मतदाता खामोश, नेताओं के उड़े होश

तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में शुरुआती गहमागहमी के बाद पसरते सन्नाटे से सभी प्रमुख राजनैतिक दल और नेता सकते में हैं कि मतदाता चुनाव में उम्मीद के मुताबिक दिलचस्पी क्यों नहीं ले रहा है. वोटर्स को लुभाने में जुटे नेता अपनी तरफ से पूरा जोर लगा रहे हैं लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल रही है तो इसकी अपनी वजहें भी हैं कि लोग सभी दलों से नाउम्मीद हो चुके हैं. मतदाता की यह उदासीनता और खामोशी अगर किसी बड़े तूफान का इशारा है तो भाजपा को सत्ता मुट्ठी में बनाए रखने ज्यादा कोशिशें करना पड़ रहीं हैं जो इस खामोशी का मतलब समझ रही है कि लोग उसे लेकर खुश नहीं हैं.

दूसरी तरफ सत्ता की दौड़ में बराबरी से दौड़ रही कांग्रेस भी बेफिक्र नहीं है क्योंकि मतदाता उसके पक्ष में भी खुल कर नहीं बोल रहा है. आमतौर पर हिन्दी भाषी राज्यों में चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही चुनावी चहल पहल और सरगरमिया शुरू हो जाती हैं लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है तो नेताओं को प्रचार के मुद्दे तय करने में कठिनाइयां पेश आ रहीं हैं.

लोगों की खामोशी बेवजह नहीं है क्योंकि भाजपा ने अपना चुनाव प्रचार अभियान एक साल पहले से ही शुरू कर दिया था, जिसके केंद्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे, वे अभी भी ऐसे हीरो हैं जिनकी फिल्में देख देख कर जनता ऊबने लगी है. एक साल से प्रदेश में घूम रहे शिवराजसिंह इतने वादे जनता से कर चुके हैं जितने आजकल के आशिक भी अपनी माशूका से नहीं करते. इन वादों की हकीकत वक्त से पहले ही सामने आने लगी है तो गड़बड़ाए शिवराज सिंह देश भर के जादूगरों को चुनाव प्रचार के लिए बुला रहे हैं. जल्द ही ये जादूगर गांव देहातों के हाट बाजारों में जाकर मजमा लगाएंगे और लोगों को सरकार की उपलब्धियां गिनायेंगे. इससे भी ज्यादा अहम बात ये कि वे दिग्विजय सिंह के दस साल के कार्यकाल की बदहाली भी जादू के साथ दिखाएंगे.

अच्छा तो यह है कि शिवराज सिंह राज्य के पहले मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल के जमाने की बदहाली की बात नहीं कर रहे कि देखो भाइयों और बहिनो तब गांवों में बिजली बिलकुल नहीं थी अब आ रही है इसलिए समृद्ध मध्यप्रदेश के लिए मुझे चौथी बार मौका दें. यही वह बिन्दु है जहां शुरुआती बढ़त बनाने के बाद वे तेजी से पिछड़ते जनता की निगाह से उतरने भी लगे हैं, खासतौर से शहरी इलाकों में जहां लोग उनकी सभा के नाम से ही मुंह फेरने लगते हैं.

गांव देहातों में तो और भी बुरी हालत है जहां भाजपा कार्यकर्ता लोगों की मिन्नतें करते नजर आते हैं कि दादा, काका चलो मीटिंग में और दादा काका हैं कि पूछ रहे हैं कि क्यों चलें, हमें 15 साल में उन्होंने सिवाय वादों और भाषणों के दिया क्या है. इतनी दुर्गति तो कांग्रेस के टाइम में नहीं हुई थी जितनी अब दो चार साल में हो गई है कि हाथ में चार पैसे भी बचाए नहीं बचते. ये लोग मानते हैं कि पांच साल पहले तक शिवराज सरकार ठीक ठाक काम कर रही थी.

दरअसल में इस चुनाव में मुद्दे गायब हैं और राष्ट्रीय नेताओं को भी लोग अब भाव नहीं दे रहे हैं. नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी तक की सभाओं और मीटिंगों के लिए कार्यकर्ताओं को भीड़ जुटाना पड़ रही है ऐसा इसलिए कि लोग समझ गए हैं कि इन नेताओं के पास भी अब बोलने कुछ खास और नया नहीं है. मोदी जी जब भी बोलेंगे तो उसका सार यही होगा कि कांग्रेस शासन काल में विकट का भ्रष्टाचार था और नेहरू गांधी खानदान ने देश को दीमक की तरह चाट चाट कर खोखला कर दिया है. दूसरी बात अब वे शिवराज सिंह की अगुवाई में मध्यप्रदेश की तरक्की की बातें करते हैं, यही बात वे राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री रमन सिंह के लिए करते हैं तो जनता अब बजाय मोदी मोदी करने के चिढ़ उठती है.

इधर राहुल गांधी की धार्मिक ड्रामेबाजी भी लोगों को रास नहीं आ रही है कि पूजा पाठ करने की बिना पर ही हमें वोट डालना है तो फिर भाजपा क्या बुरी है जिसके नेता तो चौबीसों घंटे घंटे घड़ियाल बजाते रहते हैं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ और कांग्रेस के दूसरे दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया में जरूर लोग थोड़ी बहुत दिलचस्पी ले रहे हैं लेकिन वह सत्ता दिलाने लायक नहीं हैं. ये दोनों नेता चूंकि पहली दफा प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हुये हैं इसलिए जनता इनमें संभावनाएं टटोल रही है पर दिक्कत यह है कि कांग्रेस ने इन दोनों में से किसी को बतौर मुख्यमंत्री पेश नहीं किया है. कांग्रेस की एकता पर भी वोटर यकीन नहीं कर रहा है.

मुद्दे न हों, राष्ट्रीय नेता चमक खोने लगें और दलों के कार्यकर्ता भी बेमन से काम करें तो ऐसी स्थिति बनना लाजिमी है जिसमें वोटर खुलकर किसी पार्टी का समर्थन या विरोध न करे. इससे  नेताओं की सांसें फूलना भी कुदरती बात है. तीनों राज्यों में कोई तीसरा विकल्प मतदाता के पास हैं नहीं लिहाजा भाजपा और कांग्रेस दोनों चुनाव में जान फूंकने की कोशिश में लगे हैं कि मतदान की तारीख आते आते वे वोटर को रिझा लेंगे, लेकिन लोकतन्त्र में सत्तारूढ़ दल की सेहत के लिहाज से यह खामोशी अक्सर उसे ही आखिर में मंहगी पड़ती है.

पत्नी से पीछा छुड़ाने के लिए

थाना बनियाठेर के थानाप्रभारी प्रवीण सोलंकी रात भर गश्त कर के सुबह 5 बजे अपने कमरे पर पहुंचे. वह आराम करने  के लिए लेटे ही थे कि मोबाइल की घंटी बज उठी. उन्होंने काल रिसीव की तो फोन करने वाले अज्ञात व्यक्ति ने बताया कि रसूलपुर के पास कैली गांव में मांबेटी की हत्या कर दी गई है.

डबल मर्डर की सूचना से उन की नींद काफूर हो गई. वह अपने मातहतों को ले कर घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. यह बात 19 जून, 2018 की है. थानाप्रभारी ने यह जानकारी उच्च अधिकारियों को भी दे दी.

गांव कैली थाने से करीब एक किलोमीटर दूर है, इसलिए प्रवीण सोलंकी करीब 10 मिनट में कैली गांव पहुंच गए. गांव जा कर उन्हें पता चला कि घटना भारत सिंह के घर में घटी है. थानाप्रभारी ने वहां जा कर देखा तो एक कमरे में एक ही चारपाई पर बेटी पूनम और उस के ऊपर उस की मां शांति की लाशें पड़ी थीं. मां के गले में उसी की साड़ी का फंदा कसा हुआ था, साथ ही उस का गला भी कटा हुआ था. चारपाई के पास जमीन पर काफी खून पड़ा था.

शुरुआती जांच में यही लगा कि दोनों को गला घोंट कर मारा गया है और बाद में गला काटा गया है. चारपाई से दूर एक कोने में कुछ टूटी हुई चूडि़यां पड़ी थीं. पूनम के शरीर पर खरोंचों के भी निशान थे, जिस से लग रहा था कि उस ने हत्यारों से अपने बचाव का प्रयास किया था.

कुछ ही देर में घटनास्थल पर कप्तान राधेमोहन भारद्वाज, एडीशनल एसपी पंकज कुमार मिश्र और सीओ ओमकार सिंह यादव भी पहुंच गए. उन्होंने थानाप्रभारी को निर्देश दिए. इस के बाद थानाप्रभारी ने लाशें पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दीं.

कैली गांव उत्तर प्रदेश के जिला संभल की तहसील मुख्यालय से करीब 8 किलोमीटर दूर है. करीब 3 हजार की आबादी वाले इस गांव में चंद्रपाल का परिवार रहता था. उस के 4 बेटे और 2 बेटियां थीं. करीब 30 वर्ष पूर्व चंद्रपाल की दर्दनाक मौत हो गई थी. उस की मौत के पीछे की भी एक अलग कहानी थी.

दरअसल गांव में पेयजल का संकट था. चंद्रपाल के घर के सामने कुएं की खुदाई चल रही थी. चंद्रपाल भी खुदाई कर रहा था. काफी गहराई तक मिट्टी निकाली जा चुकी थी. तभी अचानक ऊपर से मिट्टी की ढांग गिर कई और चंद्रपाल जिंदा ही दफन हो गया.

उस समय इतने संसाधन नहीं थे कि चंद्रपाल को जल्दी निकाला जा सके. फिर भी गांव वालों ने जैसेतैसे उसे बाहर निकाला लेकिन तब तक उस की मौत हो चुकी थी.

इस के बाद गांव वालों ने वह कुआं फिर से मिट्टी से भर दिया. बाद में जब चंद्रपाल के बेटे जवान हुए तो उन्होंने गांव वालों के सहयोग से पिता के मिशन को पूरा किया. कुआं तैयार हो जाने के बाद गांव में पेयजल की समस्या दूर हो गई.

जिस समय चंद्रपाल की मौत हुई थी, उस समय उस के सभी बच्चे छोटे थे यानी शांति भरी जवानी में विधवा हो गई थी. उस के सामने 6 बच्चों के पालनपोषण की समस्या थी. ऐसे में एक रिश्तेदार भारत सिंह ने शांति के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा.

भारत सिंह मुरादाबाद जिले की पुलिस चौकी जरगांव के अंतर्गत आने वाले भूड़ी गांव का निवासी था. उस की पत्नी की मौत भी एक हृदयविदारक घटना में हुई थी. भारत सिंह का विवाह करीब 32 साल पहले गांव नानपुर की मिलक, जिला रामपुर की महेंद्री नाम की युवती से हुआ था.

एक दिन अचानक रात में डाकुओं ने भूड़ी गांव पर धावा बोल दिया. गांव वालों ने भी मोर्चा संभाला. डाकू लगातार फायरिंग कर रहे थे. ग्रामीण फायरिंग का जवाब ईंटपत्थरों से दे रहे थे. लेकिन उन का मुकाबला करने में वे नाकाम रहे. तब अधिकांश लोग जान बचाने के लिए जंगलों की ओर भागने लगे.

भारत सिंह भी अपने भाइयों राधेश्याम व सूरज सिंह के साथ जंगल में भाग गया. भारत सिंह की पत्नी महेंद्री गहरी नींद में सो रही थी. वह घर में अकेली रह गई. उस समय उस की कोख में 6 महीने का बच्चा था. महेंद्री की जब आंख खुली तो खुद को घर में अकेला देख वह घबरा गई.

फायरिंग की आवाज सुन कर वह माजरा समझ गई. बदहवास महेंद्री ने भी जान बचाने की खातिर घर से जंगल की ओर दौड़ लगा दी. भागते वक्त वह ठोकर खा कर गिर गई.

जब डाकू गांव में लूटपाट कर के चले गए, तब गांव के लोग घर वापस आए. रास्ते में लोगों ने महेंद्री को तड़पते हुए देखा. भारत सिंह भी पत्नी के पास पहुंच गया. उस की हालत देख कर उस के होश उड़ गए.

घर वाले महेंद्री को उठा कर घर ले आए. खून बहता देख वे लोग समझ गए कि पेट में पल रहे नवजात को हानि पहुंची है. महेंद्री भी बेहोशी की हालत में थी. आधी रात का समय था. इलाज के लिए शहर में ले जाने का कोई साधन नहीं था.

घरों में लूटपाट होने की वजह से गांव में वैसे ही कोहराम मचा था. कोई भी गाड़ी ले कर जाने का साहस नहीं जुटा पा रहा था. फलस्वरूप सुबह होने से पहले ही महेंद्री की मौत हो गई.

भारत सिंह की शादी हुए केवल 4 साल हुए थे. पत्नी की मौत के बाद वह खोयाखोया सा रहने लगा था. फिर एक रिश्तेदार के सुझाव पर उस ने 6 बच्चों की मां, विधवा शांति देवी के साथ कराव कर लिया. दरअसल हिंदू विवाह संस्कार के अनुसार अग्नि के सात फेरे और कन्यादान एक बार ही किया जाता है. चूंकि शादी के समय शांति सात फेरे ले चुकी थी और उस का कन्यादान भी हो चुका था, इसलिए भारत के साथ वह दूसरी बार अग्नि के फेरे नहीं ले सकती थी, इसलिए उस का कराव करा दिया गया.

इस के बाद भारत सिंह व शांति का दांपत्य जीवन हंसीखुशी से गुजरने लगा. कुछ दिनों बाद ही भारत सिंह अपने हिस्से की डेढ़ बीघा जमीन बेच कर और घर अपने भाइयों को दे कर कैली में आ कर रहने लगा.

वह मेहनतमजदूरी कर के बच्चों का पालनपोषण करने लगा. इस बीच उस के 3 बच्चे और हुए. जैसेजैसे बच्चे बड़े हुए, भारत सिंह ने उन की शादी कर दी. उस ने सब से छोटी बेटी पूनम का विवाह इसी साल 18 फरवरी को अनिल के साथ कर दिया था. अनिल चंदौसी शहर के हनुमानगढ़ी मोहल्ले में रहता था.

पूनम देहाती माहौल में पलीबढ़ी थी जबकि उस की शादी शहर के लड़के से हुई थी. कई महीने तक शहर में रहने के बावजूद  वह खुद को शहरी माहौल में नहीं ढाल पाई. ससुराल वाले उसे लाख समझाते पर वह खुद को बदलने के लिए तैयार नहीं थी.

अनिल विवाह आदि समारोहों में फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी का काम करता था. रात को देर से आना उस की पेशेगत मजबूरी थी. जब वह कहीं बुकिंग पर नहीं जाता, तब भी वह शराब के नशे में देर से घर आता था. पूनम को उस का शराब पीना पसंद नहीं था. वैचारिक मतभेद के साथ दोनों के बीच मनभेद भी बढ़ता चला गया.

अनिल और पूनम के 4 महीने के वैवाहिक जीवन में घरेलू कलह रहने लगी थी. विवाद बढ़ने पर कई बार अनिल ने पूनम की पिटाई भी कर दी थी, जिस से उस के कान में चोट आई थी. ससुराल में पूनम की उपेक्षा बढ़ती जा रही थी. एक बार पूनम को बुखार आया तो अनिल उसे उस के मायके छोड़ आया. मायके वालों ने पूनम का इलाज कराया.

चोट की वजह से उस के कान में दर्द रहने लगा था. मायके वालों ने उस के कान का भी इलाज कराया. पूनम के मायके वाले  उस के दांपत्य जीवन को सुखी बनाए रखने के प्रयास में लगे रहे.

25 मई, 2018 को कैली गांव में किसी की शादी थी. शादी की दावत में पूनम व उस के पति अनिल को भी आमंत्रित किया गया था. अनिल ससुराल से पत्नी को साथ ला कर विवाह समारोह में शामिल हुआ. इस के बाद अनिल अपनी पत्नी पूनम को मायके में छोड़ कर रात में ही अपने गांव चला गया.

ससुराल वालों ने उस से रात में वहीं रुकने का आग्रह करते हुए कहा कि सुबह पूनम को भी साथ ले कर चला जाए. इस पर अनिल ने कहा कि 2-4 दिन बाद आ कर उसे ले आएगा. लेकिन 15 दिन बीत गए और अनिल पूनम को लेने नहीं आया. पूनम उस से मोबाइल पर बात करना चाहती तो वह कोई न कोई बहाना बना कर उस से बात नहीं करता था. वह कहता था कि 2-4 दिन में उसे लेने आ जाएगा. इस तरह वह उसे टालता रहा.

19 जून को पूनम व उस की मां की हत्या से घर में कोहराम मच गया था. पूरा गांव शोक में डूबा था. भारत सिंह का रोरो कर बुरा हाल था. मांबेटी की अर्थी जब एक साथ उठी तो शवयात्रा में शामिल ग्रामीणों की आंखें नम हो गईं.

उधर पुलिस ने अपनी जांच भारत सिंह से शुरू की. भारत ने पुलिस को बताया कि 18 जून की रात अनिल के पिता फूल सिंह का फोन आया था. उन्होंने बताया था कि अनिल पूनम को लेने गांव गया हुआ है. उस समय वह खेतों पर लगी मेंथा की टंकी पर था. वहां वह किसानों का मेंथा औयल निकालता था. इस काम से उसे अच्छीखासी आमदनी हो जाती थी. उस रात वह घर नहीं आ सका था.

पुलिस को अन्य सूत्रों से भी पता चला कि अनिल उस रात गांव में देखा गया था. पुलिस ने अनिल के घर दबिश दी तो वह घर पर ही मौजूद था. पुलिस उसे पूछताछ के लिए थाने ले आई.

जब उस से पूनम और उस की मां की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो वह काफी देर तक पुलिस को गुमराह करता रहा. पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो वह टूट गया और उस ने अपने जुर्म का इकबाल कर लिया. फिर डबल मर्डर की कहानी कुछ इस तरह सामने आई.

अनिल ने बताया कि गंवार संस्कृति की पूनम से वह पीछा छुड़ाना चाहता था. वह उस के दिल से पूरी तरह उतर चुकी थी, इसलिए वह उसे मायके छोड़ गया था. लेकिन उस के घर वाले उसे साथ ले जाने के लिए दबाव बना रहे थे. उधर पूनम भी बारबार उसे आने के लिए फोन करती रहती थी. किसी भी तरह वह उस से पीछा छुड़ाना चाहता था.

18 जून, 2018 की शाम को उस के पास पूनम का फोन आया. तब अनिल ने अपनी ससुराल के लोगों के बारे में जानकारी की. पता चला कि उस के पिता व भाई घर पर नहीं हैं. पिता मेंथा टंकी पर हैं और भाई खेत पर. कुछ अपनी रिश्तेदारियों में गए हुए हैं. घर पर पूनम और उस की मां ही है. उसे ऐसे ही मौके की तलाश थी.

पूनम अपनी मां के साथ गांव की हवेली से दूर अंतिम सिरे पर स्थित घेर कहे जाने वाले मकान में थी. सुनील जानता था कि पूनम के पांचों भाई अपने परिवार के साथ अंदर वाली हवेली में रहते हैं. पूनम की मां धार्मिक प्रवृत्ति की थी. वह ज्यादातर अपने हाथ का ही बना सादा भोजन करती थी. कभीकभी वह बहुओं द्वारा बनाया गया सादा भोजन भी खा लेती थी.

अनिल अपने दोस्त कौशल के साथ बाइक से घेर वाले उस मकान पर पहुंच गया. वह हाइवे से गांव को जाने वाली सड़क से न जा कर मकान के उत्तर में खाली प्लौटों से होता हुआ गया. उस ने बाइक भी कुछ दूर मकान की दीवार से सटा कर खड़ी कर दी थी. वहां से वह योजनानुसार पैदल ही घर पहुंचे, जिस से आसपड़ोस वालों को पता न चल सके कि पूनम के घर कोई आया है.

पूनम अपनी मां शांति के साथ छत पर लेटी हुई थी. अनिल को देख पूनम की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा. मांबेटी ने दोनों का आदरसत्कार किया. चायनाश्ते के बाद अनिल ने अपनी सास व अपने दोस्त को यह कह कर ऊपर छत पर भेज दिया कि पूनम से कुछ बात करनी है. अनिल ने पूनम से कह कर चारपाई बरामदे से उठा कर कमरे में डलवाई. उस समय लाइट भी नहीं थी. पूनम समझ नहीं पा रही थी कि इतनी गरमी में अंदर बैठ कर वह क्या खास बात करेंगे.

अनिल चारपाई पर बैठी पत्नी से औपचारिक बातें करने लगा, तभी अचानक उस ने अपने दोनों हाथों से पूनम का गला पकड़ लिया. पूनम समझ नहीं पाई कि वह क्या कर रहा है. गले पर हाथों का दबाव बढ़ने पर पूनम ने अपने बचाव में हाथपैर चलाने शुरू कर दिए, जिस से उस की चूडि़यां भी टूट गईं और शरीर पर खरोचों के निशान भी पड़ गए.

पति के सामने पूनम का संघर्ष असफल रहा. कुछ ही देर में वह चारपाई पर लुढ़क गई. जब अनिल को यकीन हो गया कि पूनम की सांसें थम गई हैं, तब उस ने अपने दोस्त कौशल को नीचे बुलाया. उस के साथ पूनम की मां शांति भी नीचे आ गई.

शांति जब नीचे आई तो पूनम उसे बरामदे में दिखाई नहीं दी. उस ने अनिल से पूनम के बारे में पूछा. अनिल ने इशारा करते हुए कहा कि वह अंदर कमरे में है. शांति जैसे ही कमरे की तरफ बढ़ी, अनिल ने उसे पीछे से दबोच लिया. दोस्त के सहयोग से उस ने सास को भी जमीन पर गिरा कर पहले उस के मुंह में कपड़ा ठूंसा, जिस से उस की आवाज न निकल सके. फिर कौशल ने पैर जकड़े और अनिल ने उसी की साड़ी से उस का गला घोंट दिया.

शांति को मारने के बाद दोनों ने उसे जमीन से उठा कर पूनम की लाश के ऊपर डाल दिया. अनिल को यह अहसास हुआ कि सास शांति देवी की सांसें अभी थमी नहीं हैं, तब उस ने उस की गरदन चारपाई से नीचे की ओर लटकाई. कौशल ने लटकती गरदन को पकड़ा और अनिल ने सब्जी काटने के चाकू से गरदन रेत दी.

इस के बाद दोनों वहां से निकल गए. इस मकान से आगे केवल 2 मकान और हैं. उस के बाद आबादी नहीं है. उन्होंने वहां आड़ में खड़ी बाइक उठाई और चले गए. सामने व पड़ोस में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को इस दोहरे हत्याकांड की भनक तक नहीं लग सकी.

पूनम का एक विकलांग भाई कुंवरपाल 5-6 मकान पहले गली के नुक्कड़ पर स्थित पशुशाला में सोने के लिए आया था. 4 साल की उम्र में उसे पोलियो हो गया था. उस की शादी भी एक विकलांग लड़की से हुई थी. वह बैसाखी के सहारे चलती है.

कुंवरपाल रात 10 बजे सोने के लिए पशुशाला में चला जाता था. करीब 25 सदस्यों का इन का संयुक्त परिवार है. सभी का भोजन एक साथ बनता है. सभी भाइयों एवं उन की बहुओं में गजब का सामंजस्य है. कुंवरपाल को भी घटना की जानकारी नहीं लगी.

अनिल से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस के और उस के दोस्त कौशल के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर के अनिल को सीजेएम रवि कुमार के समक्ष पेश कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. पुलिस ने दूसरे अभियुक्त कौशल की तलाश में इधरउधर छापे मारे तो उस ने 28 जून, 2018 को अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया.

अनिल ने हत्या का कारण यह भी बताया कि पूनम मानसिक रोगी थी और यह बात उस के घर वालों ने उस से छिपाई थी. जबकि परिजनों का कहना है कि उस के इस आरोप के कारण पूनम का सीटी स्कैन कराया था, जिस में वह पूर्ण स्वस्थ पाई गई.

मामले की जांच थानाप्रभारी प्रवीण सोलंकी कर रहे हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित 

लेखक : एडवोकेट मोहम्मद आसिफ कमल

संदेह की दोधारी तलवार

‘‘बीजी, आप आशू को साफसाफ कह क्यों नहीं देतीं कि वह हमारे घर न आया करे. पता नहीं क्यों, उसे देख कर मेरा खून खौल उठता है. मुझे डर है कि कहीं मुझ से कोई अनहोनी न हो जाए.’’ भिंदा ने अपनी मां कश्मीर कौर उर्फ कश्मीरो को समझाते और चेतावनी देते हुए कहा.

कश्मीर कौर जालंधर जिले के शहर नकोदर के आदी गांव के रहने वाले सतनाम सिंह की पत्नी थी. उस के छोटे बेटे भिंदा ने जब उस से यह बात कही तो वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर आज वह ऐसी बात क्यों कह रहा है. क्योंकि आशू तो भिंदा का जिगरी दोस्त था. फिर भी वह उस से बोली, ‘‘क्यों बेटा, आज आशू पर इतना नाराज क्यों हो रहा है? तेरा तो वह बचपन का दोस्त है. हम भी तो समयबेसमय उस के घर आतेजाते हैं.’’

मां की बात सुन कर भिंदा और भड़क गया. उस ने गुस्से से कहा, ‘‘मेरी बात आप को समझ नहीं आ रही, बीजी. अगर आशू मुझे इस घर में दिख गया तो मैं उस का कत्ल कर दूंगा.’’

‘‘अरे बेटा, तेरी तबीयत तो ठीक है.’’ कश्मीरो ने चिंतित होते हुए कहा, ‘‘तू आज कैसी बहकीबहकी बातें कर रहा है.’’

‘‘बहकीबहकी नहीं बीजी, मैं आप को समझाने के साथ चेतावनी भी दे रहा हूं. आप मेरी बात समझ जाएं तो अच्छा है वरना बहुत खूनखराबा होगा.’’ भिंदा ने यह बात दांत भींच कर कही थी.

कश्मीरो भिंदा का गुस्सा अच्छी तरह जानती थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि ये दोनों तो बचपन से एक साथ खातेपीते उठतेबैठते थे. दांत काटी रोटी का याराना था उन के बीच तो फिर अचानक भिंदा आशू से इतनी नफरत क्यों करने लगा है.

बेटे के तेवर देख वह बोलीं, ‘‘ठीक है पुत्तर, मैं उसे समझा दूंगी कि वह यहां न आया करे.’’

अपनी मां से बात करने के बाद भिंदा आंगन में गेहूं साफ कर रही अपनी 25 वर्षीय भाभी नवप्रीत कौर उर्फ लवप्रीत के पास पहुंचा और उसे धमकी देते हुए बोला, ‘‘आप भी अपने कान खोल कर सुन लो, आशू अब इस घर में कदम नहीं रखेगा. लेकिन आप भी घर के बाहर उस से न कभी बात करना और न ही उस के घर जाना. अगर मेरी बात नहीं मानी तो ठीक नहीं होगा.’’

भिंदा की धमकी भरी बात सुन कर लवप्रीत को बड़ा गुस्सा आया. वह भी गुस्से में भिंदा को धमकाते हुए बोली, ‘‘खबरदार, जो मुझ पर कोई हुक्म चलाया. और फिर तुम होते कौन हो मेरे ऊपर अपना रौब जमाने वाले? यह हक केवल मेरे पति या सासससुर का है. तुम छोटे देवर हो, छोटों की तरह रह कर बड़ों की इज्जत करना सीखो.’’

‘‘वाह क्या कहने, नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली.’’ व्यंग्य कसते हुए भिंदा ने कहा, ‘‘मैं आशू और आप की सारी रामकहानी जानता हूं. पता है, सारा गांव आप की ही प्रेम कहानियों के गीत गा रहा है और आप मुझे…’’

‘‘बंद करो अपनी बकवास,’’ लवप्रीत ने भिंदा की बात बीच में ही काटते हुए कहा, ‘‘क्या देखा है तुम ने मेरे और आशू के बीच. और फिर वह मेरा कोई चहेता नहीं है, तुम्हारा और तुम्हारे भाई का ही दोस्त है. मेरी शादी के पहले से ही वह इस घर में आताजाता रहा है. तुम्हारी मां ने अपना बेटा बना रखा है उसे. तब तुम्हें कोई तकलीफ नहीं हुई, जब तुम्हारी और तुम्हारे भाई की गैरमौजूदगी में वह इस घर के सारे काम किया करता था.’’

‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहता. अगर आज के बाद आप ने उस के साथ बात की तो ठीक नहीं रहेगा बस. मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं.’’

इस के बाद दोनों देवरभाभी में इसी बात को ले कर तकरार होने लगी और देखते ही देखते बात इतनी बढ़ गई कि लवप्रीत ने गुस्से में आ कर भिंदा को एक थप्पड़ जड़ दिया.

जतिंदर सिंह उर्फ भिंदा सतनाम सिंह का छोटा बेटा था. सतनाम सिंह की कुछ साल पहले मौत हो जाने के कारण मां कश्मीरो ने ही घर की बागडोर संभाली. अपनी थोड़ी सी जमीन को संभालने के साथ दोनों बेटों तीरथ सिंह और जतिंदर सिंह उर्फ भिंदा की परवरिश भी की थी. दोनों बेटे जब बड़े हुए तो उन के मन में विदेश जा कर पैसा कमाने की ललक जागी.

भागदौड़ करने के बाद उन्होंने अरब देश में काम पाने का जुगाड़ कर लिया. दोनों भाइयों ने अपनेअपने पासपोर्ट बनवाए और कतर में नौकरी के लिए चले गए. वहां दोनों भाई खूब मेहनत कर पैसा कमा कर अपने घर भेजते रहे.

विदेश से पैसा आने के कारण घर के हालात बेहतर होने लगे. गांव में पुराने मकान की जगह पर नया मकान बनवा लिया. दोनों भाइयों के लिए रिश्ते भी आने लगे थे. कश्मीरो ने नवप्रीत कौर उर्फ लवप्रीत कौर को अपने बड़े बेटे तीरथ सिंह के लिए पसंद कर लिया था.

करीब 5 साल पहले सन 2013 में तीरथ की शादी लवप्रीत कौर के साथ हो गई थी. अपनी शादी के एक महीना तक घर में पत्नी के साथ रहने के बाद तीरथ अपने भाई भिंदा के साथ वापस कतर चला गया.

आशू पुत्र रौनकी राम भी इसी गांव का मूल निवासी था. तीरथ सिंह, भिंदा और आशू तीनों बचपन से ही साथसाथ खेले और पलेबढ़े थे. उन के बीच गहरी दोस्ती थी जो युवा होने तक कायम रही. बल्कि युवा होने के बाद तो उन के बीच बहुत गहरे संबंध बन गए थे.

साथसाथ घूमनाफिरना, एकदूसरे के दुखसुख, शादीब्याह आदि के मौकों पर आगे बढ़ कर काम करना उन की आदत में शामिल था. तीरथ सिंह और आशू की दोस्ती की तरह दोनों के परिवारों का भी आपस में बड़ा प्रेम था. तीरथ सिंह की शादी में आशू ने बढ़चढ़ कर भाग लिया था.

तीरथ और भिंदा के कतर जाने के बाद आशू अकसर उन के घर आताजाता रहता था और छोटेबड़े काम कर दिया करता था. वह लवप्रीत को भाभी कहता था. देवरभाभी का रिश्ता होने की वजह से उन के बीच हलकीफुलकी हंसीमजाक भी होती रहती थी.

पति और देवर के विदेश चले जाने के बाद लवप्रीत अपने आप को अकेला महसूस करती थी. हालांकि उस की सास कश्मीरो उस का बहुत खयाल रखती थी पर उस के लिए यही पर्याप्त नहीं था. वह भी चाहती थी कि इधरउधर घूमे. लेकिन समस्या यह थी कि वह घूमने किस के साथ जाए, क्योंकि उस के साथ सास ने सैरसपाटे करने से मना कर दिया था तो वह अपने पति और देवर के दोस्त आशू के साथ ही घूमने के लिए निकल जाती थी.

पति से दूर और अकेले होने के कारण लवप्रीत को भी आशू का साथ अच्छा लगता था. दोनों का साथसाथ घूमना गांव के कुछ लोगों को पसंद नहीं था लेकिन तीरथ और आशू के परिवारों की घनिष्ठता देखते हुए लोगों ने अपना मुंह बंद ही रखा था.

दिसंबर 2017 में आशू का विवाह था. दोस्त की शादी से 2-3 महीने पहले भिंदा काम से छुट्टी ले कर कतर से गांव आ गया. आशू की शादी में उस ने बढ़चढ़ कर भाग लिया. उसी दौरान गांव के किसी व्यक्ति ने उस के कान भरते हुए कह दिया कि आजकल लवप्रीत और आशू का मेलमिलाप ज्यादा बढ़ गया है. लवप्रीत उस के साथ घूमती है.

यह सुनने के बाद भिंदा को आशू से नफरत होने लगी. इस के बाद उस ने आशू से बोलना तक बंद कर दिया था. इस के बाद भिंदा विदेश नहीं गया. कुछ दिनों में यह बात स्पष्ट हो गई थी कि किसी बात को ले कर आशू और भिंदा के बीच अनबन है. हालांकि यह बात आशू को भी नहीं पता थी कि भिंदा को उस से क्या परेशानी है.

उस ने इस ओर अधिक ध्यान नहीं दिया. वह पहले की तरह ही भिंदा के घर जाता रहा. कश्मीरो से भी बोलता रहा और लवप्रीत से भी. कश्मीरो को वह मौसी कहता था और उसे अपनी मां की तरह समझता था.

जून 2018 के आरंभ से ही भिंदा के तेवर कुछ अजीब से बन गए थे. वह बातबात पर राह चलते हुए भी आशू को रोक कर झगड़ा करने की कोशिश करता और उसे धमकी देता कि वह उस के घर न आया करे और न ही उस के परिवार से कोई वास्ता रखे.

एक दिन आशू ने उस से कहा, ‘‘भिंदा, तुम बेवजह मुझ से मत उलझा करो, अगर कश्मीरो मौसी मुझे घर आने से मना करेंगी तो मैं हरगिज नहीं आऊंगा.’’

आशू की पत्नी उन दिनों गर्भवती थी. उस की गोदभराई की रस्म में कश्मीरो और लवप्रीत भी गए थे पर भिंदा इस रस्म में शामिल नहीं हुआ था. वह तो इस फिराक में था कि कब उसे मौका मिले और वह आशू को सबक सिखाए. आखिर 9 जून, 2018 की शाम को उसे यह मौका मिल ही गया.

उस दिन शाम 5 साढ़े 5 बजे गांव के बीच में घने पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर गांव के कुछ लोग बैठे बातें कर रहे थे. आशू का चाचा बिक्कर सिंह उर्फ बिट्टू भी उन के साथ था. उसी समय आशू अपने घर से निकल कर उस चबूतरे के पास स्थित किराने की दुकान पर कोई सामान लेने के लिए जा रहा था, तभी अचानक वहां आ कर भिंदा ने आशू का रास्ता रोक लिया. मारे गुस्से के उस के जबड़े भिंचे हुए थे और आंखें लाल थीं.

भिंदा को अचानक अपने सामने देख आशू ने वहां से बच निकलने में ही समझदारी समझी. वह भिंदा की साइड से निकल जाना चाहता था लेकिन भिंदा ने मौका देखते ही अपने साथ लाए दरांत से उस पर हमला कर दिया. दरांत से ताबड़तोड़ हमला करने की वजह से आशू के शरीर से खून बहने लगा और वह चक्कर खा कर जमीन पर गिर गया. सामने चबूतरे पर बैठे आशू के चाचा व अन्य लोग यह नजारा देख रहे थे. वे आशू को बचाने के लिए आते, उस से पहले ही भिंदा वहां से भाग गया.

खून से सना दरांत ले कर वह अपने घर पहुंचा. उस समय घर पर उस की भाभी लवप्रीत कौर और मां कश्मीरो आंगन में कुछ काम कर रही थीं. भिंदा ने वहां आते ही अपनी भाभी की गरदन पर उसी दरांत से भरपूर वार कर उसे घायल कर दिया. लवप्रीत की गरदन से खून बहने लगा था. इस के बाद भिंदा मौके से फरार हो गया.

इस वारदात के बाद कश्मीरो के घर के भीतर और बाहर चबूतरे पर चीखपुकार मच गई. शोर सुन कर पूरा गांव कश्मीरो के घर और चबूतरे पर जमा हो गया. दोनों घायलों की हालत नाजुक थी. लवप्रीत और आशू को लोग उठा कर नकोदर के सरकारी अस्पताल ले गए. पर दोनों की नाजुक हालत को देखते हुए उन्हें जालंधर रेफर कर दिया गया.

लवप्रीत कौर की सास कश्मीरो उसे सिविल अस्पताल ले गई थी और आशू को खांबड़ा स्थित एक प्राइवेट अस्पताल में भरती करवाया गया था. इसी बीच पुलिस को भी इस वारदात की खबर मिल गई थी.

सूचना मिलते ही थाना सदर नकोदर के थानाप्रभारी जसविंदर सिंह और चौकी उग्गी के चौकी इंचार्ज गगनदीप सिंह सेखों भी अस्पताल पहुंच गए. डाक्टरों से बातचीत करने पर उन्हें पता चला था कि दोनों की हालत गंभीर बनी हुई है और वे बयान देने की स्थिति में नहीं हैं.

डाक्टरों से बात करने के बाद थानाप्रभारी चौकी इंचार्ज गगनदीप सिंह को अस्पताल में छोड़ कर खुद घटनास्थल का मुआयना करने आदी गांव रवाना हो गए. सूचना मिलते ही डीएसपी (नकोदर) डा. मुकेश कुमार भी अस्पताल पहुंच गए.

2 अलगअलग अस्पतालों में भरती आशू और लवप्रीत कौर को डाक्टर बचाने की कोशिश में लगे हुए थे पर वे अपनी कोशिश में असफल रहे. पौने 9 बजे लवप्रीत कौर ने दम तोड़ दिया और उस के थोड़ी देर बाद आशू की भी मौत हो गई. भनक लगते ही मीडियाकर्मियों का भी वहां जमघट लग गया था.

कश्मीरो को यह पता नहीं था कि भिंदा ने आशू को भी मार दिया है, इसलिए बेटे को बचाने के लिए वह बहू की मौत के बाद खूब चिल्लाई. उस का कहना था कि मेरी बहू अपने देवर भिंदा को बचाते हुए जान गंवा बैठी है.

कश्मीरो ने मीडिया के सामने यह भी कहा था कि इसी गांव का रहने वाला आशू उस के बेटे भिंदा से रंजिश रखता था, जो साथियों सहित उन के घर आया और तेजधार हथियारों से भिंदा पर हमला किया. उस की बहू लवप्रीत देवर को बचाने के लिए आगे आई तो आशू और उस के साथियों ने उस पर भी तेजधार हथियारों से वार किए.

लेकिन देर रात तक नकोदर पुलिस ने मामले की मौके पर जांच कर कश्मीरो द्वारा बेटे को बचाने की रची गई झूठी कहानी को नाकाम कर दिया था. मीडियाकर्मियों और पुलिस को उस की बातों पर विश्वास नहीं आया था.

आशू पर जब हमला हो रहा था, उस समय उस के चाचा बिक्कर सिंह उर्फ बिट्टू ने यह पूरा क्राइम सीन अपनी आंखों से देखा था. पुलिस को दर्ज करवाए अपने बयानों में बिक्कर सिंह ने थानाप्रभारी को आशू पर हुए हमले वाली बात बता दी.

बिक्कर सिंह के बयानों पर थानाप्रभारी ने 10 जून, 2018 को भादंवि की धारा 302 के तहत जतिंदर सिंह उर्फ भिंदा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया और दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने आरोपी भिंदा की गिरफ्तारी की प्रक्रिया शुरू कर दी थी.

लाशों का पोस्टमार्टम होने के बाद आशु की लाश उस के परिजनों के हवाले कर दी गई और लवप्रीत कौर उर्फ प्रीति का शव सिविल अस्पताल जालंधर की मोर्चरी में रखवा दिया क्योंकि उस के परिजनों ने कहा कि उस का पति तीरथ सिंह विदेश में है, उस के आने के बाद ही वह उस का अंतिम संस्कार करेंगे.

इस घटना के बाद समाजसेवी कामरेड दर्शन नाहर पीडि़त पक्ष के परिजनों व गांव के लोगों के साथ थाना सदर पहुंचे. उन्होंने पुलिस अधिकारियों से जल्द से जल्द कातिल को गिरफ्तार करने की मांग की.

पुलिस ने भिंदा की तलाश के लिए मुखबिरों को भी लगा दिया. पुलिस ने उस का फोन नंबर सर्विलांस पर लगा दिया था. उस की आखिरी लोकेशन नकोदर के दशमेश नगर के पास की मिली थी. इस के बाद उस ने अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया था.

5 दिन की लगातार भागदौड़ के बाद आखिर 15 जून, 2018 की रात को एक गुप्त सूचना के आधार पर उग्गी चौकी इंचार्ज एएसआई गगनदीप सिंह ने भिंदा को गांव रहमीपुर के पास से गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने उसी दिन आरोपी भिंदा को अदालत में पेश कर 18 जून तक के पुलिस रिमांड पर ले लिया. पुलिस रिमांड के दौरान डीएसपी नकोदर डा. मुकेश कुमार और थानाप्रभारी जसविंदर सिंह के समक्ष अपना अपराध स्वीकार करते हुए जतिंदर सिंह उर्फ भिंदा ने इस दोहरे हत्याकांड की कहानी का खुलासा इस प्रकार किया.

भिंदा का भाई तीरथ सिंह विदेश में रहता था. भिंदा को शक था कि उस की भाभी और आशू के बीच अवैध संबंध हैं. इसी के चलते उस ने दोनों का कत्ल कर दिया.

अपनी भाभी और आशू का कत्ल करने के बाद भिंदा बस से दिल्ली चला गया था और दिल्ली में कुछ दिन गुजार कर वह सूरत के लिए निकल गया था. वहां उस के रुकने का कोई ठिकाना तो था नहीं, इसलिए वह कभी सड़क किनारे खड़े किसी ट्रक या बस के बराबर में सो कर रात गुजारता तो कभी किसी सुनसान जगह पर.

जब उस के पास पैसे खत्म हो गए तो वह पैसों का इंतजाम करने के लिए वापस अपने गांव आया जहां पुलिस पहले से ही उस की ताक में बैठी थी, उस ने सूचना मिलते ही उसे गिरफ्तार कर लिया.

रिमांड के दौरान भिंदा की निशानदेही पर उस से दरांत भी बरामद कर लिया. भिंदा ने ये दोनों हत्याएं केवल शक के आधार पर की थीं. उस ने गांव के कुछ लोगों के सुनने पर ही मान लिया था कि आशू के उस की भाभी के साथ अवैध संबंध हैं.

पुलिस काररवाई पूरी करने और रिमांड अवधि खत्म होने के बाद भिंदा को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

राकेश शर्मा की बायोपिक में नजर आएंगे शाहरुख

कॉफी लंबे समय से चर्चा थी कि शाहरुख़ खान, राकेश शर्मा की बायोपिक का हिस्सा बनेंगे. लेकिन उन्होंने अब तक इस पर चुप्पी साध रखी थी. पर अब यह कन्फर्म हो चुका है कि शाहरुख़ खान ही राकेश शर्मा की बायोपिक का हिस्सा होंगे.

आपको बता दें, इस फिल्म का नाम पहले ‘सैल्यूट’ रखा गया था, लेकिन  अब इस फिल्म का नाम ‘सारे जहां से अच्छा’ रखा गया है.’ दरअसल शाहरुख़ अपना पूरा ध्यान अपनी आने वाली फिल्म ‘जीरो’ पर दे रहे हैं, क्योंकि ‘ज़ीरो’ उनके करियर की सबसे महंगी फिल्म भी है और वह पहली बार बौने की भूमिका अदा कर रहे हैं.

‘सारे जहां से अच्छा’ इस फिल्म की शूटिंग अगले साल फरवरी से शुरू होगी. इस फिल्म का निर्देशन महेश मथाई करेंगे. सबसे पहले यह फिल्म आमिर खान को ऑफर हुई थी. लेकिन वह किसी विषय पर काम कर रहे हैं तो उन्होंने हीं शाहरुख़ का नाम मेकर्स को सुझाया. मेकर्स ने भी शाहरुख़ खान को लेकर इस फिल्म को बनाने का फैसला लिया.

 

एक्स बॉयफ्रेंड संग फिल्म करेंगी दीपिका, 3 साल बाद पर्दे दिखेंगी ये जोड़ी

दीपिका पादुकोण और  रणवीर सिंह काफी लंबे वक्त से रिलेशनशिप में थे. पर अब दोनों इसी महीने 14 और 15  नवंबर को शादी करेंगे. बता दें, रणवीर सिंह से पहले दीपिका, रणबीर कपूर के साथ भी रिलेशनशिप में थीं. दोनों की ऑन स्क्रीन और ऑफ़ स्क्रीन केमिस्ट्री को खूब पसंद किया जाता था. दोनों ने एक साथ कई हिट फिल्में भी दी हैं.

हालांकि बाद में किन्हीं वजहों से उनका रिश्ता टूट गया. पर अब रणबीर कपूर आलिया भट्ट के साथ रिलेशनशिप में हैं. रणबीर कपूर और दीपिका को लेकर एक वक्त में खूब चर्चाएं होती थीं. प्रशंसक दोनों को रील और रियल लाइफ में एक साथ देखना पसंद करते थे. पर रिलेशनशिप टूटने के बाद दोनों ने लम्बे वक्त तक साथ में फ़िल्में नहीं कीं.

खबरों के अनुसार ये जोड़ी एक बार फिर रिल लाइफ में नजर आ सकती हैं. आख़िरी बार 2015 में फिल्म ‘तमाशा’ में दोनों साथ नजर आए थे. रिपोर्ट के अनुसार लव रंजन के अगले प्रोजेक्ट में ये जोड़ी साथ नजर आने वाली है.यह फिल्म 2019 में फ्लोर पर आएगी.इस फिल्म में रणवीर के अपोजिट दीपिका नजर आएंगी. अजय देवगन भी इस फिल्म में काम करेंगे पर उनके अपोजिट काम करने वाली अभिनेत्री का नाम अभी फाइनल नहीं किया गया है.

वैसे करण जौहर ने अपने शो कॉफी विद करण के एक एपिसोड में इस प्रोजेक्ट को लेकर इशारों में कहा था कि दीपिका के अगले फिल्म में रणबीर कपूर होंगे. इस फिल्म को 2020 में क्रिसमस पर रिलीज करने की तैयारी है. इससे पहले दीपिका और रणबीर ने ये जवानी है दीवानी, बचाना ऐ हसीनों और तमाशा में साथ काम किया था. दर्शकों ने दोनों की जोड़ी को खूब सराहा था.

 

फलता फूलता कांवर उद्योग

अंधविश्वास फैलाने वाले कर्म- कांडों में कांवर बहुत बड़े उद्योग का रूप धारण कर चुका है. सावन के मौसम में यह आमदनी का धंधा जोरों पर होता है. शिवपुराण व ब्रह्मपुराण में कहा गया है कि जो सनातनी यानी सनातन धर्म को मानने वाला सावन के महीने में गंगा और दूसरी पवित्र नदियों से जल ला कर शिव की मूर्ति यानी शिवलिंग पर चढ़ाता है उस की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मरने के बाद वह परम पद यानी स्वर्ग का अधिकारी बनता है.

अब धर्म के ठेकेदारों ने कहना शुरू किया है कि जो सनातनी पैदल, नंगे पैर सावन के महीने में गंगा और दूसरी नदियों से कांवर के जरिए पानी ला कर शिव की मूर्ति पर चढ़ाएगा वह मरने के बाद स्वर्ग का अधिकारी होगा. काल्पनिक स्वर्ग की चाह ने धीरेधीरे इसे व्यापार का रूप दे दिया है और अब तो यह अरबों रुपए का व्यापार बन चुका है, जिसे जनता के शोषण के लिए धर्म के नाम पर प्रचलित किया जा रहा है.

धर्म के ठेकेदारों ने तो इसे उद्योग का रूप देने के लिए बारहों महीने का धंधा बना दिया है. कांवर ले जाने वालों के लिए एक विशेष तरह की डे्रस बाजार में बड़ी तादाद में उपलब्ध रहती है. अमूमन यह गेरुए या लाल रंग की होती है. इस में हाफ पैंट, बनियान, टीशर्ट, शर्ट और गमछा तथा टोपी होती है. कांवर ले कर चलने वालों के लिए इसे पहनना जरूरी होता है. इस डे्रस को जो नहीं पहनता उसे कांवरिए के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता.

इस के अलावा ‘बहंगी’ यानी कंधे पर रख कर ले जाने वाली वस्तु भी इस में शामिल होती है. आगेपीछे डब्बे या छोटे घड़े बहंगी में लटकाए जाते हैं. जिस आदमी को कांवर ले जानी होती है उसे पूरे 15 दिन फलाहार या जलाहार पर रहना होता है. 15 दिन पहले एक विशेष कर्मकांड के जरिए कांवर ले जाने और कामनाओं की पूर्ति के लिए पंडित विशेष हवन कराता है. कांवरिए कांवर ले जाने से पहले अपने दूसरे साथी के घर जा कर कांवर के धंधे को चलाने वाले धंधेबाज की शर्तों को समझता है. जाहिर है इस में पुजारी की कमाई होती है.

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मोबाइल और पैदल सेवा

जैसेजैसे यह उद्योग बड़ा आकार लेता जा रहा है वैसेवैसे कांवर ले जाने के तमाम आधुनिक तरीके अपनाए जाने लगे हैं. इन तरीकों में मोबाइल सेवा और फास्ट वाहन सेवा प्रमुख हैं. मोबाइल सेवा काफी महंगी है. यह इसलिए कि इस में मौजमस्ती करने की सभी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होती हैं. इस में शराब के साथ गांजा, चरस और भांग बहुत बड़ी तादाद में उपलब्ध होती है, लड़कियां और लड़के साथसाथ रहते हैं. पैदल सेवा में कांवरियों को कांवर सेवा समिति की तरफ से जगहजगह रुकने की सुविधा उपलब्ध होती है. कई किलोमीटर के लंबे सफर में हर 1-2 किलोमीटर पर कांवर उद्योग के मालिक या संचालकों की तरफ से रुकने, खानेपीने और आराम करने की सुविधा उपलब्ध होती है. अमूमन एक कांवरिए को 2 से ले कर 5 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं.

धर्म के इस धंधे की असलियत क्या है

धर्म के ठेकेदारों द्वारा शुरू किया गया यह उद्योग आज सब से अधिक फायदे के उद्योगों में शुमार है. यह धंधा इसलिए तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि यह धर्म के नाम पर चल रहा है. धर्म के नाम पर इस देश में जितना भ्रष्टाचार और अनाचार है उतना किसी और विभाग में नहीं है. दरअसल, धर्म के नाम पर यह उद्योग पूरी तरह शोषण, अमानवीयता, अन्याय और भ्रष्टाचार पर आधारित है.

सब से सफल बड़ा उद्योग

एक अनुमान के मुताबिक इस उद्योग से हर साल इस धंधे से जुड़े लोगों को 1 अरब से ज्यादा की आय होती है. इस में कपड़ा, डब्बा और सेवा के नाम पर बांटे जाने वाले भोजन और फल भी शामिल हैं. पैसा, गहने, सोनाचांदी और दूसरे कीमती चढ़ावे जो चढ़ाए जाते हैं, उन का तो कोई हिसाब ही नहीं होता है. इस में केवल और केवल मुनाफा है, घाटा किसी रूप में नहीं है.

वेद की दुहाई

धर्म के ठेकेदार इस की अच्छाई साबित करने के लिए वेद की दुहाई देते हैं. पंडेपुजारी जनता को ठगने के लिए कहते फिरते हैं कि वेद में शिव से बहुत प्रार्थना की गई है. फिर ‘ओम् नम: शिवाय, नम: शंकराय, शिवकराय च’ मंत्र पढ़ देते हैं. भक्त को यह समझ में आता है कि कांवर ले जाने से शिव खुश हो जाएंगे और उस की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी. जब स्वर्ग पाने का आसान सा जरिया कांवर को बताया गया है तो भक्त को लगता है कि जिंदगी के इस बेहतरीन अवसर को किसी तरह खोना नहीं चाहिए. इतना ही नहीं, जो व्यक्ति कांवर ले जाने को अपना परम धर्म मानता है वह इस की अच्छाइयों को अपने पड़ोसी, रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों को बता कर उन्हें प्रेरित करता है. इस वजह से भी यह धंधा दिन दूनी रात चौगुनी गुनी उन्नति के रास्ते पर अग्रसर है.

कांवर के प्रचार के लिए जो तरीका अपनाया गया है वह भी कम दिलचस्प नहीं है. कांवर ले जाने वाले कांवरिए को आशीर्वाद देने वाले, दोनों कांवर ले जाने और इस के जरिए मनोकामनाएं पूरी होने का प्रचार जोरशोर से करते हैं. यह भी प्रचार किया जाता है कि कांवरिए को मदद देने से शिव प्रसन्न होते हैं.

आस्था के नाम पर चलता उद्योग

बिना लागत के चलने वाला यह उद्योग सब से अधिक फायदा देने वाला है. सब से बड़ी बात यह है  कि इस उद्योग पर मंदी या महंगाई का कोई असर नहीं पड़ता है. दूसरी बात यह है कि कांवर उद्योग में शामिल कोई भी व्यक्ति दुर्घटना का शिकार हो जाए या उस की मौत हो जाए तो उस की जिम्मेदारी कांवर उद्योग चलाने वाले पर बिलकुल भी नहीं होती. आश्चर्य की बात तो यह है कि जब कोई कांवरिया कांवर ले जाते समय रास्ते में कहीं दुर्घटना का शिकार हो जाता है, और उस की मौत हो जाती है तो उसे शिव का वरदान मान शुभ माना जाता है क्योंकि ऐसा व्यक्ति मरने के बाद मोक्ष का अधिकारी माना जाता है.

देश के गांवों में बच्चों की दुर्गति

देश के गांवों में बच्चों की क्या दुर्गति है यह इस छोटी बात से जाहिर है कि दिल्ली के एक बहुत घने गरीब इलाके में 2 कमरे के मकान में असम, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल से लाए गए 27 बच्चे एक छापे में पकड़े गए. इन बच्चों को गांवों से लाया गया था और दिल्ली में या तो घरेलू नौकरी पर लगाया जाता था या देह बेचने में.

इन बच्चों के मांबाप गांवों में बच्चों के खो जाने के बाद कुछ दिन तक रोतेकलपते रहते होंगे और फिर अपना नसीब मान कर हार कर चुप बैठ जाते होंगे. जाहिर है कि ये बच्चे बेहद गरीब घरों के हैं जहां हर रोज खाने के लाले पड़े रहते हैं. तभी कुछ के मातापिता को नौकरी का लालच दे कर तो कुछ को रिश्तेदारों से और कुछ को उठा कर लाया जाता होगा.

बच्चों का यह धंधा बड़े जोरशोर से सारे देश में चल रहा है और हमारी सारी चकाचौंध की पोल खोलता है. हम चाहे ऊंचे मकान बना रहे हों, सुंदर हवाईअड्डे बना रहे हों, बुलेट ट्रेन ला रहे हों, यह पक्का?है कि इन के नीचे बड़ा काला धब्बा छिपा है जिसे देखना नहीं चाहते. बच्चों के खोने की बात ऐसी नहीं कि इस का हल्ला न मचे.

आज सरकार के पंजे कोनेकोने में फैले हुए हैं. पुलिस, आढ़ती, ठेकेदार, नेता, मंदिर, मसजिद हर जगह हैं जहां से किसी भी बच्चे के खोने पर बड़ा शोर मच सकता है. पर मगर सब चुप रहते हैं तो शायद इसलिए कि मातापिता जानते हैं कि उन के पास घरों में बच्चों को खिलाने तक के पैसे नहीं हैं और अगर वे खो गए, भाग गए या जानबूझ कर दे दिए गए तो शायद दो जून की रोटी का तो इंतजाम हो जाए.

दिल्ली में भी ये बच्चे पड़ोसियों की शिकायत पर नहीं पकड़े गए. 21 बच्चे 2 कमरों में रह रहे हों और किसी को शक न हो, ऐसा नहीं हो सकता. यह हमारी गैरजिम्मेदारी की निशानी है कि लोग बच्चों का नसीब मान कर और गुंडों से न उलझने की सोच कर चुप रह जाते हैं. दिल्ली में चप्पेचप्पे पर बच्चे दिख जाते हैं और ये गांवों से खुद ब खुद तो भाग कर नहीं आ सकते. इन्हें तो गैंग लाएंगे और ये गैंग पुलिस की आंख से बचे रह जाते हों, हो नहीं सकता.

देश न जाने किन मंदिरों और मसजिदों के झगड़ों में उलझा हुआ है जबकि देश के लाखों बच्चे हर साल गायब हो जाते हैं और उन की सुध लेने वाला कोई नहीं है.

मनोरंजन का नया क्रेज वीडियो स्ट्रीमिंग

मनोरंजन का माध्यम अब सिनेमाघरों व टेलीविजन से होते हुए औनलाइन प्लेटफौर्म तक पहुंच चुका है. मोबाइल और लैपटौप पर वीडियो स्ट्रीमिंग वैबसाइट्स व ऐप्स मनचाही फिल्में व टीवी कंटैंट मुहैया करवा रही हैं. वीडियो स्ट्रीमिंग की बढ़ती लोकप्रियता कहीं टीवी को चलन से बाहर न कर दे.

नैटफिल्क्स पर प्रसारित वैब सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ इन दिनों सुर्खियों में है. यह जुलाई में रिलीज हुई. इसकी लोकप्रियता इस कदर बढ़ी कि सोशल मीडिया पर चारों तरफ इसी के चर्चे हो रहे हैं. सेके्रड गेम्स विक्रम चंद्रा के उपन्यास पर आधारित है. इस सीरीज को अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवाले ने डाइरेक्ट किया है. इस गैंगस्टर थ्रिलर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राधिका आप्टे और सैफ अली खान मुख्य भूमिका निभा रहे हैं.

इन दिनों बौलीवुड में तो बायोपिक की बारिश हो रही है, लेकिन अब यह ट्रैंड डिजिटल इंटरटेनमैंट प्लेटफौर्म में भी देखने को मिल रहा है. सनी लियोनी की बायोपिक की सीरीज का पहला सीजन ‘करनजीत कौर : द अनटोल्ड स्टोरी औफ सनी लियोनी’ जी-5 पर आ चुका है. और दूसरा सीजन औनएयर होने के लिए तैयार है.

सुपरहिट फिल्म ‘बाहुबली’ के दोनों पार्ट्स ने देश-विदेश में जम कर कमाई की. इसकी कहानी और कलाकार दोनों को काफी पसंद किया गया. लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि बाहुबली की कहानी जहां से शुरू होती है, उससे पहले क्या हुआ था. अब यह स्पिन औफ नैटफ्लिक्स पर आने वाले बाहुबली के 2 सीजन में वैब सीरीज के जरिए दिखाया जाएगा.

दरअसल, नैटफ्लिक्स ने एक करार किया है, जिसके तहत वह ‘द राइज औफ शिवगामी’ नौवेल की कहानी को वैब सीरीज में दिखाएगा. यह 2015 में आया बाहुबली का प्रीक्वल है. एस एस राजामौली निर्देशित बाहुबली के 2 पार्ट्स ‘बाहुबली द बिगिनिंग’ और ‘बाहुबली द कन्क्लूजन’ में जो कहानी चलती है, उससे पहले की कहानी को शिवगामी यानी राजमाता को आधार बना कर लिखा गया है. नैटफ्लिक्स बाहुबली के पहले सीजन में 9 एपिसोड्स दिखाएगा. इसमें बताया जाएगा कि एक पूरा शहर कैसे साम्राज्य में तबदील हुआ. इसके बाद इसका दूसरा पार्ट भी रिलीज होगा.

डिजिटल इंटरटेनमेंट

ये न फिल्में हैं न सीरियल, ये सब वैब सीरीज या वीडियो स्ट्रीमिंग डिजिटल इंटरटेनमेंट की मिसालें हैं जो दर्शकों, खासकर युवाओं का नया क्रेज है. आजकल आपको ज्यादातर नौजवान इयरफोन लगा कर वीडियो देखते हुए जरूर दिखते होंगे. आपको लगता होगा कि वे कोई फिल्म देख रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. वे फिल्म नहीं, वैब सीरीज देख रहे होते हैं. आज वैब सीरीज एंटरटेनमैंट के एक नए माध्यम के रूप में सामने आया है.

बड़े परदे पर फिल्म, छोटे परदे पर सीरियल और उस से छोटी स्क्रीन मतलब मोबाइल और लैपटौप पर फनी वीडियो देखे जाते हैं. जिन्हें वीडियो स्ट्रीमिंग भी कहा जाता है. वैसे, वीडियो स्ट्रीमिंग क्या होता है? आप यूट्यूब देखते हों या हौटस्टार या फिर आप ने अमेजन प्राइम देखा होगा, इन दिनों नैटफ्लिक्स का नाम तो सुन ही रहे होंगे. जी हां, यही सब वीडियो स्ट्रीमिंग कहलाते हैं.

अब आपके मन में एक सवाल उठ रहा होगा कि फिल्में तो सिनेमाघर से कमाई करती हैं. टीवी सीरियल्स विज्ञापन से कमाई करते हैं लेकिन ये वीडियो स्ट्रीमिंग कहलाने वाले सभी प्लेटफौर्म्स कमाई कैसे करते होंगे, तो इसका सीधा फंडा है कि हमें इन सभी प्लेटफौर्म्स पर सब्सक्रिप्शन लेना होता है. वैसे यूजर चाहे तो कुछ प्लेटफौर्म्स का सब्सक्रिप्शन नहीं भी ले सकता है, लेकिन फिर उसे वीडियो के बीच में ऐड देखने पड़ते हैं.

यह है भी बिलकुल आसान और पोर्टेबल. अपने स्मार्टफोन पर ऐप डाउनलोड कीजिए और अपने लिए सब्सक्रिप्शन लीजिए. इसे सब्सक्रिप्शन कहिए या यों कहिए कि आपने बिना किसी ऐड ब्रेक और सैंसर कट के फिल्म देखने के लिए अमुक कंपनी को एडवांस किराया दे दिया. लोग नैटफ्लिक्स के लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग का आनंद ले रहे हैं.

हम आज तक किसी फिल्म या नाटक को या तो अपने टीवी में देखते थे या सिनेमाहौल में या फिर सीडी, डीवीडी में. लेकिन अब इनके अलावा एक और तरीके से हम फिल्म सीरियल वगैरह देख सकते हैं. वह तरीका दिया है इंटरनेट ने. तरीके का नाम है वीडियो स्ट्रीमिंग. आज के समय में इन्हें वैब टैलीविजन कहा जाए तो गलत नहीं होगा. इनमें एक कहानी को 5-10 एपिसोड में दिखाया जाता है और ये एपिसोड 15 से 45 मिनट के ही होते हैं, जिस वजह से उबाऊ भी नहीं लगते.

सिनेमा-टीवी बनाम डिजिटल

भारत में मनोरंजन की होड़ खास दिलचस्प होती जा रही है. मुकाबला जारी है. मनोरंजन के 3 प्रमुख माध्यमों सिनेमा, टीवी और नए उभरे डिजिटल में कांटे की टक्कर चल रही है. 8वें दशक में यह सवाल उठता था क्या टीवी या बुद्धूबक्सा सिनेमा को खा जाएगा? आज फिर सवाल उठ रहा है क्या डिजिटल टीवी को लील जाएगा? आखिर क्या है हकीकत?

फिक्की अंर्स्ट ऐंड यंग की मीडिया ऐंड एंटरटेनमैंट 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत यूएसए को पीछे छोड़ कर दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन उपभोक्ता देश बन चुका है. पहला नंबर चीन का है. भारत में 50 करोड़ से ज्यादा इंटरनैटधारियों की औनलाइन सेना 2020 तक दुनिया का नंबर 2 औनलाइन वीडियो दर्शक बाजार बनने जा रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक, टीवी माध्यम आज भी भारत में मनोरंजन क्षेत्र का निर्विवाद लीडर है. लेकिन, दिलचस्प तथ्य यह है कि बीते 2 और आगामी 3 सालों में सबसे तेज विकास करने वाला माध्यम टीवी नहीं, डिजिटल मीडिया है. जिसकी इन 5 सालों में तरक्की की गति 24.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है. इससे भी ज्यादा रोचक बात यह है कि मनोरंजन के क्षेत्र में डिजिटल माध्यम भारत के सबसे चहेते मनोरंजन माध्यम सिनेमा को 2020 तक ओवरटेक करने वाला है. रिपोर्ट के अनुसार, जिस गति से डिजिटल माध्यम तरक्की कर रहा है, सिनेमा उद्योग के 19 हजार 200 करोड़ रुपए के आंकड़े के मुकाबले 2020 में उसकी संभावित कमाई 22 हजार 440 करोड़ रुपए होगी. 8वें दशक में आया, टीवी समाज के लिए सिनेमा के मुकाबले ज्यादा नया माध्यम है. मगर पारिवारिक मनोरंजन का माध्यम होने के कारण मध्यवर्ग का चहेता माध्यम बन गया.

बार्क की ताजा रपट के मुताबिक, देश के 29.8 करोड़ घरों में से 19.7 घरों में वह पहुंच चुका है. इन परिवारों के 83 करोड़ दर्शक आज भी उसके कब्जे में हैं. यह आंकड़ा डिजिटल टीवी के लिए सपने की तरह है. इसके बावजूद वह सैचुरेशन से बहुत दूर है. इसलिए उसकी विकास यात्रा ऐसे ही चलती रहेगी, इसका उसे विश्वास है.

आज भारत में मनोरंजन का परिदृश्य दिलचस्प होता जा रहा है. जियो ने बाजार के 44 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा जमा लिया है. भारत में मोबाइल कनैक्शन की संख्या मानवीय संख्या के बराबर पहुंचती जा रही है. 2015 के अक्तूबर में यह आंकड़ा 100 करोड़ के जादुई नंबर को पार कर चुका था.

एक अनुमान के मुताबिक, भारत में 50 करोड़ स्मार्टफोन उपभोक्ता हैं. फिक्की अंर्स्ट ऐंड यंग की मीडिया ऐंड एंटरटेनमैंट 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, यही 50 करोड़ उपभोक्ता भारत को जल्दी औनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग का सबसे बड़ा बाजार बना देंगे.

इस तरह डिजिटल सिनेमा और टीवी दोनों के लिए खतरा है. मगर, टीवी के लिए खतरा ज्यादा है. सिनेमा की ताकत अलग है. टीवी इस बात को पहचान चुका है. वह डिजिटल से प्रतिद्वंद्विता मोल लेने के बजाय तालमेल करके चलना चाहता है.

नैटफ्लिक्स का आगाज

शहरों पर केबल टीवी वालों का कब्जा हो गया. उसके बाद तेजी से टीवी देखने का  कौन्सैप्ट बदला और अब भी बदल रहा है.

नैटफ्लिक्स दुनिया की टौप वीडियो स्ट्रीमिंग सर्विस है, जिसमें आप अपने स्मार्टफोन से ले कर स्मार्ट टीवी तक की स्क्रीन पर कंटैंट देख सकते हैं. ओरिजिनल वैब कंटैंट को नैटफ्लिक्स में क्रिएट किया जाता हैं, जिनमें से अधिकांश अब हाई रिजोल्यूशन वाले अल्ट्रा एचडी में उपलब्ध हैं. नैटफ्लिक्स लगभग 20 वर्षों पहले जब शुरू हुआ, तो यह एक सब्सक्रिप्शन बेस्ड डीवीडी सर्विस था जो आपके घर में सीधे डीवीडी मेल करता था. यह अभी भी ऐसा ही करता है, लेकिन 2007 में नैटफ्लिक्स ने इसकी स्ट्रीमिंग सर्विस शुरू की, जिसके बाद दर्शकों को हजारों औन डिमांड टीवी शो और फिल्मों को विज्ञापनमुक्त देखने की इजाजत मिल गई. 10 वर्षों बाद, नैटफ्लिक्स मनोरंजन में सबसे बड़े नामों में शुमार हो गया. इस का बेस लौस गैटोस, कैलिफोेर्निया में है और भारत सहित दुनियाभर के 40 देशों में यह औपरेट होता है. इस की सर्विसेस औन डिमांड आधार पर प्रदान की जाती हैं, जिस का अर्थ है कि लोग जिसकी मांग करते हैं, उन्हें वह कंटैंट उपलब्ध होता है. ये सर्विसेस फ्लैट रेट पर मुहैया कराई जाती हैं.

औनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग

भारत में तकरीबन 30 कंपनियां हैं जिनमें मुख्यतया नैटफ्लिक्स, अमेजन, हौटस्टार, वायकौम हैं जो अभी देश में वीडियो गेम्स और खेल संबंधित कंटैंट लोगों को उपलब्ध करवा रही हैं. अब एक और कंपनी शीमारू एंटरटेनमैंट लिमिटेड ने भी इस मैदान में उतरने का मन बना लिया है. इस कंपनी के पास लगभग 3,500 भारतीय फिल्मों का जखीरा है और वह इसे सालाना 3-5 फीसदी की दर से बढ़ाते हुए कई औनलाइन प्लेटफौर्म्स से लाइसैंस फीस ले कर इसके जरिए कमाई करना चाहती है. इन सब कंपनियों में से नैटफिल्क्स के पास सबसे ज्यादा ग्राहक हैं. दुनियाभर में 12 करोड़ ग्राहकों वाली कंपनी नैटफिल्क्स ने 31 दिसंबर, 2017 तक लगभग 50 लाख ग्राहक बना लिए हैं. रीड हेस्टिंग्स का मानना है कि भारत 10 करोड़ वीडियो कंटैंट देखने वाले ग्राहकों का बाजार बन सकता है.

भारत में औनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग का बाजार जल्द ही बदलने वाला है. समय आ गया है कि वीडियो कंटैंट और गेमिंग एप्लीकेशंस आपकी और हमारी जिंदगी में भीतर तक प्रवेश कर जाएंगी. अंर्स्ट ऐंड यंग की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2016 के मुकाबले साल 2017 में भारत में मीडिया और एंटरटेनमैंट का बाजार 13 फीसदी की बढ़त के साथ डेढ़ लाख करोड़ का हो गया.

यूट्यूब ओरिजिनल बनाम नैटफ्लिक्स-अमेजन

अब तक भारत में फ्री में फिल्म और गानों का कोई डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफौर्म रहा है तो वह है यूट्यूब. बिना किसी सब्सक्रिप्शन चार्जेज के यहां 50-60 के दशक से ले कर आज तक हर भाषा में देश का सिनेमा, शौर्ट फिल्में और सीरियल्स फ्री में उपलब्ध होते रहे हैं.

ऐसे में जब नैटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम वीडियो जैसे ब्रैंड आ गए हैं तो उन्हें टक्कर देने और अपनी पुरानी दर्शक संख्या बरकरार रखने के लिए यूट्यूब कमर कस चुका है. इस क्रम में यूट्यूब फ्रांस, जर्मनी, जापान और मैक्सिको के अलावा भारत में भी अपने ओरिजिनल प्रोग्रामिंग, ‘यूट्यूब ओरिजिनल’ सर्विस को लौंच करने की प्लानिंग कर रही है. इस के जरिए यूट्यूब यूजर्स को अपनी पेड सब्सिक्रप्शन सर्विस की तरफ आकर्षित करेगा. दिलचस्प बात यह है कि यूट्यूब बाकी वीडियो स्ट्रीमिंग कंपनियों की तरह महज फिल्म, सीरियल ब्रौडकास्टिंग तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि उसकी ओरिजिनल प्रोग्रामिंग में टौक शो, स्क्रिप्टिड सीरीज, रिऐलिटी सीरीज, म्यूजिकल डौक्युमैंट्री शोज आदि भी शामिल होंगे.यूट्यूब के लिए ओरिजिनल प्रोग्रामिंग के ग्लोबल हेड सुजाने डैनियल्स के मुताबिक, ‘‘ज्यादातर रीजनल प्रोग्राम भाषाओं में बनाए जाएंगे और सबटाइटल्स भी रखे जाएंगे. साथ ही यूट्यूब सभी कंटैंट को यूट्यूब प्रीमियम के लिए नहीं लाएगा. इसके बजाय इस में से कुछ ही कंटैंट यूट्यूब प्रीमियम पर होंगे जबकि बाकी ऐड के साथ यूट्यूब पर फ्री में उपलब्ध होंगे.’’फिलहाल वह साउथ कोरिया में कई ओरिजिनल कार्यक्रम और भारत में एक हिंदी टौक शो अनक्रिकेट रिलीज कर चुका है. जाहिर है यूट्यूब का यह प्लानपेपर अमेजन प्राइम वीडियो और नैटफ्लिक्स को चुनौती देगा.

स्मार्टफोन की अहम भूमिका 

भारत में स्मार्टफोन की क्रांति इस के पीछे एक अहम कारण है. आज भारत का स्मार्टफोन बाजार दुनिया में दूसरे नंबर पर आ गया है. जानकारों का मानना है कि इस साल देशभर में लगभग 50 करोड़ ग्राहक इंटरनैट से जुड़ जाएंगे और इसमें स्मार्टफोन सबसे बड़ा कारक है. दुनियाभर में लोग पढ़ने की अपेक्षा वीडियो देखने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं. जाहिर है कि ऐसे माहौल में भारत वीडियो सर्फिंग और गेमिंग एक बड़ा बाजार बन जाएगा. तीसरा अहम कारण है कि भारत के देशी कंटैंट का अब इंटरनैट पर उपलब्ध  होना. भारतीय भाषाओं में कंटैंट की उपलब्धता ने मीडिया और एंटरटेनमैंट के बाजार में इजाफा किया है.

इंटरनैट प्रोवाइडर्स की औफरबाजी

वीडियो स्ट्रीमिंग का बाजार सिर्फ इंटरनैट पर ही निर्भर है. बिना इसके इनका कोई अस्तित्व नहीं है. जाहिर है भारत में इंटरनैट प्रोवाइड करने वाली ज्यादातर टैलीकौम कंपनियां अलग-अलग प्लान्स पर पैकेज देती हैं. जियो के आने के बाद इंटरनैट पैकेज का सारा गणित बदला और अनलिमिटेड डाटा कम से कम दामों में उपभोक्ताओं को मिलने लगा. इस बात की तसदीक ऐसे भी होती है कि एक समय नैटफ्लिक्स ने भारत में आने से इनकार कर दिया था लेकिन कुछ सालों बाद जब जियो की सर्विस भारत में लौंच हुई तो इस के अधिकारियों ने जियो को धन्यवाद दिया. अब जब नैटफ्लिक्स, अमेजन, वीवू, सोनी लिव, एएलटी बालाजी जैसी स्ट्रीमिंग फर्म्स मार्केट में मौजूद हैं तो इसका फायदा इंटरनैट प्रोवाइडर कंपनियां भी उठाती दिख रही हैं. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब एयरटेल ने अपने पोस्टपेड यूजर के लिए एक औफर के तहत नैटफ्लिक्स की फ्री मैंबरशिप दी थी. इसके लिए एयरटेल ने बाकायदा नैटफ्लिक्स के साथ पार्टनरशिप की. भारती एयरटेल के सीईओ ने भी यह स्वीकार किया था कि यह पार्टनरशिप कंपनी की मुख्य रणनीति का ही एक हिस्सा है. हाई स्पीड डेटा सर्विस और बढ़ते स्मार्ट डिवाइस अंतर्राष्ट्रीय व स्थानीय दोनों स्तर पर नए अवसर पैदा कर रहे हैं और वे इसका पूरा फायदा उठाने के लिए तैयार हैं. कुछ महीनों की फ्री मैंबरशिप का यह आइडिया अगर चल निकला तो बाकी कंपनियां भी अन्य स्ट्रीमिंग साइट्स के साथ नए-नए करार करेंगी.

क्यों है क्रेज

वैब सीरीज में खास यह है कि यहां ब्रेक का झंझट नहीं है. वैब सीरीज को तुगलकी सैंसरशिप से नहीं जूझना पड़ता, न ही सैंसर बोर्ड से पास होने का इंतजार करना पड़ता है. उसमें आप अपनी रचनात्मकता खुल कर दिखा सकते हैं. ऐसा नहीं है कि इस में केवल वही कलाकार काम कर रहे हैं जिन्हें बौलीवुड में मौका नहीं मिल रहा है, सितारों को भी अब समझ आ गया है कि यह भविष्य की विधा है, इसलिए कई बड़े स्टार भी काम करने लगे हैं. ‘सेके्रड गेम्स’ को ही लीजिए, इस में सैफ अली खान, नवाजुद्दीन सिद्दीकी व राधिका आप्टे हैं. इसमें कई बौलीवुड स्टार भी काम कर चुके हैं, जिनमें कल्की कोचलिन, स्वरा भास्कर, करणवीर मेहरा, परिणीति चोपड़ा, कुणाल कपूर, भूमि पेडणेकर, रिचा चड्ढा, रिया चक्रवर्ती, अली फजल और आर माधवन जैसे कलाकार शामिल हैं.अब तो फिल्मों के डाइरैक्टर भी वैब सीरीज में आ रहे हैं. अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ को भी वैब सीरीज में तबदील कर अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाया जा रहा है, जिसे खुद अनुराग कश्यप ने 8 हिस्सों की एक वैब सीरीज का फैलाव दिया है. टेलीविजन की महारानी एकता कपूर भी एक वैब सीरीज ले कर आई हैं, जिस में फिल्म ‘एयरलिफ्ट’ स्टार निम्रत कौर हैं. साथ ही, ‘बाजीराव मस्तानी’ का निर्माण करने वाला स्टूडियो इरोस नाउ एकसाथ तकरीबन 6 वैब सीरीज पर काम कर रहा है. यही नहीं, देश के सब से बड़े फिल्म निर्माताओं में से एक यशराज फिल्म्स अपनी एक निर्माण शाखा वाय फिल्म्स के माध्यम से वैब सीरीज बना रहे हैं. नैटफ्लिक्स ने देश में कई गेम्स सीरीज शुरू करने की घोषणा की है. इस की पहली कड़ी में वह एक भारतीय कंपनी के साथ बौलीवुड अभिनेता सैफ अली खान को ले कर भारत के धार्मिक पात्रों पर आधारित एक गेम बनाने जा रही है. भारत में मौजूद वीडियो औन डिमांड प्लेयर्स जैसे हौटस्टार, नैटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम वीडियो ने हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में डिजिटल कंटैंट बनाने में भारी पैसा लगाया है. वीडियो औन डिमांड या ओटीटी प्रोवाइडर्स और प्रोडक्शन हाउस की डिमांड बढ़ने की वजह से टीवी ब्रौडकास्टर्स ने अपना डिजिटल मीडिया प्लेटफौर्म शुरू कर दिया है. इस में हौटस्टार, डिट्टो टीवी, ओजी, वूट, सोनीलिव शामिल हैं. इसके अलावा, इरोज और बालाजी भी डिजिटल मीडिया में कूद पड़े हैं.  बालाजी ने हाल में ही में बालाजी एएलटी शुरू किया है. जी 5 ने डिजिटल प्लेटफौर्म पर एंटरटेनमैंट से जुड़ी मूल सामग्री पेश करने के क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है. इस के साथ ही जी 5 भारत में सब से बड़ा कंटैट हब बन गया है. जी 5 ओरिजिनल पर करीब 20 ऐसे कंटैट पेश किए जाएंगे जो इस की खास प्रस्तुति रहेगी जो ऐक्शन, सस्पैंस, थ्रिलर, बायोपिक और कौमेडी से भरपूर होगी. खास बात यह है कि इन सभी को करीब 6 भाषाओं में प्रस्तुत किया जाएगा.

पायरेसी और इंटरनैट स्पीड बिगाड़ रही है खेल

भले ही नैटफ्लिक्स दुनियाभर में डिमांडिंग ब्रैंड माना जाता हो और ताबड़तोड़ कमाई कर रहा हो लेकिन भारत में इस की राह आसान नहीं है. इस के पीछे असली कारण है पैसा. विदेशों में लोग कोई भी कंटैंट या सर्विस मुफ्त में लेना पसंद नहीं करते जबकि अपने यहां मुफ्त में खाने का चलन है. इसलिए आज पत्रिका खरीदने से बचने वाली जेनरेशन फ्री ईबुक्स और वीडियो जम कर देखती है. जाहिर है नैटफ्लिक्स और अन्य स्ट्रीमिंग सर्विस कंपनियों का कंटैट भी इंडिया में फ्री में ज्यादा देखा जा रहा है, वह भी पायरेसी के जरिए.

दिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाके में चले जाइए. वहां मोबाइल की दुकानों के आगे लैपटौप लिए बैठे लड़के नैटफ्लिक्स और अमेजन की हर सीरीज के सारे सीजन पैनड्राइव में मात्र 10 रुपए में दे रहे हैं. बाद में ये कंटैंट दोस्तयारों से होता हुआ सब जगह  फ्री में शेयर होता रहता है. दूसरी वजह इंटरनैट सेवाओं की स्पीड भी है. अमेरिका और अन्य कई देशों की तुलना में यहां यह स्पीड  बहुत ही कम है तथा 4जी की आमद के बावजूद इस में बहुत जल्दी किसी बेहतरी की संभावना नहीं दिखाई देती है. जबकि नैटफ्लिक्स ने साफ कहा है कि इस में मूवीज देखने के लिए कम से कम 5 एमबीपीएस के कनैक्शन की दरकार है. टैलीकौम टौक के एक सर्वेक्षण के अनुसार, 45  फीसदी इंटरनैट यूजर्स के पास 1 से 3 एमबी प्रति सैकंड की स्पीड का कनैक्शन है. 30 फीसदी यूजर्स एक एमबी प्रति सैकंड से कम स्पीड वाले कनैक्शन से काम चलाते हैं और 50 एमबी प्रति सैकंड से अधिक स्पीड के कनैक्शन रखने वालों की संख्या एक फीसदी से भी कम है. सामान्यतया नैटफ्लिक्स की हाई डैफिनीशन सेवाओं का समुचित ढंग से आनंद उठाने के लिए उपभोक्ता के पास 8 एमबी प्रति सैकंड स्पीड का कनैक्शन और 100 जीबी प्रतिमाह का डाटा  होना चाहिए. ऐसे कनैक्शन के लिए 2 हजार रुपए से अधिक शुल्क की सेवाएं लेनी होंगी. इस सेवा के लिए नैटफ्लिक्स की दरें भी अधिक हैं. भारत में डीटीएच का व्यापक प्रसार है. ऐसे में इन तमाम कठिन प्रतिस्पर्धाओं से नैटफ्लिक्स को जूझना होगा.

-साथ में राजेश कुमार    

टेढ़ी राह वाला पत्रकार

बात 17 मई, 2018 की है. मध्य प्रदेश के उज्जैन रेंज के आईजी राकेश गुप्ता अपने औफिस में  विभागीय कार्य निपटा रहे थे, तभी अंजना नाम की एक युवती उन के पास अपनी शिकायत ले कर पहुंची. अंजना उज्जैन के ही पटेल नगर में अपने पति और 2 बच्चों के साथ रहती थी. जो शिकायत ले कर वह आईजी साहब के पास पहुंची थी, वह शिकायत इलैक्ट्रौनिक मीडिया के एक तथाकथित पत्रकार जगदीश परमार के खिलाफ थी.

महिला ने आरोप लगाया कि उज्जैन के सेठी नगर के रहने वाले जगदीश परमार ने न सिर्फ उस के साथ बलात्कार किया बल्कि उस से लाखों रुपए भी ठगे हैं. चूंकि मामला गंभीर और नारी अपराध से जुड़ा था, इसलिए आईजी राकेश गुप्ता ने मामले को गंभीरता से लेते हुए उस की प्रारंभिक जांच कराई तो उस के आरोपों में सच्चाई नजर आई.

इस के बाद उन के निर्देश पर एडीशनल एसपी रंजन भट्टाचार्य खुद अंजना को ले कर महिला थाने पहुंचे. वहां पर अंजना की तरफ से जगदीश परमार के खिलाफ भादंवि की धारा 376, 384, 506 के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई. इस के बाद महिला थानाप्रभारी रेखा वर्मा ने सरकारी अस्पताल में रात में ही अंजना का मैडिकल परीक्षण कराया.

चूंकि यह काररवाई आईजी साहब के निर्देश पर की गई थी इसलिए एडीशनल एसपी ने की गई काररवाई की जानकारी आईजी राकेश गुप्ता को दे दी. पुलिस को अगली काररवाई पत्रकार जगदीश परमार के खिलाफ करनी थी.

चूंकि जगदीश परमार के जिले के अधिकांश अधिकारियों के साथ अच्छे संबंध थे, इसलिए आईजी राकेश गुप्ता ने उस की गिरफ्तारी के लिए एक विशेष टीम का गठन करने के बाद टीम को स्पष्ट निर्देश दे दिया था कि उस की गिरफ्तारी में कोई भी कोताही न बरती जाए.

विशेष टीम ने सेठीनगर में स्थित जगदीश परमार के घर दबिश दी, लेकिन शायद उसे इस बात की भनक लग चुकी थी, इसलिए वह पुलिस के पहुंचने से पहले ही भूमिगत हो चुका था. तब एसपी सचिन अतुलकर ने क्राइम ब्रांच के एडीशनल एसपी प्रमोद सोनकर व महिला थाने की प्रभारी रेखा वर्मा को उस की गिरफ्तारी की जिम्मेदारी सौंपी.

दोनों अधिकारियों ने जगदीश के छिपने के संभावित ठिकानों पर ताबड़तोड़ दबिशें डालीं. लेकिन उस का पता नहीं चल सका. लेकिन जगदीश को अपने साथियों की मदद से पुलिस काररवाई की सारी जानकारी मिल रही थी.

पत्रकारिता की ओट ले कर जगदीश परमार ने पिछले कुछ सालों में जिले के अनेक अधिकारियों के बीच अपनी जो पहचान बना रखी थी, उसे देखते हुए उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि पुलिस उस के खिलाफ ऐसी काररवाई भी कर सकती है.

पुलिस कारवाई को देखते हुए जगदीश समझ गया था कि अब उस का बच पाना मुश्किल है, इसलिए 2 दिन बाद ही उस ने खुद महिला थाने पहुंच कर आत्मसमर्पण कर दिया.

उसे गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने सब से पहले उस का मोबाइल फोन और लैपटाप बरामद कर लिया.

पुलिस ने उस से पूछताछ की तो पहले तो वह खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश करता रहा लेकिन बाद में उस ने अंजना के साथ अपने संबंध होना तो स्वीकार कर लिया, लेकिन उस ने ब्लैकमेलिंग और बलात्कार की बात से इनकार किया. उस का कहना था कि हम दोनों के बीच संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से बने थे.

अंजना ने उसे जो लाखों रुपए दिए थे, उस के सबूत वह पुलिस को सौंप चुकी थी. उन सबूतों के आधार पर पुलिस ने जब जगदीश से पूछताछ की तो वह इस आरोप को झुठला नहीं सका. वह पुलिस की कार्यप्रणाली से वाकिफ था.

वह जानता था कि पुलिस किसी न किसी तरह सच्चाई उगलवा ही लेती है. लिहाजा उस ने झूठ बोलने के बजाय सच्चाई पुलिस को बता दी. इस के बाद वाहन चोर से पत्रकार बने जगदीश परमार के ब्लैकमेलर बनने की कहानी इस प्रकार सामने आई—

जगदीश परमार मूलरूप से बड़नगर तहसील में खरसोद कला गांव का रहने वाला था. बचपन से ही वह शातिर और तिकड़मी था, जिस के कारण घर वाले इस से खासे परेशान रहते थे. उस का पढ़ाई में मन नहीं लगा था और गलत बच्चों की संगति में पड़ गया, जिस से वह फेल हो गया. तब उस के पिता ने उसे गुस्से में डांट कर घर से निकल जाने को कह दिया तो जगदीश सचमुच में घर छोड़ कर इंदौर भाग आया.

इंदौर के खजराना इलाके में वह पहुंचा तो उस की मुलाकात शाकिर नाम के युवक से हुई. शाकिर एक जानामाना वाहन चोर था, इसलिए जगदीश भी उस के साथ मिल कर वाहन चोरी करने लगा. इस मामले में वह पहली बार पंडरीनाथ पुलिस के हाथ लग गया.

पुलिस ने कानूनी काररवाई कर के उसे जेल भेज दिया. वह 3 महीने जेल में रहा. गैंग के लोगों ने ही उस की जमानत कराई. उसे लगा कि यह गलत काम उस के लिए ठीक नहीं है. तब वह अपने गांव पहुंच गया और घर जा कर अपने पिता से माफी मांगते हुए वह उन के कदमों में गिर गया.

पिता का दिल पिघल गया और उन्होंने उसे घर में पनाह दे दी. जगदीश को तिकड़म की कमाई खाने की आदत पड़ चुकी थी, इसलिए उस ने गांव में गैस सिलेंडर की कालाबाजारी करनी शुरू कर दी. लेकिन इतने से उस का मन नहीं भर रहा था. वह जल्द मोटी कमाई करने के चक्कर में था.

फिर कुछ दिनों बाद गांव के ही एक आदमी के साथ मिल कर वह सट्टा लगवाने का काम करने लगा. जिस के चलते जगदीश परमार का नाम पूरे इलाके में मशहूर हो गया. उस का यह धंधा भी बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया.

थाना भाटपचाला पुलिस को इस की जानकारी हुई तो तत्कालीन थानाप्रभारी धर्मेंद्र तोमर ने उसे गिरफ्तार कर के उस का पूरे गांव में जुलूस निकाला. इस से पूरे गांव में उस की बहुत बदनामी हुई.

जगदीश की जिंदगी में यह वह मोड़ था जब उसे लगा कि अपराध की दुनिया में जमे रहने के लिए पुलिस से संबंध बनाना जरूरी है. इस के लिए उस ने पत्रकारिता का रास्ता चुना.

जगदीश ने उज्जैन से प्रकाशित होने वाले एक छोटे से अखबार में संपर्क बना कर उस के लिए काम करना शुरू कर दिया. इस के बाद उस ने पुलिस अधिकारियों से दोस्ती की और उन के लिए मुखबिरी और दलाली करने लगा. फिर इन संबंधों की ओट में वह लोगों को ब्लैकमेल करने लगा.

बताया जाता है कि कुछ समय पहले जगदीश ने महिदपुर की एक महिला को भी ब्लैकमेल करने की कोशिश की थी. उस महिला की शिकायत पर उसे जेल भी जाना पड़ा था. इस के बाद जगदीश ने उज्जैन को अपना ठिकाना बनाया. यहां आ कर वह अफसरों की चाटुकारिता करने लगा.

बताते हैं कि वह पहले अफसरों को लाभ पहुंचा कर बाद में खुद उन से फायदा उठाने की नीति पर काम करता था इसलिए जल्द ही वह सभी विभागों में अधिकारियों का कृपापात्र बन गया.

उज्जैन आ कर उस ने एक लोकल न्यूज चैनल में बात की और वहां कैमरामैन बन गया. इस के साथ वह अफसरों के लिए दलाली कर अपना उल्लू सीधा करने लगा.

कहानी की दूसरी किरदार अंजना की कहानी भी काफी उतारचढ़ाव भरी है. पटेल नगर में रहने वाली अंजना की आंखें किशोरावस्था में ही मोहल्ले के रहने वाले संजय से लड़ गई थीं.

अति संपन्न किसान परिवार से संबंध रखने वाला संजय उतना ही स्मार्ट था जितनी कि खूबसूरत अंजना थी, इसलिए दोनों की दोस्ती परवान चढ़ी और प्यार में बदल गई.

अंजना उस समय बीकौम कर रही थी. बीकौम की डिग्री पूरी होते ही दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया. बाद में इन के 2 बच्चे हुए. अंजना की जिंदगी हंसीखुशी से बीत रही थी कि अचानक शराब ने उस के खुशहाल जीवन में जहर घोल दिया.

संजय को दोस्तों के साथ शराब पीने की ऐसी लत लगी कि वह दिनरात शराब के नशे में डूबा रहने लगा. अंजना ने उसे रोकने की कोशिश की तो संजय उस के साथ मारपीट करने लगा. अंजना के लिए यह बात किसी अजूबे से कम नहीं थी क्योंकि कभी उस के लिए जान देने की बातें करने वाला संजय उस पर हाथ जो उठाने लगा था. ऐसे में अंजना अपने पति को रास्ते पर लाने के प्रयास करने लगी.

जाहिर है कि उज्जैन में लोगों के संकट के समय सब से पहले महाकाल ही याद आते हैं, इसलिए अंजना नियमित रूप से महाकाल के दरबार में प्रार्थना करने के लिए जाने लगी. दुर्भाग्य से खबरों के जुगाड़ में जगदीश परमार अकसर इस मंदिर में मौजूद रहता था.

जगदीश ने 1-2 बार अंजना को मंदिर में भगवान के सामने आंसू बहाते देखा था. दूसरे अंजना के शरीर पर कीमती जेवर देख कर वह समझ गया कि पार्टी पैसे वाली होने के साथसाथ परेशान हालत में है. इसलिए आसानी से इसे जाल में फंसाया जा सकता है. यह बात 2 साल पहले की है.

इस के बाद जगदीश ने अंजना को फांसने के लिए उस के चारों तरफ जाल बुनना शुरू कर दिया. एक दिन मंदिर में काफी भीड़ थी, अपना प्रभाव जमाने के लिए जगदीश खुद अंजना के पास पहुंचा और बोला, ‘‘मैं देख रहा हूं कि आप बहुत परेशान हैं. आइए, मैं आप को दर्शन करवा देता हूं. आप शायद मुझे नहीं जानतीं लेकिन मैं ने अकसर आप को यहां आंसू बहाते देखा है. मैं एक पत्रकार हूं, इस वजह से आप को आसानी से दर्शन करवा सकता हूं. आप को परेशान देख कर शायद महाकाल ने ही मुझे आप की मदद के लिए भेज दिया है.’’

जगदीश की बातों से अंजना काफी प्रभावित हुई और उसी समय उस के साथ हो गई. तब जगदीश ने वीआईपी गेट से ले जा कर अंजना को महाकाल के दर्शन करवा दिए. इस के बाद जगदीश अंजना को अकसर मंदिर में मिलता और वीआईपी गेट से अंदर ले जा कर उसे दर्शन करा देता. इस से कुछ ही दिनों में दोनों के बीच दोस्ताना ताल्लुकात बन गए.

जब जगदीश को भरोसा हो गया कि लोहा चोट करने योग्य गरम हो चुका है तो उस ने एक दिन अंजना से पूछा, ‘‘अगर आप बुरा न मानें तो क्या मैं पूछ सकता हूं कि आप की परेशानी क्या है, जिस के लिए आप रोज महाकाल के दरबार में हाजिरी लगा रही हैं?’’

अब तक अंजना जगदीश को भला आदमी समझने लगी थी, इसलिए उस ने किशोरावस्था में हुए प्यार से ले कर अब तक की अपनी सारी कहानी उसे बता दी.

तब जगदीश बोला, ‘‘आप की समस्या सुन कर अब मुझे विश्वास हो गया कि सचमुच ही महाकाल ने आप की सहायता के लिए ही मुझे आप से मिलवाया है.’’

‘‘वो कैसे?’’ अंजना ने पूछा.

‘‘वो ऐसे कि मक्सी रोड पर एक नशा मुक्ति केंद्र है. वहां मेरी अच्छी पकड़ है. आप चिंता न करें, मैं वहां से आप के पति का नशा छुड़ाने का इलाज करवा दूंगा, जिस से वह बिलकुल ठीक हो जाएंगे.’’ जगदीश ने कहा.

‘‘अगर ऐसा है तो मैं आप का अहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगी.’’

‘‘अहसान भले ही अगले दिन भूल जाना, लेकिन हम दोनों की दोस्ती जिंदगी भर याद रखना. सच मानिए, मेरी जिंदगी में अब तक आप के जैसा कोई दोस्त नहीं आया, इसलिए मैं आप को खोना नहीं चाहता.’’ जगदीश परमार ने अंजना को अपनी गिरफ्त में ले भावुक हो कर कहा.

बात ही जगदीश ने ऐसी कही थी कि अंजना भी भावुक हो गई और उस ने जगदीश से जिंदगी भर यह दोस्ती निभाने का वादा कर लिया.

इस के अगले दिन वह अंजना को अपने साथ नशा मुक्ति केंद्र ले गया, जहां उस ने अपनी पत्रकारिता का प्रभाव दिखा कर अंजना को उस के पति का नशा छुड़ाने की दवा दिलवा दी.

अब तक अंजना जगदीश परमार पर आंख बंद कर के भरोसा करने लगी थी. जगदीश को इसी मौके का इंतजार था, इसलिए उस ने 2 जुलाई, 2016 को अंजना को अपने घर दवाई लेने बुलाया. अंजना बिना किसी संकोच के जगदीश के घर पहुंच गई जो उस की सब से बड़ी भूल साबित हुई.

जगदीश को अब अपनी हसरतें पूरी करनी थीं. उस ने अंजना को अपने घर में कैद करने के बाद डराधमका कर उस के साथ न केवल बलात्कार किया, इस की वीडियो भी बना ली और अंजना के निर्वस्त्र फोटो भी अपने मोबाइल फोन में कैद कर लिए.

इतना ही नहीं, इस बात का जिक्र किसी से करने पर उसे व उस के बच्चों को जान से मारने की धमकी भी दी. साथ ही यह भी कहा कि उस ने मुंह खोला तो उस के अश्लील फोटो और वीडियो पूरे उज्जैन में वायरल कर देगा.

अंजना को जगदीश से इतने बड़े धोखे की उम्मीद नहीं थी. वह जगदीश को उस के पाप की सजा दिलाना चाहती थी, लेकिन उस की धमकी से डर कर वह चुप रही.

अंजना को इस घटना का इतना सदमा लगा कि वह इस के बाद 15 दिन तक मंदिर भी नहीं गई. उस का सोचना था कि न वह मंदिर जाएगी और न उस धोखेबाज से उस की मुलाकात होगी.

लेकिन जगदीश का काम अभी पूरा कहां हुआ था. वह अंजना का तन तो लूट चुका था, धन लूटना तो अभी बाकी था इसलिए कुछ दिनों बाद उस ने अंजना को फोन कर अकेले में मिलने के लिए बुलाया. इतना ही नहीं, उस ने साथ में बड़ी रकम भी लाने को कहा.

अंजना ने मना किया तो जगदीश ने उसे अश्लील वीडियो और फोटो वायरल करने की धमकी दी. जिस से न चाहते हुए भी उसे उस के द्वारा मांगी गई रकम ले कर उस से मिलने के लिए जाना पड़ा. उस से पैसे लेने के बाद जगदीश ने एक बार फिर अंजना के साथ बलात्कार किया.

अंजना ने पुलिस को बताया कि पिछले 22 महीनों में जगदीश ने कई बार उस का यौनशोषण किया. उस ने यह भी बताया कि अब तक वह उसे 10 लाख रुपए और अपने जेवर भी दे चुकी है. अब घर से पैसे दे पाना संभव नहीं था, लेकिन वह उस के तन से तो खिलवाड़ कर ही रहा था साथ में लगातार ब्लैकमेल भी कर रहा था.

अंजना ने बताया कि उस ने जगदीश को सारी स्थिति बता दी थी कि अब किसी स्थिति में वह उसे और पैसे नहीं दे सकती, लेकिन जगदीश के मन में इतना जहर भरा था कि वह हर हाल में उस से पैसे चाहता था.

इसी दौरान अंजना को पता चला कि जगदीश उस की तरह और भी कई लड़कियों का शारीरिक ही नहीं बल्कि आर्थिक शोषण कर रहा है, तब उस ने उस के खिलाफ कानून की मदद लेने का फैसला किया. और फिर इस के अलावा उस के पास कोई रास्ता नहीं बचा था. इसलिए वह शिकायत ले कर आईजी राकेश गुप्ता के पास पहुंची थी.

इस संबंध में जांच अधिकारी रेखा वर्मा का कहना है कि तथाकथित पत्रकार जगदीश परमार के खिलाफ पुख्ता सबूत इकट्ठे हो गए हैं. उस का मोबाइल और लैपटाप भी बरामद कर के जांच के लिए भेज दिया गया है.

जगदीश परमार से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे न्यायालय में पेश कर के पुलिस ने उसे न्यायिक हिरासत में पहुंचा दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित और कथा में अंजना नाम परिवर्तित है.

कास्टिंग काउच जबरदस्ती नहीं होता : मेघना कौशिक

25 वर्षीय अभिनेत्री मेघना कौशिक बचपन से ही अभिनय की इच्छा रखती थीं. वे दिल्ली की रहने वाली हैं. स्कूल-कौलेज में थिएटर और डिबेट में भाग लेना उनका शौक रहा. इसे बढ़ावा दिया मेघना की मां मृदुला कौशिक ने. फिल्म ‘नीरजा’ और ‘डोर’ में काम करने के बाद उन्होंने वैब सीरीज ‘लव लस्ट ऐंड कन्फ्यूजन’ में काम किया है. साथ ही, वे एक और थ्रिलर वैब सीरीज और फिल्म में काम कर रही हैं. स्वभाव से नम्र और हंसमुख मेघना को यहां तक पहुंचने में काफी संघर्ष करना पड़ा. वे अपने मकसद पर हमेशा टिकी रहीं, तभी कामयाबी मिली.

अभिनय से पहले मेघना एक पत्रकार और मौडल रह चुकी हैं. पत्रकारिता में उनका मन नहीं लगा तो उन्होंने मुंबई आकर बौलीवुड में काम करने की ठान ली. शुरुआत में अभिनय से संबंधित जो भी काम मिला उसे मन लगा कर करती गईं. चाहे वह टीवी कमर्शियल हो या एंकरिंग, हर क्षेत्र में दिल लगा कर काम किया. इससे उन की आर्थिक स्थिति ठीक-ठाक चलती रही. उन्हें ‘नीरजा’ फिल्म में एयर होस्टेज संजना की भूमिका निभाने का मौका मिला.

अपने संघर्ष के दिनों के बारे में पूछे जाने पर मेघना बताती हैं, ‘‘मुंबई में मैं किसी को जानती नहीं थी और हर तरह का काम नहीं करना चाहती थी. ऐसे में छोटेछोटे जो भी काम मेरे अभिनय या एंकरिंग से जुड़े मेरे पास आते गए, मैं करती गई, ताकि घर खर्च चलता रहे. इससे मेरा लोगों से मिलना हुआ, मेरी पहचान बनी, जो मेरे लिए फायदेमंद साबित हुई. एक-दो साल में मैंने काफी संघर्ष किया. हर प्रोडक्शन हाउस में मैंने अपनी तस्वीरें भेजीं और औडिशन भी देती रही, क्योंकि मैंने यहां इंडस्ट्री में देखा है कि काम मिलने के लिए आपको कहीं न कहीं परदे पर दिखते रहना चाहिए. यही वजह है कि आज मैं कई वैब सीरीज में काम कर रही हूं.’’वैब सीरीज में काम कर के मेघना बहुत खुश हैं. वे कहती हैं, ‘‘आज बड़े-बड़े ऐक्टर व ऐक्ट्रैस वैब सीरीज में काम कर रहे हैं. फिल्मों से अधिक इसमें काम करने में मजा आता है, क्योंकि यह कम समय पर तैयार हो जाता है और दर्शकों की प्रतिक्रिया भी जल्दी ही पता लग जाती है. इसमें निर्माता-निर्देशक अपनी बात ठीक से कह पाते हैं.’’

संघर्ष के दौरान मेघना को कास्टिंग काउच का सामना नहीं करना पड़ा, क्योंकि वे पेशे से पत्रकार रह चुकी हैं. उनका कहना है, ‘‘जब आप किसी से मिलने जाते हैं, तो सामने वाला भी समझता है कि आपका मकसद क्या है? अगर आपने उसे सही तरह से बता दिया तो वह आगे कुछ नहीं कहता. यहां कोई काम जबरदस्ती नहीं होता.’’

मेघना की आमिर खान के साथ फिल्म करने की इच्छा है, क्योंकि वे उनके काम से काफी प्रभावित हैं. अभिनय के क्षेत्र में अंतरंग दृश्य करने में मेघना सहज नहीं, लेकिन अगर करना पड़े तो वे उसे समझ कर ही करना चाहेंगी. यों ही किसी फिल्म या सीरीज में वे इंटिमेट सींस नहीं करना चाहतीं. मेघना आरामदायक फैशन पसंद करती हैं और जरूरत पड़े तो स्टाइलिस्ट के पास जाती हैं. वे फूडी हैं और हर तरह का खाना पसंद करती हैं. बिरयानी उन्हें खास पसंद है.

यहां तक पहुंचने में वे अपने माता-पिता का सहयोग बताती हैं जिन्होंने उन पर विश्वास किया और इतनी दूर मुंबई आ कर काम करने की आजादी दी. उनके पिता दूसरे क्षेत्र में काम करते हैं, पर आज वे मेघना को सफलता के लिए बधाई देते हैं.नए कलाकारों को मेघना संदेश देना चाहती हैं कि यहां लुक्स से अधिक प्रतिभा का होना जरूरी है, ताकि आप आगे बढ़ सकें. आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच और धीरज की यहां बहुत जरूरत होती है. याद रखें, शौर्टकट में यहां कुछ नहीं होता.

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