दुल्हन की आपबीती

जिस ने शादी की वह भी पछताया और जिस ने नहीं की वह भी पछताया. लेकिन अकसर अक्लमंद लोगों का यह खयाल होता है कि क्यों न शादी कर के ही पछताया जाए.

शादी का मतलब खुशी है. पर आज के जमाने में खुशी के मौके जरा कम ही आते हैं या लोग खुशी का मतलब बदलते जा रहे हैं.

पहला दौर

यह उस वक्त शुरू होता है जब दुलहन अपने बाबुल का घर छोड़ कर अपने सरताज यानी दूल्हे के घर आती है. शोर उठता है ‘दुलहन आई, दुलहन आई’. सास भागती हुई तेल ले कर आती है. ननद कुरआन उठाती है. सास दरवाजे पर तेल डालती है और ननद कुरआन के साए में दुलहन को अंदर ले कर आती है.

औरतों और बच्चों का जमावड़ा है. कोई दुलहन का गरारा खींच रहा है तो कोई पैर पर चढ़ रहा है. कुछ औरतें प्यार जताने में उस के बाल खराब करने की कोशिश में हैं. दुलहन का गुस्से के मारे बुरा हाल है. 400 रुपए दे कर ब्यूटीपार्लर से बाल बनवाए गए थे, सब सैटिंग बिगाड़ दी. सास दूल्हादुलहन के ऊपर से खूब पैसे फेंकती है. बहू को मुंहदिखाई देती है. इस के बाद बेचारी बहू की जान छूटती है और उसे उस के कमरे में पहुंचा दिया जाता है.

दुलहन इतमीनान की सांस ले कर भारी दुपट्टा उतारती है और अपना हुलिया दुरुस्त करती है. सरसरी नजरों से कमरे का जायजा लेती है और फिर तकिए से टेक लगा कर आंखें बंद कर के ख्वाबों की दुनिया में पहुंच जाती है. अपने सरताज के बारे में तरहतरह के सवाल सोचती है. कमरे में आएगा तो मैं अपना मुंह  छुपाऊंगी, फिर वह गुजारिश करेगा.

लेकिन यह क्या, दूल्हे की आवाज के बजाय बहुत सी औरतें शोच मचा रही हैं. दुलहन घबरा कर आंखें खोलती है. ननद कहती है, ‘‘भाभी, आज ये सब आप के कमरे में सोएंगी, क्योंकि घर में जगह नहीं है. दूल्हा सोने के लिए किसी दूसरे घर गया है.’’

दुलहन पर ये शब्द हथौड़े की तरह चोट करते हैं. उस के सारे ख्वाब चकनाचूर हो जाते हैं.

दूसरा दौर

आज वलीमे (शादी के बाद दूल्हे की ओर से दिया गया भोज) की दावत है. दुलहन की खूब खातिर होती है. बेचारी के मुंह से एक निवाला अंदर नहीं जाता, जबकि उसे खाने के लिए बारबार मजबूर किया जाता है.

नाश्ते के बाद सास हुक्म देती है, ‘‘जल्दी तैयार हो जाओ, मेहमान आने वाले हैं.’’

दुलहन बेमन से उठती है और तैयार होना शुरू कर देती है. उसे बनासंवार कर औरतों में ला कर बिठाया जाता है. सलामी मिलती है. इस मौके पर कई तरह की बातें भी सुनने को मिलती हैं, जिन में कुछ कड़वी भी होती हैं और कुछ मीठी भी.

वलीमे के बाद दुलहन के परिवार वाले नए ब्याहता जोड़े को अपने साथ ले जाने के लिए इजाजत लेते हैं. धड़ाम…यह दूसरा ख्वाब उस वक्त टूटता है जब पता चलता है कि दूल्हा गाड़ी में साथ नहीं जा रहा, क्योंकि घर में शादी के बाद के बहुत से काम निबटाने हैं. वह कल दुलहन को लेने आएगा.

घर आते ही दुलहन की सब सहेलियां उस के पीछे पड़ जाती हैं कि जल्दी से दिखाओ दूल्हा भाई ने मुंह दिखाई में क्या दिया है. अब दुलहन बेचारी क्या बताए और क्या दिखाए. सहेलियां हैं कि पीछा ही नहीं छोड़तीं. कई तरह के फिकरे कसे जा रहे हैं, छेड़ा जा रहा है. लेकिन दुलहन को हंसी भी नहीं आ रही है.

तीसरा दौर

दूल्हा अगले दिन दुलहन को लेने आता है और एक बार फिर रोते हुए दुलहन मायके की दहलीज छोड़ती है. दुलहन के एक तरफ दूल्हा बैठा है और दूसरी तरफ सास. दूल्हा सारे रास्ते चोर सा बना बैठा रहता है. न सलाम, न दुआ, न हालचाल पूछना.

इसी सोच में घर आ जाता है. शुक्र है घर में सुकून है. सब मेहमान जा चुके हैं. सासससुर खूब सदके करते हैं. ननद भागभाग कर खिदमतें कर रही हैं. देवर मजाक कर रहे हैं.

दुलहन को उस के कमरे में भेज दिया जाता है. दूल्हा आ कर सलाम करता है औपचारिक सा. और इधरउधर की बातें करने के बाद गंभीर से आदेशनुमा शब्द कहता है, ‘‘मुझे दुनिया में सब से ज्यादा अपने मांबाप और भाईबहन प्यारे हैं. उन की खूब खिदमत करना. किसी तरह की शिकायत का मौका न देना. अपनेआप को उन के मुताबिक ढाल लेना.’’

धड़ाम… यह तीसरा सपना टूटा. मुंहदिखाई में न कुछ दिया, न तारीफ की और न प्यार भरे दो बोल बोले. पहले ही दिन नसीहतें शुरू कर दीं.

सुबह ननद आती है, ‘‘अरे भाभी, वह अंगूठी किधर गई जो भाईजान ने आप को मुंहदिखाई में दी?’’

भाभी बेचारी चुप. अचानक दूल्हे को याद आया, ‘‘अरे, वह तो मुझे रात को याद ही नहीं रही. लाओ इधर हाथ, यह लो अंगूठी.’’

मुंहदिखाई ऐसे देते हैं? कहानियों में तो ऐसा नहीं पढ़ा था.

चौथा दौर

धीरेधीरे सासससुर असली रंग में आना शुरू हो जाते हैं. शादी को सिर्फ 12 दिन हुए हैं. दुलहन को रसोईघर में खाना बनाने का आदेश जारी होता है. गोटे किनारी वाले कपड़े भी पहनो और चूल्हे के आगे मुंह भी काला करो. धड़ाम… एक और ख्वाब बिखर गया.

सुना था कि लोग 6-6 महीने दुलहन को चारपाई से पैर नहीं उतारने देते, मगर यह क्या… अब ‘धड़ाम’ की भी परवाह न करे क्योंकि यह ‘धड़ाम, धड़ाम’ होता रहेगा.

एक महीना खत्म हो गया. मियां ने सामान बांधा और लगे उपदेश देने ‘‘बीवी, हमारी तो छुट्टियां खत्म हुईं. हम तो काम पर जा रहे हैं. घर वालों का खयाल रखना.’’

अजीब रिवाज है यहां का. उन्हें खयाल रखना चाहिए दुलहन का, उलटा उसी को हुक्म दिया जा रहा है.

5वां और आखिरी दौर

इसे 5वां और आखिरी दौर समझ लें, क्योंकि जिंदगी उसी तरह शुरू होती है, जैसे ट्रैजिडी वाली सच्ची कहानियां होती हैं. मियां चले गए. दुलहन का दिल उदास है. ससुराल वालों को शिकायत है कि दुलहन का दिल हम में नहीं लगता, बातें नहीं करती, खामोश रहती है.

दूल्हा दोबारा छुट्टी ले कर आता है. तो उस से भी शिकायत की जाती है. वह फिर समझाता है और दुलहन चुपचाप सुनती रहती है.

अब वह दुलहन नहीं चाबी वाली गुडि़या है जिसे हर एक के हुक्म पर सिर झुकाना पड़ता है. हर बात के लिए सब से बारीबारी पूछना है. अगर गलती से कोई रह जाए तो उस की नाराजगी बरदाश्त करनी पड़ेगी. हर एक की अलगअलग फरमाइशें होंगी, फिर बुराई होगी.

लीजिए, 6 महीने में एक ‘लड़की’ एक ‘जिम्मेदार औरत’ बन गई.

मैं नौटी और नौटंकीबाज नहीं : जिज्ञासा सिंह

अपने चुलबुले अंदाज में जब पहली बार राजस्थान की छोरी जिज्ञासा सिंह छोटे परदे पर आई तो दर्शकों को यकीन ही नहीं था कि कुछ ही दिनों में यह लड़की अपनी मासूम अदाओं से लोगों को अपना दीवाना बना लेगी. परदे पर सीधीसादी व घरेलू दिखने वाली यह लड़की रीयल लाइफ में बहुत फैशनेबल और ग्लैमरस है.

टैलीविजन सीरियल ‘थपकी प्यार की’ से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली जिज्ञासा कई रिऐलिटी शोज और धारावाहिकों में काम कर चुकी हैं. कलर्स टीवी के सीरियल ‘देव 2’ में वे मुख्य किरदार निभा रही हैं. शो के प्रमोशन के दौरान उन्होंने अपनी फिटनैस से ले कर लवलाइफ तक की बातें शेयर कीं. पेश हैं मुख्य अंश:

ऐक्टिंग को कैरियर कैसे चुना?

मुझे खुद पता नहीं कि मैं ऐक्ट्रैस कैसे बन गई, क्योंकि बचपन से ही मैं कुछ और बनने का सपना संजोए हुए थी. मैं ने कभी नहीं सोचा था कि मैं इस क्षेत्र में अपना कैरियर बनाऊंगी. स्कूलटाइम में कुछ प्ले जरूर किए थे जिन में मेरे काम को लोगों ने सराहा था, लेकिन मैं ने तब सोचा नहीं था कि मैं ऐक्टिंग के क्षेत्र में आऊंगी. कालेजटाइम पर किसी ने मुझे बताया था कि टीवी शो ‘सिनेस्टार’ के औडिशन चल रहे हैं. मेरी सहेली ने अपने फौर्म के साथ मेरा फौर्म भी भर दिया. मैं अपनी सहेली को औडिशन दिलाने मुंबई आई. लेकिन उस का तो नहीं, मेरा सिलैक्शन हो गया. उस के बाद काम मिलता गया और आज मैं यहां तक पहुंची हूं.

सीरियल ‘थपकी प्यार की’ में आप का कैरेक्टर बिलकुल अलग था, ‘देव 2’ में उस से हट कर है, आप को क्या बदलाव करने पड़े अपनी ऐक्टिंग में?

सच में टीवी सीरियल ‘थपकी प्यार की’ से मुझे एक नई पहचान मिली है. आज भी कहीं बाहर जाती हूं तो लोग मुझे थपकी कह कर ही पुकारते हैं. जब आप का कैरेक्टर आप के नाम से ज्यादा हिट हो जाए तो सब से ज्यादा खुशी उस कलाकार को मिलती है जिस ने उस कैरेक्टर को निभाया है. लेकिन मैं उस कैरेक्टर से हट कर कुछ अलग करना चाहती थी, इसलिए धारावाहिक ‘देव 2’ में ध्वनि के किरदार के लिए हां किया. थपकी सीधीसादी मासूम लड़की थी, लेकिन ध्वनि उस के अपोजिट नौटी और बबली गर्ल है.

वह गैजेट्स की फैन है और हमेशा सोशल मीडिया व डेटिंग साइट्स पर व्यस्त रहती है. मेरा किरदार बड़ा रंगीन है. इस किरदार को करने में तो शुरू में मुझे हिचकिचाहट हुई, लेकिन कुछ अलग करने की इच्छा ने बहुत मोरल सपोर्ट किया.

रीयल लाइफ में जिज्ञासा कैसी है?

मैं रीयल लाइफ में थपकी की तरह हूं, लेकिन इतनी मासूम भी नहीं हूं. मैं फैशनेबल और पैशनेट हूं.  हमेशा जमाने के साथ चलने की कोशिश करती हूं. बाइक भी चलाती हूं, गैजेटफ्रैंडली भी हूं और मेकअप, फिटनैस पर हमेशा ध्यान देती हूं. मेरे पापा मेरे सब से करीब हैं. उन्होंने हर समय मेरी बहुत हैल्प की है. जब भी मैं डिसीजन लेने में नर्वस होती हूं तो वे हमेशा मुझे एनकरेज करते रहते थे. मैं जब दिल्ली में स्टडी कर रही थी तब मेरे पास ‘थपकी प्यार की’ के लिए लीड ऐक्ट्रैस के लिए फोन आया तो मैं कन्फ्यूज्ड हो गई. मैं ने न कोई प्ले किया न कोई टीवी शो. तब पापा ने कहा था कि हमेशा मौके घर चल कर नहीं आते. मेरे लिए हमेशा मेरी फैमिली फर्स्ट है. मैं आज भी अपने पापा की परी हूं.

ऐक्टिंग कहां सीखी?

कहीं नहीं, लेकिन लोगों को फौलो बहुत किया है. मैं पुरानी क्लासिकल फिल्मों की बहुत बड़ी फैन रही हूं. देवानंद, नसीरुद्दीन शाह, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, मनोज बाजपेई की भी फिल्में मैं ने बड़े गौर से देखी हैं. मुझे ऐक्ट्रैस में विद्या बालन कमाल की अदाकारा लगती हैं. वे हमेशा नैचुरल ऐक्टिंग करती हैं. उन के फिगर और उन की ऐक्टिंग दोनों की मैं बहुत बड़ी फैन हूं. इस के अलावा जो भी सीखा है कैमरे के सामने ही सीखा है.

आगे की प्लानिंग क्या है?

अभी कुछ ज्यादा सोचा नहीं है. डांस और कराटे क्लास जौइन की है क्योंकि मैं सभी अंतरंगी किरदारों को परदे पर निभाना चाहती हूं. अगर कोई अच्छा शो या बौलीवुड से किसी फिल्म का औफर आता है तो मैं उस के लिए तैयार हूं. आज के दौर में फिल्मों से कलाकार टैलीविजन पर आ रहे हैं और टीवी कलाकार फिल्मों में जा रहे हैं. आज कलाकार सभी मीडियम में काम करना चाहते हैं. उन के लिए ऐक्टिंग माने रखती है.

‘थपकी प्यार की’ में हकलाने वाली लड़की का रोल करने में कोई परेशानी आई?

मैं ने काफी समय तक हकलाने वाली लड़की का रोल किया था. तब रीयल लाइफ में मैं ने कम बोलना शुरू कर दिया था, क्योंकि कैरेक्टर को करतेकरते सामान्यतौर पर भी जब मैं बात करती तो उसी तरह हकलाने लगती. मेरे पापा मुझे हमेशा टोकते थे कि कैरेक्टर सिर्फ शूटिंग तक ही रहना चाहिए, घर पर मुझे जिज्ञासा मिलनी चाहिए. मुझे हकलाने की ट्रिक समझ आ गई थी. जब छोड़ने का मन हुआ तो पहले जैसे बहुत बातें करने लगी थी.

फिट रहने के लिए फिटनैस टिप्स

मैं रैगुलर ग्रीन टी पीती हूं. डाइटिंग में विश्वास नहीं करती, पर फैट और राइस को इग्नोर करती हूं. मैं रागी और ग्लूटेन फ्री स्टफ को ज्यादा इस्तेमाल करती हूं. डीप फ्राई डाइट से हमेशा बचती हूं. ऐक्सरसाइज करती हूं और जब समय मिलता है क्रंचेस करती हूं.

दांत टूटे शूटिंग में

‘थपकी प्यार की’ सीरियल की शूटिंग के दौरान जिज्ञासा अपने दांत भी तुड़वा चुकी हैं. एक सीन के दौरान जिज्ञासा को तेजी से दौड़ना था और शूटिंग के दौरान वे ढलान से नीचे गिर गईं. उन का चेहरा जमीन पर लगा और उन के कुछ दांत टूट गए. मुंह के अंदर टांके लगाने पड़े.

बौयफ्रैंड की खबरें भी लाइमलाइट में रहीं

जिज्ञासा सिंह जब सीरियल ‘थपकी’ में काम कर रही थीं तब उन का नाम अपने कथित बौयफ्रैंड अंकित बठला से जुड़ने लगा था, लेकिन जैसे ही अंकित शो से बाहर गए तभी से उन की और जैनिफर विंगेट के कथित बौयफ्रैंड सहबान अजीम से दोस्ती गहराते जा रही है. अजीम और जिज्ञासा की दोस्ती से  शो के दूसरे कलाकार मनीष गोपलानी को काफी तकलीफ हुई थी.

कैंसर की तरह परिवार में फैलता अलगाव

हिंदी फिल्मों में से आजकल परिवार उसी तरह गायब हो गया है जैसे काफी समय से हौलीवुड की फिल्मों से हुआ है. हौलीवुड की फिल्मों में अब मारधाड़, स्पैशल इफैक्ट, स्पीड, तरहतरह की बंदूकें और स्पाइइंग ही दिखती है. भारतीय फिल्मों में बायोपिक बनने लगी हैं और जो परिवार दिखता है उन्हीं में होता है पर वे आमतौर पर एक पर्सनैलिटी पर केंद्रित रहती हैं.

परिवार को सफल बनाने के लिए निरंतर पाठ पढ़ना जरूरी है. यह ऐसा नहीं कि विवाह करते समय किसी विवाह कराने वाले ने विवाह की शर्तें सुना दीं और हो गई इति. यह रोज का मामला है और रोज हर युगल के सामने एक नई चुनौती, एक नई समस्या, एक नई उपलब्धि, एक नया व्यवधान होता है और यदि आसपास के माहौल, समाचारों, पठनीय सामग्री, टीवी, फिल्मों में यह न दिखे तो वैवाहिक जीवन वैसे ही लड़खड़ाने लगता है जैसे विटामिनों की कमी के कारण शरीर.

लोग अब मैडिकल हैल्प के लिए डाक्टरों के पास ज्यादा जा रहे हैं बजाय फैमिली हैल्प के लिए जानकारी जुटाने या किसी विशेषज्ञ के पास. बढ़ते मानसिक रोगों और पारिवारिक तनाव का कारण यही है कि परिवार की सेहत का खयाल बिलकुल नहीं रखा जा रहा जबकि जिम जा कर शरीर की मेहनत पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है.

यह फिल्मों में दिखने लगा है. अगर 1950-60 की फिल्में जम कर चलीं तो इसीलिए कि पतिपत्नी और बच्चों के परिवारों ने तब अचानक सदियों पुरानी संयुक्त परिवार प्रणाली से मुक्त हो कर राहत की सांस ली थी और वे अपने संबंधों को अपने अनुसार चलाने के तरीके ढूंढ़ रहे थे. तभी नई नौकरियों, बढ़ते शहरों, सहशिक्षा, दफ्तरों आदि में आदमियों और औरतों के मिलने, प्रेम विवाहों के कारण जो समस्याएं पैदा हो रही थीं लोग उन के हल खोज रहे थे. कुछ पत्रिकाओं और उपन्यासों में पाते थे तो कुछ फिल्मों में.

पारिवारिक फिल्में मानसिक और पारिवारिक स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी हैं और इन का कम बनना एक गंभीर चिंता का विषय है. पारिवारिक फिल्में चाहे परिवार को किसी भी ढंग से देखें कुछ सवालों के हल जरूर करता है. ब्लैक ऐंड व्हाइट फिल्मों की छद्म नैतिकता को चाहे हम पुरातनवादी और दकियानूसी कह लें पर कम से कम वे कुछ सवालों के जवाब तो देती थीं. ‘दंगल’ जैसी सफल फिल्में चाहे परिवार से बहुत दूर नहीं हैं पर उन में परिवार की कम खिलाड़ी की अपनी समस्याओं की चर्चा ज्यादा है.

परिवार पर व्यक्ति हावी रहे इस में किसी को आपत्ति नहीं पर व्यक्तित्व निखारने के लिए जो नींव चाहिए होती है वह परिवार ही देता है. हिंदी फिल्में अब अकसर दिखाने लगी हैं कि टूटा परिवार होता है तो कैसे रहते हैं पर उन में अपनी सफलता से जूझ रहे पात्र साथसाथ परिवार की समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं.

‘इंगलिशविंगलिश’ और ‘हिंदी मीडियम’ जैसी फिल्मों में परिवार के अच्छे चित्रण हैं और तभी बिना सितारों के भी ये चलीं. जो फिल्में अचानक सफल हुईं उन में अधिकांश में परिवार केंद्र में था और दर्शकों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया.

परिवार के प्रति उदासीनता दुनियाभर में बुरी तरह फैली है. सैल्फ डैवलपमैंट पर हजारों किताबें लिखी गई हैं. ‘मैं’ की महत्ता बहुत बढ़ी है पर इसी चक्कर में परिवारों के दीवाले निकल रहे हैं और बिना तलाक लिए भी पतिपत्नी और बच्चे मुंह फुलाए घूम रहे हैं. आमतौर पर लोगों के पास अपने दुख व्यक्त करने के शब्द ही नहीं होते. उन्हें समझ ही नहीं आता कि दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करें. वे अपनी धुन में मस्त रहते हैं और उसी को जीवन की सफलता मानते हैं पर कैंसर की तरह परिवार में फैलता अलगाव का ट्यूमर एक दिन अचानक फट जाता है. उस समय दवा नहीं मिलती सिर्फ या तो सर्जरी, रैडिएशन होती है या फिर मौत.

फिसलन भरे रास्तों की नायिका

बात 26 जुलाई, 2018 की है. कुछ चरवाहे भोगपुर डैम के पास अपने जानवर चरा रहे थे. तभी उन की
नजर डैम के मछली झाला क्षेत्र में पानी पर तैरती एक लाश पर पड़ी. चरवाहों ने डैम के किनारे जा कर देखा तो लाश किसी युवक की थी.

एक चरवाहे ने इस की सूचना पुलिस को दे दी. चूंकि यह इलाका जसपुर थाना कोतवाली के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से जसपुर कोतवाली को सूचना दे दी गई.

खबर मिलते ही थानाप्रभारी सुशील कुमार, परमापुर चौकी इंचार्ज वी.के. बिष्ट के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस के पहुंचने तक अंधेरा घिर आया था, मौके पर कोई भी व्यक्ति मौजूद नहीं था. पुलिस ने लाश डैम के पानी से बाहर निकलवाई. लाश की जांच की तो उस के कपड़ों से पहचान की कोई चीज नहीं मिली. लाश एक युवक की थी. शिनाख्त न होने पर पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए काशीपुर भेज दी.

घटनास्थल की काररवाई निपटा कर पुलिस जब थाने लौट रही थी, तो रास्ते में पड़ने वाले गांव गढ़ीनेगी पहुंच कर पुलिस ने वहां के लोगों को डैम में लाश मिलने की बात बताते हुए पूछा कि यहां का कोई युवक तो गायब नहीं है. पुलिस ने लोगों को मोबाइल में मौजूद मृत युवक के फोटो भी दिखाए. वहां मौजूद एक युवक ने उस फोटो को देखते ही कहा कि यह तो करनपुर के तोताराम का बेटा पप्पू सिंह है.

इस के बाद पुलिस करनपुर गांव में तोताराम के घर पहुंच गई. पुलिस ने पप्पू की पत्नी शशि से पप्पू के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि कल वह कहीं जाने की बात कह कर घर से निकले थे, तब से अभी तक नहीं लौटे हैं. पुलिस ने उसे बताया कि पप्पू की लाश भोगपुर डैम के मछली झाला क्षेत्र में पानी पर तैरती पाई गई है. यह सुन कर शशि दहाड़ मार कर रोने लगी. घर में रोने की आवाज सुन कर आसपड़ोस वाले भी वहां पहुंच गए.

पप्पू का बड़ा भाई राजपाल जोकि दूसरे मकान में रहता था. खबर सुन कर घर वालों के साथ पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गया. राजपाल ने लाश की शिनाख्त अपने भाई पप्पू सिंह के रूप में की. लाश की शिनाख्त कर राजपाल घर लौट आया. भाई की मौत को ले कर घर वाले सारी रात परेशान रहे.

भाई को संदेह था भाई की पत्नी पर

अगले दिन सुबह के समय राजपाल अपनी पत्नी के साथ भाई पप्पू के घर पहुंचा तो घर बिलकुल सुनसान पड़ा था. राजपाल ने पप्पू की बीवी शशि को आवाज लगाई तो कोई जवाब नहीं मिला. राजपाल और उस की बीवी ने अंदर जा कर देखा तो मृतक के दोनों बच्चे सोए हुए थे.

राजपाल ने शशि को आसपास तलाशा, लेकिन उस का कहीं भी पता नहीं चला. पति की मौत के बाद शशि के अचानक गायब हो जाने से लोग अपनी मानसिकता के अनुसार तरहतरह के कयास लगाने लगे.

उसी दौरान किसी ने बताया कि शशि अभी थोड़ी देर पहले घर के सामने खड़ी थी. यह जानकारी मिलने से यह तो साबित हो गया कि वह थोड़ी देर पहले ही घर से निकली है. राजपाल ने पड़ोसियों की मदद से उसे आसपास खोजने की कोशिश की तो वह जंगल की तरफ जाती हुई मिली.

राजपाल और उस के परिजनों ने उसे रोकने की कोशिश की तो वह जोरजोर से दहाड़ें मार कर रोते हुए कहने लगी कि जब उस का मर्द ही नहीं रहा तो वह जी कर क्या करेगी. उस ने बताया कि अब वह आत्महत्या कर के पति के पास जाना चाहती है. घर वालों को उस वक्त उसे समझा कर शांत करना ठीक लगा. उन लोगों ने घर वापस चलने को कहा तो उस ने जाने से साफ मना कर दिया. घर वाले उसे जैसेतैसे समझा कर घर वापस ले आए.

राजपाल सिंह पहले से ही शशि के त्रियाचरित्र को जानता था. उसे शक था कि हो न हो शशि ने ही उस के भाई को न मरवा दिया हो. राजपाल भाई के 12 वर्षीय बेटे राज को साथ ले कर अपने घर आ गया. घर जा कर  उस ने राज से उस के पापा के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि कल शाम भूपेंद्र अंकल घर आए थे.
वह पापा को किसी काम के बहाने घर से बाहर ले गए थे. उस के बाद पापा सारी रात घर नहीं आए. उस ने मम्मी से पापा के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि तुम्हारे पापा किसी काम से बाहर गए हैं. सुबह तक आ जाएंगे. इस के बाद मम्मी ने दोनों भाईबहन को सुला दिया था.

भाई के बेटे राज के द्वारा इतनी जानकारी मिलने से यह तो पक्का हो ही गया था कि पप्पू की हत्या में भूपेंद्र सिंह शामिल था. राजपाल ने यह बात वहां मौजूद अपने घर वालों को बता दी और पुलिस को भी सूचित कर दिया.

यह जानकारी मिलते ही थानाप्रभारी सुशील कुमार महिला पुलिस के साथ मृतक के घर पहुंच गए. उन्होंने सब से पहले मृतक के बेटे राज से बात की तो उस ने वही सारी बात उन्हें बता दीं, जो अपने ताऊ राजपाल को बताई थीं. इस के बाद पुलिस ने शशि को एकांत में ले जा कर पूछताछ की.

शशि ने साफ शब्दों में कहा कि उस के पति की हत्या किस ने और क्यों की, इस बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है. पुलिस ने उस समय उस से सख्ती करनी जरूरी नहीं समझी. इस की जगह पुलिस ने उस के पड़ोसियों के साथसाथ उस के घर वालों से पूछताछ की.

पता चला काफी समय से गांव कलिया वाला टांडा निवासी भूपेंद्र सिंह का शशि के यहां आनाजाना था. वह वक्तबेवक्त आताजाता रहता था. इस बात की पुष्टि शशि के बेटे राज ने भी कर दी, जिस से साफ हो गया कि पप्पू अपनी पत्नी शशि और भूपेंद्र के बीच पनपे अवैध संबंधों की भेंट चढ़ गया था.

शशि ने स्वीकारा अपना अपराध

शशि के खिलाफ सबूत मिल चुके थे, इसलिए पुलिस उसे अपने साथ पुलिस चौकी पतरामपुर ले गई. पुलिस चौकी में की गई पूछताछ में भी वह मुंह खोलने को तैयार नहीं थी. इस पर पुलिस ने अपने गेम का अगला पासा फेंकते हुए कहा कि उस के बताने या न बताने से पुलिस को कोई फर्क नहीं पड़ता. उस के बेटे राज ने उस की सारी करतूतें बता दी हैं. वही इस केस का गवाह भी बनेगा.

यह सुनते ही शशि फफकफफक कर रोते हुए बोली, ‘‘साहब, इस में मेरा कोई कसूर नहीं है. मैं अपने आदमी को भला क्यों मारूंगी. यह सब भूपेंद्र का ही कारनामा है. वह काफी समय से मेरे पीछे पड़ा था. उस ने कई बार मुझ से शादी करने को भी कहा था. मैं ने इस के लिए मना किया तो उस ने मेरे पति की हत्या कर दी.’’

वह रोते हुए आगे बोली, ‘‘साहब, मेरे दोनों बच्चे छोटे हैं, मेरे बिना अनाथ हो जाएंगे. मुझ पर रहम करो. पति को मैं ने नहीं मारा.’’

शशि से पूछताछ करने से यह तो साफ हो गया कि पप्पू की हत्या शशि और भूपेंद्र के अवैध संबंधों की वजह से हुई थी और हत्यारा था भूपेंद्र.

यह जानकारी मिलते ही पुलिस भूपेंद्र को गिरफ्तार करने के लिए उस के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर से फरार था. इस के बाद भी पुलिस उस के पीछे पड़ी रही. बाद में भूपेंद्र को देर रात सोते हुए उस के घर से ही गिरफ्तार कर लिया गया.

भूपेंद्र से पुलिस ने कड़ी पूछताछ की तो उस ने अपना जुर्म कबूलते हुए बताया कि उस ने शशि के कहने पर ही पप्पू की हत्या की थी. शशि ने उस से कहा था कि पप्पू के खत्म होते ही रास्ते का कांटा हट जाएगा. फिर दोनों मियांबीवी की तरह रहेंगे.

शशि और भूपेंद्र दोनों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था. उन से की गई पूछताछ के बाद पप्पू की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह काफी दिलचस्प निकली—

उत्तराखंड के जिला काशीपुर के जसपुर थाना कोतवाली क्षेत्र के गांव भरतपुर में तोताराम का परिवार रहता था. तोताराम की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी. गांव में न तो उन के पास जुतासे की जमीन थी और न ही अच्छी आमदनी का कोई जरिया. भरतपुर गांव के अधिकांश लोग जंगलों से लकड़ी ला कर बेचते थे. उसी से उन का गुजारा होता था. तोताराम का भी यही काम था.

वह जंगलों से लकड़ी बीन कर लाता और उन्हें बेच कर अपने परिवार की गुजरबसर करता था. तोताराम के 3 बेटे थे, जो काफी छोटे थे. किसी बीमारी के चलते तोताराम की मौत हो गई. सिर से बाप का साया हटते ही बच्चे अनाथ हो गए. पति की मौत के बाद बच्चों को पालनेपोसने की जिम्मेदारी उस की पत्नी सुनीता पर आ गई थी. सुनीता ने जैसेतैसे बच्चों को इस लायक कर दिया कि अपने पैरों पर खड़े हो सकें.
बच्चे जवान हुए तो कामधंधे में लग गए और फिर करनपुर गांव में अपना मकान बना कर रहने लगे. करनपुर जंगल से सटा हुआ इलाका है. कुछ लोग जंगल का फायदा उठा कर कच्ची शराब बनाने का धंधा करते हैं. कच्ची शराब की भरमार होने की वजह से यहां के अधिकांश लोग शराबी बन चुके हैं.

तोताराम के तीनों लड़के भी यहां आ कर शराब पीने के आदी हो गए. करनपुर आने के कुछ दिनों बाद तोताराम के बड़े बेटों राजपाल और जगदीश की शादी हो गई थी. घर में केवल पप्पू ही शादी के लिए बचा था. बाद में उस की शादी उत्तर प्रदेश के शहर रामपुर के रहने वाले मुरलीलाल की बेटी शशि से हो गई. यह करीब 18 साल पहले की बात है.

शशि बन गई पप्पू की चहेती

शशि अपने पति से काफी खुश थी. शशि हंसमुख थी. उस की चंचलता चेहरे से ही झलकती थी. कुछ ही समय में उस ने अपनी ससुराल वालों के साथसाथ पड़ोसियों का भी दिल जीत लिया था. शादी से पहले शशि के कदम बहक गए थे. मोहल्ले के कई लड़कों के साथ उस के अवैध संबंध थे. लेकिन शादी होने के बाद उस की इस तरह की कहानियां दफन हो गई थीं.

शादी के करीब साल भर बाद वह एक बच्चे की मां बनी. उस ने बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम राज रखा गया. बच्चे के जन्म के बाद पप्पू की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई थी. खर्च पूरे करने के लिए वह दिनरात मेहनत करने लगा. उस ने गांव के नजदीक ही एक सरदार के फार्म में काम करना शुरू कर दिया.
पप्पू का ज्यादातर समय वहीं गुजरता था. वह रहता भी वहीं पर था. वहां रहने से उसे यह फायदा हो गया कि हर रोज काम तलाशने के बजाए उसे हर महीने बंधीबंधाई तनख्वाह मिलने लगी. फार्म पर रहते हुए ही वह ट्रैक्टर चलाना सीख गया था.

पप्पू को अच्छी आमदनी होने लगी तो शशि के रहनसहन में भी काफी बदलाव आ गया. वह अब बनठन कर रहने लगी थी. पप्पू सीधासादा युवक था. वह महीने में जो भी कमाता, अपनी बीवी के हाथ पर ला कर रख देता था. घर का सारा खर्च शशि ही अपने हिसाब से करती थी. इस बीच वह दूसरे बच्चे की मां भी बन गई थी. लड़की हुई थी राजो उर्फ रज्जी.

2 बच्चों के बाद शशि का शरीर पहले से कहीं ज्यादा खिल उठा था. पप्पू को तो केवल कमाई की धुन थी. वह सारे दिन काम में लगा रहता और शाम को खापी कर जल्दी सो जाता. वह पत्नी की तरफ ध्यान नहीं दे पा रहा था, जिस से उस के दिल में पप्पू के प्रति लगाव कम होने लगा.

शादी के 6 साल बीत जाने के बाद पप्पू उस के शरीर को पढ़ने में कमजोर पड़ने लगा तो शशि ने पिंजरे में बंद रहने के बजाए उड़ने की ठान ली. वह खूबसूरत तो थी ही, उस ने मोहल्ले के युवकों पर जाल फेंका तो कई युवक उस की गलियों के चक्कर लगाने लगे.

जब शशि के पैर बहके

उस ने मोहल्ले के एक युवक के साथ गहरी दोस्त कर ली और उस के साथ मौजमस्ती का खेल खेलने लगी. बुरा काम चाहे कोई भी हो, कितना भी छिपा कर क्यों न किया जाए, भेद खुल ही जाता है. शशि के प्रेमी के बारबार शशि के पास आने पर मोहल्ले वालों को शक हो गया. इस के बाद मोहल्ले के कई युवकों का शशि के यहां आनाजाना हो गया. वे उस के साथ मौजमस्ती करने के साथ ही उस के खर्चे भी उठाने लगे.
शशि जंगल से लकड़ी लाने के बहाने घर से निकलती और जंगल में वह प्रेमियों से मिलती. लेकिन एक दिन एक अनजान युवक ने उस के साथ छेड़छाड़ कर दी. यह हरकत शशि के पड़ोसी ने देख ली. शशि जानती थी कि उसे दुनिया की नजरों में पाकसाफ बन कर रहना है तो उसे जरूर कुछ करना होगा.

यही सोच कर उस ने गांव में आते ही उस युवक द्वारा की गई हरकत को ले कर शोर मचा दिया. इतना ही नहीं वह उस युवक को सबक सिखाने के लिए कुंडा स्थित पुलिस चौकी में शिकायत करने जा पहुंची.
चौकी में उस की मुलाकात एक कांस्टेबल से हुई जो उसी के हलके का था. कांस्टेबल पहली ही नजर में उस के हुस्न पर मर मिटा. उस ने शशि के साथ हमदर्दी दिखाते हुए उस का मोबाइल नंबर ले लिया और अपना मोबाइल नंबर उसे देते हुए कहा कि तुम चिंता मत करो, कल आ कर मैं उस हरामखोर को देखता हूं.

अगले दिन वह पुलिस वाला गश्त पर निकला तो घूमतेघामते शशि के घर जा पहुंचा. शशि के घर पुलिस वाले को आया देख मोहल्ले के लोग इधरउधर हो गए. इस के बाद सिपाही शशि को छेड़ने वाले युवक का पता लगाते हुए उस के घर गया.

कांस्टेबल ने उस युवक को डराधमका कर कुछ रुपए ऐंठे और आगे कोई हरकत न करने की हिदायत दे कर छोड़ दिया. युवक से पैसे ऐंठने के बाद वह शशि से मिला और उस ने उन पैसों में से कुछ पैसे शशि को दे दिए.

शशि ने पुलिस में बना ली जानपहचान

पुलिस वाले से जानपहचान हो जाने से शशि बहुत खुश हुई. वह सिपाही भी उस की कुशलक्षेम पूछने के बहाने उस के घर के चक्कर लगाने लगा. इस के बाद शशि घर वालों के साथसाथ पड़ोसियों पर भी रौब जमाने लगी. उस के घर वाले उस के त्रियाचरित्र से तंग आ चुके थे.

उन्होंने उस की इस हरकत की शिकायत पप्पू से की, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. शशि के सामने पप्पू की एक नहीं चलती थी. शशि ने उसी पुलिस वाले के सहारे घर वालों से भी कई बार पंगा ले लिया था, जिस के बाद घर वालों ने उस से संबंध ही खत्म कर दिए थे. एक पुलिस वाले के सहारे वह कई पुलिस वालों के दिलों पर राज करने लगी थी.

पुलिस वालों से दोस्ती हो जाने के बाद शशि अपनी मनमानी करने लगी. जब उसे पैसों की जरूरत होती तो वह किसी न किसी मर्द को अपने मोहपाश में फंसा लेती और फिर उसे धौंस दिखा कर मनचाहे पैसे ऐंठती. पुलिस वालों के बल पर उस का धंधा फलनेफूलने लगा था.

पति के घर से निकलते ही शशि बच्चों को तैयार कर स्कूल भेज देती और फिर सजसंवर कर अपने धंधे के लिए निकल जाती. जब उस की हरकतें हद पार करने लगीं तो घर वालों की शिकायत पर पप्पू ने उसे कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन वह उलटे उसी पर राशन पानी ले कर चढ़ने लगी.

इस के बाद दोनों मियांबीवी में मनमुटाव रहने लगा. अब वह पति से पूरी तरह से खार खाने लगी थी. अपनी बीवी की बेवफाई से तंग आ कर पप्पू ने फार्म से काम छोड़ दिया और दारू के नशे में धुत रहने लगा.
उसी दौरान उस की मुलाकात जसपुर थाना कोतवाली के गांव टांडा निवासी भूपेंद्र सिंह से हुई. भूपेंद्र के पास अपने 2 ट्रैक्टर थे. वह गांव वालों से सस्ते में गन्ना खरीद कर सीधे शुगर फैक्ट्री में बेचता था, जिस से उसे अच्छी आमदनी हो जाती थी. भूपेंद्र को अपना दूसरा ट्रैक्टर चलाने के लिए एक ड्राइवर की जरूरत थी.

उस ने पप्पू से बात की तो वह उस का ट्रैक्टर चलाने को राजी हो गया. पप्पू ने फिर से शराब का सेवन बंद कर दिया और वह भूपेंद्र का ट्रैक्टर चलाने लगा, जिस के सहारे उस का पप्पू के घर आनाजाना शुरू हो गया.

भूपेंद्र की शशि से मुलाकात उस वक्त हुई जब वह किसी काम से काशीपुर गया हुआ था. उस दिन शशि के दोनों बच्चे भी स्कूल गए थे. उस दिन भूपेंद्र पप्पू को बुलाने उस के घर आया था. शशि जानती थी उस का पति उसी का ट्रैक्टर चलाता है. शशि ने भूपेंद्र की खूब खातिरदारी की. भूपेंद्र उस की सुंदरता पर मर मिटा. एक तरह से वह उस का दीवाना बन बैठा. भूपेंद्र ने शशि का मोबाइल नंबर ले लिया. बाद में उस की शशि से फोन पर बातें होने लगीं.

भूपेंद्र बन गया शशि का आशिक

फलस्वरूप कुछ ही दिन बाद दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. भूपेंद्र को अच्छी कमाई थी. वह शशि पर भी पैसा खर्च करने लगा. इस से शशि पूरी तरह से उस की प्रेम दीवानी हो गई. भूपेंद्र अकसर पप्पू को ट्रैक्टर ले कर बाहर भेज देता और फिर सीधा उस के घर पर आ जाता.

कई बार तो भूपेंद्र पप्पू की गैरमौजूदगी में सारीसारी रात उसी के घर पर पड़ा रहता. उस वक्त शशि अपने बच्चों को जल्दी खाना खिला कर सुला देती और फिर सारी रात भूपेंद्र के साथ मौजमसती में डूब जाती.

भूपेंद्र जब भी आता, शशि और उस के बच्चों के लिए फल और मिठाई ले कर आता था, इस के चलते शशि के बच्चे भी भूपेंद्र से हिलमिल गए थे. जिस दिन वह घर आता, इस की सूचना किसी तरह पप्पू तक पहुंच ही जाती थी.

पप्पू की बेटी उस के घर आने पर ताने मारते हुए कहती, ‘‘आप से बढि़या तो भूपेंद्र अंकल हैं, वह जब भी आते हैं, अपने साथ बहुत सारी चीजें लाते हैं. बच्चों की बात सुनते ही पप्पू का पारा हाई हो जाता था. पप्पू को विश्वास हो गया था कि उस की गैरमौजूदगी में भूपेंद्र उस के घर आता है. इसी बात को ले कर उस की पत्नी से लड़ाई होती. लेकिन वह उलटे उस के ऊपर ही राशनपानी ले कर चढ़ जाती थी.’’

इसी दौरान एक दिन शशि ने भूपेंद्र के सामने बोझिल मन से कहा कि इस तरह कब तक चलेगा. पप्पू जब भी आता है तो उस का मुंह फूला होता है. वह तुम्हारे चक्कर में मुझ से ठीक से बात भी नहीं करता. जिस से मेरा सारा दिन खराब हो जाता है. अगर तुम मुझे इतना ही प्यार करते हो तो कुछ ऐसा करो कि उस की टेंशन ही खत्म हो जाए. भूपेंद्र शशि का इशारा समझ गया था.

इसी दौरान उस के दिमाग में एक आइडिया आया. उसी आइडिया के तहत उस ने एक दिन मौका पाते ही अपने गांव के एक किसान की हैरो चुरा ली. भूपेंद्र ने वह हैरो ला कर अपने खेत के एक कोने में डाल दी. जब उस किसान को पता चला कि उस की हैरो चोरी हो गई है तो उस ने पहले तो आसपास ही इधरउधर तलाशने की कोशिश की.

तभी उसे पता चला कि उस की हैरो भूपेंद्र के खेत में कोने में पड़ी हुई है. इस की जानकारी मिलते ही वह सीधे भूपेंद्र के पास गया और अपनी चोरी हुई हैरो की बात बताते हुए पूछा कि उस के खेत में वह हैरो कैसे पहुंची. भूपेंद्र ने उस से साफ शब्दों में कहा कि मेरा ट्रैक्टर पप्पू ही चलाता है. यह बात उसे ही पता होगी. मेरे पास तो पहले से ही मेरी अपनी हैरो है, फिर मैं तुम्हारी हैरो किसलिए चोरी करूंगा. तुम्हें जो भी पूछना है पप्पू से पूछो.

अपने ही घर में पप्पू हो गया बेगाना

यही बात उस किसान ने पप्पू से पूछी तो उस ने भी साफ शब्दों में कहा कि मुझे आप की हैरो से कोई लेनादेना नहीं. मैं भूपेंद्र के यहां केवल नौकरी करता हूं. मेरे पास तो अपना ट्रैक्टर तक नहीं है, मैं आप की हैरो चुरा कर क्या करूंगा.

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया तो किसान ने पुलिस चौकी जा कर दोनों के नाम हैरो चोरी की एफआईआर दर्ज करा दी. पुलिस चौकी में पहले से ही शशि की अच्छी बात थी. उस ने वहां जा कर भूपेंद्र को बचाते हुए अपने पति पप्पू को ही हैरो चोरी के इलजाम में जेल भिजवा दिया.

पप्पू के जेल चले जाने के बाद भूपेंद्र और उस के बीच मिलने का रास्ता बिलकुल साफ हो गया. इस के बाद शशि पूरी तरह से निडर हो कर उस के साथ जिंदगी के मजे लेने लगी. उस ने पप्पू को जमानत पर छुड़वाने के लिए पैरवी भी नहीं की.

यह सब देख कर पप्पू के बड़े भाई राजपाल को बहुत दुख हुआ. उस ने पप्पू को छुड़ाने के लिए काफी हाथपांव मारे तो शशि ने उस के परिवार को भी जेल भिजवाने की धमकी दे डाली. इस के बाद भी राजपाल ने जैसेतैसे पप्पू के केस की पैरवी की. पप्पू पर कोई ज्यादा बड़ा केस तो था नहीं. एक महीना जेल में रह कर वह घर आ गया.

भूपेंद्र ने खेला खेल

जेल से आते ही उस ने शशि की पिटाई की और उसे घर से निकल जाने को कह दिया. शशि ने फिर से अपने साथ पति द्वारा मारपीट की शिकायत चौकी में कर दी. इस मामले में पुलिस ने पप्पू पर कोई खास काररवाई तो नहीं की बल्कि उसे समझाते हुए पत्नी के साथ भविष्य में मारपीट न करने की चेतावनी दे कर छोड़ दिया. जेल से वापस आने के बाद पप्पू ने भूपेंद्र की नौकरी छोड़ दी. उस के बाद भूपेंद्र ने पप्पू के घर आनाजाना भी कम कर दिया.

इस पर भूपेंद्र ने शशि से मिलने का दूसरा रास्ता निकाला. जब कभी पप्पू किसी काम से बाहर जाता तो वह भूपेंद्र को फोन कर के गांव से बाहर बुला लेती और फिर उस के साथ मौजमस्ती करने निकल जाती. बाद में उस ने अपने बच्चों तक की परवाह करनी बंद कर दी. कभीकभी तो जब बच्चे ज्यादा भूखे होते तो पप्पू ही उन्हें कच्चापक्का खाना बना कर खिलाता.

शशि सुबह ही बनठन कर निकलती और देर रात घर लौटती. पति कुछ कहता तो वह उस पर ही चढ़ बैठती थी. हर रोज की चिकचिकबाजी से पप्पू परेशान हो गया तो उस ने शशि को तलाक देने की योजना बनाई. उस ने एक दिन उस से कोरे स्टांप पेपर पर अंगूठा भी लगवा लिया.

यह बात शशि ने भूपेंद्र को बताई तो उस ने शशि के कान भरते हुए उसे पति के खिलाफ ही भड़का दिया. भूपेंद्र ने शशि से कहा कि पप्पू तुम्हारी हत्या करने की साजिश रच रहा है. अगर अपनी खैर चाहती हो तो तुम पहले ही उसे मौत के घाट उतार दो.

भूपेंद्र की बात सुनते ही शशि भड़क उठी. उस ने कहा कि पति को मारना मेरे बस की बात नहीं है. अगर तुम मुझे दिल से चाहते हो तो यह काम तुम ही क्यों नहीं कर देते. अपने प्यार की खातिर इतना काम तो तुम ही कर सकते हो.

शशि के मन की बात सामने आते ही भूपेंद्र समझ गया कि अगर वह पप्पू को अपने रास्ते से हटा दे तो शशि पूरी तरह से उसी की रखैल बन कर रह जाएगी. इस के बाद उस ने पप्पू को मौत की नींद सुलाने के लिए तानेबाने बुनने शुरू कर दिए.

भूपेंद्र अगर शशि के लिए कुछ भी करने को तैयार था, तो इस का भी एक बड़ा कारण था. भूपेंद्र की शादी को कई साल बीत चुके थे, लेकिन उस की बीवी को कोई औलाद नहीं हुई थी. जिस के लिए उस की बीवी और वह परेशान रहते थे. शशि की ओर से पप्पू को अपने बीच से हटाने के लिए छूट मिलते ही उस ने सोच लिया था कि पप्पू को मौत की नींद सुलाने के बाद वह कोर्टमैरिज कर के उसे अपने घर ले आएगा.
लिखी गई हत्या की पटकथा

भूपेंद्र के गांव में ही उस का एक जिगरी दोस्त था मंजीत सिंह. मंजीत सिंह भूपेंद्र के हर सुखदुख में काम आता था. भूपेंद्र ने अपने मन की बात मंजीत के सामने रखी तो मंजीत उस का साथ देने को तैयार हो गया. इस के बाद भूपेंद्र ने अगला तानाबुना बुना. वह जानता था कि पप्पू इस वक्त उस से बहुत खफा है और उस की किसी भी चाल में फंसने वाला नहीं है.

भूपेंद्र के दिखावे के लिए शशि से मिलनाजुलना बंद कर दिया ताकि पप्पू के दिल में उस के प्रति नफरत की आग शांत हो सके. जब पप्पू ने देखा कि भूपेंद्र ने शशि से मिलना लगभग बंद कर दिया है तो पप्पू का व्यवहार भी पत्नी के प्रति नरम हो गया. फिर एक दिन शशि ने भूपेंद्र को फोन कर के अपने घर बुला लिया. उस वक्त पप्पू भी घर पर ही था.

पप्पू के घर पहुंचते ही भूपेंद्र ने उस के सामने अपनी गलती मानते हुए क्षमा मांगी. उस ने भविष्य में ऐसी कोई भी गलती न करने की कसम भी खाई. यह सब नाटक करने के बाद उस ने पप्पू से कहा कि उस के बिना उस का सारा कामधंधा चौपट हो गया है. वह आज ही उस के साथ चल कर ट्रैक्टर संभाल ले.
पप्पू उस की चिकनीचुपड़ी बातों में आ गया और फिर से उस का ट्रैक्टर चलाने लगा. उसे भूपेंद्र पर फिर से विश्वास हो गया था. उसी विश्वास के सहारे 26 जुलाई, 2018 को किसी काम के बहाने भूपेंद्र ने पप्पू को अपने साथ लिया और बाइक पर बैठा कर भोगपुर डैम की ओर ले गया. उस के साथ मंजीत भी था.

डैम के किनारे सुनसान जंगल में पहुंचते ही तीनों एक जगह बैठ गए. मौका पाते ही मंजीत ने गरमी का बहना कर के अपने सिर से पगड़ी उतार ली. फिर मौका पा कर दोनों ने पप्पू को दबोच लिया. पप्पू को कब्जे में कर के दोनों ने पगड़ी के कपड़े से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई. कहीं वह जीवित न रह जाए, इस के लिए भूपेंद्र ने अपनी बेल्ट खोली और फिर से उस के गले में डाल कर खींच दी.

पप्पू की हत्या करने के बाद दोनों ने उस की लाश उठा कर 20 मीटर दूर पानी में फेंक दी. पप्पू को मौत की नींद सुलाने के बाद दोनों बाइक से अपने घर पहुंच गए. पप्पू की हत्या करने वाली बात भूपेंद्र ने मोबाइल पर शशि को भी बता दी थी. उस की हत्या की बात सुनने के बाद शशि घर से बाहर नहीं निकली. उस के बच्चों ने पापा के बारे में पूछा तो उस ने कह दिया कि उस के पापा किसी काम से बाहर गए हुए हैं, वह आज रात नहीं आएंगे. बच्चों को खाना खिला कर उस ने सुला दिया.

इस केस के खुलते ही अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त पगड़ी, बेल्ट, बाइक, मोबाइल फोन, मृतक की चप्पलें आदि भी बरामद कर लीं. पुलिस ने मृतक की पत्नी शशि, भूपेंद्र सिंह और मंजीत सिंह के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया.

पप्पू के दोनों मासूम बच्चे अपने ताऊ राजपाल सिंह के पास थे. राजपाल सिंह ने बताया कि शशि जाते हुए भी अपने बेटे राज को जेल से छूट कर आने के बाद देख लेने की धमकी दे कर गई थी, उस की जान को खतरा हो सकता है.

जेल जाने के दौरान भी शशि के चेहरे पर न तो पति की मौत का कोई गम था और न ही अपने दोनों बच्चों के भविष्य को ले कर किसी तरह की चिंता. शशि ने जातेजाते भी पत्रकारों से कहा कि उसे अपने पति की हत्या का कोई अफसोस नहीं.

#MeToo : हिमानी शिवपुरी ने खोली आलोक नाथ की पोल

पिछले कुछ दिनों में कई महिलाओं ने सीनियर अभिनेता आलोक नाथ पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है. इसके अलावा राइटर-प्रड्यूसर विंता नंदा ने तो आलोक नाथ के ऊपर रेप का आरोप भी लगाया है. उन्होंने एक लंबी फेसबुक पोस्ट के जरिए अपने साथ घटी घटना का जिक्र किया था. इस मुद्दे पर अब सीनियर ऐक्ट्रेस हिमानी शिवपुरी ने भी बयान दिया है. उन्होंने कहा है कि आलोक नाथ के व्यवहार के बारे में इडस्ट्री में सभी लोग जानते हैं लेकिन सबके सामने यह अब खुलकर सामने आया है.

आलोक नाथ के साथ कई फिल्मों में टीवी सिरियलों में काम कर चुकीं हिमानी शिवपुरी ने यह भी कहा है कि उन्हें विंता नंदा के आरोपों के बारे में पढ़कर शौक लगा है. उन्होंने कहा, ‘अगर आलोक नाथ ने ऐसा किया है तो यह बहुत बुरा है. आप किसी भी महिला की मर्जी के खिलाफ कुछ नहीं कर सकते हैं. आप अगर महिला के ऊपर अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हैं तो यह महिला के लिए काफी कठिन होता है.’

हिमानी शिवपुरी ने अलोक नाथ के साथ ‘हम साथ साथ है’, ‘परदेस’ , ‘कभी खुशी कभी गम’ जैसी फिल्मों और ‘घर एक सपना’ जैसे टीवी सीरियलों में काम किया है. हिमानी ने कहा कि आलोक नाथ ने कभी उनके साथ खराब व्यवहार नहीं किया है लेकिन उन्होंने अन्य ऐक्ट्रेस से उनके बुरे व्यवहार के बारे में जरूर सुना है.

उन्होंने कहा, ‘जब भी हम दिन में शूटिंग करते थे तो वह अच्छा व्यवहार करते थे लेकिन शराब पीकर उनका व्यवहार बदल जाता था. मैंने कई महिलाओं से सुना है कि उनके साथ काम करना काफी कठिन था.’

इंडस्ट्री में यौन उत्पीड़न के बारे में हिमानी ने कहा, ‘हां, यह सब फिल्म इंडस्ट्री में होता है. हो सकता है कि एक समय पर मैं भी अपनी #MeToo स्टोरी के साथ सामने आऊं. कुछ मशहूर लोगों ने भी मेरा फायदा उठाने या मेरे साथ बद्तमीजी करने की कोशिश की है. जब भी मैं उनका नाम लेना चाहूंगी तब लूंगी. इसमें एक नहीं बल्कि कई नाम शामिल हैं. मेरे करियर में भी यह सब हुआ है लेकिन इसे मैं सनसनीखेज खबर नहीं बनाना चाहती हूं.’ हिमानी शिवपुरी ने तनुश्री दत्ता की बहादुरी की भी तारीफ की है.

शर्मनाक : आदमखोर भीड़ का खूनी खेल

भीड़ द्वारा हत्याओं का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है. महाराष्ट्र के धुले जनपद के राइनपाड़ा गांव के गांव वालों ने बच्चाचोर होने के शक पर 5 बेकुसूर नौजवानों को बेरहमी के साथ लाठीडंडों से पीटपीट कर मार डाला. मारे गए नौजवान एक बस से उतरे और एक बच्चे से कहीं जाने का रास्ता पूछ रहे थे. इतने में किसी ने उन्हें बच्चाचोर कह दिया. इतना सुनते ही वहां मौजूद लोग उन पांचों पर टूट पड़े और लाठीडंडों से पीटने लगे.

उन नौजवानों ने काफी समझाया कि ऐसा नहीं है, लेकिन भीड़ ने उन की एक नहीं सुनी और पांचों की जान ले ली. पुलिस ने 10 लोगों को गिरफ्तार भी किया. इसी तरह त्रिपुरा में सुकांत चक्रवर्ती नामक एक शख्स की गांव वालों ने हत्या कर दी. सुकांत चक्रवर्ती सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही बच्चे की चोरी करने वाली अफवाहों को दूर करने के लिए एक गांव से दूसरे गांव जा रहा था. वह लाउडस्पीकर से यह प्रचार कर रहा था कि आप अफवाहों पर ध्यान नहीं दें. इसी दौरान लोगों ने पीटपीट कर उसे मार डाला और 2 दूसरे लोगों को बुरी तरह से घायल कर दिया.

हो सकता है कि इन वारदातों के कुसूरवार को सजा भी मिल जाए, लेकिन जो लोग मारे गए वे वापस नहीं आएंगे. जिन परिवारों के सदस्य मारे गए, उन का दुख कम नहीं होगा. अगर कोई कुसूरवार ही हो तो क्या भीड़ को कानून अपने हाथ में लेने का हक है? कानून इस की इजाजत नहीं देता. भीड़ का फर्ज बनता है कि वह कुसूरवार को पुलिस के हवाले करे. अगर भीड़ ही सारे फैसले करने लगी तो देश में पुलिस की क्या जरूरत है?

हाल में भीड़ द्वारा लोगों को मारने के चंद उदाहरण देखें: * 18 जून, 2017. झारखंड में 9 दिनों में भीड़ ने 8 लोगों की पिटाई कर के उन की हत्या कर दी. * 10 मई, 2018. तमिलनाडु में ह्वाट्सऐप पर फैली अफवाह के चलते भीड़ के हमलों ने 2 लोगों की जान ले ली.

* 24 मई, 2018. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में झूठी अफवाह की वजह से 4 लोगों की जान ले ली गई. * 25 मई, 2018. बेंगलुरु में भीड़ ने बच्चा चोरी के शक में एक 26 साल के नौजवान की जान ले ली.

* 28 मई, 2018. आंध्र प्रदेश में भीड़ ने 52 साला किन्नर को मौत के घाट उतार दिया और 3 लोगों को बुरी तरह घायल कर दिया. * 8 जून, 2018. महाराष्ट्र में एक शख्स को पीटपीट कर मार डाला गया और 7 लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया.

* 13 जून, 2018. पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में 30 साला नौजवान को बिजली के खंभे से बांध कर इतनी पिटाई की गई कि उस की मौत हो गई. * 27 जून, 2018. गुजरात में बच्चा चोरी के शक में एक भिखारिन की हत्या कर दी गई और 30 को घायल कर दिया.

* 28 जून, 2018. त्रिपुरा में 3 लोगों को पीटपीट कर मार डाला गया. 2 को घायल कर दिया.

* 1 जुलाई, 2018. महाराष्ट्र के धुले जिले में 5 लोगों की पीटपीट कर हत्या कर दी गई. ये केवल वे हत्याएं हैं, जो रिकौर्ड में हैं. कुछ ऐसी वारदातें भी हैं जो सामने भी नहीं आ पातीं. ऐसी हत्याओं को ले कर मन की बात नहीं की जाती और न ही ऐसी वारदातों के खिलाफ अखबारों के पहले पन्ने पर खबर दी जाती है.

अब तो ऐसा लगता है कि देशभर में आवारा भीड़ बेकाबू होती जा रही है. वह जहांतहां अपने तरीके से इंसाफ करने पर आमादा दिख रही है. भीड़ द्वारा की गई हिंसा की कार्यवाही में अदालत द्वारा कड़ी सजा नहीं दी जाती, इसलिए ज्यादातर अपराधी बरी हो जाते हैं.

देश की अगुआई करने वालों का फर्ज बनता है कि इस तरह की वारदातों को अंजाम देने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिले, ताकि आगे से कोई इस तरह का अपराध करने की हिम्मत नहीं कर सके. प्रशासन और पुलिस के आला अफसरों का कहना है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने में सोशल मीडिया आड़े आ रहा है. ज्यादातर हिंसक वारदातों में नफरत फैलाने में सोशल मीडिया अहम भूमिका निभा रहा है.

पिछले कुछ महीनों के दौरान हिंसा पर उतारू भीड़ को भड़काने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोग धड़ल्ले से कर रहे हैं, चाहे वे फोटोशौप के जरीए तैयार की गई भड़काऊ तसवीरें हों या फिर लोगों के बीच नफरत पैदा करने वाली पोस्ट ही क्यों न हो. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में कहा गया है कि किसी भी शख्स को उस के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता लेकिन भीड़ द्वारा हत्याओं के मामले में तेजी देखने को मिल रही है. किसी शख्स के जिंदगी जीने के अधिकारों को खत्म कर देना अधिकारों का सरासर उल्लंघन है.

हम नफरत के बीज बो कर देश की एकता और अखंडता को बचा नहीं सकते और न ही खुशहाल भारत का सपना पूरा कर पाएंगे. जरूरत है जनजागरूकता मुहिम चलाने की और कुसूरवारों को सख्त सजा दिलाने की.

बढ़ती गई विषबेल

26 जून, 2018 की बात है. दिन के करीब 11 बज रहे थे. जयसिंहपुर पुलिस थाने के असिस्टेंट इंसपेक्टर
शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ किसी मामले को ले कर बातचीत कर रहे थे, तभी 11 वर्षीय बच्चे के साथ सूर्यकांत शिंदे वहां पहुंचा. उसे देख कर निकम और शिंदे गायकवाड़ स्तब्ध रह गए. उस की घायलावस्था और कपड़ों पर लगा खून किसी बड़ी वारदात की तरफ इशारा कर रहा था.

दोनों पुलिस अधिकारी सूर्यकांत शिंदे को अच्छी तरह से जानते पहचानते थे. इस से पहले कि वे सूर्यकांत शिंदे से कुछ पूछते उस ने पुलिस अधिकारियों को जो बताया, उसे सुन कर वे चौंक गए.

मामला काफी गंभीर और सनसनीखेज था. असिस्टेंट इंसपेक्टर शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ ने सूर्यकांत शिंदे को तुरंत अपनी हिरासत में ले कर उसे उपचार के लिए जिला अस्पताल भेज दिया. फिर मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथसाथ पुलिस कंट्रोलरूम को भी दे दी. इस के बाद वह बिना कोई देर किए पुलिस टीम ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

मामला एक प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था की महिला कार्यकर्ता की हत्या का था. इस से पहले कि घटनास्थल पर पुलिस टीम पहुंच पाती, हत्या की खबर जंगल की आग की तरह पूरे गांव और इलाके में फैल चुकी थी, जिस से घटनास्थल पर काफी भीड़ एकत्र हो गई थी.

असिस्टेंट इंसपेक्टर शाहाजी निकम ने पहले मौके पर जा कर घटनास्थल का मुआयना किया. अभी वह लोगों से पूछताछ कर ही रहे थे कि खबर पा कर कोल्हापुर के एसएसपी कृष्णांत पिंगले भी वहां पहुंच गए. उन के साथ फोरैंसिक टीम भी आई थी.

पुलिस अधिकारियों ने जब घटनास्थल का निरीक्षण किया तो वहां दिल दहला देने वाला मंजर मिला. किचन में एक महिला का शव पड़ा हुआ था. शव के चारों तरफ खून ही खून फैला था. घटनास्थल का दृश्य दिल दहला देने वाला था. मृतका के शरीर और सिर पर कई घाव थे, जो काफी गहरे और चौड़े थे. खून से सनी कुल्हाड़ी भी वहीं पड़ी थी. लग रहा था कि मृतका पर उसी कुल्हाड़ी से हमला किया गया था.

फोरैंसिक टीम का काम खत्म होने के बाद एसएसपी कृष्णांत पिंगले ने मामले की जांच असिस्टेंट इंसपेक्टर शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ को करने का निर्देश दिया. पुलिस ने खून सनी कुल्हाड़ी अपने कब्जे में ले ली और लाश पोस्टमार्टम के लिए स्थानीय अस्पताल भेज दी. पता चला मृतका का नाम माधुरी था. इस बीच सूचना पा कर उस के घर वाले भी आ गए थे.

यह घटना महाराष्ट्र के जिला कोल्हापुर के उदगांव में घटी थी. चूंकि आरोपी सूर्यकांत शिंदे ने घटना के बारे में पुलिस को पहले ही बता दिया था, इसलिए पुलिस ने उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. सूर्यकांत शिंदे ने अपने ऊपर हुए हमले और पत्नी की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी.

सूर्यकांत और माधुरी का मिलन

42 वर्षीय सूर्यकांत शिंदे के पिता महादेव शिंदे गांव के एक साधारण किसान थे. वह सीधेसादे और नेकदिल इंसान थे. गांव वालों की मदद के लिए वह अकसर तैयार रहते थे, इसी वजह से गांव वालों के बीच उन के प्रति आदर और सम्मान था.

परिवार में उन की पत्नी आनंदी बाई के अलावा एकलौता बेटा सूर्यकांत था. वह हाईस्कूल तक ही पढ़ सका था. ज्यादा पढ़ालिखा न होने की वजह से उसे ठीक सी नौकरी नहीं मिली तो वह सांगली के एक बिल्डर के यहां सुपरवाइजर का काम करने लगा.

माधुरी पाटिल और सूर्यकांत शिंदे की मुलाकात करीब 18 साल पहले सांगली की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर हुई थी. माधुरी अपने परिवार के साथ सांगली के बैरणबाजार में रहती थी. परिवार के मुखिया लक्ष्मण पाटिल का निधन हो चुका था. मां मंगला पाटिल पर 2 बेटियों की जिम्मेदारी थी. बड़ी बेटी सविता की शादी हो चुकी थी. माधुरी की जिम्मेदारी बाकी थी.

परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. पूरा परिवार खाने के टिफिन तैयार कर अपना गुजारा किया करता था. सूर्यकांत शिंदे जब कंस्ट्रक्शन साइट पर गया तो उस के खाने का बंदोबस्त माधुरी के टिफिन बौक्स से हो गया था.

माधुरी देखने में सुंदर और चंचल स्वभाव की आधुनिक विचारों वाली युवती थी. शिंदे की तरह वह भी ज्यादा पढ़लिख नहीं पाई थी लेकिन जितनी भी पढ़ी थी, उस के लिए काफी था. वह इतनी होशियार थी कि किसी से भी बेझिझक बात करती थी. वह जिस से भी एक बार बातें कर लेती, वह उस की तरफ खिंचा चला आता था.

यही हाल सूर्यकांत शिंदे का भी हुआ. वह माधुरी की पहली झलक में ही उस का दीवाना हो गया था. वह जब भी माधुरी के घर पर खाना खाने जाता था, उस की नजर खाने पर कम माधुरी पर ज्यादा रहती थी. टिफिन की तारीफ तो वह करता ही था, साथसाथ उसे अच्छी टिप भी दिया करता था.
शुरू में तो 20 वर्षीय माधुरी को सूर्यकांत शिंदे के इरादों का आभास नहीं हुआ, लेकिन वह जल्द ही उस की आंखों की भाषा समझ गई. धीरेधीरे माधुरी भी उस की ओर आकर्षित होने लगी. उसे अपने सपने और अरमान सूर्यकांत शिंदे में ही पूरे होते दिख रहे थे.

माधुरी जल्दी ही मन ही मन सूर्यकांत शिंदे को जीवनसाथी के रूप में देखने लगी. विचार मिले तो दोनों ने शादी का फैसला कर लिया. यह बात जब दोनों के परिवार वालों को पता चली तो उन्होंने दोनों की शादी पर कोई ऐतराज नहीं किया. जल्दी ही साधारण तरीके से दोनों की शादी हो गई.

शादी के बाद सूर्यकांत शिंदे माधुरी के साथ अपने गांव में रहने लगा. इसी बीच सूर्यकांत के पिता की मृत्यु हो गई तो घर की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर आ गई. वह बखूबी अपनी जिम्मेदारी निभाने लगा. प्राइवेट नौकरी होने की वजह से सूर्यकांत सप्ताह में एक दिन ही आ पाता था. एक रात रुक कर वह अगले दिन वापस सांगली चला जाता था. घर में सिर्फ सूर्यकांत की बूढ़ी मां और भाई ही रह जाते थे.

बिखरने लगे माधुरी के अरमान

ऐसी स्थिति में माधुरी को अपने सारे सपने और अरमान बिखरते नजर आ रहे थे. ऊपर से पुराने खयालों की सूर्यकांत की बूढ़ी मां को माधुरी का आधुनिक विचारों वाला आचरण पसंद नहीं था. जिसे ले कर घर में कलह और सासबहू में अकसर लड़ाईझगड़े होने लगे.

पहले तो सूर्यकांत शिंदे ने माधुरी को समझाया. लेकिन जब उस ने साफ कह दिया कि वह सास के साथ हरगिज नहीं रहेगी तो सूर्यकांत माधुरी को ले कर शिरोल तालुका के चिपरी गांव में किराए के मकान में रहने लगा.

समय अपनी गति से चल रहा था. माधुरी एक बेटी और एक बेटे की मां बन गई. पतिपत्नी ने दोनों बच्चों को अच्छी परवरिश दी. बेटी 12वीं में पढ़ रही थी तो बेटा कक्षा 2 में था.

बच्चे बड़े हुए तो घर के खर्चे भी बढ़ गए, जबकि आमदनी सीमित थी. इस सब के चलते माधुरी को अपने खुद के खर्चों में कटौती करने की नौबत आ गई. उसे अपने सपने धूमिल होते नजर आने लगे. फलस्वरूप इसे ले कर उस की पति से नोंकझोंक शुरू हो गई, जो रोजाना के झगड़े में बदलती चली गई.

नतीजा यह हुआ कि दोनों के रिश्तों में दरार आ गई, जिस की वजह से सूर्यकांत शिंदे को मजबूरन कंस्ट्रक्शन साइट की नौकरी छोड़नी पड़ी. माधुरी को किनारे कर के वह गांव में अपनी बूढ़ी मां के साथ रहने लगा. माधुरी ने सास के साथ रहने से मना कर दिया था, इसलिए वह बच्चों को ले कर अपने मायके चली गई थी.

घर तो चलाना ही था, लिहाजा सूर्यकांत ने एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली. अब वह पत्नी के साथ नहीं रहना चाहता था, लिहाजा उस ने अदालत में पत्नी से तलाक लेने की अर्जी दाखिल कर दी, जिस का माधुरी ने विरोध किया.

उस के विरोध पर कोर्ट ने तलाक के मामले को कुछ दिनों के लिए पेंडिंग में रख कर सूर्यकांत शिंदे को आदेश दिया कि वह माधुरी को गुजारा और रहने के लिए आधा घर दे. अदालत के आदेश के बाद माधुरी दोनों बच्चों के साथ आ कर रहने लगी.

दोनों के बीच गहराती गईं दरारें

माधुरी और सूर्यकांत शिंदे के बीच आई दरारें तब और गहरी हो गईं, जब वह संतोष माने और प्रमोद पाटिल के संपर्क में आई और उन की सामाजिक संस्था भूमाता ब्रिगेड व शिवाजी छत्रपति से जुड़ गई. प्रमोद पाटिल इस संस्था का संस्थापक और संतोष माने सक्रिय कार्यकर्ता था. एक तरह से संतोष माने प्रमोद पाटिल का दायां हाथ था. इस संस्था की पूरे कोल्हापुर जिले में कई शाखाएं थीं, जिस में हजारों कार्यकर्ता थे.

यह संस्था गरीब, लाचार महिलाओं की सहायता करती थी. साथ ही तमाम तरह के कार्यक्रमों का आयोजन और प्रोत्साहन वाले काम भी करती थी. संतोष माने ने माधुरी को करीब लाने के लिए उस के दिल में समाजसेवा का बीज बो दिया था.

दरअसल, माधुरी सुंदर और स्मार्ट थी. संतोष माने ने जब उसे देखा तो वह उस का दीवाना हो गया था. 2 बच्चे होने के बाद भी उस के शरीर का कसाव वैसे का वैसा ही था. संतोष माने उस के गांव के पड़ोस में ही रहता था. वैसे उस का विवाह हो चुका था और उस के 2 बच्चे भी थे. फिर भी जब से उस ने माधुरी को देखा था, वह उसी के बारे में सोचता रहता था. बहाने से उस ने माधुरी के घर भी आनाजाना शुरू कर दिया.

गांव का पड़ोसी और एक प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था का सदस्य होने के कारण माधुरी उस की इज्जत करती थी. माधुरी और संतोष माने के बीच की दूरियां कम हुईं तो वह माधुरी की रगों में सामाजिक कार्यक्रमों के रंग भरने लगा. पहले तो माधुरी ने इस में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, लेकिन संतोष के काफी जोर देने पर वह संस्था के सामाजिक कार्यों में शरीक होने के लिए तैयार हो गई.

संतोष माने ने माधुरी को संस्था के संस्थापक प्रमोद पाटिल से मिलवाया. प्रमोद पाटिल ने माधुरी की दिलचस्पी देख कर उसे संस्था का जिला उपाध्यक्ष नियुक्त कर दिया. संस्था के सामाजिक कार्यों का दायरा बड़ा होने के नाते अब उसे संस्था के हर छोटेबड़े कार्यक्रमों और मीटिंगों में जाना पड़ता था.
व्यस्तता की वजह से माधुरी का समय अपने बच्चों के साथ कम और बाहर अधिक बीतने लगा. यह बात सूर्यकांत शिंदे को अच्छी नहीं लगी. उस ने कई बार माधुरी को बच्चों के प्रति सचेत कर के समझाया. लेकिन उस ने पति की बातों पर ध्यान नहीं दिया. वह संतोष माने के साथ अधिक रहने लगी, जिस का नतीजा यह हुआ कि माधुरी अपनी सीमा लांघ गई.

जब यह बात धीरेधीरे गांव और गलियों में होते हुए सूर्यकांत के कानों तक पहुंची तो उस का खून खौल उठा. उस ने भले ही माधुरी को तलाक का नोटिस दिया था, लेकिन अभी तक तलाक हुआ नहीं था. वह अभी भी कानूनी और सामाजिक तौर पर उस की पत्नी थी.

पत्नी की वजह से उस की और उस के परिवार की समाज में बुराई हो, वह सहन नहीं कर सकता था. जिस की वजह से माधुरी और सूर्यकांत शिंदे के बीच अकसर लड़ाईझगड़ा, मारपीट होने लगी.

बनने लगी अपराध की भूमिका

मामला पुलिस थाने तक जाता था लेकिन पुलिस इसे एक पारिवारिक झगड़ा समझ कर कोई काररवाई नहीं करती थी. माधुरी को परेशान देख कर संतोष माने से रहा नहीं गया तो उस ने प्रमोद पाटिल से मशविरा कर के सूर्यकांत शिंदे को आड़े हाथों लिया.

उस ने शिंदे को चेतावनी दी कि अगर वह माधुरी और उस के बीच दीवार बनने की कोशिश करेगा तो प्रमोद पाटिल और वह उसे हमेशाहमेशा के लिए माधुरी के रास्ते से हटा देंगे. लेकिन हुआ इस का उलटा.
26 जून, 2018 को सूर्यकांत शिंदे जब माधुरी के घर के अंदर गया तो उस का धैर्य जवाब दे गया. उस ने किचन के दरवाजे के सुराख से अंदर देखा तो माधुरी और संतोष माने आपत्तिजनक स्थिति में थे.
यह देख कर उस के होश उड़ गए. वह अपने आप को रोक नहीं सका और उन्हें भद्दीभद्दी गालियां देते हुए दरवाजा जोरजोर से पीटने लगा. आवाज सुन कर सूर्यकांत शिंदे की बूढ़ी मां और अन्य लोग भी वहां आ गए.

इस के पहले कि लोग कुछ समझ पाते, किचन का दरवाजा खुला और हाथ में कुल्हाड़ी लिए संतोष माने किचन से बाहर निकला. आते ही उस ने सूर्यकांत शिंदे पर हमला बोल दिया. सूर्यकांत ने कुल्हाड़ी का पहला वार अपने हाथों पर झेल लिया.

दूसरा वार करने से पहले ही सूर्यकांत संभल गया और उस ने संतोष माने को जोर से धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया. जिस से उस के हाथों से कुल्हाड़ी छूट गई और वह सूर्यकांत शिंदे ने उठा ली.
अपने ऊपर हुए हमले के कारण सूर्यकांत शिंदे भी अपना आपा खो बैठा था. उस ने संतोष माने पर कुल्हाड़ी का वार कर दिया. इस से पहले कि कुल्हाड़ी माने को लगती माधुरी बीच में आ गई और कुल्हाड़ी का सीधा वार माधुरी के सिर पर हुआ. तभी संतोष माने यह कहते हुए वहां से भाग निकला कि प्रमोद पाटिल उसे छोड़ेगा नहीं.

संतोष माने तो वहां से निकल गया लेकिन माधुरी पति के गुस्से का शिकार बन गई. शिंदे ने उस पर कई वार किए. कुछ ही देर में माधुरी की मौत हो गई. इस के बाद सूर्यकांत शिंदे अपने बेटे शिवराज को साथ ले कर जयसिंहपुर थाने पहुंच गया और उस ने पुलिस को पूरी बात बता दी. पुलिस ने उस का इलाज कराकर उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

सूर्यकांत शिंदे से पूछताछ करने के बाद जांच अधिकारी शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ ने भूमाता ब्रिगेड व छत्रपति शिवाजी सामाजिक संस्था के संस्थापक प्रमोद पाटिल और संतोष को सूर्यकांत शिंदे के ऊपर जानलेवा हमला करने और धमकी देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.

प्रमोद पाटिल और संतोष माने की गिरफ्तारी पर भूमाता ब्रिगेड और शिवाजी छत्रपति सामाजिक संस्था के कार्यकर्ताओं के बीच में हड़कंप मच गया. शिरोल तालुका की अध्यक्ष तृप्ति देसाई ने कार्यकर्ताओं के साथ प्रमोद पाटिल और संतोष माने की गिरफ्तारी का विरोध किया, लेकिन कानून सब के लिए बराबर होता है, चाहे कोई समाज सेवक हो या खास आदमी.

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