

मोनालिसा भोजपुरी फिल्मों की जानीपहचानी हीरोइन हैं. वे 125 से ज्यादा बंगाली और भोजपुरी फिल्में कर चुकी हैं. इन दिनों वे स्टार प्लस के एक शो ‘नजर’ में नजर आ रही हैं.
अपनी फिटनैस को ले कर मोनालिसा बहुत जागरूक हैं. वे कहती हैं कि अगर आप फिट रहते हैं तो आप पर सारे कपड़े फबते यानी अच्छे लगते हैं.
अपने फैंस को मोनालिसा ने कुछ फिटनैस टिप्स दिए हैं. आइए, जानें क्या कहती हैं मोनालिसा अपनी फिटनैस के बारे में:
फिटनैस हम सभी के लिए बहुत जरूरी है. हम सभी को अपनी फिटनैस पर बहुत ध्यान देना चाहिए, क्योंकि हम फिट हैं तो सबकुछ है. अगर हम फिट नहीं तो कुछ भी नहीं. इसलिए मैं चाहती हूं कि हर इनसान अपनी फिटनैस को ले कर जागरूक रहे और फिट रहे.
मैं 2 साल पहले बहुत हैवी हो गई थी. मेरे पति मुझे कहते थे कि तुम मेनटेन नहीं कर रही हो. मैं खुद भी महसूस कर रही थी कि मेरा वजन बढ़ता जा रहा है. फिर मैं ने 10 किलो वजन कम किया.
फिटनैस के लिए जरूरी है कि आप अपना वजन कंट्रोल में रखें. जितना वजन होना चाहिए उसे बना कर रखें.
फिट रहने के लिए मैं रोज योग करती हूं. मैं योग शिल्पा शेट्टी का यूट्यूब चैनल देख कर करती हूं. इस से मुझे अपना वजन कंट्रोल करने में बहुत मदद मिलती है. साथ ही, मैं खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रख पाती हूं.
योग करने का सब से बड़ा फायदा यह है कि यह आपको पूरी तरह से फिट रखता है. मैं हर रोज कम से कम 45 मिनट तक योग करती हूं.
योग में वैसे तो हर आसन की अपनी अहमियत है लेकिन सूर्य नमस्कार जरूर करना चाहिए, क्योंकि यह एक संपूर्ण योग आसन है जिस के सब से ज्यादा फायदे आप को मिलते हैं.
इस के अलावा जब आप योग करना शुरू करते हैं तो आप की त्वचा में भी ग्लो नजर आने लगता है और आप यंग दिखते हैं, यंग फील करते हैं.
मैं औयली फूड नहीं खाती. जंक फूड तो बिलकुल भी नहीं खाती. इस के अलावा मेरी डाइट में प्रोटीन की मात्रा ज्यादा रहती है. मैं उबला हुआ खाना ज्यादा पसंद करती हूं. दाल और चिकन मुझे बहुत पसंद है, वह भी बहुत कम मसाले के साथ.
मैं बहुत काम करती रही हूं और लगातार काम करती हूं. इतना होने के बावजूद मेरे साथ कभी ऐसा नहीं हुआ कि मैं ने अपनी नींद के साथ समझौता किया हो. मुझे सोने को ले कर कभी समस्या नहीं रही. अपनी नींद को मैं पूरी कर ही लेती हूं. कई बार शूटिंग के दौरान भी जब समय मिल जाता है तो सैट पर ही आराम कर लेती हूं या फिर सो जाती हूं. बीचबीच में रैस्ट करने से मुझे थकान नहीं होती.
सुबह उठना पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि मैं रात को कितने बजे सोई क्योंकि मुंबई में आमतौर पर हम देर से सोते हैं इसलिए देर से उठते भी हैं.
सुबह नाश्ते में मैं ओट्स और उबले हुए अंडे खाती हूं. मैं हर रोज 2 से ढाई घंटे के बाद कुछ न कुछ खाती रहती हूं और रात को 8 बजे के बाद मैं कुछ भी नहीं खाती यानी मेरा डिनर 8 बजे से पहले हो जाता है.
मेरी डाइट में ओट्स और फ्रूट्स सब से ज्यादा होते हैं. मैं पपीता बहुत खाती हूं. मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं जो भी खाऊं, वह हैल्दी हो.
अगर कोई छरहरे बदन की खूबसूरत बिंदास लड़की कहे कि आज से 3 साल पहले उस के भाईबहन उसे ‘मोटी’ कह कर चिढ़ाते थे और जब वे सलाह देते थे कि इतना मत खाया कर तो वह और ज्यादा खाती. हैल्दी तो छोडि़ए, पेट भर कर जंक फूड. शराब पीने का शौक नहीं था, बल्कि लत लग गई थी उसे, तो आप यकीन नहीं करेंगे कि आज वही लड़की जिम में ऐक्सरसाइज कर के सिक्स पैक ऐब्स बना चुकी?है. इतना ही नहीं, आज वह लड़की भारत की पहली महिला नैचुरल बौडी बिल्डिंग यूनियन इंटरनैशनल प्रो कार्ड होल्डर बन गई है. प्रो कार्ड होल्डर होने का मतलब है कि वह प्रोफैशनल बौडी बिल्डिंग कंपीटिशन में भारत की नुमाइंदगी कर सकती है.
जी हां, हम बात कर रहे?हैं एक नामी फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट में डिजाइन टीचर मधु प्रिया झा की जिन्होंने अपने मोटापे की निशानी 85 किलो वजन को अपनी कड़ी मेहनत से 50 किलो कर लिया?है. पर यह सब करना इतना आसान नहीं था जितना दिख रहा है.
बिहार के मिथिलांचल इलाके की मधु प्रिया झा का जन्म और पढ़ाईलिखाई पटना में हुई है. उन के पापा अशोक कुमार झा बिहार सरकार के बाल विभाग से डिप्टी सैक्रेटरी पद से रिटायर हो चुके हैं जबकि मां निभा झा हाउस वाइफ हैं.
चूंकि मधु प्रिया झा पहले भारी शरीर की थीं और खाती भी खूब डट कर थीं तो उन की बड़ी बहन और छोटे भाई को उन्हें चिढ़ाने का अच्छा मौका मिल जाता था. इस बारे में मधु प्रिया झा ने बताया, ‘‘यह सारा बदलाव पिछले 3 साल में हुआ है. मैं तब मोटी थी और अपने उस मोटापे से प्यार करती थी. मेरा छोटा भाई मुझे ‘हाथी’ कहता था तो बड़ी बहन अपने स्टाइल में मेरी क्लास लेती थीं, पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था.
‘‘वे दोनों जितना ज्यादा कहते मैं उतना ज्यादा खाती. बाद में शराब पीने लगी और धीरेधीरे मैं एल्कोहोलिक हो गई. ‘‘शरीर बेडौल हुआ तो उस के बुरे नतीजे भी सामने आने लगे. थोड़ा सा चलते या सीढि़यां चढ़ते ही मेरी सांसें फूल जाती थीं. पीठ में भी दर्द रहने लगा था.
‘‘परिवार वालों को चिंता हुई तो उन्होंने जबरदस्ती जिम में भेज दिया. एक साल की फीस जमा करा दी और कहा कि अब कुछ भी हो जाए तुझे जाना ही पड़ेगा. ‘‘मैं न चाहते हुए भी जिम गई. कोच को दिखाने के लिए पहले दिन थोड़ा वार्मअप किया पर मैं उस में ही बहुत ज्यादा थक गई.
‘‘पार्टी में जाने की शौकीन थी तो अगले दिन जिम जाने के बजाय दोस्तों के साथ मस्ती मारने चली गई.’’ तो उस के बाद जिम नहीं गईं? इस सवाल पर मधु प्रिया झा ने बताया, ‘‘गई थी. जिम के ट्रेनर बड़े नाखुश थे. उन्होंने कहा कि तुम मुझे अपने 21 दिन दे दो. अगर उन 21 दिनों में तुम्हें अपने शरीर में कोई बदलाव महसूस नहीं हुआ तो मैं तुम्हें एक साल की पूरी फीस लौटा दूंगा. ‘‘मेरे लिए इस से अच्छी बात और क्या हो सकती थी. सोचा कि 21 दिन के बाद तो पार्टी ही पार्टी. पर मैं गलत थी, क्योंकि उन 21 दिनों ने मेरी जिंदगी बदल दी.
‘‘जिम में जाने से मेरा वजन कम होता दिखा. थकावट कम रहती थी. हां, शरीर में दर्द रहने लगा था, पर आप उसे ‘मीठा दर्द’ कह सकते?हैं, जिस से अब मैं प्यार करने लगी हूं. अगर अब मैं जिम में पसीना न बहाऊं तो लगता है जैसे मैं ने कुछ खो दिया है.’’
मधु प्रिया झा ने साल 2018 में पहली बार किसी बौडी बिल्डिंग कंपीटिशन में हिस्सा लिया था. इस के लिए वे अपने फिटनैस ट्रेनर रजत गोयल और बिंदिया शर्मा का शुक्रिया अदा करती हैं जिन्होंने उन्हें इस काम के लिए बढ़ावा दिया. मधु प्रिया झा ने बताया, ‘‘मैं मई, 2018 में नोएडा में हुए फिटलाइन क्लासिक फिटनैस कंपीटिशन के फाइनल में पहुंचने में कामयाब हुई थी. वहां %E
इंगलैंड में हुए एक सर्वे में यह पता चला है कि फेसबुक पीढ़ी बहुत अकेली होती जा रही है. 16 से 24 साल के 40 फीसदी युवा काफी अकेलापन महसूस करते हैं जबकि 65 से 74 साल के 29 फीसदी ही हैं और 75 साल से ज्यादा के 27 फीसदी. बु्रनेल युनिवर्सिटी की रिसर्च से पता चला है कि फेसबुक, व्हाट्सऐप और डेटिंग साइटों की मौजूदगी के बावजूद युवाओं में अकेलापन बढ़ रहा है.
शायद इस का एक कारण यह है कि परिवार छोटे होते जा रहे हैं और जौब करने की जगह दोस्त नहीं बनते, बल्कि प्रतियोगी बनते हैं. काम बदलने और मोबिलिटी बढ़ने से भी हर थोड़े दिनों बाद आसपास का जो चेहरा अपना सा लगने लगा था, अचानक गायब हो जाता है. हर नए चेहरे से मित्रता बढ़ाने में समय तो लगता ही है.
अब वह जमाना नहीं रह गया जब लोग एक जगह टिक कर काम करते थे और टिक कर रहते थे. तब दोस्ती व परिचय वर्षों के होते थे. आज उम्रदराज लोगों को समस्याएं कम होती हैं क्योंकि उन की जिंदगी में ठहराव आ जाता है. वे टिक कर रहते हैं, अपना घर खरीद लेते हैं, काम आसानी से बदलते नहीं हैं. वे रिश्तेदारों को सहेज कर भी रखते हैं. ‘यह मेरा स्पेस है’, ‘यह मेरा टाइम है’ जैसे वाक्य उन के मुंह से नहीं निकलते. वे हर चीज शेयर करना जानते हैं, वक्त पर एकदूसरे के काम आते हैं. उन की जड़ें जमने लगती हैं. आज युवाओं की दोस्ती गुलदस्तों के फूलों जैसी होती है जिन की जड़ें नहीं होतीं और जो 24 घंटे में सूख कर झड़ जाते हैं.
पहले फूलों को धागे में पिरोया जाता था, अब तो उन्हें डंठल से बांध कर रखने का फैशन है, जो ढीले होते ही, एकएक कर बिखर जाते हैं. कंप्यूटर क्रांति ने लोगों को काफी नजदीक लाने का जो वादा किया था वह खोखला साबित हुआ है. कंप्यूटर ने तो एकदूसरे को दूर कर दिया है क्योंकि अब तो लिखावट भी पहचान में नहीं आती. अब तो कंप्यूटर के फौंटों ने अपना एकाधिकार जमा लिया है. कुछ ऐप्स तो फौंट को बदलने भी नहीं देते और मैसेज मां ने भेजा है, बहन ने भेजा है, प्रेमिका ने भेजा है या बेटी ने, कोई फर्क नहीं रह जाता.
हां, इतना जरूर है कि अकेलेपन को कोई सजा समझना गलत होगा. पहले 8-10 सदस्यों के घर में भी बहुत से खुद को अकेला और अनचाहा समझते थे. उन की कोई गिनती नहीं करता था. लोग असल में तब अकेलेपन को ढूंढ़ा करते थे. अकेलापन खराब नहीं होता. इस का अपना मजा है. आप का स्पेस, आप का टाइमटेबल, आप का अपना खानपान, आप की सफलता ये सब बड़े काम के हैं.
काजोल व रिद्धिसेन के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘हेलीकोप्टर ईला’’ के प्रदर्शन की तारीखे क्यों बार बार बदलती रहीं, इसकी वजहें फिल्म देखकर समझ में आ गयी. फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिसके लिए दर्शक अपनी मेहनत की कमाई को इस फिल्म की टिकट खरीदने में खर्च करेगा. उत्कृष्ट फिल्मकार प्रदीप सरकार की यह फिल्म कहीं न कहीं सफलतम फिल्म ‘‘निल बटे सन्नाटा’’ की याद दिलाती है. फर्क इतना है कि ‘निल बटे सन्नाटा’ में एक घरों में काम करने वाली सिंगल मां और उसकी बेटी के साथ उस तरह का परिवार था. जबकि ‘हेलीकोप्टर ईला’ में उच्चवर्ग की सिंगल मां व बेटा है. ‘निल बटे सन्नाटा’ में मां व बेटी के संघर्षों, सपनों व जीवन में आगे बढ़ने के जद्दोजहद की कहानी को खूबसूरती से पेशकिया गया था. मगर फिल्म ‘हेलीकोप्टर ईला’ एक भी क्षण दर्शकों को बांधकर नहीं रखती.

आनंद गांधी के मशहूर गुजराती भाषा के नाटक ‘‘बेटा कागड़ो’’ पर आधारित फिल्म ‘‘हेलीकोप्टर ईला’’ की कहानी एक सिंगल मदर ईला (काजोल) की कहानी है, जिसने अपने संगीत व गायन के करियर को महज अपने बेटे विवान (रिद्धि सेन) की परवरिश के लिए त्याग दिया. अब ईला हरदम विवान के पीछे पड़ी रहती है. यहां तक कि कभी भी बिना सूचना के वह विवान के कमरे में भी पहुंच जाती है.

विवान की अपनी कोई स्वतंत्र जिंदगी ही नहीं है. मां की हरकतों से परेशान होकर विवान अपनी मां को आगे की पढ़ाई करने की सलाह देता है. ईला तुरंत विवान के ही कौलेज में एडमिशन लेकर उसका पीछा करने लगती है. इतना ही नहीं ईला भी विवान की ही कक्षा में बैठकर पढ़ती है. वह किससे बात करे, किससे नहीं, यह सलाह भी देती रहती है. बीच बीच में कहानी अतीत में जाती रहती है, जिससे यह पता चलता है कि ईला अपने बेटे विवान को लेकर इतना असुरक्षित क्यों है. मां बेटे के बीच झगड़े के साथ ही कहानी में कई मोड़ आते हैं. कौलेज में नाटक की शिक्षक लिसा मरीन (नेहा धूपिया), ईला को समझाती है. तब ईला पुनः संगीत का कांसर्ट करती है. जिसके चलते मां बेटे के बीच विवाद खत्म होते हैं.

गुजराती नाटक को फिल्म की पटकथा में बदलते समय पटकथा लेखक द्वय आनंद गांधी व मितेश शाह भूल गए कि थिएटर व फिल्म दोनों बहुत अलग माध्यम हैं. कहानी बार बार अतीत में जाती है, जिससे दर्शक की समझ में ही नहीं आता कि आखिर फिल्म है क्या. इतना ही नहीं फिल्म की लंबाई भी बहुत है. इसे एडीटिंग टेबल पर कसकर डेढ़ घंटे के अंदर समेटना चाहिए था. कम से कम अतीत की कहानी को इतना लंबा नहीं दिखाना चाहिए था. अतीत की कहानी के चलते फिल्म सिर्फ बोर करती है. फिल्म का क्लायमेक्स गड़बड़ है.
बतौर निर्देशक प्रदीप सरकार इस बार बुरी तरह से मात खा गए हैं. यहां तक कि प्रदीप सरकार ने अपने संबंधों के चलते अमिताभ बच्चन, शान, ईला अरूण आदि से भी इसमें छोटे छोटे किरदार करवा लिए हैं, मगर इससे फिल्म उत्कृष्ट नहीं बन पाती. बल्कि फिल्म के शुरू होते ही दर्शक सोचने लगता है कि कब इस फिल्म से छुटकारा मिले.

अफसोस की बात है कि भारत में सिंगल मदर यानी कि अकेली मां और उसके बेटे को लेकर एक अति बेहतरीन भावनात्मक फिल्म बनाने से प्रदीप सरकार चूक गए. कितनी मजेदार बात है कि मां अपने बेटे की ही कक्षा में जाकर पढ़ती है. इसी तरह से फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ में भी था, पर ‘निल बटे सन्नाटा’ की मां अनपढ़ थी और बेटी स्कूल में थी.
जहां तक संगीत का सवाल है, तो लोगों को नब्बे के दशक की याद आएगी, जब ‘एमटीवी’ का उदय हो रहा था. जहां तक अभिनय का सवाल है तो राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त बंगला अभिनेता रिद्धि सेन कामिक टाइमिंग की कमी के चलते निराश ही करते हैं. काजोल इंटरवल के बाद युवा बेटे की मां के रूप में सिर्फ खूबसूरत लगी हैं. तोता राय चौधरी का अभिनय ठीक ठाक है.
दो घंटे दस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हेलीकोप्टर ईला’’ का निर्माण अजय देवगन व जयंतीलाल गाड़ा की कंपनी ने किया है. निर्देशक प्रदीप सरकार, लेखक मितेश शाह व आनंद गांधी, कैमरामैन सिरसा रे, संगीतकार अमित त्रिवेदी व राघव सचर तथा कलाकार हैं – काजोल, रिद्धि सेन, नेहा धूपिया, तोतारौय चौधरी, अतुल कुलकर्णी, मुकेष ऋषि,अमिताभ बच्चन, अलिशा चिनौय, शान, इला अरूण, अनु मलिक व अन्य.
हर इंसान लोभी होता है. इंसान के इसी लोभ और प्राचीन मिथक का ऐतिहासिक पीरियड हौरर फिल्म ‘‘तुम्बाड़’’ में बहुत बेहतरीन चित्रण है. फिल्म में कल्पनाओं व लोककथा के मिश्रण के साथ बहुत सुंदर दृश्यों को पेश किया गया है.
मराठी भाषी उपन्यासकार श्रीपाद नारायण पेंडसे के उपन्यास ‘‘तुम्बाड़चे खोट’’ पर आधारित फिल्म ‘‘तुम्बाड़’’ की कहानी तीन अलग काल में विभाजित है. जिसकी शुरुआत होती है 1918 से. जहां महाराष्ट्र के तुम्बाड़ नामक गांव में विनायक राव (सोहम शाह) अपनी मां और भाई के साथ रहते हैं. वहां के बाड़े में एक खजाने के छिपे होने की चर्चा होती है, जिसकी तलाश विनायक के साथ साथ उसकी मां को भी है.

मगर कुछ घटनाक्रम ऐसे घटित होते हैं, जिसके चलते विनायक की मां उसे लेकर पुणे आ जाती है. 15 वर्ष बाद विनायक पुनः तुम्बाड़ जाकर खजाने की तलाश करता है. इस बीच उसकी शादी और बच्चे भी हो जाते हैं. लेकिन खजाने का लोभ उसे बार बार अनंत विनाश वाले गांव तुम्बाड़ जाने पर विवश करता रहता है.
एक बेहतरीन पटकथा पर बनी निर्देशक राही अनिल बर्वे के निर्देशन की तारीफ करनी पड़ेगी. उन्होंने इंसान के लालच की कहानी बयां करने के साथ ही इस बात का बाखूबी चित्रण किया है कि किस तहर लालच इंसान को राक्षस बना देता है. लोकेशन कमाल की है. पार्श्व संगीत उत्तम है. कैमरामैन पंकज कुमार की भी तारीफ करनी पड़ेगी.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो सोहम शाह की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है. उन्होंने विनायक के जीवन भर के संघर्ष को चुनौती के साथ स्वीकार कर इतनी सहजता से निभाया है कि दर्शक उन पर यकीन करने लगता है. उनकी आंखों में लोभ व वासना का भाव बड़ी सहजता से नजर आता है. वह कमाल के कलाकार हैं.
मगर अति घटिया प्रचार के चलते इस फिल्म को लेकर दर्शकों में कोई उत्सुकता नजर नहीं आती. एक घंटा 44 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘तुम्बाड़’’ का निर्माण सोहम शाह, आनंद एल राय, मुकेश शाह व अमिता शाह ने किया है. निर्देशक राही अनिल बर्वे, पटकथा लेखक राही अनिल बर्वे, आदेश प्रसाद व आनंद गांधी, संगीतकार अजय अतुल व जस्पर, कैमरामैन पंकज कुमार तथा कलाकार हैं – सोहम शाह, हरीष खन्ना, अनिता दाते, दीपक दामले,ज्योति मलसे व अन्य.
कालेज की पढ़ाई पूरी करने के साथ साथ महज 19 साल की उम्र में गुलजार के साथ मिलकर ‘‘उदास पानी’’ नामक अलबम को संगीत से संवारने व इसके गीतों को अपनी आवाज में गाने वाले अभिषेक रे की संगीतकार व गायक के तौर पर एक नई पहचान बन चुकी है. सन् 2000 में अलबम ‘‘उदास पानी’’ आया था, उसके बाद से अभिषेक रे को पीछे मुड़कर देखने की जरुरत नहीं पड़ी. तब से अब तक वह गुलजार के ही साथ ‘‘रात चांद और मैं’’ सहित 10 गैर फिल्मी अलबमों, 10 फिल्मों में संगीत, कई अलबमों के गीतों को गाने के अलावा कई फिल्मों में पार्श्व गायन भी कर चुके हैं. इन दिनों वह डिजीटल मीडिया व ‘यू ट्यूब’’ पर हर माह एक गैर फिल्मी गाना लेकर आने के साथ ही नवोदित गायिका जश की आवाज से बौलीवुड को परिचित कराने के लिए सिंगल अलबम लेकर आ रहे हैं. इनमें से एक गैर फिल्मी गाना ‘‘आतिशा आतिशा’’ बहुत जल्द ‘‘जी म्यूजिक’’ पर आएगा. इस गीत को अभिषेक ने अपने संगीत निर्देशन में गायिका जश के साथ मिलकर गाया है. इस गीत के गीतकार हैं गुलरेल शाहिद जिसके बोल हैं- ‘‘ आतिशा आतिशा आतिशा सुरमुई रात का शमा..’’
संगीत की तरफ रूझान कैसे हुआ ?
मैं मूलतः कलकत्ता के बंगाली परिवार से हूं. मेरे परिवार में संगीत और शिक्षा दोनों का माहौल है. हमारे ननिहाल और पापा दोंनों के घरों में संगीत का माहौल रहा है. लेकिन मेरे माता पिता ने संगीत को कभी पेशा नहीं बनाया. मेरे पिता इंजीनियर और एमबीए हैं. उन्होंने पूरी जिंदगी सरकारी नौकरी की. पर आफिस से लौटते ही वह सितार बजाने बैठ जाते थे. वह मशहूर सितार वादक हैं. जबकि मेरी मां कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कालेज में बोटोनी की प्रोफेसर थीं. पर उन्होंने भी संगीत में बिशारद किया था. इस तरह मेरे घर में शास्त्रीय संगीत का पूरा माहौल था. मुझे घर में ही शास्त्रीय संगीत की शिक्षा मिली. लेकिन मैंने पश्चिमी संगीत व पियानो बजाना बाहर से सीखा. जब मैं पियानो बजाता हूं, तो लोगों को लगता है कि मैं पश्चिमी संगीत से जुड़ा हुआ हूं. पर जब मैं गाता हूं, तो लगता है कि मैं भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़ा हुआ हूं.
आपने गायन की कोई ट्रेनिंग ली है ?
मैंने यह शिक्षा अपनी मां और अपनी नानी से ली. मेरी नानी ज्योती सेन आल इंडिया रेडियो में गाया करती थीं. जबकि मेरी मां दीपा रे भी अच्छी गायक रही हैं. राग रागिनी मैंने अपने पापा से सीखा. मेरे पापा निखिल बनर्जी से सितार सीखते थे.
हर बार नया नया संगीत रचने की प्रेरणा कहां से मिलती है ?
संगीत तो मेरी रगों में बसा हुआ है. मुझमे संगीत ईश्वर प्रदत्त है. मेरी राय में यदि संगीत जन्म से इंसान के अंदर न हो, तो वह सीखकर संगीतकार नहीं बन सकता. मुझे प्रकृति से, अलग अलग जगहों की यात्राएं करने से संगीत की प्रेरणा मिलती है. मुझे प्रकृति से संगीत की प्रेरणा मिलती है. मैं पैदल गाड़ी लेकर हिमालय पर, ग्लेशियर पर या जैसलमेर के रेतीले क्षेत्र में या उत्तराखंड के पहाड़ों पर या दूर दराज के गांवों में जाता रहता हूं और वहीं से मेरे अंदर अनजाने ही संगीत की नई नई धुनें आ जाती हैं. वास्तव में ऐसी जगहों पर संगीत का अपना एक अद्भुत और अलग सा ‘औरा’होता है, जिसे मैं ग्रहण कर लेता हूं. किसी पहाड़ के गांव में बारिश के दिनों में आप ध्यान से बैठकर सुने तो आपको बहुत नई व ताजी संगीत की धुन सुनायी दे सकती है. यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपके अंदर कितना संगीत है, कितना ज्ञान है और चीजों को किस तरह से ग्रहण करते हैं. मैं वाइल्ड लाइफ ट्रैकर भी हूं. मैं सरकारी मान्यता प्राप्त टाइगर और लिओपार्ड ट्रैकर भी हूं. मैं ‘‘कारबेट नेशनल पार्क’’ के पास अपना खुद का ‘‘सिताबनी वाइल्ड लाइफ सर्वे’’नामक जंगली प्राणी बचाओ प्रोजक्ट चलाता हूं.
आपको देश के कई लोक गीत व संगीत का ज्ञान कैसे मिला ?
मेरे पिता सरकारी नौकरी में थे. हर दो साल में उनका तबादला हुआ करता था. इसके चलते मुझे देश के हर हिस्से में जाने का मौका मिला. वहां के संगीत से मेरा साबका पड़ा. इसी के चलते मैं अलग अलग लोगों से मिला. अलग अलग कल्चर से वाकिफ हुआ. इसी वजह से यात्रा करने की मुझे लत पड़ गयी.
आपका पहला अलबम तो 19 साल की उम्र में गुलजार के साथ आया था ?
जी हां! यह महज इत्तफाक की बात है. उन दिनों मैं दिल्ली में रहकर विज्ञापन फिल्मों के जिंग्लस बनाने के अलावा टीवी सीरियलों के टाइटल ट्रैक को संगीत से संवार रहा था. उन दिनों मैं दिल्ली में कालेज की पढ़ाई कर रहा था और काम के सिलसिले में मुंबई आया जाया करता था. एक दिन दिल्ली एयर पोर्ट पर गुलजार जी से मेरी मुलाकात हो गयी. चंद लोग ऐसे हैं, जिनके संगीत को मैं बचपन से ही सुनता आया हूं. उनमें से गुलजार, पं.मदन मोहन, आर डी बर्मन, सलिल चौधरी आदि.. खैर, जब गुलजार साहब से मुलाकात हुई, उस वक्त मेरे बैग में मेरी बनायी हुई संगीत की धुनों का एक कैसेट पड़ा हुआ था. उस वक्त वह मेरा भोलापन था या नादानी पता नहीं. मगर मैं गुलजार साहब से मिला और मैंने उनसे कहा कि, ‘यह संगीत का कैसेट दे रहा हूं. शायद आपकी व्यस्तता के चलते इसे सुनने का आपको वक्त न मिले, पर मैं अपनी तसल्ली के लिए आपको यह मौलिक संगीत की धुनों का कैसेट दे रहा हूं.’’ उन्हें देकर मैं भूल ही गया. मगर तीन चार दिन बाद ही मि. कुट्टी का फोन आया कि गुलजार साहब मुझसे बात करना चाहते हैं. मैं अचंभित रह गया. गुलजार साहब ने बताया कि उन्हें मेरे कम्पोजीशन बहुत अच्छे लगे और वह मेरे साथ काम करना चाहते हैं. उन्होंने मुझे मुंबई बुलाया. मैं मुंबई आकर उनसे मिला. मेरे दिमाग में कुछ आइडिया थे. वास्तव में मैं कैफी आजमी और गुलजार साहब की कविताओं से बहुत प्रभावित था. तो उनकी कविताओं को लेकर कुछ साउंड को बनाने की मेरी इच्छा थी. मैं आम प्यार वाला संगीत अलबम लेकर बाजार में नहीं आना चाहता था. उन दिनों रीमिक्स का दौर था. मैं रीमिक्स नहीं करना चाहता था. मैं हमेशा थीम को लेकर काम करना चाहता था. तो उनकी कविता, उनका अपनी कविताओं का पाठ, उनके गीत जिन्हें मैंने गाया और कम्पोज किया. तो इस तरह के सिम्फनी ‘‘उदास पानी’’ अलबम में हैं. इसे आप ‘म्यूजिकल सागा आफ पोयट्री’ कह सकते हैं. यह सफल रहा. इसीलिए ‘टाइम्स यूजिक’ने हमारा दूसरा अलबम ‘‘रात चांद और मैं’’भी निकाला. यह अलबम भी गुलजार साहब के ही साथ था. मैंने हमेशा थीम आधारित संगीत ही दिया. फिर चाहे वह ‘उदास पानी’, ‘रात चांद और मैं’, ‘अमेजिंग इडिया’ व ‘रितु’जैसे अलबम हों या फीचर फिल्में या डाक्यूमेंट्री फिल्में.
आपने तो लोक संगीत को लेकर भी कुछ काम किया है ?
जी हां! ‘टाइम्स म्यूजिक’ने ही मेरे इस तरह के कुछ अलबमों की ‘अमेजिंग इंडिया’ नामक पूरी सीरीज निकाली है. जिसमें मैंने विश्व के कुछ गर्म स्थानों को लेकर अलबम तैयार किया था. मैंने एक अलबम में ताजमहल की गरिमा का चित्रण किया है. ‘इको आफ खजुराहो’ अलबम में इरोटिका का चित्रण है. इसमें संगीत के माध्यम से मैंने इरोटिका की जड़ों को बताया है. फिर एक अलबम -‘‘कौल आफ द डिजर्ट्स जैसलमेर’’ किया, जिसमें राजस्थान के कैनवास को एक्सप्लोर किया. यह सारे अलबम ‘आई ट्यून’पर बहुत बिक रहे हैं. मैंने इन अलबमों को फोक संगीत के साथ साथ विश्व संगीत का मिश्रण करके बनाया है, जिससे यह अंतरराष्ट्रीय श्रोता तक पहुंच सके. अंतरराष्ट्रीय श्रोता शुद्ध शास्त्रीय संगीत या लोक संगीत समझ नही पाता.
इसके अलावा मैंने ‘‘रितु’’ नामक एक सीरीज किया था. जिसमें मैंने भारत के छह अलग अलग रितुओं/मौसम का जिक्र किया है. जैसे कि बारिश का संगीत मैंने मेघ मल्हार में परोसा. गर्मी का संगीत राजस्थान के खास राग ‘मांड राग’में परोसा. यह प्रयोग काफी सफल रहा. इसे लोगों ने काफी पसंद किया.
इन दिनों भारतीय फिल्म संगीत की जो दुर्दशा हुई है, उसके लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं ?
रियालिटी शो से निकलने वाले गायक नकल के भरोसे या रीमिक्स गीत गाकर आगे बढ़ना चाहते हैं. जबकि फिल्म संगीत में मौलिकता की जरुरत होती है. इसके अलावा संगीत कीजो दुर्दशा है, उसकी एक वजह गानों की चयन प्रकिया है. फिल्मकार हर संगीतकार से पूछता है कि बताओ आपके पास कौन सा गाना है. फिर आलू प्याज की तरह वह गानों को बाजार में खरीदते हैं. जिससे हिंदी फिल्मों के गीतों की गरिमा खत्म हुई है. अन्यथा हिंदी फिल्मों के गीतों की गरिमा यह रही है कि गाने के बोल आते ही लोग गुनगुनाते लगते थे. भले ही उनको यह याद ना हो कि यह गाना किस फिल्म का है. मसलन, ‘गले लग जा..’ सबको यह गाना पता होगा, भले फिल्म का नाम न पता हो. पुराने समय में हर फिल्मी गाने की उड़ान, गाने की परवाज फिल्म से कई गुणा ज्यादा हुआ करती थी. अब फिल्मों के गानों की कोई गरिमा नहीं रही. इसके अलावा अब फिल्मों में लिप सांग वाले गानों की कोई कद्र नहीं रही. नए फिल्म निर्देशक अपनी फिल्मों में ‘लिप सांग’रखना पसंद ही नही करते. लोग हौलीवुड की नकल करते हुए एक गाना लेते हैं, उसका मुखड़ा कहीं डाल दिया व अंतरा कहीं और जगह. इस वजह से भी फिल्ती गीतों की उम्र घट रही है.
भारतीय श्रोता शुरू से ही मैलोडी प्रधान संगीत व गाने का प्रेमी रहा है. यूट्यूब व डिजिटल मीडियम आने के बाद अच्छे गायक अपने गीत यूट्यूब पर डाल रहे हैं. और अच्छा संगीत सुनने की चाह रखने वाला श्रोता यूट्यूब या डिजीटल माध्यम में सुन रहा है. इसलिए गैर फिल्मी अच्छे गानों की कद्र बढ़ती जा रही है. लोग संगीत जरूर सुनना चाहेंगे. हम भारतीय गानों के बगैर नहीं रह सकते. मगर शायद हमें अब फिल्मों में अच्छे गाने नहीं मिलेंगे और गैर फिल्मी गीतों में ही अच्छे गीत तलाशने होंगें. मेरी अंतरआत्मा कहती है कि जिन अच्छे गीतों को हम कभी फिल्मों से कुरेदते थे, उन्हें अब हमें गैर फिल्मी गीतों में खोजना पड़ेगा.
आपको लगता है कि रियालिटी शो ने संगीत को नुकसान पहुंचा दिया ?
रियालिटी शो के प्लस व मानस दोनों प्वाइंट हैं. संगीत के रियालिटी शो की पाजीटिव बात यह रही कि गांव व कस्बों में गाने वाला भी अब टीवी के परदे पर आ गया. अन्यथा पहले लोग अपने खेतों में गाकर ही रह जाते थे. उनकी आवाज कोई सुन नही पाता था. पर अब वह रियालिटी शो के कारण पूरे देश को अपनी आवाज सुनाते हैं. लेकिन रियालिटी शो का सबसे निगेटिव पक्ष यह हैं कि रियालिटी शो में जो गायक या गायिका पहले दूसरे या तीसरे नंबर तक नही आ पाते हैं, उन्हें भी हम बेहतर करियर का सपना दिखा देते हैं. पर उनका करियर कहीं बन नही पाता. उसे उसके शहर की हर गली का बच्चा पहचानने लगता है. लोग उसकी तारीफ करने लगते हैं. वह लोकल स्टार बन जाता हैं. बच्चों की गायकी बहुत नाजुक होती है. अब उस कच्ची उम्र में उसे लगने लगता है कि मैं स्टार बन गया हूं. पर रियालिटी शो से बाहर होते ही उसका भविष्य/संगीत करियर खत्म हो जाता है. इस हिसाब से रियालिटी शो बच्चे के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. अब वह आम बच्चों की तरह स्कूल जाकर पढ़ाई नहीं कर सकता और ना ही रियालिटी शो के बल पर मुंबई जैसे शहर में कमा सकता है. इस तरह उसका जीवन मंझधार में लटक जाता है.
इतना ही नहीं उस बच्चे के माता पिता पर भी दबाव बनता है कि आपका बच्चा स्टार है आप इसे मुंबई जैसे शहर में ले जाकर स्ट्रगल करवाएं. यहां कानपुर या मेरठ में कर रहे हैं. जिसके परिणाम स्वरुप मध्यम वर्गीय परिवार के माता पिता अपने बच्चे को लेकर मुंबई आते हैं और उसके बाद बच्चे का जो संघर्ष शुरू होता है, वह बहुत कठिन होता है. यह उसकी नैचुरल यात्रा नहीं होती. उसका आधार मजबूत नही होता. तो यह हालात बहुत खतरनाक हैं.
इन संगीत के रियालिटी शो के कारण हर वर्ष हजारों बच्चे मुंबई शहर आ रहे हैं. यह फिल्म में एक गाना पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. मैंने सुना है कि इस तरह के कुछ बच्चे तो गाने के साथ पैसा भी देने को तैयार होते हैं. अब संगीत कंपनियां भी कन्फ्यूज हैं कि वह क्या करें ? रियालिटी शो ने बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठा कर दी है. हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. जब डिमांड कम हो और सप्लाई ज्यादा हो, तो शोषण होने लगता है.
इन रियालिटी शो में जो स्थापित गायक व संगीतकार जज के रूप में बैठते हैं, उनकी संगीत को बढाने या गिराने में क्या भूमिका होती है?
देखिए, सभी पैसा कमा रहे हैं. रियालिटी शो में जाकर कला की सेवा कोई नहीं करता. रियालिटी शो टीआरपी पर आधारित है. हर चैनल अपने शो की टीआरपी को बढ़ाने के लिए जज व बच्चों से कई तरह के नाटक करवाता है. उन्हें पहले से ही सिखाकर तैयार करता है कि शो में क्या करना हैं? यहां तक कि लोगों के रिएक्शन भी पहले से तय होते हैं. यदि शो में नाटकीयता नहीं होगी, तो टीआरपी नहीं बढ़ेगी. इस तरह यह रियालिटी शो लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. हर रियालिटी शो में ह्यूमन इमोशन का कैरीकेचर बनाकर बेचा जाता है. वहां जज के रूप में जो गायक व संगीतकार बैठा है, उसकी कोई गलती नहीं होती है. क्योंकि वह तो उस वक्त जज की कुर्सी पर बैठकर चैनल के इशारे पर काम करता है. मेरी राय में वहां कुछ भी स्पाटेनियस नही होता.
अब इस तरह संगीत को नुकसान पहुंच रहा है या नहीं, इसका सबूत तो हमारा संगीत खुद ही है. आज हमारा संगीत कहां जा रहा है? पहले हम किसी भी गाने को प्रचारित करने के लिए कोई पैसा खर्च नहीं करते थे. गाना रिलीज होते ही लोकप्रिय हो जाता था या मर जाता था. अब तो गाना रिलीज करने के बाद उसके प्रमोशन में करोड़ां रूपए खर्च किए जाते हैं. ऐसे में गाना प्रमोशन के बल पर चर्चा में बना रहता है. प्रमोशन खत्म होते ही गाना कहां गया, पता नहीं चलता. क्योंकि गाने की अपनी कोई उड़ान नहीं थी. सशक्त गाना वह होता है, जिसकी अपनी उड़ान हो. जो बिना प्रमोशन के भी लोगों की जुबान पर रहे. हम सभी इस सच से वाकिफ हैं. पर कुछ लोग चापलूसी करने के लिए चुप्पी साधे हुए हैं. पर मौलिक संगीतकार के रूप में सच बोलने में मुझे कोई हिचक नहीं है.
मैंने अपने करियर की शुरुआत गुलजार साहब के साथ की थी. मैंने बड़ी बड़ी फिल्मों में संगीत दिया. मैंने कभी भी रीमिक्स संगीत को महत्ता नहीं दी. मैंने कभी किसी गीत का कवर वर्जन नही बनाया. मैं रीमिक्स करके बहुत पैसा बना सकता था. पर मैंने मौलिक काम करने का ही प्रयास किया. मुझे रीमिक्स या कवर वर्जन के नाम से ही नफरत है. कवर वर्जन से आप क्षणिक लोकप्रियता पा सकते हैं, उससे भला नहीं होगा. मुझे इस बात से कोफ्त होती है कि क्या वर्तमान समय के गायक कवर वर्जन के हिसाब से ही अपनी पहचान बनाएंगे? उनका अपना कोई संगीत नही है. हालात यह हो गई है बड़ी बड़ी फिल्मों में पुराने फिल्मों के रीमिक्स गाने डाले जा रहे हैं. यदि यही हालत रहे, तो धीरे धीरे मौलिक गायक व संगीतकार गायब हो जाएंगे.
मैंने भारतीय शास्त्रीय संगीत, सेमी शास्त्रीय संगीत, सिम्फिनी, जाज बहुत कुछ सीखा है. इसके बावजूद यदि मुझे अपनी क्रेडिट किसी डी जे के साथ बांटनी पड़े, तो लानत है..यह तो अपमान जनक बात है. जब हम देखते हैं कि हमारे साथ बैठे इंसान के साथ मेरी काबीलियत का कोई मुकाबला नहीं, तब बहुत तकलीफ होती है. पर हालात यह हैं कि अब तो लोगों को पीतल भी सोना नजर आने लगा है.
बौलीवुड अभिनेत्री तनुश्री के MeToo बयान के बाद से इंडस्ट्री में बवाल मच गया है. तनुश्री के बाद कई अभिनेत्रिया और फिल्मी दुनिया से जुड़ी महिलाएं खुलकर सामने आ गई हैं जिसके बाद से कई बड़े नामों के चेहरे से पर्दा उठ गया है. इसी कैंपेन को लेकर सीनियर एक्टर असरानी ने एक इवेंट के दौरान बोला कि ये सब प्रमोशन के लिए किया जा रहा है और कुछ नहीं.
एक न्यूज एजेंसी से बात करते हुए शोले फेम एक्टर ने कहा कि मैं महिलाओं को सपोर्ट करता हूं लेकिन ये जो कैंपेन चल रहा है सब पब्लिसिटी और फिल्म प्रमोशन के लिए है. इन आरोपों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए.
बता दें कि तनुश्री ने एक निजी चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा कि मैं नाम भी लेना चाहती हूं, एक्टर नाना पाटेकर, प्रोड्यूसर सामी सिद्दीकी, डायरेक्टर राकेश सारंग और कौरियोग्राफर गणेश आचार्य. नाना पाटेकर ने जब मेरे साथ बदतमीजी की तो मैंने इसकी शिकायत प्रोड्यूसर-डायरेक्टर से की कि इस बंदे (नाना पाटेकर) का तो सेट पर काम ही नहीं है तो यह यहां क्या कर रहा है. वह मुझे पकड़कर खींच रहा है, मुझे डांस सिखा रहा है. लेकिन बजाए मेरी शिकायत सुनने और उसे सही करने के, नाना पाटेकर ने एक और डिमांड रख दी कि वह अब इस गाने में मेरे साथ एक इंटीमेट डांस स्टैप करना चाहता है. मतलब लड़की नई एक्ट्रेस है तो जरूरत हो या न हो, उसके साथ इंटीमेट सीन कर लो.
तनुश्री और नाना का मैटर कोर्ट में पहुंच चुका है और इसके बाद से कई सारे केस सामने आए हैं. इसके साथ मीडिया इंडस्ट्री में भी MeToo कैंपेन का असर दिख रहा है.
महाभारत में एक कथा के अनुसार कर्ण, जिसे सूत पुत्र कहा गया है, एक शूरवीर है और अर्जुन की तरह ही धनुर्धर बनना चाहता है. वह गुरु द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या लेना चाहता है पर उसे द्रोण इसलिए इनकार कर देते हैं कि एक तो वह सूत पुत्र है और दूसरा कोई राजकुमार भी नहीं.
मजबूर हो कर्ण परशुराम के पास जाता है जो सिर्फ उच्च जाति यानी ब्राह्मण को ही गुरुकुल में जगह देते हैं. वहां कर्ण अपनी जाति छिपा कर शिक्षा लेता है पर एक दिन परशुराम को पता चल जाता है कि वह सूत पुत्र है.
इससे नाराज होकर वे कर्ण की बेइज्जती करते हैं, गुस्सा होते हैं और साथ ही श्राप भी दे देते हैं कि वह उचित समय पर उनसे ली गई शिक्षा भूल जाएगा.
खैर, यह तो एक कथा है.
शिक्षा में जातिधर्म
दिल्ली के यमुना किनारे बसे वजीराबाद के एक स्कूल में एक ऐसे ही शिक्षक हैं, जिन्होंने दूसरे धर्म को मानने वाले, मांस मछली खाने वाले बच्चों को हिन्दू बच्चों से अलग कक्षा में पढ़ने को कह कर गुरु और शिक्षा दोनों को कलंकित कर दिया.
यह घटना यों तो कुछकुछ महाभारत जैसी ही है, बस फर्क इतना है कि गुरु ने शिक्षा के अधिकार से वंचित तो नहीं किया, अलबत्ता यह अध्यादेश जरूर जारी कर दिया कि हिन्दू बच्चे अलग वर्ग में पढ़ेगे और मुस्लिम बच्चे अलग.
यह सनसनीखेज मामला तब खुला जब बच्चों ने अपने अभिभावकों से इसका जिक्र किया. तब बड़ी संख्या में अभिभावक स्कूल के सामने पहुंचे और हंगामा करने लगे.
देश की राजधानी हुई शर्मसार
दिल्ली के तिमारपुर वार्ड के वजीराबाद में जिस जगह यह स्कूल है उसके पास ही एक बाजार भी लगता है. शाम होते ही बाजार की रौनक बढ़ जाती है. कोई सब्जी खरीद रहा होता तो कोई ठेले पर बेची जा रही जलेबियों का मजा उठाता है. यहां हिन्दूमुस्लिम दुकानदार एक साथ ही बाजार लगाते हैं और खरीदार भी धर्म देखकर खरीदारी नहीं करता.
आरोप है कि वजीराबाद स्थिति इस स्कूल के इंचार्ज चंद्रभान सहरावत को जुलाई में स्कूल का इंचार्ज बनाया गया था. पदभार मिलने के बाद ही सहरावत ने पहली और 5वीं कक्षा में पढने वाले हिन्दू और मुस्लिम बच्चों को अलगअलग बैठा दिया.
उच्चस्तरीय जांच गठित
मामले की जानकारी मिलते ही आला अधिकारी हरकत में आए. बात दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और शिक्षामंत्री मनीष सिसौदिया तक भी पहुंची, जिसपर उन्होंने कड़ी नाराजगी जताई. शिक्षामंत्री सिसौदिया ने कहा कि हिन्दूमुस्लिम बच्चों को अलगअलग बैठाने की घटना अफसोसजनक है और भारतीय संविधान के खिलाफ है.
सिसौदिया ने ऐजुकेशन डायरेक्टर को जांच का आदेश दिया है और कहा है कि वह जल्द रिपोर्ट दें. उधर मामले की जानकारी मिलने के बाद नौर्थ एमसीडी के मेयर आदेश गुप्ता ने एक बयान में बताया है कि दोषी स्कूल इंचार्ज को सस्पेंड कर दिया गया है और उस पर जुर्माना भी लगाया गया है.
मानसिकता बदलनी होगी
फिलहाल जांच जारी है और इसकी घोषणा भी कर दी जाएगी. संबंधित इंचार्ज पर कड़ा ऐक्शन लिया जाएगा यह भी तय है.
पर सवाल बड़ा अहम है कि देश के भविष्य बच्चों के दिलोदिमाग में अभी से जातिधर्म का भेदभाव भरना देशसमाज के लिए क्या उचित है? न तो संविधान इसकी इजाजत देता है और न ही समाज के जागरुक लोग इसको सही मानेंगे. यह देश सबका है और यहां सबको समान रूप से जीने, खानेपीने, घूमने, शिक्षा लेने का अधिकार है.
इस तरह के फैसले समाज को बांटने का काम करेंगे. देश के शिक्षक को समाज अब भी सिरआंखों पर बैठाता है पर जिस तरह का कृत्य सहरावत ने किया वह सभ्य समाज के लिए सही नहीं.
विंता नंदा के बाद आलोक नाथ के मामले में एक और लोकप्रिय अभिनेत्री संध्या मृदुल सामने आयी हैं. उन्होंने भी स्वीकारा है कि आलोक नाथ ने उनके करियर के शुरुआती दौर में उनके साथ बदसलूकी करने की कोशिश की थी.
संध्या ने ट्विट्टर पर इसके बारे में विस्तार से बताते हुए लिखा, वह एक टीवी शो की शूटिंग कोडाइकनाल में कर रहे थे. मैं काफी खुश थी. अलोक नाथ मेरे औन स्क्रीन पिता बने थे. उन्होंने मुझे कहा कि मैं गौड की अपनी बच्ची हूं और मेरी खूब तारीफ की. मैं भी अपनी तारीफ सुनकर सातवें आसमान पर थी. हमलोग उस दिन पैकअप के बाद डिनर के लिए गये. वहां आलोक ने काफी पी ली थी और बार-बार कहने लगे कि मैं उनके साथ बैठूं. मैं बहुत अधिक नर्वस और असहज हो गई थी. मैं वहां से बिना डिनर के वापस आ गई.
इसके बाद मेरे कौस्टयूम दादा आये और उन्होंने अगले दिन के शूट के अनुसार मुझे कपड़े दे दिए. इसके बाद दरवाजे पर किसी और ने दरवाजा खटखटाया, मुझे लगा कि फिर से कौस्टयूम दादा आये हैं. मैंने दरवाजा खोला, तो आलोक था. उन्होंने जबरदस्ती रूम में एंट्री ली और मेरे साथ बाथरूम के दरवाजे पर ही बदतमीजी करने की कोशिश करने लगा. कहने लगा कि तुम मेरी हो, ऐसे में मैं बहुत परेशान हो गई थी. अचानक मेरे डीओपी आ गए. फिर हमने इन्हें रूम से बाहर निकालने की बहुत कोशिश की. लेकिन वह वहीं पड़े रहे. उस वक्त मुश्किल बात यह थी कि मुझे फिर से उन्हीं के साथ एक्टिंग करनी थी. मेरे सीन थे, जिसमें मुझे उनकी गोद में बैठना था. मैं ये सीन करने में घबरा रही थी. लेकिन इसके बाद वे काफी बार लगातार फोन करते रहे.
संध्या इतनी डिस्टर्ब हो गई थीं कि उन्हें अपनी हेयर ड्रेसर के साथ ही रात में सोना पड़ता. एक दिन आलोक ने आकर संध्या से माफी मांगते हुए कहा कि वह मानते हैं कि हां, उन्होंने शराब के नशे में बुरी हरकतें की हैं और फिर उन्होंने रोना शुरू कर दिया. उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी शादी भी बर्बाद कर ली है. इन सारी बातों के बाद मुझे मेरे डीओपी और रीमा लागू ने बचाया और एक मां की तरह मुझे प्रोटेक्ट किया. लेकिन मैं इसके बाद आगे शूटिंग नहीं कर पायी और घर वापस आ गई थी और हद तो तब हुई जब इसने मुंबई लौटने के बाद लोगों को कहना शुरू किया कि मैं एरोगेंट हूं. उस वक्त वह लोकप्रिय आदमी था और मैं एक नवोदित कलाकार थी.
संध्या ने कड़े शब्दों में कहा है कि उन्होंने जो विंता के साथ किया है उसके लिए वह बिल्कुल माफी के काबिल नहीं है. संध्या ने अपनी बात यह कहते हुए खत्म की है कि अब आपका खेल खत्म हो चुका है.