Raksha Bandhan : बड़ा भाई- दो भाइयों की तनातनी

अमित ने बस्ता एक ओर फेंका और सुबकता हुआ बिस्तर पर औंधेमुंह लेट गया. मां ने देखा तो हैरानी से पूछा, ‘‘क्या हुआ अमित?’’

‘‘बड़ा आया अपने को बड़ा भाई समझने वाला, बड़ा है तो क्या हर समय मुझे डांटेगा,’’ सुबकते हुए अमित ने अपने बड़े भाई रवि की शिकायत की.

तभी रवि घर में घुसता हुआ बोला, ‘‘मां, आज फिर अमित आवारा लड़कों के साथ घूम रहा था. मैं ने इसे उन के साथ जाने से मना किया तो यह नाराज हो गया. मैं ने इसे कईर् बार कहा है कि वे अच्छे लड़के नहीं हैं, जैसी संगत होगी वैसी रंगत आएगी. संभल जाओ, इस बार तुम्हारे 10वीं के पेपर हैं, 2 महीने बचे हैं. अब भी साल भर की तरह मटरगश्ती में रहोगे तो अच्छे अंक कैसे आएंगे?’’

‘‘हां, तू तो जैसे बड़े अच्छे अंक लाया था न 10वीं में. मनचाहा सब्जैक्ट भी नहीं ले सका. तुझ से तो अच्छे ही अंक लाता हूं कम पढ़ने पर भी. बड़ा बनता है, बड़ा भाई,’’ अमित ने नाराजगी जताई.

‘‘मैं मनचाहा सब्जैक्ट नहीं ले पाया इसीलिए तो तुझे समझता हूं मेहनत कर. छोड़ ऐसे आवारा लड़कों की दोस्ती. मनचाहा सब्जैक्ट नहीं मिलेगा तो कैसे करेगा इंजीनियरिंग,’’ रवि ने समझाया.

‘‘हांहां, कर लूंगा, तू अपने काम से काम रख,’’ अमित ने झल्ला कर कहा.

‘‘नहीं बेटा, ऐसा नहीं कहते,’’ मां ने समझाया, ‘‘अगर वे गलत लड़के हैं तो उन का साथ ठीक नहीं, कल को किसी लफड़े में फंसे तो साथ रहने वाले का नाम भी खराब होता है  भले ही उस ने कुछ न किया हो.’’

‘‘औैर मां, वे लड़के तो क्लास से बंक मार कर कई बार सिनेमा देखने जाते हैं, कभी आवारा लड़कों की तरह आसपास अमरूद तोडेंगे. पता है पिछले महीने इस का दोस्त राजू बाहर घूमता लड़कियां छेड़ता पकड़ा गया था. कालोनी वाले उसे पकड़ कर लाए थे प्रिंसिपल के सामने और दूसरा, क्या नाम है उस का, मुन्ना, वह तो बातबात पर हाथापाई करने में गर्व समझता है. वह स्कूल बुलिंग में अव्वल है,’’ रवि ने स्पष्ट किया.

‘‘हां हैं, तो? हैं तो मेरे दोस्त ही न. तू घबरा मत. मैं इन के साथ रह कर भी गलत नहीं करूंगा, तू अपने काम से काम रख,’’ अमित बोला.

अमित और रवि दोनों भाई शहर के नामी स्कूल में पढ़ते थे. अमित 10वीं में था और उस का बड़ा भाई रवि 12वीं में. अमित बिगड़ैल दोस्तों की संगत में पड़ कर बिगड़ता जा रहा था. रवि बड़ा भाई होने के नाते उसे बारबार समझाता, लेकिन अमित के कान पर जूं न रेंगती. अभी परसों की तो बात थी. क्लास बंक कर अमित मुन्ना के साथ बाहर जाना चाहता था. स्कूल के गेट पर ड्यूटी देते 11वीं के छात्र से मुन्ना और अमित भिड़ गए. फिर गेट कूद कर दोनों बाहर भाग गए. एकाध घंटा मटरगश्ती करने के बाद वापस आए. तब तक प्रिंसिपल तक उन की शिकायत पहुंच चुकी थी. प्रिंसिपल ने मुन्ना के पिता को बुलाया था जबकि अमित के बड़े भाई रवि को उसी समय बुला कर हिदायत दी थी, ‘‘देखो, अमित आवारागर्दी, बुलिंग में आगे बढ़ता जा रहा है. इस का अंजाम आगे चल कर अच्छा नहीं होगा. इसे जिम्मेदार बनाओ, कुछ समझाओ. इस बार सिर्फ समझा रहा हूं. अगली बार पापा को बुलाऊंगा और स्कूल से निकाल दूंगा.’’

‘‘जी सर, मैं इसे समझा दूंगा. मैं इस की जिम्मेदारी लेता हूं. आइंदा यह ऐसा नहीं करेगा,’’ कह कर रवि ने अमित की जिम्मेदारी ली थी औैर किसी अन्य सजा से अमित को बचाया था.

इस के बाद भी जब घर आते समय अमित को समझाया तो ‘हूं’ कह कर अमित ने पल्ला झाड़ लिया. अमित ने मां को इस वाकेए से अवगत करवाया तो मां ने भी अमित को समझाया, लेकिन अमित उलटा बरस पड़ा, ‘‘वे मेरे दोस्त हैं. पता है वे दिलेर हैं इसलिए सब उन से डरते हैं. आज अगर 4 लड़के मुझे पीटने आ जाएं तो वही आगे दिखेंगे बचाने में, यह बड़ा भाई नहीं. खुद तो डरपोक है ही, औरों को भी डरपोक बनने की नसीहत देता है.’’ अमित की आवारगी बढ़ती ही जा रही थी. इधर पेपर नजदीक आ रहे थे. अमित पढ़ाई में भी पिछड़ रहा था, लेकिन वह किसी की मानने को तैयार न था. स्कूल में एक से पंगा हो जाए तो सभी गुंडागर्दी करने लगते, हौकीडंडे ले कर चल देते उन्हें पीटने, जिस कारण आसपास के स्कूलों के लड़कों से भी उन की दुश्मनी हो गई थी. अब तो अमित वैन में वापस घर भी न आता. रवि से कह देता, ‘मुझे तैयारी करने दोस्त के घर जाना है और थोड़ी देर बाद आऊंगा.’ फिर आवारगर्दी करते हुए 2-3 घंटे बाद वह घर आता.

स्कूल में फेयरवैल पार्टी थी. 10वीं वालों को 9वीं के बच्चे विदाई पार्टी दे रहे थे. 11वीं के बच्चों द्वारा 12वीं वालों को फेयरवैल पार्टी दी जानी थी, जो अगले हफ्ते थी. इस के बाद ऐग्जाम्स की तैयारी के लिए छुट्टियां हो जानी थीं.अमित घर से बड़ा हीरो बन कर निकला था. आज कुछ भी पहन कर आने की छूट थी. सो, अमित ने लैदर की जैकेट और जींस की पैंट पहनी औैर सुबह जल्दी यह कह कर निकला कि दोस्तों के साथ स्कूल जाऊंगा.  रवि के स्कूल पहुंचने के बाद भी वह स्कूल नहीं पहुंचा. काफी देर देखने के बाद रवि ने अमित के क्लासमेट रोहन से अमित के बारे में पूछा तो पता चला कि वह मुन्ना, राजू औैर अन्य दोस्तों के साथ गया है. वे किसी लड़की को छेड़ने के कारण झगड़ा कर बैठे हैं और हौकीडंडे आदि ले कर गए हैं उन्हें सबक सिखाने. रवि की तो ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे अटक गई. कहां सभी बच्चे पार्टी का लुत्फ उठा रहे हैं औैर उस का भाई अमित गुंडागर्दी में फंसा है. वह क्या करे समझ नहीं पा रहा था. तभी सामने से अमित अपने उन्हीं दोस्तों के साथ आता दिखा औैर आते ही वे सब ऐसा जताने लगे जैसे कोई किला फतेह कर आए हों, ‘‘आए बड़े मेरे दोस्त की गर्लफै्रंड को छेड़ने वाले,’’ अमित गर्व से कह रहा था.

अमित को देख रवि की जान में जान आई. वह अमित को ठीकठाक देख खुश था, लेकिन डांटने के लहजे में बोला, ‘‘प्रिंसिपल की डांट भूल गए लगता है. उस दिन वारनिंग भी मिली थी तुम्हें, मम्मीपापा भी अकसर समझाते हैं, मैं भी कई बार कह चुका हूं. तुम समझते क्यों नहीं? जरा सी ऊंचनीच हो गई तो सारा कैरियर चौपट हो जाएगा…’’ ‘‘अमित अपने भाई को समझा, हमें डराने की जरूरत नहीं. हम सब समझते हैं,’’ मुन्ना बीच में ही रवि की बात काटता हुआ बोला.

‘‘मुन्ना, तुम चुप रहो. मैं अपने भाई से बात कर रहा हूं. मैं इस का बड़ा भाई हूं, इस का भलाबुरा समझता हूं और मेरी जिम्मेदारी है कि मैं इसे गलत रास्ते पर जाने से रोकूं.’’

‘‘रवि,’’ अमित चिल्लाया. उसे यह बात सब दोस्तों के सामने इंसल्ट लगी, ‘‘ये मेरे दोस्त हैं, इन्हें कुछ कहने की जरूरत नहीं. घर चल कर कह लेना जो कहना है. अब जाओ अपनी क्लास में हमारी भी पार्टी शुरू होने वाली है, आया बड़ा भाई बन कर. हर बात में टांग अड़ाता रहता है.’’

रवि अपने पर खीजता हुआ वापस अपनी क्लास में चला गया. पार्टी शुरू हो गई. रवि की क्लास के एक लड़के राजन ने बताया कि आज उस के छोटे भाई अमित की क्लासमेट, जो उस के दोस्त राजू की गर्लफै्रंड भी है, को पास के स्कूल के एक लड़के ने छेड़ दिया था. वह पार्टी के लिए सजधज कर आ रही थी. वे सभी उन्हें सबक सिखाने गए थे. अमित और उस के साथी पार्टी में मशगूल थे, उधर वे उस स्कूल के जिस लड़के की पिटाई कर आए थे, उस ने बदला लेने की नीयत से कई लड़के इकट्ठे कर लिए थे और स्कूल से कुछ दूर एकत्र हो कर अमित और उस के साथियों के निकलने का इंतजार कर रहे थे. फेयरवैल पार्टी खत्म हुई तो सभी जाने को हुए. तभी किसी ने आ कर खबर दी कि स्कूल के बाहर पास वाले स्कूल के बहुत से लड़के लाठियां और हौकियां लिए अमित, मुन्ना व राजू का इंतजार कर रहे हैं. पिछले गेट से चले जाएं वरना खैर नहीं. उन में से एकदो के पास तो चाकू भी हैं.

खबर आग की तरह फैली औैर रवि के पास भी पहुंची. छुट्टी होते ही रवि अमित के पास जाने को हुआ. वह उसे साथ घर ले जाना चाहता था. किसी अनहोनी से आशंकित रवि अमित को ढूंढ़ रहा था, लेकिन अमित अपने दोस्तों के साथ उसी समय निकला था. सामने के स्कूल से कई लड़के हौकियां व डंडे लिए आते दिखे तो अमित के दोस्तों की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई, वे पीछे से कब भाग लिए अमित को पता ही न चला. तभी सामने से आते लड़कों में से एक ने चाकू निकाला और अमित के पेट में घोंपने को हुआ कि तभी रवि वहां भागता हुआ पहुंच गया. उस ने यह सब देख लिया था.     स्थिति भांपते हुए रवि ने अमित को एक ओर धक्का दे दिया, जिस से चाकू अमित के बजाय रवि के पेट में जा घुसा.

रवि के खून बहने लगा. यह देख सभी लड़के नौ दो ग्यारह हो गए, अमित बड़े भाई को इस हाल में देख परेशान हो उठा. तभी वहां कुछ स्कूल के लड़के व स्थानीय निवासी एकत्र हो गए, जिन के सहयोग से रवि को पास के नर्सिंगहोम पहुंचा दिया गया. डाक्टर ने बताया कि रवि का काफी खून बह गया है और वह बेहोश है. खबर मिलते ही प्रिंसिपल व अन्य छात्र भी नर्सिंगहोम पहुंच गए. कुछ छात्र आपस में फुसफुसा रहे थे, ‘‘देखा, बड़ा भाई, बड़ा ही होता है, जिन दोस्तों पर अमित को गुमान था सब भाग गए. मुसीबत में बड़े भाई ने ही अमित की जान बचाई.’’ अमित भी खुद पर खिन्न था. काश, उस ने बड़े भाई की बात मान ली होती. अब तो सब फंसेंगे. उधर चाकू मारने वाले लड़के को भी पुलिस पकड़ लाई थी, उस के कैरियर पर बात आ गई थी. पुलिस को रवि के होश में आने का इंतजार था ताकि उस का बयान ले सके और मामले में अभियुक्त को पकड़ सके.

उसी समय अमित के मम्मीपापा भी आ गए. सभी परेशान थे. अमित मां के गले लग उन के आंचल में अपना मुंह छिपाता दिख रहा था. पश्चात्ताप के आंसू रुक नहीं रहे थे. तभी डाक्टर ने आ कर बताया, ‘‘इंस्पैक्टर साहब, रवि को होश आ गया है. आप बयान ले सकते हैं.’’ इंस्पैक्टर अंदर गए औैर थोड़ी देर बाद बाहर आ गए. आते ही उन्होंने अपने सिपाही को चाकू मारने वाले लड़के को छोड़ने का आदेश दिया और बताया, ‘‘रवि के अनुसार भागते समय गिर जाने से सड़क पर पड़ी कोई लोहे की पत्ती उसे लग गई थी. इस में किसी का कोई कुसूर नहीं, सो किसी पर कोई केस नहीं बनता.’’

रवि के बयान पर सब हैरान थे. वह चाहता तो अपने भाई पर हमला करने वाले को पकड़वा सकता था, लेकिन उस के इस बयान ने सब को बचा लिया था. अमित के आंसू बह निकले, वाकई रवि बड़ा भाई है, उस ने बड़ा भाई होने की जिम्मेदारी बखूबी निभाई है. तभी डाक्टर ने बताया, ‘‘आप रवि से मिल सकते हैं, लेकिन रवि का काफी खून बह गया है, उसे खून चढ़ाना पड़ेगा. डोनर की व्यवस्था करें.’’

‘‘मैं दूंगा अपने बड़े भाई को खून…’’ पीछे से आवाज आई. अमित ने देखा यह वही लड़का था जिस ने चाकू से अमित पर वार किया था, लेकिन रवि को लग गया था.

‘‘हां अमित, अगर तुम्हारा बड़ा भाई चाहता तो हम सब को फंसा सकता था. इस से हम पर केस चलता, हम 10वीं के पेपर भी नहीं दे पाते, सजा भी भुगतनी पड़ती. बुलिंग करते समय इस के अंजाम के बारे में हम ने नहीं सोचा था. रवि ने हमें न केवल सीख दी है बल्कि बड़ा भाई होने की जिम्मेदारी भी निभाई है. मैं संकल्प लेता हूं आज से बुलिंग बंद,’’ वह बोला. तभी मुन्ना और राजू आगे आए औैर बोले, ‘‘तुम ठीक कहते हो दोस्त. रवि ने जान पर खेल कर हमें यह सबक सिखाया है कि हम गलत राह पर चल रहे हैं और अपने ऐसे बयान से सब को बचा कर बता दिया है कि वह अमित का ही नहीं, हम सब का बड़ा भाई है. हम सब उसे खून देंगे और जल्द ठीक कर लेंगे, अब जिम्मेदारी निभाने की बारी हमारी हैं,’’ कहते हुए मुन्ना की भी आंखे भर आईं.

अमित अपने मम्मीपापा के साथ अंदर गया और रवि से लिपट कर रो पड़ा, ‘‘मुझे माफ कर दो भैया. मैं अच्छा बन कर दिखाऊंगा,’’ साथ ही उस ने बड़े भाई के पांव छू कर संकल्प लिया कि मम्मीपापा का सपना पूरा करेगा और अच्छी पढ़ाई कर के इंजीनियर बन कर दिखाएगा.

Raksha Bandhan : जिम्मेदारी बहन की सुरक्षा की

‘‘गुडि़या, अब तुम बड़ी हो गई हो. अब तुम्हारी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी मेरी है. तुम मेरी प्यारी बहन हो. तुम्हें कोई तकलीफ होगी तो मुझे दर्द होगा,’’ सुशांत ने अपनी बहन नेहा को समझाते हुए कहा.

‘‘भाई मैं अब बड़ी हो गई हूं. अपना खयाल रख सकती हूं. आप परेशान न हों, आप भी तो मेरे से केवल 2 साल ही बडे़ हैं,’’ नेहा ने अपना तर्क दिया.

‘‘बहन, मैं जानता हूं कि तुम बड़ी हो चुकी हो. अपना खयाल रख सकती हो. फिर भी मैं हमेशा तुम्हारी रक्षा का वचन देता हूं. 2 साल ही सही पर हूं तो तुम से बड़ा न,’’ सुशांत ने बात को समझाने का प्रयास किया.

‘‘हां, मान गई भाई, तुम जीते और मैं हारी. अब चौकलेट मुझे दो और मुझे इस का स्वाद लेने दो,’’ भाई के तर्क के आगे हार मानते हुए नेहा ने कहा.

इस तरह की जिम्मेदारी भरी नोकझोंक हर घर में भाईबहन के बीच होती ही रहती है. यह नोकझोंक आज की नहीं है. हर पीढ़ी के बीच होती रही है. नई पीढ़ी की बहन को लगता है कि वह बहुत बड़ी, समझदार और जिम्मेदार हो गई है और उसे भाई की मदद की जरूरत नहीं रह गई है. इस के विपरीत भाई को यह लगता है कि उस की बहन अभी मासूम, छोटी सी गुडि़या है, जिसे समाज में अच्छेबुरे का पता नहीं है. ऐसे में वह परेशान हो सकती है.

कई बार बड़ी होती बहन को लगता है कि सुरक्षा के नाम पर भाई या परिवार के दूसरे लोग उस की आजादी में बाधक हैं. असल में यही वह सोच है जो बहन को समझनी चाहिए. भाई या परिवार का कोई सदस्य उस की आजादी में बाधक नहीं होता. वह यह जरूर चाहता है कि लड़की के दामन पर कोई दाग न लगे, जो जीवन भर उसे परेशान करता रहे.

भावनात्मक सुरक्षा भी जरूरी

जब हम बहन की सुरक्षा की बात करते हैं तो केवल शारीरिक सुरक्षा ही मुद्दा नहीं होता बल्कि बहन की शारीरिक सुरक्षा के साथ ही साथ उस की भावनात्मक सुरक्षा भी जरूरी होती है. बड़ी होती बहन के दोस्तों में केवल लड़कियां ही नहीं होतीं लड़के भी होते हैं. इन दोस्तों में कई मासूमियत का लाभ उठाने के प्रयास में रहते हैं. बहन को लगता है कि सुरक्षा के नाम पर उस की आजादी को रोका जा रहा है. ऐसे में कई बार वह ऐसी बातों को छिपा जाती है, जो उस की सुरक्षा के लिए जरूरी होती हैं. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि बहन के साथ भाई भावनात्मक रूप से जुड़ा रहे. भाई और बहन के बीच उम्र का अंतर काफी कम होता है. इसलिए बहन और भाई की सोच एकजैसी होती है. कई बार बहन अपने मातापिता को कई बातें नहीं बताती पर अपने भाई को बता देती है.

मनोविज्ञानी डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘यहां पर भाई की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. वह बहन के साथ इमोशनली ऐसे व्यवहार रखे जिस से बहन हर बात उस को बताती रहे. ज्यादातर परेशानियां वहीं से शुरू होती हैं जब बच्चे अपनी बातें छिपाना शुरू करते हैं. यह केवल बहनें ही नहीं भाई भी करते हैं. जब भाई अपनी बातें बहन को बताएगा तो बहन भी उसे अपनी बातें बताने में संकोच नहीं करेगी. जरूरत इस बात की है कि बहन और भाई के बीच रिश्ता दोस्ताना भी बना रहे. अगर भाई पेरैंट्स की तरह बहन से व्यवहार करेगा तो वह बात को छिपा सकती है. दोस्त की तरह भाई संबंध रखेगा तो परेशानी नहीं आएगी. भाई को शारीरिक सुरक्षा के साथ बहन को भावनात्मक सुरक्षा भी देनी चाहिए.’’

सोच बदलने की जरूरत

लड़की और लड़के के बीच समाज एक तरह का फर्क करता है, जिस की वजह से कुछ बातें भाई के लिए उतनी बुरी नहीं समझी जातीं जितनी बहन के लिए समझी जाती हैं. इस बात को समझने के लिए देखें तो भाई की गर्लफ्रैंड को ले कर उतना हंगामा नहीं होता जितना बहन के बौयफ्रैंड को ले कर होता है.

आज जब महिला अधिकारों की बात हो रही है तो बहन भी अपने लिए भाई जैसे अधिकार चाहती है. समाज भाई की गलतियों को उस तरह से नहीं लेता जिस तरह से बहन की गलतियों को लेता है. यह समाज की एक तरह की पुरुषवादी मानसिकता है. यही वजह है कि केवल भाई ही नहीं पेरैंट्स भी बेटी को ले कर बेटे से अधिक सचेत रहते हैं. इस बात से ही लड़कियों का मतभेद होता है. वे इस सोच में भाईबहन के सामाजिक अधिकार के अंतर को ले कर विद्रोही हो जाती हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता विनीता ग्रेवाल कहती हैं, ‘‘लड़कियों के भोलेपन का लाभ उठाने वाला पुरुषवर्ग ही होता है. इस में कई बार करीबी रिश्तेदार तक शामिल होते हैं. जरूरत इस बात की है कि लड़कियों को भी यह समझाया जाए कि वे सही और गलत के फर्क को समझ सकें. हमारे समाज में सैक्स की चर्चा पूरी तरह से बेमानी मानी जाती है ़ऐसे में सैक्स को ले कर लड़कियां जागरूक नहीं होतीं, यह बात उन के लिए मुसीबत का सबब बनती है. सैक्स संबंधों को ले कर ज्यादातर लड़कियां इमोशनली ठगी जाती हैं, जिस का प्रभाव केवल उन के  जीवन पर ही नहीं पड़ता बल्कि परिवार पर भी पड़ता है. समाज सीधे सवाल करता है कि लड़की की सुरक्षा का परिवार वालों ने खयाल नहीं रखा. इस वजह से पेरैंट्स और भाई कुछ ज्यादा ही परेशान रहते हैं. अपनी आजादी के साथ लड़कियों को इस तर्क को सामने रख कर सोचना चाहिए, जिस से विद्रोह जैसे हालात से बचा जा सकता है.’’

खुद बनें मजबूत

समय बदल रहा है. आज लड़की को लड़के जैसे अधिकार हासिल हैं. वह भी पढ़ाई, कोचिंग, शौपिंग के लिए खुद ही जाना चाहती है. कई घरों में लड़कियों के भाई नहीं हैं, केवल पेरैंट्स ही हैं. ऐसे में हर जगह बहन की सुरक्षा में भाई नहीं मौजूद रह सकता. तब लड़कियों को खुद ही मजबूत बनना पडे़गा. केवल मानसिक  रूप से ही नहीं शारीरिक रूप से भी उसे मजबूत रहना है. यही नहीं कानून ने जो अधिकार उसे दिए हैं वे भी उसे पता होने चाहिए, जिस से पुलिस और प्रशासन से अपने लिए मदद हासिल कर सके. आज सैल्फ डिफैंस के तमाम कार्यक्रम चल रहे हैं, जिन से लड़कियां अपना बचाव कर सकें. ऐसे में जरूरी है कि लड़कियां शारीरिक मेहनत करें और खुद को मजबूत बनाएं. इस के बाद वे जरूरत पड़ने पर अपना बचाव करने में सक्षम हो सकेंगी, जिस पेरैंट्स और भाई को इस बात का यकीन होता है कि लड़की अपनी सुरक्षा खुद कर सकती है तो वह चिंतामुक्त होता है.

रैड बिग्रेड संस्था लड़कियों को आत्मरक्षा के तमाम गुण सिखाती है. संस्था की संचालक ऊषा विश्वकर्मा कहती हैं, ‘‘केवल भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि लड़कियों को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग लेनी चाहिए. इस से कमजोर बौडी वाली लड़कियां भी मजबूत से मजबूत विरोधी को मात दे कर अपना बचाव कर सकती हैं. स्कूल, पेरैंट्स, सरकार और समाज को सहयोग कर के सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग को बढ़ावा देना चाहिए, जिस से लड़की मजबूत ही नहीं होगी, उस के अंदर का डर भी खत्म हो जाएगा.’’

ऊषा को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग देने के लिए कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है. वे अपने स्तर से कई तरह की वर्कशौप कर के सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग दे रही हैं.

बढ़ाएं आपसी समझदारी

बहन की सुरक्षा भाई की जिम्मेदारी होती है. ऐसे में जरूरी है कि भाईबहन के बीच आपसी समझदारी बढे़. जब दोनों के बीच आपसी समझदारी होगी तो उसे किसी भी तरह की परेशानी का अनुभव नहीं होगा. वह यह नहीं सोचेगी कि सुरक्षा के नाम पर उस की आजादी को प्रभावित किया जा रहा है. जब उस को समझाया जाएगा कि यह सुरक्षा क्यों जरूरी है, तो वह किसी बात को छिपाएगी नहीं. जब भाईबहन एकदूसरे से कुछ छिपाएंगे नहीं तो आपस में समझदारी बढ़ेगी, जिस से खुद ही सुरक्षा का एहसास होगा. सुरक्षा का यह एहसास खुद में आत्मविश्वास पैदा करेगा. आज के दौर में समाज और हालात बहुत बदल चुके हैं. ऐसे में बच्चों के बीच आपसी समझदारी जरूरी है.

अंश वैलफेयर की अध्यक्षा श्रद्धा सक्सेना कहती हैं, ‘‘बदलते दौर में भाई और बहन दोनों को समान अवसर मिले हैं. ऐेसे में जरूरी है कि वे आपसी समझदारी दिखाएं. केवल बहन पर ही नहीं अगर भाई पर भी कोई उंगली उठती है तो बहन को भी उतनी ही तकलीफ होती है. टीनएज में होने वाले क्रश का प्रभाव केवल बहन पर ही नहीं पड़ता भाई का जीवन और कैरियर भी उस से प्रभावित होता है. ऐसे में जब भाईबहन समझदारी भरा व्यवहार करते हैं आपस में बातें शेयर करते हैं तो मुसीबतों से बचे रहते हैं, कई घरपरिवार में बहन बड़ी होती है, ऐसे में वह भाई को पूरी सुरक्षा देती है. भाई केवल बहन को ही नहीं बहन भी भाई को खुश और सुरक्षित देखना चाहती है.’’

Rakhsha Bandhan 2022: ज्योति- भाग 2

‘‘हमें सुबह का नाश्ता और रात का खाना चाहिए. दिन में हम लोग औफिस में होते हैं, तो बाहर ही खा लेते हैं,’’ सुमित ने उस का ध्यान खींचा.

मनीष भी सुमित के पास आ कर खड़ा हो गया.

‘‘कितने लोगों का खाना बनेगा?’’ औरत ने सुमित से पूछा.

‘‘कुल मिला कर 3 लोगों का, हमारा एक और दोस्त है, वह अभी घर पर नहीं है.’’

औरत ने सुमित को महीने की पगार बताई और साथ ही, यह भी कि वह एक पैसा भी कम नहीं लेगी.

दोनों दोस्तों ने सवालिया निगाहों से एकदूसरे की तरफ देखा. पगार थोड़ी ज्यादा थी, मगर और चारा भी क्या था. ‘‘हमें मंजूर है,’’ सुमित ने कहा. आखिरकार खाने की परेशानी तो हल हो जाएगी.

‘‘ठीक है, मैं कल से आ जाऊंगी,’’ कहते हुए वह जाने के लिए उठी.

‘‘आप ने नाम नहीं बताया?’’ सुमित ने उसे पीछे से आवाज दी.

‘‘मेरा नाम ज्योति है,’’ कुछ सकुचा कर उस औरत ने अपना नाम बताया और चली गई.

दूसरे दिन सुबह जल्दी ही ज्योति आ गई थी. रसोई में जो कुछ भी पड़ा था, उस से उस ने नाश्ता तैयार कर दिया.

आज कई दिनों बाद सुमित और मनीष ने गरम नाश्ता खाया तो उन्हें मजा आ गया. रोहन अभी तक सो रहा था, तो उस का नाश्ता ज्योति ने ढक कर रख दिया था.

‘‘भैयाजी, राशन की कुछ चीजें लानी पड़ेंगी. शाम का खाना कैसे बनेगा? रसोई में कुछ भी नहीं है,’’ ज्योति दुपट्टे से हाथ पोंछते हुए सुमित से बोली.

सुमित ने एक कागज पर वे सारी चीजें लिख लीं जो ज्योति ने बताई थीं. शाम को औफिस से लौटता हुआ वह ले आएगा.

रोहन को अब तक इस सब के बारे में कुछ नहीं पता था. उसे जब पता चला तो उस ने अपने हिस्से के पैसे देने से साफ इनकार कर दिया. ‘‘बहुत ज्यादा पगार मांग रही है वह, इस से कम पैसों में तो हम आराम से बाहर खाना खा सकते हैं.’’

‘‘रोहन, तुम को पता है कि बाहर का खाना खाने से मेरी तबीयत खराब हो जाती है. कुछ पैसे ज्यादा देने भी पड़ रहे तो क्या हुआ, सुविधा भी तो हमें ही होगी.’’

‘‘हां, सुमित ठीक कह रहा है. घर के बने खाने की बात ही कुछ और है,’’ सुबह के नाश्ते का स्वाद अभी तक मनीष की जबान पर था.

लेकिन रोहन पर इन दलीलों का कोई असर नहीं पड़ा. वह जिद पर अड़ा रहा कि वह अपने हिस्से के पैसे नहीं देगा और अपने खाने का इंतजाम खुद कर कर लेगा.

‘‘ठीक है, जैसी तुम्हारी मरजी’’, सुमित बोला, उसे पता था रोहन अपने मन की करता है.

थोड़े ही दिनों में ज्योति ने रसोई की बागडोर संभाल ली थी. ज्योति के हाथों के बने खाने में सुमित को मां के हाथों का स्वाद महसूस होता था.

ज्योति भी उन की पसंदनापसंद का पूरा ध्यान रखती. अपने परिवार से दूर रह रहे इन लड़कों पर उसे एक तरह से ममता हो आती. अन्नपूर्णा की तरह अपने हाथों के जादू से उस ने रसोई की काया ही पलट दी थी.

कई बार औफिस की भागदौड़ से सुमित को फुरसत नहीं मिल पाती तो वह अकसर ज्योति को ही सब्जी वगैरह लाने के पैसे दे देता.

जिन घरों में वह काम करती थी, उन में से अधिकांश घरों की मालकिनें अव्वल दर्जे की कंजूस और शक्की थीं. नापतौल कर हरेक चीज का हिसाब रख कर उसे खाना पकाना होता था. सुमित या मनीष ज्योति से कभी, किसी चीज का हिसाब नहीं पूछते थे. इस बात से उस के दिल में इन लड़कों के लिए एक स्नेह का भाव आ गया था.

अपनी हलकी बीमारी में भी वह उन के लिए खाना पकाने चली आती.

एक शाम औफिस से लौटते वक्त रास्ते में सुमित की बाइक खराब हो गई. किसी तरह घसीटते हुए उस ने बाइक को मोटर गैराज तक पहुंचाया.

‘‘क्या हुआ? फिर से खराब हो गई?,’’ गैराज में काम करने वाला नौजवान शकील ग्रीस से सने हाथ अपनी शर्ट से पोंछता हुआ सुमित के पास आया.

‘‘यार, सुरेश कहां है? यह तो उस के हाथ से ही ठीक होती है, सुरेश को बुलाओ.’’

जब भी उस की बाइक धोखा दे जाती, वह गैराज के सीनियर मेकैनिक सुरेश के ही पास आता और उस के अनुभवी हाथ लगते ही बाइक दुरुस्त चलने लगती.

शकील सुरेश को बुलाने के लिए गैराज के अंदर बने छोटे से केबिन में चला गया. थोड़ी ही देर में मध्यम कदकाठी के हंसमुख चेहरे वाला सुरेश बाहर आया. ‘‘माफ कीजिए सुमित बाबू, हम जरा अपने लिए दोपहर का खाना बना रहे थे.’’

‘‘आप अपना खाना यहां गैराज में बनाते हैं? परिवार से दूर रहते हैं क्या?’’ सुमित ने हैरानी से पूछा. इस गैराज में वह कई सालों से काम कर रहा था. अपने बरसों के अनुभव और कुशलता से आज वह इस गैराज का सीनियर मेकैनिक था. ऐसी कोई गाड़ी नहीं थी जिस का मर्ज उसे न पता हो, इसलिए हर ग्राहक उसे जानता था.

‘‘अब क्या बताएं, 2 साल पहले घरवाली कैंसर की बीमारी से चल बसी. तब से यह गैराज ही हमारा घर है. कोई बालबच्चा हुआ नहीं, तो परिवार के नाम पर हम अकेले हैं. बस, कट रही है किसी तरह. लाइए, देखूं क्या माजरा है?’’

‘‘सुरेश, पिछली बार आप नहीं थे तो राजू ने कुछ पार्ट्स बदल कर बाइक ठीक कर दी थी. अब तो तुम्हें ही अपने हाथों का कमाल दिखाना पड़ेगा,’’ सुमित बोला.

सुरेश ने दाएंबाएं सब चैक किया, इंजन, कार्बोरेटर सब खंगाल डाला. चाबी घुमा कर बाइक स्टार्ट की तो घरर्रर्र की आवाज के साथ बाइक चालू हो गई.

‘‘देखो भाई, ऐसा है सुमित बाबू, अब इस को तो बेच ही डालो. कई बरस चल चुकी है. अब कितना खींचोगे? अभी कुछ पार्ट्स भी बदलने पड़ेंगे. उस में जितना पैसा खर्च करोगे उस से तो अच्छा है नई गाड़ी ले लो.’’

‘‘तुम ही कोई अच्छी सी सैकंडहैंड दिला दो,’’ सुमित बोला.

‘‘अरे यार, पुरानी से अच्छा है नईर् ले लो,’’ सुरेश हंसते हुए बोला.

‘‘बात तो तुम्हारी सही है, मगर थोड़ा बजट का चक्कर है.’’

‘‘हूं,’’ सुरेश कुछ सोचने की मुद्रा में बोला, ‘‘कोई बात नहीं, बजट की चिंता मत करो. मेरा चचेरा भाई एक डीलर के पास काम करता है. उस को बोल कर कुछ डिस्काउंट दिलवा सकता हूं, अगर आप कहो तो.’’

सुमित खिल गया, कब से सोच रहा था नई बाइक लेने के लिए. कुछ डिस्काउंट के साथ नई बाइक मिल जाए, इस से बढि़या क्या हो सकता था. उस ने सुरेश का धन्यवाद किया और नई बाइक लेने का मन बना लिया.

‘‘ठीक है सुरेश, मैं अगले ही महीने ले लूंगा नई गाड़ी. बस, आप जरा डिस्काउंट अच्छा दिलवा देना.’’

‘‘उस की फिक्र मत करो सुमित बाबू, निश्ंिचत रहो.’’

लगभग 45 वर्ष का सुरेश नेकदिल इंसान था. सुमित ने उसे सदा हंसतेमुसकराते ही देखा था. मगर वह अपनी जिंदगी में एकदम अकेला है, इस बात का इल्म उसे आज ही हुआ.

इधर कुछ दिनों से रोहन बहुत परेशान था. औफिस में उस के साथ हो रहे भेदभाव ने उस की नींद उड़ा रखी थी. रोहन के वरिष्ठ मैनेजर ने रोहन के पद पर अपने किसी रिश्तेदार को रख लिया था और रोहन को दूसरा काम दे दिया गया जिस का न तो उसे खास अनुभव था न ही उस का मन उस काम में लग रहा था. अपने साथ हुई इस नाइंसाफी की शिकायत उस ने बड़े अधिकारियों से की, लेकिन उस की बातों को अनसुना कर दिया गया. नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह उस की शिकायतें दब कर रह गई थीं. आखिरकार, तंग आ कर उस ने नौकरी छोड़ दी.

Rakhsha Bandhan 2022: ज्योति- भाग 3

दूसरी नौकरी की तलाश में सुबह का निकला रोहन देरशाम ही घर लौट पाता था. उस का दिनभर दफ्तरों के चक्कर लगाने में गुजर जाता. मगर नई नौकरी मिलना आसान नहीं था. कहीं मनमुताबिक तनख्वाह नहीं मिल रही थी तो कहीं काम उस की योग्यता के मुताबिक नहीं था. जिंदगी की कड़वी हकीकत जेब में पड़ी डिगरियों को मुंह चिढ़ा रही थी.

सुमित और मनीष ने रोहन की मदद करने के लिए अपने स्तर पर कोशिश की, मगर बात कहीं बन नहीं पा रही थी.

एक के बाद एक इंटरव्यू देदे कर रोहन का सब्र जवाब देने लगा था. अपने भविष्य की चिंता में उस का शरीर सूख कर कांटा हो चला था. पास में जो कुछ जमा पूंजी थी वह भी कब तक टिकती, 2 महीने से तो वह अपने हिस्से का किराया भी नहीं दे पा रहा था.

सुमित और मनीष उस की स्थिति समझ कर उसे कुछ कहते नहीं थे. मगर यों भी कब तक चलता.

सुबह का भूखाप्यासा रोहन एक दिन शाम को जब घर आया तो सारा बदन तप रहा था. उस के होंठ सूख रहे थे. उसे महसूस हुआ मानो शरीर में जान ही नहीं बची. ज्योति उसे कई दिनों से इस हालत में देख रही थी. इस वक्त वह शाम के खाने की तैयारी में जुटी थी. रोहन सुधबुध भुला कर मय जूते के बिस्तर पर निढाल पड़ गया.

ज्योति ने पास जा कर उस का माथा छुआ. रोहन को बहुत तेज बुखार था. वह पानी ले कर आई. उस ने रोहन को जरा सहारा दे कर उठाया और पानी का गिलास उस के मुंह से लगाया. ‘‘क्या हाल बना लिया है भैया आप ने अपना?’’

‘‘ज्योति, फ्रिज में दवाइयां रखी हैं, जरा मुझे ला कर दे दो,’’ अस्फुट स्वर में रोहन ने कहा.

दवाई खा कर रोहन फिर से लेट गया. सुबह से पेट में कुछ गया नहीं था, उसे उबकाई सी महसूस हुई. ‘‘रोहन भैया, पहले कुछ खा लो, फिर सो जाना,’’ हाथ में एक तश्तरी लिए ज्योति उस के पास आई.

रोहन को तकिए के सहारे बिठा कर ज्योति ने उसे चम्मच से खिचड़ी खिलाई बिलकुल किसी मां की तरह जैसे अपने बच्चों को खिलाती है.

रोहन को अपनी मां की याद आ गई. आज कई दिनों बाद उसी प्यार से किसी ने उसे खिलाया था. दूसरे दिन जब वह सो कर उठा तो उस की तबीयत में सुधार था. बुखार अब उतर चुका था, लेकिन कमजोरी की वजह से उसे चलनेफिरने में दिक्कत हो रही थी. सुमित और मनीष ने उसे कुछ दिन आराम करने की सलाह दी. साथ ही, हौसला भी बंधाया कि वह अकेला नहीं है.

ज्योति उस के लिए कभी दलिया तो कभी खिचड़ी पकाती और बड़े मनुहार से खिलाती. रोहन उसे अब दीदी बुलाने लगा था.

‘‘दीदी, आप को देने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं फिलहाल, मगर वादा करता हूं नौकरी लगते ही आप का सारा पैसा चुका दूंगा,’’ रोहन ने ज्योति से कहा.

‘‘कैसी बातें कर रहे हो रोहन भैया. आप बस, जल्दी से ठीक हो जाओ. मैं आप से पैसे नहीं लूंगी.’’

‘‘लेकिन, मुझे इस तरह मुफ्त का खाने में शर्म आती है,’’ रोहन उदास था.

‘‘भैया, मेरी एक बेटी है 10 साल की, स्कूल जाती है. मेरा सपना है कि मेरी बेटी पढ़लिख कर कुछ बने. पर मेरे पास इतना वक्त नहीं कि उसे घर पर पढ़ा सकूं और उसे ट्यूशन भेजने की मेरी हैसियत नहीं है. घर का किराया, मुन्नी के स्कूल की फीस और राशनपानी के बाद बचता ही क्या है. अगर आप मेरी बेटी को ट्यूशन पढ़ा देंगे तो बड़ी मेहरबानी होगी. आप से मैं खाना बनाने के पैसे नहीं लूंगी, समझ लूंगी वही मेरी पगार है.’’

बात तो ठीक थी. रोहन को भला क्या परेशानी होती. रोज शाम मुन्नी अब अपनी मां के साथ आने लगी. रोहन उसे दिल लगा कर पढ़ाता.

ज्योति कई घरों में काम करती थी. उस ने अपनी जानपहचान के एक बड़े साहब को रोहन का बायोडाटा दिया. रोहन को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया. मेहनती और योग्य तो वह था ही, इस बार समय ने भी उस का साथ दिया और उस की नौकरी पक्की हो गई.

सुमित और मनीष भी खुश थे. रोहन सब से ज्यादा एहसानमंद ज्योति का था. जिस निस्वार्थ भाव से ज्योति ने उस की मदद की थी, रोहन के दिल में ज्योति का स्थान अब किसी सगी बहन से कम नहीं था. ज्योति भी रोहन की कामयाबी से खुश थी, साथ ही, उस की बेटी की पढ़ाई को ले कर चिंता भी हट चुकी थी. घर में जिस तरह बड़ी बहन का सम्मान होता है, कुछ ऐसा ही अब ज्योति का सुमित और उस के दोस्तों के घर में था.

ज्योति की उपस्थिति में ही बहुत बार नेहा मनीष से मिलने घर आती थी. शुरूशुरू में मनीष को कुछ झिझक हुई, मगर ज्योति अपने काम से मतलब रखती. वह दूसरी कामवाली बाइयों की तरह इन बातों को चुगली का साधन नहीं बनाती थी.

मनीष और नेहा की एक दिन किसी बात पर तूतूमैंमैं हो गई. ज्योति उस वक्त रसोई में अपना काम कर रही थी. दोनों की बातें उसे साफसाफ सुनाई दे रही थीं.

मनीष के व्यवहार से आहत, रोती हुई नेहा वहां से चली गई. उस के जाने के बाद मनीष भी गुमसुम बैठ गया.

ज्योति आमतौर पर ऐसे मामले में नहीं पड़ती थी. वह अपने काम से काम रखती थी, मगर नेहा और मनीष को इस तरह लड़ते देख कर उस से रहा नहीं गया. उस ने मनीष से पूछा तो मनीष ने बताया कि कुछ महीनों से शादी की बात को ले कर नेहा के साथ उस की खटपट चल रही है.

‘‘लेकिन भैया, इस में गलत क्या है? कभी न कभी तो आप नेहा दीदी से शादी करेंगे ही.’’

‘‘यह शादी होनी बहुत मुश्किल है ज्योति. तुम नहीं समझोगी, मेरे घर वाले जातपांत पर बहुत यकीन करते हैं और नेहा हमारी जाति की नहीं है.’’

‘‘वैसे तो मुझे आप के मामले में बोलने का कोई हक नहीं है मनीष भैया, मगर एक बात कहना चाहती हूं.’’

मनीष ने प्रश्नात्मक ढंग से उस की तरफ देखा.

‘‘मेरी बात का बुरा मत मानिए मनीष भैया. नेहा दीदी को तो आप बहुत पहले से जानते हैं, मगर जातपांत का खयाल आप को अब आ रहा है. मैं भी एक औरत हूं. मैं समझ सकती हूं कि नेहा दीदी को कैसा लग रहा होगा जब आप ने उन्हें शादी के लिए मना किया होगा. इतना आसान नहीं होता किसी भी लड़की के लिए इतने लंबे अरसे बाद अचानक संबंध तोड़ लेना. यह समाज सिर्फ लड़की पर ही उंगली उठाता है. आप दोनों के रिश्ते की बात जान कर क्या भविष्य में उन की शादी में अड़चन नहीं आएगी? क्या नेहा दीदी और आप एकदूसरे को भूल पाएंगे? जरा इन बातों को सोच कर देखिए.

Top 10 Best Raksha Bandhan Story in Hindi: टॉप 10 बेस्ट रक्षा बंधन कहानियां हिंदी में

हर भाई- बहन को  ‘रक्षाबंधन’ का बेसब्री से इंतजार होता है. यह भाई-बहन के अटूट बंधन को दर्शाने वाला फेस्टिवल है.  भाई-बहन का रिश्ता बेहद प्यारा होता है. इस रिश्ते में इमोश्न्स के साथ-साथ कई सीक्रेट्स भी होते हैं. तो इस खास मौके पर हम आपके लिए लेकर आये हैं सरस सलिल की  टॉप 10  रक्षाबंधन स्पेशल कहानियां. अगर आप कहानियां पढ़ने के शौकिन हैं तो यहां पढ़िए Top 10 Raksha Bandhan Story in Hindi.

  1.  तृप्त मन- राजन ने कैसे बचाया बहन का घर?

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अमेरिका में स्थायी रूप से रह रहे राजन के ताऊ धर्म प्रकाश को जब खबर मिली कि उन के भतीजे राजन ने आई.टी. परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है तो उन्होंने फौरन फोन से अपने छोटे भाई चंद्र प्रकाश को कहा कि वह राजन को अमेरिका भेज दे…यहां प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षण के बाद नौकरी का बहुत अच्छा स्कोप है.

चंद्र्र प्रकाश भी तैयार हो गए और बेटे को अमेरिका के लिए पासपोर्ट, वीजा आदि बनवाने में लग गए. लेकिन उन की पत्नी सरोजनी के मन को कुछ बहुत अच्छा नहीं लगा. कुल 2 बच्चे राजन और उस से 5 साल छोटी 8वीं में पढ़ रही राशी. अब बेटा सात समुंदर पार चला जाएगा तो मां को कैसे अच्छा लगेगा. उस ने तो पति से साफ शब्दों में मना भी किया.

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2. ज्योति- क्यों सगे भाईयों से भी बढ़कर निकले वो तीनों लड़के?

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‘‘हां मां, खाना खा लिया था औफिस की कैंटीन में. तुम बेकार ही इतनी चिंता करती हो मेरी. मैं अपना खयाल रखता हूं,’’ एक हाथ से औफिस की मोटीमोटी फाइलें संभालते हुए और दूसरे हाथ में मोबाइल कान से लगाए सुमित मां को समझाने की कोशिश में जुटा हुआ था.

‘‘देख, झूठ मत बोल मुझ से. कितना दुबला गया है तू. तेरी फोटो दिखाती रहती है छुटकी फेसबुक पर. अरे, इतना भी क्या काम होता है कि खानेपीने की सुध नहीं रहती तुझे.’’ घर से दूर रह रहे बेटे के लिए मां का चिंतित होना स्वाभाविक ही था, ‘‘देख, मेरी बात मान, छुटकी को बुला ले अपने पास, बहन के आने से तेरे खानेपीने की सब चिंता मिट जाएगी. वैसे भी 12वीं पास कर लेगी इस साल, तो वहीं किसी कालेज में दाखिला मिल जाएगा,’’ मां उत्साहित होते हुए बोलीं.

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3. सत्य असत्य- क्या निशा ने कर्ण को माफ किया?

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कर्ण के एक असत्य ने सब के लिए परेशानी खड़ी कर दी. जहां इसी की वजह से हुई निशा के पिता की मौत ने उसे झकझोर कर रख दिया, वहीं खुद कर्ण पछतावे की आग में सुलगता रहा. पर निशा से क्या उसे कभी माफी मिल सकी?

घर की तामीर चाहे जैसी हो, इस में रोने की कुछ जगह रखना.’ कागज पर लिखी चंद पंक्तियां निशा के हाथ में देख मैं हंस पड़ी, ‘‘घर में रोने की जगह क्यों चाहिए?’’

‘‘तो क्या रोने के लिए घर से बाहर जाना चाहिए?’’ निशा ने हंस कर कहा.

‘‘अरे भई, क्या बिना रोए जीवन नहीं काटा जा सकता?’’

‘‘रोना भी तो जीवन का एक अनिवार्य अंग है. गीता, अगर हंसना चाहती हो तो रोने का अर्थ भी समझो. अगर मीठा पसंद है तो कड़वाहट को भी सदा याद रखो. जीत की खुशी से मन भरा पड़ा है तो यह मत भूलो, हारने वाला भी कम महत्त्व नहीं रखता. वह अगर हारता नहीं तो दूसरा जीतता कैसे?’’

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4.  दागी कंगन- क्या निहाल अपनी बहन को उस दलदल से निकाल पाया

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‘‘मुन्नी, तुम यहां पर कैसे?’’ ये शब्द कान में पड़ते ही मुन्नी ने अपनी गहरी काजल भरी निगाहों से उस शख्स को गौर से देखा और अचानक ही उस के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘निहाल भैया…’’

वह शख्स हामी भरते हुए बोला, ‘‘हां, मैं निहाल.’’

‘‘लेकिन भैया, आप यहां कैसे?’’

‘‘यही सवाल तो मैं तुम से पूछ रहा हूं कि मुन्नी तुम यहां कैसे?’’

अपनी आंखों में आए आंसुओं के सैलाब को रोकते हुए मुन्नी, जिस का असली नाम मेनका था, बोली, ‘‘जाने दीजिए भैया, क्या करेंगे आप जान कर. चलिए, मैं आप को किसी और लड़की से मिलवा देती हूं. मुझ से तो आप के लिए यह काम नहीं होगा.’’

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5. भाईदूज – राधा ने मोहन को कैसे बनाया भाई

 

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‘‘मेरे सामने तो तुम उसे राधा बहन मत बोलो. मुझे तो यह गाली की तरह लगता है,’’ मालती भड़क उठी.

‘‘अगर उस ने बिना कुछ पूछे अचानक आ कर मुझे राखी बांध दी, तो इस में मेरा क्या कुसूर? मैं ने तो उसे ऐसा करने के लिए नहीं कहा था,’’ मोहन बाबू तकरीबन गिड़गिड़ाते हुए बोले.

‘‘हांहां, इस में तुम्हारा क्या कुसूर? उस नीच जाति की राधा से तुम ने नहीं, तो क्या मैं ने ‘राधा बहन, राधा बहन’ कह कर नाता जोड़ा था. रिश्ता जोड़ा है, तो राखी तो वह बांधेगी ही.’’

‘‘उस का मन रखने के लिए मैं ने उस से राखी बंधवा भी ली, तो ऐसा कौन सा भूचाल आ गया, जो तुम इतना बिगड़ रही हो?’’

‘‘उंगली पकड़तेपकड़ते ही हाथ पकड़ते हैं ये लोग. आज राखी बांधी है, तो कल को भाईदूज पर खाना खाने भी बुलाएगी. तुम को तो जाना भी पड़ेगा. आखिर रिश्ता जो जोड़ा है. मगर, मैं तो ऐसे रिश्तों को निभा नहीं पाऊंगी,’’ मालती ने अपने मन का सारा जहर उगल दिया.

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6.  स्लीपिंग पार्टनर- मनु की नजरों में अनुपम भैया

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मनु को एक दिन पत्र मिलता है जिसे देख कर वह चौंक जाती है कि उस की भाभी यानी अनुपम भैया की पत्नी नहीं रहीं. वह भैया, जो उसे बचपन में ‘डोर कीपर’ कह कर चिढ़ाया करते थे.

पत्र पढ़ते ही मनु अतीत के गलियारे में भटकती हुई पुराने घर में जा पहुंचती है, जहां उस का बचपन बीता था, लेकिन पति दिवाकर की आवाज सुन कर वह वर्तमान में लौट आती है. वह अनुपम भैया के पत्र के बारे में दिवाकर को बताती है और फिर अतीत में खो जाती है कि उस की मौसी अपनी बेटी की शादी के लिए कुछ दिन सपरिवार रहने आ रही हैं. और सारा इंतजाम उन्हें करने को कहती हैं.

आखिर वह दिन भी आ जाता है जब मौसी आ जाती हैं. घर में आते ही वह पूरे घर का निरीक्षण करना शुरू कर देती हैं और पूरे घर की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले लेती हैं. पूरे घर में उन का हुक्म चलता है.

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7.  कड़वा फल- क्या अपनी बहन के भविष्य को संवार पाया रवि?

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अपने मम्मी पापा की शादी की 10वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में हुई भव्य पार्टी की यादें आज भी मेरे दिलोदिमाग में तरोताजा हैं. वह पार्टी लंबे समय तक हमारे परिचितों के बीच चर्चा का विषय बनी रही थी.

पार्टी क्लब में हुई थी. करीब 500 मेहमानों की आवभगत वरदीधारी वेटरों की पूरी फौज ने की थी. अपनीअपनी रुचि के अनुरूप मेहमानों ने जम कर खाया, और देर रात तक डांस करते रहे. इतने सारे गिफ्ट आए कि पापा को उन्हें कारों से घर पहुंचाने के लिए अपने 2 दोस्तों की सहायता लेनी पड़ी.

मेरे लिए वे बेहद खुशी भरे दिन थे. हम ने एक बड़े घर में कुछ महीने पहले शिफ्ट किया था. मेरी छोटी बहन शिखा और मुझे अपना अलग कमरा मिला. मम्मी ने उसे बड़े सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया था.

अपने नए दोस्तों के बीच मेरी धाक शुरू से ही जम गई. मेरी साइकिल हो या जूते, कपड़े हों या स्कूल बैग, हर चीज सब से ज्यादा कीमती और सुंदर होती.

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8.  कितने अजनबी- क्या रश्मि अपने भाई-बहन के मतभेद को खत्म कर पाई?

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हम 4 एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग एकदूसरे से इतने अजनबी कि अपनेअपने खोल में सिमटे हुए हैं.

मैं रश्मि हूं. इस घर की सब से बड़ी बेटी. मैं ने अपने जीवन के 35 वसंत देख डाले हैं. मेरे जीवन में सब कुछ सामान्य गति से ही चलता रहता यदि आज उन्होंने जीवन के इस ठहरे पानी में कंकड़ न डाला होता.

मैं सोचती हूं, क्या मिलता है लोगों को इस तरह दूसरे को परेशान करने में. मैं ने तो आज तक कभी यह जानने की जरूरत नहीं समझी कि पड़ोसी क्या कर रहे हैं. पड़ोसी तो दूर अपनी सगी भाभी क्या कर रही हैं, यह तक जानने की कोशिश नहीं की लेकिन आज मेरे मिनटमिनट का हिसाब रखा जा रहा है. मेरा कुसूर क्या है? केवल यही न कि मैं अविवाहिता हूं. क्या यह इतना बड़ा गुनाह है कि मेरे बारे में बातचीत करते हुए सब निर्मम हो जाते हैं.

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9. राखी का उपहार

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इस समय रात के 12 बज रहे हैं. सारा घर सो रहा है पर मेरी आंखों से नींद गायब है. जब मुझे नींद नहीं आई, तब मैं उठ कर बाहर आ गया. अंदर की उमस से बाहर चलती बयार बेहतर लगी, तो मैं बरामदे में रखी आरामकुरसी पर बैठ गया. वहां जब मैं ने आंखें मूंद लीं तो मेरे मन के घोड़े बेलगाम दौड़ने लगे. सच ही तो कह रही थी नेहा, आखिर मुझे अपनी व्यस्त जिंदगी में इतनी फुरसत ही कहां है कि मैं अपनी पत्नी स्वाति की तरफ देख सकूं.

‘‘भैया, मशीन बन कर रह गए हैं आप. घर को भी आप ने एक कारखाने में तबदील कर दिया है,’’ आज सुबह चाय देते वक्त मेरी बहन नेहा मुझ से उलझ पड़ी थी. ‘‘तू इन बेकार की बातों में मत उलझ. अमेरिका से 5 साल बाद लौटी है तू. घूम, मौजमस्ती कर. और सुन, मेरी गाड़ी ले जा. और हां, रक्षाबंधन पर जो भी तुझे चाहिए, प्लीज वह भी खरीद लेना और मुझ से पैसे ले लेना.’’

‘‘आप को सभी की फिक्र है पर अपने घर को आप ने कभी देखा है?’’ अचानक ही नेहा मुखर हो उठी थी, ‘‘भैया, कभी फुरसत के 2 पल निकाल कर भाभी की तरफ तो देखो. क्या उन की सूनी आंखें आप से कुछ पूछती नहीं हैं?’’

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10. बड़े भैया- क्यों स्मिता अपने भाई से डरती थी?

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बड़े भैया ने घूर कर देखा तो स्मिता सिकुड़ गई. कितनी कठिनाई से इतने दिनों तक रटा हुआ संवाद बोल पाई थी. अब बोल कर भी लग रहा था कि कुछ नहीं बोली थी. बड़े भैया से आंख मिला कर कोई बोले, ऐसा साहस घर में किसी का न था.

‘‘क्या बोला तू ने? जरा फिर से कहना,’’ बड़े भैया ने गंभीरता से कहा.

‘‘कह तो दिया एक बार,’’ स्मिता का स्वर लड़खड़ा गया.

‘‘कोई बात नहीं,’’ बड़े भैया ने संतुलित स्वर में कहा, ‘‘एक बार फिर से कह. अकसर दूसरी बार कहने से अर्थ बदल जाता है.’’

स्मिता ने नीचे देखते हुए कहा, ‘‘मुझे अनिमेष से शादी करनी है.’’

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Raksha Bandhan Special: मुंहबोले भाई से ऐसे निभाएं रिश्ता

रिश्ता मांबेटे का हो या भाईबहन का, हर रिश्ते की अपनी गरिमा होती है और मांग भी. जब कोई प्यारा सा रिश्ता हमारी अनजानी गलतियों की वजह से टूट जाता है तब हमें एहसास होता है कि शायद कहीं कोई कमी रह गई थी. ऐसे में बात जब मुंहबोले भाई की हो तो शिष्टाचार कुछ ज्यादा ही महत्त्व रखता है, क्योंकि यह रिश्ता आप बहुत सोचसमझ कर बनाते हैं. इस रिश्ते का शिष्टाचार कायम रहे इस के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखें.

मिल कर कुछ नियम बनाएं

मुंहबोले भाईबहन का रिश्ता जितना प्यार भरा है यह उतना ही नाजुक भी होता है. ऐसे में कुछ मर्यादित नियम बनाइए, जिस से शिष्टता झलके. हमेशा दूरी बना कर रखें. इस रिश्ते में ज्यादा निकटता लोगों को खटकती है. अगर आप को एकदूसरे से मिलना है तो एकदूसरे के घर में या पब्लिक प्लेस में ही मिलें. बातचीत भी ऐसी करें जिस से फूहड़ता या अश्लीलता न झलके. साथ ही समय का ध्यान जरूर रखें. हो सके तो दिन में ही मिलें.

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छोटीछोटी बातों का बुरा मत मानिए

अगर मुंहबोला भाई आप को कुछ कहता भी है जैसे कि आप ऐसा न करो, यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, इस से बात मत करो आदि तो उस की बातों का बुरा न मानें, उस से गुस्से में बात न करें, क्योंकि हर भाई अपनी बहन का खयाल रखने के लिहाज से उस से ऐसा कहता है. इस से उस के प्यार और स्नेह का पता चलता है. उस की बातों को नैगेटिव न लेते हुए उस से शिष्ट हो कर ही बात करें.

सौरी बोलना सीखिए

हर भाईबहन के बीच लड़ाईझगड़ा होता रहता है लेकिनकुछ देर बाद वे सब भूल भी जाते हैं. अगर आप से कोई गलती हो भी गई है तो सौरी बोल कर अपनी गलती मान लीजिए. ऐसा करने से आप भाई की नजर में अच्छी बहन बन जाएंगी.

कमियां मत निकालिए

अपने मुंहबोले भाई की बातबात में कमियां निकालना अच्छी बात नहीं. अगर आप उसे सचमुच अपना भाई मानती हैं तो कोई भी बात सही ढंग से समझाएं न कि गुस्से से.

अच्छे गुणों की कद्र करें

आप अपने मुंहबोले भाई के अच्छे गुणों की कद्र करें, क्योंकि हर इंसान में अच्छाई व बुराई दोनों ही होती हैं. उस की कमियों को औरों के सामने उजागर न करें.

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विश्वास जीतें

अपने मुंहबोले भाई का विश्वास जीतने की कोशिश करें. इस के लिए आप दोनों को एकदूसरे को समझना बहुत जरूरी है. बिना एकदूसरे को समझे रिश्ते को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता.

पर्सनल बातों में दखलंदाजी न करें

हर किसी की अपनी पर्सनल लाइफ होती है, ऐसे में आप कभी भी मुंहबोले भाई की पर्सनल लाइफ में बिना उस से पूछे अपनी राय न दें. हो सकता है आप का दखल उसे पसंद न हो.

इन सब बातों का ध्यान रख आप मुंहबोले भाई से शिष्ट और मधुर रिश्ता बनाए रख सकती हैं.

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Raksha Bnadhan Special: भाई को बनाएं जिम्मेदार

अर्चित 3 भाइयों में सब से छोटा होने के कारण घर में सब का लाड़ला था. यही वजह थी कि वह कुछ ज्यादा ही सिर चढ़ गया था. यदि उसे कोई काम करने को कह दिया जाता तो वह उसे पूरा नहीं करता था या फिर इतने बुरे ढंग से तब करता था जब उस की कोई वैल्यू ही नहीं रह जाती थी. शुरू में तो सभी उस की इन बातों को नजरअंदाज करते रहे, लेकिन अब वह कालेज में था और उस की इन हरकतों से परिवार वालों को सब के सामने शर्मिंदा होना पड़ता था. इसी तरह रमेश को अगर कुछ काम करने जैसे कि बिजली का बिल जमा करने या बाजार से कुछ लाने को कहो तो वह कोई न कोई बहाना बना देता था. यह समस्या लगभग हर घर में देखने को मिल जाएगी. अकसर छोटे भाईबहन लापरवाह हो जाते हैं. दरअसल, आजकल के युवा कोई जिम्मेदारी लेना ही नहीं चाहते. ऐसे ही युवा आगे चल कर हर तरह की जिम्मेदारी से भागते हैं. फिर धीरेधीरे यह उन की आदत बन जाती है. फिर वह अपने मातापिता की, औफिस की व समाज की जिम्मेदारियों से खुद को दूर कर लेते हैं. लेकिन यदि कोशिश की जाए तो उन्हें भी जिम्मेदार बनाया जा सकता है. इस के लिए बड़े भाई को ही प्रयास करना होगा, क्योंकि वह आप की बात जल्दी मानेगा.

ऐसे बनाएं भाई को जिम्मेदार    

घर की परेशानियों में शामिल करें : अकसर हम अपने छोटे भाईबहनों को घर में आने वाली छोटीमोटी परेशानियों से दूर रखते हैं. घर में आने वाली मुश्किलों की भनक तक उन्हें नहीं लगने देते. ऐसे में घर के छोटों को पता ही नहीं होता कि उन के बड़े किस समस्या से जूझ रहे हैं. बस, वे अपनी फरमाइशें पूरी करवाने में ही लगे रहते हैं. ऐसा करना ठीक नहीं है, क्योंकि इस से छोटे भाईबहन जिंदगी के अच्छे और बुरे पहलू देखने और समझने से वंचित रह जाते हैं. उन्हें भी अपनी परेशानियों में शामिल करें ताकि वे भी इन का सामना कर सकें.

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जरूरी काम भाई को भी सौंपें : भाई को भी काम करने को दें. यह न सोचें कि इस के बस का नहीं है. यह कहां करेगा, मैं तो इसे मिनटों में कर लूंगा और भाई की समझ से बाहर हो जाएगा. अगर आप ऐसे करेंगे तो भाई सीखेगा कैसे  उसे भी कुछ काम करने दें. फिर चाहे वह उसे करने में ज्यादा समय ले या फिर गलत करे, लेकिन उसे करने दें. इस तरह धीरेधीरे उसे इन कामों को करने की आदत हो जाएगी, लेकिन अगर आप उसे काम सौंपेंगे ही नहीं, तो वह करेगा कैसे

भाई को छोटा न समझें : ‘अभी तो यह छोटा है,’ अगर आप ऐसे समझते रहेंगे तो वह कभी बड़ा नहीं होगा. वैसे भी वह हमेशा आप से छोटा ही रहेगा. उसे बड़ा बनाने की जिम्मेदारी आप की ही है.

पैसे की कीमत समझाएं :  यदि भाई हर वक्त मातापिता से किसी न किसी बात की डिमांड करता रहता है और पेरैंट्स को तंग करता है तो उसे घर की आर्थिक स्थिति के बारे में बताएं. उसे बताएं कि पैसा कितनी मुश्किल से कमाया जाता है. घरखर्च में उस का भी सहयोग लें और घर का सामान आदि उस से मंगाए. जब वह अपने हाथ से खर्च करेगा तो उसे पैसे की वैल्यू पता चलेगी.

रिश्ते निभाना भी सिखाएं : छोटी बहन को राखी पर अपनी पौकेटमनी से या अपने कमाए हुए पैसे से गिफ्ट देने की आदत डालें. कभीकभी घर के छोटे बच्चों से कहें कि आज चाचा ही बच्चों को आइस्क्रीम खिला कर आएंगे. घर में आए मेहमान को भी सब के बीच बैठने को कहें और बातचीत में उसे भी शामिल करें.

खुद मिसाल बनें : आप खुद भाई के सामने मिसाल बनें. जब वह घर और बाहर का सभी काम आप को जिम्मेदारी से निभाते हुए देखेगा तो आप को अपना रोलमौडल समझने लगेगा और खुद भी आप के जैसा बनने की पूरी कोशिश करेगा. आप जो भी गुण अपने भाई में देखना चाहते हैं पहले उन्हें आप खुद में लाएं और फिर भाई को सिखाएं.

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उस के काम को आप भी टाल जाएं : अगर भाई आप का कहना नहीं मानता, कोई भी काम जिम्मेदारी से नहीं करता और आप उस की इस आदत से परेशान हैं, तो आप उसे उसी की भाषा में समझाएं. जब वह आप से या घर के किसी मैंबर से अपने किसी जरूरी काम को वक्त पर करने को कहे तो आप भी टालमटोल करें और काम समय पर न करें. इस के बाद उसे गुस्सा आएगा और उलझन होगी तब उसे प्यार से समझाएं कि जब वह खुद ऐसा करता है तो अन्य लोगों को भी ऐसी ही परेशानी होती है.

गैरजिम्मेदारी के नुकसान बताएं

–       अगर आप गैरजिम्मेदार होंगे तो लोग आप को गंभीरता से नहीं लेंगे.

–       पीठ पीछे आप के बचपने की लोग बुराइयां करेंगे.

–       मांबाप भी आप पर भरोसा करने में कतराएंगे.

–       बाहर ही नहीं घर में भी कोई आप की इज्जत नहीं करेगा.

–       एक बार यदि काम करने का समय निकल गया तो यह लौट कर दोबारा नहीं आएगा और फिर आप के हाथ सिवा पछतावे के कुछ नहीं बचेगा.

–       लड़कियां आप से दूर भागेंगी कि यह तो किसी काम का नहीं, इस से दोस्ती बढ़ा कर आगे कोई फ्यूचर नहीं है.

इन बातों का भी रखें खयाल

– अगर आप रोब दिखा कर काम करवाने की कोशिश करेंगे तो वह कोई काम नहीं करेगा इसलिए प्यार से बात करें, रोब से नहीं.

– छोटे भाईबहन पर जिम्मेदारी धीरेधीरे डालें, एकदम से सारा काम न सौंपें, क्योंकि इस से वह इरीटेट होने लगेगा.

– आप का मकसद काम निकलवाना नहीं बल्कि काम सिखाना होना चाहिए इसलिए बस आज का काम किसी तरह हो जाए इस मानसिकता के साथ काम करवाएंगे तो वह कभी नहीं सीख पाएगा.

– यदि भाई को काम करने में कोई परेशानी है और वह काम ढंग से नहीं कर पा रहा है, तो उस का हौसला बढ़ाएं. वह घबराए तो उसे समझाएं कि वह यह काम इस ढंग से कर सकता है.

– अगर वह अपनी कोई जिम्मेदारी बखूबी निभाता है, तो उस की तारीफ की जानी चाहिए. इस से उस में आगे भी अच्छा करने की इच्छा पैदा होगी.

– अगर भाई ने कोई काम अच्छा किया है, तो उस का क्रैडिट खुद न लें, बल्कि सब को बताएं कि यह भाई की अपनी मेहनत है.

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– जो जिम्मेदारी या काम आप उसे सौंपना चाहते हैं पहले उसे खुद करें ताकि आप को काम करता देख वह भी सीखे और उस काम में उस का भी मन लगे. फिर चाहे वह काम घर के छोटे बच्चों को पढ़ाने का ही क्यों न हो. जब आप उन्हें पढ़ाएंगे तो एक दिन भाई भी खुद ब खुद पढ़ाने लगेगा.

– शुरूशुरू में भाई को वही काम दें, जिस में उस का इंट्रस्ट है. जब उसे उस काम को करने में मजा आने लगे और वह अपनी जिम्मेदारी सही से निभाने लगे, तो उसे अन्य काम करने की जिम्मेदारी देना शुरू करें.

Raksha Bandhan Special: ‘सई’ से लेकर ‘इमली’ तक, सबके पास होनी चाहिए ऐसी 5 बहनें

भाई-बहन का ही एक ऐसा रिश्ता होता है, जिसमें नोक-झोक के बावजूद भी दोनों मुश्किल वक्त में एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं. इस रिश्ते की खूबसूरती को टीवी सीरियल में काफी अच्छे से दिखाया जा रहा है तो आज आपको रक्षाबंधन स्पेशल में सीरियल के ऐसे पांच फेवरेट कैरेक्टर्स बारे में बताएंगे.  जिन्हें  फैंस खूब पसंद करते हैं.  हर कोई चाहता है कि इन कैरेक्टर्स की तरह ही उनका भी रिश्ता मजबूत हो. आइए बताते हैं टीवी के पांच भाई-बहनों के बारे में जो इस रिश्ते का किरदार बखूबी निभा रहे हैं.

  1. इमली: सौतेली बहन के लिए इमली ने दी प्यार की कुर्बानी

इस सीरियल में इमली का किरदार सुम्बुल तौकीर खान निभा रही हैं. शो में दिखाया गया है कि इमली गांव की रहने वाली है. आदित्य से शादी करने के बाद वह शहर जाती है. शहर आकर इमली पढ़ाई करती है और अपनी एक नई पहचान बनाती है. लेकिन जब उसे पता चलता है आदित्य की पत्नी मालिनी उसकी बहन है, ऐसे में वह अपना हक छोड़ना चाहती है. आदित्य की पहली पत्नी होने के बावजूद भी इमली चाहती है कि उसकी बहन मालिनी को सारे अधिकार मिले और वह खुश रहे.

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2.  गुम है किसी के प्यार में: सई ने अपनी ननद के लिए उठाई आवाज

शो में सई का किरदार आयशा सिंह निभा रही हैं. वह चौहान परिवार के दिल में अपनी खास जगह बनाने में कामयाब हो रही है. शो में सई का कोई भाई नहीं है लेकिन वह अपनी ननद देवयानी और देवर मोहित का हर मोड़ पर साथ देती है, दोनों के लिए आवाज उठाती है. शो में इन दिनों दिखाया जा रहा है कि अब वह अपने सम्राट दादा के हक के लिए भी लड़ रही है. अब तो हर कोई चाहेगा कि सई जैसी बहन हो!

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3.  ससुराल सिमर का: सिमर ने भाई के लिए दांव पर लगाई अपनी जान 

अब बात करते हैं ससुराल सिमर का. इस शो में सीमर का कैरेक्टर बेहद खूबसूरती से दिखाया गया है. सीमर एक आदर्श बेटी-बहू होने के साथ-साथ एक आदर्श बहन भी है. जिसने अपनी बहन की खुशी के लिए अपनी खुशियों की कुर्बानी दे दी. सबके ताने सुनते हुए उसने आरव से शादी कर ली. इता ही नहीं वह अपने भाई का जान बचाने के लिए खुद की जान दांव पर लगा दी. तो सबको सीमर जैसी केयरिंग और प्यारी बहन चाहिए.

 

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4. अनुपमा: किंजल ने अपने देवर को माना छोटा भाई

स्टार प्लस का पॉपुलर सीरियल अनुपमा की किंजल भी एक आदर्श बहन है. हरकोई चाहता है कि बहन हो तो किंजल जैसी. जो प्यारी हो और सबका ख्याल रखती है. किंजल मॉडर्न होते हुए भी अपने रिश्ते और परंपरा को नहीं भूलती है. शो में समर के साथ किंजल का रिश्ता है, वो तो बहुत प्यारा है. वह अपने देवर समर को छोटे भाई जैसा ट्रिट करती है. हर कोई चाहता है कि  किंजल और समर जैसा भाई-बहन का रिश्ता हो.

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 5. उड़ारिया: तेजो ने धोखेबाज बहन का भी दिया साथ

अब बात करते है तोजो यानी प्रियंका चौधरी की. कलर्स का मशहूर सीरियल उड़ारिया में प्रियंका चौधरी तेजो का  किरदार निभा रही हैं. शो में तेजो का कैरेक्टर बेहद प्यारा है. तेजो जिस तरह से अपने परिवार और भाई-बहन के हमेश लिए खड़ी रहती है, वह एक मिशाल है. तेजो की बहन ही उसे पीठ पिछे धोखा देती है लेकिन वह अपनी बहन का साथ कभी नहीं छोड़ती.

 

टीवी के ये कैरेक्टर्स बहुत ही प्यारे हैं. हर कोई चाहता है कि उनकी जिंदगी में इसी तरह की बहनें हो. हमारी तरफ से आप सभी को हैप्पी रक्षाबंधन.

Rakhsha Bandhan Special: बहन की स्वतंत्रता में बाधक न बनें

हम बात सगे भाईबहनों की नहीं कर रहे बल्कि उस प्यारे से रिश्ते की कर रहे हैं, जिसे दुनिया वालों की नजरों में मुंहबोले भाईबहन कहते हैं. लेकिन सच तो यह है कि इस की गहराई किसी भी सगे भाईबहन से कम नहीं होती. इस में परेशानी तब आती है जब यह रिश्ता पजेसिवपन की हद पार कर जाता है और मुंहबोला भाई अनजाने में ही बहन की केयर करतेकरते उस की आजादी में खलल डालने लगता है और यह बात उन दोनों के रिश्ते पर विपरीत प्रभाव डालती है.

दुनिया की इस भीड़ में बड़े प्यार से खुद बनाए इस रिश्ते की गरिमा, सम्मान और प्यार यों ही हमेशा बना रहे इस के लिए भाई को यह ध्यान रखना होगा कि कहीं वह बहन की स्वतंत्रता में बाधक तो नहीं बन रहा. अगर ऐसा है तो यह आप दोनों के रिश्ते के लिए सही नहीं है. आइए, जानें इस रिश्ते में आजादी, केयर और प्यार ये तीनों चीजें कैसे बरकरार रखें :

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भाई बनें पिता नहीं

कई घरों में लड़कों को अलग ही अंदाज में पाला जाता है. बचपन से ही उन्हें यह सिखाया जाता है कि पूरा घर तुम से ही चलता है, इसलिए उन्हें रोब में रहने की आदत हो जाती है और वे घर पर पिता के होते हुए भी खुद को मुखिया समझने लगते हैं. खासतौर पर बहन के मामले में तो यह बहुत ज्यादा होता है. वे बहन पर रोब झाड़ते हैं यह बात गलत है. वैसे सगी बहन के मामले में आप का यह व्यवहार चल भी जाए पर मुंहबोली बहन के मामले में बोलने का आप को कोई हक नहीं है. मुंहबोली बहन से चाहे आप का रिश्ता कितना भी गहरा क्यों न हो, लेकिन परिवार के बाकी सदस्य आप को वह जगह नहीं दे सकते जो उस घर के बेटे की है. इसलिए बेवजह मुंहबोली बहन को हड़काना ठीक नहीं है. उसे पिता की तरह डांटने के बजाय एक भाई की तरह प्यार करें.

हर बात में टांग न अड़ाएं

बहन की हर छोटीबड़ी बात में टांग अड़ाने को अपनी आदत न बनाएं. बहन की कुछ बातें आप को सही लगती होंगी और कुछ गलत, लेकिन गलत बातों के लिए उसे तुरंत टोकने के बजाय मौका देख कर समझाएं. कुछ चीजें वह आप के समझाने से भी नहीं समझेगी, इसलिए उसे अपनी मनमरजी करने दें. वह खुद ही अपनी गलतियों से सीखते हुए आगे बढ़ेगी, इस में आप को बेवजह उस पर रोकटोक लगाने की जरूरत नहीं है.

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जमाने के साथ चलने दें

‘जमाना बड़ा खराब है’, जैसे डायलौग बोल कर बहन को न पकाएं. यदि जमाना खराब भी है तो आप का फर्ज बनता है कि बहन को उस जमाने के साथ चलने के लायक बनाएं. यदि आप को लगता है. कि मुंहबोली बहन की पर्सनैलिटी दबी हुई है तो आप उसे कुछ ऐसे कोर्स करवाएं जो उस की पर्सनैलिटी को निखारें, यदि उस की इंगलिश कमजोर है तो इंगलिश स्पीकिंग कोर्स करवाएं. उसे जींसस्कर्ट भी पहनने दें. अगर कालेज सभी लोग ऐसे कपड़े पहन कर आते हैं और वह खुद भी ऐसा ही चाहती है तो उसे पहनने दें, बस, उसे उस की मर्यादाएं समझा दें. उसे सीधीसादी नहीं बल्कि जमाने के साथ चलने वाली तेजतर्रार युवती बनाएं, जो अपने हर काम के लिए किसी दूसरे पर आश्रित न रहे बल्कि अपना हर काम खुद कर ले.

जासूसी न करें

बहन कहां आतीजाती है? किस के साथ घूमती है? क्या पहनती है? क्या खाती है? उस के दोस्त कौन हैं? वह फोन पर किस से बात कर रही है? उस का कोई बौयफ्रैंड तो नहीं है? इस तरह उस की जासूसी करना बंद कर दें. जिस दिन उसे पता चलेगा कि आप उस की ऐसी जासूसी करते हैं तो उस का दिल टूट जाएगा, उसे यह बात बिलकुल भी पसंद नहीं आएगी. उसे क्या, यह बात किसी और को भी पसंद नहीं आएगी. बहन की केयर करना एक हद तक तो ठीक है, लेकिन उस के लिए ओवर पजेसिव होना आप के रिश्ते में खटास पैदा कर सकता है.

विश्वास करें

अपनी मुंहबोली बहन पर विश्वास करें. वह पढ़ीलिखी युवती है. उस में भलेबुरे की समझ है. वह अपने लिए जो भी सोचेगी और करेगी वह बेहतर ही होगा. उसे अपने फैसले खुद करने दें. अगर उस का कोई बौयफ्रैंड भी है तो नाराज न हों, हो सकता है उस ने उस के साथ फ्यूचर की कुछ प्लानिंग की हो. इसी तरह अगर उस का लड़केलड़कियों का कोई बड़ा ग्रुप है और वह उस में बिजी रहती है तो इस में चिढ़ने की बात नहीं है, वे सभी उस के दोस्त हैं और वह आउटिंग के लिए उन के साथ बाहर जा रही है तो उस पर विश्वास करें. यदि उसे मदद की जरूरत होगी तो वह आप को बुला लेगी.

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बौडीगार्ड न बनें

यदि बहन लेटनाइट पार्टी में जाना चाहती है तो उस पर पाबंदी न लगाएं. अगर उस ने अपने मम्मीपापा से परमिशन ले ली है तो फिर आप को बीच में नहीं पड़ना चाहिए. हां, एक बार आप अपनी तरफ से अवश्य उसे वैन्यू पर छोड़ने के लिए औफर कर सकते हैं, लेकिन यदि वह ऐसा नहीं चाहती तो आप जिद न करें, उसे जाने दें. हो सकता है वह अपनी कुछ सहेलियों के साथ जा रही हो और आप के साथ जाने में उसे असहज लग रहा हो.

इसी तरह कालेज में भी हर वक्त उस के आगेपीछे न घूमें, अगर किसी युवक ने उसे छेड़ा है या फिर कोई गलत बात कह दी है तो उसे पहले अपने तरीके से हैंडिल कर लेने दें. हर वक्त उस का बौडीगार्ड बन कर रहना ठीक नहीं है.

आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें

बहन को यदि आगे बढ़ने का मौका मिल रहा है, जैसे कि किसी अच्छे कोर्स में उस का ऐडमिशन शहर से बाहर हो रहा है तो उसे ‘घर से दूर अकेले कैसे रहोगी’, जैसी नेगैटिव बातें कह कर न डराएं बल्कि अगर वह मना करे तो उसे और उस के पेरैंट्स को समझाएं कि यह उस के कैरियर के लिए अच्छा है. अगर उसे जौब या पढ़ाई के सिलसिले में विदेश जाने का मौका मिल रहा है तो उसे वहां जाने के लिए प्रोत्साहित करें. उसे बेवजह यहीं रह कर कुछ करने का प्रलोभन दे कर उस की स्वतंत्रता और तरक्की में बाधक न बनें.

लाइफपार्टनर चुनने की स्वतंत्रता दें

बहन से पूछें कि उसे कैसा लाइफ पार्टनर चाहिए. यदि वह किसी को पहले से ही पसंद करती है और वह युवक भी अच्छा है तो उसे अपना जीवनसाथी बनाने का बहन को पूरा अधिकार है. यह जान कर उसे डांटें नहीं, बल्कि उस के मातापिता को इस रिश्ते के लिए तैयार करने में बहन की मदद करें. अगर बहन की जिंदगी में कोई नहीं है तो भी उसे इंटरनैट, मैरिज साइट्स के जरिए दूल्हा ढूंढ़ने और पसंद करने की आजादी दें, इस के बाद वह युवक सही है या नहीं यह तहकीकात आप कर सकते हैं, लेकिन जो भी हो उस में बहन की पसंद और इच्छा शामिल हो. उसे अपना लाइफ पार्टनर अपनी पसंद से चुनने का पूरा अधिकार है.

मुंहबोली बहन के मातापिता से भी रखें संबंध

आप अपनी मुंहबोली बहन के मातापिता व उस के अन्य भाईबहनों के साथ पारिवारिक रिश्ता कायम करें. केवल बहन तक ही सीमित न रहें. इस से रिश्ते की मर्यादा बनी रहेगी.

मुंहबोले भाईबहन का रिश्ता एक पवित्र रिश्ता है, जिस की नींव एकदूसरे के विश्वास पर टिकी रहती है. इसलिए इस प्यार भरे रिश्ते की गंभीरता व मर्यादा को समझते हुए ही रिश्ता बनाएं ताकि यह रिश्ता बदनाम न होने पाए और लोग इस पर उंगली न उठाने लगें.

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बाधक बनने के नुकसान

–       हर वक्त बहन की स्वतंत्रता में बाधक बनने से वह आप से चिढ़ जाएगी और झूठ बोलना व बातें छिपाना शुरू कर देगी.

–       अपनी स्वतंत्रता हर किसी को प्यारी होती है और जब कोई हमारी स्वतंत्रता में सेंधमारी करता है तो वह हमें पसंद नहीं आता, फिर चाहे वह रिश्ता हमारे लिए कितना भी खास क्यों न हो, इस से उस में दूरी आना स्वाभाविक है.

–       जिस तरह आप उस पर रोकटोक कर रहे हैं, कल ऐसा ही व्यवहार यदि वह भी आप से करेगी, तब शायद आप को भी अच्छा नहीं लगेगा.

–       जिस आजादी की इच्छा आप अपने लिए रखते हैं, वह दूसरों को भी देने के पक्षधर बनें वरना इस से परेशानी आप को ही होगी.

–       आप एक हिटलर भाई के रूप में प्रचलित हो जाएंगे और इस से आप की पर्सनैलिटी पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा

Raksha Bandhan Special: भाई-बहन का रिश्ता बनाता है मायका, इसलिए समझें रिश्तों की अहमियत!

पता चला कि राजीव को कैंसर है. फिर देखते ही देखते 8 महीनों में उस की मृत्यु हो गई. यों अचानक अपनी गृहस्थी पर गिरे पहाड़ को अकेली शर्मिला कैसे उठा पाती? उस के दोनों भाइयों ने उसे संभालने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यहां तक कि एक भाई के एक मित्र ने शर्मिला की नन्ही बच्ची सहित उसे अपनी जिंदगी में शामिल कर लिया.

शर्मिला की मां उस की डोलती नैया को संभालने का श्रेय उस के भाइयों को देते नहीं थकती हैं, ‘‘अगर मैं अकेली होती तो रोधो कर अपनी और शर्मिला की जिंदगी बिताने पर मजबूर होती, पर इस के भाइयों ने इस का जीवन संवार दिया.’’

सोचिए, यदि शर्मिला का कोई भाईबहन न होता सिर्फ मातापिता होते, फिर चाहे घर में सब सुखसुविधाएं होतीं, किंतु क्या वे हंसीसुखी अपना शेष जीवन व्यतीत कर पाते? नहीं. एक पीड़ा सालती रहती, एक कमी खलती रहती. केवल भौतिक सुविधाओं से ही जीवन संपूर्ण नहीं होता, उसे पूरा करते हैं रिश्ते.

सूनेसूने मायके का दर्द: सावित्री जैन रोज की तरह शाम को पार्क में बैठी थीं कि रमा भी सैर करने आ गईं. अपने व्हाट्सऐप पर आए एक चुटकुले को सभी को सुनाते हुए वे मजाक करने लगीं, ‘‘कब जा रही हैं सब अपनेअपने मायके?’’

सभी खिलखिलाने लगीं पर सावित्री मायूसी भरे सुर में बोलीं, ‘‘काहे का मायका? जब तक मातापिता थे, तब तक मायका भी था. कोई भाई भाभी होते तो आज भी एक ठौरठिकाना रहता मायके का.’’

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वाकई, एकलौती संतान का मायका भी तभी तक होता है जब तक मातापिता इस दुनिया में होते हैं. उन के बाद कोई दूसरा घर नहीं होता मायके के नाम पर.

भाईभाभी से झगड़ा:

‘‘सावित्रीजी, आप को इस बात का अफसोस है कि आप के पास भाईभाभी नहीं हैं और मुझे देखो मैं ने अनर्गल बातों में आ कर अपने भैयाभाभी से झगड़ा मोल ले लिया. मायका होते हुए भी मैं ने उस के दरवाजे अपने लिए स्वयं बंद कर लिए,’’ श्रेया ने भी अपना दुख बांटते हुए कहा.

ठीक ही तो है. यदि झगड़ा हो तो रिश्ते बोझ बन जाते हैं और हम उन्हें बस ढोते रह जाते हैं. उन की मिठास तो खत्म हो गई होती है. जहां दो बरतन होते हैं, वहां उन का टकराना स्वाभाविक है, परंतु इन बातों का कितना असर रिश्तों पर पड़ने देना चाहिए, इस बात का निर्णय आप स्वयं करें.

भाईबहन का साथ:

भाई बहन का रिश्ता अनमोल होता है. दोनों एकदूसरे को भावनात्मक संबल देते हैं, दुनिया के सामने एकदूसरे का साथ देते हैं. खुद भले ही एकदूसरे की कमियां निकाल कर चिढ़ाते रहें लेकिन किसी और के बीच में बोलते ही फौरन तरफदारी पर उतर आते हैं. कभी एकदूसरे को मझधार में नहीं छोड़ते हैं. भाईबहन के झगड़े भी प्यार के झगड़े होते हैं, अधिकार की भावना के साथ होते हैं. जिस घरपरिवार में भाईबहन होते हैं, वहां त्योहार मनते रहते हैं, फिर चाहे होली हो, रक्षाबंधन या फिर ईद.

मां के बाद भाभी:

शादी के 25 वर्षों बाद भी जब मंजू अपने मायके से लौटती हैं तो एक नई स्फूर्ति के साथ. वे कहती हैं, ‘‘मेरे दोनों भैयाभाभी मुझे पलकों पर बैठाते हैं. उन्हें देख कर मैं अपने बेटे को भी यही संस्कार देती हूं कि सारी उम्र बहन का यों ही सत्कार करना. आखिर, बेटियों का मायका भैयाभाभी से ही होता है न कि लेनदेन, उपहारों से. पैसे की कमी किसे है, पर प्यार हर कोई चाहता है.’’

दूसरी तरफ मंजू की बड़ी भाभी कुसुम कहती हैं, ‘‘शादी के बाद जब मैं विदा हुई तो मेरी मां ने मुझे यह बहुत अच्छी सीख दी थी कि शादीशुदा ननदें अपने मायके के बचपन की यादों को समेटने आती हैं. जिस घरआंगन में पलीबढ़ीं, वहां से कुछ लेने नहीं आती हैं, अपितु अपना बचपन दोहराने आती हैं. कितना अच्छा लगता है जब भाईबहन संग बैठ कर बचपन की यादों पर खिलखिलाते हैं.’’

मातापिता के अकेलेपन की चिंता:

नौकरीपेशा सीमा की बेटी विश्वविद्यालय की पढ़ाई हेतु दूसरे शहर चली गई. सीमा कई दिनों तक अकेलेपन के कारण अवसाद में घिरी रहीं. वे कहती हैं, ‘‘काश, मेरे एक बच्चा और होता तो यों अचानक मैं अकेली न हो जाती. पहले एक संतान जाती, फिर मैं अपने को धीरेधीरे स्थिति अनुसार ढाल लेती. दूसरे के जाने पर मुझे इतनी पीड़ा नहीं होती. एकसाथ मेरा घर खाली नहीं हो जाता.’’

एकलौती बेटी को शादी के बाद अपने मातापिता की चिंता रहना स्वाभाविक है. जहां भाई मातापिता के साथ रहता हो, वहां इस चिंता का लेशमात्र भी बहन को नहीं छू सकता. वैसे आज के जमाने में नौकरी के कारण कम ही लड़के अपने मातापिता के साथ रह पाते हैं. किंतु अगर भाई दूर रहता है, तो भी जरूरत पर पहुंचेगा अवश्य. बहन भी पहुंचेगी परंतु मानसिक स्तर पर थोड़ी फ्री रहेगी और अपनी गृहस्थी देखते हुए आ पाएगी.

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पति या ससुराल में विवाद:

सोनम की शादी के कुछ माह बाद ही पतिपत्नी में सासससुर को ले कर झगड़े शुरू हो गए. सोनम नौकरीपेशा थी और घर की पूरी जिम्मेदारी भी संभालना उसे कठिन लग रहा था. किंतु ससुराल का वातावरण ऐसा था कि गिरीश उस की जरा भी सहायता करता तो मातापिता के ताने सुनता. इसी डर से वह सोनम की कोई मदद नहीं करता.

मायके आते ही भाई ने सोनम की हंसी के पीछे छिपी परेशानी भांप ली. बहुत सोचविचार कर उस ने गिरीश से बात करने का निर्णय किया. दोनों घर से बाहर मिले, दिल की बातें कहीं और एक सार्थक निर्णय पर पहुंच गए. जरा सी हिम्मत दिखा कर गिरीश ने मातापिता को समझा दिया कि नौकरीपेशा बहू से पुरातन समय की अपेक्षाएं रखना अन्याय है. उस की मदद करने से घर का काम भी आसानी से होता रहेगा और माहौल भी सकारात्मक रहेगा.

पुणे विश्वविद्यालय के एक कालेज की निदेशक डा. सारिका शर्मा कहती हैं, ‘‘मुझे विश्वास है कि यदि जीवन में किसी उलझन का सामना करना पड़ा तो मेरा भाई वह पहला इंसान होगा जिसे मैं अपनी परेशानी बताऊंगी. वैसे तो मायके में मांबाप भी हैं, लेकिन उन की उम्र में उन्हें परेशान करना ठीक नहीं. फिर उन की पीढ़ी आज की समस्याएं नहीं समझ सकती. भाई या भाभी आसानी से मेरी बात समझते हैं.’’

भाईभाभी से कैसे निभा कर रखें:

भाईबहन का रिश्ता अनमोल होता है. उसे निभाने का प्रयास सारी उम्र किया जाना चाहिए. भाभी के आने के बाद स्थिति थोड़ी बदल जाती है. मगर दोनों चाहें तो इस रिश्ते में कभी खटास न आए.

सारिका कितनी अच्छी सीख देती हैं, ‘‘भाईभाभी चाहे छोटे हों, उन्हें प्यार देने व इज्जत देने से ही रिश्ते की प्रगाढ़ता बनी रहती है नाकि पिछले जमाने की ननदों वाले नखरे दिखाने से. मैं साल भर अपनी भाभी की पसंद की छोटीबड़ी चीजें जमा करती हूं और मिलने पर उन्हें प्रेम से देती हूं. मायके में तनावमुक्त माहौल बनाए रखना एक बेटी की भी जिम्मेदारी है. मायके जाने पर मिलजुल कर घर के काम करने से मेहमानों का आना भाभी को अखरता नहीं और प्यार भी बना रहता है.’’

ये आसान सी बातें इस रिश्ते की प्रगाढ़ता बनाए रखेंगी:

– भैयाभाभी या अपनी मां और भाभी के बीच में न बोलिए. पतिपत्नी और सासबहू का रिश्ता घरेलू होता है और शादी के बाद बहन दूसरे घर की हो जाती है. उन्हें आपस में तालमेल बैठाने दें. हो सकता है जो बात आप को अखर रही हो, वह उन्हें इतनी न अखर रही हो.

– यदि मायके में कोई छोटामोटा झगड़ा या मनमुटाव हो गया है तब भी जब तक आप से बीचबचाव करने को न कहा जाए, आप बीच में न बोलें. आप का रिश्ता अपनी जगह है, आप उसे ही बनाए रखें.

– यदि आप को बीच में बोलना ही पड़े तो मधुरता से कहें. जब आप की राय मांगी जाए या फिर कोई रिश्ता टूटने के कगार पर हो, तो शांति व धैर्य के सथ जो गलत लगे उसे समझाएं.

– आप का अपने मायके की घरेलू बातों से बाहर रहना ही उचित है. किस ने चाय बनाई, किस ने गीले कपड़े सुखाए, ऐसी छोटीछोटी बातों में अपनी राय देने से ही अनर्गल खटपट होने की शुरुआत हो जाती है.

– जब तक आप से किसी सिलसिले में राय न मांगी जाए, न दें. उन्हें कहां खर्चना है, कहां घूमने जाना है, ऐसे निर्णय उन्हें स्वयं लेने दें.

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– न अपनी मां से भाभी की और न ही भाभी से मां की चुगली सुनें. साफ कह दें कि मेरे लिए दोनों रिश्ते अनमोल हैं. मैं बीच में नहीं बोल सकती. यह आप दोनों सासबहू आपस में निबटा लें.

– आप चाहे छोटी बहन हों या बड़ी, भतीजोंभतीजियों हेतु उपहार अवश्य ले जाएं. जरूरी नहीं कि महंगे उपहार ही ले जाएं. अपनी सामर्थ्यनुसार उन के लिए कुछ उपयोगी वस्तु या कुछ ऐसा जो उन की उम्र के बच्चों को भाए, ले जाएं.

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