इस बीमारी से जूझ रही हैं प्रियंका, वीडियो में किया खुलासा

बौलीवुड की देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा इन दिनों अपनी निजी जिंदगी को लेकर चर्चा में बनी हुई हैं. प्रियंका इन दिनों अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त निक जोनास के साथ बिता रही हैं. इसी बीच प्रियंका ने खुद दमा की बीमारी से जूझने की जानकारी अपने फैन्स को दी है. अभिनेत्री का कहना है कि उन्हें दमा रोग है और इसमें छिपाने जैसी कोई बात नहीं है. प्रियंका ने हाल ही में एक विज्ञापन की शूटिंग को ट्वीट किया जिसमें उन्हें इस पर बात करते हुए देखा जा सकता है कि कैसे दमा भी उन्हें करियर की ऊंचाइयों पर जाने से नहीं रोक सका. प्रियंका ने बताया कि जब वह 5 साल की थीं, तब उन्हें इस बीमारी के बारे में पता चला.

उन्होंने ट्वीट किया, “मुझे अच्छी तरह जानने वाले लोग जानते हैं कि मुझे दमा है. मेरा मतलब है, इसमें छिपाने वाला क्या है? मुझे यह पता था कि इसके पहले कि दमा मुझे अपने काबू में कर ले, मुझे उसे काबू में करना होगा. जब तक मेरे पास मेरा इनहेलर है, दमा मुझे मेरे लक्ष्य को पाने और बेरोक जिंदगी जीने से नहीं रोक सकता.”

प्रियंका फिलहाल अभिनेता फरहान अख्तर और जायरा वसीम के साथ ‘द स्काई इज पिंक’ की शूटिंग कर रही हैं. सोनाली घोष द्वारा निदेर्शित फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है और इसे मुंबई, दिल्ली, लंदन और अंडमान में शूट किया जाएगा. फिल्म के संवाद जूही चक्रवर्ती लिख रही हैं और इसके संगीतकार प्रीतम चक्रवर्ती हैं. फिल्म का निर्माण रोनी स्क्रूवाला और सिद्धार्थ राय कपूर कर रहे हैं. खबरों के अनुसार ‘द स्काई इज पिंक’ की कहानी आयशा चौधरी की जिंदगी पर आधारित है जो 13 वर्ष की आयु में फेफड़ों से संबंधित बीमारी से पीड़ित होने के बाद प्रेरक वक्ता बन गईं.

अनूप जलोटा और जसलीन का उड़ा मजाक

बिग बौस 12 के शुरू होते ही हंगामे शुरू हो गए हैं. बिग बौस 12 का अभी तक का सबसे ज्यादा चर्चा का विषय जो बना वह है भजन सम्राट अनूप जलोटा और उनकी गर्लफ्रेंड सिंगर जसलीन मथारू का रिलेशन. जी हां भजन गायक और गजल गायल अनूप जलोटा जिनके गाने को सुन कई पीड़ियों की सुबह हुई है. वह अनूप जलोटा कलर्स चैनल के रियालिटी और दंगल बाज शो का हिस्सा बने हैं. सोशल मीडिया पर अनूप जलोटा और उनकी गर्लफ्रेंड का खुलासा होने के बाद कई मीम्स, जोक्स, और फोटो वायरल हो रही हैं.

अनूप जलोटा का बिग बौस के घर में हिस्सा लेने के बाद से सोशल मीडिया पर खूब मीम्स बन रहे हैं तो कुछ लोग सवाल उठाए जा रहे हैं.

बिग बौस में जाने के बाद क्या वह अपनी साफ सुथरी छवि को बचा पाएंगे. लेकिन इसका जवाब शो के पहले एपिसोड के बाद ही मिल गया. लोग हैरान थे कि तीन शादियां कर चुके अनूप जलोटा अब तीन सालों से रिलेशनशिप में हैं. अनूप जलोटा जिस सिंगर को डेट कर रहे हैं वह उनसे 37 साल छोटी हैं.

बिचौलियों के हाथों लुटते किसान

मंडी टैक्स के नाम पर देशभर की मंडियों में किसानों के साथ लूट की जा रही है. मुरादाबाद की सब्जी मंडी का एक सीन: मंडी में एक आढ़ती के यहां आलू की नीलामी चल रही है. आलू कन्हैयालाल नाम के किसान का है. पास में वरदी पहने 2 आदमी खड़े हैं. ये वरदी वाले मंडी समिति के मुलाजिम हैं.

एक बोली लगाता है और दूसरा परची बनाता है. ‘‘नया आलू 200 रुपए क्विंटल,’’ वरदी वाले एक मुलाजिम ने बोली लगाई. आसपास कुछ कारोबारी खड़े हैं. वे कन्हैयालाल के आलू हाथ में उठा कर परख रहे हैं. एक कारोबारी ने बोली लगाई, ‘‘280 रुपए क्विंटल.’’

यह उन कारोबारियों में से है जिन्होंने मंडी समिति में अपना रजिस्ट्रेशन कराया हुआ है. मंडी में जो कारोबारी रजिस्टर्ड होते हैं, वे ही बोली में भाग ले सकते हैं. मुलाजिम ने चिल्ला कर कहा, ‘‘280 एक, 280 दो…’’ इतने में एक और कारोबारी बोला, ‘‘285 रुपए क्विंटल.’’

इस तरह बोली बढ़ती गई. कुछ देर बाद गुन्नू सेठ ने 310 रुपए की बोली लगाई. मंडी समिति का एक मुलाजिम चिल्लाया, ‘‘310 एक, 310 दो, 310 तीन.’’ 310 रुपए नीलामी की आखिरी बोली हो गई. आखिरी बोली के बाद समिति के मुलाजिम ने गुन्नू सेठ को परची काट कर थमा दी.

कन्हैयालाल और गुन्नू सेठ ने कांटे पर आलू तुलवाए. 10 बोरी यानी 10 क्विंटल आलू तुले. आलू तुलवाने के बाद गुन्नू सेठ ने परची में लिखे भाव व वजन के मुताबिक बिल बनाया और कन्हैयालाल को रुपए दिए.

कन्हैयालाल के आलू की बिक्री 310 रुपए प्रति क्विंटल पर तय हुई थी, पर एक दूसरे किसान रिंकू ने अपने आलू के लिए 300 रुपए प्रति क्विंटल ही लिए. इस तरह सब किसानों के आलू की नीलामी के भाव अलगअलग बोलियों पर तय हुए.

मंडी से माल खरीदने वाले कारोबारी को मंडी समिति को कुछ टैक्स देना पड़ता है. मसलन, गुन्नू सेठ ने दिनभर में जितने रुपए का माल खरीदा, उस का एक फीसदी मंडी समिति को दिया. इस आलू की खरीद पर उस ने मंडी समिति को 31 रुपए दिए. मंडी समिति नीलामी करवाने के लिए कारोबारियों से पैसा लेती है. इसे मंडी शुल्क कहते हैं. मंडी में आलू के अलावा दूसरी सब्जियों की भी नीलामी हो रही थी.

मंडी में आने वाले कारोबारियों और किसान नेताओं का कहना है कि नीलामी में तयशुदा भाव के हिसाब से भी किसानों को कई बार पैसे नहीं दिए जाते हैं. तोल में भारी गड़बडि़यां की जाती हैं. इस में मंडी मुलाजिम और कारोबारी मिले हुए रहते हैं. मंडी में बिक्री का पूरा इंतजाम मंडी समिति की देखरेख में होता है. इस तरह का कारोबार केवल सब्जी मंडी में ही नहीं, अनाज मंडी, फल मंडी, तेल मंडी, कपड़ा मंडी में भी होता है.

मंडी कानूनों में समयसमय पर बदलाव होते रहे हैं. पहले मंडी समिति के मुलाजिम नीलामी नहीं कराते थे. अनाज की सारी नीलामी आढ़तियों के हाथ में होती थी. किसान अपना अनाज और सब्जी ले जा कर मंडी में आढ़तियों की दुकान पर रख देता था और बेचने के लिए नंबर लगाता था. जब बारी आती थी तब आढ़ती बोली लगाता था. भाव तय होने पर वह किसान को पैसा देता था. बाद में कारोबारी से आढ़ती पैसा वसूल करता था. मंडी कानून में बदलाव इसलिए किया गया ताकि किसान लुटने न पाए. किसान को आढ़त न देनी पड़े. पहले आढ़ती सौदा तय करने के लिए किसानों से आढ़त वसूल करता था. अब केवल खरीदने वाले कारोबारी से मंडी शुल्क लिया जाता है लेकिन इस तरह के बदलाव से कोई फर्क नहीं पड़ा है.

अब आढ़तियों की जगह मंडी समिति के मुलाजिमों ने ले ली लेकिन बिचौलिए फिर भी बने रहे. इस बदलाव के बाद मंडी मुलाजिम और कारोबारी 2-4 बिचौलिए हो गए और किसान लुट रहा है. वैसे, इस बदलाव की वजह यह भी रही है कि नीलामी कराने से किसानों के साथ कोई धोखा न हो और किसानों को भुगतान तुरंत मिल जाए. इस से न तो किसानों के साथ धोखा होना रुक पाया है और न ही भुगतान की समस्या का समाधान हुआ है.

मंडी शुल्क की दर हर राज्य में अलगअलग है. उत्तर प्रदेश मंडी समिति में गेहूं खरीद पर ढाई फीसदी मंडी शुल्क और 4 फीसदी बिक्रीकर लिए जाने का प्रावधान है. पर पंजाब, हरियाणा में यह 4 फीसदी है. उत्तर प्रदेश में सब्जियों पर 3 फीसदी मंडी शुल्क व 8 फीसदी बिक्रीकर लिया जाता है. फल खरीद पर ढाई फीसदी मंडी शुल्क व 6 फीसदी बिक्रीकर है. दिल्ली मंडी समिति में गेहूं खरीद पर 2 फीसदी मंडी शुल्क व 3 फीसदी बिक्रीकर है. यहां फल खरीद पर एक फीसदी मंडी शुल्क व 3 फीसदी बिक्रीकर है. सब्जी खरीद पर डेढ़ फीसदी मंडी शुल्क व 3 फीसदी बिक्रीकर लिया जाता है. यही नहीं, चोरी से आने वाले माल पर बोरी की दर से मंडी मुलाजिमों द्वारा ‘सुविधा शुल्क’ वसूला जाता है.

जीएसटी लागू होने के बाद से सभी तरह के टैक्सों के खत्म होने का दावा किया जाता रहा है पर उत्तर प्रदेश समेत कुछ राज्य अब भी मंडी टैक्स वसूल रहे हैं. कारोबारियों की शिकायतों के बाद केंद्र सरकार का तर्क सामने आया कि मंडी टैक्स से मिलने वाली रकम राज्य सरकार के खजाने में नहीं जाती, बल्कि उस का इस्तेमाल मंडियों के रखरखाव और किसानों व कारोबारियों की सुविधाओं के लिए खर्च किया जाता है. जीएसटी लगने के बाद कई राज्यों में मंडी शुल्क जारी रहने का नतीजा यह है कि आम लोगों को दाल, चावल, सब्जी, गेहूं, सुपारी, जीरा, सिंघाड़ा, लकड़ी, प्लाइवुड समेत मंडी से हो कर गुजरने वाला हर सामान दूसरे राज्यों की तुलना में यहां ढाई फीसदी महंगा मिलता है.

देश में सभी चीजों के दाम आसमान पर पहुंच गए हैं पर कृषि उत्पादन के दाम नहीं बढ़ रहे हैं. फसल जब तक किसान के यहां रहती है सस्ती होती है, पर बाजार में आढ़तियों के यहां पहुंच जाती है तो महंगी हो जाती है. कृषि उत्पादन के लिए मंडियों में आढ़तियों और मंडी मुलाजिमों की बेईमानी रुकने का नाम नहीं ले रही है. ज्यादातर आढ़ती किसान की उपज का मनमुताबिक भाव तय करवाते हैं और किसानों को एकमुश्त भुगतान नहीं करते. अगर किसान को तुरंत भुगतान चाहिए तो 2 रुपए प्रति सैकड़ा काट कर भुगतान किया जाता है.

उत्तर प्रदेश में कोई भी ऐसी मंडी नहीं है जो सूरज छिपने के देर बाद और सूरज उगने से 2 घंटे बाद ही बंद हो जाती हो. इस बीच जो खेल होता है वह सुन कर आप हैरान रह जाएंगे. मजे की बात यह है कि यहां बहुत सी दुकान मंडी समिति के दफ्तर में रजिस्टर्ड नहीं हैं. सैकड़ों की तादाद में ऐसी दुकानें चल रही हैं. हर एक दुकानदार ट्रांसपोर्टर का बैनर लगा कर इस गोरखधंधे को अंजाम देता है. पहली बात तो यहां कोई कांटा नहीं होता, न ही बाट और किसी तरह की सरकारी रसीद काटी जाती?है जिस पर लिखा हो कि अमुक ट्रांसपोर्ट कंपनी. यानी रात के अंधेरे में किसान की जेब पर डाका डाला जाता है.

ये तथाकथित आढ़ती किसी कपड़े में हाथ ढक कर आगे वाले खरीदार से सांकेतिक भाषा में सौदा कर लेते हैं और उसी सांकेतिक भाषा में अपना कमीशन तय करते हैं. भाव कुछ तय होता है और बेचारे किसान को कुछ बताया जाता है. इस में खरीदार भी शामिल होता है. उसी वक्त नकद भुगतान कर बिना किसी कानूनी लिखापढ़ी के किसान को मीठे शब्दों में प्रणाम कह कर रात में ही लुटनेपिटने को भेज दिया जाता है.

मंडियों में आढ़तियों, दलालों के साथसाथ यहां सटोरिए भी होते हैं. ये वे दलाल होते हैं जो फसल का अंदाजा लगा कर उस की जमाखोरी कर लेते हैं. ऐसे सटोरिए और दलाल हर जगह होते हैं. फसल आने पर सटोरिए कम दाम पर किसानों से खरीद कर उसे जमा कर रखते हैं और फिर इन की कोशिश होती है कि बाजार के भाव तेज रहें.

मंडी से जुड़े महकमे राज्य सरकार के तहत आते हैं. ये मंडियां भ्रष्ट, बेईमान, लुटेरे मुलाजिमों के अड्डे बनी हुई हैं. हालांकि मंडियों के मुखिया बड़े सरकारी अफसर होते हैं. इस के बावजूद मंडियों में काली करतूतें जारी रहती हैं. हमारे देश में खेतीबारी से होने वाली आमदनी को टैक्स से मुक्त रखा गया

है ताकि किसानों को फायदा हो, पर कारोबारियों, दलालों और सरकारी अफसरों ने किसानों से पैसा वसूलने के दूसरे गैरकानूनी रास्ते निकाल लिए हैं. न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर भी मंडी के अफसर और कारोबारी किसानों को घोषित दर पर भुगतान नहीं करते हैं. मंडी टैक्स चोरी कर कारोबारी किसानों के पास सीधे खेतों में या बाहर पहुंच कर खरीदारी करते हैं जहां कम कीमत पर अनाज, सब्जियां, फल खरीद लिए जाते हैं. इस से टैक्स चोरी भी होती है और किसानों को भी पूरी कीमत नहीं मिल पाती.

यहां तक कि किसानों को लागत मूल्य भी नहीं मिल पाता है. कर्ज ले कर किसान बोआई करता है. उस में भी मौसम की मार के साथसाथ उसे मंडी अफसरों, बिचौलियों और पुलिस वालों की लूट का शिकार होना पड़ता है.

वसूली होने के बावजूद भी मंडियों में किसानों और कारोबारियों के लिए सुविधाएं न के बराबर हैं. तकरीबन हर मंडी में गंदगी का आलम है. आवारा पशुओं की भरमार है. किसानों को मंडी में खुले में अनाज, फल, सब्जियां रखनी पड़ती हैं जहां बारिश, सर्दी, गरमी में नुकसान उठाना पड़ता है. दिल्ली में देश की सब से बड़ी आजादपुर मंडी में किसानों से उन की उपज बिकवाने के बदले दलाली वसूलने का खेल जारी है. आढ़ती उन से कमीशन लेते हैं.

पूठकलां गांव के किसान जगवीर सिंह कहते हैं कि किसान आढ़ती के यहां माल बेचने पर मजबूर है. अगर वह विरोध करेगा तो आढ़ती कहेगा कि अपना माल उठाओ और कहीं और बेच दो. सारे आढ़ती कमीशन वसूलते हैं. अगर माल बेचने में देरी हुई तो फलसब्जियों के खराब होने का डर रहता है.

कहने को यहां किसानों के हितों के लिए एपीएमसी यानी मंडी समिति है पर वह भी किसानों के हित के बजाय अपना हित देख रही है. मंडी समिति किसानों को दलालों की लूट से बचाने में मददगार साबित नहीं हो पा रही है. मंडी समिति के सदस्य मानते हैं कि किसानों से गैरकानूनी वसूली हो रही है. सदस्य खुद इस बारे में शिकायत करते हैं पर अफसर कार्यवाही करने को तैयार नहीं हैं. कभीकभार दिखावे के तौर पर मामूली कार्यवाही कर दी जाती है पर इस से किसानों से लूट थमती नहीं.

मंडियों में पैसों के भ्रष्टाचार की वजह से आज किसान परेशान है. सरकारी नीतियां उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर कर रही हैं. किसानों के साथ लूट का खेल जब तक बंद नहीं होगा तब तक किसानों का भला नहीं हो पाएगा.

बढ़ते अपराध : क्या है वजह, किस का है हाथ

गुड़गांव, दिल्ली, यमुनानगर व लखनऊ के स्कूलों में बच्चों ने ताबड़तोड़ दिल दहला देने वाली वारदातें कर दीं. बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं. वे वही बोलते हैं, वही करते हैं जो वे अपने आसपास बड़ों से सीखते हैं या समाज में होता हुआ देखते हैं.

लगातार बढ़ रहे अपराधों की रफ्तार देख कर सोचने पर मजबूर होना पड़ता है. मोटेतौर पर समाज व नियमों के खिलाफ कोई काम या गलती करना या कराना कानून की नजर में अपराध माना गया है. खराब माहौल व गलत सोहबत से अपराध बढ़ते हैं. हमारे समाज में अपराध की समस्या नई नहीं है. हमेशा से ऐसा होता रहा है.

पहले ऊंची जातियों के लोग नीची जाति वालों के साथ अपराध करते थे. सामूहिक अपराध होते थे, लेकिन उन जुल्मों के खिलाफ कोई चूं तक नहीं कर पाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब खिलाफत व मुकाबला करने का दौर है. सदियों से शोषित रहे पिछड़े व दलित भी उलटा दांव चलने लगे हैं.

अपराध होने की एक वजह सदियों से चल रही जाति व्यवस्था का जहर भी है. वर्ण व्यवस्था के तहत पिछड़ों को शूद्र व दलितों को अछूत कहा जाता था. मनमाने नियम बना कर नीची जाति वालों को इतना सताया जाता था कि उन का रहना, खानापीना व जीना सब मुहाल था. उन की जिंदगी जानवरों से भी बदतर होती थी. दलितों व पिछड़ों के नहाने, साफ रहने, कुएं पर चढ़ने, बरात निकालने, मंदिरों में घुसने व पढ़नेलिखने तक पर कड़ी पाबंदियों की बेडि़यां डाली गई थीं. इस से शोषितों का खुद पर से यकीन चला गया.

पहले शूद्रों को धनदौलत रखने का हक नहीं था. जानबूझ कर उन्हें गरीब व कमजोर रहने के लिए मजबूर किया जाता था. इस से निचले तबके के लोग नाराज रहते थे.

मसलन, शूद्र का पहला बेटा गंगा में डाल कर दान करा दिया जाता था ताकि वह बड़ा हो कर अगड़ों का मुकाबला न करे. लेकिन अगर किसी को उस के बुनियादी हक से बेदखल किया जाएगा तो वह आखिर कब तक सहेगा?

धीरेधीरे वक्त बदला. शोषित तबका एकजुट होने लगा. अपने ऊपर होने वाले जोरजुल्म से तंग आ कर वह दबंगों को सबक सिखाने लगा.

खून का घूंट पी कर चुप रहने वालों ने जब सारी हदें टूटती देखीं तो उन का सब्र जवाब दे गया. उन के सीने में दबी चिनगारी आग बन कर भड़कने लगी. बस, यही बात अगड़ों को अब नागवार लगती है. समाज में सारे सुखों पर सिर्फ अपना हक जमाने वालों के सारे भरम अब कांच की तरह टूट रहे हैं.

मजबूरी की हद

जुल्म सह कर भी गरीबगुरबे भूखेप्यासे रह कर पंडेपुजारियों व अमीरअगड़ों की खिदमत व बेगारी करते रहते थे. उन की बेटियों को देवदासी बना कर भगवान की सेवा करने के नाम पर मंदिरों के सुपुर्द कर दिया जाता था.

हालात से तंग आ कर पेट भरने के लिए गरीब लोग मजबूरी में छोटीमोटी चोरीचकारी कर के अपना पेट भर लेते थे. मुसहर लोग खेतों से चूहे मार कर खा जाते थे. कुछ मजबूर लोग मुरगी वगैरह चुरा कर अपने पेट की आग ठंडी कर लेते थे.

चारों ओर से मजबूर भूखाप्यासा इनसान जुर्म करने से परहेज नहीं करता. सब जानते हैं कि चंबल के बीहड़ों में ज्यादातर लोग सामंतों द्वारा उन्हें सताने, जबरदस्ती उन की जमीन कब्जाने या मौत का बदला लेने के लिए डाकू बने थे.

सामंतों ने सदियों तक गरीबों के साथ बेजा बरताव किया. बातबात पर उन की बेइज्जती की. उन से पैसों की वसूली की. उन की औरतों की आबरू लूटी. इस वजह से शोषितों के मन में हीनभावना भर गई. जब वे खफा रहने लगे तो पंडेपुजारियों ने उन्हें यह समझाया कि यह सब उन के पिछले कर्मों का फल है, जो उन्हें हर हाल में भोगना ही होगा.

नतीजतन, ज्यादातर दलितों और पिछड़ों ने शोषण व बदहाली को अपनी किस्मत मान कर होंठ सिल लिए, लेकिन जब उन पर लगातार होने वाले जुल्मों का सिलसिला नहीं रुका तो उन में विद्रोह उपजा व बदले की भावना पैदा होने लगी.

अपराधों में हो रही बढ़त वक्त का बदलाव है. सूरज उगते वक्त परछाईं पीछे होती है, लेकिन सूरज के छिपते वक्त परछाईं दूसरी ओर चली जाती

है. यही बात अपराधों की है. पहले ताकतवर अपराध करते थे, अब उन के सताए हुए करते हैं. बेशक हालात बदले हैं, लेकिन पूरी तरह नहीं बदले हैं. समाज में बहुत से संसाधनों पर अगड़े ही काबिज हैं.

समाज की धनदौलत का एक बड़ा हिस्सा मुट्ठीभर लोगों के पास है. जिन की माली हालत कमजोर है, उन्हें अमीरों के रहमोकरम पर ही रहना पड़ता है, इसलिए आज भी ज्यादातर गरीब किसान व मजबूर बेघर, बेरोजगार व लाचार हैं. उन के हक, उन का हिस्सा असरदार, दबंग व अगड़े हड़प जाते हैं और वे टुकुरटुकुर देखते रह जाते हैं.

शहरी इलाकों की बात अलग है. बहुत से पिछड़े हुए गंवई इलाकों में रहने वाले दलितों व पिछड़ों के साथ ज्यादातर मामलों में भेदभाव होता है.

सोच है पुरानी

सदियां बदल गईं, जमाना बदल गया, लेकिन गरीबों को सताने वालों की सोच नहीं बदली. पंजाब के खन्ना इलाके में सरेआम एक नेता की हत्या के वक्त बहुत से लोग मौके पर थे, लेकिन जांच एजेंसी ने जूता गांठने वाले एक गरीब रामपाल को गवाह बनाया.

पूछताछ के नाम पर रामपाल को इतना तंग किया गया कि उस ने खुदकुशी कर ली. ऐसे बहुत से लोग हैं जिन की माली हालत कमजोर है, इसलिए उन्हें जोरजुल्म सहना पड़ता है.

एक ओर विजय माल्या जैसे चालाक लोग बैंकों के अरबोंखरबों रुपए ले कर चंपत हो जाते हैं जबकि दूसरी ओर गरीबों के छोटे से कर्ज पर वे हवालात में डाल दिए जाते हैं. उन के घर की कुर्की हो जाती है. उन के हलबैल बिक जाते हैं. वे सड़क पर आ जाते हैं, इसीलिए व्यवस्था की मार के शिकार हुए लोग आखिर में हथियार उठा लेते हैं.

बिहार जैसे राज्यों में सताए हुए तबकों के लोग एकजुट हो कर हुकूमत के खिलाफ बागी, नक्सली हो जाते हैं. उपद्रवी कहलाते हैं.

ये हालात सिर्फ हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हैं. अमेरिका में पहले गोरे शासकों ने सत्ता के नशे में जिन कालों पर खूब मनमाने जुल्म किए, अब वही काले लोग गोरों को खूब नाकों चने चबवा रहे हैं.

इस वक्त नौजवानों के सामने सब से बड़ा मसला बेरोजगारी का है. पहले प्री, फिर मेन, इंटरव्यू, धरना, लाठीचार्ज, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट व सीबीआई जांच के बाद तैनाती उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में लोकसेवा आयोग के चेयरमैनों की करतूतें सुर्खियों में रही हैं. नतीजतन, हताश नौजवान अपराध करने लगते हैं. देश के एक फीसदी लोगों के पास 73 फीसदी दौलत है. गैरबराबरी से उपजा पैसों का लालच भी अपराध होने की वजह है.

अंगरेजों ने साल 1871 में आपराधिक जनजाति कानून बनाया था. जिस में कई बार बदलाव हुए. इस के तहत साल 1947 में देश आजाद होने के समय 128 जातियां जरायमपेशा लिस्ट में शामिल थीं. साल 1952 में इन्हें विमुक्त जनजाति का नाम दिया गया. इन जातियों का सिर्फ लेबल बदला, लेकिन सामाजिक दर्जा व लोगों का नजरिया नहीं बदला. पुलिस वालों के शक की सूई अकसर गरीब नट, बावरिया, कंजर, बंजारा व भांतु वगैरह जातियों पर टिकी रहती है.

शोषण का अंजाम

शोषितों की जायज मांगों को अनसुना किया गया. इस से पैदा उन की मुखालफत को दबाने के लिए कहा गया कि कुछ जातियों के लोग जन्म से ही अपराधी फितरत के होते हैं. इस बात को पुख्ता करने के लिए असरदार लोग उन की गिरफ्तारियां कराने लगे.

कभी यह नहीं देखा गया कि अगड़ों ने उन्हें पढ़ने व बढ़ने नहीं दिया. उन्हें समाज निकाला दे कर बस्तियों से बाहर कर दिया जाता था इसलिए मजबूरी में वे घुमंतू बन गए.

तालीम की कमी से नीची जातियों के लोग सदियों तक ऊंचे ओहदों पर नहीं बैठ सके, इसलिए उन पर जुल्म होते रहे, उन के साथ नाइंसाफी होती रही. फर्क इतना है कि पहले अपराध करने पर भी बगलाभक्तों को सजा देने का नियम नहीं था, लेकिन अब आसाराम, रामपाल, रामरहीम व फलाहारी जैसे कई गुरुघंटाल सींखचों के अंदर हैं.

काम की नसीहत

समाज में अपराध तभी कम होंगे जब केवल दलितों व पिछड़ों को ही नहीं बल्कि अगड़ों को भी कड़ी सजा मिलेगी. समाज में ऊंचनीच का कोई भेदभाव नहीं होगा. कोई ताकतवर किसी कमजोर पर शोषण नहीं करेगा. सब रहनुमाओं के सिर्फ खास हक ही नहीं फर्ज भी आम जनता से ज्यादा व जरूरी होंगे. नेताओं व अपराधियों की जुगलबंदी नहीं होगी.

सदियों से दबेकुचले दलितों व पिछड़े लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिशें जारी हैं. सरकारी स्कीमों के जरीए उन की जिंदगी बेहतर बना कर उन्हें ऊंचा उठाने के लिए समाज कल्याण महकमे के जरीए बहुत सी सहूलियतें दी जा रही हैं, लेकिन कहीं किसी दफ्तर के बाहर चल रही योजनाओं व कर्ज, छूट जैसी सहूलियतें लिखी नहीं दिखतीं.

भ्रष्ट व निकम्मे मुलाजिम ही ऐसी सारी बातें छिपा कर रखते हैं और कोई प्रचारप्रसार कारगर तरीके से लागू नहीं करते, ताकि खुद हिस्साबांट कर सकें, इसलिए जरूरतमंदों को कानोंकान खबर तक नहीं होती.

मेरठ की दलित महिला अनीता देवी की विधवा पैंशन की अर्जी घूस न देने के चलते प्रोबेशनरी औफिस में पूरे 2 साल तक दबी रही.

ऐसे बहुत से मामले हैं जिन में लगने वाले वक्त की कोई सीमा या जवाबदेही तय नहीं है, इसलिए जरूरतमंद धक्के खाते रहते हैं. फिर भी गरीबी, गंदगी व पिछड़ेपन से छुटकारा नामुमकिन नहीं है. बहुत से मसले खुद हल किए जा सकते हैं. बस, खुद पर यकीन होना चाहिए.

साथ ही, अंधविश्वासों के दलदल से बाहर निकल कर अपनी सूझबूझ, जानकारी, जागरूकता व तालीम बढ़ाने पर पूरा जोर देना चाहिए ताकि चालाक लोग उन्हें किसी भी तरीके से बेवकूफ न बना सकें.

शादी के नाम पर ठगी का खेल

राजस्थान में अभी भी लड़कियों की कमी के चलते कई लोग कुंआरे हैं. वहां पहले से ही जातबिरादरी में रिश्तेदारी के जरीए शादियां होती रही हैं. आज भी ज्यादातर लोग परंपरा के मुताबिक अपने समाज में ही शादी करते हैं. लेकिन आजकल ऐसा भी देखने को मिल रहा है कि एक समाज का लड़का दूसरे समाज की लड़की से प्यार कर के कोर्टमैरिज कर लेता है और अपनी नई दुनिया बसा कर मजे से रहता है.

समाज के ज्यादातर लोग उस प्रेमी जोड़े को कभी स्वीकार नहीं करते. कई बार तो वे उन्हें जान से मार डालते हैं. समाज का कोई आदमी उन से ताल्लुक नहीं रखता, जिस ने दूसरे समाज में जा कर शादी रचाई होती है. अगर कोई आदमी पंचों की बात नहीं मान कर शादी करने वालों के घर आताजाता है तो पंचायत उसे भी समाज से निकाल देती है. मगर कभीकभार पंचों के गलत फैसले भी उन के लिए मुसीबत बन जाते हैं और वे जेल का सफर भी कर लेते हैं.

ऐसे पंचों की वजह से न जाने कितने घर टूटे हैं और बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर हैं. राजस्थान के हर समाज में कुंआरे लड़कों की फौज मिलेगी. जब इन की शादी की उम्र निकल जाती है तो अपने समाज के बजाय ये मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा वगैरह राज्यों से पैसे दे कर दलाल के जरीए अपनी ही जाति की लड़की ढूंढ़ कर शादी करते हैं. गरीब घरों की ऐसी लड़कियां जब राजस्थान आ कर खुशहाल होती हैं तो उन का मायके जाने का मन नहीं होता. दूसरे प्रदेश से खरीद कर लाई गई लड़कियां थोड़े समय में ही यहां के माहौल के हिसाब से उठनेबैठने लगती हैं.

यह देख कर कई दलालों ने ऐसी फरेबी दुलहनें भी तैयार कर ली हैं जो पैसे ले कर शादी कर के ससुराल जाती हैं और मौका मिलते ही गहनेरुपए ले कर फरार हो जाती हैं. ऐसी फरेबी दुलहनों का नाम, पता व मातापिता सब फर्जी होते हैं. ऐसे ठग गिरोहों ने ऐसी फरेबी दुलहनों के अलगअलग नाम से आधारकार्ड बना रखे हैं. राजस्थान का ऐसा कोई जिला नहीं बचा जहां ऐसी फरेबी दुलहनों ने ठगी नहीं की हो.

दलाल लोग पैसे ले कर फरेबी दुलहन से ब्याह करा देते हैं. फरेबी दुलहन फिर बनती है लुटेरी दुलहन और वह सबकुछ समेट कर भाग खड़ी होती है और दोबारा कभी नहीं लौटती है. लुटेरी दुलहनें इतनी शातिर होती हैं कि कई तो पति से सैक्स संबंध तक नहीं बनाती हैं. वे कह देती हैं कि पीरियड्स चालू हैं. इस के बाद 1-2 दिन में ही वे रुपएगहने ले कर फरार हो जाती हैं.

जैसलमेर शहर में एक सेठ के बेटे की शादी मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में एक दलाल की मारफत हुई थी. दिसंबर, 2017 में शादी करने के एवज में लड़की वालों को 8 लाख रुपए दिए. लड़की गोरीचिट्टी और खूबसूरत थी. मगर जैसलमेर आ कर 3 दिन तक सेठजी के बेटे को पास तक फटकने नहीं दिया. उस ने अपने पति से कहा, ‘‘मैं

4-5 दिन आप के काम की नहीं हूं. आप मुझ से दूर रहें. जब सब ठीक होगा तब प्यार में डूब जाना.’’ सेठ का बेटा दिन गिनने लगा तभी शादी के 5वें दिन सुबहसवेरे ही दुलहन गायब हो गई. वह घर के गहने व

2 लाख रुपए नकद ले कर भाग गई. गहने 5 लाख रुपए के थे. इस हिसाब से सेठ को 15 लाख का चूना लग गया और दुलहन भी नहीं मिली. कई फरेबी दुलहनों ने पतियों के सीने में रख रातें भी गुजारीं. पति समझते थे कि प्यार करने वाली बीवी

मिली है. मगर जैसे ही दुलहन को मौका मिला, वह सबकुछ समेट कर भाग गई. बीवी की आस में लाखों रुपए खर्च कर चुके कुंआरों के साथ जब ऐसी वारदातें होती हैं तो दूसरे लोग भी मजाक करने से बाज नहीं आते. बेचारा कुंआरा जिंदगीभर की कमाई से तो हाथ धो बैठता ही है, लोगों के मजाक की वजह भी बन जाता है.

सिंगल पेरेंट का आखिर गुनाह क्या है

देश में ही नहीं लगभग दुनिया भर में सिंगल पेरेंट को अलग निगाहों से देखा जाता है. आमतौर पर लोग सिंगल पेरेंट को अकेले रहने का गुनहगार मारते हैं और यह भी कह डालते हैं कि उस की गलती से बच्चों को मातापिता दोनों का प्यार व सुरक्षा नहीं मिल रही. सिंगल पेरेंट को यदाकदा ही दोहरा ही नहीं तीहरा बोझ उठाने के लिए शाबाशी दी जाती है. तीहरे बोझ का अर्थ है काम कर घर भी चलाना.

अभी हाल में चेन्ने हाई कोर्ट के एक जज ने टिप्पणी की कि सिंगल पेरेंट की प्रवृत्ति गलत है. यानी न्यायिक सोच है कि किसी भी सहूलियत के लिए कोर्ट के दरवाजे खटखटाने वाले सिंगल पेरेंट को सहानुभूति तो मिलेगी पर उसे दोषी भी ठहराया जाएगा. दुनिया भर में 230 करोड़ बच्चों में से 32 करोड़ बच्चे आज सिंगल पेरेंटों के साथ पल रहे हैं. बच्चों का मतलब है 17 साल तक के बच्चे.

इतने सारे बच्चों का बोझ उठाने के बावजूद हर जगह सिंगल पेरेंट शक और लालफीताशाही के शिकार रहते हैं. सिंगल पेरेंटों को शादी करने के लायक साथी मुश्किल से ही मिलते हैं, उन्हें दोस्त भी नहीं मिलते. शादीशुदा दोस्त सोचते हैं कि उन पर कभी कभार बच्चों का बोझ न डाल दिया जाए और अविवाहित बच्चों की चिलपों से घबराते हैं. उन्हें अकेलेपन का दर्द भी सहना पड़ता है.

अफसोस यह है कि कानून भी सिंगल पेरेंटों को महत्व नहीं देता. चूंकि ज्यादातर मामलों में बच्चों का बोझ सिंगल मां को उठाना पड़ता है. पुरुष कानून व नियम बनाने में ढीले रहते हैं. हर दफ्तर में सिंगल औरत को ला…. नजरों से देखा जाता है. हर कोई लालफीताशाही के नाम पर उन्हें लूटने की कोशिश करता है.

छोटे बच्चों को पालने वाली अकेली मांएं और पिता दोनों सिस्टम के बहुत ज्यादा लाचार हैं. उन्हें न आसानी से मकान किराए पर मिलते हैं न दोस्त. परिवार भी साथ नहीं देता और समाज व सरकार भी नहीं. अगर यह अकेलापन तलाक या बिना विवाह मां बनने के कारण हुआ हो तो लोग अपराधी ही समझते हैं और पूरी तरह कन्नी काट लेते हैं. पुनर्विवाह यदाकदा ही होता है और बस फिल्मों में दिखता है.

चंदू : बाढ़ के बीच में क्या हुआ

‘‘हुजूर, हम को भी अपने साथ ले चलिए. 3 दिनों से कुछ नहीं खाया है. हम को भी बाहर निकालिए… 3 दिनों से बाढ़ के पानी में फंसे हुए हैं… सबकुछ तबाह हो गया है… खानेपीने का सामान था, पर अचानक आई बाढ़ में सबकुछ डूब गया हुजूर… भूख के चलते जान निकल रही है… पैर पकड़ते हैं आप के हुजूर… हम को भी निकाल लीजिए…’’

‘‘ऐसे ही थोड़े ले जाएंगे… 20-20 रुपया हर आदमी का लगेगा… तभी ले जाएंगे. हम लोगों को भी खर्चापानी चाहिए कि नहीं…’’

नाव पर सवार एक नौजवान, जिस के हाथ में स्मार्टफोन और कान में ईयर फोन था, चेहरेमोहरे से तेजतर्रार लग रहा था. उस ने नाव वाले के इस रवैए का विरोध किया और बोला, ‘‘भैया, आप ऐसा नहीं कर सकते हैं. पैसे लेने का नियम नहीं है. बाढ़ आई है. प्रशासन की तरफ से सुविधाएं मुफ्त दी जा रही हैं.

‘‘डीएम साहब ने कहा है कि लोगों को बाढ़ प्रभावित इलाकों से महफूज जगह पहुंचाने के लिए नाव के साथ नाव चालकों की टीम लगाई गई है, फिर आप लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं? लोग यहां मर रहे हैं और आप उन की मजबूरी का फायदा उठाने में लगे हैं.’’

‘‘देखो बाबू, फालतू की बात मत करो… पैसा नहीं है तो बोलो कि नहीं है. अगली ट्रिप में दे देना, ज्यादा नियमकानून मत झाड़ो.’’

‘‘हम लोग शिकायत करेंगे. आप ऐसा नहीं कर सकते हैं. अभी मैं ‘हैल्पलाइन’ नंबर पर फोन मिलाता हूं,’’ कहते हुए उस नौजवान ने फोन निकाला और ‘हैल्पलाइन’ का नंबर ढूंढ़ने लगा. कई बार फोन डायल किया, पर फोन लगा ही नहीं.

उस नौजवान ने थकहार कर कहा, ‘‘फोन कनैक्ट ही नहीं हुआ, नहीं तो आज ही आप को पता चल जाता कि 20 रुपए लेना क्या होता है.’’

‘‘बबुआ, कुछ नहीं होने वाला है. तुम्हारे जैसे लौंडों को हम लोग रोजाना देखते हैं. बाढ़ में ‘हैल्पलाइन’ का फोन भी बह गया है. कुछ नहीं होने वाला है. तुम्हारी भलाई इसी में है कि बकबक करना छोड़ दो और वाजिब पैसे दे दो, नहीं है तो उतर जाओ और सड़ते रहो यहीं पर.’’

‘‘भैया, बात पैसे की नहीं है, बेईमानी की है, भ्रष्टाचार की है. आप लोग नाजायज पैसे वसूल रहे हो. यह गलत है. हमारे पास तो पैसे हैं, पर आप लोग मजबूरों से ऐसा बुरा बरताव मत कीजिए. दुख की घड़ी में उन्हें सहारा दीजिए. थोड़ी दया दिखाइए…’’ चंदू की तरफ इशारा करते हुए वह नौजवान बोला, ‘‘देखिए इस बेचारे को, आप से हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ा रहा है, पर आप इतने गिर गए हैं कि आप को पैसे के सिवा कुछ नहीं सूझ रहा है.’’

नाव वाला गुस्से से तमतमाते हुए बोला, ‘‘देखो लड़के, बहुत भाषण सुन चुके हैं तुम्हारा. तुम जहर उगल रहे हो. तुम अपनी सोचो, दूसरे की ठेकेदारी मत लो नहीं तो यहीं फेंक देंगे. लाश का भी पता नहीं चलेगा.’’

नाव पर सवार एक और आदमी, जो पहले से ही चुप था और किसी तरह महफूज जगह पहुंच जाने की उम्मीद के चलते किसी तरह की लफड़ेबाजी में नहीं फंसना चाहता था, नाव वाले की इस बात को सुन कर और भी डर गया.

चंदू बारबार नाव वाले से गुजारिश कर रहा था, पर नाव वाला भी अडि़यल था. वह उसे ले जाने के लिए तैयार नहीं था. वह प्रति आदमी 20 रुपए बाढ़ के पानी से पार कराने के लिए लेता था.

चंदू के पास पैसे नहीं थे. उस की तरफदारी करने वाले नौजवान की भी हेकड़ी नाव खेने वाले बदमाशों के चलते निकल गई थी. मुसीबत की इस घड़ी में बहुतकुछ गंवा चुके लोगों में से कोई भी इस समय दानपुण्य करने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा था ताकि चंदू भी महफूज जगह पहुंच जाए.

नाव वाले की इनसानियत मर चुकी थी. 20 रुपए की खातिर उस ने एक आदमी को मरने के लिए छोड़ दिया और नाव आगे बढ़ा दी.

अभी भी चंदू का गिड़गिड़ाना बंद नहीं हुआ था, ‘‘हुजूर, हम को भी चढ़ा लीजिए. बाद में हम मजदूरी कर के दे देंगे पैसा… रहम कीजिए हुजूर.’’

नाव वाला नाव की रफ्तार को तेज कर चुका था. अब कराहते और मरियल चंदू की आवाज आनी बंद हो गई थी.

कोसी की प्रलयकारी बाढ़ में चंदू का सबकुछ बरबाद हो गया था. हाल ही में उस ने घर बनाया था. भले ही वह घर फूस का था, पर खूनपसीने से बनाया गया घर जब तबाह हो जाता है, तब उस का दर्द पीडि़त ही समझ सकता है. पुरोहिती और मजदूरी कर के कुछ दानापानी भी जमा किया था ताकि अपने बालबच्चों और पत्नी की गुजरबसर ठीक से कर सके, पर वह भी बह चुका था. खाने के लाले पड़ गए थे.

अचानक आई बाढ़ से जिन को जहां मौका मिला उन्होंने अपने लैवल पर जान बचाने की कोशिश की. कई बह भी गए. कई अपनों से बिछुड़ गए.

चंदू भी अपनी पत्नी और बालबच्चों से बिछुड़ चुका था. वे किस हाल में होंगे… यह सोच कर उस की हालत बुरी हो जाती थी. ऊपर से पेट की आग ने उस को परेशान किया हुआ था. उस ने कई बार अपने परिवार को तलाश करने की कोशिश की, पर पानी के दैत्य रूप को देख कर हिम्मत जवाब दे देती.

ऐसे हालात में उन के घर से कुछ ही दूरी पर आम का विशालकाय पेड़ ही था जो उस को जिंदा रहने के लिए सहारा दे रहा था. जिंदा रहने के लिए चंदू किसी तरह आम के पत्तों और बाढ़ के पानी का सेवन कर रहा था.

पेड़ की डाल पर बैठे और हाथ से डाली को पकड़े हुए कई दिन हो चुके थे. समय अपनी रफ्तार से बढ़ रहा था, पर पानी नहीं घट रहा था.

दोपहर के 4 बज रहे थे. हवाईजहाज चूड़ा और गुड़ के पैकेट गिरा रहा था. चारों ओर फैले इस जलक्षेत्र में इस पेड़ पर भी कोई आदमी है, हवाईजहाज उड़ाने वाले इस बात से अनजान थे. काश, इस पेड़ पर भी पैकेट गिरा दिए जाते.

चंदू ने डाल पर लेटे हुए धीरे से आंख ऊपर कर के हवाईजहाज को देखा कि काश, कहीं से सहारा मिल जाए, पर हवाईजहाज आंख से ओझल हो गया.

शाम हो चुकी थी. चंदू की डाल से पकड़ ढीली हो रही थी और धीरेधीरे पकड़ छूट गई. बेजान शरीर पानी में गिर चुका था.

पानी ने चंदू के सारे दुखों को हर लिया था. अब उसे नाव और राहत की जरूरत नहीं थी. वह तो बहुत ही महफूज जगह पहुंच चुका था.

टैलीविजन पर खबर चल रही थी, ‘बाढ़ में फंसे लोगों को महफूज जगह पहुंचा दिया गया है. राहत और बचाव का काम तेजी से चल रहा है.’

गांव की ओर : रमुआ ने गांव में क्या देखा

डाक्टर की सलाह पर रमुआ हवापानी बदलने के लिए अपने गांव जा रहा था. न जाने कितने साल हो गए थे उसे गांव गए हुए. मांबाप के मरने के बाद से वह एक बार भी गांव नहीं गया था.

रमुआ तकरीबन 10-12 साल पहले गांव से शहर आया था. गांव में उस की थोड़ीबहुत खेती थी. खेती के साथसाथ वह गांव में मजदूरी भी करता था.

गांव के कुछ लोग शहर में मजदूरी करते थे. जब रमुआ उन को गांव से वापस शहर जाते देखता था तो उस का मन भी मचल उठता था. लेकिन मांबाप उसे शहर नहीं जाने देते थे.

जब मजदूर शहर से गांव लौटतेतो अपनी बीवी के लिए चूडि़यां, बिंदी वगैरह लाते थे. यह देख कर रमुआ की बीवी सोचती कि काश, उस का पति भी शहर जाता. वह रमुआ को शहर जाने के लिए उकसाती थी.

एक दिन जिद कर के रमुआ रोजगार के लिए शहर चला गया. हफ्तेभर बाद उस ने बीवीबच्चों को भी वहां बुला लिया.

रमुआ को अपने गांव वालों की मदद से कैमिकल बनाने वाली किसी फैक्टरी में दिहाड़ी पर काम मिल गया था. रहने के लिए उस ने अपने साथियों के साथ शहर के बाहर एक नाले के किनारे झोंपड़ी बना ली थी.

रमुआ को जब पहली बार तनख्वाह मिली तो वह हैरान रह गया. इतना पैसा उस ने आज तक नहीं कमाया था.

रमुआ सोचने लगा कि वह अपने बच्चों को खूब पढ़ालिखा कर सरकारी नौकरी दिलाएगा.

शुरू के कुछ महीने तो अच्छे बीते, लेकिन बाद में यही पैसे कम पड़ने लगे. शहर में महंगाई ज्यादा थी और खर्चे भी गांव से ज्यादा थे.

धीरेधीरे रमुआ को भी अपने साथियों की तरह शराब पीने की लत लग गई. कभीकभी उसे काम नहीं मिलता था. फैक्टरी में हड़ताल भी अकसर होती रहती थी.

समय के साथसाथ रमुआ के बच्चे बड़े होते गए. साथ ही, नाले से लगा पूरा इलाका भी झोंपडि़यों का एक जंगल सा बन गया.

अब हफ्ता वसूलने वाले गिरोह पैदा हो गए थे. रमुआ को भी नगरपालिका व गुंडों को हफ्ता देना पड़ता था. इस चक्कर में जो आमदनी पहले बहुत ज्यादा दिखती थी, अब उस में घर का खर्चा चलाना भी मुश्किल हो गया था. बीवी तो पहले ही लोगों के घरों में बरतन मांजने का काम कर रही थी, अब बच्चों को भी काम पर लगा दिया गया था. इस इलाके में यह नई बात नहीं थी. सब परिवारों में यही हो रहा था.

रमुआ की बीवी का किसी गैर मर्द से चक्कर चल रहा था. इस बात को ले कर वह आएदिन अपनी बीवी से लड़ता रहता था. वह उसे शराब पीने के लिए कोसती थी.

धीरेधीरे रमुआ का बेटा व बेटी भी दूसरे बच्चों की तरह बुरी आदतों के शिकार हो गए. बेटा भी अब छिप कर शराब पीने लगा था. बीड़ी तो वह खुलेआम ही पीता था.

पहले जब रमुआ अपने बेटे को डांटता और पीटता था तो वह चुपचाप सुन लेता था, लेकिन अब वह भी जवाब देने लगा था, ‘तुम खुद पीते हो तो मुझे डांटते क्यों हो?’

रमुआ ताज्जुब से सिर पकड़ कर बैठ जाता था. सोचता कि आजकल के बच्चों को क्या हो गया है. उस ने तो बचपन में क्या पूरी जिंदगी में अपने बाप को ऐसे जवाब देना तो दूर आंख मिला कर बात भी नहीं की थी.

दूसरी ओर रमुआ की बड़ी बेटी, जो अपनी मां के साथ काम पर जाती थी, ने भी बस्ती की दूसरी लड़कियों के रंगढंग अपना लिए थे. वह काली थी तो क्या हुआ, पर जवान थी. लोगों की तीखी नजरें व फिकरे उस की जवानी में उबाल लाते थे. उस ने बस्ती के कुछ आवारा लड़कों को दिल दे दिया था.

प्यार के 2 रास्ते होते हैं. एक रास्ता शादी का होता?है और दूसरा बरबादी का.

रमुआ की बेटी इतनी खुशनसीब नहीं थी कि प्यार के पहले रास्ते पर चलती. कई लड़कों से उस के जिस्मानी रिश्ते बने और वह भी बिना शादी के ही पेट से हो गई.

हालांकि बस्ती में रहने वाली दाई ने दूसरी लड़कियों की तरह उसे भी इस मुसीबत से छुटकारा दिला दिया था, पर रमुआ के लिए यह बात फांस बन गई.

तभी फैक्टरी में हड़ताल हो गई. इस बार हड़ताल काफी लंबी चली. लगता था जैसे दोनों तरफ के लोग अखाड़े में उतर आए हों.

जल्दी ही भूखे रहने की नौबत आ गई. शहर की महंगाई में अकेली कमाई से पेट नहीं भरता. इस वजह से घर में क्लेश बढ़ गया.

अब बीवी अकेली कमाती थी, इसलिए दबती नहीं थी. रमुआ मन मार कर रह जाता था. मौका मिलते ही

वह घर का सामान बेच कर शराब पी लेता था.

एक दिन रमुआ की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई. ज्यादा शराब पीने व फैक्टरी में जो कैमिकल बनता था, उस की वजह से रमुआ के फेफड़े खराब हो गए. डाक्टर ने उसे कुछ दिन जगह बदलने की सलाह दी.

पहले तो रमुआ ने डाक्टर की सलाह नहीं मानी. लेकिन जब वह ठीक नहीं हुआ तो गांव जाने की तैयारी करने लगा.

एक दिन रमुआ के घर पुलिस आई और उस के बेटे कालू के बारे में पूछने लगी. रमुआ को हैरानी हुई कि आखिर उस के बेटे ने ऐसा क्या कर दिया.

काफी पूछने पर पुलिस ने बताया कि कालू ने चोरी की है.

रमुआ घबरा कर बोला, ‘साहब, वह तो कई दिनों से घर आया ही नहीं, पता नहीं कहां गया है?’

‘क्या तुम्हें अपने बच्चे के बारे में पता नहीं, कैसे बाप हो तुम?’ पुलिस ने धमकाया.

रमुआ सिर झुका कर चुपचाप सुनता रहा. उस के दिमाग में हलचल मच गई. वह सोचने लगा कि आखिर इस शहर ने उसे क्या दिया? फिर उसे लगा कि इस शहर ने उसे काम तो दिया है नहीं तो गांव में कभी अकाल, तो कभी बाढ़ की मार सहनी पड़ती थी.

काफी सोचविचार के बाद रमुआ ने गांव लौटने की ठानी. गांव जाने के लिए पहले तो रमुआ की बीवी व बच्चों ने मना किया, पर बाद में वे राजी हो गए.

गांव पहुंचते ही रमुआ के दोस्तों व रिश्तेदारों ने उसे घेर लिया.

शाम को रमुआ अपने दोस्तों के साथ गांव घूमने गया तो उस ने देखा कि गांव के बाहर खुदाई का काम चल रहा है.

‘‘अरे रहमान, यहां क्या हो रहा है?’’ रमुआ ने हैरानी से पूछा.

‘‘गांव में कच्ची नहर बन रही?है. इस में पानी आएगा और हम साल की 2 फसलें ले सकेंगे.

‘‘और हां, इस की खुदाई भी हम गांव वाले ही कर रहे हैं. पंचायत इस

के बदले में हमें 10 किलो अनाज व 30 रुपए दिहाड़ी देती है,’’ रहमान ने बताया.

‘‘अच्छा, तभी तो मैं ने गांव में कोई हुक्का पीते या बातें करते हुए नहीं देखा,’’ रमुआ ने कहा.

‘‘हां, अब बच्चे भी स्कूल जाते हैं और आदमी व औरतें नहर व दूसरे कामों पर जाते हैं,’’ रहमान ने बताया.

‘‘दूसरे कौन से काम…?’’ रमुआ ने हैरानी से पूछा.

‘‘प्रधानमंत्री गांव सड़क योजना, सरकारी दवाखाना, स्कूल व पंचायत के भवन बनाने जैसे काम,’’ रहमान ने जोश में आ कर बताया.

‘‘क्या गांव में इतने सारे काम हो रहे हैं?’’ रमुआ आंखें फाड़ कर बोला.

‘‘और नहीं तो क्या,’’ रहमान ने जवाब दिया.

लौटते समय अंधेरा हो गया था. रहमान ने चलते हुए कहा, ‘‘यार, तुम्हें तो अंधेरे में परेशानी होती होगी. तुम तो शहर में बिजली के आदी हो गए होगे?’’

अब रमुआ क्या जवाब देता. उस की झोंपड़ी में 25 वाट का बल्ब था. वह भी कभीकभी ही रोशनी देता था. गली में खंभा तो था, पर बल्ब नहीं था.

आज खाना रमुआ के दोस्त बनवारी के यहां था. रमुआ व उस के परिवार को लगा कि उन्हें इतना लजीज खाना खाए कितने साल हो गए.

सुबह उठ कर रमुआ अपने खेत की ओर गया. इतने सालों में जमीन में खरपतवार हो गए थे. खेत की मिट्टी को हाथ लगाते ही रमुआ रोने लगा.

उसे दीनू काका आते दिखाई दिए तो उस ने पूछा, ‘‘इतनी सुबहसुबह कहां जा रहे हो काका?’’

‘‘पास के कसबे के बैंक में जा रहा हूं. खेत में बीज बोने व हल खरीदने के लिए कर्ज ले रहा हूं,’’ दीनू काका ने जवाब दिया.

‘‘क्या सरकार हम जैसे छोटे लोगों को भी कर्ज देती है?’’ रमुआ ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘हां, वह भी कम ब्याज पर,’’ दीनू काका ने कहा और चल पड़े.

रमुआ की बीवी को पड़ोसी फरजाना पंचायतघर की ओर ले गई. उस ने गांव की औरतों व शहर की एक लड़की को वहां बैठे देखा तो पूछा, ‘‘अरे दीदी, यहां क्या हो रहा है?’’

‘‘यह लड़की गांव की औरतों को सिलाईकढ़ाई का काम सिखाती है और शहर से काम ला कर देती है,’’ फरजाना ने कहा.

रात को रमुआ व उस की बीवी ने गांव में आए इस बदलाव को देख कर एक फैसला किया.

सुबह रमुआ को अपना घर ठीक करते हुए देख वहां सब लोग जमा हो गए. जुम्मन ने हैरत से पूछा, ‘‘क्यों रमुआ, यहां ज्यादा दिन रहने का इरादा है क्या?’’

‘‘अब मैं कभी शहर नहीं जाऊंगा. सब के बीच यहीं काम करूंगा. शहर में गंदगी व बीमारी के सिवा कुछ नहीं रखा है. अब मैं ने सोचसमझ कर फैसला किया है कि मुझे यहीं पर रहना है,’’ रमुआ ने गांव वालों से कहा.

रमुआ की बीवी फैसला सुनाते हुए बोली, ‘‘बस, अब हम यह गांव छोड़ कर कभी नहीं जाएंगे.’’

कुछ अरसे बाद रमुआ की बेटी की शादी भी गांव में हो गई. उस का बेटा मजदूरी के साथसाथ खेती भी करने लगा. सभी लोग खुश थे.

अब रमुआ न शराब पीता था, न ही उस की बीवी उस से झगड़ती थी.

रमुआ को देख कर बाकी गांव वाले भी शहर से वापस आ गए. अब लोग शहर जाने की बात पर एकदूसरे को चुटकुले सुनाते और हंसते हैं.

‘चुनावी मुद्दा अब विकास नहीं हिंदू मुसलिम हो गया है’

देश में अब सांप्रदायिक हिंसा, अपराध और गैरबराबरी का माहौल बन गया है. दलितों और अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है. धर्म और जाति को मुद्दा बना कर सत्ताधारी दल राजनीति कर रहे हैं. विकास और जनहित की बातें गायब हैं.

जब देश का पूरा समय और ताकत गरीबी, भुखमरी, बीमारी, पढ़ाईलिखाई पर लगनी चाहिए, वहां गौरक्षा, हिंदुत्व के नाम पर लोगों को सरेआम मौत के घाट उतारा जा रहा है.

चूंकि लोकसभा चुनाव 2019 में अब कुछ ही महीने बचे हैं, लिहाजा चुनावी तैयारियों को ले कर सभी राजनीतिक दल जोरशोर से नई रणनीति बनाने और अपना प्रचारतंत्र मजबूत करने में लगे हैं. लेकिन जनता को एक कड़ी में जोड़ कर एकता, अखंडता और विकास का एजेंडा ले कर चलने की सोच रखने वाले सियासी दलों का देश में अकाल सा दिखता है.

हालांकि जनता दल राष्ट्रवादी जैसे कुछ नए दल भी हैं जो किसी खास जाति या तबके की बात नहीं करते हैं और न ही जाति और धर्म के आधार पर टिकट बांटने में यकीन रखते हैं.

जनता दल राष्ट्रवादी के राष्ट्रीय संयोजक अशफाक रहमान यों तो कारोबार से जुड़े रहे हैं लेकिन समाज के लिए कुछ करने की चाहत उन्हें राजनीति के गलियारों में ले आई है.

अशफाक रहमान राजनीति से अपराधी और विघटनकारी तत्त्वों को खत्म करना चाहते हैं. हालाकि राजनीति उन के लिए नया मैदान नहीं है. साल 1990 से ले कर साल 1995 तक वे बिहार की राजनीति में रहे और मुसलिमों को रिजर्वेशन देने की बात सब से पहले उन्होंने ही उठाई थी.

बहरहाल, मुसलिमों व दलितों के बदतर हालात को देख कर वे नए सिरे से कमर कस कर राजनीति में उतरे हैं और अब जनता दल राष्ट्रवादी के साथ जनता के बीच मौजूद हैं.

देश में पहले से कई सियासी पार्टियां हैं, ऐसे में आप को कारोबार से राजनीति में आने और जनता दल राष्ट्रवादी पार्टी बनाने का जरूरत क्यों पड़ी?

इस सवाल पर अशफाक रहमान कहते हैं, ‘‘देशभर में दलितों और मुसलिमों के साथ सामाजिक भेदभाव हो रहा है. इस के लिए मौजूदा सरकार ही जिम्मेदार है, क्योंकि वह इन हालात को बदलने के बजाय जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाती रहती है. देश की नौकरशाही का सिस्टम पूरी तरह से सड़ने लगा है.

‘‘दरअसल, सरकारें तो बदल जाती हैं लेकिन व्यवस्था में बैठे भ्रष्ट नौकरशाह नहीं बदलते हैं. वे कई सालों से देश के सिस्टम में पलीता लगा रहे हैं. नतीजतन, लोकतंत्र के माने बदल गए हैं. जनता मालिक होनी चाहिए और वे नौकर, लेकिन आज उलटा है. जनता को नौकर मान कर वे मालिक बन रहे हैं. ऐसे ही लोगों पर नकेल कसने और अव्यवस्था को पूरी तरह से बदलने के मकसद से हम राजनीति में आए हैं.’’

राजनीतिक दल चुनाव आते ही जनता को वादों और दावों का खूब भाषण पिलाते हैं, उस के बाद उन का आमजन से संवाद पूरी तरह से खत्म हो जाता है. नरेंद्र मोदी देश के गलीमहल्लों से ज्यादा विदेशों में नजर आते हैं. ऐसे में वे जनता के साथ किस तरह संवाद करते हैं?

इस सवाल पर अशफाक रहमान बताते हैं, ‘‘देखिए, न हमें नरेंद्र मोदी की तरह कोई बड़ा कारपोरेट सपोर्ट करता है और न ही हम उतने बड़े हैं कि जनता को परेशान छोड़ कर विदेश में घूमें. हम तो गांवगांव जा कर बैठकें करते हैं, लोगों से उन की इलाकाई समस्याएं पूछते हैं और उन के सामने अपनी बात रखते हैं. उन्हें व्यवस्था में बदलाव के लिए आगे आने और सही सरकार चुनने के लिए बढ़ावा देते हैं. पार्टी के दूसरे सदस्य भी इसी तरह दूरदराज के इलाकों में मीटिंग वगैरह के जरीए आमजन से संपर्क बना कर रखते हैं.’’

जनता के बीच जाने पर वे कौन से प्रमुख मुद्दे हैं जिन पर मौजूदा सरकार ने काम नहीं किया है? इस सवाल का जवाब वे कुछ यों देते हैं, ‘‘हैरानी की बात है कि इस सरकार ने सारे मुद्दे ही बदल दिए हैं. पहले चुनावी मुद्दों में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, घोटालों की बात होती थी, पर अब देश के सामने हिंदूमुसलिम अहम मुद्दा बन गया है.

‘‘इन 5 सालों में ऐसा माहौल बन गया है कि हिंदू मुसलिम को और मुसलिम हिंदू को शक की निगाहों से देखने लगा है. हमारे कार्यकर्ताओं को भी प्रचार के दौरान इस तरह के अनुभवों से गुजरना पड़ता है. मोदी सरकार ने विघटनकारी ताकतों को बल दे कर असुरक्षा का झूठा माहौल पैदा किया है.

‘‘ऐसा भरम फैलाया जा रहा है कि हिंदुओं को मुसलिमों से खतरा है. मुसलिमों ने 800 साल इस देश में राज किया. अंगरेजों ने 200 साल राज किया. तब हिंदुओं को खतरा नहीं हुआ तोअब क्या होगा. लेकिन फिर भी सरकार लोगों को बांट कर उन में दरार पैदा कर रही है.

‘‘धर्म के आधार पर जिस तरह से इस सरकार ने लोगों को बांटा है उस से देश का अहम मुद्दा ही बदल गया है. अगर किसी का हक मारा जाएगा तो वहां से विद्रोह निकलेगा ही.

‘‘दलित हो या अल्पसंख्यक, बेकुसूरों को परेशान किया जाएगा तो बेरोजगारों की फौज सड़कों पर हिंसक हो कर उतरेगी ही.

‘‘यह कैसी सरकार है जो देश के एक नागरिक को दूसरे नागरिक से लड़ा रही है? यह देश हित में नहीं है. हम व्यवस्था में बदलाव की बात कर रहे थे और आज सारा मामला ही सांप्रदायिक हो गया है. लेकिन हम फिर भी लोगों को इस बाबत जागरूक कर रहे हैं.’’

बेरोजगारी, निजीकरण के मुद्दे पर मोदी सरकार को आड़े हाथ लेते हुए अशफाक रहमान कहते हैं, ‘‘सरकार में बड़ेबड़े पद पर बैठे लोग जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं, वह शर्मनाक है. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो बेरोजगारी को ही मजाक बना दिया है. कभी वे बोलते हैं कि पकौड़े बेच लो तो कभी नाली गैस की बातें होती हैं.

‘‘बीएसएनएल जैसा बड़ा सरकारी उपक्रम फेल हो रहा है, जिओ को बढ़ावा मिल रहा है. एयर इंडिया का हाल खस्ता है. सरकार देश में निजी कंपनियों को बेचने पर उतारू है. इस तरह से देश बरबाद हो जाएगा.’’

मुसलिम और दलित समाज को ले कर हो रही सियासत पर अशफाक रहमाने कहते हैं, ‘‘देश का हर दल मुसलिमों के वोट पाने के लिए ढोंग रच रहा है. सब की साजिश यही है कि मुसलिमों और दलितों को अनपढ़ व जाहिल बना कर रखा जाए. अब तक मुसलिम समुदाय जाति या धर्म के आधार पर न तो वोट देता रहा है और न ही अपना प्रतिनिधित्व चुनता आया है. इस का फायदा नीतीश कुमार से लालू प्रसाद यादव तक सब ने उठाया.

‘‘लेकिन अगर यही हाल रहा तो आगे चल कर मुसलिम समाज भी अपनी बिरादरी का दल या नेता खोजने पर मजबूर हो जाएगा.

‘‘राजनीति में जब तक लोग जनसेवा के बजाय कमाई करने के लिए आते रहेंगे तब तक देश को सही सरकार नहीं मिल सकेगी. अगर राजनीति से कमाई करने का मकसद होता तो हमारी पार्टी में साफ इमेज के लोगों के बजाय अपराधी और दलाल होते.’’

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