करियर को बचाने के लिए प्रियंका फैला रहीं है खबरें

लगभग ढाई वर्ष पहले संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘‘बाजीराव मस्तानी’’ के प्रदर्शन के बाद ही हमने  इस फिल्म की कलाकार प्रियंका चोपड़ा के करियर को लेकर कुछ सवाल उठाए थे और उस वक्त यह निष्कर्ष निकला था कि शायद अब प्रियंका चोपड़ा का करियर खात्मे की ओर बढ़ रहा है. उस वक्त कुछ लोगों ने इसे खाली दिमाग का फितूर बताया था. पर अब यह बात काफी सच होती नजर आ रही है. ‘बाजीराव मस्तानी’ के प्रदर्शन के बाद से प्रियंका चोपड़ा किसी भी बौलीवुड फिल्म में नजर नहीं आईं. मई 2017 में प्रदर्शित हौलीवुड फिल्म ‘‘बेवाच’’ में वह नजर आयी थीं, मगर इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर पानी नहीं मांगा. उसके बाद से प्रियंका चोपड़ा किसी न किसी बहाने खुद को सुर्खियों में बनाए हुए हैं.

इस बीच प्रियंका चोपड़ा संजय लीला भंसाली की अमृता प्रीतम की प्रेम कहानी पर बनने वाली फिल्म से जुड़ने और फिर उससे बाहर हो जाने को लेकर चर्चा में रहीं. फरवरी 2017 में यूट्यूब पर खबर गर्म हुई थी कि प्रियंका चोपड़ा बहुत जल्द एक बौलीवुड फिल्म में वेश्या का किरदार निभाने वाली हैं. उन्ही दिनों यह खबर आयी थी कि संजय लीला भंसाली एक फिल्म ‘‘हीरा मंडी’’ बनाने जा रहे हैं, जो कि 1950 की माफिया किंग गंगूबाई की बायोपिक फिल्म होगी. यह गंगूबाई वही हैं, जो कि 1950 में मुंबई में एक साथ कई वेश्यालय चला रही थीं और कहा जाता है कि उन्होने अपने धंधे को बचाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समक्ष आवाज उठायी थी. मगर ‘हीरामंडी’ पर काम करने की बजाय संजय लीला भंसाली अपनी फिल्म ‘पद्मावत’ में व्यस्त हो गए थे. तथा प्रियंका चोपड़ा के किसी फिल्म में वेश्या का किरदार निभाने की खबर भी गायब हो गयी थी. मगर अब एक बार फिर यह दोनों खबरें अलादीन के चिराग की तरह जीवंत हो उठी हैं. बौलीवुड में चर्चाएं गर्म हैं कि संजय लीला भंसाली फिल्म ‘‘हीरा मंडी’’ पर काम कर रहे हैं. सूत्रों का दावा है कि संजय लीला भंसाली ने फिल्म ‘हीरा मंडी’ के चार गाने रिकार्ड कर लिए हैं. इसके अलावा उन्होने इस फिल्म में अभिनय करने वाले कलाकारों के नामों पर भी विचार कर लिया है. इसी खबर के साथ बौलीवुड में यह खबर भी गर्म हुई है की फिल्म ‘हीरा मंडी’ में प्रियंका चोपड़ा अभिनय करने वाली हैं.

यानी कि एक बार फिर संजय लीला भंसाली के निर्देशन में प्रियंका चोपड़ा अभिनय करेंगी. मगर इस खबर की पुष्टि कहीं से नहीं हो पा रही है. यहां तक कि संजय लीला भंसली के प्रवक्ता का दावा है कि संजय लीला भंसाली की प्रियंका चोपड़ा से किसी भी फिल्म को लेकर कोई बात नहीं हो रही है. इस खबर की पुष्टि न होने के बाद अब बौलीवुड का एक तबका मानकर चल रहा है कि खबरें उड़ाकर खुद को सुर्खियों में बनाए रखने की प्रियंका चोपड़ा की तरफ से की जा रही यह एक कवायद मात्र है.

पिछले दो वर्षों से प्रियंका चोपड़ा काम करने की बजाय सिर्फ खबरों में ही बनी हुई हैं. पहले सलमान खान के साथ फिल्म ‘‘भारत’’ करने को लेकर वह सुर्खियों में रहीं. फिर अचानक उन्होने इस फिल्म को छोड़ दिया. प्रियंका के ‘भारत’ छोड़ने पर कहा गया कि वह अपने अमरीकन प्रेमी निक जोनास के संग शादी करने जा रही हैं, इसलिए फिल्म छोड़ी. पर दूसरे ही दिन प्रियंका चोपड़ा ने शोनाली बोस के निर्देशन में फिल्म ‘‘द स्काई इज पिंक’’ अनुबंधित कर फिल्म के मूहूर्त की तस्वीरें सार्वजनिक कीं. तब खबर आयी कि बौलीवुड के एक स्टार के कहने पर प्रियंका चोपड़ा ने इस फिल्म से खुद को अलग किया और उस स्टार के खास दोस्त फरहान अख्तर के साथ फिल्म ‘स्काई इज पिंक’ से जुड़ीं. पर अब सूत्र दावा कर रहे हैं कि प्रियंका चोपड़ा फिल्म ‘‘द स्काई इज पिंक’’ की सह निर्माता भी हैं. अब इसके क्या मायने निकाले जाएं?

उधर प्रियंका चोपड़ा के ‘‘भारत’’ से अलग होने व ‘द स्काई इज पिंक’’ से जुड़ने के बाद सलमान खान ने प्रियंका चोपड़ा पर कई जोरदार हमले किए. सलमान खान ने प्रियंका पर आरोप लगाते हुए कहा कि, ‘प्रियंका की शादी तो मात्र बहाना है. शादी के लिए इंसान चार दिन की छुट्टी लेता है. हकीकत में वह मेरे साथ काम नहीं करना चाहती थीं.’ उसके बाद सवाल उठा कि आखिर प्रियंका चोपड़ा ने किस स्टार के कहने पर उस वक्त ‘भारत’ छोड़ी, जबकि उन्हें काम की सबसे ज्यादा जरुरत थी? पर इस सवाल का जवाब अब तक नहीं आया. इतना ही नहीं अब तो सलमान खान ने यह भी आरोप लगाया है कि फिल्म ‘‘भारत’’ में काम पाने के लिए प्रियंका चोपड़ा ने सलमान की बहन अर्पिता को हजार फोन किए थे?

सलमान के इस आरोप पर भी प्रियंका चोपड़ा ने चुप्पी साध रखी है. बहरहाल,अब तो बौलीवुड के गलियारे में सवाल पूछा जा रहा है कि प्रियंका चोपड़ा पता नहीं किस इंसान की सलाह पर अपने करियर को बचाने के लिए उटपटांग निर्णय ले रही हैं?

यदि हम ऊपरी सतह पर देखें तो भी प्रियंका चोपड़ा के करियर में कहीं कुछ भी सकारात्मक बातें होती नजर नही आ रही हैं. यूं तो चर्चा है कि प्रियंका चोपड़ा ने हौलीवुड फिल्म ‘‘इज नॉट इट रोमांटिक’’ में योगा अम्बेसडर इसाबेला का किरदार निभाया है. सूत्र बताते हैं कि इस फिल्म की घोषणा 23 मई 2016 को की गयी थी. 10 जुलाई 2017 को न्यू न्यूयार्क सिटी में इसका फिल्मांकन शुरू हुआ था. उसके बाद से इस फिल्म को लेकर कोई खबर नहीं आयी. मगर प्रियंका चोपड़ा के नजदीकी सूत्र दावा कर रहे हैं कि यह फिल्म अगले वर्ष वैलेनटाइन डे यानी कि 14 फरवरी 2019 को रिलीज होगी. पर इस फिल्म में प्रियंका चोपडा के किरदार की कितनी अहमियत यह है तो फिल्म के प्रदर्शन पर ही पता चलेगा. मगर फिल्म की कहानी के अनुसार इस त्रिकोणीय प्रेम कहानी वाली फिल्म के तीन कोणों को अपने अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं – रेबेल विल्सन, एडम डेविन व लैम हेम्सवर्थ. इतना ही नहीं इसमें रेबेल विल्सन के किरदार नटाली की सहायक के किरदार में बेट्टी गिलपिन भी हैं.

फिल्म ‘‘भारत’’ छोड़ने के साथ ही खबरें गर्म हुईं थीं कि प्रियंका चोपड़ा हौलीवुड में काफी व्यस्त हैं. खबर थी कि प्रियंका चोपड़ा ने क्रिस प्रैट के साथ फिल्म ‘‘काउब्वाय निंजा वायिंकंग’’ अनुबंधित की है. मगर अब सूत्र दावा कर रहे हैं कि ‘काउब्वाय निंजा वायिंकंग’’ के बनने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं. निर्माता ने इसे ठंडे डिब्बे में डाल दिया है. ‘‘क्वांटिको ’’ के नए सीजन से भी उनका पत्ता कट चुका है. उधर बालीवुड फिल्म ‘‘द स्काई इज पिंक’’ के प्रदर्शन की कोई तारीख नही बतायी जा रही है, जिसका निर्माण प्रियंका चोपड़ा खुद सिद्धार्थ रौय कपूर और रौनी स्क्रूवाला के साथ मिलकर कर रही हैं.

कुल मिलाकर हमारे सूत्रों पर यकीन किया जए, तो फिलहाल प्रियंका चोपड़ा के पास कोई फिल्म नहीं है. ऐसे में अपनी उम्र से छोटे निक जोनास के संग शादी कर घर बसाने के उनके निर्णय को ही सही ठहराया जा सकता है.

तो पुनीत जे पाठक के सपने को अपना सपना बना किसने किया त्याग ?

हर इंसान सपने देखता है, मगर कुछ लोग अकेले ही अपने सपनों को पूरा करने के लिए, दिन रात मेहनत करते रहते हैं. जबकि कुछ भाग्यशाली लोग ऐसे होते हैं जिनके सपने दूसरों के सपने बन जाते हैं.

ऐसी ही शख्सियत हैं- नृत्य निर्देशक व अभिनेता पुनीत जे पाठक. लोग शायद यकीन न करें न करें मगर हकीकत यही है कि पुनीत पाठक के सपने को उनके छोटे भाई ने भी अपना सपना बना लिया और पुनीत के सपने को पूरा करने में अपनी तरफ से योगदान देने के लिए, बहुत बड़ा त्याग भी किया.

वास्तव में पुनीत जे पाठक बौलीवुड में बतौर नृत्य निर्देशक कुछ उत्कृष्ट काम करना चाहते थे. यह उनका सपना था. मगर उनके इस सपने के खिलाफ उनके पिता जी थे. पुनीत के पिता का मानना था कि यदि पुनीत नृत्य के क्षेत्र में करियर बना लेंगे तो उनके पैतृक व्यवसाय को कौन संभालेगा? पर पुनीत हर हाल में अपने सपने को पूरा करना चाहते थे.

पुनीत के इस सपने व लगन को देखकर नृत्य के क्षेत्र में कार्यरत उनके छोटे भाई ने अपने बडे भाई के सपने को ही अपना सपना बनाकर त्याग करने का फैसला लिया. जिसके चलते पुनीत जे पाठक ने टीवी रियलिटी शो ‘‘डांस इंडिया डांस – सीजन 2’’ से नृत्य के क्षेत्र में अपना करियर शुरू किया.

उसके बाद उन्होने ‘झलक दिखला जा’ ‘आज की रात है जिंदगी’ सहित कई टीवी शो में बतौर नृत्य निर्देशक काम किया. इतना ही नहीं पुनीत जे पाठक ने बतौर अभिनेता ‘एबीसीडी’, ‘एबीसीडी 2’ और 27 जुलाई को प्रदर्शित फिल्म ‘‘नवाबजादे’’ में अभिनय किया.

अब बहुत जल्द वह ‘स्टार प्लस’’ पर प्रसारित होने वाले नृत्य के रियलिटी शो ‘‘डॉंस प्लस-सीजन 4’’ में जज के रूप में नजर आने वाले हैं. इस बार ‘डॉंस प्लस- सीजन’ की टैग लाइन है – ‘‘सपने सिर्फ अपने नहीं होते’. इसी शो के सिलसिले में जब मुलाकात हुई तो हमने उनसे सीधा सवाल किया कि इस शो का संदेश है कि ‘सपने सिर्फ अपने नहीं होते’. तो उनका सपना अपना नहीं तो किसका सपना था? इस पर पुनीत जे पाठक काफी भावुक हो गये, और फिर उन्होने कहा- ‘‘देखिए हककीत यही है कि मेरे सपने सिर्फ अपने नहीं थे. यदि मेरे सपने सिर्फ अपने होते तो शायद आज मैं यहां तक न पहूंच पाता. क्योंकि मेरे पिता जी चाहते थे कि मैं नृत्य का सपना छोड कर उनके व्यवसाय को संभालूं. मगर उस वक्त मेरे सपने को मेरे छोटे भाई ने अपना सपना बना लिया. जबकि वह स्वयं अच्छा डांसर है और नृत्य के क्षेत्र में काम भी कर रहा था. मगर मेरे छोटे भाई ने मेरे सपने को अपना सपना बनाकर मेरे सपने को पूरा करने में न सिर्फ पूरा योगदान दिया बल्कि उसने मेरे सपने को पूरा करने के लिए, अपने सपने का त्याग भी किया. उसने नृत्य को अलविदा कह पिता जी के व्यवसाय को संभाला. जिससे मैं निर्बाध रूप से अपने सपने को पूरा करने के लिए मेहनत कर सका’’

वेब सीरीज ‘‘लस्ट स्टोरीज’’ के लिए संजय कपूर नार्वे में पुरस्कृत

संजय कपूर एक बार फिर चर्चा में हैं.ए क तरफ वह फिल्म ‘‘जोया फैक्टर’’ में सोनम ए आहुजा के संग अभिनय कर रहे हैं, वहीं उन्हें ‘नेटफ्लिक्स’ की वेब सीरीज ‘‘लस्ट स्टोरीज’’ में उत्कृष्ट अभिनय करने के लिए नार्वे में पुरस्कृत किया गया है.

संजय कपूर को यह पुरस्कार हाल ही में नार्वे के ‘ओस्लो’ शहर में आयोजित ‘‘बौलीवुड फेस्टिवल नार्वे’’ में ओस्लो शहर के मेयर रगनहिल्ड बर्घेंम के हाथों दिया गया.

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इस पुरस्कार को ग्रहण करने के बाद संजय कपूर ने कहा-‘‘मेरे लिए यह सम्मान व गौरव की बात है कि मुझे ओस्लो शहर के मेयर रगनहिल्ड बर्घेम ने यह पुरस्कार प्रदान किया. यह मेरा पहला पुरस्कार है. मेरे पिछले 23 वर्ष के करियर में नेटफ्लिक्स की इस 30 मिनट की फिल्म ने वह कमाल कर दिखाया,जो अब तक नहीं हो पाया था. मैं निर्देशक दिबाकर बनर्जी का शुक्रगुजार हूं कि उन्होने मुझे इस फिल्म में न सिर्फ अभिनय करने का मौका दिया, बल्कि मेरे अंदर का सर्वश्रेष्ठ बाहर निकाला. इसके अलावा मैं निर्माता आशी दुआ व रौनी स्क्रूवाला और सह कलाकारों मनिषा कोईराला व जयदीप अहलवात का भी आभारी हूं.’’

दक्षिण भारत में हंगामा मचाने वाली दीप्ति सती की मराठी फिल्मों में दस्तक

मलयालम फिल्म ‘‘नी -ना’’ और कन्नड़ व तेलगू भाषा की फिल्म ‘‘जगुआर’’ में अभिनय कर शोहरत बटोर चुकी दीप्ति सती अब मराठी भाषी के पुरस्कृत फिल्मकार संजय जाधव के निर्देशन में मराठी फिल्म ‘‘लक्की’’ से मराठी सिनेमा में कदम रख रही हैं.

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यह फिल्म सात दिसंबर 2018 को प्रदर्षित होगी. मजेदार बात यह है दीप्ति सती मूलतः महाराष्ट्रियन व मराठी भाषी हैं. इतना ही नहीं दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में अपनी विजय पताका फहराने वाली वह पहली मराठी भाषी अभिनेत्री हैं. दीप्ति ने दक्षिण भारत की चारों भाषाओं की कई फिल्मों में अभिनय किया.
‘‘दुनियादारी’’, ‘‘प्यार वाली लव स्टोरी’’, ‘‘गुरू’’और ‘ये रे ये रे पैसा’’ जैसी सफलतम मराठी फिल्मों के पुरस्कृत निर्देशजय जाधव की पहचान लीक से हटकर फिल्म बनाने वाले फिल्मकार के रूप में होती है. उन्होने अपनी फिल्म ‘‘ये रे ये रे पैसा’’ का टीजर साठ कैमरों के साथ फिल्माया था.

मराठी भाषा की फिल्म ‘‘लक्की’’ से जुड़ने की चर्चा करते हुए दीप्ति सती कहती हैं- ‘‘मेरे लिए सिनेमा की भाषा अहम नहीं है. मैं हर भाषा की फिल्म करना चाहती हूं. मेरे लिए फिल्म का कंटेंट और मेरा किरदार अहम है. फिल्म ‘लक्की’का कंटेंट बहुत अच्छा है और मेरा किरदार लाजवाब है. इस फिल्म को लेकर फिलहाल बहुत ज्यादा बात नहीं कर सकती.’’

‘दिल बदतमीज’ में दिखा खेसारी और काजल का दिलकश अंदाज

भोजपुरी के सुपरस्टार खेसारी लाल यादव की फिल्म ‘संघर्ष ‘बौक्स औफिस पर अच्छा प्रदर्शन कर चुकी है. काजल राघवानी और खेसारी लाल यादव की जोड़ी को खूब पसंद किया गया है. ‘संघर्ष’ में खेसारी लाल यादव ने उम्र के दो पड़ाव दिखाए थे जिसमें वे जवान और बूढ़े बने थे. ‘संघर्ष’ की कहानी को पसंद किया गया तो उसके गाने भी उतने ही लोकप्रिय रहे. अब खेसारी लाल यादव और काजल राघवानी की ‘संघर्ष’ के गाने यूट्यूब पर आने शुरू हो गए हैं और ये खूब धूम मचा रहे हैं

भोजपुरी फिल्म ‘संघर्ष’ का सौन्ग ‘दिल बदतमीज हो गईल’ यूट्यूब पर रिलीज हो चुका है और रिलीज होते ही इस गाने ने धमाल मचा दिया है. खेसारी लाल यादव और काजल राघवानी के ‘दिल बदतमीज हो गईल को अब तक 45 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है. इस गाने में खेसारी लाल यादव काजल राघवानी के ख्यालों में खोए हुए हैं, और काजल के चक्कर में वे एक बुजुर्ग शख्स को ही गोद में उठा लेते हैं.


बता दें कि ‘संघर्ष’ के इस गाने को खेसारी लाल यादव ने गाया है और लिरिक्स आजाद सिंह के हैं. ‘दिल बदतमीज हो गईल’ का म्यूजिक धनंजय मिश्रा ने दिया है. फिल्म के डायरेक्टर पराग पाटिल है. ‘संघर्ष’ फिल्म में खेसारी लाल और काजल राघवानी के अलावा रितु सिंह, अवधेश मिश्रा, महेश आचार्य और निशा झा भी लीड रोल में हैं.

मनमर्जियां : एक अनोखी प्रेम कहानी

प्रेम त्रिकोण पर कई फिल्में बन चुकी हैं. ‘मनमर्जियां’ भी उन्ही में से एक है .कहानी के स्तर पर दूसरी फिल्मों से यह कुछ ज्यादा भिन्न नहीं है. मगर प्रस्तुतिकरण के स्तर पर ‘मनमर्जियां’ काफी अलग तरह की फिल्म है.

इसमें प्यार व रिश्तों की जटिलताओं के साथ प्यार के पैशन व जिंदगी भर की सुरक्षा के बीच लड़की क्या चुनती है, इसका भी चित्रण है. पर फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप हैं, तो कुछ तो डार्क हिस्सा भी रहेगा.

फिल्म की कहानी अमृतसर में अपने चाचा, चाची और दादा जी के साथ रह रही रूमी (तापसी पन्नू) और विक्की संधू उर्फ डी जे संधू (विक्की कौशल) की प्रेम कहानी से शुरू होती है. दोनों इस कदर गले तक प्यार में डूबे हुए हैं, मिलते ही एक दूसरे में समा जाना चाहते हैं.

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इनका प्यार शारीरिक सीमाओं को पार कर चुका है. विक्की संधू समाज की परवाह किए बगैर दूसरों की घरों की छतों पर से कूदता फांदता रूमी के शयनकक्ष में किसी भी समय पहुंच जाता है. रूमी किचन में हो या कहीं और वह भी संधू की आहट पाते ही अपने शयनकक्ष में पहुंच जाती है. और फिर शारीरिक प्यार होता है. संतुष्ट होते ही संधू नौ दो ग्यारह हो जाता है. पूरे अमृतसर में इनके प्यार के चर्चे हैं. मगर रूमी घर के सदस्यों को यह कहकर भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करती रहती है कि यदि उसके माता पिता जिंदा होते तो उसके साथ ऐसा नहीं होता.

पर जब रूमी की चाची व दादाजी रूमी और संधू को शयनकक्ष में रंगे हाथों पकड़ते हैं, तो रूमी के घर वाले रूमी पर शादी के लिए दबाव बनाते हैं. रूमी के परिवार के लोग रूमी की शादी, संधू से भी करने को तैयार हैं, बशर्ते संधू अपने माता पिता के साथ रूमी का हाथ मांगने आएं. रूमी, संधू से कहती है कि वह अपने पिता के साथ उसके घर शादी की बात करने आ जाए. मगर आवारा लौंडा विक्की संधू कब आने लगा. वह तो शादी की स्थिति के लिए अभी परिपक्व ही नहीं हुआ है. उसके लिए तो रूमी के संग प्यार ही काम है.

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जब रूमी को संधू गच्चा दे जाता है, तो रूमी की उसके घरवालों के सामने काफी फजीहत होती है. गुस्से में रूमी, संधू से झगड़ती है. रूमी कुछ समय मांगती है, पर अपने प्यार को जैसा का तैसा जारी रखना चाहती है. अब तो इनके प्यार का खेल वहां भी होने लगता है जहां संधू डी जे है. इसी बीच रूमी के घर वाले शादी कराने वाले काकाजी से कह कर रूमी के लिए रिश्ता ढूंढ़ने के लिए कहते हैं. और काकाजी की तरफ से लंदन से शादी करने आए बैंकर रौबी (अभिषेक बच्चन) का रिश्ता आ जाता है.

अब रूमी, संधू से झगड़ती है और संधू को बता देती है कि उसकी शादी रौबी से होने जा रही है. संधू से निराश रूमी भी रौबी के साथ शादी के लिए तैयार हो जाती है. पर विक्की अपने प्यार की शिद्दत का वास्ता देकर उसे अपने साथ घर से भागने के लिए राजी कर लेता है. दोनों घर से भागते हैं. कुछ दूर जाने पर रूमी को पता चलता है कि संधू के पास फूटी कौड़ी नही है. अब सवाल है कि वह बिना पैसे के कहां जाएं और वहां क्या करेंगे, कैसे रहेंगे. दोनों में झगड़ा होता है और वह वापस अपने घर आ जाती है.

रूमी व रौबी की शादी तय हो जाती है. तब संधू रात में काकाजी के घर पहुंचकर उसे धमकाता है. दूसरे दिन काकाजी सारी कहानी रूमी के घर वालों को बता देता है. रूमी को गुस्सा आता है. वह संधू से कह देती है  कि अब वह रौबी से ही शादी करेगी. पर संधू एक बार फिर रूमी के साथ भागने की योजना बनाता है. मगर वह पुनः रूमी को धोखा दे देता है. अंततः रूमी मनमारकर रौबी के नाम की मेंहदी रचा लेती है. तब फिर संधू उसके पास पहुंचता है. पर अब रूमी, संधू को भगाकर रौबी से शादी कर लेती है. पर मन व दिल से संधू से अलग नहीं हो पाती और हनीमून के लिए कश्मीर से एक ही दिन में रौबी के साथ वापस आ जाती है.

इधर रौबी अपनी तरफ से रूमी के साथ सामंजस्य बैठाने और उसके दिल में अपने प्रति प्यार पैदा करने के प्रयास में लगा रहता है. उधर रूमी झूठ बोलकर संधू के पास जाती रहती है. दोनों जब भी मिलते हैं, पुराने अंदाज में ही प्यार करते रहते हैं. एक दिन रौबी छिपकर रूमी का पीछा करता है और संधू व रूमी के बीच की बातचीत सुनता है. फिर रौबी अपने आपको ही दोषी ठहराते हुए रूमी से तलाक लेने का निर्णय लेता है. इससे संधू खुश हो जाता है और वह अपने माता पिता के साथ रूमी के घरवालों के पास पहुचता है. संधू बड़ी बड़ी हांकते हुए आस्ट्रेलिया जाने की बात करता है. रूमी, संधू को समझाकर आस्ट्रेलिया भेज देती है.

इधर रूमी व रौबी अदालत में तलाक की कारवाही पूरी कर निकलते हैं. रास्ते में उनके बीच बातचीत होती है, फिर रूमी रौबी के साथ ही रहने के लिए चल देती है.

अनुराग कश्यप बेहतरीन निर्देशक हैं, इसमें कोई दो राय नहीं. मगर इस बार उन्हे अति प्रतिभाशाली कलाकारों का साथ भी मिल गया. जिसके चलते दर्शक फिल्म के साथ इस कदर बंधा रहता है कि फिल्म की कमियों की तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता. इसमें कोई दो राय नहीं कि यह फिल्म अनुराग कश्यप की पिछली सभी फिल्मों से बहुत अलग है. इसमें प्यार का रंग है. मगर फिल्म के अंत से हर किसी का सहमत होना आवश्यक नहीं. वैसे भी अनुराग कश्यप ने अब तक परंपराओं का निर्वाह नहीं किया है. पर अनुराग कश्यपप ने युवा दर्शकों लुभाने के लिए हर मसाला डाला है. फिल्म देखकर लगता है कि अनुराग कश्यप ने नई पीढ़ी को ध्यान में रखकर ही फिल्म को गढ़ा है.

फिल्म की लेखक कनिका ढिल्लों ने प्यार को गहराई से उकेरने के अलावा दिल की सुनकर इंसान किस तरह गलतियां करता है, उसकी तरफ भी इशारा किया है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो रूमी के किरदार में तापसी पन्नू और विक्की संधू उर्फ डी जे संधू के किरदार में विक्की कौशल ने कमाल का अभिनय किया है. प्यार को समझने वाले मगर जिंदगी और जिम्मेदारी को न समझने वाले विक्की संधू के किरदार को विक्की कौशल ने सही मायनों में जिया है. विक्की कौशल ने इस फिल्म में अपने अभिनय के जलवे से साबित कर दिखाया कि बौलीवुड में उनके अभिनय से लोहा लेने वाला कोई कलाकार नहीं है. तापसी पन्नू के करियर की यह अति सर्वश्रेष्ठ फिल्म है. फिल्म में कई ऐसे सीन हैं जहां तापसी पन्नू बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती हैं. कुल मिलाकर यह पूरी फिल्म तापसी पन्नू और विक्की कौशल की ही है. पिछली फिल्मों के मुकाबले इस फिल्म में अभिषेक बच्चन का अभिनय कुछ ठीक है. पर अभी भी उन्हे अपनी अभिनय प्रतिभा को निखारने की जरुरत है.

जहां तक संगीत का सवाल है, तो अमित त्रिवेदी का संगीत ठीक ठाक है. पर इसमें पंजाबी हिप हाप गीत संगीत की भरमार है.

दो घंटे 35 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ का निर्माण आनंद एल राय की कंपनी ‘येलो कलर प्रोडक्शंस’ ने फैंटम के साथ मिलकर किया है. निर्देशक अनुरागकश्यप, लेखक कनिका ढिल्लों, संगीतकार अमित त्रिवेदी तथा कलाकार हैं- अभिषेक बच्चन, तापसी पन्नू, विक्की कौशल, अक्षय अरोड़ा, अशनूर कौर, पवन मल्होत्रा व अन्य.

पाकिस्तान में निजाम बदला, इरादे नहीं

क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान अहमद खान नियाजी पाकिस्तान के नए हीरो बन गए हैं. इमरान खान की पाकिस्तान तहरीके इंसाफ (पीटीआई) ने विरोधियों को पीछे छोड़ सब से अधिक सीटें हासिल कीं. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पीएमएल-एन और पूर्व प्रधानमंत्री व दिवंगत नेता बेनजीर भुट्टो के पति आसिफ अली जरदारी की पीपीपी को परास्त कर पीटीआई सब से बड़े दल के रूप में उभरी है.

नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुसलिम लीग (पीएमएल-एन) नैशनल असैंबली में 62 सीटें हासिल कर दूसरे स्थान पर है, जबकि आसिफ अली जरदारी के पुत्र बिलावल भुट्टो के नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपल्स पार्टी 43 सीटें हासिल कर तीसरे स्थान पर है. 272 सदस्यीय नैशनल असैंबली की 270 सीटों के लिए हुए चुनाव में इमरान खान की पार्टी को सब से ज्यादा 116 सीटें मिली हैं जबकि सरकार बनाने के लिए 136 सीटें चाहिए. पीटीआई की सहयोगी पीएमएलक्यू को 5 सीटें हासिल हुई हैं और 6 सीटें जीतने वाली मुत्तहिदा कौमी मूवमैंट (एमक्यूएम) ने पीटीआई को समर्थन देने के लिए रजामंदी दे दी थी. कुछ निर्दलीयों के सहयोग से पीटीआई सरकार बनाने लायक सीटें जुटाने में सफल हो गई.

आतंक के साए में हुए चुनावों के दौरान आत्मघाती हमलों से चुनाव अभियान काफी प्रभावित हुआ. हमलों में 3 उम्मीदवारों समेत 180 लोगों की जानें गईं.

भ्रष्टाचार बना मुद्दा आजादी के बाद युद्ध, आतंकवाद, तख्तापलट, अस्थिरता और मजहबी कट्टरता से जर्जर हो चुके पाकिस्तान की जनता बड़े राजनीतिक दलों से तंग आ चुकी थी. पिछले चुनावों में नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन को बहुमत मिला था पर अघोषित संपत्ति के मुकदमे के कारण उन पर आजीवन प्रतिबंध लग गया. फौज उन के खिलाफ हो गई. उधर, दिवंगत बेनजीर भुट्टो के पुत्र बिलावल भुट्टो कुछ खास नहीं कर पाए. बेनजीर के पति आसिफ अली जरदारी भी भ्रष्टाचार के जरिए अकूत संपत्ति जोड़ने का मामला झेल रहे हैं.

विश्वभर में क्रिकेटर के तौर पर मशहूर, औक्सफोर्ड से पढे़ इमरान ने 1996 में पाकिस्तान तहरीके इंसाफ का गठन किया था. राजनीति में उन्होंने भ्रष्ट सत्ता विरोधी नेता के रूप में अपनी शुरुआत की थी. वे भारत में हुए अन्ना हजारे के आंदोलन से प्रभावित रहे. उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में भी भ्रष्टाचार और व्यवस्था परिवर्तन के लिए बड़ी क्रांति की जरूरत है. लिहाजा, उन्होंने अपने स्तर पर भ्रष्टाचार से आजादी के लिए आंदोलन शुरू किया था. इमरान खान ने 1971 में राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट में कैरियर शुरू किया था.

वे आते ही पाकिस्तान क्रिकेट में छा गए. 1992 में उन के नेतृत्व में पाकिस्तान क्रिकेट वर्ल्डकप चैंपियन बना था. उन्हें क्रिकेट का शहजादा कहा जाता था. उन के पिता इकराम उल्लाह नियाजी आर्किटैक्ट थे. मां शौकत जिस परिवार से थीं वह क्रिकेट खिलाडि़यों का था. उन के मामा अहमद रजा खान टीम के चयनकर्ता थे. इमरान 19 साल की उम्र में इंगलैंड जाने वाली टीम में चुने गए. उसी दौरान उन्होंने औक्सफोर्ड में दाखिला ले लिया था.

खेल के दौरान इमरान की छवि प्लेबौय की थी. भारतीय फिल्म अभिनेत्री जीनत अमान से उन के प्रेमसंबंधों की चर्चा होती रहती थी. बाद में 1995 में उन्होंने ब्रिटिश उद्योगपति गोल्ड स्मिथ की बेटी जेमिमा स्मिथ से शादी की. जेमिमाइमरान के 2 बेटे हैं. यह शादी ज्यादा समय तक नहीं टिकी. जेमिमा के तलाक के बाद उन्होंने टीवी ऐंकर रेहम खान से दूसरी शादी की पर उन दोनों का साथ भी ज्यादा नहीं रहा. इमरान ने इसी साल अपनी आध्यात्मिक गुरु बुशरा मानेक से तीसरी शादी की है. इन चुनावों के दौरान इमरान खान ने नए पाकिस्तान का नारा दिया. नवाज शरीफ के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई थी. पनामा पेपर्स में नवाज शरीफ का नाम आने के बाद इमरान खान का उत्साह और बढ़ गया. लोगों ने नए पाकिस्तान के नारे पर पाकिस्तान तहरीके इंसाफ को सब से बड़ी पार्टी के रूप में चुन लिया.

इस से पहले 1997 के चुनावों में इमरान खान की पार्टी ने 9 लोगों को मैदान में उतारा था पर एक पर ही जीत दर्ज हुई. 2002 में एक सीट जीते. 2008 के चुनाव का बहिष्कार किया गया. 2013 में पीटीआई दूसरी सब से बड़ी पार्टी बनी. ऐसा कहा व माना जाता है कि इमरान खान पाकिस्तान की सेना, आईएसआई और कठमुल्लों के सहयोग से चुनाव जीते.

पाकिस्तान तहरीके इंसाफ की जीत पर विपक्षी पार्टियां चुनावों में धांधली का आरोप लगा रही हैं. पाकिस्तान में मौजूद यूरोपियन यूनियन के पर्यवेक्षक ने भी चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे. सेना पर इमरान को जिताने के लिए मीडिया पर गैरजरूरी पाबंदियां लगाने के आरोप हैं. सेना द्वारा मीडिया हाउसों को इमरान की पार्टी को ज्यादा कवरेज देने और विरोधियों को अधिक तवज्जुह न देने का दबाव बनाया गया. इमरान खान ने नए पाकिस्तान का नारा जरूर दिया पर इस के लिए वे क्या करेंगे, इस बारे में उन्होंने न तो चुनावप्रचार में कोई खाका पेश किया और न उस से पहले और न ही चुनाव जीतने के बाद. अलबत्ता, उन्होंने पुराने इरादे जरूर जाहिर कर दिए जो पिछले पाकिस्तानी शासकों के रहे हैं.

इमरान का सेना और वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ खतरनाक गठजोड़ है. सेना और आईएसआई की नीतियों से समूची दुनिया वाकिफ है. इन दोनों के साथ पाकिस्तान के मजहबी कट्टरपंथी मिले हुए हैं. सेना, आईएसआई और कट्टरपंथियों का गठजोड़ लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर आई सरकारों के लिए हमेशा नुकसानदेह साबित होता आया है

इमरान का तालिबानप्रेम पिछले सालों में इस कदर सार्वजनिक रहा है कि उत्तर पश्चिम प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में उन की प्रांतीय गठबंधन सरकार ने 2017 में हक्कानी मदरसे को 30 लाख डौलर की मदद की थी. हक्कानी मदरसे को तालिबान की रीढ़ कहा जाता है. पूर्व तालिबान चीफ मुल्ला उमर समेत अन्य नेताओं ने यहीं से शिक्षा हासिल की थी. ये कट्टरपंथी पाकिस्तान में बैठ कर भारतविरोधी गतिविधियों को अंजाम देते हैं. अब, इन के मजबूत होने की आशंका है. कश्मीर राग

जनता ने धार्मिक कट्टरपन को नकारा है पर सब से बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आई पाकिस्तान तहरीके इंसाफ कट्टरपंथी नेताओं और संगठनों से दूर नहीं है. इमरान खान आतंकियों के प्रति नरम रुख रखते हैं, यह सभी जानते हैं. कश्मीर को ले कर भी उन का रुख अन्य पाकिस्तानी नेताओं जैसा ही है. इमरान ने पूरे चुनावी कैंपेन में काफी उग्र तरीके से कश्मीर का मुद्दा उठाया. उन्होंने चुनावी दौरों में कश्मीर में सेना की मौजूदगी पर सवाल उठाए. कश्मीर के युवाओं पर ज्यादती किए जाने के आरोप लगाए यानी वे पुराने नेताओं की तरह कश्मीर राग अलापते रहेंगे.

इसलामिक कल्याणकारी राज्य बनाने का वादा करने के कारण इमरान खान को तालिबान खान कहा जाता है. उन की पार्टी को अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित घोषित उन आतंकियों का समर्थन प्राप्त है जो अलकायदा से जुड़े हैं. इमरान खान पाकिस्तान के तालिबान से भी सहानुभूति रखते हैं और उन को पख्तून नेता कहते हैं. इमरान चुनाव से पहले मौलाना फजलुर रहमान खलील से मिले थे. हरकत उल मुजाहिदीन संस्थापक फजलुर अमेरिकी आतंकी लिस्ट में शामिल है.

मुत्तहिदा मजलिस के प्रमुख फजलुर रहमान तहरीके तालिबान पाकिस्तान से संबंध रखता है. मुत्तहिदा 6 कट्टरपंथी धड़ों से बना एक गुट है जो आतंकी गुटों का समर्थक है. 2013 के अमेरिकी ड्रोन हमले में तहरीके तालिबान पाकिस्तान का कमांडर वलीउर रहमान मारा गया था, तब इमरान ने उसे शांतिसमर्थक बताया था.

जीत के बाद उन्होंने अपनी प्राथमिकता गिनाते हुए भारत का जिक्र जिस तरह सब से बाद में किया उस से उन के इरादों के बारे में बहुतकुछ संकेत मिल जाते हैं. इमरान खान ने चुनाव जीतने के बाद अपने पहले भाषण में साफ कह दिया कि वे चीन को प्राथमिकता देंगे.

पाकिस्तान की भारत नीति आर्मी हैडक्वार्टर से संचालित होगी? इमरान कट्टरपंथियों को नाराज नहीं कर पाएंगे. सेना से हाथ मिलाने का मतलब है इमरान सिर्फ चेहरा होंगे, हुकूमत सेना व मुल्लों की ही चलेगी.

पाकिस्तान में गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, धार्मिक कट्टरता जैसे कई मुद्दे हैं जिन से निबटना इमरान के लिए कड़ी चुनौती है. सेना उन की सहयोगी बनी दिखती है लेकिन उसे जनता से जुड़े इन मुद्दों से कोई मतलब नहीं है. भारत के विरोध का मुद्दा सेना के लिए सर्वोपरि है. इमरान को सेना के मुताबिक चलना पड़ेगा. जहां तक पाकिस्तान की नई हुकूमत के साथ भारत पर असर का सवाल है, साफ है कि जब तक चुनी हुई सरकार पर सेना, आईएसआई और कट्टरपंथियों का गठजोड़ हावी रहेगा, तब तक भारत के लिए खतरनाक स्थिति रहेगी. तीनों की मिलीभगत से भारत के विभिन्न हिस्सों में सीमापार से घुसपैठ और आतंकी गतिविधियां जारी रहेंगी. जम्मूकश्मीर के बदतर हालात के लिए यही तीनों जिम्मेदार हैं.

पाकिस्तान के 71 साल के इतिहास में आधे से भी कम समय चुनी हुई सरकारें रही हैं. ज्यादा समय वहां सेना ने सीधा शासन किया है. वहीं, भले ही वहां लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार रही हो, फिर भी उस की कार्यप्रणाली में सेना, खुफिया एजेंसी आईएसआई और कठमुल्लों का हस्तक्षेप रहा है. ये मिल कर न केवल पाकिस्तान को रौंदते रहे, पड़ोसी भारत के साथ दुश्मनी का नारा दे कर अपना उल्लू साधते रहे हैं. पाकिस्तानी नेताओं की सब से बड़ी दिक्कत यह है कि वे सेना, आईएसआई और धार्मिक कट्टरपंथियों का खुल कर विरोध नहीं कर पाते. जो भी विरोध की हिम्मत करता है उसे या तो जान से मरवा दिया जाता है या देशद्रोह, भ्रष्टाचार जैसे आरोपों में जेल में ठूंस दिया जाता है.

इमरान खान भी सेना, आईएसआई और कठमुल्लों के शिकंजे से बाहर नहीं निकल पाएंगे. उन्हें इन के आदेशों पर ही चलना पड़ेगा. पाकिस्तान की यही नियति है. मजहब ने उसे इतना पंगु बना दिया है कि भूख, गरीबी, हिंसा, आतंक, गृहयुद्घ इस देश की स्थायी समस्याएं बन गए हैं. जब तक यह देश धर्म का दामन नहीं छोड़ेगा तब तक ऐसे ही हालात रहेंगे. चुनावों में चुन कर आए इमरान खान भी ऐसे हालात में सेना की कठपुतली बन कर रहेंगे तो कोई आश्चर्र्य नहीं. वे नारा चाहे नए पाकिस्तान का दें, लेकिन नीतियां उन की भी वही पुरानी रहेंगी जो अब तक के शासकों की रही हैं.

सकते में मंदिर, मसजिद, चर्च और गुरुद्वारे

सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश से देश के 20 लाख मंदिरों, 3 लाख मसजिदों और हजारों चर्चों व गुरुद्वारों को सकते में डाल दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों को एक तरह से सरकार चलाने पर निगरानी करने के लिए आदेश दिया है. कहने को आदेश स्वच्छता, प्रवेश और पैसे की संभाल से संबंधित है पर यदि यह लागू हो गया तो मंदिर मसजिद दुकानदारी पर सही और गहरा आघात होगा.

सृष्टि निर्माण ईश्वर, जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म मृत्यु पश्चात स्वर्गनर्क की बातें कर के असल में धर्म लोगों की जेबें काटने वाले अनूठे तरीके ही बने रहे हैं. सभी धर्मों ने बड़ी चतुरता से आम व्यक्ति को अपने पंडे पुरोहितों के थोड़े ज्ञान के सहारे एक अनूठे जाल में फांस लिया और पीढ़ीदरपीढ़ी लोगों को जन्म से मृत्यु तक ले कर धर्म टैक्स देना पड़ रहा है. इसी टैक्स को सुरक्षित करने के लिए धर्म के दुकानदारों मसजिद, मठ, मंदिर, चर्च, गुरुद्वारे, …. बनवाए और उन में नियुक्त लोगों को बैठे ठाले हलवा पूरी भी दिलाई, औरतें पहुंचवाई, ताकत दी और सुरक्षा दी.

धर्म की दुकानदारी में लोग सदियों से अपनी सत्ता की सुरक्षा के लिए लोगों को बहकाते रहे हैं और सामाजिक प्रबंध के नाम पर प्रतिबंधों की लंबी फेहरिश्त बनाते रहे हैं. धर्मों ने केवल अपने को सुरक्षित करने के लिए अरबों की हत्याएं कराई हैं. ज्यादातर युद्घ जर, जमीन और जोरू के लिए नहीं धार्मिक सत्ता के लिए हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश इस सत्ता पर नियंत्रण करने का प्रयास है. यह सफल होगा इस में पूरा संदेह है क्योंकि बुद्ध, महावीर, धर्वाक, मार्टिन लूथर जैसे प्रारंभिक सफलताओं के बावजूद मूल धर्मों का खास बिगाड़ नहीं पाए.

सुप्रीम कोर्ट ने अभी सावधानी रखी है कि आदेश केवल भक्तों की आड़ में दिया है कि उन्हें असुविधाएं न हों और उन के चढ़ावे का सदुपयोग हो. सुप्रीम कोर्ट मंदिरों मसजिदों का प्रबंध नहीं छेड़ रहीं. जो कमा रहा है, कमाता रहे पर हिसाब रखे. उसे चुनौती देना आसान नहीं होगा.

अन्य देशों ने जब भी धार्मिक दुकानों को नियंत्रित करने की कोशिश की है, उन्होंने या तो प्रवेश बंद कराया या राज्य या सरकार ने उन्हें छीन लिया. सुप्रीम कोर्ट का आदेश आल्वीयत कर कोई रोकटोक नहीं लगाता पर यह सभी धर्मों के दुकानदारों को नहीं भाएगा, पक्का है. धर्म पर आधारित भारतीय जनता पार्टी की सरकार को अपनों के ही दिए आघात का मुकाबला करने के उपाय ढूंढ़ने होंगे.

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