Hindi Romantic Fiction : अंधेरा

Hindi Romantic Fiction. दिनेश सोच में डूबा बुदबुदा पड़ा, ‘इतनी आसानी से मैं सबकुछ खत्म नहीं होने दूंगा. 2 दिन में लोन मिलने से रहा, पर कुछ तो करना पड़ेगा. लेकिन क्या कर सकता हूं मैं? एक ही सूरत है कि कोई मुझे 60 हजार रुपए उधार दे दे. पर कोई क्यों देगा?’

ठीक उसी समय दिनेश को याद आया कि गोयल साहब ने एक दिन उस से अपनी बेटी माधुरी को ट्यूशन पढ़ाने के लिए कहा था. दिनेश ने सोच कर बताने के लिए कहा था.

दिनेश ने सोचा कि गोयल साहब को अपनी परेशानी बता कर देखते हैं. उसे लगा कि बैंक में ऊंचे पद पर काम करने वाले गोयल साहब के लिए 60 हजार रुपए की मदद कोई बड़ी बात नहीं होगी.

दिनेश उठा और सीधे गोयल साहब के घर के लिए चल पड़ा. सुबह के 9 बजे थे. गोयल साहब लौन में बैठे चाय पी रहे थे. उन्हें देखते ही दिनेश ने अदब से कहा, ‘‘नमस्ते सर, क्या मैं अंदर आ सकता हूं?’’ ‘‘क्यों नहीं, आओ बेटे.’’

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‘‘अंकल, मैं बहुत बड़ी परेशानी में फंस गया हूं,’’ इतना कह कर दिनेश ने गोयल साहब को सारी बात सचसच बता दी. ‘‘यह तो बहुत गलत हुआ. बताओ, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं?’’ गोयल साहब ने दिनेश की तरफ हमदर्दी भरी नजरों से देख कर कहा.

‘‘सर, आप मुझे 60 हजार रुपए उधार दे दें तो…’’ दिनेश ने अपना कहा वाक्य अधूरा छोड़ दिया.

‘‘बेटा, यह एक बड़ी रकम है, लेकिन तुम्हारी जरूरत से बड़ी नहीं. मैं तुम्हें 60 हजार रुपए दे दूंगा, पर मैं चाहूंगा कि तुम माधुरी को ट्यूशन पढ़ाओ. बीएससी फर्स्ट ईयर में उस के नंबर बहुत खराब आए हैं और एक सब्जैक्ट में तो बैक पेपर भी है.’’

गोयल साहब ने रुक कर फिर आगे कहना शुरू किया, ‘‘मैं अपनी दोनों बेटियों को पढ़ाई में बहुत आगे तक देखना चाहता हूं. ‘‘मेरा कोई बेटा नहीं है, इसलिए बेटे की कमी उन्हीं से पूरी करना चाहता हूं. उन का कैरियर संवारने के लिए तुम्हें अपनी पूरी ताकत  झोंकनी होगी. मेरे हिसाब से तुम मेरी बात अच्छी तरह समझ रहे हो…’’

दिनेश ने हामी भरते हुए कहा, ‘‘जी, मैं माधुरी से मिलना चाहूंगा. कहां है वह?’’ गोयल साहब थोड़ी तेज आवाज में बोले, ‘‘प्रिया बेटी, दीदी को नीचे भेजो.’’ थोड़ी देर में माधुरी नीचे आई, ‘‘जी पापा.’’ ‘‘बेटी, आप दिनेश हैं, जो पास ही में ममफोर्डगंज में रहते हैं. आप ने बीएससी 80 फीसदी नंबरों से पास किया है.

‘‘आज से आप की पढ़ाई की जिम्मेदारी इन की होगी. आप इन की हर बात मानेंगी. अब से ये आप के गार्जियन हैं. अच्छा बेटा, तुम आपस में बात करो, मैं अभी आया.’’ ‘‘क्या नाम है आप का?’’ ‘‘माधुरी गोयल.’’ ‘‘माधुरी नाम बड़ा लंबा है. मैं आप को मधु बुलाऊंगा.’’  ‘‘जी.’’ ‘‘घर में कौनकौन हैं?’’

‘‘पापा, मम्मी, मैं और मेरी छोटी बहिन प्रिया,’’ माधुरी, जो एक मासूम चेहरे की खूबसूरत लड़की थी, ने अब की बार थोड़ा आराम से जवाब दिया.

‘‘बीएससी में क्याक्या सबजैक्ट्स हैं?’’ ‘‘मैथ्स, फिजिक्स और कैमिस्ट्री.’’ ‘‘कितने नंबर आए सभी में?’’ ‘‘फिजिक्स में 42, कैमिस्ट्री में 45…’’ ‘‘और मैथ्स में?’’ ‘‘17… बैक पेपर है.’’ ‘‘अच्छा, तो हम सब से पहले पढ़ाई मैथ्स से शुरू करेंगे.’’ ‘‘जी, ठीक है.’’

‘‘सर, मैं और मेरी सहेलियां दोपहर को फिल्म देखने जा रही हैं.’’ ‘‘ठीक है, मैं शाम को 7 बजे आऊंगा.’’ ‘‘जी, सर.’’ उसी समय गोयल साहब वहां पहुंचे और पूछा, ‘‘क्यों, हो गया इंटरव्यू?’’ ‘‘जी, अंकल.’’ ‘‘जाओ बेटी.’’ ‘‘जी पापा,’’ कह कर माधुरी वहां से चली गई.

गोयल साहब ने एक पैकेट दिनेश की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जाओ बेटा, पहले जा कर एमबीए में अपना एडमिशन कराओ.’’ ‘‘थैंक यू अंकल,’’ दिनेश एहसानमंद हो कर बोला. ‘‘सिर्फ थैंक यू कहने से कुछ नहीं होगा… तुम्हें मेरी बात तो याद है न?’’ ‘‘जी, वादा रहा. माधुरी अच्छे नंबर लाएगी.’’ ‘‘अच्छा, मुझे बैंक जाना है.’’ ‘‘जी अंकल, नमस्ते,’’ कह कर दिनेश वहां से रुखसत हुआ..

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दिनेश ने अपना एमबीए में एडमिशन करवा लिया. रामदीन का परिवार काफी खुश था.

दिनेश साढ़े 6 बजे गोयल साहब के घर के लिए निकल गया. घर पहुंचने पर मिसेज गोयल दिनेश को चाय दे गईं.

‘‘मधु…’’ ‘‘सर, मैं 10 मिनट में आई,’’ माधुरी ने शायद बाथरूम के अंदर से कहा.

10 मिनट बाद वह दिनेश के सामने कुरसी पर बैठी थी. ‘‘कितने बज रहे हैं?’’

‘‘सर, 7 बज कर 10 मिनट.’’ ‘‘मधु, यह मेरी पहली और आखिरी वार्निंग है. 7 बजे का मतलब 7 बजे. समझीं?’’

‘‘माफ कर दीजिए सर,’’ माधुरी मुंह बनाते हुए बोली.

दिनेश माधुरी को 1-2 दिन पढ़ाने में ही जान गया कि उस का मन पढ़ाई में कतई नहीं लगता, इसलिए वह पढ़ना भी नहीं चाहती है.

दिनेश फिर भी उसे पढ़ाने में लगा रहा. मधु को अपनी लापरवाही की वजह से अकसर डांट पड़ती थी. धीरेधीरे ही सही, मधु में कुछ सुधार आ रहा था.

दिनेश मधु को पढ़ाने में 2-3 घंटे रोज लगा ही देता और देखते ही देखते एक महीना गुजर गया. दिनेश आजकल काफी परेशान रहता था. उस की परेशानी की वजह थी, कालेज में चल रही रैगिंग.

दिनेश अपने दोस्त अजीत से कह रहा था, ‘‘परेशान कर के रख दिया है. पढ़ाई नहीं करने देते हैं. मेरे 2-3 घंटे गोयल साहब के यहां निकल जाते हैं, उस के बाद घर का काम. खुद के कई काम और इन अमीरजादों को रैगिंग की पड़ी है.’’

अजीत दबी आवाज में बोला, ‘‘अबे यार, जो करवाते हैं, उसे करता चल, नहीं तो ये हाथ भी उठा सकते हैं.’’  ‘‘मैं किसी से नहीं डरता. अब मैं परेशान हो चुका हूं. अगर आज कुछ हुआ, तो ठीक नहीं होगा,’’ दिनेश की आवाज में भरोसा था.

‘‘हैलो, इधर आओ चिकनो,’’ ठीक उसी समय एक सीनियर ने हाथ दे कर बुलाया. अजीत चुपचाप उस सीनियर की तरफ बढ़ गया, जबकि दिनेश वहीं चुपचाप खड़ा रहा.

यह सब देख कर वह सीनियर ताव में आ गया. उस ने कुछ और सीनियर लड़कों को आवाज दी और वे सब दिनेश की ओर बढ़े. ‘‘क्यों हीरो, क्या दिक्कत है?’’ उन में से एक ने पूछा.

‘‘कोई दिक्कत नहीं है. मेरी क्लास का टाइम हो गया है और मैं वहीं जा रहा हूं,’’ दिनेश सामान्य हो कर बोला. ‘‘बहुत अकड़ है. यहां पढ़ाई करनी है कि नहीं?’’ दूसरे लड़के ने पूछा.

‘‘क्यों, क्या यह तुम्हारे बाप का कालेज है? मैं तुम सब की शिकायत प्रिंसिपल से करूंगा,’’ दिनेश ने जवाब दिया.

ठीक उसी समय बगल से एक लड़की गुजरी. एक सीनियर ने उसे टोका, ‘‘हैलो मैडम, विश करने के लिए आप की मम्मी घर से आएंगी क्या?’’ ‘‘नो सर,’’ लड़की घबराते हुए बोली.

‘‘ऐसा कर, तू इस लड़के को किस कर,’’ एक सीनियर ने शरारत से कहा. दिनेश और वह लड़की आंखें चौड़ी कर के उस सीनियर की तरफ देखने लगे.

ठीक उसी समय वहां एक सीनियर लड़की भी आ गई और बोली, ‘‘क्यों अंजलि, तुम्हें जो बोला गया है, वह सम झ में नहीं आया?’’ सीनियर लड़की पहले ही रैगिंग के दौरान अंजलि का परिचय अच्छी तरह से ले चुकी थी.

अंजलि धीरेधीरे दिनेश की ओर बढ़ने लगी और सभी लड़के ताली बजाते हुए जोश बढ़ाने के लिए चिल्लाने लगे.

अंजलि दिनेश के पास पहुंची. उस की आंखों में आंसू भरे थे. दिनेश का चेहरा गुस्से से तमतमा गया. उस ने अंजलि का हाथ पकड़ा और बोला, ‘‘आप चलो मेरे साथ.’’

वे दोनों एक तरफ बढ़ने लगे. ठीक उसी समय एक सीनियर ने उस का कौलर पकड़ना चाहा कि दिनेश ने उस के चेहरे पर एक जबरदस्त घूसा मारा. वह सीनियर बिलबिलाता हुआ पीछे हटा. तालियोें का शोर बंद हो गया. दूसरे लड़कों में से एक ने एक घूंसा दिनेश के चेहरे पर दे दिया. दिनेश की नाक से खून बहने लगा.

दिनेश ने नाक से आते खून को देखा और अंजलि का हाथ छोड़ कर टूट पड़ा उन पर. सभी उस का गुस्सा देख कर घबरा गए और पीछे हट गए.

दिनेश अंजलि को ले कर भीड़ से अलग चला गया और कुछ दूर जाने के बाद वह अंजलि का हाथ छोड़ता हुआ बोला, ‘‘माफ कीजिए, मेरी वजह से आप को परेशानी हुई. दरअसल, मु झे परेशान करने के लिए उन्होंने आप को वहां बुलाया था.’’

‘‘पर, आप को तो चोट लगी है. चलिए, कुछ फर्स्ट एड ले लीजिए.’’ ‘‘नहीं, ठीक है, मैं अभी क्लास जाना पसंद करूंगा,’’ कह कर दिनेश क्लासरूम की तरफ बढ़ा और अंजलि भी क्लास के लिए दिनेश के पीछे हो ली.

अंजलि दिनेश से काफी प्रभावित थी. शायद रैगिंग वाली घटना को ले कर. दिनेश बहुत ही सीधासादा लड़का था. उस का कालेज आना, अपनी पढ़ाई करना, अपने काम से काम रखना, ये सभी बातें अंजलि को बहुत अच्छी लगती थीं. वह मन ही मन दिनेश से प्यार करने लगी थी, पर दिनेश से कहने की हिम्मत उस में न थी.

स्मिता कालेज से लौट रही थी. अचानक उसे एक लड़का सिगरेट पीता हुआ अपनी ओर बढ़ता दिखाई दिया. स्मिता को उस का चेहरा जानापहचाना सा लगा. याद आते ही स्मिता की आंखें फटी की फटी रह गईं. यह तो वही लड़का था, जिस ने आज से लगभग 45 दिन पहले उस के घर पर चोरी की थी.

स्मिता को यह नहीं सम झ आ रहा कि वह आखिर उस की तरफ ही क्यों आ रहा है. अगले कुछ पलों में  वह स्मिता के ठीक सामने खड़ा था. स्मिता के कदम रुक गए. राजू ने उस के चेहरे को ध्यान से देखते हुए कहा, ‘‘देख, शोर मचाने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘अब शोर मचाने से क्या फायदा? जब मैं तुम्हें पकड़वा सकती थी, तब शोर नहीं मचाया, तो अब क्यों…, वैसे भी क्या काम है तुम को?’’ स्मिता ने पूछा.

‘‘मु झे तुम से कुछ बात करनी है. माना कि मैं एक अच्छा लड़का नहीं हूं. चोरी करना बुरी बात है. पर उस रात तुम से की गई छोटी सी बातचीत मु झ पर बहुत असर कर गई. उस दिन घर लौटने के बाद से मैं काफी परेशान हूं. अगर तुम्हारी बात मु झे इतना परेशान कर सकती है, तो तुम्हारी दोस्ती मु झे अच्छा आदमी जरूर बना सकती है…’’

स्मिता ने बात बीच में काटी, ‘‘क्या बकवास कर रहे हो? चलो, हटो. मु झे घर जाने के लिए देर हो रही है.’’

राजू ने कहा, ‘‘देखिए, कई लोगों ने मु झ से यह गंदा काम छोड़ने के लिए कहा और मेरी चोरीचकारी छुड़वाने की कोशिश भी की, पर मु झ पर कोई असर नहीं हुआ, इसलिए आप प्लीज एक बार मेरी बात मान लें. मैं आप को कभी परेशान नहीं करूंगा.’’

स्मिता को शरारत सू झी. उस ने राजू की ओर देखा और कहा, ‘‘ठीक है, मु झे आप की दोस्ती मंजूर है. मेरा नाम स्मिता है. आप का नाम क्या है?’’ यह सुन कर राजू की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने फौरन जवाब दिया, ‘‘मेरा नाम राजू है. वैसे घर वालों ने मेरा नाम राजेश कुमार रखा था.’’

स्मिता ने घड़ी की ओर देख कर कहा, ‘‘अब मु झे चलना चाहिए. देर हो रही है.’’ राजू बहुत खुश था. वह बोला, ‘‘हां, आप जाइए. बाद में आप से मुलाकात होगी.’’ ‘‘जरूर,’’ इतना कह कर स्मिता चली गई.

दिनेश को आज बुखार था. शायद सर्दी का असर था. फिर भी वह अपने नियमित समय के मुताबिक माधुरी के घर पहुंच गया. ‘‘सर, कल आप ने जो प्रौब्लम दिए, उन में से 2 सुल झ नहीं पाए.’’

ठीक उसी समय दिनेश को एक जबरदस्त छींक आई. माधुरी ने देखा कि उस का चेहरा लाल है और वह काफी सुस्त लग रहा है. ‘‘सर, लगता है, आप की तबीयत ठीक नहीं है?’’ ‘‘नहीं, मेरी तबीयत ठीक है.’’

माधुरी ने हिम्मत कर के अपना हाथ दिनेश के गाल पर रख दिया. यह देख दिनेश हड़बड़ा गया. मधु उस से पहले ही बोल पड़ी, ‘‘सर, वाकई आप की तबीयत ठीक नहीं है. आज आप घर जाइए और आराम कीजिए.’’

‘‘नहीं मधु, बताओ कौन सी प्रौब्लम…’’ माधुरी उस की बात को बीच में काटते हुए बोली, ‘‘सर, आप जो भी पढ़ने के लिए कहेंगे, मैं पढ़ूंगी, पर आप आराम कीजिए.’’

‘‘देखो मधु, तुम…’’ ‘‘सर प्लीज, आज मेरी बात मान लीजिए.’’

दिनेश ने माधुरी के चेहरे की तरफ देखा. वह बहुत उम्मीद भरी निगाहों से देख रही थी. दिनेश कुछ सोच कर बोला, ‘‘ठीक है मधु, पर तुम पढ़ाई करना.’’ ‘‘जी सर, थैंक्यू सर, छुट्टी, छुट्टी…’’

दिनेश माधुरी की बचकानी बातों पर मुसकराता हुआ चला गया. दिनेश जैसे ही कालेज पहुंचा, अंजलि सीधे उस के पास चली आई, ‘‘आप कल आए नहीं.’’ ‘‘ओ अंजलि, कल मेरी तबीयत खराब थी.’’

‘‘अभी कैसी है?’’ ‘‘ठीक है,’’ दिनेश क्लासरूम की तरफ बढ़ता हुआ बोला.

अंजलि डरतेडरते बोली, ‘‘दिनेश, एक बात बोलूं, मना तो नहीं करोगे?’’ ‘‘पहले बताओ तो, फिर देखते हैं,’’ अंजलि को डरता हुआ देख दिनेश ने हंस कर कहा. ‘‘मैं आज आप को अपनी बर्थडे पार्टी पर बुलाना चाहती हूं.’’

‘‘हैप्पी बर्थडे. देखो अंजलि, मैं न तो कभी पार्टी वगैरह में गया हूं और न जाना चाहता हूं. यह सब मेरी औकात के बाहर है,’’ दिनेश संकोच के भाव में बोला.

‘‘प्लीज, प्जीज, प्लीज…’’ ‘‘ठीक है, पर मैं आप के घर आऊंगा कैसे?’’

‘‘आप आज मधु को पढ़ाने तो जाएंगे ही, मैं वहीं से आप को पिकअप कर लूंगी,’’ अंजलि काफी खुश होते हुए बोली. ‘‘स्मिताजी, नमस्ते,’’ यह आवाज सुन कर स्मिता चौंक गई. सामने राजू खड़ा था.

‘‘हाय राजू, कैसे हो?’’ ‘‘कल आप जल्दी में थीं, इसलिए आप से कुछ बात नहीं हो पाई,’’ राजू ने मुसकराते हुए आगे कहा, ‘‘अगर आप के पास कुछ समय हो, तो चलिए उस बाग में बैठते हैं.’’

‘‘ठीक है, चलिए,’’ स्मिता ने कुछ रुक कर कहा. बाग की ओर बढ़ते हुए राजू ने कहा, ‘‘अपने बारे में कुछ बताइए, जैसे परिवार में कौनकौन हैं, आप कोे क्याक्या पसंद है वगैरह.’’

स्मिता ने राजू को अपने बारे में सबकुछ बता दिया, सिर्फ उन बातों पर परदा डाल दिया, जिन का जिक्र उस ने शायद किसी से नहीं किया था. स्मिता ने तकरीबन एक घंटा राजू के साथ बिताया और जैसे ही वह चलने को हुई, राजू ने उस के हाथ में एक पैकेट पकड़ा दिया.

‘‘यह क्या है राजू?’’ ‘‘अब इस का कोई मतलब नहीं है, पर क्या बताऊं… इस पैकेट में आप के घर से चुराए हुए 60 हजार रुपए, अंगूठी और घड़ी है. इसे आप वापस ले लीजिए प्लीज,’’ राजू बोल रहा था और स्मिता हैरान सी खड़ी थी.

राजू ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘देखिए, आप मेरे लिए सब से अजीज हैं. मां, बाप, भाई, बहिन कोई नहीं है मेरी जिंदगी में. आज मैं अपने अजीज दोस्त के सामने उस की दोस्ती की सौगंध खा कर कहता हूं कि मैं आज के बाद से कभी चोरी नहीं करूंगा,’’ कहते हुए वह भावुक हो गया.

कहीं उस का भावुक होना स्मिता पकड़ न ले, इसलिए वह दौड़ते हुए एक और भाग गया. स्मिता उसे देखती रह गई.

दिनेश तय समय पर मधु के घर पहुंचा. उस ने उस दिन बाकी दिनों से अच्छी पढ़ाई की थी. दिनेश खुश हो गया और बोला, ‘‘वैरी गुड मधु, वैरी गुड. लगता है, बाकी दिनों की तुलना में तुम ने आज अच्छी पढ़ाई की है.’’

‘‘सर, आखिर आप से प्रौमिस किया था, पढ़ना तो पड़ेगा ही, मधु अपना वादा कभी नहीं तोड़ती,’’ मधु ने एक प्यारी सी मुसकान के साथ कहा.

दिनेश उसे एकटक देखता ही रह गया. फिर जैसे ही उसे याद आया कि वह अपलक मधु को देख रहा है, तो वह  झेंप गया. उस ने तुरंत खामोशी को भंग किया, ‘‘गुड, वादा पूरा करना अच्छी बात है. कल से हम फिजिक्स भी पढ़ना शुरू करेंगे,’’ दिनेश ने थोड़ा रुक कर आगे कहा, ‘‘आप के पापा को आप से जितनी उम्मीदें हैं, मु झे उस से कहीं ज्यादा है.’’ मधु कुछ न बोली, क्योंकि वह पढ़ाई करने में मशगूल हो गई थी.

दिनेश सोच रहा था, ‘शुरू में यह लड़की कितनी लापरवाह थी. पढ़ाईलिखाई में भी ध्यान नहीं था. लेकिन पिछले 50 दिनों में गजब का बदलाव आ चुका है. कितनी अल्हड़ लड़की है यह, पर अपने फर्ज के हाथों मजबूर दिनेश ने कभी उसे लड़की की नजर से नहीं देखा. पर वाकई वह एक बेहतरीन घरेलू लड़की थी.’

ठीक उसी समय मधु ने दिनेश से कुछ पूछा और दिनेश की सोच का तार टूटा. तकरीबन एक घंटे बाद जब रात के करीब साढ़े 8 बज रहे थे कि दरवाजे पर किसी गाड़ी का हौर्न बजा. मधु ने लपक कर खिड़की खोली और गाड़ी की तरफ देखा.

‘‘कोई लड़की लगती है सर.’’ ‘‘अंजलि होगी.’’ ‘‘यह अंजलि कौन है सर?’’ ‘‘मेरी क्लासमेट है.’’ ‘‘पर यह यहां…’’ ‘‘इस की बर्थडे पार्टी पर इस के घर जाना है…’’

‘‘बहुत खास दोस्त है क्या?’’ मधु की आवाज में चिंता थी. ‘‘खास का तो पता नहीं, दोस्त जरूर है.’’

‘‘पैसे वाली लगती है सर, संभल कर रहना…’’ ‘‘बहुत चिंता है तुम्हें…’’

‘‘सो तो है सर, पर आप खाली हाथ हो,’’ मधु ने मजाकिया लहजे में कहा. ‘‘मैं कुछ सम झा नहीं…’’ दिनेश ने सवालिया निगाहों से देखा.

‘‘अरे, बर्थर्ड गर्ल के लिए कोई गिफ्ट नहीं ले जाओगे?’’ ‘‘ओह, पर मेरे पास तो कुछ नहीं है,’’ दिनेश का इतना कहना था कि मधु भीतर कमरे में गई और हाथ में एक किताब ले आई और बोली, ‘‘सर, इस के पन्नों पर दोस्ती की खूबियां लिखी हैं, ये आप अंजलि को गिफ्ट कीजिएगा. मैं इसे पैक करती हूं.’’

‘‘नहीं, मैं ये तुम से नहीं ले सकता.’’ ‘‘क्या सर, चलिए ट्यूशन फीस सम झ कर रख लीजिए,’’ मधु ने शरारत भरे लहजे में कहा. दोनों हंसने लगे और दिनेश वह गिफ्ट ले कर बाहर निकला.

अंजलि कार का दरवाजा खोल कर बड़े अदब से बोली, ‘‘चीफ गेस्ट का हार्दिक अभिनंदन है.’’ दोनों मुसकराते हुए गाड़ी में बैठ गए. अंजलि बड़े आराम से ड्राइव कर रही थी. तकरीबन आधे घंटे बाद ही दिनेश एक महलनुमा घर में पहुंचा.

घर देख कर दिनेश की आंखें चुधियां गईं. दिनेश चुपचाप ही रहा. उस शानदार घर को देख कर उस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दीं.

अंजलि ने गाड़ी रोकी, दूसरी तरफ जा कर दिनेश की ओर का दरवाजा खोलते हुए बोली, ‘‘आइए.’’ ‘‘जी, चलिए.’’

घर में एक बड़े से हौल में पार्टी पूरे शबाब पर थी. अंजलि को देखते ही वहां मौजूद तमाम लोगों ने तालियों से उस का अभिनंदन किया. ठीक उसी समय एक शानदार लिबास में अधेड़ जोड़ा उस लड़की के पास आया. रोबीली मूंछों वाले एक शख्स ने कहा, ‘‘वैलकम बर्थडे गर्ल.’’ अंजलि खुश हो कर बोली, ‘‘पापा, ये दिनेश हैं, जिन के बारे में मैं ने आप को बताया था.’’

‘‘आप से मिल कर अच्छा लगा जैंटलमैन. अंजलि हमेशा आप के बारे में बातचीत करती रहती है. मैं इस प्यारी लड़की का पापा कोमल सिंह और ये मेरी बीवी गुलाबी देवी हैं,’’ कह कर अंजलि के पापा ने दिनेश की तरफ हाथ बढ़ाया, पर दिनेश ने  झुक कर उन के पैर छू लिए. दोनों हैरान हो कर दिनेश की तरफ देखने लगे.

अपनी ओर देखता पा कर दिनेश ने कहा, ‘‘अंकल, दोस्त के मांबाप भी अपने मांबाप की तरह हुए. अब उन से हाथ मिलाना मु झे सही नहीं लगता.’’

अंजलि के मातापिता प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके थे. हालांकि पार्टी का माहौल दिनेश के लिए असहज हो रहा था, पर वह खुद को सामान्य किए हुए था. दरअसल, इन बड़े लोगों के बीच में दिनेश खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था.

अजंलि की नजरें सिर्फ दिनेश पर ही थीं. अंजलि के मातापिता भी इस बात पर गौर कर रहे थे. पार्टी में तमाम रस्में पूरी की गईं. केक काटा गया, केक काटने के बाद अंजली ने पहले एक बड़ा सा टुकड़ा उठा कर अपने मम्मीपापा को खिलाया, फिर उस की निगाहें दिनेश को खोजने लगीं, जो इन मौर्डन लोगों के पीछे एक कोने में खड़ा था.

अंजलि भीड़ को चीरते हुए दिनेश के सामने खड़ी हो गई और बोली, ‘‘दिनेश मुंह खोलो.’’

‘‘नहीं, ठीक है… पहले अपने खास मेहमानों को…’’ ‘‘नहींनहीं, मुंह खोलो प्लीज.’’

‘‘उन्हें बुरा लग सकता है…’’ दिनेश धीरे से बोला. ‘‘मेरी बला से.’’

दिनेश ने अंजलि के हाथों में केक के टुकड़े का एक बड़ा सा हिस्सा खा लिया.

‘‘थोड़ा सा बचा है… चलेगा क्या?’’ ‘‘चलेगा नहीं दौड़ेगा. प्लीज खिलाओ,’’ अंजलि ने कहा, तो दिनेश ने केक का बचा हिस्सा अंजलि को खिलाया. ‘‘थैंक्यू.’’ ‘‘हैप्पी बर्थडे.’’ ‘‘दिनेश, थैंक्यू फौर जौइनिंग दि पार्टी.’’

‘‘तुम्हें बड़े शानदार गिफ्ट मिले हैं, मैं ने सोचा कि मेरा गिफ्ट, जो बहुत छोटा है, मेरे दोस्त को मिले इन बड़े तोहफों के बीच खो न जाए, दिस इज फौर यू,’’ कह कर दिनेश ने मधु का दिया हुआ तोहफा अंजलि की तरफ बढ़ाया. अंजलि ने उसे लपक कर ले लिया.

‘‘अंजलि, अब मु झे जाने की इजाजत दो,’’ दिनेश ने कहा. ‘‘नहीं, आप को आज यहीं रुकना होगा,’’ तब तक वहां पहुंच चुकी अंजलि की मम्मी ने कहा. ‘‘नहीं आंटी, मैं घर बता कर नहीं आया.’’

‘‘ठीक है, ड्राइवर आप को छोड़ देगा,’’ अब बोलने की बारी अंजलि के पापा की थी. ‘‘नहीं पापा, मैं ड्रौप कर दूंगी.’’

‘‘पर आप का बर्थडे है. अभी आप कैसे जा सकती हैं?’’ दिनेश ने तपाक से जवाब दिया. ‘‘बात तो सही है बेटी,’’ अंजलि के पापा ने कहा. ‘‘अंकल, मैं चला जाऊंगा.’’

‘‘राम सिंह, साहब को घर तक छोड़ आओ,’’ अंजलि के पापा की यह बात सही थी. दिनेश को अभी घर जाने के लिए कोई साधन न मिलता. अंजलि के मम्मीपापा के पैर छू कर दिनेश वहां से चला गया.

दिनेश के जाने के फौरन बाद अंजलि ने दिनेश का गिफ्ट खोल कर देखा. एकएक कर के उस ने फ्रैंडशिप के सारे स्लोगन पढ़ डाले. उस के चेहरे पर मुसकान तैर रही थी. उस के होंठ बुदबुदा उठे, ‘‘आई लव यू जान.’’ और उस ने उस डायरी को चूम लिया. अंजलि की मां दूर खड़ी यह सब देख रही थीं और मुसकरा रही थीं.

स्मिता ने भैया के कमरे की खिड़की के पास राजू के दिए उस पैकेट को रख दिया और साथ में एक लैटर जो उस ने खुद लिखा था, रख दिया. स्मिता ने उसी रात की तरह खिड़की को भी खोल दिया.

रात के तकरीबन एक बजे दिनेश अंजलि के यहां से आया और अपने कमरे में दाखिल हुआ. उस की मां प्रमिला देवी ने कहा, ‘‘बेटा, हाथमुंह धो ले, खाना ला रही हूं.’’

‘‘मां, थोड़ा सा ही खाना देना. मैं ने खाना खा रखा है. पर तेरे हाथ न खाऊं, तो पचता ही नहीं है.’’ ‘‘कहीं, खाना खा कर आया है क्या?’’

‘‘जी मां, एक दोस्त का जन्मदिन था,’’ कहने के साथ ही दिनेश ने अपने कमरे की लाइट जलाई. खिड़की खुली देख कर वह उसे बंद करने के लिए बढ़ा कि उस के पैर से कुछ टकराया. ‘यह कैसा पैकेट है,’ सोचते हुए जब उस ने पैकेट खोला, तो मारे हैरानी के उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. घर का सारा चोरी हुआ सामान पैकेट में उन 60 हजार रुपयों के साथ था.

दिनेश ने आवाज दी, ‘‘मांपापा इधर आओ. कमाल हो गया.’’ ‘‘क्या हुआ बेटा?’’ प्रमिला देवी ने पूछा.

‘‘अरे मां, आओ तो सही, स्मिता को भी ले आओ.’’ ‘‘क्या हुआ भैया?’’ ‘‘देखो, चोर ने हमारा सारा सामान वापस कर दिया है. और हां, एक चिट्ठी भी है,’’ दिनेश हड़बड़ाते हुए बोला. ‘‘क्या लिखा है इस में?’’ यह रामदीन की आवाज थी.

‘‘पापा, लिखा है कि मैं एक पेशेवर चोर हूं, पर कुछ वजह से मैं अपने पुश्तैनी धंधे से संन्यास ले रहा हूं. अब सारा चोरी किया माल तो वापस नहीं कर सकता, पर कुछ लोगों को तो कर ही सकता हूं और उन कुछ लोगोें में से एक आप भी हैं. मु झे माफ कर दीजिएगा और मेरे अच्छा आदमी बनने और उस पर खरा उतरने के लिए दुआ कीजिएगा. एक शराफत भरी जिंदगी की तलाश में… आप का, शुभचिंतक चोर.’’

‘‘अरे वाह, यह तो बड़ा फिल्मी स्टाइल हो गया,’’ स्मिता हंस पड़ी. ‘‘चलो, कुछ भी हो बेटी, जिस खिड़की से मेरा सारा सामान गया था, उसी से वापस आ गया,’’ रामदीन ने राहत की सांस ली.

‘‘चलो, सब आराम करो. जो हुआ अच्छा हुआ. बेटा, तू खाना खा ले.’’ ‘‘ला मां, आज तो गले तक खाऊंगा,’’ दिनेश ने मजाक किया.

दिनेश खाना खा रहा था कि तभी उस के दिमाग में पापा का कहा आखिरी वाक्य याद आया, ‘चलो, जिस खिड़की से सामान गया था, उसी से वापस आ गया.’

दिनेश ने दिमाग पर जोर डाला कि जब से इस खिड़की से चोरी हुई थी, सभी लोग इसे बंद रखते थे. यह खिड़की सिर्फ अंदर से ही बंद हो सकती थी. आज सुबह भी यह खिड़की अंदर से बंद थी.

दिनेश को भरोसा हो गया कि खिड़की घर मेें से ही किसी ने खोली है. पर किस ने? उस ने लपक कर चिट्ठी उठा ली, जो कथित रूप से चोर ने लिखी थी. वह उस पर लिखी लिखावट को पहचानने लगा, पर वह किसी से मेल नहीं खा रही थी. किसी ने बड़ी सम झदारी से लिखा था. फिर दिनेश ने गौर किया कि पैन की स्याही हर 2-3 शब्दों के बाद वह थोड़ी गाढ़ी हो जाती है. दिनेश खाने को एक तरफ रख उठ खड़ा हुआ. सभी लोग सो रहे थे. उस ने पापा की जेब से उस का पैन निकला, कागज पर कुछ लाइनें लिखीं, पर इस में वह बात नहीं थी. फिर वह दबे पांव स्मिता के कमरे में गया. उस के पढ़ने वाली टेबिल पर एक पैन रखा था, दिनेश ने उस से भी कागज पर लिखना शुरू किया. उस की आंखें फैलती चली गईं.

‘स्मिता, पर क्यों…’ उस ने कमरे में सो रही स्मिता की ओर देखा. दिनेश ने स्मिता के कंधे को  झक झोर कर जगाया और बोला, ‘‘स्मिता, बाहर गलियारे में आओ.’’

‘‘क्या हुआ भैया?’’ स्मिता ने डरते हुए पूछा. ‘‘बाहर चलो…’’ दिनेश ने आदेश भरी आवाज में कहा.

स्मिता ने दिनेश की तरफ देखा और उस के पीछे हो ली, घर के बाकी सदस्य सो रहे थे. स्मिता ने देखा कि दिनेश उसे खा जाने वाली नजरों से देख रहा था.

दिनेश ने स्मिता से पूछा, ‘‘तुम्हारे पास यह पैकेट कहां से आया?’’ ‘‘जी, कौन सा पैकेट?’’ ‘‘अभी खींच कर एक थप्पड़ दूंगा. सचसच बताओ…’’

स्मिता ने हिचकिचाते हुए सारी बातें बता दीं, पर इस बार भी उस ने अपनी बुराइयों पर परदा डाल दिया. दिनेश उस की कहानी से संतुष्ट नहीं हो पाया था.

गोयल साहब ने देखा कि दिनेश आ रहा है. ‘‘आओ दिनेश, आज इतनी सुबहसुबह कैसे?’’ ‘‘सर, आप से मिलने आया था.’’ ‘‘हां, बोलो.’’ ‘‘सर, ये आप के 60 हजार रुपए. वो चोर बहुत ईमानदार निकला. उसी ने लौटाए हैं.’’ ‘‘क्या…’’

‘‘हां सर, मैं भी हैरान हूं,’’ दिनेश ने मुसकराते हुए कहा. ‘‘प्रिया बेटी, जरा चाय वगैरह ले आना.’’ ‘‘नहीं सर…’’ दिनेश ने मना किया.

प्रिया रसोई की तरफ जा रही थी. उस ने देखा कि मधु टकटकी बांधें खिड़की की ओट से दिनेश को ही देख कर रही है. वह तकरीबन सम्मोहित सी थी.

प्रिया कुछ देर यों ही मधु को देखती रही और फिर मुसकराते हुए रसोई की ओर बढ़ गई.

प्रिया जब चाय दे रही थी, तब उस ने भी दिनेश को गौर से देखा. तकरीबन 6 फुट लंबाई वाला दिनेश एक अच्छी शख्सियत का मालिक था. वह किसी तरह का नशा भी नहीं करता था. मेहनतकश और शराफत में भी कोई उस का सानी नहीं था. दीदी की पसंद पर नाज कर के प्रिया मुसकरा उठी. दिनेश के जाने के लिए उठने पर प्रिया फौरन दीदी के पास पहुंच गई.

‘‘हैलो दीदी, क्या नैनमटक्का हो रहा है,’’ प्रिया ने मजाक करते हुए कहा. ‘‘नहीं तो, कुछ भी नहीं…’’ मधु, जो दिनेश को जाते हुए देख रही थी, हड़बड़ा कर बोली.

‘‘बहुत पसंद करती हो दिनेशजी को… क्यों?’’ ‘‘मारूंगी तुम्हें अभी…’’ मधु शरमाते हुए बोली.

‘‘अच्छा, मैं ने सोचा कि तुम्हारा कोई चक्कर है,’’ प्रिया ने चुटकी ली. ‘‘क्या बकती है…’’ मधु ने तपाक से कहा.

‘‘अच्छा, मैं बकती हूं, यानी तुम्हें दिनेश से कोई मतलब नहीं. ठीक है, फिर मेरा रास्ता साफ है,’’ प्रिया ने कुटिल मुसकान के साथ कहा. ‘‘क्या मतलब है तेरा…’’ मधु ने प्रिया की तरफ देखा.

‘‘देखो दीदी, मैं भी 17 साल की हो गई हूं और दिनेश मु झे बहुत अच्छे लगते हैं. सोचती हूं कि उन्हें आई लव यू बोल ही दूं,’’ प्रिया ने बड़ी शराफत से कहा. ‘‘मैं तेरी नाक तोड़ दूंगी,’’ मधु ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा.

‘‘तो आप भी दिनेश से प्यार करती हैं?’’ प्रिया ने तुनकते हुए पूछा. ‘‘मैं भी से क्या मतलब है तुम्हारा?’’ मधु ने थोड़ा चकित हो कर पूछा. ‘‘मतलब यह कि अव्वल तो मैं उन से प्यार करती हूं और मेरे बाद तुम…’’ प्रिया अपनी दीदी का दिल टटोल रही थी.

‘‘तुम उन के लिए क्या कर सकती हो?’’ अब की बार मधु ने प्रिया पर सवाल का वार किया. ‘‘जो वे बोलेंगे,’’ प्रिया ने नाटक किया.

‘‘और, मैं उन के लिए अपनी जान भी दे सकती हूं,’’ प्रिया को चुप होना लाजिमी था. मधु ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘मैं उन से बहुत प्यार करती हूं और वे सिर्फ मेरे हैं. देखना, ग्रेजुएशन पूरी होते ही मैं उन से शादी करूंगी.’’

प्रिया मुसकरा कर बोली, ‘‘मेरी दुआएं आप के साथ हैं.’’ मधु भी प्यार भरी नजरों से प्रिया की तरफ देख कर मुसकरा रही थी, जो थोड़ी देर पहले तक प्रिया के नाटक को सच सम झ चुकी थी.

दिनेश कालेज में घुसा ही था कि एक लड़की ने उसे देख कर पूछा, ‘‘दिनेश, अंजलि को देखा है क्या?’’

‘‘नहीं, पर आप मु झ से क्यों पूछ रही हैं?’’ ‘‘लो, अब उस के बैस्ट फ्रैंड से नहीं पूछूंगी, तो किस से पूछूंगी.’’

दिनेश बैस्ट फ्रैंड शब्द सुन कर थोड़ा हैरान सा रह गया. ठीक उसी समय सामने से अंजलि आती दिखाई दी. दिनेश ने फौरन उस लड़की से मुखातिब हो कर कहा, ‘‘लीजिए, आप अंजलि को ढूंढ़ रही थीं, वह देखो सामने से आ रही है.’’

‘‘पर मैं चलती हूं. अभी वह आप से मिलने आ रही है,’’ उस लड़की ने शरारत भरे लहजे में कहा.

‘‘हाय दिनेश, गुड मौर्निंग,’’ अंजलि, जो अब तक उस के पास आ चुकी थी, मुसकरा कर बोली.

‘‘गुड मौर्निंग.’’ ‘‘अरे रेखा, कैसी हो?’’ ‘‘अच्छी हूं, आप लोग बात कीजिए, मैं बाद में मिलती हूं,’’ इतना कह कर रेखा वहां से चल पड़ी.

‘‘रेखा को कब से जानते हो?’’ अंजलि ने दिनेश से पूछा. ‘‘हम लोग बचपन से अच्छे फ्रैंड हैं,’’ दिनेश ने उसी अंदाज में जवाब दिया.

‘‘तुम ने कभी पहले नहीं बताया,’’ अंजलि थोड़ा निराश हो कर बोली. ‘‘आप ने कभी पूछा ही नहीं.’’

अंजलि को उदास होता देख दिनेश उसे सम झाते हुए बोला, ‘‘अरे यार, मैं उस को पिछले 5 मिनट से ही जानता हूं. तुम मेरी सब से अच्छी दोस्त हो और इतनी आसानी से कोई तुम्हारी जगह नहीं ले सकता.’’

‘‘अच्छा… हां, तुम्हारा गिफ्ट बहुत प्यारा था,’’ अंजलि काफी खुश हो कर बोली. ‘‘चलिए, इस गरीब का तोहफा आप को पसंद तो आया,’’ यों ही बात करते हुए दोनों क्लासरूम की तरफ बढ़े.

स्मिता ने आज एक फैसला लिया था. राजू उसे अच्छा लगा था और शायद राजू के लिए वह खुद को सुधारना चाहती थी. इसी सिलसिले में उस ने आज अमित को डांटा था और सारे संबंध खत्म करने के लिए कहा, तो अमित, जो थोड़ा डरपोक था, उस की बात मान गया. पर वह स्मिता के ऊपर आखिरी बार संबंध बनाने के लिए दबाव बना रहा था. यही सब सोचते हुए वह चली जा रही थी कि अचानक राजू आ गया.

‘‘कैसी हो स्मिता?’’ ‘‘अच्छी हूं.’’ ‘‘पर चेहरे से काफी परेशान दिख रही हो?’’ ‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं है,’’ स्मिता ने अपनी परेशानी छिपाते हुए कहा.

‘‘आओ, मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं,’’ राजू ने स्मिता का हाथ पकड़ते हुए कहा. ‘‘कहां ले जा रहे हो?’’

‘‘आओ तो सही,’’ राजू ने बात को बीच में ही काटा. राजू बाग के बाहर एक नई चमचमाती कार के पास पहुंचा. ‘‘यह क्या है?’’

‘‘यह मेरी गाड़ी है. वैसे तो यह मैं ने अपने चोरी के रुपयों से ही खरीदी है, पर अब इस से जो कमाई आएगी, वह पूरी तरह से मेरी मेहनत की होगी.’’

स्मिता मंत्रमुग्ध सी देख रही थी. राजू ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘और अब तुम्हें एक कदम भी पैदल नहीं चलने दूंगा. कल से तुम्हें कालेज ले जाने और वापस ले जाने की जिम्मेदारी मेरी.’’

यह सुन कर स्मिता की आंखों में आंसू भर आए. स्मिता को भावुक होता देख राजू ने बात बदली और उसे गाड़ी में बिठाया. वह गाड़ी चला कर आगे बढ़ा. रास्ते में उस ने अपने बारे में काफीकुछ बताया. मांबाप उस की जिंदगी में नहीं थे. पेट के लिए और गलत संगत में पड़ कर वह एक माहिर चोर बन गया. उस ने स्मिता को उस के घर से थोड़ी दूर छोड़ दिया.

समय बीतता चला गया. तकरीबन 6 महीने और बीत गए. दिनेश, मधु और अंजलि की पढ़ाई अच्छी चल रही थी. मधु और दिनेश के बीच आकर्षण बढ़ता जा रहा था. दिनेश एक टीचर की मर्यादा का पालन करने में मधु से आज तक कुछ न कह पाया. कुछ यही हाल मधु का था. वह अपने दिल की बात कहने के लिए मौके का इंतजार कर रही थी. अंजलि तो दिनेश के लिए लगभग पागल सी थी. कालेज और कालेज के बाहर भी दोनों फ्री टाइम साथ में गुजारते थे. इधर, स्मिता और राजू दोनों मन ही मन एकदूसरे को प्यार करते थे.

आज का दिन बड़ा खास था. आज दिनेश, अंजलि और मधु का रिजल्ट आ रहा था. अंजलि दिनेश के घर आई.

‘‘अरे तुम…’’ दिनेश चौंकते हुए बोला. ‘‘मैं ने सोचा कि क्यों न हम रिजल्ट साथ में देखते हैं,’’ अंजलि ने जवाब दिया और बड़ी अदब से अंजलि ने प्रमिला और रामदीन के पैर छुए और स्मिता की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘हाय स्मिता, कैसी हो?’’

‘‘कमाल है, आप मेरा नाम भी जानती हैं.’’ ‘‘जी, मैं आप के परिवार के बारे में बहुतकुछ जानती हूं, मैं आप के भैया की बहुत अच्छी दोस्त हूं.’’

‘‘मु झे पूरा भरोसा है कि आप लोगों के नंबर बहुत अच्छे आएंगे,’’ स्मिता उन का उत्साह बढ़ाते हुए बोली. ‘‘अंकलजी, हम पास के ही किसी इंटरनैट से रिजल्ट देख कर आते हैं,’’ अंजलि ने रामदीन की ओर देख कर कहा.

‘‘हां बेटी,’’ रामदीन ने सहमति में सिर हिलाया. दिनेश और अंजलि कार में बैठ कर पास के साइबर कैफे की ओर रवाना हो गए. दोनों एक ही कंप्यूटर पर बैठे हुए थे. दिनेश ने फटाफट कालेज के रिजल्ट की साइट खोली और उस में पहले अंजलि का रोल नंबर डाला.

‘‘अरे, पहले तुम अपना रिजल्ट देखो.’’ ‘‘नो मैडम, लेडीज फर्स्ट.’’

अंजलि ने 70 फीसदी अंकों के साथ इम्तिहान पास किया था. अब बारी दिनेश के नंबरों की थी. उस के नंबरों को देखते ही दोनों उछल पड़े. दिनेश के 87 फीसदी अंक आया थे, और उस ने पूरे कालेज में टौप भी किया. कालेज के पिछले 15 सालों का रिकार्ड भी दिनेश के नंबरों के साथ टूट गया.

अंजलि ने मारे खुशी के दिनेश के दोनों गालों पर चुम्मा ले लिया. दिनेश यह देख हड़बड़ा गया. अंजलि को भी फौरन खयाल आया कि उस ने यह क्या कर दिया. ‘‘सौरी…’’ ‘‘नो प्रौबलम. चलो, एक खास रिजल्ट और देखना है… मधु का.’’

‘‘आज तो उस का भी रिजल्ट आ रहा है. मु झे मालूम ही नहीं था. आप ने उस के लिए भी बहुत मेहनत की है. एक तरह से यह आप का भी रिजल्ट होगा.’’ ‘‘बिलकुल सही कहा तुम ने.’’

मधु के नंबर स्क्रीन पर थे. फर्स्ट ईयर के मैथ के बैक पेपर में 65 फीसदी सेकंड ईयर वर्ष के मैथ में 60 फीसदी, फिजिक्स में 61 फीसदी और कैमिस्ट्री में 61 फीसदी.

‘‘मजा आ गया. अब से एक साल पहले अगर कोई टीचर मधु से मिलता, तो ऐसे नंबरों की भविष्यवाणी कभी नहीं कर सकता था. हमें अभी मधु के घर चलना होगा,’’ दिनेश ने कुरसी छोड़ते हुए कहा.

‘‘चलिए,’’ अंजलि और दिनेश अगले 10 मिनट में मधु के घर पर थे. गोयल साहब बाहर ही खड़े थे. लग रहा था कि जैसे उन्हें दिनेश का ही इंतजार था. अंजलि और दिनेश के नमस्ते का जवाब दे कर वे फौरन दिनेश से लिपट गए, ‘‘वाह बेटा, तुम ने कमाल कर दिया. मु झे नाज है तुम पर,’’ गोयल साहब खुश हो गए.

‘‘अंकल, यह कमाल मेरा नहीं, बल्कि मधु का है. मधु कहां है अंकल?’’ दिनेश ने बड़प्पन दिखाते हुए पूछा. ‘‘अंदर है, जाओ मिल लो. बेटी आप भी जाइए,’’ गोयल साहब अंजलि की ओर मुखातिब हो कर बोले. ‘‘नहीं अंकल, मैं यहीं ठीक हूं.’’

दिनेश अंदर चला गया. आसमान में घटाएं घिरी हुई थीं, उसी समय बादलों में कालापन और बढ़ गया. धीमीधीमी हवा बह रही थी. मौसम का तापमान नीचे गिर रहा था. लगता था, बादल कुछ ही देर में  झमा झम बरसेंगे. दिनेश ने मधु को देखा. वह अलग सी लग रही थी, बहुत खुश और बहुत प्यारी.

‘‘गुड, वैलडन, तुम ने कमाल कर दिया.’’ ‘‘सर, यह सब आप की मेहनत से हुआ है. मैं ने कुछ नहीं किया.’’

‘‘चलो, जो भी हो, लेकिन फाइनल ईयर में मु झे और भी अच्छे नंबर चाहिए.’’ ‘‘मिलेंग सर, आप को पार्टी देनी होगी.’’

‘‘वह क्यों?’’ ‘‘यह लीजिए, जनाब, आप इतने अच्छे नंबर लाए हैं कि इतिहास रच दिया है, इसलिए पार्टी चाहिए,’’ मधु ने नखरा दिखाते हुए घूरती नजरों से देखा.

‘‘जब कहोगी, तब मिलेगी,’’ तभी बाहर जोर की बिजली चमकी और बारिश शुरू हो गई. बारिश तेज थी. बारिश की बूंदों को आंगन में देखते ही मधु की आंखें चमक उठीं.

‘‘चलिए, आइए, बारिश में भीगते हैं,’’ मधु ने चंचलता से कहा. ‘‘नहीं, मैं नहीं…’’ दिनेश का कहना था कि मधु बारिश में भीगने जा चुकी थी और आंगन के बीच में खड़ी हो कर खुद को बारिश के पानी से भिगो रही थी.

अपना चेहरा आसमान की ओर कर के उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं. बड़ी मासूम सी लगती थी वह. धीरेधीरे उस का सारा शरीर भीग रहा था और कपड़े भीग कर उस के शरीर के आकार को स्पष्ट कर रहे थे. बड़ी मोहनी सी लग रही थी वह और दिनेश जाने किन खयालों में खोया हुआ उसे टकटकी बांध कर देखे जा रहा था.

मधु की नजर भी दिनेश के चेहरे पर पड़ी. दिनेश को अपनी ओर देखता देख वह भी दिनेश की आंखों में खो गई. दोनों के दिलों में प्यार का सैलाब उमड़ रहा था, पर न जाने कौन सी ताकत थी, जो उन्हें रोके हुए थी.

मधु ने अपने दोनों हाथ फैलाए और दिनेश को पानी में आने का न्यौता दिया. दिनेश सुधबुध खोया सा भीगने के लिए पानी में पहुंच गया. कुछ ही देर में वह भी पानी में भीग चुका था और मधु के सामने खड़ा था.

मधु एक कदम आगे बढ़ी और बिना देरी किए दिनेश के होंठों को चूम लिया. दिनेश का सम्मोहन  झटके के साथ टूट गया. उसे लगा, जैसे उस के होंठों पर किसी ने सुलगते अंगारे रख दिए हों. मधु बड़ी मासुमियत से घुटनों पर बैठ गई.

‘‘दिनेश, मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं. तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकती हूं. क्या तुम मु झ से प्यार करते हो?’’ ‘‘मैं भी आप को बहुत पसंद करता हूं, पर आप हमारे रिश्ते को जानती हैं.’’ यह सुन कर मधु की आंखों में आंसू भर गए.

‘‘देखो, मैं इंतजार करूंगी और कुछ भी चोरीछिपे नहीं करूंगी. क्या तुम मेरा इंतजार करोगे?’’ इतना कह कर वह दिनेश की तरफ आशा भरी नजरों से देखने लगी.

दिनेश कुछ देर शांत रहा, फिर उस के मुंह से बोल फूट पड़े, ‘‘मैं तब तक तुम्हारा इंतजार कर सकता हूं, जब तक या तो तुम न मिल जाओ या तुम खुद न मना करो,’’ दिनेश जब आखिरी शब्द कह रहा था, उसी समय प्रिया वहां आ गई.

‘‘अरे, आग तो दोनों तरफ बराबर लगी हुई है.’’ ‘‘वो… वो…’’ दिनेश  झेंप गया. ‘‘दीदी, तुम ने मेरा पत्ता काट दिया,’’ प्रिया ने मजाक किया. ‘‘हां, तेरा पत्ता कट गया,’’ कहने के साथ ही मधु हंस पड़ी.

‘‘चलो, अब दोनों भीगते ही रहोगे या अंदर भी आओगे,’’ प्रिया ने कहा. ‘‘नहीं, अभी मत जाना. थोड़ी देर मेरे सामने यों ही खड़े रहो,’’ मधु की आवाज में मादकता थी. ‘‘अरे बाबा, अब आ भी जाओ. पापा आ जाएंगे,’’ प्रिया ने सम झदारी दिखाई.

दिनेश बारिश से हटते हुए बोला, ‘‘देखो मधु, मैं ने तुम्हारी जिम्मेदारी ली है. आप के पापा को आप से बहुत उम्मीदें हैं और मु झ पर बहुत भरोसा है. मैं उसे तोड़ नहीं सकता…’’

मधु बीच में बोली, ‘‘मैं सम झी नहीं.’’ प्रिया इन बातों को ध्यान से सुन रही थी.

‘‘जब तक आप की ग्रेजुएशन पूरी नहीं हो जाती, मैं तुम्हारे लिए सिर्फ तुम्हारा टीचर और तुम मेरे लिए सिर्फ स्टूडैंट हो,’’ दिनेश गंभीर हो कर बोला.

‘‘ठीक है, पर उस के बाद तो आप पापा से बात करेंगे न?’’ मधु ने प्यार से पूछा. ‘‘हां, जरूर बात करूंगा,’’ दिनेश ने आश्वासन दिया. ‘‘कसम से.’’ ‘‘हां, कसम से.’’ ‘‘हैलो लैलामजनूं, अब चलो भी,’’ प्रिया ने फिर मस्ती की.

बारिश के धीमे होते ही स्मिता मिठाई लाने के लिए घर से निकल पड़ी. रामदीन को भरोसा था कि दिनेश शानदार नंबर लाएगा, इसलिए बिना रिजल्ट देखे ही उस ने स्मिता को मिठाई लाने के लिए भेज दिया.

स्मिता घर से थोड़ी दूर ही गई थी कि एक कार आ कर बगल में रुकी. बिजली की फुरती से राजू ड्राइविंग सीट से उतर कर दूसरी तरफ का दरवाजा खोल कर बोला, ‘‘स्मिताजी, बैठिए. बताइए, आप को कहां जाना है?’’

स्मिता को देखते ही राजू खुश हो जाता था. मौसम ऐसा था कि स्मिता का दिल भी राजू से लिपटने को कर रहा था. पर हाय रे मजबूरी, जिस को इतना चाहती थी, उस से प्यार का इजहार भी नहीं कर सकती.

‘‘कहां खो गईं? बैठिए न,’’ राजू ने स्मिता की सोच के तार को तोड़ते हुए कहा. ‘‘सौरी,’’ कह कर स्मिता गाड़ी में बैठ गई.

स्मिता 4 किलो लड्डू ले कर वापस आई और राजू की गाड़ी में बैठ कर वापस चल दी. राजू चोरीचोरी स्मिता को निहार रहा था. स्मिता का भी कुछ यही हाल था. एक बार अचानक दोनों की नजरें टकरा गईं और दोनों सकपका गए. आगे स्मिता ने ध्यान दिया कि राजू चोरी से उसे देख तो रहा था. घर से कुछ ही दूर स्मिता गाड़ी से उतर गई. राजू देर तक उसे मुसकराते हुए देखता रहा और फिर वापस चल दिया.

स्मिता आगे बढ़ी तो उसे सरोज दिखा. वह घबरा गई. उस ने पीछे मुड़ कर देखा, तो राजू जा चुका था. सरोज उसी की तरफ आ रहा था.

‘‘क्या मजाक है,’’ सरोज ने कहा. ‘‘तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो?’’ स्मिता गुस्से में बोली.

‘‘देख, ज्यादा सतीसावित्री बनने की कोशिश मत कर.’’ ‘‘देखो, प्लीज मु झे परेशान मत करो.’’

‘‘मैं अमित से मिला था. उस के पास तुम्हारे कुछ फोटो भी हैं.’’ ‘‘क्या…?’’

‘‘वह तो डरपोक है, पर मैं जरूर तुम्हें फंसा दूंगा.’’ ‘‘क्या बकवास करते हो?’’

‘‘बकवास नहीं, सच बोल रहा हूं,’’ सरोज की आंखों में चमक थी. स्मिता कुछ बोल नहीं पाई. सरोज ने मौके को ताड़ा और आगे कहा, ‘‘देखो, तुम्हें फोटो और नेगेटिव दोनों मिल जाएंगे, बस एक बार…’’ ‘‘नहीं,’’ स्मिता सहमी सी बोली.

‘‘आज मौसम बहुत सुहावना है. हलकीहलकी बारिश भी है. बाग वाली  झाड़ी में आ जाओ. मैं और अमित वहीं पर तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं. तुम अगर नहीं आई तो तुम्हारा क्या होगा, यह तुम अच्छी तरह जानती हो,’’ इतना कह कर सरोज चलता बना. स्मिता भी धीमेधीमे कदमों से घर की तरफ बढ़ी.

मधु के घर से निकल कर अंजलि और दिनेश घर जाने के लिए चल पड़े. रास्ते में अंजलि ने गाड़ी दूसरी तरफ मोड़ दी. दिनेश बोल पड़ा, ‘‘क्या हुआ… इधर कहां?’’

‘‘सामने वाले बाग में…’’ ‘‘क्यों?’’ दिनेश थोड़ा सोच कर बोला. ‘‘मौसम कितना सुहावना है. पार्क में बहुत अच्छा लगेगा,’’ अंजलि बोली.

‘‘अरे यार, बारिश हो रही है,’’ दिनेश ने कहा. ‘‘तुम भी तो पूरा भीगे हुए हो. मु झे भी थोड़ा भीगना है.’’

‘‘सभी एकजैसी हैं…’’ दिनेश मधु के बारे में सोचते हुए बोला. ‘‘क्या कहा?’’ अंजलि सम झ नहीं पाई.

‘‘कुछ नहीं,’’ तब तक कार पार्क के सामने खड़ी थी. पार्क के अंदर पहुंच कर अंजलि ने बैठने की जगह खोजते हुए कहा, ‘‘चलो, उस पत्थर पर बैठते हैं.’’ ‘‘चलो.’’

अंजलि आज इस रिम िझम बारिश में अपने प्यार का इजहार करना चाहती थी, पर वह डर रही थी. फिर भी वह बड़ी हिम्मत कर के बोली, ‘‘दिनेश, मु झे तुम से एक बात कहनी है.’’

‘‘बोलो, म झे तो ठंड लग रही है.’’ ‘‘आई लव यू.’’ ‘‘क्या…’’ दिनेश का दिमाग चकरा गया. ‘‘मैं तुम से प्यार करती हूं.’’ दिनेश चुप रहा, अंजलि फिर बोली, ‘‘तुम मेरी बात सुन रहे हो कि नहीं?’’

‘‘सुन रहा हूं.’’ ‘‘तो जवाब दो कि तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो?’’ ‘‘मैं तुम से प्यार नहीं करता.’’ ‘‘तुम ऐसे नहीं कह सकते,’’ अंजलि की आवाज डूबने लगी.

‘‘मैं मधु से प्यार करता हूं. वह भी मु झ से प्यार करती है. पढ़ाई खत्म होने के बाद हम शादी कर लेंगे. मैं और आप सिर्फ अच्छे दोस्त रह सकते हैं,’’ दिनेश एक सांस में ही सारी बात कह गया.

अंजलि के सारे सपने टूट गए, फिर भी कुछ सोच कर वह बोली, ‘‘ठीक है, तुम मु झ से प्यार नहीं करते, मैं तुम से प्यार करती हूं और करती रहूंगी. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी. अपनी जिंदगी को इस हद तक खाली कर दूंगी कि तुम इस खालीपन को भरने जरूर आओगे,’’ इतना कहने के साथ ही उस की आवाज बैठ गई. दोनों के बीच गहरी खामोशी छा गई.

सरोज के पिता शर्माजी और पड़ोस के गुप्ताजी शायद इस मौसम का मजा लेने के लिए बाग में आने वाले तीसरे और चौथे शख्स थे. उसी बाग में गुमसुम दिनेश और अंजलि भी बैठे थे. शर्माजी और गुप्ताजी इधरउधर की बातें करते हुए बाग के किनारेकिनारे चले जा रहे थे. चलतेचलते शर्माजी ने  झाडि़यों पर नजर डाल कर कहा, ‘‘लगता है, उधर कोई जानवर है.’’

‘‘सांप भी हो सकता है,’’ गुप्ताजी ने कहा. ‘‘मु झे तो कुत्ता वगैरह लगता है,’’ शर्माजी बोले.

‘‘आप की सोच गलत है… वह सांप ही होगा.’’ ‘‘क्या बात करते हैं…’’ शर्माजी की आवाज में जिद का भाव था.

‘‘लगी शर्त…’’ गुप्ताजी ताव में आ गए. ‘‘लगी… लेकिन धीरेधीरे पैर दबा कर आएं, नहीं तो कुत्ता भाग भी सकता है,’’ शर्माजी ने सलाह दी.

और दोनों दबे पांव  झाड़ी के उस तरफ चल पड़े, जिधर हलचल थी. वहां पहुंचते ही शर्माजी के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं. गुप्ताजी ने शर्म से आंखें नींचे कर लीं. इन  झाडि़यों के पीछे शर्माजी ने देखा कि उन का लड़का सरोज, पड़ोस का लड़का अमित और रामदीन की बेटी स्मिता थे. सरोज और अमित की हालत भी खराब हो गई. स्मिता सूखे पत्ते की तरह कांप रही थी. उन्होंने जल्दीजल्दी कपड़े समेटे.

शर्माजी गुस्से के मारे थरथर कांप रहे थे. उन्होेंन सरोज को कौलर पकड़ कर  झाड़ी से बाहर निकाला और बेतहाशा मारना शुरू किया. शुरू में तो सरोज चुपचाप बरदाश्त करता रहा, पर बाद में जब ज्यादा चोट लगने लगी, तो उस ने रोना शुरू कर दिया.

दिनेश और अंजलि, जो खामोशी के आगोश में थे, रोने की आवाज सुन कर तुरंत उस तरफ दौड़ पड़े.

दिनेश को वहां पहुंचता देख शर्माजी आगबबूला हो गए और सरोज को छोड़ वे दिनेश से मुखातिब हुए, ‘‘अपनी घटिया बहिन को काबू में रख…’’

दिनेश ने शर्मा का कालर पकड़ लिया, ‘‘क्या बोला…’’ ‘‘बदजात महल्ले के लड़कों के साथ रंगरलियां मनाती फिरती है.’’

दिनेश को मामला कुछकुछ सम झ में आ रहा था. उस ने स्मिता की ओर देखा. वह चुप थी और उस की आंखों से आंसू गिर रहे थे.

‘‘हां पापा, यह रोज गंदेगंदे इशारे करती थी. मु झ से भी गलती हो गई,’’ सरोज ने भी मौके का फायदा उठाया.

दिनेश को जितना सम झ में आया, उस के आने वाले अंजाम से डर गया. वह घिघियाते हुए बोला, ‘‘देखिए, यह बहिन है मेरी. इस की जिंदगी खराब हो जाएगी. प्लीज, मेरी आप से प्रार्थना…’’

शर्माजी ने बात को बीच में काटते हुए कहा, ‘‘नहीं, तुम ने अभी मेरा कौलर पकड़ा था न, अब तमाशा देख,’’ इतना कहते ही वह सरोज को घसीटते हुए कालोनी की तरफ बढ़ा.

अंजलि ने बड़ी मुश्किल से सहारा दे कर दिनेश और स्मिता को कार में बिठाया और उस ने भी रामदीन के घर का रुख किया.

वही हुआ, जिस का डर था. शर्माजी ने अपने लड़के को बेकुसूर साबित करने के लिए पूरी कालोनी के सामने चीखचीख कर स्मिता को बदलचन साबित कर दिया.

अंजलि, स्मिता और दिनेश चुपचाप खड़े हो कर तमाशा देख रहे थे. कुछ मिनटों में कुछ लोगों ने स्मिता की ओर देख कर थूक भी दिया.

बारिश थम चुकी थी, धूप भी खिल कर निकल आई थी. रामदीन का पूरा परिवार गुमसुम बैठा था. धीरेधीरे सारी भीड़ छंट गई. सभी के जाने के बाद रामदीन घर के अंदर जा कर मिठाई के वे पैकेट ले आया, जो कुछ घंटे पहले स्मिता ले कर आई थी.

रामदीन अंजलि की ओर देख कर बोला ‘‘बेटी, अरे नहीं, अब तो मैं किसी को बेटी कहने के लायक भी नहीं बचा हूं.’’

‘‘जी अंकल, कहिए…’’ ‘‘अंजलि, मिठाई के ये डब्बे घर जाते समय रास्ते में कहीं फेंक देना?’’ ‘‘पर अंकल…’’

‘‘बहुत देर हो गई है, तुम घर जाओ,’’ कह कर रामदीन ने मिठाई के डब्बे अंजलि को पकड़ा दिए. अंजलि को कुछ सम झ में नहीं आया और वह वहां से चली गई.

रामदीन ने स्मिता की तरफ देखा, जिस की आंखें रोतेरोते सूज गई थीं. रामदीन बोला, ‘‘देखो स्मिता, मैं जो कह रहा हूं, उसे ध्यान से सुनना,’’ स्मिता समेत सभी का ध्यान रामदीन की ओर गया.

रामदीन ने कहना शुरू किया, ‘‘तुम मेरे घर से निकल जाओ, तुम कहां जाओगी, क्या करोगी, इस से मु झे कोई मतलब नहीं है. बेहतर यह होगा कि तुम जा कर किसी कोठे पर बैठ जाओ.’’ ‘‘पापा…’’ दिनेश के दिल में टीस सी उठी.

‘‘कोई बीच में नहीं बोलेगा. हां, तो मैं कह रहा था कि तुम्हारा कोठे पर बैठना अच्छा रहेगा, क्योंकि इस से तुम्हारा पेट भी पल जाएगा. पर ऐसा करने से पहले तू यह शहर छोड़ देना. हम सब का प्यार पा कर तू ने घर की इज्जत खूब बढ़ाई है, अब इसे में और बरकत मत देना.

‘‘एक और रास्ता है, खुदखुशी कर लेना. पर वह तेरे बस की बात नहीं है. सब से अहम बात, तेरे घर से जाने के बाद मेरा दिल कभी पसीजेगा, यह उम्मीद छोड़ देना. इस परिवार का कोई सदस्य अगर तुम से मिलने या ढूंढ़ने की कोशिश करेगा, तो मेरा मरा मुंह देखेगा. अगले 10 मिनट तक कोई कुछ नहीं बोलेगा.’’

रामदीन स्मिता के पास गया. पहले उस के सिर पर प्यार भरा हाथ फेरा, फिर अगले ही पल उस ने स्मिता की कलाई पकड़ी और उसे तकरीबन घसीटते हुए दरवाजे पर ले गया.

स्मिता के चेहरे पर दर्द के ऐसे भाव थे कि कोई भी रो पड़ता. स्मिता घर की चौखट को पकड़ कर कुछ यों संघर्ष कर रही थी, जैसे कह रही थी कि मु झे माफ कर दो. मु झे अपने से अलग मत करो. पर रामदीन एक बेरहम इनसान की तरह उसे धक्का देने में कामयाब रहा, स्मिता के हाथ से दरवाजे की पकड़ छूट गई, और वह दूर जा कर गिरी. रामदीन के घर का दरवाजा स्मिता के लिए हमेशाहमेशा के लिए बंद हो गया.

लुटीपिटी स्मिता न जाने किधर जा रही थी, उसे खुद नहीं मालूम. आखिर पापा ने शहर छोड़ने के लिए कहा था.

दिनेश घर से बाहर निकला, तो रामदीन ने खास हिदायत दी कि वह स्मिता को खोजने की कोशिश न करे. दिनेश काफी परेशान था. उसे लगा कि शायद मधु से मिलने पर उसे थोड़ी राहत मिलेगी. वह गोयल साहब के घर पहुंचा. गोयल साहब बाहर ही मिल गए.

‘‘यहीं रुको,’’ गोयल साहब बोले. ‘‘जी, मैं कुछ सम झा नहीं,’’ दिनेश ने कहा.

‘‘मैं अभी आया.’’ थोड़ी देर बाद गोयल साहब वापस आए और कुछ रुपए दिनेश की तरफ बढ़ाए.

‘‘यह क्या है सर?’’ ‘‘ये 55 सौ रुपए हैं, तुम ने माधुरी का 11 महीने पढ़ाया था, उस की फीस.’’

‘‘पर सर, इस की क्या जरूरत…’’ ‘‘जरूरत है, अब तुम जा सकते हो.’’

‘‘सर, मैं अभी से मधु को फाइनल ईयर के लिए…’’ ‘‘पर, अब तुम्हें यहां आने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘पर क्यों?’’ ‘‘देखो, मैं 2 बेटियों का बाप हूं, तुम्हारे यहां आने से वे बदनाम हो जाएंगी.’’

‘‘यह क्या तमाशा है,’’ अब की बार दिनेश की आवाज में गुस्सा था. ‘‘देखो, मु झे सबकुछ पता चल चुका है. तमाशा तुम कर रहे हो.’’

‘‘सर, मैं मधु से प्यार करता हूं. आप ऐसा नहीं कर सकते,’’ दिनेश का इतना बोलना था कि गोयल साहब ने उसे एक थप्पड़ रसीद कर दिया. मधु, जो अब तक परदे के पीछे खड़ी हो कर सबकुछ सुन रही थी, वह गुस्से में दनदनाते हुए बाहर निकली, ‘‘पापा, यह क्या बात हुई?’’

‘‘मधु तुम अंदर जाओ.’’ ‘‘पापा, मैं दिनेश से प्यार करती हूं.’’

अब की बार का थप्पड़ माधुरी को लगा था, जो इस के साथ ही सहम गई थी. दिनेश भावुक हो गया और बोला, ‘‘मधु या तो मेरे पास चले आना या मना कर देना, अपने वाले के मुताबिक मैं इंतजार करूंगा. और हां, फाइनल ईयर में शानदार रिजल्ट चाहिए मु झे,’’ दिनेश ने गोयल साब की ओर देख कहा, ‘‘सर, आप की वजह से मेरा एडमिशन हो पाया था, मैं ने इस एहसान को उतारने के लिए जीजान से मेहनत की, पर आज आप ने रहीसही कसर पूरी कर दी.’’

‘‘गेट आउट,’’ गोयल की आवाज में रोब था. दिनेश निराश सा वापस जा रहा था. सहारे की तलाश में दिनेश यहां आया था और खुद रुसवा हो कर जा रहा था.

स्मिता बेहोश हो कर गिर पड़ी. पिछले 6 घंटों से वह लगातार चल रही थी. शाम को राजू को सारी घटना एक पान वाले से पता चली थी. वह स्मिता को ढूंढ़ने चल दिया. स्मिता बेहोश पड़ी थी और 3-4 लोग उसे घेरे सोच रहे थे कि इस का क्या किया जाए, अस्पताल ले जाना जरूरी है, पर यह जिम्मेदारी उठाए कौन. तभी वहां राजू पहुंच गया.

स्मिता की हालत देख कर राजू की आंखें भर आईं. उस का इलाज करा कर वह उसे अपने घर ले आया. थोड़ी देर बाद स्मिता को होश आया.

‘‘राजू…’’ ‘‘हां, चुपचाप लेटी रहो, उठने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘मैं कहां हूं?’’ स्मिता ने घर को देख कर कहा. ‘‘यह मेरा घर है… यह हमारा घर है…’’

‘‘नहीं राजू, मैं इस घर में रहने लायक…’’ ‘‘चुप, अब जरा भी बोली, तो जीभ काट लूंगा,’’ राजू ने स्मिता को हंसाने की कोशिश की.

‘‘मैं तुम्हें अपने बारे में सबकुछ बताना चाहती हूं,’’ स्मिता ने राजू की तरफ देखते हुए कहा. ‘‘अभी नहीं, बाद में.’’

‘‘नहीं राजू, अभी सुनो.’’ स्मिता ने अपनी जिंदगी के एकएक पन्ने राजू के सामने खोल कर रख दिए.

‘‘मु झ इस शहर से बाहर जाना है,’’ स्मिता की कहानी का आखिरी वाक्य था.

‘‘ठीक है, कल मैं बैंक में जो थोड़ाबहुत पैसा जमा है, निकाल लेता हूं.’’ ‘‘किसलिए?’’ स्मिता ने टोका.

‘‘अरे यार, उस के बाद कुछ सामान बेचना होगा, और सब हिसाबकिताब भी रफादफा करना होगा,’’ ठीक उसी समय स्मिता ने राजू की बात काटी, ‘‘शहर मु झे छोड़ कर जाना है, तुम्हें नहीं.’’

‘‘बनारस में मेरे कुछ जानने वाले हैं. वहां जिंदगी आराम से कट जाएगी. अगर कल निकलना है तो, काम अभी से शुरू करना होगा.’’ स्मिता इस बार थोड़ा गुस्से में बोली, ‘‘तुम क्यों महात्मा बनने की कोशिश कर रहे हो, तुम ने मेरी जान बचाई….शुक्रिया, अब जाने दो.’’

‘‘अब तुम मेरे साथ ही रहोगी,’’ राजू बोला. ‘‘क्यों?’’ स्मिता बोली.

‘‘क्योंकि मैं तुम से प्यार करता हूं और तुम से शादी करना चाहता हूं. तुम्हें कोई तकलीफ नहीं दे सकता हूं,’’ राजू हिचकिचाते हुए बोला.

‘‘राजू, तुम मेरे बारे में सबकुछ जानते हो, मैं तुम्हारे लायक…’’ ‘‘तुम मु झ से प्यार करती हो या नहीं?’’ राजू ने स्मिता का सिर अपनी गोद में रखते हुए पूछा.

‘‘मैं तुम्हारी जिंदगी नरक नहीं बनाना चाहती,’’ स्मिता की आवाज सिसक रही थी. ‘‘तुम मु झ से प्यार करती हो कि नहीं?’’ राजू ने अपना सवाल फिर से दोहराया. ‘‘बाद में… तुम्हें…’’ पर स्मिता बोल नहीं पाई.

‘‘तुम मु झ से प्यार करती हो…’’ राजू ने इतना कहा ही था कि स्मिता राजू से लिपटते हुए बोली, ‘‘मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूं. अपनी जान से भी ज्यादा चाहती हूं तुम्हें.’’

‘‘देखो, जो बीत गया वो बीत गया. मैं चोर था या तुम से कुछ गलतियां हुईं. हम एक शराफत और मेहनत की जिंदगी शुरू करेंगे. भागना क्यों है, मुकाबला करेंगे. आओ, मेरी गोद में सिर रख कर सो जाओ. कल सुबह बनारस जाने की तैयारी भी तो करनी है.’’

एक साल बीत गया. इस बीच रामदीन और प्रमिला दोनों पूरी तरह से स्मिता को भूल गए थे और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में लगे थे. आज फिर रिजल्ट आया, पर इस बार दिनेश ने कोई रिकार्ड वगैरह ब्रेक नहीं किया, पर अभी भी उस के नंबर सब से ज्यादा थे.

दिनेश का यह साल गुमसुम सा निकल गया. वह अपनेआप में खोया रहने वाला एक लड़का बन गया था. अंजलि और मधु दोनों उस की जिंदगी में नहीं थीं. मन बेचारा मानता ही नहीं था. दिनेश ने कई बार गोयल साहब को सम झाने की कोशिश की, पर बदले में जिल्लत के सिवाय कुछ नहीं मिला. अब मधु भी काफी कमजोर दिखाई देती थी.

स्मिता खुश थी. वह एक आदर्श बीवी की भूमिका बखूबी निभा रही थी. बनारस आने के 2 दिनों बाद ही राजू और स्मिता एकदूसरे के हो गए थे. स्मिता के दिमाग में बस यही चलता रहता कि कैसे वह राजू के लिए अच्छा कर सकती है.

यही हाल राजू का था. वह स्मिता को दुनिया की तमाम खुशियां देना चाहता था. अब उस के पास 2 गाडि़यां थीं. एक गाड़ी वह खुद चलाता था, दूसरी गाड़ी उस ने भाड़े पर दे रखी थी.

सरोज और अमित ने सारे उलटेसीधे काम बंद कर दिए थे, वैसे अभी भी शर्मा और रामदीन में बोलचाल नहीं थी.

मधु ने कई बार अपने पापा को सम झाने की कोशिश की, पर कोई असर नहीं पड़ा. मधु को गोयल साहब से काफी खरीखोटी सुननी पड़ती थी. मधु हमेशा मायूस रहती थी, प्रिया भी उस की हालत देख कर रो पड़ती थी. इस बार मधु सभी सबजैक्टों में फेल थी.

अंजलि की जितनी तारीफ की जाए, कम है. उस ने पिछले एक साल में एक सच्चे दोस्त का फर्ज अच्छी तरह से निभाया. दिनेश को जब सब से ज्यादा किसी की जरूरत थी, तब अंजलि उस के साथ थी. उस ने अपने असफल प्यार के बारे में अपने मम्मीपापा को सबकुछ बता रखा था.

आज फिर अंजलि ने गाड़ी का रुख उसी बाग की ओर कर दिया. दिनेश ने पूछा, ‘‘उधर क्यों जा रही हो?’’

‘‘मु झे तुम से कुछ बात करनी है,’’ अंजलि ने कहा. ‘‘ठीक है, चलो.’’

दरअसल, अब दिनेश का अंजलि के प्रति रवैया बहुत बदल गया था. उसे मालूम था कि आज की तारीख में अगर कोई उस की रगरग से वाकिफ है, तो वह अंजलि ही है.

‘‘बैठो, यह वही पत्थर है.’’ ‘‘पहचान रहा हूं.’’

‘‘मैं आज फिर वही फरियाद ले कर आई हूं, दिनेश. मैं कम से कम तुम्हारी जिंदगी में इतनी अहमियत तो जरूर रखती हूं कि मेरे बिना…’’ अंजलि की बातों का सिलसिला दिनेश ने तोड़ा.

‘‘मैं जानता हूं अंजलि. तुम कहती हो कि मेरे बिना फर्क नहीं पड़ेगा, तुम्हारे बगैर शायद मैं आगे की जिंदगी भी न काट पाऊं, पर…’’ दिनेश के सामने मधु का चेहरा घूमने लगा.

‘‘मैं तुम्हारा प्यार नहीं छीनना चाहती, पर अगर यह वाकई सच्चा प्यार था, तो उस ने तुम्हें रुसवा होने के लिए क्यों छोड़ दिया? उसे तुम्हारे पास आना था, फिर देखते, कैसे लड़ते दुनिया से तुम. मैं देती तुम्हारा साथ.’’

‘‘पर सिर्फ वही एक वजह नहीं है. अंजलि, मैं और तुम ठीक उसी तरह से हैं, जैसे  झोंपड़ी और महल. इस का फर्क एक खाई की तरह है, जिस को मैं पाट नहीं पाऊंगा.’’

‘‘अपने दिल से पूछ कर देखो कि इन पिछले 2 सालों में तुम ने कभी महसूस किया हो हमारे बीच में एक खाई है?’’ अंजलि की बात सुन कर दिनेश वाकई लाजवाब हो चुका था.

‘‘आई लव यू दिनेश, तुम ने बहुत रुसवाई देखी है. मु झे रुसवा मत करना.’’

दिनेश कुछ देर चुप रहा, चेहरे पर कई भाव आए और गए. फिर दोनों हाथ फैला कर बोले, ‘‘मेरी होने वाली बीवी मु झ से इतनी दूर क्यों है?’’

कुछ दिनों में ही अंजलि और दिनेश की शादी तय हो गई. शादी की सारी तैयारियां हो गई थीं.

आज शाम को ही दिनेश और अंजलि की शादी थी. दिन के तकरीबन एक बजे अंजलि अपने पापा के पास गई.

‘‘पापा, एक बहुत ही जरूरी काम है. मु झे बाहर जाना है.’’ ‘‘कहां बेटी? तेरी शादी है आज,’’ अंजलि के पापा कोमल सिंह ने सम झाते हुए कहा.

‘‘पापा प्लीज.’’ ‘‘ठीक है, संभाल कर. जल्दी आना.’’ ‘‘जी, पापा.’’

अंजलि ने काफी पूछताछ करने के बाद पता कर लिया था कि स्मिता और राजू बनारस में रहते हैं. बनारस में उन का पता भी राजू के दोस्त से चल गया था. उस दोस्त ने ही बताया था कि दोनों ने शादी कर ली है और स्मिता पेट से है.

अंजलि चाहती थी कि स्मिता को उस के परिवार का प्यार वापस किया जाए. क्योंकि यह दिनेश की सब से बड़ी इच्छा थी, पर वह पिता को दिए वादे की वजह से मजबूर था. अंजलि बनारस के लिए निकल चुकी थी.

राजू टैक्सी स्टैंड पर अपनी गाड़ी मैं बैठा था. उसी समय एक लड़की सब से नजरें छुपाती उस की कार का दरवाजा खोल कर पीछे बैठ गई. वह मधु थी. गोयल साहब ने अपना ट्रांसफर बनारस करवा लिया था. आज मधु और प्रिया में काफी बहस हुई थी. देखते ही देखते मधु के दिमाग में चल रहे कई दिनों की लड़ाई ने एक फैसले का रूप ले लिया. मधु घर से भाग गई.

‘‘भैया, इलाहाबाद चलना है.’’ ‘‘पर मैडम, लेट हो सकता है. आप दूसरी टैक्सी देख लें. मेरी बीवी इंतजार कर रही होगी.’’

‘‘प्लीज, अब ज्यादा देर मत कीजिए. वैसे भी मैं ने बहुत देर कर दी है,’’ मधु की परेशानी देखने लायक थी.

‘‘मैडम, लगता है, दिल का मामला है.’’ ‘‘जी.’’

‘‘चलिए,’’ कहते ही राजू ने कार गियर में डाल दी. तकरीबन आधा घंटा बीत गया. गाड़ी सरपट दौड़ रही थी. तभी राजू का मोबाइल बज उठा. मोबाइल पर मधु राजू की बातें सुन रही थी.

‘‘अरे जान, क्या हुआ?’’ ‘‘भाभी, मैं सम झा नहीं…’’

‘‘अच्छाअच्छा, पर वहां कोई तमाशा हो गया, तो…’’ ‘‘नहीं, मैं तुम्हारे खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुन सकता.’’

‘‘अरे, उन को तुम्हारी परवाह होती तो… लो, अब तुम्हारी भाभी से क्या बात करूं.’’

‘‘नमस्ते भाभी.’’ ‘‘पर आप…’’ ‘‘ठीक है, आप हमारी मुमताज को ले कर आइए. मैं तो इलाहाबाद ही जा रहा हूं. वैसे मु झे आना कहां है?’’ ‘‘क्वीन इनक्लेव, ग्रीन स्ट्रीट, रामबाग,’’ राजू ने पता दोहराया.

दोपहर के 4 बजने वाले थे. राजू मधु की ओर देख कर बोला, ‘‘मैं आप से आधा ही किराया लूंगा, क्योंकि मेरी बीवी भी इलाहाबाद जा रही है.’’

मधु ने थोड़ी रुचि ली, ‘‘इलाहाबाद में आप की बीवी का क्या है?’’ राजू ने बताया, ‘‘मायका.’’ मधु हंस दी, ‘‘तो साहब ससुराल जा रहे हैं.’’ राजू बोला, ‘‘साले साहब की शादी है.’’ ‘‘लगता है, शादी एकाएक तय हुई है?’’ ‘‘नहीं मैडम, न्यौता एकाएक मिला है,’’ दोनों हंसने लगे.

राजू के पूछने पर मधु ने जो पता बताया, उस को सुन कर राजू के होश उड़ गए. ‘‘ये तो रामदीन साहब के घर का पता है?’’ ‘‘हां, पर आप को कैसे मालूम…’’ मधु ने थोड़ा चकित हो कर पूछा. ‘‘वही तो मेरी ससुराल है.’’

‘‘आप स्मिता के पति हैं?’’ अब चौंकाने की बारी राजू की थी. ‘‘आप स्मिता को कैसे जानती हैं?’’‘‘मैं मधु…’’ तभी मधु ने देखा कि दिनेश का घर सजा हुआ है.

‘‘यह क्या हो रहा है?’’ मधु ने राजू से पूछा. ‘‘मेरे साले दिनेश की शादी है.’’ ‘‘क्या…’’ मधु की आंखों के सामने अंधेरा छा गया, ‘‘दिनेश की शादी किस से हो रही है?’’ ‘‘अंजलि से…’’

मधु की आंखों से आंसू बह रहे थे, ‘‘मु झे… एक मिनट, कागज का टुकड़ा होगा क्या?’’

राजू ने कागज का टुकड़ा मधु की तरफ बढ़ा दिया. मधु ने उस कागज पर कुछ लिखा और राजू को देते हुए बोली, ‘‘यह दिनेश को दे देना.’’

इतना कह कर वह दरवाजा खोल कर एक तरफ बढ़ गई. राजू की हिम्मत भी नहीं हुई कि उस से अपना भाड़ा मांग ले. राजू अपलक मधु को देखता रहा, जो अपने आंसू पोंछते हुए आगे जा रही थी.

मधु के जाने के बाद राजू ने गाड़ी अंजलि के घर की तरफ मोड़ दी. स्मिता और अंजलि घर के बाहर ही राजू का इंतजार करते मिले.

अंजलि के खास मेहमान होने की वजह से सभी लोग उन से बड़े अदब से पेश आ रहे थे. राजू के लिए यह सब एक सपने जैसा था.

थोड़ी देर में बारात आ गई. दिनेश एक खास तौर से तैयार किए हौल में बैठा था कि एक वेटर बड़ी संजीदगी से पास आ कर बोला, ‘‘साहब, आप को और आप के मम्मीपापा को दुलहन ने ऊपर बुलाया है. बहुत जरूरी काम है.’’ ‘‘ठीक है, आप चलिए, हम आते हैं.’’

रामदीन ने एकबारगी सोचा कि भला अंजलि ने अभी क्यों बुलाया है. पर अंजलि इतनी प्यारी थी कि किसी को कुछ सोचने की जरूरत ही नहीं थी. ऊपर कमरे में अंजलि सब का इंतजार कर रही थी, साथ में उस के मम्मीपापा भी थे.

‘‘हां बेटी, किसलिए बुलाया?’’ रामदीन ने सवाल किया. ‘‘पापा, मुझे आप को किसी से मिलाना था,’’ अंजलि ने प्यार से कहा. ‘‘किस से?’’ दिनेश ने अंजलि की ओर देखते हुए कहा. ‘‘अपने जीजाजी और बहिन से,’’ अंजलि ने दरवाजे की ओर रुख कर के कहा, ‘‘आप लोग प्लीज आइए.’’

स्मिता और राजू ने जैसे ही कदम रखा, रामदीन के पूरे परिवार के होश उड़ गए. दिनेश का दिल किया कि जा कर स्मिता से उस का हालचाल पूछे. प्रमिला देवी तो बस अपनी बेटी से लिपट जाना चाहती थीं, पर सभी जड़वत खड़े रहे.

‘‘पापा…’’ इतना कह कर स्मिता की आंखों से आंसू गिरने लगे. राजू ने स्मिता के दोनों कंधों पर हाथ रख कर सम झाते हुए कहा, ‘‘अरे पगली, रोती क्यों है, आज तेरे सारे अपने तेरे साथ हैं, तु झे तो खुश होना चाहिए.’’

प्रमिला देवी के सब्र का बांध टूट गया और जा कर बेटी से लिपट गईं. दोनों फफक कर खूब रोईं. प्रमिला स्मिता का हाथ पकड़ कर एक तरफ जाने लगीं. उन्होंने स्मिता का पेट देखा और पूछा, ‘‘कितने महीने का है?’’

‘‘एक महीने.’’ ‘‘अरे, वाह, मैं मामा बनने वाला हूं,’’ दिनेश जोश में बोला. ‘‘अबे, नाना मैं बन रहा हूं, क्यों बेटा’’ रामदीन ने स्मिता की ओर देख कर कहा.

रामदीन की यह बात सुन कर सभी का खुश होना लाजिमी था. उस ने हाथ फैला कर बेटी को बुलाया. अगले ही पल स्मिता रामदीन के पास थी.

‘‘मु झे माफ कर दीजिए पापा.’’‘‘मु झे माफ कर दो बेटी, बहुत तकलीफ दी है मैं ने तुम्हें…’’ रामदीन का गला भर आया.

मौका देख कर राजू दिनेश के पास गया, ‘‘यह किसी मधु ने दी है, बहुत तकलीफ में है बेचारी.’’

‘‘क्या…’’ दिनेश ने तुरंत वह चिट्ठी ली और पढ़ने लगा.

‘दिनेश, तुम ने  झूठ बोला था. न मैं ने तुम्हें मना किया था और न ही तुम्हारे पास आई थी, फिर भी तुम ने इंतजार खत्म कर दिया. मैं अब भी तुम से उतना ही प्यार करती हूं, जितना पहले करती थी. आज मैं अपना सबकुछ छोड़ कर तुम्हारे पास आई थी, लेकिन तुम मुझ से बहुत दूर जा चुके हो. अब तक तुम लोगों ने स्मिता को स्वीकार कर लिया होगा. थोड़ी देर में तुम्हारी शादी हो जाएगी. आज का यह अंधेरा तुम्हारे और अंजलि के परिवार या स्मिता के लिए दिन के उजाले से भी ज्यादा रोशन होगा. लेकिन जानेमन, हमारी जिंदगी तो पूरी काली रात बन गई. अब मैं घर नहीं जाऊंगी. तुम से मु झे 2 वादे चाहिए. एक तो तुम मु झे ढूंढ़ने की कोशिश नहीं करोगे. दूसरा, अगर तुम्हारी जिंदगी में बेटी आती है, तो उस का नाम मधु रखना. अपने पिछले वाले कल की तरह इन को मत तोड़ना. अंजलि को मेरी दुआएं देना, जाओ वह तुम्हारा इंतजार कर रही होगी.

तुम्हारी मधु.’

चारों तरफ हंसीखुशी के माहौल से दिनेश भागना चाहता है पर वाकई उस के लिए आज अंधेरे के मायने बदल गए थे.  Hindi Romantic Fiction

-मिथिलेश कुमार सिंह

Hindi Story: एक प्यार ऐसा भी-क्या थी नसीम की गलती

जेबा से बात करतेकरते कब फिरोज उस से प्यार करने लगा, उसे पता ही न चला. उसे जेबा के लिए स्ट्रौंग फीलिंग आने लगी थी, उस ने जेबा को प्रपोज कर दिया. लेकिन जेबा…? क्या वह भी फिरोज के लिए ऐसा ही महसूस कर रही थी?

उस दिन सूरज रोज की तरह ही निकला था. गरमी के दिनों में धूप की तल्खी इंसान को भी तल्ख कर देती है. फिरोज को नसीम को देख कर ऐसा ही लग रहा था.

नसीम अपनी ही धुन में बोले जा रही थी, ‘‘बहुत घमंडी है वह, खुद को जाने क्या समझती है?’’ नसीम बहुत गुस्से में थी.

‘‘लेकिन गलती तो तुम्हारी है न, फिर बात इतनी क्यों बढ़ाई?’’ फिरोज के इतना कहते ही नसीम भड़क गई, ‘‘तुम मेरे दोस्त हो या उस के?’’

‘‘तुम्हारा दोस्त हूं, इसी कारण समझाने की कोशिश कर रहा हूं,’’ फिरोज आगे भी कुछ कहना चाहता था लेकिन नसीम का गुस्सा देख कर चुप रह गया.

‘जब नसीम का गुस्सा कम होगा, तब इसे समझाऊंगा, अभी यह कुछ नहीं समझेगी,’ मन में ऐसा सोच कर न जाने क्यों फिरोज ने डिबेट ग्रुप से उस घमंडी लड़की का नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया.

‘‘आप कौन?’’ मैसेज में चमकते उन शब्दों को देख कर फिरोज को ध्यान आया कि अनजाने में ही वह उसे एक मैसेज फौरवर्ड कर गया है.

‘‘मैं फिरोज हूं,’’ की बोर्ड पर टाइप करते हुए उस ने अपना परिचय दिया.

‘‘क्या आप मुझे जानते हैं?’’ इस प्रश्न पर फिरोज ने बताया कि मैं नसीम का दोस्त हूं.

‘‘ओह, कहिए, क्या कहना है आप को?’’

‘‘कुछ नहीं, मैं ने गलती से यह मैसेज आप को भेज दिया. माफी चाहता हूं,’’ फिरोज ने शालीनता से कहा.

उस घमंडी लड़की से फिरोज की यह पहली बात थी.

फिरोज उसे पहले से जानता था. उस का नाम जेबा है. यह भी उसे पता था लेकिन वह फिरोज को नहीं जानती थी.

एक दिन बैठेबैठे न जाने क्यों फिरोज की इच्छा हुई जेबा से बात करने की लेकिन क्या कह कर वह उस से बात करेगा. क्यों नहीं कर सकता? दोनों एक ही विषय से जुड़े हैं, भले ही उन के कालेज अलगअलग हों और फिर नसीम वाली बात भी स्पष्ट कर लेगा. आखिर नसीम उस की सब से अच्छी दोस्त है.

फिरोज ने उस का नंबर डायल कर दिया.

‘‘हैलो, कौन बोल रहा है?’’ स्क्रीन पर अनजान नंबर देख कर ही शायद उस ने यह सवाल किया था.

‘‘मैं फिरोज, उस दिन गलती से आप को मैसेज किया था. नसीम का दोस्त,’’ फिरोज ने परिचय दिया.

‘‘कहिए, कैसे फोन किया?’’ जेबा ने मधुर मगर लहजे को सपाट रखते हुए सवाल किया.

‘‘जी, बस यों ही. दरअसल, हम दोनों के विषय एक ही हैं,’’ अचानक फिरोज को लगा कि वह बेवजह का कारण बता रहा है. ‘‘दरअसल उस दिन गलती नसीम की थी मगर वह दिल की बुरी नहीं, आप उस के लिए कोई मुगालता मत रखिएगा.’’

‘‘मैं जानती हूं कि वह अच्छी है. वह तो बस उस का लहजा मुझे पसंद नहीं आया.’’ जेबा से थोड़ी देर बात कर फिरोज ने फोन रख दिया. जेबा की शालीनता से वह काफी प्रभावित हुआ. धीरेधीरे दोनों की बातें बढ़ने लगीं. फिरोज ने महसूस किया कि जेबा से बात कर के उसे अच्छा लगता है. ऐसा नहीं था कि जेबा से पहले उस ने लड़कियों से बात नहीं की थी मगर जेबा में कुछ अलग था. सब से बड़ी बात उस में और जेबा में स्वभाव में काफी समानता थी.

जेबा खूबसूरत होने के साथ काफी समझदार भी थी. उस से बात करते हुए फिरोज को समय का एहसास भी न होता था. एक रात दोनों चैटिंग कर रहे थे. जेबा ने फिरोज को वीडियोकौल कर दी. यह पहला मौका था दोनों का एकदूसरे से रूबरू होने का. फिरोज एकटक जेबा को देखता ही रह गया.

जेबा ने खिलखिला कर पूछा, ‘‘क्या हुआ आप को? ऐसे क्या देख रहे हैं?’’

फिरोज कहना तो बहुतकुछ चाहता था लेकिन अभी कुछ कहना शायद जल्दबाजी होती, इसलिए सिर हिला कर मुसकरा दिया. थोड़ी देर बात करने के बाद जेबा ने गुडनाइट कहते हुए फोन काट दिया.

फिरोज कौल कटने के बाद भी काफी देर तक मोबाइल स्क्रीन को देखता रहा और फिर बेखयाली में मुसकराते हुए उस ने स्क्रीन पर एक चुंबन जड़ दिया.

‘न जाने क्या है उस में जो मुझे अपनी तरफ खींचता है,’ आईने में बाल संवारते हुए फिरोज खुद से ही सवाल कर रहा था.

कालेज जाने के लिए बाइक स्टार्ट करने के पहले फिरोज ने मोबाइल में मैसेज चैक किए. मैसेज तो कई थे, बस जेबा का ही कोई मैसेज न था. फिरोज थोड़ा मायूम हुआ.

‘कहीं यह इकतरफा मोहब्बत तो नहीं. न…न… काश, वह भी मेरे बारे में ऐसा ही सोचती हो,’ मन ही मन सोच कर फिरोज ने बाइक स्टार्ट की ही थी कि मोबाइल पर किसी की कौल आई. जेब से मोबाइल निकाला. अरे यह तो जेबा है. आसमान की तरफ देख कर, धड़कते दिल को काबू में कर फिरोज ने फोन उठाया.

‘‘हैलो, क्या कर रहे हो?’’ उधर से जेबा का स्वर न जाने क्यों फिरोज को उदास सा लगा.

‘‘हैलो, मैं कुछ नहीं कर रहा. तुम बताओ,’’ फिरोज फिक्रमंद हुआ.

‘‘कालेज जा रहे होगे न? मैं ने तो बस यों ही कौल कर लिया था.’’

‘‘जेबा, तुम उदास क्यों हो? क्या हुआ है?’’ फिरोज अब परेशान हो गया.

‘‘मैं ने एक कंपीटिशन से अपना नाम वापस ले लिया,’’ कहती हुई जेबा हिचकियां ले कर रोने लगी.

फिरोज ने बाइक किनारे खड़ी की और एक पेड़ के सहारे खड़ा हो गया.

‘‘तुम मुझे पूरी बात बताओ जेबा. क्या और कैसे हुआ?’’ फिरोज काफी संजीदा हो गया था.

जेबा ने रोतेरोते सब बता दिया कि किस तरह चीटिंग कर के उस की जगह किसी और को फाइनल में भेजा जाएगा.

‘‘जेबा, अब तुम उस बारे में बिलकुल मत सोचो. मैं हूं न तुम्हारे साथ. ऐसे बहुत कंपीटिशन मिलेंगे तुम्हें,’’

फिरोज का मन कर रहा था कि वह किसी तरह जेबा के पास पहुंच कर उसे संभाल ले. उस की एकएक हिचकी पर फिरोज का दिल बैठा जा रहा था. आखिरकार उस ने पूछ ही लिया कि तुम कहां हो इस वक्त.

‘‘घर पर,’’ जेबा ने छोटा सा जवाब दिया.

‘‘चांदनी चौक आ सकती हो? कहीं बैठें?’’

‘‘नहीं.’’

‘उफ्फ, फिर कैसे संभालूं इसे मैं,’  मगर फिर भी फिरोज उस से बातें करता रहा जब तक जेबा नौर्मल नहीं हो गई.

‘‘अब क्या करूं? कालेज का टाइम तो मोहतरमा ने निकलवा दिया और मिल भी नहीं रही,’’ नकली गुस्से में फिरोज ने जेबा से कहा तो जेबा ने भी शोखी से जवाब दिया, ‘‘तो चले जाते, हम ने कोई जबरदस्ती तो नहीं पकड़ा था आप को.’’

‘‘मैं कुछ कहना चाहता हूं जेबा, मगर डरता हूं कहीं यह जल्दबाजी तो नहीं होगी,’’ आज फिरोज दिल की बात जुबां पर लाना चाहता था.

‘‘मैं समझी नहीं. क्या कहना है आप को?’’ जेबा की आवाज से लग रहा था जैसे वह समझ कर भी अनजान बन रही है.

‘‘कह दूं.’’

‘‘जी, कहें.’’

‘‘आई लव यू जेबा. मैं बहुत स्ट्रौंग फीलिंग महसूस कर रहा हूं तुम्हारे लिए.’’

जवाब में दूसरी तरफ खामोशी छा गई.

‘‘जेबा, क्या हुआ? नाराज हो गईं क्या? कुछ तो कहो. देखो, मैं जो कह रहा हूं सच है और मैं इस के लिए सौरी नहीं बोलूंगा. आई रियली लव यू.’’

‘‘देखिए, मेरे मन में ऐसा कुछ भी फील नहीं हो रहा लेकिन जब भी ऐसा महसूस हुआ तो जरूर कहूंगी.’’

‘‘इंतजार रहेगा कि जल्दी ही वह दिन आए,’’ कहते हुए फिरोज ने अपने दिल पर हाथ रख लिया.

जेबा और फिरोज की बातें अकसर होती रहीं. एक दिन फिरोज ने जेबा से कहा कि उसे कालेज के टूर पर 2 दिनों के लिए जाना है. इस बीच हो सकता है उन की बात न हो सके.

जेबा ने फिरोज को हैप्पी जर्नी कहा लेकिन न जाने क्यों जेबा उदास हो गई. सहेलियों से बात करते हुए भी उसे बारबार एक खालीपन का एहसास हो रहा था. उस के अनमनेपन के लिए सहेलियों ने टोका भी लेकिन जेबा उन से क्या कहती.

शाम को फिरोज की कौल आते ही उस ने पहली ही घंटी में फोन उठा लिया.

‘‘कैसे हो? क्या कर रहे हो?’’ एक सांस में जेबा ने कई सवाल कर लिए.

‘‘क्या हुआ मैडम? मिस कर रही हो क्या मुझे,’’ फिरोज ने शरारत से पूछा.

‘‘नहीं, मैं क्यों मिस करने लगी,’’ जेबा ने अपनी बेताबी को छिपाते हुए कहा.

जवाब में फिरोज हलके से हंस दिया.

‘‘सुनो, आई लव यू.’’

‘‘क्या… क्या कहा तुम ने. फिर से कहो.’’

‘‘अब नहीं कह रही. एक बार कह तो दिया,’’ जेबा शरमा गई.

‘‘तुम रेडियो हो क्या जो दोबारा नहीं बोल सकती,’’ फिरोज जेबा से फिर से सुनना चाहता था, ‘‘मैं सुन नहीं पाया.’’

‘‘आई लव यू. अब तो सुन लिया न, बदमाश,’’ जेबा के गालों पर सुर्खी दौड़ गई.

‘‘आई लव यू टू,’’ कहते हुए फिरोज ने मोबाइल से ही एक फ्लाइंग किस जेबा की तरफ उछाल दी.

फिरोज बहुत खुश था और जेबा भी.

दोनों की बातें अब दिनोंदिन लंबी होती जा रही थीं. अभी तक दोनों एकदूसरे से मिले नहीं थे. एक दिन फिरोज ने जेबा से मिलने के लिए कहा. कालिंदी कुंज में दोनों तय समय पर मिलने आए. अपनी मोहब्बत को सामने देख कर दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था. काफी समय साथ बिता कर रात में बात करने के वादे के साथ अपनेअपने घर चले गए.

जेबा अपने सब कामों से फ्री हो कर रात को 10 बजे फिरोज से बात करने के लिए औनलाइन आ गई. लेकिन फिरोज का कहीं पता नहीं था. थोड़ी देर बाद वह औनलाइन आया लेकिन उस ने जेबा को थोड़ा इंतजार करने के लिए कहा.

घड़ी की सूइयां खिसकती जा रही थीं और उस के साथ ही साथ जेबा का गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था क्योंकि वह फिरोज को औनलाइन आते देख रही थी मगर वह उस के मैसेज अनदेखे कर रहा था. आखिरकार, रात के 12 बजे जेबा के सब्र का पैमाना छलक गया और उस ने फिरोज को एक गुडनाइट के मैसेज के साथ थैंक्स लिख कर अपना मोबाइल स्विचऔफ कर लिया.

अगले दिन सुबह जेबा ने फिरोज को कई बार कौल किया लेकिन उस का फोन लगातार व्यस्त आ रहा था. दोपहर को फिरोज ने जेबा को फोन कर नाराजगी दिखाई और कहा कि उस का कजिन साथ था, वह उस के सोने का इंतजाम कर रहा था. इस कारण उस वक्त बात नहीं कर पाया. जेबा को इंतजार करना चाहिए था और सुबह वह रातभर जग कर थक कर सो गया था और उस का फोन कजिन इस्तेमाल कर रहा था.

जेबा यह सुन कर और भी नाराज हो गई, ‘‘जब तुम्हें पता था कि मैं तुम से गुस्सा हूं और सुबह तुम को फोन कर के लड़ं ूगी तो तुम ने अपना फोन अपने कजिन को क्यों दिया?’’

‘‘अरे उस का फोन खराब हो गया था और उसे अपनी गर्लफ्रैंड से बात करनी थी,’’ फिरोज को जेबा की बात सुन कर उस पर प्यार भी आ रहा था.

‘‘मुझे नहीं पता, तुम सौरी कहो.’’

‘‘मैं नहीं बोलूंगा.’’

‘‘क्या… नहीं बोलोगे?’’ जेबा भी जिद पर आ गई थी.

‘‘सौरी, सौरी नहीं कहूंगा.’’

‘‘चलो, दो बार कह दिया तुम ने सौरी. अब आगे से ऐसा मत करना,’’ जेबा ने इतरा कर कहा तो फिरोज उस की इस चतुराई पर हैरान रह गया और हंस पड़ा.

‘‘आई लव यू.’’

‘‘आई लव यू टू,’’ कहते हुए दोनों हंस पड़े, एकदूसरे के साथ जिंदगीभर यों ही हाथ पकड़ कर हंसते रहने के वादे के साथ.

Hindi Story: हम दिल दे चुके सनम-देवर को लेकर शिखा की बेचानी

Hindi Story: शिखा को नीचे से ऊपर तक प्रशंसा भरी नजरों से देखने के बाद रवि ऊंचे स्वर में सविता से बोला, ‘‘भाभी, आप की बहन सुंदर तो है, पर आप से ज्यादा नहीं.’’

‘‘गलत बोल रहा है मेरा भाई,’’ राकेश ने हंसते हुए कहा, ‘‘अरे, यह तो सविता से कहीं ज्यादा खूबसूरत है.’’

‘‘लगता है शिखा को देख कर देवरजी की आंखें चौंधिया गई हैं,’’ सविता ने रवि को छेड़ा.

‘‘भाभी, उलटे मेरी स्मार्टनैस ने शिखा को जबरदस्त ‘शाक’ लगाया है. देखो, कैसे आंखें फाड़फाड़ कर मुझे देखे जा रही है,’’ रवि ने बड़ी अकड़ के साथ अपनी कमीज का कालर ऊपर किया.

जवाब में शिखा पहले मुसकराई और फिर बोली, ‘‘जनाब, आप अपने बारे में काफी गलतफहमियां पाले हुए हैं. चिडि़याघर में लोग आंखें फाड़फाड़ कर अजीबोगरीब जानवरों को उन की स्मार्टनैस के कारण थोड़े ही देखते हैं.’’

‘‘वैरीगुड, साली साहिबा. बिलकुल सही जवाब दिया तुम ने,’’ राकेश तालियां बजाने लगा.

‘‘शिखा, गलत बात मुंह से न निकाल,’’ अपनी मुसकराहट को काबू में रखने की कोशिश करते हुए सावित्री ने अपनी छोटी बेटी को हलका सा डांटा.

‘‘आंटी, डांटिए मत अपनी भोली बेटी को. मैं ने जरा कम तारीफ की, इसलिए नाराज हो गई है.’’

‘‘गलतफहमियां पालने में माहिर लगते हैं आप तो,’’ शिखा ने रवि का मजाक उड़ाया.

‘‘आई लाइक इट, भाभी,’’ रवि सविता की तरफ मुड़ कर बोला, ‘‘हंसीमजाक करना जानती है आप की मिर्च सी तीखी यह बहन.’’

‘‘तुम्हें पसंद आई है शिखा?’’ सविता ने हलकेफुलके अंदाज में सब से महत्त्वपूर्ण सवाल पूछा.

‘‘चलेगी,’’ रवि लापरवाही से बोला, ‘‘आप लोग चाहें तो घोड़ी और बैंडबाजे वालों को ऐडवांस दे सकते हैं.’’

‘‘एक और गलतफहमी पैदा कर ली आप ने. कमाल के इंसान हैं आप भी,’’ शिखा ने मुंह बिगाड़ कर जवाब दिया और फिर हंस पड़ी.

‘‘भाभी, आप की बहन शरमा कर ऐसी बातें कर रही है. वैसे तो अपने सपनों के राजकुमार को सामने देख कर मन में लड्डू फूट रहे होंगे,’’ रवि ने फिर कालर खड़ा किया.

‘‘इन का रोग लाइलाज लगता है, जीजू. इन्हें शीशे के सामने ज्यादा खड़ा नहीं होना चाहिए. मेरी सलाह तो किसी दिमाग के डाक्टर को इन्हें दिखाने की भी है. आप सब मेरी सलाह पर विचार करें, तब तक मैं सब के लिए चाय बना कर लाती हूं,’’ ड्राइंगरूम से हटने के इरादे से शिखा रसोई की तरफ चल पड़ी.

‘‘शर्मोहया के चलते ‘हां’ कहने से चूक गईं तो मैं हाथ से निकल जाऊंगा, शिखा,’’  रवि ने उसे फिर छेड़ा.

जवाब में शिखा ने जीभ दिखाई, तो ठहाकों से कमरा गूंज उठा.

रवि अपनी सविता भाभी का लाड़ला देवर था. उस की अपनी बहन शिखा के सामने प्रशंसा करते सविता की जबान न थकती थी.

अपनी बड़ी बहन सविता की शादी की तीसरी सालगिरह के समारोह में शामिल होने के लिए शिखा अपनी मां सावित्री के साथ दिल्ली आई थी.

सविता का इकलौता इंजीनियर देवर रवि मुंबई में नौकरी कर रहा था. वह भी सप्ताह भर की छुट्टी ले कर दिल्ली पहुंचा था.

सविता और उस के पति राकेश के विशेष आग्रह पर रवि और शिखा दोनों इस समारोह में शामिल हो रहे थे. जब वे पहली बार एकदूसरे के सामने आए, तब सविता, राकेश और सावित्री की नजरें उन्हीं पर जम गईं.

राकेश अपनी साली का बहुत बड़ा प्रशंसक था. वह चाहता था कि शिखा भी उन के घर की बहू बन जाए.

अपने दामाद की इस इच्छा से सावित्री पूरी तरह सहमत थीं. देखेभाले इज्जतदार घर में दूसरी बेटी के पहुंच जाने पर वह पूरी तरह से चिंतामुक्त हो जातीं.

सावित्रीजी, राकेश और सविता को उम्मीद थी कि लड़कालड़की यानी रवि और शिखा इस बार की मुलाकात में उन की पसंद पर अपनी रजामंदी की मुहर जरूर लगा देंगे.

क्या शिखा उसे पसंद आ गई है

रवि ने अपनी बातों व हावभाव से साफ कर दिया कि शिखा उसे पसंद आ गई है. उस का दीवानापन उस की आंखों से साफ झलक रहा था. उस के हावभाव से साफ जाहिर हो रहा था कि शिखा की ‘हां’ के प्रति उस के मन में कोई शक नहीं है.

अपने भैयाभाभी का लाड़ला रवि शिखा को छेड़ने का कोई मौका नहीं चूक रहा था.

उस दिन शाम को शिखा अपनी बहन का खाना तैयार कराने में हाथ बंटा रही थी, तो रवि भी वहां आ पहुंचा.

‘‘शिखा, मेरी रुचियां भाभी को अच्छी तरह मालूम हैं. वे जो बताएं, उसे ध्यान से सुनना,’’ रवि ने आते ही शिखा को छेड़ना शुरू कर दिया.

‘‘आप को मेरी एक तमन्ना का शायद पता नहीं है,’’ शिखा का स्वर भी फौरन शरारती हो उठा.

‘‘तुम इसी वक्त अपनी तमन्ना बयान करो, शिखा. बंदा उसे जरूरपूरी करेगा.’’

‘‘मैं दुनिया की सब से घटिया कुक बनना चाहती हूं और इसीलिए अपनी मां या दीदी से पाक कला के बारे में कुछ भी सीखने का मेरा कोई इरादा नहीं है.’’

‘‘लेकिन यह तो टैंशन वाली बात है. मैं तो अच्छा खानेपीने का बहुत शौकीन हूं.’’

‘‘मैं कब कह रही हूं कि आप इस तरह का शौक न पालिए.’’

‘‘पर तुम अच्छा खाना बनाना सीखोगी नहीं, तो हमारी शादी के बाद मेरा यह शौक पूरा कैसे होगा?’’

‘‘रवि साहब, बातबात पर गलतफहमियां पाल लेने में समझदारी नहीं.’’

‘‘अब शरमाना छोड़ भी दो, शिखा. तुम्हारी मम्मी, भैया, भाभी और मैं इस रिश्ते के लिए तैयार हैं, तो तुम क्यों जबरदस्ती की ‘न’ पर अड़ी हो?’’

‘‘जब लड़की नहीं राजी, तो क्या करेगा लड़का और क्या करेंगे काजी?’’ अपनी इस अदाकारी पर शिखा जोर से हंस पड़ी.

रवि उस से हार मानने को तैयार नहीं था. उस ने और ज्यादा जोरशोर से शिखा को छेड़ना जारी रखा.

अगले दिन सुबह सब ने सविता और राकेश को उन के सुखी वैवाहिक जीवन के लिए शुभकामनाएं दीं. इस दौरान भी रवि और शिखा में मीठी नोकझोंक चलती रही.

अपने असली मनोभावों को शिखा ने उस दिन दोपहर को अपनी मां और दीदी के सामने साफसाफ प्रकट कर दिया.

‘‘देखो, रवि वैसा लड़का नहीं है, जैसा मैं अपने जीवनसाथी के रूप में देखती आई हूं. उस से शादी करने का मेरा कोई इरादा नहीं है,’’ शिखा ने दृढ़ लहजे में उन्हें अपना फैसला सुना दिया.

‘‘क्या कमी नजर आई है तुझे रवि में?’’ सावित्री ने चिढ़ कर पूछा.

‘‘मां, रवि जैसे दिलफेंक आशिक मैं ने हजारों देखे हैं. सुंदर लड़कियों पर लाइन मारने में कुशल युवकों को मैं अच्छा जीवनसाथी नहीं मानती.’’

‘‘शिखा, रवि के अच्छे चरित्र की गारंटी मैं लेती हूं,’’ सविता ने अपनी बहन को समझाने का प्रयास किया.

‘‘दीदी, आप के सामने वह रहता ही कितने दिन है? पहले बेंगलुरु में पढ़ रहा था और अब मुंबई में नौकरी कर रहा है. उस की असलियत तुम कैसे जान सकती हो?’’

‘‘तुम से तो ज्यादा ही मैं उसे जानती हूं. बिना किसी सुबूत उसे कमजोर चरित्र का मान कर तुम भारी भूल कर रही हो, शिखा.’’

‘‘दीदी मैं उसे कमजोर चरित्र का नहीं मान रही हूं. मैं सिर्फ इतना कह रही हूं कि उस जैसे दिलफेंक व्यक्तित्व वाले लड़के आमतौर पर भरोसेमंद और निभाने वाले नहीं निकलते. फिर जब मैं उसे ज्यादा अच्छी तरह जानतीसमझती नहीं हूं, तो उस से शादी करने को ‘हां’ कैसे कह दूं? आप लोगों ने अगर मुझ पर और दबाव डाला, तो मैं कल ही घर लौट जाऊंगी,’’ शिखा की इस धमकी के बाद उन दोनों ने नाराजगी भरी चुप्पी साध ली.

सविता ने शिखा का फैसला राकेश को बताया, तो राकेश ने कहा, ‘‘उसे इनकार करने का हक है, सविता. इस विषय पर हम बाद में सोचविचार करेंगे. मैं रवि से बात करता हूं. तुम शिखा पर किसी तरह का दबाव डाल कर उस का मूड खराब मत करना.’’

पति के समझाने पर फिर सविता ने इस रिश्ते के बारे में शिखा से एक शब्द भी नहीं बोला.

राकेश ने अकेले में रवि से कहा, ‘‘भाई, शिखा को तुम्हारी छेड़छाड़ अच्छी नहीं लग रही है. उस से अपनी शादी को ले कर हंसीमजाक करना बंद कर दो.’’

‘‘लेकिन भैया, उस से तो मेरी शादी होने ही जा रही है,’’ रवि की आंखों में उलझन और उदासी के मिलेजुले भाव उभरे.

‘‘सोच तो हम भी यही रहे थे, लेकिन अंतिम फैसला तो शिखा का ही माना जाएगा न?’’

‘‘तो क्या उस ने इनकार कर दिया है?’’

‘‘हां, पर तुम दिल छोटा न करना. ऐसे मामलों में जबरदस्ती दबाव बनाना उचित नहीं होता है.’’

‘‘मैं समझता हूं, भैया. शिखा को शिकायत का मौका मैं अब नहीं दूंगा,’’ रवि उदास आवाज में बोला.

शाम को शादी की सालगिरह के समारोह में राकेश के कुछ बहुत करीबी दोस्त सपरिवार आमंत्रित थे. घर के सदस्यों ने उन की आवभगत में कोई कमी नहीं रखी, पर कोई भी खुल कर हंसबोल नहीं पा रहा था.

रवि ने एकांत में शिखा से सिर्फ इतना कहा, ‘‘मैं सचमुच बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार था. मेरी जिन बातों से आप के दिल में दुख और नाराजगी के भाव पैदा हुए, उन सब के लिए मैं माफी मांगता हूं.’’

‘‘मैं आप की किसी बात से दुखी या नाराज नहीं हूं. आप के व मेरे अपनों के अति उत्साह के कारण जो गलतफहमी पैदा हुई, उस का मुझे अफसोस है,’’ शिखा ने मुसकरा कर रवि को सहज करने का प्रयास किया, पर असफल रही, क्योंकि रवि और कुछ बोले बिना उस के पास से हट कर घर आए मेहमानों की देखभाल करने में व्यस्त हो गया. उस के हावभाव देख कर कोई भी समझ सकता था कि वह जबरदस्ती मुसकरा रहा है.

‘इन जनाब की लटकी सूरत सारा दिन देखना मुझ से बरदाश्त नहीं होगा. मां को समझा कर मैं कल की ट्रेन से घर लौटने का इंतजाम करती हूं,’ मन ही मन यह फैसला करने में शिखा को ज्यादा वक्त नहीं लगा, मगर उसे अपनी मां से इस विषय पर बातें करने का मौका ही नहीं मिला और इसी दौरान एक दुर्घटना घटी और सारा माहौल तनावग्रस्त हो गया.

आखिरी मेहमानों को विदा कर के जब सविता लौट रही थी, तो रास्ते में पड़ी ईंट से ठोकर खा कर धड़ाम से गिर गई.

सविता के गर्भ में 6 महीने का शिशु था. काफी इलाज के बाद वह गर्भवती हो पाई थी. गिरने से उस के पेट में तेज चोट लगी थी. चोट से पेट के निचले हिस्से में दर्द शुरू हो गया. कुछ ही देर बाद हलका सा रक्तस्राव हुआ, तो गर्भपात हो जाने का भय सब के होश उड़ा गया.

राकेश और रवि सविता को फौरन नर्सिंगहोम ले गए. सावित्रीजी और शिखा घर पर ही रहीं और कामना कर रही थीं कि कोई और अनहोनी न घटे.

सविता की हालत ठीक नहीं है, गर्भपात हो जाने की संभावना है, यह खबर राकेश ने टेलीफोन द्वारा सावित्रीजी और शिखा को दे दी.

मांबेटी दोनों की आंखों से नींद छूमंतर हो गई. दोनों की आंखें रहरह कर आंसुओं से भीग जातीं.

सुबह 7 बजे के करीब रवि अकेला लौटा. उस की सूजी आंखें साफ दर्शा रही थीं कि वह रात भर जागा भी है और रोया भी.

‘‘सविता की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है,’’ यह खबर इन दोनों को सुनाते हुए उस का गला भर आया था.

फिर रवि जल्दी से नहाया और सिर्फ चाय पी कर नर्सिंगहोम लौट गया.

उस के जाने के आधे घंटे बाद राकेश आया तो उस का उदास, थका चेहरा देख कर सावित्रीजी रो पड़ीं.

राकेश बहुत थका हुआ था. वह कुछ देर आराम करने के इरादे से लेटा था, पर गहरी नींद में चला गया. 3-4 घंटों के बाद सावित्रीजी ने उसे उठाया.

नाश्ता करने के बाद सावित्री और राकेश नर्सिंगहोम चले गए. शिखा ने सब के लिए खाना तैयार किया, पर शाम के 5 बजे तक रवि, राकेश या सावित्रीजी में से कोई नहीं लौटा. चिंता के मारे अकेली शिखा का बुरा हाल हो रहा था.

करीब 7 बजे राकेश और सावित्रीजी लौटे. उन्होंने बताया कि रवि 1 मिनट को भी वहां से हटने को तैयार नहीं था.

सुबह से भूखे रवि के लिए राकेश खाना ले गया. फोन पर जब शिखा को अपने जीजा से यह खबर मिली कि रवि ने अभी तक खाना नहीं खाया है और न ही वह आराम करने के लिए रात को घर आएगा, तो उस का मन दुखी भी हुआ और उसे रवि पर तेज गुस्सा भी आया.

खबर इस नजरिए से अच्छी थी कि सविता की हालत और नहीं बिगड़ी थी. उस रात भी रवि और राकेश दोनों नर्सिंगहोम में रुके. शिखा और सावित्रीजी ने सारी रात करवटें बदलते हुए काटी. सुबह सावित्रीजी पहले उठीं. शिखा करीब घंटे भर बाद. उस ने खिड़की से बाहर झांका, तो बरामदे के फर्श पर रवि को अपनी तरफ पीठ किए बैठा पाया.

अचानक रवि के दोनों कंधे अजीब से अंदाज में हिलने लगे. उस ने अपने हाथों से चेहरा ढांप लिया. हलकी सी जो आवाजें शिखा के कानों तक पहुंची, उन्हें सुन कर उसे यह फौरन पता लग गया कि रवि रो रहा है.

बेहद घबराई शिखा दरवाजा खोल कर रवि के पास पहुंची. उस के आने की आहट सुन कर रवि ने पहले आंसू पोंछे और फिर गरदन घुमा कर उस की तरफ देखा.

रवि का थका, मुरझाया चेहरा देख कर शिखा का दिल डर के मारे जोरजोर से धड़कने लगा.

‘‘दीदी की तबीयत…’’ शिखा रोंआसी हो अपना सवाल पूरा न कर पाई.

‘‘भाभी अब ठीक हैं. खतरा टल गया है,’’ रवि ने मुसकराते हुए उसे अच्छी खबर सुनाई.

‘‘तो तुम रो क्यों रहे हो?’’ आंसू बहा रही शिखा का गुस्सा करने का प्रयास रवि को हंसा गया.

‘‘मेरी आंखों में खुशी के आंसू हैं, शिखाजी,’’ रवि ने अचानक फिर आंखों में छलक आए आंसुओं को पोंछा.

‘‘मैं शिखा हूं, ‘शिखाजी’ नहीं,’’  मन में गहरी राहत महसूस करती शिखा उस के बगल में बैठ गई.

‘‘मेरे लिए ‘शिखाजी’ कहना ही उचित है,’’ रवि ने धीमे स्वर में जवाब दिया.

‘‘जी नहीं. आप मुझे शिखा ही बुलाएं,’’ शिखा का स्वर अचानक शरारत से भर उठा, ‘‘और मुझ से नजरें चुराते हुए न बोलें और न ही मैं आप को ठंडी सांसें भरते हुए देखना चाहती हूं.’’

‘‘वह सब मैं जानबूझ कर नहीं कर रहा हूं. तुम्हें दिल से दूर करने में कष्ट तो होगा ही,’’ रवि ने एक और ठंडी सांस भरी.

‘‘वह कोशिश भी छोडि़ए जनाब, क्योंकि मैं अब जान गई हूं कि इस दिलफेंक आशिक का स्वभाव रखने वाले इनसान का दिल बड़ा संवेदनशील है,’’ कह शिखा ने अचानक रवि का हाथ उठा कर चूम लिया.

रवि मारे खुशी के फूला नहीं समाया. फिर अचानक गंभीर दिखने का नाटक करते हुए बोला, ‘‘मेरे मन में अजीब सी बेचैनी पैदा हो गई है, शिखा. सोच रहा हूं कि जो लड़की जरा सी भावुकता के प्रभाव में आ कर लड़के का हाथ फट से चूम ले, उसे जीवनसंगिनी बनाना क्या ठीक होगा?’’

‘‘मुझ पर इन व्यंग्यों का अब कोई असर नहीं होगा, जनाब,’’ शिखा ने एक बार फिर उस का हाथ चूम लिया, ‘‘क्योंकि आप की इस सोच में कोई सचाई नहीं है और…’’

‘‘और क्या?’’ रवि ने उस की आंखों में प्यार से झांकते हुए पूछा.

‘‘अब तो तुम्हें हम दिल दे ही चुके सनम,’’ शिखा ने अपने दिल की बात कही और फिर शरमा कर रवि के सीने से लग गई.

Romantic Story: पर्सनल स्पेस – क्यों नेहा के पास जाने को बेताब हो उठा मोहित?

Romantic Story: आज औफिस में मैं बिलकुल भी ढंग से काम नहीं कर सका था. इस कारण बौस से तो कई बार डांट खानी पड़ी ही, सहयोगियों के साथ भी झड़प हो गई थी.

आखिर में तंग आ कर मैं ने औफिस से1 घंटा पहले जाने की अनुमति बौस से मांगी, तो उन्होंने तीखे शब्दों में मुझ से कहा, ‘‘मोहित, आज सारा दिन तुम ने कोई भी काम ढंग से नहीं किया है. मुझे छोटीछोटी बातों पर

किसी को डांटना अच्छा नहीं लगता. मुझे उम्मीद है कि कल तुम्हारा चेहरा मुझे यों लटका हुआ नहीं दिखेगा.’’

‘‘बिलकुल नहीं दिखेगा, सर,’’ ऐसा वादा कर मैं उन के कक्ष से बाहर आ गया.

औफिस से निकल कर मैं मोटरसाइकिल से बाजार जाने को निकल पड़ा. मुझे अपनी पत्नी नेहा के लिए कोई अच्छा सा गिफ्ट लेना था.

हमारी शादी को अभी 4 महीने ही हुए हैं. वह मेरे सुख व खुशियों का बहुत ध्यान रखती है. मेरी पसंद पूछे बिना मजाल है वह कोई काम कर ले.

पिछले गुरुवार को उस का यही प्यार भरा व्यवहार मुझे ऐसा खला कि मैं ने उसे शादी के बाद पहली बार बहुत जोर से डांट दिया था.

उस दिन हमें रवि की शादी की पहली सालगिरह की पार्टी में जाना था. जगहजगह टै्रफिक जाम मिलने के कारण मुझे औफिस से घर पहुंचने में पहले ही देर हो गई थी. ऊपर से ये देख कर मेरा गुस्सा बढ़ने लगा कि नेहा समय से तैयार होना शुरू करने की बजाय मेरे घर पहुंचने का इंतजार कर रही थी.

‘‘इन में से मैं कौन सी साड़ी पहनूं, यह तो बता दो?’’ आदत के अनुरूप उस ने इस मामले में भी मेरी पसंद जाननी चाही थी.

‘‘नीली साड़ी पहन लो,’’ अपना व उस का मूड खराब करने से बचने के लिए मैं ने अपनी आवाज में गुस्से के भाव पैदा नहीं होने दिए थे.

‘‘मुझे लग रहा है कि मैं ने इसे तब भी पहना था, जब हम रवि के घर पहली बार डिनर करने गए थे.’’

‘‘तो कोई दूसरी साड़ी पहन लो.’’

‘‘आप प्लीज बताओ न कि कौन सी पहनूं?’’

इस बार मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं उस पर जोर से चिल्ला उठा, ‘‘यार, तुम जल्दी तैयार होने के बजाय फालतू की बातें करने में समय बरबाद क्यों कर रही हो? हर काम करने से पहले मेरी जान खाने की बजाय तुम अपनेआप फैसला क्यों नहीं करतीं कि क्या किया जाए, क्या न किया जाए? मुझे ऐसा बचकाना व्यवहार बिलकुल अच्छा नहीं लगता है.’’

पार्टी में पहुंच कर उस का मूड पूरी तरह से ठीक हो गया, पर मेरा मूड उस के चिपकू व्यवहार के कारण खराब बना रहा.

रवि मेरा कालेज का दोस्त है. उस पार्टी में शामिल होने कालेज के और भी बहुत से दोस्त आए थे. मैं कुछ समय अपने इन पुराने दोस्तों के साथ बिताना चाहता था, पर नेहा मेरा हाथ छोड़ने को तैयार ही नहीं थी.

कुछ देर के लिए जब वह फ्रैश होने गई, तब मैं अपने दोस्तों के पास पहुंच गया था. मेरे दोस्त मौका नहीं चूके और नेहा का चिपकू व्यवहार मेरी खिंचाई का कारण बन गया था.

मुंहफट सुमित ने मेरा मजाक उड़ाते हुए कह भी दिया, ‘‘अबे मोहित, ऐसा लगता है कि तू ने तो किसी थानेदारनी के साथ शादी कर ली है. नेहा भाभी तो तुझे बिलकुल पर्सनल स्पेस नहीं देती हैं.’’

‘‘शायद मोहित शादी के बाद भी हर सुंदर लड़की के साथ इश्क लड़ाने को उतावला रहता होगा, तभी भाभी इस की इतनी जबरदस्त चौकीदारी करती हैं,’’ कुंआरे नीरज के इस मजाक पर सभी दोस्तों ने एकसाथ ठहाका लगाया था.

अपने मन की खीज को काबू में रखते हुए मैं ने जवाब दिया, ‘‘वह थानेदारनी नहीं बल्कि बहुत डिवोटिड वाइफ है. तुम सब अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि वह कितनी केयरिंग और घर संभालने में कितनी कुशल है.’’

‘‘अपना यार तो बेडि़यों को ही आभूषण समझने लगा है,’’ नीरज के इस मजाक पर जब दोस्तों ने एक और जोरदार ठहाका लगाया, तो मैं मन ही मन नेहा से चिढ़ उठा था.

पार्टी में हमारे साथ पढ़ी सीमा भी मौजूद थी. वह कुछ दिनों के लिए मुंबई से यहां मायके में अकेली रहने आई थी. पति के साथ न होने के कारण वह खूब खुल कर कालेज के पुराने दोस्तों से हंसबोल रही थी. मेरे मन में उस के ऊपर डोरे डालने जैसा कोई खोट नहीं था, पर कुछ देर उस के साथ हलकेफुलके अंदाज में फ्लर्ट करने का मजा मैं जरूर लेना चाहता था.

नेहा के हर समय चिपके रहने के कारण मैं उस के साथ कुछ देर भी मस्ती भरी गपशप नहीं कर सका. अपने सारे दोस्तों को उस के साथ खूब ठहाके लगाते देख मेरा मन खिन्न हो उठा.

मुझे थोड़ा सा भी समय अपने ढंग से जीने के लिए नहीं मिल रहा है, मेरे मन में इस शिकायत की जड़ें पलपल मजबूत होती चली गई थीं.

मैं खराब मूड के साथ पार्टी से घर लौटा था. मेरे माथे पर खिंची तनाव की रेखाएं देख कर नेहा ने मुझ से पूछा, ‘‘क्या सिर में दर्द हो रहा है?’’

‘‘हां, मुझे भयंकर सिरदर्द हो रहा है, पर तुम सिर दबाने की बात मुंह से निकालना भी मत,’’ मैं ने रूखे लहजे में जवाब दिया.

‘‘मैं सिर दबा दूंगी तो आप की तबीयत जल्दी ठीक हो जाएगी,’’ मेरी रुखाई देख कर उस का चेहरा फौरन उतर सा गया था.

‘‘मुझे सिरदर्द जल्दी ठीक नहीं करना है. अब तुम मेरा सिर खाना बंद करो, क्योंकि मैं कुछ देर शांति से अकेले बैठना चाहता हूं. मुझे खुशी व सुकून से जीने के लिए पर्सनल स्पेस चाहिए, यह बात तुम जितनी जल्दी समझ लोगी उतना अच्छा रहेगा,’’ मैं उस के ऊपर जोर से गुर्राया, तो वह आंसू बहाती हुई मेरे सामने से हट गई थी.

अगले दिन मैं ने उस के साथ ढंग से बात नहीं की. वह रात को मुझ से लिपट कर सोने लगी, तो मैं ने उसे दूर धकेला और करवट बदल ली. मुझे उस का अपने साथ चिपक कर रहना फिलहाल बिलकुल बरदाश्त नहीं हो रहा था.

अगले दिन शनिवार की सुबह मैं जब औफिस जाने को घर से निकलने लगा, तब उस ने मुझ से दुखी व उदास लहजे में कहा था, ‘‘आपस का प्यार बढ़ाने के लिए पर्सनल स्पेस की नहीं, बल्कि प्यार भरे साथ की जरूरत होती है. मैं आप से दूर नहीं रह सकती, क्योंकि आप के साथ मैं कितना भी हंसबोल लूं, पर मेरा मन नहीं भरता है. आज अपने भाई के साथ मैं कुछ दिनों के लिए मायके रहने जा रही हूं. मेरी अनुपस्थिति में आप जी भर कर पर्सनल स्पेस का मजा ले लेना.’’

मैं ने उसे रुकने के लिए एक बार भी नहीं कहा, क्योंकि मैं सचमुच कुछ दिनों के लिए अपने ढंग से अकेले जीना चाहता था.

नेहा से मिली आजादी का फायदा उठाने के लिए मैं ने उस दिन औफिस खत्म होने के बाद अपने दोस्त नीरज को फोन किया. उस ने फौरन मुझे अपने घर आने की दावत दे दी, क्योंकि वह मुफ्त की शराब पीने को हमेशा ही तैयार रहता था.

हम दोनों ने उस के ड्राइंगरूम में बैठ कर शराब पी. हमारी महफिल सजने के कारण उस की पत्नी कविता का मूड खराब नजर आ रहा था, पर हम दोनों ने अपनी मस्ती के चलते इस बात की फिक्र नहीं की.

शराब खत्म हो जाने के बाद मुझे मालूम पड़ा कि मेरा दोस्त बदल चुका था. नीरज ने कविता के डर के कारण मुझे डिनर कराए बिना ही घर से विदा कर दिया.

मैं ने बाहर से बर्गर खाया और घर लौट कर नीरज को मन ही मन ढेर सारी गालियां देता पलंग पर ढेर हो गया.

पार्टी के दिन सीमा से खुल कर हंसीमजाक न कर पाने की बात अभी भी मेरे मन में अटकी हुई थी. इतवार की सुबह मैं ने रवि से उस का फोन नंबर ले कर उस के साथ लंच करने का कार्यक्रम बना लिया.

हम 12 बजे एक चाइनीज रेस्तरां में मिले. पहले मैं ने उसे बढि़या लंच कराया और फिर हम बाजार में घूमने लगे. उस की खनकती हंसी और बातें करने का दिलकश अंदाज लगातार मेरे मन को गुदगुदाए जा रहा था.

कुछ देर बाद मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या हम मैटनी शो देखने चलें?’’

‘‘नहीं,’’ उस ने अपनी आंखों में शरारत भर कर जवाब दिया.

‘‘क्यों मना कर रही हो?’’ मैं ने हंसते हुए पूछा.

‘‘हाल के अंधेरे में तुम अपने हाथों को काबू में नहीं रख पाओगे.’’

‘‘मैं वादा करता हूं कि बिलकुल शरीफ बच्चा बन कर फिल्म देखूंगा.’’

‘‘सौरी मोहित, शादी के बाद तुम्हें नेहा के प्रति वफादार रहना चाहिए.’’

उस का यह वाक्य मेरे मन को बुरी तरह चुभ गया. मैं ने उस से चिढ़ कर पूछा, ‘‘क्या तुम अपने पति के प्रति वफादार हो?’’

‘‘मैं उन के प्रति पूरी तरह से वफादार हूं,’’ उस का इतरा कर यह जवाब देना मेरी चिढ़ को और ज्यादा बढ़ा गया.

‘‘फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि अगर मैं जरा सी भी कोशिश करूं, तो तुम मेरे साथ सोने को राजी हो जाओगी.’’

‘‘शटअप.’’ उस ने मुझे चिढ़ कर डांटा, तो मैं उस का मजाक उड़ाने वाले अंदाज में हंस पड़ा था.

मेरे खराब व्यवहार के लिए उस ने मुझे माफ नहीं किया और कुछ मिनट बाद जरूरी काम होने का बहाना बना कर चली गई. मुझे उस के चले जाने का अफसोस तो नहीं हुआ, पर मन अजीब सी उदासी का शिकार जरूर हो गया.

मैं ने अकेले ही फिल्म देखी और बाद में देर रात तक बाजार में अकारण घूमता रहा. उस रात भी मैं ढंग से सो नहीं सका, क्योंकि नेहा की याद बहुत सता रही थी. बारबार उस से फोन पर बातें करने की इच्छा हो रही थी, पर उस के साथ गलत व्यवहार करने के अपराधबोध ने ऐसा नहीं करने दिया.

सोमवार को औफिस में दिन गुजारना मेरे लिए मुश्किल हो गया था. काम में मन न लगने के कारण बौस से कई बार डांट खाई. जब वहां रुकना बेहद कठिन हो गया, तो बौस से इजाजत ले कर मैं घंटा भर पहले औफिस से बाहर आ गया था.

औफिस से निकलने के घंटे भर बाद मैं ने नेहा को फोन कर के उलाहना दिया, ‘‘तुम इतनी ज्यादा निर्मोही कैसे हो गई हो? आज दिन भर फोन कर के मेरा हालचाल क्यों नहीं पूछा?’’

‘‘मैं ने तो आप की नाराजगी व डांट के डर से फोन नहीं किया,’’ उस की आवाज का कंपन बता रहा था कि मेरी आवाज सुन कर वह भावुक हो उठी थी.

‘‘तुम्हारा फोन आने से मैं नाराज क्यों होऊंगा?’’

‘‘मैं फोन करती तो आप जरूर डांट कर कहते कि मैं मायके में रह कर भी आप को चैन से जीने नहीं दे रही हूं.’’

‘‘मैं पागल हूं, जो तुम्हें अकारण डांटूंगा. मुझे लगता है कि मायके पहुंच कर तुम्हें मेरा ध्यान ही नहीं आया.’’

‘‘जिस के अंदर मेरी जान बसती है, उस का ध्यान मुझे कैसे नहीं आएगा?’’

‘‘तो वापस कब आओगी?’’

‘‘आप आज लेने आ जाओगे, तो आज ही साथ चल चलूंगी.’’

‘‘मैं तो आ गया हूं.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि दरवाजा क्यों नहीं खोल रही है, पगली?’’

‘‘क्या बारबार घंटी आप बजा रहे हो?’’

‘‘दरवाजा खोल कर देख लो न मेरी जान.’’

‘‘मैं अभी आई.’’

उस की उतावलेपन व खुशी से भरी आवाज सुन कर मैं जोर से हंस पड़ा था.

दरवाजा खोल कर जब नेहा ने मुझे फूलों का बहुत सुंदर सा गुलदस्ता हाथ में लिए खड़ा देखा, तो उस का चेहरा खुशी से खिल उठा. अपना उपहार स्वीकार करने के बाद वह मेरी छाती से लिपट कर खुशी के आंसू बहाने लगी.

मुझे इस समय उस की वह बात ध्यान आ रही थी, जो उस ने मायके आने से पहले कही थी, ‘आपस का प्यार बढ़ाने के लिए पर्सनल स्पेस की नहीं, बल्कि प्यार भरे साथ की जरूरत होती है. मैं आप से दूर नहीं रह सकती, क्योंकि आप के साथ मैं कितना भी हंसबोल लूं, पर मेरा मन नहीं भरता है.’

मैं ने उस का माथा चूम कर भावुक लहजे में कहा, ‘‘मेरी समझ में यह आ गया

है कि तुम्हारे अलावा मेरी जिंदगी में खुशियां भरने की किसी के पास फुरसत नहीं है. मुझे अपनी जिंदगी में पर्सनल स्पेस नहीं, बल्कि तुम्हारा प्यार भरा साथ चाहिए. भविष्य में मेरी बातों का बुरा मान कर फिर कभी मुझे अकेला मत छोड़ना.’’

‘‘कभी नहीं छोड़ूंगी.’’ अपनी मम्मी की उपस्थिति की परवाह न करते हुए उस ने मेरे होंठों पर छोटा सा चुंबन अंकित किया और फिर शरमा भी गई.

उस ने कुछ देर बाद ही मेरे साथ सट कर बैठते हुए ढेर सारे सवाल पूछने शुरू कर दिए. मुझे उस के सवालों का जवाब देने में अब कोई परेशानी महसूस नहीं हो रही थी. उस से दूर रहने के मेरे अनुभव इतने घटिया रहे थे कि मेरे सिर से पर्सनल स्पेस में जीने का भूत पूरी तरह से उतर गया था.

Romantic Story: कुछ कहना था तुम से

Romantic Story, Writer- Minu Vishwas

वैदेही का मन बहुत अशांत हो उठा था. अचानक 10 साल बाद सौरव का ईमेल पढ़ बहुत बेचैनी महसूस कर रही थी. वह न चाहते हुए भी सौरव के बारे में सोचने को मजबूर हो गई कि क्यों मुझे बिना कुछ कहे छोड़ गया था? कहता था कि तुम्हारे लिए चांदतारे तो नहीं ला सकता पर अपनी जान दे सकता है पर वह भी नहीं कर सकता, क्योंकि मेरी जान तुम में बसी है. वैदेही हंस कर कहती थी कि कितने झूठे हो तुम… डरपोक कहीं के. आज भी इस बात को सोच कर वैदेही के चेहरे पर हलकी सी मुसकान आ गई थी पर दूसरे ही क्षण गुस्से के भाव से पूरा चेहरा लाल हो गया था. फिर वही सवाल कि क्यों वह मुझे छोड़ गया था? आज क्यों याद कर मुझे ईमेल किया है?

वैदेही ने मेल खोल पढ़ा. सौरव ने केवल 2 लाइनें लिखी थीं, ‘‘आई एम कमिंग टू सिंगापुर टुमारो, प्लीज कम ऐंड सी मी… विल अपडेट यू द टाइम. गिव मी योर नंबर विल कौल यू.’’

यह पढ़ बेचैन थी. सोच रही थी कि नंबर दे या नहीं. क्या इतने सालों बाद मिलना ठीक रहेगा? इन 10 सालों में क्यों कभी उस ने मुझ से मिलने या बात करने की कोशिश नहीं की? कभी मेरा हालचाल भी नहीं पूछा. मैं मर गई हूं या जिंदा हूं… कुछ भी तो जानने की कोशिश नहीं की. फिर क्यों वापस आया है? सवाल तो कई थे पर जवाब एक भी नहीं था.

जाने क्या सोच कर अपना नंबर लिख भेजा. फिर आराम से कुरसी पर बैठ कर सौरव से हुई पहली मुलाकात के बारे में सोचने लगी…

10 साल पहले ‘फोरम द शौपिंग मौल’ के सामने और्चर्ड रोड पर एक ऐक्सीडैंट में वैदेही सड़क पर पड़ी थी. कोई कार से टक्कर मार गया था. ट्रैफिक जाम हो गया था. कोई मदद के लिए सामने नहीं आ रहा था. किसी सिंगापोरियन ने हैल्पलाइन में फोन कर सूचना दे दी थी कि फलां रोड पर ऐक्सीडैंट हो गया है, ऐंबुलैंस नीडेड.

वैदेही के पैरों से खून तेजी से बह रहा था. वह रोड पर हैल्प… हैल्प चिल्ला रही थी, पर कोई मदद के लिए आगे नहीं आ रहा था. उसी ट्रैफिक जाम में सौरव भी फंसा था. न जाने क्या सोच वह मदद के लिए आगे आया और फिर वैदेही को अपनी ब्रैंड न्यू स्पोर्ट्स कार में हौस्पिटल ले गया.

वैदेही हलकी बेहोशी में थी. सौरव का उसे अपनी गोद में उठा कर कार तक ले जाना ही याद था. उस के बाद तो वह पूरी बेहोश हो गई थी. पर आज भी उस की वह लैमन यलो टीशर्ट उसे अच्छी तरह याद थी. वैदेही की मदद करने के ऐवज में उसे कितने ही चक्कर पुलिस के काटने पड़े थे. विदेश के अपने पचड़े हैं. कोई किसी

की मदद नहीं करता खासकर प्रवासियों की. फिर भी एक भारतीय होने का फर्ज निभाया था. यही बात तो दिल को छू गई थी उस की. कुछ अजीब और पागल सा था. जब जो उस के मन में आता था कर लिया करता था. 4 घंटे बाद जब वैदेही होश में आई थी तब भी वह उस के सिरहाने ही बैठा था. ऐक्सीडैंट में वैदेही की एक टांग में फ्रैक्चर हो गया था, मोबाइल भी टूट गया था. सौरव उस के होश में आने का इंतजार कर रहा था ताकि उस से किसी अपने का नंबर ले इन्फौर्म कर सके.

होश में आने पर वैदेही ने ही उसे अच्छी तरह पहली बार देखा था. देखने में कुछ खास तो नहीं था पर फिर भी कुछ तो अलग बात थी.

कुछ सवाल करती उस से पहले ही उस ने कहा, ‘‘अच्छा हुआ आप होश में आ गईं वरना तो आप के साथ मुझे भी हौस्पिटल में रात काटनी पड़ती. खैर, आई एम सौरव.’’

सौरव के तेवर देख वैदेही ने उसे थैंक्यू नहीं कहा.

वैदेही से उस ने परिवार के किसी मैंबर का नंबर मांगा. मां का फोन नंबर देने पर सौरव ने अपने फोन से उन का नंबर मिला कर उन्हें वैदेही के विषय में सारी जानकारी दे दी. फिर हौस्पिटल से चला गया. न बाय बोला न कुछ. अत: वैदेही ने मन ही मन उस का नाम खड़ूस रख दिया.

उस मुलाकात के बाद तो मिलने की उम्मीद भी नहीं थी. न उस ने वैदेही का नंबर लिया था न ही वैदेही ने उस का. उस के जाते ही वैदेही की मां और बाबा हौस्पिटल आ पहुंचे थे. वैदेही ने मां और बाबा को ऐक्सीडैंट का सारा ब्योरा दिया और बताया कैसे सौरव ने उस की मदद की.

2 दिन हौस्पिटल में ही बीते थे.

ऐसी तो पहली मुलाकात थी वैदेही और सौरव की. कितनी अजीब सी… वैदेही सोचसोच मुसकरा रही थी. सोच तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. सौरव के ईमेल ने वैदेही के पुराने सारे मीठे और दर्द भरे पलों को हरा कर दिया था.

ऐक्सीडैंट के बाद पंद्रह दिन का बैडरेस्ट लेने को कहा गया

था. नईनई नौकरी भी जौइन की थी तब वैदेही ने. घर पहुंच वैदेही ने सोचा औफिस में इन्फौर्म कर दे. मोबाइल खोज रही थी तभी याद आया मोबाइल तो हौस्पिटल में सौरव के हाथ में था और शायद अफरातफरी में उस ने उसे लौटाया नहीं था. पर इन्फौर्म तो कर ही सकता था. उफ, सारे कौंटैक्ट नंबर्स भी गए. वैदेही चिल्ला उठी थी. तब अचानक याद आया कि उस ने अपने फोन से मां को फोन किया था. मां के मोबाइल में कौल्स चैक की तो नंबर मिल गया.

तुरंत नंबर मिला अपना इंट्रोडक्शन देते हुए उस ने सौरव से मोबाइल लौटाने का आग्रह किया. तब सौरव ने तपाक से कहा, ‘‘फ्री में नहीं लौटाऊंगा. खाना खिलाना होगा… कल शाम तुम्हारे घर आऊंगा… एड्रैस बताओ.’’

वैदेही के तो होश ही उड़ गए. मन में सोचने लगी कैसा अजीब प्राणी है यह. पर मोबाइल तो चाहिए ही था. अत: एड्रैस दे दिया.

अगले दिन शाम को महाराज हाजिर भी हो गए थे. सारे घर वालों को सैल्फ इंट्रोडक्शन भी दे दिया और ऐसे घुलमिल गया जैसे सालों से हम सब से जानपहचान हो. वैदेही ये सब देख हैरान भी थी और कहीं न कहीं एक अजीब सी फीलिंग भी हो रही थी. बहुत मिलनसार स्वभाव था. मां, बाबा और वैदेही की छोटी बहन तो उस की तारीफ करते नहीं थक रहे थे. थकते भी क्यों उस का स्वभाव, हावभाव सब कितना अलग और प्रभावपूर्ण था. वैदेही उस के साथ बहती चली जा रही थी.

वह सिंगापुर में अकेला रहता था. एक कार डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी में मैनेजर था. तभी आए दिन उसे नई कार का टैस्ट ड्राइव करने का मौका मिलता रहता था. जिस दिन उस ने वैदेही की मदद की थी उस दिन भी न्यू स्पोर्ट्स कार की टैस्ट ड्राइव पर था. उस के मातापिता इंडिया में रहते थे.

इस दौरान अच्छी दोस्ती हो गई थी. रोज आनाजाना होने लगा था. वैदेही के परिवार के सभी लोग उसे पसंद करते थे. धीरेधीरे उस ने वैदेही के दिल में खास जगह बना ली. उस के साथ जब होती थी तो लगता था ये पल यहीं थम जाएं. वैदेही को भी यह एहसास हो चला था कि सौरव के दिल में भी उस के लिए खास फीलिंग्स हैं. मगर अभी तक उस ने वैदेही से अपनी फीलिंग्स कही नहीं थीं.

15 दिन बाद वैदेही ने औफिस जौइन कर लिया. सौरव और वैदेही का औफिस और्चर्ड रोड पर ही था. सौरव अकसर वैदेही को औफिस से घर छोड़ने आता था. फ्रैक्चर होने की वजह से

6 महीने केयर करनी ही थी. वैदेही को उस का लिफ्ट देना अच्छा लगता था.

आज भी वैदेही को याद है सौरव ने उसे

2 महीने के बाद उस के 22वें बर्थडे पर प्रपोज किया था. औसतन लोग अपनी प्रेमिका को गुलदस्ता या चौकलेट अथवा रिंग के साथ प्रपोज करते हैं, पर उस ने वैदेही के हाथों में एक कार का छोटा सा मौडल रखते हुए कहा कि क्या तुम अपनी पूरी जिंदगी का सफर मेरे साथ तय करना चाहोगी? कितना पागलपन और दीवानगी थी उस की बातों में. वैदेही उसे समझने में असमर्थ थी. यह कहतेकहते सौरव उस के बिलकुल नजदीक आ गया और वैदेही का चेहरा अपने हाथों में थामते हुए उस के होंठों को अपने होंठों से छूते हुए दोनों की सांसें एक हो चली थीं. वैदेही का दिल जोर से धड़क रहा था. खुद को संभालते हुए वह सौरव से अलग हुई. दोनों के बीच एक अजीब मीठी सी मुसकराहट ने अपनी जगह बना ली थी.

कुछ देर तो वैदेही वहीं बुत की तरह खड़ी रही थी. जब उस ने वैदेही का उत्तर जानने की उत्सुकता जताई तो वैदेही ने कहा था कि अगले दिन ‘गार्डन बाय द वे’ में मिलेंगे. वहीं वह अपना जवाब उसे देगी.

उस रात वैदेही एक पल भी नहीं सोई थी. कई विषयों पर सोच रही थी जैसे

कैरियर, आगे की पढ़ाई और न जाने कितने खयाल. नींद आती भी कैसे, मन में बवंडर जो उठा था. तब वैदेही मात्र 22 साल की ही तो थी और इतनी जल्दी शादी भी नहीं करना चाहती थी. सौरव भी केवल 25 वर्ष का था. पर वैदेही उसे यह बताना भी चाहती थी कि उस से बेइंतहा मुहब्बत हो गई है और जिंदगी का पूरा सफर उस के साथ ही बिताना चाहती है. बस कुछ समय चाहिए था उसे. पर यह बात वैदेही के मन में ही रह गई थी. कभी इसे बोल नहीं पाई.

अगले दिन वैदेही ठीक शाम 5 बजे ‘गार्डन बाय द वे’ में पहुंच गई. वहां पहुंच कर उस ने सौरव को फोन मिलाया तो फोन औफ आ रहा था. उस का इंतजार करने वह वहीं बैठ गई. आधे घंटे बाद फिर फोन मिलाया तब भी फोन औफ ही आ रहा था. वैदेही परेशान हो उठी. पर फिर सोचा कहीं औफिस में कोई जरूरी मीटिंग में न फंस गया हो. वहीं उस का इंतजार करती रही. इंतजार करतेकरते रात के 8 बजे गए, पर वह नहीं आया और उस के बाद उस का फोन भी कभी औन नहीं मिला.

2 साल तक वैदेही उस का इंतजार करती रही पर कभी उस ने उसे एक बार भी फोन नहीं किया. 2 साल बाद मांबाबा की मरजी से आदित्य से वैदेही की शादी हो गई. आदित्य औडिटिंग कंपनी चलाता था. उस के मातापिता सिंगापुर में उस के साथ ही रहते थे.

शादी के बाद कितने साल लगे थे वैदेही को सौरव को भूलने में पर पूरी तरह भूल नहीं पाई थी. कहीं न कहीं किसी मोड़ पर उसे सौरव की याद आ ही जाती थी. आज अचानक क्यों आया है और क्या चाहता है?

वैदेही की सोच की कड़ी को अचानक फोन की घंटी ने तोड़ा. एक अनजान नंबर था. दिल की धड़कनें तेज हो चली थीं. वैदेही को लग रहा था हो न हो सौरव का ही होगा. एक आवेग सा महसूस कर रही थी. कौल रिसीव करते हुए हैलो कहा तो दूसरी ओर सौरव ही था. उस ने अपनी भारी आवाज में ‘हैलो इज दैट वैदेही?’ इतने सालों के बाद भी सौरव की आवाज वैदेही के कानों से होते हुए पूरे शरीर को झंकृत कर रही थी.

स्वयं को संभालते हुए वैदेही ने कहा, ‘‘यस दिस इज वैदेही,’’ न पहचानने का नाटक करते हुए कहा, ‘‘मे आई नो हू इज टौकिंग?’’

सौरव ने अपने अंदाज में कहा, ‘‘यार, तुम मुझे कैसे भूल सकती हो? मैं सौरव…’’

‘‘ओह,’’ वैदेही ने कहा.

‘‘क्या कल तुम मुझ से मरीना वे सैंड्स होटल के रूफ टौप रैस्टोरैंट पर मिलने आ सकती  हो? शाम 5 बजे.’’

कुछ सोचते हुए वैदेही ने कहा, ‘‘हां, तुम से मिलना तो है ही. कल शाम को आ जाऊंगी,’’ कह फोन काट दिया.

अगर ज्यादा बात करती तो उस का रोष सौरव को फोन पर ही सहना पड़ता. वैदेही के दिमाग में कितनी हलचल थी, इस का अंदाजा लगाना मुश्किल था. यह सौरव के लिए उस का प्यार था या नफरत? मिलने का उत्साह था या असमंजसता? एक मिलाजुला भावों का मिश्रण जिस की तीव्रता सिर्फ वैदेही ही महसूस कर सकती थी.

अगले दिन सौरव से मिलने जाने के लिए जब वैदेही तैयार हो रही थी, तभी आदित्य कमरे में आया. वैदेही से पूछा, ‘‘कहां जा रही हो?’’

वैदेही ने कहा, ‘‘सौरव सिंगापुर आया है. वह मुझ से मिलना चाहता है,’’ कह वैदेही चुप हो गई. फिर कुछ सोच आदित्य से पूछा, ‘‘जाऊं या नहीं?’’

आदित्य ने जवाब में कहा, ‘‘हां, जाओ. मिल आओ. डिनर पर मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा,’’ कह वह कमरे से चला गया.

आदित्य ने सौरव के विषय में काफी कुछ सुन रखा था. वह यह जानता था कि सौरव को वैदेही के परिवार वाले बहुत पसंद करते थे… कैसे उस ने वैदेही की मदद की थी. आदित्य खुले विचारों वाला इनसान था.

हलके जामुनी रंग की ड्रैस में वैदेही बहुत खूबसूरत लग रही थी. बालों को

ब्लो ड्राई कर बिलकुल सीधा किया था. सौरव को वैदेही के सीधे बाल बहुत पसंद थे. वैदेही हूबहू वैसे ही तैयार हुई जैसे सौरव को पसंद थी. वैदेही यह समझने में असमर्थ थी कि आखिर वह सौरव की पसंद से क्यों तैयार हुई थी? कभीकभी यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर किसी के होने का हमारे जीवन में इतना असर क्यों आ जाता है. वैदेही भी एक असमंजसता से गुजर रही थी. स्वयं को रोकना चाहती थी पर कदम थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

वैदेही ठीक 5 बजे मरीना बाय सैंड्स के रूफ टौप रैस्टोरैंट में पहुंची. सौरव वहां पहले से इंतजार कर रहा था. वैदेही को देखते ही वह चेयर से खड़ा हो वैदेही की तरफ बढ़ा और उसे गले लगते हुए बोला, ‘‘सो नाइस टू सी यू आफ्टर ए डिकेड. यू आर लुकिंग गौर्जियस.’’

वैदेही अब भी गहरी सोच में डूबी थी. फिर एक हलकी मुसकान के साथ उस ने कहा, ‘‘थैंक्स फार द कौंप्लीमैंट. आई एम सरप्राइज टु सी यू ऐक्चुअली.’’

सौरव भांप गया था वैदेही के कहने का तात्पर्य. उस ने कहा, ‘‘क्या तुम ने अब तक मुझे माफ नहीं किया? मैं जानता हूं तुम से वादा कर के मैं आ न सका. तुम नहीं जानतीं मेरे साथ क्या हुआ था?’’

वैदेही ने कहा, ‘‘10 साल कोई कम तो नहीं होते… माफ कैसे करूं तुम्हें? आज मैं जानना चाहती हूं क्या हुआ था तुम्हारे साथ?’’

सौरव ने कहा, ‘‘तुम्हें याद ही होगा, तुम ने मुझे पार्क में मिलने के लिए बुलाया था. उसी दिन हमारी कंपनी के बौस को पुलिस पकड़ ले गई थी, स्मगलिंग के सिलसिले में. टौप लैवल मैनेजर को भी रिमांड में रखा गया था. हमारे फोन, अकाउंट सब सीज कर दिए गए थे. हालांकि 3 दिन लगातार पूछताछ के बाद, महीनों तक हमें जेल में बंद कर दिया था. 2 साल तक केस चलता रहा. जब तक केस चला बेगुनाहों को भी जेल की रोटियां तोड़नी पड़ीं. आखिर जो लोग बेगुनाह थे उन्हें तुरंत डिपोर्ट कर दिया गया और जिन्हें डिपोर्ट किया गया था उन में मैं भी था. पुलिस की रिमांड में वे दिन कैसे बीते क्या बताऊं तुम्हें…

‘‘आज भी सोचता हूं तो रूह कांप जाती है. किस मुंह से तुम्हारे सामने आता? इसलिए जब मैं इंडिया (मुंबई) पहुंचा तो न मेरे पास कोई मोबाइल था और न ही कौंटैक्ट नंबर्स. मुंबई पहुंचने पर पता चला मां बहुत सीरियस हैं और हौस्पिटलाइज हैं. मेरा मोबाइल औफ होने की वजह से मुझ तक खबर पहुंचाना मुश्किल था. ये सारी चीजें आपस में इतनी उलझी हुई थीं कि उन्हें सुलझाने का वक्त ही नहीं मिला और तो और मां ने मेरी शादी भी तय कर रखी थी. उन्हें उस वक्त कैसे बताता कि मैं अपनी जिंदगी सिंगापुर ही छोड़ आया हूं. उस वक्त मैं ने चुप रहना ही ठीक समझा था.

‘‘और फिर जिंदगी की आपाधापी में उलझता ही चला गया. पर तुम हमेशा याद आती रहीं. हमेशा सोचता था कि तुम क्या सोचती होगी मेरे बारे में, इसलिए तुम से मिल कर तुम्हें सब बताना चाहता था. काश, मैं इतनी हिम्मत पहले दिखा पाता. उस दिन जब हम मिलने वाले थे तब तुम मुझ से कुछ कहना चाहती थीं न… आज बता दो क्या कहना चाहती थीं.’’

वैदेही को यह जान कर इस बात की तसल्ली हुई कि सौरव ने उसे धोखा नहीं दिया. कुदरत ने हमारे रास्ते तय करने थे. फिर बोली, ‘‘वह जो मैं तुम से कहना चाहती उन बातों का अब कोई औचित्य नहीं,’’ वैदेही ने अपने जज्बातों को अपने अंदर ही दफनाने का फैसला कर लिया था.

थोड़ी चुप्पी के बाद एक मुसकराहट के साथ वैदेही ने कहा, ‘‘लैट्स और्डर सम कौफी.’’

Hindi Short Story: सच्चा प्रेम

Hindi Short Story: 6 साल पहले की बात है. सोशल मीडिया ने पूरी रफ्तार से गति पकड़ ली थी. श्यामली ने भी फेसबुक पर अपना एकाउंट बना लिया था. उसी साल उस का ग्रैजुएशन पूरा हुआ था. ग्रैजुएशन पूरा होते ही उसे एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई थी.

स्वभाव से चंचल, शांत और हमेशा दूसरे के बारे में पहले सोचने वाली श्यामली औफिस का काम पूरा कर के फेसबुक लौगइन कर के बैठ जाती थी. श्यामली की प्रोफाइल में उस की एक फ्रैंड प्रियंका थी. प्रियंका और श्यामली अकसर फेसबुक पर कोई न कोई पोस्ट डालती रहती थीं. उस के बाद उन पर आए कमेंट्स और लाइक भी वे ध्यान से पढ़तीं और जरूरी होता तो जवाब भी देतीं. फेसबुक चलाने में उन्हें इतना मजा आता था कि वे उस की दीवानी बन गई थीं.

उस दिन औफिस से निकलते ही श्यामली ने फेसबुक पर एक पोस्ट शेयर की. देखते ही देखते उस पर लाइक और कमेंट्स आने लगे. प्रियंका और श्यामली आने वाले कमेंट्स पर आपस में बातें कर रही थीं कि तभी प्रियंका के एक कौमन फ्रैंड ने भी उस पोस्ट पर कमेंट किया. उस का नाम था दुष्यंत. इस के बाद दुष्यंत, प्रियंका और श्यामली कमेंट बौक्स में ही बातें करने लगे थे.

2 दिन बाद जब श्यामली ने फेसबुक खोला तो उस में दुष्यंत की फ्रैंड रिक्वेस्ट आई थी. 2 दिनों तक सोचनेविचारने के बाद श्यामली ने उस की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली. यहीं से शुरू हुई उस प्यार की शुरुआत, जो कभी श्यामली को मिल नहीं सका.

दुष्यंत ने कंप्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग की पढ़ाई अभी जल्दी ही पूरी की थी. स्वभाव से शांत और भावनात्मक दुष्यंत हमेशा सोशल मीडिया पर ऐक्टिव रहता था. सोशल मीडिया पर ही श्यामली से उस की मुलाकात हुई थी. श्यामली और दुष्यंत अब फेसबुक फ्रैंड बन गए थे. हायहैलो से शुरू हुआ यह संबंध अब पूरे जोश से आगे बढ़ रहा था.

मार्निंग शिफ्ट होने की वजह से दुष्यंत सुबह जल्दी 5 बजे ही उठ जाता था. और उठने के साथ ही वह श्यामली को गुडमौर्निंग का मैसेज भेजता था. यह उस का रोजाना का नियम बन गया था.  दुष्यंत की सुबह श्यामली को मैसेज भेजने के साथ ही शुरू होती थी. इस के बाद श्यामली के मैसेज के इंतजार में उस का आधा दिन बीत जाता. उसे श्यामली अच्छी लगने लगी थी. किसी न किसी बहाने वह उस से बात करने का मौका खोजता रहता था. वह यही सोचता रहता था कि श्यामली कब औनलाइन हो और वह उसे मैसेज करे.

दुष्यंत एक संस्कारी घर का युवक था, इसलिए श्यामली को उस पर विश्वास करने में ज्यादा समय नहीं लगा. विश्वास होने के बाद श्यामली ने दुष्यंत को अपना फोन नंबर दे दिया था. वैसे तो श्यामली आज के जमाने की आधुनिक लड़की थी. फिर भी वह खुद को इस आधुनिक जमाने से दूर रखती थी. क्योंकि उसे पता था कि सोशल मीडिया पर दुनिया भर के गलत काम भी होते हैं.

दुष्यंत को उस ने एक महीने तक परखा था, उस के बाद उस ने उसे दोस्त के रूप में दिल से स्वीकार किया था. बाकी तो उसे कोई लड़का पसंद ही नहीं आता था.

नंबर मिलने के बाद वाट्सऐप पर गुडमौर्निंग के आगे भी बात बढ़ गई थी. जबकि श्यामली अभी भी उसे अच्छा दोस्त ही मान रही थी. दुष्यंत तो श्यामली के ही सपनों में दिनरात खोया रहता था. इस के बावजूद दुष्यंत कभी श्यामली से अपने प्यार का इजहार नहीं कर सका था. दूसरी ओर दुष्यंत के स्वभाव से प्रभावित हो कर श्यामली के मन में भी उस के लिए प्रेम का बीज अंकुरित होने लगा था. पर कोई संस्कारी लड़की कहां जल्दी अपने प्यार का इजहार करती है. फिर श्यामली तो वैसे भी अपने मन की बात जल्दी किसी से कहने वाली नहीं थी.

उसी तरह दुष्यंत भी हमेशा सोचता रहता था कि वह अपने मन की बात कैसे श्यामली से कहे. प्यार की बात कहने पर कहीं श्यामली नाराज न हो जाए. पता नहीं वह उस के बारे में क्या सोचती होगी, क्या वह भी उसी की तरह उसे प्यार करती है या नहीं. अगर वह अपने मन की बात उस से कहेगा तो वह कहीं बुरा तो नहीं मानेगी?

यही सब सोचतेसोचते दिन बीत रहे थे. दुष्यंत हमेशा इसी सोच में डूबा रहता था कि आखिर वह करे तो क्या करे, किस तरह वह श्यामली से अपने मन की बात कहे.

आखिर एक दिन उस ने हिम्मत कर के श्यामली से मन की बात कह ही दी. श्यामली ने कहा, ‘‘अरे… अरे अभी रुको, अभी तो दूसरा अध्याय बाकी है.’’

दुष्यंत श्यामली से अपने मन की पूरी बात यानी प्रेम का इजहार तो नहीं कर पाया, पर इतना तो जता ही दिया कि वह उसे पसंद करता है. उस ने यह भी कह दिया था, ‘‘मैं तुम्हें तुम्हारे घर देखने आना चाहता हूं. तुम अपने मम्मीपापा से कह देना. मैं अपने मम्मीपापा के साथ आऊंगा.’’

इतना कह कर दुष्यंत सपनों की दुनिया में खो गया.

आखिर वह घड़ी आ ही गई, जब दुष्यंत जा कर श्यामली से आमनेसामने मिला. दोनों परिवारों में आपस में बातचीत हुई. श्यामली को भी दुष्यंत अच्छा लगा. पर बौडीगार्ड जैसा शरीर होने की वजह से श्यामली के पिता को दुष्यंत पसंद नहीं आया.

श्यामली एकदम स्लिम और ट्रिम थी. दूसरी ओर 90 किलोग्राम वजन वाले 25 साल के युवक दुष्यंत को श्यामली के पिता ने रिजेक्ट कर दिया. इस बात से दुष्यंत को लगा कि वह श्यामली को पसंद नहीं है, इसलिए श्यामली ने उस के साथ शादी से मना कर दिया है.

समय समुद्र की लहरों की तरह पूरे जोश से आगे बढ़ रहा था. अब श्यामली और दुष्यंत के बीच बातें कम होने लगी थीं. कुछ दिनों में श्यामली की भी शादी हो गई और दुष्यंत को भी जीवनसाथी मिल गई थी.

दोनों ही अपनीअपनी जिंदगी में बहुत खुश थे. फिर भी जब कभी दुष्यंत एकांत में होता, तो उसे श्यामली की याद आ ही जाती थी. उसे इस बात का हमेशा अफसोस रहता कि वह श्यामली से अपने दिल की बात खुल कर कह नहीं सका. किसी तरह अपने मन को मना कर उस का पहला प्रेम पूरा नहीं हुआ, इस दर्द को दिल में छिपा कर अतीत से वर्तमान में आ जाता.

पूरे 3 साल बाद अचानक एक मौल में दुष्यंत और श्यामली की मुलाकात हो गई. दोनों के बीच हायहैलो हुई. दुष्यंत ने पूछा, ‘‘कैसी हो श्यामली?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं. अपनी बताओ?’’ वह बोली.

दोनों ने एकदूसरे के बारे में पूछा. हालचाल जानने के बाद दोनों के बीच नौरमल बातें होने लगीं. बातचीत करते हुए दोनों अतीत में खो गए. उसी बातचीत में दुष्यंत ने हिम्मत कर के कह दिया कि वह उस से बहुत प्यार करता था, है और हमेशा करता रहेगा.

यह सुन कर श्यामली के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई. यह बात तो वह 3 साल पहले सुनना चाहती थी. पर उस समय यह बात दुष्यंत नहीं कह सका था. उस समय श्यामली भी इस बात को नहीं समझ सकी थी. दोनों का यह अनकहा प्रेम 3 साल से हृदय में जीवंत रहा. पर दोनों ही अपने इस प्रेम को एकदूसरे से कह नहीं सके थे.

आज पूरे 3 साल बाद जब दोनों ने अकेले में बात की तो दुष्यंत ने अपने प्रेम का इकरार कर लिया. वह बहुत अच्छा दिन था. दोनों के ही मन में एकदूसरे के लिए अनहद प्रेम था.  पर समय उन के हाथ से निकल गया था. अब दोनों की ही शादी हो गई थी और दोनों ही उम्र से अधिक समझदार हो चुके थे.

दोनों ही अपने जीवनसाथी के साथ विश्वासघात करने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे. पर दोनों ने ही एकदूसरे को वचन दिया कि वे जीवन के अंत तक एकदूसरे के संपर्क में बने रहेंगे.

दुष्यंत और श्यामली आज भी एकदूसरे से बातें करते हैं, प्रेम व्यक्त करते हैं, एकदूसरे की भावनाओं को समझते हैं, पर दोनों ही अपनेअपने जीवनसाथी के प्रति पूरी तरह से वफादार बने हुए हैं. वे जीवनसाथी नहीं बन सके तो क्या हुआ, दोनों ही एकदूसरे से मन से जुड़ कर जीवन का आनंद ले रहे हैं.

तो क्या अपने पहले प्रेम से दिल से जुड़े रहना अपराध है? क्या शादी के बाद अपने जीवनसाथी के प्रति वफादारी दिखाते हुए मनपसंद आदमी से बात करना अपराध है?

अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार रहते हुए दो प्रेमी जब अपने अधूरे रह गए प्रेम को एकदूसरे से इकरार करते हैं तो लोग इस संबंध को खराब नजरों से देखते हैं. पर दुष्यंत और श्यामली का कहना है कि अगर एकदूसरे से बात करने से दुख कम होता हो और खुशी मिलती हो तो इस में गलत क्या है.

प्रेम तो प्रेम होता है. शादी के पहले करो या बाद में, उस में पवित्रता, विश्वास और बिना स्वार्थ का लगाव होना चाहिए, जो केवल हृदय के भाव को जानसमझ सके.

Hindi Story: तू मुझे कबूल

Hindi Story, लेखक- धीरज राणा भायला

शायरा और सुहैल एकसाथ खेलते बड़े हुए थे. उन्होंने पहले दर्जे से 7वें दर्जे तक एकसाथ पढ़ाई की थी. शायरा के अब्बा बड़ी होती लड़कियों के बाहर निकलने के सख्त खिलाफ थे, इसलिए उसे घर बैठा दिया गया.

उस समय शायरा और सुहैल को लगा था, जैसे उन की खुशियों पर गाज गिर गई हो, मगर दोनों के घर गांव की एक ही गली में होने के चलते उन्हें इस बात की खुशी थी कि शायरा की पढ़ाई छूट जाने के बाद भी वे दोनों एकदूसरे से दूर नहीं थे.

उन दोनों के अब्बा मजदूरी कर के घर चलाते थे, मगर माली हालात के मामले में दोनों ही परिवार तंगहाल नहीं थे. शायरा के चाचा खुरशीद सेना में सिपाही थे, बड़ी बहन नाजनीन सुहैल के बड़े भाई अरबाज के साथ ब्याही थी, जो सौफ्टवेयर इंजीनियर थे और बैंगलुरु में रहते थे. शायरा का एकलौता भाई जफर था, उस से बड़ा, जिस की गांव में ही परचून की दुकान थी.

सुहैल 3 भाइयों में बीच का था. अरबाज बैंगलुरु में सैटल था. गुलफान और सुहैल अभी पढ़ रहे थे. सुहैल खूब  मन लगा कर पढ़ रहा था, ताकि सेना में बड़ा अफसर बन सके.

स्कूल से आते ही सुहैल का पहला काम होता शायरा के घर पहुंच कर उस से खूब बातें करना. उस समय घर में शायरा के अलावा बस उस की अम्मी हुआ करती थीं.

शायरा कोई काम कर रही होती तो सुहैल उसे बांह पकड़ कर छत पर ले जाता. जब वे छोटे थे, तब उन की योजनाओं में गुड्डेगुडि़यों और खिलौनों से खेलना शामिल था, मगर अब वे बड़े हो गए थे तो योजनाएं भी बदल गई थीं.

वह शायरा से अपने प्यार का इजहार कर दे

अब सुहैल को लगता था कि वह शायरा से अपने प्यार का इजहार कर दे, मगर उस के मासूम बरताव को देख कर वह ठहर जाता.

एक दिन स्कूल से छुट्टी ले कर सुहैल ने शहर जा कर कोई फिल्म देखी. वापस लौटते हुए फिल्म की प्यार से सराबोर कहानी उस के जेहन पर छाई हुई थी. जैसे ही वह और शायरा छत पर पंहुचे, उस ने बिना कोई बात किए शायरा का हाथ पकड़ लिया.

ऐसा नहीं था कि उस ने शायरा का हाथ पहली बार पकड़ा हो, मगर उस की आंखों में तैर रहे प्यार के भाव को महसूस कर के शायरा घबरा गई और हाथ छुड़ा कर नीचे चली गई.

सुहैल चुपचाप अपने घर लौट आया. अब हालात बदल गए थे. स्कूल से आते ही वह अपना होमवर्क खत्म करता और उस के बाद शायरा के घर जा कर बस उसे देखभर आता.

समय बीतता गया. सुहैल की ग्रेजुएशन खत्म हो चुकी थी. घर वाले शादी की बात करने लगे थे, मगर सुहैल कह देता, ‘‘अभी मु?ो सीडीएस की तैयारी करनी है और फिर नौकरी लग जाने के बाद शादी करूंगा.’’

एक शाम सुहैल सीडीएस का इम्तिहान दे कर लौटा और सीधा शायरा के घर पहुंच गया. शायरा खाना बना रही थी. सुहैल ने हाथ पकड़ कर उसे उठाया, तो वह धीरे से बोली, ‘‘क्या करते हो… रोटी बनानी है मु?ो.’’

सुहैल ने शायरा की एक न सुनी और छत पर ले आया

सुहैल ने शायरा की एक न सुनी और छत पर ले आया. वहां दोनों हाथों से उस का चेहरा ऊपर कर के बोला, ‘‘मेरी जल्द ही नौकरी लग जाएगी और फिर हम दोनों शादी कर लेंगे.’’

शायरा चुप खड़ी रही. उस का दिल तो कह रहा था कि सुहैल उसे अपनी बांहों में भर कर खूब प्यार करे.

‘‘मैं अब्बा से कहूंगा कि वे तेरे घर आ कर हमारे रिश्ते की बात करें,’’ कह कर सुहैल अपने घर चला आया.

कई दिन बाद शायरा को खबर लगी कि सुहैल की नौकरी लग गई है और उसे श्रीनगर भेज दिया गया है. यह सुनते ही शायरा को लगा जैसे घरमकान, गलीकूचा सब बदरंग हो गए हों. न खाने का मन करता था और न ही किसी से बात करने को दिल करता. दिनभर या तो वह काम करती रहती या छत पर चली जाती. रात तो तारे गिनते कब बीत जाती, उसे पता ही न चलता.

शायरा की यह हालत देख कर एक रात उस की अम्मी ने अपने शौहर से कहा कि वे सुहैल के अब्बा से उन दोनों के रिश्ते की बात कर आएं.

अगले दिन शायरा के अब्बू घर लौटे, तो शायरा ने उन्हें पानी दिया. जब वह जाने लगी, तो उन्होंने उसे रोक लिया और बोले, ‘‘मैं ने निजाम से बात कर ली है. कहते हैं कि जैसे ही सुहैल छुट्टी पर आएगा, तुम दोनों का निकाह कर देंगे.’’

शायरा भाग कर कमरे में चली गई और तकिए में मुंह छिपा कर खूब मुसकराई. उस दिन उस ने भरपेट खाना खाया और कई दिनों के बाद अच्छी नींद आई. अब इंतजार था तो सुहैल के घर लौट आने का.

एक दिन अब्बू ने बताया कि एक महीने बाद सुहैल घर लौट कर आ रहा है. यह सुन कर शायरा की खुशी का ठिकाना न रहा. अब तो बस दिन गिनने थे. महीने का समय ही कितना होता है? मगर जल्द ही उसे एहसास हो गया कि अगर किसी अजीज का इंतजार हो, तो एक दिन भी सदियों सा बड़ा हो जाता है.

शायरा सुबह उठती तो खुश होती कि चलो एक दिन बीता, मगर दिनभर बस घड़ी की तरफ निगाहें जमी रहतीं.

आखिर वह दिन भी आया, जब उसे पता चला कि सुहैल घर लौट आया  है. मेरठ नजदीक था तो चाचा भी घर  आ गए.

शाम को मौलवी की हाजिरी में दोनों परिवार के लोगों ने बैठ कर 10 दिन बाद का निकाह तय कर दिया.

शायरा को यकीन ही न था कि उसे मनमांगी मुराद मिल गई थी. घर में चूंकि चहलपहल थी, इसलिए सुहैल से मिलने का तो सवाल ही न था. बस, तसल्ली यह थी कि 10 ही दिनों की तो बात थी.

शादी में अभी 3 दिन बचे थे. घर में हर तरफ खुशी का माहौल था. अचानक एक बुरी खबर आई कि बैंगलुरु वाली बहन नाजनीन को बच्चों को स्कूल से लाते समय एक बस ने कुचल दिया. उन की मौके पर ही मौत हो गई.

एक पल में जैसे खुशियां मातम में बदल गईं. कुछ लोग तुरंत बैंगलुरु रवाना हो गए. हालात की नजाकत देखते  हुए उन्हें बैंगलुरु में ही दफना कर सब लौटे, तो अरबाज भी दोनों बच्चों के साथ आए.

शादी का समय नजदीक था, मगर शायरा ऐसे माहौल में शादी करने के हक में नहीं थी. उस ने जब यह बात सुहैल को बताई, तो उस ने शायरा का साथ दिया, मगर दोनों जानते थे कि कोई भी फैसला करना तो बड़ों को ही है.

शायरा दिनभर नाजनीन के बच्चों को अपने साथ रखती, उन के खानेपीने, नहलाने जैसी हर जरूरत का खयाल रखती. अरबाज दिन में 2-3 बार आ कर उस से बच्चों के बारे में जरूर जानते, उन का हालचाल लेते.

शादी की तैयारियां भी चुपचाप जारी थीं. शायरा भी कबूल कर चुकी थी कि बहन की मौत कुदरत की मरजी थी और यह शादी भी. उस ने मन ही मन खुद को तैयार भी कर लिया था.

शाम का समय था. सब लोग घर के आंगन में बैठे थे कि अरबाज और उस के अब्बू एकसाथ वहां पहुंचे. उन्हें बैठा कर चाय दी गई. शायरा उठ कर दूसरे कमरे में चली गई.

‘‘क्या बात है मियां, कुछ परेशान हो?’’ शायरा के अब्बू ने अरबाज के अब्बा से पूछा.

निजाम कुछ पल खामोश रहे, फिर कहा, ‘‘नाजनीन चली गई. अभी उस की उम्र ही कितनी थी. उस के बच्चे भी अभी बहुत छोटे हैं. अरबाज की हालत भी मु?ा से देखी नहीं जाती.’’

‘‘आप कहना क्या चाहते हैं?’’

‘‘अरबाज अभी जवान है. लंबी उम्र पड़ी है. कैसे कटेगी? और इन बच्चों को कौन पालेगा? आखिर इन सब के बारे में भी तो हमें ही सोचना है.’’

‘‘अब क्या किया जा सकता है?’’

‘‘नाजनीन के बच्चे शायरा के साथ घुलमिल गए हैं. अगर अरबाज और शायरा का निकाह कर दें तो कैसा रहे?’’

एक पल के लिए खामोशी छा गई. शायरा ने सुना तो उस के शरीर से जैसे जान निकल गई.

‘‘वह सुहैल से प्यार करती है. वह नहीं मानेगी,’’ शायरा के अब्बा बोले.

‘‘औरत जात की मरजी के माने ही क्या हैं? जानवर की तरह जिस के हाथ रस्सी थमा दी गई उसी से बंध गई. तुम अपनी कहो. मंजूर हो तो निकाह की तैयारी करें. अरबाज की भी नौकरी का सवाल है.’’

शायरा के अब्बा इसलाम ने अपनी बीवी जुबैदा की ओर देखा, तो जुबैदा ने हां में सिर हिला दिया.

‘‘ठीक है, जैसी आप की मरजी.’’

अगले ही दिन से शादी की तैयारी शुरू हो गई. सुहैल को इस निकाह की खबर लगी, तो उस ने अपना सामान पैक करना शुरू कर दिया.

जब यह खबर शायरा ने सुनी, तो उसे लगा कि जाने से पहले सुहैल उस से मिलने जरूर आएगा. मगर वह नहीं आया. उन के घर से खबर ही आनी बंद हो गई.

शादी बहुत सादगी से हो रही थी. शायरा को जब निकाह के लिए ले जाया गया, तो उस की हालत ऐसी थी जैसे मुरदे को मैयत के लिए ले जाया जा रहा हो. उस के सारे सपने टूट गए थे. जीने की वजह ही खत्म हो गई थी.

शायरा को लग रहा था कि जब उस से पूछा जाएगा कि अरबाज वल्द निजाम आप को कबूल है, तो वह कैसे कह पाएगी कि कबूल है?

दूल्हे से पूछा गया, ‘‘शायरा वल्द इसलाम आप को कबूल है?’’

आवाज आई, ‘‘कबूल है.’’

शायरा की जैसे धड़कन बढ़ गई. फिर शायरा से पूछा गया, ‘‘मोहतरमा, सुहैल वल्द निजाम आप को  कबूल है?’’

शायरा ने जैसे ही सुहैल का नाम सुना, तो उस ने धड़कते दिल और  चेहरे पर मुसकान लाते हुए कहा, ‘‘कबूल है.’’

दरअसल, अरबाज को पता चल चुका था कि शायरा सुहैल को चाहती है. उस ने सुहैल से बात की और शादी के दिन शायरा को यह खूबसूरत तोहफा देने की सोची. अब सुहैल और शायरा एक हो चुके थे.

Love Story : कितना करूं इंतजार

Love Story : कितना करूं इंतजार

मुझे गुमसुम और उदास देख कर मां ने कहा, ‘‘क्या बात है, रति, तू इस तरह मुंह लटकाए क्यों बैठी है? कई दिन से मनोज का भी कोई फोन नहीं आया. दोनों ने आपस में झगड़ा कर लिया क्या?’’

‘‘नहीं, मां, रोज रोज क्या बात करें.’’

‘‘कितने दिनों से शादी की तैयारी कर रहे थे, सब व्यर्थ हो गई. यदि मनोज के दादाजी की मौत न हुई होती तो आज तेरी शादी को 15 दिन हो चुके होते. वह काफी बूढ़े थे. तेरहवीं के बाद शादी हो सकती थी पर तेरे ससुराल वाले बड़े दकियानूसी विचारों के हैं. कहते हैं कि साए नहीं हैं. अब तो 5-6 महीने बाद ही शादी होगी.

‘‘हमारी तो सब तैयारी व्यर्थ हो गई. शादी के कार्ड बंट चुके थे. फंक्शन हाल को, कैटरर्स को, सजावट करने वालों को, और भी कई लोगों को एडवांस पेमेंट कर चुके थे. 6 महीने शादी सरकाने से अच्छाखासा नुकसान हो गया है.’’

‘‘इसी बात से तो मनोज बहुत डिस्टर्ब है, मां. पर कुछ कह नहीं पाता.’’

‘‘बेटा, हम भी कभी तुम्हारी उम्र के थे. तुम दोनों के एहसास को समझ सकते हैं, पर हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते. मैं ने तो तेरी सास से कहा भी था कि साए नहीं हैं तो क्या हुआ, अच्छे काम के लिए सब दिन शुभ होते हैं…अब हमें शादी कर देनी चाहिए.

‘‘मेरा इतना कहना था कि वह तो भड़क गईं और कहने लगीं, आप के लिए सब दिन शुभ होते होंगे पर हम तो सायों में भरोसा करते हैं. हमारा इकलौता बेटा है, हम अपनी तरफ से पुरानी मान्यताओं को अनदेखा कर मन में कोई वहम पैदा नहीं करना चाहते.’’

रति सोचने लगी कि मम्मी इस से ज्यादा क्या कर सकती हैं और मैं भी क्या करूं, मम्मी को कैसे बताऊं कि मनोज क्या चाहता है.

नर्सरी से इंटर तक हम दोनों साथसाथ पढ़े थे. किंतु दोस्ती इंटर में आने के बाद ही हुई थी. इंटर के बाद मनोज इंजीनियरिंग करने चला गया और मैं ने बी.एससी. में दाखिला ले लिया था. कालिज अलग होने पर भी हम दोनों छुट्टियों में कुछ समय साथ बिताते थे. बीच में फोन पर बातचीत भी कर लेते थे. कंप्यूटर पर चैट हो जाती थी.

एम.एससी. में आते ही मम्मीपापा ने शादी के लिए लड़का तलाशने की शुरुआत कर दी. मैं ने कहा भी कि मम्मी, एम.एससी. के बाद शादी करना पर उन का कहना था कि तुम अपनी पढ़ाई जारी रखो, शादी कौन सी अभी हुई जा रही है, अच्छा लड़का मिलने में भी समय लगता है.

शादी की चर्चा शुरू होते ही मनोज की छवि मेरी आंखों में तैर गई थी. यों हम दोनों एक अच्छे मित्र थे पर तब तक शादी करने के वादे हम दोनों ने एकदूसरे से नहीं किए थे. साथ मिल कर भविष्य के सपने भी नहीं देखे थे पर मम्मी द्वारा शादी की चर्चा करने पर मनोज का खयाल आना, क्या इसे प्यार समझूं. क्या मनोज भी यही चाहता है, कैसे जानूं उस के दिल की बात.

मुलाकात में मनोज से मम्मी द्वारा शादी की पेशकश के बारे में बताया तो वह बोला, ‘‘इतनी जल्दी शादी कर लोगी, अभी तो तुम्हें 2 वर्ष एम.एससी. करने में ही लगेंगे,’’ फिर कुछ सोचते हुए बोला था, ‘‘सीधेसीधे बताओ, क्या मुझ से शादी करोगी…पर अभी मुझे सैटिल होने में कम से कम 2-3 वर्ष लगेंगे.’’

प्रसन्नता की एक लहर तनमन को छू गई थी, ‘‘सच कहूं मनोज, जब मम्मी ने शादी की बात की तो एकदम से मुझे तुम याद आ गए थे…क्या यही प्यार है?’’

‘‘मैं समझता हूं यही प्यार है. देखो, जो बात अब तक नहीं कह सका था, तुम्हारी शादी की बात उठते ही मेरे मुंह पर आ गई और मैं ने तुम्हें प्रपोज कर डाला.’’

‘‘अब जब हम दोनों एकदूसरे से चाहत का इजहार कर ही चुके हैं तो फिर इस विषय में गंभीरता से सोचना होगा.’’

‘‘सोचना ही नहीं होगा रति, तुम्हें अपने मम्मीपापा को इस शादी के लिए मनाना भी होगा.’’

‘‘क्या तुम्हारे घर वाले मान जाएंगे?’’

‘‘देखो, अभी तो मेरा इंजीनियरिंग का अंतिम साल है. मेरी कैट की कोचिंग भी चल रही है…उस की भी परीक्षा देनी है. वैसे हो सकता है इस साल किसी अच्छी कंपनी में प्लेसमेंट मिल जाए क्योंकि कालिज में बहुत सी कंपनियां आती हैं और जौब आफर करती हैं. अच्छा आफर मिला तो मैं स्वीकार कर लूंगा और जैसे ही शादी की चर्चा शुरू होगी मैं तुम्हारे बारे में बता दूंगा.’’

प्यार का अंकुर तो हमारे बीच पनप ही चुका था और हमारा यह प्यार अब जीवनसाथी बनने के सपने भी देखने लगा था. अब इस का जिक्र अपनेअपने घर में करना जरूरी हो गया था.

मैं ने मम्मी को मनोज के बारे में बताया तो वह बोलीं, ‘‘वह अपनी जाति का नहीं है…यह कैसे हो सकता है, तेरे पापा तो बिलकुल नहीं मानेंगे. क्या मनोज के मातापिता तैयार हैं?’’

‘‘अभी तो इस बारे में उस के घर वाले कुछ नहीं जानते. फाइनल परीक्षा होने तक मनोज को किसी अच्छी कंपनी में जौब का आफर मिल जाएगा और रिजल्ट आते ही वह कंपनी ज्वाइन कर लेगा. उस के बाद ही वह अपने मम्मीपापा से बात करेगा.’’

‘‘क्या जरूरी है कि वह मान ही जाएंगे?’’

‘‘मम्मी, मुझे पहले आप की इजाजत चाहिए.’’

‘‘यह फैसला मैं अकेले कैसे ले सकती हूं…तुम्हारे पापा से बात करनी होगी…उन से बात करने के लिए मुझे हिम्मत जुटानी होगी. यदि पापा तैयार नहीं हुए तो तुम क्या करोगी?’’

‘‘करना क्या है मम्मी, शादी होगी तो आप के आशीर्वाद से ही होगी वरना नहीं होगी.’’

इधर मेरा एम.एससी. फाइनल शुरू हुआ उधर इंजीनियरिंग पूरी होते ही मनोज को एक बड़ी कंपनी में अच्छा स्टार्ट मिल गया था और यह भी करीबकरीब तय था कि भविष्य मेें कभी भी कंपनी उसे यू.एस. भेज सकती है. मनोज के घर में भी शादी की चर्चा शुरू हो गई थी.

मैं ने मम्मी को जैसेतैसे मना लिया था और मम्मी ने पापा को किंतु मनोज की मम्मी इस विवाह के लिए बिलकुल तैयार नहीं थीं. इस फैसले से मनोज के घर में तूफान उठ खड़ा हुआ था. उस के घर में पापा से ज्यादा उस की मम्मी की चलती है. ऐसा एक बार मनोज ने ही बताया था…मनोज ने भी अपने घर में ऐलान कर दिया था कि शादी करूंगा तो रति से वरना किसी से नहीं.

आखिर मनोज के बहनबहनोई ने अपनी तरह से मम्मी को समझाया था, ‘‘मम्मी, आप की यह जिद मनोज को आप से दूर कर देगी, आजकल बच्चों की मानसिक स्थिति का कुछ पता नहीं चलता कि वह कब क्या कर बैठें. आज के ही अखबार में समाचार है कि मातापिता की स्वीकृति न मिलने पर प्रेमीप्रेमिका ने आत्महत्या कर ली…वह दोनों बालिग हैं. मनोज अच्छा कमा रहा है. वह चाहता तो अदालत में शादी कर सकता था पर उस ने ऐसा नहीं किया और आप की स्वीकृति का इंतजार कर रहा है. अब फैसला आप को करना है.’’

मनोज के पिता ने कहा था, ‘‘बेटा, मुझे तो मनोज की इस शादी से कोई एतराज नहीं है…लड़की पढ़ीलिखी है, सुंदर है, अच्छे परिवार की है… और सब से बड़ी बात मनोज को पसंद है. बस, हमारी जाति की नहीं है तो क्या हुआ पर तुम्हारी मम्मी को कौन समझाए.’’

‘‘जब सब तैयार हैं तो मैं ही उस की दुश्मन हूं क्या…मैं ही बुरी क्यों बनूं? मैं भी तैयार हूं.’’

मम्मी का इरादा फिर बदले इस से पहले ही मंगनी की रस्म पूरी कर दी गई थी. तय हुआ था कि मेरी एम.एससी. पूरी होते ही शादी हो जाएगी.

मंगनी हुए 1 साल हो चुका था. शादी की तारीख भी तय हो चुकी थी. मनोज के बाबा की मौत न हुई होती तो हम दोनों अब तक हनीमून मना कर कुल्लूमनाली, शिमला से लौट चुके होते और 3 महीने बाद मैं भी मनोज के साथ अमेरिका चली जाती.

पर अब 6-7 महीने तक साए नहीं हैं अत: शादी अब तभी होगी ऐसा मनोज की मम्मी ने कहा है. पर मनोज शादी के टलने से खुश नहीं है. इस के लिए अपने घर में उसे खुद ही बात करनी होगी. हां, यदि मेरे घर से कोई रुकावट होती तो मैं उसे दूर करने का प्रयास करती.

पर मैं क्या करूं. माना कि उस के भी कुछ जजबात हैं. 4-5 वर्षों से हम दोस्तों की तरह मिलते रहे हैं, प्रेमियों की तरह साथसाथ भविष्य के सपने भी बुनते रहे हैं किंतु मनोज को कभी इस तरह कमजोर होते नहीं देखा. यद्यपि उस का बस चलता तो मंगनी के दूसरे दिन ही वह शादी कर लेता पर मेरा फाइनल साल था इसलिए वह मन मसोस कर रह गया.

प्रतीक्षा की लंबी घडि़यां हम कभी मिल कर, कभी फोन पर बात कर के काटते रहे. हम दोनों बेताबी से शादी के दिन का इंतजार करते रहे. दूरी सहन नहीं होती थी. साथ रहने व एक हो जाने की इच्छा बलवती होती जाती थी. जैसेजैसे समय बीत रहा था, सपनों के रंगीन समुंदर में गोते लगाते दिन मंजिल की तरफ बढ़ते जा रहे थे. शादी के 10 दिन पहले हम ने मिलना भी बंद कर दिया था कि अब एकदूसरे को दूल्हादुलहन के रूप में ही देखेंगे पर विवाह के 7 दिन पहले बाबाजी की मौत हमारे सपनों के महल को धराशायी कर गई.

बाबाजी की मौत का समाचार मुझे मनोज ने ही दिया था और कहा था, ‘‘बाबाजी को भी अभी ही जाना था. हमारे बीच फिर अंतहीन मरुस्थल का विस्तार है. लगता है, अब अकेले ही अमेरिका जाना पडे़गा. तुम से मिलन तो मृगतृष्णा बन गया है.’’

तेरहवीं के बाद हम दोनों गार्डन में मिले थे. वह बहुत भावुक हो रहा था, ‘‘रति, तुम से दूरी अब सहन नहीं होती. मन करता है तुम्हें ले कर अनजान जगह पर उड़ जाऊं, जहां हमारे बीच न समाज हो, न परंपराएं हों, न ये रीतिरिवाज हों. 2 प्रेमियों के मिलन में समाज के कायदे- कानून की इतनी ऊंची बाड़ खड़ी कर रखी है कि उन की सब्र की सीमा ही समाप्त हो जाए. चलो, रति, हम कहीं भाग चलें…मैं तुम्हारा निकट सान्निध्य चाहता हूं. इतना बड़ा शहर है, चलो, किसी होटल में कुछ घंटे साथ बिताते हैं.’’

जो हाल मनोज का था वही मेरा भी था. एक मन कहता था कि अपनी खींची लक्ष्मण रेखा को अब मिटा दें किंतु दूसरा मन संस्कारों की पिन चुभो देता कि बिना विवाह यह सब ठीक नहीं. वैसे भी एक बार मनोज की इच्छा पूरी कर दी तो यह चाह फिर बारबार सिर उठाएगी, ‘‘नहीं, यह ठीक नहीं.’’

‘‘क्या ठीक नहीं, रति. क्या तुम को मुझ पर विश्वास नहीं? पतिपत्नी तो हमें बनना ही है. मेरा मन आज जिद पर आया है, मैं भटक सकता हूं, रति, मुझे संभाल लो,’’ गार्डन के एकांत झुटपुटे में उस ने बांहों में भर कर बेतहाशा चूमना शुरू कर दिया था. मैं ने भी आज उसे यह छूट दे दी थी ताकि उस का आवेग कुछ शांत हो किंतु मनोज की गहरीगहरी सांसें और अधिक समा जाने की चाह मुझे भी बहकाए उस से पूर्व ही मैं उठ खड़ी हुई.

‘‘अपने को संभालो, मनोज. यह भी कोई जगह है बहकने की? मैं भी कोई पत्थर नहीं, इनसान हूं…कुछ दिन अपने को और संभालो.’’

‘‘इतने दिन से अपने को संभाल ही तो रहा हूं.’’

‘‘जो तुम चाह रहे हो वह हमारी समस्या का समाधान तो नहीं है. स्थायी समाधान के लिए अब हाथपैर मारने होंगे. चलो, बहुत जोर से भूख लगी है, एक गरमागरम कौफी के साथ कुछ खिला दो, फिर इस बारे में कुछ मिल कर सोचते हैं.’’

रेस्टोरेंट में बैरे को आर्डर देने के बाद मैं ने ही बात शुरू की, ‘‘मनोज, तुम्हें अब एक ही काम करना है… किसी तरह अपने मातापिता को जल्दी शादी के लिए तैयार करना है, जो बहुत मुश्किल नहीं. आखिर वे हमारे शुभचिंतक हैं, तुम ने उन से एक बार भी कहा कि शादी इतने दिन के लिए न टाल कर अभी कर दें.’’

‘‘नहीं, यह तो नहीं कहा.’’

‘‘तो अब कह दो. कुछ पुराना छोड़ने और नए को अपनाने में हरेक को कुछ हिचक होती है. अपनी इंटरकास्ट मैरिज के लिए आखिर वह तैयार हो गए न. तुम देखना बिना सायों के शादी करने को भी वह जरूर मान जाएंगे.’’

मनोज के चेहरे पर खुशी की एक लहर दौड़ गई थी, ‘‘तुम ठीक कह रही हो रति, यह बात मेरे ध्यान में क्यों नहीं आई? खाने के बाद तुम्हें घर पर छोड़ देता हूं. कोर्ट मैरिज की डेट भी तो पास आ गई है, उसे भी आगे नहीं बढ़ाने दूंगा.’’

‘‘ठीक है, अब मैरिज वाले दिन कोर्ट में ही मिलेंगे.’’

‘‘मेरे आज के व्यवहार से डर गईं क्या? इस बीच फोन करने की इजाजत तो है या वह भी नहीं है?’’

‘‘चलो, फोन करने की इजाजत दे देते हैं.’’

रजिस्ट्रार के आफिस में मैरिज की फार्र्मेलिटी पूरी होने के बाद हम दोनों अपने परिवार के साथ बाहर आए तो मनोज के जीजाजी ने कहा, ‘‘मनोज, अब तुम दोनों की शादी पर कानून की मुहर लग गई है. रति अब तुम्हारी हुई.’’

‘‘ऐ जमाई बाबू, ये इंडिया है, वह तो वीजा के लिए यह सब करना पड़ा है वरना इसे हम शादी नहीं मानते. हमारे घर की बहू तो रति विवाह संस्कार के बाद ही बनेगी,’’ मेरी मम्मी ने कहा.

‘‘वह तो मजाक की बात थी, मम्मी, अब आप लोग घर चलें. मैं तो इन दोनों से पार्टी ले कर ही आऊंगा.’’

होटल में खाने का आर्डर देने के बाद मनोज ने अपने जीजाजी से पूछा, ‘‘जीजाजी, मम्मी तक हमारी फरियाद अभी पहुंची या नहीं?’’

‘‘साले साहब, क्यों चिंता करते हो. हम दोनों हैं न तुम्हारे साथ. अमेरिका आप दोनों साथ ही जाओगे. मैं ने अभी बात नहीं की है, मैं आप की इस कोर्ट मैरिज हो जाने का इंतजार कर रहा था. आगे मम्मी को मनाने की जिम्मेदारी आप की बहन ने ली है. इस से भी बात नहीं बनी तो फिर मैं कमान संभालूंगा.’’

‘‘हां, भैया, मैं मम्मी को समझाने की पूरी कोशिश करूंगी.’’

‘‘हां, तू कोशिश कर ले, न माने तो मेरा नाम ले कर कह देना, ‘आप अब शादी करो या न करो भैया भाभी को साथ ले कर ही जाएंगे.’’’

‘‘वाह भैया, आज तुम सचमुच बड़े हो गए हो.’’

‘‘आफ्टर आल अब मैं एक पत्नी का पति हो गया हूं.’’

‘‘ओके, भैया, अब हम लोग चलेंगे, आप लोगों का क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘कुछ देर घूमघाम कर पहले रति को उस के घर छोडूंगा फिर अपने घर जाऊंगा.’’

मेरे गले में बांहें डालते हुए मनोज ने शरारत से देखा, ‘‘हां, रति, अब क्या कहती हो, तुम्हारे संस्कार मुझे पति मानने को तैयार हैं या नहीं?’’

आंखें नचाते हुए मैं चहकी, ‘‘अब तुम नाइंटी परसेंट मेरे पति हो.’’

‘‘यानी टैन परसेंट की अब भी कमी रह गई है…अभी और इंतजार करना पडे़गा?’’

‘‘उस दिन का मुझे अफसोस है मनोज…पर अब मैं तुम्हारी हूं.’’

वो वाली दोस्त: क्या मुकेश मीनू को अपना बना पाया?

कोरोना की महामारी ने बड़ेबड़े परदेशी को गांव में आने को मजबूर किया है. आज पूरे 4 साल बाद मुकेश अपने गांव आया है या कहें मजबूरी में आया है. मुकेश बहुत ही गरीबी की जिंदगी बचपन से जिया है और अपने सपनों और घर की हालत सुधारने के लिए 10 वीं पढ़ कर मुंबई भाग गया. वहां उस ने मोटर बनाने का काम सीखा और आज अच्छा पैसा कमा रहा है.

मुकेश की उम्र अभी 24 साल है. उस पर मुंबई का सुरूर देखा जा सकता है. रंगे हुए बाल, गोरा शरीर, अच्छे कपड़े उस की शोभा बढ़ा रहे थे.

मुकेश अपने घर के बाहर बरामदे में बैठा था, तभी उस की नजर सामने लगे नल पर पड़ी, जहां एक 17 साल की नई यौवन को पाई हुई खूबसूरत गोरी सी लड़की बालटी में पानी भर रही थी.

मुकेश की नजरों को मानो कोई जादू सा लग गया हो. वह एकटक उसी को देखे जा रहा था. वह सोच रहा था कि आखिर ये लड़की, जो बिलकुल साधारण कपड़ों और बिना फैशन के ही सुंदर लग रही है. हमारे शहर में लड़कियां तो मेकअप का सहारा लेती हैं, लेकिन इतनी सुंदर और मनमोहक नहीं लगतीं. मुकेश की नजर उस का तब तक पीछा करती रही, जब तक वह पानी ले कर ओझल नहीं हुई.

मुकेश ने अपनी भाभी से पूछा, ‘‘भाभी, यह लड़की कौन है? मैं तो इसे पहचान नहीं पाया.‘‘

भाभी ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अरे मुकेश, यह तो अपनी बगल के तिवारीजी की बिटिया मीनू है. तुम इसे भूल गए. शायद वह बड़ी हो गई है, इसीलिए इसे पहचान नहीं पाए.‘‘

मुकेश को उस का नाम जान कर न जाने क्या खुशी मिल रही थी, वह मन ही मन उस को अपना बनाने की सोचने लगा. मीनू की जवानी और खूबसूरती ने उस का दिल भेद दिया था.

अगले दिन फिर मुकेश बरामदे में बैठा उस का इंतजार करने लगा कि कब वह पानी भरने आएगी और कब वह उस का दीदार कर सकेगा.

तभी उस की नजर पीले सूट में चमकती हुई मीनू पर पड़ी और मुकेश की आंखें देखती रह गईं. पीले सूट में मीनू की खूबसूरती अलग ही इमेज बना रही थी, मानो कनेर का खूबसूरत फूल उतर आया हो.

मुकेश ने बड़ी हिम्मत की और नल तक पहुंच गया. वह मासूम बनते हुए बोला, ‘‘तुम मीनू हो न…‘‘

मीनू ने पलटते हुए जवाब दिया, ‘‘तुम्हें मेरा नाम मालूम है… हां, मैं ही मीनू हूं, और तुम मुकेश हो न. तुम तो मुंबई क्या गए, हम सब को भूल ही गए. अपने सभी दोस्तों और घर वालों को लगता है कि शहर की लड़कियां ज्यादा खूबसूरत लगती हैं.‘‘

अचानक मुकेश के मुंह से निकल गया, ‘‘नहीं मीनू, तुम से खूबसूरत कोई नहीं.’’

मीनू शरमा कर बालटी ले कर भागी और मुकेश को होश आया कि उस ने क्या कह दिया?

अगले दिन फिर वह बात करने पहुंच गया और बोला, ‘‘मीनू, मुझे माफ कर दो. मैं ने न जाने क्या बोल दिया, जो तुम भाग गई.‘‘

मीनू ने शरमाते हुए कहा, ‘‘अरे पागल, ऐसी कोई बात नहीं है.”

मुकेश ने कहा, ‘‘मुझ से दोस्ती करोगी?‘‘

मीनू ने कहा, ‘‘लेकिन, मैं और तुम तो पहले के ही दोस्त हैं बचपन से. बस, तुम्हीं भूल गए हो.‘‘

मुकेश को लगा कि आग दोनों तरफ है. उस ने बड़े प्यार से इशारों वाली बात में कहा, ‘‘वो वाली दोस्त बनोगी, गर्लफ्रैंड वाली.‘‘

मीनू ने कहा, ‘‘तुम परेशान करोगे लेकिन मैं ने देखा है फिल्मों में.‘‘

मुकेश ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘नहीं, प्यार करूंगा बस, परेशान कभी नहीं. तुम इतनी खूबसूरत हो, भला कौन तुम्हें परेशान करेगा.‘‘

इसी तरह दोनों की मेलमुलाकात और बातें बढ़ती गईं. कभीकभी प्यार से मीनू का हाथ मुकेश छू लेता, तब उस के शरीर मे अजब सी सिहरन दौड़ पड़ती.

मीनू मन ही मन उसे अपना दिल दे चुकी थी, बस होंठों पर इजहार लाने की देरी थी. लेकिन हर लड़की की तरह वह भी चाहती थी कि मुकेश ही इजहार करे.

एक दिन मुकेश ने बड़ी हिम्मत से अपने दिल की बात बताई

यह सुन कर मीनू खुशी से उछल पड़ी और उसे गले से लगा लिया.

गले लगते ही मुकेश को मानो क्या मिल गया, वह उस के प्यार में अधीर हो गया और पाने की ललक में व्याकुल भी.

उस के शरीर की बनावट, उस की सादगी उसे अपनी पसंद पर गुरूर दे रही थी, मानो उसे दुनिया का सब से अनमोल उपहार मिला हो.

अगले दिन मीनू उस के घर आई, तब उस की भाभी नहाने और मां बगल वाले ताऊ के यहां गई थीं. मुकेश बिस्तर पर सो रहा था. मीनू उस के समीप पहुंची और अपने होंठों से उस के गालों पर एक चुम्मा दे दी.

अचानक स्पर्श से मुकेश पलटा और दोनों के होंठ छू गए.

मुकेश उसे चूमने लगा, तभी मीनू की भी सासें गरम चलने लगीं, लेकिन खुद को संभालते हुए वह उस से झिटक कर दूर हुई और बोली, ‘‘धत्त, तुम बड़े बदमाश हो. अब कभी तुम्हें चुम्मा नहीं करूंगी.’’ लेकिन तभी मुकेश ने उठ कर उसे अपनी बांहों में भर लिया, फिर मीनू ने भी खुद को समर्पित कर दिया और अपने कोमल होंठों से उस का साथ देने लगी.

मुकेश की गरम सांसें मीनू के बदन में आग डाल रही थीं और उस का यौवन पूरे उफान पर आ चुका था. मुकेश भी अपने सीने पर उसे महसूस कर रहा था.

दोनों ही बिना कुछ बोले प्यार की आग में आहुति बन रहे थे और एकदूसरे को पूरा किए दे रहे थे.

मुकेश और मीनू का प्यार था या सिर्फ खिंचाव या फिर बचपन में हुई गलती, ये समय सिद्ध करेगा. लौकबंदी के 4 महीनों में मुकेश और मीनू ने न जाने कितनी दफा आगोश में लिपटे अपने जिस्म की गरमियों से एकदूसरे को पिघलाया.

मीनू का भरता यौवन अपनी चरमसीमा पर पहुंचने पर पूर्ण तृप्ति को पाया और मुकेश ने भी अपनी बांहों में न जाने कितनी दफा मीनू को जगह दी.

अचानक कुछ ही दिनों के बाद मुकेश को शहर से फोन आ गया. वह अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदार था. घर की गृहस्थी चलाना और अब प्यार दोनों में कोई एक चुनना था. अभी उम्र कम थी और काम ज्यादा करना था. अभी तो उसे कामयाबी मिलनी शुरू हुई थी.

एक रात उस ने बाग में मीनू को बुलाया और मिलते ही मीनू ने उसे गले से लगा लिया और उस के गालों पर अपने होंठों से चूमते हुए कहा, ‘‘ मुकेश तुम से बिलकुल दूर नहीं रहा जाता. मुझे हर जगह बस तुम्हीं दिखते हो. मन करता है कि तुम्हारी बांहों में रहूं और उम्र गुजर जाए.‘‘

मीनू की प्यार भरी बातें मुकेश सुनता रहा, परंतु वो तो मीनू से आज विदा लेने आया था कि उसे फिर शहर वापस जाना है.

मुकेश ने कहा, ‘‘मीनू, मैं भी तुम से प्यार करता हूं और तुम जानती हो कि आज के जमाने में प्रेम के साथ पैसों की भी जरूरत पड़ती है. बिना पैसों के घर नहीं चलता, इसीलिए आज तुम्हें यहां बुलाया है. मुझे कल शहर जाना है, क्योंकि आज वापसी के लिए फोन आया था.”

इतना सुनते ही मीनू के सिर पर मानो गमों का पहाड़ टूट पड़ा. यह सुन कर वह रोने लगी और फिर मुकेश की बांहों में खुद को समर्पित कर दिया.

मुकेश ने उसे प्यार से चूमा और दोनों के होंठ और हाथ एकदूसरे के बदन से खेलने लगे. मुकेश ने उस को वहीं जमीन पर लिटा दिया और चूमने लगा. मीनू भी उस का बराबर साथ दे रही थी. रात के ढलते हुए पहर में वे दोनों एकदूसरे में खोते गए. न जाने कब दोनों एकदूसरे के जिस्म में समा गए और अपनी चरमसीमा के उपरांत दोनों अलग हुए.

मुकेश ने मीनू से वादा किया, ‘‘तुम जरा भी चिंता न करो. मैं जल्दी ही वापस आऊंगा और तुम्हें अपने साथ शहर ले जाऊंगा.‘‘

सुबह हुई, मुकेश तैयार हुआ और शहर जाने के लिए निकल पड़ा. मीनू छत से उसे जाते देख रही थी, जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गया.

मीनू बहुत रोई और फिर खुद को ही समझाया, परंतु रोकने की हिम्मत न हुई क्योंकि प्रेम में आप साथी को खुद से नहीं बांध सकते उस की खुशी जब तक न हो.

आज इस घटना को पूरे 3 साल हो गए. मुकेश एक बार भी शहर से न आया. पहले एक या डेढ़ साल तक उस का फोन आता था, लेकिन तब से वह भी बंद है.

मीनू अब और बड़ी हो गई और सुंदर भी. उस का यौवन अब पूरी तरह से विकसित और ज्यादा खूबसूरत हो गया, उभार और कमर की खूबसूरती लड़कों को आकर्षित करती. उस के कालेज के न जाने कितने लड़कों ने उसे प्यार के लिए मनाया, परंतु उस के मन में मुकेश के सिवा कोई नहीं. वह बस उसी का इंतजार करती रही.

एक दिन उसे खबर मिली कि मुकेश इस हफ्ते गांव आ रहा है. उस की खुशी का ठिकाना न था. उस को लग रहा था कि वह सातवें आसमान पर है.

आज वह दिन भी आ गया और मुकेश वापस आया. मीनू कालेज से वापस आते ही भागती हुई मुकेश के घर उस से मिलने पहुंची और वहां पहुंचते ही वह हैरान हो गई.

मुकेश अकेले नहीं आया था, बल्कि एक लड़की के साथ आया था, जो उस की पत्नी थी. मुकेश ने शहर में ही शादी कर ली थी.

मीनू को देखते ही मुकेश ने उसे बुलाया और अपनी पत्नी से मिलाते हुए कहा, ‘‘सुनो, ये मेरी वो वाली दोस्त है, जिस के बारे में मैं ने तुम्हें बताया था.‘‘

मीनू ने भी उस की पत्नी को गले लगाया और कहा, ‘‘तुम बहुत तकदीर वाली हो, तुम्हें सब से अच्छा लड़का मिला, जो मेरा दोस्त था.‘‘

मीनू वहां से भागती हुई आई और फूटफूट कर रोई. वह खुद को समझाने की कोशिश कर रही थी कि वह सिर्फ वो वाली दोस्त थी.

लियो: आखिर जोया का क्या कुसूर था

राधा यश पर खूब बरसीं, धर्म, जाति, समाज की बड़ीबड़ी बातें कीं लेकिन जब यश भी उखड़ गया, तो रोने लगीं. ये कैसी मां हैं, क्या इन्हें अपने इकलौते व योग्य बेटे की खुशी पसंद नहीं? इंसानों ने अपनी खुशियों के बीच इतनी दीवारें क्यों खड़ी कर ली हैं? अपनों की खुशी इन दीवारों के आगे माने नहीं रखती क्या? राधा जोया को इतने अपशब्द क्यों कह रही हैं? आखिर, ऐसा क्या किया है उस ने?

अहा, जोया आ रही है. उस के परफ्यूम की खुशबू को मैं पहचानता हूं और वह मेरे लिए मटन ला रही है, मुझे यह भी पता चल गया है. अब आई, अब आई और यह बजी डोरबैल. यश लैपटौप पर कुछ काम कर रहा था, जिस फुरती से उस ने दरवाजा खोला, हंसी आई मुझे. प्यार करता है जोया से वह और जोया भी तो जान देती है उस पर. दोनों साथ में कितने अच्छे लगते हैं जैसे एकदूसरे के लिए ही बने हैं.

जैसे ही यश ने दरवाजा खोला, जोया अंदर आई. आते ही यश ने उस के गाल पर किस कर दिया. वह शरमा गई. मैं ने लपक कर अपनी पूंछ जोरजोर से हिला कर अपनी तरह से जोया का स्वागत किया. वह मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए नीचे ही बैठ गई. पूछा, ‘‘कैसे हो, लिओ? देखो, तुम्हारे लिए क्या लाई हूं.’’

मैं ने और तेजी से अपनी पूंछ हिलाई. फिर जोया ने आंगन की तरफ मेरे बरतनों के पास जाते हुए कहा, ‘‘आओ, लिओ.’’ मैं मटन पर टूट पड़ा, कितना अच्छा बनाती है जोया. उस के हाथ में कितना स्वाद है. राधारानी तो अपने मन का कुछ भी बनाखा कर अपनी खाली सहेलियों के साथ सत्संग, भजनों में मस्त रहती हैं. यश बेचारा सीधा है, मां जो भी बना देती है, चुपचाप खा लेता है. कभी कोई शिकायत नहीं करता. अच्छे बड़े पद पर काम करता है, पर घमंड नाम का भी नहीं. और जोया भी कितनी सलीकेदार, पढ़ीलिखी नरम दिल लड़की है. मैं तो इंतजार कर रहा हूं कि कब वह यश की पत्नी बन कर इस घर में आए.

यश के पापा शेखर भी बहुत अच्छे स्वभाव के हैं. घर में क्लेश न हो, यह सोच कर ज्यादातर चुप रहते हैं. राधा की जिदों पर उन्हें गुस्सा तो खूब आता है पर शांत रह जाते हैं. शायद इसी कारण से राधारानी जिद्दी और गुस्सैल होती चली गई हैं. यश का स्वभाव बिलकुल अपने पापा पर ही तो है. घर में मुझे प्यार तो सब करते हैं, राधारानी भी, पर मुझे उन का अपनी जाति पर घमंड करना अच्छा नहीं लगता. उन की बातें सुनता हूं तो बुरा लगता है. बोल नहीं पाता तो क्या हुआ, सुनतासमझता तो सब हूं.

मैं यश और जोया को बताना चाहता हूं कि राधारानी यश के लिए लड़कियां देख रही हैं, यह अभी यश को पता ही नहीं है. वह तो सुबह निकल कर रात तक ही आता है. वह घर आने से पहले जब भी जोया से मिल कर आता है, मैं समझ जाता हूं क्योंकि यश के पास से जोया के परफ्यूम की खुशबू आ जाती है मुझे. एक दिन जोया यश को बता रही थी कि उस का भाई समीर फ्रांस से यह परफ्यूम ‘जा दोर’ लाया था. जब घर में शेखर और राधा नहीं होते, यश जोया को घर में ही बुला लेता है. मैं खुश हो जाता हूं कि अब जोया आएगी, यश की फोन पर बात सुन लेता हूं न. जोया मुझे बहुत प्यार करती है, इसलिए हमेशा मेरे लिए कुछ जरूर लाती है.

यश जोया को अपने बैडरूम में ले गया तो मैं चुपचाप आंगन में आ कर बैठ गया. इतनी समझ है मुझ में. दोनों को बड़ी मुश्किल से यह तनहाई मिलती है. शेखर और राधा को, बस, इतना ही पता है कि दोनों अच्छे दोस्त हैं. दोनों एकदूसरे को बेइंतहा प्यार करते हैं, इस की भनक भी नहीं है उन्हें. मैं जानता हूं, जिस दिन राधारानी को इस बात का अंदाजा भी हो गया, जोया का इस घर में आना बंद हो जाएगा. एक विजातीय लड़की से बेटे की बाहर की दोस्ती तो ठीक है पर इस के आगे राधारानी कुछ सह न पाएंगी. धर्मजाति से बढ़ कर उन के जीवन में कुछ भी नहीं है, पति और बेटे की खुशी भी नहीं.

थोड़ी देर बाद जोया ने अपने और यश के लिए कौफी बनाई. फिर दोनों ड्राइंगरूम में ही बैठ कर बातें करने लगे. अब मैं उन दोनों के पास ही बैठा था.  कौफी पीतेपीते अपने पास बिठा कर मेरे  सिर पर हाथ फेरते रहने की यश की आदत है. मैं भी खुद ही कौफी का कप देख कर उस के पास आ कर बैठ जाता हूं. मुझे भी यही अच्छा लगता है. उस के स्पर्श में इतना स्नेह है कि मेरी आंखें बंद होने लगती हैं, ऊंघने भी लगता हूं. पर अचानक जोया के स्वर में उदासी महसूस हुई तो मेरे कान खड़े हुए.

जोया कह रही थी, ‘‘यश, अगर मैं ने अपने मम्मीपापा को मना भी लिया तो तुम्हारी मम्मी तो कभी राजी नहीं होंगी, सोचो न यश, कैसे होगा?’’

‘‘तुम चिंता मत करो जो, अभी टाइम है, सब ठीक हो जाएगा.’’

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जो, यश भी न. जोया के पहले से ही छोटे नाम को उस ने ‘जो’ में बदल दिया है, हंसी आती है मुझे. खैर, मैं यश को कैसे बताऊं कि अब टाइम नहीं है, राधारानी लड़कियां देख रही हैं. मैं ने अपने मुंह से कूंकूं तो किया पर समझाऊं कैसे. मुझे जोया के उतरे चेहरे को देख कर तरस आया तो मैं जोया की गोद में मुंह रख कर बैठ गया.

जोया की आंखें भर आई थीं, बोली, ‘‘यश, मैं तुम्हारे बिना जीने की कल्पना नहीं कर सकती.’’

‘‘ठीक है जो, मैं मम्मी से जल्दी ही बात करूंगा. तुम दुखी मत हो.’’

फिर यश अपने हंसीमजाक से जोया को हंसाने लगा. दोनों हंसते हुए कितने प्यारे लगते हैं. जोया की लंबी सी चोटी पकड़ कर यश ने उसे अपने पास खींच लिया था. वह हंस दी. मैं भी हंस रहा था. फिर जोया ने अपने फोन से हम तीनों की एक सैल्फी ली. वाह, ‘हैप्पी फैमिली’ जैसा फील हुआ मुझे. फिर जोया टाइम देखती हुई उठ खड़ी हुई, ‘‘अब आंटीअंकल के आने का टाइम हो रहा है, मैं चलती हूं.’’

‘‘हां, ठीक है,’’ कहते हुए यश ने खड़े हो कर उसे बांहों में भर लिया, फिर उस के होंठों पर किस कर दिया. मैं जानबूझ कर इधरउधर देखने लगा था.

जोया के जाने के 20 मिनट बाद शेखर और राधा आ गए. मैं ने सोचा, अच्छा हुआ, जोया टाइम से चली गई. जोया के परफ्यूम की जो खुशबू पूरे घर में आती रहती है, उसे शेखर और राधा महसूस नहीं करते. घंटों तक रहती है यह खुशबू घर में. कितनी अच्छी खुशबू है यह. पर आज शायद घर में मटन और परफ्यूम की अलग ही खुशबू राधारानी को महसूस हो ही गई, पूछा, ‘‘यश, कैसी महक है?’’

‘‘क्या हुआ, मम्मी?’’

‘‘कोई आया था क्या?’’

‘‘हां मम्मी, मेरे कुछ फ्रैंड्स आए थे.’’

शक्की तो हैं ही राधारानी, ‘‘अच्छा? कौनकौन?’’

‘‘अमित, महेश, अंजलि और जोया. जोया ही लिओ के लिए मटन ले आई थी.’’

शेखर ने जोया के नाम पर जिस तरह यश को देखा, मजा आ गया मुझे. बापबेटे की नजरें मिलीं तो यश मुसकरा दिया, वाह. बापबेटे की आंखोंआंखों में जो बातें हुईं, उन से मुझे मजा आया. दोनों का बढि़या दोस्ताना रिश्ता है. शेखर गरदन हिला कर मुसकराए, यश मुंह छिपा कर हंसने लगा. अचानक राधा ने कहा, ‘‘यश, अगले वीकैंड का कुछ प्रोग्राम मत रखना. फ्री रहना.’’

‘‘क्यों, मम्मी?’’

‘‘मैं ने तुम्हारे लिए एक लड़की पसंद की है, ज्योति, उसे देखने चलेंगे.’’

‘‘नहीं मम्मी, मुझे नहीं देखना है किसी को.’’

‘‘क्यों?’’ राधारानी के माथे पर त्योरियां उभर आईं.

‘‘बस, नहीं जाना मुझे.’’

‘‘कारण बताओ.’’

यश ने पिता को देखा, शेखर ने सस्नेह पूछा, ‘‘तुम्हारी कोईर् पसंद है?’’

यश साफ बात करने वाला सच्चा इंसान है. उसे लागलपेट नहीं आती, बोला, ‘‘मम्मी, मुझे जोया पसंद है, मैं उसी से मैरिज करूंगा.’’

जोया के नाम पर जो तूफान आया, पूरा घर हिल गया. राधा यश पर खूब बरसीं, धर्म, जाति, समाज की बड़ीबड़ी बातें कीं. जब यश भी उखड़ गया, तो रोने पर आ गईं. वैसा ही दृश्य हो गया जैसा फिल्मों में होता है. यश जब घर में कोई मूवी देखता है, मैं भी देखता हूं उस के साथ बैठ कर, ऐसा दृश्य तो खूब घिसापिटा है पर अब तो मेरे यश से इस का संबंध था तो मैं बहुत दुखी हो रहा था. मुझे बारबार जोया की आज की ही आंसुओं से भरी आंखें याद आ रही थीं.

मैं चुपचाप शेखर के पास बैठ कर सारा तमाशा देख रहा था और सोच रहा था, ये कैसी मां हैं, क्या इन्हें अपने इकलौते व योग्य बेटे की खुशी अजीज नहीं?

इंसानों ने अपनी खुशियों के बीच इतनी दीवारें क्यों खड़ी कर ली हैं? अपनों की खुशी इन दीवारों के आगे माने नहीं रखती? राधा जोया को इतने अपशब्द क्यों कह रही हैं? ऐसा क्या किया उस ने?

यश अपने बैडरूम की तरफ बढ़ गया तो मैं झट उठ कर उस के पीछे चल दिया. वह बैड पर औंधेमुंह पड़ गया. मैं ने उस के पैर चाटे. अपना मुंह उस के पैरों पर रख कर उसे तसल्ली दी. वह मुझे अपनी गोद में उठा कर वापस अपने पास लिटा कर एक हाथ अपनी आंखों पर रख कर सिसक उठा तो मुझे भी रोना आ गया. यश को तो मैं ने आज तक रोते देखा ही नहीं था. ये कैसी मां हैं? इतने में शेखर यश के पास आ कर बैठ गए.

यश के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले,  ‘‘बेटा, तुम्हारी मां जोया को किसी सूरत में स्वीकार नहीं करेंगी.’’

‘‘और मैं उस के सिवा किसी और से विवाह नहीं करूंगा, पापा.’’

घर का माहौल अजीब हो गया था. अगले कई दिन घर का माहौल बेहद तनावपूर्ण रहा. राधा और यश दोनों अपनी बात पर अड़े थे. शेखर कभी राधा को समझा रहे थे, कभी यश को. यश कभी घर में खाता, कभी बाहर से खा कर आता और चुपचाप अपने कमरे में बंद हो जाता. वह जोया से तो बाहर मिलता ही था, मुझे तो जोया के परफ्यूम की खुशबू अकसर यश के पास से आ ही जाती थी.

मैं ने जोया को बहुत दिनों से नहीं देखा था. मुझे जोया की याद आती थी. यश का उदास चेहरा देख कर भी राधा का हठ कम नहीं हो रहा था और मेरा यश तो मुझे आजकल बिलकुल रूठारूठा फिल्मी हीरो लगता था.

एक दिन राधा यश के पास आईं, टेबल पर एक लिफाफा रखती हुई बोलीं, ‘‘यह रही ज्योति की फोटो. एक बार देख लो, खूब धनी व समृद्ध परिवार है.  ज्योति परिवार की इकलौती वारिस है. तुम्हारा जीवन बन जाएगा और एक बात कान खोल कर सुन लो, यह इश्क का भूत जल्दी उतार लो, वरना मैं अन्नजल त्याग दूंगी.’’

मैं ने मन ही मन कहा, झूठी. आप तो भूखी रह ही नहीं सकतीं. व्रत में भी आप का मुंह पूरा दिन चलता है. मेरे यश को झूठी धमकियां दे रही हैं राधारानी. झूठी बातें कर के यश को परेशान कर रही हैं, बेचारा फंस न जाए. अन्नजल त्यागने की धमकी से सचमुच यश का मुंह उतर गया.

अब मैं कैसे बताऊं कि यश, इस धमकी से डरना मत, तुम्हारी मां कभी भूखी नहीं रह सकतीं. जोया को न छोड़ना, तुम दोनों साथ बहुत खुश रहोगे. पिछली बार जो मेरे फेवरेट पौपकौर्न तुम मेरे लिए लाए थे, आधे तो राधारानी ने ही खा लिए थे. 4 अपने मुंह में डाल रही थीं तो एक मेरे लिए जमीन पर रख रही थीं. एक बार भी नहीं सोचा कि मेरे फेवरेट पौपकौर्न हैं और तुम मेरे लिए लाए थे. तुम ने जोया के साथ मूवी देखते हुए खरीदे थे और आ कर झूठ बोला था कि एक दोस्त के साथ मूवी देख कर आए हो. हां, ठीक है, ऐसी मां से झूठ बोलना ही पड़ जाता है. गपड़गपड़ सारे पौपकौर्न खा गई थीं राधारानी. ये कभी भूखी नहीं रहतीं, तुम डरना मत, यश.

फोटो पटक कर राधा शेखर के साथ कहीं बाहर चली गई थीं. यश सिर पकड़ कर बैठ गया था. मैं तुरंत उस के पैरों के पास जा कर बैठ गया. इतने दिनों से घर में तूफान आया हुआ था. यश के साथ मैं भी थक चुका था. मैं ने उसे कभी अपने मातापिता से ऊंची आवाज में बात करते हुए भी नहीं सुना था. उसे अपनी पसंद की जीवनसंगिनी की इच्छा का अधिकार क्यों नहीं है? इंसानों में यह भेदभाव करता कौन है और क्यों? क्यों एक इंसान दूसरे इंसान से इतनी नफरत करता है? मेरा मन हुआ, काश, मैं बोल सकता तो यश से कहता, ‘दोस्त, यह तुम्हारा जीवन है, बेकार की बहस छोड़ कर अपनी पसंद का विवाह तुम्हारा अधिकार है. राधारानी ज्यादा दिनों तक बेटे से नाराज थोड़े ही रहेंगी. तुम ले आओ जोया को अपनी दुलहन बना कर. जोया को जाननेसमझने के बाद वे तुम्हारी पसंद की प्रशंसा ही करेंगी.’ यश मुझे प्यार करने लगा तो मैं  भी उस से चिपट गया.

मैं बेचैन सा हुआ तो यश ने कहा, ‘‘लिओ, क्या करूं? प्लीज हैल्प मी. बताओ, दोस्त. मां की पसंद देखनी है? मुझे भी पता है तुम्हें भी जोया पसंद है, है न?’’

मैं ने खूब जोरजोर से अपनी पूंछ हिला कर ‘हां’ में जवाब दिया. वह भी समझ गया. हम दोनों तो पक्के दोस्त हैं न. एकदूसरे की सारी बातें समझते हैं, फिर उसे पता नहीं क्या सूझा, बोला, ‘‘आओ, तुम्हें मां की पसंद दिखाता हूं.’’

यश ने मेरे आगे उस लड़की की फोटो की. मुझे धक्का लगा, मेरे हीरो जैसे हैंडसम दोस्त के लिए यह भीमकाय लड़की. पैसे व जाति के लिए राधारानी इसे बहू बना लेंगी. छिछि, लालची हैं ये. यश को भी झटका लगा था. वह चुपचाप अपनी हथेलियों में सिर रख कर बैठ गया. उस की आंखों की कोरों से नमी सी बह गई. मैं ने उस के घुटनों पर अपना सिर रख कर उसे प्यार किया. मुंह से कुछ आवाज भी निकाली. वह थके से स्वर में बोला.

‘‘लिओ, देखा? मां कितनी गलत जिद कर रही हैं. बताओ दोस्त, क्या करना चाहिए अब?’’

मेरा दोस्त, मेरा यार मुझ से पूछ रहा था तो मुझे बताना ही था. राधारानी को पता नहीं आजकल के घर के दमघोंटू माहौल में चैन आ रहा था, यह तो वही जानें. यश की उदासी मुझे जरा भी सहन नहीं हो रही थी. मेरा दोस्त अब मुझ से पूछ रहा था तो मुझे तो अपनी राय देनी ही थी. क्या करूं, क्या करूं, ऐसे समय न बोल पाना बहुत अखरता है. मैं ने झट न आव देखा न ताव, उस फोटो को मुंह में डाला और चबा कर जमीन पर रख दिया. यश को तो यह दृश्य देख हंसी का दौरा पड़ गया. मैं भी हंस दिया, खूब पूंछ हिलाई. दोनों पैरों पर खड़ा भी हो गया. यश तो हंसतेहंसते जमीन पर लेट गया था. मैं भी उस से चिपट गया. हम दोनों जमीन पर लेटेलेटे खूब मस्ती करने लगे थे.

अब यश की हंसी नहीं रूक रही थी. मैं भांप गया था, अब यश जोया से दूर नहीं होगा. वह फैसला ले चुका था और मैं इस फैसले से बहुत खुश था. मुझ पर अपना हाथ रखते हुए यश कह रहा था, ‘‘ओह लिओ, आई लव यू.’’

‘मी टू,’ मैं ने भी उस का हाथ चाट कर जवाब सा दिया था.

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