असम एनआरसी मामला : 2 करोड़ 80 लाख घुसपैठिए?

असम के कामरूप जिले के चौउतारा गांव की रहने वाली आईमोना खातून नैशनल रजिस्टर औफ सिटीजंस यानी एनआरसी केंद्र में उपलब्ध सूची में अपना नाम खोजखोज कर थक चुकी है. उस का नाम तो दर्र्ज नहीं है पर उस के पति कासिम अली और 2 बेटियों जसमीना (8) व असमीना खातून (4) के नाम दर्र्ज हैं.

खातून अपनी दुखभरी दास्तां यों बयां करती है कि एनआरसी की पूरी प्रक्रिया के दौरान लाइनों में लग कर मैं ने और मेरे पति ने परिवार से संबंधित जानकारी के साथ एनआरसी के सेवा केंद्र में आवेदन जमा करवाए थे. बदले में केंद्र की ओर से हमें पक्की रसीद मिली थी.

कुछ इसी प्रकार बिहार के मधुबनी जिले के जोकहर के निवासी दिवंगत भोला शेख के 65 वर्षीय पुत्र अजहर अली 1982 में बिहार से असम आए और यहीं बस गए. इन का विवाह छयगांव की रहने वाली अमीरुन नेशा के साथ हुआ. अजहर के 2 बेटे और 3 बेटियां हैं. एनआरसी के मसौदे में अजहर की पत्नी और 2 बेटियों के नाम सूची में हैं पर इन का और इन के बेटे अजमुद्दीन अली व बेटी अनवारा बेगम के नाम सूची में नहीं हैं.

वे कहते हैं, ‘‘इस में मेरा क्या कुसूर है? मैं भारतीय नागरिक हूं और मैं ने सारे दस्तावेज जमा भी करवाए, फिर भी मेरा और मेरे बेटे व एक बेटी के नाम 40 लाख वाले संदिग्ध लोगों की सूची में रख दिए गए. दूसरी ओर देश के पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के रिश्तेदार, असम की एक महिला पूर्व मुख्यमंत्री सैयदा अनोवारा तैमूर के साथसाथ कई पूर्र्व विधायकों तथा बिहार व उत्तर प्रदेश से यहां आ कर बसने वालों में से कइयों के नाम सूची से गायब हैं.

दरअसल, बात सिर्फ 40 लाख घुसपैठियों की नहीं है. सरकार ने इन के अलावा करीब 2 करोड़ 80 लाख लोगों के सिर पर नागरिकता की तलवार लटका दी है. कहींकहीं तो हिंदू परिवार में मुसलमान व्यक्ति का नाम एकसाथ सूची में है. जिन लोगों के नाम सूची से गायब हैं वे चिंतित और घबराए हुए हैं कि अब क्या होगा.

आखिर क्यों सरकार ने इतने लोगों को नागरिकता के सवाल पर कठघरे में खड़ा कर दिया  है?

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि जिन लोगों के नाम एनआरसी में नहीं हैं वे घुसपैठिए हैं. इन से देश की सुरक्षा के लिए खतरा है. इन लोगों के कारण राज्य के संसाधनों पर काफी दबाव पड़ रहा है और राज्य के मूल नागरिक तकलीफ झेल रहे हैं.

राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर कुछ दस्तावेजों के आधार पर तैयार किया गया है. इस में यह नहीं देखा गया कि कई वैध नागरिकों के पास ये दस्तावेज न हों और अवैध नागरिकों ने नकली दस्तावेजों के आधार पर अपने नाम शामिल करवा लिए हों. इस से वैध नागरिक कठघरे में खड़े हो गए हैं.

दरअसल, असम से बंगलादेशी घुसपैठियों को खदेड़ने की मांग को ले कर अखिल असम छात्रसंघ द्वारा ऐतिहासिक असम आंदोलन चलाया गया था जिस में 855 लोगों को जानें गंवानी पड़ी थीं. बाद में 1983 में यहां के नेल्ली नरसंहार में 7 हजार लोगों के कत्लेआम जैसे जघन्य मामलों के कईर् सालों बाद राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की दूसरी सूची जारी की गई.

एनआरसी की सूची जारी होने के बाद कई लोगों ने खुशी जाहिर की तो कई गुस्से में हैं. सूची जारी होने के पश्चात असम में धीरेधीरे नफरत का जहर घुलने लगा है. हाड़तोड़ मेहनत से भूखप्यास बुझाने वाली प्रदेश की धरती क्या खून से लाल होगी. अभी तक तो सबकुछ ठीक है पर राज्य और बाहर की राजनीतिक पार्टियां वोटबैंक की सियासत का जो खेल खेल रही हैं उस में ज्यादा स्वाद भाजपा को मिल रहा है.

कब हुई शुरुआत

प्रदेश में असमिया और गैरअसमिया को ले कर 1950 से टकराव होना शुरू हुआ. पर 1971 में बंगलादेश बनने के बाद तकरीबन 10 लाख बंगलादेशी नागरिकों ने असम में शरण ली. बाद में 9 लाख बंगलादेशी नागरिक वापस अपने देश लौट गए थे. आगे चल कर चोरीछिपे बंगलादेशी नागरिकों की असम में घुसपैठ जारी रही. इसे देख कर यहां के स्थानीय लोगों को भय सताने लगा कि ये संदिग्ध नागरिक यहां कुछ भी कर सकते हैं.

संदिग्ध नागरिकों को राज्य से खदेड़ने को ले कर असम छात्र संघ (आसू) ने आंदोलन की शुरुआत की. 6 साल चले आंदोलन का खात्मा 14 अगस्त, 1985 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और आंदोलनकारी नेताओं के बीच हुई बैठक के बाद हुआ. समझौते के बाद आंदोलनकारी नेताओं ने असम गण परिषद नाम से एक राजनीतिक पार्टी बनाई और 2 बार राज्य में इन की सरकार रही पर वह सरकार भी राज्य में घुसपैठियों की रोकथाम में नाकाम रही.

असम में बांग्ला भाषा

असम में पहले बांग्ला भाषा का प्रचलन था. 1837 में ब्रिटिश सरकार ने एक कानून बना कर देश के तमाम राज्यों के न्यायालयों, स्कूलों और कालेजों में स्थानीय भाषा को लागू करने का आदेश दिया था. पर विंडबना यह रही कि असम उस समय बंगाल में शामिल था और ऐसे में असम  में असमिया भाषा के स्थान पर बांग्ला भाषा को ही लागू किया गया. हालांकि इस का विरोध आनंदराम ढेकियाल फुकन ने किया था. फुकन की मृत्यु के सालों बाद यानी 1872 में लैफ्टिनैंट गवर्नर जौर्ज केश्वेल के निर्देश के बाद असम में असमिया भाषा की शुरुआत हुई.

40 लाख कोई मामूली संख्या नहीं है. विश्व में ऐसे कई देश हैं जिन की कुल आबादी 40 लाख से भी कम है. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का दूसरा और अंतिम मसौदा जारी होने के बाद 40 लाख

7 हजार 707 लोगों के नाम लिस्ट से गायब हैं और इसी संख्या को भारतीय जनता पार्टी घुसपैठियों की संख्या मान कर चल रही है.

खुद को भारतीय साबित करने के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में प्रदेश में रहने वाले 3 करोड़ 29 लाख 91 हजार 358 लोगों ने आवेदन किए थे. 30 जुलाई को जारी की गई सूची में 2 करोड़ 89 लाख 83 हजार 668 लोगों के नाम, पते और फोटाग्राफ हैं.

इस पूर्वोत्तर राज्य असम की समस्या है कि बंगलादेशी नागरिकों को भारतीय नागरिकता मिल जाती है तो असमिया लोगों के अल्पसंख्यक होने के खतरे की घंटी बजनी शुरू हो जाएगी.

हालांकि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक एनआरसी की फाइनल सूची जारी नहीं होती तब तक किसी को घबराने की आवश्यकता नहीं है.

असली नागरिक तो कठघरे में हैं जबकि वास्तविक घुसपैठियों ने नागरिकता के दस्तावेज बना लिए. मूल नागरिकों के साथ दस्तावेज जमा कराने की व्यावहारिक दिक्कतें हो सकती हैं. 1971 के बाद अगर भारत के किसी हिस्से से कोई नागरिक असम चला गया और वह वहां इतने सालों में कई घर बदल चुका हो तब क्या उस के पास रिहाइश का कोई सुबूत मिल सकता है?

आधार कार्ड आने से पहले ये लोग क्या प्रमाण देंगे. अगर कोई नागरिक अपने मूल गांव, कसबे या शहर भी लौट कर अपनी नागरिकता का कोई प्रमाण असम से चल कर लेने आएगा तो उसे कम से कम 10 दिन लगेंगे. ऐसे में वह एनआरसी की सूची में कैसे शामिल हो सकता है.

5 हजार रुपए दो, एनआरसी लो

असम में रहने वाले हिंदीभाषियों का एक संगठन है, पूर्वोत्तर हिंदुस्तानी सम्मेलन. इस का मुख्य कार्यालय गुवाहाटी स्थित फैंसी बाजार में है. सम्मेलन ने बाकायदा अखबारों में विज्ञापन दे कर कहा कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में नाम दर्ज कराने के लिए आजीवन सदस्य और साधारण सदस्य होना जरूरी है. साधारण सदस्यों के लिए 100 रुपए और आजीवन सदस्यों के लिए 5 हजार रुपए फीस है. ये पैसे संगठन के बैंक खाते में जमा कराने होते हैं. इस के बाद एनआरसी में नाम शामिल कराने का काम शुरू किया जाता है.

40 लाख में सब घुसपैठिए नहीं

प्रदेश की एनआरसी की सूची से बाहर 40 लाख लोगों में सब घुसपैठिए नहीं हैं. एनआरसी के प्रदेश समन्वयक प्रतीक हजेला का कहना है कि सभी नागरिकों को भारतीयता साबित करने का एक और मौका दिया जाएगा, ताकि अंतिम सूची तैयार कर के घुसपैठियों का असली आंकड़ा सामने रखा जा सके. पर इस के पहले लोकसभा में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सूची से बाहर किए गए 40 लाख से अधिक लोगों को घुसपैठिया करार दिया था.

एनआरसी में घुसपैठियों के नाम

30 जुलाई को जारी एनआरसी में दर्ज प्रदेश के मोरीगांव जिले के 39 परिवारों के 200 सदस्य बंगलादेशी हैं, लेकिन इन सभी का नाम एनआरसी की सूची में शामिल है. विदेशी न्यायाधिकरण में चल रहे मामले को छिपाने और गलत पते दे कर इन घुसपैठियों ने एनआरसी की सूची में अपना नाम दर्ज करवा लिया.

दरअसल, घुसपैठियों की समस्या भारत में ही नहीं है, बदलते हुए सामाजिक, आर्थिक माहौल में दुनियाभर में गरीबी, भुखमरी, बेकारी के चलते और सब से बड़ा कारण आतंकवाद के प्रभाव के चलते करोड़ों लोग विस्थापित हो रहे हैं. ये लोग अपनी बेहतरी के लिए निकटवर्ती देशों में शरण के लिए घुस रहे हैं. कहींकहीं सरकारें इन्हें शिविरों में रख रही हैं तो कहीं इन्हें नागरिकता दे कर अपने देश के समान नागरिकों की तरह अधिकार प्रदान करती हैं.

पिछले एक दशक से अफगानिस्तान, इराक, सीरिया युद्ध के दौरान हजारों लोग देश छोड़ने को मजबूर हुए. इन लोगों के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, जरमनी जैसे देशों ने अपनी सीमाएं खोल दीं. हर व्यक्ति को हवा में सांस लेने, पानी पीने, घूमनेफिरने का जो प्राकृतिक अधिकार है, लोकतंत्रों का भी तकाजा है कि यही प्राकृतिक हक सब को मिले, चाहे नागरिकता प्राप्त हो या न हो.

भारत दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र है पर अफसोस है कि यहां की केंद्र सरकार धर्म, जाति के आधार पर राजनीतिक नफानुकसान वाली नीतियों पर चल रही है.

एक लोकतांत्रिक देश का दायित्व है कि वह बिना नस्ल, धर्म, जाति, भाषा का भेद किए नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराए लेकिन सरकार इस मामले में हिंदूमुसलमान का खेल खेल रही है. भाजपा शुरू से ही बंगलादेशी मुसलमानों का विरोध करती रही है. उधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत कांग्रेस इन तथाकथित बंगलादेशी लोगों का बचाव करती आई हैं.

भाजपा इन मुसलमानों के नाम पर ममता बनर्जी और कांग्रेस दोनों पर हमले साध रही है और देश में यह संदेश देना चाहती है कि बंगलादेशी मुसलमानों की वजह से देश के नागरिकों के लिए संसाधनों का अभाव हो रहा है.

हमारे यहां नेताओं और धर्मगुरुओं द्वारा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ जैसी अच्छी बातों के प्रवचन दिए जाते हैं पर हकीकत में हम धार्मिक, जातीय, भाषायी, क्षेत्रीयता की संकीर्ण सोच से गहरे तक ग्रस्त हैं. हम ने धर्म द्वारा बताई गईर् तमाम संकीर्णता को अपना लिया है.

समाज का दोहरापन हर जगह झलकता है. विदेशियों को शरण देना छोड़ हमारे यहां तो अपने लोगों को ही निर्वासित किया जाता रहा है. हिंदू धर्म के नियम के अनुसार बालविधवाओं को खुद अपने घर से निर्वासित कर दिया जाता है. आज वाराणसी, वृंदावन, इलाहाबाद, हरिद्वार में हजारों विधवाएं हिंदू धर्म के आदेशों का दंश झेल रही हैं.

हमारे अपने सैनिक विदेशी दुश्मनों से नहीं, अपनों से ही लड़ते हुए मारे जा रहे हैं.

किसी भी सरकार को यह हक नहीं है कि वह अपने ही देश के नागरिकों से उस की नागरिकता का सुबूत मांगे, उसे नागरिकता के कठघरे में खड़ा करे. देश के सभी हिस्सों में आज लाखों ऐसे लोग हैं जिन के पास सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार, बेईमानी, निकम्मेपन के चलते राशनकार्ड, वोटर आईकार्ड, आधारकार्ड नहीं हैं कि जिन्हें वे रिहाइश के सुबूत के तौर पर दिखा सकें.

दुनिया आज ग्लोबल विलेज के तौर पर जानी जाती है. गरीबी, भुखमरी, बेकारी और धर्म के मारे पड़ोसी देशों से कुछ लोग इधर से उधर आजा रहे हैं. ऐसे में भारत को उदारता दिखाते हुए उन्हें अपने यहां अपना लेना चाहिए. इस मानव श्रम का सदुपयोग करने की नीतियां अब विश्व के देशों को सीखनी चाहिए. धर्म के नाम पर नफरत पैदा कर के राजनीतिक फायदा उठाने की सोच को त्यागने से ही देश व समाज का भला होगा.

(साथ में जगदीश पंवार)

इज्जत की खातिर चुना गलत रास्ता

बस्ती-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग स्थित बस्ती जिले के थाना कोतवाली क्षेत्र के बड़ेवन फ्लाईओवर पर भारी वाहनों का आनाजाना जारी था. इसी फ्लाईओवर से पश्चिम में अमहट पुल के पास सैकड़ों तमाशबीन एकत्र थे. सड़क के दूसरी ओर एक 21-22 साल के युवक की लाश पड़ी हुई थी, जिसे देख कर लग रहा था कि शायद किसी वाहन से टकराने से दुर्घटना हुई है.

मौके पर जुटी भीड़ मृतक की शिनाख्त करने की कोशिश कर रही थी. लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान पा रहा था. भीड़ में से किसी ने 100 नंबर पर फोन कर के घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी थी.

पुलिस कंट्रोलरूम से वायरलेस के जरिए घटना की सूचना प्रसारित कर दी गई. वह इलाका थाना कोतवाली में पड़ता था. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर जा पहुंचे थे.

पुलिस ने घटनास्थल पर जुटी भीड़ से शव की शिनाख्त कराई, लेकिन कोई भी मृतक को नहीं पहचान सका. पुलिस ने लाश का गौर से मुआयना किया. लाश की दशा देख कर थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह को ऐसा नहीं लगा कि उस युवक की मौत मार्ग दुर्घटना में हुई है.

क्योंकि मृतक के शरीर पर कहीं भी खरोंच के निशान तक नहीं थे, जबकि दुर्घटना में लाश की स्थिति भयावह हो जाती है. यही बात संदेह पैदा कर रही थी. मृतक के सिर के पीछे चोट लगी थी, जिसे देख कर ऐसा लग रहा था कि मृतक की हत्या कहीं और कर के हत्यारों ने लाश यहां फेंकी हो.

लाश की जामातलाशी लेने पर उस की पैंट की जेब से आधार कार्ड बरामद हुआ. आधार कार्ड मृतक का ही था, उस पर उस का नाम विवेक चौहान पुत्र शिव गोविंद चौहान निवासी बरगदवां, चिल्लुपार, गोरखपुर लिखा था.

शव की शिनाख्त हो जाने से पुलिस ने थोड़ी राहत की सांस ली. लेकिन पुलिस ने यह बात पक्की कर ली थी कि युवक की हत्या कहीं और कर के हत्यारों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश यहां फेंक दी थी.

पुलिस ने लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. उस के बाद थाना लौट कर विजयेंद्र सिंह ने कागजी काररवाई कराई. तब तक आधा दिन बीत गया था. यह घटना 10 मार्च, 2018 की सुबह की थी.

थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह को काम से जैसे ही थोड़ी फुरसत मिली, वैसे ही एक फरियादी आ गया. फरियादी का नाम विजयपाल चौहान था. विजयपाल के साथ 2 अन्य लोग भी आए थे. वे इसी थाने के मूड़ाघाट गांव के रहने वाले थे. बातचीत में पता चला कि विजयपाल की बेटी किरन, बीती रात से रहस्यमय तरीके से गायब थी.

10 मार्च की सुबह जब किरन घर में कहीं दिखाई नहीं दी तो सब परेशान हो गए. पूरा घर छान मारा गया. पड़ोसियों के घर जा कर पता लगाया गया, लेकिन किरन का कहीं पता नहीं चला.

जवान बेटी के इस तरह अचानक रहस्यमय ढंग से गायब हो जाने से पूरा परिवार परेशान था. विजयपाल चौहान बडे़ बेटे गोलू उर्फ शंभू और छोटे भाई जनार्दन के साथ बेटी की गुमशुदगी की फरियाद ले कर कोतवाली थाना पहुंचा.

विजयपाल चौहान की बात सुन कर थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह चौंके. उन्होंने विजयपाल चौहान से गुमशुदगी की तहरीर ले कर उसे घर भेज दिया. पुलिस ने किरन की गुमशुदगी दर्ज कर के आगे की काररवाई शुरू कर दी.

शाम को कोतवाली पुलिस को हाइवे से सटे पुराने आरटीओ कार्यालय के पास खेत में एक युवती की लाश पड़ी होने की सूचना मिली. उस की हत्या ईंट मारमार कर की गई थी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. 2-2 लाशें मिलने से शहर में सनसनीफैल गई थी.

युवती की लाश के पास काफी लोग एकत्र थे. देखने से युवती 19-20 साल की लग रही थी. लाश की स्थिति से ऐसा लगता था जैसे युवती की हत्या कहीं और कर के हत्यारों ने लाश ठिकाने लगाने के लिए यहां ला कर फेंकी हो. फ्लाईओवर के पास सुबह मिली लाश की दशा जैसी ही हालत इस लाश की भी थी.

पुलिस ने लाश का मुआयना किया. मृतका के दोनों पैरों की चप्पलें लाश से थोड़ी दूरी पर इधरउधर पड़ी थीं. हत्यारों ने सिर पर ईंट मारमार कर उसे मौत के घाट उतारा था. ऐसी ही चोट सुबह मिली युवक की लाश के सिर पर मौजूद थी. पुलिस सोच रही थी कि कहीं दोनों लाशों का आपस में कोई संबंध तो नहीं है.

चप्पलें मृतका की ही थीं. पुलिस ने बतौर साक्ष्य चप्पलों को कब्जे में ले लिया. इस के बाद पुलिस और सबूत ढूंढने में जुट गई. इसी बीच भीड़ में से एक युवक ने लाश को पहचान लिया. उस ने बताया कि लाश मूड़ाघाट के रहने वाले विजयपाल चौहान की बेटी किरन की है.

इतना ही नहीं उस युवक ने कोतवाल विजयेंद्र सिंह को एक ऐसी जानकारी दी, जिसे सुनते ही वे उछल पडे़. युवक ने बताया कि सुबह के समय फ्लाईओवर के पास जिस विवेक चौहान की लाश बरामद हुई थी, वह मृतका किरण का प्रेमी था.

यह सुन कर विजयेंद्र सिंह को समझते देर नहीं लगी कि दोनों हत्याओं के पीछे जरूर विजयपाल चौहान का ही हाथ रहा होगा. वह यह भी समझ गए कि यह मामला प्रेमप्रसंग से जुड़ा हुआ है और विजयपाल को पूरे मामले की जानकारी होगी.

विजयेंद्र सिंह ने 2 सिपाहियों को मूड़ाघाट भेज कर लाश की शिनाख्त कराने के लिए विजयपाल को मौके पर बुलवा लिया. विजयपाल के साथ उन का बेटा और छोटा भाई भी साथसाथ आए थे. विजयपाल युवती को देख कर पहचान गए, वह उन की बेटी किरन चौहान थी जो बीती रात रहस्यमय तरीके से गायब थी.

लाश देख कर विजयपाल चौहान, उन का बेटा और छोटा भाई दहाड़ मार कर रोने लगे. पुलिस ने उन्हें किसी तरह शांत कराया. लाश का पंचनामा भर कर पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. विजयेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ थाने लौट आए. पुलिस ने किरन की गुमशुदगी को हत्या की धारा (302) में तरमीम कर दिया, जिस में अज्ञात हत्यारों को आरोपी बनाया गया.

मौकाएवारदात पर पुलिस को जो सूचना मिली थी, वह उस ने गोपनीय रखी ताकि घटना के असल कारणों का पता लगा कर मुलजिमों को आसानी से सलाखों के पीछे पहुंचाया जा सके. थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह ने विजयपाल को कानोंकान भनक नहीं लगने दी कि वे घटना की तह तक पहुंच गए हैं.

अगले दिन पुलिस को विवेक चौहान की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. रिपोर्ट में मौत की वजह हैड इंजरी बताया गया था. हत्यारों ने किसी नुकीली और वजनदार चीज से वार कर के उसे मौत के घाट उतारा था. यही नहीं हत्यारों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए विवेक की लाश को फ्लाईओवर के पास फेंक दिया था, ताकि पुलिस इसे दुर्घटना मान ले और हत्यारे साफ बच निकलें.

विवेक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट और किरन की हत्या को ले कर सीओ (सदर) पवन कुमार गौतम काफी सक्रिय थे. दोहरे हत्याकांड की निगरानी सीओ गौतम ही कर रहे थे. पुलिस ने हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए किरन के मोबाइल की काल डिटेल्स निकवाई.

काल डिटेल्स से पता चला कि उस ने सब से ज्यादा फोन एक ही नंबर पर किए थे. उसी नंबर पर 9 मार्च, 2018 की रात 10 बजे के करीब भी किरन की बात हुई थी.

वह नंबर विवेक का निकला. जांच में यह भी पता चला कि विवेक विजयपाल के साढ़ू का बेटा था. विवेक और किरन मौसेरे भाईबहन थे. फिर भी उन के बीच सालों से प्रेमसंबंध था.

9 मार्च की रात विवेक चौहान को मूड़ाघाट गांव में देखा गया था. वह अपने मौसा के घर आया था. उस के बाद से वह गायब था. अगले दिन उस की लाश बरामद हुई थी. पुलिस के लिए यह सूचना पर्याप्त थी. इस से पुलिस का यह शक यकीन में तब्दील हो गया कि इस घटना में विजयपाल चौहान और उस के परिवार का ही हाथ है.

विजयेंद्र सिंह ने किरन की हत्या के संबंध में पूछताछ के लिए विजयपाल, उस के बेटे गोलू उर्फ शंभू और छोटे भाई जनार्दन को थाने बुलवा लिया.

सीओ (सदर) पवन कुमार गौतम थाने में पहले से मौजूद थे. थानाप्रभारी ने विजयपाल से सवाल किया, ‘‘क्या बता सकते हो कि कल फ्लाईओवर के पास जो लाश बरामद हुई थी, किस की थी?’’

‘‘साहब, मुझे क्या पता वो किस की लाश थी?’’ विजयपाल चौहान ने गंभीरता से जवाब दिया.

‘‘सच कहते हो तुम, भला तुम्हें कैसे पता होगा कि वह लाश किस की थी. तुम्हें तो उस के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है.’’

‘‘हां साहब, सचमुच मुझे उस लाश के बारे में कोई जानकारी नहीं है और न ही मैं उसे पहचानता हूं.’’ विजयपाल ने उत्तर दिया.

‘‘ठीक है, कोई बात नहीं चलो मैं ही तुम्हारी कुछ मदद कर देता हूं.’’ विजयेंद्र सिंह ने व्यंग्य कसते हुए कहा, ‘‘किसी विवेक चौहान उर्फ रामू को जानते हो?’’ विजयपाल से सवाल कर के उन्होंने उस के चेहरे पर अपनी तीखीं नजरें गड़ा दीं. उन की सवालिया नजरों को देख कर विजयपाल एकदम से सकपका गया.

‘‘साहब, आप तो मुझे ऐसे देख रहे हैं, जैसे मैं ने ही उस की हत्या की है.’’ विजयपाल बोला.

‘‘हम ने कब कहा कि तुम ने उस की हत्या नहीं की है.’’ इस बार सीओ गौतम बोले, ‘‘भलाई इसी में है कि तुम अपना जुर्म कबूल कर लो और सचसच बता दो कि तुम ने विवेक की हत्या क्यों की? वादा करता हूं, मैं सरकार से सिफारिश करूंगा कि तुम्हें कम से कम सजा हो.’’

‘‘हां, साहब. मैं ने ही रामू की हत्या की है.’’ विजयपाल सीओ (सदर) के पैरों को पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘साहब मुझे माफ कर दीजिए, मुझे बचा लीजिए, मैं ऐसा नहीं करना चाहता था, लेकिन हालात से मजबूर हो कर मुझे यह कदम उठाना पड़ा. रामू ने मेरी इज्जत की बखिया उधेड़ कर रख दी थी. लाख समझाने के बावजूद भी वह मेरी बेटी का पीछा नहीं छोड़ रहा था. उस दिन तो उस ने हद ही कर दी और…’’ भावावेश में आ कर विजयपाल चौहान पूरी कहानी सुनाता चला गया.

विजयपाल चौहान द्वारा अपना जुर्म कबूल कर लेने के बाद उस के बेटे गोलू उर्फ शंभू और भाई जनार्दन ने भी अपनाअपना गुनाह कबूल कर लिया. दोनों ने स्वीकार किया कि विवेक और किरन की हत्या में उन्होंने विजयपाल का साथ दिया था. 36 घंटे के भीतर जिले को दहला देने वाली 2-2 सनसनीखेज हत्याओं का पर्दाफाश हो चुका था.

विवेक किरन हत्याकांड के परदाफाश पर पुलिस कप्तान नरेंद्र कुमार सिंह ने पुलिस टीम को 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की. पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत के सामने पेश कर के उन्हें जेल भेज दिया. आरोपियों से की गई पूछताछ के आधार पर कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

विजयपाल के परिवार में कुल 5 सदस्य थे. पतिपत्नी और 3 बच्चे. 3 बच्चों में 2 बेटे थे गोलू उर्फ शंभू और गुलाब तथा एक बेटी थी किरन, जिस की उम्र 20 वर्ष थी. विजयपाल प्राइवेट नौकरी करता था. तीनों संतानों में किरन दूसरे नंबर की औलाद थी. किरन चंचल और हंसमुख स्वभाव की युवती थी. वह बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ रही थी. गांव से कालेज वह साइकिल से जाती थी.

किरन की मौसी परिवार सहित गोरखपुर के बड़हलगंज के चिल्लुपार विधानसभा के बरगदवा में रहती थी. उस का एक ही एकलौता बेटा रामू उर्फ विवेक था. विवेक 21-22 साल का गबरू जवान था. साढ़े 5 फीट लंबा और स्मार्ट.

विवेक की अपनी कोई बहन नहीं थी. रक्षाबंधन के अवसर पर उसे बहन की कमी काफी खलती थी. विवेक की मां से बेटे की मायूसी देखी नहीं जाती थी. इसलिए विवेक की मां सुमन अपनी बड़ी बहन की बेटी किरन को रक्षाबंधन पर अपने यहां बुला लेती थी. किरन विवेक की कलाई पर राखी बांध कर अपने घर लौट आती थी. ऐसा हर साल होता था.

किरन और विवेक करीबकरीब हमउम्र थे. भाईबहन के रिश्ते के नाते दोनों के बीच काफी नजदीकियां थीं, विवेक जब भी किरन को देखता था, ख्ुशी के मारे उस का दिल बागबाग हो उठता था. किरन भी विवेक को देख कर खुश हो जाती थी.

गतवर्ष रक्षाबंधन के मौके पर विवेक ने मौसेरी बहन किरन को तोहफे में एक मोबाइल फोन दिया था. जब भी विवेक का मन किरन से बात करने का होता था, वह फोन कर लेता था और जब देखने की इच्छा होती तो बस्ती जा कर किरन से मिल आता था.

आतेजाते, मिलतेजुलते और बात करतेकराते दोनों के बीच बहनभाई का रिश्ता कब प्यार में बदल गया, न किरन जान सकी और न विवेक. उन्हें तब होश आया जब दोनों एक दूसरे के बिना तड़पने लगे. बिना एकदूसरे को देखे, बिना बात किए दोनों को चैन नहीं मिलता था. जल्दी ही दोनों समझ गए कि उन्हें एक दूसरे से प्यार हो गया है.

विवेक का हाल भी कुछ ऐसा ही था. वह मोबाइल स्क्रीन पर किरन की तसवीर देखदेख कर जीता था. उस की तसवीरों से बात कर के अपना मन बहलाता था.

नजदीकियों के चलते जल्दी ही दोनों ने एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खा लीं और शादी करने के सपने भी बुनने लगे. दोनों यह भी भूल गए कि रिश्तों की वजह से उन के सपने कभी हकीकत का रूप नहीं ले सकते.

वे दोनों पारिवारिक रिश्तों की जिस डोर में बंधे थे, उस डोर को न तो परिवार टूटने दे सकता था और न समाज. विजयपाल तो वैसे ही मानसम्मान के मामले में और भी ज्यादा कट्टर था. वह इस रिश्ते को किसी भी हालत में कबूल नहीं कर सकता था. क्योंकि विवेक विजयपाल के लिए बेटे जैसा था.

दोनों तरफ मोहब्बत की आग बराबर लगी हुई थी. जब से विवेक को किरन से मोहब्बत हुई थी. उस का मूड़ाघाट जानाआना कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था. विजयपाल और उस के दोनों बेटों ने भी इस बात को महसूस किया था. ये बात उन की समझ से परे थी कि विवेक इतनी जल्दीजल्दी क्यों आता है. जब भी वह आता था किरन से चिपका रहता था. दोनों आपस में धीरेधीरे बातचीत करते रहते थे.

विजयपाल को अपनी बेटी किरन और साढ़ू के बेटे विवेक के रिश्तों को ले कर कुछ संदेह हो गया था. वह दोनों की बात छिपछिप कर सुनने लगा. जल्दी ही उस का संदेह यकीन में बदल गया. पता चला दोनों के बीच नाजायज संबंध बन गए हैं. हकीकत जान कर विजयपाल और उस के दोनों बेटों का खून खौल उठा.

विजयपाल ने पत्नी को अप्रत्यक्ष तरीके से समझाया कि विवेक से कह दे यहां न आया करे. उस की नीयत में खोट आ गया है. इसी के साथ उस ने ये भी कहा कि वह बेटी पर ध्यान दे. उस के पांव बहक रहे हैं. हाथ से निकल गई या कोई ऊंचनीच कर बैठी तो समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. इसलिए उसे विवेक के करीब जाने से मना कर दे.

किरन की मां शर्मिली ने समझदारी का परिचय देते हुए यह बात बेटी को सीधे तरीके से न कह कर अप्रत्यक्ष ढंग से समझाई. वह जानती थी कि बेटी सयानी हो चुकी है, सीधेसीधे बात करने से उसे बुरा लग सकता है. वैसे भी किरन जिद्दी किस्म की लड़की थी, जो ठान लेती थी वही करती थी.

किरन मां की बात समझ गई थी कि वह क्या कहना चाहती हैं. लेकिन उस के सिर पर तो विवेक के इश्क का भूत सवार था. उसे विवेक के अलावा किसी और की बात समझ में नहीं आती थी. उस के अलावा कुछ नहीं सूझता था. किरन ने मां से साफसाफ कह दिया कि वह विवेक से प्यार करती है और उसी से शादी भी करेगी. चाहे कुछ हो जाए, वह अपना कदम पीछे नहीं हटाएगी.

किरन किसी भी तरह अपने मांबाप की बात मानने को तैयार नहीं हुई. बात जब हद से आगे निकलने लगी तो शर्मिली ने अपनी बहन सुमन को फोन कर के पूरी बात बता दी. सुमन बेटे की करतूत सुन कर हैरान रह गई, लज्जित भी हुई. सुमन ने विवेक को समझाया कि ऐसा घिनौना काम कर के तो वह उन्हें जिंदा ही मार डालेगा. जो हुआ सो हुआ, अब आगे किरन से कोई बात नहीं होनी चाहिए.

विवेक और किरन जान चुके थे कि उन के प्यार के बारे में दोनों के घर वालों को पता लग चुका है. दोनों परिवार इस रिश्ते को किसी भी तरह स्वीकार नहीं करेंगे, इस बात को ले कर विवेक काफी परेशान रहने लगा था.

9 मार्च, 2018 की बात है. विवेक घर में बिना किसी को बताए किरन से मिलने बस्ती मूड़ाघाट पहुंच गया. विवेक को देख कर किरन की जान में जान आ गई. लेकिन उस के आने से न तो उस की मौसी शर्मिली खुश थी, न मौसा विजयपाल और न ही उन के दोनों बेटे. वे उसे दरवाजे से भगा भी नहीं सकते थे. लेकिन वे उसे ले कर सतर्क जरूर हो गए. उन की नजर किरन पर जमी थी. यह बात किरन और विवेक जान चुके थे, इसलिए वे खुद भी सतर्क हो गए  थे. दोनों किसी भी तरह की गलती नहीं करना चाहते थे.

बात 9 मार्च की रात 10 बजे की है. किरन को विवेक उर्फ रामू ने फोन कर के घर के पिछवाड़े खेत में बुलाया था. घर के सभी लोग खाना खा कर अपनेअपने कमरे में सोने चले गए थे. घर में चारों ओर सन्नाटा फैला था. बरामदे में कोई दिखाई नहीं दिया तो उसे विश्वास हो गया कि सब लोग सो गए है.

विवेक को घर से गए काफी समय हो गया था. वह किरन के आने का इंतजार कर रहा था. किरन भी विवेक के पास जाने के लिए व्याकुल थी. दबे पांव वह घर से खेत की ओर निकल गई. उस का छोटा भाई गुलाब अभी सोया नहीं  था. जैसे ही किरन घर से निकली, छोटे भाई गुलाब ने उसे बाहर जाते देख लिया और यह बात पिता विजयपाल को बता दी.

बेटे के मुंह से हकीकत सुन कर विजयपाल का खून खौल उठा. उस ने बड़े बेटे गोलू और छोटे भाई जनार्दन को उठाया. विजयपाल ने हाथ में टौर्च ले ली और तीनों किरन की तलाश में निकल पड़े. वे लोग यह देखना चाहते थे कि इतनी रात गए किरन अकेले कहां जा रही है.

किरन को ढूंढतेढूढंते वे मूड़ाघाट बाईपास स्थित पट्टीदार के खेत पर जा पहुंचे. उस समय रात के 12 बजे होंगे. किरन और विवेक दोनों आपत्तिजनक स्थिति में मिले. ये देखते ही तीनों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

गुस्साए विजयपाल ने विवेक को पकड़ लिया और उन लोगों ने बगल में रखी ईंट से विवेक के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर के उसे मौत की नींद सुला दिया.

इसी दौरान किरन अपने प्रेमी विवेक की जान बचाने के लिए उन से उलझ गई. इस से उन का क्रोध और बढ़ गया. बाद में उन्होंने किरन के सिर पर ईंट से वार करकर के उसे भी मार डाला.

दोनों को मौत के घाट उतारने के बाद जब वे लोग होश में आए तो अंजाम से डर गए. सोचविचार कर तीनों ने मिल कर विवेक की हत्या को हादसा बनाने के लिए उसी रात फ्लाईओवर के पास उस की लाश खेत में फेंक कर लौट आए. उन्होंने किरन की लाश खींच कर सरसों के खेत में डाल दी थी.

इन लोगों ने कानून की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की, लेकिन उन की चालाकी धरी रह गई. आखिरकार पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड का राजफाश कर ही दिया. कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपी जेल में बंद थे. पुलिस ने तीनों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अपहरण का नया स्टाइल

राजीव कुमार नोएडा स्थित एचसीएल कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर थे. वैसे वह हरिद्वार के अंतर्गत नंदग्राम के मूल निवासी थे. उन की नौकरी नोएडा में थी इसलिए वह पत्नी और बच्चों के साथ नोएडा में ही रह रहे थे. उन के बच्चों के स्कूल की छुट्टियां चल रही थीं. पत्नी और बच्चे नंदग्राम (हरिद्वार) गए हुए थे.

बीवीबच्चों के चले जाने के बाद राजीव नोएडा स्थित अपने फ्लैट पर अकेले रह गए थे. 24 मई को राजीव कुमार का जन्मदिन था. उन्होंने जन्मदिन अपने बीवीबच्चों के साथ नंदग्राम में मनाने का प्रोग्राम बनाया. उन्होंने सोचा कि 23 मई को ड्यूटी करने के बाद वह सीधे हरिद्वार के लिए निकल जाएंगे.

उन्होंने यही किया भी. 23 मई को ड्यूटी खत्म होने के बाद वह कंपनी की कैब से नोएडा से गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन पहुंच गए. यहां से उन्हें बस द्वारा हरिद्वार जाना था. लिहाजा वह वहीं पर खड़े हो कर हरिद्वार जाने वाली बस का इंतजार करने लगे.

वहां खड़ेखडे़ उन्हें काफी देर हो गई लेकिन हरिद्वार जाने वाली कोई बस नहीं आई. वह परेशान थे कि घर कैसे पहुंचेंगे. रात करीब सवा 12 बजे उन के सामने एक कार आ कर रुकी. कार का चालक हरिद्वार जाने की आवाज लगाने लगा. साथ ही वह वहां मौजूद लोगों से हरिद्वार जाने के बारे में पूछने भी लगा.

ड्राइवर ने जब राजीव से हरिद्वार जाने के बारे में पूछा तो उन्होंने पहले तो मना कर दिया. लेकिन जब कार की तरफ देखा तो उन्हें पहले से ही कुछ सवारियां बैठी दिखाई दीं. इस से राजीव को तसल्ली हो गई कि यदि वह कार से जाएं तो वह अकेली सवारी नहीं होंगे. साथ में दूसरी सवारी भी रहेंगी. इस के बाद वह उस कार में बैठ गए.

राजीव कार की पिछली सीट पर बैठे थे. उन के अगलबगल भी सवारियां थीं. कार चलने के बाद राजीव ने सोचा कि वह 3 साढ़े 3 घंटे में हरिद्वार पहुंच जाएंगे. अभी कार गाजियाबाद से कुछ दूर ही पहुंची थी कि राजीव के पास बैठे व्यक्तियों ने उन के ऊपर काला कपड़ा डाल कर चाकू सटाते हुए चेतावनी दी, ‘‘ज्यादा होशियार बनने की जरूरत नहीं है. चुपचाप ऐसे ही बैठे रहो, वरना अपनी जान गंवा बैठोगे.’’

राजीव समझ गए कि वह बदमाशों के चंगुल में फंस चुके हैं. उन हथियारबंद बदमाशों से वह अकेले मुकाबला नहीं कर सकते थे. लिहाजा उन्होंने बदमाशों से बड़े प्यार से कहा, ‘‘देखिए मेरा हरिद्वार पहुंचना बहुत जरूरी है. आप लोगों को मुझ से जो कुछ चाहिए ले लो, लेकिन मुझे छोड़ दो.’’

इस के बाद एक बदमाश ने राजीव की तलाशी ले कर उन का फोन और पर्स अपने कब्जे में ले लिया. पर्स में कुछ रुपए थे. दोनों चीजें अपने पास रखते हुए एक बदमाश बोला, ‘‘हम तुम्हें छोड़ तो देते लेकिन हमें जितने रुपए चाहिए, उतने तुम्हारे पर्स में नहीं हैं. यदि उतने पैसे हमें मिल जाएं तो हम तुम्हें छोड़ देंगे.’’

‘‘बताइए, आप को कितने पैसे चाहिए.’’ राजीव ने पूछा.

‘‘हमें 15 लाख रुपए चाहिए.’’ चलती कार में ही बदमाश बोला.

‘‘यह तो बहुत ज्यादा है. हमारी हैसियत इतने पैसे देने की नहीं है.’’ राजीव कुमार बोले.

‘‘तुम इस की चिंता मत करो. पैसे कहां से और कैसे आने हैं, इस बात को हम अच्छी तरह से जानते हैं. तुम खुद देखना कि तुम्हारे घर वाले हमारे पास पैसे किस तरह पहुंचाएंगे.’’ बदमाश बोला.

रात में सड़कों पर वह कई घंटे तक कार को घुमाते रहे, फिर वे राजीव को एक कमरे में ले गए और उन के हाथपैर बांध कर एक बोरे में बंद कर दिया. फिर बोरे को कमरे में रखी सेंट्रल टेबल के नीचे डाल दिया. इस से पहले बदमाशों ने राजीव से उन के घर वालों के फोन नंबर हासिल कर लिए थे. बदमाशों ने जिस इलाके में राजीव को बंधक बना कर रखा था, उन्होंने वहां से कहीं दूर जा कर राजीव के फोन से ही उन की पत्नी को फोन किया.

पत्नी को पता नहीं था कि उन के पति का अपहरण कर लिया गया है. इसलिए वह अपने फोन की स्क्रीन पर पति का नाम देखते ही बोलीं, ‘‘कैसे हो और घर कब तक पहुंचोगे?’’

‘‘वो घर पर अभी नहीं पहुंचेंगे. राजीव अब हमारे कब्जे में हैं. अगर तुम लोग उन्हें चाहते हो तो हमें 15 लाख रुपए दे दो.’’ बदमाश बोला.

‘‘आप कौन हैं और कहां से बोल रहे हैं.’’ पत्नी ने घबराते हुए पूछा.

‘‘तुम हमारा इतिहास जानने की कोशिश मत करो. जितना कह रहे हैं, समझ जाओ और पैसों का इंतजाम कर लो. बाकी बात मैं वाट्सऐप से करूंगा.’’ कह कर बदमाश ने काल डिसकनेक्ट कर दी.

पति के अपहरण की बात सुनते ही राजीव की पत्नी परेशान हो गईं. उन्होंने फोन कर के पति के अपहरण की बात अपने ससुरालियों और मायके वालों को बता दी. इस के बाद घर के सभी लोग बहुत परेशान हो गए. अपहर्त्ताओं ने फोन कर के 15 लाख रुपए का इंतजाम करने की बात कही थी. पैसे कहां पहुंचाए जाएं, यह उन्होंने नहीं बताया था.

चूंकि अपहर्त्ता ने वाट्सऐप द्वारा बात करने को कहा था, इसलिए राजीव की पत्नी ने पति के फोन पर वाट्सऐप मैसेज भेज कर पूछा, ‘‘मेरे पति कैसे हैं, क्या उन से हमारी बात हो सकती है. उन का एक फोटो भी भेज दीजिए.’’

‘‘वो बिलकुल ठीक हैं. तुम लोगों ने पैसों का इंतजाम किया या नहीं.’’ अपहर्त्ता ने कहा.

‘‘हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं.’’ राजीव की पत्नी ने कहा.

‘‘ठीक है मैं एक वीडियो भेजूंगा. उस के बाद खुद ही फैसला करना कि क्या करना है.’’ अपहर्त्ता ने कहा.

इस के बाद अपहर्त्ता ने राजीव को बोरे से बाहर निकाल कर उन की पिटाई करनी शुरू कर दी. दूसरे बदमाश ने पिटाई का वीडियो बना लिया. अपहर्त्ता ने राजीव से यह भी कहा कि तुम्हारे घर वालों को शायद तुम्हारी फिक्र नहीं है. इसलिए वे पैसे नहीं दे रहे. यह वीडियो देख कर शायद उन्हें तुम्हारी चिंता हो जाए.

अपहर्त्ता ने राजीव की पिटाई वाली वीडियो उन के घर वालों को वाट्सऐप कर दी. वीडियो देख कर घर वालों का दिल कांप उठा कि वे लोग कितनी बेदर्दी से राजीव की पिटाई कर रहे थे. अब घर वालों ने तय कर लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए वह उन्हें उन के चंगुल से छुड़ाने की कोशिश करेंगे वरना इस तरह तो वह लोग उन की जान ही ले लेंगे.

इस के तुरंत बाद राजीव की पत्नी ने पति के मोबाइल पर वाट्सऐप मैसेज भेजा, ‘‘आप इन से कुछ मत कहिए, अभी हमारे पास जितने भी पैसे हैं, हम आप को देने को तैयार हैं, बताइए पैसे कहां पहुंचाए जाएं.’’

दूसरी तरफ से अपहर्त्ता ने भी मैसेज भेजा, ‘‘आप पैसे राजीव कुमार के ही बैंक अकाउंट में जमा करा दीजिए.’’ तब राजीव के घर वालों ने डेढ़ लाख रुपए उन के बैंक खाते में जमा करा कर इस की जानकारी बदमाशों को दे दी.

उन्होंने फिलहाल पैसे जमा तो करा दिए लेकिन उन्हें इस बात पर भी संशय था कि बदमाशों द्वारा मांगी गई फिरौती की रकम देने के बाद इस बात की क्या गारंटी है कि वह राजीव को छोड़ देंगे. इसलिए उन्होंने इस की जानकारी अपने नजदीकी थाने को दे दी.

मामला अपहरण का था, हरिद्वार पुलिस ने जांच की तो केस उत्तर प्रदेश के जिला  गाजियाबाद का लगा. क्योंकि बदमाशों ने पहली बार राजीव के फोन से उन की पत्नी को फोन कर के जो 15 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी, उस फोन की लोकेशन उस समय गाजियाबाद जिले की ही आ रही थी.

इसलिए हरिद्वार पुलिस ने राजीव के घर वालों से कहा कि वह गाजियाबाद पुलिस से संपर्क करें. इतना ही नहीं हरिद्वार पुलिस ने गाजियाबाद पुलिस से संपर्क कर काल डिटेल्स की जानकारी भी दे दी.

राजीव के घर वालों ने गाजियाबाद के एसएसपी वैभव कृष्ण से मुलाकात कर सारी जानकारी दे दी. यह मामला सीधे तौर पर अपहरण का था, इसलिए एसएसपी ने इस केस को गंभीरता से लिया. उन्होंने एसटीएफ के एसपी आर.के. मिश्रा के साथ विभिन्न थानों में मौजूद तेजतर्रार पुलिस वालों को भी केस की छानबीन में लगा दिया.

उधर राजीव के घर वालों ने उन के खातों में जो डेड़ लाख रुपए जमा कराए थे, वह रुपए बदमाशों ने राजीव से उन का डेबिट कार्ड और पिन नंबर ले कर कई बार में अलगअलग जगहों पर स्थित एटीएम मशीनों से निकाल लिए थे.

राजीव के घर वालों ने गाजियाबाद पुलिस को यह भी जानकारी दे दी कि अपहर्त्ताओं के कहने पर उन्होंने राजीव के बैंक खाते में डेढ़ लाख रुपए जमा करा दिए थे. पुलिस ने बैंक अधिकारियों से मिल कर जब राजीव के खाते की जांच की तो पता चला कि बदमाशों ने राजीव के डेविड कार्ड से दिल्ली, गाजियाबाद, हापुड़ और बुलंदशहर के एटीएम से कई बार में सारे पैसे निकाल लिए हैं.

जिन एटीएम सेंटरों से उन्होंने वह पैसे निकाले थे, पुलिस ने वहां लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो पता चला कि अलगअलग एटीएम मशीनों से अलगअलग लोगों द्वारा पैसे निकाले गए थे और उन्होंने अपने चेहरे कैप से ढक रखे थे.

राजीव का अपहरण हुए कई दिन बीत चुके थे. उन के घर वालों और रिश्तेदारों को उन की चिंता हो रही थी. सब इस बात को ले कर परेशान थे कि पता नहीं राजीव को उन लोगों ने किस हाल में रखा होगा.

वैसे बदमाश राजीव को हर समय हाथपैर बांध कर ही रखते थे. सुबह और शाम को वह उन के हाथपैर केवल खाना खाने के लिए खोलते थे. खाना खाने के बाद वह फिर से उन्हें रस्सी से बांध देते थे. वह नशे में रहे इस के लिए उन्हे नींबू पानी में नींद की गोलियां मिला कर दे देते. इस के अलावा वह उन की कमर में नशे का इंजेक्शन भी लगाते थे.

राजीव को अपहर्त्ताओं के चंगुल में रहते हुए 9 दिन बीत चुके थे. उन के घर वाले लगातार पुलिस अधिकारियों से संपर्क कर अपनी चिंता जाहिर कर रहे थे. पुलिस की 20 टीमें अपनेअपने तरीकों से अपहर्त्ताओं के पास पहुंचने की कोशिश में लगी थीं. सर्विलांस टीम भी मुस्तैद थी.

अब तक की जांच और अपने मुखबिरों से मिली जानकारी के बाद पुलिस और एसटीएफ की टीम ने अपहरण के 9वें दिन यानी पहली जून, 2018 को गाजियाबाद की पौश कालोनी वसुंधरा के पास स्थित प्रह्लादगढ़ी गांव में दबिश दे कर रिंकू नाम के बदमाश को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने उस से पूछताछ कर सैंट्रल टेबल के नीचे बोरी में बंद पड़े राजीव कुमार को बरामद कर लिया. उन के हाथपैर बांधे हुए थे और उस समय वह बेहोशी की हालत में थे. उन्हें 2 पुलिसकर्मी तुरंत अस्पताल ले गए. इस के बाद पुलिस ने रिंकू से उस के अन्य साथियों के बारे में पूछताछ की तो रिंकू ने बताया कि उस के साथी शरद और महेश राजनगर एक्सटेंशन की तरफ गए हैं.

रिंकू को साथ ले कर पुलिस राजनगर एक्सटेंशन की तरफ गई तो उन्हें एक सैंट्रो कार दिखी. रिंकू के इशारे पर पुलिस ने उस कार का पीछा किया तो उन लोगों ने सैंट्रो कार की स्पीड और तेज कर दी. बाद में 2 बदमाश कार छोड़ कर पैदल ही भागने लगे. इतना ही नहीं उन्होंने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी. जवाब में पुलिस ने भी फायरिंग की.

बदमाशों की फायरिंग से 2 पुलिसकर्मी अरुण कुमार और मनीष कुमार घायल हो गए. उधर पुलिस की गोली से दोनों अपहर्त्ता भी घायल हो कर गिर पड़े. तभी पुलिस ने दोनों बदमाशों को भी हिरासत में ले लिया. सभी घायलों को तुरंत अस्पताल में भरती कराया गया.

एसएसपी वैभव कृष्ण और एसटीएफ के एसपी आर.एन. मिश्रा को मुठभेड़ में पुलिसकर्मियों के घायल होने और अपहर्त्ताओं को गिरफ्तार कर राजीव कुमार के सकुशल बरामद करने की जानकारी मिली तो दोनों पुलिस अधिकारी अस्पताल पहुंच गए.

उधर सूचना मिलने पर राजीव के घर वाले भी गाजियाबाद के लिए रवाना हो गए. एसएसपी के समक्ष जब तीनों बदमाशों से सख्ती से पूछताछ की गई तो पता चला कि लोगों का अपहरण कर मोटी फिरौती मांगना इन बदमाशों का धंधा बन चुका था.

राजीव से पहले ये और भी कई लोगों का अपहरण कर उन से फिरौती की मोटी रकम वसूल चुके थे. नशे की ज्यादा खुराक देने के चक्कर में अपहरण किए गए 3 लोगों की नशे की ओवरडोज से इन के यहां मौत भी हो चुकी थी और 2 लोगों की वह हत्या भी कर चुके थे.

इन लोगों ने अपहरण करने का गैंग क्यों बनाया और इन का अपहरण करने का तरीका क्या था आदि के संबंध में पुलिस ने पूछताछ की तो इन शातिर बदमाशों ने जो कहानी बताई वह वास्तव में हैरान कर देने वाली थी.

पता चला कि हापुड़ निवासी रिंकू, अयोध्या के रहने वाले शरद और सूरजपुर निवासी महेश मिश्रा तीनों ही वाहन चोर हैं. ये अलगअलग रह कर वाहन चोरी करते थे. जेल में मुलाकात होने के बाद इन्होंने एक साथ मिल कर लूटपाट भी शुरू कर दी. इन लोगों ने लिफ्ट देने के बहाने लोगों को लूटना भी शुरू कर दिया. ज्यादा पैसे पाने के लिए इन्होंने नए तरीके से लोगों का अपहरण कर उन के घर वालों से मोटी फिरौती वसूलनी चालू कर दी.

करीब एक महीने पहले इन्होंने लालकुआं (गाजियाबाद) से बिजनौर जा रहे सौरभ नाम के एक युवक को अपनी कार में लिफ्ट दे कर बंधक बनाया. जब उस ने लूट का विरोध किया तो इन्होंने उस की हत्या कर दी. इस के बाद इन्होंने उस का मोबाइल फोन, अन्य सामान लूट लिया और उस की लाश डासना क्षेत्र में डाल दी.

इस के अलावा 24 मई, 2018 को इन्होंने डाबर तिराहे से दिल्ली में प्राइवेट जौब पर जाने वाले देवेंद्र नाम के युवक को लूटने के लिए रोका. देवेंद्र ने विरोध किया तो उन्होंने चाकू मार कर उस की हत्या कर दी. हत्या के बाद ये उस का लैपटौप, मोबाइल फोन आदि लूट कर फरार हो गए.

28 अप्रैल, 2018 को इन लोगों ने गजरौला के रहने वाले 22 वर्षीय पप्पू खान को आनंद विहार बस अड्डे से लिफ्ट दे कर किडनैप किया और उस के घर वालों से फिरौती  की रकम वसूल की. पप्पू खान 28 अप्रैल को बस द्वारा गजरौला से दिल्ली के लिए चला था. वह रात साढ़े 12 बजे आनंद विहार बस अड्डे पहुंचा. वहां से उसे हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर मुंबई में अपने भाई ने पास जाना था.

आनंद विहार बस अड्डे के बाहर महेश, रिंकू और शरद सैंट्रो कार लिए शिकार की तलाश कर रहे थे. ये लोग सराय काले खां बस अड्डे जाने की आवाज लगाने लगे. हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन सराय काले खां बस अड्डे के बराबर में ही है. यही सोच कर पप्पू खान उन की सैंट्रो कार में बैठ गया.

कार में बैठने के बाद इन्होंने पप्पू खान के एक तरफ से चाकू और दूसरी तरफ से पिस्टल लगा दी. पप्पू के मुंह से कोई भी आवाज नहीं निकली. वह बुरी तरह से डर गया. तभी बदमाशों ने उस के मुंह में जबरदस्ती नशे की गोलियां डाल कर ऊपर से पानी पिला दिया और उस का मोबाइल फोन और एटीएम कार्ड अपने कब्जे में ले लिया.

पप्पू को जब होश आया तो उस ने खुद को एक कमरे में बंद पाया. बदमाश 29 अप्रैल को उसे एनएच-24 हाईवे पर डासना के पास ले गए. उन्होंने उस के ही मोबाइल से उस के भाई से बात कराई. उन्होंने उस के भाई से 10 लाख रुपए की फिरौती मांगी. बाद में मामला 2 लाख रुपए में तय हो गया. 2 लाख रुपए उन्होंने पप्पू खान के ही बैंक खाते में मंगाए. फिर अपहर्त्ता अलगअलग जगहों की एटीएम मशीन से रोजाना 25 हजार रुपए निकाल लेते.

इस तरह उन्होंने 9 दिनों तक पप्पू खान को अपने पास बंधक बना कर रखा. वह उसे नशे की हालत में बांध कर कमरे में रखे संदूक में छिपा कर रखते थे. 2 लाख रुपए वसूलने के बाद उन्होंने पप्पू खान की आंखों पर पट्टी बांध कर सुबह 4 बजे एनएच-24 हाईवे पर यूपी गेट के पास छोड़ दिया. बदमाशों ने घर जाने के लिए उसे 500 रुपए भी दिए थे.

आनंद विहार बस अड्डा और मयूर विहार से उन्होंने अप्रैल माह में ही 2 और लोगों का अपहरण कर उन्हें 10 दिनों तक अपने कब्जे में रखा था. इन में एक को उत्तर प्रदेश के गजरौला में और दूसरे को गाजियाबाद के प्रह्लादगढ़ी में रखा गया था.

किडनैप किए लोगों को ये लोग नशे का इंजेक्शन लगा कर या नशीली गोलियां खिला कर, उन्हें बांध कर रखते थे. हैवी डोज देने की वजह से इन लोगों के पास रहते 3 लोगों की मौत भी हो गई थी. एचसीएल के इंजीनियर राजीव कुमार का अपहरण करने के बाद उन्हें भी नशे की हालत में रखा गया था.

बेहोशी की हालत में कभी उन्हें गद्दे के नीचे छिपा दिया जाता था तो कभी बोरी में बांध कर सेंट्रल टेबल के नीचे. राजीव कुमार ने बताया कि उन्हें बदमाशों के हावभाव देखने के बाद खुद के जीवित रहने की उम्मीद नहीं थी.

किडनैपिंग के अलावा भी शरद, महेश और रिंकू ने गाडि़यां चोरी करनी बंद नहीं की थीं. यह चोरी इस वजह से करते थे ताकि इन की पहचान छोटेमोटे चोर के रूप में बनी रहे. पुलिस ने शरदचंद्र, महेश मिश्रा और रिंकू से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उन्हें अदालत में पेश कर जेल भेज दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों एवं जनचर्चा पर आधारित

बरसात में इन से बचें

बरसात के मौसम में घर के बाहर पैर रखते ही कीचड़, नालों का गंदा पानी, कूड़े के ढेर से उठती सड़ांध से दिमाग खराब हो जाता है. बारिश की बूंदों से गरमी से राहत मिलती है लेकिन इस मौसम में पनपने वाली कई बीमारियों से बचना बेहद जरूरी है. आइए, जानते हैं दिल्ली के वरिष्ठ फिजिशियन व कार्डियोलौजिस्ट डा. के के अग्रवाल से कि इन बीमारियों से कैसे बचें.

लेप्टोस्पायरोसिस

इस बीमारी में बुखार आता है और आंखों में सूजन आती है. यह बीमारी जानवरों के मलमूत्र से फैलने वाले लेप्टोस्पाइश नामक बैक्टीरिया के कारण होती है. खासकर यह चूहों से होती है. चूहे जब पानी में या अन्य जगह पेशाब करते हैं तो आप के पैरों के माध्यम से, विशेषकर यदि आप के पैरों में घाव हैं तो, उस पेशाब के कीटाणु जिस्म में घुस जाते हैं. इस मौसम में जलभराव व बहते पानी के कारण यह संक्रमण पानी में मिल कर उसे दूषित कर देता है. इस वजह से इस बीमारी की आशंका अधिक रहती है.

बारिश के मौसम में नंगेपैर चलना ठीक नहीं रहता, हमेशा जूते, चप्पल, दस्ताने, चश्मा, मास्क आदि लगाएं. तालाबों, पूलों व नदियों आदि के  पास जाने, मृत जानवरों को छूने से बचें. घावों की नियमित साफसफाई करते रहें.

मलेरिया

बारिश की वजह से जगहजगह सड़कों व नालों में पानी जमा हो जाता है और गंदे पानी में मच्छर पनपने शुरू हो जाते हैं, जिन में से कुछ मलेरिया के भी मच्छर होते हैं. इस मौसम में दिल्ली में डेंगू व चिकनगुनिया, गुजरात में जिका और पूर्वोत्तर में मलेरिया का जबरदस्त आतंक रहता है.

मच्छर को घर में या बाहर पनपने न दें. छोटे व बड़े बरतन में पानी को ढक कर रखें. पानी की टंकी को बराबर साफ करते रहें. मांसपेशियों में दर्द और कंपकंपी के साथ बुखार आना मलेरिया के लक्षण हो सकते हैं.

डायरिया, टायफायड व जौंडिस

ये तीनों बीमारियां दूषित पानी पीने से होती हैं. इस मौसम में उबला पानी पिएं. अच्छी तरह पका हुआ खाना खाएं. सब्जी को छील कर या अच्छी तरह धो कर पकाएं और ठंडा खाना हमेशा गरम कर के ही खाएं.

सर्दीजुकाम, गले में खराश या बुखार हो तो टायफायड के लक्षण हो सकते हैं. उलटी, कमजोरी या फिर आंखों व हाथ के नाखूनों में पीलापन आना जौडिंस के लक्षण हैं.

स्नेक पौयजनिंग

बरसात में बिलों में पानी घुसने से अकसर सांप बाहर निकल आते हैं. यदि सांप काट ले तो तुरंत अस्पताल जाएं नजदीकी डाक्टर को दिखाएं. फिल्मों में जो दिखाया जाता है कि सांप काटने से मुंह से जहर खींच लेते हैं, ऐसा कतई न करें.

करीना के रेडियो शो की पहली मेहमान होंगी सनी लियोन

बौलीवुड इंडस्ट्री में इन दिनों एक खबर जोरों शोरो पर है कि करीना कपूर खान जल्द ही खुद का रेडियो शो लेकर आ रही हैं. अब सामने आया है कि करीना ने शो की रिकौर्डिंग भी शुरू कर दी है. ऐसे में सबके मन में यह सवाल आना लाजमी है कि आखिर करीना का पहला मेहमान कौन होगा.

दरअसल करीना कपूर खान एक चैट शो लेकर आ रही हैं जिसके पहले एपिसोड में सनी लियोन को गेस्ट के तौर पर बुलाया गया. जानकारी के मुताबिक इस शो के दौरान करीना ने सनी की पिछली जिदगी से जुड़े सवाल नहीं पूछे बल्कि शादी और मातृत्व को लेकर बात की. सनी ने तीन बच्चे गोद लिए हैं. दोनों ने मां के रूप में अपने अपने अनुभव भी शेयर किये. हाल ही में मुंबई के एक स्टूडियो में इस चैट शो को रिकार्ड किया गया. करीना ने बड़ी ही सहजता से इसे अंजाम दिया.

खबरों की मानें तो करीना का यह रेडियो शो इस साल दिसंबर से औन एयर हो जाएगा. कहा जा रहा है कि इस शो में करीना लोगों की परेशानियां सुनेंगी. सूत्रों के हवाले से पता चला है कि, ‘कौलिंग करण की तरह इस शो में भी श्रोताओं को करीना से बात करने का मौका मिलेगा और यह शो इश्क 104.8 एफएम पर प्रसारित होगा.’

भोजपुरी एक्ट्रेस ने दी सपना चौधरी को टक्कर, ‘तेरी आंख्या..’ पर किया डांस

सपना चौधरी ने अपने डांस से हर इंडस्ट्री में झंडे गाड़ दिए हैं. सपना चौधरी ने भोजपुरी फिल्म ‘बैरी कंगना 2’ में स्पेशल सान्ग किया था, और इस सान्ग में उनके डांस को काफी पसंद किया गया था. भोजपुरी सिनेमा में लोकप्रियता का ही नतीजा है कि वहां के सुपरस्टार्स के बीच सपना चौधरी काफी पौपुलर हो गई हैं. भोजपुरी सिनेमा की क्वीन कही जाने वाली रानी चटर्जी का दिल भी सपना चौधरी के गाने ने जीत लिया है.

 

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सपना चौधरी के सुपरहिट गाने ‘तेरा आंख्या का यो काजल’ इतना हिट है कि हर मौके पर इसे सुना जा सकता है. अब सपना चौधरी का सिक्का भोजपुरी सिनेमा में चल रहा है तो वहां उनके गाने भी तो अपनी जगह बनाएंगे. ऐसा ही रानी चटर्जी के साथ भी हुआ. अकसर अपने डांस वीडियो सोशल मीडिया पर डालने वाली रानी चटर्जी ने सपना चौधरी के इस सुपरहिट गाने को सुना तो वह खुद को रोक नहीं पाईं. रानी चटर्जी ने अपने ही अंदाज में सपना के इस गाने पर जमकर कमर हिलाई, और अलग ही अंदाज में डांस किया.

महामारी बनती जा रही है नशे की लत

नशे की लत भारत में भी महामारी बनती जा रही है. पंजाब तो इस का बुरी तरह शिकार है. पंजाब में 4 दशकों पहले जब बिहारी मजदूर आने लगे थे तो उन्हें काम पर लगाए रखने के लिए किसानों ने उन्हें नशा कराना शुरू किया था ताकि उन्हें दर्द महसूस न हो और वे 12-14 घंटे काम कर सकें. पंजाब में अफगानिस्तान से आने वाली अफीम आसानी से मिलती थी. इसीलिए मजदूरों के लिए ड्रग जमा करना कोई मुश्किल काम न था.

अब यह आदत मजदूरों से किसानों के बच्चों में घुस गई है. पूरा पंजाब ड्रग की मंडी बन गया है. हर दूसरा घर नशेड़ी का है. नशे के चलते सब नष्ट हो रहा है. नशे से ज्यादा पैसा उगाहने के लिए अब पंजाब से उस की तस्करी दूसरे राज्यों में की जा रही है और दिल्ली नशे का बड़ा केंद्र बन रहा है. यहां विदेशी भी आ कर धंधा कर रहे हैं.

दिल्ली में हर दूसरे रोज एक जघन्य अपराध होता है जिस में मर्डर तक होता है केवल इसलिए कि अपराधियों को नशे की आदत थी. जेलें नशेडि़यों से भरने लगी हैं और अमेरिका जैसा हाल होने लगा है जहां कोकीन और हेरोइन घरघर में मिलने लगी है और दक्षिण अमेरिका का ड्रग माफिया कितने ही इलाकों में पैर फैलाए हुए है.

ड्रग्स का चलन अभी तक या तो बहुत गरीबों में है या फिर बहुत अमीर घरों के बिगड़ैलों में. लेकिन इस को फैलते देर न लगेगी. जिन्हें सिगरेट और शराब पीने का चस्का लगा हुआ है उन में ड्रग्स लेने की आदत डलवाना आसान है. फिल्मों और पार्टियों से शराब का जिस तरह प्रचार हो रहा है वह चौंकाने वाला है. आजकल छोटे बच्चों की बर्थडे पार्टियों में भी जाम छलकने लगे हैं. ये बच्चे लिमिट जानते ही नहीं हैं लिमिट का पता हो, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

बिहेवियोरल ऐक्सपर्ट यानी व्यवहार के विशेषज्ञ कहते हैं कि शराब पीने, नशा करने में लिमिट जैसी कोई बात नहीं होती. शराब के समर्थक अकसर कहते हैं कि वे सिर्फ सोशल ड्रिंकिंग करते हैं यानी लिमिट में शराब पीते हैं. वहीं विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि लिमिट का कोई पैमाना नहीं होता और यह बदली जाती रहती है. ड्रग्स भी इसी तरह आदत में शामिल हो जाती है. बस, टेस्ट करने से शुरू हो कर नशेड़ी बनने में समय नहीं लगता.

ड्रग्स पर कंट्रोल करना है तो शराब पर कंट्रोल आवश्यक है. यह अगली पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए जरूरी है. इस बारे में ढीलढाल देश को महंगी पड़ेगी. चीन एक बार 17वीं सदी में अफीम की गिरफ्त में आया था और उस को 150-200 साल गुरबत में बिताने पड़े. हमारे यहां धर्म व जाति का नशा तो है ही, भांग, अफीम, कोकीन, मेरीजुआना का नशा ज्यादा चढ़ा तो हम 16वीं सदी में लौट जाएंगे.

जहां पावर वहां अमर

योगी आदित्यनाथ सरकार ने विकास का चमचमाता मौडल दिखाने की कड़ी में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी का आयोजन किया. इस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित देश के बड़ेबड़े बिजनैसमेन शामिल हुए. प्रधानमंत्री ने 60 हजार करोड़ रुपए की 81 योजनाओं का शिलान्यास किया. लेकिन विकास से अधिक चर्चा का विषय अमर सिंह रहे.

अमर सिंह की खासियत है कि वे जहां होते हैं, खबरों का झुकाव उन की तरफ ही रहता है. अमर सिंह फोटो में भी आकर्षण का केंद्र बने रहे. भगवा कुरते में उन की छवि निखर रही थी. अमर सिंह का कद उस समय और ऊंचा हो गया जब प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘अमर सिंह बैठे हैं, सब की हिस्ट्री निकाल देंगे.’’ अमर सिंह ने बाद में ट्वीट किया कि वे ‘बूआ’ और ‘बबुआ’ के नहीं, विकास के साथ चलेंगे.

अमर सिंह के इस कदम के बाद उन के खिलाफ एक वाकयुद्ध शुरू हो गया. किसी ने तर्क दिया कि वे जहां जाते हैं वहां तोड़फोड़ कर देते हैं. इस के लिए बच्चन, अंबानी और मुलायम परिवारों के उदाहरण दिए गए. किसी ने कहा कि वे अपनी राज्यसभा की सदस्यता बचाना चाहते हैं. अमर सिंह को खलनायक बना कर पेश किया जाने लगा. यह सही बात है कि अमर सिंह पहले कांग्रेस के करीबी थे. इस के बाद उन का लंबा समय समाजवादी पार्टी खासकर सपा नेता मुलायम सिंह के साथ बीता.

अमर सिंह उद्योगपतियों और फिल्मी हस्तियों के बहुत करीबी रहे हैं. ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में भी वे फिल्म और उद्योगजगत की हस्तियों के बीच ही बैठे थे. जितनी चर्चा अमर सिंह के एक सम्मेलन में शामिल होने से शुरू हो गई उतनी चर्चा तो रामविलास पासवान, उदित राज और रामदास अठावले की नहीं हुई जो अपनी विचारधारा छोड़ कर भाजपा के साथ आए.

विचारधारा की राजनीति

राजनीतिक दल या राजनेता की अपनी एक विचारधारा होती थी. सत्ता से मिलने वाली पावर ने उस सिद्धांत को खत्म कर दिया. अब सत्ता जाते ही नेता पलटी मारने के प्रयास में लग जाते हैं. कोई ऐसा दल नहीं जिस में दलबदलू नेता नहीं हैं. जिस दल में नेता जाते हैं उसी दल की विचारधारा को वे मानने लगते हैं. वे अपने पुराने बयानों तक को याद नहीं रखते. सोशल मीडिया के जमाने में ऐसे सुबूत आसानी से मिलने लगे हैं. वे पिछली बातों पर कोई अफसोस तक नहीं जताते. बस, नई पार्टी के सुर में सुर मिलाने लगते हैं. ऐसे में केवल अमर सिंह जैसे नेता पर ही सवाल क्यों?

भाजपा को मनुवादी कहने वाले रामविलास पासवान, उदित राज जैसे नेता भाजपा के कदम से कदम मिला कर चल रहे हैं, जो नेता पूजापाठ और रूढि़वादिता के खिलाफ थे, खुद को नास्तिक कहते थे वे अब आस्तिक हो गए हैं.

अब यह साफ हो गया है कि राजनीतिक गठजोड़ विचारधारा पर नहीं, बल्कि सत्ता की अवसरवादी राजनीति पर हो रहा है. जहां सत्ता दिखती है, नेता वहीं खड़ा हो जाता है. ऐसे में अमर सिंह और रामविलास पासवान, उदित राज और अनुप्रिया पटेल में अंतर नहीं दिखता. सभी एक ही छत के नीचे खड़े हैं जहां सत्ता की ताकत है.

जनता को यह समझना जरूरी है कि उन के ये नेता केवल चुनाव जीतने के लिए ही जाति व धर्म की बात करते हैं. वोट ले कर चुनाव जीतने के बाद पावर मिलते ही केवल कुरसी ही अहमियत रखती है. ऐसे में नेता जाति व धर्म के नाम पर लोगों को केवल भड़काते हैं. उन का मकसद केवल सत्ता हासिल कर राज करना होता है.

अमर सिंह हैं खास

अमर सिंह सत्ता के साथ अपना कदम बदलते हैं. इस के बाद भी वे सभी दलों में बराबर की दोस्ती रखते हैं. अमर सिंह और बसपा नेता मायावती के बीच बेहतर रिश्ते नहीं रहे. समाजवादी पार्टी की तरफ से अमर सिंह मायावती के खिलाफ तीखी बयानबाजी करते रहे हैं. ऐसे में जब सपा व बसपा के बीच रिश्ते मधुर हो रहे हैं, अमर सिंह के लिए वहां जगह नहीं रह गई. सपा में अमर सिंह को मुलायम सिंह यादव खेमे का माना जाता है.

मुलायम परिवार में विवाद के समय भले ही अमर सिंह का कोई रोल न रहा हो पर सपा नेता अखिलेश यादव अमर सिंह को ही इस का जिम्मेदार मानते थे. सपा में मुलायम की पकड़ खत्म होने के बाद छोटेबड़े तमाम नेता अमर सिंह के खिलाफ टिप्पणी करने लगे थे. ऐसे में अमर सिंह सपा, बसपा के गठजोड़ में सहज नहीं रह सकते थे. अब अमर सिंह भाजपा के पाले में हैं.

अमर सिंह ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में हिस्सा लेने से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले. इस के बाद जब प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में अमर सिंह का नाम लिया तो यह पक्का हो गया कि अमर सिंह केसरिया सदरी पहन कर ऐसे ही नहीं आए हैं.

भाजपा के लिए आगामी लोकसभा चुनाव में अमर सिंह बहुत काम के नेता साबित हो सकते हैं. उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल में वे अपनी मजबूत पकड़ रखते हैं. इस के अलावा राष्ट्रीय राजनीति में समीकरण बनाने में वे अहम किरदार निभा सकते हैं. कई बार सरकार को बनानेगिराने में उन का रोल सामने आता रहा है.

अमर सिंह अपनी बात बड़ी साफगोई से कहते हैं. मुखर होने के कारण वे मीडिया में आकर्षण का केंद्र रहते हैं. लिहाजा, भाजपा के लिए वे एक अच्छे मैनेजर साबित हो सकते हैं.

भाजपा के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव से 2019 का लोकसभा चुनाव अलग है. केवल मोदी के चेहरे पर इस चुनाव को जीतना व सरकार बनाना उस के लिए संभव नहीं है. ऐसे में अमर सिंह विपक्ष की काट साबित हो सकते हैं.

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