Hindi Kahani : बरसात की रात

Hindi Kahani : चमेली उन से बच कर भाग रही थी. गीली मिट्टी होने की वजह से पीछा करने वालों के पैरों की आहट आ रही थी. कीचड़ के छींटों से उस की साड़ी सन गई थी. उस ने अपने कंधे पर बच्चे को लाद रखा था. तभी बूंदाबांदी शुरू हो गई.

चमेली ने पल्लू से बच्चे के मुंह को ढक दिया. पगडंडी खत्म हुई. वह कुछ देर के लिए रुकी. चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा था. अंधेरे में कहीं भी कोई नजर नहीं आ रहा था. बहुत दूरी पर स्ट्रीट लाइट टिमटिमा रही थी.

चमेली ने मुड़ कर देखा. अंधेरे में उसे कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था. कोई आहट न थी. उस की जान में जान आई. वे लोग उस का पीछा नहीं कर सके थे.

बारिश कुछ तेज हुई. उसे रुकने का कोई ठिकाना नहीं दिखाई दिया. बहुत दूर कुछ दुकानें थीं, पर उस के पैर जवाब दे चुके थे. बच्चा भीगने के चलते रोने लगा था. उस ने थपकियां दे कर उसे चुप कराने की कोशिश की, मगर वह चुप नहीं हुआ.

अचानक हुई तेज बारिश की वजह से भागना मुश्किल था. थोड़ा दूरी पर एक मकान दिखाई दिया, तो चमेली ने उस का दरवाजा खटखटा दिया.

‘‘कौन है?’’ अंदर से आवाज आई.

चमेली ने देखा, उस आवाज में सख्ती थी, तो कलेजा मुंह को आ गया. वह मंगू दादा का घर था, जिस से सभी डरते थे. वह आसमान से गिरी और खजूर पर अटक गई थी. घबराहट के मारे उस की आवाज नहीं निकली.

‘‘कौन है?’’ मंगू दादा दहाड़ा.

‘‘म… म… मैं हूं,’’ बच्चे को कस कर पकड़ते हुए चमेली ने कहा.

‘‘अरे तू? इस समय यहां? क्या बात है?’’ मंगू ने पूछा.

‘‘नहींनहीं… कुछ नहीं.’’

‘‘घर से लड़ कर आई हो?’’

‘‘हां… मर्द दारू पी कर दंगा कर रहा था,’’ चमेली रोते हुए बोली.

‘‘कहां जा रही हो?’’

‘‘रामनगर… मां के पास. सुबह मैं पहली बस से चली जाऊंगी,’’ चमेली धीमी आवाज में बोली.

‘‘रामनगर? इतनी दूर तुम बच्चे के साथ कैसे जाओगी?’’

‘‘जाना ही पड़ेगा… चली जाऊंगी,’’ आवाज सुन कर बच्चा रोने लगा. जवाब का इंतजार किए बिना वह जाने लगी.

‘‘क्या बेवकूफी करती हो? दिमाग खराब है क्या? फूल सा बच्चा लिए बरसात में भीगती हुई जाओगी. वह भी इतनी रात में. चुपचाप अंदर चलो.

‘‘रात भर ठहर जाओ. सुबह चली जाना…’’ वह बोला, ‘‘मुझ पर भरोसा है तो अंदर आओ, नहीं तो इस बारिश में डूब मरो.’’

वह अनमनी सी वहीं खड़ी रही, तो मंगू ने उस के हाथों से बच्चा छीन लिया और अपने कंधे से लगा कर सहलाने लगा.

‘‘तुम्हें शौक है तो मरो, पर इस बच्चे को यहीं छोड़ जाओ. सुबह ले जाना,’’ मंगू उसे लताड़ते हुए बोला.

अब क्या चारा था? जाल में फंसी मछली की तरह वह तड़प उठी. मजबूर हो कर मंगू के घर में घुस गई.

मंगू के पास से गुजरते समय सस्ती शराब की गंध से उस के नथुने भर गए. घर के अंदर भी वही सड़ांध… वही बदबू छाई थी.

‘‘यह लो, बच्चे के कपड़े बदल दो और खुद भी कपड़े पहन लो,’’ मंगू उसे तौलिया देते हुए बोला.

‘‘घर में लड़ाई क्यों हुई?’’ मंगू ने सख्ती से पूछा.

‘‘दारू पीना तो उस की रोज की आदत है. आज वह नशे में धुत्त हो कर 2 आदमियों को भी साथ लाया था. वे दोनों मुझे दबोचने के लिए आगे बढ़े, तो मैं बच्चे को ले कर पिछवाड़े से भाग निकली…’’ चमेली सिसकते हुए बोली.

‘‘दोनों ने मेरा पीछा भी किया, पर मैं किसी तरह से बच गई.’’

मंगू कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा, फिर कोने में रखे बक्से के पास गया. ढक्कन खोलते ही शराब की बदबू चारों ओर फैल गई.

‘‘शराब…’’ आगे के शब्द चमेली के गले में ही अटक गए.

‘‘इस के बिना मैं नहीं रह सकता,’’ कहते हुए मंगू ने बोतल मुंह से लगाई और गटागट पी गया.

‘‘अकेले डर तो नहीं लगेगा न?’’

‘‘और… आप?’’ उस ने हिचकते हुए पूछा.

‘‘मेरे कई ठिकाने हैं, कहीं भी चला जाऊंगा. दरवाजा ठीक से बंद कर लो,’’ मंगू ने कहा.

मंगू दरवाजा धकेल कर मूसलाधार बारिश में चल पड़ा. उस अंधेरे में चमेली न जाने क्या देखती रही.

Hindi Kahani : तिनका तिनका घोंसला

Hindi Kahani : हलीमा का सिर दर्द से फटा जा रहा था, लेकिन काम पर तो जाना ही था वरना नाजिया मैडम झट से उस की पगार काट लेतीं, और दस बातें सुनातीं अलग से. कल रात फिर से उस का शौहर अकरम आधी रात के बाद शराब पी कर लौटा था और आते ही हलीमा से बिना बात मारपीट करने लगा था. अब तो ये आए दिन की बात हो गई थी.

अकरम दिनभर रिकशा चला कर जो कमाता उस का एक बड़ा हिस्सा जुए में हार आता और कभी कुछ पैसे बच जाते तो अपने दोस्तों के साथ शराब पी लेता.

5 साल पहले वे जब अपने गांव कराल से दिल्ली आए थे तो वह कितनी खुश थी. दिल्ली में ज्यादा कमाई होगी, बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ सकेंगे, और एक बेहतर जिंदगी के सपने देखे, लेकिन दिल्ली आते ही वह मानो आसमान से सीधे जमीन पर आ गिरी हो. रेलवे लाइन के किनारे बसी एक बस्ती में एक बेहद ही छोटी सी झुग्गी में पूरे परिवार को रहना था.

गांव के ही करीम चाचा ने अकरम को एक रिकशा किराए पर दिला दिया था. शुरूशुरू में अकरम बहुत मेहनत करता था. करीम चाचा ने ही उस को बताया था कि जैतपुर में काफी सस्ती जमीन मिल सकती है. हलीमा अपना घर बनाने के सपने देखने लगी और बड़ी मुश्किल से उस ने अकरम को इस बात के लिए मनाया कि वह बराबर वाली कालोनी में 1-2 घरों में काम करने लगे, ताकि वह भी कुछ पैसे जोड़ सके.

दोनों ने खूब मेहनत कर कुछ पैसे जोड़ भी लिए थे, लेकिन कुछ दिनों बाद अकरम का उठनाबैठना कुछ गलत लोगों के साथ हो गया. ज्यादा पैसे कमाने के लालच में अकरम ने उन के साथ जुआ खेलना शुरू कर दिया और इस चक्कर में अपनी सारी जमापूंजी भी लुटा बैठा. इतना ही नहीं, कभीकभी वह शराब भी पी लेता. हलीमा कितना रोई थी, कितना लड़ी थी उस से. शुरूशुरू में अकरम कसमें खाता कि अब जुए और शराब से दूर रहेगा, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर वही सब शुरू हो जाता.

सुबहसवेरे निकल कर हलीमा कई घरों में काम करती और शाम को थक कर चूर हो जाने के बाद भी उस को कोई आराम नहीं था. घर आ कर सब के लिए खाना बनाना और बाकी काम भी करने होते थे. अब तो हाल यह था कि घर का खर्चा भी बस हलीमा ही चलाती थी. कभी कुछ पैसे बच जाते तो अकरम छीन कर उन को भी जुए में हार आता.

उस दिन उस का छोटा बेटा माजिद बारिश में भीगने की वजह से बीमार पड़ गया. बस्ती में ही रहने वाले एक झोलाछाप डाक्टर से उस की दवा भी कराई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, बल्कि बीमारी और बढ़ गई. फिर उस को ओखला में एक डाक्टर को दिखाया गया. इस सब में उस के पास बचे सारे पैसे खत्म हो गए और कितना ही उधार उस के सिर चढ़ गया था.

कितना रोई थी वह अकरम के सामने, लेकिन वह तो करवट बदल कर खर्राटें भरने लगा था.

“सुनो हलीमा, क्या तुम एक और घर में काम करोगी? पड़ोस में ही मेरी एक सहेली रहने आई हैं. अकेली रहती

हैं, बैंक में नौकरी करती हैं,” एक दिन शबाना मैडम ने हलीमा से पूछा.

“मैडमजी, मुझे तो दम लेने की भी फुरसत नहीं है. एक घर और काम करने लगी तो बीमार ही पड़ जाऊंगी… और मुझे तो बीमार पड़ने की भी फुरसत नहीं है,” हलीमा ने बेचारगी से कहा.

“देख लो, वह तुम्हें 1,000 रुपए दे सकती हैं. उन का काम ज्यादा नहीं है, तुम्हें बस आधा घंटा ही लगेगा उन के घर.

“दरअसल, उन को एक अच्छी मेड चाहिए और मैं ने उन को तुम्हारा नाम बता दिया है,” शबाना मैडम ने उस को समझाते हुए कहा, तो हलीमा सोच में पड़ गई.

अगर वह आधा घंटा निकाल पाए तो 1,000 रुपए ज्यादा कमा सकती है. फिर उस ने यह सोच कर हां कर दी कि वह सुबह आधा घंटा पहले उठ जाया करेगी.

शांति मैडम से मिल कर उस को काफी अच्छा लगा. इत्तेफाक से वे भी उस के ही जिला बिजनौर की रहने वाली थीं.

हलीमा उन से मिल कर काफी खुश हो गई. हलीमा काम तो बड़ी साफसफाई से करती ही थी, खाना भी अच्छा बनाती थी. एक बार शांति मैडम ने ही उस को घर पर अचार, चटनी वगैरह बनाने का सुझाव दिया.

हलीमा ने 2-3 तरह के अचार बना कर शांति मैडम को दिए, तो उन्होंने अपने बैंक में ही 1-2 लोगों से हलीमा के लिए और्डर ले लिए. इस से हलीमा को कुछ अतिरिक्त आय भी होने लगी.

“मैं तुम्हारे पैसे बैंक में डाल दूं या तुम्हें कैश चाहिए,” एक महीने बाद शांति मैडम ने उस की पगार देने के लिए पूछा, तो हलीमा की हंसी निकल गई.

“क्या मैडमजी, हम गरीबों के भी कोई बैंक में खाते होते हैं?” हलीमा ने हंसते हुए कहा.

“क्या तुम्हारा किसी बैंक में अकाउंट नहीं है,” शांति ने हैरानी से पूछा.

“नहीं मैडमजी,” हलीमा ने गंभीरता से जवाब दिया.

“अगर तुम चाहो तो मैं अपने बैंक में ही तुम्हारा खाता खुलवा दूं. अगर किसी बैंक में तुम्हारा खाता नहीं है, तो तुम चार पैसे कैसे बचा पाओगी?” शांति ने उस को समझाया.

बात कुछकुछ हलीमा की समझ में आ रही थी. फिर उस ने यह सोच कर शांति से बैंक में खाता खुलवाने के लिए हां कर दी कि वह किसी को भी इन पैसों के बारे में नहीं बताएगी. इन पैसों को वह अपने बच्चों के भविष्य के लिए सुरक्षित रखेगी. और सचमुच उस ने किसी को इन पैसों के बारे में नहीं बताया और न ही इन पैसों को खर्च किए.

फिर एक दिन जब शांति ने उस को बताया कि उस के खाते में 10,000 से भी ज्यादा रुपए हो गए हैं, तो उस की आंखों में खुशी के आंसू आ गए.

पर, यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिकी. उस दिन पूरी रात भी जब अकरम घर नहीं आया, तो उस को कुछ फिक्र हुई. वह चाहे कितना भी जुआ या शराब करे, रात में घर जरूर आता था. फिर सुबहसुबह करीम चाचा ने उस को बताया कि कल रात पुलिस अकरम और कुछ लोगों को उठा कर थाने ले गई है.

सुनते ही मानो उस के पैरों के नीचे से जमीन निकल गई. करीम चाचा के साथ वह पुलिस थाने गई. उन को देखते ही अकरम दहाड़ें मार मार कर रोने लगा.

“मुझे बचा ले हलीमा. ये पुलिस वाले मुझे बिना बात पकड़ लाए. अरे, मैं तो राजेंदर और अनीस के साथ ठेके से घर ही आ रहा था, इन्होंने मुझे रास्ते में उठा लिया,” अकरम रोतेरोते बता रहा था.

“कितनी बार कहा तुम से कि ये सब छोड़ दो. न तुम्हें घर वालों की फिक्र है, न अल्लाह का डर, और अब पुलिस थाने भी शुरू हो गए. क्या करूंगी. मैं कहां जाऊंगी बच्चों को ले कर,” हलीमा भी जोरजोर से रो रही थी.

“बस, इस बार मुझे बचा ले. तेरी कसम… आगे से सब बुरे काम छोड़ दूंगा,” अकरम उस के आगे हाथ जोड़ रहा था.

“मैं इंस्पेक्टर साब से बात कर के देखता हूं,” करीम चाचा ने हलीमा से कहा, तो वह भी उन के साथ चल दी.

“साहब, मेरे आदमी को छोड़ दो. आगे से कभी जुआ नहीं खेलेगा,” हलीमा ने इंस्पेक्टर के आगे हाथ जोड़े.

“शराब पी कर ये सारे लोग चौक पर दंगा कर रहे थे और एक दुकान का ताला तोड़ रहे थे. ये तो जाएगा 2-3 साल के लिए अंदर,” इंस्पेक्टर ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा.

“साहब, ये जुआरी और शराबी जरूर है, मगर चोर नहीं है. आप को कोई गलतफहमी हुई है,” हलीमा ने हाथ जोड़ेजोड़े विनती की.

“हम तो उधर से आ रहे थे. चोर तो पहले ही भाग गए थे. कोई नहीं मिला तो मुझे ही पकड़ लाए,” पीछे से अकरम की रोती हुई आवाज आई.

“अरे शहजाद, जरा लगा इस के दो हाथ… हमें हमारा काम सिखाता है,” इंस्पेक्टर ने भद्दी सी गाली देते हुए अपने कांस्टेबल से कहा, तो कांस्टेबल ने दो डंडे अकरम की कमर पर जड़ दिए. अकरम की चीखें पूरे थाने में गूंज गईं.

“अरे साहब, जाने दो न. गरीब आदमी है. आगे से ऐसा नहीं करेगा. कुछ सेवापानी कर देंगे,” करीम चाचा ने इंस्पेक्टर के आगे हाथ जोड़ कर कहा, तो इंस्पेक्टर ने उन को ऐसे घूरा मानो कच्चा ही चबा जाएगा.

“ठीक है, 10,000 रुपयों का इंतजाम कर लो, छोड़ देंगे इसे,” इंस्पेक्टर ने कुछ सोचते हुए कहा.

“10,000 रुपए…? इतने सारे रुपए कहां से लाएंगे सरकार. हम तो रोज कमानेखाने वाले लोग हैं. इतने सारे पैसे तो हम ने कभी एकसाथ देखे भी नहीं,” हलीमा ने रोते हुए इंस्पेक्टर से कहा.

“नहीं देखे तो अब इस को भी मत देखना कई साल. जा… जा कर कोई वकील कर, उस को हजारों रुपए फीस दे, अदालत में रिश्वत खिला, तब शायद ये 10 साल में घर वापस आ जाए,” इंस्पेक्टर दहाड़ा.

इतना सुन कर ही हलीमा की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. अकरम कैसा भी था, था तो उस का शौहर ही.

“ठीक है, साहब. मैं पैसों का इंतजाम कर के लाती हूं,” हलीमा ने हार कर कहा.

हलीमा ने शांति से कह कर अपने खाते में पड़े 10,000 रुपए निकलवाए और इंस्पेक्टर को ला कर दिए.

रास्तेभर उस ने अकरम से कोई बात नहीं की. आंखों में आंसू भरे वह अपने बच्चों का भविष्य बरबाद होते देख रही थी.

अकरम रोरो कर उस से माफी मांग रहा था, लेकिन हलीमा ने उस से एक लफ्ज भी नहीं बोला. अकरम बच्चों के सिर पर हाथ रख कर कसमें खा रहा था, लेकिन हलीमा को उन कसमों पर जरा भी यकीन नहीं था.

लेकिन इस बार अकरम सचमुच बदल गया था. हवालात में बिताए कुछ घंटों ने उस की आंखें खोल दी थीं. आज वह हलीमा का कर्जदार हो गया था. दिनभर उस ने जीतोड़ मेहनत कर के जितने भी पैसे कमाए, सारे के सारे हलीमा के हाथ पर रख दिए.

“मुझे माफ कर दे हलीमा… मैं बुरी संगत में पड़ कर ये भी भूल गया था कि मेरे ऊपर तुम सब की जिम्मेदारी भी है. मेरा यकीन कर आगे से मैं ऐसा कोई काम नहीं करूंगा, जिस से तेरी आंखों में आंसू आएं,” अकरम ने हलीमा के आगे हाथ जोड़ दिए.

“याद करो, हम गांव से दिल्ली किसलिए आए थे. अपने बच्चों के अच्छे कल के लिए, लेकिन हम उन को कैसा कल दे रहे हैं. जरा सोचो,” हलीमा की आंखें डबडबा आईं.

“तू सच कह रही है. मैं तुम सब का गुनाहगार हूं. मुझे एक मौका दे दे, मैं अपने बच्चों के लिए खूब मेहनत करूंगा और उन को एक अच्छी जिंदगी दूंगा,” अकरम ने हलीमा के हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा.

“आ जाओ मेरे बच्चो, अब तुम्हें अपने अब्बा से डरने की कोई जरूरत नहीं है,” अकरम ने बच्चों से कहा, जो दूर कोने में डरेसहमे से खड़े थे.

फिर अकरम ने उन सब को अपने गले लगा लिया. हलीमा को भी उम्मीद की एक नई किरण नजर आ रही थी. मन ही मन वह शांति मैडम की भी शुक्रगुजार थी, जिन की वजह से वह कुछ पैसे बचा पाई थी और आज उस का परिवार फिर से एक हो गया था.

Hindi Kahani : अभिलाषा – रूपी क्यों भागकर शादी करना चाहती थी?

Hindi Kahani : एक दिन रूपी मोहल्ले के ही रामू के साथ भाग गई. इस के बाद तो जितने लोग, उतनी तरह की बातें होने लगीं. अधिकतर लोग रूपी  के मातापिता को ही इस का दोष दे रहे थे. मामला लड़की के भागने का था, इसलिए रूपी के पिता ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी थी.

करीब एक महीना बीत गया. काफी दौड़धूप और खोजबीन के बाद भी उन दोनों का कुछ पता नहीं चला. सब हैरान थे. आश्चर्य की बात तो यह थी कि रामू शादीशुदा था, इस के बावजूद भी उस ने ऐसा काम किया था.

रामू और रूपी शहर से दूर चले गए थे. वे कहां चले गए, यह बात मोहल्ले का कोई भी व्यक्ति नहीं जानता था. बेटी की हरकत से रूपी के मातापिता अपने संबंधियों, मोहल्ले वालों और समाज की दृष्टि में गिर चुके थे. वे किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं थे.

लोग उन के सामने ही उन्हें ताने देते थे. इस से उन का घर से निकलना दूभर हो गया था. ऐसे में वे बेचारे कर भी क्या सकते थे? लोगों की तरहतरह की बातें सुनने को वे लाचार थे.

अचानक एक दिन सुनने में आया कि रामू और रूपी जयपुर में पकड़े गए हैं. मोहल्ले के एक प्रोफेसर माथुर ने जयपुर में अपने रिश्तेदार भरत माथुर के घर रामू और रूपी को देख लिया था. फिर क्या था, उन्होंने इस बात की सूचना पुलिस को दी तो पुलिस ने रामू और रूपी को पकड़ लिया था.

पुलिस ने रूपी को तो उस के मातापिता के घर पहुंचा दिया, जबकि रामू को हिरासत में ले लिया. रामू को उम्मीद थी कि रूपी कभी भी उस के खिलाफ बयान नहीं देगी, क्योंकि वह उस के साथ करीब 6 महीने पत्नी की तरह रही थी. पर बात एकदम इस के विपरीत निकली. रूपी ने अपने मातापिता की भावनाओं और दबाव में आ कर कोर्ट में अपने प्रेमी रामू के खिलाफ ही बयान दिया था. रूपी नाबालिग थी, इसलिए कोर्ट ने रामू को एक नाबालिग लड़की को भगाने के जुर्म में 3 साल की सजा सुनाई.

इस बीच रूपी की शादी एक आवारा लड़के से कर दी गई, क्योंकि समाज में कोई भी शरीफ लड़का उस से शादी करने को तैयार नहीं था. 3 साल की सजा काट कर रामू घर आया तो मेरे दिमाग में तरहतरह की शंकाओं के बीच वही प्रश्न बारबार आ रहा था कि शादीशुदा रामू ने ऐसा क्यों किया?

मुझे उस पर रहरह कर गुस्सा भी आ रहा था, क्योंकि रामू को मैं बचपन से जानता था. वह एक चरित्रवान और शरीफ लड़का था. सब उस का सम्मान करते थे. फिर उस ने ऐसा नीच कार्य क्यों किया? यह हकीकत जानने के लिए एक दिन मैं उस के घर चला गया.

‘‘कहो, भाई क्या हालचाल है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हाल तो ठीक है, पर चाल खराब हो गई है.’’ उस ने टूटे दिल से कहा, ‘‘तुम अपना हाल बताओ.’’

‘‘मेरा हाल तो ठीक है. तुम्हारा हाल जानने आया हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘मेरा हाल तो एक खुली किताब की तरह है, जिसे दुनिया ने पढ़ा है, तुम ने भी पढ़ा होगा.’’ एक मायूसी मिश्रित लंबी आह भर कर रामू ने कहा और शून्य में न जाने क्या खोजने लगा.

रामू की इस ‘आह’ में कितनी विवशता, कितनी कसक और कितनी दुखभरी वेदना थी, यह मैं खुद देख रहा था. वह आंखों में छलक आए आंसुओं को रूमाल से पोंछने लगा. उस के छलकते आंसू रूमाल के धागों में विलीन हो गए.

‘‘छोड़ो बीती बातों को.’’ मैं ने सांत्वना देते हुए कहा.

‘‘यह भी एक संयोग है.’’ उस ने आगे कहा, ‘‘तुम तो जानते ही हो कि मेरी शादी हुए करीब 6 साल हो गए हैं, परंतु हम दोनों के जीवन में कोई फूल नहीं खिला. तुम्हारी भाभी के प्यार का साथ ही मेरे जीवन का सर्वस्व था. मैं सुखी था, प्रसन्न था, परंतु वह न जाने क्यों अंदर ही अंदर घुटती रहती थी. उस का सौंदर्य, उस का स्वास्थ्य धीरेधीरे उस से दामन छुड़ाने लगा था.

‘‘मैं ने इस राज को जानने का बहुत प्रयत्न किया. एक दिन तुम्हारी भाभी ने विनीत भाव से कहा, ‘कितना अच्छा होता कि हमारे आंगन में भी बच्चा होता.’

‘‘यह सुन कर उस दिन से मुझे भी अपने घर में बच्चे का अभाव अखरने लगा. डाक्टर ने तुम्हारी भाभी का परीक्षण करने के बाद बताया कि यह कभी मां नहीं बन सकती. इस बात से वह बड़ी दुखी हुई. उस ने मुझे दूसरी शादी के लिए प्रेरित किया. लेकिन मैं ने शादी करने से साफ मना कर दिया.

‘‘उस दिन से मैं उसे और अधिक प्रेम करने लगा. जिस से वह इस मानसिक दुख से छुटकारा पा सके. लेकिन वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है. उन्हीं दिनों हमारे पड़ोस में रहने वाली रूपी तुम्हारी भाभी के पास आनेजाने लगी. दोनों एकांत में घंटों बैठी न जाने क्याक्या बातें करती रहतीं. एक दिन रात को सोने से पहले तुम्हारी भाभी ने मुझ से कहा, ‘रूपी कितनी सुशील और सुंदर लड़की है. तुम रूपी से शादी क्यों नहीं कर लेते.’

‘‘पागल हो गई हो क्या? ऐसा कभी हो सकता है?’’ मैं ने उसे बांहों में कसते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं, क्या आप एक बच्चे के लिए इतना भी नहीं कर सकते?’’ कह कर वह फूटफूट रोने लगी.

‘‘मैं ने तुम्हारी भाभी को बहुत समझाया कि एक विवाहित व्यक्ति के साथ कोई भी पिता अपनी लड़की का विवाह नहीं करेगा. यह असंभव है. मैं तुम्हारी सौत नहीं ला सकता. पर वह अपनी जिद पर अड़ी रही. वह फफकफफक कर रोने लगी. दूसरे दिन जब रूपी हमारे घर आई तो मैं उसे निहारने लगा.

‘‘रूपी की शोख जवानी और सुंदरता ने मुझ पर ऐसा जादू किया कि तनमन से मैं उस की ओर खिंचता चला गया. तुम्हारी भाभी ने हमें संरक्षण दिया और हमारे प्रेम को पलने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया.’’

इतना कह कर रामू न जाने किन स्वप्नों में खो गया. थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह फिर कहने लगा, ‘‘रूपी मुझ से शादी करने के लिए तैयार थी, लेकिन मैं उस के मातापिता से यह सब कहने का साहस नहीं कर सका. रूपी मुझ से जिद करती रही और मैं टालता रहा.

‘‘एक दिन शाम के समय रूपी जब हमारे घर आई तो उस ने कहा, ‘रामू, ऐसे कब तक चलेगा. चलो, हम कहीं भाग चलें.’ यह सुन कर मैं कांप उठा. रूपी मुझे देखती रही और हंसती रही.

‘‘उस ने फिर कहा, ‘बस, एक साल की बात है. एक बच्चा हो जाएगा तो हम लौट आएंगे. उस के बाद पिताजी भी मजबूर हो कर मेरी शादी तुम्हारे साथ कर देंगे.’ कह कर उस ने अपना चेहरा मेरे सीने पर रख दिया.’’

रामू न जाने किन खयालों में खो गया. मैं भी कहीं खो चुका था. मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए रामू ने आगे कहा, ‘‘लेकिन स्वप्न साकार नहीं हुए. हम दोनों जोधपुर छोड़ कर जयपुर भाग गए और दोस्त भरत के यहां रहने लगे. 6 महीने बाद हम पुलिस द्वारा पकड़े गए. तुम्हारी भाभी की चिरपोषित अभिलाषा भी एक स्वप्न बन कर रह गई.’’ इतना कह कर वह चुप हो गया.

मैं ने भी इस से अधिक पूछताछ करनी उचित नहीं समझी और उस से विदा ले कर अपने घर की ओर चल पड़ा. रास्ते में सोचता रहा कि क्या रामू दोषी है, जो समाज के ताने सहन न कर सका और संतान की चाह ने उसे अंधा बना दिया. शादीशुदा होते हुए भी वह नाबालिग रूपी के साथ भाग गया.

क्या रामू की पत्नी दोषी है, जिस ने अपने पति को गलत राह पर चलने की सलाह दी? या फिर रूपी का पिता दोषी है, जिस ने 2 प्रेमियों को मिलने से रोक कर अपनी लड़की का किसी आवारा लड़के के साथ ब्याह रचा दिया? मैं अभी तक तय नहीं कर पाया हूं कि आखिर दोषी कौन है?

Hindi Story : एक थी मालती

Hindi Story : यकीन करना मुश्किल था कि बीस साल पहले मैं उस कमरे में रहता था. पर बात तो सच थी. सन 1990 से 1993 तक छपरा में पढ़ाई के दौरान मैने रहने के कई ठिकाने बदले पर जो लगाव शिव शंकर पंडित के मकान से हुआ वो बहुत हद तक आज भी कायम है. छोटे छोटे आठ दस खपरैल कमरों का वो लाॅज था. उन्हीं में से एक में मैं रहता था. किराया 70 रूपये से शुरू होकर मेरे वहां से हटते हटते 110 तक पहुंचा था. यह बात दीगर है कि मैने कभी समय पर किराया दिया नहीं. पंडित का वश चले तो आज भी सूद समेत मुझसे कुछ उगाही कर लें. एक बार तो पंडित ने मेरे कुछ मित्रों से आग्रह किया था कि भाई उनसे कहिए कि उल्टा हमसे दो महीने का किराया ले लें और हमारा मकान खाली कर दें.

पंडित का होटल भी था जहां पांच रुपये में भर पेट खाने का प्रावधान था. मेरा खाना भी अक्सर वहीं होता था. पंडिताइन लगभग आधा दिन गोबर और मिट्टी में ही लगी रहती. कभी उपले बनाती कभी मिट्टी के बर्तन. जब खाने जाओ, झट से हाथ धोती और चावल परोसने लगती. सच कहूं उस वक्त बिल्कुल घृणा नहीं होती थी. बल्कि गोबर और मिट्टी की खुशबु से खाने में और स्वाद आ जाता.

उनकी एक बेटी थी.. मालती.

1993 उधर उसकी शादी हुई, इधर मैने उसका मकान खाली किया. वैसे मालती से मेरा कोई खास अंतरंग रिश्ता नहीं था. मगर उसके जाने के बाद एक अजीब सा सूनापन नजर आ रहा था. मन उचट सा गया था. इसलिए मैंने वहां से हटने का निश्चय किया. इसके पहले कि दुसरा ठिकाना खोजता, नौकरी लग गई और मैंने छपरा को अलविदा कह दिया.

बीस साल बाद छपरा में एक दिन मैं बारिश में घिर गया और मेरी मोटरसाइकिल बंद हो गई. सोचा क्यों न बाइक को पंडित के घर रख दें। कल फिर आकर ले जाएंगे.

मै बाइक को धकेलते और बारिश में भीगते वहां पहुंचा. पंडित का होटल अब मिठाई की दुकान में तब्दील हो गया था.

पंडिताइन मुझे देखते ही पहचान गयी. चाय बनाने लगी. मैंने उनसे कहा- भौजी आप चाय बनाइए तब तक मैं अपना कमरा देखकर आता हूँ जहाँ मैं रहता था.

पीछे लाॅज की ओर गया. सारे कमरे लगभग गिर चुके थे. अपने कमरे के दरवाजे को मैं आत्मीयता से सहलाने लगा. तभी मेरी नजर एक चित्र पर गयी. दिल का रेखाचित्र और बीच में अंग्रेजी का एम. यादें ताजी हो गयी. एक दिन मैंने मालती से कहा था- अबे वो बौनी, नकचढी, नाक से बोलने वाली लडकी, तेरा ये मकान मैं तभी खाली करूंगा जब तू ससुराल चली जाएगी.

इसपर वो बनावटी गुस्से में बोली- ये मेरा मकान है। जब चाहें तब निकाल दे तुम्हे, ये लो, और उसने खुरपी से दरवाजे पर दिल का रेखाचित्र बनाया और बीच में एम लिख दिया.

मालती का कद काफी छोटा था. लाॅज के सारे लडके उसे बौनी कहते थे मगर उसके पीछे. वो जानते थे कि मालती खूंखार है, सुन लेगी तो खूरपी चला देगी. ये हिम्मत मैने की. एक दिन उससे कहा- ऐ तीनफुटिया, जरा अपनी दुकान से चाय लाकर तो दे.

उसने कहा –  चाय नहीं, जहर लाकर दूंगी भालू.

नहाने का कार्यक्रम खुले में होता था नल के नीचे और मालती ने बालों से भरा मेरा बदन देख लिया था, इसलिए मुझे वो भालू कहती थी.

मैं समझ गया कि उसे बुरा नहीं लगा था. कुछ मस्ती मै कर रहा था, कुछ वो। फिर तो मस्ती का सिलसिला चल पड़ा.

पंडित के घर के पिछले हिस्से में लाॅज था. अगले हिस्से में वो रहते थे। बीच में एक पतली गली थी.

मालती हम लोगों के लिए अलार्म का काम भी करती थी.

सुबह सुबह गाय लेकर उस गली से  गुजरती तो जोर से आवाज लगाती.. कौन कौन जिन्दा है? जो जिन्दा है, वो उठ जाए, जो मर गया उसका राम नाम सत्य.

मै जानता था कि मरने वाली बात वो मेरे लिए बोलती थी क्योंकि मैं सुबह देर तक सोता था. खैर उसके इसी डायलॉग से मेरी नींद खुलती थी। फिर भी कभी अगर नींद नहीं खुलती तो मारटन टाफी चलाकर मारती.

उन दिनों बिहार में मारटन टाफी का खूब प्रचलन था. उनका एक राशन दुकान भी था जहां उनका बेटा यानि मालती का बड़ा भाई बैठता था. उस समय मैं महज उन्नीस का था. इतनी मैच्योरिटी नहीं थी. मैंने मालती के राशन दुकान का भरपूर फायदा उठाया. जब कभी वो गली से गुजरती में अपने आप से ही जोर जोर से कहता.. यार कोलगेट खत्म हो गया, पैसे भी नहीं, मालती बहुत अच्छी लडकी है, उससे कह दो तो कोलगेट क्या पूरी दुकान लाकर दे दे. फिर क्या थोड़ी देर बाद दरवाजे पर कोलगेट पड़ा मिलता. फिर तो कभी साबुन कभी कभी चीनी कभी कुछ मै अपनी जुगत से हासिल करने लगा.

एक दिन वो गली में टकरा गयी. बोली- तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो? दिन रात जो तारीफ करते हो. क्या सचमुच मैं उतनी अच्छी और सुंदर हूँ?

मैने उससे मुस्करा कर कहा-  तुम तो बहुत सुंदर हो. सिर्फ थोड़ा कद छोटा है, नाक थोड़ी टेढ़ी है, दांत खुरपी जैसे हैं और गर्दन कबूतर जैसी. बाकी कोई कमी नहीं. सर्वांग सुंदरी हो.

वह लपकी.. तुम किसी दिन मेरी खुरपी से कटोगे. अब खा लेना मारटन टाफी.

शरारतों का सिलसिला यूंही चलता रहा. एक दिन उसका रिश्ता आया. बाद में पता चला कि लडके वालों ने उसे नापसंद कर दिया.

यह मालती के लिए सदमे जैसा था. कई दिनों तक वो घर से निकली नहीं और जब निकली तो बदल चुकी थी. वो वाचाल और चंचल लडकी अब मूक गुडिया बन चुकी थी।. उसका ये शांत रूप मुझे विचलित करने लगा. एक दिन मैंने उसे गली में घेर लिया। पूछा-  तू आजकल इतनी शांत कैसे हो गई?

वो बोली-  तुम झूठे हो। कहते थे कि मालती सुंदरी है. लडके वाले रिजेक्ट करके चले गये.

मैने उसे समझाया- धत पगली वो लडका ही तेरे लायक नहीं था। तेरे नसीब में तो कोई राजकुमार है.

वो भोली भाली मालती फिर से मेरी बातों का यकीन कर बैठी. अब फिर वो पहले की तरह चहकने लगी और कुछ दिनों बाद सचमुच उसकी शादी तय हो गई.

उसने मुझसे पूछा- तुम मेरी शादी में आओगे न?

मैने चिर परिचित अंदाज में जवाब दिया- चाहे धरती इधर की उधर हो जाये, मैं तेरी शादी जरूर अटेंड करूंगा.

उसकी शादी हो गई. संयोग देखिए, जिस दिन शादी थी उसी दिन मेरा पटना में इम्तिहान था. मैं अटेंड नहीं कर सका. मालती चली गई थी अपने साथ समस्त उर्जा लेकर.

मालती के जाने के बाद, कुछ खाली खाली सा लगने लगा था. समझ में नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है. कहां चली गई उर्जा. ऐसा कबतक चल सकता था?

कुछ दिनों बाद मैने भी वो कमरा खाली कर दिया.

भौजी की चाय तैयार थी. मै चाय पी ही रहा था कि पंडित जी भी आ गए. बातों बातों में मैंने उनसे पूछा.. मालती कैसी है? कहां है आजकल?

तब पंडिताइन ने बताया-  मालती…. वो अब दुनिया में नहीं.

मेरे पैर तले जमीन खिसक गई. कांपते स्वर में पूछा-  कब हुआ ये सब?

पंडिताइन ने आंखें पोंछते हुए कहा-  शादी के दो साल बाद ही. डिलीवरी के दौरान जच्चा बच्चा दोनों.

ओह…… तब मैंने सोचा कितना बदनसीब हूँ मैं. एक लड़की जो मुझे बेइंतहा चाहती थी, न मैं उसकी शादी में शामिल हो सका न जनाजे में.

और तो और उसकी मौत की खबर भी मिली उसके मरने के 15 साल बाद.

लेखक- दीपक कुमार

Short Story : जीने की राह

Short Story : मैंचांद साधारण घर से थी. मुझे याद है कि मेरे पापा के पास हम 6 बहनभाई को अच्छा खिलाने और पहनाने के बाद कोई खास पूंजी नहीं बचती थी. जैसे ही मैं ने कालेज किया, लोगों ने मेरी शादी के बारे में बात करना शुरू कर दिया. मैं इस के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं थी. मुझे अभी भी पढ़ना था और मेरा परिवार भी अभी शादी करने के बारे में ज्यादा नहीं सोच रहा था. वजह न जाने क्या थी, पर वे लोग तैयार नहीं थे.

मेरी जिंदगी गुजरती जा रही थी. मैं ट्यूशन क्लास दे कर जो भी कमाती थी, सब खानेपहनने पर ही खर्च कर देती थी. नौकरी करने की इजाजत नहीं थी, क्योंकि ऐसा माना जाता था कि मुसलिम लड़कियां नौकरी नहीं करतीं.

मैं देखने में कोई ज्यादा खूबसूरत नहीं थी. मेरा रंग थोड़ा गहरा था. वैसे भी मैं दुबलीपतली थी और सोने पर सुहागा यह कि मेरे दांत भी थोड़े आगे निकले हुए थे. सब लोग मुझे ‘काली’, ‘दांतों’ और न जाने क्याक्या कह कर बुलाते. किसी को कभी मेरी ऐजूकेशनल क्वालिटी नजर न आती.

इन बातों को सुन कर कभी मैं भावुक हो कर रोती, तो कभी गुस्से में आ कर बहस करती, ‘‘जाओ, ऊपर वाले से जा कर लड़ो, जिस ने मुझे ऐसा बनाया.’’

मैं अपनी मां से कहती, ‘‘मां, मुझे काली क्यों पैदा किया? मुझे भी खूबसूरत पैदा करती…’’

मेरी मां कभी मुझे शांत हो कर देखती रह जातीं और कभी समझातीं. मैं ने 26 साल का आंकड़ा पार कर लिया था. इन सालों में मैं ने डबल सब्जैक्ट्स में मास्टर्स की डिगरी हासिल की थी.

मैं ने अपनी ऐजूकेशन के लिए सब गहने बेच दिए, क्योंकि मेरा परिवार नहीं चाहता था कि मैं प्रोफैशनल कोर्स करूं, तो उन्होंने कोई सपोर्ट नहीं किया. मुझे नौकरी की इजाजत नहीं मिली. हर कोई पूछा करता था कि शादी नहीं हुई? रिश्ता नहीं हुआ? मैं थक गई थी सुनसुन कर. अब और नहीं. शादी करने के लिए ही मजबूर हो गई.

रिश्तों के आने का एक सिलसिला शुरू हुआ. रिश्ते एक तो आते बहुत मुश्किल से थे और अगर आते भी थे  तो वे मुझे नापसंद कर जाते.

पहली बार में मुझे बहुत गुस्सा आया, लेकिन फिर आदत हो गई. वजह, मेरे नैननक्श से ज्यादा हमारी माली हालत थी. मेरा परिवार लड़की दे सकता था, पर कार कैसे देता? और वह एक गोरी बहू भी नहीं दे सकता था.

मां और मेरी छोटी बहन बिलकुल टूट चुकी थीं. मुझे मेरी मां की उदासी अंदर तक तोड़ देती थी. जब कोई परिवार आता और बिना कोई जवाब दिए उठ कर चला जाता, तो मेरी हिम्मत नहीं होती थी उन का चेहरा देखने की.

अब मैं ने सोच लिया था कि बस बहुत हुआ, अब यह सब अब और नहीं. मैं ने रूढि़वाद को खत्म करने की सोच ली. मैं ने अच्छा कोर्स किया. मैं ने टीचर बन कर पढ़ाना शुरू किया. साथ में पढ़ाई भी करती रही. दिनभर पढ़ाना और रात को पढ़ना मेरा रूटीन बन गया.

मैं ने सब की मरजी न होते हुए भी आईसीएस एग्जाम दिया और टौप किया. बस, अब मेरे खराब दिन खत्म हुए और ऐसी रोशनी आई, जिस ने सब तरफ का अंधेरा मिटा दिया. सब लोग मेरे बारे में अच्छे तरीके से बात कर रहे थे. हर कोई मेरी काबिलीयत को सलाम कर रहा था. कई लोग मुझ से शादी करना चाहते थे, लेकिन अब मुझे शादी नहीं करनी थी.

मैं ने अपने मांबाप को सपोर्ट किया. अपनी 4 बहनों की शादी की. खुद के बारे में भी सोचना था मुझे और मैं ने सोचा भी. एक प्यारी सी बेटी को गोद लिया और उस का नाम रखा ‘चांदनी’.

अब मेरी जिंदगी में कुछ बुरा नहीं है. मैं खुश हूं. मैं अगर बुरे वक्त में जिंदगी से हार कर खुदकुशी कर लेती तो क्या होता? कुछ नहीं, इसलिए निराश न हों परेशानी से, बल्कि प्रेरणा बनें दूसरों की.

लेखक- इरफना परवीन

Short Story : बीरा ने बढ़ाया अपने गांव का मान-सम्मान

Short Story : आज भी बीरा के मांबाप को भजन सिंह चेताने आए थे, ‘‘तुम अपनी बेटी को संभाल कर रखो, नहीं तो मैं उस के हाथपैर तोड़ दूंगा.’’

हर रोज बीरा किसी न किसी लड़के से झगड़ा कर लेती थी. गांव के लड़के बीरा को हमेशा छेड़ा करते थे, ‘तुम लड़के जैसी लगती हो, लेकिन तुम्हारी आवाज लड़की जैसी है. एक पप्पी नहीं दोगी…’

कोई लड़का बीरा के गाल को पकड़ लेता तो कोई मौका मिलते ही उस की छाती को भी. बीरा कभी बरदाश्त नहीं करती और मारपीट पर उतारू हो जाती. स्कूल, गलीमहल्ले, खेतखलिहान, खेल के मैदान, बीरा को हर रोज इन समस्याओं से जूझना पड़ता था.

धीरेधीरे पूरे गांव में यह प्रचार होने लगा कि बीरा किन्नर है.

इसी बीच बीरा की मां की मौत हो गई. अब तो बीरा की परेशानियों को दुनिया में समझने वाला भी कोई नहीं रहा. बीरा की मां उसे एक लड़की की तरह जिंदगी जीने का सलीका सिखाने आई थी. खाना बनाना, बरतन धोना, लड़की की तरह सिंगार करना, सबकुछ उस ने अपनी मां से सीखा था.

बीरा के पिता को लोग चिढ़ाने लगे. खुलेआम मजाक उड़ाने लगे, ‘तेरी बेटी किन्नर है. इस ने तो गांव की नाक कटवा दी है. आज तक इस गांव में कोई किन्नर पैदा नहीं हुआ है.’

बीरा के पिता का भी बरताव बदलने लगा. जैसेजैसे बीरा के कदम जवानी की तरफ बढ़ने लगे, गांव के लड़के उस की तरफ खिंचने लगे और मौका मिलते ही और ज्यादा छेड़ने लगे. बीरा इन हरकतों से तंग आ चुकी थी.

एक दिन बीरा के पिता ने कहा, ‘‘तुम घर से निकल जाओ. रोजरोज के झगड़ों से मैं तंग आ चुका हूं.’’

बीरा भी अपने परिवार वालों का रुख देख कर घर से निकल गई और बिना मंजिल के एक ट्रेन पकड़ ली. उसे मालूम नहीं था कि कहां जाना है.

बीरा आसनसोल स्टेशन पहुंची, जहां किन्नरों की हैड से उस की मुलाकात हुई. उस ने खाना खिलाया, प्यार से बातें कीं और ट्रेन में ही गाने गा कर लोगों से पैसा वसूलने का हुनर सिखाया.

बीरा अब पैसा तो कमाती थी, लेकिन उस का सुख नहीं भोगती थी, क्योंकि सारा पैसा किन्नर की हैड ले लेती. वह 4 महीने तक आसनसोल में रही. वह वहां की जिंदगी से भी तंग आ चुकी थी.

एक दिन किसी को बिना बताए बीरा पटना चली आई. वहां उस की रेशमा नामक समाजसेवी किन्नर से मुलाकात हुई. रेशमा ने बीरा के दर्द को समझने की कोशिश की.

बीरा पढ़ना चाहती थी. रेशमा ने उस का बीए में दाखिला करा दिया. वह मन लगा कर पढ़ने लगी. अपना खर्च निकालने के लिए वह शादीब्याह और पर्वत्योहार के मौके पर आरकैस्ट्रा में नाचगाने का काम भी करने लगी.

बीए करने के बाद बीरा ने कोचिंग की और बीपीएससी की तैयारी करने लगी. पहली बार में वह नाकाम हुई, पर दूसरी बार बीपीएससी पास कर गई. उस की बहाली बीडीओ के पद पर हुई. उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने अपने साथियों को जम कर पार्टी दी.

बीरा के पिता को जब गांव वालों से मालूम हुआ तो उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिसे वे और गांव वाले हिकारत की नजर से देखते थे, वह बीरा पढ़लिख कर अफसर बन जाएगी.

गांव वालों द्वारा यह सूचना भी उन्हें चिढ़ाने जैसी ही लगी. पर उन के गांव का ही एक लड़का बीरा से मिलवाने के लिए उन्हें ब्लौक दफ्तर ले गया. पिता को गलती का एहसास हुआ.

बीरा ने अपने पिता से गांव का हालचाल पूछा और यह भी बोली, ‘‘पिताजी, अब आप को गांव के लोग यह कह कर नीचा नहीं दिखाएंगे कि आप की बेटी किन्नर है.’’

बीरा ने यह भी पूछा कि गांव की मुख्य समस्या क्या है? पिता ने कहा, ‘‘गांव में स्कूल नहीं है.’’

बीरा ने अपने पैसे से गांव में स्कूल खुलवाने का वादा किया. 6 महीने के अंदर बीरा ने बच्चों को पढ़ने के लिए अपने पैसे से गांव में स्कूल खुलवाया, जहां गांव के बच्चे मुफ्त में पढ़ने लगे.

गांव वालों ने बीरा से माफी मांगते हुए उसे सम्मानित किया. सम्मान समारोह में लोगों ने यही कहा कि उन के गांव में आज तक कोई ऐसा लड़का या लड़की नहीं पैदा हुई, जो हमारे गांव का नाम रोशन कर सके. बीरा ने इस गांव का मानसम्मान बढ़ाया है.

Short Story : कोठा – उस लड़की ने धंधा करने से क्यों मना कर दिया

Short Story : ‘‘अरे  रामू, क्या हुआ?’’ चनकू बाई ने पूछा.

‘‘यह लड़की धंधा करने को तैयार नहीं हो रही है,’’ रामू ने कहा.

रामू की बात सुन कर चनकू बाई कुछ सोचने लगी. कुछ याद आते ही वह बोली, ‘‘रामू, फौरन डीडी को बुलाओ, वही चुटकियों में ऐसे केस हल कर देता है.’’

डीडी उर्फ दामोदर गांव का एक सीधासादा नौजवान था. गांव के ऊंचे घराने की लड़की से उसे इश्क हो गया था. वह लड़की भी उसे बहुत प्यार करती थी. लेकिन उन दोनों के प्यार के बीच दौलत की दीवार थी, जिसे दामोदर तोड़ न सका.

दामोदर के सामने ही उस की प्रेमिका किसी और की हो गई. उस दिन दामोदर बहुत रोया था. उसे एहसास हो गया था कि दौलत के बिना इनसान अधूरा है. उस के पास दौलत होती, तो शायद उस का प्यार नहीं बिछुड़ता.

अपने प्यार का घरौंदा उजड़ते देख कर दामोदर ने फैसला किया कि वह बहुत दौलत कमाएगा, चाहे यह दौलत पाप की कमाई ही क्यों न हो.

इश्क में हारा दामोदर घर में अपने मांबाप से बगावत कर के शहर में

दौलत कमाने का सपना ले कर मुंबई आ गया.

मुंबई में दामोदर बिलकुल अकेला था. काम की तलाश में वह बहुत भटका, मगर उसे काम नहीं मिला.

एक दिन दामोदर की मुलाकात रामू से हो गई. दामोदर ने उसे अपनी आपबीती सुनाई, तो रामू को अपनापन महसूस हुआ.

वह बोला, ‘‘मैं तुम्हें काम दिला सकता हूं, पर उस काम में जोखिम बहुत है और पुलिस का डर भी है.’’

‘‘मो सिर्फ पैसा चाहिए, काम चाहे कितना भी खतरनाक ही क्यों न हो.’’

दामोदर की बात सुन कर रामू ने एक बार उसे ऊपर से नीचे तक देखा. वह समा चुका था कि दामोदर के सिर पर दौलत कमाने का भूत सवार है. इस से कुछ भी काम कराया जा सकता है.

रामू दामोदर को ले कर चनकू बाई के कोठे पर पहुंचा.

चनकू बाई ने दामोदर से बात की, फिर उसे एक वैन दे दी, जिस से वह लड़कियां सप्लाई करने लग पड़ा.

इस काम में दामोदर को अच्छीखासी रकम मिलती थी. अब रामू व दामोदर एकसाथ रहने लगे थे. उन दोनों में गहरी दोस्ती भी हो गई थी.

कुछ ही दिनों में दामोदर ने अपनी मेहनत से चनकू बाई के दिल में अच्छीखासी जगह बना ली थी. अब चनकू बाई दामोदर को डीडी के नाम से पुकारती थी.

डीडी उर्फ दामोदर को चनकू बाई का संदेश मिला और वह फौरन कोठे पर पहुंचा.

रामू ने लड़की के बारे में दामोदर को सबकुछ बता दिया.

दामोदर दरवाजा खोल कर कमरे में आया. उस ने फर्श पर पड़ी लड़की को उठाना चाहा, मगर वह बेहोशी की हालत में थी. उस का जिस्म किसी गरम भट्ठी की तरह तप रहा था.

‘‘बाई, इस लड़की को तो काफी

तेज बुखार है. किसी डाक्टर को दिखाना होगा,’’ दामोदर ने कहा.

‘‘इस कोठे पर कौन डाक्टर आएगा…’’ चनकू बाई परेशान होते हुए बोली.

‘‘फिर?’’ रामू ने पूछा.

‘‘ठीक है बाई, मैं इस लड़की को घर ले जाता हूं, वहां किसी डाक्टर को दिखा लूंगा. जब यह ठीक हो जाएगी, तो कोठे पर ले आऊंगा,’’ दामोदर बोला.

दामोदर की बात से रामू और चनकू बाई दोनों राजी थे.

दामोदर लड़की को अपने घर ले आया. उस का घर बहुत छोटा था.

उस के साथ लड़की देख कर महल्ले वाले यह समो कि शायद यह उस की बीवी है.

डाक्टर ने आ कर लड़की को दवाएं दे दीं. बुखार उतर नहीं रहा था.

दामोदर पूरी रात उस लड़की के माथे पर पट्टियां रखता रहा.

दामोदर की मेहनत रंग लाई. सुबह लड़की को होश आ गया. दामोदर ने उसे कुछ दवाएं खाने को दीं. नानुकर के बाद लड़की ने दवा खा ली.

दोपहर तक लड़की पूरी तरह से होश में आ चुकी थी. उस ने अपना नाम रजनी बताया. बचपन में ही उस के पिता की मौत हो चुकी थी.

रजनी की मां ने बेटी को पालने के लिए दूसरी शादी कर ली. शादी के कुछ साल बाद ही रजनी की मां की मौत हो गई.

मां की मौत के बाद से ही रजनी के सौतेले बाप ने उसे तंग करना शुरू कर दिया था. पिता से आजिज हो चुकी रजनी गांव के एक नौजवान को दिल दे बैठी.

उस नौजवान ने रजनी को शहर की चमकदमक के सुनहरे सब्जबाग दिखाए. वह रजनी को बहलाफुसला कर शहर ले आया और धोखे से कोठे पर बेच दिया था.

दामोदर ने रजनी की कहानी बड़े गौर से सुनी. आज तक उस ने जितनी भी लड़कियों को धंधे में उतारा था, उन में से किसी की भी कहानी नहीं सुनी थी.

थोड़ी देर के बाद दामोदर दरवाजे पर बाहर से ताला लगा कर खाना लेने होटल चला गया.

कुछ देर बाद ही दामोदर खाना ले कर लौटा. रजनी ने खाना खाया. उस के बाद वह तख्त पर लेट गई. दामोदर भी फर्श पर चटाई बिछा कर पुराना सा कंबल ले कर लेट गया.

रजनी की सेहत दिन ब दिन सुधरने लगी थी. दामोदर रोज घर के बाहर ताला लगाने के बाद कोठे पर जा कर चनकू बाई को रजनी की सेहत के बारे में बताता था.

एक दिन दामोदर जल्दी में बाहर से ताला लगाना भूल गया. जब वह शाम को घर लौटा, तो उस ने खुला दरवाजा देखा. उस के मानो होश उड़ गए. उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. लेकिन रजनी घर पर ही थी.

‘‘रजनी, आज तो भागने का मौका था. तुम भागी क्यों नहीं?’’

दामोदर की बात सुन कर रजनी मुसकराते हुए बोली, ‘‘भाग कर जाती भी तो कहां? अब तो दुनिया के सभी दरवाजे मेरे लिए बंद हो गए हैं.’’

रजनी के ये शब्द दामोदर के दिल में तीर की तरह चुभ गए थे.

‘‘लो, खाना खा लो,’’ दामोदर ने खाने का पैकेट रजनी को देते हुए कहा.

‘‘नहीं, आज मैं ने घर पर ही खाना बना लिया था. आप हाथमुंह धो लीजिए. मैं खाना परोसती हूं,’’ रजनी बोली.

दामोदर ने रजनी के हाथ का बना खाना खाया. आज पहली बार मां के बाद उस ने किसी दूसरी औरत के हाथ का बना स्वादिष्ठ खाना खाया था.

खाना खाने के बाद दामोदर पुराना कंबल ले कर जमीन पर लेट गया. रजनी भी तख्त पर लेट गई. पर उन दोनों को नींद नहीं आ रही थी. वे दोनों अपनीअपनी जगह पर करवटें बदलते रहे.

सर्दी भरी रात में दामोदर ठंड से सिकुड़ता जा रहा था, लेकिन रजनी जाग रही थी.

रजनी लेटे हुए ही दामोदर को देख रही थी, शायद दामोदर सो चुका था.

रजनी ने अपनी रजाई उठाई और वह भी दामोदर के साथ सो गई.

सुबह जब दामोदर की आंख खुली, तब तक काफी देर हो चुकी थी. रजनी ने अपना सबकुछ दामोदर को सौंप दिया था. दामोदर अपनी इस गलती के लिए शर्मिंदा था.

दामोदर तैयार हो कर जैसे ही कोठे पर जाने के लिए निकला, सामने रामू अपने गुरगे ले कर पहुंच गया. वह रजनी को लेने आया था, पर दामोदर ने रजनी के बीमार होने की बात कही और उन के साथ कोठे पर चला गया.

अब दामोदर रजनी को कोठे पर नहीं लाना चाहता था. शायद उसे रजनी से प्यार हो गया था.

दामोदर ने अपने प्यार वाली बात रामू को बताई. रामू ने दामोदर को चनकू बाई के कहर का वास्ता दिया और आगे से ऐसी गलती न करने की राय भी दी.

दूसरे दिन रामू जीप ले कर रजनी को लेने दामोदर की खोली में पहुंचा, तो दामोदर वहां नहीं था. उस के कमरे के बाहर ताला लटका देखा. रामू तो समा गया कि दामोदर रजनी को ले कर कहीं भाग गया है.

जब यह खबर चनकू बाई को मिली, तो वह गुस्से से तिलमिला उठी. उस ने फौरन शहर में गुंडे फैला दिए थे, ताकि दामोदर और रजनी शहर से बाहर न जाने पाएं.

अब सारे शहर में चनकू बाई के आदमी घूम रहे थे, पर दामोदर और रजनी का कहीं अतापता नहीं था.

रामू भी कुछ आदमियों को ले कर रेलवे स्टेशन पर तलाश कर रहा था. हथियारों से लैस चनकू बाई के आदमी टे्रन के हर डब्बे की तलाशी ले रहे थे.

रामू जैसे ही डब्बे में घुसा, सामने दामोदर और रजनी को देख कर ठिठक गया था. रजनी किसी अमरबेल की तरह दामोदर से चिपकी थी.

रामू को देख कर वह कांप उठी. दामोदर भी रामू की आंखों में आंखें डाले देख रहा था. उधर ट्रेन चलने के लिए हौर्न दे रही थी.

‘‘रामू, वे इस डब्बे में हैं क्या?’’ चनकू बाई के किसी आदमी ने चिल्ला कर पूछा.

‘‘नहीं, इस डब्बे में कोई नहीं है. चलो, कहीं दूसरी जगह ढूंढें़.’’

रामू की यह बात सुन कर दामोदर और रजनी की जान में जान आई.

रामू ट्रेन से नीचे उतर गया था. वह खिड़की के पास से गुजरते हुए बोला, ‘‘जाओ मेरे दोस्त, तुम्हें नई जिंदगी मुबारक हो. तुम दोनों हमेशा खुश रहो. इस दलदल से निकल कर एक नई जिंदगी जीओ.’’

ट्रेन चल चुकी थी. दामोदर ने खिड़की से बाहर देखा. रामू जीप स्टार्ट कर के चनकू बाई के आदमियों के साथ दूर जा चुका था.

Social Story : गांव की गोरियां

Social Story : सोशल मीडिया भी गजब ही है भैया. यहां कबाड़ भरा है तो जुगाड़ भी भरा है. अब टिक टौक और लाइक को ही ले लो. एक अलग ही दुनिया. कुछ सैकंड का धमाल, दुनिया में कर दो कमाल. अब तो बड़ेबड़े नामचीन भी इस के असर से अछूते नहीं हैं. शहर की गोरीचिट्टी छोरियां इंगलिश में गिटपिट बोलें, लड़कों के मजे लें और अपने हुस्न के जलवे बिखेर कर खूब लाइक बटोरें.

पर गांवदेहात की लड़कियों को भी कम मत सम?ाना. टिक टौक और लाइक पर छाई हुई हैं ये कसे बदन की तितलियां. कभी गौर किया है इन बिजली सी चमकती ठेठ गोरियों पर. सपना चौधरी के ‘तेरी आंख्यां का यू काजल…’ गीत पर ठुमके लगा कर सपना चौधरी को ही पानी भरवा दें. सब से बड़ी बात तो यह कि ऐसी लड़कियां ज्यादा अमीर घरों की नहीं होती हैं. उन के कच्चेपक्के घरों, बिना ओट की छतों से अंदाजा लगा सकते हैं कि वे किसी अगड़े समाज से नहीं आती हैं, पर उन में अपना हुनर दिखाने की ललक होती है.

हां, एक बात जरूर है कि कैमरे के सामने आने से पहले वे अपना होमवर्क बड़े अच्छे ढंग से करती हैं. कैसे अपनी फिगर का इस्तेमाल करना है, कैसे कपड़े पहनने हैं कि बदन उतना ही दिखे कि आह निकल जाए. वे मेकअप पर भी खूब ध्यान देती हैं और जो भी पेश करती हैं, उस में उन की मेहनत दिखाई देती है.

इस सब में फिल्मी गानों, संवादों और चुटकुलों का भी बड़ा अहम रोल होता है. देशी बोली के तड़कतेभड़कते गाने और लड़कियों का कूल्हे मटकाना जबरदस्त जुगलबंदी बन जाता है. इस में बहुत सी लड़कियां अपने डांस को और मस्त बनाने के लिए कपड़े भी इतने बदनदिखाऊ पहन लेती हैं कि मनचलों की आहें निकल जाती हैं. फिर कुछ लड़कियां तो एडल्ट चुटकुले भी अपने दिलकश अंदाज में सुना देती हैं.इस से उन के चाहने वालों की लिस्ट लंबी हो जाती है.

सपना चौधरी के गाने पहले सस्ते वीडियो कैसेट पर बजते थे, फिर जब उन की देखादेखी बहुत सी लड़कियों ने ऐसे छोटेछोटे वीडियो बना कर टिक टौक वगैरह पर डालने शुरू कर दिए तो उन के भी फैन बनते चले गए.

हरियाणा की सोनाली फोगाट तो इतनी मशहूर हो गईं कि उन को हरियाणा विधानसभा की टिकट तक मिल गई. उन के वीडियो भी कम दिलचस्प नहीं हैं. पूजा जैन से ढिंचक पूजा बन चुकी यह लड़की अब इंटरनैट की सनसनी है.

Family Story : रामलाल की घर वापसी

Family Story : तकरीबन 7-8 घंटे के सफर के बाद बस ने गांव के बाहर ही उतार दिया था. रामलाल ने कमला को भी अपने साथ बस से उतार लिया था.

‘‘देखो कमला, तुम्हारा पति जब तुम्हारे साथ इतनी मारपीट करता है, तो तुम उस के साथ क्यों रहना चाहती हो?’’

कमला थोड़ी देर तक खामोश बनी रही. उस ने कातर भाव से रामलाल की ओर देखा.

‘‘पर…’’

‘‘परवर कुछ नहीं, तुम मेरे साथ चलो.’’

‘‘तुम्हारे घर के लोग मेरे बारे में पूछेंगे, तो क्या कहोगे?’’

‘‘कह दूंगा कि तुम मेरी घरवाली हो, जल्दबाजी में ब्याह करना पड़ा.’’

कमला कुछ नहीं बोली. दोनों के कदम गांव की ओर बढ़ गए.

रामलाल के सामने पिछले एक महीने में घटी एकएक बात किसी फिल्म की तरह सामने आ रही थी.

रामलाल शहर में मजदूरी करता था. ब्याह नहीं हुआ था, इसलिए जो मजदूरी मिलती उस में उस का खर्च आराम से चल जाता. थोड़ेबहुत पैसे जोड़ कर वह गांव में अपनी मां को भी भेज देता. गांव में एक बहन और मां ही रहते हैं. एक बीघा जमीन है, पर उस से सभी की गुजरबसर होना मुमकिन नहीं था. गांव में मजदूरी मिलना मुश्किल था, इसलिए उसे शहर आना पड़ा.

‘शहर गांव से तो बहुत दूर था, ऊपर उसे कौन रोजरोज गांव आना है…’ सोच कर रामलाल यहीं काम करने भी लगा था. एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया था. एक स्टोव और कुछ बरतन. शाम को जब काम से लौटता तो 2 रोटी बना लेता और खा कर सो जाता. दिनभर का थका होता, इसलिए नींद भी अच्छी आती.

रामलाल ईमानदारी से काम करता था, इस वजह से सेठ भी उस से खुश रहता था. वह अपनी मजदूरी से थोड़े पैसे सेठ के पास ही जमा कर देता.

सालभर हो गया था रामलाल को शहर में रहते हुए. इस एक साल में वह अपने गांव भी नहीं जा पाया था. उस दिन उस ने देर तक काम किया था. वह अपने कमरे पर देर से पहुंचा था. जल्दबाजी में उसे ध्यान ही नहीं रहा कि वह सेठ से कुछ पैसे ले ले. उस ने अपनी जेब टटोली 10 का सिक्का उस के हाथ में आ गया.

‘चलो आज का खर्चा तो चल जाएगा, कल सेठ से पैसे मिल ही जाएंगे.’ रामलाल ने गहरी सांस ली. 2 रोटी बनाई और खा कर सो गया.

सुबह जब रामलाल नहा कर काम पर जाने के लिए निकला, तो पता चला कि पुलिस वाले किसी को घर से निकलने ही नहीं दे रहे हैं. सरकार ने लौकडाउन लगा दिया है. बहुत देर तक तो वह इस का मतलब ही नहीं सम झ पाया. केवल यही सम झ में आया कि वह आज काम पर नहीं जा पाएगा. वह उदास कदमों से अपने कमरे पर लौट आया. मकान मालिक उस के कमरे के सामने ही मिल गया था.

‘देखो रामलाल, महीनेभर का लौकडाउन है. कोई वायरस फैल रहा है. तुम एक काम करो कि जल्दी से जल्दी कमरा खाली कर दो.’

रामलाल वैसे ही लौकडाउन का मतलब नहीं सम झ पाया था, उस पर वायरस की बात तो उसे बिलकुल भी सम झ में नहीं आई.

‘कमरा खाली कर दो… मु झ से कोई गलती हो गई क्या?’

‘नहीं, पर तुम काम पर जा नहीं पाओगे, तो कमरे का किराया कैसे दोगे?’

‘क्या महीनेभर काम बंद रहेगा?’

‘हां, घर से निकलोगे तो पुलिस वाले डंडा मारेंगे.’

रामलाल के सामने अंधेरा छाने लगा. उस के पास तो केवल 10 का सिक्का ही है. वह कुछ नहीं बोला, उदास कदमों से अपने कमरे में आ कर जमीन पर बिछी दरी पर लेट गया.

जब रामलाल की नींद खुली तब तक शाम का अंधेरा फैलने लगा था. उस ने बाहर निकल कर देखा. बाहर सुनसान था. उसे पैसों की चिंता सता रही थी अगर वह कल ही सेठ से पैसे ले लेता तो कम से कम खाने का जुगाड़ तो हो जाता.

अगर वह सेठ के पास चला जाए तो सेठ उसे पैसे जरूर दे सकते हैं. उस ने कमरे से फिर बाहर की ओर झांका. बहुत सारे पुलिस वाले खड़े थे. उस की हिम्मत बाहर निकलने की नहीं हुई. वह फिर से दरी पर लेट गया. उस की नींद जब खुली, उस समय रात के 2 बज रहे थे. भूख के चलते उस के पेट में दर्द सा हो रहा था.

वह उठा और स्टोव जला लिया, पर आटा रखने वाले डब्बे को खोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी. वह जानता था कि उस में थोड़ा सा ही आटा बचा है. अगर अभी रोटी बना ली तो कल के लिए कुछ नहीं बचेगा. उस ने निराशा के साथ डब्बा खोला और सारे आटे को थाली में डाल लिया. 2 छोटीछोटी रोटियां ही बन पाईं. एक रोटी खा ली और दूसरी रोटी को डब्बे में रख दिया.

सुबह हो गई थी. रामलाल ने बाहर झांक कर देखा. पुलिस कहीं दिखाई नहीं दी. वह कमरे से बाहर निकल आया. उस के कदम सेठ के घर की ओर बढ़ लिए.

सेठ का घर बहुत दूर था. छिपतेछिपाते वह उन के घर के सामने पहुंच गया था. दिन पूरा निकल आया था. यह सोच कर कि सेठ जाग गए होंगे, उस के हाथ बाहर लगी घंटी पर पहुंच गए थे. उन के नौकर ने दरवाजा खोला था.

‘जी मैं रामलाल हूं, सेठजी के यहां ठेके पर काम करता हूं.’

‘हां तो…’

‘मुझे कुछ पैसे चाहिए.’

‘हां तो ठेके पर जाना वहीं मिलेंगे. सेठजी घर पर नौकरों से नहीं मिलते.’

‘पर, वह लौकडाउन लग गया है, न तो काम तो महीनेभर बंद रहेगा.’

‘तभी आना…’

‘तुम एक बार उन से बोलो तो सही, वे मु झे बहुत चाहते हैं.’

‘अच्छा रुको, मैं पूछता हूं,’ नौकर को शायद दया आ गई थी उस पर.

नौकर के साथ सेठ भी बाहर आ गए थे. उन के चेहरे पर झुं झलाहट के भाव साफ झलक रहे थे, जिन्हें रामलाल नहीं पढ़ पाया.

सेठजी को देखते ही उस ने झुक कर पैर पड़ने चाहे थे, पर सेठ ने उसे दूर से ही झटक दिया.

‘अब तुम्हारी इतनी हिम्मत हो गई कि घर चले आए…’

‘सेठजी कल आप से पैसे ले नहीं पाया था. मेरे पास बिलकुल भी पैसे नहीं हैं, ऊपर से लौकडाउन हो गया है. इसलिए आना पड़ा,’ रामलाल ने सकपकाते हुए कहा.

‘चल यहां से… बड़ा पैसे लेने आया है. मैं घर पर लेनदेन नहीं करता.’

सेठ ने उसे गुस्साई निगाहों से घूरा तो रामलाल घबरा गया. उस ने सेठजी के पैर पकड़ लिए, ‘मेरे पास बिलकुल भी पैसे नहीं हैं. थोड़े से पैसे मिल जाते हुजूर.’

सेठ उसे ठोकर मारते हुए अंदर चले गए. हक्काबक्का रामलाल थोड़ी देर तक वहीं खड़ा रहा. उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. तभी पुलिस की गाडि़यों के आने की आवाज गूंजने लगी. वह डर गया और भागने लगा. छिपतेछिपाते वह अपने कमरे के नजदीक तक तो पहुंच गया, पर यहीं गली में उसे पुलिस वालों ने पकड़ लिया. वह कुछ बोल पाता, इस के पहले ही उस के ऊपर डंडे बरसाए जाने लगे थे.

रामलाल दर्द से कराह उठा. पुलिस वालों ने गंदीगंदी गालियां देनी शुरू कर दी थीं. तभी एक मोटरसाइकिल पर सवार कुछ नौजवान आ कर रुक गए. उन्होंने पुलिस वालों से कुछ बात की. पुलिस ने उन्हें जाने दिया. रामलाल भी इसी का फायदा उठा कर वहां से खिसक लिया. वह हांफते हुए अपने कमरे
की दरी पर लेट गया. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे, जिन्हें पोंछने वाला कोई नहीं था. उसे अपनी मां की याद सताने लगी.

मां की याद आते ही उस के आंसुओं की रफ्तार बढ़ गई थी. रोतेरोते वह सो गया था. दोपहर का समय ही रहता होगा, जब उस की आंख खुली. उस का सारा बदन दुख रहा था. पुलिस वालों ने उसे बेदर्दी से मारा था. वह कराहता हुआ उठा. बहुत जोर की भूख लगी थी. वह जानता था कि डब्बे में अभी एक रोटी रखी हुई है.

सूखी और कड़ी रोटी खाने में समय लगा. वह अब क्या करे? उस के सामने अनेक सवाल थे. मकान मालिक ने दरवाजा भी नहीं खटखटाया था, सीधे अंदर घुस आया था, ‘तुम कमरा कब खाली कर रहे हो?
वह सकपका गया.

‘मैं इस समय कहां जाऊंगा, आप कुछ दिन रुक जाओ, माहौल शांत हो जाने दो, ताकि मैं दूसरा कमरा ढूंढ़ सकूं.’

रामलाल हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया था.

‘नहीं, माहौल तो मालूम नहीं कब ठीक होगा. तुम तो कमरा कल तक खाली कर दो… नहीं तो मु झे जबरदस्ती करनी पड़ेगी,’ कहता हुआ वह चला गया.

रामलाल को सम झ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. वह चुपचाप बैठा रहा. अभी तो उसे शाम के खाने की भी फिक्र थी.

सूरज ढलने को था. रामलाल अभी भी वैसे ही बैठा था, खामोश. और वह करता भी क्या? उस ने कमरे का दरवाजा जरा सा खोल कर देखा. बाहर पुलिस नहीं थी. वह बाहर निकल आया. थोड़ी दूर पर उसे कुछ भीड़ दिखाई दी.

वह लड़खड़ाते हुए वहां पहुंच गया. कुछ लोग खाने का पैकेट बांट रहे थे. वह भी लाइन में लग गया. हर पैकेट को देते हुए वो फोटो खींच रहे थे, इसलिए समय लग रहा था. उस का नंबर आया. एक आदमी ने उस के हाथ में खाने का पैकेट रखा, साथ में और लोग भी उस के चारों ओर खड़े हो गए. कैमरे का फ्लैश चमकने लगा. फोटो खिंचवा कर वे लोग जा चुके थे.

रामलाल भी अपने कमरे की ओर लौट पड़ा, ‘चलो, आज के खाने का इंतजाम तो हो गया. इसी में से कुछ बचा लेंगे तो सुबह खा लेंगे.’

उसे बहुत जोरों से भूख लगी थी, इसलिए कमरे में आते ही उस ने पैकेट खोल लिया था. पैकेट में केवल 2 मोटी सी पूरी थी और जरा सी सब्जी. सब्जी बदबू मार रही थी, शायद वह खराब हो गई थी.

हक्काबक्का रामलाल पूरी को कुछ देर तक यों ही देखता रहा, फिर उस ने मोटी पूरी को चबाना शुरू कर दिया. दरी पर लेट कर वह भविष्य के बारे में सोचने लगा. वह अब क्या करे. कमरा भी खाली करना है.

अपने गांव भी नहीं लौट सकता, क्योंकि ट्रेनें और बसें बंद हो चुकी हैं, पैसे भी नहीं हैं. रामलाल समझ नहीं पा रहा था कि वह करे तो क्या करे.

रामलाल ने सुबह ही पता लगा लिया था कि सरकार की ओर से खाने का इंतजाम किया गया है, इसलिए वह ढ़ूंढ़ते हुए यहां आ गया था. उस के जैसे यहां बहुत सारे लोग लाइन में लगे थे. वे लोग भी मजदूरी करने दूसरी जगह से आए थे. यहीं उस की मुलाकात मदन से हुई थी, जो उस के पास वाले जिले का था. उस से ही उसे पता चला कि बहुत सारे मजदूर शाम को पैदल ही अपने अपनेअपने गांव लौट रहे हैं. मदन भी उन के साथ जा रहा है.

रामलाल को लगा कि यही अच्छा मौका है. उसे भी इन के साथ गांव चले जाना चाहिए. पर क्या इतनी दूर पैदल चल पाएगा? पर, अब उस के पास कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं. अगर मकान मालिक ने जबरन उसे कमरे से निकाल दिया तो वह क्या करेगा. गहरी सांस ले कर उस ने सभी के साथ गांव लौटने का मन बना लिया.

शाम को वह अपना सामान बोरे में भर कर तय जगह पर पहुंच गया, जहां मदन उस का इंतजार कर रहा था. सैकड़ों की तादाद में उस के जैसे लोग थे, जो अपनाअपना सामान सिर पर रख कर पैदल चल रहे थे. इन में बच्चे भी थे और औरतें भी.

रात का अंधकार फैलता जा रहा था, पर चलने वालों के कदम नहीं रुक रहे थे. कुछ अखबार वाले और कैमरा वाले सैकड़ों की इस भीड़ का फोटो खींच रहे थे. इसी वजह से पुलिस वालों ने उन्हें घेर लिया था. वे गालियां बक रहे थे और लौट जाने को कह रहे थे. भीड़ उन की बात सुन नहीं रही थी. पुलिस ने जबरन उन्हें रोक लिया था.

‘आप सभी की जांच की जाएगी और रुकने का इंतजाम किया जाएगा, कोई आगे नहीं बढ़ेगा,’ लाउडस्पीकर से बोला जा रहा था.

सारे लोग रुक गए थे. एकएक कर सभी की जांच की गई. फिर सभी को इकट्ठा कर आग बु झाने वाली मशीन से दवा छिड़क दी गई. दवा की बूंदें पड़ते ही रामलाल की आंखों में जलन होने लगी थी. मदन भी आंख बंद किए

कराह रहा था. और भी लोगों को परेशानी हो रही थी, पर कोई सुनने को तैयार ही नहीं था.

दवा छिड़कने वाले कर्मचारी उलटासीधा बोल रहे थे. सारे लोगों को एक स्कूल में रोक दिया गया था. सैकड़ों लोग और कमरे कम. बिछाने के लिए केवल दरी थी. पानी के लिए हैंडपंप था. औरतों के लिए ज्यादा परेशानी थी. 2 रोटी और अचार खाने को दे दिया गया था.

‘हरामखोरों ने परेशान कर दिया,’ बड़बड़ाता हुआ एक कर्मचारी जैसे ही निकला, एक औरत ने उसे रोक लिया, ‘क्या बोला… हरामखोर… अरे, हम तो अच्छेभले जा रहे थे, हमें जबरन रोक लिया और अब गाली दे रहे हैं.’

उस औरत की आवाज सुन कर और भी लोग इकट्ठा हो गए थे.

‘भूखों को जमाई जैसी सुविधाएं चाहिए…’ वह फिर बड़बड़या.

‘रोकने का इंतजाम नहीं था तो क्यों रोका… 2 सूखी रोटी दे कर अहसान जता रहे हैं,’ किसी ने जोर से बोला था, ताकि सभी सुन लें. पर, साहब को यह पसंद नहीं आया. उन्होंने हाथ में डंडा उठा लिया था, ‘कौन बोला… जरा सामने तो आओ… यहां मेरी बेटी की बरात लग रही है क्या… जो तुम्हें छप्पन व्यंजन बनवा कर खिलवाएं.’

सारे सकपका गए. वे सम झ चुके थे कि उन्हें कुछ दिन ऐसे ही काटने पड़ेंगे. छोटे से कमरे में बहुत सारे लोग जैसेतैसे रात को सो लेते और दिन में बाहर बैठे रहते. बाथरूम तक का इंतजाम नहीं था. औरतें बहुत परेशान हो रहीं थीं.

कोई नेताजी आए थे उन से मिलने. वहां के कर्मचारियों ने पहले ही बता दिया था कि कोई नेताजी से शिकायत नहीं करेगा, इसलिए बाकी सारे लोग तो खामोश रहे, पर एक बूढ़ी औरत खामोश नहीं रह पाई.

जैसे ही नेताजी ने मुसकराते हुए पूछा, ‘कैसे हो आप लोग… हम ने आप के लिए बहुत सारा इंतजाम किया है उम्मीद है कि आप अच्छे से होंगे.’

बुजुर्ग औरत यह सुन कर भड़क गई, ‘दो सूखी रोटी और सड़ी दाल दे कर अहसान जता रहे हो.’

किसी को उम्मीद नहीं थी. सभी लोग सकपका गए. एक कर्मचारी उस औरत की ओर दौड़ा, पर वह खामोश नहीं हुई, ‘हुजूर, यहां कोई इंतजाम नहीं है. हम लोग एक कमरे में भेड़बकरियों की तरह रह रहे हैं.’

नेताजी कुछ नहीं बोले. वे लौट चुके थे. उन के जाने के बाद सारे लोगों पर कहर टूट पड़ा था.

फिर सरकार ने बस भिजवाई थी, ताकि सभी लोग अपनेअपने गांव लौट सकें. मदन और रामलाल एक ही बस में बैठ रहे थे, तभी किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई दी थी.

रामलाल उधर पहुंच गया था. एक आदमी एक औरत के बाल पकड़ कर पीठ पर मुक्के मार रहा था. वह औरत दर्द से बिलबिला रही थी.

‘इसे क्यों मार रहे हो भाई?’ रामलाल से सहन नहीं हो रहा था.

‘तू बीच में मत पड़. यह मेरी घरवाली है. सम झ गया तू,’ उस ने अकड़ कर कहा.

‘घरवाली है तो ऐसे मारोगे.’

‘तुझे क्या, जा अपना काम कर.’

रामलाल का खून खौलने लगा था, ‘पर बता तो सही, इस ने किया क्या है?’

‘यह औरत मनहूस है. इस के चलते ही मैं परेशान हो रहा हूं,’ कहते हुए उस ने जोर से औरत के बाल खींचे. वह दर्द से रो पड़ी. रामलाल सहन नहीं कर सका. उस ने औरत का हाथ पकड़ा और अपनी बस में ले आया.

‘तुम मेरे साथ बैठो. देखता हूं, कौन माई का लाल है, जो तुम्हें हाथ लगाएगा?’

औरत बहुत देर तक सुबकती रही थी. उस ने अपना नाम कमला बताया था. उस ने तो केवल यह सोचा था कि उस के आदमी का गुस्सा जब शांत हो जाएगा, तो वह ही उसे ले जाएगा. पर, वह उसे लेने नहीं आया.

‘अच्छा ही हुआ. उस ने इस की जिंदगी खराब कर रखी थी, पर अब यह जाएगी कहां?’ सवाल तो रामलाल के मन में था, पर जवाब उस के पास नहीं था. बस से उतर कर उस ने उसे साथ ले जाने का फैसला कर लिया था.

रामलाल के साथ कमला भी सोचती हुई कदम बढ़ा रही थी. उसे नहीं मालूम था कि उस का भविष्य क्या है, पर रामलाल उसे अच्छा लगा था. वह जिन यातनाओं से हो कर गुजरी है, शायद उसे उन से छुटकारा मिल जाए.

मां बाहर आंगन में बैठी ही मिल गई थीं.

रामलाल उन से लिपट पड़ा, ‘‘मां…’’ उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. रो तो मां भी रही थी, जब से लौकडाउन लगा था, तब से ही मां उस के लिए बेचैन थीं. उन्होंने उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया था. दोनों रो रहे थे, कमला चुपचाप मां बेटे को रोता हुआ देख रही थी.

अपने आंसू पोछ कर उस ने कमला की ओर इशारा किया. ‘‘मां, आप की बहू…’’

यह सुन कर चौंक गईं मां, ‘‘बहू… तू ने बगैर मु झ से पूछे ब्याह रचा लिया…?’’

‘‘मां, मजबूरी थी, लौकडाउन के चलते… गांव आना था इसे कहां छोड़ता… बेसहारा है न मां.’’

मां ने नजर भर कर कमला को देखा.

‘‘चल, अच्छा किया.’’ कह कर मां ने कमला का माथा चूम लिया.

Family Story : रफूचक्कर

Family Story : ईशा बिजनौर जिले के नगीना इलाके में अपने अम्मीअब्बा के साथ रहती थी. उस से बड़ी दो बहनों की शादी पहले ही हो चुकी थी, बाकी के 2 भाई मुंबई में स्टोर चलाते थे.

घर पर केवल ईशा और उस के अम्मीअब्बा ही रहते थे. उन का घर मेन रोड पर था. जब ईशा छत पर कपड़े फैलाने जाती थी, तो अकसर आनेजाने वाले लड़के उसे हसरतभरी निगाहों से देखते थे.

ईशा की उम्र अभी 17 साल थी, पर वह थी बड़ी गजब की खूबसूरत. सुनहरे बाल, गोरा चमकता चेहरा, छोटीछोटी कत्थई आंखें, सुर्ख होंठ, पतली कमर, उभरी हुई छाती. ऐसा लगता था जैसे सारा रस छाती में भर गया हो, जिसे पीने के लिए हर कोई बेताब रहता था और उसे अपना बनाने की तरकीब सोचता रहता था.

उन्हीं में से एक लड़का था इमरान. ईशा जब भी छत पर जाती थी, तब इमरान हमेशा उसे हसरतभरी निगाहों से देखता रहता था और वह ईशा का ऐसा दीवाना बना हुआ था कि दोपहर की भरी गरमी हो या तूफानी बारिश या फिर कड़ाके की ठंड… ईशा की एक झलक पाने के लिए वह बेकरार रहता था. इन सब मौसम की परवाह न करते हुए उस के घर के पास खड़ा रहता था.

ईशा समझ गई थी कि इमरान उसे दिलोजान से चाहता है. ईशा के दिल में भी इमरान के लिए प्यार के बीज फूटने लगे थे और अब वह भी कोई न कोई बहाना बना कर छत पर आ जाती और इमरान को अपनी एक कातिल मुसकान से घायल कर जाती.

कई दिनों तक यों ही आंखोंआंखों में वे दोनों एकदूसरे से अपने प्यार का इजहार करते रहे, फिर उन की जिंदगी में आखिरकार वह दिन भी आ ही गया, जब दोनों ने एकदूसरे से मिल कर अपने प्यार का इजहार किया.

ईशा के अम्मीअब्बू पास के एक गांव में अपने किसी रिश्तेदार के यहां गए हुए थे. बादलों की गड़गड़ाहट के साथ तेज बारिश हो रही थी.

इमरान इस तेज बारिश में ईशा के दीदार के लिए पागलों की तरह बारिश में खड़ा था. उस का पूरा बदन पानी में भीग चुका था.

ईशा अपने घर मे अकेली थी. तभी उस ने इमरान की झलक पाने के लिए छत पर जा कर नजर दौड़ाई, तो देखा इमरान बारिश में खड़ा हुआ भीग रहा था. दूरदूर तक इमरान के सिवा कोई नजर नहीं आ रहा था. सब लोग तेज आंधी और बारिश की वजह से अपनेअपने घरों में कैद थे.

ईशा भी छत पर गई, तो पलभर में ही बुरी तरह भीग गई. उस ने जल्दी से इमरान को अपने घर में आने का इशारा किया और नीचे चली आई.

दरवाजा खुला था. इमरान फौरन मौका देख कर घर के अंदर दाखिल हो गया. ईशा बरामदे में ही खड़ी थी और इमरान को तौलिया दे कर बोली, ‘‘सिर पोंछ लो, नहीं तो सर्दी लग जाएगी.’’

इमरान की नजर जब ईशा के भीगे हुए बदन पर पड़ी, तो वह मदहोश हो गया. ईशा की उठी हुई छाती उस के कपड़े से चिपकी हुई अलग ही नजर आ रही थी.

ईशा के भीगे हुए बदन से कपड़े ऐसे चिपके हुए थे कि बदन का एकएक अंग साफ नजर आ रहा था. उस की पतली कमर देख कर इमरान का मन ललचाने लगा था.

इमरान ने आगे बढ़ कर ईशा को अपने आगोश में भर लिया और उस पर चुम्मों की बौछार कर दी. वह उस की उभरी हुई छाती को अपने सख्त हाथों से मसलने लगा.

इमरान की इन हरकतों से ईशा को एक अजब ही मजा आने लगा था. वह धीरेधीरे अपने बदन को इमरान को सौंपने लगी.

इमरान ने पलभर में ही बारिश से भीगे ठंडे बदन को अपने बदन की गरमी से गरम कर दिया था. ईशा ने पूरी तरह अपना कमसिन बदन इमरान को सौंप दिया था.

इमरान ने ईशा को अपनी गोद में उठा कर वहीं पड़े पलंग पर लिटा दिया. पलभर में ही वे दोनों पसीने से सराबोर हो गए.

ईशा के बदन से कपड़े हटते ही उस का गोरा और कमसिन बदन संगमरमर की तरह चमकने लगा. ईशा दर्द से तड़पने लगी. उस का कुंआरा बदन आज इमरान के आगोश में आ कर एक अजीब और मीठा दर्द महसूस कर रहा था.

कुछ देर दोनों ऐसे ही एकदूसरे का साथ देते रहे, फिर ठंडे पड़ कर एकदूसरे से अलग हो गए.

वे दोनों एकदूसरे के दीवाने हो गए थे और साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे थे.

ईशा बोली, ‘‘इमरान, मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकती. चलो, हम कहीं भाग चलें.’’

इमरान ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘जल्दबाजी में गलत कदम नहीं उठाना. ऐसा करने से घर वालों की बेइज्जती होगी. हम दोनों एकदूसरे से सच्चा प्यार करते हैं. पहले हम कोशिश करेंगे कि हमारे घर वाले हमारी शादी के लिए राजी हो जाएं. अगर उन्होंने हमारी बात नहीं मानी, तो हम भाग कर शादी कर लेंगे.’’

ईशा बोली, ‘‘ठीक है, मैं अपने घर वालों को मनाने की पूरी कोशिश करूंगी. अगर वे नहीं माने तो तुम्हें मेरा साथ देना होगा, क्योंकि मेरे घर वाले ऊंचनीच का भेदभाव करते हैं. वे अपनेआप को ऊंची जाति का समझते हैं.’’

‘‘वे क्या जानें दो दिलों की मुहब्बत के बारे में. उन्हें तो बस अपनी जात प्यारी है,’’ इमरान बोला.

‘‘इमरान, तुम कोशिश तो करो. क्या पता कि वे हमारी मुहब्बत को समझे… हमारे प्यार को कबूल कर लें और हमारा निकाह करा दें,’’ ईशा की यह बात सुन कर इमरान ने उस से रुखसती ली और अपने घर चला गया.

इमरान पिछड़ी मुसलिम जाति की सलमानी बिरादरी से ताल्लुक रखता था, जबकि ईशा मुसलिम समुदाय की खान बिरादरी से ताल्लुक रखती थी.

उत्तर प्रदेश में बिरादरीवाद कुछ ज्यादा ही रहता है. वहां कोई भी अपनी बिरादरी की लड़की या लड़के की शादी किसी गैरबिरादरी में नहीं करता है. अगर करता है तो उन के समुदाय के लोग उन से बातचीत तो बंद करते ही हैं, साथ ही उन्हें यह भी ताना मारते हैं कि इसे अपनी बिरादरी में लड़का या लड़की नहीं मिली, जो दूसरों के यहां रिश्ता कर दिया.

इमरान ने जब अपने अब्बा से खान बिरादरी की ईशा से शादी करने की बात कही, तो पहले तो उस के अब्बा ने नानुकर की, पर जब इमरान अपनी जिद पर अड़ा रहा, तो उन्हें इमरान के आगे झुकना पड़ा और वे इस शादी के लिए राजी हो गए.

ईशा ने जब अपने अब्बा से इमरान से शादी करने की बात कही, तो वे यह सुनते ही आगबबूला हो गए और गुस्से में कहने लगे, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती एक गैरबिरादरी के लड़के से शादी करने की सोच रखते हुए. हम किसी भी कीमत पर उस लड़के से तेरी शादी नहीं करेंगे.

‘‘अभी तेरी उम्र ही क्या है, जो तेरे ऊपर इश्क का भूत सवार हो गया. यह सब हमारी आजादी का नतीजा है,’’ कहते हुए उन्होंने ईशा पर कड़ी नजर रखने की हिदायत दी.

ईशा रोतीबिलखती रही और अपनी मुहब्बत की भीख मांगती रही, पर उस के अम्मीअब्बा इमरान से उस की शादी के लिए राजी न हुए.

ईशा की उम्र 18 साल होने में अभी एक महीना बाकी था. वह अपनी मरजी से इमरान से शादी करने के लिए अभी मजबूर थी और उस एक महीने का इंतजार कर रही थी कि कब उस की उम्र 18 साल हो और वह इमरान के साथ रफूचक्कर हो जाए.

ईशा ने इमरान को अपने अम्मीअब्बा की सारी बातें अपनी एक सहेली के जरीए बता दीं, जो उस की खास
सहेली थी.

अब इमरान और ईशा की प्रेमकहानी प्रेमपत्र के जरीए चलने लगी, जिस को ईशा की एक सहेली अच्छी तरह से अंजाम दे रही थी.

दोनों तरफ एकदूसरे को पाने की आग लगी थी. उन का एकदूसरे से मिलनाजुलना मुश्किल हो रहा था. बस, प्रेमपत्र के जरीए ही वे अपने अपने प्यार का इजहार करते और अपने दिल की बात एकदूसरे से शेयर करते.

एक महीने तक वे दोनों अपनेअपने दिल पर पत्थर रख कर बिना एकदूसरे से मिले अपनी बात प्रेमपत्र के द्वारा ही बताते रहे.

फिर आखिरकार वह दिन भी आ गया, जब ईशा 18 साल की हो गई. वह आज बहुत खुश थी. उस के सपनों का राजकुमार अब उसे मिलने वाला था.

ईशा उस की बांहों में अपनेआप को सौंप कर उस से जीभर कर प्यार करने के लिए बेचैन थी, इसलिए आज उस के चेहरे पर अजीब सी खुशी दिखाई दे रही थी.

ईशा ने अपनी सहेली के जरीए प्रेमपत्र भेज दिया, जिस में उस ने लिखा था, ‘आज रात को 4 बजे जब सब गहरी नींद में सो रहे होंगे, तब तुम मुझे लेने आ जाना. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’

काली घनी रात थी. सब लोग गहरी नींद में सो रहे थे. ईशा के अम्मीअब्बा भी गहरी नींद मे सो चुके थे. ईशा का रास्ता साफ हो चुका था. रात के 4 बजने में अभी भी थोड़ा समय बाकी था.

ईशा बड़ी बेसब्री से सुबह के 4 बजने का इंतजार कर रही थी. पर आज उसे ऐसा लग रहा था कि घड़ी जहां की तहां रुकी हुई है और वक्त आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहा था.

ईशा कभी घर के अंदर तो कभी छत पर जा कर इमरान के आने का इंतजार कर रही थी, पर दूरदूर तक इमरान दिखाई नहीं दे रहा था.

ईशा बेचैन हो रही थी और सोच रही थी कि कब इमरान आएगा और उसे अपने साथ ले जाएगा, पर आज वक्त कुछ धीमा हो गया था. ईशा को आज की रात का 1-1 मिनट घंटों के बराबर लग रहा था.

काफी देर तक यों ही तड़पने के बाद आखिरकार 4 बजे ईशा छत पर गई और उसे दूर कहीं इमरान के आने की आहट सुनाई दी.

ईशा ने फौरन छत से उतर कर अपना सामान उठाया और हलके से घर का दरवाजा खोला, तो उसे बाहर इमरान दिखाई दिया. दोनों ने फौरन तेज कदमों के साथ वह जगह छोड़ दी और रफूचक्कर हो गए.

अगले दिन जब सुबह को ईशा घर में कहीं नजर नहीं आई और घर का दरवाजा भी खुला देखा, तो उस के अम्मीअब्बा समझ गए कि ईशा इमरान के साथ घर छोड़ कर रफूचक्कर हो गई है.

ईशा के अम्मीअब्बू को ईशा की इस हरकत पर बड़ा गुस्सा आया और ईशा को कोसने लगे कि ऐसी नालायक बेटी किसी को न दे, जिस ने जीतेजी उन की नाक कटवा दी और उन्हें बेइज्जत कर दिया.

इमरान और ईशा ने भाग कर शादी कर ली और अपनी जिंदगी जीने लगे. लोग कुछ दिन तक दोनों को बुराभला कहते रहे, फिर इस मामले को धीरेधीरे भूल गए.

अगर ईशा के अम्मीअब्बा पहले ही उस की बात मान लेते तो आज उन्हें यह दिन न देखना पड़ता और न यों रुसवा होना पड़ता. उन की बेटी भी उन के पास होती और इज्जत भी बनी रहती.

तकरीबन एक साल के बाद ईशा इमरान के साथ एक बेटा गोद में ले कर आई, जो उन दोनों का था. वे दोनों पहले इमरान के घर गए. इमरान के अम्मीअब्बू ने अपनी बहू को प्यार से अपने घर में रख लिया.

कुछ दिनों के बाद ईशा भी इमरान और अपने बेटे को ले कर अपने अम्मीअब्बा से मिलने गई, तो उन्होंने भी ईशा की हरकत को नजरअंदाज कर गले से लगा लिया और इमरान को भी अपना दामाद मान लिया.

फिर वे सब हंसीखुशी रहने लगे.

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