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Hindi Story : साजिश

Hindi Story. शिकार शेरनियां करती हैं शेर नहीं. बच्चों को पालने और परिवार को संभालने की जिम्मेदारी शेरनियों के कंधों पर होती है शेरों के नहीं. यह कुदरत का नियम है जिसे कोई ताकत नहीं बदल सकती. इस के लिए शेरनियां अपनी जान की परवाह भी नहीं करती हैं. तभी तो जंगल में उन से बढ़ कर कोई शिकारी नहीं होता.

इस में कोई शक नहीं कि इनसानों में भी शेरनियां पाई जाती हैं. भले ही शक्ल और सूरत में वे शेरनियों जैसी न हों, लेकिन हिम्मत और चपलता में वे शेरनियों को भी मात दे देती हैं. जटपुर की वीरवती भी किसी शेरनी से कम न थी.

‘‘मादर… चाहूं तो दरांती से तेरी गरदन अभी धड़ से अलग कर दूं,’’ वीरवती ने शौनाथ की छाती पर घूटना टेक कर और उस की गरदन पर तीखे दांतों वाली दरांती रखते हुए कहा.

शौनाथ को एकदम से बाजी पलटने की उम्मीद बिलकुल न थी. उस ने तो कितनी ही औरतों की इज्जत को इसी अंदाज में तारतार कर दिया था, लेकिन यहां तो कुछ ही पलों में बाजी पलट गई.

वह उस से अपने प्राणों और इज्जत की भीख मांगते हुए गिड़गिड़ाया, ‘‘वीरवती, मु?ो माफ कर दे. किसी को पता चल गया तो मैं समाज में कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचूंगा.’’

‘‘वाह, कुत्ते के पिल्ले, वाह. अपनी इज्जत तो बड़ी प्यारी है और जब दूसरों की इज्जत से खेलता है तो उस का कुछ नहीं. कमीने, समाज में बड़ा सफेदपोश का अवतार बना फिरता है, तेरी काली करतूतों का चिट्ठा खुलना ही चाहिए. तू हमें सम?ाता क्या है? कान खोल कर सुन ले, मैं बेवा हूं कोई धंधे वाली नहीं.’’

‘‘माफ कर दे, वीरवती, माफ कर दे. तू देवी है देवी.’’

‘‘सूअर की औलाद, तू ने मु?ो छूने की हिम्मत ही कैसे की? मन तो करता है, कठफोड़वे, तेरा खून पी जाऊं, जहांतहां चोंच मारता फिरता है. औरतों को अपनी रखैल सम?ाता है.’’

‘‘नहीं, नहीं, वीरवती. तु?ो पहचानने में मु?ा से भूल हो गई. आज पता चला हर औरत एक सी नहीं होती. तेरे पांव पड़ता हूं, मु?ो माफ कर दे. मेरी बीवी और औलाद को मेरी करतूतों का पता चल गया तो वे मु?ो घर में भी न घुसने देंगे.’’

‘‘तेरे जैसा घटिया आदमी परिवार तो क्या समाज में भी रहने लायक नहीं. तेरे जैसे नालायक को तो जीने का हक ही नहीं होना चाहिए जो अपनी औरत को दगा दे कर इधरउधर मुंह मारता फिरता है और दूसरी औरतों पर गंदी नजर रखता है.’’

‘‘वीरवती, अब मैं इन रास्तों की ओर कदम भी नहीं रखूंगा. मां कसम.’’

‘‘मां नहीं, बाप की कसम खा. तेरे जैसे नामर्द की जबान पर ‘मां’ शब्द शोभा नहीं देता.’’

शौनाथ अभी भी गिड़गिड़ा रहा था लेकिन ऐसा लगता था वीरवती उसे माफ करने के मूड में नहीं थी. वह शेरनी सी दहाड़ कर बोली, ‘‘मु?ो महानता का तमगा गले में लटका कर घूमने का शौक नहीं. सजा तो तेरी करनी की तु?ो मिल कर रहेगी और वह भी ऐसी जिसे तू जिंदगीभर याद रखेगा. किसी गैर औरत की ओर गंदी नजर उठाने से पहले हजार बार सोचेगा,’’ यह कहते हुए वीरवती ने उस का बायां कान ‘खच्च’ से दरांती से साफ कर दिया.

खून की एक तेज धार शौनाथ की कनपटी से बह निकली. उस के मुंह से दर्दनाक चीख निकली. उस ने बहते खून को रोकने के लिए कनपटी पर अपना हाथ रख लिया और दर्द से कराहता हुआ तेजी से वहां से चल पड़ा. उस के शरीर का बायां भाग खून से लथपथ हो चुका था.

‘‘जा याद रखना शैतान कि एक औरत की इज्जत पर हाथ डालने का क्या नतीजा हो सकता है…’’

जमीन पर पड़े कटे हुए कान पर वीरवती ने जोर से पैर मारा तो वह जमीन में धंस गया. फिर उस ने चारे की गठरी उठाई और गांव की ओर चल दी. कितने ही खयाल उस के मन में उमड़घुमड़ रहे थे.

वीरवती जब ब्याह कर गांव में आई थी तो सबकुछ ठीकठाक था. उस का आदमी राकेश शराब तो पीता था लेकिन इतनी ज्यादा भी नहीं. पता नहीं किस कारण से उस के आदमी को कैंसर हो गया और उस का पता तब चला जब वह तीसरी स्टेज में पहुंच कर लाइलाज हो गया और 2 साल पहले ही उस की मौत हो गई थी.

बेटा लवकेश गलत संगत में पड़ गया था और हत्या के केस में 20 साल की उम्र में ही जेल की हवा खाने चला गया था. अपनी बेटी बाला को पढ़ने के लिए उस ने गढ़वाल के श्रीनगर भेज दिया था. अब वह अपने घर में अकेली रहती थी. वह अपनी बेटी को पढ़ालिखा कर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती थी, इसलिए भैंस पाल कर दूध बेचने का काम करने लगी थी.

उ  स का आदमी 5 बीघा खेती की जमीन छोड़ गया था. कितनों ने ही उस की आर्थिक तंगी देख कर उस के सामने उस की खेती की जमीन खरीदने का प्रस्ताव रखा था लेकिन उस ने जमीन बेचने से साफ मना कर दिया था. उस जमीन में वह अनाज, गन्ना और भैंसों के लिए चारा उगाती थी. अपनी मेहनत के बलबूते उस ने अपनी आर्थिक तंगी पर जीत पा ली थी.

शौनाथ गांव का बड़ा जमींदार और रसूखदार आदमी था. वह हमेशा गांव की कमजोर और बेबस औरतों पर गंदी नजर रखता था और उन की कमजोरी का फायदा उठाता था. उस ने वीरवती को भी ऐसी ही कमजोर और लाचार औरत सम?ा लिया था.

उस दिन जब वह भैंसों के लिए अपने खेत में चारा काटने गई थी तो पीछे से चुपचाप आ कर शौनाथ ने उसे दबोच लिया था. बस यही उस से सब से बड़ी गलती हो गई थी. उसे पता नहीं था कि वीरवती बचपन में कुश्ती लड़ती थी और उसे कुश्ती के दांवपेंच अच्छे से आते थे.

वीरवती ने एक ही ?ाटके में उसे नीचे पटक दिया था और शेरनी सी उस की छाती पर घुटना टेक कर सवार हो गई थी.

शौनाथ को उस दिन ऐसा सबक मिल गया था कि उस दिन के बाद से उस ने किसी औरत की तरफ गलत नजर उठा कर देखने की हिमाकत न की थी. लोग अब उसे ‘कनकटा’ कहने लगे थे. कटे हुए कान को छिपाने के लिए वह हमेशा पगड़ी बांध कर रहने लगा था. उस का कान कैसे कटा, यह बात उस ने किसी को नहीं बताई थी.

वीरवती ने बिटिया बाला को पढ़ालिखा कर काबिल बना दिया था. वह एक इंटर कालेज में इकोनौमिक्स की लैक्चरर हो गई थी. वीरवती ने उस की शादी उसी की मरजी से उसी के कालेज में हिंदी के लैक्चरर सुमित से कर दी थी. उस की जिंदगी अब खुशियों से भरी थी. बस वीरवती को अब इंतजार था बेटे लवकेश का जेल से बाहर आने का.

एक दिन वीरवती को खबर मिली कि सरकार 15 अगस्त पर कुछ कैदियों को रिहा करने जा रही है.

उन कैदियों में लवकेश का नाम भी था. इस से बड़ी खुशी और क्या हो सकती थी.

लवकेश 10 साल बाद जेल से बाहर आया तो वीरवती उसे किराए की कार में बैठा कर घर लाई. इतने लंबे समय बाद उस का बेटा जेल से बाहर आया था इस खुशी में उस ने गांव में बड़े भारी भोज का आयोजन किया. उस में जटपुर गांव की भीड़ ही नहीं, बल्कि आसपास के गांव की भीड़ भी उमड़ पड़ी थी.

वीरवती ने लवकेश के लिए कई चीजें तैयार की थीं. उस में सुंदर डिजाइन का एक तकिया भी था। उस तकिए को लवकेश को देते हुए उस ने कहा, ‘‘ले बेटा, यह तेरा सिरहाना है. सिरहाना हमारा सम्मान होता है. तू 10 साल जेल में काट कर आया है. अब अपना सम्मान और यश बढ़ाना. दुष्ट लोगों से बच कर रहना.’’

‘‘मां, तू कैसी बातें करती है? एक अपराधी का और वह भी हत्या के आरोपी का कोई सम्मान होता है भला. मैं 10 साल जेल में अपराधियों के बीच में रह कर आया हूं. मैं भले ही जेल से बाहर आ गया हूं लेकिन मेरा दिमाग अभी भी अपराधियों की तरह ही सोचता है. मेरे मन से ये बातें अभी तो नहीं निकलतीं. अभी किसी अच्छे काम को करने को मन नहीं होता. जेल की जिंदगी का आदी हो गया हूं. किसी काम को करने का मन नहीं करता.’’ ‘‘न बेटा, ऐसा मत सोच. सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘मां, यह बात कैसे मान लूं? भोज में कितने लोग आए, सब गड़पगड़प भोजन तो खा गए, लेकिन किसी ने सीधे मुंह मु?ा से बात भी नहीं की. सब के सब आज भी मु?ो हत्यारा और अपराधी ही सम?ाते हैं. शौनाथ चाचा को छोड़ कर कोई मेरी छुआई लेने को तैयार भी नहीं.’’

शौनाथ का नाम सुनते ही वीरवती का खून खौल उठा. लेकिन उस ने खुद को शांत ही रखा. उस ने सोचा कि लवकेश को अगर शौनाथ की काली करतूत बता दी तो कहीं वह उस का काम तमाम ही न कर दे. एक हत्या की सजा तो वह काट कर आ ही रहा है, कहीं दूसरी हत्या वह अपने सिर न ले ले. वह उस के दोबारा जेल जाने के सोचने मात्र से सिहर उठी. उस ने बस इतना कहा, ‘‘बेटा, शौनाथ से दूर ही रहना. वह मु?ो अच्छा आदमी नहीं लगता.’’

‘‘मां, पूरे गांव में लेदे कर एक ही तो आदमी है जो इतने प्यार से मु?ो अपने पास बैठाता है. उसी से मु?ो तुम चेता रही हो, सावधान कर रही हो.’’

यह सुन कर वीरवती के मन में शौनाथ को ले कर कुछ शंका सी हुई, लेकिन अपनी शंका को अपने मन में रखते हुए उस ने कहा, ‘‘ठीक है बेटा. जैसा तेरा मन. रात घनी हो गई है, अब तू सो जा.’’

इस बात को हुए 4 दिन भी नहीं गुजरे थे कि लवकेश ने अपनी मां को दूध में नींद की गोलियां मिला कर गहरी नींद सुला दिया और फिर उसी तकिए से अपनी मां का दम घोंट दिया जिस तकिए को वीरवती ने उस के लिए बड़े जतन से तैयार किया था. अफवाह फैला दी गई थी कि वीरवती की रात में हार्ट अटैक से मौत हो गई.

जब वीरवती की अर्थी को लोग कंधा दे कर ले जा रहे थे तब शौनाथ मन ही मन खुश हो कर सोच रहा था, ‘वीरवती, बेइज्जती का बदला पूरा हुआ. तेरे अपराधी सोच के बेटे ने इस लालच में तु?ो यमलोक पहुंचा दिया कि तेरे मरने के बाद पूरी जायदाद पर उस का हक होगा. उस बेवकूफ को भी मैं कहीं का नहीं छोड़ने वाला. मेरी पहली योजना कामयाब रही तो दूसरी भी जरूर होगी.’

शौनाथ वीरवती की अर्थी के पीछे पीछे गंगा के घाट तक गया. जब उस की चिता जल रही थी तब वह गंगा की ढांग पर खड़ा गंगा की लहरों की तरफ मुंह किए कुटिल मुसकान से मुसकरा रहा था कि उस की साजिश पूरी तरह से कामयाब रही. उस की बेइज्जती का बदला आज पूरा हुआ. इस का ब्याज लवकेश को वह बरबाद कर के वसूलेगा.

तभी गंगा की एक तेज लहर उस ढांग से टकराई. ढांग नीचे गिरी और इसी के साथ शौनाथ भी मुंह के बल गिरा. कई दिन बाद उस की सड़ीगली लाश गोताखोरों को कई किलोमीटर दूर जा कर मिली. Hindi Story

Hindi Suspense Story : एक खौफनाक पार्सल

Hindi Suspense Story. थिंपू को घेरे हुए ‘दुंगशिंग गांग’ की ऊबड़खाबड़ चोटियों पर जिद्दी कोहरे ने रेंगना शुरू कर दिया था. सूरज ढलते ही पहाड़ों की लंबी और डरावनी परछाइयां ताशी पेनजोर के ‘शोंगखांग’ (जनरल स्टोर) पर पसरने लगीं.

ताशी का यह स्टोर जिले की बड़ी और रसूखदार जगहों में गिना जाता था. शाम ठंडी थी. ऐसी शाम जो आमतौर पर सकून लाती है, मगर आज हवा में एक अजीब सी भारी चुप्पी थी.

ताशी अपनी भारी लकड़ी की कुरसी पर बैठा था, जो दुकान के ठीक सामने मशहूर ‘मेटोग’ फूलों की दुकान के सामने रणनीतिक रूप से रखी गई थी. उस ने दिन का अखबार खोला. शांत दुकान में पन्नों की सरसराहट कुछ ज्यादा ही तेज सुनाई दे रही थी.

तभी उस की नजर एक ऐसी सुर्खी पर पड़ी जिस ने शरीर में ठंडी लहर दौड़ा दी, ‘अपर मोतीथांग में अवैध जुए के अड्डे पर पुलिस का छापा’.

खबर में विस्तार से लिखा था कि कैसे ‘रौयल भूटान पुलिस’ ने एक दोपहर दबिश दे कर 8,50,000 न्युल्ट्रम जब्त किए और 5 संदिग्धों को हिरासत में लिया.

तभी फोन की तीखी बीप ने ताशी की एकाग्रता भंग कर दी. यह उस के दोस्त थिनले का संदेश था. वही थिनले, जो एक नामी लौटरी एजेंट था और जिसे सब की टोह लेने और गपशप करने की खतरनाक आदत थी.

‘ओ ताशी, वह जुआ वाला अड्डा पर पुलिस रेड मार दिया रे’ मोबाइल की स्क्रीन चमकी.

ताशी ने अपना बायां हाथ धीरे से फैलाया और पत्थर जैसे भावहीन चेहरे के साथ टाइप किया, ‘तो मैं क्या करूं?’

ताशी ने फिर अपना ध्यान ‘कुनसेल’ अखबार की खबर पर लगाया. रिपोर्ट अब और भी सटीक हो रही थी, ‘संदिग्धों में एक महिला वांगमो (40 साल) और 30 की उम्र के 5 मर्द शामिल हैं, जिन में से 4 आदतन अपराधी हैं.’

फिर बीप हुई. थिनले की जिद दांत के दर्द की तरह चुभने वाली थी, ‘वांगमो अभी पुलिस कस्टडी में है.’

ताशी के माथे पर बल पड़ गए. सीने में हलकी सी जकड़न महसूस हुई, पर चेहरा शांत रहा. उस ने चिढ़ कर जवाब भेजा, ‘इस से मेरा क्या लेनादेना? नो प्रौब्लम, खे मी.’

थिनले का जवाब बिजली की तरह आया, जैसे वह परदे के पीछे इंतजार ही कर रहा हो, ‘पिछला हफ्ता तुम तो उधर गया था न?’

ताशी ठिठक गया. दुकान के भीतर की परछाइयां और गहरी लगने लगीं. उसने टाइप किया, ‘हां, गया था, तो क्या हुआ? साला फालतू आदमी, तुम भी तो वही किया था. तुम्हारा प्रौब्लम क्या है? छोई गी कान्येल गाची मो (तुझे  क्या तकलीफ है?)?’

‘तुम्हारा वांगमो के साथ झगड़ा नहीं हुआ था क्या?’ थिनले का अगला संदेश बिना किसी दोस्ताना लहजे के आया.

ताशी को बेचैनी महसूस होने लगी. उसे वह धुंधला कमरा, सस्ते तंबाकू और ‘के5’ व्हिस्की की गंध याद आई. उसे अपनी ही आवाज की वह चुभती हुई कड़वाहट याद आई जो उस रात निकली थी. अब सब्र का बांध टूटा तो उस ने थिनले को फोन ही लगा दिया, ‘‘अरे भाई, यह सब बोल कर क्या फायदा?’’ ताशी ने पूर्वोत्तर के लहजे में कहा, ‘‘अपुन तो खाली अपना फेवरेट ड्रिंक मांगा था. तुम को तो मालूम है न वह वांगमो कैसा औरत है, कैसा टेढ़ा बात करती है.’’

‘‘हां, मेरे को सब याद है,’’ थिनले ने दूसरी तरफ से कहा, ‘‘मेरे को वह सीन भी याद है जब तुम रिनचेन दोरजी को बोला था कि वह कार्ड्स में बेईमानी कर रहा है. तुम्हारा आवाज इतना जोर था कि बाकी लोग भी गरम हो गया था.’’

‘‘अरे, वह तो कुछ सीरियस नहीं था रे,’’ ताशी ने जवाब दिया, हालांकि उस के पैर ठंडे पड़ रहे थे, ‘‘अपुन लोग तो हमेशा ऐसा करता है न? गेम में ऐसा थोड़ाबहुत चिल्लाना तो चलता है.’’

थिनले का अगला जवाब किसी मौत के फरमान जैसा था, ‘‘लेकिन वांगमो ऐसा नहीं सोचती. तुम को याद है वह क्या बोला था? वह तुम्हारा आंख में आंख डाल कर फुसफुसाया था, ‘मैं तुम सब को देख लूंगी. मेरा लिंक बड़ेबड़े गुंडों के साथ है.’ उस टाइम वह मजाक नहीं कर रही थी ताशी.’’

ताशी का जबड़ा भिंच गया. उस ने कोई जवाब नहीं दिया. उस ने जबरदस्ती अपनी नजरें अखबार पर टिका दीं, पर शब्द पन्ने पर नाच रहे थे. उस की आंखें 2011 के दंड संहिता (संशोधन) अधिनियम पर टिक गईं. जुआ खेलना एक मामूली अपराध था… एक महीने से एक साल तक की जेल. लेकिन दोबारा अपराध करने वालों के लिए यह सजा 3 साल या उस से भी ज्यादा हो सकती थी.

थिंपू की सर्द हवाएं जब ताशी पेनजोर की दुकान के शटरों को ?ाक?ार रही थीं, तब उस के मन में बस एक ही डर कौंध रहा था. क्या वांगमो के वे ‘लिंक्स’ वरदीधारी पुलिस वालों के कान में उस का नाम फुसफुसा चुके होंगे? उस के हाथ में थमा अखबार अचानक किसी भारी पत्थर जैसा लगने लगा.

अगली सुबह घाटी को एक गाढ़े, चिपचिपे कोहरे ने अपने आगोश में ले लिया था, लेकिन यह कोहरा उन अफवाहों की आग को नहीं बुझा सका जिस ने पूरे शहर को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया था. एक नई सुर्खी उभरी थी, जिस ने पिछले दिन के छापे की खबर को भी फीका कर दिया, हिरासत में ली गई वांगमो का सौतेला भाई, रिनचेन दोरजी, शहर के बाहरी इलाके में एक सुनसान और जंग लगे गोदाम के पीछे मरा पाया गया था.

दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाला था. शरीर को इतनी बेरहमी से काटा गया  था कि पहचानना नामुमकिन था. और सब से सिहरन पैदा करने वाली बात यह थी कि लाश का सिर पूरी तरह से गायब था.

ताशी पेनजोर अपने ‘शोंगखांग’ की मंद रोशनी में बैठा था और माथे पर ठंडी पट्टी दबाए हुए था. भोर से ही उस की कनपटी में एक न सहन होने वाली टीस मारता सिरदर्द जड़ जमा चुका था, जो दीवार घड़ी की टिकटिक के साथ ताल मिला रहा था. कांच के काउंटर पर रखे उस के फोन में कंपन हुआ. थिनले का संदेश था.

फोन उठाते ही थिनले की आवाज गूंजी, जिस में उस की पुरानी मजाक वाली रंगत गायब थी, ‘‘ओ ताशी, सुना क्या?’’ थिनले हांफते हुए बोला, ‘‘अरे बाबा, वह रिनचेन दोरजी. उस का बौडी मिला पुराना डिपो के पास, पूरा काट डाला है रे. और मारने वाला उस का मुंडी भी साथ ले गया, जैसे कोई ट्रौफी हो.’’

ताशी ने आंखें मूंद लीं, उस की आवाज फटी हुई सी निकली, ‘‘देख थिनले, आज अपुन का यह भूतप्रेत का कहानी सुनने का हिम्मत नहीं है. सिर ऐसा फट रहा है जैसे कोई कुल्हाड़ी मार रहा हो.’’

‘‘गा ची मो (क्या बोला?)?’’ थिनले फुसफुसाया, ‘‘भूत का कहानी नहीं है रे. पुलिस लोग पूरा सड़क पर उतरा है. वे लोग उस को ढूंढ़ रहा है जिस का भी वह फैमिली के साथ लफड़ा हुआ था. और पिछला हफ्ता तुम कैसे चिल्लाया था कार्ड्स को ले कर, सब लोग देखा है तुम को.’’

‘‘अरे, कार्ड्स खेलते वक्त तो सब चिल्लाता है न…’’ ताशी भड़क उठा, हालांकि उस की गरदन पर ठंडे पसीने की एक बूंद लुढ़क गई, ‘‘मेरे को अकेला छोड़ दे. बहुत हो गया तेरा. गोंग बोम मे (माफ कर दे भाई).’’

दोपहर के खाने के वक्त जब दुकान की टिमटिमाती रोशनी बरदाश्त से बाहर हो गई, तो ताशी अपने सहायक वांगदी के भरोसे दुकान छोड़ कर पास ही अपने घर चला गया. उसे लगा जैसे सड़कें पहले से संकरी हो गई हैं और राहगीरों की नजरें उस पर भारी पड़ रही हैं.

ताशी के जाने के कुछ ही देर बाद, एक डिलीवरी वाला, जिस का चेहरा टोपी के नीचे छिपा था, दुकान में दाखिल हुआ. उस ने तेल के धब्बों वाले भूरे कागज में लिपटा एक भारी, चौकोर पार्सल मुख्य काउंटर पर रख दिया, ‘‘तुम्हारा मालिक, पेनजोर ला के वास्ते है,’’ उस आदमी ने बुदबुदाते हुए कहा.

वांगदी एक ग्राहक में बिजी था, उस ने बस सिर हिला दिया, ‘‘उधर टेबल पर रख दे भाई. मालिक आएगा तो देख लेगा.’’

वह पार्सल चावल की बोरियों और कैरोसिन के डब्बों के बीच एक खामोश मेहमान की तरह रखा रहा. उस में से कुछ भी रिस नहीं रहा था, फिर भी उस से एक ऐसी ठंडक फूट रही थी जिस ने आसपास की हवा को बोझिल कर दिया था.

तीसरे पहर तक भारी जूतों की आहट लकड़ी के फर्श पर गूंजी. रौयल भूटान पुलिस के 2 अफसर पहुंचे, उन के चेहरों पर कत्ल की तफतीश की गंभीरता साफ झलक रही थी. उन्होंने वांगमो और उस के भाई से जुड़े हर शख्स से पूछताछ शुरू कर दी थी.

‘‘ताशी पेनजोर ला,’’ बड़े अफसर ने ताशी की आंखों में देखते हुए कहा, जो अभीअभी वापस लौटा था.

‘‘मालूम पड़ा है कि मोतीथांग वाले अड्डे पर तुम्हारा कुछ… अनबन हुआ था? मरने वाले के साथ तुम्हारा कोई बहसबाजी हुआ था क्या?’’

ताशी काउंटर का सहारा ले कर खड़ा हो गया, चेहरा पीला था पर आवाज स्थिर, ‘‘साहब, खेल में तो थोड़ाबहुत खटपट होता ही है न. गुस्से में आदमी क्याकुछ नहीं बोल देता. अभी तुम क्या एक इज्जतदार दुकानदार को यह खूनी खेल के लिए शक करेगा?’’

पुलिस वाले एक घंटे तक गिद्धों की तरह सवाल घुमाते रहे, मगर ताशी के जवाब किसी तराशे हुए पत्थर की तरह चिकने और अभेद्य थे. उन्हें उस की बातों में कोई दरार नहीं मिली. जब वे जाने के लिए मुड़े, तो बड़े अफसर की नजर साइड टेबल पर रखे उस भूरे कागज वाले पार्सल पर पड़ी, ‘‘नया माल आया क्या?’’ उस ने सहज भाव से पूछा.

‘‘हां, साहब,’’ ताशी ने जवाब दिया, उस का दिल अचानक किसी कैद परिंदे की तरह पसलियों से टकराने लगा था.

दरवाजा बंद हुआ और ताशी उस पार्सल के साथ अकेला रह गया. सिरदर्द फिर से तेजी से उभरा था और दुकान में अब ऐसी खामोश पसरी थी जो किसी भारी बोझ  जैसी महसूस हो रही थी.

सूरज पहाड़ों की काली लकीरों के पीछे डूब चुका था, जिस से ‘शोंगखांग’ के भीतर एक अजीब सी खौफनाक उदासी पसर गई थी. ताशी पेनजोर उस पार्सल के ऊपर झुका हुआ था, उस की आंखों में गहरी चिड़चिड़ाहट और शक के बादल थे. दुकान की टिमटिमाती ट्यूबलाइट के नीचे वह तेल के धब्बों वाला भूरा कागज जैसे धड़कता हुआ महसूस हो रहा था.

‘‘यह कौन ले कर आया रे,’’ ताशी की आवाज धीमी पर तीखी थी, जिस ने दुकान के सन्नाटे को चीर दिया.

वांगदी ने बहीखाते से सिर उठाया, उस का चेहरा पीला पड़ चुका था, ‘‘वह एक डिलीवरी वाला आया था पेनजोर ला. उस ने अपना नाम ‘सिंग्ये पासांग’ बताया था शायद.’’

वह नाम ठंडी धुंध की तरह हवा में तैरने लगा. ताशी की उंगलियां कांप रही थीं जब उस ने थिनले को मैसेज करने के लिए फोन निकाला.

‘सिंग्ये पासांग कौन है?’

जवाब तुरंत आया, ‘अपुन को नहीं मालूम.’

ताशी की नब्ज तेज हो गई, उस ने वापस टाइप किया, ‘वांगमो का कोई गुंडा लोग है क्या यह नाम का? मेरे को पक्का यकीन है, एकदम पक्का कि इस पार्सल के अंदर क्या है.’

रिनचेन दोरजी के बिना सिर वाले धड़ की याद उस की आंखों के सामने बिजली की तरह कौंधी. उसे उस भारी पैकिंग के भीतर से खून की लोहे जैसी गंध महसूस होने लगी. कनपटी की टीस अब एक ठंडे और गहरे खौफ में बदल चुकी थी. उस ने तुरंत थिनले और अपने साझ दोस्त न्गावांग को एक गंभीर चर्चा के लिए अपने घर बुलाया.

जब वे पहुंचे, तो ताशी अपनी बैठक के अंधेरे कोने में बैठा था. वह पार्सल उन के बीच एक छोटे मेज पर किसी जिंदा बम की तरह रखा था.

‘‘अरे खोल कर देख न ताशी,’’ न्गावांग फुसफुसाया, हालांकि उस ने खुद उसे छूने की हिम्मत नहीं की.

‘‘हो सकता है कोई तुम से मजाक कर रहा हो.’’

‘‘नहीं,’’ ताशी की आवाज किसी अनजाने डर से भारी हो गई थी. एक ही दोपहर में उस का चेहरा दस साल बूढ़ा लगने लगा था. लकीरें खिंची हुईं और आंखें दहशत से फटी हुई थीं.

‘‘अगर अपुन ने इस को खोला, तो मैं इस डरावने सपने का गवाह बन जाएगा. और अगर पुलिस ने मेरे को इस के साथ पकड़ लिया… जो मेरे को लगता है इस के अंदर है… तो फिर कोई सुनवाई नहीं होगा, सीधा ‘फोर्थ डिगरी’ का सजा मिलेगा.’’

आखिरकार, वे एक खौफनाक सहमति पर पहुंचे. वे इस के अंदर नहीं देखेंगे. वे इस पार्सल को हमेशा के लिए कहीं दफन कर देंगे.

आधी रात के काले साए में, तीनों आदमी गाड़ी ले कर नदी की ओर चल दिए. कार की हैडलाइट्स पहाड़ के घुमावदार कोहरे को चीर रही थीं. वे किसी साजिश करने वाले की तरह हिल रहे थे, कड़ाके की ठंड में उन की सांसें धुएं की तरह निकल रही थीं. पुल पर पहुंच कर उन्होंने एक मोटे औद्योगिक रस्से से पार्सल को एक भारी पत्थर के साथ बांध दिया.

सब ने मिल कर जोर लगाया और उसे शून्य में उछाल दिया. एक दबी हुई आवाज के साथ वह पार्सल नदी के गहरे और उफनते पानी में समा गया.

Hindi Suspense Story

घर लौट कर ताशी पेनजोर अपनी कुरसी पर ढह गया और एक लंबी, कंपकंपाती हुई राहत की सांस ली. वह बोझ, जो 2 दिनों से उस के सीने को कुचल रहा था, आखिरकार नदी की गहराई में समा गया था.

अगली दोपहर थिंपू की हवा कुछ हलकी महसूस हो रही थी, मानो नदी ने न केवल उस पार्सल को, बल्कि पिछले दिनों के उस डरावने माहौल को भी निगल लिया हो.

ताशी पेनजोर के चेहरे की रौनक लौटने लगी थी. उस ने अपनी इलैक्ट्रौनिक की दुकान चलाने वाले पुराने दोस्त दावा वांगचुक से मिलने का मन बनाया.

दावा वांगचुक की दुकान मशीनों की गुनगुनाहट और अमीर ग्राहकों की खास महक से भरी एक सुरक्षित पनाहगाह जैसी थी. ताशी और दावा के बीच करीब एक घंटे तक दिल खोल कर बातें हुईं, आयात की बढ़ती कीमतों से ले कर पहाड़ों के दर्रों पर पिघलती बर्फ और वसंत की खूबसूरती तक. यह वैसी ही बातचीत थी जो किसी भी इनसान को उस की साधारण और सुकून भरी दुनिया से वापस जोड़ देती है.

ज ब ताशी जाने के लिए खड़ा हुआ और एक नए जोश के साथ अपना पारंपरिक ‘घो’ ठीक करने लगा, तभी दावा कांच के काउंटर पर थोड़ा झांकते हुए बोला, ‘‘अरे, रुकोरुको पेनजोर ला,’’ दावा को अचानक कुछ याद आया, ‘‘मैं पूछने ही वाला था, तुम को वह नया वाला ‘सैमसंग’ म्यूजिक सिस्टम मिल गया न? कुछ हफ्ता पहले तुम कितना पीछे पड़ा था उस के लिए.’’

ताशी जैसे वहीं जम गया. पिछले चौबीस घंटों में उस ने शांति का जो महल बड़ी मुश्किल से खड़ा किया था, वह.एक झटके में कांच के आईने की तरह चकनाचूर हो गया. कनपटी की वह पुरानी टीस पहले से कहीं ज़्यादा तेजी से वापस लौटी.

‘‘वह… म्यूजिक सिस्टम?’’ ताशी की आवाज किसी मुरदे जैसी निकली, ‘‘तुम्हारा मतलब है… कोई पार्सल?’’

‘‘हां भाई, वही. अब तुम अपना मनपसंद गाना ब्लूटूथ लगा कर बजा सकता है, जैसा तुम को मांगता था. तुम भूल कैसे गया रे? तुम ही तो बोला था कि तुम्हारा ब्रांड न्यू सैमसंग सिस्टम सैट करने को,’’ दावा एक मददगार मुसकान के साथ बोला. वह इस बात से पूरी तरह अनजान था कि उस के दोस्त के चेहरे पर दहशत की कितनी गहरी परछाईं उतर आई है.

दावा कहता रहा, ‘‘माल कल सुबह ही पहुंचा. मेरा एक नया कामगार लड़का है, गांव से आया है, उसी को बोला था लंच टाइम पर तुम्हारा दुकान पर दे आने को. मैं ने उस को बोला था कि यह स्पैशल और्डर है.’’

ताशी पेनजोर पत्थर का बुत बना खड़ा रहा. उस की आंखों के सामने उस काली गहरी नदी, भारी पत्थर और एलईडी फिटेड साइनबोर्ड्स के मंजर घूमने लगे. उसे तेल के धब्बों वाला वह भूरा कागज याद आया और उस का वो अटूट विश्वास… कि वह रिनचेन दोरजी का कटा हुआ सिर ठिकाने लगा रहा है.

‘‘अच्छा वह लड़का…’’ ताशी फुसफुसाया, उस की आंखें फटी की फटी रह गईं, ‘‘लड़के का नाम क्या है?’’

‘‘अरे, वह तो सीधासादा बच्चा है…’’ दावा ने अपनी ठुड्डी खुजलाते हुए कहा, ‘‘नाम जान कर क्या करेगा? पर तुम इतना पीला क्यों दिख रहा है भाई?’’

ताशी पेनजोर ने कोई जवाब नहीं दिया. वह दरवाजे की ओर मुड़ा, उस के होंठ धीरेधीरे हिल रहे थे, ‘‘वह वांगदी… बेवकूफ. ओह वांगदी. दुकान के शोरशराबे में उस लड़के ने ‘सैमसंग’ बोला होगा और इस गधे ने ‘सिंग्ये पासांग’ सुन लिया.’’

ताशी ने खाली सड़क की ओर देखा, जहां दूर कहीं नदी के बहने का शोर सुनाई दे रहा था. थिंपू घाटी की गहराइयों में कहीं एक ब्रांड न्यू म्यूजिक सिस्टम हमेशाहमेशा के लिए दफन हो चुका था.  Hindi Suspense Story

–गौतम भट्टाचार्य

Hindi Story : उलटा दांव

Hindi Story. डाक्टर अशोक का अपना नर्सिंगहोम था. वे शहर के दिल की बीमारी के जानेमाने डाक्टर थे. वे 32 साल के हो गए थे, पर अभी तक उन्होंने शादी नहीं की थी और न ही वे इस बंधन में बंधना चाहते थे. वे काफी रंगीनमिजाज थे. उन के कई औरतों से नाजायज संबंध थे.

डाक्टर अशोक अपने नर्सिंगहोम में भी खूबसूरत जवान नर्सें रखते थे और किसी न किसी बहाने उन्हें अपने जाल में फांस कर उन से नाजायज संबंध बना लेते थे. जो भी लड़की उन के जाल में फंस जाती, तो उसे तभी उन के चंगुल से छुटकारा मिलता, जब खुद डाक्टर का मन उस से भर जाता था.

लतिका नई नर्स थी. उसे नर्सिंगहोम में आए हुए 4-5 दिन ही बीते थे कि डाक्टर अशोक ने उसे अपनी लच्छेदार बातों में फंसाना शुरू कर दिया.

दरअसल, लतिका ने इस से पहले किसी भी नर्सिंगहोम में काम नहीं किया था और न ही वह अपने काम के बारे में कुछ जानती थी. उसे तो डाक्टर साहब ने उस की गदराई जवानी और खूबसूरती के चलते अपने यहां अच्छी तनख्वाह पर रख लिया था. वह बहुत दिनों से टेस्ट बदलने की फिराक में थे. पुरानी नर्सें अब उन के लिए बासी हो गई थीं.

लतिका जब नर्स की सफेद स्कर्ट और शर्ट पहन कर आती, तो गजब की सैक्सी लगती थी.

एक हफ्ते बाद डाक्टर अशोक ने लतिका की नाइट ड्यूटी लगा दी. वह रात में उसे अपने चैंबर में बुला कर मीठीमीठी बातें करते थे. ऐसी बातें सुन कर लतिका शरमा जाती और केवल हां या नहीं में जवाब देती. डाक्टर अशोक उस की हिचक दूर करना चाहते थे. वे हर लड़की के साथ ऐसा ही करते थे.

एक दिन लतिका को ड्यूटीरूम में बैठेबैठे नींद आ रही थी. अचानक डाक्टर अशोक वहां आ पहुंचे. उसे ऊंघता देख कर उन्होंने कहा, ‘‘हैलो लतिका.’’

‘‘यस डाक्टर,’’ लतिका एकदम से आंखें मलती हुई हड़बड़ा कर उठ बैठी. उसे अपने ऊंघने पर शर्म आ रही थी कि डाक्टर अशोक क्या सोच रहे होंगे? पर वह कर भी क्या सकती थी? नींद पर किस का बस है? वैसे भी इस समय रात के 12 बज रहे थे.

लतिका को हैरानी हो रही थी कि इस समय डाक्टर साहब क्यों राउंड पर आए हैं? सब मरीजों की दवाएं तो वह पहले ही समय पर खिला चुकी थी. कोई गंभीर मरीज भी इस समय नर्सिंगहोम में भरती नहीं था.

‘‘लगता है, तुम्हें नींद आ रही है?’’ डाक्टर अशोक ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘सौरी सर,’’ लतिका ने किसी तरह कहा.

‘‘कोई बात नहीं… हो जाता है. रात की ड्यूटी करना बहुत मुश्किल काम है. आप ऐसा क्यों नहीं करतीं कि नींद और बोरियत से बचने के लिए कोई रोमांटिक मैगजीन या उपन्यास पढ़ा करें?’’

‘‘जी सर, पर रोमांटिक ही क्यों? जासूसी क्यों नहीं?’’ लतिका ने पूछा.

‘‘यह उम्र रोमांस करने की है. रोमांटिक उपन्यास पढ़ने से मन भी रोमांटिक होने लगता है. किसी को प्यार करने को जी चाहने लगता है,’’ डाक्टर अशोक ने कहा.

लतिका शरमाई सी खड़ी रह गई. वह कुछ कह न सकी.

‘‘क्या आप का कोई बौयफ्रैंड है?’’ डाक्टर अशोक ने अचानक पूछा.

‘‘नहीं सर, कोई नहीं है,’’ लतिका अचकचा कर बोली.

‘‘यह कैसे हो सकता है कि आप जैसी खूबसूरत और स्मार्ट लड़की का कोई बौयफ्रैंड न हो?’’

‘‘सच मानिए सर, कोई नहीं है,’’ अब लतिका भी मुसकराई.

‘‘तो कोई बात नहीं. अगर आप बुरा न मानें, तो मैं आप का बौयफ्रैंड बन जाऊं?’’ डाक्टर अशोक ने जाल फेंका.

‘‘आप भी सर, कैसी बातें कर रहे हैं?’’ लतिका ने शरमा कर कहा.

‘‘क्यों, क्या मैं आप को पसंद नहीं? आप खूबसूरत हैं, तो मैं भी हैंडसम हूं,’’ डाक्टर अशोक ने हंसते हुए कहा.

‘‘जी हां सर, इस में क्या शक है?’’ लतिका झेंपते हुए बोली. इस से पहले किसी ने भी उस से ऐसी रोमांटिक बातें नहीं की थीं. उस के दिल में एक अजीब सी गुदगुदी होने लगी. डाक्टर अशोक उसे बेहद जिंदादिल आदमी लगे.

‘‘कम औन माई डियर लतिका, हम लोग अपने इस नए संबंध को ऐंजौय करते हैं,’’ डाक्टर अशोक ने उस की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कुछ रोमांटिक अंदाज में कहा.

‘‘मतलब?’’ पूछते हुए लतिका खुद में ही सिकुड़ गई.

‘‘अरे भई, अब तुम हमारी गर्लफ्रैंड हो. गर्लफ्रैंड को कौफी पिलाना चाहिए या नहीं?’’ डाक्टर अशोक का रोमांटिक मूड बरकरार था.

लतिका मुसकराई. वह सोच रही थी कि कितनी आसानी से डाक्टर ने उसे अपनी गर्लफ्रैंड बना लिया है. अब इस खुशी में कौफी पिलाना चाहते हैं. उसे क्या करना चाहिए? वैसे, इस समय कौफी पीने में हर्ज क्या है? वह कौफी पीने के लिए तैयार हो गई. इस के सिवा और कोई चारा भी नहीं था.

डाक्टर अशोक उसे अपने केबिन में ले गए. वहां कौफी बनाने का सारा इंतजाम था. उन्होंने केबिन में पहुंच कर वहां लगा टैलीविजन चालू कर दिया और लतिका को कुरसी पर बैठा कर खुद कौफी बनाने लगे.

‘‘लाइए सर, मैं कौफी बनाती हूं,’’ लतिका ने कहा.

‘‘नो माई डार्लिंग, आज तो तुम मेरे हाथ की बनी कौफी पी कर देखो,’’ डाक्टर अशोक ने बड़ी अदा से उसे टाल दिया.

लतिका उन की इस अदा पर मुसकराई और सोफे पर बैठी टैलीविजन पर फिल्म देखने लगी.

कुछ ही देर में डाक्टर अशोक ने इलैक्ट्रिक केतली में 2 कप कौफी तैयार कर ली.

‘‘यह लो डार्लिंग, बताओ कौफी कैसी बनी है?’’ एक कप कौफी और तले हुए काजू लतिका की तरफ बढ़ाते हुए डाक्टर अशोक ने पूछा.

लतिका को समझ  नहीं आ रहा था कि आज डाक्टर अशोक उस पर इतने मेहरबान क्यों हैं?

कौफी अच्छी बनी थी. लतिका ने कौफी पीते हुए डाक्टर अशोक की तारीफ की, तो वे मुसकराए. दोनों फिल्म देखते हुए कौफी पीने लगे. फिल्म बहुत रोमांटिक थी. हीरोहीरोइन के प्यार के संबंध दिखाए जा रहे थे. दोनों के दिलों में कुछकुछ होने लगा.

उस कौफी में ऐसा न जाने क्या मिला था कि लतिका अपने होशोहवास खोने लगी. शायद डाक्टर अशोक ने उस में कोई नशीली दवा मिला दी थी.

लतिका को नींद सी आने लगी. उसी समय डाक्टर अशोक ने उसे लपक कर अपनी बांहों में भर लिया. वह उन की बांहों में कसमसाने लगी, पर जल्दी ही अपने होश खो बैठी.

लतिका को जब होश आया, उस समय सुबह के 5 बज रहे थे. वह हड़बड़ा कर उठी. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे. अपनी ऐसी हालत देख कर वह हैरान रह गई.

डाक्टर अशोक ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा था. उस की इज्जत तारतार कर के रख दी थी. अपनी ऐसी हालत देख कर उस की आंखों से आंसू निकल आए.

लतिका किसी तरह उठी. अपने कपड़े ठीक किए और केबिन से बाहर निकल कर मरीजों को सुबह की दवाएं देने लगी. उस ने मन ही मन फैसला कर लिया कि वह डाक्टर अशोक को उस की इस हरकत के लिए सबक सिखा कर ही रहेगी. वह ऐसी लड़की नहीं थी कि हालात से समझौता कर के घुटघुट कर जीने के लिए मजबूर हो जाए.

लतिका ने बहुत सोचसमझ  कर एक योजना बनाई और उस में एक और नर्स मुक्ता को भी शामिल कर लिया.

लतिका ने पता लगा लिया था कि इस नर्सिंगहोम में काम करने वाली मुक्ता भी डाक्टर अशोक के हाथों छली गई थी और उस से बदला लेने के लिए बेताब थी.

दूसरी ओर डाक्टर अशोक अपनी कामयाबी पर बहुत खुश थे. जब कई दिनों तक लतिका ने इस बारे में कोई शिकायत नहीं की, तो उन्होंने समझा  लिया कि वह चालू लड़की है और इस तरह के संबंधों से उसे कोई एतराज नहीं है.

एक दिन रात को राउंड लेते समय लतिका ने बड़ी अदा से मुसकराते हुए डाक्टर अशोक से कहा, ‘‘कौफी पिलाए तो बहुत दिन हो गए हैं डाक्टर साहब. अपनी गर्लफ्रैंड को क्या इतनी जल्दी भूल गए?’’

‘‘नहीं…नहीं… ऐसी कोई बात नहीं है डार्लिंग. मैं तो समझा था कि कहीं तुम उस दिन की बात का बुरा तो नहीं मान गई हो?’’ डाक्टर अशोक ने बड़ी बेताबी से कहा

‘‘बुरा तो मान गई थी डाक्टर. प्यार करने के लिए भला नशे की गोली देने की क्या जरूरत थी? खुद तो पूरा मजा ले लिया, मैं प्यासी की प्यासी ही रह गई,’’ आंखों में शरारत भर कर लतिका ने कहा.

‘‘ओह, तो आज जी भर कर प्यार कर लेना डार्लिंग. बंदा आप की सेवा में हाजिर है,’’ डाक्टर अशोक खुश होते हुए बोले.

रात को तकरीबन 12 बजे लतिका ने मुक्ता से गुपचुप कुछ सलाहमशवरा किया, फिर वह डाक्टर अशोक के केबिन में दाखिल हुई. वह बहुत बेसब्री से उसी का इंतजार कर रहे थे.

‘‘आओ डार्लिंग, बहुत देर लगा दी,’’ उसे देख कर वह मुसकराए.

‘‘इंतजार में ही तो मजा है. अब फिक्र मत करो. सारी रात ही अपनी है,’’ बड़ी अदा से आंखें मटकाते हुए लतिका बोली.

डाक्टर अशोक उसे अपनी बांहों में लेने को बेचैन हो उठे, लेकिन उस ने उन्हें झटक दिया.

‘‘जरा रुकिए, पहले एक कप कौफी हो जाए, तो जरा शरीर में ताजगी आए. थकान से मेरा अंगअंग टूट रहा है. आप मुझ से बहुत काम लेते हैं डाक्टर. आप बहुत जालिम हैं. पहले जरा मूड बनने दीजिए,’’ वह नखरे दिखाते हुए डाक्टर की बांहों में आने से बचते हुए बोली. फिर वह बड़ी अदा से अपने कूल्हे मटकाती हुई इलैक्ट्रिक केतली में कौफी बनाने चली गई.

उस की ऐसी अदाएं देख कर डाक्टर अशोक उसे पाने को बेचैन हो उठे थे. वे टैलीविजन में आती हुई रोमांटिक फिल्म देखने में मशगूल हो गए.

कौफी पीने के बाद डाक्टर अशोक को अपना सिर घूमता हुआ सा महसूस हुआ. अभी वे कुछ समझ  पाते कि बेहोश हो कर अपने केबिन में बिछे बैड पर ढह गए.

इस के 2 दिन बाद जब डाक्टर अशोक अपने केबिन में बैठे मरीज देख रहे थे, उसी समय लतिका उन के पास आई. उस ने उन्हें एक लिफाफा दे कर उसे देख लेने को कहा.

डाक्टर अशोक ने लिफाफा खोल कर देखा. उस में कुछ फोटो थे. उन फोटो को देख कर उन की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उन फोटो में वे एकदम नंगे थे और लतिका भी साथ थी. ये फोटो उस रात को कौफी में नशे की गोलियां मिला कर मुक्ता की मदद से खींचे गए थे.

डाक्टर अशोक ने हड़बड़ाहट में सब को केबिन से बाहर निकाला. उन का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया था.

‘‘आखिर तुम चाहती क्या हो?’’ डाक्टर ने सहमे अंदाज में लतिका से पूछा.

‘‘अपनी बेइज्जती का बदला लेना है,’’ लतिका ने कहा.

‘‘तुम जितनी चाहो, उतनी दौलत ले लो, लेकिन ये फोटो और इन के नैगेटिव मुझे दे दो,’’ डाक्टर अशोक ने उसे रुपयों का लालच देते हुए कहा.

‘‘डाक्टर अशोक, तुम ने क्या मुझे ऐसीवैसी लड़की समझ  रखा है? तुम ने क्या समझ  था कि तुम धोखे से मेरे जिस्म से खिलवाड़ कर लोगे और मैं चुप रह जाऊंगी या आंखों में आंसू भर कर तुम्हारे सामने गिड़गिड़ाऊंगी?

‘‘नहीं… मैं इतनी कमजोर नहीं हूं. केवल 10 साल की उम्र में मैं ने अपने पिता को खो दिया था. तब से मैं जिंदगी में आने वाली तमाम मुश्किलों का सामना अकेली कर रही हूं,’’ लतिका ने गुस्से से कहा.

‘‘तो तुम करोगी क्या? इस से तो तुम्हारी ही बदनामी होगी? इस से अच्छा है कि तुम रुपए ले लो, नहीं तो फिर तुम्हारे पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा. मैं ने तुम जैसी लड़कियां बहुत देखी हैं,’’ एक बार फिर उसे झांसे में लेने की कोशिश करते हुए डाक्टर अशोक ने धमकाया.

‘‘नहीं, मैं तुम को इतनी आसानी से नहीं छोड़ूंगी. होने दो बदनामी. मैं तो लुट ही चुकी हूं. मैं अब अपनी बदनामी से डरने वाली नहीं हूं. लेकिन कल जब ये फोटो सभी अखबारों में छपेंगे, तो तुम कहीं के नहीं रहोगे डाक्टर.

‘‘लोग तुम्हारे नाम पर थूकेंगे. यह दौलत और शोहरत एक ही दिन में तुम से छिन जाएगी. बलात्कार करने के जुर्म में तुम्हें जेल अलग से होगी. मैं ही नहीं, कई दूसरी लड़कियां भी तुम्हारे खिलाफ बयान देंगी.’’

इतना सुनते ही डाक्टर अशोक घबरा गए. उन्हें अपने पैरों के नीचे से जमीन खिसकती नजर आई. उन की बोलती बंद हो गई.

वे गिड़गिड़ाते हुए बोले, ‘‘मुझे  माफ कर दो. मुझ  से बहुत बड़ी गलती हो गई है. प्लीज, ऐसा मत करो, नहीं तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा. मेरी डाक्टरी की डिगरी तक छिन जाएगी.’’

‘‘मैं ऐसा ही करूंगी. मैं तुम्हें दरदर का भिखारी बना कर छोड़ूंगी, ताकि तुम किसी औरत की तरफ गलत निगाह से देखने की कभी हिम्मत भी न कर सको,’’ लतिका ने उन्हें धमकी दी. वह उन्हें गिड़गिड़ाता देख कर बहुत खुश थी. यही तो वह चाहती थी.

‘‘मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूं. तुम जो भी कहोगी, मैं मानने को तैयार हूं, लेकिन मेरी बदनामी मत करो,’’ उस के पैरों पर झकते हुए डाक्टर अशोक बोले.

‘‘तुम ने मेरी इज्जत लूटी है, इसलिए अब मुझे  समाज में अपनी बीवी का दर्जा देना पड़ेगा. तुम्हें मंजूर है?’’ लतिका ने कहा.

कुछ देर तक डाक्टर अशोक सोचते रहे, फिर बोले, ‘‘ठीक है लतिका, मैं तुम से शादी करूंगा.’’

‘‘देखो, अपनी बात से मुकरना मत. तुम्हारी सारी बातें अब मेरे इस मोबाइल में टेप हो चुकी हैं,’’ अपना मोबाइल दिखाते हुए लतिका बोली.

डाक्टर अशोक अब पूरी तरह से अपनी हार मान चुके थे. अब उन के सामने लतिका को बीवी बनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था.  Hindi Story

Story in Hindi : कहानी एक रात की

Story in Hindi. नए बौस की बीमारी की खबर सुन कर जयंत ने घर आए अपने पुराने बौस को पत्नी मंजुला के हवाले कर दिया और खुद अस्पताल चला गया. पति के प्यार को तरस रही मंजुला के सामने एक जवां मर्द और रात की तनहाई थी. क्या हुआ उस रात को?

तबादले के बाद जब जयंत रामपुर वाले नए दफ्तर में पहुंचा, तो उसे वहां का माहौल काफी अच्छा लगा. साथ काम करने वालों की मदद से उसे दफ्तर के पास ही एक अच्छा किराए का मकान भी मिल गया. उस की पत्नी मंजुला को भी वह मकान काफी पसंद आया.

शादी के 10 साल बाद भी जयंत और मंजुला के कोई औैलाद नहीं हुई थी.

मंजुला का गोरा, खूबसूरत और गदराया बदन भी जयंत को अपनी ओर खींच नहीं पाता था. जिंदगी की तमाम परेशानियों ने जयंत के अरमान कुचल डाले थे.

वक्त के थपेड़ों ने धीरेधीरे जयंत से उस की मर्दानगी भी छीन ली थी और तब मंजुला मन से ही नहीं तन से भी गरीब हो गई थी.

शाम के 7 बजे थे. जयंत दफ्तर से लौट आया था और बिस्तर पर लेट कर टैलीविजन पर क्रिकेट मैच देखने का मजा ले रहा था, तभी मंजुला चाय ले कर कमरे में आई और चाय की प्याली जयंत की ओर बढ़ाते हुए बोली, ‘‘आज आप ने लौटने में इतनी देर क्यों कर दी?’’

चाय की चुसकी लेता हुआ जयंत कुछ जवाब देता, इस के पहले ही दरवाजे की घंटी बज उठी.

जयंत ने दरवाजा खोला, तो अपने पुराने बौस वीरेंद्र को देख कर खुशी से बोल उठा, ‘‘सर, आप… आप को अपने घर में देख कर बेहद खुशी हुई. आइए, अंदर आइए.’’

वीरेंद्र ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘हां जयंत, तुम्हारे जैसे ईमानदार और मेहनती सहयोगी के तबादले से मैं परेशान था और तुम से मिलना चाह रहा था. आज यहां मेरी एक बैठक थी. बैठक खत्म होते ही मैं सीधा तुम्हारे दफ्तर पहुंचा, वहां से तुम्हारे मकान का पता ले कर यहां आया हूं.’’

‘‘यह तो आप की मेहरबानी है सर. मेरे नए बौस विशालजी भी आप की वजह से मुझ बहुत चाहते हैं.’’

‘‘लेकिन जयंत, आज की बैठक में तुम्हारे बौस विशाल को नहीं देखा,’’ वीरेंद्र ने पूछा.

‘‘दरअसल, वे कल से ही काफी बीमार हैं और छुट्टी पर हैं. बच्चे बाहर गए हुए हैं. घर में सिर्फ उन की पत्नी और नौकर दीपू ही हैं,’’ जयंत ने उत्तर दिया.

तभी मंजुला ट्रे में चायनाश्ता ले कर वहां आ पहुंची. ‘नमस्ते’ कह कर उस ने ट्रे वीरेंद्र के सामने मेज पर रख दी. फिर तीनों ने साथसाथ चाय पी.

बहुत देर तक दफ्तर की बातें होती रहीं. फिर जयंत ने वीरेंद्र से कपड़े बदलने और फ्रैश हो कर आराम करने को कहा. तभी फोन बजा. मंजुला ने फोन उठाया, ‘‘हैलो?’’

उधर से आवाज आई, ‘मैं विशाल की पत्नी माया बोल रही हूं. इन की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई है. डाक्टर ने इन्हें फौरन भरती करने को कहा है. इन्होंने जयंतजी को तुरंत बुला लेने को कहा है. जरा जयंतजी से बात करा दीजिए.’

मंजुला फोन जयंत की ओर बढ़ाते हुए बोली, ‘‘मायाजी का फोन है. वे बहुत घबराई हुई हैं… आप बात कर लें.’’

‘‘हैलो मैडम, मैं जयंत बोल रहा हूं. क्या बात है?’’

उधर से माया ने बताया, ‘आप यहां जल्दी चले आइए. इन की तबीयत बहुत खराब हो गई है. इन्हें तुरंत डाक्टर मिश्र के क्लिनिक में भरती कराना है. इन्होंने आप को जल्दी बुला लेने को कहा है. शायद आप को रात में क्लिनिक पर ही रुकना पड़े. मैं अकेली हूं. प्लीज, जल्दी आ जाइए.’

जयंत और मंजुला एकदूसरे को देखने लगे. उन की खामोशी देख वीरेंद्र ने पूछा, ‘‘क्या बात है जयंत? तुम लोग चुप क्यों हो?’’

जयंत ने उन्हें माया से हुई बात बताई और जाने के लिए उन से इजाजत चाही.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘इस में हिचक कैसी? दुख की घड़ी में दूसरों की मदद करना तो हर इनसान का फर्ज है.’’

जयंत ने बिना एक पल गंवाए मंजुला की ओर मुड़ कर कहा, ‘‘मंजुला, मैं चलता हूं. तुम इन का ध्यान रखना. इन्हें यहां किसी चीज की दिक्कत नहीं हो.’’

रात में दरवाजा ठीक से बंद कर लेने की हिदायत दे कर जयंत विशाल के घर की ओर चल पड़ा. उस समय रात के 10 बज रहे थे.

जयंत कुछ ही देर में विशाल के घर पहुंच गया. उस के पहुंचते ही माया विशाल को ले कर कार से क्लिनिक की ओर चल पड़ी.

क्लिनिक पहुंचते ही डाक्टर ने विशाल को आईसीयू में भरती कर लिया और उन का बाकायदा इलाज शुरू कर दिया.

इस के बाद जयंत ने मोबाइल से घर का नंबर मिलाया. फोन की घंटी बजते ही वीरेंद्र ने फोन उठा कर ‘हैलो’ कहा.

वीरेंद्रजी की आवाज सुन कर जयंत ने कहा, ‘सर, विशालजी की हालत चिंताजनक है. उन्हें आईसीयू में भरती कर लिया गया है. मैं रात को घर नहीं आ सकूंगा.’

फोन पर हो रही बात सुन कर मंजुला भी वहां आ गई. वीरेंद्र ने फोन मंजुला को थमा दिया.

जयंत ने मंजुला से कहा, ‘मंजुला, मैं आज रात नहीं आ सकूंगा. तुम वीरेंद्रजी का ध्यान रखना. उन्हें कोई तकलीफ न हो.’

मंजुला सोच रही थी कि आज की रात एक पराए मर्द की मौजूदगी में अकेले गुजारनी होगी. उधर वीरेंद्र के दिल की धड़कन तो जयंत के न लौटने की खबर से बढ़ गई थी. दोनों खामोश एकदूसरे को अपलक देख रहे थे.

मंजुला ने खामोशी तोड़ते हुए पूछा, ‘‘खाना लगाऊं?’’

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘नहीं मंजुला, खाना तो रोज खाता हूं. आज कुछ पीने की इच्छा हो रही है… पिलाओगी?’’

वीरेंद्र की इस अजीब बात पर मंजुला एकाएक घबरा उठी. इस पर उन्होंने कहा, ‘‘घबराओ नहीं. बस, उधर रखा मेरा ब्रीफकेस उठा कर मुझे दे दो.’’

मंजुला ने जब ब्रीफकेस ला कर वीरेंद्र के सामने रख दिया, तो वे उसे खोलते हुए बड़े प्यार से बोले, ‘‘मैं पहली बार तुम्हारे घर आया हूं. जल्दबाजी में कुछ ले कर नहीं आया,’’ यह कहते हुए उन्होंने अपने ब्रीफकेस से सौसौ रुपए के 2 बंडल निकाले और मंजुला की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘बुरा मत मानना. इसे अपने पास रख लो और अपनी पसंद से अपने लिए सोने की चेन और कुछ अच्छी साडि़यां खरीद लेना.

‘‘देखो, यह पैसा मेरा नहीं है… यह तुम्हारा ही है. जयंत के जरीए मैं ने बहुत रुपए कमा लिए हैं, लेकिन उस ने कभी अपना हिस्सा नहीं लिया. अगर तुम भी इनकार कर दोगी, तो मेरा दिल टूट जाएगा और मुझे बहुत दुख होगा.’’

मंजुला का दिल ही नहीं, बदन भी कांप रहा था. उस ने एकसाथ 20 हजार रुपए कभी देखे भी नहीं थे. उस के अंदर उथलपुथल मची थी.

उस ने दूसरे ही पल सोचा, ‘इस 20 हजार रुपए पर उस का ही हक होगा, जिसे जयंत भी कभी जान नहीं सकेंगे. मन की कितनी दबी ख्वाहिशें एकसाथ पूरी हो सकती हैं,’ और उस ने रुपए थाम लिए और वीरेंद्र का चेहरा खुशी से दमक उठा.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मंजुला, मैं ने कहा था न कि आज कुछ खाने की नहीं, पीने की इच्छा है. क्या तुम मुझे  पिलाओगी?’’ इतना कह कर उन्होंने ब्रीफकेस से शराब की एक बोतल निकालते हुए उस से पैग तैयार कर देने को कहा और वह मना न कर सकी.

सोफे पर बैठ कर मंजुला वीरेंद्र के लिए पैग तैयार करने लगी.

मंजुला के चेहरे पर उठते हुए भावों को वीरेंद्र ने पढ़ने की कोशिश की, जिस में झिझक तो थी, लेकिन हामी भी दिख रही थी.

मंजुला से पैग ले कर वीरेंद्र ने उस के हाथों पर अपना हाथ रखते हुए कहा, ‘‘मंजुला, हालात ने हमें यह मौका दिया है. यहां मेरा अचानक आना, जयंत का रातभर के लिए बाहर जाना, यह मस्ती भरा आलम, सुहानी रात और हम दोनों का घर में रातभर के लिए अकेले होना, क्या यह सब सिर्फ इत्तिफाक भर है? ऐसा मौका जिंदगी में शायद ही कभी किसी को मिलता है.

‘‘आओ मंजुला, हम एकदूसरे को प्यार करें…’’ और इतना कह कर वीरेंद्र ने मंजुला को अपनी बांहों में भर लिया और उस के रसीले होंठों को चूम लिया.

इस के बाद तो वीरेंद्र के चुंबनों की बौछार ने मंजुला को मदहोश कर दिया.

वीरेंद्र ने मंजुला के जिस्म से कपड़े उतार कर नीचे फेंकने शुरू कर दिए और फिर देखते ही देखते वे दो जिस्म एक जान हो गए.

मंजुला मस्ती के इस आलम में इस कदर खो गई कि उसे अच्छेबुरे का एहसास नहीं रहा. फिर तूफान शांत हो गया. जब दोनों की आंखें खुलीं, तो दोनों मुसकरा रहे थे. उस समय रात के 2 बज रहे थे.

मंजुला ने कहा, ‘‘अब तो कुछ खा लीजिए, नहीं तो जयंत कहेंगे कि मैं ने उन के बौस की खातिरदारी नहीं की.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. तुम ने तो मेरी ऐसी खातिरदारी की है कि मैं जिंदगीभर नहीं भूल सकूंगा,’’ वीरेंद्र ने कहा, पर मंजुला नहीं मानी और रसोई से खाना ले आई और दोनों ने एकसाथ खाना खाया.

मंजुला जब सोने के लिए दूसरे कमरे में जाने लगी, तो वीरेंद्र ने मंजुला को अपने साथ सोने को मजबूर कर दिया.

दोनों की आंखें तब खुलीं, जब सुबह के 7 बज गए. मंजुला ने उठ कर पहले अपने कपड़ों को ठीक किया और अपने कमरे की ओर जाने लगी, तभी वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मंजुला, अगर मुझ से कोई गलती हुई हो, तो मुझे माफ कर देना. हम शायद ही कभी इस तरह दोबारा मिल सकेंगे. हमें कभी इस के लिए अफसोस नहीं करना चाहिए.’’

मंजुला चुपचाप खड़ी वीरेंद्र की बातें सुन रही थी. उस के चेहरे पर भी कहीं अफसोस का भाव नहीं था.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मुझे अभी 8 बजे की ट्रेन से लौटना है. क्या एक कप चाय पिला सकोगी?’’

‘‘क्यों नहीं,’’ कह कर मंजुला चाय बनाने चल पड़ी.

जैसे ही वह चाय ट्रे में ले कर गई, तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. उस ने लपक कर दरवाजा खोला. सामने जयंत खड़ा था. उस की आंखें थकीथकी सी थीं और चेहरे पर उदासी थी.

तभी जयंत की नजर वीरेंद्र पर पड़ी, जो तैयार हो कर बैठे चाय पी रहे थे.

वीरेंद्र ने पूछा, ‘‘जयंत, तुम्हारे बौस का क्या हाल है? मैं तो एक जरूरी काम से अभी 8 बजे की गाड़ी से लौट रहा हूं, वरना क्लिनिक पर जा कर उन से जरूर मिलता.’’

जयंत ने जवाब दिया, ‘‘मैं अभीअभी अपने नए बौस को अंतिम यात्रा पर विदा कर के लौटा हूं और अपने पुराने बौस को ठीक से खातिरदारी किए बगैर विदा कर रहा हूं.

‘‘काश, ऐसी रात फिर कभी मुझे न देखनी पड़े. सचमुच यह रात मेरे लिए अंधेरा ले कर आई, जिस में मैं ने बहुतकुछ खोया है.’’

मंजुला चुपचाप खड़ी सूनी आंखों से उन दोनों को देख रही थी.  Story in Hindi

–पुरुषोत्तम

Crime Story : ब्लैक मेलिंग का फल!

Crime Story. स्वयं को होशियार, ताकतवर और सक्षम समझकर जब लालच के गंदे भंवर में फंस, कोई ब्लैकमेलिंग अर्थात भयदोहन का खेल खेलने लगता है तो अंजाम के रूप में “फल” जेल ही मिलती है.

यह एक बार पुनः छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में घटित एक सच्ची घटना से सिद्ध हो गया. केशकाल थाना क्षेत्र में एक युवती को पचास हजार रुपए ब्लैकमेल कर वसूलने वाले साथ ही दुष्कर्म के नाले में डुबकी लगाने वाले दो लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया.

पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कांकेर जिले के केशकाल के बोरगांव वार्ड क्रमांक 6 में  रात 8 बजे एक युवती अपने दोस्त  के घर की चाबी मांग अपने प्रेमी के संग रुकी थी.

जहां भनक मिलने के बाद तकरीबन रात एक बजे बाजू के रूम में रहने वाले दीपंकर विश्वास ने छुप कर  युवक-युवती का अंतरंग दृश्यों को कैमरे में कैद कर वीडियो बना लिया.

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जिसके बाद दीपंकर विश्वास ने फोन से अपने दोस्त वेंकट विजय को सूचना देकर उसे भी बुला. जिसके बाद दोनों ने दरवाजा खुलवाया और प्रेमी को अपने कमरे में ले जा उसे वीडियो दिखा कर 50 हजार रुपए मोबाइल से अपने खाते में ले लिए और प्रेमी को घर से भगाकर लड़की को वीडियो दिखाकर बारी-बारी से दुष्कर्म किया.

एसडीओपी अमित पटेल ने बताया कि इस बीच प्रेमी ने थाना केशकाल पहुंच घटना की जानकारी दी तो रात्रि पेट्रोलिंग में तैनात पुलिसकर्मियों ने आरोपियों को गिरफ्तार किया.पीड़िता सिमरन (बदला हुआ नाम) ने थाने में बताया कि पास के ही गांव में पुलिया बनाई जा रही है. जिसके ठेकेदार  के साथ वह रात्रि में अपने दोस्त के घर की चाबी लेकर वहां ठहरने गई थी. जहां वे दोनों बात कर रहे थे. इतने में दरवाजा खुलवा दोनों आरोपियों ने ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया और प्रेमी को भगाकर मेरे साथ दुष्कर्म भी किया.

अंतरंग वीडियो और रेप

पहले तो आरोपी ने  युवती सिमरन का अंतरंग दृश्यों का वीडियो बना लिया फिर  50 हजार रूपये ले लिए, यह काम कथित रूप से  दो लोगों जिनमें एक डाक्टर व एक शिक्षक  है ने मिलकर किया. यही नहीं मौका देख कर सिमरन से बलात्कार भी किया. घटना के पश्चात बॉयफ्रेंड के द्वारा सिमरन को हिम्मत बंधाकर  शिकायत दर्ज करवाई गई परिणाम स्वरूप समाज में आदर्श के रूप में प्रस्तुत डाक्टर व शिक्षक को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल के सीखचों में डाल दिया है. महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि गिरफ्तार आरोपियों में एक शिक्षक भी है, जबकि इसका मास्टरमाइंड एक कथित डाक्टर है.

पुलिस के मुताबिक सिमरन अक्सर अपने बॉयफ्रेंड के साथ दीपांकर विश्वास के मकान के पास आया करती थी. दीपांकर की निगाह कई दिनों से शिकार पर थी. मौका मिलते ही उसने छुपकर दोनों का निजी क्षणों का दृश्य कैमरे में कैद कर लिया. इसके बाद उसे लगा कि क्यों ना इनसे रूपए ऐंठ लिए जाए. दीपंकर खुद को डाक्टर बताता था और एक क्लिनिक भी चलाता है. युवती का विडियो बनाने वाला झोलाछाप डाक्टर दीपंकर लगातार इस बात की धमकी दे रहा था कि वो इसे वायरल कर देगा, यही नहीं लड़के से मिलने उसके कमरे में आती हो, ये जानकारी परिवारवालों को भी दे देगा.बदनामी के डर से लड़की ने अपने दोस्त की मदद से उस कथित डाक्टर को 50 हजार रूपये दे भी दिये थे. लेकिन डाक्टर मान नहीं रहा था उसकी भूख बढ़ती चली जा रही थी.

एक दिन  जब युवती अपने कमरे में थी, तभी अचानक से कथित डाक्टर दीपंकर अपने शिक्षक साथ वेंकट  के साथ युवती के कमरे में पहुंच गया.दोनों आरोपियों ने लड़की को जान से मारने की धमकी दी और फिर दोनों आरोपियों ने युवती के साथ रेप किया. इस तरह दीपांकर और उसका साथी दोनों अपराध के दलदल में फंसते चले गए और आज जेल की हवा खा रहे हैं. Crime

Story In Hindi: शक – क्या केतकी की कम हुई सुगना के लिए जलन

Story In Hindi: रोज इसी समय वह काम से लौटती थी. उस के चारों बच्चे वहीं खेलते हुए मिलते थे. उसे ध्यान आया कि हो सकता है कि उस का पति मंगल आज बच्चों को उस की मां के घर छोड़ कर काम पर चला गया हो. वह कराहते हुए उठी और अपनेआप को घसीटते हुए मां के  घर की ओर चल पड़ी, जो उस के घर से मात्र एक फर्लांग की दूरी पर था. वहां पहुंच कर उस ने पाया कि मां अभी तक काम से नहीं लौटी थीं. उन के घर में भी ताला लगा हुआ था. निराश हो कर वह वापस लौटी और घर के सामने जमीन पर बैठ कर पति और बच्चों का इंतजार करने लगी.

वह रोज सवेरे 4 बजे सो कर उठती. घर का कामकाज निबटा कर पति व बच्चों के लिए दालभात पका कर काम पर निकल जाती थी. पति व बच्चे देर से सो कर उठते थे. मंगल बच्चों को खिलापिला कर उन्हें खेलता छोड़ कर काम पर निकल जाता. जब वह दोपहर में लौट कर आती तो उस के बच्चे घर के सामने गली के बच्चों के साथ खेलते मिलते. आज पहला मौका था कि सुगना को घर बंद मिला और बच्चे नहीं मिले. आसपास पूछताछ करने पर पता चला कि किसी ने भी मंगल व बच्चों को नहीं देखा था. ऐसा लगता था कि मंगल बच्चों को ले कर भोर होते ही कहीं चला गया था. सुगना को बाहर बैठेबैठे 2 घंटे हो गए थे. वह धीरेधीरे सुबकने लगी. आसपास औरतों व बच्चों की भीड़ जमा हो गई.

उस की पड़ोसिन केतकी, ईर्ष्यावश उस से बात नहीं करती थी पर सुगना की दयनीय स्थिति देख कर केतकी  को भी उस पर दया आ गई. उस ने उसे अपने घर के अंदर आ कर कुछ खा लेने व आराम करने को कहा पर सुगना नहीं मानी. उस ने रोतेरोते कहा कि जब तक वह मंगल व बच्चों को नहीं देख लेगी तब तक न तो वहां से कहीं जाएगी और न ही कुछ खाएगी.

केतकी का पति, बसंत अकसर सुगना को निहारा करता था, जिस के कारण वह मन ही मन उस से जलती थी और उस से बात नहीं करती थी. बसंत ही नहीं, बस्ती के सभी पुरुषों की नजरों का केंद्रबिंदु थी सुगना. वह 6 धनी परिवारों में मालिश का काम करती थी. उन घरों की मालकिनों को कुछ काम नहीं था. खाली बैठेबैठे उन के बदन में दर्द होता रहता. सुगना उन के हाथपैरों में मालिश करती. साथ ही, इधरउधर की बातें नमकमिर्च लगा कर सुना कर उन का मनोरंजन करती.

ये रईस स्त्रियां प्रसन्न हो कर सुगना को अपनी उतरी हुई पुराने फैशन की साडि़यां दे देतीं. सुगना जब जार्जेट, रेशम, शिफान, टसर व नायलोन की साडि़यां पहन कर निकलती तो बस्ती की स्त्रियों के सीनों पर सांप लोट जाते और पुरुष आहें भरने लगते. सभी उसे पाना चाहते, उस से बातें करने को लालायित रहते.

शाम घिरने लगी थी. धीरेधीरे बस्ती के पुरुष काम से लौैटने लगे थे. आते ही सभी मंगल और बच्चों की खोज में लग गए. वास्तव में उन्हें खोजने से ज्यादा उन की दिलचस्पी सुगना की कृपादृष्टि पाने में थी.

जब मंगल व बच्चों का कहीं पता नहीं चला तो सब ने सोचा कि शायद वह पास वाले गांव में अपने मातापिता के पास चला गया होगा. इस विचार के आते ही बस्ती के दारूभट्टी के नौजवान मालिक केवल सिंह ने सुगना की सहायता के लिए अपनेआप को पेश कर दिया. बस्ती के सभी पुरुषों के पास वाहन के नाम पर पुरानी घिसीपिटी साइकिलें ही थीं. केवल सिंह ही ऐसा रईस था जिस के पास एक पुरानी खटारा फटफटी थी.

केवल सिंह ने अपनी फटफटी पर एक और नौजवान को बैठाया और मंगल का पता लगाने पास वाले गांव में चला गया. केवल सिंह का सुगना के घर खूब आनाजाना था. मंगल जब दारू पी कर उस की दुकान में लुढ़क जाता तो वह उसे अपनी गाड़ी में लाद कर घर छोड़ने आता. हर रात ऐसा ही होता.

उसे मंगल से कोई लगाव नहीं था, बल्कि सुगना को आंख भर देखने तथा नशे में बेहोश मंगल की सेवा करने के बहाने सुगना के पास बैठने और उस से देर रात तक बतियाने का मौका पाने के लिए वह ऐसा करता था. मंगल का जब नशा टूटता तो वह आधी रात को सुगना को जगा कर खाना मांगता. जरा भी नानुकुर या देर होने पर वह सुगना को बुरी तरह पीटता. रात के सन्नाटे में सुगना की दर्दभरी चीखें महल्ले वाले सुनते पर क्या करते, पतिपत्नी का मामला था.

धुंधलका गहरा होने लगा था. केवल सिंह लौट आया था. मंगल सिंह अपने बच्चों के साथ अपने गांव भी नहीं गया था. इतना बड़ा ताला लगा कर आखिर गया कहां वह?  सब इस गुत्थी को सुलझाने में लगे हुए थे कि तभी किसी को घर के अंदर से बच्चों की दबीदबी सिसकियां सुनाई दीं. सब के कान खड़े हो गए. तुरंत 2 हट्टकट्टे नौजवानों ने दरवाजा तोड़ डाला.

अंदर का मंजर दिल दहलाने वाला था. मंगल का शरीर छत की मोटी बल्ली से लटका हुआ था. गले में बंधी थी सुगना की नाइलोन की साड़ी. वह मर चुका था. चारों बच्चे डरे हुए, सुबक रहे थे. देखते ही सुगना पछाड़ खा कर जमीन पर गिर कर बेहोश हो गई. स्त्रियों ने उस के ऊपर पानी डाला. होश में आते ही वह बच्चों से लिपट कर दहाड़ मार कर रोने लगी.

भीड़ में से ही किसी ने पुलिस को शिकायत कर दी. पुलिस ने आते ही जांचपड़ताल शुरू कर दी. ऐसा लगता था कि शराब के नशे में मंगल ने आत्महत्या कर ली थी. कमरे की एकमात्र खिड़की अंदर से बंद थी. बस्ती वाले मंगल की बुरी आदतों से परेशान तो थे ही. सभी ने उस के विरोध में बयान दिया. किसी पर भी शक की सुई नहीं घूम रही थी. पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि मंगल ने बाहर से ताला लगाया तथा खिड़की से कूद कर अंदर आ गया. अंदर से दरवाजा बंद कर के उस ने आत्महत्या कर ली. उस ने बच्चों को भी मारने की कोशिश की थी. पतीली में बचेखुचे दालभात की जांच से पता चला कि उस में अफीम मिलाई गई थी. मात्रा कम होने के कारण बच्चे बच गए थे.

आत्महत्या का कारण किसी को समझ में नहीं आ रहा था. एक नशेड़ी इतने ठंडे दिमाग से योजनाबद्ध काम करेगा यह बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी. बच्चे कुछ भी बताने में असमर्थ थे. कई दिन तक गहन पूछताछ और जांचपड़ताल के बाद भी पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला. सभी के बयान समान थे और केवल मंगल की ओर इशारा करते थे. पुलिस ने भी इस गरीब बस्ती के एक नशेड़ी की मौत के मामले में ज्यादा  सिर खपाने की जरूरत नहीं समझी और आत्महत्या का मामला दर्ज कर तुरंत फाइल बंद कर दी.

मिसेज दिवाकर के यहां सुगना काम करती थी. उन्हें घर के अन्य नौकरों से मंगल की मौत के बारे में पता चला तो उन्हें शराब की भट्ठी के मालिक केवल सिंह पर शक हुआ, क्योंकि वही ऐसा व्यक्ति था जिस का सुगना के यहां अधिक आनाजाना था. वह उस में जरूरत से ज्यादा रुचि भी लेता था. पर उन्होंने इस मामले में अपनी टांग अड़ाना उचित नहीं समझा.

मंगल की मौत को 1 माह ही बीता था कि केवल सिंह ने सुगना को चूडि़यां पहना कर अपनी पत्नी बना लिया. एक दिन की अनुपस्थिति के बाद सुगना सजीसंवरी, नई चूडि़यां खनकाती काम पर आई तथा मिसेज दिवाकर को अपने विवाह की सूचना दी. सुनते ही मिसेज दिवाकर भड़क गईं और बोलीं, ‘‘हाय मरी, तुझे तो रोज रात की मारपीट से मुक्ति मिल गई थी. फिर से क्यों जा पड़ी नरक में उसी मुए के साथ, जिस ने तेरे मंगल को मारा?’’

अनजाने में उन के मुख से उन के अंदर का दबा हुआ शक उजागर हो गया, पर अविचलित सुगना बोली, ‘‘अपने आदमी की मार भी कोई मार होती है. इस से बस्ती में इज्जत बढ़ती है. रही शादी की बात, तो महल्ले के सब बदमाशों से बचने के लिए किसी एक का हाथ थामना अच्छा है. आप क्या जानो, एक औरत का अकेले रहना कितना मुश्किल होता है. बिना आदमी के बस्ती के मनचले दारू पी कर मेरा दरवाजा पीटते थे. रात को सोने नहीं देते थे.’’

मिसेज दिवाकर को कुछ अटपटा सा लगा कि केवल सिंह पर उन के द्वारा लगाए हत्या के इल्जाम को सुन कर भी कोई प्रतिक्रिया उस ने व्यक्त नहीं की थी.

एक वर्ष बीत गया था. सुगना के पांव भारी थे. जच्चगी के लिए अस्पताल जाने से पहले उस ने अपनी छोटी बहन फागुन को घर व बच्चों की देखभाल के लिए बुलवा लिया. जब वह अस्पताल से नवजात बेटे के साथ घर लौटी तो उसे यह देख कर जबरदस्त धक्का पहुंचा कि उस के पति केवल सिंह ने उस की अनुपस्थिति में उस की बहन को चूडि़यां पहना कर अपनी पत्नी बना लिया है.

क्रोधित हो सुगना ने फागुन को बालों से पकड़ कर घसीटा और खदेड़ कर बाहर निकाल दिया. केवल सिंह के ऊपर फागुन का जबरदस्त नशा चढ़ा हुआ था. उसे अपनी नईनवेली पत्नी का अपमान सहन नहीं हुआ. उस ने कोने में  पड़ी हुई  कुल्हाड़ी उठा कर सुगना की टांग पर दे मारी. कुल्हाड़ी मांस फाड़ कर हड्डी के अंदर तक धंस गई. सुगना बेहोश हो कर गिर पड़ी. टांग से बहते खून की धार तथा रोते हुए नवजात शिशु को देख केवल सिंह के मन में पश्चाताप होने लगा. शोरगुल सुन सब पड़ोसी इकट्ठे हो गए. जिस अस्पताल से सुगना थोड़ी देर पहले वापस आई थी फिर वहीं दोबारा भरती हो गई.

केवल सिंह बड़ी लगन से तब तक उस की सेवा करता रहा जब तक वह पूरी तरह स्वस्थ व समर्थ नहीं हो गई. सुगना उस की सेवा से खुश कम थी और दुखी ज्यादा थी क्योंकि केवल सिंह ने फागुन को घर से नहीं निकाला था.

बेचारी दुखी सुगना क्या करती. उस ने अपनी पूरी आशाएं अपने नवजात बेटे पर टिका दी थीं. उस ने निश्चय किया कि वह बेटे को सेना में भरती कराएगी. जब वह लड़ाई में मारा जाएगा तो उसे सरकार लाखों रुपया देगी और उन रुपयों से वह अपनी मालकिनों की तरह ऐशोआराम से रहेगी. इसलिए उस ने अपने बेटे का नाम कारगिल रख दिया.

सुगना की विचित्र निष्ठुर कामना सुन कर मिसेज दिवाकर के रोंगटे खड़े हो गए. बड़ा ही क्रूर लगा उन्हें नवजात शिशु को बड़ा कर उस की मौत की कल्पना करना और अपने ऐशोआराम के लिए उसे भुनाना.

थोड़े ही दिन बीते थे कि एक दिन केवल सिंह अपनी नई  पत्नी फागुन के साथ हमेशा के लिए कहीं चला गया. साथ में ले गया अपना नन्हा पुत्र कारगिल. सुगना का धनपति बनने का सपना धरा रह गया. 2 बार ब्याही सुगना फिर से अकेली रह गई थी.

वर्षा के दिन थे. सुगना की टांग का घाव भर गया था, पर दर्द की टीस अब भी उठती थी. पति और उस की सगी बहन ने मिल कर जो छल उस के साथ किया था उस ने उसे अंदर से भी घायल कर दिया था. एक दिन वर्षा में भीगती सुगना जब मिसेज दिवाकर के यहां पहुंची तो उसे तेज बुखार था. अपनी साइकिल बाहर खड़े उन के ड्राइवर को थमा बड़ी मुश्किल से वह बरामदे तक पहुंची ही थी कि गिर कर बेहोश हो गई. जब वह होश में आई तो मिसेज दिवाकर ने अपने ड्राइवर से उस को कार में ले जा कर डाक्टर गर्ग से दवा दिलवा कर घर छोड़ आने को कहा.

आगे की सीट पर बैठी सुगना का सिर निढाल हो कर ड्राइवर गोपी के कंधे पर लुढ़क गया तो उस ने उसे हटाया नहीं. उसे बड़ा भला सा लग रहा था.

डाक्टर से दवा दिलवा कर गोपी उस को घर पहुंचाने गया. वहां उस को सहारा दे कर अंदर तक ले गया. इस के बाद भी उस का मन नहीं माना. वह उसे देखने उस के घर बराबर जाता तथा यथासंभव उस की सहायता करता. 3 दिन के बुखार में गोपी और सुगना बहुत करीब आ गए थे. चौथे ही दिन गोपी ने सुगना के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा. सुगना सहर्ष तैयार हो गई. गोपी ने उसे चूडि़यां पहना कर अपनी पत्नी बना लिया.

मिसेज दिवाकर को सुगना का पुनर्विवाह तनिक भी नहीं भाया. वह गुस्से से चीखीं, ‘‘कुदरत तुझे बारबार खराब  पुरुषों से मुक्ति दिलाती है, फिर चैन से अकेले क्यों नहीं रहती? अपनी मां के साथ रहने में तुझे क्या तकलीफ है?’’

सुगना बड़ी सहजता से बोली, ‘‘अकेली औरत जात को कोई तो रखवाला चाहिए.’’

मिसेज दिवाकर ने सुगना की समस्या से अपने को अलग रखने की ठान ली.

एक दिन मिसेज दिवाकर ने सुगना से धुले कपड़ों का गट्ठर इस्तरी वाले के ठेले तक अपनी साइकिल पर रख कर पहुंचाने को कहा. गट्ठर बड़ा होने के कारण साइकिल के कैरियर पर ठीक से नहीं बैठ रहा था. यह देख कर मिसेज दिवाकर बोलीं, ‘‘सुगना, तुझे ठीक से गांठ बांधनी भी नहीं आती. कपड़े बाहर निकल रहे हैं.’’

‘‘मांजी, चिंता मत कीजिए. गांठ लगानी मुझे खूब आती है. मंगल के लिए कैसी मजबूत गांठ लगाई थी मैं ने,’’ अकस्मात सुगना के मुंह से निकला.

ऐसा कहते हुए उस ने आंखें ऊपर उठाईं. उस की आंखों में शैतानी चमक देख कर मिसेज दिवाकर सहम उठीं. अंदर दबा हुआ शक उभर कर ऊपर आ गया था. उन्होंने सोचा, ‘तो मेरा शक सही था. मंगल ने आत्महत्या नहीं की थी. सुगना ने ही उसे मारा था.’

स्तब्ध मिसेज दिवाकर अपना सिर दोनों हाथों में थाम कर सोफे पर धम्म से बैठ गईं.

‘सुगना, हत्यारिन मेरे घर में, और मुझे पता ही नहीं चला.’ सोचसोच कर वह हैरान व परेशान थीं.

उन के शरीर में भय से सिहरन दौड़ गई. अब इतने अरसे बाद किस से कहें और किस से शिकायत करें. अपराधी को अपने दुष्कर्म की सजा मिलनी ही चाहिए. पर उन के पास कोई सुबूत भी नहीं था. था केवल शक. कौन सुनेगा उन के शक को? अगर सुगना को सजा दिलवा भी दी तो उस के बच्चों का क्या होगा? सोचते सोचते उन के सिर में दर्द होने लगा.

और सुगना, अनजाने में अपना अपराध प्रकट कर बैठी थी. अपने अपराध के प्रकटीकरण से बेखबर मिसेज दिवाकर के हृदय की हलचल से अनभिज्ञ बढ़ी चली जा रही थी अपने गंतव्य की ओर. Story In Hindi

Hindi Kahani: जानलेवा चुनौती – अमीर को कौनसा सबक मिला

Hindi Kahani: यह कहानी बंटवारे से पहले अंगरेजी राज की है. उस समय लोगों के स्वास्थ्य बहुत अच्छे हुआ करते थे. बीड़ीसिगरेट, वनस्पति घी का प्रयोग नहीं हुआ करता था. उस जमाने के लोग बहुत निडर होते थे. हत्या, डकैती की कोई घटना हो जाती थी तो पुलिस और जनता उस में रुचि लिया करती थी. गांवों में पुलिस आ जाती तो पूरे गांव में खबर फैल जाती कि थाना आया हुआ है.

एक अंगरेज डिप्टी कमिश्नर इंग्लैंड से रावलपिंडी स्थानांतरित हो कर आया था. जब भी कोई नया अंगरेज अधिकारी आता तो उसे उस इलाके की पूरी जानकारी कराई जाती थी, जिस से वह अच्छा कार्य कर के अपनी सरकार का नाम ऊंचा कर सके. उस अंगरेज डिप्टी कमिश्नर को बताया गया कि भारत में अनोखी घटनाएं होती हैं, जिन में डाके और चोरियां शामिल हैं. अपराधियों की खोज करना बहुत कठिन होता है. कई घटनाएं ऐसी होती हैं कि सुन कर हैरानी होती है.

नए अंगरेज डिप्टी कमिश्नर ने एसपी से कहा कि मेरे बंगले पर 24 घंटे पुलिस की गारद रहती है साथ ही 2 खूंखार कुत्ते भी. इस के अलावा मेरे इलाके में पुलिस भी रहती है. रात भर लाइट जलती है, क्या ऐसी हालत में भी चोर मेरे घर में चोरी कर सकता है?

एसपी ने जवाब दिया कि ऐसे में भी चोरी की संभावना हो सकती है. अंगरेज डिप्टी कमिश्नर ने कहा, ‘‘मैं इस बात को नहीं मानता, इतनी सावधानी के बावजूद कोई चोरी कैसे कर सकता है?’’

एसपी ने कहा, ‘‘अगर आप आजमाना चाहते हैं तो एक काम करें. एक इश्तहार निकलवा दें, जिस में यह लिखा जाए कि अंगरेज डिप्टी कमिश्नर के बंगले पर अगर कोई चोरी कर के निकल जाए, तो उसे 500 रुपए का नकद ईनाम दिया जाएगा. अगर वह पुलिस या कुत्तों द्वारा मारा जाता है तो अपनी मौत का वह स्वयं जिम्मेदार होगा. अगर वह मौके पर पकड़ा या मारा नहीं गया तो पेश हो कर अपना ईनाम ले सकता है. उसे गिरफ्तार भी नहीं किया जाएगा और न ही कोई सजा दी जाएगी.’’

डिप्टी कमिश्नर ने एसपी की बात मान ली. इश्तहार छपा कर पूरे शहर में लगा दिए गए. इश्तहार निकलने के 2 महीने बाद यह बात उड़तेउड़ते चकवाल गांव भी पहुंची. उस जमाने में गांवों के लोग शाम को चौपालों पर एकत्र हो कर गपशप किया करते थे. चकवाल की एक ऐसी चौपाल पर अमीर नाम का आदमी बैठा हुआ था, जो 10 नंबरी था.

उस ने वहीं डिप्टी कमिश्नर के इश्तहार वाली बात सुनी. उस ने लोगों से पूछा कि 2 महीने बीतने पर भी वहां चोरी करने कोई नहीं आया क्या? एक आदमी ने उसे बताया कि पिंडी से आए एक आदमी ने बताया था कि उस बंगले में किसी की हिम्मत नहीं है जो चोरी कर सके. वहां चोरी करने का मतलब है अपनी मौत का न्यौता देना.

अमीर ने उसी समय फैसला कर लिया कि वह उस बंगले में चोरी जरूर करेगा. अंगरेज डिप्टी कमिश्नर को वह ऐसा सबक सिखाएगा कि वह पूरी जिंदगी याद रखेगा. उस ने अपनी योजना के बारे में सोचना शुरू कर दिया.

कुत्तों के लिए उस ने बैलों के 2 सींग लिए और देशी घी की रोटियों का चूरमा बना कर उन सींगों में इस तरह से भर दिया कि कुत्ते कितनी भी कोशिश करें, रोटी न निकल सकें. उस जमाने में रेल के अलावा सवारी का कोई साधन नहीं था. गांव के लोग 30-40 मील तक की यात्रा पैदल ही कर लिया करते थे.
चूंकि अमीर 10 नंबरी था इसलिए कहीं बाहर जाने से पहले इलाके के नंबरदार से मिलता था. इसलिए अमीर सुबह जा कर उस से मिला, जिस से उसे लगे कि अमीर गांव में ही है. चकवाल से रावलपिंडी का रास्ता ज्यादा लंबा नहीं था. अमीर दिन में ही पैदल चल कर डिप्टी कमिश्नर की कोठी के पास पहुंच गया.
उस ने संतरियों को कोठी के पास ड्यूटी करते हुए देखा. बंगले के बाहर की दीवार आदमी की कमर के बराबर ऊंची थी. बंगले के अंदर संतरों के पेड़ थे, और बड़ी संख्या में फूलों के पौधे भी थे.

बंगले के चारों ओर लंबेलंबे बरामदे थे, बरामदे के 4-4 फुट चौड़े पिलर थे. अमीर को अंदर जा कर कोई भी चीज चुरानी थी और यह साबित करना था कि भारत में एक ऐसी भी जाति है, जो बहुत दिलेर है और जान की चिंता किए बिना हर चैलेंज कबूल करने के लिए तैयार रहती है.
जब आधी रात हो गई तो वह बंगले की दीवार से लग कर बैठ गया और संतरियों की गतिविधि देखने लगा. जिन सींगों में घी लगी रोटियों का चूरमा भरा था, उस ने वे सींग बड़ी सावधानी से अंदर की ओर रख दिए. वह खुद दीवार से 10-12 गज दूर सरक कर बैठ गया. कुत्तों को घी की सुगंध आई तो वे सींगों में से चूरमा निकालने में लग गए. फिर दोनों कुत्ते सींगों को घसीटते हुए काफी दूर अंदर ले गए.
अब अमीर ने संतरियों को देखा, वे 4 थे. बरामदे में इधर से उधर घूमते हुए थोड़ीथोड़ी देर के बाद एकदूसरे को क्रौस करते थे. संतरी रायफल लिए हुए थे और उन्हें ऐसा लग रहा था कि 2 महीने से भी ज्यादा बीत चुके हैं. अब किसी में यहां आने की हिम्मत नहीं है. वैसे भी वह थके हुए लग रहे थे.

अमीर दीवार फांद कर पौधों की आड़ में बैठ गया. वह ऐसे मौके की तलाश में था जब संतरियों का ध्यान हटे और वह बरामदे से हो कर अंदर चला जाए. उसे यह मौका जल्दी ही मिल गया. क्रौस करने के बाद जब संतरियों की पीठ एकदूसरे के विपरीत थी, अमीर जल्दी से कूद कर बरामदे के पिलर की आड़ में खड़ा हो गया.

अमीर फुर्तीला था. दौड़ता हुआ ऐसा लगता था, मानो जहाज उड़ा रहा हो. उसे यकीन था कि काम हो जाने के बाद अगर वह बंगले के बाहर निकल गया तो संतरियों का बाप भी उसे पकड़ नहीं पाएगा.
दूसरा अवसर मिलते ही वह कमरे का जाली वाला दरवाजा खोल कर कमरे में पहुंच गया. लकड़ी का दरवाजा खुला हुआ था. चारों ओर देख कर वह बंगले के बीचों बीच वाले कमरे के अंदर पहुंचा. उस ने देखा कमरे के बीच में बहुत बड़ा पलंग था. उस पर एक ओर साहब सोया हुआ था और दूसरी ओर उस की मेम सो रही थी. मध्यम लाइट जल रही थी.

कमरे में लकड़ी की 2-3 अलमारियां थीं, चमड़े के सूटकेस भी थे. उस ने एक सूटकेस खोला, उस में चांदी के सिक्के थे. उस ने एकएक कर के सिक्के अपनी अंटी में भरने शुरू कर दिए. जब अंटी भर गई तो उस ने मजबूती से गांठ बांध ली. वह निकलने का इरादा कर ही रहा था कि उस की नजर सोई हुई मेम के गले की ओर गई, जिस में मोतियों की माला पड़ी थी.

मध्यम रोशनी में भी मोती चमक रहे थे. उस ने सोचा अगर यह माला उतारने में सफल हो गया तो चैलेंज का जवाब हो जाएगा. मेम और साहब गहरी नींद में सोए हुए थे. उस ने देखा कि माला का हुक मेम की गरदन के दाईं ओर था. उस ने चुपके से हुक खोलने की कोशिश की. हुक तो खुल गया, लेकिन मेम ने सोती हुई हालत में अपना हाथ गरदन पर फेरा और साथ ही करवट बदल कर दूसरी ओर हो गई.
अब माला खुल कर उस की गरदन और कंधे के बीच बिस्तर पर पड़ी थी, अमीर तुरंत पलंग के नीचे हो गया. 5 मिनट बाद उसे लगा कि अब मेम फिर गहरी नींद में सो गई. उस ने पलंग के नीचे से निकल कर धीरेधीरे माला को खींचना शुरू कर दिया. माला निकल गई. उस ने माला अपनी लुंगी की दूसरी ओर अंटी में बांध ली.

अमीर जाली वाले दरवाजे की ओट में देखता रहा कि संतरी कब इधरउधर होते हैं. उसे जल्दी ही मौका मिल गया. वह जल्दी से खंभे की ओट में खड़ा हो कर बाहर निकलने का मौका देखने लगा. कुत्ते अभी तक सींग में से रोटी निकालने में लगे हुए थे.

उसे जैसे ही मौका मिला, वह दीवार फांद कर बाहर की ओर कूद कर भागा. संतरी होशियार हो गए और जल्दबाजी में अंटशंट गोलियां चलाने लगे. लेकिन उन की गोली अमीर का कुछ नहीं बिगाड़ सकीं. वह छोटे रास्ते से पगडंडियों पर दौड़ता हुआ रात भर चल कर अपने घर पहुंच गया.

बाद में अमिर को पता लगा कि गोलियों की आवाज सुन कर मेम और साहब जाग गए थे. जागते ही उन्होंने कमरे में चारों ओर देखा. सिक्कों की चोरी को उन्होंने मामूली घटना समझा. लेकिन जब मेम साहब ने अपनी माला देखी तो उस ने शोर मचा दिया. वह कोई साधारण माला नहीं थी, बल्कि अमूल्य थी.

एसपी साहब और नगर के सभी अधिकारी एकत्र हो गए. उन्होंने नगर का चप्पाचप्पा छान मारा, लेकिन चोर का पता नहीं लगा. अंगरेज डिप्टी कमिश्नर हैरान था कि इतनी सिक्योरिटी के होते हुए चोरी कैसे हो गई. उस ने कहा कि चोर हमारी माला वापस कर दे और अपनी 5 सौ रुपए के इनाम की रकम ले जाए. साथ में उसे एक प्रमाणपत्र भी मिलेगा.
इश्तहार लगाए गए, अखबारों में खबर छपाई गई लेकिन 6 माह गुजरने के बाद भी चोर सामने नहीं आया. दूसरी तरफ मेमसाहब तंग कर रही थी कि उसे हर हालत में अपनी माला चाहिए. माला की फोटो हर थाने में भिजवा दी गई. साथ ही कह दिया गया कि चोर को पकड़ने वाले को ईनाम दिया जाएगा.

उधर अमीर चोरी के पैसों से अपने घर का खर्च चलाता रहा, उस समय चांदी का एक रुपया आज के 2-3 सौ से ज्यादा कीमत का था. अमीर के घर में पत्नी और एक बेटी थी, बिना काम किए अमीर को घर बैठे आराम से खाना मिल रहा था. उस ने सोचा, पेश हो कर अपने लिए क्यों झंझट पैदा करे, हो सकता है उसे जेल में डाल दिया जाए.

उस की पत्नी ने माला को साधारण समझ कर एक मिट्टी की डोली में डाल रखा था. एक दिन उस ने उस माला के 2 मोती निकाले और पास के एक सुनार के पास गई. उस ने सुनार से कहा कि उस की बेटी के लिए 2 बालियां बना दे और उन में एक मोती डाल दे. सुनार ने उन मोतियों को देख कर अमीर की पत्नी से कहा, ‘‘यह मोती तो बहुत कीमती हैं. तुम्हें ये कहां से मिले?’’

उस ने झूठ बोलते हुए कहा, ‘‘मेरा पति गांव के तालाब की मिटटी खोद रहा था, ये मोती मिट्टी में निकले हैं. मैं ने सोचा बेटी के लिए बालियां बनवा कर उस में ये मोती डाल दूं, इसलिए तुम्हारे पास आई हूं.’’ सुनार ने उस की बातों पर यकीन कर के बालियां बना दीं. उस ने अपनी बेटी के कानों में बालियां पहना दीं.
दुर्भाग्य से एक दिन अमीर की बेटी अपने घर के पास बैठी रो रही थी. तभी एक सिपाही जो किसी केस की तफ्तीश के लिए नंबरदार के पास जा रहा था, उस ने रास्ते में अमीर के घर के सामने लड़की को रोते हुए देखा. देख कर ही वह समझ गया कि किसी गरीब की बच्ची है, मां इधरउधर गई होगी. इसलिए रो रही होगी.

लेकिन जब उस की नजर बच्ची के कानों पर पड़ी तो चौंका. उस की बालियों में मोती चमक रहे थे. उसे लगा कि वे साधारण मोती नहीं हैं. उस ने नंबरदार से पूछा कि यह किस की लड़की है. उस ने बता दिया कि वह अमीर की लड़की है, जो दस नंबरी है.

हवलदार को कुछ शक हुआ. उस ने पास जा कर मोतियों को देखा तो वे मोती फोटो वाली उस माला से मिल रहे थे. जो थाने में आया था.

उस ने अमीर को बुलवा कर कहा कि वह बच्ची की बालियां थाने ले जा रहा है, जल्दी ही वापस कर लौटा देगा. थाने ले जा कर उस ने चैक किया तो वे मोती मेम साहब की माला के निकले. अमीर पहले से ही संदिग्ध था, नंबरी भी. उसे थाने बुलवा कर पूछा गया कि ऊपर से 10 मोती उसे कहां से मिले. सब सचसच बता दे, नहीं तो मारमार कर हड्डी पसली एक कर दी जाएगी.
पहले तो अमीर थानेदार को इधरउधर की बातों से उलझाता रहा, लेकिन जब उसे लगा कि बिना बताए छुटकारा नहीं मिलेगा तो उस ने पूरी सचाई उगल दी. उस के घर से माला भी बरामद कर ली गई.
थानेदार बहुत खुश था कि उस ने बहुत बड़ा केस सुलझा लिया है, अब उस की पदोन्नति भी होगी और इनाम भी मिलेगा. अमीर को एसपी रावलपिंडी के सामने पेश किया गया. साथ ही डिप्टी कमिश्नर को सूचना दी गई कि मेम साहब की माला मिल गई है.

डीसी और मेम साहब ने उन्हें तलब कर लिया. मेम साहब ने माला को देख कर कहा कि माला उन्हीं की है. डिप्टी कमिश्नर ने अमीर के हुलिए को देख कर कहा कि यह चोर वह नहीं हो सकता, जिस ने उन के बंगले पर चोरी की है. क्योंकि उस जैसे आदमी की इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि माला गले से उतार कर ले जाए.

एसपी ने अमीर से कहा कि अपने मुंह से साहब को पूरी कहानी सुनाए. अमीर ने पूरी कहानी सुनाई और बीचबीच में सवालों के जवाब भी देता रहा. उस ने यह भी बताया कि सोते में मेम साहब ने अपनी गरदन पर हाथ भी फेरा था. डिप्टी कमिश्नर ने उस की कहानी सुन कर यकीन कर लिया, साथ ही हैरत भी हुई.
उन्होंने कहा, ‘‘तुम ने हमें बहुत परेशान किया है, अगर तुम उसी समय हमारे पास आ जाते तो हमें बहुत खुशी होती, लेकिन हम चूंकि वादा कर चुके हैं, इसलिए तुम्हें तंग नहीं किया जाएगा. हम तुम्हें सलाह देते हैं कि बाकी की जिंदगी शरीफों की तरह गुजारो.’’

अमीर ने वादा किया कि अब वह कभी चोरी नहीं करेगा. वह एक साधू का चेला बन गया और उस की बात पर अमल करने लगा. लेकिन कहते हैं कि चोर चोरी से जाए, पर हेराफेरी से नहीं जाता. वह छोटीमोटी चोरी फिर भी करता रहा. धीरेधीरे उस में शराफत आती गई. Hindi Kahani

Best Hindi Story: नाक – जब रूपबाई फंसी बेइज्जती के दलदल में

Best Hindi Story: मां की बात सुन कर रूपबाई ठगी सी खड़ी रह गई. उसे अपने पैरों के नीचे से धरती खिसकती नजर आई. उस के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला. रूपबाई ने तो समझा था कि यह बात सुन कर मां उस की मदद करेगी, समाज में फैली गंदी बातों से, लोगों से लड़ने के लिए उस का हौसला बढ़ाएगी और जो एक नई परेशानी उस के पेट में पल रहे बच्चे की है, उस का कोई सही हल निकालेगी. पर मां ने तो उस से सीधे मुंह बात तक नहीं की. उलटे लाललाल आंखें निकाल कर वे चीखीं, ‘‘किसी कुएं में ही डूब मरती. बापदादा की नाक कटा कर इस पाप को पेट में ले आई है, नासपीटी.’’

मां की बातें सुन कर रूपबाई जमीन पर बैठ गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए. उसे केवल मां का ही सहारा था और मां ही उस से इस तरह नफरत करने लगेंगी, तो फिर कौन उस का अपना होगा इस घर में.

पिताजी तो उसी रामेश्वर के रिश्तेदार हैं, जिस ने जबरदस्ती रूपबाई की यह हालत कर दी. अगर पिताजी को पता चल गया, तो न जाने उस के साथ क्या सुलूक करेंगे. रूपबाई की मां सोनबाई जलावन लेने खेत में चली गई. रूपबाई अकेली घर के आंगन में बैठी आगे की बातों से डर रही थी. हर पल उस की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उस की आंखों में आंसू भर आए थे. मन हो रहा था कि वह आज जोरजोर से रो कर खुद को हलका कर ले.

रामेश्वर रूपबाई का चाचा था. वह और रामेश्वर चारा लाने रोज सरसों के खेत में जाते थे. रामेश्वर चाचा की नीयत अपनी भतीजी पर बिगड़ गई और वह मौके की तलाश में रहने लगा.

एक दिन सचमुच रामेश्वर को मौका मिल गया. उस दिन आसपास के खेतों में कोई नहीं था. रामेश्वर ने मौका देख कर सरसों के पत्ते तोड़ती रूपबाई को जबरदस्ती खेत में पटक दिया. वह गिड़गिड़ाती रही और सुबकती रही, पर वह नहीं माना और उसे अपनी हवस का शिकार बना कर ही छोड़ा. घर आने के बाद रूपबाई के मन में तो आया कि वह मां और पिताजी को साफसाफ सारी बातें बता दे, पर बदनामी के डर से चुप रह गई.

इस के बाद रामेश्वर रोज जबरदस्ती उस के साथ मुंह काला करने लगा. इस तरह चाचा का पाप रूपबाई के पेट में आ गया.

कुछ दिन बाद रूपबाई ने महसूस किया कि उस का पेट बढ़ने लगा है. मशीन से चारा काटते समय उस ने यह बात रामेश्वर को भी बताई, ‘‘तू ने जो किया सो किया, पर अब कुछ इलाज भी कर.’’

‘‘क्या हो गया?’’ रामेश्वर चौंका. ‘‘मेरे पेट में तेरा बच्चा है.’’

‘‘क्या…?’’ ‘‘हां…’’

‘‘मैं तो कोई दवा नहीं जानता, अपनी किसी सहेली से पूछ ले.’’ अपनी किसी सहेली को ऐसी बात बताना रूपबाई के लिए खतरे से खाली नहीं था. हार कर उस ने यह बात अपनी मां को ही बता दी, पर मां उसे हिम्मत देने के बजाय उलटा डांटने लगीं.

शाम को रूपबाई का पिता रतन सिंह काम से वापस आ गया. वह दूर पहाड़ी पर काम करने जाता था. आते ही वह चारपाई पर बैठ गया. उसे देख कर रूपबाई का पूरा शरीर डर के मारे कांप रहा था. खाना खाने के बाद सोनबाई ने सारी बातें अपने पति को बता दीं.

यह सुन कर रतन सिंह की आंखें अंगारों की तरह दहक उठीं. वह चिल्लाया, ‘‘किस का पाप है तेरे पेट में?’’

‘‘तुम्हारे भाई का.’’ ‘‘रामेश्वर का?’’

‘‘हां, रामेश्वर का. तुम्हारे सगे भाई का,’’ सोनबाई दबी जबान में बोली. ‘‘अब तक क्यों नहीं बताया?’’

‘‘शर्म से नहीं बताया होगा, पर अब तो बताना जरूरी हो गया है.’’ इस बात पर रतन सिंह का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ, फिर उस ने पूछा, ‘‘अब…?’’

‘‘अब क्या… किसी को पता चल गया, तो पुरखों की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी.’’ ‘‘फिर…?’’

‘‘फिर क्या, इसे जहर दे कर मार डालो. गोली मेरे पास रखी हुई है.’’ ‘‘और रामेश्वर…’’

‘‘उस से कुछ मत कहो. वह तो मर्द है. लड़की मर जाए, तो क्या जाता है? ‘‘अगर दोनों को जहर दोगे, तो सब को पता चल जाएगा कि दाल में कुछ काला है.’’

‘‘तो बुला उसे.’’ सोनबाई उठी और दूसरे कमरे में सो रही रूपबाई को बुला लाई. वह आंखें झुकाए चुपचाप बाप की चारपाई के पास आ कर खड़ी हो गई.

रतन सिंह चारपाई पर बैठ गया. रूपबाई उस के पैरों पर गिर कर फफक कर रो पड़ी. रतन सिंह ने उस की कनपटी पर जोर से एक थप्पड़ मारते हुए कहा, ‘‘अब घडि़याली आंसू मत बहा. एकदम चुप हो जा और चुपचाप जहर की इस गोली को खा ले.’’

यह सुन कर रूपबाई का गला सूख गया. उसे अपने पिता से ऐसी उम्मीद नहीं थी. वह थरथर कांप उठी और अपने बाएं हाथ को कनपटी पर फेरती रह गई. झन्नाटेदार थप्पड़ से उस का सिर चकरा गया था. रात का समय था. सारा गांव सन्नाटे में डूबा हुआ था. अपनेअपने कामों से थकेहारे लोग नींद के आगोश में समाए हुए थे.

गांव में सिर्फ उन तीनों के अलावा एक रामेश्वर ही था, जो जाग रहा था. वह दूसरे कमरे में चुपचाप सारी बातें सुन रहा था. पिता की बात सुन कर कुछ देर तक तो रूपबाई चुप रही, फिर बोली, ‘‘जहर की गोली?’’

तभी उस की मां चीखी, ‘‘हां… और क्या कुंआरी ही बच्चा जनेगी? तू ने नाक काट कर रख दी हमारी. अगर ऐसा काम हो गया था, तो किसी कुएं में ही कूद जाती.’’ ‘‘मगर इस में मेरी क्या गलती है? गलती तो रामेश्वर चाचा की है. मैं उस के पैर पड़ी थी, खूब आंसू रोई थी, लेकिन वह कहां माना. उस ने तो जबरदस्ती…’’

‘‘अब ज्यादा बातें मत बना…’’ रतन सिंह गरजा, ‘‘ले पकड़ इस गोली को और खा जा चुपचाप, वरना गरदन दबा कर मार डालूंगा.’’ रूपबाई समझ गई कि अब उस का आखिरी समय नजदीक है. फिर शर्म या झिझक किस बात की? क्यों न हिम्मत से काम ले?

वह जी कड़ा कर के बोली, ‘‘मैं नहीं खाऊंगी जहर की गोली. खिलानी है, तो अपने भाई को खिलाओ. तुम्हारी नाक तो उसी ने काटी है. उस ने जबरदस्ती की थी मेरे साथ, फिर उस के किए की सजा मैं क्यों भुगतूं?’’ ‘‘अच्छा, तू हमारे सामने बोलना भी सीख गई है?’’ कह कर रतन सिंह ने उस के दोनों हाथ पकड़ कर उसे चारपाई पर पटक दिया.

सोनबाई रस्सी से उस के हाथपैर बांधने लगी. रूपबाई ने इधरउधर भागने की कोशिश की, चीखीचिल्लाई, पर सब बेकार गया. उस बंद कोठरी में उस की कोई सुनने वाला नहीं था. जब रूपबाई के हाथपैर बंध गए, तो वह अपने पिता से गिड़गिड़ाते हुए बोली, ‘‘मुझे मत मारिए पिताजी, मैं आप के पैर पड़ती हूं. मेरी कोई गलती नहीं है.’’

मगर रतन सिंह पर इस का कोई असर नहीं हुआ. रूपबाई छटपटाती रही. रस्सी से छिल कर उस की कलाई लहूलुहान हो गई थी. वह भीगी आंखों से कभी मां की ओर देखती, तो कभी पिता की ओर.

अचानक रतन सिंह ने रूपबाई के मुंह में जहर की गोली डाल दी. लेकिन उस ने जोर लगा कर गोली मुंह से बाहर फेंक दी. गोली सीधी रतन सिंह की नाक से जा टकराई. वह गुस्से से तमतमा गया. उस ने रूपबाई के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया. रूपबाई के गाल पर हाथ का निशान छप गया. उस का सिर भन्ना उठा. वह सोचने लगी, ‘आदमी इतना निर्दयी क्यों हो जाता है? वहां मेरे साथ जबरदस्ती बलात्कार किया गया और यहां इस पाप को छिपाने के लिए जबरदस्ती मारा जा रहा है. अब तो मर जाना ही ठीक रहेगा.’

मरने की बात सोचते ही रूपबाई की आंखों में आंसू भर आए. आंसुओं पर काबू पाते हुए वह चिल्लाई, ‘‘पिताजी, डाल दो गोली मेरे मुंह में, ताकि मेरे मरने से तुम्हारी नाक तो बच जाए.’’ रतन सिंह ने उस के मुंह में गोली डाल दी. वह उसे तुरंत निगल गई. पहले उसे नशा सा आया और फिर जल्दी ही वह हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गई.

रतन सिंह और सोनबाई ने उस के हाथपैर खोले और उस की लाश को दूसरे कमरे में रख दिया. सारी रात खामोशी रही. रामेश्वर बगल के कमरे में अपने किए के लिए खुद से माफी मांगता रहा.

सुबह होते ही रतन सिंह और सोनबाई चुपके से रूपबाई के कमरे में गए और दहाड़ें मार कर रोने लगे. रामेश्वर भी अपने कमरे से निकल आया. फिर वे तीनों रोने लगे. रोनेधोने की आवाज सुन कर आसपास के लोग इकट्ठा हो गए कि क्या हो गया?

‘‘कोई सांप डस गया मेरी बच्ची को,’’ सोनबाई ने छाती पीटते हुए कहा और फिर वह दहाड़ें मार कर रो पड़ी. Best Hindi Story

Best Hindi Kahani: बह गया जहर – एक माफी को तरसता अमर

Best Hindi Kahani: रात के 9 बज रहे थे. बाहर हो रही तेज बारिश से बेपरवाह अमर अपने कमरे में चुपचाप बैठा था. दीवार पर उस की पत्नी शोभना और उस का फोटो टंगा था जिस पर अमर ने किसी की न सुनते हुए माला लगा दी थी. उस का कहना था कि शोभना के साथ वह भी मर चुका है.

आज घर तकरीबन खाली था. ज्यादातर सदस्य और अमर का 4 साल का बेटा रोहित किसी रिश्तेदार की शादी में बाहर गए हुए थे और अगले दिन शाम तक लौटने की बात थी. केवल अमर की भाभी मुग्धा अपने 9 महीने के बेटे विक्की के साथ यहीं रुक गई थी. आखिर उसे अपने जेठ अमर का खयाल भी तो रखना था.

मुग्धा अपनी जिम्मेदारियां अच्छी तरह समझती थी. उसे अमर से एक खास लगाव था. अमर का हमेशा अपनों की मदद के लिए खड़े हो जाने वाला रवैया उस के दिल में अमर को खास जगह दिला चुका था.

अमर के यों तनाव में जाने से सब से ज्यादा वही दुखी थी. 2 दिन पहले अमर के पैर में चोट लगी थी और डाक्टर ने रात को नींद की गोली और पेन किलर खाने को दी थी.

गोलियां खाने के बाद उस ने मुग्धा की दी हुई सर्दीखांसी की दवा भी ली और कुछ देर तक शोभना और अपनी तसवीर के सामने भरी आंखें ले कर खड़ा रहा.

उसे शोभना की याद आज कुछ ज्यादा ही सताने लगी थी. जब भी उस की तबीयत बिगड़ती थी तो शोभना सब काम छोड़ कर उस की सेवा में लग जाती थी.

‘आज मेरा खयाल नहीं रखोगी शोभना?’ जैसे अमर के मन ने कहा. खुद को समझाने की कोशिश करते हुए अमर ने पालने में सो रहे विक्की के सिर पर हाथ फेरा और बिस्तर पर लेट गया. दवाओं की वजह से उस की खुमारी बढ़ गई थी.

गहरी नींद की हालत में अमर न जाने क्या अनापशनाप बड़बड़ाए जा रहा था, तभी उस का हाथ किसी चीज से टकराया और कुछ गिरने की आवाज आई. शायद वह पानी का जग था. मगर अमर की आंखें खुल नहीं सकीं. तभी उसे लगा कि शोभना उसे बुला रही है. अमर का कलेजा गरम हो उठा. उस की सांसें तेज हो गईं. उसे जितना पता चल सका, उस के मुताबिक शोभना बिलकुल उस के करीब खड़ी थी. उस ने उसे बुलाना चाहा.

‘‘शोभना…’’ टूटीफूटी आवाज उस के गले से निकल सकी. अमर को महसूस हुआ कि शोभना ने उस के सिर पर हाथ फेरा लेकिन वह वापस जाने लगी. अमर ने किसी तरह उस का हाथ पकड़ लिया और बुरी तरह रो पड़ा, ‘‘नहींनहीं शोभना… अब मत जाओ मुझ से दूर… मैं मर जाऊंगा… शोभना…’’

अमर की आंखें अब भी बंद थीं. उस ने अनुभव किया कि शोभना ने उस के आंसू पोंछे और उस के बगल में लेट गई. अमर उस से लिपटता चला गया. उसे कहीं न कहीं लग रहा था कि वह सपना देख रहा है जो उस की नींद के साथ ही टूट जाएगा. उस के दिल में जमा प्यार बाहर आने को बेताब हो उठा. उस ने एकएक कर उन के बीच पड़ने वाली हर दीवार तोड़ दी. उस के हाथ शोभना के जिस्म को सहलाने, दबाने लगे.

इस के बाद शोभना की कोमल उंगलियों की छुअन अमर को अपनी पीठ पर मिलने लगी. अरसे से अमर के अंदर भरा दहकता लावा रहरह के बह पड़ता. 1, 2, 3… न जाने कितनी बार अमर अपना सबकुछ शोभना पर लुटाता रहा.

शोभना अमर के शरीर से दबी पिसती रही. अमर को किसी बात का डर सता रहा था तो बस अपने जागने का लेकिन समय कब किसी के रोके रुका है.

सुबह की रोशनी खिड़की से कमरे में आने लगी. साथ ही, अमर की चेतना भी. तभी उसे अपनी बांहों में कैद किसी असली औरत की देह महसूस हुई. उस ने चौंक कर आंखें खोलीं तो देखा कि उस ने मुग्धा को ही अपने आगोश में ले रखा था. दोनों में से किसी के बदन पर एक भी कपड़ा नहीं.

अमर को तो जैसे बिजली का तेज झटका लगा. वह छिटक कर मुग्धा से दूर कमरे के कोने में जा खड़ा हुआ.

‘‘मुग्धा… यह सब… क्या हुआ… मैं ने कैसे कर दिया…’’ कहता हुआ अमर उसी हालत में अपना सिर पकड़ कर वहीं जमीन पर बैठ गया. उस का दिल बेतहाशा धड़कने लगा. पास ही पालने में विक्की इस सब से निश्चिंत सो रहा था. पास में उस के दूध की खाली बोतल पड़ी थी. जमीन पर पानी का वही जग गिरा हुआ था जो रात उस के हाथ से टकराया था.

कुछ पलों तक यह सब देखते रहने के बाद मुग्धा धीरेधीरे खुद को संभालते हुए उठी और बिस्तर पर पड़ी साड़ी अपने शरीर से लपेट कर वहां से चली गई.

अमर उसी हालत में वहीं बैठा था. उस का दिमाग काम नहीं कर रहा था. रात का नशा अब तक हावी था. सो, वह चुपचाप मुग्धा के अगले कदम का इंतजार करने लगा. समाज के सामने लगने वाला बदनामी का धब्बा उसे अपने माथे पर महसूस हो रहा था और कानों में मातापिता और भाई विक्रम द्वारा कहे जाने वाले शब्द गूंजने लगे जो सारी बात जानने के बाद कहेंगे ‘पापी, बेहया, कर दिया न सारे खानदान का नाम खराब.

‘कितना समझाते रहे हम सब इसे, लेकिन सुने कौन? बीवी क्या किसी और की मरती है. एक इसी की स्पैशल बीवी मरी थी जो भाभी के साथ सोना पड़ गया नशे में…’

अमर के हाथ अपने कानों पर जमते गए तभी उसे मुग्धा की आवाज सुनाई दी, ‘‘अमर, मैं फ्रैश होने जा रही हूं, आप भी हो लीजिए, नाश्ता तुरंत बन जाएगा.’’

अमर उस की तरफ देखने की हिम्मत नहीं जुटा सका. मुग्धा के जाने के बाद वह भी फ्रैश होने चला गया. नाश्ता परोसते समय मुग्धा का चेहरा सामान्य था, लेकिन अमर अपनी नजरें नीची किए रहा और आज समय पर अपनी दुकान के लिए निकल गया.

शोभना के गुजरने के बाद से उस का दुकान पर जाना अनियमित सा हो गया था. आज भी वहां जाने का मकसद कमाई न हो कर मुग्धा के सामने से हटा रहना था.

शाम होने को आई. दोपहर के खाने के लिए भी अमर घर नहीं लौटा. पापा का फोन आया कि वे लोग लौट आए हैं.

अमर का दिमाग फिर सन्नसन्न करने लगा. रात को विक्रम का फोन आने पर वह घर के लिए चला.

घर आते ही रोहित उस से लिपट गया. अमर सब से नजरें चुरा रहा था लेकिन घर का माहौल बिलकुल सही लगा.

उस रात नींद आंखों से दूर रही. इसी तरह तकरीबन पूरा हफ्ता बीत गया. अमर का मन अपनी उस रात की गलती के लिए कचोटता रहता था.

एक शाम उस ने मौका पा कर छत पर मुग्धा को बुलाया और सिर झुका कर कहने लगा, ‘‘मुग्धा, मैं बहुत कमजोर निकला. मैं इस घर के हर सदस्य के साथसाथ शोभना का भी अपराधी हूं. मेरी कमजोरी मुझे किसी से कुछ कहने नहीं दे रही, लेकिन मैं जानता हूं कि तुम कमजोर नहीं हो, तुम चुप मत रहो, सच बता दो सब को, मुझे सजा मिलनी ही चाहिए.’’

मुग्धा गौर से अमर को देखती रही, फिर मुसकरा कर बोली, ‘‘अमर, बीमारी तन की हो या मन की, वह केवल कमजोर करना ही जानती है. शोभना दीदी के जाने के बाद आप का मन बीमार हो गया था. आप टूटते जा रहे थे. उस रात मैं ने महसूस किया कि आप के अंदर के मर्द को एक औरत के सहारे की जरूरत है.’’

अमर अब तक अपना सिर उठा नहीं पाया था. मुग्धा कहती रही, ‘‘मेरे अंदर की औरत आप को वह सहारा देने से खुद को रोक नहीं पाई. आप के अंदर मैं ने हमेशा अपना बड़ा भाई, कभी पिता, तो कभी दोस्त देखा है. इस के साथसाथ मैं ने अकसर आप के अंदर अपने प्रेमी को भी देखा, प्रेम किसी शरीर पर आश्रित नहीं होता, उस की सीमा अनंत होती है.’’

इतना कह कर मुग्धा ने अमर का चेहरा पकड़ कर उस की आंखों में आंखें डालीं और कहा, ‘‘मर्द टूटा हुआ और कमजोर अच्छा नहीं लगता, फिर आप तो मेरे कंप्लीट मैन हैं. आप को जोड़ने के लिए मैं ने अपना थोड़ा सा कुछ हिस्सा न्योछावर कर दिया, अब मेरा मान रखिए.’’

‘‘लेकिन, मुग्धा…’’ अमर ने कुछ कहना चाहा, लेकिन मुग्धा ने उसे रोक दिया और बोली, ‘‘आप यही कहना चाहते हैं न कि जब आप के छोटे भाई को यह सब पता चलेगा तो क्या होगा? इस का जवाब यही है कि मैं अपने पति की थी, हूं और हमेशा उन्हीं की रहूंगी, आप के और मेरे बीच जो भी हुआ, वह एक बिखरी हुई जिंदगी को जोड़ने की मेरी कोशिश थी, कोई दैहिक खिंचाव नहीं…

‘‘हां, यह भी सच है कि मेरी यह भावना शायद हर कोई न समझ सके, इसलिए उस रात की बात दीवारों के दायरे में ही रहने दीजिए.’’

इतना कह कर मुग्धा नीचे को चल पड़ी. अमर के मन में भरा तनाव का जहर आंखों के रास्ते बाहर बहने लगा. Best Hindi Kahani

Best Hindi Kahani: शिकार – काव्या के लिए रंजन की नफरत

Best Hindi Kahani: वह एक बार फिर उस के सामने खड़ा था. लंबाचौड़ा काला भुजंग. आंखों से झांकती भूख. एक ऐसी भूख जिसे कोई भी औरत चुटकियों में ताड़ जाती है. उस आदमी के लंबेचौड़े डीलडौल से उस की सही उम्र का पता नहीं लगता था, पर उस की उम्र 30 से 40 साल के बीच कुछ भी हो सकती थी.

वहीं दूसरी ओर काव्या गोरीचिट्टी, छरहरे बदन की गुडि़या सी दिखने वाली एक भोलीभाली, मासूम सी लड़की थी. मुश्किल से अभी उस ने 20वां वसंत पार किया होगा. कुछ महीने पहले दुख क्या होता है, तकलीफ कैसी होती है, वह जानती तक न थी.

मांबाप के प्यार और स्नेह की शीतल छाया में काव्या बढि़या जिंदगी गुजार रही थी, पर दुख की एक तेज आंधी आई और उस के परिवार के सिर से प्यार, स्नेह और सुरक्षा की वह पिता रूपी शीतल छाया छिन गई.

अभी काव्या दुखों की इस आंधी से अपने और अपने परिवार को निकालने के लिए जद्दोजेहद कर ही रही थी कि एक नई समस्या उस के सामने आ खड़ी हुई.

उस दिन काव्या अपनी नईनई लगी नौकरी पर पहुंचने के लिए घर से थोड़ी दूर ही आई थी कि उस आदमी ने उस का रास्ता रोक लिया था.

एकबारगी तो काव्या घबरा उठी थी, फिर संभलते हुए बोली थी, ‘‘क्या है?’’

वह उसे भूखी नजरों से घूर रहा था, फिर बोला था, ‘‘तू बहुत ही खूबसूरत है.’’

‘‘क्या मतलब…?’’ उस की आंखों से झांकती भूख से डरी काव्या कांपती आवाज में बोली.

‘‘रंजन नाम है मेरा और खूबसूरत चीजें मेरी कमजोरी हैं…’’ उस की हवस भरी नजरें काव्या के खूबसूरत चेहरे और भरे जिस्म पर फिसल रही थीं, ‘‘खासकर खूबसूरत लड़कियां… मैं जब भी उन्हें देखता हूं, मेरा दिल उन्हें पाने को मचल उठता है.’’

‘‘क्या बकवास कर रहे हो…’’ अपने अंदर के डर से लड़ती काव्या कठोर आवाज में बोली, ‘‘मेरे सामने से हटो. मुझे अपने काम पर जाना है.’’

‘‘चली जाना, पर मेरे दिल की प्यास तो बुझा दो.’’

काव्या ने अपने चारों ओर निगाह डाली. इक्कादुक्का लोग आजा रहे थे. लोगों को देख कर उस के डरे हुए दिल को थोड़ी राहत मिली. उस ने हिम्मत कर के अपना रास्ता बदला और रंजन से बच कर आगे निकल गई.

आगे बढ़ते हुए भी उस का दिल बुरी तरह धड़क रहा था. ऐसा लगता था जैसे रंजन आगे बढ़ कर उसे पकड़ लेगा.

पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. उस ने कुछ दूरी तय करने के बाद पीछे मुड़ कर देखा. रंजन को अपने पीछे न पा कर उस ने राहत की सांस ली.

काव्या लोकल ट्रेन पकड़ कर अपने काम पर पहुंची, पर उस दिन उस का मन पूरे दिन अपने काम में नहीं लगा. वह दिनभर रंजन के बारे में ही सोचती रही. जिस अंदाज से उस ने उस का रास्ता रोका था, उस से बातें की थीं, उस से इस बात का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था कि रंजन की नीयत ठीक नहीं थी.

शाम को घर पहुंचने के बाद भी काव्या थोड़ी डरी हुई थी, लेकिन फिर उस ने यह सोच कर अपने दिल को हिम्मत बंधाई कि रंजन कोई सड़कछाप बदमाश था और वक्ती तौर पर उस ने उस का रास्ता रोक लिया था.

आगे से ऐसा कुछ नहीं होने वाला. लेकिन काव्या की यह सोच गलत साबित हुई. रंजन ने आगे भी उस का रास्ता बारबार रोका. कई बार उस की इस हरकत से काव्या इतनी परेशान हुई कि उस का जी चाहा कि वह सबकुछ अपनी मां को बता दे, लेकिन यह सोच कर खामोश रही कि इस से पहले से ही दुखी उस की मां और ज्यादा परेशान हो जाएंगी. काश, आज उस के पापा जिंदा होते तो उसे इतना न सोचना पड़ता.

पापा की याद आते ही काव्या की आंखें नम हो उठीं. उन के रहते उस का परिवार कितना खुश था. मम्मीपापा और उस का एक छोटा भाई. कुल 4 सदस्यों का परिवार था उस का.

उस के पापा एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करते थे और उन्हें जो पैसे मिलते थे, उस से उन का परिवार मजे में चल रहा था. जहां काव्या अपने पापा की दुलारी थी, वहीं उस की मां उस से बेहद प्यार करती थीं.

उस दिन काव्या के पापा अपनी कंपनी के काम के चलते मोटरसाइकिल से कहीं जा रहे थे कि पीछे से एक कार वाले ने उन की मोटरसाइकिल को तेज टक्कर मार दी.

वे मोटरसाइकिल से उछले, फिर सिर के बल सड़क पर जा गिरे. उस से उन के सिर के पिछले हिस्से में बेहद गंभीर चोट लगी थी.

टक्कर लगने के बाद लोगों की भीड़ जमा हो गई. भीड़ के दबाव के चलते कार वाले ने उस के घायल पापा को उठा कर नजदीक के एक निजी अस्पताल में भरती कराया, फिर फरार हो गया.

पापा की जेब से मिले आईकार्ड पर लिखे मोबाइल से अस्पताल वालों ने जब उन्हें फोन किया तो वे बदहवास अस्पताल पहुंचे, पर वहां पहुंच कर उन्होंने जिस हालत में उन्हें पाया, उसे देख कर उन का कलेजा मुंह को आ गया.

उस के पापा कोमा में जा चुके थे. उन की आंखें तो खुली थीं, पर वे किसी को पहचान नहीं पा रहे थे.

फिर शुरू हुआ मुश्किलों का न थमने वाला एक सिलसिला. डाक्टरों ने बताया कि पापा के सिर का आपरेशन करना होगा. इस का खर्च उन्होंने ढाई लाख रुपए बताया.

किसी तरह रुपयों का इंतजाम किया गया. पापा का आपरेशन हुआ, पर इस से कोई खास फायदा न हुआ. उन्हें विभिन्न यंत्रों के सहारे एसी वार्ड में रखा गया था, जिस की एक दिन की फीस 10,000 रुपए थी.

धीरेधीरे घर का सारा पैसा खत्म होने लगा. काव्या की मां के गहने तक बिक गए, फिर नौबत यहां तक आई कि उन के पास के सारे पैसे खत्म हो गए.

बुरी तरह टूट चुकी काव्या की मां जब अपने बच्चों को यों बिलखते देखतीं तो उन का कलेजा मुंह को आ जाता, पर अपने बच्चों के लिए वे अपनेआप को किसी तरह संभाले हुए थीं. कभीकभी उन्हें लगता कि पापा की हालत में सुधार हो रहा है तो उन के दिल में उम्मीद की किरण जागती, पर अगले ही दिन उन की हालत बिगड़ने लगती तो यह आस टूट जाती.

डेढ़ महीना बीत गया और अब ऐसी हालत हो गई कि वे अस्पताल के एकएक दिन की फीस चुकाने में नाकाम होने लगे. आपस में रायमशवरा कर उन्होंने पापा को सरकारी अस्पताल में भरती कराने का फैसला किया.

पापा को ले कर सरकारी अस्पताल गए, पर वहां बैड न होने के चलते उन्हें एक रात बरामदे में गुजारनी पड़ी. वही रात पापा के लिए कयामत की रात साबित हुई. काव्या के पापा की सांसों की डोर टूट गई और उस के साथ ही उम्मीद की किरण हमेशा के लिए बुझ गई.

फिर तो उन की जिंदगी दुख, पीड़ा और निराशा के अंधकार में डूबती चली गई. तब तक काव्या एमबीए का फाइनल इम्तिहान दे चुकी थी.

बुरे हालात को देखते हुए और अपने परिवार को दुख के इस भंवर से निकालने के लिए काव्या नौकरी की तलाश में निकल पड़ी. उसे एक प्राइवेट बैंक में 20,000 रुपए की नौकरी मिल गई और उस के परिवार की गाड़ी खिसकने लगी. तब उस के छोटे भाई की पढ़ाई का आखिरी साल था. उस ने कहा कि वह भी कोई छोटीमोटी नौकरी पकड़ लेगा, पर काव्या ने उसे सख्ती से मना कर दिया और उस से अपनी पढ़ाई पूरी करने को कहा.

20 साल की उम्र में काव्या ने अपने नाजुक कंधों पर परिवार की सारी जिम्मेदारी ले ली थी, पर इसे संभालते हुए कभीकभी वह बुरी तरह परेशान हो उठती और तब वह रोते हुए अपनी मां से कहती, ‘‘मम्मी, आखिर पापा हमें छोड़ कर इतनी दूर क्यों चले गए जहां से कोई वापस नहीं लौटता,’’ और तब उस की मां उसे बांहों में समेटते हुए खुद रो पड़तीं.

धीरेधीरे दुख का आवेग कम हुआ और फिर काव्या का परिवार जिंदगी की जद्दोजेहद में जुट गया.

समय बीतने लगा और बीतते समय के साथ सबकुछ एक ढर्रे पर चलने लगा तभी यह एक नई समस्या काव्या के सामने आ खड़ी हुई.

काव्या जानती थी कि बड़ी मुश्किल से उस की मां और छोटे भाई ने उस के पापा की मौत का गम सहा है. अगर उस के साथ कुछ हो गया तो वे यह सदमा सहन नहीं कर पाएंगे और उस का परिवार, जिसे संभालने की वह भरपूर कोशिश कर रही है, टूट कर बिखर जाएगा.

काव्या ने इस बारे में काफी सोचा, फिर इस निश्चय पर पहुंची कि उसे एक बार रंजन से गंभीरता से बात करनी होगी. उसे अपनी जिंदगी की परेशानियां बता कर उस से गुजारिश करनी होगी

कि वह उसे बख्श दे. उम्मीद तो कम थी कि वह उस की बात समझेगा, पर फिर भी उस ने एक कोशिश करने का मन बना लिया.

अगली बार जब रंजन ने काव्या का रास्ता रोका तो वह बोली, ‘‘आखिर तुम मुझ से चाहते क्या हो? क्यों बारबार मेरा रास्ता रोकते हो?’’

‘‘मैं तुम्हें चाहता हूं,’’ रंजन उस के खूबसूरत चेहरे को देखता हुआ बोला, ‘‘मेरा यकीन करो. मैं ने जब से तुम्हें देखा है, मेरी रातों की नींद उड़ गई है. आंखें बंद करता हूं तो तुम्हारा खूबसूरत चेहरा सामने आ जाता है.’’

‘‘सड़क पर बात करने से क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम किसी रैस्टोरैंट में चल कर बात करें.’’

काव्या के इस प्रस्ताव पर पहले तो रंजन चौंका, फिर उस की आंखों में एक अनोखी चमक जाग उठी. वह जल्दी से बोला, ‘‘हांहां, क्यों नहीं.’’

रंजन काव्या को ले कर सड़क के किनारे बने एक रैस्टोरैंट में पहुंचा, फिर बोला, ‘‘क्या लोगी?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘कुछ तो लेना होगा.’’

‘‘तुम्हारी जो मरजी मंगवा लो.’’

रंजन ने काव्या और अपने लिए कौफी मंगवाईं और जब वे कौफी पी चुके तो वह बोला, ‘‘हां, अब कहो, तुम क्या कहना चाहती हो?’’

‘‘देखो, मैं उस तरह की लड़की नहीं हूं जैसा तुम समझते हो,’’ काव्या ने गंभीर लहजे में कहना शुरू किया, ‘‘मैं एक मध्यम और इज्जतदार परिवार से हूं, जहां लड़की की इज्जत को काफी अहमियत दी जाती है. अगर उस की इज्जत पर कोई आंच आई तो उस का और उस के परिवार का जीना मुश्किल हो जाता है.

‘‘वैसे भी आजकल मेरा परिवार जिस मुश्किल दौर से गुजर रहा है, उस में ऐसी कोई बात मेरे परिवार की बरबादी का कारण बन सकती है.’’

‘‘कैसी मुश्किलों का दौर?’’ रंजन ने जोर दे कर पूछा.

काव्या ने उसे सबकुछ बताया, फिर अपनी बात खत्म करते हुए बोली, ‘‘मेरी मां और भाई बड़ी मुश्किल से पापा की मौत के गम को बरदाश्त कर पाए हैं, ऐसे में अगर मेरे साथ कुछ हुआ तो मेरा परिवार टूट कर बिखर जाएगा…’’ कहतेकहते काव्या की आंखों में आंसू आ गए और उस ने उस के आगे हाथ जोड़ दिए, ‘‘इसलिए मेरी तुम से विनती है कि तुम मेरा पीछा करना छोड़ दो.’’

पलभर के लिए रंजन की आंखों में दया और हमदर्दी के भाव उभरे, फिर उस के होंठों पर एक मक्कारी भरी मुसकान फैल गई.

रंजन काव्या के जुड़े हाथ थामता हुआ बोला, ‘‘मेरी बात मान लो, तुम्हारी सारी परेशानियों का खात्मा हो जाएगा. मैं तुम्हें पैसे भी दूंगा और प्यार भी. तू रानी बन कर राज करेगी.’’

काव्या को समझते देर न लगी कि उस के सामने बैठा आदमी इनसान नहीं, बल्कि भेडि़या है. उस के सामने रोने, गिड़गिड़ाने और दया की भीख मांगने का कोई फायदा नहीं. उसे तो उसी की भाषा में समझाना होगा. वह मजबूरी भरी भाषा में बोली, ‘‘अगर मैं ने तुम्हारी बात मान ली तो क्या तुम मुझे बख्श दोगे?’’

‘‘बिलकुल,’’ रंजन की आंखों में तेज चमक जागी, ‘‘बस, एक बार मुझे अपने हुस्न के दरिया में उतरने का मौका दे दो.’’

‘‘बस, एक बार?’’

‘‘हां.’’

‘‘ठीक है,’’ काव्या ने धीरे से अपना हाथ उस के हाथ से छुड़ाया, ‘‘मैं तुम्हें यह मौका दूंगी.’’

‘‘कब?’’

‘‘बहुत जल्द…’’ काव्या बोली, ‘‘पर, याद रखो सिर्फ एक बार,’’ कहने के बाद काव्या उठी, फिर रैस्टोरैंट के दरवाजे की ओर चल पड़ी.

‘तुम एक बार मेरे जाल में फंसो तो सही, फिर तुम्हारे पंख ऐसे काटूंगा कि तुम उड़ने लायक ही न रहोगी,’ रंजन बुदबुदाया.

रात के 12 बजे थे. काव्या महानगर से तकरीबन 3 किलोमीटर दूर एक सुनसान जगह पर एक नई बन रही इमारत की 10वीं मंजिल की छत पर खड़ी थी. छत के चारों तरफ अभी रेलिंग नहीं बनी थी और थोड़ी सी लापरवाही बरतने के चलते छत पर खड़ा कोई शख्स छत से नीचे गिर सकता था.

काव्या ने इस समय बहुत ही भड़कीले कपड़े पहन रखे थे जिस से उस की जवानी छलक रही थी. इस समय उस की आंखों में एक हिंसक चमक उभरी हुई थी और वह जंगल में शिकार के लिए निकले किसी चीते की तरह चौकन्नी थी.

अचानक काव्या को किसी के सीढि़यों पर चढ़ने की आवाज सुनाई पड़ी. उस की आंखें सीढि़यों की ओर लग गईं.

आने वाला रंजन ही था. उस की नजर जब कयामत बनी काव्या पर पड़ी, तो उस की आंखों में हवस की तेज चमक उभरी. वह तेजी से काव्या की ओर लपका. पर उस के पहले कि वह काव्या के करीब पहुंचे, काव्या के होंठों पर एक कातिलाना मुसकान उभरी और वह उस से दूर भागी.

‘‘काव्या, मेरी बांहों में आओ,’’ रंजन उस के पीछे भागता हुआ बोला.

‘‘दम है तो पकड़ लो,’’ काव्या हंसते हुए बोली.

काव्या की इस कातिल हंसी ने रंजन की पहले से ही भड़की हुई हवस को और भड़का दिया. उस ने अपनी रफ्तार तेज की, पर काव्या की रफ्तार उस से कहीं तेज थी.

थोड़ी देर बाद हालात ये थे कि काव्या छत के किनारेकिनारे तेजी से भाग रही थी और रंजन उस का पीछा कर रहा था. पर हिरनी की तरह चंचल काव्या को रंजन पकड़ नहीं पा रहा था.

रंजन की सांसें उखड़ने लगी थीं और फिर वह एक जगह रुक कर हांफने लगा.

इस समय रंजन छत के बिलकुल किनारे खड़ा था, जबकि काव्या ठीक उस के सामने खड़ी हिंसक नजरों से उसे घूर रही थी.

अचानक काव्या तेजी से रंजन की ओर दौड़ी. इस से पहले कि रंजन कुछ समझ सके, उछल कर अपने दोनों पैरों की ठोकर रंजन की छाती पर मारी.

ठोकर लगते ही रंजन के पैर उखड़े और वह छत से नीचे जा गिरा. उस की लहराती हुई चीख उस सुनसान इलाके में गूंजी, फिर ‘धड़ाम’ की एक तेज आवाज हुई. दूसरी ओर काव्या विपरीत दिशा में छत पर गिरी थी.

काव्या कई पलों तक यों ही पड़ी रही, फिर उठ कर सीढि़यों की ओर दौड़ी. जब वह नीचे पहुंची तो रंजन को अपने ही खून में नहाया जमीन पर पड़ा पाया. उस की आंखें खुली हुई थीं और उस में खौफ और हैरानी के भाव ठहर कर रह गए थे. शायद उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की मौत इतनी भयानक होगी.

काव्या ने नफरत भरी एक नजर रंजन की लाश पर डाली, फिर अंधेरे में गुम होती चली गई. Best Hindi Kahani

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