Hindi Kahani: अमीर

रो की तरह डमरू ने चबूतरे की सफाई की. उसी समय उस पर कुछ सजीधजी औरतों ने दया दिखाई. प्रसाद के 2 लड्डू दे दिए उस को. डमरू आगे बढ़ गया. 10 मिनट चल कर ट्रक के करीब आया. आधे दाम पर 3 दर्जन केले खरीद लिए. अब उसे इस जंगल के दूसरी तरफ चादर बिछा कर केले बेचने थे.
दरअसल, इस कसबे की एक तरफ छोटा सा जंगल है. बंदर आते हैं. लोग केले खिला देते हैं. इस तरह डमरू की आमदनी हो जाती है.

अकेले रहने वाले डमरू के पास बचत के 2,120 रुपए रखे हैं. हर दिन 50 रुपए के केले खरीद कर 130 रुपए में बेच देता है. डमरू को रोज मुनाफा होता है. 65 साल की अकेली जिंदगी. उसे रुपए की इसीलिए कमी नहीं रहती है. अब दोपहर से शाम हो रही थी. वैसे दिन ढलना एक रोज घटने वाली घटना है. उसी तरह तय समय पर डमरू का 1-1 लड्डू कुछ समय पर निकाल कर खाना. खाने का उसे कोई शौक नहीं रहा है, इसलिए कुछ भी पकाना नहीं है और उस का बहुत सारा समय बच जाता है वरना जब पत्नी थी, तब सुबह उठ कर रोटी बनाने में ही उस का बहुत सारा समय बरबाद हो जाता था.

डमरू लड्डू पर बाजार से खरीदा गया काला नमक छिड़कता है और काम तमाम. मीठा और नमकीन दोनों का मजा एकसाथ. जैसे कभीकभार पानी में शक्कर बुरक कर भी पी जाता है. लड्डू खत्म तो अखबार के उस कतरे को कूड़ेदान में डाल कर वह अपनी जगह पर कर बैठ गया. इधर गरमी भी अपना रंग दिखाते जा रही थी, बदन जैसे ?ालस ही जाए. ऐसे में कुछ लोग अपने घरों से निकलने में कतरा रहे थे. दोपहरी का यह समय तमाम जगहों पर आराम का होता है, लेकिन डमरू अपनी टूटी चप्पल घसीट कर घर जाए और फिर बचे हुए केले बेचने आए, यह नामुमकिन है, इसीलिए रोज इतनी तेज धूप में भी इसी नीले के किनारे आसमान के नीचे बैठा रहता है, गरमी के कम होने तक. कोई भूलाभटका ग्राहक भी जाता था.

एक बार तो कुछ मजदूर आए और एक दर्जन केले खरीद कर ले गए. वाह, ऐसे में डमरू खुश हो गया.
लेकिन डमरू का ज्यादा समय ऊंघने में ही बीतता था. जमीन में पड़ा हुआ उस का वजूद कितना कमजोर लगता था. दुबलापतला बूढ़ा आदमी, जिस के बालों की बसावट जरा भी घनी नहीं थी. खोपड़ी ही दिखाई देती थी. मुंह खोल कर बीचबीच में ऊंघता हुआ डमरू सचमुच किसी ढोल सा लग रहा था जिसे किसी ने हथेली नहीं, बल्कि टहनी मार कर, ?ाक?ार कर, बारबार बजा कर जिंदा कर दिया हो. नाली के किनारे पर दूर नीम के पेड़ के पीछे जमा सूखे पत्तों और इस बुजुर्ग में कितनी तो समानता है, मगर इस की किसी को परवाह नहीं. अचानक डमरू को कुछ लोगों की आवाज सुनाई दी. सिर पर पोटली रखे कुछ औरतें रही थीं. वे सब डमरू के करीब गईं. वे 4 औरतें थीं. बेहद गरीब लग रही थीं. डमरू की फटी चादर के पास बैठ गईं.

एक औरत बोली, ‘‘हमारे पास पैसे नहीं हैं. हम को केले खाने को दे दो.’’ डमरू ने उन को गौर से देखा. उसे 4 साल पहले मरी अपनी पत्नी याद गई. लाली नाम था. मटकती रहती थी. डमरू को जाने क्या सू?. वह बोला, ‘‘गीत सुनाओ. तब फोकट में केला मिलेगा.’’ ‘‘अच्छा, ठीक है,’’ कह कर वे औरतें एक फिल्मी गीत गाने लगीं. 2-3 लाइनें गा कर उन सब को जोश गया. एक के बाद एक टूटेफूटे 10 गीत सुना दिए डमरू को. डमरू ने केले गिने. पूरे 12 थे. उस ने खुशीखुशी उन औरतों को दे दिए. खुश हो कर वे औरतें केले ले कर चली गईं. डमरू ने भी चादर समेटी और मजे से गुनगुनाता हुआ अपने ठिकाने की तरफ चल दिया. आज वह किसी अमीरजादे सा महसूस कर रहा था

Hindi Story: चाहत

Hindi Story: जमीन के लालच में चाहत के पति और पिता को उस के अपनों ने ही मार डाला. गोद में रह गया बेटा उदय, पर चाहत ने हिम्मत नहीं हारी और उदय को प्रौफेसर बना दिया. फिर वह अपने मायके लौटी. आगे क्या हुआ?

खे से लौट कर प्रेम शंकर ने अपने गले से गमछा हटाया और चबूतरे पर बैठ गए. बीड़ी सुलगा कर फूंक से धुआं हवा में उछाला. माथे के पसीने की बूंदों को पोंछते हुए और थकी आवाज में पुकार लगाई, ‘‘चाहत की अम्मांअभी तक मेहमान गांव से नहीं लौटे हैं क्या?’’ सवाल पूछ कर वे बेचैनी से चारों तरफ टहलने लगे. चाहत की मां राजौरी हड़बड़ाती हुई बाहर निकल आई. चाहत भी पीछे से अपने बेटे उदय को गोद में ले कर गई. ‘‘इतनी जल्दी आप गए? कुछ हुआ है क्या? कभी सोहन के बारे में नहीं पूछतेआज?’’ राजौरी की सांसें फूलने लगीं. प्रेम शंकर उस का हाथ पकड़ कर बोले, ‘‘अरे, शांत हो जा राजौरी. मैं ने बस इतना पूछ लिया कि शाम हो गई और अभी तक नहीं लौटे.’’ राजौरी की घबराहट कुछ कम हुई, फिर अपने पति के लिए पानी लाने चली गई.

राजौरी पानी का लोटा और कटोरी में थोड़ा सा गुड़ ले कर आई और प्रेम शंकर को पकड़ाया. वे उठ कर आंगन में नली के पास जा कर कुल्ला करने लगे, फिर चबूतरे पर बैठ गए. गुड़ खा कर पानी पिया. थोड़ी तरावट महसूस हुई. आज मौसम में खुश्की थी. नीम और पकड़ी के पेड़ की पत्तियां भी हिलने से मना कर रही थीं. ‘‘चाहत की मां, हम आते हैं दालान से घूम कर,’’ प्रेम शंकर की आवाज में सुस्ती थी.
‘‘कोई बात है क्या चाहत के बापू? कुछ तो है जो हम सब से छिपा रहे हैं?’’
प्रेम शंकर ने अपनी गरदन को एक ?ाटका दिया और हौले से मुसकरा कर बोले, ‘‘कुछ नहीं है. उमस के मारे दम निकल रहा है और धान रोपनी का समय हो रहा है. बहुत काम है, इसी मारे चिंता लगी हुई है.’’
प्रेम शंकर असल बात राजौरी को बता नहीं पाए. दरअसल, जब वे रास्ते में सुरेश से मिल कर रहे थे, तो एक बात पता चली थी उन्हें. मारे घबराहट के उन को पसीना आने लगा था.

इस गांव की रीत है कि जायदाद अपने बेटे को ही देनी होती है. अगर बेटा नहीं है तो भतीजे को. बेटियों को जायदाद का एक हिस्सा भी नहीं दिया जा सकता है. प्रेम शंकर को एक ही बेटी है चाहत. वह छोटी थी तब प्रेम शंकर सोचते थे कि खेतखलिहान भतीजे को दे देंगे, पर बाद के दिनों में भाईभतीजे के रंगढंग ठीक नहीं लगने से उन का मन बदल गया था. चाहत की शादी राजौरी की बहन की ननद के बेटे रोहन से हुई थी, जिस के सिर से मांबाप का साया उठ गया था. हालांकि, गांव में अफवाह है कि चाहत और सोहन के बीच प्रेम था. बातों को दबाने के लिए उन दोनों की शादी करा दी गई. प्रेम शंकर ने सोहन और चाहत के नाम सारी जायदाद लिख दी. पूरे कुनबे में यह बात आग की तरह फैल गई. सब तिलमिलाहट से भर गए. सब के सब प्रेम शंकर और उन के परिवार से कट कर रहने लगे, पर प्रेम शंकर और उन के दामाद सोहन को गांव के लोग बहुत प्यार और इज्जत देते थे.

आज जो बात सुरेश ने बताई, उस के लिए प्रेम शंकर कभी सोच भी नहीं सकते थे. इतनी नीचता पर कैसे उतर सकते थे मथुरा भैया और भतीजे. ‘‘प्रेम शंकर, जरा बच कर रहना अपने भाईभतीजे से. उन लोगों ने प्लानिंग की है कि सोहन को जान से मार देंगे और उदय को भी.’’इतना सुनते ही प्रेम शंकर अचानक खांसने लगे थे. उन की छाती में कुछ अटका हुआ महसूस हो रहा था. उन की बेचैनी बढ़ गई थी. आखिर वे करें तो क्या करें? क्या प्रेम शंकर को पुलिस के पास जाना चाहिए? क्या यह बात सच हो सकती है? उन्होंने तय किया कि कल सुबह वे थाने में जा कर शिकायत दर्ज करा आएंगे. अपनी खुशियों को इस तरह दूसरों की हथेलियों में बंद नहीं होने देंगे. अजीब सा खालीपन चारों तरफ पसर गया था. परिंदे भी अपने अपने घोंसलों की ओर जा रहे थे, पर प्रेम शंकर को वापस घर जाने का मन नहीं हुआ.

हलका अंधेरा गहरा आया था. प्रेम शंकर धीमे कदमों से घर की ओर कर खेत की ओर चले गए. जिंदगी किस करवट लेगी, इस सोच ने उन का मन उथलपुथल से भर दिया. एक ऐसा समय भी था, जब प्रेम शंकर सिंह और उन के परिवार की जिंदगी आराम से कट रही थी. एक तरह का आनंद था उन के घर के चारों ओर. चाहत की नौकरी शिक्षामित्र में लग गई थी और सोहन भी पास के गांव में सरकारी टीचर हो गया था. उदय के पैदा होने के बाद तो प्रेम शंकर के घर में हर दिन उत्सव जैसा माहौल रहता था. फिलहाल प्रेम शंकर टहलतेटहलते कुछ दूर आगे अपने खेत के आसपास निकल आए. अचानक उन्हें कुछ आवाज सुनाई दी. पीछे मुड़ कर देखा. उन की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. दुश्मन के रूप में उन के भाईभतीजे हाथ में गंडासा लिए खड़े थे. अभी प्रेम शंकर संभल पाते कि उन पर हमला शुरू हो गया. उन के मुंह को अपने हाथों से दबाए उन का एक भतीजा कह रहा था, ‘‘बहुत मर्दानगी छाई है . अब सब भुला जाओगे. हमारे रहते तू सोहन को मालिक बना देगा, ले अब भुगत.’’

गंडासे से प्रेम शंकर का सिर काट कर उन्हीं के सगे भाई नेजय भवानीके नारे से जीत का जश्न मनाया.
अचानक राजौरी का दिल जोर से धड़का. कुछ अपशकुन होने का सोच कर उस की आंखों में आंसू गए. दिल रहरह कर धड़क रहा था. पैर भी लड़खड़ा रहे थे. अपने अंदर कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ. मन बेचैन हुआ तो उदय को ले कर पड़ोस में चली गई. चाहत स्कूल की कौपियां जांचने बैठ गई. उस के चेहरे पर संतोष की चमक थी. तभी सोहन की आवाज सुनाई दी, ‘‘चाहत, एक लोटा पानी देना.’’ पानी और गुड़ लिए जब चाहत बाहर आई तो सोहन के हाथों को पकड़े हुए चाचा और भैया लोग को देखा. एक अनजाने डर से उस का मन कांप गया. उन के हाथों में कुल्हाड़ी और गंडासा था. चाहत दौड़ कर चाचा के पैरों से लिपट गई, ‘‘सोहन को कुछ मत करिए मथुरा चाचाजी.’’ ‘‘यहां से हट चाहत. आज प्रेम के खानदान को खत्म कर देंगे. बहुते गरमी चढ़ी है शरीर में.’’


‘‘चाचाजी, हम आप की गोद में खेले हैं. हमारा सुहाग मत उजाडि़ए. रजनीश भैया, धीरज भैया, छोड़ दीजिए सोहन को. हम सब जायदाद आप के नाम कर देंगे. इस गांव से हम सब बाहर चले जाएंगे. सोहन को कुछ मत करिए चाचाजी.’’ चाहत की दर्दभरी आवाज को अनदेखा कर धीरज ने कहा, ‘‘चल हट, ज्यादा अंगरेजी मत ?ाड़. आज हमारी आंखों में खून उतर आया है.’’ ‘‘अरी अम्मां, कहां गई रेजल्दी आओ अम्मां, वरना सोहन को ये लोग मार देंगे. अरे गांव के लोग, आओ बचाओ इन को. सब कहां चले गए हो? कोई तो इन कसाइयों सब को रोको,’’ चाहत की कातर आवाज चारों तरफ गूंजने लगी.
तभी कुल्हाड़ी और गंडासे से सोहन के पूरे शरीर पर वार होने लगे. चाहत की आंखों के सामने सोहन मर रहा था. उस की दर्दभरी आवाज से पूरा गांव रो रहा था, पर दुश्मन की आंखों पर जायदाद की पट्टी बंधी थी. राजौरी उदय को लिए घर की ओर रही थी कि तभी मुसहर टोले के परदेसी ने उदय को उन की गोद से ले लिया और रोते हुए बोला, ‘‘जल्दी घर जाओ मालकिन. प्रेम मालिक और सोहन बबुआ की जान…’’

राजौरी वहीं से चिल्लाते हुए घर की तरफ भागी आई, ‘‘चाहत के बाबू, जल्दी आओहमारा घर उजड़ गया है…’’ घर के पास कर राजौरी की आंखें फटी की फटी रह गईं. सोहन का शरीर कई टुकड़ों में इधरउधर फैला हुआ था. पास ही चाहत बेहोश पड़ी हुई थी. दुश्मन वहां से खूनी खेल खेल कर चले गए थे.
राजौरी प्रेम शंकर की खोज में खेत की तरफ गई. देखा गांव के लोग प्रेम शंकर की लाश लिए चले रहे
थे. इस सदमे से राजौरी का वहीं दम निकल गया. चाहत को गांव की औरतें पानी का छींटा दे कर होश में लाने की कोशिश कर रही थीं. होश आते ही वहसोहनसोहनचिल्लाने लगती थी और फिर बेहोश हो जाती थी. रात को पुलिस की गाडि़यां आईं. गांव के लोगों आंखों देखा सब बयान कर दिए. चाहत का भी बयान लिया गया. 3 लाशों का एकसाथ दाह संस्कार किया गया. श्मशान घाट पर धूंधूं कर चिताएं जल रही थीं. तेज हवा से लपटें कांप उठती थीं. पूरे गांव में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ था. सब एकदूसरे से आंखें चुरा रहे थे. पुलिस मथुरा और उस के बेटों को खोजने में लगी हुई थी.

उस रात खौफ से पूरा गांव थर्रा गया था. चाहत को जब होश आया तब उदय का खयाल आया. मुसहर टोले के विशंभर ने बताया कि परदेसी बाबा उस को गांव से बाहर ले गए हैं. सुनने में आया है कि उदय बाबू को भी मारने की प्लानिंग है. ‘‘मु? ले चलो उदय के पास. पता नहीं वह कैसे रात में रहा होगा. एक दिन भी वह मेरे बगैर नहीं रहा है,’’ रोते हुए चाहत ने कहा. ‘‘उदय बाबू ठीक हैं बहन. परदेसी बाबा से बात हुई है. कल सुबह हम उदय को ले कर आएंगे.’चाहत के पास अब उदय बचा था. हिम्मत से काम लेना होगा उसे. उस ने सोचा कि गांव में रह कर इंसाफ की गुहार नहीं लगा सकती है और उदय को भी खतरे में नहीं डाल सकती है. रात के 10 बजे जब गांव के सारे लोग सो रहे थे, तब चाहत विशंभर के साथ अपनी मौसी के गांव चली आई. सुबह विशंभर उदय को परदेसी से ले कर चाहत के पास आया. आंसुओं पर बंधा हुआ बांध अचानक से टूट गया. उदय को गोद में ले कर चाहत फूटफूट कर रोने लगी.

उस का मन किया कि उदय को अपने सीने में छिपा ले. जिसे कोई देख पाए, जिसे कोई छू पाए.
मथुरा और उस के बेटे को पुलिस खोज नहीं पा रही थी. तब कोर्ट के आदेश पर उस के घर का कुर्की जब्ती का वारंट आया. एक दिन के बाद मथुरा और उस के बेटों ने पुलिस के हवाले कर दिया. ताउम्र कैद की सजा हुई. चाहत गांव लौट कर नहीं आई. उस ने अपना घर परदेसी बाबा के नाम कर दिया. खेतखलिहान उन लोगों को बेच दिया, जिन्होंने पुलिस के सामने मथुरा और उस के बेटों के खिलाफ गवाही
दी थी. दिन गुजरने लगे, महीने बीतने लगे. दुखों का मौसम बहुत लंबा होता है. इन बीते सालों में चाहत ज्यादातर चुप ही रहती थी. आंखें सूनी रहती थीं. वह कहीं भी आनाजाना छोड़ चुकी थी. उस का सपना बेटे को ऊंचाई पर देखना था. उदय 7 साल का हो गया था. उस पर वक्त के पहले ही गंभीरता गई थी. उस का सारा समय मां के साथ और पढ़ाई में गुजरता था.


एक दिन उदय ने पूछा, ‘‘मां, मेरे पिताजी कहां हैं? सभी के पिता उन के साथ रहते हैं, मेरे पिता तो कभी मु? देखने भी नहीं आते हैं.’’ चाहत बेबसी से मुसकराई. कुरसी से उठ कर उदय को सीने से लगा कर बोली, ‘‘तुम्हारे पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं बेटा. उन की मौत हो गई है.’’ ‘‘कैसे मौत हो गई मां?’’ उदय ने हैरान हो कर पूछा. ‘‘इस बारे में मैं कभी बाद में बताऊंगी, तब जब तुम बड़े और सम?ाने लायक हो जाओगे,’’ कहते हुए चाहत ने अपनी मुट्ठियों को कस कर बांध लिया. चाहत भरसक कोशिश करती कि उदय को कोई तकलीफ हो. वह मां और पिता दोनों की भूमिका निभा रही थी. कभी भी उदय के सामने उदास नहीं रहती और कभी गुस्सा होती. एक दिन स्कूल की जल्दी छुट्टी हो गई. उदय घर आया तो मां को एक साड़ी को हाथों से सहलाते हुए देखा. उस को देख कर मां बक्से में उस साड़ी को रखने लगी.
‘‘मां, यह क्या रख रही हो? मु? दिखाओ,’’ उदय जिज्ञासा से पूछा.

‘‘कुछ नहीं रख रही. जाओ हाथमुंह धो लो. खाना साथ खाएंगे,’’ कहते हुए चाहत ने जल्दी से उस साड़ी को बक्से में रख दिया. ‘‘बताओ मां, क्या छिपा रही हो?’’ उदय ने जिद पकड़ ली. ‘‘अभी नहीं बेटा, अभी तुम सम?ाने लायक नहीं हो. बाद में इस बारे में बताऊंगी,’’ चाहत अपने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर रसोईघर में चली गई. दिन बीतते रहे. उदय ने 10वीं के बोर्ड इम्तिहान में जिले में टौप किया था. पूरे गांव में उत्सव का माहौल था. चाहत सुबह से ही मिलनेमिलाने में बिजी थी. सभी की जबान पर एक ही बात थी कि बिना बाप का बेटा है, इस को हर क्षेत्र में कामयाबी मिले. रात के 10 बज रहे थे. उदय की नींद खुली. मां को अपने पलंग पर देख कर वह उसे खोजने लगा. स्टोररूम का दरवाजा खुला हुआ था. अंदर गया तो देखा कि मां साड़ी को गोद में ले कर बैठी हुई है. आहट सुन कर चाहत ने ?ाट से वह साड़ी बक्से में रख दी. ‘‘मां , इस साड़ी में ऐसी क्या बात हैआप जबतब इस को ले कर चूमती रहती हैं…’’


‘‘अभी नहीं बता सकती. बाद में बताऊंगी. जब मु? लगेगा कि तुम को बताना चाहिए,’’ चाहत की बातों में
इतनी मजबूती थी कि उदय कुछ नहीं पूछ सका. इस के बाद भी उदय ने कई बार अपनी मां को उस साड़ी के साथ तड़पते देखा, लेकिन फिर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर सका. उदय को ऊंची तालीम हासिल करने के लिए चाहत ने उस को दिल्ली के एक होस्टल में भेज दिया. समय पंख लगा कर उड़ रहा था. उदय हरेक इम्तिहान में टौप करता गया. हर बार चाहत का सिर गर्व से ऊपर उठ जाता था. अब वह फिर से मुसकराने लगी थी. गांव के गरीब बच्चों और अनपढ़ औरतों को पढ़ाना उस का मकसद हो गया था.
आखिरकार ख्वाबों को मंजिल मिल गई. चाहत की इच्छा और उदय की मेहनत रंग लाई. उदय बनारस
हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर बन गया. एक चमकीली उम्मीद चाहत के आंचल में समा गई. वह सुनहरे भविष्य घोंसला बनाने के लिए फिर से उम्मीदों के तिनके जुटाने लगी.

उस के पैरों में पंख लग गए. अब तक का रोका हुआ बांध ढहने लगा. चाहत उदय के कंधे पर सिर रख कर फूट पड़ी, ‘‘आज मेरा जीवन सफल हो गया उदय. तुम्हारे नानानानी और पिता जहां भी होंगे, खुशी का जश्न मना रहे होंगे.’’ रात में वह साड़ी निकाल कर चाहत उदय के पास बैठ गई, ‘‘जो जिज्ञासा तुम्हारे अंदर बचपन से है, अब उस साड़ी और तुम्हारे पिता के बारे में बताने का समय गया है उदय.’’ चाहत ने गहरी सांस ली, ‘‘तुम्हारे पिता, नाना और नानी को उन के अपनों ने ही मारा, जायदाद के लिए. आज भी मैं उस जायदाद को कोसती हूं, जिस के चलते हमारा पूरा परिवार बेमौत मारा गया.’’ बीते हुए दिनों को बताते हुए चाहत उसी दुख से गुजर रही थी, जिसे याद कर के वह सालों से रोती रही है. कहा जाता है कि दुख बांटने से दुख कम होता हैपता नहीं कितना कम हुआ. पर चाहत के चेहरे पर शांति छा गई थी.
उदय सन्नाटे में था. अचानक वह चौंक कर उठा और बोला, ‘‘मां, चलो नाना के गांव. मैं देखना चाहता हूं उस गांव को मेरे मेरे पिता की मौत हुई थी.’’


दूसरे दिन चाहत उदय को ले कर उस गांव में गई, जहां उस का सारा संसार उजड़ गया था. चाहत और उदय के साथ गाड़ी में उदय का मामा विशंभर भी बैठा था. उस की आंखें बारबार नम हो जा रही थीं.
चाहत गाड़ी से उतरी. परदेसी का बेटा उस को देखते ही खुशी से चिल्ला उठा, ‘‘हम सब की चाहत बहन गई.’’ आवाज सुन कर गांव के लोग इकट्ठा होने लगे. विशंभर के साथ उदय भी गाड़ी से उतरा.
उदय ने सब को प्रणाम किया. विशंभर ने सब को बताया कि यह चाहत का बेटा उदय है और बनारस के कालेज में पढ़ाता है. सब की जबान पर एक ही बात थी, ‘हम सब के उदय बबुआ गए हमारे गांव…’
चाहत के घाव पर जैसे कोई मरहम लग रहा था. उसी पल महसूस हुआ, जैसे हवा में एक खुशबू बिखर रही हैसोहन के देह की खुशबू. ‘‘कुरसी लाओ जरा, उदय बबुआ के बैठने के खातिर,’’ विशंभर उल्लास से बोला.


तभी परदेसी की पत्नी बनवारी हांफते हुए आई. उस के हाथों में गुड़ और पानी का लोटा देख कर चाहत को अपना वही दिन याद गया, जब सोहन को पानी देने गई थी और अपनी आंखों से दर्दनाक मौत देखी थी. धुंधली नजर से उस ने बनवारी काकी को देखा और उन के गले लग कर रोने लगी. ‘‘काकी का पैर छुओ उदय. परदेसी काका अगर नहीं होते तो आज तुम जिंदा नहीं रहते,’’ चाहत ने कहा. उदय पैर छूने के लिए ?ाका, तभी बनवारी काकी ने कांपते हाथों से उसे गले लगा लिया. ‘‘बबुआ, तेरी माई के साथ बहुत बुरा हुआ. हम ने अपनी आंखों से सब देखा, पर कुछ कर नहीं पाई. आज भी वही हालात हैं. कुछ नहीं बदला बीते सालों में. बेटियों का हिस्सा आज भी भाईभतीजा के पास जा रहा है,’’ बनवारी काकी ने कहा. उदय कुछ देर के लिए वहीं चबूतरे पर बैठ गया और हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मु? कुरसी नहीं चाहिए और किसी तरह का स्वागतसत्कार. यह मेरे नाना का गांव है. आप सब मेरे अपने हैं.

मेरी एक छोटी सी चाहत है. आप चाहें तो इसे आशीर्वाद के रूप में मु? दे सकते हैंक्या आप लोग दीजिएगा?’’ उदय के बोलते ही पूरा गांव चिल्ला उठा, ‘मांगो बच्चा, हम सब से जो बन पड़ेगा, दे देंगे.’‘‘आज के बाद इस गांव की बेटियों को भी उन के हिस्से का हक देना होगा. जो मेरी मां के साथ हुआ, वह अब किसी बेटी के साथ हो. ‘‘आज बरसों बाद मेरी मां उसी साड़ी को पहन कर आई है, जिस साड़ी को पहने हुए अपने पति की लाश को गले लगाया था, चूमा था. देखिए, खून के छींटे अभी भी साड़ी पर लगे हुए हैं. क्या आप सब फिर ऐसी जिंदगी अपनी बेटियों के नाम लिखना चाहते हैं?’’ कहते हुए उदय की आंखों में आंसुओं का मानो समंदर उतर आया. इस माफी को किसी में ठुकराने की हिम्मत नहीं हुई. चाहत को लगा कोई अनजाना उस के पीछे खड़ा मुसकरा रहा है.                                 

कात्यायनी सिंह

  

Hindi Story: ममता की जीत

Hindi Story: 3 बच्चों की विधवा मां राधा की वीरान जिंदगी में विजय  बहार बन कर आए. दुनिया की परवाह करते हुए उन्होंने राधा से शादी की. राधा खुश हो गईं. पर क्या राधा की जिंदगी में वाकई बहार आई थी? विजय का असली मकसद क्या थागंगा के किनारे बसे छोटे से कसबे इटावा में, जहां नदियां पुरानी लोककथाएं गाती हैं और खेतों की हवा में सोने सी धूप नाचती है, एक घर था जो कभी खट्टीमीठी हंसी से गूंजता था. वह घर था राधा कालकड़ी की पुरानी दीवारें और छत पर चढ़ी जूही की लताएं, जो हर सुबह भीनी खुशबू देती थीं.


राधा एक साधारण, सांवली औरत थीं. उम्र 40 के करीब, लेकिन जीवन ने उन के चेहरे पर गहरी और कठोर झुर्रियां उकेर दी थीं. उन के पति हरि प्रसाद एक मेहनती और सिद्धांतवादी किसान थे, जो खेतों में दिनरात खटते, भविष्य के सपने बोते थे. 5 साल पहले, उन की जिंदगी एक झटके में थम गई. हरि प्रसाद की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई. ट्रैक्टर पर बाजार जाते वक्त एक तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें कुचल दिया. इटावा के छोटे अस्पताल में डाक्टर केवल निराशा में सिर हिला सके.


हरि प्रसाद की मौत के बाद, राधा ने टूट कर भी हिम्मत बांधी. वे अपने 3 बच्चों… 2 बेटियां और एक बेटाके साथ अपने मायके लौट आई थीं. मायका कानपुर के बाहरी इलाके में बसा एक शांत, कृषिप्रधान गांव हरिपुरा, जहां राधा देवी की मां सरला और पिता रामलाल रहते थे. हरिपुरा हराभरा था. गेहूं की सुनहरी फसल हवा में लहराती थी और शाम को गायें अपने खुरों की आवाज के साथ घर लौटती थीं. राधा को लगा था कि इस ममता की छांव में उन्हें और बच्चों को शांति मिलेगी. बच्चे स्कूल जाएंगे और वे छोटेमोटे काम कर के घर चलाएंगी.


लेकिन विधवा होना, खासकर एक छोटे गांव में, आसान नहीं होता. गांव वाले इशारे करते. उन के कानाफूसी भरे शब्द तीर बन कर राधा के आत्मसम्मान को भेदते थे. गांव की औरतें इशारों में कहतीं, ‘‘अरे राधा, अब तो बड़ी बेटी को ब्याह दोवरना दुनिया की बातें सुनसुन कर जीना मुश्किल हो जाएगा. जवान विधवा का क्या भरोसा?’’ राधा चुपचाप सब सहतीं. उन के पास विरोध करने की शक्ति नहीं थी, केवल सहनशक्ति थी. बड़ा बेटा छोटू सिर्फ 10 साल का था, पर पिता की तरह खेतों में बड़ों के साथ मदद करता. बेटियां सीता (8 साल की) और गीता (6 साल की) डर कर मां की गोद में सिर छिपातीं.


राधा दिनभर घर संभालतीं. खेतों में काम करतीं. रात को बच्चों को पुरानी लोककथाएं सुनातीं और लोरी गातीं. लेकिन अंदर का खालीपन हर रात उन की नींद और मन की शांति चुरा लेता था. वे अकसर तकिए में मुंह छिपा कर रोती थीं. एक दिन गांव के मेले में राधा की नजर एक अजनबी पर पड़ी. उन का नाम विजय था, जो लखनऊ के बाहरी इलाके के रहने वाले थे और एक ठेकेदार थे. लंबा कद, गोरा रंग और उन की मुसकान इतनी भोली थी कि राधा का बेजान दिल भी एक पल के लिए धड़क उठा.


विजय मिट्टी के बरतनों के स्टौल पर खड़े थे. राधा ने वहां से रंगबिरंगा दीया खरीदा. विजय ने दीया लपक कर पैक किया और शरारती हंसी के साथ बोले, ‘‘दीया जला दो बहनजीलेकिन इस रोशनी में खुद को भी देखना, कहीं अंधेरा छिप जाए. जिंदगी में उजाला रखना जरूरी है.’’ राधा मुसकराईं. यह सालों बाद पहली बार था कि वे दिल से मुसकराई थीं. बात बन गई. विजय ने बताया कि वे विधुर हैं, उन की पत्नी लंबी बीमारी से चल बसीं और उन के कोई बच्चे नहीं हैं. विजय ने अपनी जादुई बातों का सिलसिला जारी रखा, ‘‘जीवन छोटा है बहनजीहंसते रहो, रोते रहोगे तो आंसू भी थक जाएंगे. हर दिन एक नया मौका होता है.’’


विजय की बातों की मिठास, उन की हमदर्दी और स्नेह राधा के तड़पते दिल को सालों बाद छू गया. वे उन्हें अपने जीवन में एक नई आशा जैसे लगे. धीरेधीरे विजय हरिपुरा आने लगे. वे बच्चों के लिए फल ले कर आते, छोटी बच्चियों के लिए खिलौने लाते. वे छोटू से खेती की बातें करते. राधा की मां सरला को शक हुआ. उन्होंने राधा को टोका, ‘‘बेटी, गांव में बातें हो रही हैं. यह बारबार क्यों आता है?’’ राधा ने अपनी मां सरला को समझाया, ‘‘मां, हमारी बस दोस्ती हैइस खाली दिल को थोड़ी सी गरमाहट मिलती है. वे बहुत नेक इनसान हैं.


लेकिन दोस्ती रुकती कहां है, जब दिल प्यार और सहारे के लिए तरस रहा हो. एक शाम तेज बारिश हो रही थी. घर सो चुका था. तभी अचानक विजय आए. विजय ने राधा का हाथ पकड़ा, उन की आंखों में देखा और गंभीर स्वर में कहा, ‘‘राधामैं तुम्हें इस अकेलेपन में तड़पते नहीं देख सकता. यह तुम्हारे लिए नहीं है. शादी कर लो मुझ सेमैं तुम्हारे बच्चों को अपना नाम दूंगा. मैं तुम्हें वह खुशी दूंगा जो सालों से खो गई है. तुम्हारी हर सांस में खुशबू भर दूंगा.’’


राधा का दिल पूरी ताकत से धड़का. वे डर और उत्साह के बीच फंसी थीं. विधवा हो कर दोबारा शादी, गांव क्या कहेगा, बच्चे क्या सोचेंगे. लेकिन विजय की आंखों में सच्चा वादा था. 6 महीने बाद, सामाजिक विरोधों के बावजूद, उन्होंने सादे विवाह में सात फेरे लिए. राधा की मां सरला ने आंसू भरी आंखों से आशीर्वाद दिया. सरला ने कहा, ‘‘बेटीखुश रहना. अपना जीवन फिर से शुरू कर.’’ शादी के बाद विजय का काम लखनऊ में था, जबकि राधा बच्चों की पढ़ाई और गांव की जमीन के कारण हरिपुरा में ही थीं. विजय हफ्ते में 2-3 बार आते.


शुरुआत में सब अच्छा था. प्यार, हंसी और भविष्य की योजनाएं. लेकिन जल्द ही असली रंग दिखने लगे. पहले प्यार, फिर झगड़े. विजय ने एक शाम गुस्से में भर कर कहा, ‘‘तेरे बच्चेमेरे गले की फांस बन गए हैं. मैं यहां आता हूं, तो मुझे आराम नहीं मिलता, बस उन की देखभाल करनी पड़ती है. मुझे आजादी चाहिए.’’ राधा का दिल टूट कर बिखर गया. उन की आंखें अचानक नम हो गईं. उन्होंने हिम्मत बांध कर कहा, ‘‘विजयजीये मेरे कलेजे के टुकड़े हैं, निर्दोष हैं. आप ने शादी से पहले वादा किया था.


एक रात झगड़ा सीमा लांघ गया. विजय ने हिंसा का सहारा लिया और हाथ उठाया. राधा का गाल लाल हो गया. अंदर असहनीय दर्द की लहर दौड़ गई, लेकिन वे चुपचाप सह गईं. दूसरा रिश्ता भी टूटना नहीं चाहिए, इसी डर ने उन्हें जकड़ लिया. विजय का गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ता गया. वे चिल्लाए, ‘‘मैं नया जीवन चाहता हूंएक नया परिवार. इन पुरानी जंजीरों से आजादी…’’ राधा हर तरह से विजय को मनाने की कोशिश करती रहीं. वे उन का मनपसंद खाना बनातीं, उन के कपड़े धोतीं, घर साफ रखतीं. लेकिन विजय शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से और दूर होते गए.


एक साल बाद, राधा गर्भवती हुईं. उन के दिल में खुशी की लहर दौड़ी. यह विजय का अपना बच्चा था.
राधा ने उम्मीद से भर कर कहा, ‘‘विजयजीहमारा बच्चा होगा, हमारा अपना. अब सब ठीक हो जाएगा.’’
विजय का चेहरा काला पड़ गया. उन की आंखें गुस्से से लाल थीं. वे चीखे, ‘‘क्या बकवास है यह?
मैं नहीं चाहता यह बोझ. मेरे पास पहले से 3-3 बच्चे हैं. मुझे यह जिम्मेदारी नहीं चाहिए.’’ राधा का दिल धक से रह गया. आंसू छलक आए. उन्होंने डरते हुए, प्यार से कहा, ‘‘लेकिनयह हमारा है, हमारी खुशी की निशानी है.’’ विजय गुस्से में घर छोड़ कर चले गए और पूरे हफ्ते नहीं आए. जब लौटे तो धमकी भरे लहजे में बोले, ‘‘अगर यह बच्चा पैदा हुआ तोमैं तुम्हें और इन चारों बच्चों को छोड़ कर घर छोड़ दूंगा सब छोड़ दूंगा. मैं तुम्हें तलाक दूंगा.


राधा सिसकियां रोक नहीं पाईं. उन्होंने अकेले ही अपना गर्भ संभाला. मां सरला ने ममता और नैतिकता का सहारा दिया. सरला ने उसे दिलासा दिया, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा, बस हिम्मत मत हारना. तू अकेली नहीं है.’’ राधा रातें रोते काटतीं. विजय आतेजाते रहते, पर प्यार नहीं. वे मानसिक रूप से राधा को तंग
करते रहे. विजय ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए कहा, ‘‘मैं बाहर देख रहा हूंएक लड़की हैयुवा, बिना किसी बोझ की. मैं उस के साथ शादी करूंगा.’’ राधा चुप रहीं. उन का दिल हर पल चुभता. गर्भ के महीने कटे, पेट बढ़ा, और दर्द भी. गांव वालीं ताने मारतीं.


गांव की औरतें कहतीं, ‘‘राधा, संभल करविधवा हो कर दोबारा शादी, अब यह सब. इस नए बच्चे का क्या होगा? क्या पता क्या होगा आगे.’’ राधा मुसकरातीं, अंदर ही अंदर जलतीं और अपने आंसू पी जातीं. वे अपने अजन्मे बच्चे के लिए मजबूत बनी रहीं. 20 अक्तूबर की सुबह तेज प्रसव पीड़ा हुई. मां सरला ने पुरानी दाई बुलाई. घर में अचानक हलचल मच गई. छोटू अपनी मां को तड़पते देख कर रोया.
दाई ने खुशी से कहा, ‘‘लड़का होगासेहतमंद, मजबूत.’’ दोपहर को सेहतमंद बेटा जनमा. राधा ने उसे गोद में लिया. असीम खुशी के आंसू लुढ़क आए.


राधा ने फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘मेरा बेटातू मेरा सहारा है, मेरी जिंदगी. तेरा नाम छोटे हरि होगा.’’
नाम रखा गया छोटे हरि. विजय शाम को आए, पर उन का चेहरा उदासी और असंतोष से भरा था.
विजय ने ठंडे स्वर में कहा, ‘‘अच्छा हैलेकिन अब क्या होगा? अब जिम्मेदारी और बढ़ गई.’’
राधा ने टूटे दिल से उम्मीद जताते हुए कहा, ‘‘परिवार पूरा हो गयाअब सब ठीक हो जाएगा. खुश हो जाओ हमारे लिए.’’ विजय की हंसी कड़वी निकली. वे बोले, ‘‘खुश? यह बोझ और बढ़ गयामेरे सपनों पर, मेरे भविष्य पर.

मैं इस सब को नहीं सहूंगा.’’ राधा का सीना दुखा. विजय उसी रात गुस्से में चले गए. अगली सुबह विजय लौटे. उन के हाथ में एक थैला था. राधा बच्चे को दूध पिला रही थीं. विजय ने बच्चे को देखा और तुरंत घबराए हुए स्वर में कहा, ‘‘बच्चा कमजोर लग रहा हैबुखार है, गंभीर. इसे तुरंत डाक्टर के पास ले जाना है.’’ राधा घबरा गईं. उन का दिल जोरों से धड़कने लगा. वे बोलीं, ‘‘क्या हुआ? मैं भी चलूंगीअपने बेटे के साथ.’’ विजय ने झूठा बहाना बनाया, ‘‘नहींतुम थकी हो, आराम करो. कानपुर का बड़ा अस्पतालआईसीयू में रखना पड़ेगा. 2-4 दिन की बात हैचिंता मत करो.’’


राधा ने कांपते हाथों से बच्चा विजय को सौंपा. उन की आंखें डर और अविश्वास से भरी थीं.
राधा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘सावधान रहना जीयह मेरी जान है. इसे कुछ नहीं होना चाहिए.’’
विजय ने रूखेपन से कहा, ‘‘हांमैं हूं .’’ विजय बाइक पर चले गए. राधा खिड़की से उन्हें देखती रहीं. उन की बेचैनी बढ़ती गई. पहले दिन फोन आया. विजय ने कहा, ‘‘निमोनिया हैगंभीर. 2 दिन और लगेंगेडाक्टर कह रहे हैं.’’ राधा का कलेजा मुंह को आया. वे आंसू बहाती रहीं. उन्होंने दोबारा पूछा, ‘‘मैं जाऊंअपने बेटे के पास…’’


विजय का जवाब था, ‘‘नहींइंफैक्शन फैलेगा, तुम्हें भी हो जाएगा. तुम घर पर इंतजार करो.’’
दूसरे दिन फोन आया. विजय बोले, ‘‘अब ठीक हैलेकिन औब्जर्वेशन में रखा है.’’
राधा रातदिन रोतीं. सरला ने सांत्वना दी, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा. खुद पर भरोसा रखो.
तीसरा दिन फोन नहीं आया. राधा ने फोन किया, नंबर बंद रहा. उन का दिल बैठता गया.
चौथे दिन विजय घर आए. उन का चेहरा पीला पड़ा था, लेकिन वे शांत दिख रहे थे.
विजय ने कहा, ‘‘बच्चाअब ठीक है. अस्पताल में ही छोड़ा हैकल ले आएंगे. उस की हालत अब सुधर
गई है.’’


राधा गले लगीं, खुशी के आंसू छलके, ‘‘धन्यवाद जीमेरी जान बचाई आप ने.’’ लेकिन विजय की आंखें झूठी लगीं. वे डर और छिपाव से भरी थीं. दिन बीतते गए, विजय के बहाने चलते रहे, ‘‘डाक्टर ने कहाएक हफ्ता और.’’ राधा का दूध सूख गया. उन की ममता उफनती रही. वे रोईं, ‘‘मेरा बेटा भूखा होगामां का दूध मांगेगा. मैं उसे कब देखूंगी?’’ गांव की औरतें कानाफूसी करतीं, ‘‘बच्चा कहां है राधा? इतने दिनों तक अस्पताल में क्यों?’’ राधा झूठा आत्मविश्वास दिखाती, ‘‘अस्पताल मेंठीक हो रहा है. जल्दी आएगा.’’
शक बढ़ता गया. एक रात राधा ने डर समाए पूछा, ‘‘सच बताओ जीमेरा बेटा ठीक है ? आप झूठ तो नहीं बोल रहे?’’


विजय चिल्लाए, ‘‘चुप रहोसब ठीक है, बस चुप. ज्यादा सवाल मत पूछो.’’ राधा कांप उठीं. सरला ने राधा को अलग बुलाया. सरला बोलीं, ‘‘बेटीकुछ गड़बड़ है, मेरा दिल कह रहा है. पता करोजल्दी.’’
29 अक्तूबर की शाम, भयानक हलचल मच गई. गांव का एक लड़का दौड़ादौड़ा आया. लड़का बोला, ‘‘मां जीतालाब के पास कुछ मिला है. किसी बच्चे की लाश…’’ हरिपुरा के बाहर 300 मीटर दूर एक सूखा तालाब था, जहां झाडि़यां उग आई थीं. गाय चराने वाले ने एक पौलीथिन में लिपटा हुआ कुछ देखा था. उस ने खोला. नवजात बच्चे का शव निकला. गांव वाले जमा हो गए.


कोई बोला, ‘‘ओह, कौन सा बच्चा है यह?’’ किसी ने पहचान लिया, ‘‘राधा का तो गायब है.’’ सरला तुरंत दौड़ीं, ‘‘बेटीतालाब चल, जल्दी.’’राधा गईं. उन के पैर लड़खड़ाए. भीड़ जमा थी. पौलीथिन खुली पड़ी थी. छोटा शरीर, नीला पड़ गया था. राधा चीखीं. उन की चीख से पूरी दुनिया थम गई. राधा आह भरते हुए बोलीं, ‘‘मेरा बेटामेरा छोटे हरि.’’ राधा दौड़ीं छू ने, लेकिन गांव वालों ने दर्द से रोका. कोई चाचा बोले, ‘‘नहीं राधापुलिस को बुलाओ. इसे छूना नहीं.’’ राधा सिसकती रहीं, ‘‘कौनकौन कर सकता है यह? मेरा मासूमकिस शैतान ने?’’


सरला ने राधा को गले लगाया, ‘‘बेटीसंभाल खुद को. तू अकेली नहीं है.’’ 112 पर फोन किया गया. पुलिस आई. इंस्पैक्टर राजेश सिंह. शव को कवर किया गया. राधा को थाने ले गए. थाने में राधा बैठी थीं. उन की आंखें सूजी थीं, दिल टूट चुका था. इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘‘क्या हुआ थासब बताओ. हमें सच जानना है.’’ राधा बयान देती रहीं. उन का गला रुंधता गया. राधा बोलीं, ‘‘साहबविजय ने किया, मेरे पति. वे नहीं चाहते थे बच्चाबोझ कहता था. उन्होंने मुझे झूठ कहा कि वह अस्पताल में है…’’ इंस्पैक्टर बोला, ‘‘तहरीर लिखाओसब लिखो. हम तुम्हें इंसाफ दिलाएंगे.’’ राधा ने कांपते हाथों से दस्तखत किए. पुलिस तलाश में निकली.


राधा घर लौटीं. छोटू ने पूछा, ‘‘मांभाई कहां है?’’ राधा ने टूटे स्वर में कहा, ‘‘नहीं रहा.’’ राधा रातभर जागीं, दर्द से करवटें बदलती रहीं. सुबह विजय पकड़े गए. कानपुर हाईवे पर भागते हुए. उन के खून लगे कपड़े मिले. वे टूट गए. विजय ने स्वीकार किया, ‘‘हांमैं ने मार डाला. वह रातभर रो रहा थामुझे बोझ लग रहा था. मैं ने राधा को झांसा दिया थाअब सब खत्म. मैं आजाद होना चाहता था.’’ पोस्टमार्टम हुआगला दबा कर हत्या निकली. कोर्ट चला. राधा गवाह बनीं. उन की आंखों में आग सुलगती रही. राधा ने कहा, ‘‘वह मेरा पति थालेकिन शैतान निकला. उस ने मेरी ममता को मारा.’’ विजय को सजा सुनाई गई. उम्रकैद. राहत मिली, पर दर्द नहीं गया.


राधा हरिपुरा में, अकेले बच्चों को पालती रहीं. वे तालाब जातीं, फूल चढ़ातीं, आंसू बहातीं. राधा बोलीं, ‘‘बेटामां के पास आया कर, सपनों में ही सही.’’ जीवन चला, लेकिन छाया रही. विधवा की, मां की, टूटे सपनों में जीती. सुबह सूरज उगता, गंगा बहती. राधा खेत जातीं, बच्चों को स्कूल भेजतीं. शाम को घर संभालतीं. रात को लोरी सुनातीं, छोटा सा कोना खाली रहता. छोटू बड़ा होता, बेटियां पढ़तीं. राधा मुसकरातीं, दर्द छिपातीं. गांव चुप, हमदर्दी देता. विजय जेल में था. वहां से चिट्ठी भेजता… ‘माफ कर दोअब पछता रहा हूं.’


राधा चिट्ठी फाड़ देतीं, ‘‘कभी नहींकभी नहीं.’’ सरला बूढ़ी हो गईं, रामलाल चल बसे. राधा ने सब संभाल लिया. छोटू ने कहा, ‘‘मांमैं डाक्टर बनूंगा, बच्चों को बचाऊंगा. कोई मासूम बच्चा नहीं मरेगा.’’
राधा की नम आंखें, गर्व से भर गईं, ‘‘हां, बेटाबिलकुल बनो, मेरे छोटे हरि की तरह.’’ राधा की बेटियां बोलीं, ‘मैं टीचरमैं पुलिस…’ राधा गले लगाई, खुशी के आंसू बहे, ‘‘सब बनोमेरे सपने बनो.’’ छोटू अब 20 साल का था. कानपुर मैडिकल कालेज में एमबीबीएस कर रहा था. छोटे हरि की मौत ने उसे इतना झकझोर दिया कि उस ने कसम खाई कि कोई मासूम नवजात उस की वजह से नहीं मरेगा.


छोटू रातदिन पढ़ता, गरीब बच्चों का मुफ्त इलाज करता. गांवदेहात के इलाकों में कैंप लगाता, मां की तरह दर्द समझता. उस का सपना था, हरिपुरा में छोटा क्लिनिक खोलेगाछोटे हरि की याद में.
सीता अब 18 की थी, कानपुर यूनिवर्सिटी में बीएड कर रही थी. वह गांव की लड़कियों को पढ़ाती, महिला समिति में सक्रिय थी. मां की तरह मजबूत, तानों से नहीं डरती. वह स्कूल टीचर बनेगी, जहां विधवाओं के बच्चों को मुफ्त तालीम देगी.


गीता 16 की थी, पुलिस की तैयारी कर रही थी. दौड़ती, जिम जाती, कानून की किताबें रटती. विजय की हैवानियत ने उसे सिखायाइंसाफ खुद लड़ कर लेना पड़ता है. वह इंस्पैक्टर बनेगी, हर राधा की आवाज बनेगी. तालाब साफ हुआ, राधा पौधे लगातीं, छोटे हरि की याद में. फूल खिलते गए. राधा बोलीं, ‘‘बेटा देखतेरी मां जी रही है, तेरे लिए.’’ झुर्रियां बढ़ीं, हिम्मत नहीं टूटी. गांव की औरतें सम्मान से देखतीं.
बारिश की शाम, छत पर खड़ीं. याद आईविजय की पहली बारिश. सपना रह गया. अंदर गईं, लोरी सुनाई, सो गईं. सपने में छोटे हरि आया, मुसकराया, ‘‘मांमैं ठीक हूं, तुम मुसकराओ.’’ सुबह नम आंखें, मुसकान आई, उम्मीद जगी. हरिपुरा बदला. राधा महिला समिति में हौसला देतीं, ‘‘मजबूत रहोटूटना नहीं. बच्चों के लिएसब सहना.’’


सपने पूरे हुए. छोटू मैडिकल में टौप कर रहा था, सीता कालेज में गोल्ड मैडलिस्ट, गीता पुलिस भरती में सिलैक्ट. राधा गर्व करतीं, आंसू खुशी के. ‘‘मेरा छोटे हरितुम सब में जी रहा है. मेरे बच्चेमेरी दुनिया, मेरी ताकत.’’ समय बीता, राधा अब 70 पार कर चुकी थीं. बाल सफेद, कद झुका, लेकिन आंखों में वही चमक. छोटू ने हरिपुरा मेंछोटे हरि मैमोरियल क्लिनिकखोला. सीता नेराधा देवी विद्या मंदिरशुरू किया. गीता कानपुर में इंस्पैक्टर बनी. राधा अब गंगा को निहारतीं. तालाब अब बगीचा बन चुका था. गांव वालेराधा मांकहते. आखिरी सर्दी में, राधा बीमार पड़ीं. बिस्तर पर लेटीं, बच्चों ने घेरा. छोटे हरि सपने में आया, हाथ बढ़ाया.


हलकी आवाज में राधा बोलीं, ‘‘ रही हूं बेटा…’’ आंखें बंद हुईं, मुसकान बरकरार. राधा मां नहीं रहीं.
अंतिम संस्कार गंगा तट पर हुआ. तालाब पर पत्थर लगा, ‘राधा मां : मां, योद्धा, प्रेरणा’. 20 अक्तूबर कोराधा स्मृति दिवसमनाया जाता है. उस रात गंगा की लहरें ऊंची उठीं. हवा में लोरी गूंजी. राधा की आत्मा बच्चों में, फूलों में, गंगा में समा गई. दर्द खत्म हुआ, प्यार अमर हो गया. राधा मां चली गईं, लेकिन उन की कहानी हर मां के दिल में धड़कती रहेगीटूट कर भी टूटने की, खो कर भी जीतने की.                    Hindi Story

Hindi Story: सांवली

Hindi Story: शहर से काफी दूर बसा सज्जनपुर गांव पुराने समय से ही 3 हिस्सों में बंटा था. इस गांव के राजामहाराजा और बड़ेबड़े जमींदार एक जगह बसे थे. उन के सारे मकान पक्के थे. पैसे की कोई कमी नहीं थी, इसलिए उन के बच्चे अपना ज्यादा समय ऐशोआराम में बिताते थे.


दूसरे हिस्से में ब्राह्मण और राजपूत थे. कुछ मुसलिम भी थे. तीसरा हिस्सा पिछड़ी जाति या दलित तबके का था. उन लोगों की बस्ती अलग पहाड़ीनुमा टीले पर थी. उन के घर फूस के बने थे. वे लोग पैसे वाले जमींदारों, राजामहाराजाओं की मेहरबानी पर गुजरबसर कर रहे थे. उस गांव में एक प्राइमरी स्कूल था. 30-40 गांवों के बीच महज एक ही स्कूल था. आसपास की सारी सड़कें कच्ची और बड़ेबड़े गड्ढों वाली थीं.
उन सभी गांवों से स्कूल को जोड़ने वाली सड़कें जब पक्की हो गईं, तो स्कूल भी चल निकला और 2-3 साल में हाईस्कूल बन गया. फिर वहां इंटर तक की पढ़ाई शुरू हो गई थी.


दलित झोंपड़पट्टी का कोई बच्चा वहां पढ़ने नहीं आता था.
कहा जाता है कि महात्मा गांधी और भीमराव अंबेडकर भी एक बार वहां गए थे. दलितों के पक्के मकान बनवाने के वादे भी किए गए थे, पर महात्मा गांधी की हत्या के बाद उन दलितों की सुध लेने वाला कोई नहीं था. एक बार कलक्टर साहब का वहां दौरा हुआ. उन्होंने वहां के लोगों को समझाया कि आप अपने बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजते हैं? अपने हक की जानकारी होने पर ही आप उस की मांग कर सकते हैं. सरकार बच्चों की सुविधा का खयाल करेगी, पहले उन्हें स्कूल में तो भेजिए.


बहुत समझाने के बाद एक निषाद की बेटी स्कूल जाने को तैयार हुई. फिर उस झोंपड़पट्टी के दूसरे बच्चे भी स्कूल जाने लगे. उस स्कूल के सारे मास्टर ऊंची जाति के थे. उन्हें दलित तबके के बच्चों से नफरत होने लगी, क्योंकि उन के कपड़े अच्छे नहीं होते थे. पैरों में जूते नहीं होते थे. शिष्टाचार की कमी भी थी.
स्कूल जाने वाली पहली दलित लड़की का नाम सांवली था. उसे शुरू से ही अपने कपड़ों का खयाल था. वह शिष्टाचार का पालन भी करती थी. एक तरह से वह सभी दलित बच्चों की हैड गर्ल बन गई थी. धीरेधीरे वह पढ़ने में भी होशियार हो गई.


बड़ीबड़ी आंखें, घुंघराले घने बाल, शरीर भी गठा हुआ. दुबली और मोटी. स्कूल में सब की चहेती थी सांवली. अपने महल्ले में भी सांवली का बहुत आदर होता था. लोग आपस में बात करते हुए कहते थे कि सांवली बड़ी हो कर अफसर बनेगी. कार में घूमेगी. सांवली के पिता मंगरू मल्लाह से लोग कहते, ‘देखो मंगरू, सांवली की पढ़ाई बंद मत करना. रुपएपैसे की किल्लत होगी, तो हम लोग आपस में चंदा कर के पैसे जुटाएंगे.’


जैसेजैसे सांवली बड़ी होती गई, वैसेवैसे उस की खूबसूरती भी बढ़ती गई. 9वीं जमात में आने पर सांवली के बदन पर जवानी भी दस्तक देने लगी थी. जब सांवली 7वीं जमात में थी, तब ऊंची जाति के एक मास्टर ने उस के अंकों को जानबूझ कर घटा दिया था, जिस से एक राजपूत की बेटी क्लास में फर्स्ट गई थी.
सांवली इस बात पर उस मास्टर से लड़ बैठी थी और उस ने हैडमास्टर से शिकायत भी कर दी थी. उन्होंने सांवली के साथसाथ सभी मास्टरों को बुलवा कर कहा था कि जो बच्चे जैसा लिखते हैं, उन्हें उतने ही अंक मिलने चाहिए. इस में जाति का फर्क नहीं होना चाहिए.


उस दिन से सांवली पढ़ने में ज्यादा मन लगाने लगी थी. उस की बस्ती में बिजली नहीं थी, इसलिए वह लालटेन की रोशनी में पढ़ती थी. तेल नहीं रहने पर महल्ले के कई लोग सांवली को तेल भरी लालटेन दे जाते थे. इधर सांवली का पिता मंगरू मल्लाह दिनभर मछली पकड़ता और शाम को नजदीक के बाजार में उन्हें बेचता था. अगर कुछ मछलियां बच जाती थीं, तो जमींदार को भी दे आता था. जमींदार मंगरू को कभी पैसे देते, कभी नहीं भी देते थे. सांवली 9वीं जमात में स्कूलभर में फर्स्ट आई थी. हर जगह उस की चर्चा होने लगी. राज्य सरकार ने अव्वल आने वाली लड़कियों को साइकिल देने का ऐलान किया था. सांवली को भी लाल रंग की साइकिल मिल गई थी.

अब वह साइकिल से ही स्कूल आनेजाने लगी थी. क्लास में लड़कियों की तरफ ताकझांक करने की हिम्मत लड़कों में नहीं थी, पर लंच टाइम में सभी लड़के अपनेअपने ढंग से मनोरंजन करते थे. सभी अपनीअपनी पसंद की लड़की बताते थे. मनोज नाम का लड़का कहता, ‘‘नाम भी सांवली और रंग भी सांवला. सांवली होने के बावजूद यह कितनी अच्छी लगती है. जी करता है कि चूम लूं इसे. लेकिन इशारा करने पर भी नहीं देखती है.’’ यह सुन कर दिनेश ने कहा, ‘‘साइकिल पर घंटी बजाती हुई जब वह हम सब लड़कों के बीच से गुजरती है, तो दिल पर छुरी चला देती है.’’


जमींदार राय साहब के बेटे मधुरेश ने कहा, ‘‘सांवली कहीं अकेले में मिल जाए, तो कसम से मैं इसे सीने से लगा कर चूम लूंगा.’’ अब सांवली 10वीं जमात में थी. बोर्ड के इम्तिहान भी नजदीक रहे थे. सांवली का मन पढ़ाई में ज्यादा लग रहा था. इधर लड़कों का मन पढ़ने से उचट रहा था. उस स्कूल में ही नहीं, आसपास के सभी गांवों में सांवली की चर्चा होने लगी थी. मधुरेश के पिता राय साहब को मालूम हो गया था कि उन का बेटा पढ़ाई में जीरो है और सांवली हीरो.


एक दिन राय साहब ने मधुरेश से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे स्कूल में दलित की बेटी पढ़ाई में फर्स्ट आती है?’’
‘‘सांवली पहले से ही पढ़ाई में तेज है,’’ मधुरेश का जवाब था. एक दिन शाम को जब मंगरू राय साहब के यहां मछली देने आया, तो वे बोल पड़े,  ‘‘मंगरू, मुझे तुझ से जरूरी काम है. इधर .’’ जब मंगरू उन के नजदीक पहुंचा, तो राय साहब ने कहा  ‘‘देखो मंगरू, तुम्हारे खानदान का मेरे खानदान से आज का नाता नहीं है.’’


‘‘हां, सो तो है,’’ मंगरू ने कहा.
‘‘क्या सांवली तुम्हारी बेटी है?’’
‘‘हां सरकार, आप लोगों की दुआ से,’’ मंगरू बोला.
‘‘वह पढ़ाई में बहुत तेज है ?’’
‘‘जी हां मालिक?’’
फिर राय साहब बोल उठे, ‘‘मेरा एक बेटा है और 2 बेटियां हैं. बड़ी बेटी की शादी की बात चल रही है. दूसरी बेटी तो बहुत छोटी है.
‘‘चिंता है तो सिर्फ मधुरेश की. वह 10वीं जमात में गया है, पर उसे आताजाता कुछ नहीं है. अगर तुम्हारी बेटी सांवली उसे थोड़ा पढ़ा दे, तो वह जरूर 10वीं पास कर जाएगा.’’
मंगरू ने कहा, ‘‘अब हम क्या बताएं मालिक, यह तो सांवली ही जाने. वह क्या पढ़ती है, क्या लिखती है, मुझे नहीं मालूम.’’
‘‘देखो मंगरू, सांवली बहुत अच्छी लड़की है. वह तुम्हारी बात नहीं टालेगी. साइकिल से आएगीजाएगी. तुम जितना कहोगे, हम उस को फीस दे दिया करेंगे.’’
‘‘ठीक है मालिक,’’ मंगरू ने हाथ जोड़ कर कहा.


मंगरू रात को जब अपने घर पहुंचा, तो उस ने सांवली को राय साहब की बातें बता दीं. सांवली का कहना था, ‘‘हम दोनों तो 10वीं जमात में ही पढ़ते हैं, फिर मैं कैसे उसे पढ़ा सकती हूं?’’ लेकिन बहुत नानुकर के बाद सांवली राय साहब के यहां जा कर पढ़ाने को राजी हो गई. स्कूल से छूटती, तो सांवली सीधे राय साहब के यहां अपनी साइकिल से पहुंच जाती. मधुरेश को बिन मांगी मुराद पूरी होती नजर आई. 2-3 महीनों के बाद मधुरेश समझ गया कि सांवली बहुत भोली है, घमंड तो उस में बिलकुल नहीं. वह सांवली के गदराए बदन को देखदेख कर मजा उठाता रहा.

लेकिन जब मधुरेश की हिम्मत बढ़ती गई, तो सांवली ने पूछ लिया, ‘‘ऐसे क्यों घूरते हो मुझे?’’
सांवली के मुंह से यह सुन कर मधुरेश बहुत डर गया.
‘‘मधुरेश, तुम मेरी तरफ घूरघूर कर क्यों देखते हो? बोलो ?’’ सांवली ने फिर पूछा.
‘‘जी करता है कि मैं तुम्हें चूम लूं,’’ मधुरेश धीरे से बोला.
सांवली ने कहा, ‘‘तो चूम लो मुझे, पर दूसरी चीज मत मांगना.’’
मधुरेश चुप रहा.
सांवली अपने गालों को उस की तरफ बढ़ाते हुए बोली,  ‘‘तो चूम लो .’’
मधुरेश उस को चूमने लगा, तो सांवली उस के सीने से चिपक गई.
इस तरह मधुरेश और
सांवली का एकदूसरेके प्रति खिंचाव बढ़ता गया.
मैट्रिक बोर्ड का रिजल्ट गया था. सांवली का नंबर पूरे राज्य में पहला था और मधुरेश भी सैकंड डिविजन से पास हो गया था.
रिजल्ट के बाद जब वे दोनों मिले, तो सांवली बोली, ‘‘मधुरेश, तुम मुझे चाहते हो ? शादी करोगे मुझ से?’’
मधुरेश का जवाब था, ‘‘मैं वादा करता हूं.’’
‘‘तो अपने पिताजी को समझाओ.’’
मधुरेश ने कहा, ‘‘पिताजी तो मुझ से ज्यादा तुम से खुश रहते हैं.’’
रात को सांवली ने अपने मातापिता को मधुरेश की बात बता दी.
मंगरू उसे समझाते हुए बोला, ‘‘देखो सांवली, प्यार सिर्फ बड़े लोगों के लिए है, पैसे वालों के लिए है, हम जैसे गरीब को यह सुहाता नहीं है.
‘‘क्या राय साहब अपने बेटे की शादी हम जैसे गरीब निषाद से करेंगे? नामुमकिन. वैसे, राय साहब तुम्हारी
जीभर कर तारीफ करते हैं. देखता हूं कि वे क्या कहते हैं.’’
एक शाम को मंगरू मछली ले कर राय साहब के यहां पहुंचा और उन से हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘सरकार, मैं आप से एक भीख मागने आया हूं.’’
‘‘कैसी भीख? ’’
‘‘आप का बेटा मधुरेश मेरी बेटी
से शादी करना चाहता है,’’ मंगरू ने डरतेडरते कहा.
यह सुनते ही राय साहब अपना आपा खो बैठे और मंगरू पर गरज पड़े, ‘‘तुम्हारी बेटी की हिम्मत कैसे हुई मेरे बेटे पर डोरे डालने की…’’
फिर वे एक मोटा सा डंडा ले
आए और जानवरों की तरह मंगरू पर बरसाने लगे. मंगरू बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ा. राय साहब के लोगों ने उसे उठा कर सड़क के किनारे पटक दिया. मंगरू के पीटे जाने की खबर चारों ओर फैल गई थी. दलित बस्ती के लोग उग्र हो चुके थे. जल्दी ही मंगरू को अस्पताल पहुंचाया गया. उस की हालत चिंताजनक थी.


सांवली यह खबर सुन कर बेहोश हो गई थी. 2 दिनों के बाद दलित बस्ती के टीले पर गांव वालों की सभा बुलाई गई. तय हुआ कि कोई भी दलित किसी भी काम के लिए ऊंची जाति की बस्ती में कभी कदम नहीं रखेगा. एक महीने बाद राय साहब की बेटी की शादी थी. घर में चहलपहल थी. सारे सामान दूसरे शहर से मंगवाए गए थे. आज राय साहब का घर जश्न में डूबा हुआ था, उधर दलित बस्ती में हाहाकार मचा था, क्योंकि मंगरू दम तोड़ चुका था. दाह संस्कार के बाद सारे गांव वाले थाने पर टूट पड़े. वहां आग लगा दी गई. थानेदार भाग कर राय साहब के घर में छिप गया था. अगले दिन से धीरेधीरे माहौल शांत हो गया, पर राय साहब का घमंड ज्यों का त्यों बना हुआ था.


बरसात का मौसम गया था. सज्जनपुर गांव के बगल का बांध अचानक टूट गया और ऐसी भयंकर बाढ़ आई कि पूरा गांव बह गया. दलितों की बस्ती बहुत ऊंची थी, इसलिए महफूज थी. वहां के लोगों ने अपनीअपनी नावों से बहुत से लोगों को बह जाने से बचाया था. सांवली निषाद की बेटी थी, इसलिए वह अच्छी तैराक भी थी. वह किनारे पर नाव ले कर खड़ी थी कि एक टूटीफूटी नाव में राय साहब का पूरा परिवार खुद को बचा रहा था. नाव में पानी भर गया था. उस में सेसांवली बचाओ’, ‘सांवली बचाओकी आवाजें रही थीं.


सांवली का चाचा चिल्ला उठा, ‘‘उन्हें मत बचाओ सांवली.’’
इतने में राय साहब की नाव पानी से पूरी तरह भर गई थी.
सांवली का दिल पिघल कर मोम हो गया. वह झट से अपनी नाव को बड़ी तेजी से उन की ओर बढ़ाने लगी. राय साहब के परिवार के सारे लोग सांवली की नाव को पकड़ने लगे.
कुछ देर बाद कोई चिल्लाया, ‘‘मधुरेश डूब गया है.’’
सांवली झट से पानी में कूद गई. एक डुबकी के बाद उसे मधुरेश का कुछ
पता नहीं चला, तो उस ने दूसरी बार डुबकी लगाई.


इधर किनारे पर खड़े राय साहब के परिवार के सदस्य रो रहे थे. जब सांवली ने तीसरी बार डुबकी लगाई, तो वह मधुरेश को खींचती हुई पानी से बाहर निकाल लाई. एक नाव में मधुरेश को अस्पताल ले जाया गया. राय साहब का पूरा परिवार वहां था. जैसे ही मधुरेश की आंखें खुलीं, सामने सांवली को देख कर उस ने उस के पैरों में सिर झुका दिया और रोने लगा. मधुरेश को बिलखता देख कर सांवली भी उसे अपनी छाती से लगा कर रोने लगी. राय साहब सिर झुकाए खड़े रहेवे अपने किए पर शर्मिंदा लग रहे थे.   

श्यामानंद झा

Hindi Kahani: लुट गई जोगी तेरे प्यार में

Hindi Kahani: जमीला और शर्मिला पक्की सहेलियां थीं. उन की दोस्ती को देख कर घरपरिवार वाले और पड़ोसी उन्हें दो जिस्म एक जान कहते थे. दोनों सहेलियों ने गांव में ही एकसाथ पढ़ाई की थी. आगे की पढ़ाई के लिए गांव में स्कूल होने, गरीबी और परदा प्रथा की वजह से उन के परिवारों ने आगे दिलचस्पी नहीं दिखाई. नतीजतन, वे दोनों घर पर ही रह कर परिवार के साथ बीड़ी बनाने का काम करने लगीं.
जमीला कब जवान हो गई, उस की सम? में नहीं आया. घर के बड़ेबूढ़े जब उसे टोकते, ‘बड़ी हो गई है तू, ठीक से दुपट्टा ओढ़ कर बाहर निकला कर. अकेले घूमने मत जाना. बहू, इसे नकाब ला कर दे. अब कोई छोटी बच्ची थोड़े ही है, बड़ी हो गई…’


वह सोचती, ‘आखिर मु? में ऐसा क्या हुआ है? जब मैं स्कूल जाती थी, तब कोई कुछ नहीं कहता था.’
शर्मिला की शादी पास के गांव में हो गई और जमीला अकेली रह गई. दिल की बात कहनेसुनने वाला कोई रहा. उस की जिंदगी कैद के पंछी की तरह रह गई. बीड़ी बनाते और घर का काम करतेकरते उस का दम घुटने लगा. समय पंख लगा कर उड़ने लगा. जवानी जमीला को जिंदगी का मजा लूटने की दावत देने लगी. वह अंदर ही अंदर कसमसाने लगी. जब वह जवान जोड़ों को देखती, तो उस की बेचैनी और बढ़ जाती. शहनाई की आवाज सुन कर वह जोश में जाती. ‘‘जमीला के अब्बू, देखनाजमीला को क्या हुआ है…’’ उस की मां ने घबरा कर आवाज दी.


‘‘आया बेगम,’’ बाहर अपने दोस्तों के साथ बैठे जमीला के अब्बू जावेद मियां ने कहा. वे दौड़ेदौड़े बैठक में आए, जहां जमीला अकेली बैठी बीड़ी बनातेबनाते बेहोश हो कर गिर गई थी. ‘‘क्या हुआ बेटी, देखो मु?आंखें खोलोबेगम, पानी लाओइस के मुंह पर पानी के छींटे मारो,’’ जावेद मियां ने कहा. तब तक उन के दोस्त भी अंदर गए थे. ‘‘कैसे हो गया यह सब?’’ मौलाना ने पूछा, जो जावेद के दोस्त थे.
‘‘क्या बताऊंजमीला बैठी बीड़ी बना रही थी कि एकाएक बेहोश हो कर गिर पड़ी,’’ जमीला की मां ने बताया. मौलाना ने ?ाड़फूंक शुरू कर दी. मुंह पर पानी के छींटे मारे, प्याज सुंघाई गई और तकरीबन आधा घंटे बाद जमीला को होश गया. जमीला कुछ थकीथकी सी लग रही थी, इसलिए उसे आराम करने की सलाह दे कर जावेद मियां के दोस्त वहां से चले गए. दूसरे दिन मौलाना ने जावेद मियां के घर पर दस्तक दी. दोनों बैठ कर जमीला की बीमारी पर बातचीत करने लगे.


‘‘देखो जावेद मियां, ऐसे हालात में लड़की की शादी करने में मुश्किल आएगी,’’ मौलवी ने कहा. ‘‘बात तो सही है, पर इस का कोई उपाय तो बताओ? ‘‘जमीला के ठीक होते ही मु? जैसा भी लड़का मिलेगा, मैं उस की शादी कर दूंगा,’’ कह कर जावेद मियां चुप हो गए. ‘‘ठीक है, मैं पता करता हूं, फिर तुम्हें खबर करूंगा…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘अब मैं चलता हूं.’’ तकरीबन हफ्तेभर बाद मौलाना जावेद मियां के घर दोबारा आए. ‘‘आओ मौलाना, काफी दिन बाद आना हुआ,’’ जावेद मियां ने कहा. ‘‘मैं तुम्हारे काम में लगा था. बड़ी मुश्किल से एक शख्स मिला है. उस का कहना है कि वह लड़की को ठीक कर देगा. कुछ वक्त लगेगा, पैसा भी खर्च होगा. जब तक ?ाड़फूंक चलेगी, तब तक यह बात किसी तक पहुंचे, वरना इल्म टूट जाएगा.’’ ‘‘मौलाना, मु? हर शर्त मंजूर है. तुम आज से ही इलाज शुरू करा दो. अपनी बेटी की बेहतरी के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.’’


मौलाना के मन में खोट था. उस ने अपने एक दूर के साले असद से इस पूरे मसले पर पहले ही बात कर ली थी. मौलाना ने उस से कहा था, ‘देखो मियां, मैं ने सौदा पटा लिया है. जावेद मियां की जमीन अपनी जमीन से लगी हुई है. हमें उसे हड़पना है. अब जा कर फंसा है. पहले तो बड़ीबड़ी बातें करता था, खेत जाने का रास्ता बंद कर दिया था, इसलिए मजबूरी में मु? उस से दोस्ती करनी पड़ी. तुम ऐसी चाल चलो कि जावेद की जमीन बिक जाए और वह मु?मिल जाए.’ असद एक शातिर बदमाश था. उस की बीवी उस की हरकतों से तंग कर पिछले 10 सालों से अपने मायके में बैठी थी. गांव के भोलेभाले लोगों को गंडेतावीज बना कर देना, उन से रकम ऐंठना उस का पेशा था. असद ने जावेद मियां के घर कर अपना काम शुरू कर दिया. शुरूशुरू में तो जमीला को कुछ भी अच्छा लगा, लेकिन अकेले में पराए मर्द को पा कर वह धीरेधीरे खुश रहने लगी. जब असद को महसूस हुआ कि जमीला उस की ओर खिंच रही है, तो उस ने जावेद मियां से कहा, ‘‘जावेद साहब, कुछ जरूरी काम से मैं 1-2 दिन के लिए घर जा रहा हूं, लेकिन जल्दी ही वापस जाऊंगा.’’


जाने से पहले मौलाना और असद के बीच साजिश की लंबी बात चली. इसी के तहत वह अचानक अपने घर चला गया. इधर जावेद मियां परेशान हो उठे, क्योंकि जमीला फिर से बारबार बेहोश होने लगी थी.
वे घबरा कर मौलाना के पास गए और असद को जल्द से जल्द बुलाने की गुहार लगाई. मौलाना की खबर पा कर असद वापस आया ही था कि 8-10 मर्द और औरत उसे ढूंढ़ते हुए जावेद मियां के घर जा पहुंचे.
वे सभी गुजारिश करने लगे, ‘जोगी बाबा गांव वापस चलो, हम सब परेशान होने लगे हैं.’ इसी बीच मौलाना ने कर लोगों को सम?ाया कि आप के जोगी बाबा 2 दिन बाद आप के पास जाएंगे. रात में असद उर्फ जोगी बाबा के शरीर में भयानक हलचल होने लगी और वह जोरजोर से हंसने लगा. घर के सभी लोग जाग गए. बाहर से आए उस के चेले दुआ मांगने लगे, परेशानी से बचने के उपाय पूछने लगे. जोगी बाबा का गुस्से से भरा मिजाज देख कर सब डर गए. असद ने बताया कि जावेद के घर के पीछे किसी ने काला जादू कर दिया है, उसे निकाल कर नदी में डाल दो. पर सावधान, किसी की जान जा सकती है. 5 क्विंटल पुलाव बना कर फातिहा दिलाओ और पहले कहीं से काले जादू की पुडि़या ढूंढ़ो.

ज्यादा से ज्यादा लोगों को खाना खिलाओ. जोगी बाबा जो कहे वह करो. सब ठीक हो जाएगा.
काफी मशक्कत के बाद आखिर कपड़े में लिपटी एक पुडि़या मिल गई. उस पुडि़या में हड्डी, काजल, सिंदूर, अनाज, काली चूड़ी वगैरह मिली. शक अब यकीन में बदल गया. ‘‘जावेद मियां, बात को सम?…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘बच्ची प्यारी है या जायदाद. तुम ऐसा करो कि मेरे नाम जमीन की रजिस्ट्री कर दो. पूरा खर्चा मैं करता हूं. जब पैसा हो, तो मेरा पैसा लौटा देना और जमीन वापस ले लेना.’’ मौलाना ने अपनी चाल से जावेद को फांस लिया. अंधविश्वास में फंसे जावेद ने मौलाना की बात मान कर जमीन की रजिस्ट्री उन के नाम कर दी. इधर असद उर्फ जोगी बाबा ने ऐसी चाल चली कि जमीला ने अपनेआप को उस के हवाले कर दिया. अब वे दोनों बीमारी की आड़ लेकर जिंदगी का मजा लूटने लगे. ?ाड़फूंक के बहाने अब दोनों को कोई नहीं रोक पाता था. जमीला को जब से पराए मर्द का चसका लगा था, तब से वह खुश रहने लगी थी. उस के मांबाप इसे जोगी बाबा की ?ाड़फूंक का नतीजा मान रहे थे.

धीरेधीरे साल पूरा होने को आया. उस के मांबाप को जमीला की शादी की फिक्र होने लगी और वे
लड़के की तलाश में जुट गए. इस बात की भनक असद को लग गई. वह मौका पा कर वहां से रफूचक्कर हो गया. इसी बीच जमीला की शादी पक्की हो गई, लेकिन एक दिन वह अचानक बेहोश हो कर गिर पड़ी.
लोगों के ?ाक?ोरने पर भी होश नहीं आया, तो उसे अस्पताल ले जाया गया. लेडी डाक्टर ने जांच करने के बाद कहा, ‘‘हम ने बच्ची को देख लिया है. अब वह होश में गई है. आप उस का खयाल रखिए. भारी चीज उठाने दें, क्योंकि आप की बेटी मां बनने वाली है.’’ लेडी डाक्टर की यह बात सुन कर जावेद, उस की बेगम और रिश्तेदारों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उन की जमीला ढोंगी जोगी के प्यार में लुट चुकी थी.  Hindi Kahani

लेखक  ए. खान

Hindi Story: सफेद दाग

Hindi Story: शादी के 3 साल गुजर जाने के बाद भी रमतिया की गोद सूनी थी. रमरतिया का पति जागेश्वर उस से दूर भागता था, जबकि रमरतिया अपनी जोबन की आग में झुलस रही थी. पर इस सब की वजह क्या थी?

गां का हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर था, जहां सिर्फ पैसेंजर ट्रेनें ही रुकती थीं. रमरतिया अपने घर के दरवाजे पर ताला लगा कर शाम के साढ़े 6 बजे वाली पूरब दिशा की ओर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन पकड़ने स्टेशन आई थी. वह अपने मायके जा रही थी. उस के भाई की शादी जो थी. रमरतिया के मायके से उसे लेने के लिए 2-3 बार छोटा भाई आया था, लेकिन उस के पति जागेश्वर ने उसे यह कह कर वापस भेज दिया था कि शादी का दिन नजदीक आने पर एक दिन वह खुद रमरतिया को छोड़ देगा.


पर आजकल करतेकरते शादी को जब 3 दिन रह गए, तो जागेश्वर ने कहा, ‘‘रमरतिया, मु झे तुम्हें मायके छोड़ने की फुरसत नहीं है. तू 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अकेले ही चली जाना. हां, शाम वाली पैसेंजर से मैं भी जाऊंगा, फिर 3-4 दिन ससुराल में ऐश करूंगा,’’ यह कह कर जागेश्वर पश्चिम दिशा की ओर जाने वाली सुबह 7 बजे की पैसेंजर ट्रेन से अपनी ड्यूटी पर चला गया था. जागेश्वर गांव के उस हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पश्चिम दिशा उतर कर एक गांव के स्कूल में क्लर्क की नौकरी करता था, जबकि रमरतिया का मायके गांव के हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पूर्व दिशा की ओर था.


रमरतिया की शादी को 3 साल गुजर गए हैं, पर अभी तक उस की गोद सूनी थी. इस की वजह यह थी कि जागेश्वर उसे बिलकुल पसंद नहीं करता था, क्योंकि उस के शरीर पर जगहजगह सफेद दाग थे. इस वजह से वह उस के पास आने में घिन महसूस करता था. जागेश्वर घर पर केवल भोजन से मतलब रखता था, फिर बिस्तर लपेट कर बगल में दाबे हुए बाहर चला जाता था और मड़ैया में बिछी खाट पर सो जाता था या जब खलिहान में फसल होती, तब खलिहान में सोता था.


सावनभादों की रातें हों या वसंत की चांदनी रातें, रमरतिया अपने जोबन की आग पर काबू कर के किसी तरह अकेली समय काट लेती. वह सोचा करती कि औरत का जन्म पा कर जिस को खूबसूरत शरीर नहीं मिला उस की जिंदगी बेकार है और उन्हीं बेकार औरतों की श्रेणी में एक वह भी है. कभीकभी जब वह अपने पति जागेश्वर को चायपानी देते समय उंगलियों से छू देती या फिर मुसकरा देती, तब वह उसे डांटते हुए बोल उठता, ‘‘मुसे तू अपनी जवानी की प्यास बु झाना चाहती हैमैं तेरी जैसी बदसूरत औरत को भला क्यों भोगूं, मु झे तो खूबसूरत औरतें मिलती रहती हैं. तू जवानी की आग में जल मरे , मैं तब भी तु झे हाथ तक नहीं लगाने वाला.’’


यह सुन कर रमरतिया की आंखों में आंसू छलक आते. वह मन ही मन  जागेश्वर को कोसती हुई बुदबुदाती रहती, ‘‘बाजारू औरतों के चक्कर में पड़ना ठीक तो नहीं होता राजा, लेकिन मैं सम झाऊं भी तो कैसे…’’
प्लेटफार्म पर बनी सीमेंट की लंबी कुरसी पर बैठी रमरतिया अपनी प्लास्टिक की डोलची हाथ में थामे यह सब सोच ही रही थी कि पैसेंजर ट्रेन आने की सूचना हो गई. मुसाफिर अपनी जगह से उठ कर पश्चिम दिशा की ओर  झुक झुक कर रेल की पटरियों को देखने लगे. जागेश्वर के कहे मुताबिक रमरतिया तो सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन ही पकड़ने वाली थी, पर बाल संवारने, नाखून रंगने और पांव को आलता से रंग कर सजनेसंवरने में उसे देर हो गई थी.


सजसंवर कर जब रमरतिया आईने के सामने खड़ी होती, तो किसी अप्सरा से कम थोड़ी लगती, पर उस का आदमी तो उस के शरीर के सफेद दाग से बिदका हुआ रहता. सांचे में ढले उस के बदन के कसाव और उभार पर तो कभी उस की नजर ही नहीं गई. सुहागरात को ही लालटेन की रोशनी में रमरतिया के शरीर के सफेद दाग देख कर जागेश्वर ऐसा बिदका था कि फिर रात में कभी नहीं पास आया. हर समय कहता रहता, ‘‘बेकार लड़की से शादी करा दी. जब जवानी की आग में तड़पेगी तब पता चलेगा कि किसी भोलेभाले लड़के से सफेद दाग वाली बात छिपा कर शादी करने का नतीजा क्या होता है.’’


जागेश्वर शाम को स्कूल से छुट्टी होने पर सीधे स्टेशन आया और अपनी ससुराल तक के स्टेशन का टिकट ले कर शाम वाली पैसेंजर ट्रेन में सवार हो गया. उसे पूरी तरह भरोसा था कि रमरतिया सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अपने मायके पहुंच कर घरपरिवार के माहौल में घुलमिल गई होगी. चलो, रात के 10 बजे तक तो वह भी पहुंच ही जाएगा वहां. शादीब्याह वाले घरों में वैसे भी 10-11 बजे तक चहलपहल रहती ही है. ट्रेन में बैठा हुआ जागेश्वर यह सब सोचतेसोचते कभीकभी  झपकी लेने लगता. बीच के स्टेशनों पर लोग चढ़तेउतरते रहे. उस ने खिड़की से बाहर  झांका, तो पता लगा सूरज डूब चुका था और अंधेरा हो गया था.


अरे, यह तो उस के गांव का स्टेशन तुलसीपुर है. यहां तक आतेआते ट्रेन पूरे डेढ़ घंटे लेट हो गई थी. अब पूरे 8 बज   रहे थे. उसे प्यास लगती महसूस हुई. अगले ही पल वह तुलसीपुर स्टेशन पर हैंडपंप से पानी पीने ट्रेन से नीचे उतर पड़ा, यह सोच कर कि वहां कुछ देर तक तो ट्रेन रुकती ही है. गुलमोहर के पेड़ तले वाला हैंडपंप पास ही तो था. जागेश्वर ने हैंडपंप के हत्थे पर जोर डाल कर चलाया और जल्दी से 8-10 अंजुलि पानी पी डाला. तब तक ट्रेन खुल गई, तो वह दौड़ कर एक बोगी में चढ़ गया. इस बोगी में तो घुप अंधेरा है, कोई बल्ब नहीं जल रहा, शायद इस बोगी में बिजली का कनैक्शन किसी तरह से हट गया है, इसीलिए उस में कोई मुसाफिर भी नहीं चढ़ा था. जागेश्वर अंधेरे में ही बीच की एक लंबी वाली बर्थ पर बैठ गया. ट्रेन तेज रफ्तार से भागी जा रही थी.


एकाएक जागेश्वर को लगा कि उस के सामने वाली लंबी सीट पर कोई औरत लेटी है, क्योंकि उस ने शायद करवट बदली थी, तो चूडि़यों की खनकने की आवाज आई थी. वह सोचने लगा, ‘इस अंधेरी बोगी में जहां हाथ को हाथ नहीं सू रहा और यहां औरतजरूर कोई पागल औरत होगी…’ पर जागेश्वर के मन का शैतान अगले ही पल उछलकूद करने लगा. वह सोचने लगा कि काश, यह औरत उस के मन की मुरादनहींनहींऐसी पागल औरत से जिस्मानी रिश्ता बनाना खतरे से खाली नहीं, एड्स का शिकार हो जाएगा.
मन में यह सम तो जागेश्वर को आई पर अगले ही पल हवस के भेडि़ए ने उस के मन पर कालिख पोत दी और उस की हथेलियां सीट पर कुछ टटोलने लग गईं. अगले ही पल उस औरत के पांव की पायल छू गई, साथ ही चिकनी नरम चमड़ी.


अरे, यह औरत तो कुछ भी नहीं एतराज कर रही, शायद इस का मन भी…’ जागेश्वर का हौसला बढ़ गया. उस ने दोबारा अपनी हथेलियां उस की पिंडलियों तक पहुंचा दीं. वह औरत अभी भी खामोश थी. जागेश्वर को अब पूरा यकीन हो गया कि यह औरत उसे मना नहीं करेगी. जागेश्वर का हौसला बढ़ता गया और उस की हथेलियां एकएक बित्ता ऊपर बढ़ती गईं. औरत खामोश रही. हवस का भेडि़या अगले ही पल मांसपिंड पर टूट पड़ा और स्वाद चख कर शांत हो गया. पैसेंजर ट्रेन बीच के कई स्टेशनों को पार करती जागेश्वर की ससुराल वाले रेलवे स्टेशन पर जा लगी. इस बीच में उस बोगी में अंधेरा देख कर कोई भी मुसाफिर नहीं चढ़ सका था. ट्रेन रुकते ही जागेश्वर स्टेशन पर उतर पड़ा. अभी वह नीचे उतर कर खड़ा ही हुआ था कि वह औरत भी  झटपट उतर पड़ी.


स्टेशन के उजाले में जागेश्वर ने उस औरत को देखा, तो जैसे वह उस से नजरें नहीं मिला पा रहा था. वह हकलाता हुआ बोल पड़ा, ‘‘रेरमरतियातूइस अंधेरी बोगी में…’’ ‘‘हां, मैं रमरतिया ही हूं, सुबह वाली पैसेंजर ट्रेन छूट गई थी. जल्दी में स्टेशन पर इस शाम वाली ट्रेन में चढ़ी तो अंधेरी बोगी मिल गई. ट्रेन जब खुल गई तो मैं ने देखा कि तुम स्टेशन के हैंडपंप से पानी पी कर दौड़ कर इसी बोगी में चढ़ गए थे. ‘‘मैं चुपचाप बोगी के बीच में पहुंच कर एक सीट पर लेट गई. मैं जानती थी कि तुम इसी तरह ट्रेनों में, बाजारों में, गलीकूचों में औरतों की तलाश करते रहते हो और अपनी जवानी की प्यास बु झाते फिरते हो.


‘‘यही सोच कर मैं एक लावारिस औरत की तरह पड़ी रही, ताकि आज इस ट्रेन में तुम से मेल कर के यह एहसास करा सकूं कि शरीर तो एक ही होता है, चाहे वह काला हो, गोरा हो या सफेद दाग से भरा हो.
‘‘अगर मन स्वीकार कर ले तो सारी कमियां दूर हो जाती हैं, क्योंकि हर औरतआदमी के मिलन का सुख एक सा हुआ करता है,’’ यह कह कर रमरतिया खामोश हो गई. जागेश्वर को आज रमरतिया की यह बात बहुत गहरे तक जा लगी. उस ने जो कुछ कहा, आदमी औरत के मिलन की सचाई यही तो है. इतना सुख देने वाली सेहतमंद, कसे बदन वाली पत्नी को मात्र सफेद दाग की वजह से छोड़ कर जागेश्वर इधरउधर भटकते हुए बाजारू औरतों से अपने जिस्म की प्यास बु झाता रहा.


सचमुच, जागेश्वर का मन एक औरत के प्रति क्यों इतनी गलत सोच वाला हो गया. हकीकत तो यही है कि उस की पत्नी दिलदिमाग और बरताव में किसी दूसरी औरत से कमतर तो नहीं. उसे अब बहुत पछतावा होने लगा था. शादी के कई साल बीत गए, पर वे दोनों एक घर में रह कर भी अलगअलग थे. जागेश्वर ने रमरतिया के शरीर के सफेद दाग का इलाज करवाने के लिए भी कभी नहीं सोचा. अब तो कोई भी बीमारी लाइलाज नहीं रही, देश का मैडिकल क्षेत्र बहुत विकसित हो चुका है. वह अपनी चांद सी पत्नी के सफेद दाग का इलाज जरूर कराएगा.


अगले ही पल जागेश्वर ने अंधेरे में खेत की पगडंडी पर अपनी ससुराल वाले गांव की ओर कदम बढ़ाते हुए रमरतिया को अपनी बांहों में जकड़ लिया और उस के गाल पर एक गहरा चुंबन जड़ दिया. रमरतिया मुसकरा उठी. जागेश्वर के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा, ‘‘मैं ने बहुत बड़ी भूल की है. तुम ने मेरी आंखें खोल दी हैं रमरतिया. मैं अब तुम्हें छोड़ किसी दूसरी औरत की ओर ताकूंगा भी नहीं.’’ Hindi Story

लेखक -कमलेश पांडेय ‘पुष्प’

Hindi Story: बाथरूम

Hindi Story: सरपंच सोहन ठाकुर को पराई औरतों को ताड़ने की गंदी आदत थी. वे एक दलित औरत बलुई को अपनी छत से नहाते हुए देखते और उसे पाने की तरकीब लगाने लगे. क्या सोहन ठाकुर बलुई को पा सके?

सो  हन ठाकुर की उम्र 48 साल की हो गई थी, पर उन के अंदर अब भी जवानों के जैसा जोश बरकरार था. वे जम कर खाते और दंड पेलते थे. उन का अच्छाखासा शरीर था. सोहन ठाकुर को देख कर कोई यह नहीं कह सकता था कि उन का 20 साल का एक बेटा भी है. सोहन ठाकुर की एक खूबसूरत पत्नी भी थी, जिसे वे प्यार से रूपमती कहा करते थे. गांव का सरपंच होने के नाते उन की खूब इज्जत भी थी.
गांव में सोहन ठाकुर का दोमंजिला मकान बना हुआ था, जिस के अंदर रूपमती के लिए एक खूबसूरत सी रसोई भी बड़े मन से बनवाई गई थी.


पंचायत में भी सोहन ठाकुर की बात को मान दिया जाता था. जब भी पंचायत लगती तो सोहन ठाकुर कोई भी फैसला देने से पहले एक अलग अंदाज में अपनी मूंछ पर ताव देते और फिर फैसला सुनाते और फैसला सुनाते समय उन के चेहरे पर गजब की चमक आती थी. 48 साल की उम्र होने के बाद और गांव में इतना रसूख होने के बाद भी सोहन ठाकुर का एक और पहलू था, जिसे सिर्फ वे ही जानते थे. वह पहलू यह था कि उन की आंखें किसी भी औरत का नंगा जिस्म देखने को हमेशा आतुर रहती थीं. गांव में खेतों के बीच काम करते समय मजदूर औरतों की छाती पर सोहन ठाकुर की नजरें बरबस ही जम जाती थीं.
सुबह के तकरीबन 10 बजे सोहन ठाकुर गांव के तालाब की तरफ टहलने चले जाते और वहां पर कोई कोई औरत कपड़े धोते दिख जाती, तो उस के खुले अंगों पर किसी गिद्ध की तरह उन की नजरें टिक जाती थीं.


सोहन ठाकुर के मकान के पीछे 2-3 घर दलित जाति के लोगों के थे. इन्हीं घरों में बलुई रहती थी. बलुई की उम्र 40 साल के आसपास होगी. बलुई का शरीर लंबा और मांसल पर गठा हुआ था. सांवले रंग की बलुई ब्लाउज के नीचे कुछ नहीं पहनती थी, फिर भी उस की छाती तनी ही रहती थी. बलुई अपनी पतली कमर पर साड़ी को काफी नीचे बांधती थी, इसलिए उस की गहरी नाभि साफ दिखाई देती थी. अकसर ही सोहन ठाकुर की नजरें बलुई के जिस्म का भरपूर मुआयना करती थीं. सोहन ठाकुर एक बार अपनी छत पर खड़े हो कर चारों तरफ देख रहे थे कि तभी उन के कानों में नल चलने और पानी गिरने की आवाज आई, तो उत्सुकतावश वे छत के कोने में गए और नीचे   झांकनें लगे. सोहन ठाकुर की आंखें खुशी और हैरत से फैल गईं. उन्होंने देखा कि नीचे बलुई अपने घर के कोने में लगे नल पर नहा रही थी. वजह, गांव के गरीब और दलित घरों में बंद बाथरूम नहीं होते, इसलिए औरतें खुले में ही नहाने को मजबूर होती हैं.


सोहन ठाकुर वैसे भी बहुत दिन से बलुई को घूरा करता थे, पर बलुई के तेज स्वभाव के चलते उन्होंने कभी बलुई को छूने की कोशिश नहीं की थी, पर वे बलुई के मांसल और गठीले शरीर के दीवाने तो थे ही, इसलिए रात में अपनी पत्नी रूपमती के साथ सैक्स करते, तब भी उन के खयालों में बलुई ही रहती थी.
बलुई आज सोहन ठाकुर के सामने बिना कपड़ों के नहा रही थी. वे  झ से थोड़ा सा पीछे हो गए, पर अपनी नजरें बलुई के जिस्म पर ही गड़ाए रखी थीं. बलुई अपने सांवले जिस्म को बारबार साबुन लगा कर मसल रही है, तो सोहन ठाकुर के समूचे जिस्म में हवस दौड़ गई और जब बलुई ने अपने हाथ उठा कर अपनी पीठ को रगड़ा, तब तो बलुई की जवानी खिल कर सामने ही गई.


सोहन ठाकुर जम कर बलुई के रूप के दर्शन कर रहे थे. जब बलुई नहा चुकी और कपड़े पहनने लगी, तो सोहन ठाकुर धीरे से पीछे हट गए और नीचे गए. उस दिन से रोज ही सोहन ठाकुर ने धीरेधीरे यह अंदाजा लगा लिया था कि बलुई दिन में दोपहर के तकरीबन 2 बजे नहाती है. शायद इस समय तक वह
खेतों और घर का सारा काम निबटा भी लेती होगी. अब सोहन ठाकुर बलुई को नहाते हुए घूरने का मौका तलाशते रहते कि बलुई कब नहाए और कब वे उसे घूर कर अपनी आंखों को मजा देते रहें. पर एक दिन नहाते समय अचानक बलुई की नजर ऊपर खड़े सोहन ठाकुर पर पड़ ही गई. उस दिन तो बलुई ने झाट से अपने हाथों से कैंची बनाई और अपने खुले सीने को ढक लिया और कमरे में भाग गई, पर संकोच के चलते कुछ कह सकी.


पर एक दिन बाद जब फिर से बलुई नहा रही थी, तो सोहन ठाकुर छिप कर उस के रूप के मजे ले रहे थे. तभी बलुई ने सोहन ठाकुर को देख लिया, पर इस बार बलुई डरी नहीं और सकुचाई भी नहीं. उस ने पहले तो कपड़ों से सीने को ढका और फिर तेज आवाज में सोहन ठाकुर से कहा, ‘‘अरे, ठाकुर साहब,
हमें छिप कर क्या देखते होअगर रस चखना है, तो कभी बाहर कर मिलो…’’
बलुई की आवाज सुन कर सोहन ठाकुर फौरन नीचे भाग गए कि कहीं ऐसा हो कि यह बात उन का बेटा और रूपमती जान जाएं. वे तुरंत अपने कमरे में जा कर लेट कर सोने का बहाना करने लगे, पर बलुई की कहीं गई बात उन के कानों में अब भी गूंज रही थी और मन ही मन में वे रोमांचित भी हो रहे थे.


बलुई जाति से दलित जरूर थी, पर अपने पति किसना के साथ अच्छी तरह से जिंदगी काट रही थी. उसे बस यह दुख था कि शादी के 10 साल बाद भी उन दोनों के कोई औलाद नहीं थी. हालांकि, अब तो उस ने औलाद के बारे में सोचना भी छोड़ दिया था और अपने काम पर ही पूरा ध्यान रखे हुए थी. किसना गांव के बाहर कसबे की ओर जाने वाली सड़क के किनारे पानपुडि़या और चिप्स, पानी की बोतल, कोल्डड्रिंक का खोखा लगाता था और आतेजाते लोग उस के कस्टमर होते थे. गुजारे लायक कमाई तो हो जाती थी, पर बलुई के अंदर आगे बढ़ने की और कुछ ज्यादा पैसे कमाने की मंशा भी थी, जिस से कि वह अपने पति के लिए सड़क के किनारे एक पक्की दुकान बनवा सके.


गांव में नई उम्र के लड़केलड़कियां मोबाइल चलाते, तो बलुई को भी शौक चढ़ता था कि वह भी मोबाइल पर अपनी वीडियो बनाए. बलुई को तो सुनने में यह भी आया था कि नाचगाने की रील बना कर पैसा भी कमाया जा सकता है. बलुई भी तो नाच सकती है और दूसरे लोगों से बेहतर नाच सकती है, पर इन सब चीजों के लिए उसे अच्छा मोबाइल चाहिए और मोबाइल लेने के लिए पैसा चाहिए, जो फिलहाल तो बलुई और उस के मरद के पास नहीं था. उस दिन शाम ढले बलुई जब पास के बाजार से वापस रही थी, तब रास्ते में उसे सोहन ठाकुर मिल गए. वे बलुई को सामने देख कर थोड़ा डर गए, पर बलुई उन्हें देख कर मुसकरा दी, तो सोहन ठाकुर का साहस बंध गया और वे उस के तराशे बदन को ऊपर से नीचे देखने लगे.
‘‘देखने के भी पैसे लगेंगे ठाकुर साहब,’’ बलुई ने इठलाते हुए कहा तो सोहन ठाकुर को ग्रीन सिगनल मिल गया. उन्होंने ?ाट से 100 का नोट निकाल कर बलुई की तरफ बढ़ाया, तो बलुई ने लेने से मना कर दिया और बोली, ‘‘इतने में तो हमारे पैर ही देख पाओगे ठाकुर साहब…’’


सोहन ठाकुर सम? गए थे कि बलुई ज्यादा पैसे चाहती है और पैसों के बदले उस के हुस्न का मजा भी लिया जा सकता है, इसलिए उन्होंने 500 रुपए निकाले और बलुई को दे दिए, पर बलुई इतने में भी नहीं मानी, तो उन्होंने उसे 1,000 रुपए देने का वादा किया. सोहन ठाकुर की बात मान कर बलुई एक गन्ने के खेत की तरफ बढ़ गई और सोहन उस से दूरी बना कर पीछे चल दिए. गन्ने के खेत में जा कर सोहन ठाकुर ने बलुई के जिस्म से जरूरी कपड़े हटाए और उस खूबसूरत औरत के जिस्म को जम कर भोगा.
बलुई ने देखा कि सोहन ठाकुर उस के जिस्म को किसी कुत्ते की तरह चाट रहे थे. वह सोच रही थी, ‘हम को नीच जात का कह कर हमारे हाथ से पानी तक नहीं पीते हैं और इस समय अपनी जीभ भी हमारे अंदर डालने से इन्हें परहेज नहीं…’


सोहन ठाकुर और बलुई का यह सिलसिला शुरू हुआ, तो फिर आगे आने वाले दिनों में भी जारी रहा. बलुई पैसों के बदले खुद को ठाकुर को सौंप देती और ठाकुर को बलुई जैसी नमकीन औरत के जिस्म का मजा मिल जाता, पर बलुई इतनी बेवकूफ नहीं थी और है वह चरित्रहीन थी. उस ने अपने पति से धोखा किया था, पर वह तो सोहन ठाकुर को अपना जिस्म सौंप कर कुछ पैसे इकट्ठे कर लेना चाहती थी, जिस से वह अपने नहाने के लिए एक छत वाली जगह बनवा सके, ताकि सोहन ठाकुर उसे और घूर सकें.


एक दिन खेत में जब सोहन ठाकुर बलुई के जिस्म में घुसने की तैयारी कर रहे थे, तभी बलुई ने उन से एक एंड्राइड मोबाइल की मांग कर डाली. ठाकुर पहले तो हिचके, क्योंकि मोबाइल थोड़ा महंगा आता है, पर बलुई ने अपने अंगों को सिकोड़ लिया और संबंध मनाने से मना कर दिया, तो सोहन ठाकुर ने मोबाइल देने के लिए मजबूरन हां कर दी और बाद में उन को बलुई के लिए एक मोबाइल खरीदना ही पड़ा.


मोबाइल पा कर बलुई बहुत खुश हो गई थी और हाई स्कूल में पढ़ने वाली एक लड़की की मदद से उस ने फेसबुक और रील्स बनाना भी सीख लिया था. इस बीच गांव में पंचायत के चुनाव की तारीख निकट आने लगी थी और सोहन ठाकुर एक बार फिर से सरपंच बनने की जुगत में लग गए थे और घरघर जा कर हाथ जोड़ कर उन्हें ही सरपंच चुनने की विनती करने लगे थे. सरपंच के बेटे मोहित सिंह को अपने पिता के कामकाज से कोई मतलब नहीं था. वह तो अपने दोस्तों की मंडली में नशे की लत में पड़ चुका था. दोस्तों को ले कर सुबह से शाम तक इधरउधर घूमता, गांजे का दम भरता और औरतों पर बुरी निगाह रखता.
उस दिन बलुई अपने घर से निकल कर खेत में काम करने जा रही थी कि तभी मोहित सिंह ने बलुई का रास्ता रोक लिया. उस की आंखों में नशा था और चेहरे से हवस टपक रही थी.


बलुई तो मोहित सिंह से उम्र में काफी बड़ी थी, पर जब इनसान के सिर पर हवस चढ़ कर बोल रही हो, तो उसे कुछ नहीं दिखता. मोहित सिंह ने बलुई को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ लिया और खेत में ले जा कर उस का रेप कर दिया. बलुई ने चीखना चाहा, पर मोहित सिंह ने अपना गमछा उस के मुंह में ठूंस दिया और अपनी मनमानी कर ली. बलुई को अपने साथ यह जबरन गलत काम बिलकुल नहीं भाया. वह सिसकती रही और घर कर नल के पानी से नहाने लगी. बलुई के मन में तूफान चल रहा था कि अगर वह आज नाइंसाफी सह गई, तो आगे आने वाले समय में जाने कितनी बार ये ऊंची जाति वाले उस के साथ रेप करेंगे. हो सकता है कि कई लोग मिल कर एकसाथ उस के साथ गलत काम करें.


ऐसा बलुई इसलिए भी सोच रही थी कि उस ने अपने बचपन में इस तरह के कई कांड होते हुए देखेसुने थे. अच्छा यही होगा कि वह अपने साथ हुए इस गलत काम के प्रति आवाज उठाए. लिहाजा, बलुई ने अपनी शिकायत को पंचायत में उठाने की बात सोची और अपने पति किसना से अपने साथ हुई वारदात को बताया. किसना दुखी हुआ और गुस्से से भर गया, पर वह जानता था कि सरपंच के लड़के पर ऐसा आरोप लगाने से कोई फायदा नहीं होगा और उस ने यह बात बलुई को सम?ाई पर बदले की भावना से भरी हुई बलुई नहीं मानी और पंचायत में जा कर अपनी शिकायत दर्ज कराई.


सरपंच सोहन ठाकुर अपने लड़के की यह करतूत सुन कर गुस्सा होने की बजाय मन ही मन खुश हो गए.
मेरे बेटे ने भी बलुई का मजा ले लिया. वाह, हमारी पसंद तो काफी मिलतीजुलती है और इस का मतलब है कि मेरा बेटा भी जवान हो गया है,’ सोहन ठाकुर ने सोचा. सरपंच के अलावा पंचायत के दूसरे सदस्यों ने बलुई के साथ हुए गलत काम पर अफसोस जताया और बलुई को भरोसा दिलाया कि उसे इंसाफ मिलेगा और इस के लिए इस हफ्ते की 8 तारीख को दोनों पक्षों की सुनवाई के लिए पंचायत को बुलाए जाने का तय हुआ.


सोहन ठाकुर के सामने दिक्कत यह थी कि अगर वे फैसला बलुई के पक्ष में देते हैं, तो बेटे को सजा सुनानी पड़ेगी और अगर बेटे के पक्ष में फैसला सुनाते हैं, तो हो सकता है कि गांव वाले आने वाले चुनाव में उन्हें वोट दें और वे हार भी सकते हैं. तय दिन और समय पर पंचायत लगी और पहले बलुई ने अपनी शिकायत रखी जिस में बलुई ने अपने साथ हुए रेप की बात बताई और इंसाफ मांगा. इस के बाद मोहित सिंह को बोलने का मौका दिया गया.


मोहित अपने कांड से साफ मुकर गया. उलटा उस ने कहा कि बलुई उस पर ?ाठा आरोप लगा रही है.
दोनों लोगों की बात पर फैसला देना था और यह फैसला सरपंच सोहन ठाकुर ने यह कह कर सुना दिया, ‘‘बलुई अपने साथ हुए रेप का कोई सुबूत नहीं ला सकी है. अगर वह अपने निजी अंगों को सब के सामने दिखा सके तभी तो हम जानेंगे कि रेप हुआ या नहीं. ‘‘लिहाजा, सुबूतों की कमी में मोहित ठाकुर को बरी किया जाता है और बलुई को सख्त हिदायत दी जाती है कि बिना सुबूत किसी शरीफ आदमी पर ऐसे आरोप लगाए.’’ बलुई का मन किया कि सोहन ठाकुर के मुंह पर जा कर थूक दे, पर उस ने अपनेआप को संभाला और बेइज्जती का घूंट पी लिया.


रात में जब किसना ने उसे दिलासा देने के लिए अपने गले लगाया, तो बलुई की रुलाई फूट पड़ी थी, पर इन बहते आंसुओ में बदले लेने की भावना अब भी बलवती हो रही थी. सरपंच सोहन ठाकुर को अपने फैसले पर पछतावा तो हो रहा था, पर पुत्र मोह के चलते उन्हें ऐसा फैसला करना पड़ा, जिस ने बलुई को उन से नाराज कर दिया था. बलुई सरपंच सोहन ठाकुर को सामने देख कर अपना रास्ता बदल लेती या तो उन्हें नफरतभरी निगाह से घूरती रहती थी. सोहन ठाकुर बस बलुई को देखते रह जाते थे. तकरीबन 2 महीने हो चले थे और सोहन ठाकुर को बलुई के जिस्म का मजा नहीं मिला था. अपने मन को शांत करने के लिए बलुई के नहाने के समय पर सोहन ठाकुर छत पर चले गए और हर बार की तरह इस बार भी बलुई को नहाते हुए देखने लगे.


बलुई तो पहले से ही सतर्क थी. आज वह अपने पेटीकोट को अपने सीने के ऊपर बांधे हुए थी. बलुई की कनखियों ने देखा कि सोहन ठाकुर छत पर गए हैं. उस ने ?ाट से अपने पैरों के
पास रखे मोबाइल को उठाया और सैल्फी मोड पर किया और इस तरह से अपना वीडियो बनाने लगी, जिस से बलुई का चेहरा भी एक और पीछे से ठाकुर की ?ांकती हुई वीडियो भी जाए.
बलुई ने यह काम बहुत सफाई से किया, ताकि सोहन को शक भी हो और मोबाइल में सुबूत के तौर पर यह वीडयो भी कैद हो जाए और कुछ देर में ही बलुई ने कई छोटेछोटे वीडियो के क्लिप बना लिए थे.
बलुई के सामने मोहित सिंह और उस के दोस्त अकसर पड़ ही जाते थे. आज भी जब बलुई खेत से मजदूरी कर के रही थी तो मोहित सिंह और उस के दोस्त उसे छेड़ने लगे.


‘‘यार मोहित, जवान औरतों से ज्यादा तो बड़ी उम्र की औरतों में मजा है,’’ एक दोस्त ने फिकरा कसा, तो मोहित सिंह भी भद्दी सी हंसी हंसने लगा. बलुई को तो इसी मौके का इंतजार था, ‘‘तुम ने तो बेकार में जबरदस्ती की, मांग लेते तो भी मैं मना थोड़े ही करती, बल्कि गोश्त और दारू का इंतजाम कर के आप लोगों का मन भी बहला देती,’’ बलुई ने दांव खेला, तो मोहित सिंह उस के ?ांसे में गया और तुरंत ही उस ने जेब से 1,000 रुपए निकाले और बलुई को दिए, फिर कहा कि आज शाम को वह दारू ले आए और गोश्त पका कर रखे. वे लोग आज फिर से बलुई के हुस्न का स्वाद चखेंगे.


बलुई ने पूरा जाल बिछा दिया था. उस ने पंचायत चुनाव में सोहन ठाकुर के विरोधी नेता को अपनी सारी कहानी कह सुनाई थी और उस से मदद मांगी थी. वह नेता भी बलुई की मदद के लिए तैयार था, बस अब सुबूत जुटाने की तैयारी थी. शाम को पुराने स्कूल के एक कमरे में बलुई ने दारू मंगवा ली और गोश्त पकाने लगी थी. मोहित सिंह और उस के 2 दोस्त भी गए और गोश्त पकने का इंतजार करने लगे थे.
मोहित सिंह ने पहले से ही दारू पीनी शुरू कर दी थी. थोड़ी देर बाद जब गोश्त पक गया, तब बलुई ने प्लेट में खाना लगाया और सब लोग साथ में खाने लगे.


खाना खाने के बाद मोहित सिंह की आंखों में हवस के डोरे तैर आए थे. उस ने बलुई के सीने पर हाथ रख दिया और दबाव बढ़ाने लगा. बलुई ने विरोध नहीं किया तो उस की हिम्मत बढ़ गई
और उस ने बलुई के जरूरी कपड़े ऊपर कर दिए. बलुई सम? गई कि यही सही समय है और उस ने इतने में उस ने विरोधी पार्टी के नेता को मदद के लिए फोन लगा दिया और वह फोन पर चिल्ला कर मदद मांगने लगी थी.


वह नेता तुरंत ही पुलिस ले कर गया और मौके पर ही नशे में चूर मोहित सिंह और उस के दोस्तों को गिरफ्तार कर लिया. ‘‘दारोगा साहब, सिर्फ यही कुसूरवार नहीं है, बल्कि इस का बाप भी मु? गरीब को रोज नहाते हुए देखता है,’’ बलुई ने कहा तो दारोगा के साथसाथ मोहित सिंह को भी अजीब लगा कि उस के पिता भी बलुई पर बुरी नजर रखते हैं. बलुई ने अपने मोबाइल का वीडियो पुलिस को दे दिया, जो उस ने अपने मोबाइल से शूट किया था, जिस में साफ दिख रहा था कि बलुई को सोहन ठाकुर अपनी छत से घूर रहे हैं.


सोहन ठाकुर को पुलिस ने खरीखोटी सुनाई और चेतावनी दे कर छोड़ दिया, जबकि उन के लड़के को रेप करने की कोशिश मे गिरफ्तार कर लिया गया. पंचायत चुनाव में सरपंच सोहन ठाकुर की जबरदस्त हार हुई. पूरे गांव में इन दोनों की कारिस्तानी की बात फैल गई थी और सब लोग सोहन ठाकुर और उन के लड़के मोहित सिंह के नाम पर थूथू कर रहे थे. सोहन ठाकुर की पत्नी रूपमती को जब यह बात पता चली, तो वे सीधे बलुई के घर पहुंचीं और अपने पति और बेटे की तरफ से माफी मांगी और पूरे 50,000 रुपए बलुई को दिए.


बलुई ने पैसे लेने से मना किया, तो रूपमती ने कहा, ‘‘ये पैसे मैं तुम्हें इसलिए दे रही हूं, ताकि तुम अपने नहाने की जगह एक बाथरूम बनवा सको और तुम्हें खुले आसमान के नीचे नहाना पड़े. जब तुम बाथरूम में नहाओगी, तो तुम्हें कोई भी नहीं घूर सकेगा.’’ रूपमती यह कह कर चुप हो गई थीं, जबकि बलुई सोच रही थी कि सोहन ठाकुर जैसे नीच को कितनी अच्छी पत्नी मिली है. बलुई अब मोबाइल और भी कुशलता से चलाती है और उस ने और किसना ने खूब मेहनत कर के अब और भी पैसे भी जोड़ लिए हैं, पर अभी भी इतने पैसे नहीं इकट्ठा हो पाए हैं कि वे लोग सड़क के किनारे पक्की दुकान बनवा सकें, पर पैसे कमाने की उन की कोशिश जारी है.


विरोधी पार्टी का नेता अब गांव का सरपंच है और उस ने पंचायत के 5 सदस्यों में बलुई को भी शामिल
किया है. बलुई अब गांव वालों की समस्याएं सुनती है और अपना फैसला भी सुनाती है. बलुई और सरपंच की कोशिश से अब हर घर में नहाने की जगह एक बंद छत वाला बाथरूम बन गया है. गांव की कोई औरत अब खुले में नहीं नहाती है.  Hindi Story

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