कपिल शर्मा की बायोपिक में कपिल का किरदार निभाएंगे कृष्णा

कौमेडियन कपिल शर्मा इन दिनों दर्शकों से काफी दूर हैं. न तो उनका टीवी पर कोई शो आ रहा है और न ही वो पहले की तरह सोशल मीडिया पर एक्टिव दिखाई दे रहे हैं. लेकिन इस सब के बीच एक चौंकाने वाली खबर आ रही है. खबर है कि निर्देशक विनोद तिवारी जल्‍द ही मशहूर कौमेडियन कपिल शर्मा की बायोपिक बनाने की तैयारी कर रहे हैं. हालांकि बायोपिक का इस समय सीजन ही चल रह है और बौलीवुड में कई बायोपिक्‍स बन रही हैं, लेकिन चौंकाने वाली खबर है कि इस फिल्‍म में कपिल शर्मा का किरदार कौमेडियन कृष्‍णा अभिषेक निभाएंगे.

इस खबर से कपिल के फैन्‍स को झटका इसलिए भी लग सकता है क्‍योंकि कपिल शर्मा और कृष्‍णा अभिषेक के बीच कभी भी बहुत ज्‍यादा अच्‍छे कनेक्‍शन नहीं रहे. हालांकि इन दोनों ने एक-दूसरे पर कभी सीधे निशाना नहीं ताना लेकिन कमेंट मारने में भी वो कभी पीछे नहीं रहे. दरअसल में विनोद तिवारी, कृष्‍णा अभिषेक की आने वाली फिल्‍म ‘तेरी भाभी है पगले’ के निर्देशक हैं.

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विनोद तिवारी का कहना है कि अगर कपिल अपनी बायोपिक में अपना कैरेक्‍टर खुद प्‍ले करेंगे, तो उनके साथ काम करना अच्‍छा लगेगा. लेकिन अगर वे इससे इंकार करते हैं, तो उन्‍हें लगता है कि कपिल की जगह कृष्‍णा अभिषेक फिट होंगे.

निर्देशक विनोद तिवारी का कहना है कि दोनों ही कौमेडी में माहिर हैं, इसलिए कृष्‍ण, कपिल शर्मा के चरित्र से न्‍याय कर सकेंगे. कपिल शर्मा की बायोपिक के ख्‍याल के बारे में विनोद तिवारी ने कहा कि फिल्‍म ‘संजू’ देखने के बाद मैं एक बायोपिक बनाने के लिए प्रेरित हुआ और मुझे महसूस हुआ कि वो बायोपिक कपिल शर्मा की हो सकती है.

मुझे लगता है कि उनकी स्‍टोरी को बाहर आना चाहिए. इसके लिए मैंने प्रोड्यूसर से बात की, जो कपिल की बायोपिक बनाने को इंट्रस्‍टेड हैं. हालांकि मैं साल 2010 में ही कपिल की बायोपिक बनाना चाहता था, तब प्रोड्यूसर रेडी नहीं थे, मगर अब तैयार हैं. बता दें फिल्‍म ‘तेरी भाभी है पगले’ 13 जुलाई को रिलीज होगी.

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आइए आधार लिंक कराएं : जीवन और मोक्ष की चाबी

बिहार के गया तीर्थ में पिंडदान करने से पितर स्वर्गलोक का टिकट पा जाते हैं तो आधार कार्ड द्वारा व्यक्ति को मृत्युलोक की सुखसुविधाओं का लाभ मिल जाता है. पंडित हमारी जन्मकुंडली बनाता है और सरकार आधारकुंडली को लिंक करा कर आम आदमी के कर्मों का लेखाजोखा रखने लगी है. हम जब भी दुनियादारी से परेशान होते हैं, तो हमें भगवान की याद आती है और मठमंदिरों में बैठे पंडेपुजारी हम से चढ़ोतरी ले कर भगवान से हमारी सिफारिश कर देते हैं. ठीक वैसे ही, जब हमें सरकारी लाभ लेना होता है तो आधार कार्ड को सेवा शुल्क दे कर लिंक कराना पड़ता है. यदि आप का आधार कार्ड लिंक नहीं है, तो इस का मतलब है आप की नीयत में खोट है. सरकार की नजरों में आप चोर हैं.

सरकार चाहती है कि देश के विकास में अंतिम पंक्ति के व्यक्ति का योगदान हो. तभी तो सब्जी वाला, दूध वाला, कपड़ों की धुलाई करने वाला, चाय वाला, रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदूरी करने वाला आम आदमी सरकार की मंशा पूरी करने के लिए आधार कार्ड को लिंक कराने में लगा है. सरकार ने भी योजनाओं का पिटारा खोल रखा है. कन्यादान योजना में मुफ्त शादी कराओ, बच्चे पैदा करने के लिए जननी सुरक्षा योजना और बंद करने के लिए नसबंदी योजना तो है ही. शिक्षकों का वेतन बढ़ाने पर भले ही सरकार पर आर्थिक संकट आ जाता हो परंतु देश के नौनिहालों को आंगनवाड़ी और स्कूलों में मध्याह्न भोजन, पुस्तकें, स्कौलरशिप, साइकिल सबकुछ बांटा जा रहा है. बूढ़ों को वृद्धापैंशन मिलती है, एक रुपए किलो गेहूंचावल मिलता है. इस के बावजूद गरीबी दूर नहीं हो रही, तो करमजले गरीब का ही दोष है.

नोटबंदी की अप्रत्याशित घटना से आम आदमी यह तो समझने लगा है कि सरकार कभी भी, कुछ भी कर सकती है. बगैर आधार शादीविवाह पर बैन लगा दे, हो सकता है आधार कार्ड लिंक न कराने वालों को राष्ट्रद्रोह के इलजाम में जेल में ठूंस दे. आधार से किसी का भला हो न हो, आधार बनाने वाली कंपनी की पांचों उंगलियां जरूर घी में हैं. कहते हैं आदमी इतना बुरा भी नहीं होता जितना वोटर लिस्ट में दिखता है. वह इतना अच्छा भी नहीं होता जितना आधार कार्ड में दिखता है. आज के दौर में आदमी की पहचान उस के रंग, रूप, कद, काठी, पद, प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि नामपते वाले 12 अंकों के यूनिक नंबर वाले आधार कार्ड से हो रही है.

यदि आप देश के आम आदमी हैं तो सावधान हो जाइए क्योंकि आप का आधार कार्ड अभी कई जगह लिंक नहीं है. आधार कार्ड को बैंक खाते, रसोईगैस, मोबाइल नंबर, बीमा पौलिसी व पैन कार्ड से लिंक कराने की जिम्मेदारी आप के मजबूत कंधों पर है. आधार कार्ड लिंक हुए बिना आप को सरकारी सुविधाएं नहीं मिल सकतीं. शायद तुलसीदासजी इसलिए बहुत पहले कह गए थे कि ‘कलियुग केवल नाम आधार’ अर्थात कलियुग में केवल आधार कार्ड का ही नाम होगा. आधार कार्ड जादू की वह पुडि़या है जो जब तक हर जगह अलगअलग लिंक नहीं होगा, सरकार का मिशन पूरा नहीं होगा. मेहनतमजदूरी करने वाला लच्छू अभी भी इसी भ्रम में है कि आधार लिंक होने से देश का कालाधन वापस आ जाएगा, सीमा पर पाक की नापाक हरकतों पर विराम लगेगा और हमारा देश फिर से सोने की चिडि़या बन जाएगा. इसलिए आम आदमी सब कामधाम छोड़ कर अपने आधार कार्ड को लिंक कराने पर डटा हुआ है.

अपना तो मानना है कि सरकार लगेहाथ आधार कार्ड को ससुराल से भी लिंक कराने का फरमान जारी कर दे, क्योंकि ससुर टाइप के लोग सब्सिडी के नाम पर दामाद को सुखसुविधाएं दिला कर कहीं अपनी आमदनी को छिपा कर आयकर बचाने का उपक्रम तो नहीं कर रहे हैं. दामादों के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है क्योंकि बगैर आधार कार्ड के मिलने वाली ससुराली खैरात बंद हो गई तो उन के तो लेने के देने पड़ जाएंगे.

विपक्षी पार्टियों का काम तो विरोध करना है, तो करती रहें. उन्हें रोकता कौन है? सरकार तो आखिर सरकार है. उसे किस का डर? वह कब, कौन से नोट की शक्ल बदल दे, कहा नहीं जा सकता. लोग तो कहते हैं कि हमारे प्रधानमंत्रीजी को सूट का जो रंग पसंद आता है, वे नोटों को भी उसी रंग में देखना चाहते हैं. आधार लिंक कराने के बहाने सरकार ने देश के नागरिकों की कुंडली बना ली है, वह कभी भी, किसी की पोल खोल सकती है. कालेधन वाले सफेदपोशों को डर दिखा कर चुप रहना सिखा दिया है सरकार ने. तभी तो चारों ओर नमोनमो की धूम मची है. यह अलग बात है कि विजय माल्या जैसे लोग देश को लूट कर सरकार को ठेंगा दिखा रहे हैं. जो पार्टी कभी आधार कार्ड के विरोध में अपने झंडे गाड़ती थी, अब सरकार में आते ही उस के गुणगान करती नहीं थक रही.

हमारी सरकार की पिछले 4 साल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि भी यही है कि वह देश के सवा सौ करोड़ भाईबहनों के आधार कार्ड उन के बैंक खातों और रसोईगैस से लिंक करवाने पर तुली हुई है. अब बारी है गरीबों के पैन कार्ड बनवा कर आधार से लिंक कराने की. आयकर विभाग भले ही केवल आयकरदाताओं के पैन कार्ड से मतलब रखता हो, मगर सरकार को गरीबों की सब से ज्यादा चिंता है. सरकार का मानना है कि आखिर गरीब आदमी का भी अपना स्टेटस है. वह आधार सैंटरों के चक्कर काट कर 500 रुपए का गांधी छाप वाला हरा नोट खर्च कर के पैन कार्ड बनवाता है. फिर उसे अपने जनधन अकाउंट से लिंक करवाता है. उसे पता है चुनाव वाले अच्छे दिन फिर से आने वाले हैं. हो सकता है कि इसी खाते में सरकार नोटबंदी से वापस आए कालेधन में से कभी भी 15-15 लाख रुपए जमा करवा दे और गरीब आदमी गरीबी की रेखा को पार कर बल्लेबल्ले करने लगे.

इन 5 वर्षों में राममंदिर, अनुच्छेद 370, गंगा की सफाई, सीमापार की घुसपैठ जैसे मसलों को दरकिनार कर आधार कार्ड को लिंक कराने का अभियान चला कर सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह आम आदमी के विकास के बारे में गंभीरता से सोच रही है.

आम आदमी को भी अब यह भरोसा हो गया है कि उस ने अपना कीमती वोट इसीलिए दिया था कि उस की असल पहचान वाला बेशकीमती आधार कार्ड कश्मीर से कन्याकुमारी तक लिंक हो जाए. कुछ विघ्नसंतोषी यह कुतर्क देते फिर रहे हैं कि आधार कार्ड से उन की निजता के अधिकार का हनन होगा. अपना तो मानना है कि गीता के उपदेश को केवल सुनें ही नहीं, उसे जीवन में भी उतारें, क्योंकि गीता में कहा गया है कि हम क्या ले कर आए थे, क्या ले कर जाएंगे, जो हमारा नहीं है उस के लिए क्यों व्यर्थ शोक करें. आज भले ही हम साक्षर होने का दम भर लें मगर आधार कार्ड बनवाने में लगा अंगूठा अब हमारी पहचान बन चुका है. अब हम अंगूठा लगाने में कोई शर्मसंकोच नहीं, बल्कि अपनी शान में इजाफा समझ रहे हैं. बैंक एटीएम, राशन दुकान, मोबाइल नंबर आदिआदि में लगा हमारा अंगूठा इस बात का साक्षी है. आधार कार्ड को और कहांकहां लिंक कराया जा सकता है, सरकार इस पर लगातार मंथन कर रही है. सरकारी नौकरचाकरों के आधार कार्ड सेलरी से, व्यापारियों के बहीखातों से लिंक होने की खबर सोलह आने सही है.

नशामुक्ति अभियान चलाने वाले एक भाईसाहब का सुझाव है कि सरकार शराब की दुकानों पर भी आधार कार्ड लिंक कराना अनिवार्य कर दे. सरकार एक बार अंगूठा लगाने पर अद्धापौआ का हिसाब निर्धारित कर शराबखोरी को नियंत्रित कर सकती है. इस प्रक्रिया से शराब पीने वालों के आंकड़े भी अगली जनगणना में सार्वजनिक हो जाएंगे. सरकार आसानी से इस तिलिस्म का राज भी जान सकती है कि गरीबीरेखा से नीचे जीवनयापन करने व राशन दुकानों से मुफ्त राशन लेने वाले महीने में अपनी आमदनी से ज्यादा की शराब कैसे गटक जाते हैं. नोटबंदी में अपने नोट बदलने के लिए कईकई दिनों तक लाइन में लगा रहने वाला आम आदमी यह सोच कर खुश है कि देश में किसी भी नेता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे जनसेवा का धर्म छोड़ कर बैंक की लंबी लाइन में लग कर अपना समय खराब करते और न ही हमारे नेताओं के इतने खर्चे हैं कि उन्हें अपनी घरगृहस्थी चलाने के लिए बैंक के किसी एटीएम की लाइन में लग कर पैसा निकालना पड़े.

सरकार आम आदमी की नब्ज टटोल चुकी है. उसे पता है कि आम आदमी जब तक लाइन में खड़ा नहीं रहता उस का हाजमा खराब रहता है. इसीलिए सरकार समयसमय पर जनहित वाले ऐसे कामों को अंजाम देती रहती है. सरकारको मतदाताओं की बहुत फिक्र रहती है. यही कारण है कि अब तक उस ने वोटर लिस्ट को आधार कार्ड से लिंक करने की तरफ ध्यान नहीं दिया है. सरकार को पता है कि आधार कार्ड यदि वोटर लिस्ट से लिंक हो गया तो असलीनकली के नाम पर मतदाता के स्वाभिमान को चोट पहुंच सकती है और देश का प्रजातंत्र दुर्घटनाग्रस्त हो सकता है. प्रजातंत्र की सलामती के लिए यह कदम ठीक नहीं है.

धन्य है हमारा देश और धन्य है हमारी जनता जो बड़ेबड़े संकटों में भी मुसकराती है. चुनावी सभाओं और कुकरमुत्तों की तरह उग आए टैलीविजन चैनलों पर नेताओं के लच्छेदार भाषणों व जुमलों को सुन कर जनता ताली पीटती है. उसे भलीभांति पता है कि उस के हर मर्ज की दवा इन्हीं नेताओं के पास है. तभी तो नेताओं के भाषण और नारों को सुन कर आम आदमी की भूख गायब हो जाती है. आइए, हम भी सरकार के इस नेक काम में सहभागी बनें और अपनेअपने आधार कार्ड को जहांजहां लिंक नहीं है, लिंक कराएं क्योंकि आधार ही हमारी असली पहचान है. क्या पता आगे चल कर बिन आधार कार्ड हम कब, कौन सी सरकारी खैरात से वंचित रह जाएं.

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अच्छे रिजल्ट पर रोजगार कहां

प्रोफैसर अमर्त्य सेन ने एक बार कहा था, ‘‘भारत एकमात्र ऐसा देश है जो अशिक्षित व स्वास्थ्यहीन श्रमबल के आधार पर वैश्विक आर्थिक शक्ति होने की कोशिश कर रहा है. ऐसा किसी देश में कभी नहीं हुआ. यह असंभव है.’’ अमर्त्य सेन का यह तंज समझने की जरूरत है और सरकार को कोरी लफ्फाजी वाले वादों, दावों, 56 इंच का सीना, विश्वगुरु का सपना और पौराणिक काल की संस्कृति व धर्म के बखान व सब्जबाग दिखाने के बजाय शिक्षा व रोजगार की मूलभूत कमियों को दूर कर नए सार्थक, स्वस्थ रोजगार के अवसर मुहैया कराने पर जोर देने की जरूरत है.

मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा आयोजित 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं के नतीजे इस साल चौंका देने वाले थे. हर किसी को यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ था कि इस साल 10वीं में 65.54 और 12वीं में 68.07 फीसदी छात्र उत्तीर्ण हुए. केवल एक साल में कुल कामयाब छात्रों की संख्या 12 लाख 54 हजार 920 के लगभग है. इस से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस दौर के युवा पढ़ाई पर जरूरत से ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. इन छात्रों को कम उम्र में समझ आ  गया है कि अगर अच्छी नौकरी चाहिए तो लगन और मेहनत से पढ़ाई करनी जरूरी है.

हर साल की तरह इस साल भी मैरिट में आए छात्रछात्राओं के इंटरव्यू न्यूज चैनल्स व अखबारों ने दिखाए व छापे. शिवपुरी जैसे पिछड़े जिले से टौप पर रहे 12वीं के ललित पचौरी की इच्छा सिविल सेवा में जाने की है तो 10वीं की टौपर रही विदिशा की अनामिका साध सौफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहती है. मोटी तनख्वाह वाली प्राइवेट या रसूखदार सरकारी नौकरी मैरिट से चूक गए छात्रों का भी ख्वाब है. इस के लिए उन्हें समझ आ गया है कि आइंदा और ज्यादा मेहनत से पढ़ना है.

अच्छे नतीजे देने में घटिया क्वालिटी की पढ़ाई के लिए बदनाम सरकारी स्कूलों के छात्र भी पीछे नहीं रहे. 300 के लगभग बनी विभिन्न संकायों की मैरिट में 43 छात्र सरकारी स्कूलों के थे. उन का परीक्षा परिणाम भी 50 फीसदी के लगभग रहा.

इन आंकड़ों को देखते हुए यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि छात्र चाहे वे गांवदेहात के हों या शहरों के, किसी भी कीमत पर प्रतिस्पर्धा से पिछड़ना नहीं चाहते. उन्हें यह एहसास है कि अच्छे जौब का रास्ता अच्छे नंबरों से हो कर जाता है, इसलिए 10वीं और 12वीं जैसे बोर्ड के इम्तिहानों में फेल होना मंजिल तक पहुंचने में अड़ंगा ही है.

पर मंजिल है कहां

छात्रों की मेहनत और कामयाबी वाकई बेमिसाल है जिस पर फख्र करना स्वाभाविक बात है. लेकिन यह बात, कामयाब छात्रों का आंकड़ा देखते व उन के भविष्य के लिहाज से कम चिंताजनक भी नहीं कही जा सकती.

मिसाल मध्य प्रदेश की ही लें, वहां पहले से ही डेढ़ करोड़ के लगभग बेरोजगार युवा धूल फांक रहे हैं. मिसाल देशभर की लें, तो बेरोजगारों की तादाद 18 करोड़ का चिंताजनक आंकड़ा छू रही है. इन में पढ़ेलिखे युवाओं की तादाद ज्यादा है.

मोदी सरकार काफी समय से विश्वभर की आर्थिक एजेंसियों के हवाले से भारत में बढ़ते रोजगार व जीडीपी ग्रोथ का ढोल पीटती रही है. लेकिन विश्वबैंक की एक रिपोर्ट ‘जौबलैस ग्रोथ-2018’ मोदी सरकार के कथन से परदा हटा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, देश की आर्थिक व्यवस्था को डूबने से बचाने के लिए हर साल करीब 80 लाख नौकरियों की जरूरत है. अगर यह आंकड़ा पूरा नहीं हुआ तो देश बेरोजगारों की हताशा व तादाद से टूट जाएगा.

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रिपोर्ट की मानें तो 2015 में भारत की रोजगार दर 52 प्रतिशत थी, जबकि नेपाल (81 प्रतिशत), मालदीव (66 प्रतिशत), भूटान (65 प्रतिशत) और बंगलादेश जैसे देश भारत से बेहतर स्थिति में थे. इस सूची में भारत से सब ऊपर व बेहतर थे. साल 2017 में करीब 18.3 लाख भारतीय बेरोजगारों का यह आंकड़ा 2019 तक 189 लाख हो जाएगा.

ऐसे में 10वीं, 12वीं या स्नातक स्तर पर कामयाब हो रहे लाखों छात्रों की फौज इस तादाद में और इजाफा करेगी. उत्तीर्ण हुए युवाओं के चेहरों की मासूमियत, जिस में नौकरी और बेहतर जिंदगी के ख्वाब झलकते हैं, के साथ क्या न्याय हो पाएगा? जाहिर है, नहीं. ऐसे में इस अन्याय का जिम्मेदार कौन है, इस सवाल का स्पष्ट जवाब ढूंढ़ पाना टेड़ी खीर है.

यह भी एक स्थापित तथ्य है कि बोर्ड इम्तिहानों में हर साल छात्रों की भागीदारी बढ़ती है जिसे स्पष्ट शब्दों में कहें तो देशभर में हर साल 2 करोड़ के लगभग बेरोजगार स्कूलों और कालेजों से किसी बेकार प्रौडक्ट की तरह निकलते हैं.

देश में इस वक्त बेरोजगारों की संख्या 18 करोड़ है. इस मेंलगभग 12 करोड़ शिक्षित बेरोजगार हैं. दरअसल, बेरोजगारों की समस्या से नजात पाने के लिए सरकार को स्किल डैवलपमैंट व लघु उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए. युवाओं को नौकरी लायक बनाने के लिए वोकेशनल प्रशिक्षण के जरिए इन कीस्किल डैवलप करने के बजाय सरकार विज्ञापनबाजी में ही उलझी दिखती है. हालांकि रोजगार का सीधा संबंध शिक्षा से है लेकिन बेहतरीन नतीजों के बीच छिपी शिक्षा जगत की कमियों की अनदेखी करने के चलते नौकरियां कम हो रही हैं.

उद्योग संगठन एसोचैम व यस इंस्टिट्यूट की जौइंट स्टडी के मुताबिक, भारत की महज 16 प्रतिशत कंपनियां संस्थान के भीतर प्रशिक्षण देती हैं जबकि चीन में यह काम 80 प्रतिशत कंपनियां कर रही हैं. यहां तक कि विश्व के 200 शीर्ष विश्वविद्यालयों में भारत के सिर्फ 2 शिक्षण संस्थान (आईआईटी दिल्ली व दिल्ली विश्वविद्यालय) जगह बना पाते हैं.

स्टडी के मुताबिक, देश की मेधावी प्रतिभाएं रिसर्च व स्टडी के लिए विकसित देशों में चली जाती हैं. करीब 6 लाख भारतीय विद्यार्थी विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं और वहां 20 अरब डौलर सालाना खर्च करते हैं. जाहिर है जो प्रतिभाएं बचती हैं वे स्किल में कमजोर होती हैं. ऐसे लोग अव्वल नंबर ला कर भी देश में कुछ उल्लेखनीय व प्रोडक्टिव कार्य नहीं कर पाते.

इसी स्टडी के अनुसार, भारतीय उच्चशिक्षा क्षेत्र रोजगार के अल्पस्तर, रिसर्च की कमी व उद्यमिता के सीमित विकल्पों का शिकार है. जाहिर है इस से नजात पाने के लिए उच्चशिक्षा सिस्टम को विश्वस्तर का बनाने व भविष्य आधारित तकनीकी शैक्षणिक रूपरेखा बनाने की दरकार है. सरकार इस मोरचे पर भी पूरी तरह से फेल नजर आती है.

इसीलिए नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बेरोजगारों की फौज में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. वजह साफ है कि मोदी सरकार का ध्यान विस्फोटक होती इस समस्या पर है ही नहीं. प्रसंगवश यह उल्लेखनीय है कि इन्हीं नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था जिसे ले कर वे युवाओं के भी निशाने पर हैं.

मध्य प्रदेश के ललित पचौरी और अनामिका साध का सरकारी या अच्छी प्राइवेट नौकरी करने का ख्वाब पूरा होगा, इस का उन के मैरिट में होने से कोई संबंध नहीं. फिर बाकी लाखों छात्रों के भविष्य के बारे में सोच कर दहशत ही होती है. यह सोचना एकदम बेमानी या निरर्थक नहीं कि, क्या फायदा ऐसी पढ़ाई से जो एक ऐसी बीमार अर्थव्यवस्था और सिस्टम में पलबढ़ रही है जो खुद कैंसर जैसी घातक व जानलेवा बीमारी सरीखी है.

बेरोजगार युवाओं के साथ छलकपट और उन्हें सब्जबाग दिखाना क्या गुनाह नहीं, इस सवाल का जवाब बहुत पेचीदा नहीं है. यह सच है कि सरकार सभी युवाओं को नौकरी नहीं दे सकती क्योंकि उस के पास नौकरियां सीमित हैं लेकिन परेशानी और अफसोस की बात यह है कि वह प्राइवेट सैक्टर से भी रोजगार के मौके छीन रही है और ऐसा वह खुद मानती भी है.

मध्य प्रदेश बेरोजगार सेना के एक पदाधिकारी राज ठाकुर की मानें तो लोकतंत्र में नौकरी, रोजगार या व्यवसाय के मौके उपलब्ध कराना सीधेतौर पर सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए. युवाओं का काम तो पढ़लिख कर डिगरी या सर्टिफिकेट हासिल करना होता है.

यह आक्रोशित जवाब मुमकिन है सरकार के प्रति ज्यादती लगे, लेकिन सरकार और दूसरी एजेंसियों के बयानों और आंकड़ों पर गौर करें तो साफ लगता है कि पढ़ाने की जिम्मेदारी तो वह ठीकठाक तरीके से निभा रही है, लेकिन रोजगार के मोरचे पर मुंह छिपाती रहती है.

भयावह हैं हालात

लाख कोशिशों के बाद भी सरकार बेरोजगारी पर अपनी असफलता को छिपा नहीं पा रही है जिस से युवाओं में सुखद भविष्य को ले कर एक अजीब सी बेचैनी और आशंका है.

यह बेचैनी अगर वक्त रहते दूर नहीं हुई तो सरकार को बड़े पैमाने पर युवाओं का हिंसक आक्रोश झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए. यह बात अपनी जगह ठीक है कि सरकार सभी बेरोजगारों को नौकरी नहीं दे सकती लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि सरकार प्राइवेट सैक्टर में रोजगार के मौके बजाय पैदा करने के, उन्हें खत्म कर रही है. ऐसा करने के पीछे उस के राजनीतिक, आर्थिक और दीगर स्वार्थ हो सकते हैं लेकिन शुतुरमुर्ग की तरह आंखें बंद कर लेने से मुसीबत टलने वाली नहीं.

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 50 के दशक के उत्तरार्ध में लखनऊ में एक आयोजन में साफतौर पर माना था कि हर साल 10 लाख पढे़लिखे युवा शिक्षण संस्थानों से निकल रहे हैं लेकिन सरकार के पास देने के लिए 10 हजार नौकरियां भी नहीं हैं.

तब देश नयानया आजाद हुआ था और आबादी 40 करोड़ के लगभग थी. अब हालत यह है कि आबादी 130 करोड़ के लगभग है जिस में से 18 करोड़ लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं यानी बेरोजगार हैं. इन में भी युवाओं की संख्या तकरीबन 14 करोड़ है. तब देशभर के कुल स्नातकों की संख्या भी उतनी नहीं थी जितने आज एक साल में निकलते हैं.

भारत की आबादी में 65 प्रतिशत हिस्सा 35 साल से कम उम्र के युवाओं का है यानी दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र होने के नाते हमारे पास सब से ज्यादा रोजगार पैदा करने के अवसर हैं. लेकिन हम फिर भी फेल हो रहे हैं.

दूसरी एजेंसियों की रिपोर्ट्स के अलावा खुद सरकार का श्रम विभाग यह स्वीकार कर चुका है कि देश में 12 करोड़ लोग बेरोजगार हैं. जिन के चलते भारत दुनिया के सब से ज्यादा बेरोजगारों का देश बन गया है. श्रम विभाग ने यह भी माना है कि साल 2015-16 में बेरोजगारी की दर 5 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंची.

दिलचस्प बात सरकार की यह स्वीकारोक्ति थी कि इन 12 करोड़ बेरोजगारों में से वह महज 1 लाख 35 हजार लोगों को ही नौकरी दे पाई है. श्रम विभाग की एक रिपोर्ट में यह भी माना गया है कि स्वरोजगार के मौके घटे हैं और नौकरियां कम हुई हैं.

वित्तीय वर्ष 2012 से 2016 के बीच रोजगार के लिए 8.41 करोड़ लोग आए लेकिन श्रमशक्ति में बढ़ोतरी केवल 2.01 करोड़ की रही. इस में भी कामकाजी उम्र वाली आबादी का 24 प्रतिशत हिस्सा श्रमशक्ति से जुड़ा, वहीं 76 प्रतिशत इस से बाहर रहा.

संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की एक रिपोर्ट में पहले ही यह चेतावनी दी जा चुकी है कि साल 2018 में भारत में बेरोजगारी और बढ़ सकती है जो बेरोजगार युवाओं के लिए खतरे की घंटी है.

वर्तमान सरकार सिर्फ नए रोजगार पैदा करने के मामले में फेल नहीं है, बल्कि लाखों की संख्या में रिक्त पदों को भरने में भी वह नाकाम नजर आती है. सरकारी व गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक, फिलहाल देश में लगभग 14 लाख डाक्टरों की कमी है, करीब 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 6 हजार से भी ज्यादा पद खाली हैं, आईआईटी, आईआईएम व एनआईटी में हजारों पद खाली हैं. वहीं शेष इंजीनियरिंग कालेजों में 27 प्रतिशत शिक्षकों की जरूरत है और करीब 12 लाख स्कूली शिक्षकों के पद खाली हैं. अगर ये तमाम खाली पद भी सरकार युवाओं से भर दे तो बेरोजगारी पर किसी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है.

नोटबंदी ने निगलीं नौकरियां

कांग्रेस के शासनकाल में भी बेरोजगारी थी और आज भी है, लेकिन यह अचानक हैरतअंगेज तरीके से बढ़ी है तो इस के लिए मौजूदा सरकार द्वारा लिए गए कुछ जिद्दी व अदूरदर्शी फैसले हैं, जिन में से पहला नोटबंदी और दूसरा जीएसटी लागू करना है.

सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकोनौमी यानी सीएमआईई के एक सर्वे की मानें तो 8 नवंबर, 2016 से लागू नोटबंदी के बाद जनवरी 2017 से ले कर अप्रैल 2017 तक तकरीबन 15 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था यानी हर रोज 450 लोगों की नौकरियां गईं. 4 महीने के इस सर्वे में संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्र शामिल किए गए थे.

कहां तो 2014 के लोकसभा चुनावप्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने हर साल एक करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा किया था और कहां अब हर साल लाखों की लगीलगाई नौकरियां भी जा रही हैं. हालांकि बेरोजगारी की भयावह बदहाली को सरकार कौशल विकास जैसी योजनाओं से ढकने की कोशिश कर रही है पर वह उस में कामयाब नहीं हो पा रही है.

नोटबंदी के बाद जीएसटी के फैसले ने आग में घी डालने का काम किया. किराने के छोटे दुकानदारों से ले कर बड़ी नामी कंपनियों ने छंटनी शुरू कर दी तो इस के पीछे उन की अपनी मजबूरियां थीं जो इस फैसले से पैदा हुई थीं. व्यापारियों और कंपनियों को अपने खर्चे कम करने के लिए भी मजबूर होना पड़ा तो इस की गाज हर किसी पर गिरी.

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नोटबंदी और जीएसटी की जुगलबंदी से प्राइवेट सैक्टर में नौकरियां घटीं जिस का खमियाजा रोजगार छिनने की शक्ल में सामने आया और हर नियोक्ता ने कर्मचारी हटाए जिस के काम का भार दूसरे कर्मचारियों पर पड़ा यानी नौकरी करने की शर्त अब गधे की तरह बोझ ढोते रहने की भी हो गई है.

इन फैसलों से किसी को कोई फायदा हुआ होता तो भी एकदफा बात समझ आती, लेकिन बेरोजगारी बढ़ने का नुकसान साफसाफ दिख रहा है.

मौजूदा सरकार ने रोजगारपरक योजनाओं की झड़ी लगाई तो लगा कि देश के युवाओं को रोजगार मिल जाएगा लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात वाला ही रहा. ‘मेक इन इंडिया’ के जरिए नौकरियां पैदा करने की बड़ीबड़ी बातें की गईं. इस के जरिए अनुसूचित जातियों, जनजातियों व महिलाओं में उद्यमिता के माध्यम से रोजगार पैदा करने का वादा था. लेकिन आज देश के सफल स्टार्टअप्स में इन तबकों की मौजूदगी शून्य है.

स्किल इंडिया भी रोजगार मूलक योजना के तौर पर प्रचारित की गई. कहा गया कि 2022 तक 40 करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग दी जाएगी लेकिन सच सब के सामने है.

पढ़ाई का फायदा क्या

विश्वबैंक की एक रिपोर्ट, ‘वर्ल्ड डैवलपमैंट रिपोर्ट 2018 : लर्निंग टू रियलाइज एजुकेशंस प्रौमिस’ में बताया गया है कि भारत उन 12 देशों की सूची में नंबर 2 पर आता है जहां दूसरी कक्षा के छात्र एक छोटे से पाठ का एक शब्द भी नहीं पढ़ पाते. वहीं, 5वीं कक्षा के आधे छात्र दूसरी क्लास के पाठ्यक्रम के लैवल की किताब ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं.

शिक्षा, ज्ञान का यह संकट सिर्फ नैतिक स्तर पर शर्मनाक नहीं है, आर्थिक संकट पर भी है, क्योंकि इसी लचर शिक्षा ढांचे से निकले छात्र बड़े हो कर नौकरियों के लिए भटकेंगे और देश का आर्थिक विकास चौपट कर देंगे.

साल 2011 की जनगणना के बाद तत्कालीन सरकार ने बेरोजगारी पर जो आंकड़े जारी किए थे उन के मुताबिक 20 से 29 साल की उम्र तक के 42 फीसदी युवा बेरोजगार थे. नई सरकार का एक साल में एक करोड़ नौकरियां देने का वादा तो छलावा साबित हुआ ही, हर साल एक करोड़ बेरोजगारों का बढ़ना नीम चढ़े करेले जैसी बात है.

ऐसे में क्या मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल की परीक्षाओं में पास हुए 12 लाख से भी ज्यादा छात्रों या अन्य सीबीएसई व दूसरे राज्यों के बोर्ड्स से उत्तीर्ण हुए छात्रों की कामयाबी पर खुश होना चाहिए. देशभर के छोटेबड़े सभी राज्यों के माध्यमिक शिक्षा मंडलों सहित सीबीएसई के उत्तीर्ण छात्रों की संख्या मिला कर देखा जाए तो इस साल कोई 2 करोड़ युवाओं ने 10वीं और 12वीं के इम्तिहान पास किए हैं, इन में से लगभग 50 लाख स्नातक स्तर की पढ़ाई करेंगे.

यानी देश में इस साल डेढ़ करोड़ नए शिक्षित बेरोजगार पैदा हो गए हैं. उन की पीठ यह कहते ईमानदारी से थपथपाई नहीं जा सकती कि पढ़ोगेलिखोगे तो बनोगे नवाब या पढ़लिख कर कुछ बन जाओगे.

यह सोच कर दहशत होना स्वाभाविक है कि ये युवा क्या करेंगे और इन के अंधकारमय भविष्य का जिम्मेदार कौन है. अगर सरकार या मौजूदा सिस्टम इस की जिम्मेदारी नहीं लेता तो पढ़ाईलिखाई का फायदा क्या. तसवीर उम्मीद से ज्यादा भयावह है कि ये युवा अपने ख्वाब दफन करते पैंटशर्ट में मजदूरी करते नजर आएंगे.

देश का भविष्य कहे जाने वाले इन युवाओं को अगर मजदूरी ही करनी थी या फिर पकौड़े ही बेचने थे तो इन की पढ़ाईलिखाई के माने क्या? इस पर हर कोई खामोश है. खामोश तो अभी युवा भी हैं जो कभी गुस्से या भड़ास में फट पड़ें तो हालात किसी सरकार के काबू में आने वाले नहीं.

युवाओं के नजरिए से देखें तो उन की पहली प्राथमिकता सरकारी नौकरी होती है, क्योंकि वह एक व्यवस्थित जीवन व भविष्य की गारंटी होती है पर दिक्कत यह है कि सरकार के पास कुल 2 फीसदी नौकरियां हैं जिस के लिए विकट की मारामारी मची रहती है.

सब से ज्यादा 53 फीसदी युवाओं को रोजगार कृषि क्षेत्र से मिलता है लेकिन वह अस्थायी होता है. अलावा इस के, खेतीकिसानी भी तेजी से चौपट हो रही है. गांवदेहात के लोग खेत और जायदाद बेच कर शहरों की तरफ भाग रहे हैं. इस के पीछे उन की एक बड़ी मंशा बच्चों को पढ़ालिखा कर कुछ बना देने की है.

उन्हें नहीं मालूम कि अब पढ़ाईलिखाई रोजगार की गारंटी नहीं रही. हो सिर्फ इतना रहा है कि ग्रामीणों की दूसरी पीढ़ी थोड़ा पढ़लिख कर शहरों की मजदूर बनती जा रही है.

ठीक यही हाल दूसरी तरह से प्राइवेट सैक्टर का है जो 36 फीसदी नौकरियां देता है. जो युवा सरकारी नौकरी हासिल नहीं कर पाते वे प्राइवेट कंपनियों में नौकरी कर लेते हैं. इन में व्यावसायिक और तकनीकी स्नातकों की संख्या ज्यादा है. ये प्राइवेट नौकरियां भी अनिश्चितता की शिकार हैं और पहले की तरह आकर्षक तनख्वाह वाली अब नहीं रह गई हैं.

जैसेजैसे बेरोजगारों की भीड़ बढ़ी वैसेवैसे इन प्राइवेट कंपनियों, जिन में आईटी कंपनियां ज्यादा हैं, ने पैकेज का आकार घटाना शुरू कर दिया. जिस पद पर नियुक्त कर्मचारी को पहले एक लाख रुपए महीना दिए जा रहे थे उस पर 4 लोगों को रख कर 25-25 हजार रुपए दिए जाने लगे. इस से बेरोजगारी तो घटी पर पगार भी कम हुई. सरकारें चाहें तो इस फार्मूले से सबक ले सकती है कि भारीभरकम पगार वाली नौकरियां खत्म करें और फिक्स पे का सिद्धांत लागू करें. हालांकि यह शोषण ही है लेकिन बेरोजगारी से तो अच्छा है.

मुद्दे की बात शिक्षा का उद्देश्य क्या है, यह जानना है तो जवाब साफ है कि कोई भी युवा कोई ज्ञानी, महर्षि या पंडित बनने के लिए पढ़ाईलिखाई नहीं करता. वह सिर्फ और सिर्फ अच्छी नौकरी के लिए पढ़ाई करता है. वह भी न मिले तो विश्वगुरु और आर्थिक शक्ति बनने का सपना देख रहे देश में पीएचडीधारक भी पेट पालने के लिए अपना शोध भूलभाल कर चपरासी, माली व ड्राइवर तक बनने को तैयार रहते हैं.

छोटे पदों के लिए बड़ी मारामारी

इस साल मुंबई में 1,137 पुलिस कौंस्टेबल्स की नौकरियां निकलीं तो आवेदकों की संख्या 2 लाख हो गई. आश्चर्य व दुख की बात यह है कि इन आवेदनों में योग्यता से ऊपर के आवेदक बहुत थे. इन में 423 इंजीनियरिंग, 167 उम्मीदवार एमबीए और 543 पोस्टग्रेजुएट थे, हालांकि योग्य उम्मीदवार 12वीं पास पर्याप्त था. अगर ये तमाम डिगरीधारी अपनी काबिलीयत से कम स्तर की नौकरियों के लिए आवेदन कर रहे हैं तो साफ है कि शिक्षित तबके में बेरोजगारी कितने चरम पर है.

‘जौबलैस ग्रोथ’ रिपोर्ट के अनुसार, साल 2005 से 2015 के बीच भारत में पुरुष रोजगार दर में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है. जाहिर है यह गिरावट इन्हीं पढ़ेलिखे, बेहतर रिजल्टधारी युवाओं पर भारी पड़ी.

हर महीने 13 लाख नए लोग कामकाज करने की उम्र में प्रवेश कर जाते हैं. यानी एक करोड़ 56 लाख नए युवा हर साल रोजगार के लिए कतारों में खड़े दिखते हैं.

इस की पहली बड़ी मिसाल सितंबर 2015 के तीसरे सप्ताह में देखने में आई जब उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय में चपरासी के 368 पद निकले थे. भरती के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 5वीं पास थी.

उम्मीद से परे इन पदों के लिए 23 लाख आवेदन आए थे. साथ ही 5वीं पास आवेदकों की संख्या महज 53,420 थी जबकि 2 लाख के लगभग उच्चशिक्षित युवाओं को सरकारी दफ्तर का चपरासी बनना मंजूर था. जब इंटरव्यू देने वाले बेरोजगारों की भीड़ कतार में लगी तो सरकार को समझ आया कि 23 लाख इंटरव्यू लेतेलेते तो 4 साल निकल जाएंगे और इस दौरान कई उम्मीदवार नौकरी की उम्र पार कर चुके होंगे. अलावा इस के अच्छाखासा प्रशासनिक अमला अपने कामधाम छोड़ कर इंटरव्यू ही लेता रहेगा. नतीजतन, ये भरतियां रद्द कर दी गई थीं.

पर युवाओं के लिहाज से यह वाकेआ शर्मनाक था, क्योंकि कोई भी युवा चपरासी जैसी छोटी नौकरी के लिए अपनी जवानी पढ़ाई में नहीं झोंक देता और न ही कोई पीएचडी इसलिए करता कि बहुत सा ज्ञान बटोरने व शोध करने के बाद वह टेबल साफ करे, दफ्तर में झाड़ूपोंछा करे और साहबों को चाय, कौफी, पानी व पानसिगरेट ला कर दे.

यहां बात छोटेबड़े काम की अहमियत की नहीं, बल्कि युवाओं के स्वाभिमान की है जिस से समझौता करने के लिए किस हद तक जा कर उन्हें झुकना पड़ रहा है. प्रसंगवश लौर्ड मैकाले को कोसते रहने का रिवाज उल्लेखनीय है कि उस ने शिक्षाव्यवस्था ऐसी बना दी थी जो सिर्फ बाबू यानी क्लर्क पैदा करती है. अंगरेज शासन करने भारत आए थे, उन का असल मकसद प्राकृतिक संपदा और संसाधनों का दोहन था. वे चूंकि व्यापारी थे, इसलिए उन्हें सामान ढोने वाले और उस की गिनती कर हिसाबकिताब करने वाले युवा चाहिए थे.

पर आजाद भारत के कर्ताधर्ताओं ने कौन सा तीर मार लिया और शिक्षापद्धति में कौन सी उल्लेखनीय क्रांति ला दी कि उस में शैक्षणिक योग्यता के हिसाब से नौकरी मिलने लगी. उलटे, बाबू की जगह शासक, चपरासी, ड्राइवर, माली और दूसरे छोटे पदों पर नौकरी करने के लिए युवाओं को विवश कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ यह सिलसिला अभी थमा नहीं है, न ही इस के थमने के आसार नजर आ रहे हैं. पिछले साल नवंबरदिसंबर में मध्य प्रदेश की अदालतों में भी छोटे पदों पर भरती के लिए खासे पढ़ेलिखे, उच्चशिक्षित जब मुंह लटकाए लाइन लगाए नजर आए तो नए पढ़ेलिखे के भविष्य का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है. इन हालात को ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश बोर्ड की 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं को पास कर चुके युवाओं को बधाई देने से पहले यह सोचनेसमझने की जरूरत है कि कहीं उन्हें बेवकूफ तो नहीं बनाया जा रहा.

बढ़ती और विकराल होती बेरोजगारी का संभावित विस्फोट सरकार से छिपा नहीं है पर उस के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं है जिसे घुमाते ही करोड़ों युवाओं को रातोंरात वह नौकरी दे सके या रोजगार के मौके पैदा कर सके.

हर कोई इस बात को समझ रहा था कि जब पहले की कांग्रेसी सरकारें युवाओं के लिए कुछ खास नौकरी या रोजगार के अवसर पैदा नहीं कर पाईं तो मोदी सरकार से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगाना उस से ज्यादती होगी. इसलिए बेरोजगारी को ले कर कभी किसी ने मोदी सरकार को न तो जरूरत के मुताबिक कोसा और न ही उस की खिल्ली उड़ाई.

हालांकि मनमोहन सिंह की सरकार के आखिरी 2 सालों यानी 2012-13 में 7.41 लाख नए रोजगार आए जबकि श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015-16 में रोजगार सृजन मात्र 1.55-2.13 लाख रहा. तुलना करिए और समझ जाइए कि हम आगे बढ़े या खाई में गिरे.

लेकिन एक मौके पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब यह कहा कि युवा पकौड़े तलें तो उन की हंसी अब तक लोग उड़ाते रहते हैं. नरेंद्र मोदी की यह सलाह उन के भक्तों के गले भी नहीं उतरी थी कि वे इस में कौन सा जीवनदर्शन ढूंढें.

पकौड़े बेच कर पेट भरना कतई जिल्लत या जलालत की बात नहीं पर नरेंद्र मोदी की खिल्ली उड़ने की असल वजह यह थी कि वे युवाओं से बड़े सपने देखने की बात नहीं कर रहे थे. वे यह नहीं कह रहे थे कि युवा डाक्टर, अफसर, इंजीनियर या साइंटिस्ट बनें या फिर अपनी कंपनियां और फैक्टरियां शुरू करें जिस से दूसरे युवाओं को भी रोजगार मिले.

प्रधानमंत्री के मुख से पकौड़े को पेशा बनाने की राय व्यक्त की गई तो युवाओं का तिलमिलाना स्वाभाविक बात थी कि उन्होंने इतनी पढ़ाई कोई खोमचा या ठेला लगाने के लिए नहीं की और पढ़ाई पर उन के अभिभावकों ने इसलिए लाखों रुपए नहीं खर्चे थे कि उन की संतानें चौराहों पर पकौड़े तलती नजर आएं.

विपक्ष ने जगहजगह पकौड़े बना कर विरोधप्रदर्शन किया, यह एक अनिवार्य राजनीतिक प्रतिक्रिया थी. लेकिन देश का प्रधानमंत्री युवाओं को पकौड़े बेचने का मशवरा दे, इस से युवाओं का स्वाभिमान आहत हुआ था और नरेंद्र मोदी की छवि को गहरा धक्का भी लगा था.

घाटे में अभिभावक

पढ़ाईलिखाई जरूरत से ज्यादा महंगी हो चली है, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं है और न ही यह कि शिक्षा अब, वजहें जो भी हों, पूरी तरह कारोबार हो चली है.

शिक्षा का भारीभरकम खर्च अधिकतर अभिभावक उठा भी रहे हैं तो इस के पीछे उन की मंशा समाज को एक अच्छा नागरिक देने की ही होती है जो शिक्षित हो कर कहीं अच्छी नौकरी कर देश की तरक्की में अपना योगदान देते सम्मानजनक जीवन जी रहा होता है. यह कितना बड़ा भ्रम था, यह बात जब साबित होती है तो मांबाप पर क्या गुजरती है, यह तो वही जानते हैं. अपने बेरोजगार युवा बेटे या बेटी की हालत देखते हुए उन का कलेजा मुंह को आने लगता है.

सच तो यह है कि सरकार से बदतर और विस्फोटक होते हालात संभल नहीं रहे हैं. एक बारूद भीतर ही भीतर युवाओं के दिलोदिमाग में रोजगार और नौकरी को ले कर सुलग रहा है जो कब फट पड़े, कहा नहीं जा सकता.

बेरोजगारी की मौजूदा हालत तो चिंताजनक है ही, लेकिन सब से बड़ी चिंता इस बात की है कि जिस तरह हर माह/साल युवाओं की लाखोंकरोड़ों की नई फौजें नौकरियों के लिए कतारों में लग रही हैं उसे आने वाले समय में सरकार कैसे संभालेगी. अब तक तो युवा गांवकसबों में बेरोजगारी के दिन काट रहे थे पर अब शिक्षित व संपन्न होतेहोते ये शहरों की तरफ कूच कर रहे हैं, जबकि शहर पहले से ही बेरोजगारों से गले तक डूबे हुए हैं. ऐसे में इन की भारी भीड़ देश में उठापटक या कहें हिंसक विद्रोह पैदा कर सकती है.

यह सवाल सिर्फ मोदी सरकार के लिए ही नहीं है, बल्कि कोई भी सरकार भला इतनी बड़ी आबादी वाले देश के करोड़ों युवा बेरोजगारों से कैसे निबटेगी? कहीं ऐसा न हो कि आने वाले समय में यही बेरोजगार व शिक्षित युवा देश में अशांति का माहौल पैदा करें. और जिस तरह राजनीतिक दल इन की ऊर्जा, शक्ति व बेरोजगारी का इस्तेमाल अपने राजनीतिक एजेंडों को साधने के लिए कर रहे हैं, उस से भी युवाओं को बहुत दिनों तक बहलायाफुसलाया नहीं जा सकेगा. हाल यह होगा कि एक दिन

यही परेशान, हिंसक व खालीजेब युवा अपना आक्रोश देश के संसाधनों, व्यवस्था व शांति पर उतारेगा. यह भविष्य के लिए खतरे की घंटी है.

– साथ में राजेश कुमार

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हाय मैं पेट से तो नहीं हो गई..?

44 साला उषा अपनी जवान होती बेटी निशा को देख कर सिहर उठती हैं कि कहीं उसे भी उन की तरह शादी के पहले इश्क के चक्कर में पड़ कर पेट से हो कर उन हालात से न गुजरना पडे़ जिन से वे कई साल पहले हो कर गुजरी थीं.

हुआ यों था कि 20 साल पहले बीए करने के बाद उषा को अपने आशिक राकेश से बच्चा ठहर गया था. खुद के पेट से होने का पता उन्हें 4 महीने बाद चला था. वह भी एक सहेली के टोकने पर जिस से उन्होंने कहा था कि 4 महीने से पीरियड नहीं आ रहे हैं और शरीर में थकान व सुस्ती भी रहती है.

सहेली तुरंत भांप गई और राकेश से उन की हमबिस्तरी के बारे में पूछा तो उन्होंने सचसच बता दिया कि हां, कई बार बगैर कंडोम के भी संबंध बने थे.

सहेली ने एक नर्सिंगहोम जा कर उषा के पेशाब की जांच कराई तो रिजल्ट पौजिटिव आया. इस पर उषा के पैरों तले जमीन खिसकने लगी. शुक्र इस बात का था कि घर में किसी को इस बात का अंदाजा नहीं हुआ था.

राकेश को जब उन्होंने यह बात बताई तो उस की भी हालत खस्ता हो गई. वह उषा से सच्चा प्यार तो करता था पर 2 बड़ी बहनों की शादी हो जाने तक भाग कर शादी कर लेने का जोखिम नहीं उठा सकता था. इस पर उन दोनों ने तय किया कि सभी झंझटों से बचने के लिए बेहतर है कि बच्चा गिरा दिया जाए.

पर यह कोई हंसीखेल वाली बात नहीं थी. अपने छोटे से शहर में तो जानपहचान के चलते वे बच्चा गिराने की बात सोच ही नहीं सकते थे, इसलिए राकेश नजदीक के बड़े शहर में गया और कई नर्सिंगहोम में बच्चा गिराने की बात कही लेकिन इस में दिक्कत यह थी कि बगैर लड़की की जांच किए कोई इस के लिए तैयार नहीं था.

उषा की दिक्कत यह थी कि उन्हें किसी बड़ी वजह के बिना शहर से बाहर जाने की इजाजत घर वालों से नहीं मिलने वाली थी.

इस दफा भी सहेली ही काम आई जो उषा के घर बहाना बना कर उन्हें इंदौर ले गई और जैसेतैसे एक नर्सिंगहोम वाले को तैयार किया. 3 दिन अस्पताल में रह कर उन्हें इस मुसीबत से छुटकारा मिला मगर इस दौरान जो तकलीफें उन्होंने उठाईं, वे आज तक जेहन में जिंदा हैं.

बाद में उन्होंने घर वालों के कहने पर चुपचाप सुरेंद्र से शादी कर ली और राकेश को हमेशा के लिए भूल गईं.

और जो नहीं भूल पाईं वह सब उषा अपनी बेटी निशा को बता देना चाहती हैं कि अगर प्यार वगैरह के चक्कर में पड़ जाओ तो पेट से होने से कैसे बचना है, जिस से कोई उंगली न उठे.

इस तरह जानें

उषा का जमाना कुछ और था. तब आज जितनी सहूलियतें और साधन नहीं थे जिन से पेट से हो जाने का पता आसानी से चल सके और पता चल जाने पर बच्चा भी आसानी से गिरवाया जा सके.

आमतौर पर कम उम्र की लड़कियां नहीं जानती हैं कि पेट से हो जाने के लक्षण क्या होते हैं और इस से शरीर में क्याक्या बदलाव आते हैं.

पेट से हो जाने का सब से अहम लक्षण है पीरियड का न आना. अगर आशिक से हमबिस्तरी की है और पीरियड आना बंद हो गया है तो शक की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती कि नतीजा आ गया है.

इस नतीजे की तसल्ली के लिए आजकल तरहतरह की प्रैग्नैंसी टैस्ट किट मैडिकल स्टोर पर मिल जाती हैं जिन से मिनटों में हकीकत का पता चल जाता है. इस किट को खरीदने के लिए किसी डाक्टर के परचे की जरूरत नहीं पड़ती है.

किट पर दी गई हिदायतों के मुताबिक जांच करने पर अगर रिजल्ट पौजिटिव आता है तो बगैर देर किए किसी नर्सिंगहोम का रुख करना चाहिए.

आजकल नर्सिंगहोम वाले फोटो, आईडी और उम्र साबित करने वाला सुबूत मांगते हैं जिन्हें साथ ले जाना चाहिए. इस में किसी का डर या झिझक की बात नहीं है क्योंकि बच्चा गिराने की बात प्राइवेट रखी जाती है.

इस के अलावा कुछ और लक्षण भी दिखते हैं, जैसे निप्पल सख्त हो जाना, बारबार पेशाब लगना, शरीर में सुस्ती और थकान के अलावा लगातार सिरदर्द और सुबह उठने पर थकान महसूस होना. सुबह उठने के बाद जी मिचलाना और उबकाई आना भी खास लक्षण हैं. पर ऐसा सभी लड़कियों के साथ हो, यह जरूरी नहीं.

हमारे समाज में कुंआरी मां बनना आज भी अच्छा नहीं माना जाता है और कई वजहों के चलते यह ठीक भी नहीं है इसलिए संबंध बनाते वक्त एहतियात बरतना चाहिए. पार्टनर को कंडोम पहनने के लिए मजबूर करना चाहिए या खुद किसी लेडी डाक्टर से मिल कर औरल पिल्स ले लेनी चाहिए. इन्हें खरीदने में शर्म या देर नहीं करनी चाहिए. वजह, पेट से हो जाने पर मुसीबतें कई गुना बढ़ जाती हैं.

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यार के लिए पत्नी का वार

कृष्णा आगरा के थाना सदर के अंतर्गत आने वाले मधुनगर इलाके में अपने मांबाप और भाई अवनीत के साथ रहता था. इटौरा में उस की स्टील रेलिंग की दुकान थी जो काफी अच्छी चल रही थी. कृष्णा की अभी शादी नहीं हुई थी. उस की शादी के लिए जिला मैनपुरी के कस्बा बेवर की युवती प्रतिभा से बात चल रही थी. कृष्णा ने अपने परिवार के साथ जा कर लड़की देखी तो सब को लड़की पसंद आ गई. देखभाल के बाद शादी की तारीख भी नियत कर दी गई. फिर हंसीखुशी से शादी हो गई.

नई दुलहन को सब ने हाथोंहाथ लिया, लेकिन कृष्णा की मां ने महसूस किया कि दुलहन के चेहरे पर जो खुशी होनी चाहिए थी, वह नहीं है. जबकि कृष्णा बहुत खुश था. मां ने सोचा कि प्रतिभा जब घर में सब से घुलमिल जाएगी तो ठीक हो जाएगी.

हफ्ते भर बाद जब सारे रिश्तेदार अपनेअपने घर चले गए तो प्रतिभा का भाई उसे लेने के लिए आ गया. किसी ने भी इस बात पर ज्यादा गौर नहीं किया कि प्रतिभा आम लड़कियों की तरह खुश क्यों नहीं है.

वह भाई के साथ पगफेरे के लिए चली गई और 4-6 दिन बाद कृष्णा उसे फिर ले आया. इस के बाद कृष्णा की पुरानी दिनचर्या शुरू हो गई. इसी बीच आगरा की आवासविकास कालोनी का रहने वाला ऋषि कठेरिया उस की दुकान पर आनेजाने लगा. ऋषि ठेके पर मकान बना कर देता था.

धीरेधीरे कृष्णा का ऋषि के साथ व्यापारिक संबंध जुड़ने लगा. ऋषि कृष्णा को स्टील रेलिंग के ठेके दिलवाने लगा.

दूसरी ओर प्रतिभा का व्यवहार परिवार वालों की समझ में नहीं आ रहा था. वह जबतब मायके जाने की जिद करने लगती तो सास उसे समझाती कि शादी के बाद बारबार मायके जाना ठीक नहीं है, ससुराल की जिम्मेदारियां भी संभालनी होती हैं.

एक दिन प्रतिभा ने कृष्णा से कहा कि उसे अपने मांबाप की याद आ रही है, वह अपने मायके जाना चाहती है. इस पर कृष्णा ने कहा कि जब उसे फुरसत मिलेगी, वह उसे छोड़ आएगा.

ठीक उसी समय प्रतिभा के मोबाइल पर किसी का फोन आया तो प्रतिभा ने फोन यह कह कर काट दिया कि वह फिर बात करेगी. लेकिन मायके जाने की बात पर वह अड़ी रही. आखिर कृष्णा ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम तैयारी कर लो, मैं तुम्हें कल तुम्हारे मायके छोड़ आऊंगा.’’

अगले दिन घर वालों की इच्छा के खिलाफ कृष्णा उसे ससुराल ले गया. बस में बैठते ही प्रतिभा का मूड एकदम बदल गया. अब वह काफी खुश थी. शादी के 4 महीने बाद भी कृष्णा अपनी पत्नी के मूड को समझ नहीं पाया था. पर कृष्णा की मां की समझ में यह बात अच्छी तरह आ गई थी कि बहू कुछ तो उन से छिपा रही है.

प्रतिभा ने मायके जाने से पहले फोन द्वारा किसी को खबर तक नहीं दी थी. अत: जब वह मायके पहुंची तो उसे देख कर उस की मां हैरान हो कर बोली, ‘‘अरे दामादजी, आप अचानक ही… फोन कर के खबर तो कर दी होती.’’

इस से पहले कि कृष्णा कुछ कहता प्रतिभा बोली, ‘‘मम्मी, हमारा फोन खराब था, इसलिए खबर नहीं कर पाई.’’

कृष्णा पत्नी की इस बात पर हैरान था कि प्रतिभा मां से झूठ क्यों बोली. उस ने महसूस किया कि उस की सास लक्ष्मी के माथे पर बल पड़े हुए थे.

पत्नी को मायके छोड़ने के बाद कृष्णा जैसे ही आगरा वापस जाने के लिए घर से निकला तो उसे ऋषि दिख गया. उस ने पूछा, ‘‘अरे ऋषि, तुम यहां कैसे?’’

‘‘मैं गुप्ताजी से मिलने आया हूं.’’ उस ने एक घर की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘वह रहा गुप्ताजी का घर.’’

‘‘अरे वो तो प्रतिभा के चाचा का घर है.’’ कृष्णा बोला.

‘‘हां, वही गुप्ताजी. मेरे पुराने जानकार हैं.’’ ऋषि ने कहा.

कृष्णा हैरान था. तभी उस ने पूछा, ‘‘तब तो तुम यह भी जानते होगे कि गुप्ताजी के बड़े भाई मेरे ससुर हैं?’’

‘‘हांहां जानता हूं, प्रतिभा उन की ही तो बेटी है.’’ ऋषि ने लापरवाही से कहा.

‘‘लेकिन तुम ने यह बात मुझे पहले कभी नहीं बताई.’’ ऋषि ने पूछा.

‘‘कभी जरूरत ही नहीं पड़ी.’’ ऋषि ने  कहा तो कृष्णा ने मुड़ कर प्रतिभा को देखा. शक का एक कीड़ा उस के दिमाग में घुस चुका था.

उस ने सामने से जाते हुए ईरिक्शा को रोका और बसअड्डे पहुंच गया. रास्ते भर वह यही सोचता रहा कि यदि ऋषि का प्रतिभा के चाचा के घर आनाजाना था तो यह बात उस ने या प्रतिभा ने उसे क्यों नहीं बताई.

उस के जेहन में यह बात भी खटकने लगी कि मां ने उसे एकदो बार बताया था कि ऋषि उस की गैरमौजूदगी में भी कई बार उस के घर आया था. यह बातें सोच कर वह काफी तनाव में आ गया.

अभी तक तो वह यह समझ रहा था कि नईनई शादी होने की वजह से प्रतिभा को मायके वालों की याद आती होगी, इसलिए उस का मन नहीं लग रहा होगा, लेकिन अब उसे लगने लगा कि उस का जल्दीजल्दी मायके आने का कोई और ही मकसद है.

इसी तनाव में वह घर पहुंचा तो मां ने छूटते ही कहा, ‘‘बेटा, तेरी बीवी के रंगढंग हमें समझ नहीं आ रहे. उस का रोजरोज मायके जाना ठीक नहीं है.’’

उस समय कृष्णा ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि अभी उसे केवल शक ही था, जब तक वह मामले की तह तक नहीं पहुंचता तब तक घर में बता कर बेकार का फसाद फैलाना ठीक नहीं था.

हफ्ते भर बाद वह पत्नी को मायके से लिवा लाया. कुछ दिन बाद पता चला कि प्रतिभा गर्भवती है. पिता बनने की चाह में कृष्णा के मन की कड़वाहट पिघलने लगी. लेकिन उस ने अब ऋषि से घुलमिल कर बातें करनी बंद कर दीं. इधर ऋषि भी समझ गया था कि कृष्णा के तेवर कुछ बदले हुए से हैं, इसलिए वह भी सतर्क हो गया.

शक का कीड़ा जो कृष्णा के दिमाग में रेंग रहा था, वह उसे चैन से नहीं रहने दे रहा था. वह अपनी परेशानी किसी को बता भी नहीं सकता था.

एक दिन कृष्णा के बहनबहनोई घर आए तो बहनोई ने बातों ही बातों में कृष्णा से पूछा, ‘‘आजकल लगता है दुकान पर तुम्हारा मन नहीं लगता. क्या कोई परेशानी है?’’

‘‘नहीं जीजाजी, ऐसी कोई बात नहीं है. दरअसल तबीयत कुछ ठीक नहीं है.’’ कृष्णा ने जवाब दिया.

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‘‘लगता है, प्रतिभा तुम्हारा ठीक से खयाल नहीं रखती.’’ बहनोई ने पूछा तो कृष्णा की मां ने कह दिया, ‘‘अरे दामादजी, खयाल तो वो तब रखे जब उसे मायके आनेजाने से फुरसत मिले.’’

सास की बात प्रतिभा को अच्छी नहीं लगी. उस ने छूटते ही कहा, ‘‘इस घर में किसी को मेरी खुशी भी नहीं सुहाती.’’ कह कर वह दनदनाती हुई अपने कमरे में चली गई. इस से कृष्णा के बहनबइनोई समझ गए कि पतिपत्नी के संबंध सामान्य नहीं हैं.

कृष्णा को पत्नी का यह व्यवहार बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. बहनबहनोई तो चले गए, लेकिन कमरे में आने के बाद उस ने प्रतिभा को दो  तमाचे जड़ते हुए कहा, ‘‘अपना व्यवहार सुधारो वरना अच्छा नहीं होगा.’’

‘‘अब इस से ज्यादा बुरा क्या होगा कि तुम्हारे जैसे आदमी के साथ मेरी शादी हो गई.’’ कह कर प्रतिभा बैड पर जा कर बैठ गई. उस दिन के बाद उन दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं.

दूसरी ओर प्रतिभा रात में देरदेर तक ऋषि के साथ मोबाइल पर बातें करती. एक दिन कृष्णा की नींद खुल गई तो उस ने देखा कि प्रतिभा किसी से बातें कर रही थी. वह समझ गया कि ऋषि से ही बातें कर रही होगी. कृष्णा समझ गया कि प्रतिभा अब आपे से बाहर होती जा रही है. पर करे तो क्या करे, यह उस की समझ में नहीं आ रहा था.

इसी बीच प्रतिभा ने एक बेटी को जन्म दिया. पूरे घर में जैसे खुशी छा गई. बच्ची का नाम राधिका रखा गया. कृष्णा को उम्मीद थी कि मां बन जाने के बाद शायद प्रतिभा के व्यवहार में कोई फर्क आ जाए, पर ऐसा हुआ नहीं. कृष्णा को इस बात की पुष्टि हो गई थी कि ऋषि के साथ प्रतिभा के नाजायज संबंध शादी से पहले से थे. चूंकि ऋषि शादीशुदा था, इसलिए उस के साथ शादी करना प्रतिभा की मजबूरी थी.

प्रतिभा के मांबाप को सब कुछ मालूम था, इसीलिए उन्होंने बेटी को कृष्णा के गले बांध दिया और सोचा कि शादी के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा. लेकिन प्रतिभा का रवैया नहीं बदला.

कृष्णा अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था. वह प्रतिभा को भी खुश रखने का भरसक प्रयास करता था लेकिन अपनी परेशानी घर में किसी को बता नहीं पा रहा था. जबकि प्रतिभा के व्यवहार से कोई भी खुश नहीं था.

धीरेधीरे समय गुजर रहा था. मौका मिलते ही प्रतिभा चोरीछिपे ऋषि से यहांवहां मिल लेती पर वह जानती थी कि कृष्णा जैसे व्यक्ति के साथ वह पूरा जीवन नहीं गुजार सकती. दूसरी ओर ऋषि भी शादीशुदा था, उसे लगता था कि उस का जीवन कटी पतंग की तरह है. प्रेमी ने कभी उसे इस बात के लिए आश्वस्त नहीं किया कि वह उसे अपने साथ रख सकता है.

संभवत: इसी कशमकश में प्रतिभा भी समझ नहीं पा रही थी कि वह करे तो क्या करे. कृष्णा से छुटकारा पाने के बारे में वह सोचने लगी पर वह जानती थी कि मायके वाले भी ऋषि के कारण उस के खिलाफ थे.

इसी बीच कृष्णा ने 25 लाख रुपए में अपनी एक जमीन बेच दी. वह रकम उस ने घर में ही रख दी थी. यह बात प्रतिभा को पता चल गई थी और अचानक उसे लगा कि पति के इस पैसे से वह प्रेमी को बाध्य कर देगी कि वह उस के साथ अपनी दुनिया बसा ले.

प्रेमी को पाने की धुन में वह गुनहगार बनने को भी तैयार हो गई. एक दिन उस ने ऋषि को फोन कर के कहा कि वह उसे बड़ा फायदा करा सकती है.

ऋषि हंसने लगा, ‘‘अरे तुम तो हमेशा ही मुझे खुशियां देती हो.’’

‘‘लेकिन तुम तो मुझे केवल सपने ही दिखाते हो जो आंखें खुलते ही टूट जाते हैं.’’ प्रतिभा ने तल्ख स्वर में कहा.

‘‘प्रतिभा, यह बात तुम अच्छी तरह जानती हो कि मेरी मजबूरियां क्या हैं. मेरी पत्नी है, बच्चे हैं. मैं उन्हें किस के सहारे छोड़ सकता हूं.’’ ऋषि ने कहा.

प्रतिभा गुस्से में भर उठी, ‘‘तो मुझ से प्यार क्यों किया? क्यों मुझे झूठे सपने दिखाए? तुम ने तो सिर्फ अपना मतलब पूरा किया है. तुम्हें तो कभी मुझ से प्यार था ही नहीं.’’

प्रतिभा ने उस दिन ऋषि को साफसाफ कह दिया, ‘‘या तो तुम मुझे अपने साथ रखो अन्यथा मैं तुम्हारी जिंदगी से दूर चली जाऊंगी. समझ लो मैं आत्महत्या भी कर सकती हूं, जिस का दोष तुम्हारे ऊपर आएगा.’’

ऋषि ऐसे किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहता था. अत: उस ने उस दिन प्रतिभा को किसी तरह समझाबुझा दिया कि वह कुछ सोचेगा. तभी प्रतिभा ने धीरे से कहा, ‘‘कृष्णा ने अपनी जमीन बेची है. 25 लाख की बिकी है.’’

ऋषि के कान खड़े हो गए. प्रतिभा ने आगे कहा, ‘‘इन 25 लाख के सहारे हम कहीं दूर जा कर अपनी दुनिया बसा सकते हैं.’’

‘‘तुम पागल हो गई हो क्या, चोरी के इलजाम में जेल भिजवाओगी हमें.’’ ऋषि ने कहा. लेकिन वह जानता था कि प्रतिभा उस के प्यार में अंधी है और थोड़ाबहुत लाभ उसे हो सकता है. ऋषि ने उसे 2 दिन बाद किसी होटल में मिलने को कहा.

इस के बाद ऋषि को भी लालच आ गया. उस ने प्रतिभा से फोन पर बात की. प्रतिभा ने उस से साफ कह दिया, ‘‘मैं तो सिर्फ तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. लेकिन कृष्णा हमारी खुशियों की राह में रोड़ा बना हुआ है.’’

फिर एक दिन बेटी को डाक्टर को दिखाने का बहाना कर प्रतिभा घर से निकली और एक कौफीहाउस में ऋषि से मिली. दोनों ने मिल कर एक षडयंत्र रचा, जिस में कृष्णा को रास्ते से हटाने की बात तय कर ली गई.

नादान प्रतिभा प्रेमी की आशिकी में अंधी हो चुकी थी. उसे भलाबुरा नहीं सूझ रहा था. उस ने यह भी नहीं सोचा कि उस की 9 माह की बेटी का क्या होगा. इधर प्रतिभा के बदले हुए तेवर देख कर एक दिन सास ने कहा, ‘‘बहू, क्या बात है आजकल तू हर वक्त घर से निकलने के बहाने ढूंढती रहती है?’’

‘‘नहीं तो मम्मी, ऐसी कोई बात नहीं है. राधिका की तबीयत ठीक नहीं रहती, इसलिए परेशान रहती हूं.’’ प्रतिभा ने बहाना बनाया.

‘‘देख बहू, हमारे परिवार का समाज में सम्मान है. हमारे परिवार में बहुएं सिर्फ घर के बच्चों और पति के लिए ही जीतीमरती हैं.’’ कह कर सास अपने कमरे में चली गई.

कृष्णा को रास्ते से हटाने की योजना बन चुकी थी और 25 लाख रुपए में से 5 लाख रुपए देने का वादा कर ऋषि ने इस साजिश में अपने दोस्त पवन निवासी रायमा, जिला मथुरा को भी शामिल कर लिया था.

13 फरवरी, 2018 को कृष्णा के पास ऋषि का फोन आया. उस ने बताया कि उसे एक बहुत बड़ा ठेका मिला है. उस बिल्डिंग में स्टील ग्रिल भी लगनी है. अगर तुम यह काम करना चाहते हो तो बात करने के लिए रायमा आ जाओ. कृष्णा ने पहले तो सोचा कि वह उस से कोई संबंध नहीं रखना चाहता, क्योंकि वह विश्वास के काबिल नहीं है. पर फिर उसे लगा कि पारिवारिक बातों को व्यापार से अलग ही रखना चाहिए. अत: उस ने कह दिया कि वह शाम तक रायमा पहुंच जाएगा.

कृष्णा ने घर से निकलते वक्त अपनी मां को बता दिया कि एक सौदा करने के लिए वह रायमा जा रहा है. पति के घर से निकलने के बाद प्रतिभा ने अपने प्रेमी ऋषि को फोन कर के बता दिया कि कृष्णा घर से चल दिया है.

घर में किसी को भी नहीं मालूम था कि कौन सा कहर टूटने वाला था. कृष्णा रायमा पहुंचा तो वहां ऋषि, पवन और रायमा निवासी टिल्लू बातों में उलझा कर कृष्णा को खेतों की ओर ले गए. लेकिन तभी वहां कुछ लोग आ गए और वे अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके. जब रात में कृष्णा घर पहुंचा तो उसे देख कर प्रतिभा हैरान रह गई. देर रात को प्रतिभा ने ऋषि को फोन किया तो उस ने प्रेमिका को सारी बात बता दी.

अगले दिन ऋषि ने कृष्णा के फोन पर बता दिया कि उस की पवन से बात हो गई है. वह अब अपने घर में रेलिंग लगाने का ठेका देने को तैयार हो गया है, तुम आ जाओ.

सीधासादा कृष्णा बिना कुछ सोचेसमझे 14 फरवरी, 2018 को अपनी मां से रायमा जाने की बात कह कर घर से निकल गया, जहां स्टेशन पर ही उसे ऋषि मिल गया. ऋषि उसे बातों में लगा कर इधरउधर घुमाता रहा. तब तक शाम हो गई. तभी पवन का फोन आ गया. उस के कहे मुताबिक, ऋषि कृष्णा को खेतों की तरफ ले गया. तब तक अंधेरा होने लगा था.

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तभी वहां उसे पवन दिखाई दिया, जिस ने इशारा कर के उन्हें सड़क पार कर खेत में आने को कहा. कृष्णा को जब तक कुछ समझ में आता तब तक काफी देर हो चुकी थी. वहीं टिल्लू भी आ गया तो कृष्णा ने कहा, ‘‘अगर तुम्हें सौदा मंजूर है तो अब जल्दी से कुछ एडवांस दे दो. रात भी हो रही है, मुझे घर पहुंचना है. प्रतिभा इंतजार कर रही होगी.’’

यह सुनते ही पवन हंसने लगा, ‘‘ओह क्या सचमुच तेरी बीवी तेरा इंतजार करती है. हमें तो यह पता है कि वह ऋषि का इंतजार करती है.’’

कृष्णा की समझ में अब कुछकुछ आने लगा था. उस ने कहा, ‘‘यह क्या बदतमीजी है, जल्दी करो मुझे जाना है.’’ यह कहते हुए वह अपनी बाइक की तरफ बढ़ा लेकिन तीनों झपट कर उसे खेत के अंदर ले गए और डंडों से उस की पिटाई शुरू कर दी. डंडों से पीटपीट कर उन्होंने उस की हत्या कर लाश वहीं छोड़ दी और चले गए.

इधर कृष्णा घर नहीं पहुंचा था. घर से जाने के बाद उस ने कोई फोन भी नहीं किया था. उस का फोन भी स्विच्ड औफ आ रहा था. सभी रिश्तेदारों को फोन कर पूछ लिया गया, पर वह कहीं नहीं था. अंतत: आगरा के थाना सदर में उस की गुमशुदगी लिखवा दी गई.

प्रतिभा के मायके वालों को फोन किया गया तो प्रतिभा के भाई ने कहा कि ऋषि से पूछताछ करें. थानाप्रभारी नरेंद्र सिंह ने सभी थानों को वायरलैस द्वारा कृष्णा की गुमशुदगी की सूचना दे दी.

16 फरवरी को पुलिस को रायमा के खेत में एक लाश मिलने की सूचना मिली, जिसे कृष्णा के भाई अवनीश ने पहचान कर शिनाख्त कर दी.

घर वालों से पूछताछ की गई तो कृष्णा की मां ने कहा कि कृष्णा ने उसे बताया था कि रेलिंग का ठेका लेने के लिए वह रायमा जा रहा है. पर वह कहां जा रहा था, उसे पता नहीं था. 13 और 14 फरवरी को भी वह रायमा गया था. 13 को वह देर रात घर लौटा था. वह नहीं बता पाई कि कृष्णा रायमा में किस के पास गया था.

पुलिस टीम हत्यारे की खोजबीन में लग गई. पुलिस की एक टीम बेवर भेजी गई तो प्रतिभा के भाई ने कहा कि उन्हें इस बारे में कुछ भी नहीं पता, लेकिन यदि कृष्णा के दोस्त ऋषि से पूछताछ की जाए तो कुछ पता चल सकता है. जांच अधिकारी ने महसूस किया कि प्रतिभा के मायके वाले कुछ छिपा रहे हैं.

इस के बाद थानाप्रभारी ने कृष्णा के घर जा कर प्रतिभा से पूछताछ की तो महसूस किया कि उसे पति की मौत का जैसे कोई दुख नहीं था. इसी बीच पुलिस को एक मुखबिर ने बताया कि ऋषि की दोस्ती रायमा निवासी पवन के साथ है. अगर उसे हिरासत में लिया जाए तो केस खुल सकता है.

पुलिस ने रायमा में पवन को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ की गई तो पता चला कि मृतक की पत्नी प्रतिभा के साथ ऋषि के नाजायज संबंध थे. मृतक की पत्नी प्रतिभा ने ऋषि को बता दिया था कि कृष्णा ने जो 25 लाख रुपए की जमीन बेची है, उन पैसों से वे एक अच्छी जिंदगी की बुनियाद रख सकते हैं. इस के बाद पवन ने कृष्णा की हत्या की सारी कहानी बता दी.

पुलिस ने 18 फरवरी को प्रतिभा को हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस बीच पुलिस को यह जानकारी भी मिली कि ऋषि ने बाह थाने में अपने अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिस में उस ने बताया था कि वह किसी तरह अपहर्त्ताओं के चंगुल से छूट कर भागा है. मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने ऋषि और टिल्लू को भी गिरफ्तार कर लिया.

प्रतिभा ने योजना बना कर अपने हाथों अपना सुहाग तो उजाड़ दिया, लेकिन उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि जिन 25 लाख रुपयों के लालच में उस ने यह सब किया, वह रकम कृष्णा ने अपने कमरे में न रख कर अपनी मां के पास रख दी थी.

पुलिस ने ऋषि, प्रतिभा, पवन और टिल्लू से पूछताछ के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया. 9 माह की राधिका अनाथ हो चुकी है. मां जेल में है और पिता की हत्या कर दी गई है. बूढ़ी दादी अब कैसे उसे पाल पाएगी, यह बड़ा सवाल है.

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सोलह श्रृंगार वाला बाबा

‘‘कुलदीप सिंह, तुम्हारा भांडा फूट चुका है.’’ पुलिस अफसर ने कड़क लहजे में कहा, ‘‘हम तुम्हें युवराज सिंह को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार करने आए हैं.’’

‘‘भक्त, तुम भोले हो. तुम्हें हमारे बारे में किसी ने गलत सूचना दी है.’’ कुलदीप सिंह ने पुलिस अफसर को अपनी मीठी बातों से फुसलाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘हम तो माताजी हैं, माताजी मतलब मातेश्वरी.’’

‘‘न तो मैं तुम्हारा कोई भक्त हूं और न तुम कोई मातेश्वरी हो.’’ पुलिस अफसर ने सख्ती से कुलदीप सिंह को बांह पकड़ कर उठाते हुए कहा, ‘‘औरत का वेश धारण कर के तुम लोगों को बेवकूफ बनाते हो, खुद को लिपस्टिक बाबा और माताजी बताते हो.’’

‘‘साहब, मेरी बात तो सुनो,’’ कुलदीप सिंह गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘मैं ने कोई अपराध नहीं किया है. मुझे थाने मत ले जाओ, मेरी सारी इज्जत खराब हो जाएगी. हजारों लोग मेरे भक्त और अनुयाई हैं. वे मेरे बारे में बुराभला सोचेंगे.’’

‘‘अब ज्यादा नाटक करने की जरूरत नहीं है. चुपचाप चल कर बाहर खड़ी पुलिस की गाड़ी में बैठ जाओ, वरना हमें तुम्हारे जैसे पाखंडियों को ठीक करना आता है.’’ पुलिस अफसर ने उसे कमरे से बाहर निकालते हुए कहा.

कुलदीप सिंह ने खुद को देवी का रूप बता कर पुलिस टीम को अपने प्रभाव में लेने की काफी कोशिश की, लेकिन दाल गलती नहीं देख उस ने पुलिस के साथ जाने में ही भलाई समझी.

वह सिर नीचा कर अपने घर जय मां शक्ति पावन धाम से बाहर निकला. बाहर पुलिस की कई गाडि़यां खड़ी थीं. पुलिस टीम के कुछ लोग उन गाडि़यों में बैठे थे और कुछ हथियारबंद पुलिस वाले कुलदीप सिंह के मकान को घेरे खड़े थे.

अपने घर से बाहर आ कर कुलदीप सिंह चुपचाप पुलिस की एक गाड़ी में बैठ गया. पुलिस की गाडि़यां उसे ले कर सीधे कोतवाली की ओर रवाना हो गईं. 27 मार्च की दोपहर को पुलिस ने कुलदीप सिंह को राजस्थान के झालावाड़ शहर में उस के मकान से पकड़ा था.

पुलिस अधिकारी कुलदीप सिंह को ले कर सीधे कोतवाली थाने आ गए. कोतवाली में डीएसपी छगन सिंह राठौड़ और अन्य पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप सिंह से पूछताछ की. इस के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने उस का मोबाइल भी जब्त कर लिया.

पुलिस द्वारा कुलदीप सिंह उर्फ मातेश्वरी को उस के घर से पकड़ कर ले जाने की बात पूरे शहर में फैल गई. लोग तरहतरह की चर्चा करने लगे.

दरअसल, चर्चा का कारण यह था कि कुलदीप सिंह शहर का जानापहचाना शख्स था. वह पिछले कई सालों से तंत्रमंत्र से लोगों के कष्टों का निवारण करने का दावा करता आ रहा था. खुद को वह मातेश्वरी के रूप में प्रचारित करता था. अधिकांश समय वह औरत का वेश धारण कर के कथित तंत्रमंत्र करता था. उस ने अपने घर का नाम भी मां शक्ति पावन धाम लिखवा रखा था. कुछ अनुयाई उसे लिपस्टिक बाबा भी कहते थे. उस के अनुयायियों में पुरुषों के साथ बड़ी संख्या में महिलाएं भी थीं.

कुलदीप सिंह कौन था, उस के बारे में जानने से पहले यह जान लें कि उसे पुलिस ने गिरफ्तार क्यों किया.

झालावाड़ शहर में पंचमुखी बालाजी के सामने रहने वाले सोहन सिंह राजपूत जयपुर बिजली वितरण निगम में कर्मचारी हैं. सोहन सिंह का छोटा सा परिवार था. पत्नी शीला सिंह, बड़ी बेटी और छोटा बेटा.

बेटी की उन्होंने शादी कर दी थी. एकलौता बेटा युवराज सिंह ही उन के भविष्य का सहारा था. युवराज होनहार था. उस ने बीसीए कंपलीट कर ली थी. इस के बाद वह जयपुर से एमसीए करने की तैयारी में जुटा था.

सोहन सिंह चाहते थे कि बेटे की शादी कर दी जाए. युवराज 23 साल का हो गया था. सोहन सिंह बेटे के विवाह के लिए ऐसी लड़की तलाश रहे थे, जो उन के परिवार को भी संभाल सके और युवराज के साथ उस के मातापिता की भी सेवा कर सके. सोहन सिंह ने युवराज के लिए 2-4 रिश्ते देखे भी थे, लेकिन कुछ ऐसी घटनाएं हुईं कि रिश्ता तय नहीं हो सका.

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इस बीच ऐसा कुछ हो गया, जिस की उम्मीद न सोहन सिंह को थी और अन्य किसी घरवाले को. युवराज ने फांसी लगा ली. करीब 17-18 घंटे तक जीवन और मौत से संघर्ष करते हुए वह परिवार वालों को बिलखता छोड़ गया. इस घटना ने सोहन सिंह की सारी खुशियां छीन लीं.

एकलौते बेटे की मौत ने मजबूत कलेजे वाले सोहन सिंह को हिला दिया. वह जानते थे कि युवराज कमजोर दिल का नहीं था, जरूर उसे आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया गया होगा. सोहन सिंह को यह भी पता था कि युवराज कथित तांत्रिक कुलदीप के चंगुल में फंसा हुआ था. कुलदीप सिंह ने युवराज का जीवन नरक बना दिया था.

घर का चिराग बुझने पर सोहन सिंह ने तय किया कि वे पाखंडी कुलदीप सिंह की असलियत सब के सामने उजागर कर के रहेंगे. इस के बाद सोहन सिंह ने मार्च के पहले सप्ताह में झालावाड़ एसपी को एक प्रार्थनापत्र दिया था. एसपी ने सोहन सिंह का वह प्रार्थनापत्र मुकदमा दर्ज कर ने और जांच के लिए झालावाड़ कोतवाली भेज दिया.

कोतवाली में 14 मार्च को सोहन सिंह के प्रार्थनापत्र पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया. प्रार्थनापत्र में सोहन सिंह ने बताया कि उस का 23 साल का एकलौता बेटा युवराज सिंह उर्फ बाबू 19 फरवरी को शाम करीब 7 बज कर 10 मिनट पर बाहर से घर आया.

इस के करीब 10 मिनट बाद ही उस ने घर में फांसी लगा ली. हमें युवराज के फांसी लगाने की घटना का तुरंत पता चल गया. इस पर हम उसे अस्पताल ले गए. दूसरे दिन 20 फरवरी को दोपहर करीब डेढ़ बजे अस्पताल के आईसीयू में इलाज के दौरान उस ने दम तोड़ दिया.

उस समय अस्पताल में सोहन सिंह के परिवार वाले और कुलदीप सिंह के घर में बने मंदिर के 15-20 सेवादार मौजूद थे. एकलौते वारिस की मौत हो जाने पर परिवार के लोग होशोहवास खो बैठे थे. इस का फायदा उठा कर कुलदीप सिंह और मंदिर के सेवादारों ने हमारे परिवार की महिलाओं और अन्य घर वालों पर युवराज सिंह के शव का पोस्टमार्टम न करवाने का दबाव बनाया. इसी वजह से युवराज सिंह के शव का पोस्टमार्टम और थाने में उसी समय रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई गई.

सोहन सिंह ने रिपोर्ट में बताया कि कुलदीप सिंह काफी समय से खुद को माताजी के रूप में देवी बताता है और जादूटोना, तंत्रमंत्र व वशीकरण आदि तांत्रिक क्रियाएं करता है.

रिपोर्ट में बताया गया कि युवराज सिंह पिछले करीब 6 साल से कुलदीप सिंह के गोदाम की तलाई स्थित मंदिररूपी मकान पर जाया करता था. वह कई बार कुलदीप सिंह के घर सो भी जाता था. कुलदीप सिंह अपने मोबाइल से मेरे बेटे युवराज सिंह के वाट्सऐप पर अश्लील मैसेज भेजता था. कभीकभी वह युवराज को रात को बुला कर उस के साथ अश्लील हरकतें और अप्राकृतिक कृत्य भी करता था.

सोहन सिंह जब भी बेटे युवराज की शादी के लिए लड़की देखने जाते तो कुलदीप सिंह घर वालों को भ्रमित करता और युवराज को भी शादी नहीं करने के लिए प्रेरित करता था.

सोहन सिंह ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि कुलदीप सिंह के घर पर बने मंदिर में जाने वाले अधिकतर लड़केलड़कियों ने बताया है कि कुलदीप सिंह दीक्षा देने के बहाने अश्लील हरकतें और अप्राकृतिक कृत्य करने का दबाव बनाता था. मोबाइल पर अश्लील मैसेज भेजता था, मंदिर में आने वाले लड़केलड़कियां उस का विरोध करते तो वह उन्हें मानसिक रूप से प्रताडि़त करता और मारपीट भी करता था. साथ ही लड़कियों को बदनाम करने की धमकी भी देता था.

सोहन सिंह ने अपने घर पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज पुलिस को देते हुए रिपोर्ट में बताया कि युवराज 19 फरवरी की शाम को जब घर पर आया तो मानसिक रूप से परेशान और घबराया हुआ दिखाई दे रहा था.

बाद में कुलदीप सिंह के घर पर बने मंदिर में आने वाले लोगों से पता चला कि युवराज उस दिन कुलदीप सिंह के साथ ही था. कुलदीप सिंह ने उस दिन मंदिर के सदस्यों के सामने युवराज सिंह के साथ गालीगलौज व मारपीट की थी और कहा था कि तू कल मरता है तो आज मर जा, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.

रिपोर्ट में सोहन सिंह ने इस बात का जिक्र भी किया था कि 19 मार्च को युवराज के फांसी लगाने के बाद जब हम उसे अस्पताल ले गए थे तो वहां मेरे भाई खेमराज सिंह के सामने मोहित गुर्जर ने युवराज का मोबाइल, पर्स, चेन, कड़ा व अन्य चीजें निकाली थीं.

मेरे भाई खेमराज ने युवराज की ये चीजें अस्पताल में मौजूद युवराज की मां को देने को कहा था, लेकिन रात साढ़े 8 बजे से रात डेढ़ बजे तक वे सभी चीजें मोहित के पास ही रहीं. इस बीच कुलदीप सिंह, अभय सिंह, अमित, सत्यनारायण, भानू जांगिड़ वगैरह अस्पताल आए थे.

उन्होंने युवराज के मोबाइल की काल डिटेल्स, वाट्सऐप, इंस्टाग्राम आदि का डेटा खत्म कर दिया था. इस के अलावा उसी रात हमारे घर की सीसीटीवी फुटेज में कुलदीप सिंह की बहन रानू और मंदिर के सदस्यों का युवराज के फांसी लगाने वाले कमरे में जाने का पता चला.

इस से यह संदेह है कि इन्होंने युवराज का सुसाइड नोट गायब कर दिया. झालावाड़ कोतवाली में सोहन सिंह के प्रार्थनापत्र पर 5 लोगों तांत्रिक कुलदीप सिंह राजपूत, अभय सिंह राजपूत, सत्यनारायण, भानू जांगिड़ और अमित के खिलाफ भादंसं की धारा 306 एवं 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

चूंकि घटना 19 फरवरी की थी और पुलिस में रिपोर्ट 14 मार्च को दर्ज हुई थी, इसलिए आरोपियों की ओर से अधिकांश सबूत नष्ट किए जाने की आशंका थी. पुलिस ने इस की जांचपड़ताल शुरू कर दी.

इस बीच युवराज के घर वालों और समाज के लोगों ने अपने हाथों में तख्तियां ले कर न्याय दिलाने की मांग की. इन में युवराज के पिता सोहन सिंह और उन के परिवार के अलावा समाज की महिलाएं भी शामिल हुईं. इन लोगों ने तांत्रिक कुलदीप सिंह और उस के साथियों पर युवराज को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए पुलिस की ओर से कोई काररवाई नहीं करने पर विरोध जताया.

दूसरी ओर 19 मार्च को जय मां शक्ति पावन धाम से जुड़े कुलदीप सिंह, अभय सिंह सिसोदिया व सत्यप्रकाश शर्मा ने एसपी को परिवाद दे कर सोहन सिंह की ओर से दर्ज कराई गई रिपोर्ट को मिथ्या और भ्रामक बताया. उन्होंने युवराज की आत्महत्या मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की.

22 मार्च को विभिन्न संगठनों ने झालावाड़ शहर में रैली निकाल कर प्रदर्शन किया और मिनी सचिवालय पहुंच कर जिला कलेक्टर को ज्ञापन दिया. इस में आरोपियों के खिलाफ काररवाई की मांग की गई. रैली में हाड़ौती महासभा अध्यक्ष तेज सिंह हाड़ा, बारां से मदनमोहन, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के नंद सिंह राठौड़, करणी सेना की अनीता झाला, महेश हाड़ा, नारायण लाल, नारायण राठौड़, श्याम राठौड़, सुनील राठौड़ सहित झालावाड़, बूंदी, बारां व कई अन्य शहरों के लोग बड़ी संख्या में शामिल थे.

युवराज की आत्महत्या के मामले में लगातार हो रहे प्रदर्शन और लोगों में आक्रोश को देखते हुए पुलिस ने अपनी जांचपड़ताल में तेजी ला कर उज्जैन की एक युवती सहित कथित तांत्रिक द्वारा पीडि़त कई लोगों के बयान दर्ज किए.

इन बयानों से इस बात की पुष्टि हो गई कि तांत्रिक कुलदीप सिंह ने 19 फरवरी को युवराज से गालीगलौज और मारपीट कर उसे आत्मघाती कदम उठाने के लिए मजबूर किया गया.

आवश्यक सबूत जुटाने के बाद पुलिस ने 29 मार्च को तांत्रिक कुलदीप सिंह राजपूत को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया था. तांत्रिक कुलदीप सिंह कौन था, यह जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा.

झालावाड़ शहर में गोदाम की तलाई में रहने वाला कुलदीप सिंह 7-8 साल से तंत्रमंत्र के जरिए लोगों के कष्टों का निवारण करने का दावा करता था. शहर में हजारों लोग उस के अनुयाई बन गए थे. अनुयायियों की ओर से शहर में फ्लेक्स लगा कर तांत्रिक बाबा का प्रचारप्रसार किया जाता था. इस से उस के भक्तों की संख्या बढ़ने लगी थी.

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कुलदीप सिंह खुद को मातेश्वरी और जगदंबा का रूप बताता था. उस ने अपने मकान का नाम जय मां शक्ति पावन धाम रखा हुआ था और घर में ही मंदिर बना रखा था. वह बडे़बड़े बाल रखता था. दिन में भी वह अकसर महिलाओं के कपड़े पहने रहता था.

वह होंठों पर लिपस्टिक लगाता था, इसीलिए कई भक्त उसे लिपस्टिक बाबा के नाम से भी पुकारते थे. नाक में बाली, कान में कुंडल, माथे पर बिंदिया, पैरों में पायल व बिछिया सहित वह महिलाओं के पूरे 16 शृंगार करता था. तांत्रिक बाबा के शृंगार के लिए ब्यूटी पार्लर से महिलाएं आती थीं.

औरत का वेश धारण कर बाबा माता का दरबार लगाता और तंत्रमंत्र करता था. आरोप है कि मंदिर पर आने वाले लोगों पर वह तांत्रिक क्रियाएं करता था. इस से अधिकतर लोग तथाकथित वशीकरण में रहते थे. उस के अनुयायियों में बड़ी संख्या जवान लड़केलड़कियों की थी.

कुलदीप सिंह महिला का वेश धारण कर, 16 शृंगार कर के साल में एक बार गुरुदीक्षा शोभायात्रा निकालता था. शोभायात्रा में उस के अनुयाई शामिल होते थे.

तांत्रिक कुलदीप सिंह ने गुरुदीक्षा देने का कार्यक्रम मई 2010 में शुरू किया था. गुरुदीक्षा का कार्यक्रम अब तक करीब 9 बार हो चुका था. इस कार्यक्रम में अगले साल की दीक्षा की तिथि घोषित कर दी जाती थी ताकि सभी लोगों को पता रहे. इस बीच, एक साल तक गुरुदीक्षा कार्यक्रम का व्यापक प्रचारप्रसार किया जाता था.

आरोप है कि दीक्षा के बहाने वह रात को कमरे में लड़केलड़कियों से अश्लील हरकतें करता था. इस दौरान कोई उस का विरोध करता था तो वह उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त कर मारपीट करता था. लड़कियों को बदनाम करने की धमकी देता था. वह कष्टों का निवारण करने और गुरुदीक्षा के नाम पर लोगों से पैसे भी लेता था.

जांचपड़ताल और पूछताछ में कुलदीप सिंह के 3 बैंकों में खाते होने और अनुयायियों के पैसों से करीब साढ़े 4 बीघा जमीन खरीदने का पता चला. यह जमीन उस ने देवरीघटा बिलोनिया गांव के पास खरीदी थी.

इस के लिए उस ने 25-30 अनुयायियों से एकएक लाख रुपए लिए थे और वहां माता का भव्य मंदिर बनाने के बाद सभी को एकएक प्लौट देने का वादा किया था. जमीन की रजिस्ट्री कुलदीप सिंह के खुद के नाम से थी. पुलिस ने कुलदीप के बैंक खाते सील करा दिए.

गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने तांत्रिक कुलदीप सिंह को 3 दिन के रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि पूरी होने पर पुलिस ने 30 मार्च को उसे अदालत में पेश किया. पुलिस के निवेदन पर अदालत ने उसे फिर 3 दिन के रिमांड पर पुलिस को सौंप दिया. बाद में 2 अप्रैल को उसे न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया.

मृतक युवराज के पिता सोहन सिंह ने पुलिस को सबूत के तौर पर एक डायरी सौंपी. तांत्रिक कुलदीप अपने अनुयायियों को इसी तरह की डायरियों के माध्यम से तांत्रिक विद्या सिखाता था. पुलिस ने इस डायरी की बाकायदा जांच की. कुलदीप सिंह के मोबाइल की भी जांच की गई.

4 अप्रैल को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट स्वाति शर्मा ने कुलदीप सिंह की जमानत अरजी खारिज कर दी. मृतक युवराज के पिता फरियादी सोहन सिंह के अधिवक्ता राजेंद्र सिंह झाला ने बताया कि सीजेएम ने अपने आदेश में कहा कि प्रकरण में अनुसंधान चल रहा है. साक्ष्य की विस्तृत विवेचना किए बिना और प्रकरण की गंभीरता तथा इस से समाज पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को ध्यान में रखते हुए अभियुक्त कुलदीप सिंह को जमानत का लाभ दिया जाना, न्यायोचित नहीं है.

जेल में न्यायिक अभिरक्षा भुगत रहे तांत्रिक कुलदीप की मुसीबतें खत्म होने के बजाए और बढ़ गई हैं. उस के खिलाफ 13 अप्रैल को एक और मुकदमा झालावाड़ के महिला पुलिस थाने में दर्ज हुआ. अदालती इस्तगासे के माध्यम से झालावाड़ की एक युवती ने कुलदीप सिंह के खिलाफ गलत हरकत और छेड़खानी करने का मुकदमा दर्ज कराया.

इस महिला ने इस्तगासे में बताया कि वह कुलदीप सिंह के मंदिर जय मां शक्ति पावन धाम पर जाती थी. वहां कुलदीप सिंह ने उस पर बुरी आत्मा का प्रभाव बता कर उस का निवारण करने की बात कही. कष्ट निवारण के बहाने कुलदीप सिंह उस युवती को एक व्यक्ति के मकान पर ले गया. वहां उस ने उस युवती को 5-6 अन्य युवतियों के साथ एक कमरे में खुद को बंद कर दिया.

इस के बाद उस युवती की आंखों पर पट्टी बांध कर कहा गया कि अब बुरी आत्मा प्रकट होगी. वह किसी के साथ कोई भी गलत हरकत कर सकती है. इस दौरान तांत्रिक ने काफी डरावनी आवाजें निकालीं.

इस प्रक्रिया के बीच युवती से छेड़खानी एवं गलत हरकतें कीं. युवती के विरोध करने पर तांत्रिक ने धमकी दी कि अगर यह बात किसी को बताई तो वह तंत्र विद्या से उस के परिवार को तबाह कर देगा.

परिवादी युवती के अधिवक्ता राजेंद्र सिंह झाला ने बताया कि 16 अप्रैल को पीडि़ता के बयान अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट के समक्ष दर्ज कराए गए.

इस मामले में महिला थाना पुलिस आरोपी तांत्रिक कुलदीप सिंह को 26 अप्रैल को प्रोडक्शन वारंट पर ले कर आई. पूछताछ के बाद उसी दिन उसे अदालत में पेश किया गया. अदालत ने उसे फिर जेल भेज दिया.

इस मामले की जांच महिला थाने की कृष्ण चंद्रावत कर रही हैं. युवराज को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले की जांच कोतवाली के सब इंसपेक्टर नैनूराम कर रहे हैं.

तांत्रिक कुलदीप सिंह के खिलाफ दोनों ही मामलों में पीडि़तों की पैरवी कर रहे झालावाड़ के वरिष्ठ अधिवक्ता राजेंद्र सिंह झाला का कहना है कि धर्म के नाम पर लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले ऐसे ढोंगी बाबाओं को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

एकलौते बेटे युवराज को खो चुके दुखियारे पिता सोहन सिंह का कहना है कि इस मामले में अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार कर सख्ती से पूछताछ की जाए तो तांत्रिक के कई अनछुए राज और उजागर हो सकते हैं. न्यायपालिका पर पूरा भरोसा रखने वाले सोहन सिंह कहते हैं कि मेरा बेटा तो चला गया, अब ऐसे पाखंडियों को सजा दिलाना ही उन का मकसद है.

–  कथा पुलिस सूत्रों, युवराज के पिता से की गई बातचीत और दस्तावेजों पर आधारित

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क्या आपको पता है सनी लियोनी के जीवन की ये कहानी

बौलीवुड अदाकारा सनी लियोनी को आज कौन नहीं जानता. पौर्न इंडस्ट्री से बौलीवुड में अपनी पहचान बनाने वाली सनी जल्द ही वेब सीरीज के जरिए अपनी जिंदगी की कहानी लेकर आ रही हैं. उनकी वेब सीरीज का नाम है ‘करनजीत कौर- द अनटोल्ड स्टोरी आफ सनी लियोनी.

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वेब सीरीज ‘करनजीत कौर- द अनटोल्ड स्टोरी आफ सनी लियोनी 16 जुलाई को जी5 के ऐप पर रिलीज की जाएगी. सनी लियोनी पर बन रही इस बायोपिक का ट्रेलर रिलीज हो चुका है. ट्रेलर में बचपन, परिवार और पोर्न स्टार बनने के सफर को दिखाया गया है. एक दिन में ही सनी की बायोपिक के ट्रेलर को 6,371,088 व्यूज मिल चुके हैं.

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ट्रेलर की शुरूआत होती है, शो के ग्रीनरूम से, जहां सनी लियोनी नजर आती हैं. इसमें सनी लियोनी एक टीवी चैनल को इंटरव्यू देती नजर आती हैं. ट्रेलर में सनी का इंट्रो देते हुए बताया जाता है कि जहां सनी को इंडिया में बहुत प्यार मिला है, उतनी ही नफरत भी मिली है. इसके बाद स्क्रीन पर सनी के बचपन के कुछ किस्से दर्शाए जाने लगते हैं. ट्रेलर में दिखाया जाता है कि सनी सनी बन कर नहीं बल्कि करणजीत वोहरा बन कर पैदा हुई थीं.


करणजीत के परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं रहती. ऐसे में करणजीत कैसे सनी बनती है इसकी एक झलक ट्रेलर में यह दिखाई गई है. सनी की जिंदगी में उनके सामने आने वाले सवालों को दर्शाने वाली इस वेब सीरीज का ये ट्रेलर झंझोर कर रख देगा. वहीं इन सवालों का सनी बेहद खूबसूरती से जवाब देती हैं जो कि काबिल-ए-तारीफ है.

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केजरीवाल-बैजल-मोदी

दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुरी तरह खार खाए हुए हैं. मई 2014 में हुए आम चुनावों में शानदार जीत हासिल करने के बाद कुछ महीनों में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें जीतने वाली पार्टी को 67 के मुकाबले 3 पर खड़ा कर दिया तो भाजपा की नाक शूर्पणखा की तरह कट गई. संविधान के लिखित प्रावधानों की आड़ में अब अरविंद केजरीवाल की सीता (सरकार) को हरने का प्रयास किया जा रहा है.

अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में कोई चमत्कार नहीं किया लेकिन संविधान ने भी वास्तव में दिल्ली सरकार को बहुत कम अनियंत्रित अधिकार दिए हैं. वहीं जिन अधिकारों को प्रधानमंत्री के निर्देश पर उपराज्यपाल को कभीकभार इस्तेमाल करना चाहिए था, उन्हें रोज हर काम में किया जा रहा है. हर फाइल पर उपराज्यपाल महीनों बैठे रहते हैं और फैसले पर नुक्ताचीनी करते हैं.

नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार दिल्ली सरकार के साथ उस महापंडित की तरह व्यवहार कर रही है जो हर स्मृति, हर कुंडली, हर रिवाज को खोले बैठा है. मोदी की सरकार केजरीवाल की सरकार के हर फैसले को गलत ठहराने में लगी है, क्योंकि उस का उद्देश्य तो अरविंद केजरीवाल व उन की सरकार को हर जगह अपमानित करने का है. नरेंद्र मोदी सरकार ऐसा हर उस राज्य सरकार के साथ कर रही है जो अपने विज्ञापनों में भगवा रंग का इस्तेमाल नहीं करती और नरेंद्र मोदी का फोटो नहीं लगाती है.

दिल्ली के मुख्यमंत्री उपराज्यपाल के निवास पर धरने पर बैठें, यह राजकाज की पराकाष्ठा है और खासतौर पर तब जब उन के साथ लगभग कैदियों सा व्यवहार हो रहा हो. कानूनीतौर पर राजभवन का खर्च अरविंद केजरीवाल की सरकार देती है पर उपराज्यपाल अपने संवैधानिक मालिक नरेंद्र मोदी के इशारों पर इस सरकार को परेशान करने का काम कर रहे हैं.

अरविंद केजरीवाल अद्भुत किस्म के नेता हैं क्योंकि वे कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी की परंपराओं की जंजीरों में नहीं बंधे. 4 साल तक सरकार चलाने के बावजूद उपचुनाव में भी जीत दर्ज करा रहे हैं. यह भाजपा के लिए घोर चिंता का विषय है और वह नहीं चाहती कि यह नौसिखिया नेता दिल्लीवासियों के लिए अनूठे काम कर पाए.

आम आदमी पार्टी का कोई भी फैसला ऐसा नहीं है जो केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ जाता हो या दिल्ली की जनता के लिए हानिकारक हो. किसी भी फाइल में ऐसी कोई सिफारिश नहीं है जिस में अरविंद केजरीवाल किसी विशेष को लाभ पहुंचाना चाहते हों. अरविंद केजरीवाल केवल अपने (भारी) बहुमत के अधिकार का उपयोग कर रहे हैं पर चूंकि वे भाजपाश्रेष्ठ नहीं हैं, इसलिए उपराज्यपाल अनिल बैजल प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के इशारे पर उन्हें दबा कर रखते हैं.

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मुश्किल दौर में है पाकिस्तान

पाकिस्तान में राजनीतिक प्रक्रिया जिस दिशा में जाती दिख रही है, उससे कुछ लोग भले खुश हों लें, लेकिन देश के भविष्य के मद्देनजर इसमें कई त्रासद संदेश छिपे हैं. अन्य तमाम बातों के अलावा इतना तो साफ दिख रहा है कि किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने जा रहा.

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने जिताऊ के नाम पर अनाप-अनाप टिकट भले बांटे, अब तक अनिश्चितता का शिकार है. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सिंध तक सिमटती दिखाई दे रही है और त्रिशंकु संसद की स्थिति में ही उसे अपना कोई भविष्य दिख रहा है. नवाज शरीफ की पीएमएल-एन के उम्मीदवार कमर-उल-इस्लाम किसी भी वक्त किसी अदालत से दोषी ठहराए जा सकते हैं. ये और ऐसे तमाम मामले हर उस दल के लिए परेशानी और अनिश्चितता का सबब बने हुए हैं, जिनके लोग नेशनल अकांटबिलिटी बोर्ड के राडार पर हैं.

नवाज शरीफ ‘राष्ट्रीय एकता सरकार’ की वकालत करते भले ही दिखाई देने लगे हों, क्योंकि उनकी नजर में मौजूदा चुनौतियों के मद्देनजर किसी एक दल के लिए देश को आगे ले जा पाना संभव नहीं होगा. लेकिन देश के तीनों प्रमुख दलों के बीच की परस्पर कटुता का जो माहौल है, उसमें यह खयाल ही यथार्थ की जमीन से कोसों दूर लगता है.

क्षेत्रीय मुद्दों को छोड़ भी दें तो अमेरिका के साथ असहज संबंध और चुनाव बाद उभरने वाली संभावित चुनौतियों के मद्देनजर भी नई सरकार के लिए आर्थिक मोर्चा टेढ़ी खीर बनने जा रहा है. विदेशी मुद्रा भंडार अक्तूबर 2016 की ऊंचाई से ढुलककर बहुत नीचे आ चुका है और यह अब भी ढलान पर ही है. सच तो यह है कि देश एक बार फिर कटोरा लेकर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के दरवाजे खटखटाने की मजबूरी में आ चुका है, पर अमेरिका से बिगड़े रिश्तों के कारण वहां भी पूर्व शर्तें थोपे जाने की आशंका मंडरा रही है.

मुद्रा कोष पहले ही नेशनल फाइनेंस कमीशन से नाराज बैठा है, और कमजोर सरकार की स्थिति में यह बड़ी मुश्किल साबित होगा. कुल मिलाकर देश मुश्किल दौर में है और इससे बाहर निकलने की कोई सीधी राह फिलहाल तो नहीं दिखती.

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