामले सामने नहीं आते हैं. चर्चा में रहने के बाद भी ऐसे मामले साबित नहीं हो पाते हैं.

नेताओं के साथ ही साथ कार्यस्थलों, औफिसों में भी ऐसे मामले चर्चा में नहीं आते. कार्यस्थलों में सब से अधिक मामले शिक्षा संस्थानों के आते रहे हैं. यहां पर महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए अलग से कानून बनाने के अलावा एक सुनवाई सैल का भी गठन किया गया. इस के बाद भी इन कार्यस्थलों पर यौनशोषण की बातें सामने आती हैं.

इमेज की चिंता के कारण ठगी का शिकार होने के बाद भी औरतें ये बातें बाहर नहीं करतीं. ऐसे में इन्हें शिकार बनाने वाले भी बच निकलते हैं. पुलिस और कचहरी में ऐसे कई मामले आते हैं जिन में सालों से यौनशोषण के शिकार होने की बात कही जाती है.

इन घटनाओं के बाद रेणुका चौधरी जैसी महिला नेताओं के बयानों से पता चलता है कि कास्टिंग काउच केवल फिल्मों का मुद्दा नहीं है. राजनीति सहित समाज के दूसरे हिस्सों में भी यह खूब प्रचलित है. इस पर तभी विराम लग सकता है जब इस का शिकार होने वाली महिलाएं ‘मी टू’ जैसा अभियान चलाएं.

शिक्षा का भी वर्णभेद

भाजपा सरकारें बारबार यह जताने में लगी हैं कि देश में उन की और ऊंची जातियों की मेहरबानी से पिछड़े (शूद्र) व दलित (अछूत) जिंदा हैं और उन्हें थोड़ीबहुत जगह समाज में दी जा रही है. यह जताने का मतलब सिर्फ इतना समझाना है कि जो मिल रहा है उसे ऊपर वाले और ऊंचों की कृपा समझो वरना वैसी पिटाई होगी जैसी ऊना या राजकोट में हुई.

अभी मध्य प्रदेश के शिक्षा बोर्ड ने 10वीं व 12वीं क्लासों के नतीजे जारी करते हुए कहा कि सवर्ण ऊंचे जनरल कैटीगरी में कितने पास हुए, अन्य पिछड़ी जातियों के कितने और शैड्यूल कास्ट के कितने. यह सोच हर सरकारी विभाग में ठूंसठूंस कर भरी हुई है जबकि हर सरकारी विभाग में काफी पिछड़े व दलित आरक्षण की बदौलत पहुंच चुके हैं. वे इस कदर डरे रहते हैं कि ऐसे जातिवादी फैसले पर विभाग में रोकटोक नहीं कर सकते. बुरा हो लिबरल मीडिया का जिस ने इस बात को पकड़ लिया और हल्ला मचा दिया. इस पर बोर्ड के अफसर सफाई देते हैं कि इस से तो इन बच्चों को आगे पढ़ने में सहूलियत होगी. उन्हें दाखिले आसानी से मिलेंगे. उन की सोच पर दया आती है कि इन आंकड़ों को इकट्ठा कर के जारी कर के क्याकैसे मिलेगा, यह मालूम न होते हुए भी वे अपनी बात को सही साबित करने में लगे हैं.

असल में ऊंची ही नहीं नीची जातियों के मन में गहरा बैठा है कि यह भेदभाव तो खुद भगवान ने दिया है. बारबार पुराणों का उल्लेख करा जाता है कि आदि पुरुष के मुंह से ब्राह्मण, हाथों से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य व पैरों से शूद्र पैदा हुए थे. जो दलित हैं तो वे शायद कहीं पैरों के नीचे की धूल से जन्मे थे क्योंकि उन का पौराणिक साहित्य में न के बराबर जिक्र है. नीची जातियां पीढ़ी दर पीढ़ी इस बात को मानती रही हैं और धर्मकर्म से अपना अगला जन्म सुधारने में लगी रहती हैं. अब वे पढ़नेलिखने लगी हैं पर आमतौर पर पिछड़ी रहती हैं. हालांकि अब बड़े शहरों में, जहां जातिवाद कुछ कम है, वहां के बच्चे बराबरी का दर्जा पाने लगे हैं. बोर्ड की यह जलील करने वाली हरकत एक आम बात है. पढ़नेपढ़ाने वाले इन वर्गों के लोगों को हिकारत से देखते हैं. भेदभाव रखते हैं. कहीं नौकरी मिल जाए तो भी चूंचूं करने से बाज नहीं आते. पीठ पीछे तो न जाने क्याक्या बोल जाते हैं और वे बातें कई दफा मुंह से निकल आती हैं. जाति का भूत अभी तो दमदार तरीके से सिर पर सवार है.

मकान बनाने से पहले

रोटी, कपड़ा और मकान इनसान की बुनियादी जरूरतें हैं. मेरे पास कपड़े थे और रोटियां भी, लेकिन मकान किराए का था. मेरे पिताजी का कहना था कि इस बुनियादी जरूरत को जल्दी से जल्दी पूरा कर लेना चाहिए, क्योंकि दूसरे के मकान में थूकने का भी डर होता है और अपने मकान में मनमानी करने की पूरी छूट होती है, इसलिए इस मनमानी को पूरा करने के लिए मेरे मन में उतावलापन मचा हुआ था.

लेकिन मकान का इंतजाम करना बड़ी टेढ़ी खीर होती है. मैं ने नौकरी करते हुए रिश्वतखोरी को बढ़ावा दिया, ताकि जैसेतैसे मैं अपना एक गरीबखाना बना सकूं.

मेरे हर दोस्त ने अपना यह शौक पलक झपकते ही पूरा कर लिया था. कई तो ऐसे थे, जिन के पास हर आवास योजना में एक मकान था. वे हमेशा मकान जैसी अचल जायदाद बनाने में लगे रहे और मैं हमेशा चंचला लक्ष्मी के पीछे पड़ा रहा.

एक दिन मेरे साथ अनहोनी हो गई. मैं ने एक हाउसिंग सोसाइटी में मकान लेने का फार्म भरा हुआ था. इत्तिफाक कहिए कि मुझे प्लौट अलौट हो गया.

यह सुनते ही मेरा शरीर रोमांचित हो उठा. पत्नी समेत बच्चे बल्लियां उछल पड़े. मदहोशी का एक ऐसा आलम था कि उसे मैं यहां बयान नहीं कर सकता.

मुझे रातदिन मकान के रंगीन सपने आने लगे. खाली जमीन पर सपनों में कोठी बनने लगी. उस को बनाने को ले कर घरेलू बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया. नक्शे बनने लगे. सुझाव आने लगे.

पत्नी का कहना था कि अमुक कमरे में पंखा लगेगा, तो मेरा सुझाव था कि कूलर लगवाया जाएगा. बच्चे पढ़ने के बजाय चुपकेचुपके कोर्स की कौपियों में मकान के नक्शे बनाने लगे. बाहर लौनपेड़पौधे और ऊपर खुली बालकनी पर जोर दिया जाने लगा.

मैं इस सारी मुहिम में शामिल तो होता था, लेकिन हमेशा एक हताशा मुझे घेरे रहती थी कि मकान की नींव कैसे खुद पाएगी.

मेरे एक दोस्त हैं महेशजी. 2-3 महीने बाद एक दिन जब वे अचानक मिले, तो उन का हुलिया व चेहरे का भूगोल देख कर मेरे होश फाख्ता हो गए.

मैं ने पूछा, ‘‘क्यों, क्या मकान बनवा रहे हो?’’

वे खुश हो कर बोले, ‘‘आप को कैसे पता चला?’’

मैं ने कहा, ‘‘वह तो आप की शक्ल देख कर ही पता चल गया है. यह आप की बढ़ी हुई दाढ़ी, पिचके हुए गाल, धंसी हुई आंखें, बिना इस्तिरी किए कपड़े… कौन कह सकता है कि आप मकान नहीं बनवा रहे हैं?’’

वे बोले, ‘‘बस, पूछिए मत. भूल कर भी इस करमजले मकान का नाम मत लेना भाई. मुझे पता होता कि यह ऐसे गुल खिलाएगा, तो मैं नींव में सब से पहले खुद कूद जाता.’’

‘‘क्यों, ऐसा क्या हुआ?’’

‘‘हुआ यह कि जनाब, इस देश में जिन की पत्नियां कमाएं और जो बीड़ी पीता हो, उस का तो ऊपर वाला ही मालिक है. बस, मकान में जो कारीगर आते हैं, वे हर 15 मिनट के बाद बीड़ी पीते हैं. भला बताइए कि वे आप की जान नहीं लेंगे, तो और क्या करेंगे?’’

‘‘लेकिन, मैं क्या करूं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘करना क्या है, इमली के पत्ते पर दंड पेलिए. मकान तो साक्षात काल है, जो मुंह खोले खड़ा है. जो जाता है, वही उस में समा जाता है,’’ महेशजी बोले.

मैं ने कहा, ‘‘जरा, सोचसमझ कर बोलिए. मकान के मामले में कुछ तो अच्छा बोलिए.’’

उन्होंने कहा, ‘‘तुम मेरे हालात देखने के बाद अगर रिस्क लेना चाहते हो, तो शौक से ले लो. मकान वही बना सकता है, जिस का दो नंबर का धंधा हो.’’

‘‘जब एक नंबर ही नहीं है, तो दो नंबर का सवाल ही कहां से आता है?’’

‘‘फिर तो हरि कीर्तन करो. मकान एक ऐसा लड्डू है, जिसे खाने वाला और नहीं खाने वाला दोनों पछताते हैं. मैं ने बनाया है, जान गले में आ गई. लोन के तमाम फौर्म भर कर पैसा उगाह लिया, लेकिन मकान अभी तक अधूरा है. मैं समझता हूं कि अगर मैं ने मकान पूरा बनाया, तो या तो मकान रहेगा या फिर मैं,’’ वे बोले.

यह सुन कर मेरे भी रोंगटे खड़े हो गए. मैं बस इतना ही कह पाया, ‘‘अगर ऐसी बात है, तो मैं मकान न बनाने की शपथ खाता हूं. जिस मकान को बनाने से आदमी को जिंदा ही स्वर्ग नसीब होता है, तो फिर मैं किराए के मकान में ही रह लूंगा.’’

वे हंसते हुए चले गए. उस दिन के बाद से मैं रोज नक्शे बनाता हूं, मकान के स्टाइल पर विचार करता हूं, लेकिन जमीन की बाउंड्रीवाल ही नहीं बन पाती, तो मकान क्या बनेगा.

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