मानव तस्करी : हैवानियत की हद

गुजरात के खूबसूरत शहर सूरत की कई मायनों में अपनी अलग पहचान है. हीरा नगरी के नाम से जाने वाले इस शहर में व्यापक स्तर पर हीरे तराशने का काम होता है. इस के अलावा सूरत की साडि़यां भी पूरे देश में मशहूर हैं.

उस दिन सूरत शहर के थाना पांडेसरा क्षेत्र में जीयाव-बुडि़या रोड पर साईंमोहन सोसायटी के पास कुछ बच्चे मैदान में क्रिकेट खेलने गए थे. इन में कुछ बच्चे जमीन में विकेट गाड़ रहे थे तो कुछ बौलिंग और कुछ फील्डिंग की प्रैक्टिस कर रहे थे. तभी उन की बौल मैदान के पास झाडि़यों की तरफ चली गई. 2-3 बच्चे बौल लेने के लिए झाडि़यों की ओर गए तो वहां उन्हें एक लड़की पड़ी दिखाई दी.

लड़की को इस तरह पड़ा देख बच्चे डर गए और अपने साथियों के पास लौट आए. उन्होंने अपने साथियों को झाडि़यों के पास एक लड़की के पड़े होने की बात बताई. इस के बाद 8-10 बच्चे झाडि़यों के पास पहुंचे तो वहां का नजारा देख सन्न रह गए. वहां एक लड़की की लाश पड़ी हुई थी.

यह देख बच्चे अपनी बौल ढूंढना और क्रिकेट खेलना भूल कर दौड़ते हुए साईंमोहन सोसायटी की तरफ आ गए. उन्होंने लोगों को मैदान के पास झाडि़यों में एक लड़की की लाश पड़ी होने की जानकारी दी. बच्चों के बताने पर कई लोग झाडि़यों के पास गए तो वहां सचमुच लाश पड़ी हुई थी. लोगों ने इस की सूचना पुलिस को दे दी.

कुछ ही देर में पांडेसरा थाने की पुलिस मौके पर पहुंच गई, पुलिस ने मौकामुआयना किया. लाश को उलटपुलट कर देखा. लाश करीब 10-11 साल की लड़की की थी. उस के बदन पर नीले सफेद रंग की टीशर्ट और नीला पायजामा था. उस के गले के अलावा शरीर पर कई जगह मारपीट के निशान साफ नजर आ रहे थे. पुलिस ने वहां एकत्र लोगों से मृत लड़की की शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उसे नहीं पहचाना.

पुलिस ने पंचनामे के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया. पोस्टमार्टम की प्राथमिक रिपोर्ट में पता चला कि लड़की के साथ दुष्कर्म किया गया था. रिपोर्ट में उस की हत्या कुछ घंटे पहले किए जाने की बात कही गई थी. हत्या गला घोंट कर की गई थी.

पांडेसरा पुलिस स्टेशन में उसी दिन अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ हत्या, दुष्कर्म और पोक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. यह बीते 6 अप्रैल की बात है.

लड़की की शिनाख्त न होने से पुलिस को लगा कि उस की हत्या कहीं दूसरी जगह की गई होगी और शव यहां क्रिकेट मैदान के पास ला कर फेंक दिया गया होगा. पुलिस के लिए सब से पहले लड़की की शिनाख्त होना जरूरी था. इस के लिए पुलिस ने लड़की के फोटो के साथ स्टेट कंट्रोलरूम को इस की जानकारी भेज दी. इस के अलावा शहर के विभिन्न पुलिस स्टेशनों में दर्ज लापता लड़कियों के बारे में सूचनाएं जुटाई गईं. काफी कोशिश के बाद भी उस लड़की के बारे में पुलिस को कोई जानकारी नहीं मिल सकी.

लाश मिलने के अगले ही दिन पुलिस ने लड़की की पहचान में आम लोगों का सहयोग मांगते हुए उस के बारे में सूचना देने वाले को 20 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा कर दी. घोषणा में पुलिस ने यह भी जोड़ा कि जानकारी देने वाले का नाम गुप्त रखा जाएगा.

पुलिस ने भले ही इनाम का ऐलान कर दिया था, लेकिन इस का कोई फायदा नहीं हुआ. पुलिस को मृतका के बारे में कोई सूचना नहीं मिली. इस पर पुलिस अपने तरीके से जांचपड़ताल में जुट गई.
इसी बीच 9 अप्रैल को सूरत शहर के पांडेसरा इलाके में ही जीयाव गांव के नजदीक हाईवे किनारे की झाडि़यों में एक महिला की सड़ीगली लाश मिली. लाश कई दिन पुरानी थी. यह जगह साईंमोहन सोसायटी से ज्यादा दूर नहीं थी. पुलिस ने महिला की लाश का पोस्टमार्टम करवाया.

पोस्टमार्टम की प्राथमिक रिपोर्ट से पता चला कि महिला की उम्र 35-40 साल के बीच थी और उस की हत्या कई दिन पहले गला घोंट कर की गई थी. इस महिला की भी पहचान नहीं हो सकी.

4 दिन के भीतर एक ही थानाक्षेत्र में एक लड़की और एक महिला की लाश मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई थी. पुलिस के लिए यह परेशानी की बात थी कि दोनों शवों की ही शिनाख्त नहीं हो सकी थी. जबकि आमतौर पर शव की शिनाख्त होने पर ही जांच आगे बढ़ती है.

दोनों शव मिलने की जगह में करीब 2 किलोमीटर की दूरी होने के कारण पुलिस को दोनों शवों के बीच आपसी संबंध होने का संदेह हुआ. पुलिस का अनुमान था कि महिला उस लड़की की मां हो सकती है. इस बात की पुष्टि के लिए पुलिस ने महिला और लड़की के शव का डीएनए टेस्ट कराने के लिए सैंपल भेजे.
जहां लड़की की लाश मिली थी, उस के आसपास में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई. फुटेज में तड़के करीब साढ़े 4 बजे एक हैचबैक कार नजर आई. कई कैमरों की फुटेज देखने पर कार का रंग काला होने का पता चला. इस पर पुलिस ने भेस्तान इलाके में काले रंग की सभी हैचबैक कार के बारे में पूछताछ की. आरटीओ कार्यालय से भी काले रंग की सभी हैचबैक कार के बारे में जानकारी जुटाई गई.

काफी भागदौड़ के बाद पुलिस की नजरें कार नंबर जीजे05सी एल8520 पर अटक गई. इस कार के मालिक के बारे में पता चला कि कार भेस्तान के सोमेश्वर नगर में रहने वाले रामनरेश के नाम से रजिस्टर्ड है. पुलिस ने पूछताछ के लिए रामनरेश को थाने बुलवा लिया. उस ने बताया कि उस की कार 6 अप्रैल को हरसहाय गुर्जर ले गया था.

पुलिस हरसहाय गुर्जर की तलाश में जुट गई. पता चला कि हरसहाय गुर्जर सूरत के भेस्तान इलाके में सोमेश्वर सोसायटी की एक बिल्डिंग में अपने बड़े भाई हरिसिंह के साथ रह रहा था. हरिसिंह मार्बल लगाने की ठेकेदारी करता था.

वह मूलरूप से राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में गंगापुर सिटी के पास कुरकुरा खुर्द गांव का रहने वाला था. उस के परिवार में पत्नी और 2 बेटे थे. एक बेटा उस के साथ सूरत में और दूसरा बेटा कुरकुरा खुर्द गांव में रहता था.

हरसहाय के बारे में सारी जानकारी जुटा कर पुलिस ने सूरत की सोमेश्वर सोसायटी में उस के मकान पर दबिश दी तो वह वहां नहीं मिला. पड़ोसियों से पूछताछ में पता चला कि हरसहाय 2-3 दिन पहले ही पत्नी और बच्चों के साथ अपना सारा सामान ले कर गांव चला गया है.

इस पर अहमदाबाद पुलिस की क्राइम ब्रांच की एक टीम राजस्थान भेजी गई. राजस्थान में सवाई माधोपुर पुलिस की मदद से 20 अप्रैल को कुरकुरा खुर्द गांव से हरसहाय गुर्जर को पकड़ लिया गया. गुजरात पुलिस उसे सूरत ले गई.

इस बीच डीएनए जांच से इस बात की पुष्टि हो गई कि पांडेसरा में जीयाव के पास जिस महिला का शव मिला, वह दुष्कर्म पीडि़ता 11 साल की बेटी की मां ही थी. महिला और बच्ची के शव की डीएनए रिपोर्ट पौजिटिव आई.

हरसहाय से की गई पूछताछ में अभागिन मांबेटी के मामले में मानव तसकरी होने की बात सामने आई. दोनों मांबेटी से कई दिनों तक दुष्कर्म कर के बाद में उन्हें मौत की नींद सुला दिया गया था. इस मामले में बाद में पुलिस ने मानव तस्करी से जुड़े हरसहाय के कुछ अन्य साथियों को भी गिरफ्तार कर लिया.
पुलिस की पूछताछ में मांबेटी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी—

राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में गंगापुर सिटी के पास कुरकुरा खुर्द गांव का रहने वाला हरसहाय गुर्जर कई साल पहले गुजरात के सूरत चला गया था. उस का बड़ा भाई हरिसिंह भी सूरत में रहता था. हरसहाय सूरत में मकानों और अन्य बिल्डिंगों में ठेके ले कर मार्बल लगाने का काम करता था.

हरसहाय भेस्तान के सोमेश्वर सोसायटी की एक बिल्डिंग में पत्नी रमादेवी और छोटे बेटे प्रियांशु के साथ किराए के मकान में रहता था. उस का बड़ा बेटा दीपांशु राजस्थान में गांव में ही रहता था.

हरसहाय के पास मार्बल लगाने का काम करने वाले एक युवक कुलदीप की शादी नहीं हुई थी. कुलदीप करीब 6 महीने पहले राजस्थान से एक महिला को शादी करने के मकसद से 35 हजार रुपए में खरीद कर सूरत ले आया था. उस महिला के साथ 11 साल की एक बेटी भी थी. बाद में कुलदीप के घर वालों ने खरीदी हुई महिला से उस की शादी करने से इनकार कर दिया.

कुलदीप ने हरसहाय को सारी बात बताई. हरसहाय ने उस महिला और उस की बेटी को रखने की हामी भर ली. इस पर कुलदीप और मुकेश ने वह महिला और उस की बेटी हरसहाय को सौंप दीं. हरसहाय ने मांबेटी के रहने की व्यवस्था सूरत के कामरेज में टाइल्स फिटिंग की एक साइट पर कर दी. उस ने दोनों मांबेटी के रहने के साथ खानेपीने का भी इंतजाम कर लिया. इस के एवज में हरसहाय ने महिला से ज्यादती कर अवैध संबंध बना लिए.

इश्कमुश्क और अवैध संबंधों के मामले ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रहते. यहां भी ऐसा ही हुआ. कुछ दिनों बाद हरसहाय की पत्नी रमादेवी को इस बात का पता चल गया कि उस के पति ने एक महिला को रखा हुआ है.

दरअसल हरसहाय उस महिला के लिए कई बार अपने घर से कई तरह के सामान और कपड़े ले कर जाता था और वहां से कईकई घंटे बाद लौटता था.

रमादेवी जब उस से इस बारे में पूछती तो वह उसे साफ जवाब नहीं देता था. एक दिन रमादेवी ने अपने भरोसे के एक आदमी को पति के पीछे लगा दिया. बाद में उस आदमी ने रमादेवी को बताया कि हरसहाय ने एक औरत रखी हुई है.

रमादेवी इस बात पर पति से झगड़ा करने लगी. घर में रोजरोज की कलह शुरू हो गई. इस बीच हरसहाय ने उस महिला और उस की बेटी को कामरेज से हटा कर मानसरोवर के एक फ्लैट में रख दिया. दूसरी तरफ हरसहाय ने जिस महिला को रखा हुआ था, वह बारबार शादी करने या पैसे देने की बात कहती थी. इस पर हरसहाय परेशान रहने लगा. कोई और रास्ता न देख उस ने महिला से पीछा छुड़ाने का फैसला कर लिया.

मार्च महीने के चौथे सप्ताह में हरसहाय ने पहले उस महिला के सिर पर ईंट मार कर उसे घायल कर दिया. इस के बाद दुपट्टे से उस का गला घोंट कर उसे मार डाला. महिला की हत्या उस की मासूम बेटी के सामने की गई. इस के बाद हरसहाय ने उस महिला का शव पांडेसरा में जीयाव के पास फेंक दिया था. बाद में 9 अप्रैल को पुलिस ने उस महिला का शव सड़ीगली हालत में बरामद किया था.

महिला की हत्या के बाद उस की 11 साल की बेटी को हरसहाय अपने घर पर ले आया. वह बच्ची अपनी मां के लिए रोती रहती थी. किसी दूसरे की बच्ची को अपने घर लाने पर रमादेवी का अपने पति से झगड़ा बढ़ गया. हरसहाय यह तय नहीं कर पा रहा था कि उस बच्ची का क्या करे.

घर में बढ़ते झगड़े को देख कर और उस बच्ची द्वारा कभी भी पोल खोल दिए जाने के डर से वह बच्ची को बंधक बना कर यातनाएं देने लगा. कई बार वह उसे डंडे से बेरहमी से पीटता था. बच्ची के शरीर पर उस ने ब्लेड से कई घाव कर दिए थे. इस दौरान हरसहाय ने उस मासूम से दुष्कर्म भी किया.

5 अप्रैल की रात हरसहाय उस बच्ची को मकान की छत पर ले गया, जहां उस ने उस के साथ दुष्कर्म किया. दुष्कर्म के बाद उस ने उस के नाजुक अंगों पर घाव कर दिए. फिर गला दबा कर बच्ची को मार डाला. बच्ची की हत्या उस ने सिर्फ इसलिए की कि कहीं वह अपनी मां की हत्या का राज उजागर न कर दे.
हरसहाय 6 अप्रैल को तड़के रामनरेश की कार से उस बच्ची के शव को साईंमोहन सोसायटी के पीछे क्रिकेट मैदान के पास झाडि़यों में फेंक आया. बाद में उसी दिन बच्ची का शव पांडेसरा पुलिस ने बरामद किया था. बच्ची की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस के शरीर पर 80 से ज्यादा घाव मिले.

20 दिनों की मशक्कत के बाद सूरत पुलिस ने राजस्थान और सूरत में 40 से ज्यादा लोगों से पूछताछ कर के मांबेटी की शिनाख्त करने में सफलता हासिल कर ली.

वह महिला राजस्थान के सीकर की रहने वाली थी. महिला की मां के मुताबिक, उस की बेटी का चेहरा बचपन में गर्म पानी से झुलस गया था. इस वजह से उस की शादी नहीं हो पा रही थी. बाद में उस की शादी 22 जून, 2007 को सीकर के फतेहपुर कस्बे में कर दी गई. ससुराल में आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी. शादी के साल भर बाद ही उस महिला ने एक बेटी को जन्म दिया.

बाद में महिला ने फतेहपुर निवासी पति को छोड़ दिया. उस ने 2010 में बूंदी में एक युवक से शादी कर ली. महिला अपनी बेटी को भी बूंदी ले गई. महिला का दूसरा पति बूंदी में जूतेचप्पल बेचने का काम करता था. उस की पहली पत्नी की मौत हो चुकी थी. पहले से ही उस के 3 बच्चे थे. दूसरी शादी के बारे में महिला ने अपने परिवार वालों को नहीं बताया था.

दूसरी शादी करने के बावजूद महिला को सुख नसीब नहीं हुआ. उस का पति से झगड़ा रहने लगा. एक बार पति से झगड़ा होने पर महिला अपने मायके चली गई.

बाद में उस का पति भी बूंदी से सीकर आ गया. उस समय महिला की मां ने उस से कहा कि या तो यहां पर रुक जा, नहीं तो फिर दोबारा यहां पर मत आना. इस के बाद वह सीकर से चली गई थी. इस के बाद महिला के घर वालों का उस से कोई संपर्क नहीं हुआ था.

घटना से करीब 7 महीने पहले यह महिला अपने पति से 2 दिन में आने की बात कह कर बेटी के साथ घर से निकली थी. वह घर से जेवर भी ले गई थी. लोगों ने महिला को बूंदी के बसस्टैंड पर एक युवक के साथ देखा था.

जब वह 2 दिन तक घर नहीं लौटी तो पति ने उसे फोन किया. महिला ने कहा कि वह जयपुर में है और काफी परेशानी में है. इस के बाद उस का महिला से संपर्क नहीं हुआ तो उस ने बूंदी कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज करा दी थी.

पुलिस ने महिला की मोबाइल लोकेशन निकलवाई तो वह गंगापुर सिटी की आई. इस पर उस के दूसरे पति ने गंगापुर सिटी जा कर भी उस की तलाश की लेकिन उस का पता नहीं चल सका. बाद में उस की मोबाइल लोकेशन दौसा व गंगापुर सिटी और इस के बाद सूरत आती रही.

महिला के दूसरे पति का कहना है कि वह उस की पत्नी को बेचने और खरीदने वाले को नहीं जानता. उस का आरोप है कि पुलिस ने सपोर्ट नहीं किया. पुलिस अगर सपोर्ट करती तो उस की पत्नी सूरत नहीं पहुंचती और आज वह जिंदा होती.

सूरत पुलिस ने सीकर पहुंच कर महिला के परिजनों को खोज लिया. फिर फोटो, आधार कार्ड और अन्य सबूतों के आधार पर महिला की शिनाख्त की. इस के बाद पुलिस सीकर से महिला के घर वालों को सूरत ले गई. सूरत में पुलिस की मौजूदगी में 27 अप्रैल को मोरा भागल स्थित कब्रिस्तान में परिजनों ने महिला और उस की बेटी के शव दफना दिए.

हतभागी मांबेटी को एकता ट्रस्ट के अब्दुल मलबारी के सहयोग से दफनाया गया था. हालांकि यह सब पुलिस ने गुप्तरूप से किया और मीडिया को इस से दूर रखा. पुलिस ने मीडिया को गुमराह करने के लिए कब्रिस्तान के गेट पर ताला भी लगा दिया था.

महिला के परिजनों को पुलिस जिस कार में कब्रिस्तान ले गई, उस के नंबर भी ढक दिए थे. घर वालों को मुंह ढक कर कार में बीच में बैठा कर लाया और ले जाया गया. इस के बाद सूरत पुलिस ने महिला के सीकर से आए घर वालों के बयान दर्ज किए. घर वालों ने बताया कि 2 साल पहले उन की बेटी सीकर में घर आई थी, उस के बाद से उन का उस से कोई संपर्क नहीं था.

इस मामले में यह खास बात रही कि 26 अप्रैल को पांडेसरा इलाके में क्रिकेट मैदान के पास मिले बच्ची के शव की शिनाख्त के लिए सूरत पुलिस और अहमदाबाद क्राइम ब्रांच सहित करीब 500 पुलिस जवानों को लगाया गया था. पुलिस ने करीब 8 हजार घरों पर जा कर बच्ची का फोटो दिखा कर उस की पहचान करने की कोशिश की थी. सूरत शहर में बच्ची के पोस्टर चिपकवाए गए. बच्ची की पहचान बताने वाले को 20 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की गई.

भेस्तान क्षेत्र के अलावा नैशनल हाईवे के आसपास के इलाके में करीब 800 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई. गुजरात के अलावा आसपास के 3 राज्यों से गुमशुदा बच्चियों के फोटो से मृतक बच्ची का फोटो मिलान करने का प्रयास किया गया. सूरत से अन्य राज्यों में जाने वाली ट्रेनों में बच्ची के फोटो चिपकवाए गए. सूरत के नागरिकों ने भी अपने स्तर पर बच्ची की पहचान के लिए इनाम का ऐलान किया था.

कपड़ा व्यापारियों ने दूसरे राज्यों में भेजे जाने वाले माल के पार्सलों पर भी बच्ची के फोटो चिपकवाए. जिस जगह बच्ची का शव मिला था, उस के आसपास 5 अप्रैल की रात से 6 अप्रैल की सुबह तक एक्टिव रहे करीब एक हजार मोबाइल नंबरों की जांच की गई.

भेस्तान में सोमेश्वर सोसायटी की जिस बिल्डिंग में बच्ची को बंधक बना कर उस से दुष्कर्म और फिर हत्या की गई थी, उस बिल्डिंग के लोगों को बच्ची का शव मिलने के बाद पुलिस ने फोटो दिखाया था, लेकिन किसी ने उसे नहीं पहचाना था. इस का कारण यह था कि बच्ची को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था.

सूरत के पुलिस कमिश्नर सतीश शर्मा का कहना है कि आरोपियों को सख्त सजा दिलाने के लिए पुलिस के पास काफी सबूत हैं. सीसीटीवी फुटेज हैं. मांबेटी का डीएनए मैच हो गया है. दूसरी ओर गुजरात के गृह राज्यमंत्री प्रदीप सिंह जडेजा का कहना है कि इस मामले की सुनवाई फास्टट्रैक कोर्ट में होगी. इस के लिए सरकार स्पैशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर नियुक्त करेगी.

बहरहाल, यह मामला न केवल खुल गया है, बल्कि यह बात भी उजागर हो गई है कि महिलाओं की खरीद फरोख्त आज भी हो रही है. खरीदार खरीदी गई महिला को उपभोग की वस्तु मानता है. जब तक मन चाहता है उपभोग करता है. मन भर जाने पर उसे दरदर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ देता है या हरसहाय जैसे दरिंदे पीछा छुड़ाने के लिए उसे मौत के घाट उतार देते हैं. इस कहानी में न तो महिला का कोई कसूर था और न उस की बच्ची का. लेकिन दरिंदों ने उन की जान ले ली.

मौनसून में पेट की बीमारियों से कैसे बचें

मौनसून आते ही चारों तरफ खुशियों का माहौल दिखता है. मनुष्यों से ले कर जानवरों, पक्षियों, पेड़पौधे, खेतखलिहान, सब में खुशियों की लहर दौड़ जाती है और हरेभरे हो जाते हैं. ऐसे में जहां ये दृश्य सब को आनंद देते हैं वहीं इस मौसम के चलते पेट की कुछ बीमारियां भी पनपती हैं. इस दौरान हर व्यक्ति को अपना खास ध्यान रखने की जरूरत होती है.

वर्षा के मौसम में पेट की बीमारियां तकरीबन 30 प्रतिशत बढ़ जाती हैं. मुंबई के शुश्रुत हौस्पिटल के गैस्ट्रोएंट्रोलौजिस्ट डा. समित जैन बताते हैं कि मौनसून का मजा तभी है जब आप अपने खानपान पर ध्यान दें और स्वस्थ रहें.

कुछ बीमारियां हैं जो मौनसून के कारण होती हैं, जिन की जानकारी सभी को होनी आवश्यक है.

एक्यूट गैस्ट्रोएंटाइटिस

 लक्षण

–    पेट में दर्द.

–    पतले दस्त या जुलाब का होना.

–    फूड पौयजनिंग होना.

–    बारबार उलटियां हो.

–    बुखार आना और कमजोरी महसूस करना.

इलाज

मरीज को ओआरएस का घोल, नारियल पानी व नीबू पानी या फिर इलैक्ट्रौल पाउडर का घोल देना सही रहता है. यदि एक दिन में मरीज ठीक न हो तो तुरंत डाक्टर की सलाह लें.

हैपेटाइटिस ‘ए’

हैपेटाइटिस ‘ए’ वायरस दूषित पानी पीने से आता है. यह वाटरबौर्न वायरल इन्फैक्शन डिसीज है.

 लक्षण

–    इसे पीलिया भी कहा जाता है.

–    उलटियां होना.

–    कमजोरी और बुखार होना.

–    जोड़ों में दर्द होना.

इलाज

मरीज के खून की जांच कराई जाती है. इस के लिए डाक्टर की सलाह तुरंत लें, ताकि समय पर मरीज को जरूरी दवाएं मिल सकें.

टाइफायड

टाइफायड वैक्टेरियल इन्फैक्शन है, जो दूषित पानी से मौनसून में अधिक होता है.

लक्षण

–    तेज बुखार आना.

–    पतले दस्त होना.

–    उलटियां होना.

–    सिरदर्द होना.

–    कमजोरी जाना.

 इलाज

ऐसा होते ही तुरंत डाक्टर को दिखाएं क्योंकि इस में इलाज खून और स्टूल की जांच के बाद ही शुरू होता है.

डाक्टर समित बताते हैं कि इन सभी पेट की बीमारियों में साफ पानी पीना बहुत जरूरी है. इन बीमारियों से आप तभी बच सकते हैं जब मौनसून के दौरान इन बातों का ध्यान रखें :

–    मौनसून में रोडसाइड बनने वाला खाना न खाएं.

–    बाहर रखे किसी भी ठंडे भोजन को खाने से बचें.

–    कटे फल या कच्चा सलाद न खाएं, उसे अच्छी तरह से धो कर ही खाएं.

–    गन्ने का रस या किसी भी प्रकार का खुले में रखा जूस न पिएं.

–    पीने का पानी उबाल कर या प्यूरीफाई कर के पिएं.

–    हर बार मैडिकेटेड साबुन से हाथ धो कर कुछ खाएं.

–    जुकाम में रूमाल का प्रयोग करें.

–    बाहर का जंकफूड और पानी पीने से बचें.

–    अधिक ट्रैवल करते हैं, तो हैंड सैनिटाइजर का प्रयोग करें.

–    घर में हाथ पोंछने के लिए तौलिया रखते हैं, तो उसे भी हर दिन बदलने की कोशिश करें.

प्रौढ़ावस्था में मधुमास की आहट

मन एक अबूझी पहेली सा तो होता है, उस पर दिल कहीं अटक जाए, तो स्थिति बड़ी विकट हो जाती है और तब शुरू होता है ऊहापोह का दौर. मन की भटकन विवेक को खत्म कर देती है और बौराया सा मन किसी का भी दीवाना हो जाता है. बात यदि कम उम्र की हो तब तो सब स्वाभाविक ही होगा, क्योंकि युवावस्था की देहरी पर विपरीत सैक्स का आकर्षण स्वाभाविक ही होता है. पर यहां मुद्दे का विषय है बड़ी आयु में प्रेम हो जाने का और वह भी तब, जब घर में बेटाबहू और पति हैं, बेशक वे अलग घर में रहते हों, पर ऐसी मानसिकता का क्या किया जाए.

रागिनी की बात करें तो उस के जीवन में सबकुछ था, स्मार्ट पति और प्यार करने वाले बेटाबहू भी, पर फिर भी न जाने क्यों रागिनी बुझीबुझी सी रहती थी. बेटाबहू अलग घर में रहते थे और पति की बेहद व्यस्त दिनचर्या थी. ऐसे में रागिनी को लगता कि वह बेहद अकेली सी हो गई है. उस का पति संजय अपने में ही उलझा रहता. जीवन में तब कुछ उथलपुथल हुई जब संजय के मित्र अंशुल का घर आनाजाना हुआ. रागिनी की जो मानसिक भूख कभी मिटी नहीं थी, उसे अंशुल ने नजरों से सहला दिया था. उस का रागिनी के प्रति एक अलग ही नजरिया था. बेशक वह ग्रेसफुली प्रशंसा करता, पर वह रागिनी के दिल में समा गया था और रागिनी उस का इंतजार करती. रागिनी के मन के किसी कोने में प्रेम का अलाव जल उठा था पर संजय गहराई समझ न पाया लेकिन कुछ दिनों बाद ही उसे लगा कि कहीं कुछ तो है. वह एक समझदार पुरुष था, उस ने स्वयं ही गहराई से सोचा, तो उसे लगा कि वह रागिनी की उपेक्षा कर रहा है. उस ने सारी स्थिति अपने विवेक से संभाल ली और फिर सबकुछ ठीक हो गया. संजय ने अपने चातुर्य से सब ठीक कर दिया और बात आगे बढ़ी नहीं.

परपुरुष के प्रति प्रेम

प्रौढ़ावस्था में प्रेम के किस्से सुनाई दे ही जाते हैं. इस के मूल में जाएं तो घर में कुछ तो ऐसा होता है जहां रिश्ते दरक जाते हैं. पारिवारिक मूल्यों की ओर एक निगाह डालें तो कमोबेश हर घर में ही पत्नी तमाम घर को व्यवस्थित रखती है. ऐसे में वह चाहती है कि उसे सराहा जाए. आमतौर पर रोजमर्रा के जीवन में पति आपाधापी में व्यस्त रहते हैं और गृहस्थी नून, तेल तक सिमट कर रह जाती है. ऐसे में पत्नी को किसी अन्य पुरुष में कुछ बदलाव नजर आता है तो उस का मन डोल भी सकता है. जब ऐसा कुछ होता है तब विवेक कहां काम करता है कि घर में पति नामक प्राणी है और बच्चे भी हैं.

प्रौढ़ावस्था यानी 30 से 50 वर्ष की उम्र में भी षोडशी भीतर समां जाती है और प्रेम का बीज फूट पड़ता है.

सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि जब पति काफी समय के लिए घर से बाहर रहते हों तब अकेले जीवन से ऊब कर पत्नी के मन में अन्यत्र प्रेम उपज सकता है.

बड़ी उम्र में प्रेम होने के बहुत कारण हो सकते हैं, कहीं पुरुष पत्नी के साथ तनावभरा जीवन जीने से भटक कर कोई साथी बना लेता है, तो कहीं स्त्रियां अपने ऊब भरे जीवन से परेशान हो अन्यत्र प्रेम तलाशती हैं. बहरहाल, ये कदम घर में अजीब वातावरण बना देते हैं.

क्या करें बैटरहाफ

ऐसे में क्या करें बैटरहाफ? विकल्प 2 हैं – या तो गृहक्लेश में जियो या फिर अपने चातुर्य से स्थिति संभाल लो, हालांकि दोनों ही परिस्थितियों में घर का वातावरण बिगड़ तो जाता ही है.

इस आयु में प्रेम के विषय में और अधिक जानकारी देती हुई मनोवैज्ञानिक प्रभा बताती हैं, ‘‘प्रौढ़ावस्था तक पहुंचतेपहुंचते जीवन का स्टाइल बदल जाता है. घर में पति है पर तमाम रूटीन पर ही जीवन चलता रहता है. कई बार पत्नी स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगती है, पति समझ नहीं पाता और पत्नी का मन मानसिकरूप से कुंठित सा हो जाता है. तब जैसे तेज धूप में चलतेचलते थोड़ी सी छाया भी उस के क्लांत मन को आराम दे देती है, इसी तरह परपुरुष का जरा सा भी झुकाव उसे अच्छा लगने लगता है और फिर शुरू हो जाता है प्रेम का सिलसिला.

‘‘इस आयु में प्रेम हो भी जाए तो संतुलन बना कर रखना जरूरी है. प्रेम में इतनी गहरी गोताखोरी भी न करें कि परिवार की नैया डांवांडोल हो जाए. मेरे खयाल से तो घर में पतिपत्नी ही प्रेमीप्रेमिका बन कर रहें. पत्नी केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिकरूप से भी जुड़ना चाहती है, वह चाहती है कि कोई उस से प्यार का इजहार करे. ऐसे में पति को चाहिए कि वह रिश्तों को प्रेममय बना कर मजबूत करे.’’

प्रेममय वातावरण बनाएं

कहने का अर्थ यह है कि घर का वातावरण ऐसा हो कि पत्नी खुद को उपेक्षित महसूस न करे. एक  औरत जो तमाम घर को चलाती है उसे जरा सा प्यार मिल जाए, तो उस के लिए यह बड़ी बात होगी. यहां हम यह नहीं कह रहे कि उसे बिलकुल प्यार ही नहीं मिलता पर शारीरिक प्रेम ही तो सबकुछ नहीं होता. मानसिकरूप से चाहत की तलाश रहती है.

सोचिए भला, जो स्त्री घर की धुरी है, पूरा घर चलाती है तो क्या वह पति से प्यार के दो मीठे बोल की अपेक्षा नहीं कर सकती.

यहां यह कहना भी तर्कसंगत होगा कि उन स्त्रियों को भी परपुरुष से प्रेम करने से पहले जरूर सोचना चाहिए कि घर में आप का पति है, बहूबेटा है, घर की कुछ मर्यादाएं हैं. ऐसे में आप के पति और बच्चों पर क्या गुजरेगी, साथ ही, आप के तथाकथित प्रेमी की भी पत्नी व बच्चे होंगे, उन पर क्या बीतेगी.

ये सारे रिश्ते क्यों खराब कर रहा है आप का यह प्रेम. आप को कोई अच्छा लगता है तो उसे आप पारिवारिक मित्र बनाएं.

आप अगर पसंद करती हैं तो पति को बताइए कि आप को उन का प्रशंसा करना अच्छा लगता है और आप भी उन्हें कौंपलीमैंट यदाकदा दें ताकि रिश्ते जीवंत रहें.

याद रखने की बात यह है कि जो भी इस आयु में प्रेम में पड़ रहे हैं, वे उस का एक ही पहलू देख रहे हैं. जाहिर है वह थोड़े समय आप के साथ है, आप की प्रशंसा ही तो करेगा और आप खुश. कुछ दिन साथ रह कर देखिए, पता चलेगा कि वे महाशय भी किस प्रकार के हैं और जरा उन की पत्नी से पूछ कर तो देखिए, पता चलेगा कि वे भी वैसे ही एक पुरुष हैं जैसे आप के पति. हो सकता है उस की पत्नी आप के पति पर रीझ जाए. तो फिर यह चक्र यों ही चलता रहेगा. बस, अपने विवेक को कायम रखिए और पति की प्रेमिका बन कर देखिए फिर महसूस कीजिए जिंदगी का मजा.

भोजपुरी फिल्मों में चमकी सादा हीरोइनें

भोजपुरी फिल्मों का मुकाबला सीधे हिंदी फिल्मों से है. ऐसे में इन की लोकप्रियता दूसरी क्षेत्रीय बोली की फिल्मों से ज्यादा है.

पहले हिंदी फिल्मों में काम करने के लिए ज्यादातर कलाकार लड़केलड़कियां हिंदी बोली वाले उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश से आते थे. हीरोहीरोइन बनने के सपने देखने वाले सभी कलाकार हिंदी फिल्मों में काम नहीं पाते. लड़के हीरो की जगह पर दूसरे काम करने लगते थे. लड़कियां भी वापस घर आ जाती थीं. पर जब से भोजपुरी फिल्में बनने लगी हैं, छोटे शहरों की वे लड़कियां जो हीरोइन बनने के सपने देखती थीं, अब फिल्मी परदे पर चमकने लगी हैं. इन में से कई आज भोजपुरी फिल्मों की स्टार बन गई हैं.

पटना से अक्षरा सिंह, इलाहाबाद से पूनम दुबे, चंडीगढ़ से कल्पना शाह, हरदोई से अंजना सिंह, भोपाल से गुंजन पंत, आजमगढ़ से सनी सिंह जैसे कई नाम इस लिस्ट में शामिल हैं.

छोटे शहरों से आने वाली लड़कियों में से ज्यादातर ने ऐक्टिंग की कोई क्लास नहीं की होती है. हां, बहुतों ने स्कूल में होने वाले नाटकों में हिस्सा लिया होता है. वहीं से वे ऐक्टिंग की दुनिया में कदम रखने आ जाती हैं.

आजमगढ़ की सनी सिंह ने बताया, ‘‘मुझे कई दोस्त कहते थे कि मेरी शक्ल अच्छी है, मैं हीरोइन बन सकती हूं. ऐसे में मैं ने घर वालों से बात कर के  फिल्मों में कदम रखा. धीरेधीरे मुझे काम मिलना शुरू हुआ और मेरी एक पहचान बन गई.

‘‘आज भोजपुरी फिल्मों के दर्शक मुझे बहुत पसंद करते हैं. अगर भोजपुरी फिल्में नहीं होतीं तो शायद मुझे इतना जल्दीकाम मिलना शुरू नहीं होता.’’

हरदोई उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा पिछड़ा जिला है. यहां की रहने वाली अंजना सिंह ने पहले लखनऊ में एक सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. वहां से वे ऐक्टिंग की दुनिया में आईं. आज वे भोजपुरी फिल्मों की बड़ी कलाकार हैं. उन को भोजपुरी फिल्मों का ‘हौट केक’ कहा जाता है.

बदल रहे हैं परिवार

भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन प्रियंका महाराज पटना जिले की रहने वाली हैं. हीरोइन बनने के लिए उन्होंने बड़ा संघर्ष किया है. पहले वे पटना से कुछ दिन दिल्ली में रहीं, फिर वहां से मुंबई गईं.

प्रियंका महाराज कहती हैं, ‘‘मेरे पिताजी शुरुआत में राजी नहीं थे. मेरी मां तैयार थीं. ऐसे में वे मेरे साथ मुंबई आईं और यहां मेरे साथ रहीं. कुछ दिनों के बाद मेरे पिताजी भी तैयार हो गए. अब भी मैं मां के साथ मुंबई में रहती हूं.’’

पहले के समय में छोटे शहरों में रहने वाले परिवार अपने घर के बच्चों खासकर लड़कियों को फिल्मों में भेजने से बचते थे. यही वजह होती थी कि कई बार लड़केलड़कियां घर वालों को बिना बताए मुंबई चले आते थे. पर अब समय बदल गया है. बच्चे पहले अपने मांबाप को विश्वास में लेते हैं और मांबाप भी बच्चों पर भरोसा करते हैं.

पहले लड़कियों को ले कर एक आम सोच होती थी कि फिल्मों में उन का शोषण होता है. अब शोषण की बात कोई मुद्दा नहीं रह गई है. लोगों में यह समझ आ गई है कि ऐसे हालात केवल फिल्मों में नहीं हैं, शोषण का शिकार तो हर जगह हुआ जा सकता है. ऐसे में छोटे शहरों की लड़कियों को पहले से ज्यादा मौके मिल रहे हैं.

मेहनत से मिली कामयाबी

भोजपुरी फिल्मों में छोटे शहरों की लड़कियां ज्यादा कामयाब हैं. इन में भी आमतौर पर वे गरीब और साधारण परिवारों से होती हैं.

इस की वजह पर बात करते हुए सुधाकर मिश्र कहते हैं, ‘‘छोटे शहरों की लड़कियां आमतौर पर मेहनती होती हैं. उन की बौडी फिट होती है. वे लुक  के हिसाब से भी भोजपुरी फिल्मों के लायक होती हैं. वे कम पैसों में ज्यादा और अच्छा काम कर लेती हैं.

‘‘शूटिंग पर रहने की बात हो या वहां तक आनेजाने की, वे किसी तरह की कोई परेशानी खड़ी नहीं करती हैं. ऐसे में वे भोजपुरी फिल्मों के डायरैक्टर और प्रोड्यूसर के बजट को सूट करती हैं.

‘‘हिंदी भाषी होने के चलते वे दर्शकों को पसंद आती हैं. कई भोजपुरी फिल्मों में गुजरात और महाराष्ट्र की लड़कियों ने काम किया, पर वे दर्शकों को पसंद नहीं आईं. ऐसे में हिंदी भाषा वाले इलाकों में रहने वाली लड़कियां भोजपुरी फिल्मों में ज्यादा कामयाब होती हैं.’’

भोजपुरी फिल्मों के एक डायरैक्टर कहते हैं, ‘‘भोजपुरी फिल्मों की कहानी गांव और छोटे शहरों के आधार पर बनती हैं. ऐसे में छोटे शहरों की लड़कियां भोजपुरी फिल्मों में ज्यादा कामयाब हो जाती हैं.

‘‘भोजपुरी फिल्मों में हर साल तकरीबन 100 फिल्में बनती हैं. ऐसे में हर साल नई लड़कियों के लिए मौके भी सामने आते हैं. एकदूसरे को देख कर छोटे शहरों की लड़कियां खुद आगे बढ़ रही हैं. इन के मातापिता भी मदद कर रहे है.’’

भोजपुरी फिल्मों की नायिका अंजना कहती हैं, ‘‘अब गांव की लड़कियां पहले जैसी नहीं रही हैं. वे भी मौका मिलने पर अपने हुनर का कमाल दिखा सकती हैं. भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाली ज्यादातर लड़कियां छोटे शहरों से ही आती हैं. यहां वे अपनी चमक बिखेरती हैं.’’

भोजपुरी फिल्मों की डांसर सीमा सिंह कहती हैं, ‘‘पहले हमारे घर वाले यह सोचते थे कि गांवघर और परिवार के लोग क्या कहेंगे? पर अब वे यह नहीं सोचते हैं और अपनी लड़की का साथ देते हैं.’’

सीमा सिंह को खुद फिल्मों में आने के लिए सघर्ष करना पड़ा था. आज उन के घर के लोग ही नहीं गांव और शहर के लोग भी हम पर नाज करते हैं.

पति ने कहा सैक्सी लग रही हो : अनीता हसनंदानी

खूबसूरत कलाकार अनीता हसनंदानी ने टैलीविजन, फिल्म और इश्तिहार की दुनिया में खूब काम किया है. उन्होंने अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत एकता कपूर के बालाजी टैलीफिल्म्स के शो ‘कभी सौतन कभी सहेली’ से की थी. इस के बाद उन्होंने एकता कपूर के ही एक और शो ‘काव्यांजलि’ में अंजलि का किरदार निभाया था जो खूब पसंद किया गया और लोगों के बीच वे अंजलि नाम से मशहूर हो गईं. ‘कयामत’, ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’, ‘क्या दिल में है’, ‘कसम से’, ‘प्यार तू ने क्या किया’, ‘ये हैं मोहब्बतें’, ‘त्रिदेवियां’ जैसे कई हिट शो का भी वे हिस्सा रही हैं.

अनीता हसनंदानी की पहली हिंदी फिल्म ‘ताल’ थी. इस के बाद वे कई तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और पंजाबी फिल्मों में भी नजर आईं. हिंदी फिल्मों की बात करें तो ‘कृष्णा कौटेज’ और ‘रागिनी एमएमएस’ में उन के काम की खूब तारीफ हुई. टैलीविजन के कई इश्तिहारों में भी वे नजर आती रही हैं.

अनीता हसनंदानी एकता कपूर के टैलीविजन शो ‘नागिन 3’ में काम कर रही हैं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

कैसे बनी आप ‘नागिन’?

जब शो ‘नागिन 3’ का औफर मुझे मिला तो मैं बहुत खुश हुई. जब मुझे अपने किरदार के बारे में बताया गया तो पता चला कि यह पौजीटिव किरदार नहीं है, लेकिन नैगेटिव भी नहीं है. यह बहुत ही राज भरा किरदार है.

क्या टैलीविजन शो में स्क्रिप्ट हीरो होती?है?

मुझे लगता है कि टैलीविजन एक ऐसा मीडियम है जिस में स्क्रिप्ट ही हीरो होती है. अगर स्क्रिप्ट में दम नहीं है तो उस शो में कितने ही बड़े कलाकारों को शामिल कर लें, शो नहीं चलेगा.

तो क्या यह मान लिया जाए कि बालाजी फिल्म्स आप का दूसरा घर है?

मेरी जिंदगी और कैरियर में बालाजी फिल्म्स और एकता कपूर का बहुत बड़ा रोल रहा है. एकता मेरी बहुत अच्छी दोस्त भी हैं. वे जानती हैं कि उन्हें किस कलाकार से क्या काम लेना है और क्या काम कौन बेहतर कर सकता है, इसलिए एकता के तकरीबन सभी शो सुपरहिट रहते हैं.

bollywood a talk with anita hansnandani

मतलब, टैलीविजन ने आप के काम और नाम दोनों को पहचान दी है?

टैलीविजन हो या फिल्म, लोगों को वही याद रहता है जो मशहूर होता है. लोग उसे ही याद रखते हैं. पहले जब मैं ने ‘काव्यांजलि’ शो किया तो लोग मुझे ‘अंजलि’ कह कर पुकारने लगे. उस के बाद कुछ लोग अब ‘शगुन’ बोलते हैं. मुझे अपने ऊपर इतना यकीन है कि मैं मेहनत कर के जो भी किरदार निभाती हूं लोग मुझे उस नाम से ही जानने लगते हैं. कोई भरोसा नहीं कि अब मेरा नाम ‘विष’ पड़ जाए.

क्या आप को सुपर नैचुरल जौनर के शो करना पसंद हैं?

मुझे सुपरनैचुरल जौनर के शो देखने में मजा आता है, क्योंकि ये आप को कुछ समय के लिए ही सही कल्पना की दुनिया में ले जाते हैं और जब हम शो देखते हैं तो उस दुनिया को असल दुनिया मान कर उस के मजे ले रहे होते हैं.

आप के लिए ऐक्टिंग के क्या माने हैं?

मुझे ऐक्टिंग करने में बहुत मजा आता है. मीडियम चाहे कोई भी हो, इस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. रिएलिटी शो में आप जो हो उसी रूप में भाग लेते हैं. वहां आप बस अपना काम कर रहे होते हैं जबकि टैलीविजन और फिल्म में आप किरदार निभा रहे होते हैं.

मैं ऐक्टर हूं इसलिए मुझे ऐक्टिंग करना ज्यादा पसंद है. यही वजह भी है कि मैं ने हर मीडियम में काम किया है. अब मैं वैब सीरीज भी कर रही हूं.

क्या ‘नागिन 3’ के अपने किरदार के लिए वजन कंट्रोल करना पड़ा?

इस शो में मेरा लुक सैक्सी है. बदन दिखाते कपड़े पहनने थे, तो बहुत जरूरी था कि मैं अपना वजन कम करूं. इन दिनों मैं बिलकुल भी तला हुआ खाना नहीं खा रही हूं. चावल और रोटी भी नहीं खाती, न ही ब्रैड खा रही हूं. सब्जी, दाल, सलाद, फल, सूप, ओट्स वगैरह खाने पर मैं ज्यादा ध्यान देती हूं.

इस नए लुक पर आप के पति ने क्या कहा?

जब ‘नागिन 3’ का लुक सामने आया तो मेरे पति ने कहा कि तुम सैक्सी लग रही हो. मुझे इस तरह के लुक में किसी ने अब तक नहीं देखा था. यह मेरे लिए बहुत बड़ी और खुश करने वाली बात.

लव सोनिया : नई बोतल में पुरानी शराब

सेक्स रैकेट, बाल यौन शोषण और वूमन ट्रैफीकिंग पर कई फिल्में बन चुकी हैं. 2014 में मशहूर फिल्मकार नागेश कुकनूर भी इसी विषय पर फिल्म ‘‘लक्ष्मी’’ लेकर आए थे. अब इसी विषय पर ‘‘लाइफ आफ पाई’’ जैसी आस्कर अवार्ड विजेता फिल्म के निर्माता तबरेज नूरानी बतौर निर्माता व निर्देशक फिल्म ‘‘लव सोनिया’’ लेकर आए हैं. जिसमें उन्होंने दो बहनों के अगाध प्यार की कहानी के बहाने वूमन ट्रैफीकिंग व देह व्यापार की बदसूरत दुनिया की उस क्रूर व निर्मम सच का चित्रण किया है, जिसे देख इंसान विचलित हो जाता है. यह एक अति डार्क फिल्म है. मगर फिल्मकार तबरेज नूरानी को सारी गंदगी व गरीबी महज भारत में ही क्यों नजर आयी?

Love Sonia Movie Review

फिल्म की कहानी महाराष्ट् के एक गांव से शुरू होती है, जहां कर्ज तले दबा किसान शिवा (आदिल हुसेन) की दो बेटियां हैं, बेटा नहीं है. वह अपनी बड़ी बेटी सोनिया (मृणाल ठाकुर) से सांड़ की तरह खेत में मेहनत करवाता है. छोटी बेटी प्रीति (रिया सिसोदिया) उतनी मेहनत नहीं कर पाती है. इसलिए शिवा अक्सर उसे पीटता रहता है और कोसता रहता है कि ईश्वर ने बेटे के जगह बेटियां क्यों दे दी. पर सोनिया और प्रीति के बीच अगाध प्यार है. सोनिया के बनिस्बत प्रीति काफी खूबसूरत भी है.

एक दिन शिवा अपना कर्ज चुकाने के लिए काका ठाकुर (अनुपम खेर) के हाथों चंद रूपयों में प्रीति का सौदा कर लेता है. जब वह पैसे लेकर प्रीति को दादा ठाकुर के पास सौंपने जाता है, तो वहां सोनिया भी पहुंच जाती है और वह उसका विरोध करती है. पर सोनिया की एक नहीं चलती. दादा ठाकुर, प्रीति को अंजली (साई ताम्हणकर) के हवाले करते हैं. अंजली, प्रीति को लेकर मुंबई में फैजल उर्फ बाबू (मनोज बाजपेयी) के वेश्यागृह में पहुंचा देती है.

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कई दिन बीत जाने पर भी जब प्रीति की कोई खबर नहीं मिलती है, तो सोनिया, दादा ठाकुर के पास पहुंचकर कहती है कि वह उसे भी प्रीति के पास मुंबई पहुंचा दें. वह भी मुंबई में काम करेगी. अंजली, सोनिया को लेकर बाबू के पास पहुंचती है. यानी प्रीति की तलाश में सोनिया भी देह व्यापार के घिनौने धंधे में पहुंच जाती है. सोनिया वहां भी प्रीति से मिलने की बात करती है. बाबू और उसकी सहयोगी माधुरी (रिचा चड्ढा) कई तरह से सोनिया को टार्चर करते हैं. यहीं पर सोनिया की मुलाकात रश्मि(फ्रीडी पिंटो) से होती है. इन्हे भी किसी न किसी मजबूरी के तहत देह व्यापार में जबरन ढकेला गया था. पर एक दिन सोनिया को उसकी बहन प्रीति से मिलवाया जाता है.

ड्रग्स के नशे की आदी हो चुकी प्रीति, सोनिया को बहन मानने से इंकार कर देती है. उधर सोनिया को इस दलदल से निकालने के लिए समाज सेवक मनीष (राज कुमार राव) अपनी जान की बाजी लगा देता है. पर अपनी बहन प्रीति को बचाने के लिए वह जिस्मफरोशी के उस दलदल से निकलने के लिए राजी नहीं होती. कहानी में कई मोड़ आते हैं. एक दिन बाबू, सोनिया का सौदा किसी विदेशी ग्राहक से करता है और फिर कंटेनर के अंदर बंद कर समुद्री रास्ते से माधुरी व सोनिया को दुबई और वहां से लास एंजेल्स भेज दिया जाता है.

जहां एक दिन सोनिया भागने में सफल होती है और उसे एक एनजीओ की मदद मिलती है. जिसकी मदद से उसका संपर्क भारत में मनीष से होता है. पता चलता है कि मनीष के ही एनजीओ में दूसरी लड़कियों के साथ प्रीति भी रह रही है. अंततः सोनिया भारत आकर मनीष के एनजीओ में रहना शुरू करती है. पर उसकी बहन प्रीति तब तक पुनः देह व्यापार के दलदल में जा चुकी होती है.

तबरेज नूरानी की फिल्म काफी विचलित करती है और कई जगह पर वह बहुत सतही स्तर पर कहानी को बयां कर गए हैं. पर उन्होंने डार्क पक्ष को ही ज्यादा महत्व दिया है. उन्होंने इंसानियत के काले पक्ष को भी उजागर किया है. फिल्म में इस बात का बड़ी बेबाकी से चित्रण है कि यहां इंसान महज अपने स्वार्थ लिप्तता के चलते संवेदनहीन हो गया है. फिल्म में देह व्यापार के साथ पुलिस प्रशासन की मिली भगत की ओर भी इंगित किया गया है. अफसोस फिल्मकार ने फिल्म को अधूरा ही छोड़ा है.

फिल्मकार का दावा है कि यह फिल्म कई सत्य घटनाओं पर आधारित है, पर फिल्म देखकर यह अहसास भी होता है कि यह फिल्म उन दर्शकों के लिए है, जो प्रेम कहानी के नाम पर उत्तेजित होना चाहते हैं. इतना ही नहीं फिल्मकार ने भारत में ही ज्यादा गंदगी व प्रताड़ना आदि का चित्रण किया है. जबकि दुबई व लास एजेंल्स को काफी अच्छा दिखा दिया है.

मगर हम सभी इस हकीकत से वाकिफ हैं कि पूरे विश्व में देह व्यापार और वूमन ट्रैफीकिंग के अनैतिक धंधे में अमरीका का लास एंजेल्स शहर नंबर वन है. फिल्म में ‘मुंह से सेक्स’ ‘बैक डोर एंट्री, ‘सील’ जैसे संवाद फिल्म का स्तर घटाते है. बहरहाल, आम दर्शक इस फिल्म को पसंद करेगा, ऐसी उम्मीद कम नजर आती है.

अफसोस की बात यह है कि देह व्यापार के धंधे में सोनिया के पहुंचते ही  शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व मौखिक दुव्र्यवहार आदि हवा में उड़ जाता है. सिर्फ देह व्यापार की स्याह दुनिया ही रह जाती है. पर फिल्म के निर्देशक तबरेज नूरानी को प्रतिभाशाली कलाकारों का अच्छा साथ मिला है. फिल्म का पार्श्व संगीत उम्दा है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो प्रीति के किरदार में रिया सिसोदिया ने ठीक ठाक अभिनय किया है. मगर सोनिया के किरदार में मृणाल ठाकुर ने जबरदस्त परफार्मेंस दी है. उनके अभिनय के ही चलते उनकी पीड़ा दर्शकों को भी कचोटती है. रिचा चड्डा तो बेहतरीन अदाकारा हैं, इसमें कोई दो राय नहीं. वेश्याग्रह के मालिक के किरदार में मनोज बाजपेयी भी जमे हैं. अपने छोटे किरदार में राज कुमार राव भी अपनी छाप छोड़ ही जाते हैं. फ्रीडा पिंटो की प्रतिभा को जाया किया गया है. डेमी मूर, अनुपम खेर, आदिल हुसेन आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है.

दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘लव सोनिया” का निर्माण डेविड वोमार्क और तबरेज नूरानी ने किया है. निर्देशक तबरेज नूरानी, लेखक अल्केश वजा व तेड कप्लान,संगीतकार नील्स बाय नेल्सन और कलाकार हैं – मनोज बाजपेयी, राज कुमार राव, रिचा चड्ढा, डेमी मूर, फ्रीडा पिंटो, मृणाल ठाकुर, रिया सिसोदिया, आदिल हुसेन,अनुपम खेर, साई ताम्हणकर, सनी पवार, मार्क डुप्ल व अन्य.

अमित शाह के दौरे से पहले राजस्थान भाजपा में विवाद

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जयपुर यात्रा से ठीक एक दिन पहले राजस्थान चुनाव प्रबंधन समिति को लेकर पार्टी में असंतोष सामने आ गया है. भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री देवीसिंह भाटी ने कहा कि जनाधार विहीन नेताओं को प्राथमिकता दी गई है. उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व से चुनाव प्रबंधन समिति के संयोजक और सह संयोजक को लेकर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है.

केंद्रीय नेतृत्व ने पिछले दिनों विधानसभा चुनाव को लेकर चुनाव प्रबंधन समिति गठित कर केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को संयोजक और केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल को सह संयोजक बनाया है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदनलाल सैनी को समिति का अध्यक्ष बनाया गया है.

भाटी ने चुनाव प्रबंधन समिति को लेकर केंद्रीय नेतृत्व के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराने की बात स्वीकारते हुए कहा कि समिति में ऐसे नेताओं को शामिल कर लिया गया, जिनका कोई जनाधार नहीं है. भाटी ने कहा कि समिति में ऐसे लोगों को शामिल करना चाहिए, जो पूरे प्रदेश की जानकारी रखते हों.

मेघवाल और भाटी में चल रही है वर्चस्व की लड़ाई

बीकानेर संभाग की राजनीति में भाटी और मेघवाल के बीच काफी लंबे समय से वर्चस्व की लड़ाई चल रही है. इनके बीच चल रही खींचतान की झलक सीएम वसुंधरा राजे की ‘राजस्थान गौरव यात्रा’ के दौरान भी साफ देखने को मिली थी. अपनी दबंग छवि के चलते भाटी का बीकानेर के राजपूत मतदाताओं में खासा प्रभाव है. भाटी इससे पहले प्रदेशाध्यक्ष की दौड़ में शामिल रहे केंद्रीय राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत का भी विरोध कर चुके हैं. अब शेखावत चुनाव प्रबंधन समिति का संयोजक बनाए जाने के बाद भाटी के तेवरों में तल्खी लाजिमी है .

वसुंधरा ने भाटी को बयानबाजी से बचने को कहा

चुनाव प्रबंधन समिति को लेकर भाटी की नाराजगी सार्वजनिक होने के बाद मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उनसे बयानबाजी से बचने के लिए कहा है. मुख्यमंत्री ने चुनाव निकट आते देख किसी भी तरह के विवाद से बचने और चुनाव की तैयारी में जुटने को कहा है.

आज से शुरू होंगे शाह के चुनावी दौरे

अमित शाह राजस्थान में मंगलवार से अपने चुनावी दौरों की शुरुआत करेंगे. पहला दौरा जयपुर में होगा. इसके बाद चार अक्टूबर तक वह विभिन्न तिथियों और स्थानों पर अलग-अलग दौरे करेंगे. जयपुर में वे एक ही दिन में पार्टी के शक्ति केंद्रों के प्रतिनिधियों, प्रबुद्धजन, नगरीय निकायों के प्रमुखों और सहकारिता के कार्यो से जुड़े जनप्रतिनिधियों के सम्मेलनों को संबोधित करेंगे. वे पार्टी कार्यालय में भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों से चर्चा करेंगे.

वीडियो : भोजपुरी स्टार पवन सिंह संग राखी सावंत ने किया बोल्ड डांस

भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार पवन सिंह सोशल मीडिया पर अक्सर चर्चा का विषय बने ही रहते हैं. हाल ही में अक्षरा सिंह और भोजपुरी सिनेमा की ही अन्य कई हीरोइन के साथ उनके कई वीडियो यूट्यूब पर छाए रहे. लेकिन इस बार पवन सिंह किसी भोजपुरी अदाकारा नहीं बल्कि बौलीवुड की बोल्ड अदाकारा राखी सावंत के साथ एक वीडियो की वजह से सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं.

 

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ऐसा माना जा रहा है कि राखी सावंत जल्द ही भोजपुरी सिनेमा की तरफ रुख कर सकती हैं. हाल ही में राखी सावंत के इंस्टाग्राम अकाउंट से कुछ वीडियो शेयर किए गए जिसमें राखी, भोजपुरी गायक और एक्टर पवन सिंह के साथ एक गाने की शूटिंग करती नजर आ रही हैं. वीडियो में राखी हमेशा की तरह अपने बोल्ड अंदाज डांस करती नजर आ रही हैं.

 

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वहीं हाल ही में राखी सावंत हरियाणा की डांसिंग क्वीन सपना चौधरी के साथ WWE की रिंग में परफौर्म करने पहुंची थीं. हिमाचल प्रदेश के मंडी में हुए इस मैच में जब ये दोनों स्टार रिंग में उतरीं तो फैन्स बेकाबू हो गए. दोनों ने स्टेज पर मिलकर ऐसी परफौर्मेंस दी कि देखने वाले देखते रह गए. सपना और राखी की ये वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ.

दुलहन का खतरनाक दांव

विवाह के बाद हनीमून हर पत्नी और पति की एक सुखद अनुभूति होती है, जिस के लिए वे हैसियत के अनुसार एक मनोहारी वातावरण वाले स्थान का चयन करते हैं. पुणे निवासी आनंद कांबले ने भी दीक्षा से शादी हो जाने के बाद हनीमून के लिए महाराष्ट्र के महाबलेश्वर जाने का प्लान बनाया था. उन्होंने इस के लिए तारीख तय की 2 जून, 2018.

आनंद कांबले और दीक्षा खुश थे. उन की यह खुशी तब दोगुनी हो गई जब आनंद का जिगरी दोस्त राजेश बोवड़े और उस की पत्नी कल्याणी बोवड़े भी इस खुशी में शामिल हो गए.

2 जून को अपराह्न 3 बजे ये चारों लोग मारुति सुजुकी कार नंबर एमएच14जी एक्स7171 से सतारा के लिए निकले. अभी ये लोग पंचगनी के पसरणी घाट ही पहुंचे थे कि उन के सारे सपने बिखर कर चूरचूर हो गए. कुछ देर पहले तक हंसतेहंसाते इन जोड़ों के बीच एकाएक मातम पसर गया.

हुआ यह कि पसरणी घाट पर पहुंचते ही आनंद कांबले की पत्नी दीक्षा ने उल्टियां आने की बात कही. पत्नी के कहने पर आनंद कांबले ने कार साइड में रुकवा दी. कार के रुकते ही दीक्षा मुंह पर हाथ रख कर नीचे उतर आई.

उस के साथसाथ आनंद कांबले भी कार से बाहर आ गया था. जिस जगह पर कार खड़ी थी, वह काफी संकरी थी, इसलिए राजेश बोवड़े ने कार थोड़ा आगे ले जा कर खड़ी कर दी और स्वयं भी कार से उतर कर अपनी पत्नी के साथ वहां के मनोहारी दृश्यों को देखने लगा. उस ने पत्नी के साथ कुछ फोटो खींचे.

हालांकि दीक्षा को उल्टियां नहीं हुई थीं, फिर भी आनंद कांबले उस की हालत देख कर घबरा गया था. वह दौड़ कर गया और कार से दीक्षा के लिए पानी की बोतल ले आया.

दीक्षा रोड के साइड में पड़े एक बड़े से पत्थर पर बैठ कर अभी अपने मुंह पर छींटे मार ही रही थी कि तभी वहां एक मोटरसाइकिल आ कर रुकी. उस पर 2 युवक बैठे थे, जो बिना किसी बात के ही वहां खड़े आनंद कांबले से उलझ गए. जब दीक्षा ने पति का पक्ष लेते हुए ऐतराज जताया तो वे लोग दीक्षा के गहने छीनने लगे.

उन्होंने उस का मंगलसूत्र खींच लिया, जिस से दीक्षा के गले पर जख्म भी हो गया. यह आनंद कांबले को बरदाश्त नहीं हुआ. वह उन दोनों से भिड़ गया. तब उन युवकों में से एक ने अपने साथ लाए कांते से आनंद के सिर पर वार कर दिया. अपनी जान बचाने के लिए आनंद वहां से भाग खड़ा हुआ, लेकिन वह कुछ ही दूर जा कर जमीन पर गिर पड़ा.

इधर अपनी सेल्फी और गपशप में मस्त राजेश और उस की पत्नी कल्याणी ने दीक्षा और आनंद कांबले की चीख सुनी तो वे उन की तरफ दौड़े. वे रोड पर आए तो उन्होंने देखा कि 2 युवक आनंद से मारपीट कर रहे हैं, जिन में से एक के हाथ में खतरनाक हथियार था. राजेश दोस्त की जान बचाने के बजाए डर की वजह से पत्नी के साथ कार में जा कर बैठ गया.

हमलावर युवकों ने जब राजेश को देखा तो वे आनंद को छोड़ कर कार के करीब पहुंच गए. कार के दरवाजे बंद थे. एक युवक ने कांते से कार के आगे वाले शीशे पर वार किया. फलस्वरूप शीशा टूट गया, शीशे के टुकड़े राजेश बोवड़े व उस की पत्नी के सिर में लगे, जिस से खून बहने लगा. लेकिन इस की परवाह न करते हुए राजेश ने कार तेजी से भगा दी.

कुछ ही दूर आगे पंचगनी का पुलिस थाना था. थाने पहुंच कर राजेश ने इस घटना की जानकारी दी. लेकिन वहां से उन्हें कोई सहायता नहीं मिल सकी. वहां की पुलिस ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि घटना वाली जगह वाई पुलिस थाना क्षेत्र में आती है.

जब तक राजेश बोवड़े और उस की पत्नी कल्याणी वाई पुलिस थाने पहुंचे, तब तक वहां की पुलिस को सतारा जिला अस्पताल से इस मामले की जानकारी मिल चुकी थी. फिर भी वाई पुलिस थानाप्रभारी इंसपेक्टर विनायक वेताल ने उन दोनों का बयान नोट किए और घटना की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथसाथ पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी.

उन्होंने अपनी एक पुलिस टीम को घटनास्थल पर भेजा और स्वयं अपने सहायकों के साथ सातारा अस्पताल की ओर रवाना हो गए. वहां जाने पर पता चला कि राजेश बोवड़े और उस की पत्नी कल्याणी बोवड़े के जाने के बाद दोनों हमलावर मोटरसाइकिल से भाग गए थे.

उन के जाने के बाद दीक्षा किसी से लिफ्ट मांग कर आनंद कांबले को सतारा के क्रांति नानासाहेब पाटिल अस्पताल लाई और सारी बात डाक्टरों को बता दी. डाक्टरों ने गंभीर रूप से घायल आनंद कांबले का चैकअप किया तो पता चला कि उस की मौत हो चुकी है. अस्पताल प्रशासन ने इस की जानकारी पुलिस को दे दी. दीक्षा भी मामूली रूप से जख्मी थी. उस का भी प्राथमिक उपचार किया गया.

थानाप्रभारी विनायक वेताल अस्पताल पहुंच कर डाक्टरों से मिले और आनंद कांबले के शव का बारीकी से निरीक्षण किया. आनंद कांबले के शरीर पर गहरे जख्म थे. दीक्षा बयान देने की हालत में नहीं थी, इसलिए थानाप्रभारी डाक्टरों से बात कर के थाने लौट आए.

इस मामले की खबर जब आनंद कांबले के परिवार वालों को मिली तो कोहराम मच गया. परिवार के सारे लोग रोतेबिलखते अस्पताल पहुंच गए. आनंद कांबले के शव का पोस्टमार्टम होने के बाद शव उस के परिवार वालों को सौंप दिया गया.

मामला लूटपाट और हत्या से संबंधित था, जिस की जांच के लिए मौकाएवारदात की गवाह दीक्षा कांबले का बयान जरूरी था. घटनास्थल पर गई पुलिस टीम खाली हाथ लौट आई थी. उसे वहां लूटपाट जैसा कोई सूत्र नहीं मिला था. इस बारे में अब दीक्षा ही कुछ बता सकती थी.

मामूली रूप से जख्मी दीक्षा जब कुछ सामान्य हुई तो थानाप्रभारी विनायक वेताल ने उस का बयान दर्ज करने के लिए उसे थाने बुलाया. चूंकि मृतक आनंद कांबले आरपीआई पार्टी का पुणे शहर का उपाध्यक्ष था, इसलिए पुलिस के लिए यह मामला महत्त्वपूर्ण बन गया था.

आनंद की हत्या की जानकारी पूरे शहर में फैल गई थी. देखते ही देखते पार्टी के हजारों कार्यकर्ता पुणे शहर की सड़कों पर उतर आए थे. मामला तूल पकड़ता, इस के पहले ही सतारा के एसीपी संदीप पाटिल और अजित टिके हरकत में आ गए.

थानाप्रभारी विनायक और क्राइम ब्रांच के पीआई पद्माकर घनवट केस की जांच में जुट गए. दिनरात एक कर के पुलिस ने 24 घंटे के अंदर केस को खोलने में सफलता हासिल कर ली. पुलिस ने अभियुक्तों को भी गिरफ्तार कर लिया.

थानाप्रभारी विनायक वेताल और पीआई पद्माकर घनवट पहले आनंद कांबले को अपनी जांच के दायरे में लिया. क्योंकि उन का मानना था कि आनंद कांबले चूंकि आरपीआई पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता था, इसलिए उस की किसी से अनबन या दुश्मनी हो सकती है. लेकिन जांच में ऐसा कुछ नहीं निकला. आनंद कांबले का चरित्र साफसुथरा था.

इस के बाद जब उन का ध्यान कांबले परिवार की नईनवेली दुलहन दीक्षा पर गया तो उन्हें दाल में कुछ काला नजर आया. उन्होंने देखा कि सिर्फ 7 दिन की दुलहन के चेहरे पर दुख के वैसे भाव नहीं थे, जैसे होने चाहिए थे. जहां सारा परिवार आनंद कांबले के गम में डूबा था, वहीं दीक्षा की आंखों और चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी.

दूसरी बात जो पुलिस को खटक रही थी, वह यह थी कि अगर हत्यारे लूटपाट के इरादे से आए थे तो उन्होंने आनंद कांबले की हत्या क्यों की? उन्हें दीक्षा की हत्या करनी चाहिए थी, क्योंकि सारे गहने दीक्षा के शरीर पर थे. जबकि वे सिर्फ उस का मंगलसूत्र ले कर गए थे.

इन सारी कडि़यों को जोड़ने और दीक्षा की कुंडली खंगालने के बाद दीक्षा पुलिस के निशाने पर आ गई. उन्होंने जब दूसरी बार दीक्षा को थाने बुला कर पूछताछ की तो वह संभल नहीं सकी और उस ने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया.

24 वर्षीय दीक्षा ओव्हाल देखने में जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही हसीन और चंचल थी. महत्त्वाकांक्षी सौंदर्यरूपी दीक्षा को जो एक बार देख लेता था, वह अपने आप उस की तरफ खिंचा चला आता था. लेकिन दीक्षा जिस की तरफ खिंची चली गई थी, वह खुशनसीब निखिल मलेकर था, जो उस के स्कूल का दोस्त था.

26 वर्षीय निखिल मलेकर पुणे के चिखली गांव का रहने वाला था. उस के पिता सुदाम मलेकर पुणे की एक प्राइवेट फर्म में काम करते थे. परिवार साधनसंपन्न था. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी.

निखिल मलेकर को पूरा परिवार प्यार करता था, उस की हर मांग पूरा करता था. यही वजह थी कि वह जिद्दी स्वभाव का बन गया था. वह जो चाहता था किसी न किसी तरह हासिल कर लेता था.

दीक्षा के पिता धार्मिक प्रवृत्ति और पुराने खयालों के आदमी थे. उन के लिए समाज और मानमर्यादा ही सब कुछ थी. उन की गिनती गांव के संपन्न काश्तकारों में होती थी. दीक्षा उन की लाडली बेटी थी, जिसे पूरा परिवार प्यार करता था. इसी वजह से परिवार के सामाजिक और रूढि़वादी होने के बावजूद दीक्षा को खुली छूट मिली हुई थी.

निखिल मलेकर और दीक्षा की लवस्टोरी तब से शुरू हुई थी, जब दोनों स्कूल आतेजाते थे. दीक्षा का गांव निखिल मलेकर के गांव के करीब था. दोनों का स्कूल आनेजाने का रास्ता एक ही था. दोनों स्कूल तो साथसाथ आतेजाते ही थे, स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों और पिकनिक पर भी साथसाथ रहते थे.

जब तक दोनों कम उम्र के थे, तब तक उन का व्यवहार दोस्ती जैसा था. लेकिन जैसेजैसे उम्र बढ़ी, वैसेवैसे उन का रंगरूप और खयाल बदले. वक्त के साथ बचपन की दोस्ती ने प्यार का रूप ले लिया. दोनों की पढ़ाई भले ही खत्म हो गई, लेकिन प्यार खत्म नहीं हुआ. उन का मिलनाजुलना पहले जैसा ही चलता रहा.

दोनों जब भी मिलते थे, एकदूसरे को अपने जीवनसाथी के रूप में देखा करते थे. उन्हें ऐसा लगता था, जैसे वे दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं. जहां दीक्षा और निखिल मलेकर अपने सुनहरे जीवन का सपना देख रहे थे, वहीं दूसरी ओर दीक्षा के मातापिता उस की शादी का तानाबाना बुन रहे थे.

दीक्षा के पिता उस के लिए वर की तलाश में थे. यह बात जब दीक्षा को पता चली तो वह बेचैन हो गई. वह अपने दिल में निखिल मलेकर की छवि समेटे बैठी थी और उसी से शादी करना चाहती थी.

आखिर एक दिन उस ने अपने रूढि़वादी पिता को सारी बातें बता दीं. उस ने कहा कि वह निखिल से प्यार करती है और उस से विवाह करेगी. निखिल का परिवार भी अच्छा है और घर के लोग भी. हम दोनों खुशीखुशी साथ रह सकते हैं.

दीक्षा की बात सुन कर उस के घर वालों के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि उन की बेटी अपनी आजादी का उन्हें इतना बड़ा तोहफा देगी.

पिता ने दीक्षा की बातों को अनसुना करते हुए कहा, ‘‘देखो बेटा, हम तुम्हारे अपने हैं, हमेशा तुम्हारा भला ही चाहेंगे. हमारी अपनी मर्यादा भी है और समाज में इज्जत भी. इसलिए हम चाहते हैं कि तुम प्यारव्यार का चक्कर छोड़ कर मानसम्मान से जिओ और परिवार को भी अपना सिर उठा कर चलने दो. इसी में सब की भलाई है.’’

अपने परिवार वालों के सख्त रवैए से दीक्षा यह बात अच्छे से समझ गई थी कि जो सपने सच नहीं हो सकते, उन्हें देखने से क्या फायदा. यही सोच कर वह धीरेधीरे निखिल मलेकर को भूल कर उस से दूर रहने की कोशिश करने लगी. लेकिन यह संभव नहीं हो पा रहा था.

एक तरफ जहां दीक्षा का यह हाल था, वहीं दूसरी तरफ निखिल मलेकर भी परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अकसर मिलने और चहकने वाली दीक्षा को अचानक क्या हो गया कि वह खामोश और उदास रहने लगी.

लेकिन कहावत है कि जहां चाह होती है वहां राह जरूर निकल आती है. ऐसा ही दीक्षा के साथ भी हुआ. एक दिन उस ने निखिल को बता दिया कि उस के घर वाले उन दोनों की शादी के खिलाफ हैं और उस की शादी कहीं दूसरी जगह करना चाहते हैं.

दीक्षा ने निखिल से कहा कि वह उसे भूल जाए. दीक्षा की बात सुन कर निखिल के होश उड़ गए. वह बोला, ‘‘दीक्षा, तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारे घर वालों से बात करूंगा. उन के पैर पकड़ूंगा, उन से विनती करूंगा.’’

‘‘इस से कुछ नहीं होगा निखिल, मैं अपने परिवार वालों को अच्छी तरह से जानती हूं. वहां तुम्हारा केवल अपमान ही होगा. इस से अच्छा है कि तुम मुझे भूल जाओ.’’ दीक्षा ने उदासी भरे स्वर में कहा.

‘‘तो क्या तुम मुझे भूल सकती हो?’’ निखिल मलेकर ने सपाट शब्दों में पूछा.

‘‘मैं तुम्हें भूल तो नहीं सकती लेकिन कुछ कर भी तो नहीं सकती.’’ वह बोली.

दीक्षा के काफी समझाने के बाद भी निखिल मलेकर नहीं माना और वह उस के परिवार वालों से जा कर मिला. आखिर वही हुआ जिस का दीक्षा को डर था. निखिल मलेकर को अपमानित कर घर से धक्के मार कर निकाल दिया गया. यह बात दीक्षा से सहन नहीं हुई.

निखिल मलेकर को घर से निकालने की बात ले कर बेटी बगावत न कर दे, यह सोच कर उस के पिता दीक्षा के लिए वर की तलाश में जुट गए. जल्दी ही उन्होंने पुणे के तालुका औंध गांव मंजठानगर के रहने वाले आनंद कांबले से दीक्षा का रिश्ता तय कर दिया.

32 वर्षीय आनंद ज्ञानेश्वर कांबले सुंदर स्वस्थ और मिलनसार युवक था. उस का मातापिता के साथ भाईभाभियों और बहनों का भरापूरा परिवार था. पिता ज्ञानेश्वर कांबले गांव के प्रतिष्ठित काश्तकार थे. संयुक्त परिवार होने के कारण कांबले परिवार में सभी मिलजुल कर रहते और काम करते थे.

आनंद कांबले वाहनों की नंबर प्लेट बनाने का काम करता था. उस की पुणे में आनंद आर्ट्स के नाम से दुकान थी. इस के अलावा वह राजनीति में भी सक्रिय था. वह आरपीआई पार्टी का पुणे शहर का उपाध्यक्ष था. शहर में उस की अच्छी इज्जत थी. उस के भाईबहनों की शादी हो चुकी थी, केवल आनंद कांबले ही अविवाहित था.

26 मई, 2018 को दीक्षा ओव्हाल और आनंद कांबले का विवाह बड़े उत्साह और धूमधाम से हो गया. विवाह में आरपीआई पार्टी के अध्यक्ष रामदास अठावले के अलावा पुणे शहर के सभी कार्यकर्ता और कई प्रतिष्ठित लोग शामिल हुए.

आनंद कांबले दीक्षा को पा कर बहुत खुश था. उस के परिवार वाले भी अपनी सुंदर बहू से बहुत खुश थे. लेकिन दीक्षा वहां पर अपने आप को कैदी की तरह महसूस कर रही थी. उस के दिलोदिमाग पर निखिल मलेकर की छवि हावी थी. वह सारे रस्मोरिवाज के बीच उदास रही. उस की इस उदासी को उस की ससुराल वाले उस के मायके का गम समझ रहे थे.

घर के सारे कार्यक्रमों के हो जाने के बाद भी जब दीक्षा के चेहरे की उदासी नहीं गई तो परिवार वालों ने आनंद कांबले से बहू को कहीं घुमाफिरा कर लाने के लिए कहा.

घर वालों के कहने पर आनंद कांबले ने हनीमून के लिए सतारा के पंचगनी और महाबलेश्वर जाने की योजना बनाई. इस प्रोग्राम में उस ने अपने जिगरी दोस्त राजेश बोवड़े और उस की पत्नी कल्याणी को भी साथ चलने के लिए राजी कर लिया था.

यह बात जब दीक्षा ने अपने प्रेमी निखिल मलेकर को बताई तो वह तिलमिला उठा. उस की प्रेमिका किसी और के साथ सुहागरात के लिए जाए, यह उस से बरदाश्त नहीं हुआ. यही हाल दीक्षा का भी था.

उस ने घर वालों के दबाव में आ कर आनंद कांबले से विवाह जरूर कर लिया था, लेकिन वह आनंद को स्वीकार नहीं कर पा रही थी. वह किसी भी तरह उस से छुटकारा पाना चाहती थी. इस के लिए वह निखिल मलेकर के साथ मिल कर एक खतरनाक योजना बना चुकी थी. योजना बना कर निखिल मलेकर घटना के एक दिन पहले ही पंचगनी चला गया.

घटना के दिन दीक्षा उसी समय से निखिल के संपर्क में रही, जिस समय वह पति के साथ पंचगनी महाबलेश्वर के लिए कार से निकली थी. वह निखिल मलेकर को फोन के जरिए पलपल की जानकारी और लोकेशन बता रही थी.

कार जब पंचगनी पसरणी घाट की तरफ गई तो दीक्षा ने योजना के अनुसार उल्टियां आने का बहाना बना कर कार रुकवा ली. कार को रुके अभी 2-3 मिनट भी नहीं हुए थे कि हत्यारे वहां पहुंच गए और केवल 10 मिनट के अंदर अपना काम कर के निकल गए.

दीक्षा कांबले से पूछताछ कर के पुलिस ने उस का मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले कर जांच की तो सारा राज खुल गया. पुलिस ने निखिल मलेकर की सरगर्मी से तलाश शुरू की और 24 घंटे के अंदर उसे पुणे के पिंपरी चिंचवाड़ से गिरफ्तार कर लिया.

विस्तार से पूछताछ में उस ने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया. दीक्षा कांबले और निखिल मलेकर से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया गया, जहां से दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक पुलिस उन 2 युवकों की तेजी से तलाश कर रही थी, जो आनंद कांबले की हत्या कर के फरार हो गए थे.

– कथा पुलिस की प्रैसवार्ता और समाचारपत्रों पर आधारित

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