जब न्यूयार्क की सड़कों पर अचानक थिरकने लगी प्रियंका चोपड़ा…!

बौलीवुड देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा जल्द ही सलमान खान के साथ फिल्म ‘भारत’ की शूटिंग शुरू करेंगी. इससे पहले अभिनेत्री ने अपनी हौलीवुड फिल्म ‘इजन्ट इट रोमांटिक’ की शूटिंग पूरी कर ली है. एक्ट्रेस के फैन-क्लब ने शूटिंग के वीडियो जारी किए हैं, जिसमें प्रियंका को-स्टार्स के साथ थिरकती दिखाई दे रही हैं. इंटरनेट पर वायरल होते वीडियो में प्रियंका न्यूयार्क के ग्रैंड सेंट्रल स्टेशन के करीब शूटिंग करती दिख रही हैं. न्यूयार्क की सड़कों पर प्रियंका अपने को-स्टार्स रेबल विल्सन, एडम डेविन और लियाम हेम्सवर्थ के साथ जमकर डांस-मस्ती कर रही हैं.

प्रियंका ने इंस्टाग्राम पर एक तस्वीर साझा की, जिसमें वह फिल्म के को-स्टार रेबल विल्सन, एडम डेविन और लियाम हेम्सवर्थ के साथ नजर आ रही हैं. अभिनेता एडम ने इसी तस्वीर को साझा करते हुए कैप्शन में लिखा, “इस फिल्म की शूटिंग में बहुत मजा आया. मैं एक बार फिर गाना गाने और नाचने वाला शख्स हूं. ‘इजन्ट इट रोमांटिक’ अगले साल वेलेंटाइन्स डे पर रिलीज होगी.”

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टिप्पणियां टौड स्ट्रौस-स्कल्सन द्वारा निर्देशित फिल्म 14 फरवरी 2019 को रिलीज होगी. फिल्मों के अलावा प्रियंका अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर चर्चाओं में बनी हुई हैं. कथित तौर पर एक्ट्रेस अपनी उम्र से 10 साल छोटे हौलीवुड सिंगर निक जोनास को डेट कर रही हैं.

कश्मीर में गिरी सरकार

भारतीय जनता पार्टी ने पीपुल्स डैमोक्रैटिक पार्टी को धता बता कर जम्मूकश्मीर की साझा सरकार आखिर गिरा दी है. महबूबा मुफ्ती और नरेंद्र मोदी दोनों श्रीनगर की सरकार को चलाने में घुटन महसूस कर रहे थे और यह टूट काफी दिनों से दिख रही थी. सरकार चलाना वैसे भी इस इलाके में आसान नहीं क्योंकि मुसलिम बहुमत वाला यह राज्य हिंदू भारत से अपनापन जोड़ नहीं पाया है और आम जनता अपनी धार्मिक मनमानी के लिए लगातार कुरबानियां देने को तैयार है.

अब लगता है कि भाजपा इस सुलगती आंच पर पैट्रोल डाल कर 2019 की खीर पकाना चाहती है. देशभर में हिंदूमुसलिम तनाव पैदा करने में भाजपा के कट्टर नेताओं को कश्मीर की साझा सरकार मानसिक स्पीड ब्रेकर नजर आ रही थी. अब कश्मीर में मनमाने काम कर के केंद्र सरकार यह जता सकेगी कि देखो, हम ने कश्मीर को कैसे काबू में रख रखा है और 2019 में हमें ही वोट दो ताकि जो कट्टर हिंदू धर्म को न माने उसे भी वही देखना पड़े जो कश्मीरी देख रहे हैं.

भाजपा ने 2014 के बाद सोचा था कि उस का एकछत्र राज आ गया है और अलग धर्मों, जातियों और क्षेत्रों के लोग अपनेआप नए चक्रवर्ती सम्राट के अश्वमेध घोड़े के आगे स्वयं को सुपुर्द कर देंगे. कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान में चुनाव व उपचुनावों में मिली हार ने साबित कर दिया है कि पौराणिक सरकार को बनाए रखने के लिए महाभारत का युद्ध तो लगातार जारी रखना पड़ेगा. जम्मूकश्मीर सरकार की बलि इसी कोशिश का पहला अनुष्ठान है.

अगर नरेंद्र मोदी और महबूबा मुफ्ती लेनेदेने की नीति में विश्वास रखते तो कोई कारण नहीं कि कश्मीर की जनता को मनाया नहीं जा सकता था. मुसलिम देश होने के कारण ही पाकिस्तान किसी का आदर्श नहीं बन जाता. बंगलादेश ने अपनी बंगाली संस्कृति को इसलामाबाद की मुसलिम सरकार से ज्यादा प्राथमिकता दी थी. पाकिस्तान को खुद सिंध, ब्लूचिस्तान और कई छोटे इलाकों को बांधे रखने में दिक्कत होती रहती है. सिर्फ धर्म के कारण कश्मीरी जनता भारत से विद्रोह नहीं कर सकती. जो गुस्सा कश्मीरियों को है उसे नरेंद्र मोदी को सुलझाने का अनूठा मौका मिला था जो उन्होंने गंवा दिया है.

अब कश्मीर तो जल ही सकता है, उस की आग का फायदा देशभर में हिंदूमुसलिम तनाव फैलाने में करा जाए तो आश्चर्य न होगा. विपक्षी दलों को ऐसी हालत में मुसलिम अल्पसंख्यकों का साथ देना होगा और भाजपा फिर उन पर हिंदू विरोधी आरोप जड़ कर 2019 में वोट बटोर सकती है. न देश की जनता के पास, न विपक्षी दलों के पास ऐसी किसी नीति का कोई ठोस बचाव है. वे यही उम्मीद कर सकते हैं कि अपने खुद के आर्थिक विकास में व्यस्त जनता के पास निरर्थक हिंदूमुसलिम विवाद में उलझने का समय और शक्ति नहीं होगी.

देश में कहीं भी सुरक्षित नहीं महिलाएं

10 जनवरी, 2017 दिल्ली : राजधानी में फुटपाथ पर रहने वाली एक किशोरी से गैंगरेप करने के बाद उसे बेबस हालत में छोड़ने की घटना ने झकझोर कर रख दिया. किशोरी  साढ़े 7 माह की गर्भवती थी. रेप के बाद किशोरी ने अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया. आरोपियों ने किशोरी के साथ फुटपाथ पर ही रेप किया और मरने के लिए उसे वहीं छोड़ दिया.

6 जनवरी, 2017 उत्तर प्रदेश : महिलाओं की सुरक्षा के मामले में हमेशा सवालों के घेरे में रहने वाले उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में 4 हैवानों ने पीडि़ता के साथ रेप की कोशिश की लेकिन जब पीडि़ता ने हिम्मत न हारते हुए अपनी आबरू बचाने के लिए उन का विरोध किया तो सनक में डूबे सिरफिरों ने पीडि़ता के कान काट दिए और फरार हो गए.

4 जनवरी, 2017 : नए साल की बदनुमा शुरुआत हुई  सोनीपत में जहां बर्बरता और कायरता का परिचय देते हुए समाज के वहशी दरिंदों, हत्यारों ने एक बुजुर्ग महिला के प्राइवेट पार्ट में टौयलेट क्लीनर की प्लास्टिक की बोतल डाल दी. लगातार ब्लीडिंग की वजह से उस बुजुर्ग महिला की मौत हो गई. पीडि़ता के शव का पोस्टमौर्टम करने वाले डाक्टरों का मानना है कि उन्होंने इस तरह का क्रूर और बर्बर कृत्य अपने जीवन में नहीं देखा. 80 वर्षीय वृद्धा के साथ निर्भया जैसी बर्बरता अपराधियों के बुलंद होते हौसलों का जीताजागता प्रमाण ही है.

4 जनवरी, 2017 : बेंगलुरु में समाज को शर्मसार करने वाला ऐसा वीडियो सामने आया जो किसी भी सभ्य समाज को स्वीकार नहीं होगा. घर से महज कुछ ही दूरी पर एक लड़की अकेली रात में घर की ओर बढ़ रही थी. तभी 2 लड़के स्कूटर से उस के पीछे से आते हैं और आगे जो कुछ भी होता है वह अत्यंत ही निंदनीय है. लड़की से छेड़खानी करने के बाद उसे सड़क पर बेबस हालत में छोड़ कर वे भाग जाते हैं. छेड़छाड़ के दौरान लड़की बचाव की पूरी कोशिश करती है लेकिन सफल नहीं हो पाती. इस घटना का एक अन्य शर्मनाक पहलू यह था कि छेड़छाड़ के दौरान प्रत्यक्षदर्शियों में से कोई भी लड़की की मदद के लिए आगे नहीं आया.

31 दिसंबर, 2016 : बेंगलुरु की भयावह रात जहां सड़कों पर नए साल का जश्न मनाने निकली कई महिलाओं के साथ मध्य बेंगलुरु के एमजी रोड, ब्रिगेड रोड और चर्च स्ट्रीट पर मनचलों ने महिलाओं से छेड़छाड़ की. मनचलों ने महिलाओं पर न केवल भद्दे कमैंट किए बल्कि उन के साथ शारीरिक छेड़छाड़ करने की भी कोशिश की. मदद की गुहार लगाने पर पुलिस ने ऐसी महिलाओं की मदद से परहेज किया. इन घटना की प्रत्यक्षदर्शी गवाह और बेंगलुरु मिरर की फोटोग्राफर अनंता सुब्रमण्यम ने इस घटना के बारे में ट्वीट कर के कहा था, ‘सड़कों पर ‘हैपी न्यू ईयर’ के शोर की जगह ‘हैल्प मी’ ने ले ली थी.’

23 दिसंबर, 2016 लखनऊ : नवाबों की नगरी लखनऊ जिसे तहजीब और नजाकत की नगरी भी कहा जाता है, वहां इस के मिजाज के उलट 23 दिसंबर की रात हैवानियत का खेल खेला गया. कुछ अज्ञात लोगों ने 7 साल की बच्ची के साथ रेप किया और उसे खून से लथपथ हालत में पुलिस थाने के बाहर छोड़ गए. वारदात साढ़े 3 बजे दिन को हुई जब लड़की पास की दुकान से सामान खरीदने गई थी. मासूम बच्ची पुलिस को थाने के पास झाडि़यों में मिली, उसे तुरंत अस्पताल में भरती कराया गया.

16 दिसंबर, 2012 निर्भया कांड के बाद एक मध्यवर्गीय मानसिकता के साथ ही सही मगर कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक लोग सड़कों पर उतरे थे और इंसाफ की मांग इसलिए की थी कि आज यह किसी और की बेटी के साथ ऐसा हुआ है तो कल हमारी बेटी के साथ भी हो सकता है. उस दौरान पीडि़ता के परिवार के साथ किया गया वादा अभी भी अधूरा है. तमाम कमेटियां बनाई गईं, कानून बने. बावजूद इस के, महिलाओं के खिलाफ दिनोंदिन बढ़ते अपराध निर्भया के बलिदान को मुंह चिढ़ा रहे हैं.

भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के मुताबिक, साल 2015 में भारत में बलात्कार के कुल 34 हजार 651 मामले दर्ज किए गए. बलात्कार पीडि़तों की आयु 6 से ले कर 60 साल तक की थी. इस के अलावा महिलाओं से जुड़े अपराधों की संख्या 3 लाख 27 हजार रही. देश में हर दिन औसतन 93 औरतें बलात्कारियों का शिकार बन रही हैं.

ये आंकड़े यह चीखचीख कर बता देते हैं कि भारत ही नहीं, दुनिया के किसी भी कोने में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. पिछले साल 6 अक्तूबर को बीए में पढ़ने वाली एक लड़की ने बिहार के वैशाली के थानाइंचार्ज रंजीत कुमार पर आरोप लगाया कि रंजीत उसे शादी का झांसा दे कर 2 सालों तक उस का यौनशोषण करता रहा. लड़की ने वैशाली थाना में यौनशोषण के लिए एफआईआर दर्ज करा दी है.

लड़की ने एफआईआर में लिखा है कि एक बार वह छेड़खानी की रिपोर्ट दर्ज कराने थाने गई थी. उस के बाद केस की जांच के बहाने रंजीत कुमार रोज उस के मोबाइल फोन पर कौल करने लगा और काफी देर तक बातें करता रहता. केस के सिलसिले में उसे कई दफे थाना बुलाया और कई दफे रंजीत उस के घर पर भी पहुंच गया. इसी दौरान दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और बात विवाह तक पहुंच गई. विवाह करने की बात कह कर रंजीत ने 2 सालों तक उस के शरीर से खिलवाड़ किया और बाद में मुकर गया.

आम इंसान तो दूर, पढ़ेलिखे और समझदार लोग भी यौनशोषण के शिकार हो जाते हैं. साल 2015 के जनवरी महीने में बिहार के भभुआ जिले की महिला डीएसपी, निर्मला कुमारी (2006 बैच की बिहार पुलिस सेवा की औफिसर) ने कैमूर के एसपी, पुष्कर आनंद (2009 बैच के आईपीएस औफिसर) पर उस से विवाह करने का झूठा भरोसा दे कर अंतरंग संबंध बनाने का आरोप लगा कर बिहार सरकार और पुलिस मुख्यालय में हड़कंप मचा दिया था. सूबे में किसी महिला पुलिस औफिसर के अपने ही सीनियर औफिसर पर यौनशोषण करने का आरोप मढ़ने का पहला वाकेआ सामने आया था. डीएसपी ने भभुआ के महिला थाने में दर्ज एफआईआर में एसपी पर यौनशोषण का आरोप लगाया और यह भी लिखा कि जब उस ने शादी से मुकरने का उस का विरोध किया तो एसपी ने कैरियर खराब करने की धमकी दे कर उस का मुंह बंद करने की पुरजोर कोशिश की.

निर्मला ने एसपी के पिता उमाकांत मेहता और माता के खिलाफ भी आईपीसी की धारा 376 (2)बी, 120 (बी) 354 (ए), 354 (डी) और 509 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई थी.

निर्मला ने एफआईआर में कहा कि एसपी पुष्कर आनंद ने उस के जौइन करने के 2 दिनों के बाद से ही फेसबुक और व्हाट्सऐप के जरिए उस से दोस्ती और नजदीकी बढ़ानी शुरू कर दी थी. कुछ दिनों बाद एसपी ने उस से विवाह करने की इच्छा जाहिर की और उन्होंने अपने घर वालों को भी इस बारे में बताया. उस के बाद एसपी के घर वालों ने उस की जन्मकुंडली मांगी थी. दोनों के विवाह की बात आगे बढ़ने के बाद दोनों और नजदीक आए. विवाह की बात के आगे बढ़ने के बाद दोनों के बीच अंतरंग रिश्ते भी बने.

जन्मकुंडली देने के कुछ दिनों के बाद ही जब महिला पुलिस औफिसर के परिवार वालों ने एसपी के परिवार वालों से मिल कर विवाह की तारीख पक्की करने के बारे में बात की तो यह कह कर विवाह से इनकार कर दिया गया कि पुष्कर और निर्मला की जन्मकुंडली मिली ही नहीं. इस वजह से दोनों की शादी मुमकिन ही नहीं है.

एसपी ने सफाई दी थी निर्मला काम के सिलसिले में अकसर उन के चैंबर में आतीजाती थी. इसी बीच लगता है कि उसे किसी बात को ले कर गलतफहमी हो गई. कुछ समय के बाद इसी बीच निर्मला ने उन से शादी की बात की, पर उन्होंने इस की अनदेखी कर दिया. इस के बाद भी वह मौकेबेमौके शादी की इच्छा जाहिर करती रही. बाद में उस ने शादी के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया.

एसपी का दावा है कि निर्मला पहले भी कई मामलों में विवादित रह चुकी है. इस मामले पर भले ही पुलिस महकमे ने परदा डाल कर अपनी किरकिरी होने से बचा लिया लेकिन इस मामले ने इस बात का तो भंडाफोड़ कर ही दिया कि महिला कहीं भी सुरक्षित नहीं है, चाहे वह समाज और दुनिया को सुरक्षा देने का दावा करने वाला पुलिस महकमा ही क्यों न हो?

बदलाव की समीक्षा

मानव विकास संस्थान यानी आईएचडी द्वारा ‘मेकिंग सिटीज सेफ ऐंड इन्क्लूसिव: पर्सपैक्टिव फ्रौम साउथ एशिया’ विषय पर दिल्ली में आयोजित सैमिनार में दिल्ली व पटना जैसे शहरों में गरीबी, असमानता व हिंसा पर जम कर बहस चली. सैमिनार में प्रस्तुत रिसर्चपेपर के जरिए यह बताने की कोशिश की गई कि दिल्ली में 2012 में हुई रेप की घटना का कईर् सामाजिक संगठनों ने पुरजोर विरोध किया था और उस के बाद फौजदारी कानून में कई संशोधन किए गए.

सवाल यह उठता है कि क्या महिलाओं की सुरक्षा के लिए चलाए गए अभियानों या सरकार की ओर से महिला सुरक्षा को ले कर उठाए गए कदमों से महिलाओं में अपने साथ हुई छेड़छाड़, बलात्कार की वारदातों की रिपोर्ट दर्ज कराने की हिम्मत आई है? क्या लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाले अपराध की बढ़ोतरी से उन के परिजनों में खौफ का माहौल बना है? क्या इसी खौफ की वजह से कई जगहों पर लड़कियों को घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी गई है?

एवौन इंडिया की प्रशिक्षण प्रमुख नीतू पाराशर कहती हैं कि यह बहुत ही गंभीर मामला है. वाकई में आज के समय में महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. औफिस से निकलते समय डर लगता है कि सहीसलामत घर पहुंच सकेंगे कि नहीं. वर्तमान माहौल और महिलाओं के प्रति लोगों के व्यवहार के कारण महिलाओं का घर से बाहर निकलना व सड़क पर चलना असुरक्षित हो गया है.

डर के साए में

आईएचडी के सर्वे के मुताबिक, पटना में 66.8 प्रतिशत लोग खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. 16.3 फीसदी लोगों का मानना है कि उन्हें कभीकभार सुरक्षा को ले कर डर होता है जबकि 16.5 फीसदी लोग खुद को पूरी तरह से असुरक्षित मानते हैं. दूसरी तरफ पटना के स्लम इलाके में रहने वाले लोगों में से 35.4 फीसदी ही खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. 33.3 फीसदी लोगों को कभीकभी सुरक्षा का डर सताता है और 31.2 फीसदी लोग हमेशा असुरक्षा के साए में जिंदगी गुजार रहे हैं.

पटना की सामाजिक कार्यकर्ता अनिता सिन्हा कहती हैं कि महिलाएं और लड़कियां कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. सरकार, कानून और सामाजिक संगठन भले ही महिलाओं की सुरक्षा को ले कर कितने भी दावे करें लेकिन महिलाओं को कदमकदम पर यौनउत्पीड़न, छेड़छाड़, छींटाकशी, गंदे इशारों आदि से सामना करना पड़ता है. करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों से महिलाओं को खतरा बना रहता है.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट को देख कर हैरत और अफसोस होता है कि बलात्कार के कुल मामलों में 47.2 फीसदी में पीडि़त लड़की के परिचित ही शामिल थे. इन में पिता, चाचा, मामा, भाई, दादा जैसे नजदीकी रिश्तेदार और पड़ोसी जैसे लोग ही शामिल हैं. बलात्कार के कुल 1,127 मामलों में से 532 में कोई न कोई परिचित ही आरोपी था. इन में 4 ऐसे मामले थे जिन में दादा, पिता या भाई को आरोपी पाया गया, 36 ऐसे मामले थे जिन में परिवार का कोई नजदीकी सदस्य ही आरोपी था. इस के अलावा 44 रिश्तेदारों और 182 पड़ोसियों को आरोपी पाया गया है.

करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों, नौकरों, ड्राइवरों आदि द्वारा बच्चियों के अंगों से छेड़छाड़ करने व उन के साथ जबरन सैक्स संबंध बनाने की वारदातें तेजी से बढ़ रही हैं. ऐसी वारदातों के बढ़ने की सब से बड़ी वजह पारिवारिक व सामाजिक लिहाजों, संस्कारों व मर्यादाओं का तेजी से टूटना है.

समाजसेवी किरण कुमारी कहती हैं कि पहले परिवार के करीबी रिश्तेदारों के बीच कुछ मर्यादा, सीमाएं और लिहाज होता था, जो आज की भागदौड़ की जिंदगी में खत्म होता जा रहा है. रिश्तेदारों और पड़ोसियों की गंदी नजरों का शिकार मासूम बच्चियां बन रही हैं. इस से बच्चियों को बचाने के लिए उन के गार्जियन को ही एहतियात बरतने की जरूरत है.

पटना में 35.4 फीसदी लोगों की राय है कि महिलाएं पहले की तुलना में ज्यादा सुरक्षित हुई हैं, जबकि 49.4 फीसदी लोगों को इस दिशा में कोई भी बदलाव या सुधार नजर नहीं आया. दिल्ली वालों का मानना है कि महिलाओं की सुरक्षा को ले कर दिल्ली महफूज नहीं है. 11 फीसदी लोग ही मानते हैं कि दिल्ली में महिलाएं पूरी तरह से सुरक्षित हैं.

रहना होगा सचेत 

पटना हाईकोर्ट के सीनियर वकील संजीव कुमार सिंह कहते हैं कि केंद्र सरकार ने महिला यौनउत्पीड़न सुरक्षा कानून-2010 तो बना दिया, पर उस के बाद भी महिलाओं का यौनशोषण कम नहीं हुआ है. इस कानून में किसी भी तरह के यौनउत्पीड़न को बलात्कार के बराबर माना गया है. कार्यस्थल पर किसी भी तरह के यौनउत्पीड़न यानी छेड़खानी, भद्दे इशारे, घूरना, टटोलना, गंदे जोक्स सुनाना, बारबार सामने आना, शारीरिक संबंध बनाने की पेशकश करना, शादी का झांसा दे कर सैक्स करना, अश्लील फिल्म दिखाना या कोई भी अशोभनीय शारीरिक, मौखिक या अमौखिक यौनाचार को इस कानून के दायरे में रखा गया है.

इस तरह की हरकतों पर केवल कानून के डंडे से रोक नहीं लगाई जा सकती है. महिलाओं को खुद सचेत रहने व किसी झांसे में फंसने से बचना होगा. अगर किसी महिला से उस का किसी तरह का कोई संबंधी विवाह से पहले सैक्स संबंध बनाने की बात करे तो महिला को उस से इनकार करना होगा. नौकरी देने, विवाह करने, कर्ज दिलाने, इम्तिहान में पास करा देने, फर्जी डिगरी दिला देने आदि के नाम पर महिलाएं यौनशोषण का शिकार होती रही हैं. ऐसे मामलों में उन्हें सचेत होना होगा.

यह सच है कि ज्यादातर लड़कियां और औरतें यौनशोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाती हैं. समाज में बदनामी होने के डर से वे चुप रह जाती हैं. कुछेक लड़कियां जब अपने अभिभावकों को इस बारे में बताती हैं तो वे भी इज्जत का हवाला दे कर चुप रहने की और अपने काम से मतलब रखने की सलाह दे कर मामले को रफादफा करने की कोशिश करते हैं. बलात्कार, छेड़छाड़ या किसी भी तरह के शारीरिक शोषण के खिलाफ पुलिस थाने में जब शिकायत ही दर्ज नहीं  कराई जाती है, तो गलत सोच वाले लोगों का हौसला बढ़ेगा ही.

पटना के पत्रकारनगर थाने के तहत आने वाले न्यू चित्रगुप्त महल्ले में एमबीए की 21 साल की छात्रा रोशनी ने पिछले साल 25 अक्तूबर को दोपहर में फांसी लगा कर अपनी जिंदगी खत्म कर ली. प्यार के चक्कर में फंस कर उस ने यौनशोषण, दगाबाजी और ब्लैकमेलिंग से परेशान हो कर मौत को गले लगा लिया.

सुसाइड नोट में रोशनी ने लिखा था कि जब वह इंटरमीडिएट में पढ़ती थी तब एक सहेली की शादी में शरीक होने उस के घर गई थी. वहीं सहेली के भाई हीरा से मुलाकात हुई. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई. 3 सालों के बाद उसे पता चला कि उस का आशिक धोखेबाज है. वह इंजीनियरिंग पास भी नहीं था. वह अपराधी, शराबी और बदमाश है एवं कई बार जेल की हवा खा चुका है. जब रोशनी ने हीरा से रिश्ता तोड़ने की कोशिश की तो वह इंटरनैट पर नग्न युवती के शरीर पर उस के चेहरे का फोटो लगाने और उस के प्रेमपत्रों को घर वालों को देने और अखबार में छपवाने की धमकी दे कर ब्लैकमेलिंग करने लगा. इतना ही नहीं, हीरा और उस के दोस्तों ने उस के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया था.

अपनों से खतरा

10 साल की लड़की सोनी रोज की तरह तैयार हो कर स्कूल पहुंची. उस की क्लास के मौनीटर ने उस से कहा कि उस के हाथ के नाखून काफी बढ़े हुए हैं, इसलिए डायरैक्टर साहब ने उसे अपने चैंबर में बुलाया है. सोनी के साथ उस की एक सहेली भी डायरैक्टर के चैंबर में पहुंची. डायरैक्टर ने उस की सहेली को क्लास में भेज दिया और सोनी के साथ बलात्कार किया. स्कूल की छुट्टी होने पर सोनी को स्कूल की गाड़ी से उस के घर पहुंचा दिया गया. सोनी की मां को बताया गया कि स्कूल में ही सोनी बेहोश हो गई थी. जब सोनी को होश आया तो उस ने सारी बात बताई. उस के बाद सोनी के परिवार वाले और आसपास के लोग स्कूल पहुंच गए व जम कर तोड़फोड़ की.

पटना के पुराने इलाके पटनासिटी के पटना सिटी सैंट्रल स्कूल (दर्शन विहार) के डायरैक्टर पवन कुमार दर्शन की इस घिनौनी करतूत ने जहां स्कूलटीचर और स्टूडैंट के रिश्तों पर कालिख पोत दी है, वहीं मासूम बच्चियों की सुरक्षा पर एक बार फिर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. स्कूलटीचर, प्रिंसिपल, ड्राइवर, खलासी, नौकर, चापरासी, पड़ोसी समेत करीबी रिश्तेदारों की ओछी मानसिकता की शिकार मासूम बच्चियां हो रही हैं.

ऐसे मामलों का बढ़ना परिवार और समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा है. अपनों और आसपड़ोस की खूंखार निगाहों की सौफ्ट टारगेट बनी हुई हैं मासूम बच्चियां.

पटना हाईकोर्ट के सीनियर वकील अशोक कुमार कहते हैं कि पहले लोग करीबी रिश्तेदारों व पड़ोसियों के पास अपनी बच्चियों को छोड़ कर बड़े ही आराम से किसी काम से बाहर चले जाते थे, आज ऐसा नहीं के बराबर हो रहा है. अपनों द्वारा ही भरोसा तोड़ने के बढ़ते मामलों की वजह से परिवार और पड़ोस के लोगों के पास बच्चियों को छोड़ने से लोग कतरानेघबराने लगे हैं.

परिवार और पड़ोस में बैठे लोगों की कुंठित मानसिकता और गंदी नजरों का आसान शिकार परिवार व पड़ोस की मासूम बच्चियां बन रही हैं. बच्चियों के जिस्म से खिलवाड़ कर उन के अपने ही लोग अपनी सैक्स की कुंठा को शांत करते हैं. पुलिस अफसर राकेश दूबे कहते हैं कि अपने आसपास खेलतेकूदते, स्कूल आतेजाते और छोटीमोटी चीज खरीदने महल्ले की दुकानों पर जाने वाले बच्चियों के साथ छेड़छाड़ करना उन के अपनों के लिए काफी आसान होता है. परिवार और पड़ोस के लोगों की आपराधिक सोच व साजिश का पता लगा पाना किसी के लिए भी आसान नहीं है. पता नहीं कब किस के अंदर का शैतान जाग उठे और मासूम बच्चियों को वह अपनी खतरनाक साजिश का निशाना बना डाले. ऐसे में हरेक मांबाप को अपने बच्चों पर खास ध्यान रखने की जरूरत है. मासूम बच्चियों की सुरक्षा को ले कर मांबाप को किसी भी तरह की कोताही नहीं बरतनी चाहिए.

समाज की टूटती मर्यादाओं व घटिया सोच की वजह से ही बच्चियों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है. अब इंसान अपने भाई, चाचा, मामा, दोस्तों समेत अपनों से लगने वाले पड़ोसियों पर भरोसा न करे, तो फिर किस पर करे? आज की हालत यह है कि लोगों की नीयत बदलते देर नहीं लगती. अपने ही अपनों के भरोसे का खून कर रहे हैं. यह रिश्तों और समाज के लिए बहुत ही खतरनाक बन चुका है.

झाड़फूंक के बहाने खिलवाड़

ओझा और तांत्रिकों की कारगुजारियों को अगर गौर से देखा जाए तो पता चल जाता है कि वे झाड़फूंक और टोटका के बहाने औरतों के जिस्मों को अपने हाथों से टटोलटटोल कर अपनी वासना की प्यास बुझा रहे हैं. कोई भी ओझा औरतों के घरवालों के सामने बड़ी ही चालाकी व बेशर्मी से बीमार औरत के कपड़ों के भीतर अपना हाथ घुसेड़ देता है और आंखें बंद कर मंत्र पढ़ने का ढोंग करता रहता है. औरत के घरवाले बाबा की अश्लील हरकतों को इलाज करने का तरीका समझ कर चुपचाप देखते रहते हैं और बाबा बेरोकटोक वासना का गंदा खेल?खेलता रहता है. झाड़फूंक के नाम पर औरतों को चूमना व उन के जिस्मों को सहलाना बाबाओं का पुराना शगल है.

खुद की सैक्स की भूख को शांत करने के लिए ढोंगी और पाखंडी बाबा इस तरह का हथकंडा अपनाते हैं. आएदिन यह सुननेपढ़ने को मिलता है कि फलां जगह फलां बाबा ने इलाज के नाम पर औरतों को नशा दे कर बलात्कार किया या उस के अंगों से खिलवाड़ किया. इस के बाद भी औरतों और उन के परिजनों की आंखें नहीं खुल पा रही हैं क्योंकि बहुत सी औरतों को इस खिलवाड़ में प्राकृतिक आनंद भी आता है.

डायन के नाम पर जुल्म

डायन होने के आरोप में गरीब और बेसहारा औरतों, खासकर विधवाओं को तंग, तबाह और प्रताडि़त करने की वारदातें आज की मैडिकल साइंस, टैक्नोलौजी और तरक्की के दावों पर तगड़ा तमाचा की तरह हैं. आज भी देश के कई हिस्सों में औरतों को डायन करार दे कर उन के साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जा रहा है. सरकार, प्रशासन, पुलिस और कानूनों को ठेंगा दिखा कर गांवों में उन्मादी लोग जिसे चाहते हैं, डायन करार दे कर अपना मतलब साधते रहते हैं. समूचे देश में हर साल डायन बता कर करीब 3 हजार औरतों को परेशान किया जाता है.

डायन के आरोप लगने के बाद गांव वालों की पिटाई के बीच जान बचा कर भाग निकलने वाली मालती उस वारदात के बाद चुप सी हो गई है. बहुत कुरेदने पर थोड़ा बोलती है. पटना से सटे दानापुर प्रखंड के रूपसपुर पीपलतल गांव की रहने वाली 56 साल की मालती और उस की 10 साल की बेटी सुनिंदा को 3 साल पहले डायन बता कर गांव वालों ने पिटाई शुरू की थी कि वह किसी तरह भाग निकली. उस का बेटा रंजन पटना के ए एन कालेज में बीए की पढ़ाई कर रहा है.

काफी कुरेदने पर मालती बताती है कि वह दोपहर में अपने पति के लिए खाना पहुंचाने के लिए सैलून जा रही थी, तभी उस के पड़ोसी सुनील और उस के परिवार वालों ने उसे डायन कह कर मारनापीटना शुरू कर दिया. पिटाई करने के साथ सुनील चिल्ला रहा था कि उस ने उस की बेटी को कालाजादू कर के मार दिया है. कुछ दिन पहले ही उस की बेटी की किसी बीमारी से मौत हो गई थी.

मालती कहती है, ‘‘मैं 20 साल से गांव में रह रही हूं. कभी किसी से झगड़ाफसाद नहीं हुआ. पति सुरेंद्र ठाकुर सैलून चला कर पविर को पाल रहे हैं. एक बेटा पौलिटैक्निक की पढ़ाईर् कर रहा है और दूसरा बीए में पढ़ रहा है. मेरे भी बालबच्चे हैं, किसी दूसरे के बच्चे को मारने के बारे में कभी सोचा भी नहीं. उस के बाद भी मुझ पर डायन होने और लड़की को मारने का आरोप लगाया गया.’’ इतना कह कर मालती सिसकने लगती है.

बिहार के कटिहार जिले के कुरसैला इलाके की रहने वाली राजकुमारी कुछ ऐसे ही दबंगों की सताई हुई है और गांव से भाग कर पटना जंक्शन के पास के महावीर मंदिर के गेट पर भीख मांग कर जिंदगी गुजार रही है. 65 साल की चंपा से जब गांव छोड़ने के बारे में पूछा गया तो उस की आंखें शून्य में कुछ घूरने लगती हैं, फिर आंखों से टपटप आंसू बहने लगते हैं. वह बताती है कि उस के पति की मौत 12 साल पहले हो गई. और उस के 2 बेटे हैं, दोनों पंजाब में मजदूरी करते हैं. पति की मौत के बाद वह गांव में अकेले रहने लगी थी. गांव में ही उस का छोटा सा पक्का घर था और 18 कट्ठा खेत थे. गांव के कुछ अपराधी स्वभाव के लोग उस से खेत बेचने के लिए कहते थे. उन की बात नहीं मानने पर वे लोग धमकाने लगे.

राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, असम, गुजरात और महाराष्ट्र के 50 से ज्यादा जिलों में औरतों को डायन बता कर उन पर अत्याचार किया जाता है. काला जादू, टोनही, टोटका जैसे अंधविश्वास से भरे आरोप लगा कर किसी औरत को डायन करार दे कर उसे मार दिया जाता है. डायनप्रथा की ओट में कई संगीन अपराधों को अंजाम दिया जाता है. इलाके के दबंग ओझा, तांत्रिक, बाबाओं के साथ मिल कर साजिश रचते हैं और किसी औरत को डायन करार दे देते हैं. विडंबना यह है कि अगर किसी औरत को डायन करार दे दिया गया तो उस के नातेरिश्तेदार भी सामाजिक दबाव से उस का साथ देना छोड़ देते हैं.

डायनप्रथा को रोकने के लिए कई कानून बने हुए हैं, पर इस के बाद भी औरतों को डायन करार दे कर उन्हें प्रताडि़त करने के मामलों में कमी नहीं आई है. कानून कहता है कि किसी औरत को डायन करार देना अपराध है और इस के लिए 3 महीने की जेल या 1 हजार रुपया जुर्माना हो सकता है. किसी औरत को डायन बता कर उसे जिस्मानी और दिमागी यातना देने वाले को 6 महीने की जेल और 2 हजार रुपया जुर्माना या दोनों सजा हो सकती हैं. किसी महिला को डायन करार दे कर उस के खिलाफ समाज के लोगों को भड़काने पर 3 महीने की कैद और 1 हजार रुपया जुर्माना के तौर पर वसूला जा सकता है. कानून यह भी कहता है कि डायन बता कर उस के साथ झाड़फूंक या टोटका करने वाले को 1 साल की जेल और 2 हजार रुपए के जुर्माने की सजा हो सकती है. सारे कानून फाइलों में बंद हैं और  डायन का आरोप लगा कर विधवाओं व गरीब औरतों की हत्या का खुलाखेल जारी है.

एसिड अटैक से जलते सपने

21 अक्तूबर, 2012 की उस काली रात ने चंचल और उस की बहन सोनम की जिंदगी में घुप अंधेरा भर दिया था. आधीरात को जब गांव में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ था तो चंचल को छत पर कुछ आवाजें सुनाई दीं. उस की नींद खुल गई. उस ने देखा कि 3 लड़के उस की छत पर खड़े हैं और मुसकरा रहे हैं. अंधेरे में जब तक उन्हें पहचानने की कोशिश करती तब तक उन्होंने तेजाब भरी बोतल उस के सिर पर उड़ेल दी. दर्द और तेज जलन से बिलबिलाती चंचल की आवाज सुन कर सोनम की नींद भी खुल गई. बदमाशों ने उस के ऊपर भी बोतल से भरा तेजाब उलट दिया. वह भागने लगी. चंचल दर्द से तड़प कर बेहोश हो चुकी थी. उस के बाद तीनों बदमाश छत से कूद कर भाग गए.

यह बताते हुए चंचल की आंखों में आंसू भर आते हैं और उस के साथ उस की बहन सोनम भी सिसकने लगती है. पटना शहर से 30 किलामीटर दूर मने प्रखंड छिनावां गांव की रहने वाली दोनों बहनों का कुसूर इतना ही था कि उन्होंने छेड़खानी करने वाले लफंगों को जम कर फटकार लगाई थी. कालेज आतीजाती लड़कियों के साथ छेड़खानी करने वाले बदमाशों के खिलाफ आवाज उठाना चंचल को इतना महंगा पड़ा कि उस पर तेजाब फेंका गया, जिस से उस का शरीर का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा जल गया. उसे मांस का चलताफिरता लोथड़ा बना कर रख दिया गया.

चंचल कहती है कि जब भी वह कंप्यूटर की कोचिंग के लिए घर से निकलती थी तो रास्ते में अनिल राय, राजकुमार और धनश्याम नाम के 3 लड़के उस के साथ छेड़खानी करते थे और अंटशंट बातें बोलते थे. शुरू में तो कई दिनों तक वह चुपचाप सब सहती रही और उन की अनदेखी करती रही. इस से उन बदमाशों के हौसले काफी ज्यादा बढ़ गए. बदमाश लोग उस का दुपट्टा तक खींचने लगे और गंदे इशारे करने लगे. सड़क पर ही उस के सामने खड़े हो जाते और साथ भाग चलने की बातें करते थे. मोटरसाइकिल से घरों के चक्कर लगाना, घर के खिड़कीदरवाजों के परदे फाड़ देना और खिड़कियों पर पत्थर मारना आएदिन की बात हो गई थी. एक दिन चंचल ने गुस्से में आ कर बदमाशों को फटकार लगा दी और खूब खरीखोटी सुनाई.

एसिड अटैक ने दोनों लड़कियों समेत उन के पूरे परिवार की जिंदगी की राह को बदल दिया है. समूची जिंदगी पुलिस, कोर्ट, अस्पताल में उलझ कर रह गईर् है. चंचल और उस की बहन सोनम के इलाज पर अब तक 8 लाख रुपए से ज्यादा की रकम खर्च हो चुकी है. अभिनेता जौन अब्राहम समेत कई एनजीओ की मदद से इलाज की रकम इकट्ठी की गई.

देश के हर हिस्से में आएदिन महिलाओं के साथ होने वाली, इंसानियत को तारतार करने वाली ये बर्बर घटनाएं सिर्फ खबर ही नहीं, बल्कि सभ्य समाज पर एक करारा तमाचा सरीखी हैं. दिल को दहला देने वाले राजधानी दिल्ली के निर्भया कांड को पूरे 4 साल हो गए हैं लेकिन इन बीते 4 सालों के दौरान बलात्कार के मामलों में कमी नहीं हुई है. हाल के दिनों में पूरे देश में महिलाओं पर यौनहिंसा सहित विभिन्न तरह के अत्याचार के मामले काफी हद तक बढ़ गए हैं. महिलाओं, नाबालिग लड़कियों तथा छोटीछोटी बच्चियों के साथ रेप की घटनाओं में तेजी से इजाफा हो रहा है.

हर जगह यही कहानी

महिलाओं के साथ अपराध की घटनाएं किसी एक राज्य या शहर तक सीमित नहीं हैं. दिल्ली, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश सभी राज्यों में बलात्कार तथा छेड़छाड़ की बर्बर घटनाएं सिर चढ़ कर बोल रही हैं. घर हो या बाहर, महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. हैरानी की बात है कि दरिंदे न महिला की उम्र देखते हैं न जगह. वह मासूम बच्ची हो या बुजुर्ग महिला, वे सभी को अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं. ऐसे समाज को हम किस आधार पर सभ्य व सुसंस्कृत समाज कह सकते हैं.

एक तरफ जहां देश सामंती, रूढि़वादी मानसिकता की राह पर चल रहा है जहां लड़कियां पहले के मुकाबले ज्यादा पढ़लिख रही हैं, बड़ेबड़े मुकाम हासिल कर रही हैं, वहीं उन के खिलाफ अपराध भी उसी गति से बढ़ रहे हैं. पहले उन्हें घर की चारदीवारी में कैद कर के रखा जाता था. अब वे घर की चौखट लांघ कर अपने पंखों को उड़ान देने की कोशिश कर रही हैं तो समाज के वहशी दरिंदे उन के पंख कतरने को तैयार बैठे हैं. उन्हें वे अपने मनोरंजन का खिलौना समझ कर रौंद रहे हैं.

समाज की सामंती और रूढि़वादी ताकतें लड़कियों के अधिकारों व उन की आजादी पर हमले का कोई मौका नहीं छोड़ रहीं. कोई महिलाओं के मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक का आदेश देता है तो कोई कहता है उन्हें खुले कपड़े नहीं पहनने चाहिए. वहीं, कोई फरमान जारी करता है कि महिलाएं घर से बाहर अकेले न निकलें तो कोईर् कहता है कि देररात में बाहर न निकलें. कुल मिला कर सारे सामंती फरमान महिलाओं के लिए हैं. खाप पंचायत तो यहां तक कहती हैं कि रेप से बचने के लिए लड़कियों का वयस्क होने से पहले ही विवाह कर दिया जाए. ऐसा लगता है समाज महिलाओं की स्वतंत्रता को पचा नहीं पा रहा है. स्त्रियों के मसले पर आधुनिक और रूढि़वादी परंपराओं के बीच सीधा टकराव दिखता है.

कदम कदम पर फैला है गुनाह

3 नवंबर, 2016 की रात हरदोई के पुलिस अधीक्षक राजीव मेहरोत्रा सरकारी काम से लखनऊ के थाना हजरतगंज आए थे. वह अपनी सरकारी सूमो गाड़ी भीड़भाड़ वाले इलाके हजरतगंज में खड़ी कर के काम निपटाने चले गए. ड्राइवर महेश कुमार गाड़ी के पास था. महेश को चाय पीने की तलब लगी तो वह सूमो के चारों दरवाजे लौक कर के चाय पीने चला गया. थोड़ी देर बाद जब वह चाय पी कर वापस लौटा तो गाड़ी वहां नहीं थी. यह देख महेश के पैरों तले की जमीन खिसक गई और वह परेशान हो गया. उस ने इधरउधर देखा, लेकिन गाड़ी कहीं दिखाई नहीं दी. महेश समझ गया कि वाहन चोरों ने एसपी साहब की सरकारी गाड़ी पर हाथ साफ कर दिया है. उस ने तुरंत फोन कर के एसपी राजीव मेहरोत्रा को इस मामले की जानकारी दी. सूचना मिलते ही एसपी राजीव काम बीच में ही छोड़ कर वहां लौट आए. थोड़ी ही देर में एसपी साहब की गाड़ी गायब होने की खबर लखनऊ के पूरे पुलिस डिपार्टमेंट में फैल गई.

आननफानन में कोतवाली पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना जिले के सभी थानों को दे दी थी. फलस्वरूप पुलिस ने राजधानी से जुड़े सभी सीमाई इलाकों की नाकेबंदी कर के वाहनों की चैकिंग शुरू कर दी. लेकिन देर रात तक चली चैकिंग के बाद भी सूमो का कहीं पता नहीं चला. वाहन चोर संभवत: सूमो को पहले ही लखनऊ से बाहर ले गए थे. इस संबंध में कोतवाली थाने में अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई. घटना किसी मामूली व्यक्ति से जुड़ी हुई नहीं थी. बात एसपी साहब की गाड़ी की चोरी की थी. ऐसे में राजधानी पुलिस की नींद हराम हो जाना स्वाभाविक था. क्राइम ब्रांच ने अपने मुखबिरों को यह पता लगाने की जिम्मेदारी सौंप दी कि इस में किस गिरोह का हाथ हो सकता है.

करीब हफ्ते भर बाद मुखबिरों ने क्राइम ब्रांच को हैरत में डालने वाली सूचना दी. सूचना के अनुसार, वाहन चोरों ने एसपी राजीव की सूमो 50 हजार में नेपाल के रोतहट जिले के कबाड़ी सागर शाह के हाथों बेच दी थी.

यह खबर मिलते ही लखनऊ क्राइम ब्रांच की टीम सादे कपड़ों में नेपाल गई और वहां के जिला हेटौड़ा के डीआईजी पशुपति उपाध्याय से मिली. इस टीम ने उन्हें घटना की पूरी जानकारी दे कर उन से अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए मदद मांगी. डीआईजी पशुपति उपाध्याय ने इस टीम को रोतहट जिले के प्रभारी डीएसपी नवीन कृष्ण भंडारी जो एसपी का पद भी संभाल रहे थे, के पास भेज दिया. क्राइम ब्रांच की टीम नवीन कृष्ण भंडारी से मिली. नवीन कृष्ण भंडारी ने फौरी तौर पर एक पुलिस टीम गठित की और सागर शाह के वीरगंज स्थित कबाड़ के गोदाम पर छापेमारी की. सागर शाह चोरी के वाहन खरीदने और बेचने के लिए बदनाम था. यह बात नेपाल की पुलिस  भी जानती थी.

उस के गोदाम से पुलिस टीम को एसपी साहब की सूमो की चेसिस मिल गई. उस ने सूमो को कई हिस्सों में काट कर उस के पार्ट अलगअलग कर दिए थे, जिस से उसे आसानी से न पहचाना जा सके. नेपाल पुलिस ने सागर शाह को हिरासत में ले लिया. उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो उस ने सूमो खरीदने की बात कबूल कर ली. उस ने पुलिस को बताया कि वह सूमो उसे तस्कर और वाहन चोर गिरोह के सरगना शमीम अख्तर के साथी असगर उर्फ मोजाबिल अंसारी और अफगान अहमद ने 50 हजार रुपए में बेची थी. सागर शाह ने यह भी बताया कि शमीम अख्तर वीरगंज में छिपा है.

नेपाल पुलिस के हाथों बड़ा बटेर लग चुका था. सागर शाह की निशानदेही पर नेपाल पुलिस ने शमीम अख्तर के ठिकाने पर दबिश दी. वहां से शमीम अख्तर को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने उस के पास से 2 पिस्टल, 23 जिंदा कारतूस, 200 ग्राम हेरोइन, 5 मोबाइल फोन, 18 सिम, फरजी प्रैस कार्ड और तमाम जाली आईडी बरामद कीं. बरामद सामानों को नेपाल पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस शमीम अख्तर को गिरफ्तार कर के थाने ले आई. उस के खिलाफ थाना वीरगंज में मुकदमा दर्ज किया गया.

बिहार के मोतिहारी (पूर्वी चंपारण) के पुलिस अधीक्षक जितेंद्र राणा को जब शमीम अख्तर की गिरफ्तारी की सूचना मिलीतो वह बहुत खुश हुए. शमीम अख्तर बिहार के कई जिलों का वांछित अपराधी था. सीतामढ़ी के एक ही परिवार के 3 सदस्यों के अपहरण और उन की नृशंस हत्या, मृतकों की बेटी आशा सिंह को पहले बेटी बनाना, फिर बेटी से पत्नी और बाद में उसे जिस्मफरोशी के धंधे में उतार देने जैसे उस के कई कृत्य काफी चर्चित रहे थे.

उस ने आशा सिंह को पाकिस्तान में बेचने की योजना बना ली थी ताकि वह वहां से वापस ही न लौट सके. लेकिन वह अपने घृणित मंसूबों में कामयाब होता, उस से पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया था. लेकिन वह पुलिस के चंगुल से फरार हो गया और नेपाल में जा कर छिप गया था. शमीम नेपाल में छिप कर रहते हुए वहीं से अपना आपराधिक धंधा चला रहा था.

बहरहाल, दोबारा गिरफ्तारी के बाद  शमीम अख्तर अभी नेपाल की जेल में बंद है. यहां की पुलिस उस के प्रत्यर्पण की कोशिश में जुटी है. शमीम अख्तर से लखनऊ एटीएस, एसटीएफ, लखनऊ की स्पैशल ब्रांच, पटना की स्पैशल ब्रांच, एटीएस, पटना की एसटीएफ के साथ मोतिहारी पुलिस के कई अधिकारियों ने नेपाल जा कर उस से विस्तृत पूछताछ की है.

पूछताछ में शमीम ने कबूल किया है कि उस के कहने पर उस के साथियों ने हरदोई के एसपी की सरकारी गाड़ी चुराई थी. लेकिन पकड़े जाने के डर से उस ने यह गाड़ी सागर शाह के हाथों 50 हजार रुपए में बेच दी थी.

करीब 40 वर्षीय शमीम अख्तर बिहार के मोतिहारी (पूर्वी चंपारण) जिले के थाना ढाका क्षेत्र के आजाद चौक इलाके के सिकंदरापुर टोला का रहने वाला था. उस के पिता नईमुद्दीन अख्तर किसान थे. नईमुद्दीन के आधा दरजन बच्चों में शमीम अख्तर सब से बड़ा था. शमीम शुरू से ही शातिरदिमाग था. जिस चीज पर उस का दिल आ जाता था, उसे पा कर ही दम लेता था. भले ही इस के लिए उसे किसी भी तरह के हथकंडे क्यों न अपनाने पड़ें. शमीम की हरकतों से उस के घर वाले काफी परेशान रहते थे. अपनी हरकतों के चलते ही शमीम इंटर से आगे पढ़ाई नहीं कर सका था.

नईमुद्दीन का परिवार बड़ा था. वह अपने परिवार का भरणपोषण किसानी से करते थे. उन के परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी. जबकि शमीम गरीबी के आलम में जीना नहीं चाहता था. पढ़ाई बीच में छोड़ कर शमीम ने कबाड़ का धंधा शुरू कर दिया. उस ने जीजान से मेहनत की. फलस्वरूप उस का धंधा चल निकला. लेकिन उस ने अमीर बनने के जो ख्वाब देखे थे, वह कबाड़ की कमाई से पूरे नहीं हुए. आखिरकार उस ने अमीर बनने के लिए एक शौर्टकट रास्ता निकाल लिया. यह अलग बात है कि वह रास्ता जुर्म की अंधेरी सुरंग से हो कर जाता था.

बात सन 2001 की है. शमीम अख्तर ने अपने 2 साथियों राजमिया और चंदनदीप के साथ मिल कर अरेराज, जिला मोतिहारी के संजय का अपहरण कर लिया. इन लोगों ने संजय के घर वालों से फिरौती की बड़ी रकम वसूल की. पैसे मिलने के बाद शमीम ने संजय को छोड़ दिया. एक बार शमीम अख्तर ने अपराध की दुनिया में कदम रखा तो फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

इस के बाद शमीम ने इसी जिले से दूसरा अपहरण कर के सनसनी फैला दी. इस बार उस ने एक ज्वैलर का अपहरण किया था. फिरौती में उस ने ज्वैलर के परिवार वालों से करीब 50 लाख वसूले. जुर्म की दुनिया से काला पैसे आते ही शमीम अख्तर ने अपना एक बड़ा गिरोह बना लिया. अपने गिरोह में उस ने कम उम्र के नएनए चेहरों को शामिल किया ताकि पुलिस उस तक आसानी से न पहुंच सके.

2-2 अपहरण कर के शमीम ने पुलिस की नाक में दम कर दिया था. पुलिस भी चुप नहीं बैठी थी. आखिर उस ने शमीम को गिरफ्तार कर ही लिया. गिरफ्तारी के बाद उसे मोतिहारी जेल भेज दिया गया. बाद में पुलिस ने उसे सीतामढ़ी जेल में ट्रांसफर कर दिया. सीतामढ़ी जेल में रहने के दौरान शमीम की मुलाकात सीतामढ़ी के शातिर अपराधी दीपनारायण महतो से हुई.

दीपनारायण महतो की सीतामढ़ी में तूती बोलती थी. उस ने शमीम को अपराध के कई गुर सिखाए. शमीम जेल से ही अपना सिंडीकेट चला रहा था. उस के गुर्गों ने मोतिहारी टाउन, बैरगनिया, फेनहारा और मेहसी में ताबड़तोड़ लूट की कई घटनाओं को अंजाम दिया. पकडे़ जाने के बाद शमीम ने जेल में रह कर 8 साल गुजारे.

इस बीच शमीम अख्तर की पत्नी अपने बच्चों के साथ हमेशाहमेशा के लिए मायके चली गई. शमीम के जेल जाने से पहले की बात है. नईमुद्दीन बेटे की करतूतों से आजिज आ चुके थे. उन्होंने उस की शादी करवा कर उसे सुधारने की सोची, लेकिन नईमुद्दीन की यह कवायद काम नहीं आई. जब वह रोजरोज के पुलिस के झमेले से परेशान हो गए तो उन्होंने शमीम से नाता तोड़ लिया. इसी से दुखी हो कर उस की पत्नी हमेशा के लिए मायके चली गई थी. खैर, उन दिनों शमीम अख्तर के सितारे बुलंदियों पर थे.

सन 2008 में शमीम सीतामढ़ी की जिस जेल में बंद था, उसी में सीतामढ़ी जिले के थाना डुमरा का रहने वाला मूकबधिर संजीव कुमार सिंह भी बंद था. उसे पट्टीदारों से संपत्ति के बंटवारे के विवाद में जेल जाना पड़ा था. उस की पत्नी खुशबू सिंह पति से मिलने जेल आया करती थी.

खुशबू बला की खूबसूरत महिला थी. जेल में आतेजाते जब उस पर शमीम अख्तर की नजर पड़ी तो वह उस का दीवाना हो गया. शमीम और खुशबू के बीच परिचय हुआ तो उस ने खुशबू को विश्वास दिलाया कि जेल से बाहर निकलते ही वह उस के पति को जेल से छुड़वा देगा.

पता नहीं शमीम ने ऐसा कौन सा जादू कर दिया था कि खुशबू उस की अंधभक्त बन गई. उसे शमीम पर पूरा भरोसा हो गया कि वह उस की मदद जरूर करेगा. जेल से बाहर आने के बाद शमीम ने जोड़जुगत कर के खुशबू के पति संजीव को जेल से बाहर निकलवा दिया.

खुशबू शमीम के इस एहसान तले दब गई. वजह यह थी कि जब उस के अपनों ने उस का साथ छोड़ दिया था, तब एक अंजान शख्स उस का सहारा बना. धीरेधीरे शमीम और खुशबू सिंह एकदूसरे की ओर खिंचते चले गए. दोनों के बीच का यह आकर्षण प्रेम में बदल गया. यहां से शमीम अख्तर की जिंदगी में दूसरे अध्याय की एक अनोखी कड़ी जुड़ गई.

खुशबू सिंह की शादी सन 1990 में जिला सीतामढ़ी के डुमरा के संजीव कुमार सिंह से हुई थी. संजीव कुमार सिंह जन्म से मूकबधिर था. शादी के बाद उस के वहां एक बेटे का जन्म हुआ. मांबाप ने उस का नाम अमनदीप सिंह रखा. उस के 3 साल बाद खुशबू आशा सिंह की मां बनी. मूकबधिर संजीव बहुत खुद्दार और जिंदादिल इंसान था. अपने कर्म और मेहनत पर भरोसा करने वाली खुशबू उस का हौसला बढ़ाती रहती थी. संजीव को अपने भाइयों से कभी कोई मदद नहीं मिली थी. सच तो यह है कि वे एक तरह से उस से घृणा करते थे.

न जाने वह कौन सा मनहूस दिन था, जब संजीव कुमार सिंह के परिवार में बुरे वक्त ने कुंडली मार ली. उस का हंसताखेलता परिवार बिखर गया. सन 2008 में पट्टीदारों से विवाद के चलते संजीव सिंह परिवार को ले कर शहर में आ गए. लेकिन विवाद फिर भी नहीं थमा. इसी विवाद के चलते संजीव को जेल जाना पड़ा था.

बहरहाल, 3 जनवरी 2009 को खुशबू की जिंदगी में एक और तूफान आया. उस के 13 वर्षीय बेटे अमनदीप सिंह का किसी ने अपहरण कर लिया. अपहर्त्ताओं ने फिरौती में 20 लाख वसूले. इस के बावजूद अपहर्त्ताओं ने पैसे ले कर भी संजीव और खुशबू सिंह के साथ धोखा किया. उन्होंने अमनदीप को छोड़ने के बजाय उस की हत्या कर दी. अमनदीप की क्षतविक्षत लाश रेलवे लाइन पर मिली. अमनदीप का अपहरण शमीम ने अपने गुर्गों से करवाया था. उस ने यह काम इतने शातिर ढंग से किया था कि खुशबू को इस की भनक तक नहीं लगी.

खुशबू की जिंदगी ने जैसे दुखों से नाता जोड़ लिया था. वह अभी बेटे की मौत के सदमे से पूरी तरह उबर भी नहीं पाई थी कि दरवाजे पर एक और मुसीबत बांहें फैलाए आ खड़ी हुई.

दिसंबर, 2010 की बात है. संजीव किसी काम से घर से बाहर गया तो फिर लौट कर घर नहीं पहुंचा. बदमाशों ने संजीव सिंह को भी उस के बेटे की तरह अगवा कर लिया. अपहरण करने के 2 दिनों बाद यानी 1 जनवरी, 2011 को शिवहर-पूर्वी चंपारण जिले की सीमा ललुआ सरेह में उस की लाश पड़ी मिली. सदर अस्पताल में खुशबू ने लाश की शिनाख्त अपने पति संजीव के रूप में की. यह काम भी शमीम अख्तर ने ही किया था. संजीव उस की और खुशबू की राह में रोड़ा बन रहा था. संजीव की मौत के बाद शमीम का रास्ता साफ हो गया. अब उसे कोई नहीं रोक सकता था.

खुशबू का हंसताखेलता परिवार उजड़ गया था. उस के जीने का एकमात्र सहारा उस की 13 वर्षीय बेटी आशा सिंह ही बची थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. जीने के लिए अभी पूरी जिंदगी बाकी थी. संकट की इस घड़ी में शमीम अख्तर ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया. चूंकि दोनों एकदूसरे को अपना जीवनसाथी बनाना चाहते थे, इसलिए खुशबू सिंह इनकार नहीं कर पाई. इस तरह वह शमीम की शरीकेहयात बन गई. शमीम ने खुशबू की बेटी अंशुप्रिया को अपनी बेटी के रूप में अपना लिया.

खुशबू से निकाह करने के बाद शमीम अख्तर पत्नी और बेटी आशा को ले कर बंगाल चला गया. उस ने बंगाल के डागापार में जमीन खरीद कर मकान बनवाया और परिवार के साथ रहने लगा. बाद में उस ने पत्नी और बेटी का धर्म परिवर्तन करा दिया. इस के बाद खुशबू सिंह का नाम रुखसाना खातून और उस की बेटी का नाम नूर हो गया. उस के कुछ दिनों बाद पत्नी और बेटी को ले कर वह वहां से सिलीगुड़ी चला गया.

उस ने सिलीगुड़ी में एक और फ्लैट खरीदा. यह फ्लैट उस ने रुखसाना खातून की करोड़ों की संपत्ति में से कुछ हिस्से को बेच कर खरीदा था. दरअसल, अमनदीप और संजीव की मौत के बाद शमीम अख्तर की नजर खुशबू उर्फ रुखसाना की संपत्ति पर जम गई थी. उस ने धीरेधीरे पत्नी की संपत्ति का आधा हिस्सा अपने नाम करा लिया था. इस के बाद वह उस संपत्ति को बेचता रहा. शमीम के प्यार में अंधी खुशबू उर्फ रुखसाना ने उसे कभी रोकने की कोशिश नहीं की. नूर बच्ची थी, उस के विरोध करने का कोई मतलब नहीं था.

अचानक एक दिन खुशबू उर्फ रुखसाना रहस्यमय तरीके से गायब हो गई. शमीम ने उस की हत्या कर के लाश गायब कर दी. खुशबू की लाश आज तक बरामद नहीं हुई. शमीम ने आशा उर्फ नूर से झूठ बोला कि उस की मां धोखा दे कर एक आदमी के साथ भाग गई.

13 साल की मासूम आशा उर्फ नूर मां के गायब होने से काफी दुखी थी. मां की याद में रोरो कर उस का बुरा हाल था. अपना राज छिपाने के लिए शमीम नूर को ले कर सिलीगुड़ी से मोतिहारी सिकंदरापुर आ गया. उस ने नूर की देखभाल की जिम्मेदारी आयशा को सौंप दी. आयशा शमीम से मिल कर जिस्मफरोशी का धंधा करती थी. शमीम के काले धंधों में एक धंधा जिस्मफरोशी का भी था.

जिस्मफरोशी की दुकान चलाने वाली आयशा शमीम तक कैसे पहुंची, इस की भी एक रोमांचक कहानी है. आयशा शमीम अख्तर के चंगुल में धोखे से आ फंसी थी. दरअसल, दिल्ली एनसीआर की रहने वाली आयशा जौब के सिलसिले में सहारनपुर के दीपांशु से मिली थी. दीपांशु लड़कियों को जौब देने के लिए अखबारों में विज्ञापन छपवाता था. ऐसे विज्ञापन छपवा कर वह भोलीभाली लड़कियों को अपने जाल में फांसता था.

आयशा भी उस के इस धोखे का शिकार बन गई थी. दरअसल, दीपांशु सैक्स रैकेट का सरगना था. राह भटकी अथवा मजबूर लड़कियों को नौकरी दिलाने का झांसा दे कर वह उन्हें अपने यहां लाता था. उन्हें नौकरी तो नहीं मिलती थी, उन का दैहिक शोषण कर के वह उन्हें जिस्मफरोशी के धंधे में उतार देता था.

आयशा दीपांशु की चिकनीचुपड़ी बातों में फंस गई थी. पहले तो उस ने आयशा का खूब दैहिक शोषण किया, फिर उस की नग्न फिल्म तैयार की ताकि वह उस के चंगुल से आजाद न हो सके.

दीपांशु ने वीडियो फिल्म दिखा कर आयशा को इतना मजबूर किया कि वह उस की बात मानने को तैयार हो गई. उस ने आयशा को धमकी दी कि अगर कभी उस ने कुछ ऐसावैसा सोचा भी तो वह उस की ब्लू फिल्म की सीडी बना कर बाजार में उतार देगा. दीपांशु की धमकियों से डरी आयशा अपनी इज्जत बचाने के लिए वही करती रही, जैसा उस ने करने के लिए कहा.

दीपांशु और शमीम अख्तर एक ही नाव के सवार थे. शमीम अख्तर को एक नई लड़की की तलाश थी. उस ने दीपांशु से कह रखा था कि कोई अच्छी लड़की मिले तो उसे उस के यहां भेज दे. उस की मांग पर दीपांशु ने आयशा को मोतिहारी भेज दिया.

इंसान की खाल में छिपे शैतान शमीम अख्तर की भूखी नजरों से आयशा भी नहीं बची. उस ने आयशा को जिस्मफरोशी के धंधे में उतार दिया. आयशा एक पिंजरे से निकल कर दूसरे पिंजरे में कैद हो गई थी. थकहार कर वह शमीम की जिस्मफरोशी की दुकान चलाने लगी.

शमीम अख्तर ने नूर की निगरानी आयशा पर छोड़ दी थी. आयशा 24 घंटे उस पर कड़ी नजर रखती थी. ताकि वह वहां से भाग न सके. बेटी का दरजा देने वाले हैवान शमीम ने उस से जबरन निकाह कर लिया. बेबस और लाचार नूर कुछ नहीं कर पाई. आशा उर्फ नूर को उस ने अपने घर के नीचे बने तहखाने में कैद कर दिया था. उस की मासूमियत को उस ने पहले ही रौंद डाला था.

उस ने नूर को भी जिस्मफरोशी के बाजार में उतार दिया. जब नूर इस के लिए तैयार नहीं होती थी तो शमीम जबरन उस की बांह में नशीला इंजेक्शन लगा देता था. इंजेक्शन की वजह से बेहोशी के आलम में पहुंचते ही जिस्म के भूखे भेडि़ए उसे नोचना शुरू कर देते थे. आयशा गेट के बाहर खड़ी उस की पहरेदारी करती थी.

तहखाने में कैद नूर 3 साल तक सिसकती रही, लेकिन शमीम को उस पर दया नहीं आई. शमीम ने नारकीय जीवन जी रही नूर को उस की बची हुई संपत्ति हथियाने के लिए जिंदा रखा था. वह अभी बालिग नहीं हुई थी. जिस्मानी रिश्तों से नूर को गर्भ न ठहरे, इस के लिए वह हर 3 महीने में उस की कमर में इंजेक्शन लगवा देता था.

शमीम अख्तर ने नूर से निकाह करने के बाद पाकिस्तान के रहने वाले जैक लेबोरियन से 2 लाख में उस का सौदा कर दिया था. जैक लेबोरियन नूर पर लट्टू था और उस से निकाह करने के लिए पाकिस्तान से कपड़े भी खरीद कर लाया था. निकाह के बाद वह उसे पाकिस्तान ले जाना चाहता था. शमीम उस के साथ लंदन जाने की बात कह कर करीब डेढ़ महीने तक गायब रहा. नूर को धोखे में रखने के लिए शमीम ने उस से जैक लेबोरियन को लंदन का रहने वाला बताया था. लेकिन जब नूर ने कपड़े देखे तो उस का भांडा फूट गया. कपड़े पाकिस्तान से खरीदे गए थे.

शमीम अख्तर के पाप का घड़ा भर चुका था. बात 24 फरवरी, 2015 की है. मोतिहारी के ढाका थाने के इंसपेक्टर अशोक कुमार को मुखबिरों से सूचना मिली कि कबाड़ व्यवसाई शमीम अख्तर के घर ढाका लाइन में चोरी हुई कई गाडि़यां देखी गई हैं. इंसपेक्टर अशोक कुमार ने पुलिस टीम के साथ शमीम के सिकंदरापुर आवास पर दबिश दी. पुलिस ने उस के घर से चोरी की 6 गाडि़यां बरामद कीं.

पुलिस की दबिश की सूचना शमीम अख्तर को पहले ही मिल गई थी, इसलिए वह पुलिस के आने से पहले ही घर छोड़ कर फरार हो गया था. तलाशी लेते हुए पुलिस जब उस कमरे तक पहुंची, जहां कबाड़ रखा था तो वहां उसे बाहर की खिड़की से तहखाना दिखाई दिया. तहखाने से किसी के कराहने की मद्धिम सी आवाज आ रही थी. जब आवाज की दिशा की ओर कान लगा कर सुना गया और भीतर झांक कर देखा गया तो उन के होश उड़ गए. तहखाने में एक लड़की कैद थी.

पुलिस को मामला संदिग्ध लगा तो यह खबर अधिकारियों को दी गई. सूचना मिलते ही अधिकारी मौके पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने घर की तलाशी ली. तलाशी के दौरान वहां से आयशा को गिरफ्तार किया गया. आयशा की निशानदेही पर तहखाने में कैद आशा उर्फ नूर को मुक्त कराया गया. नूर ने जब पुलिस को आपबीती सुनाई तो पुलिस अधिकारियों के भी रोंगटे खड़े हो गए. मासूम नूर कई सालों से शमीम की यातनाओं को झेल रही थी.

छानबीन के दौरान तहखाने से पुलिस को कई तरह की नशीली गोलियों के रैपर, इंजेक्शन, नशीली दवाओं की शीशियां, कई कंपनियों के सिम और मोबाइल मिले. इन चीजों को पुलिस ने साक्ष्य के तौर पर अपने कब्जे में ले लिया. इस के बाद पुलिस ने आशा उर्फ नूर को अदालत में पेश किया. अदालत के सामने उस ने अपने नाना के घर जाने की इच्छा जाहिर की. नाना, नानी और मामा के अलावा उस का दुनिया में कोई और बचा भी नहीं था.

आशा उर्फ नूर के बयान पर ढाका थाने में भादंवि की धारा 313, 376ए, 376डी, 376 (2एन), 372, 373, 34 एवं 3, 4, 5, 6, 8 आईटीपी और पोक्सो एक्ट के तहत आरोपी शमीम अख्तर, अजगर खां, मोहम्मद रामजान और आयशा के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया. नूर की दुखभरी कहानी सुन कर शमीम अख्तर के प्रति लोगों का आक्रोश फूट पड़ा. उन लोगों ने शमीम अख्तर को गिरफ्तार करने के लिए सड़कों पर धरनेप्रदर्शन किए. आंदोलन कई दिनों तक चलता रहा. नागरिकों के भारी दबाव में पुलिस ने शमीम को गिरफ्तार करने के लिए उस के कई ठिकानों पर दबिश दी, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं आया.

शमीम अख्तर बिहार छोड़ कर बंगाल भाग गया था. उस ने बंगाल और सिलीगुड़ी के मकान औनेपौने दामों में बेच दिए. ढाका आजाद चौक से सिमरन की बरामदगी के बाद फरार मुख्य आरोपी शमीम ने विभिन्न राज्यों में ठिकाना बनाने के बाद नेपाल के वीरगंज में पानी टंकी के पास नया ठिकाना बनाया था.

उस के बाद वह गाड़ी चोरी के रैकेट से जुड़ गया था. उस का अड्डा ढाका व बैरगनिया (सीतामढ़ी) से सटे गौर (नेपाल) में था. शातिर शमीम अख्तर चोरी की गाडि़यों के गौर पहुंचते ही नंबर प्लेट उतार कर नई नंबर प्लेट लगवा देता था, जिस के नाम से गाड़ी बेची जाती थी, उस के नाम वह फौरी तौर पर कागजात भी बनवा देता था. इस के साथ ही वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ से भी जुड़ा था.

जांच में पुलिस को शमीम के नेपाल के त्रिभुवन एयरपोर्ट से पाकिस्तान जाने की वीडियो भी मिल गई है. शमीम नेपाल से कई बार पाकिस्तान जा चुका था. पुलिस को उस के पाक जाने के पुख्ता सबूत मिले हैं. शमीम आइएसआइ तक कैसे पहुंचा, इस की भी जांच की जा रही है. आइएसआइ से जुड़ कर उस ने नकली नोटों की खेप, मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी तेज कर दी थी.

आशा उर्फ नूर शमीम अख्तर के लिए खतरा बन चुकी थी. अपने मां, बाप और भाई की हत्या की वही एकमात्र गवाह थी, जो उसे सजा दिला सकती थी. नेपाल में रह कर शमीम अख्तर उस की हत्या की योजना बना रहा था.

बात 3 अक्तूबर, 2016 की है. नूर अपने नाना के घर बाजपट्टी के बाबू नरहा और सीतामढ़ी की महिला चौकीदार इंदू देवी के साथ छत पर सोई थी. नूर को शमीम के चंगुल से मुक्त कराए जाने के बाद ढाका थाने ने उस की सुरक्षा में एक महिला और पुरुष सिपाही लगा दिए थे. रात 11 बजे के करीब नूर को घुटन महसूस हुई तो वह छटपटा कर उठ बैठी.

उस ने देखा कि कोई उस का गला दबा कर हत्या करने की कोशिश कर रहा था. वह उसे पहचान गई और चीखने लगी. उस की चीख सुन कर इंदू देवी उठ गईं. तब तक हमलावर छत से नीचे कूद कर फरार हो गया. नूर हमलावर को पहचान गई थी. वह उसी गांव का रहने वाला परमानंद कुमार था. नूर की चीख सुन कर नीचे से सिपाही अरविंद कुमार यादव भी ऊपर आ गया था. नूर ने हमलावर का नाम बताया. पुलिस ने उसी रात परमानंद कुमार को अवैध धारदार चाकू के साथ गिरफ्तार कर लिया और थाना बाजपट्टी ले आई.

थाने में पुलिस पूछताछ में आरोपी परमानंद कुमार ने पुलिस को बताया कि उसे शमीम अख्तर की ओर से नूर को जान से मारने के लिए पैसे मिले थे. ये पैसे उस के आदमियों ने दिए थे. बाजपट्टी थाने की पुलिस ने नूर की तहरीर पर भादंवि की धारा 452, 323, 376, 504, 506 और 34 के तहत परमानंद कुमार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. बाद में उसे जेल भेज दिया गया. परमानंद की नाकामी से शमीम अख्तर बौखला कर रह गया था.

शमीम के ही इशारों पर बेतिया निवासी उस के आदमियों असगर उर्फ मोजाबिल अंसारी और अफगान अहमद ने हरदोई के एसपी राजीव मेहरोत्रा की सरकारी गाड़ी चुराई. इस वाहन की वजह से ही उस के गुनाहों का भंडाफोड़ हुआ और उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा.

शमीम अख्तर अभी नेपाल की जेल में बंद है. भारत की पुलिस उस के प्रत्यर्पण के लिए कोशिश कर रही है. नेपाल की जेल में बंद शमीम अख्तर से लखनऊ एटीएस, एसटीएफ, लखनऊ स्पैशल ब्रांच, पटना स्पैशल ब्रांच, एटीएस, एटीएफ पटना की एसटीएफ के साथ मोतिहारी पुलिस के कई अधिकारियों ने पूछताछ की है.

लेकिन कानूनी दांवपेच के चलते शमीम को भारत नहीं लाया जा सका. उस के कई साथी गिरफ्तार किए जा चुके हैं और कई फरार चल रहे हैं. नूर के बयान पर ढाका थाने में शमीम के खिलाफ खुशबू सिंह, अमनदीप सिंह और संजीव सिंह की हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया था.

शमीम अख्तर ने जो गुनाह किए हैं, उस की फेहरिस्त काफी लंबी है. शायद कानून की किताबों की तमाम धाराएं उस के गुनाहों के सामने कम पड़ जाएं. मासूम नूर की तो दुनिया ही तबाह हो गई. उसे अपना कहने वाला कोई नहीं रहा.

उस के बचपन की हसरतों को शमीम ने छीन लिया था. उस के हिस्से में अंधेरों के सिवाय कुछ नहीं बचा. जैसे ही शमीम अख्तर के गिरफ्तार होने की सूचना 17 वर्षीय नूर को मिली, खुशी के मारे उस की आंखों से आंसू छलक पड़े. उस ने कानून से उस के लिए फांसी की सजा की गुहार की है.

– कथा पुलिस सूत्रों, जनचर्चाओं और सोशल मीडिया पर आधारित. कथा में आशा उर्फ नूर नाम बदला हुआ है.

गैंगस्टर दुल्हिनिया का ट्रेलर हुआ रिलीज, आप भी देखें

झारखंड के कुछ जुनूनी युवाओं की टीम द्वारा बनी बहुचर्चित फिल्म ‘गैंगस्टर दुल्हिनिया’ का ट्रेलर टीसीरीज ने शुक्रवार को लौन्च किया. साढ़े चार मिनट के इस ट्रेलर में ‘गैंगस्टर दुल्हिनिया’ बनी लूलिया गर्ल निधि झा के एक्शन के साथ गौरव झा के साथ रोमांस की भी झलक दिखाई देती है. अभी तक किसी भी फिल्म में नहीं दिखे झारखंड के खूबसूरत लोकेशन्स के बीच कलाकारों का संवाद रोमांच पैदा करता है.

दमदार है फिल्म का ट्रेलर

खलनायक संजय पांडे वैसे तो अपनी हर फिल्म में अपनी अलग लुक के लिए मशहूर हैं, लेकिन ‘गैंगस्टर दुल्हिनिया’ का उनका लुक उनके खलनायक के किरदार पर फिट बैठता है. फिल्म के एक विशेष गाने में वह अदाकारा मोनिका राय के साथ ठुमके लगाते भी दिखे हैं. दमदार ट्रेलर में कुल चार गानों की झलक मिलती है और चारों गाने पर संगीतकार अमन श्लोक की मेहनत नजर आती है, क्योंकि सभी गाने कर्णप्रिय हैं.

फिल्म में दिखेगा इनका जलवा

दर्जनों फिल्मों में अपनी नृत्य का जलवा बिखेर चुकी ग्लोरी मोहंता इस फिल्म में अभिनय का जलवा बिखेरती नजर आएंगी. बता दें, ‘गैंगस्टर दुल्हिनिया’ का निर्माण जीआर 8 फिल्म्स के बैनर तले कुमार विवेक ने किया है, जबकि फिल्म के निर्देशक हैं सौरभ सुमन झा. ‘गैंगस्टर दुल्हिनिया’ में निधि झा और गौरव झा के साथ संजय पांडे, ग्लोरी मोहंता, कन्हैया लाल, कौशिक मिश्रा और आर जे राज आदि मुख्य भूमिका में हैं.

आपको बता, फिल्म संगीतकार अमन श्लोक हैं, जबकि गीतकार हैं प्यारेलाल यादव, अरविंद तिवारी, संतोष पूरी, शेखर मधुकर और अशोक सिन्हा. फिल्म के एक्शन दृश्यों को निर्देशित किया है प्रदीप खड़के ने, जबकि सिनेमेटोग्राफी किया है साहिल जे अंसारी ने. ‘गैंगस्टर दुल्हनिया’ के गानों को कोरियोग्राफ किया है प्रसून यादव और के निशान ने जबकि प्रचारक हैं उदय भगत. निर्माता कुमार विवेक ने बताया कि फिल्म के रिलीज की घोषणा जल्द कर दी जाएगी.

सैक्रेड गेम्स में टौपलेस दिखी अदाकारा पौर्न स्टार बुलाए जाने से है दुखी

नेटफ्लिक्स की पहली भारतीय (हिंदी) वेबसीरीज सैक्रेड गेम्स अलग-अलग कारणों के चलते सुर्खियों में हैं. एक्ट्रेस राजश्री देशपांडे ने फिल्म में कुछ बेहद बोल्ड सीन्स दिए हैं. इन सीन्स को देखते वक्त दर्शक थोड़े असहज हो सकते हैं लेकिन राजश्री का कहना है कि वह इन दृश्यों को करते वक्त बेहद सहज थीं. एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया कि काम के वक्त उन्हें पूरी आजादी दी गई थी और किसी तरह की रोका-टोकी नहीं थी.

इंटरव्यू के दौरान राजश्री से पूछा गया कि क्या उन्हें ये सीन्स करते वक्त असहज महसूस हो रहा था? इस पर उन्होंने कहा, “नहीं, बिलकुल नहीं, वास्तविक सेक्स नहीं हो रहा था. लेकिन पर्याप्त मात्रा में कैमरा चीटिंग की गई है. यह वास्तविक सिनेमा का दौर है. सैक्रेड गेम्स में भी लव मेकिंग सीन्स हैं. मेरे लिए मेरा ब्लाउज खोलना एक बड़ी चीज थी, लेकिन मैंने यह कर दिया.

हालांकि कुछ चीजों पर राजश्री दुखी भी होती नजर आईं. उन्होंने कहा कि मुझे यह अंदाजा नहीं था कि मेरे उन सीन्स की तस्वीरें व्हाट्सएप पर सर्कुलेट होने लगेंगी और कौलेजों में मुझे हौट एक्ट्रेस विद मंगलसूत्र कह कर पुकारा जाने लगेगा. इतना ही नहीं उन सीन्स ने पोर्न साइट्स तक पर जगह बना ली है. सबसे खराब बात यह है कि मुझे अभी भी यह मैसेजेज आ रहे हैं कि मैं एक पोर्न स्टार हूं.

राजश्री ने कहा कि वह इसे इग्नोर करने के सिवा कुछ नहीं कर सकती हैं. उन्होंने कहा, “कुछ कमेंट्स तो निहायती भद्दे हैं. मुझे कश्यप पर भरोसा है, उन्होंने मुझे पहले ही इस बारे में बता दिया था और कहा था कि वह आगे नहीं बढ़ेंगे यदि मैं असहज होउंगी.” बता दें कि राजश्री देशपांडे ने वेबसीरीज में सुभद्रा का किरदार निभाया है. सुभद्रा गायतोंडे (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) की नौकरानी हैं.

जयललिता की वो कहानी, जो आपने कभी नहीं सुनी होगी

मई में हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में सब से ज्यादा चौंकाने वाला नतीजा था तमिलनाडु का. एग्जिट पोल जयललिता की हार की भविष्यवाणी कर रहे थे मगर जयललिता न केवल जीतीं बल्कि तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में पिछले 32 सालों में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी पार्टी को लगातार दूसरी बार सत्ता मिली हो. यह भी तब जब जयललिता स्वास्थ्य की वजह से रैलियों और प्रचार में कम नजर आई थीं. वहीं, उन्हें चुनौती दे रहे द्रमुक के नेतृत्व ने प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी थी. इस लिहाज से जयललिता की पार्टी का यह प्रदर्शन असाधारण कहा जा सकता है. वे देश में सब से ज्यादा बार यानी छठी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाली नेता बनीं.

उन के राजनीतिक जीवन में बारबार यही हुआ है. लेकिन बहुत से लोग उन्हें तब से जानते हैं जब वे मासूम लड़की थीं. अद्भुत है उन की जिंदगी की कहानी तो कुछ लोग कहते हैं पूरी फिल्मी है उन की कहानी. किसी महाबिकाऊ उपन्यास से कम रोमांचक और सनसनीखेज नहीं है उन की जीवनयात्रा.

एक मासूम लड़की

हालात ने कभी उस के सभी इंद्रधनुषी सपनों को चकनाचूर कर ऐसी दुनिया में उसे ठेल दिया था जिस से उसे सख्त नफरत थी. मगर उस ने हिम्मत नहीं हारी और वहां भी शोहरत व कामयाबी के उन शिखरों को हासिल किया जिन की झलक पाने को भी लोग तरस जाते हैं. मगर इस संघर्ष ने उसे एक ऐसी निष्ठुर व निर्मम लौह महिला बना दिया जो आज पैसा, ग्लैमर, सत्ता व राजनीति के हर खेल की माहिर खिलाड़ी बन चुकी थी और इस पुरुष प्रधान दुनिया में पुरुष उस के सामने लोटते थे.

35 सालों पहले जयललिता नाम के धूमकेतु का उदय तमिलनाडु की राजनीति में हुआ था. तब से उस के दोस्त हों या दुश्मन, समर्थक हों या विरोधी, राजनीतिज्ञ हों या मनोवैज्ञानिक, सभी जयललिता नाम की इस अबूझ पहेली को बूझने की कोशिश करते रहते हैं कि कैसे एक मासूम लड़की अंधी महत्त्वाकांक्षा, विराट अहंकार और विशुद्ध स्वार्थ का पर्याय है, जो खुद तो किसी पर विश्वास नहीं करती, मगर अपने बारे में उसे यह खुशफहमी है कि वह इस दुनिया का केंद्र है, इसलिए सारी दुनिया को उस के इर्दगिर्द घूमना चाहिए.

लंबे समय तक जयललिता के खास सहयोगी रहे भूतपूर्व सांसद वालमपुरी जौन कहते हैं कि जयललिता अंतर्विरोधों का पुलिंदा है. उस के आज के अजीबोगरीब बरताव के बीज उस के अतीत में खोजे जा सकते हैं. उस के पिता, अभिनेता एम जी रामचंद्रन और प्रेमी शोभन बाबू ये पुरुष उस की जिंदगी में आए पर इन में से कोई भी उस की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा. इसलिए आज वह हरेक पर अविश्वास करती है. कुछ मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जयललिता के दुखद और असुरक्षा की भावना से ग्रस्त बचपन में ही आज के विचित्र व्यक्तित्व की वजहें छिपी हुई हैं. जयललिता खुद भी यह स्वीकार करती रही है कि उस का बचपन कष्टपूर्ण था. अकसर बचपन की यादें ताजा होने पर उस की आंखें छलछला जाती हैं.

कई वर्षों पहले सिम्मी ग्रेवाल को दिए गए एक टैलीविजन इंटरव्यू में उस ने बहुत अफसोस के साथ बताया था कि उस का परिवार काफी संपन्न था मगर उस के पिता शराबी और फुजूलखर्च थे. इसलिए उन की मृत्यु के बाद परिवार कंगाल हो गया था. घर का खर्च चलाने के लिए मां को फिल्मों में छोटीछोटी भूमिकाएं करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

जयललिता को हमेशा यह महसूस हुआ कि चूंकि वह छोटीमोटी भूमिकाएं निभाने वाली चरित्र अभिनेत्री की बेटी है, इसलिए उस का मजाक उड़ाया जाता है. यदि वह किसी स्टार की बेटी होती, तो उस के साथी उस का सम्मान करते. उस के इर्दगिर्द घूमते. तब कक्षा में फर्स्ट आ कर उस ने अपने साथियों की जबान पर ताला लगा दिया था.

जयललिता अभिनेत्री या राजनीतिज्ञ नहीं, बल्कि लखपति और वकील बनना चाहती थी. घर की खस्ता माली हालत ने वकील बनने का उस का सपना तोड़ दिया. सोलह वर्षीय जयललिता जयराम को स्टेला मौरिस कालेज में प्रवेश लेने के बजाय श्रीधर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘वेनिश आदाई’ के सैट पर स्पौटलाइटों के बीच जा कर खड़ा होने के लिए मजबूर होना पड़ा. यह उस की जिंदगी का निर्णायक मोड़ था जिस ने हमेशा के लिए उस की राह बदल दी थी.

हुआ यह कि जयललिता की मां संध्या चाहती थीं कि उन की बेटी बालासरस्वती अथवा यामिनी कृष्णमूर्ति की तरह नृत्यागंना बने पर यह मंशा अधूरी रह गई. जयललिता की मां एक बार अपने संग जयललिता को भी एक फिल्मी पार्टी में ले गईं. उस पार्टी में फिल्म निर्मातानिर्देशकों की नजर सोलह साल की जयललिता पर पड़ी औैर वह फिल्म अभिनेत्री बन गई. खूबसूरती की खबर दूसरे राज्यों में पहुंची और जयललिता देखतेदेखते ही तमिल के अलावा तेलुगू, कन्नड़ और हिंदी फिल्मों की पौपलुर हस्ती बन गई.

अभिनय की ग्लैमरस दुनिया में कदम रखने के बाद उस की मुलाकात तमिल फिल्मों के सुपरस्टार एम जी रामचंद्रन से हुई, जिन की नजदीकियों की वजह से जयललिता का जितना नाम हुआ उससे कहीं ज्यादा उसे बदनामी भी झेलनी पड़ी. एम जी रामचंद्रन और जयललिता एकदूजे से प्रेम करते थे पर एम जी रामचंद्रन पहले से विवाहित थे और 2 बच्चों के पिता थे, जिस की वजह से उन की और जयललिता की शादी नहीं हो सकती थी, इसलिए दोनों के रिश्तों को नाम नहीं मिला. सार्वजिनक रूप से जयललिता ने हमेशा कहा कि एम जी रामचंद्रन उन के मैंटर हैं, इस से ज्यादा और कुछ नहीं.

उस के शुरुआती जीवन की आधिकारिक जानकारी केवल 1970 के दशक के अंतिम दौर में तमिल पत्रिका ‘कुमुदम’ में प्रकाशित आत्मकथात्मक लेखों की शृंखला से मिलती है. इसी लेख शृंखला में उस के शुरुआती जीवन के बारे में बताया गया है. जब उस ने एमजीआर (एम जी रामचंद्रन) के साथ अपने निजी संबंधों का जिक्र शुरू किया तो वह शृंखला एकाएक बंद हो गई. कहा जाता है कि एमजीआर ने हस्तक्षेप किया और उस से कहा कि वह लिखना बंद करे.

जयललिता ने प्रेम के बारे में अपने विचार प्रकट करते हुए कहा है, ‘‘जिसे ‘प्लेटोनिक प्रेम’ कहते हैं वह सिर्फ पुस्तकों और फिल्मों में ही पाया जाता है.’’ जाहिर है यह विचार गौडफादर और प्रेमी एम जी रामचंद्र्रन और दूसरे प्रेमी तेलुगू अभिनेता शोभन बाबू के साथ उस के प्रेमप्रसंगों का निचोड़ है. इन  2 प्रेमप्रसंगों ने न केवल प्रेम के बारे में बल्कि पुरुष जाति के बारे में उसे तल्खी से भर दिया. आज उसे हर पुरुष से शिकायत है, क्योंकि, उस की जिंदगी में जो भी पुरुष आए उन्होंने या तो उस का इस्तेमाल किया या फिर विश्वासघात किया. इस में सब से ऊपर नाम एम जी रामचंद्रन का ही है जिन्हें वह अपना मार्गदर्शक मानती रही है और जिन के नाम की दुहाई दे कर वह अब तक राजनीति करती आई है.

लंबी फिल्मी सहयात्रा के बावजूद एमजीआर और जयललिता के रिश्तों में प्रेम व नफरत का अजीब मिश्रण था. जयललिता ने खुद कहा था कि शुरुआत में उसे यह बात बहुत चुभती थी कि एमजीआर के सैट पर आने पर उसे उन के सम्मान में उठ कर खड़ा होना पड़ता और झुक कर अभिवादन करना पड़ता था. यह बात अलग है कि बाद में उस ने स्वयं को पूरी तरह एमजीआर को समर्पित कर दिया और एमजीआर के साथ उस का नाम अटूट रूप से जुड़ जाने के कारण ही वह देखतेदेखते तमिल फिल्मों की सुपरस्टार हो गई. जयललिता सुपरस्टार जरूर बन गई थी मगर अभिनेत्री के तौर पर उसे कभी ऊंचा स्थान प्राप्त नहीं हो पाया.

तमिल फिल्मों में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने के बाद हिंदी फिल्मों में भी अपने अभिनय को आजमाने की कोशिश की जयललिता ने. धमेंद्र के साथ उस ने ‘इज्जत’ नाम की फिल्म में काम किया था. लेकिन यह फिल्म बौक्स औफिस पर झंडे नहीं गाड़ सकी. इस की वजह यह भी थी कि हिंदी फिल्मों के दर्शक थुलथुल बदन वाली जयललिता को पसंद नहीं कर पाए. नतीजतन, हिंदी फिल्मों की हीरोइन बनने की जयललिता की महत्त्वाकांक्षा पर पानी फिर गया.

एम जी रामचंद्रन और जयललिता की जोड़ी जैसेजैसे तमिल फिल्मों में लोकप्रिय होती गई वैसेवैसे एमजीआर जयललिता को ले कर ज्यादा, और ज्यादा पजैसिव हो गए. वे कतई इस बात को बरदाश्त नहीं कर पाते थे कि जयललिता किसी और हीरो के साथ काम करे या किसी और हीरो के साथ देखी जाए. मगर 1970 में उन्होंने स्वयं एक नई हीरोइन के साथ काम करना शुरू कर दिया.

इस से आगबबूला हो कर जयललिता ने भी अपने लिए एक नया प्रेमी खोज लिया. उस का नाम था-शोभन बाबू. वह तेलुगू फिल्मों का हीरो था. कई वर्षों तक जयललिता उस के साथ रही मगर एमजीआर कभी भी इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर पाए. उन्होंने हर तरह के हथकंडे अपना कर शोभन बाबू और जयललिता को अलग होने पर मजबूर कर दिया. इस प्रेमत्रिकोण के टूटने से जयललिता की जिंदगी में एक बार फिर नया मोड़ आया. अब उस का फिल्मी कैरियर खत्म हो चुका था. वह फिल्मों की ग्लैमरस दुनिया से राजनीति की दुनिया की ओर चल पड़ी.

एमजीआर, जो पहले से ही फिल्मों के साथसाथ द्रमुक की राजनीति में भी सक्रिय थे, इस बीच तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हो चुके थे.  एमजीआर और जयललिता की दोस्ती फिर परवान चढ़ गई थी, मगर सबकुछ ठीकठाक नहीं था. एमजीआर के गिलेशिकवे पूरी तरह खत्म नहीं हुए थे क्योंकि अब उन्हें अपनी जया पर पहले जैसा विश्वास नहीं रह गया था. वे उस की हर मांग पूरी करते, नाजनखरे उठाते मगर दूसरी ओर उस की जासूसी भी करवाते. एमजीआर के आदमी उस की हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखते थे. मजेदार बात यह है कि उस समय एमजीआर ने जयललिता की जासूसी करने के लिए जिन लोगों को नियुक्त किया था उन में से एक थीं शशिकला, जो बाद में जयललिता की सब से खासमखास सहेली बन गईं. दूसरी ओर जयललिता में भी हार का दंश बना रहा. इसलिए वह मौका मिलते ही एमजीआर को डसने से बाज नहीं आई.

जयललिता फिर भी हमेशा एमजीआर को अपना राजनीतिक गुरु मानती रही. मगर एमजीआर सिर्फ गुरु नहीं, गुरुकंटाल थे. एक घुटे हुए राजनीतिज्ञ की तरह राजनीति के सारे दांवपेच जानते थे. इसलिए फिल्मी ग्लैमर से महिमामंडित जयललिता को उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी नेता, उदार व अंधविश्वास विरोधी करुणानिधि की अपार लोकप्रियता की कारगर काट के लिए चुना.

एमजीआर के बहुत से विश्वस्त साथियों और अन्नाद्रमुक के नेताओं ने जयललिता के राजनीति में प्रवेश का डट कर विरोध किया था. कुछ तो यह मानते थे कि यह एमजीआर के राजनीतिक जिंदगी की सब से बड़ी गलती थी. लेकिन एमजीआर ने किसी की सलाह पर ध्यान नहीं दिया. और 1982 में जयललिता को अन्नाद्रमुक का प्रचार सचिव बना दिया. वह पार्टी में आते ही दो नंबर की बन गई थी. लोगों में आमधारणा बन गई थी कि एमजीआर ने उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया है.

राजनीति में पांव जमाते ही जयललिता ने अपने राजनीतिक गुरु की ही जड़ें काटनी शुरू कर दीं. तब एमजीआर को भी अपने किए पर पछताना पड़ा. मगर तब तक काफी देर हो चुकी थी. जयललिता अपने बूते पर अपने लिए मुकाम बना चुकी थी. एमजीआर की गलती की कीमत उन के बजाय तमिलनाडु को ज्यादा चुकानी पड़ी.

एमजीआर की खता इतनी भर नहीं थी कि वे जयललिता को राजनीति में लाए, बल्कि यह भी थी कि उन्होंने उस की हर सनक, हर मांग को पूरा कर उस के दिमाग को सातवें आसमान तक पहुंचा दिया था. अगर उस की छोटी सी जरूरत या इच्छा पूरी न होती तो वह आसमान सिर पर उठा लेती.

उस का एक किस्सा तो लोग आज भी चटखारे लेले कर बताते हैं. 8वें दशक में जब वह सिर्फ राज्यसभा की सदस्य थी, तब अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान अकसर तमिलनाडु भवन में रहती. उस के लिए वहां का स्टाफ उस का खास ड्रिंक (जिन और नारियल पानी) बना कर रखना कभी नहीं भूलता था. लेकिन एक बार वहां के कर्मचारी नारियल खरीदना भूल गए और जयललिता अपनी पसंदीदा ड्रिंक नहीं पी सकी. इस बात से उस का पारा इतना चढ़ गया कि उस ने तमिलनाडु भवन के शीशे तोड़ने शुरू कर दिए.

आखिरकार भवन के अफसरों ने हरियाणा भवन से नारियल पानी मंगा कर जयललिता को उस का पसंदीदा ड्रिंक पेश किया. गला तर होने पर वह शांत हुई. तब से तमिलनाडु भवन के अधिकारियों ने स्टाफ को स्थाई निर्देश दे रखे थे कि जरूरत हो या न हो, नारियल का स्टौक हमेशा रखा जाए.

जयललिता और विवाद का चोलीदामन का साथ रहा है. राजनीति में उस के प्रवेश के साथ ही बखेडे़ शुरू हो गए थे और उन का सिलसिला आज तक बदस्तूर जारी है. इन बखेड़ों के लिए वह खुद ही बहुत हद तक जिम्मेदार थी.

दरअसल, जयललिता का अहंकारी स्वभाव और स्वकेंद्रित कार्यशैली ही इस सारे विवाद की जड़ थी. पार्टी में जूनियर होने के बावजूद वह पार्टी के बड़े और वरिष्ठ नेताओं के साथ किसी महारानी की तरह पेश आती. और इस पर तुर्रा यह था कि पार्टी के प्रचार के नाम पर उस ने जगहजगह ‘जयललिता मनरम’ यानी जयललिता फैन्स क्लब बनाना शुरू कर दिया था. इसे पार्टी के अंदर अलग दबाव गुट बनाने की कोशिश माना जा रहा था. जयललिता के सनकभरे और तानाशाही रवैये से पुराने नेता इस कदर नाराज थे कि 1984 में सोमसुंदरम के नेतृत्व में पार्टी के एक गुट ने इस की कार्यशैली और एमजीआर द्वारा उसे नियंत्रित न कर पाने के खिलाफ बगावत कर दी. इस तरह सत्ता में आने के बाद पहली बार अन्नाद्रमुक में फूट पड़ी.

इस के बावजूद एमजीआर अपनी चहेती जयललिता का ही पक्ष लेते रहे. मगर उस की उपस्थिति पार्टी के लिए खतरा बनती जा रही थी, इसलिए एमजीआर ने एक नया रास्ता निकाला. उसे राज्यसभा का सदस्य बना कर दिल्ली भेज दिया. जयललिता कभी इस अपमान को बरदाश्त नहीं कर पाई. धीरेधीरे उस में स्वयं तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनने की इच्छा पनपने लगी. यह तब तक संभव नहीं था जब तक एमजीआर मुख्यमंत्री की कुरसी पर विराजमान थे. इसलिए एक तरफ वह एमजीआर के नाम की दुहाई दे कर अपने को उन का वारिस साबित करने की कोशिश करती रही और दूसरी ओर अपने राजनीतिक गुरु की जड़ें खोदने में लगी रही. जब एमजीआर गंभीर रूप से बीमार पड़ गए तो उस ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी और राज्यपाल एस एल खुराना से अनुरोध किया था कि चूंकि एमजीआर का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वे मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी नहीं निभा सकते, इसलिए उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया जाए.

तब एमजीआर जयललिता द्वारा उन के खिलाफ छेडे़ गए अभियान से इतने नाराज हुए थे कि उन्होंने जयललिता को संसदीय दल के उपनेता के पद से हटा दिया था. उन दिनों क्रोध से धधक रही जयललिता ने अंगरेजी की एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में एक बयान दिया था. यह बयान एक तरह से एमजीआर के प्रभाव से मुक्त हो कर एक स्वतंत्र हस्ती के रूप में विकसित होने की घोषणा थी. इस के बाद से तमिलनाडु में जयललिता पीरावई नामक संगठन उभरने लगा था. इसे जयललिता के ही समर्थकों ने उसी के इशारे पर शुरू किया था. मगर जयललिता ने एक बयान जारी कर उस से अपना पल्ला झाड़ लिया था और कहा था कि इस संगठन को बनाने में उस का कोई हाथ नहीं है. मगर एमजीआर हकीकत जानते थे. उन्होंने जयललिता को निर्देश दिए कि वह प्रचार सचिव के रूप में काम करना बंद कर दे और उस के खास समर्थक कानन को तो पार्टी से निकाल दिया.

इस बीच, अन्नाद्रमुक में जयललिता का विरोधी गुट एमजीआर को यह समझाने में कामयाब हो गया कि यदि उन्हें पार्टी पर अपना प्रभुत्व बना कर रखना है, पार्टी की एकता और अनुशासन बनाए रखना है तो आमसभा की बैठक बुला कर जयललिता और उस के समर्थकों को पार्टी से निकाल देना चाहिए. एमजीआर इस के लिए राजी भी हो गए. मगर जैसे ही जयललिता को इस की भनक लगी, उस ने अपने गुट के 33 विधायकों के साथ प्रधानमंत्री राजीव गांधी से संपर्क किया. पता रहे कि जयललिता ने राज्यसभा सदस्य के रूप में राजीव गांधी से बहुत मधुर संबंध बना लिए थे और एमजीआर इस से बहुत खफा थे.

राजीव गांधी के जरिए जयललिता ने एमजीआर पर दबाव डलवाया कि वे जयललिता के अन्नाद्रमुक से निष्कासन पर रोक लगा दें. नतीजा यह हुआ कि अन्नाद्रमुक की आमसभा के एजेंडे से जयललिता के निष्कासन का विषय हटा दिया गया और जयललिता को आमसभा को संबोधित करने के लिए बुलाया गया. यह एक तरह से जयललिता की एमजीआर पर राजनीतिक जीत थी.

इस के बावजूद, जयललिता की पार्टी विरोधी गतिविधियां नहीं रुकीं तो एमजीआर ने दोबारा उन्हें पार्टी से निकालने का पक्का फैसला किया. एमजीआर के निकट सहयोगी वीरप्पन बताते हैं- ‘22 दिसंबर, 1987 को एमजीआर ने पार्टी औफिस को जयललिता के फोन को काटने का निर्देश दिया था. 25 दिसंबर को वे राष्ट्रपति की राज्य यात्रा खत्म होने के बाद जयललिता को पार्टी से निष्कासित करने की घोषणा करने वाले थे लेकिन 24 दिसंबर के दिन लंबी बीमारी के कारण एमजीआर की मृत्यु हो गई.’ केवल एक दिन के फर्क ने जयललिता के राजनीतिक कैरियर को बचा लिया. यदि एमजीआर की मृत्यु एक दिन बाद होती तो इतिहास कुछ और होता. एमजीआर जयललिता को पार्टी से निकाल चुके होते. तब एमजीआर की वारिस होने का दावा वह कर नहीं पाती.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि तब तक जयललिता का अपना कोई जनाधार नहीं था. मगर एमजीआर को हटाने की मुहिम में लगी रही जयललिता ने उन की मृत्यु के बाद उन के नाम का जम कर इस्तेमाल किया. लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि वही एमजीआर की असली वारिस है. कहना न होगा कि अपनी कोशिश में वह कामयाब भी हुई. एमजीआर के बाद उन की पत्नी जानकी कुछ दिनों के लिए राज्य की मुख्यमंत्री बनीं. लेकिन जयललिता ने खुद को रामचंद्रन का असली उत्तराधिकारी बताते हुए पार्टी तोड़ दी. बाद में हुए विधानसभा चुनाव में उसे 23 सीटें मिलीं, जबकि जानकी वाली अन्नाद्रमुक को सिर्फ एक.

एमजीआर के साथ चले शीतयुद्ध में सफलता ने जयललिता को आत्मविश्वास से भर दिया था. एमजीआर देश के घाघ राजनेताओं में एक माने जाते थे. जब जयललिता अपनी कुटिलता के जरिए उन्हें मैनेज करने में कामयाब रही तो उस में यह भावना जन्मी कि अब वह हर तरह के राजनीतिज्ञों को उन के खेल में मात दे सकती है. और उस ने ऐसा किया भी.

एम जी रामचंद्रन की मृत्यु के बाद अन्नाद्रमुक 2 हिस्सों में बंट गई थी- एक तरफ थी एम जी रामचंद्रन की पत्नी जानकी तथा अन्नाद्रमुक के नेता वीरप्पन तो दूसरी तरफ थी जयललिता. दोनों पक्षों में एकदूसरे को राजनीतिक रूप से खत्म करने की लड़ाई खुल कर चलती रही. दरअसल, एमजीआर की अंतिम यात्रा के दिन ही यह लड़ाई फूट पड़ी थी. एमजीआर की पत्नी जानकी ने जयललिता को अंतिम दर्शन के लिए उस गाड़ी पर चढ़ने नहीं दिया था जिस में शव को ले जाया जा रहा था. उसे उस गाड़ी से धकेल दिया गया था. जयललिता ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी.

बाद में उस ने जानकी पर यह आरोप लगाया था कि जानकी ने उसे जहर मिली छाछ पिला कर मारने की कोशिश की थी. ज्यादातर लोग इस आरोप को झूठा और इस बात का सुबूत मानते हैं कि जयललिता अपने विरोधियों से बदला लेने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है.

1989 में हुए विधानसभा चुनावों में जयललिता के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक को द्रमुक के हाथों बुरी तरह पराजित होना पड़ा था. इस हार से वह इतनी हताश और निराश हो गई थी कि उस ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से मिलनाजुलना बंद कर दिया था. कई बार उस ने राजनीति से संन्यास लेने तक की धमकी दी. कुछ समय तक तो वह चेन्नई छोड़ कर अपने हैदराबाद वाले बंगले में रहने के लिए चली गई थी.

1989 के विधानसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद एआईएडीएमके के भीतर लामबंदी और तेज हो गई. जयललिता को विपक्ष का नेता चुना गया. उस ने करुणानिधि और डीएमके की नीतियों का जम कर विरोध किया. प्रभावी नेतृत्व के कारण जयललिता का अपनी पार्टी में प्रभुत्व बढ़ता गया. आखिर जानकी रामचंद्रन ने राजनीति से संन्यास ले लिया और दोनों धड़ों का आपस में विलय हो गया. 1991 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में उसे अभूतपूर्व समर्थन के साथ मुख्यमंत्री की कुरसी मिली. हुआ यह कि राजीव गांधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में सहानुभूति लहर के कारण अन्नाद्रमुक और कांग्रेस गठबंधन को अभूतपूर्व सफलता मिली.

द्रमुक को इतनी करारी हार का सामना करना पड़ा कि करुणानिधि के अलावा द्रमुक का एक भी सदस्य विधानसभा में पहुंच नहीं पाया. इस प्रकार जयललिता ने अपनी नाकामी और हार को एक शानदार जीत में बदल दिया था. वह तमिलनाडु की राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गई.

सफलता की लहर पर चढ़ कर जयललिता मुख्यमंत्री की कुरसी तक पहुंच गई. मुख्यमंत्री बनने के बाद उस ने भ्रष्टाचार, व्यक्तिपूजा, मनमानी और प्रतिशोध के कीर्तिमान बनाए मगर उस की लोकप्रियता में कभी कोई कमी नहीं आई. राजनीतिक विश्लेषक भगवान सिंह कहते हैं, ‘‘1989 में जब उन्होंने विधानसभा में करुणानिधि के बजट पेश करने के दौरान आपत्ति जताई थी तो वहां अफरातफरी मच गई थी. और एक बार तो ऐसी स्थिति पैदा हो गई थी कि डीएमके के एक वरिष्ठ सदस्य ने उन के कपड़े फाड़ दिए थे. तब उन्होंने कसम खाई थी कि वे विधानसभा में बतौर मुख्यमंत्री ही आएंगी.’’

लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल का भूत अब तक भी उस का पीछा करता रहा है. इसी दौरान (1991-96) उस के कामों या अनदेखियों की वजह से आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हुआ था. मामले के उतारचढ़ावों की वजह से उसे 2 बार (2002 और 2015) अपनी मुख्यमंत्री की कुरसी खाली करनी पड़ी. पहली बार मुख्यमंत्री रहते हुए जयललिता पर कई आरोप लगे. उस ने कभी शादी नहीं की लेकिन अपने दत्तक पुत्र वी एन सुधाकरण की शादी पर पानी की तरह पैसे बहाए. 2001 में वह दोबारा सत्ता में आई. अकसर जयललिता की तुलना फिनिक्स पक्षी से की जाती है, जिस के बारे में कहा जाता है कि वह मरने के बाद फिर जी उठता है. जयललिता के राजनीतिक कैरियर के साथ भी बारबार ऐसा ही हुआ है. कई बार राजनीतिक पंडितों ने उस के राजनीतिक जीवन को श्रद्धांजलि अर्पित कर दी, मगर नाकामी की राख को झटक कर वह फिर राजनीति के क्षितिज पर उभर आई, ज्यादा ताकत और ज्यादा चमक के साथ.

1996 के विधानसभा चुनावों में जयललिता को बड़ी करारी शिकस्त मिली थी. ऐसा होना लाजिमी था. मुख्यमंत्री के तौर पर उस के 5 साल चरम भ्रष्टाचार, परले दरजे की अक्षमता और राजनीतिक प्रतिशोध के लिए हमेशा याद किए जाते रहेंगे. चुनावों में पराजय के अलावा जेल की हवा खा कर उसे इस अपराध की कीमत चुकानी पड़ी, लेकिन ढाई साल बाद ही फिर उस का राजनीतिक कायाकल्प हो गया जब 1998 के लोकसभा चुनाव में उस ने भाजपा और अन्य कई दलों से गठबंधन कर द्रमुक और तमिल मनीला कांग्रेस को धूल चटा दी. राज्य की 38 लोकसभा सीटों में से 27 सीटें उस के नेतृत्व वाले गठबंधन को मिलीं. इस प्रकार राष्ट्रीय राजनीति में वह एक ऐसी निर्णायक शक्ति के रूप में उभरी, जिस के पास दिल्ली की किसी भी केंद्र सरकार को बनाने अथवा बिगाड़ने की कुंजी थी. इस शक्ति का जयललिता ने उपयोग कम, व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति के लिए दुरुपयोग ज्यादा किया.

आय से अधिक संपत्ति और भ्रष्टाचार के आरोपों को ले कर सत्ता छोड़ने के लिए बाध्य हुई अन्नाद्रमुक प्रमुख जयललिता ने मई 2015 को, करीब 8 माह बाद, फिर से 5वीं बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद  की शपथ ली. गौरतलब है कि 27 सितंबर, 2014 को बेंगलुरु की एक निचली अदालत ने आय से अधिक 66.66 करोड़ रुपए की संपत्ति के मामले में जयललिता को दोषी ठहराया था जिस से वह मुख्यमंत्री पद के लिए अयोग्य हो गई थी. हालांकि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 11 मई, 2015 को उसे इन आरोपों से बरी कर दिया था. जयललिता के बरी होने के साथ ही उस के फोर्ट सेंट जौर्ज स्थित सत्ता की पीठ में वापसी की प्रक्रिया की शुरुआत हो गई थी.

एक नाजुकमिजाज महारानी

कोई भला कहे या बुरा, जयललिता का हर राजनीतिज्ञ की तरह का एक ही एजेंडा है-अपना हित साधना. और इसी की पूर्तता के लिए वह अपनी पार्टी और अपने सारे जनाधार का इस्तेमाल कर रही है. जो भी इस एजेंडे में जरा भी बाधक बनता है, जयललिता उसे अपना दुश्मन समझने लगती है. उसे सही रास्ते पर लाने के लिए वह हर तरीके का इस्तेमाल करने से नहीं चूकती.

झूठे आरोप लगाने में तो जयललिता का कोई सानी नहीं है. बहुत सारे लोग उस की इस आदत के शिकार हो चुके हैं. इन में छोटेमोटे लोग नहीं, पी वी नरसिंहा राव, करुणानिधि और जी के मूपनार जैसे बड़ेबड़े नाम हैं. जब प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के साथ जयललिता के रिश्ते कुछकुछ बिगड़ने लगे थे तब एक बार तमिलनाडु विधानसभा में कांग्रेसी सदस्यों ने राज्य में बढ़ रही डकैतियां करवाने का आरोप लगाते हुए कहा था, ‘हो सकता है मेरी सरकार को बदनाम कराने के लिए नरसिंहा राव यह सब करा रहे हों.’  किसी जमाने में जयललिता के राजीव गांधी से मधुर संबंध थे. मगर अहंकार पर थोड़ी चोट लगने पर जयललिता उन्हें भी आडे़ हाथों लेने से चूकी नहीं. हुआ यह कि किसी दिन जयललिता ने रात 10.30 बजे राजीव गांधी को फोन किया तो राजीव गांधी फोन पर नहीं आए. इतने भर से जयललिता को इतना सदमा लगा कि दूसरे दिन एक बयान जारी कर के उस ने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया, ‘जो व्यक्ति 10.30 बजे फोन पर उपलब्ध नहीं हो सकता, वह कैसे देश का प्रधानमंत्री बना रह सकता है.’

ये सारी घटनाएं इस बात की ओर इंगित करती हैं कि जयललिता एक नाजुकमिजाज महारानी की तरह है जो अपनी शान में कोई गुस्ताखी पसंद नहीं कर सकती, गुस्ताखी करने वाले को मजा चखा कर ही दम लेती है. ताजा विधानसभा चुनाव में जयललिता का करिश्मा खूब नजर आया. जयललिता के कम दिखने के चलते कई जानकारों ने उन की वापसी पर शक जताया था. कई एग्जिट पोल भी ऐसी ही संभावना जता चुके थे.

गरीबों की पकड़ी नब्ज

जयललिता को यह विश्वास था कि गरीबों के लिए चलाई गई उन की योजनाएं चुनाव में अपना असर दिखाएंगी ही. इन योजनाओं पर गौर करें तो उन की सुपर हिट ‘अम्मा कैंटीन’ का विपक्ष के पास भी कोई जवाब नहीं है. इस कैंटीन में सुबह के नाश्ते में 2 रुपए की 2 इडली, सांभर के साथ मिलती हैं. साथ ही, 3 रुपए में 2 चपातियां भी मिलती हैं जिन के साथ दाल मुफ्त होती है. कैंटीन में 5 रुपए में प्लेटभर ‘लेमन राइस’ या ‘कर्डराइस’, सांभर के साथ मिलता है. इस तरह जयललिता ने इस योजना से गरीबों की नब्ज पकड़ी है जिन के लिए दो वक्त का खाना ही सब से बड़ी चीज मानी जाती है. तभी तो अम्मा कैंटीन शायद एकमात्र ऐसी स्कीम है जिसे विधानसभा चुनाव में जीत की स्थिति में विपक्षी डीएमके ने भी जारी रखने का वादा किया था.

जयललिता ने पिछले चुनाव में 54 वादे किए थे जिन्हें उन्होंने पूरा भी किया. इन में राशनकार्ड धारकों को 20 किलो चावल, महिलाओं को मिक्सर, ग्राइंडर, पंखा, ग्रामीण क्षेत्र के गरीबों को दुधारू गाय और बकरियां मुफ्त देने जैसी कई योजनाएं शामिल हैं. इस के अलावा उन्होंने वे योजनाएं भी चलाईं जिन का उन्होंने वादा नहीं किया था. इन में अम्मा कैंटीन, अम्मा पानी, अम्मा नमक, अम्मा सीमेंट और गरीब महिलाओं के लिए मुफ्त सेनेटरी नैपकिन देना शामिल हैं. ये सभी योजनाएं ऐसी हैं जिन्होंने जयललिता को लोगों में लोकप्रिय बना दिया. इस बार भी जयललिता ने चुनाव से पहले मतदाताओं को तमाम मुफ्त चीजें देने के वादों की बारिश की थी. इन में पूर्ण शराबबंदी, महिलाओं को स्कूटर और मोपेड खरीदने पर 50 प्रतिशत सब्सिडी, किसानों को ऋणमाफी, 100 यूनिट मुफ्त बिजली और लड़कियों को शादी से पहले सरकार की ओर से दिए जाने वाले 4 ग्राम सोने को बढ़ा कर 8 ग्राम करना शामिल हैं.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, ‘‘वे आक्रामक, अहंकारी और कठोर रही हैं. लेकिन इन्हीं खासीयतों के चलते लोग उन्हें पसंद करते रहे हैं. उन्हें ‘लोहे की तितली’ भी कहते हैं.’’ उन के मुताबिक, साल 2000 की शुरुआत में जयललिता अकसर अपनी सार्वजनिक सभाओं में कहती थीं, ‘आप के सामने आप की बहन खड़ी है.’ लेकिन 2012 में सत्ता में आने के बाद वे अम्मा बन गईं. एक देवी जैसी, जो जानबूझ कर लोगों से दूरी तो बनाए रखती है, लेकिन परोपकारी भी है, उन का दुखदर्द भी जानती है.

शशिकला से जिगरी दोस्ती की कहानी

जयललिता और शशिकला की जिगरी दोस्ती की कहानी पिछले 25 सालों से सियासत के गलियारों में सुनी जाती रही है.  तमिलनाडु में वी के शशिकला को जयललिता का साया कहा जाता है. उन्हें देश की सब से ताकतवर महिला नेताओं में से एक और मुख्यमंत्री जयराम जयललिता के पीछे की ताकत कहा जाता है. लेकिन किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि दोनों की कहानी में केवल प्यार और विश्वास ही था. उस में साजिश, धोखा और फरेब का मसाला भी रहा है. कई बार दोस्ती टूटी भी. मगर फिर जुड़ भी गई.

तमिलनाडु के तंजौर जिले के मन्नारगुडी गांव की शशिकला की पढ़ाई तो शुरुआत में ही छूट गई और फिल्मों से नाता गहरा होता चला गया. फिल्मों का ही असर था कि शशिकला फिल्मस्टारों जैसे ऐशोआराम वाली जिंदगी जीने के ख्वाब देखने लगी.

जयललिता की बढ़ती लोकप्रियता के कारण शशिकला उन की वीडियो फिल्म बना कर उन के करीब आना चाहती थीं. जयललिता ने भी फिल्म बनाने की अनुमति दे दी. शशिकला शूटिंग के दौरान जयललिता की हर छोटीबड़ी जरूरत का खयाल रखने लगी. यहीं से शशिकला ने जयललिता पर शिकंजा कसना शुरू किया. शशिकला के प्रभाव के चलते ही जयललिता ने वी एन सुधाकरन को अपना दत्तक पुत्र बनाया. मुख्यमंत्री के तौर पर 1991 से 1996 तक के जयललिता के पहले कार्यकाल में शशिकला संविधान से परे एक शक्ति के तौर पर काम करने लगी.

राजनीति के गलियारे में लोग शशिकला को मन्नारगुड़ी का माफिया कह कर बुलाने लगे. 1995 में वी एन सुधाकरन की शादी पूरी दुनिया में चर्चित हुई, इस पर 100 करोड़ रुपए जो खर्च हुए थे. 1996 के आम चुनाव में इसी वजह से जयललिता की पार्टी राज्य की सभी 39 सीटें हार गई. इस से घबराई जयललिता ने शशिकला और उस के परिवार से दूरी बना ली. इसी दौरान शशिकला को विदेशी मुद्रा के लेनदेन के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया. जेल से बाहर आने पर उस ने जयललिता से माफी मांगी. अपने सभी रिश्तेदारों तक से दूरी बनाने का विश्वास दिलाया. दोनों सहेलियां फिर एक हो गईं. 2001 में जयललिता के सत्ता में आने पर शशिकला ने खुद को परदे के पीछे रखा. एक पत्रिका ने दावा किया था कि जयललिता की खास दोस्त शशिकला ने जयललिता को धीमा जहर दे कर तमिलनाडु का ताज पाने की साजिश रची थी.

जयललिता को अपनी सरकार के तख्तापलट की साजिश का पता चला तो उन्होंने 17 दिसंबर, 2011 को शशिकला व उन के रिश्तेददारों समेत 12 लोगों को पार्टी से निकाल दिया. हालांकि, यह अलगाव भी 100 दिन ही चला. शशिकला द्वारा माफी मांग लेने पर जयललिता ने उसे दोबारा दोस्त के तौर पर अपना लिया. ऐसा माना जाता है कि आजकल शशिकला ही एआईएडीएमके के सभी मामले देखती हैं और एक प्रकार से सरकार के कामकाज पर भी नजर रखती हैं.

भाजपा से रिश्तों में उतारचढ़ाव

जनता पार्टी के तब के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता पर 1991 से 1996 के दौरान आय से अधिक संपत्ति रखने का आरोप लगाते हुए अदालत में निजी शिकायत दर्ज कराई मगर बाद में दोनों में सुलह हो गई. इस मामले में 27 सितंबर, 2014 को विशेष अदालत ने जयललिता और 3 अन्य को भ्रष्टाचार का दोषी ठहराया. उन्हें 4-4 साल कारावास की सजा सुनाई गई. सजा मिलने के कारण विधायक के तौर पर अयोग्य हो जाने के बाद जयललिता को मुख्यमंत्री पद की कुरसी छोड़नी पड़ी. हालांकि 8 महीने बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने जयललिता को आय से अधिक संपत्ति के मामले में बरी कर दिया और जयललिता एक बार फिर मुख्यमंत्री बनीं. लेकिन स्वामी के साथ तब हुई सुलह के कारण जयललिता ने उन के कहने पर वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. उस के बाद आए अविश्वास प्रस्ताव में वाजपेयी सरकार एक वोट से गिर गई. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनने वाली पहली भाजपा सरकार महज 13 दिनों में ही गिर गई थी. राष्ट्रपति ने दूसरी बार भाजपा को सरकार बनाने से पूर्व उस को सभी गठबंधन सहयोगियों से एक चिट्ठी पर हस्ताक्षर करवाने की शर्त रखी थी. सरकार बनाने की और नए सहयोगियों को जुटाने की जल्दबाजी में भाजपा एक बड़ी चूक कर बैठी कि वह अपने सभी गठबंधन सहयोगियों से समर्थन की औपचारिक चिट्ठी लेना भूल गई.

अन्नाद्रमुक की जयललिता ने भाजपा की इस गलती का राजनीतिक फायदा उठाते हुए चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने के बदले अपनी कुछ शर्तें रख दीं. जयललिता ने सुब्रह्मण्यम स्वामी को वित्त मंत्री बनाना उन्हीं शर्तों में शामिल था.

19 मार्च, 1998 को अटल बिहारी वाजपेयी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बन गए तो दूसरी तरफ कांग्रेस की बागडोर पहली बार सोनिया गांधी के हाथ में आ गई. यहीं से कांग्रेस एक बार फिर से नेहरुगांधी परिवार की जागीर बन गई. सुब्रह्मण्यम स्वामी वित्त मंत्री न बनाए जाने से खफा थे, इसलिए उन्होंने राजग सरकार को अस्थिर करने के लिए जयललिता और सोनिया गांधी का टी पार्टी के जरिए मिलन करवाया. गुपचुप तरीके से दोनों नेत्रियों ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला कर लिया. टी पार्टी के कुछ दिनों के बाद सुनियोजित तरीके से जयललिता ने राजग सरकार से समर्थन वापस ले लिया.17 अप्रैल, 1999 का दिन अटल बिहारी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के लिए किसी अग्निपरिक्षा से कम नही था क्योंकि संसद में उस के समक्ष सत्ता के लिए जरूरी 273 का आकंड़ा पूरा करना था. संसद के मतदान में 269 और सरकार के विरोध में 270 वोट पड़े. इस प्रकार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार महज 13 महीने तक ही चल सकी.

फायदे हैलमैट पहनने के

अगर कोई आप से पूछे कि आप हैलमैट क्यों पहनते हैं? तो आप का सीधा सा जवाब होगा कि हादसे के समय सिर को बचाने के लिए हैलमैट पहनते हैं. मगर हैलमैट पहनने की केवल यही एक वजह नहीं है. इस की जानकारी मुझे अपने दोस्त गिरधारीजी से मिली.

एक दिन मैं यों ही गिरधारीजी के घर गया. वे घर पर नहीं थे. भाभीजी ने आदर से मुझे बैठाया. अभी हम चायपानी कर ही रहे थे, इतने में गिरधारीजी घर आ गए. स्कूटर बाहर खड़ा कर हैलमैट लगाए हुए ही वे अंदर चले आए.

उन्होंने मुझे हैलमैट को उतार कर नमस्कार किया, यह सब मुझे बड़ा अटपटा लगा.

पूछने पर वे कहने लगे, ‘‘हैलमैट के बहुत फायदे हैं. जैसे अगर आप दफ्तर से देर से घर आए हैं. आप की बीवी खरीदारी पर जाने के लिए कब से आप का इंतजार करतेकरते थक गई है, तो उस का गुस्सा सातवें आसमान पर होगा ही. जैसे ही आप घर में दाखिल होंगे, बीवी की बेलनरूपी मिसाइल से केवल हैलमैट ही आप को बचा सकता है और कोई नहीं.

‘‘अगर दफ्तर जाने में देर हो जाए. घबराने की जरूरत नहीं है. आप आराम से हैलमैट लगाए हुए ही दफ्तर के अंदर जाएं. बौस पहले आप को देखेगा, फिर घड़ी को देख कर चीखेगा, मगर आप को हैलमैट के चलते कुछ सुनाई नहीं देगा.

‘‘फिर भी बौस का गुस्सा न उतरा हो, तो वह केबिन में बुलाएगा. फिर आप कहिएगा, ‘सर, हैलमैट पहने था, इसीलिए आप की बातें सुन न सका.’

‘‘अगर आप की बीवी दफ्तर जाते समय रोज कभी सब्जी, कभी राशन लाने को कहे, तो आप भी परेशान हो जाते होंगे. दिनभर दफ्तर के पकाऊ काम से थके होने के चलते खरीदारी करना बड़ा सिरदर्द होता है. इस दर्द का इलाज यह हैलमैट ही है.

‘‘बीवी जब टमाटर मंगाए, तो घर में आलू ले जाइए. मिर्च की जगह नीबू खरीदें. बीवी गुस्सा होगी. कहना कि हैलमैट पहने हुए था. सुनाई नहीं दिया होगा. दूसरे दिन से बीवी आप से सब्जी मंगाना बंद कर देगी.

‘‘अगर आप के दोस्त आप से उधार मांगने के लिए दफ्तर के बाहर खड़े हो कर आप को आवाज दें. आप देख कर भी उन्हें अनदेखा कर दें. जब कोई उलाहना दे, तो कहें कि दोस्त, हैलमैट पहने था. सुनाई नहीं दिया होगा. इस तरह हैलमैट आप के रुपयों को डूबने से बचा लेता है.

‘‘अगर आप बीवी के साथ सड़क पर घूम रहे हैं, तो अगलबगल ताकझांक करने पर बीवी का कंट्रोल होता है. इस का भी अचूक उपाय है. हैलमैट पहन कर आप मनचाही जगह ताकझांक करो, कोई आप को पकड़ नहीं पाएगा.’’

मैं गिरधारीजी की बातों से हैरान था. शायद इसीलिए कहा गया है, ‘हैलमैट में गुण बहुत हैं, सदा रखिए संग…’

नया क्षितिज (भाग-1) : अब क्या करेगी वसुधा

‘वसु,’ पीछे से आवाज आई, वसुधा के पांव ठिठक गए, कौन हो सकता है मुझे इस नाम से पुकारने वाला, वह सोचने लगी. ‘वसु,’ फिर आवाज आई, ‘‘क्या तुम मेरी आवाज नहीं पहचान रही हो? मैं ही तो तुम्हें वसु कहता था.’’ पुकारने वाला निकट आता सा प्रतीत हो रहा था. अब वसु ने पलट कर देखा, शाम के धुंधलके में वह पहचान नहीं पा रही थी. कौन हो सकता है? वह सोचने लगी. वैसे भी, उस की नजर में अब वह तेजी नहीं रह गई थी. 55 वर्ष की उम्र हो चली थी. बालों में चांदी के तार झिलमिलाने लगे थे. शरीर की गठन यौवनावस्था जैसी तो नहीं रह गई थी. लेकिन ज्यादा कुछ अंतर भी नहीं आया था, बस, हलकी सी ढलान आई थी जो बताती थी कि उम्र बढ़ चली है.

लंबा छरहरा बदन तकरीबन अभी भी उसी प्रकार का था. बस, चेहरे पर हलकीहलकी धारियां आ गई थीं जो निकट आते वार्धक्य की परिचायक थीं. कमर तक लटकती चोटी का स्थान ग्रीवा पर लटकने वाले ढीले जूड़े ने ले लिया था.

अभी भी वह बिना बांहों का ब्लाउज व तांत की साड़ी पहनती थी जोकि उस के व्यक्तित्व का परिचायक था. कुल मिला कर देखा जाए तो समय का उस पर वह प्रभाव नहीं पड़ा था जो अकसर इस उम्र की महिलाओं में पाया जाता है.

‘वसु’ पुकारने वाला निकट आता सा प्रतीत हो रहा था. कौन हो सकता है? इस नाम से तो उसे केवल 2 ही व्यक्तियों ने पुकारा था, पहला नागेश, जिस ने जीवन की राह में हाथ पकड़ कर चलने का वादा किया था लेकिन आधी राह में ही छोड़ कर चला गया और दूसरे उस के पति मृगेंद्र जिन्हें विवाह के 15 वर्षों बाद ही नियति छीन कर ले गई थी. दोनों ही अतीत बन चुके थे तो यह फिर कौन हो सकता था. क्या ये नागेश है जो आवाज दे रहा है, क्या आज 35 वर्षों बाद भी उस ने उसे पीछे से पहचान लिया था?

आवाज देने वाला एकदम ही निकट आ गया था और अब वह पहचान में भी आ रहा था. नागेश ही था. कुछ भी ज्यादा अंतर नहीं था, पहले में और बाद में भी. शरीर उसी प्रकार सुगठित था. मुख पर पहले जैसी मुसकान थी. बाल अवश्य ही थोड़े सफेद हो चले थे. मूंछें पहले पतली हुआ करती थीं, अब घनी हो गई थीं और उन में सफेदी भी आ गई थी.

‘तुम यहां?  इतने वर्षों बाद और वह भी इस शाम को अचानक ही कैसे आ गए,’ वसुधा ने कहना चाहा किंतु वाणी अवरुद्ध हो चली थी.

वह क्यों रुक गई? कौन था वो, उसे वसु कह कर पुकारने वाला. यह अधिकार तो उस ने वर्षों पहले ही खो दिया था. बिना कुछ भी कहे, बिना कुछ भी बताए जो उस के जीवन से विलुप्त हो गया था. आज अचानक इतने वर्षों बाद इस शाम के धुंधलके में उस ने पीछे से देख कर पहचान लिया और अपना वही अधिकार लादने की कोशिश कर रहा था. फिर इस नाम से पुकारने वाला जब तक रहा, पूरी निष्ठा से रिश्ते निभाता रहा.

आवाज देने वाला अब और निकट आ गया था. वसुधा ने अपने कदम तेजी से आगे बढ़ाए. अब वह रुकना नहीं चाहती थी. तीव्र गति से चलती हुई वह अपने घर के गेट पर आ गई थी. कदमों की आहट भी और करीब आ गई थी. उस ने जल्दी से गेट खोला. उस की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं. वह सीधे ड्राइंगरूम में जा कर धड़ाम से सोफे पर गिर पड़ी.

दिल की धड़कनें तेजतेज चल रही थीं. किसी प्रकार उस ने उन पर नियंत्रण किया. प्यास से गला सूख रहा था. फ्रिज खोल कर ठंडी बोतल निकाली. गटगट कर उस ने पानी पी लिया. तभी डोरबैल बज उठी.

उस के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं. कहीं वही तो नहीं है, उस ने सोचते हुए धड़कते हृदय से द्वार खोला. उस का अनुमान सही था. सामने नागेश ही खड़ा था. क्या करूं, क्या न करूं, इतनी तेजी से इसलिए भागी थी कि कहीं फिर उस का सामना न हो जाए लेकिन वह तो पीछा करते हुए यहां तक आ गया. अब कोई उपाय नहीं था सिवा इस के कि उसे अंदर आने को कहा जाए. ‘‘आइए’’ कह कर पीछे खिसक कर उस ने अंदर आने का रास्ता दे दिया. अंदर आ कर नागेश सोफे पर बैठ गया.

वसुधा चुपचाप खड़ी रही. नागेश ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘बैठोगी नहीं वसु?’’ वसु शब्द सुन कर उस के कान दग्ध हो उठे. ‘‘यह तुम मुझे वसुवसु क्यों कह रहे हो? मैं हूं मिसेज वसुधा रैना. कहो, यहां क्यों आए हो?’’ वसुधा बिफर उठी.

‘‘सुनो, वसु, सुनो, नाराज न हो. मुझे भी तो बोलने दो,’’ नागेश ने शांत स्वर में कहा.

‘‘पहले तुम यह बताओ, यहां क्यों आए हो? मेरा पता तुम को कैसे मिला?’’ वसुधा क्रोध से फुंफकार उठी.

‘‘किसी से नहीं मिला, यह तो इत्तफाक है कि मैं ने तुम्हें पार्क में देखा. अभी 4 दिनों पहले ही तो मैं यहां आया हूं और पास में ही फ्लैट ले कर रह रहा हूं. अकेला हूं. शाम को टहलने निकला तो तुम्हें देख लिया. पहले तो पहचान नहीं पाया, फिर यकीन हो गया कि ये मेरी वसु ही है,’’ नागेश ने विनम्रता से कहा.

‘‘मेरी वसु, हूं, यह तुम ने मेरी वसु की क्या रट लगा रखी है? मैं केवल अपने पति मृगेंद्र की ही वसु हूं, समझे तुम. और अब तुम यहां से जाओ, मेरी संध्याकालीन क्रिया का समय हो गया है और उस में मैं किसी प्रकार का विघ्न बरदाश्त नहीं कर सकती हूं,’’ वसुधा ने विरक्त होते हुए कहा.

‘‘ठीक है मैं आज जाता हूं पर एक दिन अवश्य आऊंगा तुम से अपने मन की बात कहने और तुम्हारे मन में बसी नफरत को खत्म करने,’’ कहता हुआ नागेश चला गया.

वसुधा अपनी तैयारी में लग गई किंतु ध्यान भटक रहा था. ‘‘ऐसा क्यों हो रहा है? अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ था. फिर आज यह भटकन क्यों? क्यों मन अतीत की ओर भाग रहा है? अतीत जहां केवल वह थी और था नागेश. अतीत वर्तमान बन कर उस के सामने रहरह कर अठखेलियां कर रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे किसी फिल्म को रिवाइंड कर के देखा जा रहा है, उस के हृदय में मंथन हो रहा था. उस के वर्तमान को मुंह चिढ़ाते अतीत से पीछा छुड़ाना उस के लिए मुश्किल हो रहा था. अतीत ने उसे सुनहरे भविष्य के सपने दिखाए थे. उसे याद आ रहा था वह दिन जब वह पहली बार नागेश से मिली थी.

दिसंबर का महीना था. वह अपनी मित्र रिया के घर गई थी. वहां उस की 2 और भी सहेलियां आई थीं, शीबा और रेशू. रिया उन सब को ले कर ड्राइंगरूम में आ गई जहां पहले से ही उस के भाई के 2 और मित्र बैठे थे. दोनों ही आर्मी औफिसर थे. रिया के भाई डाक्टर थे, डा. रोहित. उन्होंने सब से मिलवाया. फिर सब ने एकसाथ चाय पी. वहीं उस ने नागेश को देखा. रिया ने ही बताया, ‘‘ये नागेश भाईसाहब हैं, कैप्टन हैं और यह उन के मित्र कैप्टन विनोद हैं. उन सब ने हायहैलो की, औपचारिकताएं निभाईं और वहां से विदा हो गए.

वसुधा पहली बार में ही नागेश की ओर आकर्षित हो गई थी. नागेश का गोरा चेहरा, पतलीपतली मूंछें, होंठों पर मंद मुसकान, आंखों में किसी को भी जीत लेने की चमक, टीशर्ट की आस्तीनों से झांकती, बगुले के पंख सी, सफेद पुष्ट बांहों को देख कर वसुधा गिरगिर पड़ रही थी. घर आ कर वह कुछ अनमनी सी हो गई थी. सब ने इस बात को गौर किया पर कुछ समझ न सके.

दिन गुजरते रहे और कुछ ऐसा संयोग बना कि कहीं न कहीं नागेश उसे मिल ही जाता था. फिर यह मिलना दोस्ती में बदल गया. यह दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला. घंटों दोनों दरिया किनारे घूमने चले जाते थे, बातें करते थे जोकि खत्म होने को ही नहीं आती थीं. दोनों भविष्य के सुंदर सपने संजोते थे.

दोनों के ही परिवार इस प्यार के विषय में जान गए थे और उन्हें कोई एतराज नहीं था. दोनों ने विवाह करने का फैसला कर लिया. जब उन्होंने अपना मंतव्य बताया तो दोनों परिवारों ने इस संबंध को खुशीखुशी स्वीकार कर लिया और एक छोटे से समारोह में उन की सगाई हो गई.

अब तो वसुधा के पांव जमीन पर नहीं पड़ते थे. इधर नागेश भी बराबर ही उस के घर आने लगा था. सब ने उसे घर का ही सदस्य मान लिया था. विवाह की तिथि निश्चित हो गई थी. केवल 10 दिन ही शेष थे कि अकस्मात नागेश को किसी ट्रेनिंग के सिलसिले में झांसी जाना पड़ गया.

एकदो माह की ट्रेनिंग के बाद विवाह की तिथि आगे टल गई. दोबारा तिथि निश्चित हुई तो नागेश के ताऊ का निधन हो गया. एक वर्ष तक शोक मनाने के कारण विवाह की तिथि फिर आगे बढ़ा दी गई. इस प्रकार किसी न किसी अड़चन से विवाह टलता गया और 2 वर्ष का अंतराल बीत गया.

वसुधा की बेसब्री बढ़ती जा रही थी. यूनिवर्सिटी में उस की सहेलियां पूछतीं, ‘क्या हुआ, वसुधा, कब शादी करेगी? यार, इतनी भी देरी ठीक नहीं है. कहीं कोई और ले उड़ा तेरे प्यार को तो हाथ मलती रह जाएगी.’

‘नहीं वह मेरा है, मुझे धोखा नहीं दे सकता. और जब मेरा प्यार सच्चा है तो मुझे मिलेगा ही,’ वसुधा स्वयं को आश्वस्त करती.

नागेश 15 दिनों की छुट्टी ले कर घर जा रहा था. उस ने आश्वासन दिया था कि इस बार विवाह की तिथि निश्चित कर के ही रहेगा. वसुधा उस से आखिरी बार मिली. उसे नहीं पता था, यह मिलना वास्तव में आखिरी है. अचानक उसे आभास हुआ कि शायद अब वह नागेश को कभी नहीं देख पाएगी, दिल धक से हो गया. लेकिन फिर आशा दिलासा देने लगी, ‘नहीं, वह तेरा है, तुझे अवश्य मिलेगा.’

एक ओर संशयरूपी नाग फन काढ़े हुए था और दूसरी ओर आशा वसुधा को आश्वस्त कर रही थी. इन दोनों के बीच में डूबतेउतराते हुए एक सप्ताह बीत गया कि अकस्मात वज्रपात हुआ. उस के पापा के पास नागेश के पिता का पत्र आया जिस में उन्होंने विवाह करने में असमर्थता बताई थी बिना किसी कारण के.

वह हतप्रभ थी, यह क्या हुआ. वह तो नागेश के पत्र की प्रतीक्षा कर रही थी. पत्र तो नहीं आया लेकिन उस की मौत का फरमान जरूर आया था. उस का दम घुट रहा था. ऐसा प्रतीत होता था मानो उसे जीवित ही दीवार में चुनवा दिया गया हो. चारों ओर से निगाहें उस की ओर उठती थीं, कभी व्यंग्यात्मक और कभी करुणाभरी. वह बरदाश्त नहीं कर पा रही थी.

एक दिन उसे अपने पीछे से किसी की आवाज सुनाई दी. ‘ताजिए ठंडे हो गए? अब तो जमीन पर आ जाओ.’ उस ने पलट कर देखा, उस की सब से गहरी मित्र रिया हंस रही थी. वह तिलमिला उठी थी लेकिन कुछ न कह कर वह क्लास में चली गई. वहां भी कई सवालिया नजरें उसे देख रही थीं.

धीरेधीरे ये बातें पुरानी हो रही थीं. अब उस से कोई भी कुछ नहीं पूछता था. एक रोज रिया ने हमदर्दी से कहा, ‘वसुधा, सौरी, मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था. मुझे तो अंदाजा भी नहीं था कि तेरे साथ इतना बड़ा धोखा हुआ है.’ और वह वसुधा से लिपट गई.

6 महीनों बाद ही पापा ने उस का विवाह मृगेंद्र से सुनिश्चित कर दिया और वह विदा हो कर अपने पति के घर की शोभा बन गई. विवाह की पहली रात वह सुहागसेज पर सकुचाई सी बैठी थी. कमरे की दीवारें हलके नीले रंग की थीं. नीले परदे पड़े हुए थे. नीले बल्ब की धीमी रोशनी बड़ा ही रूमानी समा बांध रही थी. वह चुपचाप बैठी कमरे का मुआयना कर रही थी कि तभी एक आवाज आई, ‘वसु, जरा घड़ी उधर रख देना.’

मृगेंद्र का स्वर सुन कर वह धक से रह गई. खड़ी हो कर उस ने मृगेंद्र की घड़ी ले ली और साइड टेबल पर रख दी. अब क्या होगा. मृगेंद्र मेरे अतीत को जानने का प्रयास करेंगे. मैं क्या कहूंगी. मौसी ने कहा था, ‘बेटी, पिछले जीवन की कोई भी बात पति को न बताना. पुरुष शक्की होते हैं. भले ही उन का अतीत कुछ भी रहा हो लेकिन पत्नी के अतीत में किसी और से नजदीकियां रखना उन्हें स्वीकार्य नहीं होता है.’

लेकिन मृगेंद्र ने कुछ भी तो नहीं पूछा. बस, उस के दोनों कंधों से उसे पकड़ कर बैड पर बैठा दिया और स्वयं ही कहने लगे, ‘वसु, मैं यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान का प्रोफैसर हूं. इतना वेतन मिल जाता है कि अपने लोगों का गुजारा हो जाए. मेरे पास एक पुराने मौडल की मारुति कार है जो मुझे बहुत ही प्रिय है. मुझे नहीं पता कि तुम्हारी मुझ से क्या अपेक्षाएं हैं परंतु कोशिश करूंगा कि तुम्हें सुखी रख सकूं. मैं थोड़े में ही संतुष्ट रहता हूं और तुम से भी यही आशा करता हूं.’

वसु हतप्रभ रह गई. यह कैसी सुहागरात है. कोई प्यार की बात नहीं, कोई मानमनौवल नहीं. बस, एक छोटी सी आरजू जो मृगेंद्र ने उसे कितने शांत भाव से साफसाफ कह दी, मानो जीवन का सारा सार ही निचोड़ कर रख दिया हो. उसे गर्व हो रहा था. वह डर रही थी कि कहीं अतीत का साया उस के वर्तमान पर काली परछाईं न बन जाए लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और वह सबकुछ बिसार कर मृगेंद्र की बांहों में समा गई.

उस ने अपनेआप से एक वादा किया कि अब वह मृगेंद्र की है और संपूर्ण निष्ठा से मृगेंद्र को सुखी रखने का प्रयास करेगी. अब उन दोनों के बीच किसी तीसरे व्यक्ति का अस्तित्व वह सहन नहीं करेगी. पेशे से मृगेंद्र एक मनोवैज्ञानिक थे, शायद, इसीलिए उन्होंने उस के मनोभावों को समझ कर उस के अतीत को जानने का कोई प्रयास नहीं किया.

2 वर्षों बाद उस ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया जो हूबहू मृगेंद्र की ही परछाईं थी. जब उन्होंने उसे अपनी गोद में लिया तो उन की आंखें छलक आईं, गदगद हो कर बोले, ‘वसु, तुम ने बड़ा ही प्यारा तोहफा दिया है. मैं प्यारी सी बेटी ही चाहता था और तुम ने मेरे मन की मुराद पूरी कर दी.’ और उन्होंने वसुधा के माथे पर आभार का एक चुंबन अंकित कर दिया. उस का नाम रखा वान्या.

वान्या के 3 वर्ष की होने के बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया. बड़े प्यार से मृगेंद्र ने उस का नाम रखा कुणाल. अब वह बहुत ही खुश था कि उस का जीवन धन्य हो गया. वह एक सुखी और संपन्न जीवन व्यतीत कर रही थी कि उस के जीवन में फिर एक बेटी का आगमन हुआ, मान्या. कुणाल बहुत खुश रहता था क्योंकि उसे एक छोटी बहन चाहिए थी जो उसे मिल गई थी.

हंसतेखेलते विवाह के 15 वर्ष बीत गए थे कि एक दिन मृगेंद्र के सीने में अचानक दर्द उठा. वह उन्हें ले कर अस्पताल भागी जहां पहुंचने के कुछ ही क्षणों बाद डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित करते हुए कहा, ‘मैसिव हार्ट अटैक था.’

अब वह तीनों बच्चों के साथ अकेली रह गई थी. यूनिवर्सिटी के औफिस में ही उसे जौब मिल गई और जीवन फिर धीमी गति से एक लीक पर आ गया.

वान्या और मान्या ने अपनी शिक्षा पूरी कर ली थी. कुणाल इंजीनियर बन गया था. उस ने तीनों बच्चों का विवाह उन की ही पसंद से कर दिया. तीनों ही खुश थे. वान्या और मान्या दोनों ही मुंबई में थीं और कुणाल अपनी कंपनी के किसी प्रोजैक्ट के लिए जरमनी चला गया था. बच्चों के जाने से घर में चारों ओर एक नीरवता छा गई थी. तीनों बच्चे चाहते थे कि वह उन के साथ रहे लेकिन पता नहीं क्यों उसे अब अकेले रहना अच्छा लग रहा था, जैसे जीवन की भागदौड़ से थक गई हो.

उस की सेवानिवृत्ति के 3 वर्ष बचे थे. उस ने वीआरएस ले लिया था क्योंकि अब वह नौकरी भी नहीं करना चाहती थी. जो कुछ पूंजी उस के पास थी, उस ने साउथ सिटी में 2 कमरों का एक छोटा सा फ्लैट ले लिया और अकेले रह कर अपना जीवन व्यतीत कर रही थी.

अचानक आकाश में बादलों की गड़गड़ाहट की आवाज हुई. वह यादों के भंवर से बाहर आ गई.

वह बहुत परेशान थी. शायद हृदय में अभी भी नागेश के लिए कुछ भावनाएं व्याप्त थीं. तभी तो न चाहते हुए भी उस के विषय में सोच रही थी. ‘क्या यह सच है कि पहला प्यार भुलाए नहीं भूलता,’ उस ने अपनी अंतरात्मा से प्रश्न किया? ‘हां’ उत्तर मिला. तो वह क्या करे, क्या नागेश से दोबारा मिलना उचित होगा? कहीं वह कमजोर न पड़ जाए. नहीं, नहीं, वह बड़बड़ा उठी. वह क्यों कमजोर पड़ेगी? जिस ने उस के जीवन के माने ही बदल दिए थे, उस धोखेबाज से वह क्यों मिलना चाहेगी? उस का और मेरा अब नाता ही क्या है? वसु मन ही मन सोच रही थी.

उस के मन में फिर विचार आया. एक बार बस, एक बार वह उस से मिल कर अपना अपराध तो पूछ लेती. ‘क्या उस ने सच में धोखा दिया था या कोई और मजबूरी थी. हुंह, उस की कुछ भी मजबूरी रही हो, मेरा जीवन तो उस ने बरबाद कर दिया था. फिर कैसा मिलना.’

वसु के मन में विरोधी विचारधाराएं चल रही थीं. लेकिन फिर उस का हृदय नागेश से मिलने के लिए प्रेरित करने लगा, हां, उस से एक बार अवश्य ही मिलना होगा. वह अपनी मजबूरी बताना भी चाह रहा था लेकिन उस ने सुनने की कोशिश ही नहीं की. अब उस ने सोच लिया कि कल सायंकाल पार्क में जाएगी जहां शायद उस का सामना नागेश से हो जाए.

बैड पर लेट कर उस ने आंखें बंद कर लीं क्योंकि रात्रि के 2 प्रहर बीत चुके थे. लेकिन नींद अब भी कोसों दूर थी. मन बेलगाम घोड़े की भांति अतीत की ओर भाग रहा था-नागेश जिस ने उस की कुंआरी रातों में चाहत के अनगिनत सपने जगाए थे, नागेश जिस के कदमों की आहट उस के दिल की धड़कनें बढ़ा देती थीं, नागेश जिस की आंखें सदैव उसे ढूंढ़ती थीं.

उसे याद आता है कि एक बार दोपहर में वह सो गई थी कि अचानक ही नागेश आ गया था. मां ने उसे झकझोर कर उठाया तो वह अचकचा कर दिग्भ्रमित सी इधरउधर देखने लगी. डूबते सूर्य की रश्मियां उस के मुख पर अठखेलियां कर रही थीं. नागेश उसे अपलक देखते हुए बोल उठा, ‘इतना सुंदर सूर्यास्त तो मैं ने अब तक के जीवन में कभी नहीं देखा. और उस का चेहरा अबीरी हो उठा था. नागेश, जिस ने पहली बार जब उसे अपनी बांहों में ले कर उस के होंठों पर अपने प्यार की मुहर लगाई थी, उस चुंबन को वह अभी तक न भूल सकी थी.

जब भी वह मृगेंद्र के साथ अंतरंग पलों में होती थी, तो उसे मृगेंद्र की हर सांस, हर स्पर्श में नागेश का आभास होता था. वह मन ही मन में बोल उठती थी, ‘काश, इस समय मैं नागेश की बांहों में होती.’ एक प्रकार से वह दोहरे व्यक्तित्व को जी रही थी.

प्रतिपल नागेश एक परछाईं की भांति उस के साथ रहता था. जब भी वह नागेश के विषय में सोचती, उस की अंतरात्मा उसे धिक्कारती, ‘वसु, तू अपने पति से विश्वासघात कर रही है. नहीं, नहीं, मैं उन्हें धोखा नहीं दे रही हूं. मेरे तन और मन पर मेरे पति मृगेंद्र का ही अधिकार है. लेकिन यदि अतीत की स्मृतियां हृदय में फांस बन कर चुभी हुई हैं तो यादों की टीस तो उठेगी ही न.’

स्मृतियों के झीने आवरण से अकसर ही उसे नागेश का चेहरा दिखता था और वह बेचैन हो जाती थी. किंतु जब से मृगेंद्र उस के जीवन से चले गए, वह हर पल, हर सांस मृगेंद्र के लिए ही जीती थी. यह सत्य था कि नागेश की स्मृतियां उसे झकझोर देती थीं लेकिन मृगेंद्र की शांत आंखें उस के आसपास होने का एहसास दिलाती थीं. हर पल उसे कानों में मृगेंद्र की आवाज सुनाई देती थी. उसे लगता, मृगेंद्र पूछ रहे हैं, ‘क्या हुआ, वसु, क्यों इतनी उद्विग्न हो रही हो? मैं तो सदा ही तुम्हारे पास हूं न, तुम्हारे व्यक्तित्व में घुलामिला.’

यह सत्य है कि मृगेंद्र का साया उस के अस्तित्व से लिपटा रहता था. फिर भी, वह क्यों नागेश से मिलना चाहती है. जिस ने, किसी मजबूरी से ही सही, उस से नाता तोड़ा और अब 35 वर्षों बाद उस को अपनी सफाई देना चाहता है. क्या वह पहले नहीं ढूंढ़ सकता था.

मृगेंद्र के जाने के बाद वह अकसर ही एक गीत गुनगुनाती थी- ‘तुम न जाने किस जहां में खो गए, हम भरी दुनिया में तनहा हो गए…’ किस के लिए था यह गीत? नागेश के लिए? मृगेंद्र के लिए? दोनों ही तो खो गए थे और हां, वह इस भीड़भरी दुनिया में तनहाई का ही जीवन व्यतीत कर रही थी.

यादों का सैलाब उमड़घुमड़ रहा था. 15 वर्षों के क्षणिक जीवन में भी मृगेंद्र ने उसे इतना प्यार दिया कि वह सराबोर हो उठी थी. लेकिन, कहीं न कहीं आसपास नागेश के होने का एहसास होता था. हालांकि हर बार वह उस एहसास को झटक देती थी यह सोच कर कि यह मृगेंद्र के प्रति विश्वासघात होगा.

मृगेंद्र ने जब अपनी आंखें बंद कीं तब वह निराश हो उठी. उस के मन में एक आक्रोश जागा, यदि नागेश ने धोखा न दिया होता तो वह असमय वैरागिनी न बनी होती और उस की चाहत नागेश के लिए, नफरत में बदल गई. उसे सामने पा कर वह नफरत ज्वालीमुखी बन गई. नहीं, मुझे उस से नहीं मिलना है, किसी भी दशा में नहीं मिलना है. वह निर्मोही पाषाण हृदय, नफरत का ही हकदार है. यदि वह आएगा भी, तो उस से नहीं मिलेगी, मन ही मन में सोच रही थी.

लेकिन फिर, विरोधी विचार मन में पनपने लगे. आखिर एक बार तो मिलना ही होगा, देखें, क्या मजबूरी बताता है और इस प्रकार आशानिराशा के बीच झूलते हुए रात्रि कब बीत गई, पता ही नहीं चला.

खिड़की का परदा थोड़ा खिसका हुआ था. धूप की तीव्र किरण उस के मुख पर आ कर ठहर गई थी. धूप की तीव्रता से वह जाग गई, देखा, दिन के 11 बजे थे. ओहो, कितनी देर हो गई. नित्यक्रिया का समय बीत जाएगा.

जल्दी से नहाधो कर उस ने मृगेंद्र की तसवीर के आगे दीया जला कर, हाथ जोड़ कर उन को प्रणाम करते हुए बोली, मानो उन का आह्वान कर रही हो, ‘‘बताइए, मैं क्या करूं, क्या नागेश से मिलना उचित होगा? मैं हांना के दोराहे पर खड़ी हूं. एक मन आता है कि मिलना चाहिए, तुरंत ही विरोधी विचार मन में पनपने लगते हैं, नहीं, अब और क्या मिलनामिलाना, विगत पर जो चादर पड़ गई है समय की, उस को न हटाना ही ठीक होगा. मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं.’’

अचानक उसे ऐसा लगा जैसे मृगेंद्र ने उस की पीठ पर हाथ रख कर कहा, ‘क्या हुआ, वसु, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है. तुम कुछ भी गलत नहीं करोगी. और फिर मैं तुम्हें कोई भी कदम उठाने से रोकूंगा नहीं. तुम एक बार नागेश से मिल लो. शायद, तुम्हारी जीवननौका को एक साहिल मिल ही जाए.’ हां, यही ठीक होगा, उस ने मन में सोचा.

दूसरे दिन सायंकाल वह जल्दी से तैयार हुई अपनी मनपसंद रंग की साड़ी, मैंचिंग ब्लाउज पहना, बालों का ढीलाढाला जूड़ा बनाया, अनजाने में ही उस ने नागेश के पसंददीदा रंग के वस्त्र पहन लिए थे. आईने में वह खुद को देख कर चौंक उठी, ‘‘क्यों? यह क्या किया मैं ने, क्यों उसी रंग की साड़ी पहनी जो नागेश को पसंद थी. क्या इस प्रकार वह अपने सुप्त प्यार का इजहार कर बैठी? नहीं, नहीं, यह तो इत्तफाक है, उस ने खुद को आश्वस्त किया.

जब वह पार्क में पहुंची तो नागेश कहीं नजर नहीं आया. वह चारों ओर देख रही थी लेकिन बेकार. क्या उस ने गलती की है यहां आ कर? क्या वह नागेश को अपनी कमजोरी का एहसास कराना चाहती थी. नहीं, नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं. वह तो नागेश के इसरार करने पर ही यहां आई थी. आखिर उन की बात भी तो सुननी ही चाहिए न.

नागेश को पार्क में न देख कर वह लौट पड़ी. तभी ‘‘वसु,’’ नागेश का स्वर सुनाई दिया. वह ठिठक गई, शरीर में एक सिहरन सी हुई. कैसे सामना करे वह उस का. कल तो झिड़क दिया था और आज मिलने आ पहुंची. भला वह क्या सोचेगा. पर वह अचल खड़ी ही रही.

नागेश सामने आ कर खड़ा हो गया, ‘‘मिलने आई हो न? मैं जानता था कि तुम आओगी अवश्य ही,’’ नागेश ने संयत स्वर में कहा, ‘‘चलो बैंच पर बैठते हैं.’’ और वह निशब्द नागेश के साथ बैंच पर जा कर बैठ गई. मन में तरहतरह के विचार आ रहे थे. कल और आज में कितना अंतर था. कल वह एक चोट खाई नागिन सी बल खा रही थी और आज नागेश के सम्मोहन में बंधी बैठी थी.

दोनों के बीच कुछ पलों का मौन पसरा रहा. फिर, नागेश ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘वसु, मैं अपनी सफाई में कुछ नहीं कहना चाहता, बस, यही चाहता हूं कि तुम्हारे मन में अपने लिए बसी नफरत को यदि किसी प्रकार दूर कर सकूं तो शायद चैन मिल जाए. 35 वर्ष बीत चुके हैं पर चैन नहीं है. तुम्हें तलाशता रहा कि शायद जीवन के किसी मोड़ पर तुम्हारा साथ मिल जाए पर असफलता ही हाथ लगी.’’

अब वसुधा चुप नहीं रह सकी, ‘‘क्यों आप ने विवाह किया होगा, आप के भी बालबच्चे होंगे, तो फिर चैन क्यों नहीं? और उस दिन आप ने यह क्यों कहा था कि मैं अकेला रह गया हूं. आप का परिवार तो होगा ही.’’

नागेश ने कातर दृष्टि से उसे देखा, ‘‘नहीं वसु, विवाह नहीं किया. मेरे जीवन में तुम्हारे सिवा किसी के लिए कोई भी स्थान नहीं था.’’

‘‘फिर क्यों आप ने धोखा दिया,’’ वसु ने भरे गले से पूछा.

‘‘धोखा, हां, तुम सही कह रही हो. तुम्हारी नजर में ही नहीं, तुम्हारे परिवार की नजरों में भी मैं धोखेबाज ही हूं पर यदि तुम विश्वास कर सको तो मैं तुम्हें बता दूं कि मैं ने तुम्हें धोखा नहीं दिया.’’

‘‘धोखा और क्या होता है, नागेश. तुम्हारा पत्र नहीं आया. तुम्हारे पिता ने एकतरफा फैसला सुना दिया बिना किसी कारण के. यदि विवाह करना ही नहीं था तो सगाई का ढोंग क्यों किया?’’ वसुधा ने तड़प कर कहा.

‘‘हां, तुम सही कह रही हो. कुछ तो अपराध मेरा भी था. मुझे ही तुम्हें पहले बता देना चाहिए था. इस के पूर्व कि मेरे पिता का इनकार में पत्र आता. न जाने क्यों मैं कमजोर पड़ गया और पिता की हां में हां मिला बैठा. दरअसल, उन के पास पैसा नहीं था और उन्हें दहेज की आशा थी जो तुम्हारे घर से पूरी नहीं हो सकती थी.

‘‘उसी समय दिल्ली के एक धनवान परिवार ने जोर लगाया और पिताजी को मनमाना दहेज देने का आश्वासन दिया. पिताजी झुक गए. मैं भी उन की हां में हां मिला बैठा. लेकिन जब विवाह की तिथि निश्चित हुई और ऐसा लगा कि मेरेतुम्हारे बीच में विछोह का गहरा सागर आ गया है, हम कभी भी मिल नहीं सकेंगे, तो मैं तड़प उठा और तत्काल ही विवाह के लिए मना कर दिया. भला जो स्थान तुम्हारा था वह मैं किसी और को कैसे दे सकता था? तभी मुझे फ्रंट पर जाने का पैगाम आया और मैं सीमा पर चला गया.

‘‘मुझे इस बात का एहसास भी नहीं था कि तुम्हारी शादी हो जाएगी. जब मैं लौटा तब तुम्हारे ही किसी परिचित से पता चला कि तुम्हारा विवाह हो चुका है. मैं खामोश हो गया. और उसी दिन यह प्रतिज्ञा ली कि अब यह जीवन तुम्हारे ही नाम है. मैं विवाह नहीं करूंगा. समय का इतना लंबा अंतराल बीत चला कि सबकुछ गड्डमड्ड हो गया. मैं ने कभी तुम्हारे वैवाहिक जीवन में दखल न देने की सोच ली थी, इसलिए एकाकी जीवन बिताता रहा.

‘‘समय की आंधी में हम दोनों 2 तिनकों की तरह उड़ चले. मुझे तो तुम्हारे मिलने की कोई भी आशा नहीं थी. कर्नल की पोस्ट से रिटायर हुआ हूं और यहां एक फ्लैट ले कर रहने आ गया. जीवन का इतना लंबा समय बीत चला कि अब जो कुछ पल बचे हैं उन्हें शांतिपूर्वक बिताना चाहता था कि समय देखो, अचानक तुम से मुलाकात हो गई.’’ नागेश चुप हो गया था.

वसुधा के नेत्रों से अविरल आंसू बह रहे थे, दिल में फंसा हुआ जख्मों का गुबार आंखों की राह बाहर निकलना चाहता था और वह उन्हें रोकने का कोई प्रयास भी नहीं कर रही थी.

रात्रि गहरा रही थी. ‘‘चलो वसु, अब घर चलें,’’ नागेश ने उठते हुए कहा. वसुधा चौंक कर उठी. अक्तूबर का महीना था. हलकीहलकी ठंड थी जो सिहरन पैदा कर रही थी. दोनों उठ खड़े हुए और अपनेअपने रास्ते हो लिए. घर आ कर वसुधा ने एक सैंडविच बनाया और एक कप चाय के साथ खा कर बैड पर लेटने का उपक्रम करने लगी. आंखें नींद से मुंदी जा रही थीं.

– क्रमश:

 

तरह तरह की फिल्मी सेवाएं

नैटफ्लिक्स चैनल की सफलता के बाद अब हौलीवुड की अन्य फिल्में दिखाने के लिए वाल्ट डिज्नी कंपनी भी अपना चैनल शुरू करने वाली है. डिज्नी की अपनी फिल्में व जिन फिल्मों के कौपीराइट्स उस ने ले रखे हैं, वे सभी उसी के चैनल पर औनलाइन रिलीज होंगी और जब चाहो, देखी जा सकेंगी. ब्रौडबैंड इंटरनैट की स्पीड जैसेजैसे सुधर रही है, लोग बिना इंटेरप्शन या विज्ञापनों के हाई क्वालिटी में स्ट्रीमिंग फिल्में नैटफ्लिक्स और अमेजौन पर देख रहे हैं.

ग्राहकों को अब इन चैनलों को अलगअलग सब्सक्राइब करना पड़ेगा जब तक कोई ऐसा औप्शन नहीं आ जाता जिस में सैटटौप बौक्स की तरह आप चैनल बदल कर स्ट्रीमिंग कंपनी बदल सकें लेकिन भुगतान एक ही जगह पर कर सकें.

बड़ी स्क्रीन पर दिखने वाली ये फिल्में शायद एक बार फिर सिनेमाहौलों पर संकट ला दें. मल्टीप्लैक्सों में अरबों रुपए लगाए गए हैं जिन में एक ही लौबी, एक ही फूड सर्विस के माध्यम से कई हौलों में फिल्में दिखाना संभव हुआ है. सिनेमा हौलों के दरवाजे पहले हर 2-3 घंटे में खुलते थे, पर अब मल्टीप्लैक्सों के दरवाजे हर समय खुले रहते हैं. दर्शकों को यह सुविधा भी हो गई है कि एक ही मल्टीप्लैक्स में कई फिल्में देखने को मिल जाती हैं. इस सुविधा ने सिंगल स्क्रीन हौलों को तो खत्म कर दिया लेकिन मल्टीप्लैक्सों को जान दे दी है. अब स्ट्रीमिंग औनलाइन फिल्मी सेवाएं मल्टीप्लैक्सों को चुनौती पेश कर रही हैं.

एंड्रौयड टीवी आने के कारण यह काम और आसान हो रहा है. एंड्रौयड स्टिक भी आ गई है जिस से पुराने टीवी पर स्ट्रीमिंग फिल्में देखना संभव हो गया. इस सब का दुखद पक्ष यह है कि यह सारी मेहनत केवल कोरा मनोरंजन देने के लिए की जा रही है. डिज्नी, नैटफ्लिक्स, अमेजौन या इसी तरह की कोई और सेवा न ज्ञान बांटने वाली हैं न मार्गदर्शन करने वाली. तमाशा ही जीवन का बड़ा हिस्सा बन रहा है.

कठिनाई यह है कि सर्कस से कभी रोटी पैदा नहीं होती. ग्रीक और रोमन राजाओं ने जनता को बहलाने के लिए सर्कसों का आयोजन किया और बड़ेबड़े पैंथियन बनाए थे पर उसी ने रोमन सभ्यता का अंत किया, क्योंकि आम जनता को कुछ साल तो बहकाया जा सका पर उसे रोटी न दी जा सकी.

स्ट्रीमिंग फिल्मी सेवाएं लोगों को बहलाएंगी, फिल्म एडिक्ट बनाएंगी पर नया करने या जीवन के संघर्षों से मुकाबला करना नहीं सिखाएंगी. भारत जैसे गरीब देश ही नहीं, अमेरिका जैसे अमीर देशों में भी जरूरत उत्पादकता की है, मनोरंजन की नहीं. ये सेवाएं लोगों को निचोड़ कर रख देंगी. ये अफीम से कम नहीं हैं.

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