‘मी टू’ अभियान पर ऐश्वर्या ने रखी अपनी राय

बौलीवुड की अदाकारा ऐश्वर्या राय बच्चन ने भारत में ‘मी टू’ अभियान चलने पर अपनी खुशी जाहिर की है, उन्होंने कहा कि यौन उत्पीड़न के अपने अनुभव साझा करने वाली महिलाओं को और समर्थन तथा मजबूती दी जानी चाहिए.

तनुश्री दत्ता द्वारा नाना पाटेकर के खिलाफ उत्पीड़न के आरोप लगाने पर देश में ‘मी टू’ अभियान में तेजी आई है. आलोक नाथ, रजत कपूर, विकास बहल और कौमेडी ग्रुप एआईबी सहित मनोरंजन उद्योग के कई लोगों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे हैं.

एक रिपोर्ट के अनुसार, ऐश्वर्या ने अपने एक साक्षात्कार में कहा, ‘मी टू’ अभियान की वर्तमान समय में गति तेज हुई है. सोशल मीडिया के साथ दुनिया छोटी हो गई है, हर आवाज बड़ी हो रही है. वर्तमान समय के बारे में यह देखना अच्छा है कि मीडिया के सदस्य इससे जुड़ गये हैं और ऐसी आवाजों को प्रेरित कर रहे हैं जिन्हें सुने जाने की जरूरत है और उन्हें मंच दिया जा रहा है. देश का कानून न्याय करेगा.

उन्होंने कहा, ‘व्यक्तिगत मामलों में स्पष्ट टिप्पणी करना सही नहीं होगा क्योकि मामले अदालत में विचाराधीन हैं और हमारी तरफ से जिम्मेदारीपूर्ण नहीं होगा लेकिन इसी के साथ, भगवान कृपा करे और ऐसी आवाजों को मजबूती दे, जिन्हें समर्थन की जरूरत है.’

नाबालिग बच्चियों के यौनशोषण की कहानी

कोई भी गलत काम ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता. एक न एक दिन उस का भंडाफोड़ हो ही जाता है. बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बालिका संरक्षण गृह में बालिकाओं के शोषण की घटना इस का ताजा उदाहरण है. अगर टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज (टिस) की टीम वहां नहीं जाती तो पता नहीं वहां बालिकाओं के साथ शोषण कब तक और चलता.

बात फरवरी, 2018 की है. मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज की इकाई ‘कोशिश’ ने मुजफ्फरपुर जिले के ‘सेवा संकल्प समिति’ के बालिका संरक्षण गृह का औडिट किया. इस संरक्षण गृह में 44 लड़कियां रहती थीं. औडिट के दौरान टीम ने पाया कि संरक्षण गृह का रखरखाव सही नहीं है और वहां रह रही बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है. दुर्व्यवहार ही नहीं, बल्कि टीम को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की शिकायतें भी मिलीं.

औडिट करने के बाद टिस ने अपनी रिपोर्ट समाज कल्याण विभाग को सौंप दी. इस से पहले नवंबर 2017 में ‘कोशिश’ के स्टेट कोआर्डिनेटर कायम मासूमी, सुनीता बिस्वास और आसिफ इकबाल इसी बालिका गृह में आए थे. तब यहां डरीसहमी बालिकाओं ने टीम के सदस्यों को बताया था कि उन का दैहिक शोषण किया जाता है. टिस ने अपनी औडिट रिपोर्ट में बालिकाओं की उसी पीड़ा का उल्लेख किया था.

टिस की सनसनीखेज रिपोर्ट पढ़ कर समाज कल्याण विभाग के निदेशक देवेश शर्मा उछल गए. उस औडिट रिपोर्ट में कुछ ऐसा उल्लेख किया गया था कि उसे जो भी पढ़ता, चौंके बिना नहीं रह पाता. टिस ने अपनी औडिट रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि मुजफ्फरपुर बालिकागृह में रह रही 44 लड़कियों में से 42 की मैडिकल जांच कराए जाने पर उन में से 34 लड़कियों के साथ दुष्कर्म किए जाने की पुष्टि हुई है.

संरक्षण गृह की 34 लड़कियों के साथ दुष्कर्म होना कोई छोटीमोटी बात नहीं थी. मामला प्रकाश में आते ही जिला ही नहीं बल्कि पूरे राज्य में भूचाल खड़ा हो सकता था. मीडिया अलग से नाक में दम कर देती. काफी सोचविचार कर निदेशक शर्मा ने टिस की औडिट रिपोर्ट को हलके में लिया. उन्होंने रिपोर्ट को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया और कान में रूई डाल कर चुपचाप बैठ गए.

रिपोर्ट पर 4 महीने तक कोई काररवाई न होता देख टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज की ‘कोशिश’ टीम परेशान हो गई. लेकिन वह चुप नहीं बैठी. टीम ने 26 मई, 2018 को 100 पेज की सोशल औडिट रिपोर्ट बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावा पटना और मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन को भी भेज दी.

चूंकि रिपोर्ट अब शासन तक पहुंच चुकी थी और जिला प्रशासन उसे दबा नहीं सकता था. इस से औडिट रिपोर्ट को ठंडे बस्ते के हवाले करने वाले समाज कल्याण विभाग के निदेशक देवेश शर्मा की आंखों से नींद उड़ गई. जिला प्रशासन सिर के बल दौड़ने लगा. इस से पहले कि देवेश शर्मा पर कोई गाज गिरती, उन्होंने अपनी भूल स्वीकारते हुए कहा कि वह रिपोर्ट को हलके में ले रहे थे, जो उन की बड़ी भूल थी.

मुक्त कराई गईं लड़कियां

इस के बाद 31 मई, 2018 को जिला प्रशासन ने सेवा संकल्प एवं विकास समिति के बालिका संरक्षण गृह से 46 किशोरियों को मुक्त कराया. मुक्त कराई गई किशोरियों को पटना, मोकामा और मधुबनी के संरक्षण गृहों में भेज दिया गया.

देवेश शर्मा ने बालिका गृह का संचालन कर रहे एनजीओ के मालिक और सरगना ब्रजेश ठाकुर, सरगना की पर्सनल असिस्टैंट मधु, बालिका गृह की अधीक्षिका इंदु कुमारी, सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष दिलीप कुमार वर्मा, समिति की कार्यकर्त्री किरण, मंजू, मीनू, हेमा, नेहा, चंदा समेत 11 लोगों के खिलाफ महिला थाने में दुष्कर्म की धारा एवं पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. मामले की जांच महिला थाने की प्रभारी ज्योति कुमारी ने खुद संभाली.

बालिका संरक्षण गृह में बड़े पैमाने पर चल रहे देहव्यापार के खुलासे के बाद जिले के आला अफसरों आईजी (जोन) सुनील कुमार, डीआईजी अनिल कुमार सिंह, एसएसपी हरप्रीत कौर, एसपी (सिटी) उपेंद्रनाथ वर्मा और डीएसपी (सिटी) आनंद कुमार मुकुल के होश फाख्ता थे. अधिकारियों ने किशोरियों को न्याय दिलाने के लिए कमर कस ली थी.

बालिका गृह से मुक्त कराई गई किशोरियों को मोकामा नाजरथ अस्पताल में भरती कराया गया, जहां उन का इलाज शुरू हुआ. जांच अधिकारी ज्योति कुमारी किशोरियों के बयान लेने के लिए अस्पताल पहुंच गईं. किशोरियों के बयान से हैरान कर देने वाला सच सामने आया.

किशोरियों ने बताया कि बालिका गृह में काम करने वाली महिला कर्मचारी न केवल उन के साथ होने वाले रेप में साथ देती थीं, बल्कि खुद भी बच्चियों का यौनशोषण करती थीं. महिला कर्मचारी उन के साथ बेहद अमानवीय व्यवहार किया करती थीं.

एक 16 साल की किशोरी मीरा ने जांच अधिकारी को बताया कि बालिका गृह में खाने में नींद की गोलियां मिला कर देने के बाद उन के साथ गलत काम किया जाता था. सुबह जागने के बाद गुप्तांग में असहनीय दर्द होता था. तब देखभाल करने वाली वहां की इंदु आंटी उन्हें बताती थी कि उन के साथ गलत काम किया गया है.

इलाजरत पीडि़त किशोरियों के संबंध में मनोचिकित्सक ने जांच अधिकारी ज्योति कुमारी को बताया कि यौनशोषण होने के कारण कई किशोरियां एसटीडी (सैक्सुअल ट्रांसमिटेड डिजीज) से पीडि़त हो गई हैं. उन में से सब से ज्यादा बैड वेटिंग (बिस्तर पर पेशाब कर देना) से पीडि़त हैं. सभी का इलाज किया जा रहा है. बैड वेटिंग सभी लड़कियों में एक कौमन बीमारी के रूप में सामने आई.

बीमारी देख कर यह पता चलता है कि सभी के दिलोदिमाग में यौनशोषण घर कर गया है और इसी वजह से उन के साथ यह समस्या आ रही है. जब तक पीडि़त किशोरियां इस त्रासदी से निकल कर बाहर नहीं आएंगी, तब तक ऐसे ही पीडि़त रहेंगी.

कानून के दायरे में आए संचालक और उन के साथी

बहरहाल, 2 जून, 2018 को जांच अधिकारी ज्योति कुमारी ने एनजीओ के मालिक और मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर और संस्था से जुड़े 8 लोगों को महिला थाने बुला कर पूछताछ शुरू की. उसी दिन बालिका संरक्षण गृह को सील भी कर दिया.

पूछताछ के बाद 9 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही संस्था की पीए कही जाने वाली मधु और दिलीप कुमार वर्मा भूमिगत हो गए. इधर गिरफ्तार आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां अदालत ने सभी को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया. इधर फरार आरोपी मधु और दिलीप कुमार वर्मा की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने जगहजगह इश्तहार लगवाए. इतना ही नहीं, पुलिस उन की संपत्ति की कुर्की की काररवाई करने में भी जुट गई.

चूंकि यह कोई छोटामोटा मामला नहीं था, बल्कि मुजफ्फरपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार ‘प्रात: कमल’ के मालिक और मीडिया जगत के सिंडीकेट ब्रजेश ठाकुर से जुड़ी हुई बहुचर्चित घटना थी, जिस की पहुंच सत्ता के ऊंचे गलियारों तक थी. जिस के एक इशारे पर बड़ेबड़े सफेदपोश माथा टेकने के लिए समर्पित रहते थे.

ब्रजेश ठाकुर के सिंडीकेट की खेवनहार उस की अपनी हनीप्रीत कही जाने वाली महिला मित्र मधु थी. सरगना ब्रजेश के सारे अच्छेबुरे कामों का लेखाजोखा वही रखती थी, इसलिए यह मामला तूल पकड़ने लगा.

आगे की कहानी बताने से पहले ब्रजेश ठाकुर और उस की हनीप्रीत कही जाने वाली महिला दोस्त मधु के जीवन के रंगीन पन्नों का यहां उल्लेख करना अनिवार्य है, इस तरह था—

करीब 55-60 वर्षीय ब्रजेश ठाकुर मूलरूप से मुजफ्फरपुर का रहने वाला है. उस के पिता का नाम राधामोहन ठाकुर था. उन की सालों पहले असामयिक मौत हो गई थी. वह एक सच्चे समाजसेवक थे. इसी सेवा से ओतप्रोत हो कर वह समाज के लिए कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिस से दुनिया से विदा होने के बाद भी लोग उन्हें याद करें.

इसी सोच को साकार रूप देने के लिए उन्होंने रोशनाई से भरी कलम को अपने हाथों में उठा लिया और चल पड़े पत्रकारिता की दोधारी तलवार जैसी दुरूह राह पर. पत्रकारिता जगत में राधामोहन ठाकुर बड़े नाम के रूप में विख्यात हुए. समाज के छोटेबड़े तबके में उन की अलग पहचान बनी. लोगों का उन्हें प्यार और सम्मान मिला.

राधामोहन ने सन 1982 में मुजफ्फरपुर से एक हिंदी अखबार ‘प्रात:काल’ का बीजारोपण किया. राधामोहन ठाकुर की पत्रकारों के बीच अच्छी पहचान बनने लगी. बिहार में छोटे अखबारों को शुरू करने वाले शुरुआती नामों से नाम राधामोहन ठाकुर का नाम बड़े सम्मान से लिया जाने लगा. धीरेधीरे राधामोहन ठाकुर ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर के अपने अखबार के लिए सरकारी विज्ञापन लेने शुरू कर दिए. इन विज्ञापनों से राधामोहन ठाकुर ने खूब पैसे बनाए और उस पैसे को रियल एस्टेट में लगा दिया.

पिता की उपलब्धि का लाभ उठाया ब्रजेश ने

राधामोहन ठाकुर पत्रकारिता जगत के मंझे हुए बड़े खिलाड़ी बन चुके थे. जब उन्होंने रियल एस्टेट के व्यवसाय में हाथ डाला तो वहां भी कुंदन बन कर दमकने लगे. जबकि उन्हें इस कारोबार की कोई जानकारी नहीं थी. उस समय रियल एस्टेट का शुरुआती दौर था और उस दौर में राधामोहन ठाकुर ने इस से भी खूब पैसा बनाया.

बताया जाता है कि उसी दौरान राधामोहन ठाकुर बीमार पड़े तो फिर स्वस्थ नहीं हो सके और फिर एक दिन उन की मृत्यु हो गई. पिता की मौत के बाद विरासत उन के बेटे ब्रजेश ठाकुर ने संभाली. पैसा पहले से ही विरासत में मिला था, साथ ही पिता का रसूख भी, इसलिए ब्रजेश ठाकुर के हाथ में कमान आते ही उस ने रियल एस्टेट के कारोबार को तो संभाला ही, एक कदम आगे बढ़ कर राजनीति में भी हाथ आजमाना शुरू कर दिया.

बिहार के बाहुबली नेता आनंद मोहन से ब्रजेश ठाकुर की गहरी छनती थी. दोनों बचपन के दोस्त थे. ब्रजेश ठाकुर ने आनंद मोहन की अंगुली पकड़ कर राजनीति की पिच पर पारी खेलनी शुरू की. उसी दौरान 1993 में जब आनंद मोहन ने जनता दल से अलग हो कर अपनी ‘बिहार पीपुल्स पार्टी’ बनाई तो ब्रजेश ठाकुर उस में शामिल हो गया.

1995 में बिहार में विधानसभा के चुनाव हुए तो ब्रजेश ठाकुर मुजफ्फरपुर की कुड़हानी विधानसभा सीट से बिहार पीपुल्स पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा. लेकिन उसे चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा. इतना ही नहीं, उस के बाद भी वह कभी कोई चुनाव नहीं जीत सका.

सन 2004 में मुखिया आनंद मोहन ने अपनी पार्टी का कांग्रेस के साथ विलय कर दिया. इस के बाद ब्रजेश ठाकुर के चुनाव लड़ने के रास्ते बंद हो गए, लेकिन उस की आनंद मोहन से नजदीकी बरकरार रही. साथ ही राजद और जदयू नेताओं के साथ भी उस का उठनाबैठना जारी रहा.

जब आनंद मोहन को गोपालगंज के जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या में जेल हो गई तो भी ब्रजेश ठाकुर आनंद मोहन से मिलने जेल में जाता रहा. इतना ही नहीं, जबजब आनंद मोहन की जेल बदली गई, ब्रजेश आनंद मोहन के साथ खड़ा दिखा और उसे आर्थिक मदद भी पहुंचाता रहा.

उसी दौरान ब्रजेश ठाकुर ने अपनी सामाजिक संस्था ‘सेवा संकल्प’ और ‘विकास समिति’ की नींव डाल दी थी और दोनों संस्थाएं घुटनों के बल रेंगने लगी थीं. तब तक ब्रजेश ठाकुर की संस्था में मधु की एंट्री हो चुकी थी.

इसी बीच ब्रजेश ठाकुर ने अपने अखबार ‘प्रात:कमल’ का मालिक अपने बेटे राहुल आनंद को बना दिया था. पुलिस के मुताबिक, ब्रजेश ठाकुर खुद अपने अखबार में सिर्फ पत्रकार बन कर रह गया था. इसी दौरान ब्रजेश ठाकुर की किस्मत ने एक नई ऊंचाई को छुआ.

सूत्रों के मुताबिक, सन 2005 में जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो ब्रजेश ठाकुर ने मुजफ्फरपुर में अपने घर बेटे राहुल आनंद के जन्मदिन की पार्टी दी. इस पार्टी में शामिल होने के लिए उस वक्त के बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी पहुंचे थे. ब्रजेश ठाकुर ने यह पार्टी अपना सियासी रसूख दिखाने के लिए आयोजित की थी. इस कार्यक्रम के जरिए उस ने एक तीर से 2 निशाने लगाए थे.

पहला यह कि उस के अखबार को सरकारी विज्ञापन बड़े पैमाने पर मिलते रहें. दूसरा यह कि अपने बेटे राहुल आनंद को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जरिए राजनीति के अखाड़े में उतार सके. इस के बाद प्रात:कमल जैसे अखबार को और ज्यादा सरकारी विज्ञापन मिलने लगे और उसे बिहार सरकार की ओर से मान्यताप्राप्त पत्रकार का तमगा भी मिल गया.

इतना होने के बावजूद ब्रजेश ठाकुर के अंदर का सियासी कीड़ा मरा नहीं था. उस की खुद की सियासी पारी शुरू होने से पहले ही खत्म तो हो गई. ब्रजेश जान चुका था कि राजनीति उस के भाग्य में नहीं है, इसलिए बेटे को इस अखाड़े में उतार दिया. उस ने सन 2016 में बेटे राहुल आनंद को जिला परिषद के चुनाव में कुड़नी से उतार दिया.

बेटे को उतारा राजनीति के मैदान में

चुनाव हुआ और राहुल आनंद ने जीत दर्ज कर ली. बेटे के राजनीतिक संरक्षण से ब्रजेश ठाकुर को बल मिलने लगा, क्योंकि ब्रजेश ठाकुर सेवा संकल्प एवं विकास समिति एनजीओ चलाता था, जिस में बालिका गृह भी था.

बहरहाल, आइए अब सेवा संकल्प की हनीप्रीत कही जाने वाली मधु के जीवन पर रोशनी डालते हैं. कौन है मधु? आखिर वह कैसे ब्रजेश ठाकुर तक पहुंची? उस के भी जीवन की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक नहीं है.

37 वर्षीया मधु मुजफ्फरपुर की ही रहने वाली थी. वह ब्रजेश ठाकुर के संपर्क में 17 साल पहले आई थी. उन दिनों मधु की जिंदगी कठिनाइयों के दौर से गुजर रही थी. किशोरावस्था में पिता का साया सिर से उठने के बाद वह अपनी मां के साथ मुजफ्फरपुर के चर्चित चतुर्भुज मोहल्ले में रहने लगी.

यह मोहल्ला रेडलाइट एरिया के नाम से कुख्यात था और आज भी है. उस समय मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज मोहल्ले में औपरेशन उजाला चला था. इस औपरेशन को चलाने वाली प्रशिक्षु आईपीएस अधिकारी दीपिका सूरी थीं.

दीपिका सूरी एक कड़क अफसर थीं, जिन का नाम मुजफ्फरपुर के लोग आज भी लेते हैं. उन्होंने चतुर्भुज के रेडलाइट एरिया में सुधार के लिए बड़ा काम किया था. प्रशिक्षु आईपीएस ने मोहल्ला सुधार समिति का गठन कराया, जिस में ब्रजेश ठाकुर और मधु सहित 12 लोग सदस्य बने थे.

मोहल्ला सुधार समिति की देखरेख में वहां जागरुकता अभियान चलने लगा. इसी दौरान 90 के दशक में ब्रजेश ठाकुर और मधु करीब आए थे. उन में काफी मधुर संबंध स्थापित हो गए थे. तब ब्रजेश ठाकुर की शादी भी नहीं हुई थी. वह कुंवारा और गबरू जवान था.

मधु बनी खेवनहार

मधु बेहद खूबसूरत और जवान थी तो ब्रजेश ठाकुर भी कम रसिक नहीं था. वह मधु पर मर मिटा था. मधु भी ब्रजेश की दीवानी हो गई थी. फिर क्या था? मधु की मजबूरी और दीवानगी को उस ने कैश करना शुरू कर दिया. मधु को आगे कर के ब्रजेश ने अधिकारियों से गैरकानूनी कई काम कराए और अपनी संस्था और अखबार के लिए पैसे बटोरे.

बाद में जब ब्रजेश की शादी हो गई तो मधु को ले कर उस का पारिवारिक जीवन खतरे में आ गया. मधु की वजह से ब्रजेश ठाकुर और उस की पत्नी के बीच कई बार झगड़े हुए. इस झगड़े के कारण दोनों के संबंधों में दरार आ गई थी. फिर भी ब्रजेश ने उस से संबंध नहीं तोड़ा.

ब्रजेश ठाकुर ने मधु के साथ वफादारी निभाई. आगे चल कर ब्रजेश ठाकुर ने मधु को पहचान दिलाने के लिए चतुर्भुज में ही ‘सेवा संकल्प’ और ‘विकास समिति’ के अलावा वामा शक्ति वाहिनी के नाम से एक और स्वयंसेवी संगठन बनाया और मधु को इस का निदेशक बना दिया.

संगठन का काम चतुर्भुज स्थान में सुधार के कार्य चलाना था. संस्था का उद्देश्य बाजार में बिकने वाली लड़कियों को मुक्त कराना और एड्स को ले कर जागरुकता जैसे कार्यक्रम शामिल थे.

वामा शक्ति वाहिनी की ओर से कई तरह के सामाजिक कार्यक्रम समाज को दिखाने के लिए चलाए जाते थे. लेकिन परदे के पीछे कुछ और ही होता था. संस्था में सिर छिपाने आई पीडि़त और मजबूर लड़कियों को डराधमका और मारपीट कर देहव्यापार के नरक में धकेल दिया जाता था.

बाद में जब राज से परदा उठा और पीडि़त लड़कियों ने अपनी जुबान खोली, तब जा कर पता चला कि यौनशोषण कराने में निदेशिका मधु मुख्य किरदार निभाती थी. इस मामले का परदाफाश होने के बाद मधु भूमिगत हो गई. उस का अब तक पता नहीं चला कि वह जिंदा भी है या उस के साथ कोई अनहोनी घट चुकी है.

अगर जिंदा है तो कहां है, क्योंकि ब्रजेश ठाकुर के सारे बुरे कामों की एकलौती राजदार वही है. वही गलत धंधे से कमाई गई दौलत का हिसाबकिताब रखती थी. मधु के गिरफ्तार होते ही ब्रजेश ठाकुर के चेहरे से कई नकाब उतर जाएंगे, जिस पर उस ने मुखौटा चढ़ा रखा है.

बहरहाल, 25 जून, 2018 को 22 बच्चियों के बयान कोर्ट में दर्ज कराए गए. बच्चियों ने कोर्ट के समक्ष बयान देते हुए बताया कि जब वह गलत काम करने के लिए तैयार नहीं होती थीं तो उन के साथ मारपीट की जाती थी. उन्हें नशीली दवाएं खिला कर उन के साथ दुष्कर्म किया जाता था. पीडि़ताओं ने बताया कि मंगलवार का दिन उन के लिए बेहद यातना भरा होता था. उस दिन बड़े सर का कहर उन पर आफत बन कर टूटता था.

इस बाबत पुलिस पहले ही अपनी जांच कर चुकी थी. जांच के दौरान पता चला कि सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष दिलीप कुमार वर्मा को ही बड़े सर के नाम से जाना जाता था. दिलीप के अलावा समाज कल्याण विभाग का अधिकारी रवि रोशन और विकास कुमार भी बालिका गृह में मुंह काला करने आते थे. पीडि़त किशोरियों ने उन के फोटो देख कर उन्हें पहचान भी लिया.

बालिका गृह रेप कांड बड़ा मामला बन गया था. इस कांड में बड़ेबड़े सफेदपोश नेता और पुलिस अधिकारियों के नाम उछलने लगे थे. मामले में बड़े लोगों के संलिप्त होने की वजह से लोगों को सिविल पुलिस की निष्पक्ष जांच पर अंदेशा था, इसलिए इस केस की जांच सीबीआई से कराए जाने के लिए 3 जुलाई, 2018 को कोर्ट में एक याचिका दायर की गई. 9 जुलाई, 2018 को पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार से इस मामले में जवाब मांगा.

19 जुलाई को पटना कोर्ट में बच्चियों की पेशी हुई. उस दौरान कोर्ट के सामने एक बच्ची ने बयान दिया कि बालिका गृह में एक किशोरी के साथ बलात्कार किया गया. उस के बाद उस की हत्या कर दी गई और लाश बालिका गृह में ही दफना दी गई. बच्ची के सनसनीखेज बयान के बाद मामला और गरमा गया.

इस के बाद विपक्षियों ने हंगामा खड़ा किया. सच्चाई का पता लगाने के लिए अगले दिन पोक्सो कोर्ट ने साहू रोड स्थित बालिका गृह में मृत किशोरी के शव की खोज के लिए जमीन खोदने का आदेश दिया. 5 फीट गहरी खुदाई की गई लेकिन शव कहीं नहीं मिला. यही नहीं यह मामला संसद में भी उठा.

शुरू हुई सीबीआई जांच

24 जुलाई को लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अगर बिहार सरकार चाहे तो हम सीबीआई जांच के लिए तैयार हैं. 26 जुलाई को बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार ने इस मामले की सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश की. केंद्रीय गृहमंत्री  ने बिहार सरकार की सिफारिश मंजूर कर ली और घटना की जांच के लिए सीबीआई को हरी झंडी दे दी.

28 जुलाई, 2018 को आईजी (जोन) सुनील कुमार और डीआईजी अनिल कुमार सिंह ने बालिका गृह का निरीक्षण किया. इस दौरान डीएसपी (सिटी) आनंद कुमार मुकुल, महिला थानाप्रभारी ज्योति कुमारी के साथ अन्य पुलिस पदाधिकारी मौजूद थे. आईजी के निरीक्षण के क्रम में ही एफएसएल व मैडिकल टीमें भी वहां पहुंचीं.

वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य एकत्रित करने के लिए पहुंची एफएसएल टीम ने पहले बारीकी से कमरे का निरीक्षण किया. इस के बाद किशोरियों के बैड सहित बालिका गृह के सभी कमरों में लगे बैड की चादर, गद्दों के साथ ही अन्य कपड़ों के दाग पर कैमिकल लगा कर जांच की.

इस के बाद दागधब्बे युक्त चादर, तौलिए, तकियों के खोल आदि को जब्त कर लिया. यही नहीं, एफएसएल टीम ने कमरे में मौजूद हैंगर पर लटके कपड़ों की भी कैमिकल लगा जांच की. वहां मौजूद बरतन और ग्लासों को भी जांच के दायरे में लाया गया. पूरी जांचपड़ताल की फोटो व वीडियोग्राफी भी कराई गई.

29 जुलाई को सीबीआई की टीम पटना पहुंची. टीम का नेतृत्व एसपी जे.पी. मिश्र कर रहे थे. पटना पहुंच कर उन्होंने एक नया मुकदमा आरोपियों के खिलाफ दायर किया. बालिका गृह मामले की कमान संभालते ही सीबीआई टीम 30 जुलाई की शाम 4 बजे साहू रोड पहुंची. एसपी जे.पी. मिश्रा खुद टीम का नेतृत्व कर रहे थे. उन के साथ केस की जांच अधिकारी इंसपेक्टर विभा कुमारी, इंसपेक्टर राजेश कुमार, ए.के. सिन्हा सहित अन्य अधिकारी भी थे.

31 जुलाई को रामदयालु स्थित सीबीआई कैंप कार्यालय में सुबह 11 बजे जांच अधिकारी ज्योति कुमारी पहुंचीं. सीबीआई की पूरी टीम की मौजूदगी में उन्होंने केस से जुडे़ जब्त किए गए सारे दस्तावेज सीबीआई के हवाले कर दिए. उस में 23 जुलाई को जब्त किए गए स्टाफ रजिस्टर, उपस्थिति पंजिका, मीटिंग रजिस्टर, और्डर रजिस्टर, डोनेशन रजिस्टर 2017, डिसपोजल रजिस्टर, गर्ल्स ट्रेनिंग रजिस्टर, आगंतुक रजिस्टर, फोन डायरेक्टरी, 11 फोटोग्राफ सहित कई सामान शामिल थे.

उस के बाद सीबीआई ने बालिका गृह के खुले कमरों को देखा. टीम के सदस्यों ने ब्रजेश के आवास, प्रिंटिंग प्रैस व बालिका गृह के कमरे की हर एंगल से फोटोग्राफी कराई. एसपी जे.पी. मिश्र ने ब्रजेश के घर का बाहर से निरीक्षण करते हुए अखबार के प्रिंटिंग कक्ष के पास बारीकी से पूरे भवन का मुआयना किया. प्रिंटिंग कक्ष में 3 सीढि़यां देख कर चौंक गए. उन्होंने बालिका गृह की बिल्डिंग पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह जेल की तरह दिखता है.

सीबीआई जांच में खुलते गए राज सीबीआई ने करीब एक घंटे तक बालिका गृह का निरीक्षण किया और स्थानीय लोगों को बुला कर पूछताछ भी की. उन से ब्रजेश के बारे में हर प्रकार की जानकारी ली. एसपी ने खुद गली में पैदल घूम कर हर मकान में रहने वाले लोगों की जानकारी ली. जिस जगह पर खुदाई की गई थी, उस जगह की भी सीबीआई ने जांच की.

सीबीआई जांच से कई चौंकाने वाले राजों से परदा उठ गया. जांच के दौरान पता चला कि बालिका गृह चलाने वाली संस्था सेवा संकल्प व विकास समिति को पिछले 5 सालों में 60 लाख रुपए समाज कल्याण विभाग की ओर से मिले थे.

यह राशि बालिका गृह में रहने वाली लड़कियों के भोजन, उन के वोकेशनल कोर्स और पढ़ाई के मद में दिए गए. हालांकि टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज की सोशल औडिट रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि यहां रह रही किशोरियों के लिए वोकेशनल कोर्स और पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं थी. भोजन की गुणवत्ता भी ठीक नहीं थी.

सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, संस्था को हर साल 12 लाख रुपए भोजन, वोकेशन कोर्स चलाने और शिक्षा के मद में दिए जाते थे. समाज कल्याण विभाग से 1 लाख रुपए का फंड हर महीने जाता था. बालिका गृह में वोकेशनल कोर्स और पढ़ाई के लिए सरकार से फंड दिए जाने का प्रावधान है. बच्चियों ने भी महिला आयोग के सामने बयान दिया था कि वहां पढ़ाई, कोर्स और खाने की व्यवस्था नहीं थी. एनजीओ ने हर महीने बच्चियों की संख्या 50 बता कर सरकार से पैसे लिए, जबकि यहां कुल 44 बच्चियां ही रहती थीं.

बाल संरक्षण के निदेशक देवेश शर्मा ने बताया कि एनजीओ सेवा संकल्प को हर महीने 1 लाख रुपए दिए जाते थे. यह राशि 50 बच्चियों के हिसाब से जोड़ कर दी जाती थी. एक बच्ची पर खर्च के लिए सरकार ने 2 हजार रुपए तय किया था.

विभागीय नियम के अनुसार 2 हजार में से 200 रुपए एनजीओ को अपनी तरफ से खर्च करने होते हैं. बाद में ये 200 रुपए भी हिसाब के समय सरकार की तरफ से ही जोड़ लिए जाते हैं यानी संस्थान का एक पैसा भी खर्च नहीं होता.

खैर, मामले की जांच सीबीआई कर रही है. सीबीआई ने जांच के दौरान पाया कि ब्रजेश ठाकुर के एक मंत्री और 2 आईएएस अफसरों से गहरे ताल्लुकात हैं, जिन्होंने ब्रजेश के सारे गलत कामों में अहम भूमिका निभाई थी. वे भी सीबीआई के रडार पर आ गए हैं.

जांच के दौरान ब्रजेश ठाकुर की संस्था को दिए जाने वाले सरकारी फंड को रोक दिया गया. उस के अखबार प्रात:कमल के सरकारी विज्ञापन पर भी रोक लगा दी गई यहां तक कि अखबार की मान्यता भी समाप्त कर दी गई. पुलिस फरार चल रहे सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष दिलीप कुमार वर्मा और मधु की तलाश में जुटी हुई है. दोनों आरोपी अभी भी पुलिस गिरफ्तार से बाहर है.

वहीं जेल में बंद समाज कल्याण विभाग के बाल संरक्षण अधिकारी रवि रोशन की जमानत याचिका को पोक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश आर.पी. तिवारी ने 7 अगस्त, 2018 को खारिज कर दिया. रवि रोशन ने अपने वकील के माध्यम से एक पूरक आवेदन कोर्ट में डाला था. जिस में उस ने कहा था कि कार्बन डेटिंग पद्धति से केस डायरी और अन्य रिपोर्ट की जांच होनी चाहिए.

वहीं बच्चियों की मैडिकल जांच रिपोर्ट भी रेप की पुष्टि नहीं करती है. बाल संरक्षण अधिकारी ने यह भी कहा कि मुझे फंसाने के लिए थानाप्रभारी ज्योति कुमारी ने बच्चियों के बयान के साथ डायरी की रिपोर्ट में छेड़छाड़ की है, मैं निर्दोष हूं.

उधर 13 अगस्त को खुदीराम बोस केंद्रीय कारागार में हुई सीबीआई छापेमारी के दौरान बालिका गृह कांड में गिरफ्तार हुए ब्रजेश ठाकुर के पास से बरामद 3 पर्चियों से मिले नंबर से पुलिस ने एक नेता को खोज निकाला है. पटना के अनीसाबाद में नेताजी का ठिकाना है. पर्ची में लिखे सभी नंबरों की काल डिटेल्स पुलिस निकाल रही है. पुलिस इस बात का पता कर रही है कि ब्रजेश ने किस नंबर से जेल में रहते हुए नेता से संपर्क किया था.

इतना ही नहीं, नेता के अलावा और किनकिन नंबरों पर उस ने फोन किया, यह जांच से पता चल सकेगा. जेल से मिले पन्ने पर लेनदेन का जिक्र होने के बाद राहुल से जमीन की बिक्री के बारे में सीबीआई जानकारी लेगी. इस के अलावा ब्रजेश और सेवा संकल्प एवं विकास समिति के खातों के बारे में सीबीआई जानकारी जुटा रही है.

इस मामले में समाज कल्याण विभाग की पूर्वमंत्री मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा का नाम आने के बाद सीबीआई का मंत्री दंपति पर लगातार शिकंजा कसता जा रहा है. बेगूसराय के चेरियाबरियापुर थाने में मंजू वर्मा और उन के पति चंद्रशेखर वर्मा के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है.

बेगूसराय स्थित चेरिया बरियापुर के अर्जुन टोला स्थित उन के घर से सीबीआई ने 17 अगस्त को 50 जिंदा कारतूस समेत अन्य सामान बरामद किए थे.

सीबीआई ने 19 अगस्त को मंजू वर्मा और चंद्रशेखर वर्मा के खिलाफ चेरियाबरियापुर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

बहरहाल, कथा लिखे जाने तक गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया जा चुका था. बालिका गृह रेप कांड की आगे की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी थी. अब देखना यह है कि जांच में कौनकौन से चेहरे बेनकाब होने वाले हैं.

– कथा में पीड़ितों के नाम परिवर्तित हैं. कथा पुलिस सूत्रों, समाचारपत्रों और जनचर्चाओं पर आधारित

अधूरी प्रेम कथा

इंटरमीडिएट करने के बाद सोमबीर ने आगे की पढ़ाई का इरादा त्याग दिया था. अब वह कोई कामधंधा करना चाहता था. रोहतक के पास स्थित सोमबीर के गांव सिंहपुरा में कई ऐसे युवक थे, जो ऊंची डिग्रियां ले कर नौकरी की तलाश में भटकने के बाद भी बेरोजगार थे. इसी के मद्देनजर सोमबीर ने पहले ही सोच लिया था कि वह नौकरी के चक्कर में न पड़ कर अपना खुद का कोई काम शुरू करेगा, जिस में सीधा कमाई का जरिया बन जाए.

सोचविचार कर उस ने प्रौपर्टी डीलिंग का काम करने का फैसला किया. इस काम में न तो ज्यादा मेहनतमशक्कत की जरूरत थी और न ही ज्यादा भागदौड़ की. हां, एक अदद पूंजी की जरूरत जरूर थी, जो उस ने अपने पिता जयराज की मदद से थोड़े ही दिनों में एकत्र कर ली थी. उस ने प्रौपर्टी डीलिंग के काम के लिए पास के गांव गद्दीखेड़ा को चुना.

सोमबीर ने गद्दीखेड़ा के जाट रामकेश के मकान में किराए का कमरा ले कर अपना औफिस खोल लिया. धीरेधीरे उस का काम चल निकला तो वह उसी मकान में एक दूसरा कमरा ले कर रात में भी वहीं रहने लगा. कुछ ही दिनों में वह मकान मालिक रामकेश के पूरे परिवार के साथ काफी घुलमिल गया.
रामकेश के परिवार में पत्नी सरिता के अलावा 3 बेटियां थीं, जिन में सब से बड़ी ममता थी. ममता जब ढाई साल की थी, तभी उसे रोहतक की श्याम कालोनी में रहने वाली उस की बुआ कृष्णा ने गोद ले लिया था. वह रोहतक में बारहवीं में पढ़ रही थी.

पिछले साल ममता रोहतक से अपने जैविक मातापिता के घर गद्दीखेड़ा गई थी. ममता 17 साल की जवान हो चुकी थी. मां सरिता ने बेटी को देखा तो देखती रह गई.

ममता ने आगे बढ़ कर मां के पैर छुए तो सरिता निहाल हो गई. ममता अपनी दोनों छोटी बहनों से गले मिली, कुशलक्षेम पूछा. ममता के आने से पूरे घर का माहौल खुशनुमा हो गया. सरिता ने फोन कर के अपनी ननद कृष्णा से कह दिया कि ममता कुछ दिनों यहां रहने के बाद रोहतक लौटेगी, इसलिए वह उसे जल्दी बुलाने के लिए फोन न करे.

एक दिन ममता का सामना सोमबीर से हुआ तो वह उसे अपलक देखता रह गया. गोरीचिट्टी, बला की खूबसूरत ममता किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. दरअसल, सोमबीर को यह मालूम नहीं था कि रामकेश अंकल की एक और बड़ी लड़की भी है, जिसे बचपन में ही उस के फूफा ने गोद ले लिया था. ममता ने उसे अपनी ओर टकटकी लगाए देखा और पलभर के लिए उसे तिरछी नजरों से देखते हुए मुसकरा कर घर के अंदर चली गई.

ममता और सोमबीर की यह पहली मुलाकात थी, जो कुछ न कह कर भी बहुत कुछ कह गई थी. इस के कुछ दिनों बाद जब सोमबीर को ममता से बात करने का मौका मिला तो वह उस की खूबसूरती की तारीफ करने लगा. ममता को न जाने क्यों उस की बातें अच्छी लगीं.

इसे उम्र का तकाजा कह सकते हैं और पहली नजर का प्यार भी, जिस में आकर्षण की भूमिका बड़ी होती है. बहरहाल, इसी के चलते सोमबीर और ममता ने भी प्यार का इजहार भी किया. प्यार जैसेजैसे दिन गुजरते गए, सोमबीर और ममता एकदूसरे के प्यार में डूबते चले गए.

शुरू में तो सरिता और रामकेश ने ममता और सोमबीर के मिलनेजुलने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब वे हद से आगे बढ़ने लगे तो उन का माथा ठनका.

सरिता ने ममता को समझाया कि सोमबीर अनुसूचित जाति का लड़का है, इसलिए उस से ज्यादा घुलनामिलना ठीक नहीं है. ममता ने मां की बातें एक कान से सुन कर दूसरे से बाहर निकाल दीं.
इस के बाद सरिता बेटी पर नजरें रखने लगी. हालांकि ममता और सोमबीर रामकेश और सरिता की नजरों से बच कर मिलते थे, पर उन की अनुभवी आंखों को धोखा देना आसान नहीं था. कई बार किसी न किसी ने दोनों को मिलते हुए देख लिया और इस की खबर रामकेश तक पहुंचा दी.

पानी सिर से ऊपर जाते देख रामकेश ने सोमबीर को ममता से दूर रहने के लिए कहा. इतना ही नहीं, उसे छोटी जाति का हवाला दे कर खतरनाक परिणाम भुगतने की भी चेतावनी दी. रामकेश की धमकी से परेशान सोमबीर ने ममता से कहा कि दोनों के परिवार वाले उन्हें किसी भी हाल में मिलने नहीं देंगे, इसलिए जल्दी ही कोई उपाय नहीं किया गया तो उन का एक होना मुश्किल हो जाएगा.

सोमबीर की बातें सुन कर ममता उसे विश्वास दिलाते हुए बोली कि वह उस के बिना नहीं जी सकती. इस के बाद दोनों ने एक साथ जीने और मरने की कसमें खाईं. सोमबीर जानता था कि ममता के घर वाले एक तो जाट हैं और दूसरे रसूख वाले दबंग भी, इसलिए उस ने कानून का सहारा ले कर कोर्ट में शादी करने की योजना बनाई.

24 अगस्त, 2017 को ममता मौका पा कर घर से निकली और सोमबीर के पास पहुंच गई. सोमबीर उसे साथ ले कर चंडीगढ़ पहुंचा. वहां दोनों ने पहले आर्यसमाज मंदिर में और फिर कोर्ट में शादी कर ली.
ममता के गायब होने की बात जब उस की मां सरिता को पता चली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. सरिता और रामकेश ने यह बात रमेश को बताई तो उन्हें ममता की इस हरकत पर बहुत गुस्सा आया. मां कृष्णा भी ममता की इस हरकत से सन्न रह गई. वे लोग रामकेश के घर आ गए.

सोमबीर के खिलाफ लिखाई रिपोर्ट

सब ने विचारविमर्श कर के रोहतक के थाना आर्यनगर में ममता के नाबालिग होने और सोमबीर व उस के पिता जयराज के खिलाफ अपनी बेटी को बहलाफुसला कर भगा ले जाने का मुकदमा दर्ज करवा दिया.
गांवों और ग्रामीण समाज में ऐसी बातें देरसबेर किसी न किसी तरह पहुंच ही जाती हैं. जिस ने भी इस बारे में सुना वह इस बात को और भी बढ़ाचढ़ा कर बखान करने लगा. जितने मुंह उतनी ही बातें होने लगीं.
मामला केवल प्रेम विवाह का नहीं था, बल्कि इस बात का था कि जाट बिरादरी की एक लड़की ने अपने से छोटी जाति के लड़के के साथ शादी रचा ली है. रामकेश और रमेश के परिवार की बिरादरी में थूथू होने लगी. इस सब से गुस्साए रमेश ने ममता की हत्या करने का फैसला कर लिया.

रमेश के इस फैसले से ममता को जन्म देने वाली मां सरिता और पिता रामकेश भी सहमत थे. सब से पहले उन्होंने कोर्ट में ममता का स्कूल सर्टिफिकेट दे कर बताया कि ममता अभी नाबालिग है, 17 साल की. इसलिए कोर्ट उस की शादी को रद्द घोषित करे.

जब कोर्ट ने इस मामले की छानबीन की तो पता चला ममता की उम्र सचमुच 17 साल ही है. हकीकत जानने के बाद कोर्ट ने सोमबीर और ममता को कोर्ट में पेश होने का सम्मन जारी कर दिया. यह बात जनवरी, 2018 की है. जब दोनों कोर्ट में पेश हुए तो पता चला कि सोमबीर ने फरजी तरीके से ममता की उम्र 18 साल बता कर उस से शादी की थी.

कोर्ट को धोखे में रखने के जुर्म में सोमबीर और उस के पिता को जेल और ममता को बालिग होने तक नारी निकेतन भेज दिया गया. ममता के बालिग होने में अभी 17 महीने बाकी थे.

ममता के बालिग हो जाने के बाद 8 अगस्त, 2018 को रोहतक कोर्ट में पेश किया जाना था. उधर करनाल स्थित नारी निकेतन में रह रही ममता की खुशी देखते ही बन रही थी. लोगों ने ममता को इतना खुश पहले कभी नहीं देखा था. वह सब से कह रही थी ‘आज मैं अपने घर चली जाऊंगी.’

सबइंसपेक्टर नरेंद्र और लेडी हैडकांस्टेबल सुशीला ममता को नारी निकेतन से ले कर रोहतक कोर्ट पहुंचे. चूंकि ममता का पति सोमबीर और ससुर जेल में थे, इसलिए सोमबीर की मां सरोज तथा छोटा भाई देवेंद्र कोर्ट पहुंचे थे. सरोज और देवेंद्र काफी डरे हुए थे, जिस की वजह ममता के पिता की ओर से समयसमय पर दी गई जान से मार देने की धमकियां थीं.

यहां तक कि ममता ने यह कह कर कई बार अपने दत्तक पिता रमेश से माफ कर देने की गुहार भी लगाई थी कि वह अपनी इस नई जिंदगी से काफी खुश है. लेकिन ममता द्वारा अपने से छोटी जाति के युवक से शादी कर लेने से बुरी तरह आहत रमेश का एक ही रटारटाया जवाब था, ‘ममता को मरना होगा, क्योंकि उस ने सोमबीर से शादी कर के हमें समाज और बिरादरी के आगे हमेशा के लिए नीचे झुका दिया है.’
ममता को जन्म देने वाली मां सरिता और पिता रामकेश भी उस की जान बख्शने को तैयार नहीं थे. रमेश तथा रामकेश भी कोर्ट में मौजूद थे.

ढाई बजे कोर्ट में अपना बयान दर्ज कराने के बाद ममता अपनी सास सरोज, देवर देवेंद्र के साथ लघु सचिवालय के गेट नंबर-2 से बाहर निकल रही थी. साथ में सबइंसपेक्टर नरेंद्र और लेडी हैडकांस्टेबल सुशीला भी थे. पांचों लोगों ने सड़क के पार पहुंच कर एक दुकान पर जूस पीया. वहां से निकल कर वे आटो पकड़ने के लिए आगे बढ़ ही रहे थे कि तभी पीछे से आए 2 मोटरसाइकिल सवारों ने ममता को 3 गोलियां मारीं.

एसआई नरेंद्र ने हमलावरों को मारने के लिए अपना रिवौल्वर निकालने की कोशिश की, लेकिन वे ऐसा कर पाते इस से पहले ही हमलावरों ने उन्हें गोली मार दी. वह सड़क पर ही ढेर हो गए. हेडकांस्टेबल सुशीला ने सरोज को बदमाशों की गोलियों से देवेंद्र सड़क से पत्थर उठाने के लिए नीचे झुका तो गोलियां उस के सिर के ऊपर से गुजर गईं. हमलावर उन पर और भी गोलियां चलाना चाहते थे, लेकिन गोलियां खत्म होने के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए.

योजना बना कर किया हमला

हमलावरों के भाग जाने के बाद हैडकांस्टेबल सुशीला जैसेतैसे घायल ममता और सबइंसपेक्टर नरेंद्र को उठा कर पीजीआई रोहतक ले गई. लेकिन दोनों को बचाया नहीं जा सका. घटना के बाद पूरे क्षेत्र में हडंकंप मच गया. हमलावरों को पकड़ने के लिए रोहतक में सड़कों पर बैरिकेड्स लगा कर तलाशी अभियान चला, लेकिन वे भागने में कामयाब रहे.

8 अगस्त को लेडी हेडकांस्टेबल सुनीता के बयान पर ममता और सबइंसपेक्टर नरेंद्र की संदिग्ध हत्यारों के विरुद्ध भादंवि की धारा 333, 353, 196, 307, 302, 34 और 120बी के तहत दर्ज कर के तफ्तीश शुरू की गई. इस केस की जांच आर्यनगर की थानाप्रभारी सुनीता को सौंपी गई.

रोहतक के एसपी जशनदीप सिंह ने डीएसपी रमेश कुमार को निर्देश दिया कि इस केस से संबंधित सभी आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करें. थानाप्रभारी सुनीता ने हमलावरों की तलाश में ममता के पिता रामकेश के गांव गद्दीखेड़ा में दबिश दी. वहां वारदात में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल तो मिल गई पर वहां से कातिल फरार हो चुके थे.

रामकेश और सरिता से पूछताछ करने के बाद दोनों को 10 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया. उसी दिन ममता के दत्तक पिता को भी पुलिस उन के घर से गिरफ्तार कर थाना आर्यनगर ले आई.

चारों से प्रारंभिक पूछताछ के बाद ममता हत्याकांड के पीछे यह बात निकल कर सामने आई कि उस की हत्या कराने में मुख्य हाथ उस के दत्तक पिता रमेश का हाथ था. उस की हत्या 7 लाख की सुपारी दे कर कराई गई थी, जिस में मुख्य भूमिका ममता के मौसेरे भाई मोहित उर्फ मंगलू ने निभाई थी.

मंगलू ने उत्तर प्रदेश के 2 पेशेवर शार्पशूटरों को ममता की हत्या की सुपारी दी थी. दोनों शूटर हत्या के एक दिन पहले गद्दीखेड़ी गांव आ गए थे. मोहित ने अगले दिन उन के लिए एक बाइक मुहैया करवाई और खुद शूटर्स की कार में बैठा रहा.

घटना वाले दिन जब ममता अपनी सास के साथ सड़क पर चल रही थी तो उस से कुछ ही दूरी पर खड़े उस के दत्तक पिता ने हत्यारों को ममता की ओर इशारा कर के उसे गोली मारने का इशारा किया.
उस का इशारा पाते ही मोटरसाइकिल सवार हत्यारों ने पहले तो ममता पर गोली चलाई, लेकिन जैसे ही उन्होंने सबइंसपेक्टर नरेंद्र को रिवौल्वर निकालते देखा तो उन्हें भी गोली मार दी. इस के बाद सभी गद्दीखेड़ा गांव पहुंचे.

वहां खाना खाने के बाद वे अपनी कार से फरार हो गए. पुलिस की जांच में यह तथ्य सामने आया कि ममता के मौसेरे भाई मोहित का मोबाइल फोन गद्दीखेड़ा गांव पहुंचने तक औन था. वहां पहुंचते ही उस का मोबाइल औफ हो गया था. घटना वाले दिन उस की आखिरी लोकेशन गद्दीखेड़ा गांव में ही थी.
उधर पोस्टमार्टम के बाद पुलिस की निगरानी में ममता की लाश का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उस की लाश को मुखाग्नि उस के ताऊ के लड़के नान्हा ने दी.

सबइंसपेक्टर नरेंद्र की लाश को उन के घर वालों के हवाले कर दिया गया, जिन्होंने उन का अंतिम संस्कार पुलिस सम्मान के साथ किया. उस समय कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वहां मौजूद थे. शहीद सबइंसपेक्टर नरेंद्र के परिवार वालों को सरकार की ओर से 60 लाख रुपए का अनुदान देने की घोषणा की गई है.

चूंकि नरेंद्र अनुसूचित जाति के थे, इसलिए इस दोहरे हत्याकांड में अब एससी/एसटी एक्ट जोड़ कर आगे की जांच रोहतक के डीएसपी रमेश कुमार करेंगे. ममता का पति सोमबीर और ससुर जयराज अभी भी सुनारिया जेल में बंद हैं. उन्हें अपने घर वालों की हत्या किए जाने की आशंका है. इस हत्याकांड में शामिल अन्य आरोपियों की जोरशोर से तलाश जारी है.

लिटिल चैंप का घमासान : बेटे के कैरियर को ले कर घमासान

कुछ लोग गृहस्थी को युद्ध का मैदान मानते हैं. लड़ने के लिए वैसे भी 2 पक्ष चाहिए ही. सच ही कहा गया है कि पतिपत्नी अलगअलग ग्रह से आते हैं. एक राहु होता है तो दूसरा केतु. सफल दांपत्य जीवन के लिए कितने ही लेख पढ़ लें, फिल्में देख लें, प्रवचन सुन लें, पूजापाठ कर लें, वास्तुशास्त्र के टोटके कर लें मगर आदर्श परिवार बनने का दूध अहमभाव के दही से फट ही जाता है.

सुबह हुई नहीं कि मैं भी फटे हुए दूध को क्षमायाचना की सूई से सीने बैठ गया.

‘‘सुनो प्रिये, मेरी बातों का बुरा मत माना करो. कल दफ्तर में बौस से झड़प हो गई. तुम तो जानती हो करीना कि धोबी अपना गुस्सा गधे पर उतारता है, सो मैं अपने दुर्व्यवहार के लिए क्षमा मांगता हूं,’’ मैं ने अपने कान पकड़ लिए.

‘‘तुम ने मुझे गधी कहा,’’ पत्नी दहाड़ी.

‘‘नहीं, भाग्यवान, यह तो मुहावरा है. अब अपना गुस्सा थूक दो,’’ मैं ने पुचकारते हुए कहा.

दांपत्य जीवन में इस प्रकार की तकरार को खुशहाली बनाए रखने का सूत्र माना जाता है. घर में चार बर्तन हों तो खड़केंगे ही. पत्नी करीना के साथ जब घमासान होने का खतरा दिखाई देता है तब मैं सफेद रुमाल निकाल कर समझौते की मुद्रा में आ जाता हूं.

उस से कहता हूं, ‘‘मेरी एग करी, जरा अपना मुंह फुलाने का कारण तो बताइए?’’

करीना का जब पारिवारिक घमासान करने का मूड होता है तो वह बेडरूम, जिसे मैं आधुनिक कोप भवन की संज्ञा देता हूं, में जा कर औंधे मुंह लेट जाती है. उस की घनी बिखरी केश राशि किसी काले चमकीले घने बाल बनाने वाली केश तेल कंपनी का जीवित विज्ञापन लगती है. वह घायल नागिन की तरह फुफकारने लगती है. ऐसी स्थिति में पत्नी को न मनाते बनता है न छेड़ते बनता है.

मैं ने नम्रतापूर्वक कहा, ‘‘हे करीना देवी, अब मान भी जाओ. अपना पिंटू बड़ा हो रहा है. वह तुम्हें इस रौद्र रूप में देखेगा तो उस के बालमन पर बुरा असर पड़ेगा. वह स्कूल से आता ही होगा. चलो, उठ कर कपड़े बदल लो.’’

पिंटू का नाम सुनते ही करीना झटके से उठ खड़ी हुई, ‘‘आप ठीक कहते हैं जी, पिंटू का मुझे तो खयाल ही नहीं रहा. इधर मैं कुछ दिनों से देख रही हूं कि उस का मन पढ़ने में नहीं लग रहा है. बाथरूम में दरवाजा बंद कर घंटों गुनगुनाता रहता है. लगता है उसे लिटिल चैंप बनने की सनक सवार हो गई है.’’

‘‘करीना, अच्छा हुआ जो तुम ने बता दिया. वरना हमारे बीच तूतू मैंमैं होती रहती. पिंटू के कैरियर को ले कर मैं चिंतित हूं. मैं तो उसे क्रिकेट का चैंपियन बनाना चाहता हूं. क्रिकेट में अच्छीखासी कमाई हो जाती है. दोचार टेस्ट खेलो और वारेन्यारे. पहले कहा जाता था :

पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब

खेलोगे कूदोगे होगे खराब.’’

अब सबकुछ उलटापुलटा हो रहा है. सोच, स्टेटस सब बदल रहा है. अब बच्चों का कैरियर डाक्टर, इंजीनियर बनने में नहीं बल्कि ‘चक दे इंडिया’ की तर्ज पर फिल्म गोल, लगान के नायक की तरह खेल में है. मैं तो चाह रहा हूं करीना कि हम अपने पिंटू को अच्छा खिलाड़ी बनाएं. लान टेनिस, चेस में क्या कम आमदनी है? खिलाड़ी देश का गौरव होता है. इस में सम्मान है, पैसा है, विदेश यात्रा है,’’ मैं ने अपनी भावना करीना को बतलाई.

‘‘मगर खिलाड़ी बनने के लिए 18 वर्ष की आयु होनी जरूरी है. मैं अपने पिंटू के कैरियर के लिए इतना इंतजार नहीं कर सकती,’’ करीना ने अपना पैंतरा बदलते हुए कहा, ‘‘जब टीवी कार्यक्रम के लिए उम्र आड़े नहीं आती. आप देख रहे हैं कि 10-12 वर्ष के छोटेछोटे बच्चे भी गीतसंगीत के माध्यम से देशविदेश में छा रहे हैं, लाखों में खेल रहे हैं… मैं तो अपने पिंटू को अच्छा गायक बनाऊंगी जी.’’

करीना जिस उत्साह से बोल रही थी उस में उस का गजब का आत्मविश्वास झलक रहा था. मुझे लगा, जिद्दी करीना पिंटू को लिटिल चैंप बना कर ही रहेगी. पिंटू के स्कूल से आते ही मैं बोला, ‘‘बेटा पिंटू, तुम्हारी मम्मी कह रही थीं कि तुम आजकल ठीक से पढ़लिख नहीं रहे हो. दिन भर डीवीडी में फिल्मी गीत सुनते रहते हो, गाने गाते रहते हो, यह ठीक बात नहीं है, बेटा. यह तुम्हारे पढ़नेलिखने के दिन हैं.’’

‘‘मैं सोचता हूं पापा, आखिर पढ़लिख कर वैसे ही तो कमाना है. मैं लिटिल चैंप बन कर 5-10 लाख रुपए हर साल कमा कर आप को दे दूंगा. पढ़ाई तो बाद में भी होती रहेगी.’’

करीना ने पिंटू को पुचकारते हुए कहा, ‘‘बेटा, जब तू लिटिल चैंप के स्टेज पर झूमझूम कर गाएगा तब मुझे भी मंच पर बुलाएगा न?’’ यह कह रोमांचित हो करीना ताली बजाने लगी.

मुझे लगा, करीना व मेरे बीच पिंटू के भविष्य को ले कर घमासान अब हुआ तब हुआ. करीना हवा में उड़ने लगी. भोली करीना को मालूम नहीं कि एक अरब से अधिक की जनसंख्या वाले देश में गायक बनना इतना आसान नहीं है. संगीत के सुरताल को समझने में, उस्ताद के पास रियाज करने में सालों निकल जाएंगे फिर भी गारंटी नहीं होगी कि पिंटू इस स्पर्द्धा में टिका रहेगा. ऐसे में पिंटू न घर का रहेगा न घाट का.

मैं जानता हूं, करीना को समझाना इतना आसान नहीं है. एक बार रेत में से तेल निकाला जा सकता है मगर जिद्दी करीना को उस के भ्रमजाल से निकालना आसान नहीं.

मैं ने अपना आखिरी दांव खेलते हुए कहा, ‘‘करी, पहले पिंटू को शिक्षा पूरी कर लेने देते हैं फिर बड़ा होने पर उसे जो बनना है वह बने. मुझे भी पिंटू के उज्ज्वल भविष्य की चिंता है. टीवी कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए जबर्दस्त आत्मविश्वास, साधना, श्रम व धैर्य की जरूरत पड़ती है. गायक बनने के लिए अच्छा गला भी होना चाहिए, जो अपने पिंटू का नहीं है.’’

‘‘पिंटू मेरा बेटा है जी,’’ करीना बोली, ‘‘बस, उस के मन में एक बार बैठ जाए कि उसे लिटिल चैंप बनना है, वह बन जाएगा. गले का क्या है. कालीमिर्च, तुलसी, मुलेठी, अदरक तो गले के लिए वरदान हैं जी. 2 दिन में ही उस की आवाज सुरीली हो जाएगी देखना… बस, अब मैं नहीं जानती और न कुछ सुनना चाहती हूं.’’

करीना रूठ कर कोप भवन में चली गई. जब नारी बेडरूम में जाती है तब वहां किसी घमासान की आधारशिला रखी जाती है, जिस से मजबूत से मजबूत गृहस्थी की ईंटें हिलने लगती हैं. मैं डर रहा हूं कि पिंटू के कैरियर को ले कर हमारे घर के घमासान के आडियो की जगह वीडियो से पड़ोसी मुफ्त का आनंद न लेने लगें.

मैं देख रहा था, पिंटू टीवी पर लिटिल चैंप का प्रोग्राम फुल वाल्यूम के साथ देख कर मजे ले रहा है. करीना खुश हो कर कह रही है, ‘‘जीयो मेरे लिटिल चैंप.’’

मैं लिटिल चैंप की दीवानी करीना को कैसे समझाऊं कि पिंटू को कितने एस.एम.एस. मिलेंगे. मेरे लिए एस.एम.एस. का अर्थ तो सुरीला महासंग्राम होता है. और यह महासंग्राम देरसवेर मेरी गृहस्थी के प्रांगण में हो कर रहेगा.

कुरीतियों के खिलाफ ग्रीन ग्रुप की हिम्मती औरतें

देश के नक्सलियों की मार  झेल रहे राज्यों छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार से सटे हुए उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में चंदौली, मीरजापुर और सोनभद्र का नाम सुनते ही लोगों की कभी रूह कांप उठती थी.

कुछेक घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो नक्सलियों का नैटवर्क अब इन इलाकों में खत्म होता जा रहा है. औरतों को चौखट से बाहर निकाल कर मर्दों के बराबर खड़ा किया जा रहा है. औरतों के ग्रीन ग्रुप बनाए जा रहे हैं. इन औरतों को पुलिस के बराबर हक हासिल हैं. यह इलाका उत्तर प्रदेश के उन जिलों में शुमार है जहां नक्सलियों का असर रहा है. लेकिन अब धीरेधीरे इन में कमी आ रही है.

मीरजापुर के पुलिस सुपरिंटैंडैंट की अनोखी पहल का ही नतीजा कहा जा सकता है, जिन्होंने कुछ नया करने के मकसद से औरतों को इकट्ठा किया और उन्हें ट्रेनिंग देते हुए आगे लाने का काम किया है.

पुलिस सुपरिंटैंडैंट आशीष तिवारी बताते हैं कि ग्रीन ग्रुप में एक गांव की 15 औरतें शामिल होंगी. इन को पुलिस का दर्जा मिलेगा. इस ग्रुप की औरतें नशे और जुए के लती नौजवानों को सुधारने का काम करेंगी. वे घरेलू हिंसा और औरतों को सताने के दूसरे मामलों को भी सुलझाएंगी. गांव में खुली चौपाल लगा कर तरक्की और दूसरे मुद्दों पर चर्चा करेंगी. साथ ही, इलाके में संदिग्ध लोगों और नक्सलियों की हरकतों के बारे में भी जानकारी देंगी.

women of green group against the bad practices

ग्रीन ग्रुप से जुड़ीं औरतों को ट्रेनिंग देने की जिम्मेदारी वाराणसी की एक होप संस्था को दी गई है.

होप संस्था द्वारा पुलिस सुपरिंटैंडैंट आशीष तिवारी के डायरैक्शन में मीरजापुर जिले के नक्सली इलाके के 10 गांवों में नौजवानों को नशे, जुए व दहेज जैसी कुरीतियों से दूर कर औरतों व बच्चों के साथ होने वाले अपराधों के खिलाफ जागरूक करने के मकसद से चलाई गई मुहिम और इस के लिए बने ग्रीन ग्रुप के कामों के नतीजे अब दिखने लगे हैं.

कुछ समय पहले ही होप संस्था द्वारा इन औरतों को अपनी हिफाजत के लिए कराटे की ट्रेनिंग भी दी गई थी. अब ये औरतें इतनी ताकतवर हो चुकी हैं कि नशेड़ी इन्हें दूर से देख कर या तो रास्ता बदल लेते हैं या फिर छिप जाते हैं.

अति पिछड़े खासकर नक्सली इलाके में रहने वाले लोगों की जिंदगी में सुधार लाने व उन्हें कुरीतियों की जकड़न से बाहर निकालने की गरज से बीएचयू, जेएनयू और काशी विद्यापीठ के छात्रों द्वारा बनाई गई होप संस्था ने वाराणसी के देहाती इलाके से अपनी इस मुहिम को शुरू किया था जो अब मीरजापुर और चंदौली इलाकों में भी लोगों को जागरूक करने का काम कर रही है.

संस्था की ओर से हरी साड़ी पहनी 150 ग्रीन ग्रुप की औरतों द्वारा दूसरी औरतों को नशामुक्ति, जुआ व औरतों के साथ होने वाले जोरजुल्म के बारे में समझाया व जागरूक किया गया.

मडि़हान विधायक रमाशंकर सिंह पटेल कहते हैं कि अगर औरतें अपने मन में ठान लें कि नशा, जुआ व उन्हें सताया जाना रोकना है तो यह काफी हद तक रुक सकता है. इन की कोशिशों से गांव में फैली तमाम तरह की बुराइयों को भी खत्म करने में मदद मिल सकती है.

ग्रीन ग्रुप की औरतें गांव में होने वाले छोटेमोटे अपराधों की रोकथाम की दिशा में भी काम कर रही हैं. वे लीगल लैवल पर गांव की समस्याओं को सुलझाने के साथसाथ बड़े अफसरों के यहां भी जा कर अपनी और गांव वालों की बातों, समस्याओं को बड़े ही दमदार तरीके से रख रही हैं.

मीरजापुर के कलक्टर अनुराग पटेल ने ग्रीन ग्रुप की औरतों को भरोसा दिया है कि उन्हें जल्द से जल्द होने वाली समस्याओं से छुटकारा दिलाया जाएगा.

इस दौरान कलक्टर ने इस ग्रुप की औरतों को एक ड्रैस में देख कर पहले तो हैरानी जताई, बाद में ग्रुप की औरतों के साथ आए एसपी आशीष तिवारी द्वारा उन्हें ग्रुप की औरतों की कोशिशों के बारे में बताए जाने पर कलक्टर ने उन की समस्याओं के निबटान के साथ ग्रीन ग्रुप के कामों की तारीफ की.

घरवालियों को डरा रहा है महंगाई का भूत

महंगाई का भूत अब घरवालियों को डरा रहा है. पैट्रोल, डीजल और घरेलू गैस के दाम तो बढ़ ही गए हैं और भी दूसरी बहुत सी चीजों के दाम बढ़ रहे हैं और पहले दामों के आदी लोगों को इस नई मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है. इस बार की महंगाई का जिम्मा असल में सीधासीधा नोटबंदी और जीएसटी पर जाएगा. तेल की विश्व बाजार में बढ़ती कीमतें भी इतनी जिम्मेदार नहीं हैं.

सरकार ने नोटबंदी से देश के व्यापारों को चरामरा दिया था. सारे तमाशे के बाद पता चला कि कमरों में भरा काला धन तो सफेद हो कर बैंकों में आ गया और जितने नोट चलन में थे उन के 99% बैंकों से होते हुए रिजर्व बैंक में पहुंच गए. इस दौरान 3 से 6 महीनों की नक्दी की किल्लत ने व्यापारों की कमर तोड़ दी.

दुर्घटना के बाद डाक्टरों का बिल तो आता ही है, ऊपर से पाखंडी पंडितों पर अंधविश्वास करने वाले फिर टोनेटोटकों पर ही खर्च करने लगते हैं. इसी तर्ज पर भगवा सरकार ने जीएसटी थोप दिया कि एक टैक्स सब की जिंदगी आसान बना डालेगा, पर हुआ उलटा ही. हरेक की जिंदगी कंप्यूटर कुंडलियों में फंस कर रह गई है और आम घरों तक इस आग की ताप पहुंच रही है.

आंकड़ेबाजी से चाहे जो लगे कि अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही है पर असल में लाखों व्यापार ठप्प हो गए हैं. उन के साथ सीधे जुड़े कर्मचारियों के घर अब पैरालाइसिस में हैं.

महंगाई का असर खर्च पर कम मन पर पहले पड़ता है. हरकोई एक दाम का आदी हो जाता है और उसी के अनुसार अपना बजट बनाता है. पर इस तरह की भयंकर ऐपिडैमिक संतुलन बिगाड़ देती है.

परेशानी यह है कि सरकार की आम लोगों की परेशानियों को दूर करने में कोई रुचि नहीं है. सरकार पैट्रोल के दामों में कमी करने को तैयार नहीं जबकि इस पर बहुत ज्यादा टैक्स लगे हैं. असल में सरकार ही पैट्रोल व डीजल पर कालाबाजारी कर रही है. इस का व्यापार अपने या कुछ के हाथों में रख कर उन्हें भी लाभ पहुंचा रही है और खुद भी कमा रही है.

महंगाई का आलम यह है कि भारत जैसे गरीब देशों में जरा सी चीनी, टमाटर, आलू ज्यादा पैदा हो जाएं दाम धड़ाम से गिर पड़ते हैं. थोड़ी सी सस्ती हुई चीज भी घरों में खरीद कर नहीं रखी जाती, क्योंकि इतने पैसे ही नहीं बचते. लोग अब बच्चों की पढ़ाई, इलाज और यहां तक कि मौजमस्ती के लिए तीर्थयात्रा तक में कर्ज लेते हैं. महंगाई ने साल की बचत को बुरी तरह हड़प लिया है. पैसा जमा कर के भविष्य के लिए रखने की आदत को तो नोटबंदी ने पहले ही नष्ट कर दिया था.

अब तो हरिभजन गाओ, एटीएम की ठंडी हवा खाओ.

पोंगापंथ के चक्कर में दलितों की कटती जेब

बस्ती, उत्तर प्रदेश के विशुनपुरा गांव के दलित जाति के रामदीन को जब औलाद नहीं हुई तो उन्हें एक बाबा ने बताया कि यह सब उस के पिछले जन्म में किए गए बुरे कर्मों के चलते हुआ है जिस वजह से उसे औलाद नहीं हुई. अगर उस ने इस जन्म में अपने कर्मों को नहीं सुधारा तो फिर से अगले जन्म में उसे इसी तरह बेऔलाद रहना पड़ेगा.

रामदीन को लगा कि हो न हो, बाबा सही कह रहे हैं. उस ने बाबा के कहे मुताबिक इस समस्या का उपाय पूछा तो बाबा ने कहा कि उसे पिछले जन्म में किए गए बुरे कर्मों के पापों से छुटकारा पाने के लिए 9 दिनों तक कथा सुननी होगी. साथ ही, ऊंची जाति के लोगों को भोजन भी कराना होगा.

बाबा की बात सुन कर रामदीन ने कहा कि वह अपने घर कथा तो सुन लेगा लेकिन दलित होने के चलते कोई भी ऊंची जाति का आदमी उस के घर भोजन नहीं करेगा.

बाबा ने कहा कि वह किसी ऊंची जाति के आदमी के घर भोजन तैयार करने का पैसा दे दे और उसी के घर पर भोज का इंतजाम हो जाएगा.

रामदीन को बाबा की बात जंच गई और उस ने अपने घर पर 9 दिनों के लिए कथा का आयोजन किया और ऊंची जाति के लोगों के लिए एक बड़े जाति के आदमी के घर पर भोजन का इंतजाम शुरू कर दिया.

एक गरीब रिकशा चालक रामदीन को 9 दिनों तक कथा के आयोजन, भोजन के इंतजाम व दानदक्षिणा के लिए तकरीबन 2 लाख रुपए की जरूरत थी. उस ने पिछले जन्मों के बुरे कर्मों से छुटकारा पाने के लालच में थोड़े से खेत व पत्नी के गहनों को बेच कर पैसों का इंतजाम किया और उस बाबा के कहे मुताबिक कथा सुनने लगा.

लेकिन बाद में बाबा ने और भी खर्चे बढ़ा दिए जिस के चलते रामदीन को अपना घर तक गिरवी रख कर ब्याज पर पैसे उठाने पड़े, तब कहीं जा कर उस ने कथा, दानदक्षिणा व भोजन का इंतजाम करने में कामयाबी पाई.

पिछले जन्म के बुरे कर्मों से छुटकारा पाने के लालच के चलते रामदीन ने अपनी माली हालत बहुत ही खस्ता कर ली थी जिस से उस के घर में खाने तक के लाले पड़ गए क्योंकि उस ने अपनी सारी जमापूंजी पुण्य कमाने के लालच में गंवा दी थी.

बेवकूफी और निकम्मापन पुण्य कमाने, पिछले जन्मों के बुरे कर्मों के डर से छुटकारा पाने का लालच दलितों में बेवकूफी व निकम्मेपन की तरफ इशारा करता है जिस का फायदा शातिर किस्म के बाबा उठाते हैं और सदियों से उन्हें बेवकूफ बनाते आ रहे हैं. इस वजह से दलित तबका गरीबी व पिछड़ेपन के दलदल से निकल ही नहीं पा रहा है. आज भी यह तबका बदहाली का शिकार बना हुआ है, जबकि सरकार इस को आगे बढ़ाने के लिए तमाम तरह की सहूलियतें दे रही है.

सरकार की सहूलियतों के चलते दलित और पिछड़ों में जो भी आगे बढ़े हैं वे अपनी जाति के दूसरे लोगों को आगे बढ़ाने के लिए पीछे मुड़ कर नहीं देखते हैं और न ही उन को ऊंचा उठाने के लिए कोई काम करते हैं, बल्कि वे भी ऊंची जाति की जमात में शामिल होने की कोशिश करते हैं.

पोंगापंथ के साए में दलित पिछड़े अपनी बदहाली के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं क्योंकि उन की बेवकूफी का फायदा बाबाओं द्वारा उठाया जाता है. बाबाओं द्वारा धर्मकर्म का डर दिखा कर उन की जेब खाली कर दी जाती है और ये इन बाबाओं से लुटने को हर वक्त तैयार भी रहते हैं. इन्हें अगले जन्म में ऊंची जातियों में जन्म लेने का लालच दिया जाता है.

दलितों के मन में धर्मकर्म और अंधविश्वास का डर इस कदर समाया हुआ है कि ये बेवकूफ इन बाबाओं के बहकावे में आ कर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं.

जहां दलित तबका पुण्य कमाने और पिछले जन्म के बुरे कर्मों से छुटकारा पाने की जुगत में अपनी जेबें खाली करने में लगा है वहीं दूसरे तबकों से कहीं ज्यादा इस तबके के लोगों में अंधविश्वास की जड़ें फैली हुई हैं. दलित तबके से जुड़े लोग हर छोटीमोटी बीमारी और समस्या की वजह भूतप्रेत और काली शक्तियों को मानते हैं. ऐसे में ये लोग डाक्टर से इलाज न करा कर झाड़फूंक से समाधान ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं.

अंधविश्वास का दायरा सिर्फ यहीं तक नहीं सिमटा है, बल्कि इस तबके से जुड़े लोग तंत्रतंत्र से अमीर होने के सपने भी देखते हैं. झाड़फूंक के दौरान इन तबके की औरतों और लड़कियों की इज्जत लुटना आम बात है.

दलित जातियों में तांत्रिकों और झाड़फूंक करने वालों की तादाद में बड़ी तेजी से इजाफा हुआ है और ये तांत्रिक हर छोटीमोटी बीमारी में भूतप्रेत का डर दिखा कर झाड़फूंक का नाटक करते हैं. इसी की आड़ में बाबाओं द्वारा दलित जाति की लड़कियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ भी किया जाता रहा है.

अपनों से लुटते दलित जहां एक तरफ ऊंची जातियों के हाथों दलित धर्मकर्म और पोंगापंथ के चक्कर में पड़ कर लुटते रहे हैं, वहीं दलित जातियों में भी कुछ शातिर किस्म के लोग अपनी ही जाति के लोगों को धर्मकर्म के नाम पर बेवकूफ बना कर लूटने में लगे हैं.

दलित जातियों में से ही कुछ लोग बाबागीरी का चोला ओढ़ कर दलित जातियों के लोगों को बौद्ध कथा और अंबेडकर कथा सुनाने के नाम पर उनसे मोटी रकम खर्च करवाते हैं. और अब तो इन के शादीब्याह भी दलित जाति के बाबाओं द्वारा किए जाने लगे हैं.

ये दलित जाति के बाबा ऊंची जाति के बाबाओं से कम शातिर नहीं होते हैं. चूंकि दलित जातियों के बाबा उन की अपनी जाति के होते हैं इसलिए उन की कही बातों पर यह जल्दी विश्वास कर लेते हैं और धर्मकर्म, अंधविश्वास और झाड़फूंक के चक्कर में पड़ कर अपनी माली हालत को खस्ता कर लेते हैं. इस के चलते बाद में वे नुकसान का सामना करते हैं.

वीआईपी के कुछ नए खट्टेमीठे अर्थ

हमारे शब्दछेड़ू मित्र प्रो. अर्थसिंह को हर बात में नए अर्थ ढूंढ़ लेने की आदत है. यों उन का नाम पृथ्वीसिंह है मगर हम यार लोग उन की अर्थ निकालने की आदत के कारण उन्हें अर्थ सिंह के नाम से बुलाते हैं. यह नाम ज्यादा ठीक भी बैठता है. वह भी खूब मजा लेते हैं अपने नए डाउन टू अर्थ नाम का. अभी कल ही प्रोफेसर मिले. पूछा, ‘‘कहां रहते हो?’’ बोले, ‘‘आजकल कुरसियों के नए अर्थ खोज रहा हूं.’’

‘‘कुरसियों के नए अर्थ? क्या विषय है यार?’’ हम ने कह तो दिया मगर तत्काल दिलचस्पी ने हमें घेर लिया. कहा, ‘‘एक्सप्लेन करो.’’

अर्थसिंह ने समझाया, ‘‘वीआईपी होना एक चमकदार कुरसी होना है, क्यों?’’

हम ने कहा, ‘‘ठीक है, मगर इस का मतलब तो सीधा है, वेरी इंपोर्टेंट पर्सन. हां, खुशवंत सिंह के किसी कालम में हम ने 2 गलत से अर्थ पढ़े थे ‘वेरी इंपोर्टेंट (महत्त्वपूर्ण) प्राब्लम’ और ‘वेरी इनकन्विनिएंट (असुविधाजनक) पर्सन.’ अर्थसिंह खिलखिला कर हंसने लगे, ‘‘हां, यार, बडे़ जबर्दस्त अर्थ थे. मगर थे खरखरे, मैं ने भी कोशिश कर कुछ नए अर्थ खोजे हैं, मुलाहिजा फरमाएं, शायद आप को स्वादिष्ठ लगें. ‘‘सब से पहले कुछ मीठे अर्थ…‘वेरी आइडियल (उत्कृष्ट) पर्सन’, ‘वेरी आइडल (आराध्य) पर्सन’, ‘वर्सेटाइल (बहुमुखी) इंडियन पर्सनेलिटी’, ‘वेरी इल्सट्रियस   (उदाहरणीय) पर्सन’ ‘वेरी इंपार्शियल (निष्पक्ष) पर्सन’ ‘वेंचर (साहसिक कार्य) इनीशिएटिंग पर्सन’, ‘वेरी इंटैलिजेंट पायनियर (मार्गदर्शक)’, ‘वेरी इंसपायरिंग (प्रेरक) पर्सन’, ‘वेरी इंटैलिजेंट पर्सन’.’’

हम ने कहा, ‘‘वाह, क्या सही अर्थ हैं…बेहद शालीन व सभ्य. आप ने अपने नाम को सही रूप में चरितार्थ कर दिखाया. आजकल के वीआईपीज को अच्छा लगने वाला काम किया. एक लिस्ट अगर आप सभी वीआईपीज के पास भिजवा दें तो सामाजिक व आध्यात्मिक कार्यों को समर्पित उन की पत्नियों की प्रसिद्ध संस्था आप को सहर्ष सम्मानित कर सकती है. इस बहाने आप अखबारों में छा जाएंगे.’’

प्रो. साहब के चेहरे पर संतुष्टि भरी मुसकान आ चुकी थी. वह बोले, ‘‘अब कुछ और किस्म के अर्थ बडे़ अदब के साथ पेश करता हूं. थोड़े कड़वे हैं, प्लीज, आराम से चखना… ‘वेरी आइडल (समयगंवाऊ) पर्सन’, ‘वेरी इंडिफ्रेंट (उदासीन) पर्सन’, ‘वेरी इग्नोरेंट (अनजान) पर्सन’, ‘वेरी इनआर्टिकुलेट (अस्पष्ट) पर्सन’, ‘वेरी इग्नोरिंग (उपेक्षाकरू) पर्सन’, ‘वेरी वेरी इलिबरल (संकीर्ण) पर्सन’, ‘वेरी इम्मोबाइल (गतिहीन) पर्सन’, ‘वेरी इम्मोडेस्ट (अशिष्ट) पर्सन’, ‘वेरी इम्पेशेंट (उतावले) पर्सन’…’’

‘‘बसबस,’’ अर्थसिंह को रोका हम ने और कहा, ‘‘क्या गजब करते हो यार.’’

‘‘क्या हुआ? अर्थ गलत हो गया क्या? कौन सा गलत है, बताओ? अभी सही अर्थ खोजने की कोशिश करता हूं.’’

अर्थसिंह को शायद शक होने लगा कि उन्होंने ठीक अर्थ नहीं निकाले हैं. हम ने उन से साफ कह दिया, ‘‘आज जमाना सही अर्थों का नहीं है, बल्कि सब को उन की पसंद के अर्थ परोसने का है. आप यह कड़वे अर्थ किसी वीआईपी के पास भी नहीं पहुंचने देना, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा.’’

प्रोफेसर थोड़े उखड़े, घबराए, लड़खड़ाए. अब वीआईपी शब्द का रोबदाब व असर तो होता ही है. हम ने कहा, ‘‘घबराइए नहीं, इस समय आसपास कोई वीआईपी नहीं है, पर ध्यान रखिएगा.’’

कुछ देर हम दोनों चुप रहे. शायद कड़वे अर्थों का असर होने लगा था. थोड़ी देर बाद प्रो. अर्थसिंह जाने लगे तो हमें लगा कि अभी उन के पास वीआईपी जैसे सजीले, गर्वीले, ग्रेट शब्द के कुछ और अर्थ भी हैं, जो वह बताना चाहते थे मगर हम ने ही उन्हें  रोक दिया था. अब जिम्मेदारी हमारी बनती थी, सो हम ने उन से अनुरोध किया, ‘‘बुरा न मानें, बाकी अर्थ भी बता दें. आप ने सच, बड़ी मेहनत की है.’’

अर्थसिंह बोले, ‘‘वीआईपी के मीठे और कड़वे अर्थ तो आप को बता चुका हूं, अब जो अर्थ बता रहा हूं उन्हें मैं ने खट्टी श्रेणी में रखा है. कुछ नमूने देखें… ‘वैरिड (विविध) इनट्रस्ट पर्सन’, ‘वेरी इंफ्लेमेबल (ज्वलनशील) पर्सन’, ‘वेरी इंबैलैंस (विषम) फिजीशियन’, ‘वेरी इंडिपेंडेंट (स्वतंत्र) पर्सन’, ‘वेरी इमेजिनेटिव (कल्पनाशील) पैट्रिएट (देशभक्त)’, ‘वेरी इनसिंसियर (कपटी) पार्टनर’…कुछ और भी हैं, पर रहने दो.’’

अर्थसिंह के बताए अनर्थ जैसेतैसे निबट गए. शाम को किसी वीआईपी से मिलने जाना था मगर यह निश्चय किया कि कल जाऊंगा ताकि नए अर्थ सुबह तक भूल जाऊं. डर लगने लगा था कहीं याद रह गए तो मुश्किल हो जाएगी.

राजस्थान : भगवाई बलवा सिर्फ सत्ता के लिए

प्रदेश में भगवा ब्रिगेड के हिंदू संगठनों का बलवा दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है. बूंदी में हर साल होने वाले टाइगर हिल मानधाता पूजन के दौरान हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं के अडि़यल रुख के चलते पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा.

झगड़ा पूजा वाली जगह को जाने वाले रास्ते को ले कर शुरू हुआ. मानधाता हनुमान मंदिर को जाने का रास्ता मीरा साहब की दरगाह से है. प्रशासन ने इस बार इस रास्ते से मंदिर जाने पर रोक लगा दी थी. हिंदू महासभा इसी रास्ते से मंदिर जाने पर अड़ी रही.

हिंदू महासभा के कहने पर सोमवार, 1 जनवरी, 2018 की सुबह से ही बड़ी तादाद में भगवाई मानधाता बालाजी की ओर जाने के लिए इकट्ठा होने लगे थे.

पुलिस ने लोगों को रोकने की कोशिश की, लेकिन जब वे नहीं माने तो उन पर लाठियां बरसानी पड़ीं. एक दर्जन से भी ज्यादा लोगों को चोटें आईं.

बूंदी की घटना वाले दिन 1 जनवरी को सांप्रदायिक दंगा भड़काने के मकसद से अजमेर में एक भड़काऊ भाषण का वीडियो वायरल हुआ. भाषण देने वाले शख्स को हिरासत में ले लिया गया.

पुलिस सुपरिंटैंडैंट राजेंद्र सिंह के मुताबिक, शिव सेना हिंदुस्तान नाम के हिंदूवादी संगठन की ओर से जारी वीडियो में और बहुत सी मुसलिम जगहों की तरह अजमेर दरगाह को भी हिंदू मंदिर बताया गया और बाबरी मसजिद की तर्ज पर उसे भी ढहाने का माहौल  बनाया गया.

चिश्ती फाउंडेशन के चेयरमैन सलमान चिश्ती ने भी कहा कि पिछले 800 सालों से हिंदूमुसलिम एकता के प्रतीक इस दरगाह को पहली बार विवाद में घसीटने की कोशिश की जा रही है. देवबंद के उलेमा ने भी सरकार से ऐसे संगठनों के खिलाफ कार्यवाही करने और इन संगठनों को बैन करने की मांग की.

वैसे, शिव सेना हिंदुस्तान ने वायरल हो रहे वीडियो से खुद को दूर कर लिया. पर मामले की असलियत तो यही है कि किसी तरह उत्पात मचाया जाए.

इस वीडियो में शिव सेना हिंदुस्तान का एक सदस्य लखन सिंह धार्मिक आधार पर भड़काऊ बातें कहता हुआ पाया गया.

इस से पहले भी राजस्थान के बिसाऊ (झुंझुनूं), सूरसागर (जोधपुर) व जैसलमेर में धार्मिक जुलूस निकालने के दौरान तनाव व पत्थरबाजी की खबरें आईं तो देशभर में सियासत द्वारा प्रायोजित दंगों की यादें फिर से ताजा हो गईं.

जयपुर के चौमूं इलाके में भी एक लड़की से छेड़खानी की अफवाह फैली और हिंदू बनाम मुसलिम की आड़ में जाटों को मुसलिमों से लड़ाने की साजिश सामने आई. जब जानकारी जुटाई गई तो यह महज अफवाह निकली.

जयपुर के ग्रामीण व बाहरी इलाकों से कोचिंग के लिए चौमूं व आसपास के इलाकों से आए नौजवानों को दंगों की आग में धकेला जा रहा है. पंचायतें, संभाएं कर के सोशल मीडिया के जरीए इलाके में मुसलिमों से मुक्त करने की कसमें दिलवाई जा रही हैं.

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर दंगे की शुरुआत भी छेड़खानी की घटना की आड़ में शुरू की गई थी जिस में जाटों के हजारों नौजवान जेल की यातनाएं व मुकदमों की मार झेल रहे हैं और साजिश करने वाले सत्ता के मजे ले रहे हैं.

राजस्थान में इसी साल चुनाव हैं. भगवा ब्रिगेड भगवाई मुद्दे के सहारे सत्ता पर काबिज होने के मनसूबे पाल रही है.

जिस गुजरात मौडल की बात दुनियाभर में कर के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली तक सफर तय किया है, वह गुजरात मौडल और कुछ नहीं था, बल्कि दंगों से सजे श्मशान व कब्रों पर की गई राजनीतिक खेती ही थी, जो अब दोबारा पैदा तो हुई, लेकिन उपज कम मिली.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से तुरंत पहले भी मुजफ्फरनगर में भाजपा ने आजम खां के बहाने दंगों की बुनियाद रखी थी. भाजपा के नेता संगीत सोम पर दंगा भड़काने का मुकदमा दर्ज हुआ व गिरफ्तारी भी हुई. साध्वी प्राची के भड़काऊ भाषण सब ने सुने हैं.

हरियाणा में हिंदूहिंदू कर के व तमाम जुमले फेंक कर सत्ता पर कब्जा कर लिया गया. हरियाणा में ही किसान रैली कर के नरेंद्र मोदी ने किसानों के लिए लाभकारी स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने का वादा किया था और अब सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट दे कर मोदी सरकार कह रही है कि स्वामीनाथ रिपोर्ट लागू करना मुमकिन नहीं है.

चुनावों के दौरान हरियाणा में ही सेना वालों की तादाद देखते हुए नरेंद्र मोदी ने रिटायर्ड फौजियों की रैली कर के वन रैंक व वन पैंशन का वादा किया था और आज भी रिटायर्ड फौजी जंतरमंतर पर धरने पर बैठे हैं. उन की कोई सुध लेने वाला नहीं है.

हरियाणा में मुसलिम बहुत कम हैं, तो हिंदूमुसलिम विवाद तो खड़ा नहीं हो सकता, इसलिए किसानों व सेना के लोगों से झूठे वादे कर के सत्ता हड़प ली गई. आज हरियाणा के किसान बरबाद हो रहे हैं, लेकिन हरियाणा की सरकार सरकारी खजाने से गीता जयंती महोत्सव मना रही है.

अब राजस्थान की तरफ इन्होंने कदम बढ़ाए हैं. हिंदूमुसलिम व जातीय नफरत के रूप में दोनों रास्ते सामने पेश कर रहे हैं. आप को जिस में उलझना है उलझ लीजिए और अपने मुद्दों को भूल कर अपनी मौत की कब्र खोद लीजिए.

पिछले साल भीलवाड़ा में दंगा रोकने वाले अफसर पंकज चौधरी को परेशान किया जा रहा है. इसी साल डीडवाना में भाजपा के मंत्री के समर्थकों द्वारा देश विरोधी नारे लगवाए गए. उस से पहले नागौर में गौहत्या के नाम पर दंगा भड़काने की कोशिश की गई.

जाट बहुल नागौर इलाके में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राष्ट्रीय अधिवेशन किया गया था और अब एकसाथ झुंझुनूं, जोधपुर व जैसलमेर से ऐसी खबरें आना इसी तरफ संकेत कर रही हैं.

बाड़मेर में करणी सेना के झंडाबरदार सुखदेव गोगामेड़ी ने ‘35 बनाम एक’ कर के दूसरा रास्ता भी खोल दिया है.

राजस्थान में भगवा ब्रिगेड कोई बड़ा हिंदूमुसलिम दंगा कराने में कामयाब नहीं हुई है, इसलिए ये लोग दूसरा रास्ता भी आजमाना चाहते हैं.

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