इस स्कूल में लगती है ‘डीएम अंकल’ की पाठशाला

पटना के बांकीपुर स्कूल की लड़कियां सुबह से जोश में थीं और बारबार उन की निगाहें दरवाजे की ओर उठ जाती थीं. दोपहर के सवा एक बजे एक शख्स क्लासरूम में दाखिल हुए, जो किसी भी तरह से स्कूल के मास्टर नहीं लग रहे थे. दरअसल, वे शख्स थे पटना के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल. उन्होंने एक छात्रा खुशबू कुमारी की कौपी उठा कर पढ़ाईलिखाई के बारे में पूछा, तो उस ने कहा कि स्कूल में पढ़ाई नहीं होती है. डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल ने जब इस बारे में स्कूल प्रशासन से पूछा, तो पता चला कि वहां पर भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, भूगोल, हिंदी, उर्दू, टाइपिंग और संगीत के टीचर ही नहीं हैं. जब उन्होंने छात्राओं से पूछा कि वे कोचिंग क्यों जाती हैं, तो मासूम बच्चियों ने यह कह कर एक झटके में ऐजूकेशन सिस्टम की कलई खोल दी कि स्कूल में तो पढ़ाई होती ही नहीं है. सभी छात्राओं का यही दर्द था कि अगर वे कोचिंग नहीं करेंगी, तो कोर्स पूरा नहीं होगा.

बिहार की शिक्षा व्यवस्था से रूबरू होने के लिए पटना के कलक्टर संजय कुमार अग्रवाल 27 जनवरी, 2017 को एक सरकारी स्कूल में छात्राओं को पढ़ाने पहुंचे. उन्होंने पटना के तमाम सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए अफसरों की एक टीम बनाई है.

शिक्षा विभाग के सूत्र बताते हैं कि अफसर अपना काम तो ठीक से करते नहीं हैं, ऐक्स्ट्रा काम वे क्या खाक करेंगे. मास्टरों का काम अफसरों से करा कर एजूकेशन सिस्टम को ठीक करने की बात सोचना खुली आंखों से सपना देखने की ही तरह है. सरकारी स्कूलों की बदहाली के लिए अफसरशाही ही जिम्मेदार है.

कुछ भी हो, सरकारी स्कूलों को दुरुस्त करने के लिए पटना के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल ने अनोखी पहल की है. उन्होंने 2 सौ अफसरों की एक टीम तैयार की है, जो हर हफ्ते स्कूलों में जा कर एक घंटे तक बच्चों के बीच गुजारेंगे और स्कूल की कमियों को दूर करने की कोशिश करेंगे. हर दिन अफसरों को सामान्य काम में रुकावट नहीं आए, इस के लिए रोस्टर तैयार किया गया है.

डीएम, एसडीएम, एडीएम, डीएसपी, बीडीओ, सीओ, थानेदार, सीडीपीओ और शिक्षा विभाग के तमाम बड़े अफसरों को सरकारी स्कूलों में हो रही पढ़ाई की क्वालिटी को सुधारने की मुहिम में लगाया गया है.

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल ने बताया कि आमतौर पर जब कोई अफसर किसी स्कूल का दौरा करता है, तो उस के पहुंचने से पहले ही स्कूल प्रशासन वहां की तमाम व्यवस्था आननफानन दुरुस्त कर लेता है. अफसर के लौटने के बाद स्कूल की हालत फिर से बदतर हो जाती है. अब अफसर जब रोज स्कूल जाएंगे, तो वहां की हालत हमेशा दुरुस्त रहेगी. अफसर भी स्कूल की कमियों को दूर करने का काम करेंगे.

अफसर जिस किसी स्कूल में जाएंगे, वहां केवल बच्चों को किताबी या नैतिक बातें ही नहीं पढ़ाएंगे, बल्कि वहां की कमियों को भी देखेंगे और उन्हें दूर करने के उपाय करेंगे. हर अफसर स्कूल

के रजिस्टर पर अपनी हाजिरी भी लगाएगा. अफसरों के इस काम की मौनीटरिंग भी होगी.

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल की पहल तो अच्छी है, पर वे अब अफसरों की मौनीटरिंग के ठोस इंतजाम करने की बात कर रहे हैं, तो मास्टरों की मौनीटरिंग के ठोस इंतजाम क्यों नहीं किए जा रहे हैं?

महिला इंजीनियर की मौत, गुत्थी में उलझी पुलिस

बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के थाना अहियापुर की कोल्हुआ बजरंग विहार कालोनी के एक  निर्माणाधीन मकान में 23 अक्तूबर, 2016 की रात मुरौल प्रखंड में तैनात मनरेगा की जूनियर इंजीनियर सरिता देवी को कुरसी से बांध कर आग के हवाले कर दिया गया था. 24 अक्तूबर, 2016 की सुबह मकान मालिक और मोहल्ले वालों की सूचना पर पुलिस वहां पहुंची तो उसे एक जोड़ी लेडीज चप्पलें, अधजले कपड़े, पर्स, रूमाल, 4 गिलास, मिट्टी के तेल का डिब्बा और हड्डियों के अवशेष मिले. सरिता की मां कुसुम ने अधजली चप्पलें देख कर उस की पहचान की थी. सरिता सीतामढ़ी के सोनबरसा की रहने वाली थी. उस का विवाह नेपाल बौर्डर पर स्थित गांव कन्हौली फूलकाहां के रहने वाले विजय कुमार नायक से हुआ था, जिस से 2 बेटे हैं. पति से संबंध अच्छे  न होने की वजह से सरिता अलग रहती थी. पति गांव में रह कर खेती करता था और सरिता नौकरी कर रही थी. पति को उस का नौकरी करना अच्छा नहीं लगता था, इसलिए वह उसे नौकरी छोड़ कर गांव में रहने के लिए कहता, लेकिन सरिता को नौकरी छोड़ कर गांव में रहना ठीक नहीं लगता था. वह बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए नौकरी करना चाहती थी. उस का बड़ा बेटा ध्रुव दरभंगा में पौलिटैक्निक कर रहा है तो छोटा बेटा आर्यन उस के साथ रह कर पढ़ रहा था. सरिता पिछले 3 सालों से मुरौल प्रखंड में जूनियर इंजीनियर थी. बजरंग विहार कालोनी में वह विजय गुप्ता के मकान में किराए पर रहती थी. विजय मनरेगा की योजनाओं का एस्टीमेट बनाता था.

उसी मोहल्ले में विजय एक और मकान बनवा रहा था. उसी मकान में एक कमरा किराए पर ले रखा था, जिस में सरिता ने अपना औफिस बना रखा था. वह देर रात तक वहां बैठ कर औफिस के काम निपटाती थी. 24 अक्तूबर, 2016 की सुबह जब लोग उठे तो उन्हें विजय गुप्ता के निर्माणाधीन मकान से धुआं निकलता दिखाई दिया. उन्हें लगा कि शौर्ट सर्किट से मकान में आग लग गई है. उन्होंने शोर मचाया तो तमाम लोग इकटठे हो गए. विजय वहां मौजूद था. वह किसी को अंदर नहीं जाने दे रहा था. उस का कहना था कि किसी ने उस के घर में आग लगा दी है. विजय की इस हरकत से लोगों को दाल में कुछ काला नजर आया तो कुछ लोग उसे किनारे कर के जबरदस्ती मकान में घुस गए. कमरे के अंदर की हालत देख कर सभी के रोंगटे खड़े हो गए. कमरे में राख और हड्डियों के टुकड़े पड़े थे. जली हुई लकडि़यों से अभी भी धुआं निकल रहा था. पूरे मकान में मांस जलने की बदबू फैली हुई थी.

पड़ोसियों ने जब विजय से कहा कि लगता है यहां किसी आदमी को जलाया गया है? उस ने इस की खबर पुलिस को दी या नहीं तो उस ने सफाई देते हुए कहा कि उसे कुछ नहीं पता. सुबह जब वह यहां आया तो उस ने देखा कि उस के घर से धुआं उठ रहा है. लेकिन अभी उस ने कुछ किया नहीं है. वहां जमा लोग विजय से ही तरहतरह के सवाल करने लगे. जबकि उस का कहना था कि यह सब कैसे हुआ? उसे कुछ पता नहीं है. वह खुद ही घर में आग लगने से परेशान है. विजय ने तो पुलिस को इस घटना की जानकारी दी ही, मोहल्ले के भी कुछ अन्य लोगों ने भी पुलिस को फोन कर कर के विजय के घर में घटी घटना की सूचना दी. कुछ ही देर में पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई और विजय तथा मोहल्ले वालों से पूछताछ करने लगी. घटनास्थल के निरीक्षण के बाद पुलिस को लगा कि किसी को कुरसी से बांध कर जिंदा जलाया गया है. उस के बाद हड्डियों पर कैमिकल डाल कर गलाने की कोशिश की गई है, ताकि हत्या का कोई सबूत ही न रह जाए.

पुलिस ने जब सरिता के बारे में पूछताछ की तो मोहल्ले वालों से पता चला कि वह 23 अक्तूबर की शाम को वह अपने घर के पास नजर आई थी. उस के बाद वह दिखाई नहीं दी. मनरेगा से जुड़े लोगों से पूछताछ की गई तो वे उस के बारे में कुछ नहीं बता सके. इस से पुलिस को लगा कि सरिता को ही जला कर मारा गया है. पुलिस को केवल पैरों की हड्डियां मिली थीं, बाकी हड्डियों को कैमिकल से गला दिया गया था. अधजली चप्पलों से लाश की पहचान की गई थी. बेटी की इस हालत को देख कर वह दहाड़े मार कर रो रही थी. उन का कहना था कि उस की तो किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी, वह दिनरात मन लगा कर काम करती थी, फिर उसे किस ने इस तरह बेरहमी से मार दिया.

कुसुम के बताए अनुसार सरिता की पति से नहीं पटती थी, इसलिए वह उस से अलग रहती थी. उस का पति कोई काम नहीं करता था. इस बात को ले कर दोनों में अकसर विवाद होता रहता था. पति के विवाद को भुला कर वह अपने बच्चों की बेहतर परवरिश और बेहतर कैरियर बनाने में लगी थी. वह अपने बच्चों को भी अपनी तरह इंजीनियर बनाने का सपना देख रही थी. उन्होंने बेटी की हत्या की आशंका तो जताई है, पर किसी पर शक नहीं जताया है. पुलिस ने सरिता के मकानमालिक विजय गुप्ता से पूछताछ की तो उस ने बताया कि सरिता से उस की पुरानी जानपहचान थी. वह उस के लिए मनरेगा की योजनाओं का स्टीमेट तैयार करता था. उसी के नए बन रहे मकान में वह विभागीय फाइलों का निपटारा करती थी. उस के पास मकान की एक चाबी भी रहती थी. वह उस के साथ मुरौल प्रखंड के अपने औफिस भी जाती थी. शुरुआती जांच में पुलिस को लगा कि सरिता की हत्या कहीं और कर के लाश को औफिस में ला कर जलाया गया था. जिस से हत्या का कोई सबूत न मिले. लेकिन जब सरिता के बेटे ध्रुव से पूछताछ की गई तो उस ने कुछ और ही बातें बताई थीं. हत्या की सूचना मिलने के बाद भी उस का पति सीतामढ़ी से अहियापुर नहीं आया था.

एक सवाल यह भी है कि हत्या करते समय या जब उसे कुरसी से बांध कर जिंदा जलाया जाने लगा था तो क्या वह चीखीचिल्लाई नहीं थी? अगर वह चीखीचिल्लाई तो आसपास के लोगों को उस की चीख सुनाई क्यों नहीं दी? कहीं ऐसा तो नहीं कि आसपड़ोस के लोग पुलिस के झमेले से बचने के लिए मुंह बंद किए बैठे हों? लाश को पूरी तरह से जलने में 3 से 4 घंटे लगते हैं. इस के अलावा मांस जलने की बदबू भी आती है. डीएसपी आशीप आनंद के अनुसार, मामले की जांच की जा रही है. पुलिस सरिता और उस के पति के बीच के विवाद, विजय गुप्ता के साथ उस के रिश्तों और मनरेगा के किसी ठेकेदार से विवाद की जांच कर रही है. मनरेगा के कामों को ले कर इंजीनियर, मुखिया और ठेकेदारों के बीच अकसर विवाद होते रहते हैं. विजय गुप्ता ने पुलिस को बताया था कि रोज की तरह वह सुबह मकान पर पहुंचा तो मकान के मेन गेट का ताला टूटा हुआ था. धक्का देते ही वह खुल गया तो अंदर से मांस के जलने की बदबू आई और धुआं उठता दिखाई दिया. इस के बाद उस ने तुरंत पुलिस को सूचना दे दी थी.

सरिता को जिंदा जलाने के मामले की जांच कर रही पुलिस का सिर तब चकरा गया, जब उसे सरिता के सुसाइड करने के संकेत मिले. सरिता की हत्या की गुत्थी सुलझाने में पुलिस के पसीने छूट रहे हैं. पुलिस और फोरैंसिक साइंस लैबोरेटरी की टीम कई बार राख में सुराग ढूंढ चुकी है, पर कुछ हाथ नहीं लगा है. घटनास्थल पर पुलिस को 4 गिलास मिले थे, जिस से अंदाजा लगाया गया था कि कत्ल वाली रात कुछ लोग सरिता से मिलने आए थे. अगले दिन कमरे की तलाशी में पुलिस को एक लिफाफा मिला था, जिसे लोगों ने सरिता का सुसाइड नोट समझा. लेकिन लिफाफे में क्या था, पुलिस यह बताने से बच रही है.

गोपनीय सूत्रों से पता चला है कि उस में सुसाइड नोट ही था, जिस में उस ने बेटे को इंजीनियर बनाने का जिक्र किया है. उस में किसी मुखिया का भी जिक्र है. विजय के बारे में लिखा है कि वह इंसान नहीं, भेडि़या है. उस ने मुखिया पर जिंदगी तबाह करने का आरोप लगाया है. इस के बाद से पुलिस के शक की सुई मुखिया की ओर घूम गई है, पर उस में किसी का नाम और पता नहीं लिखा है, इसलिए पुलिस अभी तक उस तक पहुंच नहीं पाई है. लेकिन पता लगा रही है कि कहीं मुखिया ने सरिता की हत्या कर उसे इस तरह जला कर खुदकुशी का रूप देने की कोशिश तो नहीं की. पुलिस सुसाइड नोट की हैंडराइटिंग और सरिता की हैंडराइटिंग का मिलान करा रही है. पुलिस सुसाइड नोट में उलझी थी कि अगले दिन यानी 25 अक्तूबर, 2016 को सरिता के एक पड़ोसी ने पुलिस को एक लिफाफा दिया, जिसे पुलिस ने खोला तो उस में 3 पन्ने मिले. उन में लाखों रुपए के लेनदेन की बातें लिखी थीं. उस के कई लोगों के पास लाखों रुपए बकाया थे. लेकिन किसी का नाम नहीं लिखा था. नाम की जगह कोड वर्ड का इस्तेमाल किया गया था.

पुलिस नाम पता करने की कोशिश कर रही है, क्योंकि यह भी हो सकता है कि रुपयों के विवाद में उस की हत्या की गई हो? मनरेगा की योजनाओं में फैले भ्रष्टाचार की वजह से इस में शामिल अफसरों, ठेकेदारों और मुखियाओं के बीच अकसर विवाद होता रहता है. सरिता की मौत से कुछ दिनों पहले ही जिला गोपालगंज के कलेक्ट्रेट में एसडीओ आशुतोष ठाकुर और विजयपुरी प्रखंड के जेई विवेक मिश्र के बीच जम कर मारपीट हुई थी. कलेक्ट्रेट के कौशल विकास केंद्र भवन में तकनीकी पदाधिकारियों की बैठक चल रही थी. उसी दौरान दोनों में पहले तूतू मैंमैं हुई, उस के बाद मारपीट होने लगी.

हंगामा होने के बाद सारे इंजीनियर बाहर आ गए और एसडीओ पर गलत व्यवहार का आरोप लगाने लगे. एसडीओ ने जेई से कहा था कि वह सभी योजनाओं के बिल सुपर चेक नहीं कराता है. इस पर जेई ने कहा था कि 5 लाख रुपए तक के बिल को सुपर चेक करने का अधिकार उस का है. यह सुन कर एसडीओ आगबबूला हो गए और गालीगलौज करने लगे थे. गाली देने पर जेई को भी गुस्सा आ गया था और वह मारपीट करने लगा था. मारपीट का यह मामला भी थाना और अदालत तक पहुंच चुका है. जूनियर इंजीनियर सरिता की हत्या हुई या उस ने खुदकुशी की? इस बात का खुलासा करने में पुलिस को अभी तक कामयाबी नहीं मिल सकी है. उस की मां ने न किसी पर हत्या का आरोप लगाया है और न ही किसी से विवाद की पुष्टि की है. इस की वजह से पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लग रहा है. सरिता के जले जिस्म की राख की तरह इस केस से उठता धुआं अब धीरेधीरे ठंडा पड़ने लगा है.

इन 6 पाइंट्स से जानिए खुले में शौच का असली शिकार कौन

डकैत समस्या के चलते कभी दुनियाभर में कुख्यात रहे ग्वालियर व चंबल संभागों के इलाकों की हालत यह हो गई है कि यहां के लोग अब लाइसैंसी हथियारों का इस्तेमाल डकैती डालने या खुद के बचाव के लिए नहीं, बल्कि इत्मीनान से खुले में शौच करने के लिए करने लगे हैं. इन इलाकों के कई गांवों के लोग सुबह जंगल में जाते वक्त एक हाथ में लोटा या पानी की बोतल और दूसरे हाथ में हथियार ले कर शौच के लिए जाते हैं. इन्हें खतरा दुश्मनों या फिर जंगली जानवरों से नहीं, बल्कि उन सरकारी मुलाजिमों से है जिन्होंने खुले में शौच रोकने का बीड़ा उठाया हुआ है, जिस से कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2 साल पहले शुरू की गई स्वच्छ भारत मुहिम को अंजाम तक पहुंचाया जा सके.

ग्वालियर जिला पंचायत के सीईओ नीरज कुमार को अपर जिला दंडाधिकारी शिवराज शर्मा से झक मार कर यह सिफारिश करनी पड़ी थी कि आधा दर्जन गांवों के तकरीबन 55 बंदूकधारियों के लाइसैंस रद्द किए जाएं क्योंकि ये बंदूक के दम पर खुले में शौच जाते हैं और अगर सरकारी मुलाजिम इन्हें रोकते हैं तो ये गोली चला देने की धौंस देते हैं. मजबूरन सरकारी अमले को उलटे पांव वापस लौटना पड़ता है. ये लोग बदस्तूर खुले में शौच करते रहते हैं. 10 जनवरी को ऐसी ही शिकायत एक ग्राम रोजगार सहायक घनश्याम सिंह दांगी ने उकीता गांव के निवासी अजय पाठक के खिलाफ दर्ज कराई थी. इस बारे में जनपद पंचायत मुरार के सीईओ राजीव मिश्रा की मानें तो गांव में स्वच्छ भारत मुहिम के तहत सुबहसुबह निगरानी करने के लिए टीम गठित की गई थी. उकीता गांव में अजय खुले में शौच कर रहा था. जब उसे खुले में शौच न करने की समझाइश दी गई तो उस ने जान से मारने की धमकी दे दी.

  1. कार्यवाही या ज्यादती

खुले में शौच से लोगों को रोकने के लिए सरकारी मुलाजिम किस कदर मनमानी करने पर उतारू हो गए हैं, यह अब आएदिन उजागर होने लगा है. मध्य प्रदेश के ही उज्जैन से एक वीडियो बीते दिनों वायरल हुआ था जिस में सरकारी मुलाजिम खुले में शौच करते एक बेबस, बूढ़े आदमी से उठकबैठक लगवा रहे हैं और उसे अपना मैला हाथ से उठा कर फेंकने को मजबूर भी कर रहे हैं. वायरल हुए इस वीडियो पर खूब बवाल मचा था पर इस बिगड़ैल सरकारी मुलाजिम का कुछ नहीं बिगड़ा था. इस से यह जरूर साबित हुआ था कि स्वच्छ भारत अभियान अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर जा पहुंचा है जिस के शिकार वे गरीब दलित ज्यादा हो रहे हैं, जिन के यहां शौचालय इसलिए नहीं हैं कि उन का अपना कोई घर ही नहीं है.

जिन गरीबों के पास अपने घर हैं भी, तो उन्हें मजबूर किया जा रहा है कि वे जैसे भी हो, पहले घर में शौचालय बनवाएं जिस के पीछे छिपी मंशा यह है कि जिस से गांव देहातों के रसूखदार लोगों को बदबू व बीमारियों का सामना न करना पड़े. ग्वालियर और उज्जैन के मामलों में फर्क इतनाभर है कि ग्वालियर के लोग हथियारों के दम पर ही सही, सरकारी मुलाजिमों से जूझ पा रहे हैं लेकिन उज्जैन और देश के दूसरे देहाती व शहरी इलाकों के लोग न तो दबंग हैं और न ही उन के पास शौच करने जाने के लिए हथियार हैं. इसलिए वे खामोशी से ऊंचे वर्गों व सरकारी मुलाजिमों की गुंडागर्दी बरदाश्त करने को मजबूर हैं. उज्जैन का वायरल वीडियो इस की एक उजागर मिसाल थी, जिस में एक गरीब, कमजोर, बूढ़े के साथ जानवरों से भी ज्यादा बदतर बरताव किया गया.

जाहिर है जान पर नहीं बन आती तो ग्वालियर व चंबल संभागों के इलाकों में भी उज्जैन सरीखा शर्मनाक वाकेआ दोहराया जाता. हथियारों से निबटते बीते साल अगस्त में ग्वालियर प्रशासन ने यह फरमान जारी किया था कि जो लोग खुले में शौच करते पाए जाएंगे उन के हथियारों के लाइसैंस रद्द कर दिए जाएंगे. इस पर भी बात न बनी तो प्रशासन ने जुर्माने का रास्ता अख्तियार कर लिया. इस साल जनवरी के दूसरे हफ्ते में ग्वालियर की घाटीगांव जिला पंचायत के 2 गांवों सुलेहला और आंतरी के 21 लोगों पर प्रशासन ने 7 लाख 95 हजार रुपए की भारीभरकम राशि का जुर्माना ठोका था, तो भी खूब बवाल मचा था कि यह तो सरासर ज्यादती है. इतनी भारी रकम गरीब लोग कहां से लाएंगे जो पिछड़े और दलित हैं. यह तो इन पर जुल्म ही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने सरकारी अफसरों व मुलाजिमों के हाथ में एक कानूनी डंडा थमा दिया है जिस के आगे दूसरे हथियार ज्यादा दिनों तक टिक पाएंगे, ऐसा लगता नहीं क्योंकि खुले में शौच पर जुर्माने की रकम अब मजिस्ट्रेटों के जरिए वसूली जाएगी. अगर जुर्माने की राशि नकद नहीं भरी गई तो शौच करने वालों की जमीनजायदाद कुर्क करने का हक भी सरकार को है. जिस के पास जमीनजायदाद नहीं होगी, उसे जेल में ठूंस दिया जाएगा. बात अकेले ग्वालियर, चंबल या उज्जैन संभागों की नहीं है, बल्कि देशभर में सरकारी मुलाजिम शौच की आड़ में गरीब, दलित और पिछड़ों पर तरहतरह के जुल्म ढा रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि जिन राज्यों में भाजपा का राज है वहां ऐसा ज्यादा हो रहा है. कुछ पीडि़तों को 1975 वाली इमरजैंसी याद आ रही है जब गरीब नौजवानों को पकड़पकड़ कर उन की नसबंदी कर दी गई थी. इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी में फर्क नहीं रह गया जिन के मुंह से निकली ख्वाहिश ही कानून बन जाती है.

होना तो यह चाहिए था कि प्रशासन हर जगह लोगों में पल्स पोलियो मुहिम की तरह जागरूकता पैदा कर खुले में शौच के नुकसान गिनाते लोगों को उन की सेहत के बाबत आगाह करता, उन्हें शौचालय में शौच करने के फायदे गिनाता. पर, हो उलटा रहा है. सरकारी तंत्र 1975 की तरह बेलगाम हो कर कार्यवाही कर रहा है जिस की बड़ी गाज गांवदेहातों के गरीबों, दलितों और पिछड़ों पर गिर रही है. खुलेतौर पर खुले में शौच और जाति का कोई सीधा ताल्लुक नहीं है पर यह हर कोई जानता है कि अधिकांश दलित गरीब हैं, उन के पास रहने को पक्के तो दूर, कच्चे घर भी नहीं हैं. इसलिए वे खुले में शौच करने को मजबूर होते हैं. ऐसे में इसे जुर्म मानना, उन के साथ नाइंसाफी नहीं तो क्या है?

शौचालय बनवाने के नाम पर हर जगह हेरफेर और घोटाले सामने आने लगे हैं तो लगता है कि भ्रष्टाचार और मनमानी का लाइसैंस सरकारी मुलाजिमों के साथ उन दबंगों को भी मिल गया है जिन का समाज पर खासा दबदबा है. ये दोनों मिल कर शौच के नाम पर कार्यवाही नहीं, बल्कि गुंडागर्दी कर रहे हैं. दिक्कत यह है कि कोई इन के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहा. लोगों का पहला अहम काम जुर्माने और सजा से खुद को बचाना है. हालात नोटबंदी जैसे शौच के मामले में भी हो चले हैं कि अगर नए नोट चाहिए तो बदलने के लिए बैंक की लाइनों मेें खामोशी से खड़े रहो वरना मेहनत से कमाए नोट रद्दी हो जाएंगे. जो भी किया जा रहा है वह तुम्हारे उस भले के लिए है जिसे तुम नहीं जानतेसमझते.

यज्ञ, हवन, उपवास, दान, दक्षिणा क्यों कराए जाते हैं? ताकि तुम्हारा यह जन्म व अगला जन्म सुधरे. कैसे सुधारोगे, यह हम कुछ विशेष लोग जानते हैं, आम दलित, गरीब को जानने की जरूरत नहीं. वह पिछले जन्मों के पाप का दंड भोगता रहे. नोटबंदी और खुले में शौच का दिलचस्प कनैक्शन यह है कि अब बैंकों की तरह सार्वजनिक और सुलभ शौचालयों में भीड़ उमड़ने लगी है. कार्यवाही के डर से खुले में शौच करने वाले एक बार पेट हलका करने के लिए 5 रुपए खर्च कर रहे हैं जिस से उन का रोजाना का एक खर्च बढ़ गया है. अगर एक परिवार में 4 सदस्य हैं तो वह 20 रुपए की मार भुगत रहा है जबकि उस की कमाई ज्यों की त्यों है. बल्कि, अब तो नोटबंदी के बाद कमाई और कम हो गई है.

भोपाल के कारोबारी इलाके एमपी नगर में आधा दर्जन सुलभ कौंपलैक्स हैं. इस इलाके में झुग्गीझोंपडि़यों की भी भरमार है. कुछ दिनों पहले तक झुग्गी के लोग 2-4 किलोमीटर दूर जा कर रेल पटरियों के किनारे या सुनसान में मुफ्त में पेट हलका कर आते थे पर अब सरकारी टीमें कभी सीटियां, तो कभी कनस्तर बजा कर उन्हें ढूंढ़ने लगी हैं. ये लोग अब सुलभ और सार्वजनिक शौचालयों की लाइनों में खड़े नजर आने लगे हैं. अगर सहूलियत से और समय पर शौच करना है तो सुलभ कौंपलैक्स में 5 रुपए इन्हें देने पड़ते हैं. मुफ्त वाले शौचालयों में हफ्तों सफाई नहीं होती, गंदगी और बदबू की वजह से इन के आसपास मवेशी भी नहीं फटकते. पर, वे गरीब जरूर कभीकभार हिम्मत कर इन में चले जाते हैं जिन की जेब में 5 रुपए भी नहीं होते.

एमपी नगर इलाके में ही सरगम टाकीज के पास एक झुग्गीझोंपड़ी बस्ती के बाशिंदे गजानंद, जो महाराष्ट्र से मजदूरी करने यहां आए, का कहना है कि उस के परिवार में 6 लोग हैं जो शौच के लिए अब हबीबगंज रेलवे स्टेशन के सुलभ कौंप्लैक्स में जाते हैं जिस से 30 रुपए रोज अलग से खर्च होते हैं. अगर शाम को भी जाना पड़े तो यह खर्च दोगुना हो जाता है. गजानंद बताता है, हम जैसे गरीबों पर यह दोहरी मार है. सरकार हल्ला तो बहुत मचा रही है पर मुफ्त वाले शौचालय बहुत कम हैं.

2. यहां है गड़बड़झाला

खुले में शौच करने वाले आज स्थानीय निकायों की आमदनी का एक बड़ा जरिया बन गए हैं. पंचायतों से ले कर नगरनिगमों तक ने फरमान जारी कर दिए हैं कि जो भी खुले में शौच करता पाया जाएगा, उस से जुर्माना वसूला जाएगा. यह जुर्माना राशि 50 रुपए से ले कर 5 हजार रुपए तक है. मध्य प्रदेश के तमाम नगरनिगम, नगरपालिकाएं, नगरपंचायतें और ग्रामपंचायतें रोज खुले में शौच करने वालों से जुर्माना वसूलते अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं.

स्थानीय निकायों को ऐसे नियम, कायदे व कानून बनाने के हक होने चाहिए कि नहीं, यह अलग और बड़ी बहस का मुद्दा है पर प्रधानमंत्री को खुश करने की होड़ में यह कोई नहीं सोच रहा कि जिस की जेब में जुर्माना देने लायक राशि होती, वह भला खुले में शौच करने जाता ही क्यों. यह मान भी लिया जाए कि कोई 8-10 फीसदी लोगों की खुले में शौच करने की ही आदत पड़ गई है जबकि उन के घर पर शौचालय हैं तो इस की सजा बाकी 90 फीसदी लोगों को क्यों दी जा रही है?

3. परेशानियां तरह तरह की

जो लोग जुर्माना नहीं भर पा रहे हैं, उन के खिलाफ तरहतरह की दिलचस्प लेकिन चिंताजनक कार्यवाहियां की जा रही हैं. इन्हें देख लगता है कि देश में लोकतंत्र और उसे ले कर जागरूकता नाम की चीज कहीं है ही नहीं. इन वाकेओं को देख ऐसा लगता है कि खुले में शौच करने वालों को जागरूक नहीं, बल्कि जलील किया जा रहा है.

कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के ही सागर जिले में बसस्टैंड पर सुबहसुबह एक ड्राइवर और बसकंडक्टर को नगरनिगम के मुलाजिमों अशोक पांडेय व वसीम खान ने मुरगा बनाया. बसकंडक्टर और ड्राइवर का गुनाह इतना भर था कि वे खुले में शौच करते पकड़े गए थे.

इतना ही नहीं, सागर के ही लेहदरा नाके के इलाके में तो बेलगाम हो चले मुलाजिमों ने खुले में शौच करने वालों को पकड़ कर उन्हें राक्षस का मुखौटा पहना कर उन के साथ मोबाइल फोन से सैल्फी ली. महाराष्ट्र के बुलढाना जिले में प्रशासन ने फरमान जारी किया था कि जो भी खुले में शौच करने वालों के साथ सैल्फी खींच कर लाएगा, उसे इनाम में नकद 5 सौ रुपए दिए जाएंगे. इस का नतीजा यह हुआ कि लोग सुबहसुबह अपना मोबाइल फोन हाथ में ले कर झाडि़यों में झांकते फिरे ताकि कोई शौच करता मिल जाए तो उस के साथ सैल्फी ले कर 5 सौ रुपए कमाए जा सकें.

मनमानी और ज्यादती का आलम यह है कि रतलाम के मैदानों में नगरपरिषद हैलोजन लैंप और बल्ब लगा कर रोशनी के इंतजाम कर रही है जिस से खुले में शौच करने वालों पर नकेल डाली जा सके. हैलोजन बल्ब को लगाने का पैसा है पर गांवों, गंदी बस्तियों में सीवर लगाने का पैसा नहीं है ताकि घरों में ढंग के शौचालय बन सकें.

इस से भी एक कदम आगे चलते सागर नगरनिगम के कमिश्नर कौशलेंद्र विक्रम सिंह ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को हुक्म दिया हुआ है कि खुले में शौच को रोकने के लिए वे कलशयात्राएं निकालें, शाम को भजन गाएं और जगहजगह तुलसी के पौधे लगाएं. तुलसी को हिंदू पवित्र पौधा मानते हैं, इसलिए उस के आसपास शौच करने में हिचकिचाएंगे, ऐसा इन साहब का सोचना था.

4. जाति और धर्म से गहरा नाता

कोई अगर यह सोचे कि भला खुले में शौच से जाति और धर्म से क्या वास्ता, तो यह खयाल नादानी और गलतफहमी ही है. हकीकत यह है कि खुले में शौच का उम्मीद से ज्यादा और गहरा ताल्लुक जाति व धर्म से है जो अधिकांश लोगों की समझ में नहीं आ रहा. 2014 के लोकसभा चुनावप्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने साफ कहा था कि देवालयों यानी मंदिरों से ज्यादा जरूरी शौचालय हैं. तब गरीब लोग यह समझ कर खुश हुए थे कि मोदी सरकार जगहजगह पक्के शौचालय बनवाएगी और उन्हें जिल्लत व जलालत से छुटकारा मिल जाएगा.

केंद्र सरकार ने जैसे ही यह फरमान जारी किया कि खुले में शौच करने वालों पर 5 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जाए तो सब से पहले जैन समुदाय के लोग चौकन्ना हुए. क्योंकि जैन मुनि हिंसा के अपने उसूल का पालन करते खुले में ही शौच करते हैं. जगहजगह से मांग उठी कि जैन मुनियों को खुले में शौच की छूट दी जाए.

ये लाइनें लिखे जाने तक केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने खुलेतौर पर इस बात की  घोषणा नहीं की थी पर चर्चा है कि केंद्र सरकार ने जैन मुनियों को खुले में शौच करने की छूट देने का मन बना लिया है. दरअसल, भाजपा जैन वोटरों को नाराज नहीं करना चाहती. अगर सरकार इस तरह की किसी छूट का ऐलान करेगी तो तय है देशभर में बवाल मच जाएगा क्योंकि फिर गरीब, दलित भी अपने लिए इस तरह की छूट की मांग करते आसमान सिर पर उठा लेंगे.

बात अकेले जैन मुनियों की नहीं है, बल्कि लाखों की तादाद में नदियों के किनारे रह रहे हिंदू साधुसंतों की भी है जिन का कोई घर नहीं होता. ये साधु मंदिरों में रहते हैं और धड़ल्ले से खुले में शौच करते हैं. अभी तक एक भी मामला ऐसा सामने नहीं आया है जिस में निगरानी टीमों या सरकारी मुलाजिमों ने किसी साधु, संत या मुनि पर खुले में शौच करने के जुर्म के एवज में जुर्माना लगाया हो या समझाइश दी हो.

5. असल मार इन पर

आजादी के समय देश की 70 फीसदी आबादी खुले में शौच के लिए जाती थी. इस में से अधिकतर लोग दलित, पिछड़े और आदिवासी होते थे. हालात अब और बदतर हैं. अब खुले में शौच जाने वाले 90 फीसदी लोग इन्हीं जातियों के हैं. इन्हें आज कानून के नाम पर तंग किया व हटाया जा रहा है. दलित, आदिवासी तबके के लोगों को मुद्दत तक शौचालयों से दूर रखा गया क्योंकि खुले में शौच जाना इन की एक अहम पहचान होती थी. ठीक वैसे ही, जैसे गले में लटकता जनेऊ ब्राह्मण की पहचान होती थी, जो आज भी है.

यह कड़वा सच आजादी के बाद आज तक कायम है कि अभी भी 85 फीसदी दलित गरीब ही हैं जो झुग्गीझोंपड़ी बना कर रहते हैं. पढ़ेलिखे होने के बावजूद ये शौचालय की अहमियत नहीं समझते थे. अब आरक्षण के जरिए जो लोग सरकारी नौकरी पा गए हैं, वे घरों में शौचालय बनवा रहे हैं. इस सच का एक दूसरा पहलू यह है कि वे घर बनाने लगे हैं.

अब न केवल सियासी बल्कि सामाजिक तौर पर यह हो रहा है कि पैसे वाले दलितों को सवर्णों के बराबर माना जाने लगा है. वे पूजापाठ कर सकते हैं और दानदक्षिणा भी पंडों को दे सकते हैं. जाहिर है सवर्ण जैसे हो गए इन्हीं दलितों के यहां शौचालय हैं. इन की तादाद तकरीबन 10 फीसदी है. इन्हें देखदेख कर ही ऊंची जाति वाले चिल्लाचिल्ला कर यह जताने की कोशिश करते हैं कि देखो, जातिवाद और छुआछूत खत्म हो गई क्योंकि दलित अब खुलेआम मंदिर में जा रहा है. पूजापाठ भी कर रहा है और तो और, उस के यहां शौचालय भी है जो पहले नहीं हुआ करता था.

दरअसल, हकीकत सामने आ न जाए, इस का नया टोटका खुले में शौच का मुद्दा है. बढ़ते शहरीकरण के चलते अब जंगल और जमीन कम हो चले हैं जिस सेपक्के मकानों में रहने वाले ऊंची जाति वालों को खुले में शौच जाने वालों से परेशानी होने लगी थी. गांवों में भी जमीनें कम हो चली हैं. गरीब, मजदूर और किसान अपनी जमीनें बेच कर शहरों की तरफ भाग रहे हैं. गांवों में पहले सार्वजनिक जमीन बहुत होती थी जो अब न के बराबर हो गई है. कुछ सरकार या ग्राम सभाओं ने बेच खाई तो कुछ पर कब्जा हो गया. आम गरीब, जिन में दलित ज्यादा हैं, के लिए शौचालय न गांव में था और न ही शहर में है. कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक बिछी रेल की पटरियां इस की गवाह हैं जहां रोज करोड़ों लोग हाथ में पानी की बोतल ले कर उकड़ूं बैठे देखे जा सकते हैं. चूंकि रेल की जमीन सरकारी है, कोई स्थानीय दबंग रेलवे की जमीन पर शौच करते किसी को धमका नहीं सकता.

जिन के पास 5 रुपए शौच के लिए सुलभ कौंप्लैक्स में जाने के नहीं हैं उन की जेब से खुले में शौच के जुर्माने के नाम पर 5 सौ या 5 हजार रुपए निकालना लोकतंत्र तो दूर, इंसानियत की बात भी नहीं कही जा सकती.

धर्म और जाति के नाम पर अत्याचार खत्म हो गए हैं, यह नारा पीटने वालों को एक दफा खुले में शौच के लिए जाने वालों की हालत देख लेनी चाहिए कि वे जस के तस हैं. बस, अत्याचार करने का तरीका बदल गया है. दलित की जगह गरीब शब्द इस्तेमाल किया जाने लगा है जिस से जाति छिपी रहे. भोपाल नगरनिगम के एक मुलाजिम का नाम न छापने की गुजारिश पर कहना है कि यह सच है कि लोग खुले में शौच करते पकड़े जा रहे हैं, इन में 70 फीसदी दलित, 20 फीसदी पिछड़े और 10 फीसदी सवर्ण, मुसलमान व दूसरी जाति के लोग हैं.

दरअसल, सारा खेल वे दबंग लोग खेल रहे हैं जिन के हाथ में समाज और राजनीति की डोर है. उन्होंने अब खुले में शौच को अत्याचार करने का हथियार बना डाला है. मंशा पहले की तरह समाज और राजनीति पर खुद का दबदबा बनाए रखने की है. और अगर कोई भेदभाव नहीं हो रहा, तो यह बताने को कोई तैयार नहीं

कि साधुसंतों और मुनियों के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं की जाती. साफ है कि सिर्फ इसलिए कि वे धर्म के ठेकेदार हैं. उन्हें कोई रोकेगा तो तथाकथित पाप का भागीदार हो जाएगा.

6. गरीबी का सच और शौच

लोगों को साफसफाई की अहमियत कानून के डंडे से सिखाया जाना न तो मुमकिन है और न ही तुक की बात है. इस की जिम्मेदार एक हद तक सरकार की नीतियां भी हैं. ग्वालियर व चंबल संभागों के लोगों के पास हथियार हैं पर शौचालय नहीं, इस का राज क्या है? कुछ लोग घर में शौचालय बनाने की माली हैसियत रखते हैं पर नहीं बनवा रहे, तो इस की वजह क्या है?

राज और वजह यह है कि अधिकतर दलित आदिवासी और अति पिछड़े बीपीएल कार्ड वाले हैं. स्वच्छ भारत मुहिम ने इन के गरीब होने के माने और पैमाने बदल दिए हैं. बीपीएल सूची में शामिल लोगों को काफी सरकारी सहूलियतें और रियायती दामों पर राशन वगैरा खरीदने की छूट मिली हुई है. सरकार गरीब उसे ही मानती है जिस के बीपीएल ग्रेडिंग सिस्टम में 14 या उस से कम नंबर हों. जिस के घर में शौचालय होता है उसे सर्वे में 4 अंक दे दिए जाते हैं. जिन के 10 या 12 अंक हैं, उन में से अधिकतर लोग शौचालय इसलिए नहीं बनवा रहे कि अगर ये 4 अंक भी जुड़ गए तो वे 14 अंक पार कर जाएंगे और गरीब नहीं माने जाएंगे यानी उन से सारी सहूलियतें छिन जाएंगी.

ऐसे में सरकारी इमदाद से ही सही, शौचालय बनवा कर गरीब लोग अगर अपनी गरीबी नहीं छोड़ना चाह रहे हों तो इस में उन की गलती क्या, गलती तो सरकारी योजनाओं की खामियों और पैमाने की है. अभी, खुले में शौच के लिए जाने वालों को जीरो अंक दिया जाता है. जो लोग सामूहिक शौचालय में जाते हैं उन्हें एक या दो अंक पानी मुहैया होने न होने की बिना पर दिए जाते हैं. अब सरकार जबरदस्ती गरीबों को उन के छोटेतंग घरों में शौचालय, जिस की लागत 4-6 हजार रुपए आती है, बनवाने के साथ उन्हें 4 अंक दे कर उन की गरीबी का तमगा छीनना चाह रही है. ऐसा होने से उन से सस्ता राशन, प्रधानमंत्री आवास योजना वगैरा जैसी दर्जनों सहूलियतें छिन जाएंगी. ऐसे में उन का घबराना स्वाभाविक है.

जेब ढ़ीली कर देगा पान

लेखक- शंकर जालान

देश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले कोलकाता शहर में पान की एक ऐसी दुकान है, जहां एक पान की कीमत 1,001 रुपए से ले कर 5,001 रुपए तक है.

कालेज स्ट्रीट के पास बंकिम चटर्जी स्ट्रीट पर तकरीबन 83 साल पुरानी कल्पतरु भंडार नामक एक दुकान है. यहां 5 रुपए से ले कर 5,001 रुपए तक की कीमत के पान बिकते हैं. इस दुकान की मशहूरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुकान से इधरउधर एक किलोमीटर दूर से पूछने पर कोई भी शख्स ग्राहकों को इस दुकान तक पहुंचने का रास्ता बता देता है.

वैसे तो पान की चर्चा होते ही आम लोगों को बनारस की याद आती है और हिंदी फिल्म ‘डौन’ का गीत ‘खइके पान बनारस वाला…’ जबान पर आता है, लेकिन पान के शौकीनों को साल 1935 में खोली गई कल्पतरु भंडार दुकान याद आती है. वहां कम से कम 5 रुपए से ले कर 5,001 रुपए तक का पान बिकता है.

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इस दुकान पर कल्पतरु स्पैशल पान (सोना वर्क) 5,001 रुपए, कल्पतरु स्पैशन पान (चांदी वर्क) 1,001 रुपए, बादशाही पान 501 रुपए, बनारस रुचि पान 101 रुपए, मन मतवारा पान 51 रुपए, दिलखुश पान 21 रुपए, मुख विलास पान 11 रुपए और मुखरंजन पान 5 रुपए में मिलता है.

इस के अलावा इस दुकान पर ग्राहक की जेब के हिसाब से परीक्षा उत्तीर्ण पान, नौकरी प्राप्त पान, सम्मान प्राप्त पान, चुनाव फतेह पान, सगाई पान, शादी पान, सुहागरात पान व हनीमून पान बिकते हैं.

एक सवाल के जवाब में दुकान के मालिक श्यामल दत्त ने बताया कि कल्पतरु भंडार में बिकने वाले पान में कई ऐसी खूबियां हैं, जो इसे दूसरी पान की दुकानों से अलग पहचान दिलाती है. यहां जिस क्वालिटी का मसाला और सुपारी इस्तेमाल की जाती है, वैसी कहीं दूसरी जगह नहीं मिलती है. पान में डाला जाने वाला मसाला घर में बनाया जाता है.

श्यामल दत्त का दावा है कि कल्पतरु भंडार के पान कई नामचीन हस्तियों ने खाए हैं, जिन में प्रमुख हैं पूर्व राष्ट्रपति डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन, पूर्व राष्ट्रपति डाक्टर जाकिर हुसैन, पूर्व राष्ट्रपति डाक्टर वीवी गिरि, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी. इन के अलावा पूर्व सेना प्रमुख सहित कई राज्यपाल, कई मुख्यमंत्री, बौलीवुडटौलीवुड के लोकप्रिय कलाकार, मशहूर संगीतकार, गीतकार से ले कर बड़ेबड़े साहित्यकारों तक ने न केवल कल्पतरु भंडार का पान खाया है, बल्कि तारीफ भी की है.

श्यामल दत्त ने आगे बताया कि उन के यहां का पान खाने से मुंह लाल नहीं होता और पीक थूकने की जरूरत नहीं पड़ती. और तो और बगैर फ्रिज में रखे कई दिनों तक पान के स्वाद में कोई फर्क नहीं पड़ता. कल्पतरु स्पैशल पान में नेहरू पत्ती, डौलर सुपारी, कश्मीरी टैबलेट, मेवा सुपारी, दूध सुपारी, गुलाब सुपारी, लखनऊवी सौंफ, छुआरा सुपारी, मेगुनी इलायची, स्पैशल मावा, केसरानी, ड्राई कत्थाचूना का इस्तेमाल होता है. इस पान को सोने के वर्क में 5,001 रुपए और चांदी के वर्क में 1,001 रुपए में बेचा जाता है.

इस के अलावा दूसरी तरह के पान में इस्तेमाल होने वाले मसाले देश की अलगअलग जगहों से मंगवा कर घर पर ही तैयार किए जाते हैं.

आईसी सुपारी, चांदी सुपारी, लच्छा सुपारी, छुआरा सुपारी, बनारसी सौंफ, मिल्की, टाका सुपारी, कश्मीरी टैबलेट, लौंग, इलाइची वाले पान 11 से 101 रुपए तक में बेचे जाते हैं. अलगअलग दाम वाले पान में अलगअलग मसालों का इस्तेमाल होता है.

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यह बिकने वाले पान में 15 से 20 रुपए की सिर्फ सुपारी और 30 से 35 तरह के मसालों का इस्तेमाल होता है. मीठा पत्ता वे ओडिशा के भुवनेश्वर से मंगाते हैं और उन के यहां के पान देश के कई राज्यों के अलावा विदेशों में भी जाते हैं.

श्यामल दत्त ने बताया कि आजादी के पहले साल 1935 में अंगरेजी हुकूमत के दौरान उन के पिता राधा विनोद दत्त ने यह दुकान खोली थी. उस दौरान आसपास एक भी पान की दुकान नहीं थी, देखते ही देखते उन का पान लोकप्रिय हो गया. उसी दौरान पिताजी ने सोच लिया था कि बिलकुल अलग स्वाद वाला पान लोगों को खिलाएंगे, सो घर पर कच्चे मसाले व सुपारी मंगा कर वे इसे खास तरीके से तैयार करते थे.

साल 2001 में दुकान के संस्थापक यानी श्यामल दत्त के पिता की मौत हो गई. तब पेशे से इंजीनियर श्यामल दत्त ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे कर पिता की विरासत संभाली.

58 साल के श्यामल दत्त कहते हैं कि उन्हें सरकारी नौकरी छोड़ने का कोई गम नहीं है, बल्कि पान बेच कर पिता का नाम रोशन करने की खुशी है. पिता ने उन से एक ही बात कही थी, ‘बेटा, सत्य पर रहना, गलत मत करना. अपनेआप आगे बढ़ोगे.’

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श्यामल दत्त अपने पिता की इस सीख को मान रहे हैं और मिठास के इस धंधे में आगे बढ़ रहे हैं.

पान के नाम और कीमत

कल्पतरु स्पैशल पान (सोना वर्क) :        5,001 रुपए

कल्पतरु स्पैशल पान (चांदी वर्क) :        1,001 रुपए

बादशाही पान       :        501 रुपए

बनारस रुचि पान    :        101 रुपए

मन मतवारा पान    :        51 रुपए

दिलखुश पान       :        21 रुपए

मुखविलास पान     :        11 रुपए

मुखरंजन पान      :        5 रुपए

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