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Hindi Story : ऐश्वर्या नहीं चाहिए मुझे – जब वृद्धावस्था में पिताजी को आई अक्ल

Hindi Story : ‘‘उम्र उम्र की बात होती है. जवानी में जो अच्छा लगता है बुढ़ापे में अकसर अच्छा नहीं लगता. इसी को तो कहते हैं जेनरेशन गैप यानी पीढ़ी का अंतर. जब मांबाप बच्चे थे तब वे अपने मांबाप को दकियानूसी कहते थे. अब जब खुद मांबाप बन गए हैं तो दकियानूसी नहीं हैं. अब बच्चे उद्दंड और मुंहजोर हैं. मतलब चित भी मांबाप की और पट भी उन्हीं की. किस्सा यहां समाप्त होता है कि मांबाप सदा ही ठीक थे, वे चाहे आप हों चाहे हम.’’

राघव चाचा मुसकराते हुए कह रहे थे और मम्मीपापा कभी मेरा और कभी चाचा का मुंह देख रहे थे. राघव चाचा शुरू से मस्तमलंग किस्म के इनसान रहे हैं. मैं अकसर सोचा करता था और आज भी सोचता हूं, क्या चाचा का कभी किसी से झगड़ा नहीं होता? चिरपरिचित मुसकान चेहरे पर और नजर ऐसी मानो आरपार सब पढ़ ले.

‘‘इनसान इस संसार को और अपने रिश्तों को सदा अपने ही फीते से नापता है और यहीं पर वह भूल कर जाता है कि उस का फीता जरूरत के अनुसार छोटाबड़ा होता रहता है. अपनी बच्ची का रिश्ता हो रहा हो तो दहेज संबंधी सभी कानून उसे याद होंगे और अपनी बच्ची संसार की सब से सुंदर लड़की भी होगी क्योंकि वह आप की बच्ची है न.’’

‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, राघव,’’ पिताजी बोले, ‘‘साफसाफ बात करो न.’’

‘‘साफसाफ ही तो कर रहा हूं. सोमू के रिश्ते के लिए कुछ दिन पहले एक पतिपत्नी आप के घर आए थे…’’

पिताजी ने राघव चाचा की बात बीच में काटते हुए कहा था, ‘‘आजकल सोमू के रिश्ते को ले कर कोई न कोई घर आता ही रहता है. खासकर तब से जब से मैं ने अखबार में विज्ञापन दिया है.’’

‘‘मैं अखबार की बात नहीं कर रहा हूं,’’ राघव चाचा बोले, ‘‘अखबार के जरिए जो रिश्ते आते हैं वे हमारी जानपहचान के नहीं होते. आप ने उन से क्या कहा क्या नहीं, बात बनी, नहीं बनी, किसे पता. दूर से कोई आया, आप से मिला, आप की सुनी, उसे जंची, नहीं जंची, वह चला गया, किसे पता किसे कौन नहीं जंचा. किस ने क्या कहा, किस ने क्या सुना…’’

चाचा के शब्दों पर मैं तनिक चौंक गया. मैं पापा के साथ ही उन के कामकाज मेें हाथ बटाता हूं. आजकल बड़े जोरशोर से मेरे लिए लड़की ढूंढ़ी जा रही है. घर में भी और दफ्तर में भी. कौन किस नजर से आता है, देखतासुनता है वास्तव में मुझे भी पता नहीं होता.

‘‘याद है न जब मानसी के लिए लड़का ढूंढ़ा जा रहा था तब आप की गरदन कैसी झुकी होती थी. उस का रंग सांवला है, उसी पर आप उठतेबैठते चिंता जाहिर करते थे. मैं तब भी आप को यही समझाता था कि रंग गोराकाला होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. पूरा का पूरा अस्तित्व गरिमामय हो, उचित पहनावा हो, शालीनता हो तो कोई भी लड़की सुंदर होती है. गोरी चमड़ी का आप क्या करेंगे, जरा मुझे समझाइए. यदि लड़की में संस्कार ही न हुए तो गोरे रंग से ही क्या आप का पेट भर जाएगा? आप का सम्मान ही न करे, जो हवा में तितली की तरह उड़ती फिरे, जो जमीन से कोसों दूर हो, क्या वैसी लड़की चाहिए आप को?

‘‘अच्छा, एक बात और, आप मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं न, जहां दिन चढ़ते ही जरूरतों से भिड़ना पड़ता है. भाभी सारा दिन रसोई में खटती हैं और जिस दिन काम वाली न आए, उन्हें बरतन भी साफ करने पड़ते हैं. यह सोमू भी एक औसत दर्जे का लड़का है, जो पूरी तरह आप के हाथ के नीचे काम करता है. इस की अपनी कोई पहचान नहीं बनी है. आप हाथ खींच लें तो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से कमा सकेगा. आप का बुढ़ापा तभी सुखमय होगा जब संस्कारी बहू आ कर आप से जुड़ जाएगी. कहिए, मैं सच कह रहा हूं कि नहीं?’’

राघव चाचा ने एक बार पूछा तो मम्मीपापा आंखें फाड़फाड़ कर उन का चेहरा देख रहे थे. सच ही तो कह रहे थे चाचा. मेरी अपनी अभी कोई पहचान है कहां. वकालत पढ़ने के बाद पापा की ही तो सहायता कर रहा हूं मैं.

‘‘मेरे एक मित्र की भतीजी है जो मुझे बड़ी प्यारी लगती है. काफी समय से उन के घर मेरा आनाजाना है. वह मुझे अपनीअपनी सी लगती है. सोचा, मेरे ही घर में क्यों न आ जाए. मुझे सोमू के लिए वह लड़की उचित लगी. उस के मांबाप आप का घरद्वार देखने आए थे. मेरे साथ वे नहीं आना चाहते थे, क्योंकि अपने तरीके से वे सब कुछ देखना चाहते थे.’’

‘‘कौन थे वे और कहां से आए थे?’’

‘‘आप ने क्या कहा था उन्हें? आप को तो सुंदर लड़की चाहिए जो ‘ऐश्वर्या राय तो मैं नहीं कहता हो पर उस के आसपास तो हो,’ यही कहा था न आप ने?’’

मैं चाचा की बात सुन कर अवाक् रह गया था. क्या पापा ने उन से ऐसा कहा था? ठगे से पापा जवाब में चुप थे. इस का मतलब चाचा जो कह रहे थे सच है.

‘‘क्या आप अमिताभ बच्चन हैं और आप का बेटा अभिषेक, जिस की लंबाई 5 फुट 7 इंच’ है. आप एक आम इनसान हैं और हम और? क्या आप को ऐश्वर्या राय चाहिए? अपने घर में? क्या ऐश्वर्या राय को संभालने की हिम्मत है आप के बेटे में?… इनसान उतना ही मुंह खोले जितना पचा सके और जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारे.’’

‘‘बस करो, राघव,’’ मां तिलमिला कर बोलीं, ‘‘क्या बकबक किए जा रहे हो.’’

‘‘बुरा लग रहा है न सुन कर? मुझे भी लगा था. मुझे सुन कर शर्म आ गई जब उन्होंने मुझ से हाथ जोड़ कर माफी मांग ली. भैया को शर्म नहीं आई अपनी भावी बहू के बारे में विचार व्यक्त करते हुए…भैया, आप किसी राह चलती लड़की पर फबती कसें तो मैं मान लूंगा क्योंकि मैं जानता हूं कि आप कैसे चरित्र के मालिक हैं. पराई लड़कियां आप की नजर में सदा ही पराई रही हैं, जिन पर आप कोई भी फिकरा कस लेते हैं, लेकिन अपनी बहू ढूंढ़ने वाला एक सम्मानजनक ससुर क्या इस तरह की बात करता है, जरा सोचिए. आप तब अपनी बहू के बारे में बात कर रहे थे या किसी फिल्म की हीरोइन के बारे में?’’

पापा ने तब कुछ नहीं कहा. माथे पर ढेर सारे बल समेटे कभी इधर देखते कभी उधर. गलत नहीं कह रहे हैं चाचा. मेरे पापा जब भी किसी की लड़की के बारे में बात करते हैं, तब उन का तरीका सम्मानजनक नहीं होता. इस उम्र में भी वे लड़कियों को पटाखा, फुलझड़ी और न जाने क्याक्या कहते हैं. मुझे अच्छा नहीं लगता पर क्या कर सकता हूं. मां को भी उन का ऐसा व्यवहार पसंद नहीं है.

‘‘अब आप बड़े हो गए हैं भैया. अपना चरित्र जरा सा बदलिए. छिछोरापन आप को नहीं जंचता. हमें स्वप्न सुंदरी नहीं, गृहलक्ष्मी चाहिए, जो हमारे घर में रचबस जाए और लड़की वालों को इतना सस्ता भी न आंको कि उन्हें आप कहीं भी फेंक देंगे. लड़की वाले भी देखते हैं कि कहां उन की बेटी की इज्जत हो पाएगी, कहां नहीं. जिस घर में ससुर ही ऐसी भाषा बोलेगा वहां बाकी सब कैसा बोलते होंगे यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.’’

‘‘कौन थे वे लोग? और कहां से आए थे?’’ मां ने प्रश्न किया.

‘‘वे जहां से भी आए हों पर उन्होंने साफसाफ कह दिया है कि राघवजी, आप के भाई का परिवार बेहद सुंदर है और इतने सुंदर परिवार में हमारी लड़की कहीं भी फिट नहीं बैठ पाएगी. वह एक सामान्य रंगरूप की लड़की है जो हर कार्य और गुण में दक्ष है, लेकिन ऐश्वर्या जैसी किसी भी कोण से नहीं लगती.’’

चाचा उठ खड़े हुए. उड़ती सी नजर मुझ पर डाली, मानो मुझ से कोई राय लेना चाहते हों. क्या वास्तव में मुझे भी कोई रूपसी ही चाहिए, जिस के नखरे भी मैं शायद नहीं उठा पाऊंगा. राह चलते जो रूप की चांदी यहांवहां बिखराती रहे और मैं असुरक्षा के भाव से ही घिरा रहूं. मैं ही कहां का देवपुरुष हूं, जिसे कोई अप्सरा चाहिए. चाचा सच ही कह रहे हैं कि पापा को ऐसा नहीं कहना चाहिए था. मैं ने एकाध बार पापा को समझाया भी था तो उन्होंने मुझे बुरी तरह डांट दिया था, ‘बाप को समझा रहा है. बड़ा मुंहजोर है तू.’

मुझे याद है एक बार मानसी की एक सहेली घर आई थी. पापा ने उसे देख कर मुझ से ही पूछा था :

‘‘सोमू, यह पटाखा कौन है? इस की फिगर बड़ी अच्छी है. तुम्हारी कोई सहेली है क्या?’’

तब पहली बार मुझे बुरा लगा था. वह मानसी की सहेली थी. अगर मानसी किसी के घर जाए और उस घर के लोग उस के शरीर की बनावट को तोलें तो यह जान कर मुझे कैसा लगेगा? यहां तो मेरा बाप ही ऐसी अशोभनीय हरकत कर रहा था.

मेरे मन में एक दंश सा चुभने लगा. कल को मेरे पिता मेरी पत्नी की क्या इज्जत करेंगे? ये तो शायद उस की भी फिगर ही तोलते रहेंगे. मेरी पत्नी में इन्हें ऐश्वर्या जैसा रूप क्यों चाहिए? मैं ने तो इस बारे में कभी सोचा ही नहीं कि मेरी पत्नी कैसी होगी. मेरी बहन  का रंग सांवला है, शायद इसीलिए मुझे सांवली लड़कियां बहुत अच्छी लगती हैं.

मैंने चाचा की तरफ देखा. उन की नजरें बहुत पारखी हैं. उन्होंने जिसे मेरे लिए पसंद किया होगा वह वास्तव में अति सुंदर होगी, इतनी सुंदर कि उस से हमारा घर रोशन हो जाए. मुझे लगा कि पिता की आदत पर अब रोक नहीं लगाऊंगा तो कब लगाऊंगा. मैं ने चाचा को समझाया कि वे उन से दोबारा बात करें.

‘‘सोमू, वह अब नहीं हो पाएगा.’’

चाचा का उत्तर मुझे निरुत्तर कर गया.

‘‘अपने पिता की आदत पर अंकुश लगाओ,’’ चाचा बोले, ‘‘उम्रदराज इनसान को शालीनता से परहेज नहीं होना चाहिए. खूबसूरती की तारीफ करनी चाहिए. मगर गरिमा के साथ. एक बड़ा आदमी सुंदर लड़की को ‘प्यारी सी बच्ची’ भी तो कह सकता है न. ‘पटाखा’ या ‘फुलझड़ी’ कहना अशोभनीय लगता है.’’

चाचा तो चले गए मगर मेरी आंखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा. ऐसा लगने लगा कि मेरा पूरा भविष्य ही अंधकार में डूब जाएगा, अगर कहीं पापा और मेरी पत्नी का रिश्ता सुखद न हुआ तो? पापा का अपमान भी मुझ से सहा नहीं जाएगा और पत्नी की गरिमा की जिम्मेदारी भी मुझ पर ही होगी. तब क्या करूंगा मैं जब पापा की जबान पर अंकुश न हुआ तो?

मां ने तो शायद यह सब सुनने की आदत बना ली है. मेरी पत्नी पापा की आदत पचा पाए, न पचा पाए कौन जाने. अभी पत्नी आई नहीं थी लेकिन उस के आने के बाद की कल्पना से ही मैं डरने लगा था.

सहसा एक दिन कुछ ऐसा हो गया जिस से हमारा सारा परिवार ही हिल गया. हमारी कालोनी से सटा एक मौल है जहां पापा एक दिन सिनेमा देखने चले गए. अकेले गए थे इसलिए हम में से किसी को भी पता नहीं था कि कहां गए हैं. शाम के 5 बजे थे. पापा खून से लथपथ घर आए. उन की सफेद कमीज खून से सनी थी. एक लड़की उन्हें संभाले उन के साथ थी. पता चला कि आदमकद शीशा उन्हें नजर ही नहीं आया था और वे उस से जा टकराए थे. नाक का मांस फट गया था जिस वजह से इतना खून बहा था. पापा को बिस्तर पर लिटा कर मां उन की देखभाल में जुट गईं और मैं उस लड़की के साथ बाहर चला आया.

‘‘ये दवाइयां इन्हें खिलाते रहें. टिटनैस का इंजेक्शन मैं ने लगवा दिया है,’’ इतना कहने के बाद उस लड़की ने अपना पर्स खोल कर दवाइयां निकालीं.

‘‘दरअसल इन का ध्यान कहीं और था. ये दूसरी ओर देख रहे थे. लगता है सुंदर चेहरे अंकल को बहुत आकर्षित करते हैं.’’

जबान जम गई थी मेरी. उस ने नजरें उठा कर मुझे देखा और बताने लगी, ‘‘माफ कीजिएगा, मैं भी उन चेहरों के साथ ही थी. जब ये टकराए तब वे चेहरे तो खिलखिला कर अंदर थिएटर में चले गए लेकिन मैं जा नहीं पाई. मेरी पिक्चर छूट गई, इस की चिंता नहीं. मेरे पिताजी की उम्र का व्यक्ति खून से सना हुआ छटपटा रहा है, यह मुझ से देखा नहीं गया.’’

दवाइयों का पुलिंदा और ढेर सारी हिदायतें मुझे दे कर वह सांवली सी लड़की चली गई. अवाक् छोड़ गई मुझे. मेरे पिता पर उस ने कितने पैसे खर्च दिए पूछने का अवसर ही नहीं दिया उस ने.

नाक की चोट थी. पूरी रात हम जागते रहे. सुबह पापा के कराहने से हमारी तंद्रा टूटी. आंखों के आसपास उभर आई सूजन की वजह से उन की आंखें खुली हैं या बंद, यह हमें पता नहीं चल रहा था.

‘‘वह बच्ची कहां गई. बेचारी कहांकहां भटकी मेरे साथ,’’ पापा का स्वर कमजोर था मगर साफ था, ‘‘बड़ी प्यारी बच्ची थी. वह कहां है?’’

पापा का स्वर पहले जैसा नहीं लगा मुझे. उस साधारण सी लड़की को वह बारबार ‘प्यारी बच्ची’ कह रहे थे. बदलेबदले से लगे मुझे पापा. यह चोट शायद उन्हें सच के दर्शन करा गई थी. सुंदर चेहरे उन पर हंस कर चले गए और साधारण चेहरा उन्हें संभाल कर घर छोड़ गया था. एक कमजोर सी आशा जागी मेरे मन में. हो सकता है अब पापा भी मेरी ही तरह कहने लगें, ‘साधारण सी लड़की चाहिए, ऐश्वर्या नहीं चाहिए मुझे.’

Hindi Story : अंतिम मुस्कान – प्राची क्यों शादी के लिए आनाकानी करने लगी?

Hindi Story : ‘‘एकबार, बस एक बार हां कर दो प्राची. कुछ ही घंटों की तो बात है. फिर सब वैसे का वैसा हो जाएगा. मैं वादा करती हूं कि यह सब करने से तुम्हें कोई मानसिक या शारीरिक क्षति नहीं पहुंचेगी.’’

शुभ की बातें प्राची के कानों तक तो पहुंच रही थीं परंतु शायद दिल तक नहीं पहुंच पा रही थीं या वह उन्हें अपने दिल से लगाना ही नहीं चाह रही थी, क्योंकि उसे लग रहा था कि उस में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह अपनी जिंदगी के नाटक का इतना अहम किरदार निभा सके.

‘‘नहीं शुभ, यह सब मुझ से नहीं होगा. सौरी, मैं तुम्हें निराश नहीं करना चाहती थी परंतु मैं मजबूर हूं.’’

‘‘एक बार, बस एक बार, जरा दिव्य की हालत के बारे में तो सोचो. तुम्हारा यह कदम उस के थोड़े बचे जीवन में कुछ खुशियां ले आएगा.’’

प्राची ने शुभ की बात को सुनीअनसुनी करने का दिखावा तो किया पर उस का मन दिव्य के बारे में ही सोच रहा था. उस ने सोचा, रातदिन दिव्य की हालत के बारे में ही तो सोचती रहती हूं. भला उस को मैं कैसे भूल सकती हूं? पर यह सब मुझ से नहीं होगा.

मैं अपनी भावनाओं से अब और खिलवाड़ नहीं कर सकती. प्राची को चुप देख कर शुभ निराश मन से वहां से चली गई और प्राची फिर से यादों की गहरी धुंध में खो गई.

वह दिव्य से पहली बार एक मौल में मिली थी जब वे दोनों एक लिफ्ट में अकेले थे और लिफ्ट अटक गई थी. प्राची को छोटी व बंद जगह में फसने से घबराहट होने की प्रौब्लम थी और वह लिफ्ट के रुकते ही जोरजोर से चीखने लगी थी. तब दिव्य उस की यह हालत देख कर घबरा गया था और उसे संभालने में लग गया था.

खैर लिफ्ट ने तो कुछ देर बाद काम करना शुरू कर दिया था परंतु इस घटना ने दिव्य और प्राची को प्यार के बंधन में बांध दिया था. इस मुलाकात के बाद बातचीत और मिलनेजुलने का सिलसिला चल निकला और कुछ ही दिनों बाद दोनों साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे थे. प्राची अकसर दिव्य के घर भी आतीजाती रहती थी और दिव्य के मातापिता और उस की बहन शुभ से भी उस की अच्छी पटती थी.

इसी बीच मौका पा कर एक दिन दिव्य ने अपने मन की बात सब को कह दी, ‘‘मैं प्राची के साथ शादी करना चाहता हूं,’’ किसी ने भी दिव्य की इस बात का विरोध नहीं किया था.

सब कुछ अच्छा चल रहा था कि एक दिन अचानक उन की खुशियों को ग्रहण लग गया.

‘‘मां, आज भी मेरे पेट में भयंकर दर्द हो रहा है. लगता है अब डाक्टर के पास जाना ही पड़ेगा.’’ दिव्य ने कहा और वह डाक्टर के पास जाने के लिए निकल पड़ा.

काफी इलाज के बाद भी जब पेट दर्द का यह सिलसिला एकदो महीने तक लगातार चलता रहा तो कुछ लक्षणों और फिर जांचपड़ताल के आधार पर एक दिन डाक्टर ने कह ही दिया, ‘‘आई एम सौरी. इन्हें आमाशय का कैंसर है और वह भी अंतिम स्टेज का. अब इन के पास बहुत कम वक्त बचा है. ज्यादा से ज्यादा 6 महीने,’’ डाक्टर के इस ऐलान के साथ ही प्राची और दिव्य के प्रेम का अंकुर फलनेफूलने से पहले ही बिखरता दिखाई देने लगा.

आंसुओं की अविरल धारा और खामोशी, जब भी दोनों मिलते तो यही मंजर होता.

‘‘सब खत्म हो गया प्राची, अब तुम्हें मुझ से मिलने नहीं आना चाहिए.’’ एक दिन दिव्य ने प्राची को कह दिया.

‘‘नहीं दिव्य, यदि वह आना चाहती है, तो उसे आने दो,’’ शुभ ने उसे टोकते हुए कहा. ‘‘जितना जीवन बचा है, उसे तो जी लो वरना जीते जी मर जाओगे तुम. मैं चाहती हूं इन 6 महीनों में तुम वह सब करो जो तुम करना चाहते थे. जानते हो ऐसा करने से तुम्हें हर पल मौत का डर नहीं सताएगा.’’

‘‘हो सके तो इस दुख की घड़ी में भी तुम स्वयं को इतना खुशमिजाज और व्यस्त कर लो कि मौत भी तुम तक आने से पहले एक बार धोखा खा जाए कि मैं कहीं गलत जगह तो नहीं आ गई. जब तक जिंदगी है भरपूर जी लो. हम सब तुम्हारे साथ हैं. हम वादा करते हैं कि हम सब भी तुम्हें तुम्हारी बीमारी की गंभीरता का एहसास तक नहीं होने देंगे.’’

बहन के इस ऐलान के बाद उन के घर का वातावरण आश्चर्यजनक रूप से बदल

गया. मातम का स्थान खुशी ने ले लिया था. वे सब मिल कर छोटी से छोटी खुशी को भी शानदार तरीके से मनाते थे, वह चाहे किसी का जन्मदिन हो, शादी की सालगिरह हो या फिर कोई त्योहार. घर में सदा धूमधाम रहती थी.

एक दिन शुभ ने अपनी मां से कहा, ‘‘मां, आप की इच्छा थी कि आप दिव्य की शादी धूमधाम से करो. दिव्य आप का इकलौता बेटा है. मुझे लगता है कि आप को अपनी यह इच्छा पूरी कर लेनी चाहिए.’’

मां उसे बीच में ही रोकते हुए बोलीं, ‘‘देख शुभ बाकी सब जो तू कर रही है, वह तो ठीक है पर शादी? नहीं, ऐसी अवस्था में दिव्य की शादी करना असंभव तो है ही, अनुचित भी है. फिर ऐसी अवस्था में कौन करेगा उस से शादी? दिव्य भी ऐसा नहीं करना चाहेगा. फिर धूमधाम से शादी करने के लिए पैसों की भी जरूरत होगी. कहां से आएंगे इतने पैसे? सारा पैसा तो दिव्य के इलाज में ही खर्च हो गया.’’

‘‘मां, मैं ने कईर् बार दिव्य और प्राची को शादी के सपने संजोते देखा है. मैं नहीं चाहती भाई यह तमन्ना लिए ही दुनिया से चला जाए. मैं उसे शादी के लिए मना लूंगी. फिर यह शादी कौन सी असली शादी होगी, यह तो सिर्फ खुशियां मनाने का बहाना मात्र है. बस आप इस के लिए तैयार हो जाइए.

‘‘मैं कल ही प्राची के घर जाती हूं. मुझे लगता है वह भी मान जाएगी. हमारे पास ज्यादा समय नहीं है. अंतिम क्षण कभी भी आ सकता है. रही पैसों की बात, उन का इंतजाम भी हो जाएगा. मैं सभी रिश्तेदारों और मित्रों की मदद से पैसा जुटा लूंगी,’’ कह कर शुभ ने प्राची को फोन किया कि वह उस से मिलना चाहती है.

और आज जब प्राची ने शुभ के सामने यह प्रस्ताव रखा तो प्राची के जवाब ने शुभ को निराश ही किया था परंतु शुभ ने निराश होना नहीं सीखा था.

‘‘मैं दिव्य की शादी धूमधाम से करवाऊंगी और वह सारी खुशियां मनाऊंगी जो एक बहन अपने भाई की शादी में मनाती है. इस के लिए मुझे चाहे कुछ भी करना पड़े.’’ शुभ अपने इरादे पर अडिग थी.

घर आते ही दिव्य ने शुभ से पूछा, ‘‘क्या हुआ, प्राची मान गई क्या?’’

‘‘हां मान गई. क्यों नहीं मानेगी? वह तुम से प्रेम करती है,’’ शुभ की बात सुन कर दिव्य के चेहरे पर एक अनोखी चमक आ गई जो शुभ के इरादे को और मजबूत कर गई.

शुभ ने दिव्य की शादी के आयोजन की इच्छा और इस के लिए आर्थिक मदद की जरूरत की सूचना सभी सोशल साइट्स पर पोस्ट कर दी और इस पोस्ट का यह असर हुआ कि जल्द ही उस के पास शादी की तैयारियों के लिए पैसा जमा हो गया.

घर में शादी की तैयारियां धूमधाम से शुरू हो गईं. दुलहन के लिए कपड़ों और गहनों का

चुनाव, मेहमानों की खानेपीने की व्यवस्था, घर की साजसजावट सब ठीक उसी प्रकार होने लगा जैसा शादी वाले घर में होना चाहिए.

शादी का दिन नजदीक आ रहा था. घर में सभी खुश थे, बस एक शुभ ही चिंता में डूबी हुई थी कि दुलहन कहां से आएगी? उस ने सब से झूठ ही कह दिया था कि प्राची और उस के घर वाले इस नाटकीय विवाह के लिए राजी हैं पर अब क्या होगा यह सोचसोच कर शुभ बहुत परेशान थी.

‘‘मैं एक बार फिर प्राची से रिक्वैस्ट करती हूं. शायद वह मान जाए.’’ सोच कर शुभ फिर प्राची के घर पहुंची.

‘‘बेटी हम तुम्हारे मनोभावों को बहुत अच्छी तरह समझते हैं और हम तुम्हें पूरा सहयोग देने के लिए तैयार हैं पर प्राची को मनाना हमारे बस की बात नहीं. हमें लगता है कि दिव्य के अंतिम क्षणों में, उसे मौत के मुंह में जाते हुए पर मुसकराते हुए वह नहीं देख पाएगी, शायद इसीलिए वह तैयार नहीं है. वह बहुत संवेदनशील है,’’ प्राची की मां ने शुभ को समझाते हुए कहा.

‘‘पर दिव्य? उस का क्या दोष है, जो प्रकृति ने उसे इतनी बड़ी सजा दी है? यदि वह इतना सहन कर सकता है तो क्या प्राची थोड़ा भी नहीं?’’ शुभ बिफर पड़ी.

‘‘नहीं, तुम गलत सोच रही हो. प्राची का दर्द भी दिव्य से कम नहीं है. वह भी बहुत सहन कर रही है. दिव्य तो यह संसार छोड़ कर चला जाएगा और उस के साथसाथ उस के दुख भी. परंतु प्राची को तो इस दुख के साथ सारी उम्र जीना है. उस की हालत तो दिव्य से भी ज्यादा दयनीय है. ऐसी स्थिति में हम उस पर ज्यादा दबाव नहीं डाल सकते.

‘‘फिर हमें समाज का भी खयाल रखना है. शादी और उस के तुरंत बाद ही दिव्य की मृत्यु. वैधव्य की छाप भी तो लग जाएगी प्राची पर. किसकिस को समझाएंगे कि यह एक नाटक था. यह इतना आसान नहीं है जितना तुम समझ रही हो?’’ प्राची की मां ने शुभ को समझाने की कोशिश की.

उस दिन पहली बार शुभ को दिव्य से भी ज्यादा प्राची पर तरस आया लेकिन यह उस की समस्या का समाधान नहीं था. तभी उस के तेज दिमाग ने एक हल निकाल ही लिया.

वह बोली, ‘‘आंटी जी, बीमारी की वजह से इन दिनों दिव्य को कम दिखाई देने लगा है. ऐसे में हम प्राची की जगह उस से मिलतीजुलती किसी अन्य लड़की को भी दुलहन बना सकते हैं. दिव्य को यह एहसास भी नहीं होगा कि दुलहन प्राची नहीं, बल्कि कोई और है. यदि आप की नजर में ऐसी कोई लड़की हो तो बताइए.’’

‘‘हां है, प्राची की एक सहेली ईशा बिलकुल प्राची जैसी दिखती है. वह अकसर नाटकों में भी भाग लेती रहती है. पैसों की खातिर वह इस काम के लिए तैयार भी हो जाएगी. पर ध्यान रहे शादी की रस्में पूरी नहीं अदा की जानी चाहिए वरना उसे भी आपत्ति हो सकती है.’’

‘‘आप बेफिक्र रहिए आंटी जी, सब वैसा ही होगा जैसा फिल्मों में होता है, केवल दिखावा. क्योंकि हम भी नहीं चाहते हैं कि ऐसा हो और दिव्य भी ऐसी हालत में नहीं है कि वह सभी रस्में निभाने के लिए अधिक समय तक पंडाल में बैठ भी सके.’’

शादी का दिन आ पहुंचा. विवाह की सभी रस्में घर के पास ही एक गार्डन में होनी थीं. दिव्य दूल्हा बन कर तैयार था और अपनी दुलहन का इंतजार कर रहा था कि अचानक एक गाड़ी वहां आ कर रुकी. गाड़ी में से प्राची का परिवार और दुलहन का वेश धारण किए गए लड़की उतरी.

हंसीखुशी शादी की सारी रस्में निभाई जाने लगीं. दिव्य बहुत खुश नजर आ रहा था. उसे देख कर कोई यह नहीं कह सकता था कि यह कुछ ही दिनों का मेहमान है. यही तो शुभ चाहती थी.

‘‘अब दूल्हादुलहन फेरे लेंगे और फिर दूल्हा दुलहन की मांग भरेगा.’’ जब पंडित ने कहा तो शुभ और प्राची के मातापिता चौकन्ने हो गए. वे समझ गए कि अब वह समय आ गया है जब लड़की को यहां से ले जाना चाहिए वरना अनर्थ हो सकता है और वे बोले, ‘‘पंडित जी, दुलहन का जी घबरा रहा है. पहले वह थोड़ी देर आराम कर ले फिर रस्में निभा ली जाएं तो ज्यादा अच्छा रहेगा.’’ कह कर उन्होंने दुलहन जोकि छोटा सा घूंघट ओढ़े हुए थी, को अंदर चलने का इशारा किया.

‘‘नहीं पंडित जी, मेरी तबीयत इतनी भी खराब नहीं कि रस्में न निभाई जा सकें.’’ दुलहन ने घूंघट उठाते हुए कहा तो शुभ के साथसाथ प्राची के मातापिता भी चौक उठे क्योंकि दुलहन कोई और नहीं प्राची ही थी.

शायद जब ईशा को प्राची की जगह दुलहन बनाने का फैसला पता चला होगा तभी प्राची ने उस की जगह स्वयं दुलहन बनने का निर्णय लिया होगा, क्योंकि चाहे नाटक में ही, दिव्य की दुलहन बनने का अधिकार वह किसी और को दे, उस के दिल को मंजूर नहीं होगा.

आज उस की आंखों में आंसू नहीं, बल्कि उस के होंठों पर मुसकान थी. अपना सारा दर्द समेट कर वह दिव्य की क्षणिक खुशियों की भागीदारिणी बन गई थी. उसे देख कर शुभ की आंखों से खुशी और दुख के मिश्रित आंसू बह निकले. उस ने आगे बढ़ कर प्राची को गले से लगा लिया.

यह देख कर दिव्य के चेहरे पर एक अनोखी मुसकान आ गई. ऐसी मुसकान पहले किसी ने उस के चेहरे पर नहीं देखी थी. परंतु शायद वह उस की आखिरी मुसकान थी, क्योंकि उस का कमजोर शरीर इतना श्रम और खुशी नहीं झेल पाया और वह वहीं मंडप में ही बेहोश हो गया.

दिव्य को तुरंत हौस्पिटल ले जाना पड़ा जहां उसे तुरंत आईसीयू में भेज दिया गया. कुछ ही दिनों बाद दिव्य नहीं रहा परंतु जाते समय उस के होंठों पर मुसकान थी.

प्राची का यह अप्रत्याशित निर्णय दिव्य और उस के परिवार वालों के लिए वरदान से कम नहीं  था. वे शायद जिंदगी भर उस के इस एहसान को चुका न पाएं. प्राची के भावी जीवन को संवारना अब उन की भी जिम्मेदारी थी.

Hindi Story : सही समय पर

Hindi Story : कमलेश के साथ मैं ने विवाहित जिंदगी के 30 साल गुजारे थे, लेकिन कैंसर ने उसे हम से छीन लिया. सिर्फ एक रिश्ते को खो कर मैं बेहद अकेला और खाली सा हो गया था.

ऊब और अकेलेपन से बचने को मैं वक्तबेवक्त पार्क में घूमने चला जाता. मन की पीड़ा को भुलाने के लिए कोई कदम उठाना, उस से छुटकारा पा लेने के बराबर नहीं होता है.

आजकल किसी के पास दूसरे के सुखदुख को बांटने के लिए समय ही कहां है. हर कोई अपनी जिंदगी की समस्याओं में पूरी तरह उलझा हुआ है. मेरे दोनों बेटे और बहुएं भी इस के अपवाद नहीं हैं. मैं अपने घर में खामोश सा रह कर दिन गुजार रहा था.

कमलेश से बिछड़े 2 साल बीत चुके थे. एक शाम पापा के दोस्त आलोकजी मुझे हार्ट स्पैशलिस्ट डाक्टर नवीन के क्लीनिक में मिले. उन की विधवा बेटी सरिता उन के साथ थी.

बातोंबातों में मालूम पड़ा कि आलोकजी को एक दिल का दौरा 4 महीने पहले पड़ चुका था. उन की बूढ़ी, बीमार आंखों में मुझे जिंदगी खो जाने का भय साफ नजर आया था.

उन्हें और उन की बेटी सरिता को मैं ने उस दिन अपनी कार से घर तक छोड़ा. तिवारीजी ने अपनी जिंदगी के दुखड़े सुना कर अपना मन हलका करने के लिए मुझे चाय पिलाने के बहाने रोक लिया था.

कुछ देर उन्होंने मेरे हालचाल पूछे और फिर अपने दिल की पीड़ा मुझ से बयान करने लगे, ‘‘मेरा बेटा अमेरिका में अपनी पत्नी व बच्चों के साथ ऐश कर रहा है. वह मेरी मौत की खबर सुन कर भी आएगा कि नहीं मुझे नहीं पता. तुम ही बताओ कि सरिता को मैं किस के भरोसे छोड़ कर दुनिया से विदा लूं?

‘‘शादी के साल भर बाद ही इस का पति सड़क दुर्घटना में मारा गया था. मेरे खुदगर्ज बेटे को जरा भी चिंता नहीं है कि उस की बहन पिछले 24 साल से विधवा हो कर घर में बैठी है. उस ने कभी दिलचस्पी…’’

तभी सरिता चायनाश्ते की ट्रे ले कर कमरे में आई और अपने पापा को टोक दिया, ‘‘पापा, भैया के रूखेपन और मेरी जिंदगी की कहानी सुना कर मनोज को बोर मत करो. मैं टीचर हूं और अपनी देखभाल खुद बहुत अच्छी तरह से कर सकती हूं.’’

चाय पीते हुए मैं ने उस से सवाल पूछ लिया था, ‘‘सरिता, तुम ने दोबारा शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘मेरे जीवन में जीवनसाथी का सुख लिखा होता तो मैं विधवा ही क्यों होती,’’ उस ने लापरवाही से जवाब दिया.

‘‘यह तो कोई दलील नहीं हुई. जिंदगी में कोई हादसा हो जाता है तो इस का मतलब यह नहीं कि फिर जिंदगी को आगे बढ़ने का मौका ही न दिया जाए.’’

‘‘तो फिर यों समझ लो कि पापा की देखभाल की चिंता ने मुझे शादी करने के बारे में सोचने ही नहीं दिया. अब किसी और विषय पर बात करें?’’

उस की इच्छा का सम्मान करते हुए मैं ने बातचीत का विषय बदल दिया था.

मैं उन के यहां करीब 2 घंटे रुका. सरिता बहुत हंसमुख थी. उस के साथ गपशप करते हुए समय के बीतने का एहसास ही नहीं हुआ था.

सरिता से मुलाकात होने के बाद मेरी जिंदगी उदासी व नीरसता के कोहरे से बाहर निकल आई थी. मैं हर दूसरेतीसरे दिन उस के घर पहुंच जाता. हमारे बीच दोस्ती का रिश्ता दिन पर दिन मजबूत होता गया था.

कुछ हफ्ते बाद आलोकजी की बाईपास सर्जरी हुई पर वे बेचारे ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहे. हमारी पहली मुलाकात के करीब 6 महीने बाद उन्होंने जब अस्पताल में दम तोड़ दिया तब मैं भी सरिता के साथ उन के पास खड़ा था.

‘‘मनोज, सरिता का ध्यान रखना. हो सके तो इस की दूसरी शादी करवा देना,’’ मुझ से अपने दिल की इस इच्छा को व्यक्त करते हुए उन की आवाज में जो गहन पीड़ा व बेबसी के भाव थे उन्हें मैं कभी नहीं भूल सकूंगा.

आलोकजी के देहांत के बाद भी मैं सरिता से मिलने नियमित रूप से जाता रहा. हम दोनों ही चाय पीने के शौकीन थे, इसलिए उस से मिलने का सब से अच्छा बहाना साथसाथ चाय पीने का था.

मेरी जिंदगी अच्छी तरह से आगे बढ़ रही थी कि एक दिन मेरे दोनों बेटे गंभीर मुद्रा बनाए मेरे कमरे में मुझ से मिलने आए थे.

‘‘पापा, आप कुछ दिनों के लिए चाचाजी के यहां रह आओ. जगह बदल जाने से आप का मन बहल जाएगा,’’ बेचैन राजेश ने बातचीत शुरू की.

‘‘मुझे तंग होने को उस छोटे से शहर में नहीं जाना है. वहां न बिजली है न पानी. अगर मन किया तो तुम्हारे चाचा के घर कभी सर्दियों में जाऊंगा,’’ मैं ने अपनी राय उन्हें बता दी.

राजेश ने कुछ देर की खामोशी के बाद आगे कहा, ‘‘कोई भी इंसान अकेलेपन व उदासी का शिकार हो गलत फैसले कर सकता है. पापा, हमें उम्मीद है कि आप कभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे जो समाज में हमें गरदन नीचे कर के चलने पर मजबूर कर दे.’’

‘‘क्या मतलब हुआ तुम्हारी इस बेसिरपैर की बात का? तुम ढकेछिपे अंदाज में मुझ से क्या कहना चाह रहे हो?’’ मैं ने माथे में बल डाल लिए.

रवि ने मेरा हाथ पकड़ कर भावुक लहजे में कहा, ‘‘हम मां की जगह किसी दूसरी औरत को इस घर में देखना कभी स्वीकार नहीं कर पाएंगे, पापा.’’

‘‘पर मेरे मन में दूसरी शादी करने का कोई विचार नहीं है फिर तुम इस विषय को क्यों उठा रहे हो?’’ मैं नाराज हो उठा था.

‘‘वह चालाक औरत आप की परेशान मानसिक स्थिति का फायदा उठा कर आप को गुमराह कर सकती है.’’

‘‘तुम किस चालाक औरत की बात कर रहे हो?’’

‘‘सरिता आंटी की.’’

‘‘पर वह मुझ से शादी करने की बिलकुल इच्छुक नहीं है.’’

‘‘और आप?’’ राजेश ने तीखे लहजे में सवाल किया.

‘‘वह इस समय मेरी सब से अच्छी दोस्त है. मेरी जिंदगी की एकरसता को मिटाने में उस ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है,’’ मैं ने धीमी आवाज में उन्हें सच बता दिया.

‘‘पापा, आप खुद समझदार हैं और हमें विश्वास है कि हमारे दिल को दुखी करने वाला कोई गलत कदम आप कभी नहीं उठाएंगे,’’ राजेश की आंखों में एकाएक आंसू छलकते देख मैं ने आगे कुछ कहने के बजाय खामोश रहना ही उचित समझा था.

अगली मुलाकात होने पर जब मैं ने सरिता को अपने बेटों से हुई बातचीत की जानकारी दी तो वह हंस कर बोली थी, ‘‘मनोज, तुम मेरी तरह मस्त रहने की आदत डाल लो. मैं ने देखा है कि जो भी अच्छा या बुरा इंसान की जिंदगी में घटना होता है, वह अपने सही समय पर घट ही जाता है.’’

‘‘तुम्हारी यह बात मेरी समझ में ढंग से आई नहीं है, सरिता. तुम कहना क्या चाह रही हो?’’ मेरे इस सवाल का जवाब सरिता ने शब्दों से नहीं बल्कि रहस्यपूर्ण अंदाज में मुसकरा कर दिया था.

सप्ताह भर बाद मैं शाम को पार्क में बैठा था तब तेज बारिश शुरू हो गई. बारिश करीब डेढ़ घंटे बाद रुकी और मैं पूरे समय एक पेड़ के नीचे खड़ा भीगता रहा था.

रात होने तक शरीर तेज बुखार से तपने लगा और खांसीजुकाम भी शुरू हो गया. 3 दिन में तबीयत काफी बिगड़ गई तो राजेश और रवि मुझे डाक्टर को दिखाने ले गए.

उन्होंने चैकअप कर के बताया कि मुझे निमोनिया हो गया है और उन की सलाह पर मुझे अस्पताल में भरती होना पड़ा.

तब तक दोनों बहुएं औफिस जा चुकी थीं. राजेश और रवि दोनों गंभीर मुद्रा में यह फैसला करने की कोशिश कर रहे थे कि मेरे पास कौन रुके. दोनों को ही औफिस जाना जरूरी लग रहा था.

तब मैं ने बिना सोचविचार में पड़े सरिता को फोन कर अस्पताल में आने के लिए बड़े हक से कह दिया था.

सरिता को बुला लेना मेरे दोनों बेटों को अच्छा तो नहीं लगा पर मैं ने साफ नोट किया कि उन की आंखों में राहत के भाव उभरे थे. अब वे दोनों ही बेफिक्र हो कर औफिस जा सकते थे.

कुछ देर बाद सरिता उन दोनों के सामने ही अस्पताल आ पहुंची और आते ही उस ने मुझे डांटना शुरू कर दिया, ‘‘क्या जरूरत थी बारिश में इतना ज्यादा भीगने की? क्या किसी रोमांटिक फिल्म के हीरो की तरह बारिश में गाना गा रहे थे.’’

‘‘तुम्हें तो पता है कि मैं ट्रेजडी किंग हूं, रोमांटिक फिल्म का हीरो नहीं,’’ मैं ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘तुम्हारे पापा से बातों में कोई नहीं जीत सकता,’’ कहते हुए वह राजेश और रवि की तरफ देख कर बड़े अपनेपन से मुसकराई और फिर कमरे में बिखरे सामान को ठीक करने लगी.

‘‘बिलकुल यही डायलाग कमलेश हजारों बार अपनी जिंदगी में मुझ से बोली होगी,’’ मेरी आंखों में अचानक ही आंसू भर आए थे.

तब सरिता भावुक हो कर बोली, ‘‘यह मत समझना कि दीदी नहीं हैं तो तुम अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ कर सकते हो. समझ लो कि कमलेश दीदी ने तुम्हारी देखभाल की जिम्मेदारी मुझे सौंपी है.’’

‘‘तुम तो उस से कभी मिली ही नहीं, फिर यह जिम्मेदारी तुम्हें वह कब सौंप गई?’’

‘‘वे मेरे सपने में आई थीं और अब अपने बेटों के सामने मुझ से डांट नहीं खाना चाहते तो ज्यादा न बोल कर आराम करो,’’ उस की डांट सुन कर मैं ने किसी छोटे बच्चे की तरह अपने होंठों पर उंगली रखी तो राजेश और रवि भी मुसकरा उठे थे.

मेरे बेटे कुछ देर बाद अपनेअपने औफिस चले गए थे. शाम को दोनों बहुएं मुझ से मिलने औफिस से सीधी अस्पताल आई थीं. सरिता ने फोन कर के उन्हें बता दिया था कि मेरे लिए घर से कुछ लाने की जरूरत नहीं है क्योंकि मेरे लिए खाना तो वही बना कर ले आएगी.

मैं 4 दिन अस्पताल में रहा था. इस दौरान सरिता ने छुट्टी ले कर मेरी देखभाल करने की पूरी जिम्मेदारी अकेले उठाई थी. मेरे बेटेबहुओं को 1 दिन के लिए भी औफिस से छुट्टी नहीं लेनी पड़ी थी. सरिता और उन चारों के बीच संबंध सुधरने का शायद यही सब से अहम कारण था.

अस्पताल छोड़ने से पहले मैं ने सरिता से अचानक ही संजीदा लहजे में पूछा था, ‘‘क्या हमें अब शादी नहीं कर लेनी चाहिए?’’

‘‘अभी ऐसा क्या खास घटा है जो यह विचार तुम्हारे मन में पैदा हुआ है?’’ उस ने अपनी आंखों में शरारत भर कर पूछा.

‘‘तुम ने मेरी देखभाल वैसे ही की है जैसे एक पत्नी पति की करती है. दूसरे, मेरे बेटेबहुएं तुम से अब खुल कर हंसनेबोलने लगे हैं. मेरी समझ से यह अच्छा मौका है उन्हें जल्दी से ये बता देना चाहिए कि हम शादी करना चाहते हैं.’’

सरिता ने आंखों में खुशी भर कर कहा, ‘‘अभी तो तुम्हारे बेटेबहुओं के साथ मेरे दोस्ताना संबंधों की शुरुआत ही हुई है, मनोज. इस का फायदा उठा कर मैं पहले तुम्हारे घर आनाजाना शुरू करना चाहती हूं.’’

‘‘हम शादी करने की अपनी इच्छा उन्हें कब बताएंगे?’’

‘‘इस मामले में धैर्य रखना सीखो, मेरे अच्छे दोस्त,’’ उस ने पास आ कर मेरा हाथ प्यार से पकड़ लिया, ‘‘कल तक वे सब मुझे नापसंद करते थे, पर आज मेरे साथ ढंग से बोल रहे हैं. कल को हमारे संबंध और सुधरे तो शायद वे स्वयं ही हम दोनों पर शादी करने को दबाव डालेंगे.’’

‘‘क्या ऐसा कभी होगा भी?’’ मेरी आवाज में अविश्वास के भाव साफ झलक रहे थे.

‘‘जो होना होता है सही समय आ जाने पर वह घट कर रहता है,’’ उस ने मेरा हाथ होंठों तक ला कर चूम लिया था.

‘‘पर मेरा दिल…’’ मैं बोलतेबोलते झटके से चुप हो गया.

‘‘हांहां, अपने दिल की बात बेहिचक बोलो.’’

‘‘मेरा दिल तुम्हें जीभर कर प्यार करने को करता है,’’ अपने दिल की बात बता कर मैं खुद ही शरमा गया था.

पहले खिलखिला कर वह हंसी और फिर शरमाती हुई बोली, ‘‘मेरे रोमियो, अपनी शादी के मामले में हम बच्चों को साथ ले कर चलेंगे. जल्दबाजी में हमें ऐसा कुछ नहीं करना है जिस से उन का दिल दुखे. मेरी समझ से चलोगे तो ज्यादा देर नहीं है जब वे चारों ही मुझे अपनी नई मां का दर्जा देने को खुशीखुशी तैयार हो जाएंगे.’’

‘‘तुम सचमुच बहुत समझदार हो, सरिता,’’ मैं ने दिल से उस की तारीफ की.

‘‘थैंक यू,’’ उस ने आगे झुक कर मेरे होंठों को पहली बार प्यार से चूमा तो मेरे रोमरोम में खुशी की लहर दौड़ गई थी…

सही समय की शुरुआत हो चुकी थी.

Hindi Story: लिस्ट – क्या सच में रिया का कोई पुरुष मित्र था?

Hindi Story : संडे के दिन लंच के बाद मैं सारे काम निबटा कर डायरी उठा कर बैठ गई. मेहमानों की लिस्ट भी तो बनानी थी. 20 दिन बाद हमारे विवाह की 25वीं सालगिरह थी. एक बढि़या पार्टी की तैयारी थी.

आलोक भी पास आ कर बैठ गए. बोले, ‘‘रिया, बच्चों को भी बुला लो. एकसाथ बैठ कर देख लेते हैं किसकिस को बुलाना है.’’

मैं ने अपने युवा बच्चों सिद्धि और शुभम को आवाज दी, ‘‘आ जाओ बच्चो, गैस्ट लिस्ट बनानी है.’’

दोनों फौरन आ गए. कोई और काम होता तो इतनी फुरती देखने को न मिलती. दोनों कुछ ज्यादा ही उत्साहित थे. अपने दोस्तों को जो बुलाना था. डीजे होगा, डांस करना है सब को. एक अच्छे होटल में डिनर का प्लान था.

मैं ने पैन उठाते हुए कहा, ‘‘आलोक, चलो आप से शुरू करते हैं.’’

‘‘ठीक है, लिखो. औफिस का बता देता हूं. सोसायटी के हमारे दोस्त तो कौमन ही हैं,’’ उन्होंने बोलना शुरू किया, ‘‘रमेश, नवीन, अनिल, विकास, कार्तिक, अंजलि, देविका, रंजना.’’

आखिर के नाम पर मैं ने आलोक को देखा तो उन्होंने बड़े स्टाइल से कहा, ‘‘अरे, ये भी तो हैं औफिस में…’’

‘‘मैं ने कुछ कहा?’’ मैं ने कहा.

‘‘देखा तो घूर कर.’’

‘‘यह रंजना मुझे कभी पसंद नहीं आई.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘तुम जानते हो, उस का इतना मटकमटक कर बा करना, हर पार्टी में तुम सब कुलीग्स के गले में हाथ डालडाल कर बातें करना बहुत बुरा लगता है. ऐसी उच्छृंखल महिलाएं मुझे कभी अच्छी नहीं लग सकतीं.’’

‘‘रिया, ऐसी छोटीछोटी बातें मत सोचा करो. आजकल जमाना बदल गया है. स्त्रीपुरुष की दोस्ती में ऐसी छोटीछोटी बातों पर कोई ध्यान नहीं देता… अपनी सोच का दायरा बढ़ाओ.’’

मैं चुप रही. क्या कहती. आलोक के प्रवचन सुन कर कुछ कटु शब्द कह कर फैमिली टाइम खराब नहीं करना चाहती थी. अत: चुप ही रही.  फिर मैं ने शुभम से कहा, ‘‘अब तुम लिखवाओ अपने दोस्तों के नाम.’’

शुभम शुरू हो गया, ‘‘रचना, शिवानी, नव्या, अंजलि, टीना, विवेक, रजत, सौरभ…’’

मैं बीच में ही हंस पड़ी, ‘‘लड़कियां कुछ ज्यादा नहीं हैं लिस्ट में?’’

‘‘हां मौम, खूब दोस्त हैं मेरी,’’ कह वह और भी नाम बताता रहा और मैं लिखती रही.

‘‘यह हमारी शादी की सालगिरह है या तुम लोगों का गैट टु गैदर,’’ मैं ने कहा.

‘‘अरे मौम, सब वेट कर रहे हैं पार्टी का… नव्या और रचना तो डांस की प्रैक्टिस भी करने लगी हैं… दोनों सोलो परफौर्मैंस देंगी.’’

सिद्धि ने कहा, ‘‘चलो मौम, अब मेरे दोस्तों के नाम लिखो- आशु, अभिजीत, उत्तरा, भारती, शिखर, पार्थ, टोनी, राधिका.’’

उस ने भी कई नाम लिखवाए और मैं लिखती रही. शुभम ने उसे छेड़ा, ‘‘देखो मौम, इस की लिस्ट में भी कई लड़के हैं न?’’

सिद्धि ने कहा, ‘‘चुप रहो, आजकल सब दोस्त होते हैं. हम लोग पार्टी का टाइम पूरी तरह ऐंजौय करने वाले हैं… आप देखना मौम आशु कितना अच्छा डांसर है.’’ इसी बीच आलोक को औफिस की 2 और लड़कियों के नाम याद आ गए. मैं ने वे भी लिख लिए.

‘‘हमारे दोस्तों की लिस्ट तो बन गई मौम. लाओ, मुझे डायरी और पैन दो मैं आप की फ्रैंड्स के नाम लिखूंगी,’’ सिद्धि बोली.

‘‘अरे, तुम्हारी मम्मी की लिस्ट तो मैं ही बता देता हूं,’’ मैं कुछ कहती उस से पहले ही आलोक बोल उठे तो मैं मुसकरा दी.

आलोक बताने लगे, ‘‘नीरा, मंजू, नीलम, विनीता, सुमन, नेहा… कुछ और भी होंगी किट्टी पार्टी की सदस्याएं… हैं न?’’  तब मैं ने 4-5 नाम और बताए. फिर अचानक कहा, ‘‘बस एक नाम और लिख लो, शरद.’’

‘‘यह कौन है?’’ तीनों चौंक उठे.

‘‘मेरा दोस्त है.’’

‘‘क्या? कभी नाम नहीं सुना… कौन है? इसी सोसायटी में रहता है?’’

तीनों के चेहरों के भाव देखने लायक थे.

आलोक ने कहा, ‘‘कभी तुम ने बताया नहीं. मुझे समझ नहीं आ रहा कौन है?’’

‘‘बताने को तो कुछ खास नहीं है. ऐसे ही कुछ दोस्ती है… मेरा मन कर रहा है कि मैं उसे भी सपरिवार इस पार्टी में बुला लूं. इसी सोसायटी में रहता है. 1 छोटी सी बेटी है. कई बार उसे सपरिवार घर बुलाने की सोची पर बुला नहीं पाई. अब पार्टी है तो मौका भी है… तुम लोगों को अच्छा लगेगा उस से मिल कर. अच्छा लड़का है.’’  तीनों को तो जैसे सांप सूंघ गया. माहौल एकदम  बदल गया. एकदम हैरत भरा, गंभीर माहौल.

आलोक के मुंह से फिर यही निकला, ‘‘तुम ने कभी बताया नहीं.’’

‘‘क्या बताना था… इतनी बड़ी बात नहीं थी.’’

‘‘कहां मिला तुम्हें यह?’’

‘‘लाइब्रेरी में मिल जाता है कभीकभी. मेरी तरह ही पढ़नेलिखने का शौकीन है… वहीं थोड़ी जानपहचान हो गई.’’

‘‘उस की पत्नी से मिली हो?’’

‘‘बस उसे देखा ही है. बात तो कभी नहीं हुई. अब सपरिवार बुलाऊंगी तो मिलना हो जाएगा.’’

शुभम ने कहा, ‘‘मौम, कुछ अजीब सा लग रहा है सुन कर.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘पता नहीं मौम, आप के मुंह से किसी मेल फ्रैंड की बात अजीब सी लग रही है.’’

सिद्धि ने भी कहा, ‘‘मौम, मुझे भी आप से यह उम्मीद तो कभी नहीं रही.’’

‘‘कैसी उम्मीद?’’

‘‘यही कि आप किसी लड़के से दोस्ती करेंगी.’’

‘‘क्यों, इस में इतनी नई क्या बात है? जमाना बदल गया है न. स्त्रीपुरुष की मित्रता तो सामान्य सी बात है न. मैं तो थोड़ी देर पहले आप लोगों के विचार सुन कर खुश हो रही थी कि मेरा परिवार इतनी आधुनिक सोच रखता है, तो मेरे भी दोस्त से मिल कर खुश होगा.’’

अभी तक तीनों के चेहरे देखने लायक थे. तीनों को जैसे कोई झटका लगा था.  आलोक ने अचानक कहा, ‘‘अभी थोड़ा लेटने का मन हो रहा है. बच्चो, तुम लोग भी अपना काम कर लो. बाकी तैयारी की बातें बाद में करते हैं.’’  बच्चे मुंह लटकाए हुए चुपचाप अपने  रूम में चले गए. आलोक ने लेट कर आंखों पर हाथ रख लिया. मैं वहीं बैठेबैठे शरद के बारे में सोचने लगी…  साल भर पहले लाइब्रेरी में मिला था. वहीं थोड़ीबहुत कुछ पुस्तकों पर, पत्रिकाओं पर बात होतेहोते कुछ जानपहचान हो गई थी. वह एक स्कूल में हिंदी का टीचर है. उस की पत्नी भी टीचर है और बेटी तो अभी तीसरी क्लास में  ही है. उस का सीधासरल स्वभाव देख कर ही उस से बात करने की इच्छा होती है मेरी. कहीं कोई अमर्यादित आचरण नहीं. बस, वहीं खड़ेखड़े कुछ साहित्यिक बातें, कुछ लेखकों का जिक्र, बस यों ही आतेजाते थोड़ीबहुत बातें… मुझे तो उस का घर का पता या फोन नंबर भी नहीं पता… उसे बुलाने के लिए मुझे लाइब्रेरी के ही चक्कर काटने पड़ेंगे.

खैर, वह तो बाद की बात है. अभी तो मैं अपने परिवार की स्त्रीपुरुष मित्रता पर आधुनिक सोच के डबल स्टैंडर्ड पर हैरान हूं. शरद का नाम सुन कर ही घर का माहौल बदल गया. मैं कुछ हैरान थी. मैं तो कितनी सहजता से तीनों के दोस्तों की लिस्ट बना रही थी. मेरी लिस्ट में एक लड़के का नाम आते ही सब का मूड खराब हो गया. पहले तो मुझे थोड़ी देर तक बहुत गुस्सा आता रहा, फिर अचानक मेरा दिल कुछ और सोचने लगा.

इन तीनों को मेरे मुंह से एक पुरुष मित्र का नाम सुन कर अच्छा नहीं लगा… ऐसा क्यों हुआ? वह इसलिए ही न कि तीनों मुझे ले कर पजैसिव हैं तीनों बेहद प्यार करते हैं मुझ से, जैसेजैसे मैं इस दिशा में सोचती गई मेरा मन हलका होता गया. कुछ ही पलों में डबल स्टैंडर्ड के साथसाथ मुझे इस बात में भी बहुत सा स्नेह, प्यार, सुरक्षा, अधिकार की भावना महसूस होने लगी. फिर मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं रही. मुझे कुछ हुत अच्छा लगा.  अचानक फिर तीनों के साथ बैठने का मन हुआ तो मैं ने जोर से  आवाज दी, ‘‘अरे, आ जाओ सब. मैं तो मजाक कर रही थी. मैं तो तुम लोगों को चिढ़ा रही थी.’’

आलोक ने फौरन अपनी आंखों से हाथ हटाया, ‘‘सच? झूठ क्यों बोला?’’

बच्चे फौरन हाजिर हो गए, ‘‘मौम, झूठ  क्यों बोला?’’

‘‘अरे, तुम लोग इतनी मस्ती, मजाक करते रहते हो, तो क्या मैं नहीं तुम्हें चिढ़ा सकती?’’

सिद्धि ने फरमाया, ‘‘फिर भी मौम, ऐसे मजाक भी न किया करें… बहुत अजीब लगा था.’’

शुभम ने भी हां में हां मिलाई, ‘‘हां मौम, मुझे भी बुरा लगा था.’’

आलोक मुसकराते हुए उठ कर बैठ चुके थे, ‘‘तुम ने तो परेशान कर दिया था सब को.’’

अब फिर वही पार्टी की बातें थीं और  मैं मन ही मन अपने सच्चेझूठे मजाक पर मुसकराते हुए बाकी तैयारी की लिस्ट में व्यस्त हो गई. लेकिन मन के एक कोने में शरद की याद और ज्यादा पुख्ता हो गई. उसे तो किसी दिन बुलाना ही होगा. मैरिज ऐनिवर्सरी पर नहीं तो किसी और दिन.

Hindi Story: बाढ़ – जब अनीता ने फंसाया अपने सीधे-सादे पति अमित को!

Hindi Story, लेखिका- नमिता दुबे

अनिता बचपन से मनमौजी, महत्त्वाकांक्षी और बिंदास थी. दोस्तों के साथ घूमना, पार्टी करना और उपहार लेनादेना उसे बहुत पसंद था. बहुतकुछ करना चाहती थी, किंतु वह अपने लक्ष्य पर कभी केंद्रित न हो सकी. बमुश्किल वह एमबीए कर सकी थी, तब उस के मातापिता अच्छे दामाद की खोज मे लग गए.

उस समय अनिता मानसिकतौर पर शादी के लिए तैयार नहीं थी. अपनी लाड़ली की मंशा से अनजान पिता जब सीधेसादे अमित से मिले तो उन्हें मुराद पूरी होती दिखी.

अमित डाक्टर था. वह प्रैक्टिस करने के साथ ही एमएस की तैयारी कर रहा था. अमित के पिता की 7 वर्षों पहले एक दुर्घटना में मौत हो गई थी. अमित का बड़ा भाई अमेरिका मे डाक्टर था, वह विदेशी लड़की से शादी कर वहीं बस गया था. घर में सिर्फ मां थी जो बहुत ही शालीन महिला थी और गांव के घर में रहती थी. इस विश्वास के साथ कि उस घर में उन की लाड़ली सुकून से रह सकती है, उन्होंने अमित से अनिता की शादी तय कर दी. अमित पहले तो शादी के लिए तैयार ही नहीं था किंतु अनीता के पापा में अपने पापा की छवि की अनुभूति ने उसे राजी कर लिया.

डाक्टर अमित को जीवन के थपेड़ों ने बचपन में ही बड़ा बना दिया था. पिता की मृत्यु के बाद मां को संभालते हुए डाक्टरी की पढ़ाई करना आसान न था. अमित आधुनिकता से दूर, अपने काम से काम रखने वाला अंतर्मुखी लड़का था. उस की दुनिया सिर्फ मां तक ही सीमित थी.

शादी के बाद अमित पत्नी अनिता को ले कर भोपाल आ बसा. उस ने अनिता को असीम प्यार और विश्वास से सराबोर कर दिया. अल्हड़ अनिता आधुनिकता के रंग में रंगी अतिमहत्त्वाकांक्षी लड़की थी. वह खुद भी नहीं जानती थी कि वह चाहती क्या है? अनिता अपने पिता के इस निर्णय से कभी खुश नहीं हुई, किंतु परिवार के दबाव में आ कर उसे अमित के साथ शादी के लिए हां कहना पड़ा.

अमित अपनी एमएस की तैयारी में लगे होने से अनिता को ज्यादा समय नहीं दे पा रहा था. वह उस की भावनाओं का सम्मान तो करता था लेकिन वक्त की नज़ाकत को देख उस ने अनिता को समझाया कि, बस, 2 वर्षों की बात है, उस का एमएस पूरा हो जाए, फिर उस के पास समय की कमी नहीं होगी. तब दोनों जीवन का भरपूर आनंद लेंगे.

क्लब, दोस्तों और पार्टियों मे समय बिताने वाली अनिता को अमित के साथ चल रही नीरस ज़िंदगी रास नहीं आ रही थी. अमित का पूरा फोकस पढ़ाई पर था. वह चाहता था अनिता भी आगे पढ़े. उस ने उसे प्रोत्साहित भी किया. उस की हर इच्छा पूरी करता, उस के सारे नखरे उठाता था क्योंकि कहीं न कहीं उसे समय न दे पाने की मजबूरी उसे परेशान करती थी.

अमित की भावनाओं से बेखबर अनिता बहुत मनमौजी होती जा रही थी. वह कई रातें अपनी दोस्तों के साथ होस्टल मे बिताने लगी. उसे पता ही नहीं चला वह कब गलत संगत मे फंस चुकी थी. उस की सहेलियां अमित को ले कर ताने भी मारतीं. अब उसे भी अमित से नफरत होने लगी थी. इस के लिए अब वह अपने मांपिता को जिम्मेदार समझने लगी. जितना अमित उस के प्यार को समेटने की कोशिश करता, उतनी ही उस में नफरत की आग भड़क उठती.

अमित की परीक्षा नजदीक आ गई थी. इधर अनीता का व्यवहार पल में तोला पल में माशा होता. कभी तो वह अमित को मोहब्बत के सुनहरे सब्जबाग दिखाती, कभी सीधे मुंह बात भी न करती.

एक दिन अमित की नाइट ड्यूटी थी. तब अनिता ने अपनी दोस्त सारिका को अपने घर बुला लिया. दोनों ने दिनभर पिक्चर देखी और खूब गपें मारीं. रात में बहुतरात तक लैपटौप पर पिक्चर देखती रहीं. सुबह जब अमित हौस्पिटल से लौटा तब दोनों नींद से उनींदी हो रही थीं.

नाइट ड्यूटी से लौटा अमित थका हुआ था. अनिता पति अमित को वहीं खीच लाई जहां सारिका सो रही थी. पलभर के लिए तो अमित सकपका गया, फिर संभलते हुए कहा कि तुम आराम करो, मैं बाहर सोफे पर सो जाऊंगा. उसे समझ पाना अमित के लिए मुश्किल हो रहा था.

उस दिन अनिता अपनी पहली वैडिंग एनिवर्सरी की तैयारी में जुटी थी. उस ने अमित के लिए इम्पोर्टेड महंगी घडी और्डर कर दी थी. अमित भी बहुत खुश था और मन ही मन एक रोमांटिक डिनर प्लान कर चुका था. अमित जल्दी से अपना काम निबटा कर हौस्पिटल से निकल गया. हालांकि परीक्षा होने में सिर्फ 10 दिन थे लेकिन आज वह अपना पूरा दिन अनिता को देना चाहता था, इसलिए ही उस ने नाइट ड्यूटी की थी.

लाल शिफौन की साड़ी पर खुली हुईं घुंघराली व लहराती काली जुल्फ़ें अनिता की सुंदरता में चारचांद लगा रही थीं. अमित जैसे ही घर आया, अनिता की बला की खूबसूरती और उसे बेसब्री से अपना इंतज़ार करते देख मंत्रमुग्ध हो गया. घर में हर सामान बहुत सलीके से रखा था. पूरा घर रजनीगंधा की महक से महक रहा था. अमित के आते ही अनिता बांहों का हार डाल उस से लिपट गई, धीरे से कान में फुसफुसाई, ‘आय लव यू अमित. रियली, आय मिस यू अमित. मिस यू वेरी मच माय डियर.’

अमित इस बदलाव से आश्चर्यचकित था, मन ही मन सोच रहा था कहीं गलती से वह दूसरे घर में तो नहीं आ गया. उस ने खुद को चिकोटी काटी. तभी अनीता ने उसे प्यार से धक्का देते हुए कहा, “अब यों ही बुत बने खड़े रहोगे या…?” “ओह, मैं अभी आया फ्रेश हो कर.” अमित को आज पहली बार अनिता के निश्च्छल प्रेम की अनुभूति हुई थी और वह उस में पूरी तरह डूब जाना चाहता था. अनिता ने जल्दी से 2 गिलास शरबत तैयार किया. जब तक अमित फ्रेश हो कर आया तब तक अनिता अपना शरबत ख़त्म कर चुकी थी. अमित के आते ही उस ने अपने हाथों से उसे शरबत पिलाया. फिर दोनों ने मिल कर केक काटा, साथ ही, अपना वीडियो भी बनाया. और फिर गिफ्ट में अनिता ने अमित को सुंदर घड़ी पहना दी. अमित भी कहां मौका चूकने वाला था, उस ने भी हीरे के लौकेट की प्लेटिनम चेन अनिता को पहना दी.

लेकिन, यह क्या… थोड़ी देर बाद ही अमित उलटियां करने लगा. पूरा कमरा उलटी से भर चुका था. फिर वह धीरेधीरे होश खोते फर्श पर गिर पड़ा. कुछ देर बाद खुद को जख्मी कर, अनिता पड़ोस में रहने वाली आंटी को बता रही थी कि आज अमित नशा कर के आया और देखो आंटी, उस ने मुझे मारा भी!

“अरे, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ. कहां है वो? मैं उस से जा कर बात करती हूं, कहती हुई आंटी उठ खड़ी हुईं.

“अरे नहीं आंटी, वह तो उलटियां कर के औंधा पड़ा है,” कहती हुई अनिता ने आंटी को रोक दिया.

अमित की ऐसी बदसलूकी पर कोई यकीन नहीं कर रहा था. थोड़ी देर बाद अमित को अस्पताल ले जाया गया जहां इलाज़ के दौरान पता चला कि यह ज्यादा मात्रा में नींद की गोली का परिणाम है.

अनिता का एक नया रूप सामने आ चुका था. अमित की सज्जनता से सभी परिचित थे, इसलिए अनिता द्वारा लगाए आरोपों को किसी ने भी सच नहीं माना, यहां तक कि अनिता के मांबाप ने भी अमित की खूबियां बताते हुए अनिता को समझाने का असफल प्रयास किया.

बौखलाई अनिता की नफ़रत अब अपने चरम पर थी. अमित कुछ समझ पाता, इस से पहले ही अनिता ने अमित के विरुद्ध मोरचा तान दिया. थाने में घरेलू हिंसा, प्रताड़ना, दहेज़ के केस दायर हो चुके थे. पढ़ाई छोड़ अमित कोर्ट और थाने के चक्करों में उलझ कर रह गया. 10 दिनों बाद होने वाली परिक्षा को पास करने में उसे 2 वर्ष लग गए.

3 वर्षों बाद 15 लाख रुपए दे कर आपसी सुलह से जैसेतैसे केस निबटा कर अमित जब घर आया तो मां की सूनीनिरीह आंखों से अश्रुधारा बह निकली. आखिर क्या दोष था अमित का? अमित तो जैसा कल था वैसा ही आज भी है, फिर यदि अनिता को अमित उस के ख्वाबों का राजकुमार नहीं लगा था तो अनिता शादी के लिए तैयार ही क्यों हुई? क्या अनिता की महत्त्वाकांक्षा से उस के मांबाप परिचित न थे? आज अमित की मां भी इसी निष्कर्ष पर थी कि लड़की की इच्छाओं को, उस की महत्त्वाकांक्षाओं को समझना चाहिए. कहीं ऐसा न हो कि मांबाप योग्य लड़का देख, अपनी बेटी की शादी कर, अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लें और उधर लड़की की उछलती महत्त्वाकांक्षाओं की लहरें बाढ़ बन कर, न जाने कितनों को हताहत कर जाएं.

Hindi Story: खुशियों के फूल – क्या था लिपि के पिता का विकृत चेहरा?

Hindi Story : ‘‘रश्मि आंटी ई…ई…ई…’’ यह पुकार सुन कर लगा जैसे यह मेरा सात समंदर पार वैंकूवर में किसी अपने की मिठास भरी पुकार का भ्रम मात्र है. परदेस में भला मुझे कौन पहचानता है?  पीछे मुड़ कर देखा तो एक 30-35 वर्षीय सौम्य सी युवती मुझे पुकार रही थी. चेहरा कुछ जानापहचाना सा लगा. हां अरे, यह तो लिपि है. मेरे चेहरे पर आई मुसकान को देख कर वह अपनी वही पुरानी मुसकान ले कर बांहें फैला कर मेरी ओर बढ़ी.

इतने बरसों बाद मिलने की चाह में मेरे कदम भी तेजी से उस की ओर बढ़ गए. वह दौड़ कर मेरी बांहों में सिमट गई. हम दोनों की बांहों की कसावट यह जता रही थी कि आज के इस मिलन की खुशी जैसे सदियों की बेताबी का परिणाम हो.

मेरी बहू मिताली पास ही हैरान सी खड़ी थी. ‘‘बेटी, कहां चली गई थीं तुम अचानक? कितना सोचती थी मैं तुम्हारे बारे में? जाने कैसी होगी? कहां होगी मेरी लिपि? कुछ भी तो पता नहीं चला था तुम्हारा?’’ मेरे हजार सवाल थे और लिपि की बस गरम आंसुओं की बूंदें मेरे कंधे पर गिरती हुई जैसे सारे जवाब बन कर बरस रही थीं.

मैं ने लिपि को बांहों से दूर कर सामने किया, देखना चाहती थी कि वक्त के अंतराल ने उसे कितना कुछ बदलाव दिया.

‘‘आंटी, मेरा भी एक पल नहीं बीता होगा आप को बिना याद किए. दुख के पलों में आप मेरा सहारा बनीं. मैं इन खुशियों में भी आप को शामिल करना चाहती थी. मगर कहां ढूंढ़ती? बस, सोचती रहती थी कि कभी तो आंटी से मिल सकूं,’’ भरे गले से लिपि बोली.

‘‘लिपि, यह मेरी बहू मिताली है. इस की जिद पर ही मैं कनाडा आई हूं वरना तुम से मिलने के लिए मुझे एक और जन्म लेना पड़ता,’’ मैं ने मुसकरा कर माहौल को सामान्य करना चाहा.

‘‘मां के चेहरे की खुशी देख कर मैं समझ सकती हूं कि आप दोनों एकदूसरे से मिलने के लिए कितनी बेताब रही हैं. आप अपना एड्रैस और फोन नंबर दे दीजिए. मैं मां को आप के घर ले आऊंगी. फिर आप दोनों जी भर कर गुजरे दिनों को याद कीजिएगा,’’ मिताली ने नोटपैड निकालते हुए कहा.

‘‘भाभी, मैं हाउसवाइफ हूं. मेरा घर इस ‘प्रेस्टीज मौल’ से अधिक दूरी पर नहीं है. आंटी को जल्दी ही मेरे घर लाइएगा. मुझे आंटी से ढेर सारी बातें करनी हैं,’’ मुझे जल्दी घर बुलाने के लिए उतावली होते हुए उस ने एड्रैस और फोन नंबर लिखते हुए मिताली से कहा.

‘‘मां, लगता है आप के साथ बहुत लंबा समय गुजारा है लिपि ने. बहुत खुश नजर आ रही थी आप से मिल कर,’’ रास्ते में कार में मिताली ने जिक्र छेड़ा.

‘‘हां, लिपि का परिवार ग्वालियर में हमारा पड़ोसी था. ग्वालियर में रिटायरमैंट तक हम 5 साल रहे. ग्वालियर की यादों के साथ लिपि का भोला मासूम चेहरा हमेशा याद आता है. बेहद शालीन लिपि अपनी सौम्य, सरल मुसकान और आदर के साथ बातचीत कर पहली मुलाकात में ही प्रभावित कर लेती थी.

‘‘जब हम स्थानांतरण के बाद ग्वालियर शासकीय आवास में पहुंचे तो पास ही 2 घर छोड़ कर तीसरे क्वार्टर में चौधरी साहब, उन की पत्नी और लिपि रहते थे. चौधरी साहब का अविवाहित बेटा लखनऊ में सर्विस कर रहा था और बड़ी बेटी शादी के बाद झांसी में रह रही थी,’’ बहुत कुछ कह कर भी मैं बहुत कुछ छिपा गई लिपि के बारे में.

रात को एकांत में लिपि फिर याद आ ग. उन दिनों लिपि का अधिकांश समय अपनी बीमार मां की सेवा में ही गुजरता था. फिर भी शाम को मुझ से मिलने का समय वह निकाल ही लेती थी. मैं भी चौधरी साहब की पत्नी शीलाजी का हालचाल लेने जबतब उन के घर चली जाती थी.

शीलाजी की बीमारी की गंभीरता ने उन्हें असमय ही जीवन से मुक्त कर दिया. 10 वर्षों से रक्त कैंसर से जूझ रही शीलाजी का जब निधन हुआ था तब लिपि एमए फाइनल में थी. असमय मां का बिछुड़ना और सारे दिन के एकांत ने उसे गुमसुम कर दिया था. हमेशा सूजी, पथराई आंखों में नमी समेटे वह अब शाम को भी बाहर आने से कतराने लगी थी. चौधरी साहब ने औफिस जाना आरंभ कर दिया था. उन के लिए घर तो रात्रिभोजन और रैनबसेरे का ठिकाना मात्र ही रह गया था.

लिपि को देख कर लगता था कि वह इस गम से उबरने की जगह दुख के समंदर में और भी डूबती जा रही है. सहमी, पीली पड़ती लिपि दुखी ही नहीं, भयभीत भी लगती थी. आतेजाते दी जा रही दिलासा उसे जरा भी गम से उबार नहीं पा रही थी. दुखते जख्मों को कुरेदने और सहलाने के लिए उस का मौन इजाजत ही नहीं दे रहा था.

मुझे लिपि में अपनी दूर ब्याही बेटी  अर्पिता की छवि दिखाई देती थी.  फिर भला उस की मायूसी मुझ से कैसे बर्दाश्त होती? मैं ने उस की दीर्घ चुप्पी के बावजूद उसे अधिक समय देना शुरू कर दिया था. ‘बेटी लिपि, अब तुम अपने पापा की ओर ध्यान दो. तुम्हारे दुखी रहने से उन का दुख भी बढ़ जाता है. जीवनसाथी खोने का गम तो है ही, तुम्हें दुखी देख कर वे भी सामान्य नहीं हो पा रहे हैं. अपने लिए नहीं तो पापा के लिए तो सामान्य होने की कोशिश करो,’ मैं ने प्यार से लिपि को सहलाते हुए कहा था.

पापा का नाम सुनते ही उस की आंखों में घृणा का जो सैलाब उठा उसे मैं ने साफसाफ महसूस किया. कुछ न कह पाने की घुटन में उस ने मुझे अपलक देखा और फिर फूटफूट कर रोने लगी. मेरे बहुत समझाने पर हिचकियां लेते हुए वह अपने अंदर छिपी सारी दास्तान कह गई, ‘आंटी, मैं मम्मी के दुनिया से जाते ही बिलकुल अकेली हो गई हूं. भैया और दीदी तेरहवीं के बाद ही अपनेअपने शहर चले गए थे. मां की लंबी बीमारी के कारण घर की व्यवस्थाएं नौकरों के भरोसे बेतरतीब ही थीं. मैं ने जब से होश संभाला, पापा को मम्मी की सेवा और दवाओं का खयाल रखते देखा और कभीकभी खीज कर अपनी बदकिस्मती पर चिल्लाते भी.

‘मेरे बड़े होते ही मम्मी का खयाल स्वत: ही मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया. पापा के झुंझलाने से आहत मम्मी मुझ से बस यही कहती थीं कि बेटी, मैं बस तुम्हें ससुराल विदा करने के लिए ही अपनी सांसें थामे हूं. वरना अब मेरा जीने का बिलकुल भी जी नहीं करता. लेकिन मम्मी मुझे बिना विदा किए ही दुनिया से विदा हो गईं.

‘पापा को मैं ने पहले कभी घर पर शराब पीते नहीं देखा था लेकिन अब पापा घर पर ही शराब की बोतल ले कर बैठ जाते हैं. जैसेजैसे नशा चढ़ता है, पापा का बड़बड़ाना भी बढ़ जाता है. इतने सालों से दबाई अतृप्त कामनाएं, शराब के नशे में बहक कर बड़बड़ाने में और हावभावों से बाहर आने लगती हैं. पापा कहते हैं कि उन्होंने अपनी सारी जवानी एक जिंदा लाश को ढोने में बरबाद कर दी. अब वे भरपूर जीवन जीना चाहते हैं. रिश्तों की गरिमा और पवित्रता को भुला कर वासना और शराब के नशे में डूबे हुए पापा मुझे बेटी के कर्तव्यों के निर्वहन का पाठ पढ़ाते हैं.

‘मेरे आसपास अश्लील माहौल बना कर मुझे अपनी तृप्ति का साधन बनाना चाहते हैं. वे कामुक बन मुझे पाने का प्रयास करते हैं और मैं खुद को इस बड़े घर में बचातीछिपाती भागती हूं. नशे में डूबे पापा हमारे पवित्र रिश्ते को भूल कर खुद को मात्र नर और मुझे नारी के रूप में ही देखते हैं.

‘अब तो उन के हाथों में बोतल देख कर मैं खुद को एक कमरे में बंद कर लेती हूं. वे बाहर बैठे मुझे धिक्कारते और उकसाते रहते हैं और कुछ देर बाद नींद और नशे में निढाल हो कर सो जाते हैं. सुबह उठ कर नशे में बोली गई आधीअधूरी याद, बदतमीजी के लिए मेरे पैरों पर गिर कर रोरो कर माफी मांग लेते हैं और जल्दी ही घर से बाहर चले जाते हैं.

‘ऊंचे सुरक्षित परकोटे के घर में मैं सब से सुरक्षित रिश्ते से ही असुरक्षित रह कर किस तरह दिन काट रही हूं, यह मैं ही जानती हूं. इस समस्या का समाधान मुझे दूरदूर तक नजर नहीं आ रहा है,’ कह कर सिर झुकाए बैठ गई थी लिपि. उस की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी थी.

मैं सुन कर आश्चर्यचकित थी कि चौधरी साहब इतना भी गिर सकते हैं. लिपि अपने अविवाहित भाई रौनक के पास भी नहीं जा सकती थी और झांसी में उस की दीदी अभी संयुक्त परिवार में अपनी जगह बनाने में ही संघर्षरत थी. वहां लिपि का कुछ दिन भी रह पाना मुश्किल था.  घबरा कर लिपि आत्महत्या जैसे कायरतापूर्ण अंजाम का मन बनाने लगी थी. लेकिन आत्महत्या अपने पीछे बहुत से अनुत्तरित सवाल छोड़ जाती है, यह समझदार लिपि जानती थी. मैं ने उसे चौधरी साहब और रौनक के साथ गंभीरतापूर्वक बात कर उस के विवाह के बाद एक खुशहाल जिंदगी का ख्वाब दिखा कर उसे दिलासा दी. अब मैं उसे अधिक से अधिक समय अपने साथ रखने लगी थी.  मुझे अपनी बेटी की निश्चित डेट पर हो रही औपरेशन द्वारा डिलीवरी के लिए बेंगलुरु जाना था. मैं चिंतित थी कि मेरे यहां से जाने के बाद लिपि अपना मन कैसे बहलाएगी?

यह एक संयोग ही था कि मेरे बेंगलुरु जाने से एक दिन पहले रौनक लखनऊ से घर आया. मेरे पास अधिक समय नहीं था इसलिए मैं उसे निसंकोच अपने घर बुला लाई. एक अविवाहित बेटे के पिता की विचलित मानसिकता और उन की छत्रछाया में पिता से असुरक्षित बहन का दर्द कहना जरा मुश्किल ही था, लेकिन लिपि के भविष्य को देखते हुए रौनक को सबकुछ थोड़े में समझाना जरूरी था.  सारी बात सुन कर उस का मन पिता के प्रति आक्रोश से?भर उठा. मैं ने उसे समझाया कि वह क्रोध और जोश में नहीं बल्कि ठंडे दिमाग से ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचे जो लिपि के लिए सुरक्षित और बेहतर हो.

अगली सुबह मैं अकेली बेंगलुरु के लिए रवाना हो गई थी और जा कर अर्पिता की डिलीवरी से पूर्व की तैयारी में व्यस्त हो गई थी कि तीसरे दिन मेरे पति ने फोन पर बताया कि तुम्हारे जाने के बाद अगली शाम रौनक लिपि को झांसी भेजने के लिए स्टेशन गया था कि पीछे घर पर अकेले बैठे चौधरी साहब की हार्टअटैक से मृत्यु हो गई.

रौनक को अंदर से बंद घर में पापा टेबल से टिके हुए कुरसी पर बैठे मिले. बेचारे चौधरी साहब का कुछ पढ़ते हुए ही हार्ट फेल हो गया. लिपि और उस की बहन भी आ गई हैं. चौधरी साहब का अंतिम संस्कार हो गया है और मैं कल 1 माह के टूर पर पटना जा रहा हूं.’

चौधरी साहब के निधन को लिपि के लिए सुखद मोड़ कहूं या दुखद, यह तय नहीं कर पा रही थी मैं. तब फोन भी हर घर में कहां होते थे. मैं कैसे दिलासा देती लिपि को? बेचारी लिपि कैसे…कहां… रहेगी अब? उत्तर को वक्त के हाथों में सौंप कर मैं अर्पिता और उस के नवजात बेटे में व्यस्त हो गई थी.

3माह बाद ग्वालियर आई तो चौधरी साहब के उजड़े घर को देख कर मन में एक टीस पैदा हुई. पति ने बताया कि रौनक चौधरी साहब की तेरहवीं के बाद घर के अधिकांश सामान को बेच कर लिपि को अपने साथ ले गया है. मैं उस वक्त टूर पर था, इसलिए जाते वक्त मुलाकात नहीं हो सकी और उन का लखनऊ का एड्रैस भी नहीं ले सका.

लिपि मेरे दिलोदिमाग पर छाई रही लेकिन उस से मिलने की अधूरी हसरत इतने सालों बाद वैंकूवर में पूरी हो सकी.  सोमवार को नूनशिफ्ट जौइन करने के लिए तैयार होते समय मिताली ने कहा, ‘‘मां, मेरी लिपि से फोन पर बात हो गई है. मैं आप को उस के यहां छोड़ देती हूं. आप तैयार हो जाइए. वह आप को वापस यहां छोड़ते समय घर भी देख लेगी.’’

लिपि अपने अपार्टमैंट के गेट पर ही हमारा इंतजार करती मिली. मिताली के औफिस रवाना होते ही लिपि ने कहा, ‘‘आंटी, आप से ढेर सारी बातें करनी हैं. आइए, पहले इस पार्क में धूप में बैठते हैं. मैं जानती हूं कि आप तब से आज तक न जाने कितनी बार मेरे बारे में सोच कर परेशान हुई होंगी.’’

‘‘हां लिपि, चौधरी साहब के गुजरने के बाद तुम ग्वालियर से लखनऊ चली गई थीं, फिर तुम्हारे बारे में कुछ पता ही नहीं चला. चौधरी साहब की अचानक मृत्यु ने तो हमें अचंभित ही कर दिया था. प्रकृति की लीला बड़ी विचित्र है,’’ मैं ने अफसोस के साथ कहा.

‘‘आंटी जो कुछ बताया जाता है वह हमेशा सच नहीं होता. रौनक भैया उस दिन आप के यहां से आ कर चुप, पर बहुत आक्रोशित थे. पापा ने रात को शराब पी कर भैया से कहा कि अब तुम लिपि को समझाओ कि यह मां के गम में रोनाधोना भूल कर मेरा ध्यान रखे और अपनी पढ़ाई में मन लगाए.

‘‘सुन कर भैया भड़क गए थे. पापा के मेरे साथ ओछे व्यवहार पर उन्होंने पापा को बहुत खरीखोटी सुनाईं और कलियुगी पिता के रूप में उन्हें बेहद धिक्कारा. बेटे से लांछित पापा अपनी करतूतों से शर्मिंदा बैठे रह गए. उन्हें लगा कि ये सारी बातें मैं ने ही भैया को बताई हैं.

‘‘भैया की छुट्टियां बाकी थीं लेकिन वे मुझे झांसी दीदी के पास कुछ दिन भेज कर किसी अन्य शहर में मेरी शिक्षा और होस्टल का इंतजाम करना चाहते थे. वे मुझे झांसी के लिए स्टेशन पर ट्रेन में बिठा कर वापस घर पहुंचे तो दरवाजा अंदर से बंद था.

‘‘बारबार घंटी बजाने पर भी जब दरवाजा नहीं खुला तो भैया पीछे आंगन की दीवार फांद कर अंदर पहुंचे तो पापा कुरसी पर बैठे सामने मेज पर सिर के बल टिके हुए मिले. उन के सीधे हाथ में कलम था और बाएं हाथ की कलाई से खून बह रहा था. भैया ने उन्हें बिस्तर पर लिटाया. तब तक उन के प्राणपखेरू उड़ चुके थे. भैया ने डाक्टर अंकल और झांसी में दीदी को फोन कर दिया था. पापा ने शर्मिंदा हो कर आत्महत्या करने के लिए अपने बाएं हाथ की कलाई की नस काट ली थी और फिर मेरे और भैया के नाम एक खत लिखना शुरू किया था. ‘‘होश में रहने तक वे खत लिखते रहे, जिस में वे केवल हम से माफी मांगते रहे. उन्हें अपने किए व्यवहार का बहुत पछतावा था. वे अपनी गलतियों के साथ और जीना नहीं चाहते थे. पत्र में उन्होंने आत्महत्या को हृदयाघात से स्वाभाविक मौत के रूप में प्रचारित करने की विनती की थी.

‘‘भैया ने डाक्टर अंकल से भी आत्महत्या का राज उन तक ही सीमित रखने की प्रार्थना की और छिपा कर रखे उन के सुसाइड नोट को एक बार मुझे पढ़वा कर नष्ट कर दिया था.

‘‘हम दोनों अनाथ भाईबहन शीघ्र ही लखनऊ चले गए थे. मैं अवसादग्रस्त हो गई थी इसलिए आप से भी कोई संपर्क नहीं कर पाई. भैया ने मुझे बहुत हिम्मत दी और मनोचिकित्सक से परामर्श किया. लखनऊ में हम युवा भाईबहन को भी लोग शक की दृष्टि से देखते थे लेकिन तभी अंधेरे में आशा की किरण जागी. भैया के दोस्त केतन ने भैया से मेरा हाथ मांगा. सच कहूं, तो आंटी केतन का हाथ थामते ही मेरे जीवन में खुशियों का प्रवेश हो गया. केतन बहुत सुलझे हुए व्यक्ति हैं. मेरे दुख और एकाकीपन से उबरने में उन्होंने मुझे बहुत धैर्य से प्रेरित किया. मेरे दुख का स्वाभाविक कारण वे मम्मीपापा की असामयिक मृत्यु ही मानते हैं.

‘‘मैं ने अपनी शादी का कार्ड आप के पते पर भेजा था. लेकिन बाद में पता चला कि अंकल के रिटायरमैंट के बाद आप लोग वहां से चले गए थे. मैं और केतन

2 वर्ष पहले ही कनाडा आए हैं. अब मैं अपनी पिछली जिंदगी की सारी कड़ुवाहटें भूल कर केतन के साथ बहुत खुश हूं. बस, एक ख्वाहिश थी, आप से मिल कर अपनी खुशियां बांटने की. वह आज पूरी हो गई. आप के कंधे पर सिर रख कर रोई हूं आंटी. खुशी से गलबहियां डाल कर आप को भी आनंदित करने की चाह आज पूरी हो गई.’’

लिपि यह कह कर गले में बांहें डाल कर मुग्ध हो गई थी. मैं ने उस की बांहों को खींच लिया, उस की खुशियों को और करीब से महसूस करने के लिए.

‘‘आंटी, मैं पिछली जिंदगी की ये कसैली यादें अपने घर की दरोदीवार में गूंजने से दूर रखना चाहती हूं, इसलिए आप को यहां पार्क में ले आई थी. आइए, आंटी, अब चलते हैं. मेरे प्यारे घर में केतन भी आज जल्दी आते होंगे, आप से मिलने के लिए,’’ लिपि ने उत्साह से कहा और मैं उठ कर मंत्रमुग्ध सी उस के पीछेपीछे चल दी उस की बगिया में महकते खुशियों के फूल चुनने के लिए.

Hindi Story : संकर्षण

Hindi Story : अपने बचपन के मित्र गगन के यहां से लौटते हुए मेरे  पति बारबार एक ही प्रश्न किए जा रहे थे, ‘‘अरे देखो न संकर्षण की शक्लसूरत, व्यवहार सब कुछ गगन से कितना मिलताजुलता है. लगता है जैसे उस का डुप्लिकेट हो. बस नाक तुम्हारी तरह है. मेरा तो जैसे उसे कुछ मिला ही नहीं.’’

‘‘मिला क्यों नहीं है? बुद्धि तुम्हारी तरह ही है. तुम्हारी ही तरह जहीन है.’’  ‘‘हां, वह तो है, पर फिर भी शक्लसूरत और आदतें कुछ तो मिलनी चाहिए थीं.’’  ‘‘शक्लसूरत और आदतें तो इनसान के अपनेअपने परिवेश के अनुसार बनती हैं और हो सकता है उस के गर्भ में आने के बाद से ही मैं ने उसे गगन भाई साहब को देने का मन बना लिया था. इसी कारण उन जैसी शक्लसूरत हो गई हो.’’  ‘‘हां, तुम ठीक कहती हो, पर यार तुम बहुत महान हो. खुशीखुशी अपना बच्चा गगन की झोली में डाल दिया.’’ ‘‘क्या करूं? मुझ से उन लोगों की तकलीफ देखी नहीं जा रही थी. गगन भाई साहब और श्रुति भाभी को हम लोगों ने कोई गैर नहीं समझा. आप के लंदन रहने के दौरान हमारे पिताजी और हमारे बच्चों का कितना ध्यान रखा.’’

‘‘हां, यह बात तो है. गगन और भाभीजी के साथ कभी पराएपन का बोध नहीं हुआ. फिर भी एक मां के लिए अपनी संतान किसी और को दे देना बड़े जीवट का काम है. मेरा तो आज भी मन कर रहा था कि उसे अपने साथ लेते चलूं.’’

‘‘कैसी बात करते हैं आप? देखा नहीं कैसे गगन भाई साहब और श्रुति भाभीजी की पूरी दुनिया उसी के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई है.’’  ‘‘सच कह रही हो और संकर्षण भी उन्हीं को अपने मातापिता समझता है. अपने असली मातापिता के बारे में जानता भी नहीं.’’ शुक्र है मेरे पति को किसी प्रकार का शक नहीं हुआ वरना मैं तो डर ही गई थी

कि कहीं यह राज उन पर उजागर न हो जाए कि संकर्षण के पिता वास्तव में गगन ही हैं. आज 17 वर्षों के वैवाहिक जीवन में यही एक ऐसा राज है जिसे मैं ने अपने पति से छिपा कर रखा है और शायद अंतिम भी. इस रहस्य को हम परिस्थितिवश हुई गलती की संज्ञा तो दे सकते हैं, पर अपराध की कतई नहीं. फिर भी जानती हूं इस रहस्य से परदा उठने पर 2 परिवार तबाह हो जाएंगे, इसलिए इस रहस्य को सीने में दबाए रखे हूं.

गगन इन के बचपन के मित्र हैं. गगन जहां दुबलेपतले, शांत और कुछकुछ पढ़ने में कमजोर थे वहीं मेरे पति गुस्सैल, कदकाठी के अच्छे और जहीन थे. घर का परिवेश भी दोनों का नितांत भिन्न था. गगन एक गरीब परिवार से संबंध रखते थे और मेरे पति उच्च मध्यवर्गीय परिवार से. इतनी भिन्नताएं होते हुए भी दोनों की दोस्ती मिसाल देने लायक थी. गगन को कोई भूल से भी कुछ कह देता तो उस की खैर नहीं होती. वहीं मेरे पति आशीष की कही हुई हर बात गगन के लिए ब्रह्मवाक्य से कम नहीं होती.

धीरेधीरे समय बीता और मेरे पति का आईएएस में चयन हो गया और गगन ने अपना छोटामोटा बिजनैस शुरू किया, जिस में हमारे ससुर ने भी आर्थिक सहयोग दिया. मेरी सास की मृत्यु मेरे पति के पढ़ते समय ही हो गई थी. उस समय गगन की मां ने ही मेरे पति को मां का प्यार दिया और ससुर भी कभी गगन को अपने परिवार से अलग नहीं समझते थे और कहते थे कि कुदरत ने उन्हें 2 बेटे दिए हैं. एक आशीष और दूसरा गगन.

संयोग देखो कि दोनों के विवाह के बाद जब मैं और श्रुति आईं तो भी उन दोनों के परिवार में किसी प्रकार का भी अलगाव न आया. मेरी और श्रुति की अच्छी बनती थी. हालांकि जब भी लोग हम चारों की मित्रता को देखते तो कहते कि यह मैत्री भी शायद कुदरत का चमत्कार है, जहां 2 भिन्न परिवेश और भिन्न सोच वाले व्यक्ति अभिन्न हो गए थे. मुझे पति के तबादलों के कारण कई शहरों में रहना पड़ा. ऐसे में ससुर अकेले पड़ गए थे. उन्हें अपना शहर छोड़ कर यों शहरशहर भटकना गंवारा न था. ऐसे में गगन और उन की पत्नी ही उन का पूरा खयाल रखते, बेटेबहू की कमी महसूस न होने देते.

समय बीतता रहा. जहां मैं 2 बच्चों की मां बन गई, वहीं गगन की पत्नी को कई बार गर्भ तो ठहरा पर गर्भपात हो गया. डाक्टर का कहना था कि उन की पत्नी की कोख में कुछ ऐसी गड़बड़ी है कि वह गर्भ पनपने ही नहीं देती. हर बार गर्भपात के बाद दोनों पतिपत्नी बहुत मायूस हो जाते. गगन की पत्नी श्रुति का तो और भी बुरा हाल हो जाता. एक तो गर्भपात की कमजोरी और दूसरा मानसिक अवसाद. दिन पर दिन उन का स्वास्थ्य गिरने लगा. डाक्टर ने सलाह दी कि अब खुद के बच्चे के बारे में भूल जाएं. या तो कोई बच्चा गोद ले लें या किराए की कोख का प्रबंध कर लें वरना पत्नी के जीवन पर संकट आ सकता है.

पर उन पतिपत्नी को डाक्टर की बात रास नहीं आई. गगन मुझ से कहते, ‘‘भाभी अब मैडिकल साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है. अगर कुछ कमी है तो क्या वह दवा से दूर हो सकती है. इस शहर के सब डाक्टर पागल हैं. मैं देश के सब से बड़े गाइनोकोलौजिस्ट को दिखाऊंगा, देखिएगा हमारे घर भी अपने बच्चे की किलकारियां गूजेंगी.’’

और सच में उन्होंने देश के सब से मशहूर गाइनोकोलौजिस्ट को दिखाया. उन्होंने आशा बंधाई कि टाइम लगेगा, पर सब कुछ ठीक हो जाएगा. इधर मेरे पति को डैपुटेशन पर 3 सालों के लिए लंदन जाना पड़ा. मैं नहीं जा सकी. बच्चे पढ़ने लायक हो गए थे और ससुर भी अस्वस्थ रहने लगे थे. अब उन्हें केवल गगन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता था. आखिर हम पतिपत्नी का भी तो कोई उत्तरदायित्व था.

आशीष के लंदन प्रवास के दौरान ही ससुर की मृत्यु हो गई. किसी प्रकार कुछ दिनों की छुट्टी ले कर आशीष आए फिर चले गए. इधर गगन की पत्नी को पुन: गर्भ ठहरा. अब की बार हर प्रकार की सावधानी बरती गई. गगन अपनी पत्नी को जमीन पर पांव ही नहीं धरने देते. वैसे डाक्टर ने भी कंप्लीट बैड रैस्ट के लिए कह रखा था.  डाक्टर ने अल्ट्रासाउंड वगैरह करवाने को भी मन कर दिया था ताकि उस की रेज से भी गर्भ को नुकसान न पहुंचे. धीरेधीरे गर्भ पूरे समय का हो गया. गगन, उन की पत्नी और उन की मां का चेहरा बच्चे के आने की खुशी में पुलकित रहने लगा. प्रसन्नता मुझे भी कम न थी.

नियत समय में श्रुति को प्रसववेदना शुरू हो गई. लगता था सब कुछ सामान्य हो जाएगा. मैं भी अपने बच्चों को मां के पास छोड़ कर गगन के परिवार के साथ थी. आखिरकार इस मुश्किल घड़ी में मैं उन का साथ न देती तो कौन देता. पर 1 हफ्ते तक प्रसववेदना का कोई परिणाम न निकला. डाक्टर भी सामान्य डिलिवरी की प्रतीक्षा करतेकरते थक गई थीं.

अंत में उन्होंने औपरेशन का फैसला लिया और औपरेशन से जिस बच्चे ने जन्म लिया, वह भयानक शक्ल वाला 2 सिर और 3 हाथ का बालक था. जन्म लेते ही उस ने इतने जोर का रुदन किया कि सारी नर्सें उसे वहीं छोड़ कर डर कर भाग गईं.

डाक्टर ने यह खबर गगन को दी. गगन भी बच्चे को देख कर हैरान रह गए. यह तो अच्छा हुआ कि बच्चा आधे घंटे में ही इस दुनिया से चल दिया. गगन की पत्नी बेहोश थीं.  गगन जब बच्चे को दफना कर लौटे तो इतने थकेहारे, बेबस लग रहे थे कि पूछो मत.  गगन की मां ने मुझ से कहा, ‘‘सीमा तुम गगन को ले कर घर जाओ. बहुत परेशान है वह. थोड़ा आराम करेगा तो इस परेशानी से निकलेगा. मैं हौस्पिटल में रुकती हूं.’’

मैं ने विरोध भी किया, ‘‘आंटी, आप और गगन भाई साहब चले जाएं. मैं यहां रुकती हूं.’’  मगर गगन एकदम से उठ कर खड़े हो गए. बोले, ‘‘चलिए भाभी चलते हैं.’’ मैं और गगन कमरे में आ गए. कमरे में आ कर मैं ने गगन के ऊपर सांत्वना भरा हाथ रखा  भर था कि उन का इतनी देर का रोका सब्र का बांध टूट गया.

वे मेरी गोद में सिर रख कर फफकफफक कर रोने लगे, ‘‘मैं क्या करूं भाभी? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है. श्रुति जब होश में आएगी तो मैं उसे क्या जवाब दूंगा? इस से अच्छा होता वह गर्भ में आया ही न होता… श्रुति क्या यह सदमा बरदाश्त कर पाएगी? मुझे उस की बड़ी फिक्र हो रही है. उस का सामना करने की हिम्मत मुझ में नहीं है. मैं कहीं चला जाऊंगा. भाभी आप ही उसे संभालिएगा.’’

मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि किन शब्दों में उन्हें सांत्वना दूं. केवल उन के बाल सहलाती रही. हम दोनों को ही उस मुद्रा में झपकी सी आ गई और उस दौरान कब प्रकृति और पुरुष का मिलन हो गया हम दोनों ही समझ न पाए. गगन अपराधबोध से भर उठे थे. अपराधबोध मुझे भी कम न था, क्योंकि जो कुछ भी हम दोनों के बीच हुआ था उसे न तो बलात्कार की संज्ञा दी जा सकती थी और न ही बेवफाई की. हम दोनों ही समानरूप से अपराधी थे… परिस्थितियों के षड्यंत्र का शिकार.

गगन अपनी पत्नी को ले कर दूर किसी पर्वतीय स्थल पर चले गए थे. आशीष को कुछ दिन बाद ही लंदन से लौटना था और हम लोगों को ले कर वापस जाना था, क्योंकि आशीष को वहां पर काफी अच्छी जौब मिल गई थी. उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था. मुझे देश और इतनी अच्छी नौकरी छोड़ कर विदेश जाना स्वीकार न था, पर आशीष पर तो पैसे और विदेश का भूत सवार था. आशीष आए तभी मुझे पता चला कि मैं फिर से मां बनने वाली हूं. मुझे अच्छी तरह से पता था कि यह बच्चा गगन का है. आशीष को पता चला तो वे आश्चर्य में पड़ गए. बोले, ‘‘इतनी  सावधानियों के बाद ऐसा कैसे हो सकता है?’’

मैं ने कहा, ‘‘अब हो गया है तो क्या करें?’’

आशीष बोले, ‘‘अबौर्शन करवा लो. अभी नए देश में खुद को और बच्चों को ऐडजस्ट करने में समय लगेगा. यह सब झमेला कैसे चल पाएगा?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं एक बात सोचती हूं. श्रुति भाभी बहुत दुखी हैं, डिप्रैशन में आ गई हैं, शायद अब उन का दूसरा बच्चा हो भी न? तो क्यों न हम इस बच्चे को उन लोगों को दे दें.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं है? अपना बच्चा कोई कैसे दूसरे को दे सकता है?’’

आशीष बोले.

‘‘क्यों? वे लोग कोई गैर तो नहीं हैं… फिर तुम अबौर्शन कराने की बात कर रहे थे… कम से कम जीवित तो रहेगा और उन लोगों के जीवन में खुशियां भर देगा.’’

‘‘वह तो ठीक है,’’ आशीष ने हथियार डालते हुए कहा, ‘‘पर क्या गगन और भाभी इस के लिए मान जाएंगे?’’

‘‘चलिए, बात कर के देखते हैं.’’  जब हम लोगों ने गगन भाई साहब और श्रुति भाभी से इस संबंध में बात की तो वे विश्वास न कर सके.

गगन बोले, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है भाभी? आप अपना बच्चा हमें दे देंगे.’’

मैं ने कहा, ‘‘हमारा और आप का बच्चा अलग थोड़े ही है.’’

मेरी इस बात पर गगन ने चौंक कर मेरी आंखों में देखा. मैं ने भी उन की आंखों में देखते हुए अपनी बात जारी रखी, ‘‘कृष्ण के भाई बलराम की कहानी जानते हैं न? उन्हें संकर्षण विधि द्वारा देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में प्रतिस्थापित कर दिया गया था तो यही समझिए कि यह आप लोगों का ही बच्चा है, केवल गर्भ में मेरे है. अगर बेटा होगा तो आप लोग नाम संकर्षण ही रखिएगा.’’

मगर न श्रुति को और न ही आशीष को इतनी पौराणिक कथाओं का ज्ञान था, केवल मैं और गगन ही इस अंतनिहित भाव को समझ सके. फिर मैं ने कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि आप लोग उसे पूरा प्यार देंगे.’’  बच्चे की कल्पना मात्र से गगन की पत्नी की आंखों में चमक आ गई. बोलीं, ‘‘सच भाभी क्या आप ऐसा कर पाएंगी?’’

‘‘क्यों नहीं? आप कोई गैर थोड़ी न हैं.’’

आपसी सहमति बनी कि मैं अभी आशीष के साथ नहीं जाऊंगी. बच्चे को जन्म देने पर उसे श्रुति को सौंप लंदन जाऊंगी. मैं ने ऐसा किया भी. बच्चे को हौस्पिटल से निकलते ही श्रुति की गोद में डाल दिया और आशीष के पास बच्चों के साथ लंदन चली गई.  तब से कई बार भारत आना हुआ पर मायके से ही हो कर लौट गई. डरती थी कहीं  मेरा मातृत्व न जाग जाए. कभीकभी इस बात पर क्षोभ भी होता कि मैं ने बेकार ही अपने बच्चे को पराई गोद में डाल दिया. फिर लगता शायद मैं ने ठीक ही किया, नहीं तो उसे देख कर एक अपराधभाव मन में हमेशा बना रहता.

आशीष सारे तथ्यों से अनजान थे. तभी तो उन का पितृत्व जबतब अपने बच्चे से मिलने को बेचैन हो उठता. उन्हीं की जिद थी कि अब की बार गगनजी के यहां जाने का कार्यक्रम बना. संकर्षण से मिल कर आशीष की प्रतिक्रिया से मुझे तो डर ही लग गया था कि कहीं इस रहस्य से परदा न उठ जाए और 2 परिवारों की सुखशांति भंग हो जाए.  मगर आशीष के मुझ पर और गगन पर अटूट विश्वास ने उन की सोच की दिशा इस ओर नहीं मोड़ी वरना मैं फंस जाती, क्योंकि आज तक न तो मैं ने कभी उन से झूठ बोला है और न ही कोई बात छिपाई है, विश्वासघात तो दूर की बात है और इतना तो मैं आज भी मन से कह सकती हूं कि मैं ने और गगन ने न तो कोई विश्वासघात किया है और न ही कोई बेवफाई. गलती जरूर हुई है. पर हां यह बात छिपाने को विवश जरूर हूं, क्योंकि इस गलती का पता लगने पर  2 परिवार व्यर्थ में विघटन की कगार पर पहुंच जाएंगे. इसीलिए मैं इस विषय पर एकदम चुप हूं.

Hindi Story: जाएं तो जाएं कहां

Hindi Story : हमारे एक बुजुर्ग थे. वे अकसर हमें समझाया करते थे कि जीवन में किसी न किसी नियम का पालन इंसान को अवश्य करना चाहिए. कोई भी नियम, कोई भी उसूल, जैसे कि मैं झूठ नहीं बोलता, मैं हर किसी से हिलमिल नहीं सकता या मैं हर किसी से हिलमिल जाता हूं, हर चीज का हिसाबकिताब रखना चाहिए या हर चीज का हिसाबकिताब नहीं रखना चाहिए.

नियम का अर्थ कि कोई ऐसा काम जिसे आप अवश्य करना चाहें, जिसे किए बिना आप को लगे कुछ कमी रह गई है. मैं अकसर आसपास देखता हूं और कभीकभार महसूस भी होता है कि पक्का नियम जिसे हम जीतेमरते निभाते हैं वह हमें बड़ी मुसीबत से बचा भी लेता है. हमारे एक मित्र हैं जिन की पत्नी पिछले 10 साल से सुबह सैर करने जाती थीं. 2-3 पड़ोसिनें भी कभी साथ होती थीं और कभी नहीं भी होती थीं.

‘‘देखा न कुसुम, भाभी रोज सुबह सैर करने जाती हैं तुम भी साथ जाया करो. जरा तो अपनी सेहत का खयाल रखो.’’

‘‘सुबह सैर करने जाना मुझे अच्छा नहीं लगता. सफाई कर्मचारी सफाई करते हैं तो सड़क की सारी मिट्टी गले में लगती है. जगहजगह कूड़े के ढेरों को आग लगाते हैं…गली में सभी सीवर भर जाते हैं. सुबह ही सुबह कितनी बदबू होती है.’’  बात शुरू कर के मैं तो पत्नी का मुंह ही देखता रह गया. सुबह की सैर के लाभ तो बचपन से सुनता आया था पर नुकसान पहली बार समझा रही थी पत्नी.

‘‘ताजी हवा तब शुरू होती है जब आबादी खत्म हो जाती है और वहां तक पहुंचतेपहुंचते सन्नाटा शुरू हो जाता है. खेतों की तरफ निकल जाओ तो न आदमी न आदमजात. इतने अंधेरे में अकेले डर नहीं लगता क्या कुसुम भाभी को.’’

‘‘इस में डरना क्या है. 6 बजे तक वापस आतेआते दिन निकल आता है. अपना ही इलाका है, डर कैसा.’’

‘‘नहीं, शाम की सैर ठीक रहती है. न बच्चों को स्कूल भेजने की चिंता और न ही अंधेरे का डर. भई, अपनेअपने नियम हैं,’’ पत्नी ने अपना नियम मुझे बताया और वह क्यों सही है उसे प्रमाणित करने के कारण भी मुझे समझा दिए. सोचा जाए तो अपनेअपने स्थान पर हर इंसान सही है. पुरानी पीढ़ी के पास नई पीढ़ी को कोसने के हजार तर्क हैं और नई पीढ़ी के पास पुरानी को नकारने के लाख बहाने. इसी मतभेद को दिल से लगा कर अकसर हम अपने अच्छे से अच्छे रिश्ते से हाथ धो लेते हैं.

मेरी बड़ी बहन, जो आगरा में रहती हैं, का एक नियम बड़ा सख्त है. कभी किसी का गहना या कपड़ा मांग कर नहीं पहनना चाहिए. कपड़ा तो कभी मजबूरी में पहनना भी पड़ सकता है क्योंकि तन ढकना तो जरूरत है, लेकिन गहनों के बिना प्राण तो नहीं निकल जाएंगे.

हम किसी शादी में जाने वाले थे. दीदी भी उन दिनों हमारे पास आई हुई थीं. जाहिर है, भारी गहने साथ ले कर नहीं आई थीं. मेरी पत्नी ने अनुरोध किया कि वे उस के गहने ले लें, तो दीदी ने साफ मना कर दिया. मेरी पत्नी को बुरा लगा.

‘‘दीदी ने ऐसा क्यों कहा कि वे कभी किसी के गहने नहीं पहनतीं. मैं कोई पराई हूं क्या? कह रही हैं अपनेअपने उसूल हैं, ऐसे भी क्या उसूल…’’

दीदी शादी में गईं पर उन्हीं हल्केफुल्के गहनों में जिन्हें पहन कर वे आगरा से आई थीं. घर आ कर भी मेरी पत्नी अनमनी सी रही जिसे दीदी भांप गई थीं.

‘‘बुरा मत मानना भाभी और तुम भी अपने जीवन में यह नियम अवश्य बना लो. यदि तुम्हारे पास गहना नहीं है तो मात्र दिखावे के लिए कभी किसी का गहना मांग कर मत पहनो. अगर तुम से वह गहना खो जाए तो पूरी उम्र एक कलंक माथे पर लगा रहता है कि फलां ने मेरा हजारों का नुकसान कर दिया था. जिस की चीज खो जाती है वह भूल तो नहीं पाता न.’’

‘‘अगर मुझ से ही खो जाए तो?’’

‘‘तुम चाहे अपने हाथ से जितना बड़ा नुकसान कर लो…चीज भी तुम्हारी, गंवाई भी तुम ने, अपना किया बड़े से बड़ा नुकसान इंसान भूल जाता है पर दूसरे द्वारा किया सदा याद रहता है.

‘‘मुझे याद है 10वीं कक्षा में हमारी अंगरेजी की किताब में एक कहानी थी ‘द नैकलेस’ जिस में नायिका मैगी मात्र अपनी एक अमीर सखी के घर पार्टी पर जाने के लिए दूसरी अमीर सखी का हीरों का हार उधार मांग कर ले जाती है. हार खो जाता है. पतिपत्नी नया हार खरीदते हैं और लौटा देते हैं. और फिर पूरी उम्र उस कर्ज को उतारते रहते हैं जो उन्होंने लाखों का हार चुकाने को लिया था.

‘‘लगभग 15 साल बाद बहुत गरीबी में दिन गुजार चुकी मैगी को वही सखी बाजार में मिल जाती है. दोनों एकदूसरे का हालचाल पूछती हैं और अमीर सखी उस की गिरी सेहत और बुरी हालत का कारण पूछती है. नायिका सच बताती है और अमीर सखी अपना सिर पीट लेती है, क्योंकि उस ने जो हार उधार दिया था वह तो नकली था.

‘‘नकली ले कर असली चुकाया और पूरा जीवन तबाह कर लिया. क्या पाया उस ने भाभी? इसी कहानी की वजह से मैं कई दिन रोती रही थी.’’

दीदी ने प्रश्न किया तो मुझे भी वह कहानी याद आई. सच है, दीदी अकसर किस्सेकहानियों को बड़ी गंभीरता से लेती थीं. यही एक कहानी गहरी उतर गई होगी मन में.

‘‘दोस्ती हमेशा अपने बराबर वालों से करो, जिन के साथ उठबैठ कर आप स्वयं को मखमल में टाट की तरह न महसूस करो. क्या जरूरत है जेब फाड़ कर तमाशा दिखाने की. अपनी औकात के अनुसार ही जिओ तो जीवन आसान रहता है. मेरा नियम है भाभी कि जब तक जीवनमरण का प्रश्न न बन जाए, सगे भाईबहन से भी कुछ मत मांगो.’’

चुप रहे हम पतिपत्नी. क्या उत्तर देते, अपनेअपने नियम हैं. उन्हें कभी भी नहीं तोड़ना चाहिए. अप्रत्यक्ष में दीदी ने हमें भी समझा दिया था कि हम भी इसी नियम पर चलें. ऐसे नियमों से जीवन आसान हो जाता है, यह सच है क्योंकि हम पूरा का पूरा वजन अपने उस नियम पर डाल देते हैं जिसे सामने वाला चाहेअनचाहे मान भी लेता है. भई, क्या करें नियम जो है.

‘‘रवि साहब, किसी का जूठा नहीं खाते, क्या करें भई, नियम है न इन का. वैसे एक घूंट मेरे गिलास से पी लेते तो हमारा मन रह जाता.’’

‘‘अब कोई इन से पूछे कि जूठा पानी अगर रवि साहब पी लेते तो इन का मन क्यों रह जाता. इन का मन हर किसी के नियम तोड़ने को बेचैन भी क्यों है. इन का जूठा अमृत है क्या, जिसे रविजी जरूर पिएं. संभव है इन्हें खांसी हो, जुकाम हो या कोई मुंह का संक्रमण. रविजी इन का मन रखने के लिए मौत के मुंह में क्यों जाएं? सत्य है, रविजी का नियम उन्हें बीमार होने से तो बचा ही गया न.’’

मेरे एक अन्य मित्र हैं. एक दिन हम ने साथसाथ कुछ खर्च किया. उन्होंने झट से 20 रुपए लौटा दिए.

‘‘20 रुपए हों या 20 लाख रुपए मेरे लिए दोनों की कीमत एक ही है. सिर पर कर्ज नहीं रखता मैं और दोस्ती में तो बिलकुल भी नहीं. दोस्त के साथ रिश्ते साफसुथरे रहें, उस के लिए जब हिसाब करो तो पैसेपैसे का करो. अपना नियम है भई, उपहार चाहे हजारों का दो और लो, कर्ज एक पैसे का भी नहीं. यही पैसा दोस्ती में जहर घोलता है.’’

चुप रहा मैं क्योंकि उन का यह पक्का नियम मुझे भी तोड़ना नहीं चाहिए. सत्य भी यही है कि अपनी जेब से बिना वजह लुटाना भी कौन चाहता है. हमारी एक मौसी बड़ी हिसाब- किताब वाली थीं. वे रोज शाम को खर्च की डायरी लिखती थीं. बच्चे अकसर हंसने लगते. वे भी हंस देती थीं. घर में एक ही तनख्वाह आती थी. कंजूसी भी नहीं करती थीं और फुजूल- खर्ची भी नहीं. रिश्तेदारी में भी अच्छा लेनदेन करतीं. कभी बात चलती तो वे यही कहती थीं :

‘‘अपनी चादर में रहो तो क्या मजाल कि मुश्किल आए. रोना तभी पड़ता है जब इंसान नियम से न चले. जीवन में नियम का होना बहुत आवश्यक है.’’

हमारे एक बहनोई हैं. हम से दूर रहते हैं इसलिए कभीकभार ही मिलना होता है. एक बार शादी में मिले, गपशप में दीदी ने उलाहना सा दे दिया.

‘‘सब से मिलना इन्हें अच्छा ही नहीं लगता,’’ दीदी बोलीं, ‘‘गिनेचुने लोगों से ही मिलते हैं. कहते हैं कि हर कोई इस लायक नहीं जिस से मेलजोल बढ़ाया जाए.’’

‘‘ठीक ही तो कहता हूं सोम भाई, अब आप ही बताइए, बिना किसी को जांचेपरखे दोस्त बनाओगे तो वही हाल होगा न जो संजय दत्त का हुआ. दोस्तीयारी में फंस गया बेचारा. अब किसी के माथे पर लिखा है क्या कि वह चोरउचक्का है या आतंकवादी.

‘‘अपना तो नियम है भाई, हाथ सब से मिलाते चलो लेकिन दिल मिलाने से पहले हजार बार सोचो.’’

आज शाम मैं घर आया तो विचित्र ही खबर मिली. ‘‘आप ने सुना नहीं, आज सुबह कुसुम भाभी को किसी ने सराय के बाहर जख्मी कर दिया. उन के साथ 2 पड़ोसिनें और थीं. कानों के टौप्स खींच कर धक्का दे दिया. सिर फट गए. तीनों अस्पताल मेें पड़ी हैं. मैं ने कहा था न कि इतनी सुबह सैर को नहीं जाना चाहिए.’’

‘‘क्या सच?’’ अवाक् रह गया मैं.

‘‘और नहीं तो क्या. सोना ही दुश्मन बन गया. नशेड़ी होंगे कोई. गंड़ासा दिखाया और अंगूठियां उतरवा लीं. तीनों से टौप्स उतारने को कहा. तभी दूर से कोई गाड़ी आती देखी तो कानों से खींच कर ही ले गए…आप कहते थे न, अपना ही इलाका है, तुम भी जाया करो.’’

निरुत्तर हो गया मैं. मेरी नजर पत्नी के कानों पर पड़ी. सुंदर नग चमक रहे थे. उंगली में अंगूठी भी 10 हजार की तो होगी ही. अगर इस ने अपना नियम तोड़ कर मेरा कहा मान लिया होता तो इस वक्त शायद यह भी कुसुम भाभी के साथ अस्पताल में होती.

आज के परिवेश में क्या गलत और क्या सही. सुबह की सैर का नियम जहां कुसुम भाभी को मार गया, वहीं शाम की सैर का नियम मेरी पत्नी को बचा भी गया. सोना इतना महंगा हो गया है कि जानलेवा होने लगा है. सोच रहा हूं कि एक नियम मैं भी बना लूं. चाहे जो भी हो जाए पत्नी को गहने पहन कर घर से बाहर नहीं जाने दूंगा. परेशान हो गई थी पत्नी.

‘‘नकली गहने पहने तो कौन सा जान बच गई. कुसुम भाभी के टौप्स तो नकली थे. अंगूठी भी सोने की नहीं थी. उन्होंने कहा भी कि भैया, सोना नहीं पहना है.’’

‘‘तो क्या कहा उन्होंने?’’

‘‘बोले, यह देखने का हमारा काम है. ज्यादा नानुकर मत करो.’’

क्या जवाब दूं मैं. आज हम जिस हाल में जी रहे हैं उस हाल में जीना वास्तव में बहुत तंग हो गया है. खुल कर सांस कहां ले पा रहे हैं हम. जी पाएं, उस के लिए इतने नियमों का निर्माण करना पड़ेगा कि हम कहीं के रहेंगे ही नहीं. सिर्फ नियम ही होंगे जो हमें चलाएंगे, उठाएंगे और बिठाएंगे.

रात में हम दोनों पतिपत्नी अस्पताल गए. कुसुम भाभी के सिर की चोट गहरी थी. दोनों कान कटे पड़े थे. होश नहीं आया था. उन के पति परेशान थे, सीधासादा जीवन जीतेजीते यह कैसी परेशानी चली आई थी.

‘‘यह बेचारी तो सोना पहनती ही नहीं थी. पीतल भी पहनना भारी पड़ गया. अब इन हालात में इंसान जिए तो कैसे जिए, सोम भाई. कभी किसी का बुरा नहीं किया इस ने. इसी के साथ ऐसा क्यों?’’

वे मेरे गले से लग कर रोने लगे थे. मैं उन का कंधा थपथपा रहा था. उत्तर तो मेरे पास भी नहीं है. कैसे जिएं हम. जाएं तो जाएं कहां. कितना भी संभल कर चलो, कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता है कि सब धरा का धरा रह जाता है.

Family Story : मंगलसूत्र

Family Story : आधी रात गुजर चुकी थी. अचानक किसी ने कमरे का दरवाजा खोला, तो आवाज सुन कर शकुंतला सोते से जाग उठी. थोड़ी देर पहले ही तो उसे नींद आई थी. देखा तो लड़खड़ाता हुआ उमेश कमरे के अंदर दाखिल हो रहा था. उस के पैर जमीन पर सीधे नहीं पड़ रहे थे. उस ने काफी शराब पी रखी थी.

‘‘सौरी शकुंतला, दोस्तों ने जबरदस्ती दारू पिला दी. मैं ने उन्हें काफी मना किया, लेकिन उन सब ने मेरी…’’ अपनी बात पूरी करने से पहले ही नशे की हालत में उमेश बेसुध सा पलंग पर गिर पड़ा.

शकुंतला चुपचाप उमेश की ओर देखती रही. उसे कुछ भी सम झ में नहीं आ रहा था. उमेश को इस हालत में देख कर शकुंतला के भीतर कहीं पत्थर सी जड़ता उभर आई थी. कुछ देर तक शकुंतला जड़वत सी उमेश को बेसुध पड़ा हुआ देखती रही.

कमरे में रजनीगंधा और गुलाब के फूलों की खुशबू फैली हुई थी. विवाहित जोड़े के स्वागत के लिए कमरे की सजावट में कोई कोरकसर नहीं थी. लाल सुर्ख जोड़े में सजीसंवरी शकुंतला पिछले कई घंटों से उमेश का इंतजार कर रही थी. थोड़ी देर पहले ही तो उस की आंख लगी थी.

कितनी सारी बातें शकुंतला ने सोच रखी थीं कहनेसुनने को, पर… शकुंतला ने भरपूर नजर से सोते हुए उमेश की ओर देखा और मन ही मन सोचा, ‘बेचारा उमेश… सच में इस सब में इस की क्या गलती… जरूर इस के दोस्तों ने ही इसे जबरदस्ती दारू पिलाई होगी…’

बेहद सरल स्वभाव की शकुंतला शादी के बाद जब विदा हो कर अपनी ससुराल आई तो किसी भी नई ब्याहता की तरह ही उस की आंखों में भी शादीशुदा जिंदगी के प्रति कुछ सपने थे.

2 कमरे का एक छोटा सा फ्लैट, जिस में शकुंतला की ससुराल वालों के नाम पर, उस की विधवा ननद और शकुंतला का पति उमेश था. उस के सासससुर का देहांत काफी पहले हो चुका था. विधवा ननद प्रतिमा की ससुराल भी पटना में ही थी, लेकिन वह अपने मायके में अपने भाई के पास ही रहती थी.

शकुंतला का पति उमेश किसी प्राइवेट कंपनी में था. ग्रेजुएशन करने के बाद शकुंतला ने अपने कैरियर को ले कर ज्यादा कुछ कभी सोचा नहीं था. उस का सपना भी उस के गांव की सहेलियों की तरह ही एक छोटे से खुशहाल परिवार और एक बेहद प्यार करने वाले पति तक ही सीमित था.

सुबह जैसे ही शकुंतला कमरे से बाहर निकलने को हुई कि उस के कानों में बेहद हलका स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘शकुंतला…’’ उस के पास आ कर किसी ने बेहद धीमे से उस के कानों में कहा, तो वह चौंक कर ठिठक गई.

शकुंतला की सहमी हुई सी आंखें उमेश पर ठहर गईं, ‘‘आप…’’

‘‘कल रात के लिए मु झे माफ कर दो,’’ उमेश ने शकुंतला को अपनी बांहों में समेटते हुए कहा.

धीरेधीरे उमेश की सांसों की गरमाहट शकुंतला के पूरे बदन पर फैलने लगी. वह शरमाते हुए वहां से चली गई.

शकुंतला को नाश्ता बनाने में देर हो गई. इस बात पर उमेश काफी नाराज हो गया.

‘‘इस से भूख बरदाश्त नहीं होती. अब जब तुम ने देरी की है, तो इस की नाराजगी भी तुम्हें ही झेलनी होगी,’’ प्रतिमा ने उमेश को कुछ कहने के बजाय शकुंतला को ही हिदायत दे दी.

‘‘कोई बात नहीं. अभी नईनई गृहस्थी है, धीरेधीरे सीख जाएगी,’’ प्रतिमा ने नाश्ते की प्लेट उमेश के आगे कर दी.

धीरेधीरे उमेश हर छोटीबड़ी बात पर शकुंतला को डांटने लगा और जब शकुंतला इन बातों से आहत होती, तो प्रतिमा उसे घरगृहस्थी के तौरतरीके सम झा कर शांत कर देती.

जब कभी हद से ज्यादा बात बिगड़ जाती, तब उमेश से नाराज हो कर शकुंतला उस से कुछ दिन बात नहीं करती थी. तब उमेश कोई न कोई गिफ्ट उसे पकड़ा देता था, अपने किए की उस से माफी भी मांग लेता था और फिर बात आईगई हो जाती थी.

‘‘दोपहर की ट्रेन से मुझे कोलकाता निकलना है. औफिस का कुछ काम है,’’ एक दिन अचानक ही उमेश ने शकुंतला से कहा.

‘‘आप ने पहले से कुछ बताया नहीं, अचानक कोलकाता जाने का प्रोग्राम कैसे बना?’’ शकुंतला ने पूछा.

‘‘तुम ज्यादा सवाल मत पूछो. मेरे साथ सतीश और हरीश भी जा रहे हैं. किसी की भी पत्नी इतने सवाल नहीं पूछती… तुम फटाफट मेरा सामान पैक करो,’’ उमेश ने तेवर दिखाए.

उमेश को कोलकाता गए 3 दिन हो गए थे और उस ने एक बार भी न तो शकुंतला को फोन किया और न ही शकुंतला की किसी भी फोन काल को रिसीव किया, तब हार मान कर शकुंतला ने सतीश को फोन कर दिया.

सतीश ने फोन तो उठाया, पर वह घबराया सा लगा और उस ने तुरंत फोन काट दिया.

शकुंतला को सतीश का यह बरताव कुछ अजीब सा लगा. सतीश के फोन कट करते ही कुछ ही सैकंड के भीतर शकुंतला को उमेश का फोन आया, ‘क्या है? क्यों बारबार फोन कर के परेशान कर रही हो?’

उमेश फोन पर ही शकुंतला पर चिल्ला पड़ा, लेकिन तभी शकुंतला को दूसरी तरफ से किसी लड़की के हंसने की आवाज सुनाई पड़ी.

शकुंतला उमेश से कुछ पूछ पाती, इस से पहले ही उमेश ने फोन कट कर दिया और इस के बाद शकुंतला ने जितने भी फोन किए, उमेश ने किसी का भी रिप्लाई नहीं दिया.

थकहार कर शकुंतला ने हरीश को फोन लगाया. जवाब में उस ने बताया, ‘उमेश मेरे साथ नहीं है. वह सतीश के साथ इस समय सोनागाछी गया हुआ है. सोनागाछी कोलकाता का रैडलाइट एरिया है. वे दोनों हर रात वहीं जाते हैं.’

हरीश से मिली इस जानकारी के बाद शकुंतला ने दोबारा उमेश को फोन किया, पर उमेश का फोन स्विचऔफ था.

अगली सुबह उमेश ने खुद ही शकुंतला को फोन किया. उस ने बताया कि वह तो यहां के एक मंदिर में देवी के दर्शन करने आया है.

लेकिन जब शकुंतला ने उमेश से पिछली रात की हकीकत के बारे में जानना चाहा और हरीश से मिली उस जानकारी पर सवाल किए, तब उमेश गुस्से में शकुंतला के ऊपर फोन पर ही चीखनेचिल्लाने लगा.

‘तुम्हें मु झ पर जरा भी भरोसा नहीं है, तुम उस हरीश की बातों में आ कर मु झ पर झूठा इलजाम लगा रही हो. यह हरीश मु झ से अपनी पुरानी दुश्मनी निकालने की खातिर तुम्हें बरगला रहा है. वहां आने पर तुम्हें सारी हकीकत बताऊंगा,’ इतना कह कर उमेश ने फोन कट कर दिया.

शकुंतला बेसब्री से उमेश के लौटने का इंतजार करने लगी.

‘‘आज तुम्हारी पटना के लिए ट्रेन थी. तुम कोलकाता से अब तक नहीं लौटे,’’ फोन पर कहते हुए शकुंतला परेशान हो उठी.

‘मैं पटना पहुंच गया हूं, लेकिन रास्ते में हनुमान मंदिर पड़ता है न… तो बिना दर्शन किए कैसे आगे निकल जाता, पूजापाठ करने में ही वक्त निकल गया. तुम चिंता मत करो. मैं बस पहुंच ही रहा हूं.’

2 घंटे बाद वापस शकुंतला ने फोन किया, तो जवाब में उमेश ने कहा, ‘रास्ते में सुनार की दुकान दिख गई.

मु झे याद आया कि तुम्हारे लिए मैं ने झुमके बनाने का और्डर दिया था, वही झुमके जो तुम कितने दिनों से खरीदना चाह रही थी… वही लेने के लिए रुका था कि इतने में तुम्हारा मंगलसूत्र जो टूट गया था, जो बनाने के लिए दिया था, उस दुकानदार का भी फोन आ गया, तो उसे भी लेने आ गया. मैं बस पहुंच ही रहा हूं.’

उमेश जब घर पहुंचा, तो शकुंतला बाहर ड्राइंगरूम में बैठी उस के आने का इंतजार कर रही थी. शकुंतला को कुछ भी पूछने या कहने का मौका दिए बिना ही उस के हाथ में प्रसाद के साथसाथ मंगलसूत्र और झुमके पकड़ा कर उमेश फ्रैश होने चला गया और कुछ देर बाद वह खुद को बेहद थका हुआ बता कर अपने कमरे में आराम करने चला गया.

रात को कमरे में आने के बाद शकुंतला ने वापस उमेश के सामने अपने वही सवाल दोहराए, लेकिन शकुंतला के सवालों का कोई भी सही जवाब दिए बिना उमेश ने उसे खींच कर अपने सीने से लगा लिया.

‘‘तुम्हें तो इस बात का भी एहसास नहीं है कि मैं तुम्हारे लिए मंदिरमंदिर घूमघूम कर किस तरह पूजाअर्चना करता आया हूं. अपने घर की सुखशांति और खुशियों के लिए मन्नत मांगता फिर रहा हूं और तुम हो कि किसी बाहर वाले के बहकावे में आ कर अपनी ही बसीबसाई गृहस्थी को उजाड़ने पर तुली हो…’’

उमेश ने दुखी होने का नाटक किया, ‘‘तुम जानती नहीं हो कि हरीश कैसा आदमी है. वह जलता है मु झ से. उस की अपनी पत्नी तो हर वक्त मायके भागी रहती है, इसीलिए दूसरों की गृहस्थी में आग लगाने की कोशिश करता रहता है.’’

उमेश को इस तरह दुखी होता देख शकुंतला खुद को ही इन सारी बातों का कुसूरवार सम झने लगी.

‘‘शकुंतला, आज मैं तुम्हें ऐसी खबर सुनाने वाला हूं, जिसे सुनते ही तुम खुशी से झूम उठोगी,’’ एक दिन अचानक ही उमेश ने शकुंतला से कहा, ‘‘मु झे मुंबई की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिली है. मैं अगले हफ्ते ही मुंबई जा रहा हूं.’’

शकुंतला हैरानी से उमेश को देखती रह गई, क्योंकि उमेश ने कभी भी शकुंतला से इस बात का जिक्र भी नहीं किया था कि वह नौकरी बदलने की सोच रहा है या वह मुंबई की किसी कंपनी में नौकरी के लिए अप्लाई कर रहा है. अब आज अचानक उसे यह खबर सुनाई जा रही है.

शकुंतला को यह सम झ में नहीं आ रहा था कि वह खुशी जाहिर करे या नाराजगी, क्योंकि उमेश ने अभी तक उस से यह बात छिपा कर रखी थी. अगर उमेश यह बात उसे पहले बता देता, तो भी शकुंतला उस के इस फैसले में कौन सी अड़चन डालने वाली थी, बल्कि उसे तो खुशी होती.

मुंबई जाने से पहले नाटक करते हुए उमेश शकुंतला के गले से लिपट कर रोने लगा कि जैसे उसे शकुंतला को यहां अकेली छोड़ कर जाते हुए बहुत दुख हो रहा हो कि वह जा तो रहा है, पर उस का दिल तो यहां शकुंतला के पास ही रहेगा.

जातेजाते उस ने शकुंतला से कहा कि वह मुंबई में जैसे ही रहने की अच्छी जगह ढूंढ़ लेगा, उसे भी वहीं अपने पास बुला लेगा.

उमेश को विदा करते हुए शकुंतला की आंखें भी नम हो उठीं. उस का दिल भी यह सोच कर बैठा जा रहा था कि वहां मुंबई जैसे बड़े शहर में उमेश का खयाल कौन रखेगा.

खैर, देखतेदेखते समय भी अपनी रफ्तार से बीतता चला गया. पहले कुछ दिन, फिर हफ्ते, फिर महीने, फिर एकएक कर 3 साल का लंबा वक्त निकलता चला गया.

शकुंतला उमेश के आने का इंतजार करती रही और वह हर बार कोई न कोई बहाना बनाता रहा.

शुरू के कुछ महीने तो उमेश अकसर फोन कर के शकुंतला से उस का हालचाल पूछ लिया करता था. लेकिन, जैसेजैसे समय बीतता गया, उमेश का फोन भी आना बंद हो गया… धीरेधीरे घरखर्च के पैसे भी देने बंद कर दिए.

शकुंतला जब पूछती, तब वह अपनी ही मजबूरियों की गठरी उस के आगे खोल देता, अपनी बेचारगी का रोना शकुंतला के आगे वह कुछ इस तरह रोता कि शकुंतला की जबान पर ताले लग जाते.

शकुंतला ने भी धीरेधीरे हार मान कर उस से पैसे मांगने बंद कर दिए. अब वह शकुंतला के फोन का जवाब भी अपनी सुविधा के हिसाब से ही देता. धीरेधीरे उस ने फोन करने भी कम कर दिए. इधर शकुंतला ने भी हालात से सम झौता कर लिया था.

शकुंतला अब कैसे भी कर के उमेश की मदद करने की बात सोचने लगी. खुद के लिए नौकरी ढूंढ़नी शुरू कर दी, ताकि जिस से वह उमेश पर बो झ भी न बने और जरूरत पड़ने पर उस की पैसे से मदद भी कर सके.

शकुंतला ने जगहजगह नौकरी के लिए अर्जी भेजनी शुरू कर दी, लेकिन कुछ चीजों में उस की जानकारी की कमी के चलते उसे नौकरी मिलने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था.

शकुंतला की सब से बड़ी कमी उस के अंदर आत्मविश्वास की थी. इंटरव्यू के दौरान वह बोलने में अटक जाती थी, इसलिए अब वह अपनी ऐसी बहुत सी छोटीछोटी कमियों पर जीत हासिल करने की कोशिश में जुट गई.

सिलाई तो शकुंतला को पहले से आती थी, उस ने पास के ही एक बुटीक में पार्टटाइम नौकरी भी पकड़ ली. उन्हीं पैसों से उस ने पर्सनैलिटी डवलपमैंट का कोर्स किया. साथ ही साथ उस ने प्रोडक्ट मैनेजमैंट का भी कोर्स कर लिया.

एक दिन शकुंतला की खुशी का ठिकाना न था, जब उसे मुंबई की ही एक कंपनी से नौकरी का औफर आया. उस ने सोचा कि नौकरी मिलने की बात फिलहाल वह उमेश को नहीं बताएगी. नौकरी जौइन करने के बाद जब उस के हाथ में पहली तनख्वाह के पैसे आ जाएंगे, फिर वह उमेश को बता कर एकदम से हैरान कर देगी.

मुंबई शहर शकुंतला के लिए बिलकुल नया था. उस ने एक पीजी होस्टल में किराए पर एक कमरा ले लिया और रहने लगी. उस की रूम पार्टनर नीता बहुत ही खूबसूरत और मिलनसार थी. बहुत ही कम समय में वह उस की बैस्ट फ्रैंड बन गई.

शकुंतला को अब इंतजार था तो बस पहले महीने की मिलने वाली उस की सैलरी का, जिसे पाने के बाद वह उमेश के साथ रहने चली जाएगी.

शकुंतला उमेश को परेशान नहीं करना चाहती थी और न ही अपने खर्चे का बो झ उस पर डालना चाहती थी, इसलिए वह अपने पहले महीने की सैलरी मिलने के बाद ही मुंबई पहुंचने की सूचना उमेश को दे कर उस के साथ रहना चाहती थी.

अब जबकि वह भी कमा रही है, तो घर के खर्चे का बो झ दोनों साथ मिल कर उठाएंगे. ऐसे में साथ रहने पर उमेश को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी. यही सोचते हुए वह उमेश से मिलने के दिन गिनती रहती.

‘‘तुम्हारा कल का कोई प्रोग्राम तो नहीं है. मेरा मतलब है कि कल तुम फ्री हो न?’’ शकुंतला के औफिस से आते ही नीता ने अचानक पूछा.

‘‘नहीं, कुछ खास काम नहीं है. वैसे, कल औफिस की छुट्टी है, तो सारा दिन आराम करने की सोची है. लेकिन, तुम बताओ कि ऐसा क्यों पूछ रही हो?’’ शकुंतला नीता के पास आ कर बोली.

‘‘मैं तुम्हें निमंत्रण देना चाह रही थी. कल मेरी रिंग सैरेमनी है. बहुत ज्यादा लोगों को न्योता नहीं दिया है, सिर्फ कुछ खास दोस्तों को ही बुलाया है.

‘‘मम्मीपापा मेरे फैसले के खिलाफ हैं, इसलिए उन्होंने आने से मना कर दिया है. मैं पिछले एक साल से मम्मीपापा को मनाने की कोशिश कर रही हूं, लेकिन मालूम नहीं कि उन्हें उमेश में क्या खराबी नजर आती है.’’

उमेश का नाम सुन कर शकुंतला एक पल के लिए चौंक गई, फिर उस ने सोचा, ‘एक नाम के कई लोग हो सकते हैं.’

‘‘मैं उमेश से बहुत प्यार करती हूं. उस के बिना मैं जिंदगी के बारे में सोच भी नहीं सकती. तुम नहीं जानती शकुंतला कि उमेश कितना अच्छा और नेक है. जब से वह मेरी जिंदगी में आया है, मेरी तो दुनिया ही बदल गई है. सच्चा प्यार क्या होता है, उसी ने मु झे सिखाया है,’’ उमेश के प्यार में दीवानी नीता शकुंतला के सामने उमेश चालीसा पढ़े जा रही थी और शकुंतला चुपचाप उस की बातों को सुन रही थी.

‘‘क्या तुम्हारे पास उमेश की कोई तसवीर है? जरा मैं भी तो देखूं, मेरी प्यारी दोस्त जिस के प्यार में इतनी दीवानी है, वह दिखता कैसा है?’’

‘‘क्यों नहीं, यह देखो,’’ नीता एकएक कर उमेश के साथ वाली बहुत सारी तसवीरें अपने मोबाइल फोन की स्क्रीन पर शकुंतला को दिखाती चली गई.

शकुंतला अपलक उन तसवीरों को देखती रह गई. उस के लिए यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा था. उस के दिल में टीस सी उठने लगी, चेहरा मुरझा गया, आंखों में आंसुओं का सैलाब उतरने लगा, जिसे उस ने बड़े ही जतन से काबू कर लिया.

‘‘नीता, तुम उमेश को कितने समय से जानती हो?’’ शकुंतला ने खुद को संभालते हुए नीता से सवाल पूछा.

‘‘पिछले 2 साल से.’’

‘‘क्या तुम ने उमेश के बारे में भी सबकुछ ठीक से जांचपड़ताल की है. मेरा मतलब है कि वह इनसान कैसा है और उस के परिवार में कौनकौन लोग हैं?’’

‘‘यार शकुंतला, तुम बिलकुल मेरे मम्मीपापा की तरह बातें कर रही हो. प्यार जांचपड़ताल कर के नहीं किया जाता, वह तो बस हो जाता है.

‘‘और रही बात उमेश के बारे में जानने की, तो उमेश ने मु झ से कभी भी कोई बात नहीं छिपाई. यहां तक कि उस ने अपनी पहली शादी के बारे में भी मु झे सबकुछ सचसच बता दिया है कि कैसे उस की पहली पत्नी की मौत शादी के कुछ दिन बाद हो गई.

‘‘बेचारे ने तो शादी का सुख भी नहीं भोगा. अब तुम बताओ, क्या अभी भी मु झे उस की ईमानदारी पर शक करना चाहिए?’’

‘‘नीता, क्या तुम ने उमेश की पहली पत्नी की तसवीर देखी है?’’

‘‘नहीं, इस की जरूरत ही नहीं है. जिस बात से उमेश को तकलीफ पहुंचती हो, वह बात मु झे करना भी पसंद नहीं. प्यार करने वाले जख्मों को भरा करते हैं, उसे कुरेदा नहीं करते.’’

‘‘पर, अगर कभी उमेश की पहली पत्नी अचानक तुम्हारे सामने आ कर खड़ी हो जाए, अगर वह जिंदा हो, उस की मौत ही न हुई हो, फिर तुम क्या करोगी?’’

‘‘यह बात तो मैं मान ही नहीं सकती. ऐसा कभी हो ही नहीं सकता. अगर ऐसा हुआ भी जैसा कि तुम कह रही हो, तब भी मैं उमेश का साथ नहीं छोड़ूंगी. मैं तब भी अपने कदम पीछे नहीं हटाऊंगी. उस की पहली पत्नी को ही पीछे हटना होगा. अगर वह जिंदा थी, तो इतने सालों तक उस ने उमेश की खोजखबर क्यों नहीं ली?

‘‘मैं यही सम झूंगी कि जरूर इस में उमेश की कोई न कोई मजबूरी रही होगी. मैं उमेश से जुदा हो कर जी नहीं सकूंगी.’’

शकुंतला का मन उमेश के प्रति नफरत से भर गया. कैसे उस ने जीतेजी उसे मरा हुआ बता दिया. उस का मन पीड़ा से भर उठा. क्या शादी का बंधन, उस की पवित्रता, उस की मर्यादा को निभाने की, अग्निकुंड के सामने मंत्र उच्चारण के साथ जो वचन लिए गए थे, उन्हें निभाने की जिम्मेदारी सिर्फ उसी की थी?

मंगलसूत्र टूट जाने पर शकुंतला को कितनाकुछ सुनाया था. वह हर वक्त डरती रही कि गलती से भी कहीं मंगलसूत्र उस के गले से निकल कर टूट न जाए, जबकि उमेश ने तो यहां उस के भरोसे, उस के आत्मसम्मान को ही चकनाचूर कर दिया.

क्या उस के आत्मसम्मान की कीमत उस के मंगलसूत्र से भी कम है? क्या इस समाज में मंगलसूत्र, सिंदूर और बिंदी की कीमत किसी औरत के आत्मसम्मान से ज्यादा है?

इस समाज में कितनी ही ऐसी औरतें हैं, जिन के पति उन्हें न तो पूरी तरह अपनाते हैं और न ही आजाद हो कर जीने का हक देते हैं. वे शादीशुदा होते हुए भी अकेले जिंदगी बिताने को मजबूर रहती हैं, जबकि उन के पति उन्हें अकेला छोड़ कर ऐशोआराम की जिंदगी बड़े शान से जी रहे होते हैं. तब यही समाज उन के पतियों से कुछ नहीं कहता. लेकिन, किसी औरत के गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर न पा कर सभी उस की बुराई करने लग जाते हैं.

अगर शकुंतला मुंबई नहीं आई होती, तो वह कभी भी अपने पति उमेश की हकीकत जान ही नहीं पाती. वह तो अकेली सुहागन होने का, शादीशुदा होने का तमगा लटकाए जिंदगी को ढोने के लिए मजबूर कर दी जाती.

शकुंतला कुरसी पर बैठे हुए बहुत देर तक मन ही मन काफीकुछ सोचती रही. उस के सामने ड्रैसिंग टेबल पर लगा हुआ आईना था, जिस पर उस ने पिछले दिन ही अपनी बिंदी उतार कर चिपकाई थी, जो उस की ओर झांक रही थी.

शकुंतला रूमाल से आईने को साफ करने लगी. वह रूमाल को आईने पर तब तक रगड़ती रही, जब तक कि वह बिंदी पूरी तरह निकल नहीं गई.

अगले दिन शकुंतला आत्मविश्वास के साथ रिंग सैरेमनी फंक्शन में नीता के बताए पते पर पहुंच गई. समारोह किसी होटल में था. नीता काफी खुश नजर आ रही थी.

शकुंतला को देखते ही नीता दौड़ कर उस के गले मिली. शकुंतला का हाथ पकड़ कर वह उसे उमेश के पास ले गई और उस का परिचय उमेश से कराते हुए बोली, ‘‘उमेश, यह है मेरी सहेली शकुंतला. यह मुंबई की एक बड़ी कंपनी में प्रोडक्ट मैनेजर है.’’

शकुंतला उमेश से ऐसे मिली, जैसे उसे पहली बार देखा हो, जबकि शकुंतला को देख कर उमेश हक्काबक्का रह गया.

शकुंतला उन दोनों के लिए 2 अलगअलग गिफ्ट ले आई थी. वह गिफ्ट दे कर वहां से होस्टल के लिए निकल गई.

नीता के होस्टल पहुंचने से पहले ही शकुंतला होस्टल छोड़ कर कहीं दूसरी जगह शिफ्ट हो गई थी. दूसरी तरफ समारोह खत्म होने के बाद जब उमेश अपने कमरे में अकेला था, तब उस ने शकुंतला का दिया हुआ गिफ्ट खोला. एक बौक्स के अंदर मंगलसूत्र और झुमके के साथ ही उस की लिखी एक चिट्ठी भी थी.

चिट्ठी में शकुंतला ने लिखा था, ‘यह मंगलसूत्र मेरे लिए जंजीर से ज्यादा कुछ नहीं. मैं इस के बो झ से खुद को आजाद कर रही हूं… लेकिन हां, तुम ने अब तक मेरे साथ जोकुछ किया, वह सब नीता के साथ मत करना. वह तुम से बहुत प्यार करती है. कम से कम उस की इस बात की ही इज्जत रखना.

‘मैं ने उसे तुम्हारी कोई भी हकीकत अभी तक नहीं बताई है, नहीं तो प्यार से उस का भरोसा उठ जाता. जिस दिन इस दुनिया में लोगों का प्यार से भरोसा उठ गया, उस दिन यह दुनिया जीने लायक नहीं रहेगी और यह मैं बिलकुल नहीं चाहती…

‘जो धोखा तुम ने मु झे दिया है, वह नीता को कभी मत देना. एक शादीशुदा औरत के लिए उस के पति से मिलने वाली इज्जत और प्यार ही सब से बड़ा सिंगार होता है, उस का सब से कीमती जेवर होता है, जिस की कमी को दुनिया का महंगा से महंगा जेवर भी पूरा नहीं कर सकता.

‘मंगलसूत्र के साथ मैं झुमके भी तुम्हें लौटा रही हूं, जो तुम ने उस दिन अपने उस बड़े से झूठ पर परदा डालने और मेरा विश्वास जीतने के लिए दिए थे. तुम्हें तलाक का नोटिस मैं बहुत जल्दी ही भेज दूंगी.’

शकुंतला की लिखी चिट्ठी को उमेश बारबार पढ़ता रहा. अपने दिल के किसी कोने में आज पहली बार उसे दर्द का एहसास हुआ.

लेखिका – गायत्री ठाकुर

Hindi Story : हैसियत

Hindi Story : ‘‘सौरभ, हम कब तक इस तरह मिलतेजुलते रहेंगे…’’ चंपा से आखिरकार रहा न गया, ‘‘अब हमें जल्दी ही शादी कर लेनी चाहिए.’’

‘‘शादी भी कर लेंगे चंपा,’’ सौरभ बोला, ‘‘पहले हम बीए कर लें.’’

‘‘तुम नहीं जानते हो सौरभ, मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं…’’

‘‘क्या कह रही हो तुम?’’ हैरानी से सौरभ बोला, ‘‘चलो, अस्पताल जा कर बच्चा गिरा देते हैं.’’

‘‘नहीं सौरभ, यह हमारे प्यार की निशानी है…’’ चंपा बोली, ‘‘मैं बच्चा नहीं गिराना चाहती हूं.’’

‘‘मगर, मैं तुम से शादी नहीं कर सकता,’’ सौरभ ने कहा.

‘‘क्यों नहीं कर सकते? क्या परेशानी हैं तुम्हें?’’ चंपा जरा तेज आवाज में सौरभ से बोली.

‘‘तुम हमारी हैसियत के बराबर नहीं हो,’’ सौरभ बोला.

‘‘जब मैं तुम्हारी हैसियत के बराबर नहीं थी, तब तुम ने क्यों प्यार किया मुझ से…’’ नाराज हो कर चंपा बोली, ‘‘अब तुम्हें शादी तो करनी ही पड़ेगी मुझ से.’’

‘‘शादी करूं और तुम से… किसी और का पाप मुझ पर क्यों डाल रही हो?’’ जब सौरभ ने यह कहा, तब चंपा का गुस्सा भीतर ही भीतर बढ़ गया. वह गुस्से से बोली, ‘‘क्या कहा तुम ने कि शादी नहीं करोगे? मतलब, तुम्हारा प्यार केवल मेरे जिस्म तक ही था.’’

‘‘हां, यही समझ लो. अब कभी मिलने की कोशिश मत करना,’’ चंपा से इतना कह कर सौरभ गाड़ी में बैठ कर नौ दो ग्यारह हो गया.

चंपा ठगी सी रह गई. जिस सौरभ पर चंपा ने पूरा विश्वास किया, आगे रह कर उस ने प्रेम के अंकुर बोए, उस ने ही उसे धोखा दे दिया.

चंपा और सौरभ एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों एक ही गांव में रहते थे.

सौरभ गांव के एक अमीर किसान अमृतलाल का बेटा था. उस की गांव में ढेर सारी खेती थी. खेती के अलावा अमृतलाल के और भी धंधे थे, जिन्हें वह गुपचुप तरीके से करता था, इसलिए उस के पास काली दौलत भी बहुत थी.

अमृतलाल राजनीति में भी दखल देता था, इसलिए भोपाल तक अमृतलाल की पहचान थी. थाने को भी उस ने अपनी काली दौलत से खरीद लिया था. गांव में उस का दबदबा था. सब लोग उस से डरते भी थे, इसलिए कभी थाने में शिकायत भी नहीं करते थे. जिस थाने में शिकायत की गई, वह उसी थाने को खरीद लेता था.

अमृतलाल का सब से छोटा बेटा सौरभ कालेज में पढ़ रहा था और उस के लिए शहर में ही घर बना दिया था.

चंपा एक गरीब किसान चंपालाल की बेटी थी. उस के पिता के पास थोड़ी सी जमीन थी, उस से उतनी ही पैदावार होती थी, जिस से पेट भर सके, इसलिए कभीकभी वह अमृतलाल के यहां मजदूरी भी करता था.

जब चंपा ने हायर सैकेंडरी का इम्तिहान अच्छे नंबरों से पास किया, तब उस की इच्छी थी कि वह शहर जा कर कालेज में पढ़े. पर उस की मां दुर्गा देवी ने साफसाफ कह दिया था कि कालेज जा कर लड़की को बिगाड़ना नहीं है.

मां का विरोध देख कर पिता ने भी चंपा को कालेज जाने से मना कर दिया था. मगर, उस की जिद ने पिता को पिघला दिया.

जब चंपा का कालेज में एडमिशन हो गया, तब सुबह वह गांव से बस में बैठ कर शहर चली जाती, 2-4 पीरियड पढ़ कर गांव लौट आती.

एक बार चंपा कालेज के दालान में सौरभ से टकरा गई. दोनों की आंखें मिलीं. आंखों ही आंखों में इशारा
हो गया.

वे दोनों ही जानते थे कि एक ही गांव के रहने वाले हैं. दोनों में कब प्यार हो गया, उन्हें पता ही नहीं चला.

सौरभ चंपा की हर मांग पूरी करने लगा. चंपा भी उस के प्यार में पागल सी हो गई. कभीकभी वह कालेज से सौरभ के बंगले में पहुंच जाती. उस की बांहों में समा जाती. तब सौरभ कहता, ‘‘चंपा, मैं तुझ से ही शादी करूंगा.’’

‘‘सच कह रहे हो न सौरभ?’’ चंपा पूछती, ‘‘तुम मुझे धोखा दे कर जाओगे तो नहीं?’’

‘‘नहीं, कभी नहीं. यह मेरा वादा है, पक्का वादा है,’’ जब सौरभ बोला, तब जोश में आ कर चंपा ने शहर वाले बंगले में उसे अपना जिस्म सौंप दिया. इसी का नतीजा आज यह हुआ है कि वह उस के बच्चे की मां बनने वाली है.

भावुकता भरा कदम चंपा को इतना महंगा पड़ जाएगा, उसे पता नहीं था. आज सौरभ ने शादी करने से मना कर दिया, तब उस को लगा कि वह न घर की रही, न घाट की.

जब इस बात का पता मां और पिता को चलेगा, तब उन के दिल पर क्या बीतेगी. अब वह अपनी मां को कैसे बताए कि उस के पेट में सौरभ का बच्चा पल रहा है. वह प्यार में धोखा खा चुकी है. गांव वाले और रिश्तेदारों को पता चलेगा कि वह कुंआरी मां बन रही है, तब उस के मांबाप की कितनी किरकिरी होगी. क्या वह अपने बच्चे को गिरा दे? गिरा देगी… तब भी सब को यह पता चल ही जाएगा.

इस वजह से आज चंपा दोराहे पर खड़ी थी. आखिर दाई से वह कब तक पेट छिपाए रखेगी… शादी करने का वादा करने के बाद भी सौरभ ने मना कर दिया. प्यार में उस ने धोखा खाया.

कालेज से वापस अपने घर आने के बाद चंपा का मन बेचैन रहा. क्या वह मां को सचसच बता दे? आज नहीं तो कल मां को तो मालूम पड़ ही जाएगा. इस मामले में मांएं तो उड़ती चिडि़या भांप लेती हैं.

‘‘कालेज से आ गई बेटी… खाना खाया?’’ जब मां दुर्गा देवी ने कहा, तब चंपा बोली, ‘‘खाने की इच्छा नहीं है.’’

‘‘तो क्या शहर से खा कर आई है?’’ मां ने जब यह सवाल पूछा, तब चंपा बोली, ‘‘नहीं मां, मुझे तुम से एक बात कहनी है.’’

‘‘क्या बात है?’’

‘‘पहले मुझे यह वचन दो कि आप नाराज नहीं होंगी मुझ से,’’ अभी चंपा यह बात कह ही रही थी कि पिता चंपालाल भी आ गया.

तब दुर्गा देवी ने पूछा, ‘‘बोल, क्या कहना चाहती है?’’

‘‘मां, मेरी बात सुन कर तुम बहुत नाराज हो जाओगी, इसलिए कहने में डर रही हूं,’’ जब चंपा ने यह बात कही, तब चंपालाल बोला, ‘‘कह दे, बेझिझक कह दे. तेरी मां नाराज नहीं होगी. क्या कहना चाहती है?’’

‘‘बापू, मुझ से भारी भूल हो गई.’’

‘‘कुछ बताएगी भी, वरना हमें कैसे पता चलेगा… कह दे बेटी, हम नाराज न होंगे,’’ चंपालाल ने कहा.

‘‘बापू, मैं अमृतलाल के बेटे सौरभ से प्यार करती हूं. वह भी मुझे बहुत प्यार करता है. उस ने मुझ से शादी करने का वादा किया और मैं ने अपना जिस्म उसे सौंप दिया. अब उस का बच्चा मेरे पेट में पल रहा है,’’ अभी चंपा यह बात कह रही थी कि मां दुर्गा देवी बीच में ही गुस्से से उबल पड़ी, ‘‘क्या कहा कि तू पेट से है?… तू ने तो हमारी इज्जत को ही उछाल दिया. आग लगे तेरी जवानी को. मैं ने पहले ही कहा था कि इस करमजली को शहर में पढ़ने मत भेजो. उसी का नतीजा है कि इस के…’’

‘‘चुप रहो दुर्गा, कुछ भी बक देती हो,’’ नाराज हो कर चंपालाल बीच में ही बात काट कर बोला.

‘‘कैसे चुप रहूं…’’ दुर्गा देवी गुस्से से बोली, ‘‘इस ने हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी और आप कह रहे हो कि चुप हो जाऊं? मैं तो शहर में कालेज भेजने के खिलाफ थी, मगर आप ने कहां चलने दी मेरी.

‘‘आप की लाड़ली बेटी है न और यह गुल खिला दिया. अब कौन करेगा इस से शादी. इसे सब बदचलन कह कर नकार देंगे.’’

‘‘थोड़ी देर के लिए चुप भी हो जाओ…’’ फिर समझाते हुए चंपालाल बोला, ‘‘अभी मैं अमृतलाल के पास जाता हूं और उस से चंपा के रिश्ते की बात करता हूं.’’

‘‘बापू, वहां जाने से कोई फायदा नहीं. सौरभ ने मुझ से शादी करने से यह कह कर मना कर दिया कि हम गरीबों की हैसियत उन के बराबर नहीं है,’’ जब चंपा ने यह बात कही, तब चंपालाल बोला, ‘‘अरे, हैसियत बता कर वह बच नहीं सकता है. थाने में रपट…’’

‘‘थाने में रपट लिखवाने से कुछ न होगा. वह थाने को भी खरीद लेगा. उस के पास बहुत पैसा है…’’ बीच में ही बात काट कर दुर्गा देवी बोली, ‘‘माना कि थानेदार रपट लिख भी लेगा, मुकदमा चलेगा, तब कहां से लाओगे पैसे? पैसे हैं तुम्हारे पास क्या…’’

‘‘तुम ठीक कहती हो दुर्गा,’’ नरम पड़ते हुए चंपालाल बोला, ‘‘भावुकता में मुझे भी गुस्सा आ गया था… मैं मालिक को जा कर समझा तो सकता हूं.’’

इतना कह कर चंपालाल अमृतलाल की हवेली की ओर बढ़ गया. दुर्गा देवी अब भी चंपा को गालियां दे कर अपनी भड़ास निकाल रही थी.

जब चंपालाल अमृतलाल की हवेली में गया, तब वे अपनी बैठक में ही मिल गए, जो अपने कारिंदों के बीच घिरे हुए थे.

चंपालाल भी उन कारिंदों के बीच जा कर बैठ गया. उसे देख कर कारिंदे उठ कर बाहर चले गए. अब बैठक में दोनों ही अकेले रह गए. तब अमृतलाल बोले, ‘‘आओ चंपालाल, यहां किसलिए आए हो?

‘‘मालिक, मैं बहुत बुरा फंस गया हूं…’’ हाथ जोड़ते हुए चंपालाल बोला, ‘‘आप ही इस समस्या का हल निकाल सकते हैं.’’

‘‘पहले अपनी समस्या बताओ, मेरे हल करने जैसी होगी, तो मैं जरूर करूंगा,’’ अमृतलाल बोले.

‘‘मालिक, आप का बेटा सौरभ और मेरी बेटी चंपा शहर के एक ही कालेज में पढ़ते हैं. उन दोनों में इश्क हो गया. और…’’ बीच के शब्द चंपालाल के गले में ही अटक गए.

‘‘बोलो, रुक क्यों गए चंपालाल?’’ उसे रुकते देख कर अमृतलाल बोले ‘‘मालिक, चंपा के पेट में जो बच्चा पल रहा है, वह छोटे मालिक सौरभ का है,’’ बहुत मुश्किल से चंपालाल यह कह पाया.

‘‘क्या कहा…?’’ आगबबूला हो कर अमृतलाल बोले.

‘‘हां मालिक, मैं यही कहने आया हूं कि चंपा को अपनी बहू बना लो,’’ हाथ जोड़ कर चंपालाल बोला.

‘‘बहू बना लूं. अरे, तू ने कैसे कह दिया कि बहू बना लूं. तेरी लड़की गांव में न जाने किनकिन लड़कों से पैसों के लिए संबंध बनाती है और मेरे बेटे को बदनाम करती है. अब तेरी बेटी पेट से हो गई, तब उस का पाप मेरे होनहार बेटे पर डाल रहा है.

‘‘बहू बना लूं तेरी बेटी को. अपनी हैसियत देखी है. पहले अपनी आवारा लड़की को संभाल… फिर तेरे पास क्या सुबूत है कि उस के पेट में सौरभ का ही बच्चा है?’’

‘‘यह तो डाक्टर की रिपोर्ट बताएगी मालिक?’’ चंपालाल ने जब तेज आवाज में यह बात कही, तब अमृतलाल गुस्से से बोले, ‘‘मतलब, तू मुझे अदालत ले जाएगा.’’

‘‘हां मालिक, जरूरत पड़ी तो ले जाऊंगा,’’ इस समय चंपालाल में न जाने कहां से ताकत आ गई. वह पलभर के लिए रुक कर फिर बोला, ‘‘उस औरत का नाम तो मालूम नहीं है मालिक, मगर अपने नाजायज बच्चे को पिता का नाम देने के लिए वह कोर्ट गई थी. कई साल तक कोर्ट में लड़ी और आखिर में जीत उस की हुई. जानते हो, उस के पिता कौन थे?’’

‘‘मैं नहीं जानता. कौन थे वे?’’ अमृतलाल गुस्से से बोले.

‘‘वे थे भूतपूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत तिवारी.’’

‘‘अच्छा तो, तू मुझे धमकी दे रहा है. नालायक कहीं का,’’ गाली देते हुए अमृतलाल बोले, फिर गुस्से से उठ कर उस की पीठ पर एक लात जमा दी, फिर उसी गुस्से से बोले, ‘‘चला जा यहां से इसी समय. अब अपना मुंह कभी मत दिखाना हरामखोर.’’

चंपालाल ने ज्यादा बहस करना उचित नहीं समझा. वह अपनी कमर को सहलाते हुए हवेली से बाहर निकल गया.

चंपालाल ने अमृतलाल से पंगा जरूर ले लिया, मगर वह अब उस का बदला जरूर लेगा. तब उस ने मन ही मन सोचा कि मालिक ने उस से पंगा ले कर अच्छा नहीं किया. इस का नतीजा भुगतना पड़ेगा. जिसजिस ने भी अमृतलाल से पंगा लिया, उस को ठिकाने लगा दिया गया. देवीलाल, सुखराम, करण सिंह इस के उदाहरण हैं.

मगर अब वह कैसे साबित करे कि चंपा के पेट में जो बच्चा पल रहा है, वह सौरभ का है. मगर आज वैज्ञानिक ने इतनी तरक्की कर ली है कि सब पता चल जाता है. तब क्या वह सौरभ के खिलाफ रपट लिखा दे. पुलिस उस से सब पूछ लेगी. मगर कोर्ट में जाने के लिए पैसे चाहिए और पैसा कहां है उस के पास. इन्हीं विचारों ने चंपालाल को परेशान कर रखा था.

जब चंपालाल घर पहुंचा, तब दुर्गा देवी उसी का इंतजार कर रही थी. वह बोली, ‘‘क्या कहा मालिक ने?’’

‘‘वे तो यह मानने के लिए भी तैयार नहीं हैं कि चंपा के पेट में उन के बेटे का बच्चा पल रहा है. उन्होंने अपनी हैसियत बता दी,’’ निराश भरी आवाज में जब चंपालाल ने जवाब दिया, तब दुर्गा देवी बोली, ‘‘अब क्या होगा? कौन करेगा इस से शादी?’’

‘‘देखो दुर्गा, हम कोर्ट में जा कर इंसाफ मांगेंगे.’’

‘‘मगर, कोर्ट में जाने के लिए पैसा चाहिए. कहां है हमारे पास इतना पैसा…’’ जब दुर्गा देवी ने यह सवाल पूछा, तब कुछ सोच कर चंपालाल बोला, ‘‘इस के सिवा हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है. चाहे मकान या खेत भी बेचना पड़े…’’

यह बात आईगई हो गई. कुछ दिन तक वे दोनों सोचते रहे कि थाने में रपट लिखाएं या नहीं, मगर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए.

इसी बीच एक घटना हो गई. एक रात चंपा को किसी ने अगवा कर लिया. किस ने किया, यह पता नहीं चला.

सुबह होते ही जब चंपा बिस्तर पर नहीं मिली, तब घर में कुहराम मच गया. गांव वाले उसे आसपास टोली बना कर सब जगह ढूंढ़ने निकल गए. 3-4 घंटे ढूंढ़ने के बाद भी चंपा का कहीं पता नहीं चला. तब थाने में रपट लिखा दी गई. पुलिस भी हरकत में आई. उस ने छानबीन की, मगर चंपा का कहीं पता नहीं चला.
2 दिन बाद चंपा की लाश अमृतलाल के कुएं में तैरती पाई गई.

पुलिस ने चंपा की लाश कुएं से बाहर निकाली. उस का पोस्टमार्टम किया गया. डाक्टर ने पोस्टमार्टम की रपट में बताया कि चंपा ने खुदकुशी नहीं की, बल्कि उसे मार कर कुएं में फेंक दिया गया.

तब पुलिस को अमृतलाल पर शक हुआ, मगर वह सुबूत नहीं जुटा पाई. पोस्टमार्टम में यह रिपोर्ट भी थी कि चंपा 2 महीने के पेट से थी. तब गांव वाले खुल कर नहीं, दबी आवाज में यह चर्चा कर रहे थे कि हो न हो, चंपा का खून अमृतलाल के कारिंदों ने ही किया है. मगर, डर के मारे कोई खुल कर सामने नहीं आना चाहता था.

पुलिस जब चंपालाल के घर पर एक बार फिर तलाश करने आई, तब उन्हें वहां चंपा की दस्तखत की गई एक चिट्ठी पुलिस के हाथ लगी. उस का मजमून इस तरह था :

‘मैं जनता कालेज में पढ़ती हूं. बस से रोजाना अपने गांव से अपडाउन करती हूं. कालेज में इसी गांव के अमृतलाल का बेटा सौरभ पढ़ता है. उस ने लालच दे कर पहले मुझे अपने प्रेमजाल में फंसाया. मुझ से शादी करने का वादा किया. तब मैं ने अपना जिस्म उसे सौंप दिया. इस का नतीजा यह हुआ कि मेरे पेट में उस का बच्चा पलने लगा.

‘मैं ने सबकुछ सच बता कर उस से शादी करने की बात कही. तब उस ने मेरे गरीब पिता की हैसियत देख कर मुझ से शादी करने से मना कर दिया.

‘मैं खूब रोईगिड़गिड़ाई, मगर उस पर कोई असर नहीं पड़ा. तब मैं ने अपने पेट से होने की बात अपने गरीब मांबाप को बताई. मेरे गरीब पिता अमृतलाल के पास मुझे अपनी बहू बनाने की बात कहने गए. तब उन्हें लात मार कर भगा दिया गया. तब से मैं भीतर ही भीतर घबरा रही थी कि मेरे गरीब पिता ने अमृतलाल से पंगा लिया.

‘कहीं वह मेरा या मेरे पिता का खून न करवा दे, इस डर से मैं परेशान सी रही. अगर मेरा इन लोगों ने खून कर दिया, तब पिता और मां को कानून में मत घसीटना. मैं बहुत घबराई हुई हूं कि कहीं ये लोग मेरी हत्या न कर दें.’

वह चिट्ठी पढ़ कर पुलिस हरकत में आ गई. शहर जा कर सब से पहले सौरभ को गिरफ्तार किया. इस तरह चिट्ठी ने अपनी हैसियत बता दी.

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