Hindi Story: दलदल

Hindi Story: मोहनलाल की जब बैंक में नौकरी लगी, तो उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उसे बैंक की शेखपुर ग्रामीण ब्रांच में पहली पोस्टिंग मिली. शहर में पलेबढ़े मोहनलाल को शेखपुर गांव की जिंदगी रास नहीं आई, पर गांव से शहर की किसी ब्रांच में तबादला कराना आसान नहीं था, इसलिए वह चाहते हुए भी गांव में रहने के लिए मजबूर था, जहां बिजली, सड़कें, अच्छे घर और दूसरी बुनियादी जरूरतों की कमी थी. बैंक में नौकरी मिलने के एक साल बाद ही मोहनलाल की शादी मोनिका से हो गई. मोनिका बहुत खूबसूरत थी और उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी.

शादी के बाद वह 2 महीने तक मोहनलाल के मातापिता के साथ रही और फिर उस के साथ शेखपुर गांव चली गई. मोनिका को शेखपुर गांव में रहना सजा काटने के बराबर लगा, पर बिना पति के साथ के रात काट पाना भी उस के लिए आसान नहीं था. वह मजबूर हो कर गांव में एकएक दिन काट रही थी और पति से अपना तबादला किसी शहरी ब्रांच में कराने की जिद कर रही थी. मोहनलाल ने उसे समझाया कि बैंक के जितने मुलाजिम गांव की ब्रांचों में काम करते हैं, उन में से आधे से ज्यादा लोग अपना तबादला किसी शहरी ब्रांच में कराना चाहते हैं, इसलिए तबादले के लिए दी गई अर्जियों पर बैंक कोई ध्यान नहीं देता और यूनियन के नेता भी ऐसे तबादलों के केस अपने हाथ में नहीं लेते.

मोहनलाल ने मोनिका को यह भी बताया कि उस की तो अभी 2 साल की ही नौकरी हुई है, यहां तो 10-12 साल से लोग लगे हैं और अभी तक उन की अर्जियों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई. मोनिका के बारबार पूछने पर मोहनलाल ने बताया कि अगर जोनल मैनेजर चाहें, तो उस का तबादला शहर में हो सकता है. मोनिका जिद कर के मोहनलाल के साथ जोनल मैनेजर से मिलने उन के घर पहुंच गई. जोनल मैनेजर नरेश को जब मालूम हुआ कि मोहनलाल बैंक की शेखपुर ब्रांच में क्लर्क है, तो उन्हें उस का बिना इजाजत के घर आना बुरा लगा, पर मोनिका ने लपक कर उन के पैर छू लिए. जोनल मैनेजर नरेश ने एक निगाह मोनिका पर डाली, तो उस के तीखे नाकनक्श और कसी हुईर् देह देख कर उन के तेवर ढीले पड़ गए.

मोनिका को आशीर्वाद देने के बहाने वे देर तक उस की नंगी पीठ सहलाते रहे. मोनिका भी निगाह नीची किए उन से सटी मुसकराती रही. नरेश उन दोनों को घर के अंदर ले गए और नौकर से चाय लाने के लिए कहा. इस बीच मोनिका ने मोहनलाल के तबादले के लिए उन से गुजारिश की, जिसे नरेश ने उस की खूबसूरत देह को ललचाई नजर से घूरते हुए मान लिया. मोहनलाल चुपचाप जमीन पर नजर गड़ाए बैठा रहा. जब वे लोग लौटने लगे, तो मोनिका ने जबरन नरेश के फिर से पैर छू लिए. इस घटना के 15 दिन बाद जोनल मैनेजर नरेश शेखपुर ब्रांच का दौरा करने आए और रात को शेखपुर के डाक बंगले में रुकने का इंतजाम करने के लिए ब्रांच मैनेजर को निर्देश दिया. बैंक मैनेजर ने उन के रुकने का सारा इंतजाम करा दिया.

शाम को मोहनलाल बैंक से घर आया, तो उस ने नरेश के शेखपुर गांव आने की बात मोनिका को बताई. मोनिका ने मोहनलाल से कहा कि नरेशजी को डिनर के लिए अपने घर बुला लो. मोहनलाल ने ऐसा ही किया, जिसे नरेश ने बिना किसी नानुकर के मान लिया. साथ ही शराब पीने का इंतजाम रखने का इशारा भी किया. उन्होंने उस से यह भी कहा कि वे रात को 9 बजे डाक बंगले पर पहुंच जाए. रात के 9 बजे मोहनलाल जब डाक बंगले पर पहुंचा, तो नरेशजी उस का इंतजार कर रहे थे. उन्हें ले कर मोहनलाल घर पहुंचा, तो सजीधजी मोनिका ने दरवाजे पर उन का स्वागत किया. फिर शराब का दौर चला. शुरू में
तो मोहनलाल झिझका, मगर 2 पैग पीने के बाद ही वह खुल गया. इस के बाद नरेशजी के इशारा करने पर
उस ने मोनिका को भी जबरदस्ती पैग पिला दिया.

जब नरेशजी मस्ती में गए, तो डिनर हुआ. इस के बाद नरेशजी ने सिगरेट पीने की फरमाइश की. मोहनलाल सिगरेट लेने बाजार की ओर भागा. इस बीच नरेशजी ने मोनिका की कमर में हाथ डाल दिया और उस की मांसल देह को सहलाने लगे. जब मोनिका ने उन की इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया, तो उन की हिम्मत बढ़ गई. उन्होंने उसे खींच कर अपनी गोद में बैठा लिया और उन के हाथ तेजी से मोनिका की देह पर फिसलने लगे. कुछ ही देर में मोनिका के हाथ भी नरेशजी की देह में कुछ खोजने लगे.
जल्दी ही नरेशजी ने उसे उठा कर पलंग पर लिटा दिया. जब तक मोहनलाल लौटा, तब तक वे हलके हो कर कुरसी पर बैठ चुके थे. पर उन की तेज चल रही सांसों और मोनिका के गालों पर दांत के हलके निशान बीती हुई घटना की चुगली मोहनलाल से कर रहे थे.

मोहनलाल कुछ उदास हो गया, पर चलते समय जब नरेशजी ने उसे छाती से लगा कर कहा कि आज से तुम मेरे भाई जैसे हो, तो उस का दिल बल्लियों उछलने लगा. नरेशजी ने जाते ही मोहनलाल के तबादले का आदेश जारी कर दिया. मोहनलाल और मोनिका अपने शहर के तबादले पर बेहद खुश थे. अब नरेशजी अकसर उस के घर आने लगे. शहर में मोहनलाल को बहुतकुछ मिला. उन के घर बेटी पैदा हुई और प्रमोशन में अफसर का पद भी मिल गया. हां, प्रमोशन के लिए मोहनलाल को कई बार नरेशजी को डिनर के लिए अपने घर बुलाना पड़ा था और डिनर के बाद घर में सिगरेट होते हुए भी मोनिका के इशारे पर सिगरेट लाने के लिए उसे रात के 10-11 बजे के बाद बाजार जाना पड़ा था. एक चतुर खिलाड़ी की तरह
मोनिका ने मोहनलाल और नरेशजी दोनों को अपने इशारों पर नचाना शुरू कर दिया.

कुछ ही महीने बाद नरेशजी की पोस्टिंग दूसरे शहर में हो गई, पर मोनिका लगातार उन से मिलती रही और अपने पति के प्रमोशन और शहरी ब्रांचों में नियुक्ति का इंतजाम कराती रही. बदले में वह नरेशजी की खुल कर सेवा करती रही. मोहनलाल ने भी हालात से समझौता कर लिया था. 4 साल बाद नरेशजी दोबारा तबादला हो कर मोहनलाल के शहर में गए. अब उन की मेहरबानियां खुल कर मोनिका पर बरस रही थीं. यहां तक कि उन्होंने कई बड़े कर्ज भी उन के लिए मंजूर किए थे. मोहनलाल के पास शहर में 2-2 मकान, बढि़या गाड़ी, नौकरचाकर सबकुछ था. उस के पुराने साथी अब भी बैंक में बाबू और बड़े बाबू के पद पर थे, जबकि वह मैनेजर बन गया था. मोहनलाल की बेटी चेतना ने 12वीं जमात का इम्तिहान सैकंड डिविजन में पास किया, तो कालेज में दाखिला लेने के लिए किसी यूनिवर्सिटी में बात नहीं बनी.

मजबूरन मोनिका को नरेशजी का सहारा लेना पड़ा और देखते ही देखते उस की बेटी को शहर के अच्छे कालेज में दाखिला मिल गया. मोनिका के कहने पर नरेशजी ने दोपहर में उस के घर आना शुरू कर दिया.
ऐसे ही एक दिन जब नरेशजी मोनिका के घर में थे, तो कालेज में एक लड़की की मौत होने की वजह से जल्दी छुट्टी हो गई और मोनिका की बेटी चेतना 12 बजे ही घर पहुंच गई. घर का बाहरी दरवाजा खुला था.
चेतना ने बैग ड्राइंगरूम में रखा और फ्रिज से पानी की बोतल निकालने लगी, तभी उसे अपनी मां की चीख सुनाई दी. उस ने खिड़की से छिप कर देखा, तो दंग रह गई. कुछ देर बाद मोनिका और नरेशजी जब कमरे से बाहर निकले, तो चेतना को ड्राइंगरूम में देख कर सकपका गए. नरेशजी बिना कुछ बोले ही बाहर निकल गए और मोनिका ने खुद को घरेलू कामों में मसरूफ कर लिया.

एक दिन मोहनलाल घर लौट रहा था. रास्ते में उस ने देखा कि एक अधेड़ शख्स स्कूटर चला रहा था और चेतना उस के पीछे बैठी थी. वह अपने दोनों हाथों से उस अधेड़ शख्स को जकड़े हुए थी. शाम को घर कर मोहनलाल ने यह बात मोनिका को बताई. मोनिका ने अकेले में चेतना से पूछा, ‘‘आज तुम दोपहर में किस के साथ स्कूटर पर जा रही थीं?’’ चेतना ने बताया कि वह बायोलौजी पढ़ाने वाले सर के साथ थी.
इस पर मोनिका ने पूछा, ‘‘तुम उन के साथ कहां गई थीं?’’
‘‘फिल्म देखने.’’
‘‘क्यों? तुम टीचर के साथ फिल्म देखने क्यों गई थीं?’’
‘‘अरे मां, 30 नंबर का प्रैक्टिकल होता है. अगर सर खुश हो गए, तो 30 में से पूरे 30 नंबर भी दे सकते

हैं. अगर वे चाहें, तो कैमिस्ट्री और फिजिक्स के टीचरों से भी प्रैक्टिकल में अच्छे नंबर दिला सकते हैं.’’
‘‘तो प्रैक्टिकल में अच्छे नंबर पाने के लिए तुम अपनी इज्जत लुटा दोगी?’’ मोनिका ने चीखते हुए कहा.
‘‘क्यों मां, इस में बुराई क्या है? आखिर आप भी तो मनचाही चीजें पाने के लिए यही करती हैं,’’ चेतना ने मां को घूरते हुए कहा.
यह सुन कर मोनिका के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उस का मुंह खुला का खुला रह गया.
बैडरूम में चुपचाप बैठे मांबेटी की बात सुन रहे मोहनलाल का हाल भी कुछ ऐसा ही था. वे दोनों अपने ही
बनाए गए दलदल में छटपटाने के लिए मजबूर थे.                             

डा. जीके शर्मा

Social Story: गौसेवा के नाम पर हिंसा और चंदा वसूली

Social Story: पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो देश में गौरक्षा के नाम पर कुछ संगठनों द्वारा हिंसक वारदात को अंजाम दिया जा रहा है, जो चिंता की बात है. अमूमन इन वारदात में मुख्य रूप से मुसलिम ट्रक चालकों और व्यापारियों को निशाना बनाया गया है. ये हिंसक वारदात मवेशी तस्करी या अवैध वध को रोकने के बहाने की गई हैं. हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, जम्मूकश्मीर और कर्नाटक सहित कई राज्यों में इन हमलों ने गौरक्षक समूहों द्वारा किए जा रहे हमलों में स्थानीय अधिकारियों, विशेष रूप से पुलिस की भूमिका भी गैरजिम्मेदाराना रही है.
भारत में जिस तरह से हिंदूमुसलिम को बांटने की राजनीति चल रही है,

उस में विभिन्न राज्यों में मुसलिमों के खिलाफ हिंसक हमलों की लहर सी चल रही है. गौरक्षा के नाम पर सक्रिय समूहों ने कानून को अपने हाथ में ले लिया है और गायों की तस्करी या वध के आरोपी मुसलिमों को निशाना बना रहे हैं. ऐसा नहीं है कि गायों की तस्करी और अवैध परिवहन में केवल मुसलिम समाज ही शामिल है, बल्कि हिंदू धर्म के लोग खुद को गाय का हिमायती बता कर सब से ज्यादा गौवंश की तस्करी में शामिल पाए जाते हैं. गौरक्षा दल और दक्षिणपंथी संगठनों के अन्य गौसंरक्षण संगठन के लोग कानून की परवाह किए बिना काम कर रहे हैं. पीडि़त, जो अकसर मवेशी या संबंधित उत्पादों के परिवहन में शामिल मुसलिम होते हैं, अनुचित हमले और धमकियों का शिकार हो रहे हैं.

मध्य प्रदेश के कई छोटे बड़े शहरों में सभी तरह की दुकानों पर गाय की आकृति वाली प्लास्टिक की चंदा जमा करने वाली गुल्लक रखी हुई हैं, जिन में दुकान पर आने वाले ग्राहक चंदे के नाम पर कुछ राशि डालते हैं. ग्राहकों को बताया जाता है कि कमजोर और आवारा गाय को सहारा देने के लिए गौशालाएं पैसा खर्च कर रही हैं, जबकि हकीकत इस से अलग है. गौशालाओं के नाम पर व्यापार किया जा रहा है. ऐसे ही एक दुकानदार से जब पूछा गया, तो उस ने बताया गया कि गौशाला चलाने वाली संस्थाओं के नुमाइंदे इन गुल्लकों को दुकान पर छोड़़ जाते हैं और एक निश्चित समय के बाद दुकान में कर उस में डले हुए रुपए निकाल कर ले जाते हैं. गौशाला चलाने वाले ज्यादातर लोग किसी राजनीतिक दल से जुड़े़ लोग होते है, जो स्वयंसेवी संस्था बना कर सरकारी अनुदान का जुगाड़़ करने में माहिर होते हैं.

सड़़को पर आवारा घूमती गायों और इन गुल्लकों को देख कर यह सवाल उठता है कि आखिर गौसेवा के नाम पर उगाहे जा रहे इस चंदे का इस्तेमाल कौन सी गायों की सेवा पर किया जाता है? हालांकि, कुछ ऐसी गौशालाएं आज भी हैं जो बिना चंदे या शासकीय अनुदान के प्रचार से कोसों दूर कमजोर और बीमार गायों की सेवा कर रही हैं. पर दर्जनों संगठन गौसेवा के नाम पर देश में हिंसा फैला रहे हैं, गौरक्षकों की टोली आएदिन सड़़कों पर गायों का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर ड्राइवर और क्लीनर से मारपीट कर उन से चौथ वसूली कर रही है और शासनप्रशासन इन लोगों को खुली छूट दे रहा है. सवाल यह भी उठता है कि गाय का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर उस के ड्राइवर से मारपीट करने वाले इन गौरक्षकों का खून सड़कों पर आवारा घूमती गाय को देख कर क्यों नहीं खोलता? गौहत्या और गौमांस के मुद्दे पर कानों सुनी बातों पर मौब लिंचिंग पर उतारू इन भक्तों की भीड़ को सोचना होगा कि वे गाय को एक तरफ तो मां का दर्जा देते हैं और फिर उन्हें इस तरह सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं.

क्यों? धार्मिक पाखंड है जिम्मेदार दरअसल, गाय की इस हालत के लिए धार्मिक पाखंड सब से ज्यादा जिम्मेदार है. कपोल कल्पित कथा पुराणों में जब यह बताया गया है कि गाय में तैंतीस करोड़ देवताओं को निवास है, तो फिर लोग गाय की पूजा करने के बजाय मंदिरों में भगवान को क्यों तलाशते फिर रहे हैं?
कपोल कल्पित कथाओं से बड़ेबड़े पंडालों में होने वाली धार्मिक कथाओं में बताया जाता है कि दान की गई इसी गाय की पूंछ पकड़ कर स्वर्ग के रास्ते में पड़ने वाली एक वैतरणी नदी को पार करना पड़ता है.
इसी पाखंड की वजह से मध्य प्रदेश की एक महिला मुख्यमंत्री तो सड़क पर अपने काफिले को रोक कर गाय को रोटी खिलाती थीं. आखिर लोगों को यह बात में क्यों नहीं आती कि गाय को हरे चारे और भूसा की जरूरत रोटी से कहीं ज्यादा है? सच बात तो यह है कि गाय सिर्फ और सिर्फ एक पालतू पशु है. धर्म के ठेकेदार पंडेपुजारी अपने फायदे के लिए गाय को दान करने का उपदेश देते हैं.

पापपुण्य का डर दिखा कर लोगों को बताया जाता है कि गौदान करने से आदमी सीधे स्वर्गलोक की टिकट पा? जाता है. सालभर में दान के नाम पर लाखों की संख्या में गायों को दान में दिया जाता है, मगर ये गायें पंडों के घरों में दिखाई नहीं देती हैं. जाहिर है कि दान में मिली गायों को पंडे व्यापारियों को बेच देते हैं या फिर दूध दुहने के बाद सड़कों पर छोड़ देते हैं. हिंदुओ में गाय को तब तक माता माना जाता है तब तक वह दूध देती है. इस के बाद उसे आवारा छोड़ दिया जाता है. गाय को माता मानने वालों का दोहरा चरित्र यह भी है कि वे अपनी बूढ़ी और बेकार गोमाता को कसाई को बेचने में भी संकोच नहीं करते हैं.
गोभक्ति का एक पक्ष यह भी है कि गोमाता के मरने पर वे उस की लाश को नहीं उठाते हैं, यहां तक कि उसे छूते भी नहीं हैं. ऐसा करने पर उन का धर्म भ्रष्ट हो जाता है, इसलिए उसे उठा कर ले जाने के लिए वे दलित बस्ती से उन लोगों को बुला कर लाते हैं, जो मरे पशुओं की खाल उतारने का काम करते हैं. यह भारत की अकेली पाखंडी कौम है, जो अपनी गोमाता को सड़़कों पर भूखा मरने के लिए छोड़़ देती है और मरने पर अपनी मां को कंधा भी नहीं देती है.

सरकारी
कोशिशें दिखावे तक सीमित सरकार गौवंश की रक्षा की बात तो करती है, पर गाय को सड़क से हटाने के लिए कोई ठोस प्रयास अभी तक नहीं कर पाई है. मध्य प्रदेश में गायें सड़कों पर मारीमारी फिर रही हैं और सरकार विदेशों से चीता ला कर उन पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रही है. मध्य प्रदेश की भगवा सरकार धर्म की दुहाई दे कर गाय को माता तो मानती है, मगर आवारा घूमती गाय की बेचारगी उसे दिखाई नहीं देती. आज मध्य प्रदेश के गांवकसबों और शहरों में सड़क पर आवारा घूमती गाय सरकार के नुमाइंदों को दिखाई नहीं दे रही है. गाय और गौमांस की तस्करी की खबर पर मौब लिंचिंग पर उतारू बजरंग दल के लोगों को सड़क पर भूखीप्यासी गाय दिखाई नहीं देती. दक्षिण अफ्रीका के नामीबिया से कूनोपालपुर नैशनल पार्क में चीते लाए गए हैं, जिन के भोजन के सैकड़ों की तादाद में चीतल सहित दूसरे जंगली जानवरों को हलाल किया जा रहा है.

यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही है कि यह किस तरह का पर्यावरण संरक्षण है, जिस में सैकड़ों की तादाद में जंगली जानवरों की बलि दे कर केवल चीते का संरक्षण किया जा रहा है? मौजूदा दौर में खेती में मशीनीकरण से गौवंश के बैल बेकार होने चाहिए थे, लेकिन दूध देने वाली गाय क्यों बेकार हुई? इस सवाल का जवाब किसी के पास है, ही कोई खोजना चाहता है. आज तो छोटे शहर से ले कर दिल्ली तक सरकार की हर लेयर पर कथित गौरक्षा समर्थित दल हैं, तब क्यों नहीं कोई राष्ट्रीय गौनीति लाई जाती?
गौहत्या की चिंता करने वालों को यह चिंता भी करनी होगी कि गाय सड़कों पर अपमानित और मरने के
लिए नहीं आवारा फिरें, बल्कि घरों में जगह पाए. आज भी गांवदेहात में कई परिवारों की आजीविका का स्रोत गाय का दूध और उस से बने उत्पाद दहीमक्खन और घी हैं. गाय के गोबर से बने उपले लाखों घरों के चूल्हों का ईंधन बने हुए हैं, पर वर्तमान में गाय की बदहाली किसी से छिपी नहीं है. जनवरी, 2022 के आखिरी दिनों में भोपाल के नजदीक बैरसिया में एक महिला भाजपाई नेता की गौशाला में 100 से ज्यादा गायों की मौत हो गई थी.

इस गौशाला में 500 गायें हैं. उस समय गौशाला के नजदीक बने कुएं में 20 गायों के शव और मैदान में 80 से ज्यादा गायों के शव और कंकाल पड़े मिले थे. उस के बाद उन भाजपाई नेता पर पुलिस ने केस दर्ज किया था और प्रशासन ने गौशाला का संचालन अपने हाथ में ले लिया था.
आज भी प्रदेश में खोली गई ज्यादातर गौशालाओं का संचालन राजनीतिक रसूख वाले लोग ही कर रहे हैं. गौशालाओं में हट्टीकट्टी गायें ही रखी जाती हैं, जिन का घी दूध पी कर गौमाता की सेवा करने का ढोंग करते हैं और लाचार, बीमार गायें सड़कों पर आवारा घूमती हैं, उस की फिक्र इन को कभी नहीं रहती.
सरकार को चुनावी फायदे की बात छोड़ कर गाय की लाचारगी की चिंता है तो किसानों को गाय पालने की अनिवार्यता का नियम लागू करना चाहिए. जो किसान गाय का पालन करे, उसे ही सरकारी सब्सिडी और दूसरे फायदे मिल सकें.

मध्य प्रदेश में तो बाकायदा गौसेवा आयोग भी बना कर उस के अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया जाता है, पर प्रदेश में गायों की बदहाली गौसेवा आयोग के वजूद पर ही सवालिया निशान लगाती है.
छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले के साहित्यकार, संपादक वरुण सखाजी चर्चा के दौरान बताते हैं कि गौहत्या का विरोध कर के उन्माद में कर मरनेमारने पर उतारू लोग भीड़तंत्र का हिस्सा तो बन जाते हैं, पर गायों की आवारगी पर बात नहीं करना चाहते. वे इसे एक तरह की छद्म धार्मिकता और जाहिलपन ही मानते हैं. वे तल्ख अंदाज में कहते हैं, ‘‘हम अपने बब्बा (पिता के पिता) को कोई गाली दे तो गाली देने वाले को मार डालेंगे, लेकिन अपने घर में उसे खुद चाहे दोनों टाइम पीटें, कोई फर्क नहीं पड़ता. यह दोहरापन ठीक नहीं है.’’फसलों को चट कर रहे आवारा पशु  एक दौर था जब पशुपालन किसानों के लिए आमदनी का जरीया हुआ करता था. लोग गायभैंस, बकरी पाल कर इन के दूध, घी, मक्खन को बेच कर घरपरिवार की जरूरतों को पूरा करते थे.

बैल खेती किसानी के कामों में हलबखर चलाते थे. बैलगाड़ी में किसान अपनी उपज मंडियों तक ले जाता था. नई तकनीक आने से अब खेती में कृषि उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ गया है. इस के चलते पशुपालन में अब किसानों की दिलचस्पी कम हो गई है. अब लोग पालतू पशुओं को दूध देने तक घर में रखते हैं, पर बाद में उन्हें छुट्टा छोड़ देते हैं. आजकल गांवकसबों में आवारा पशुओं के चलते फसलों की हिफाजत करना एक बड़ी समस्या बन कर उभर रही है. साल 2023 में देश के पशुपालन और डेयरी विभाग ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिस के मुताबिक 20वीं पशुधन गणना से पता चलता है कि देश में 50.21 लाख आवारा मवेशी सड़कों पर घूम रहे हैं. इन में राजस्थान में सब से ज्यादा 12.72 लाख और उत्तर प्रदेश में 11.84 लाख मवेशी सड़कों पर आवारा घूमते हैं. देशभर में आवारा पशुओं को पालने की सालाना लागत 11,000 करोड़ रुपए से ज्यादा है. मवेशियों की हत्या पर बैन और गौरक्षकों के डर से आवारा पशुओं की समस्या तेजी से बढ़ी है और उत्तर प्रदेश में दूध देने वाले पशुओं को पालना किसानों के लिए मुश्किल होता जा रहा है.

लौकडाउन के पहले दतिया के रेलवे स्टेशन पर आवारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता था. ये आवारा गायबैल मुसाफिरों के खानेपीने की चीजों पर पट पड़ते थे. कई बार इन आवारा जानवरों के अचानक रेलवे प्लेटफार्म पर दौड़ लगाने से बच्चे, महिलाएं और बुजुर्गों को चोट भी लग जाती थी. होशंगाबाद जिले के पचुआ गांव में साल 2018 में चरनोई जमीन पर गांव के कुछ रसूख वाले किसानों ने कब्जा कर लिया था, जिस के चलते गांव के आवारा पशु किसानों के खेत में घुस कर फसलों को नुकसान पहुंचाने लगे थे. इस बात को ले कर 2 पक्षों में हो गया था, जिस में एक आदमी की मौत हो गई थी. दूसरे पक्ष के 2 लोग हत्या के आरोप में हवालात में बंद हैं. पिछले कुछ सालों में देश के अलगअलग इलाकों में हुईं ये घटनाएं बताती हैं कि हमारे देश में पशुओं की आवारगी लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन गई है. किसानों की हाड़तोड़ मेहनत से उगाई गई फसल जब आवारा पशु चर लेते हैं, तो वे मनमसोस कर रह जाते हैं.

गांवकसबों में दबंगों के पाले पशु आवारा घूमते हैं और दलितपिछड़ों की जमीन पर उगी फसल चट कर
जाते हैं. दबंगों के डर से इन आवारा पशुओं को रोकने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता. चरनोई जमीन की कमी में आवारा घूमते पशु मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के राज में आवासीय पट्टा देने के लिए सरकारी जमीन के अलावा चरनोई जमीन का भी अलौटमैंट राजस्व महकमे द्वारा दलितों को कर दिया गया था. सरकार के इस कदम से बचीखुची चरनोई जमीन भी खत्म हो गई. इसी तरह गांवदेहात के इलाकों में कृषि उपज मंडी, अस्पताल, स्कूल और दूसरी तरह की सरकारी इमारतों को भी चरनोई जमीन के रकबे पर बनाया जा रहा है. किसानों द्वारा भी वेयरहाउस, पैट्रोलपंप, बरातघर वगैरह भी खेती की जमीन पर बन रहे हैं. कसबों और शहरों में भी खेतीबारी वाली जमीन पर आवासीय कालोनी बना कर प्लाट बेचे जा रहे हैं. गांवों में चरनोई जमीन के अलावा जो पठारी क्षेत्र या सरकारी जमीन बची है, उस पर भी दबंगों का कब्जा है.

आज शहर और गांव की सड़कों पर बनाए बैठे पशुओं की आवारगी की खास वजह भी खत्म होती चरनोई जमीन ही है. गांवदेहात में चरनोई जमीन के नाम पर कुछ नहीं बचा है. ऐसे में वे किसान, जिन के पास खुद की जमीन नहीं है, गायभैंसों को खुला छोड़ देते हैं. चरनोई जमीन नहीं होने से गायें खेतों में घुस कर फसलों को खा जाती हैं और जिन किसानों की फसलों को नुकसान होता है, वे लड़ने पर आमादा हो जाते हैं. गांवों में चरनोई जमीन नहीं होने और गौपालन में किसानों की दिलचस्पी कम होने के चलते शहर की सड़कों में भी गायें आवारा घूमती हैं. लोगों द्वारा प्लास्टिक की पन्नी में फेंकी गई खाने की चीजों को खाने के चक्कर में गायें प्लास्टिक की पन्नी भी खा लेती हैं और गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही हैं. चरनोई जमीन पर कब्जा किए दबंगों के राजनीतिक दबदबे के चलते इन पर शिकंजा नहीं कसा जा सका है. सरकार चरनोई जमीन को इन दबंगों के चंगुल से छुड़ाने की कोई योजना बनाए तो गायों के लिए चरने के इंतजाम के साथसाथ पशुपालन के प्रति किसानों की दिलचस्पी भी जाग सकती है.

हमारे देश की कानून भी दोहरे मापदंड वाला है. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कहता है कि आवारा पशुओं का भी खयाल रखो और अपनी फसलों को भी सहीसलामत रखो. पर यह कैसे मुमकिन है? जमीनी हकीकत
यह है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के इलाकों में नीलगाय, सूअर, गाय, बकरी, भैंस जैसे आवारा पशुओं से फसल बचाने के लिए किसान खेतों में रतजगा कर रहे हैं. आवारा पशुओं को किसान मार भी नहीं सकते, क्योंकि यह गैरकानूनी है. गांवदेहात में खेती करने वाले छोटे किसानों के पास जो जमीन है, उस पर किसी बड़े फार्महाउस जैसी तार की बाड़  नहीं होती है. गरीब और पिछड़े पशुपालक अपने पालतू पशुओं को खुद चराने ले जाते हैं, पर ऊंची जाति के दबंगों के पशु बेखौफ आवारा घूमते हैं. देश का कानून भी उपदेशकों की तरह केवल उपदेश देता है.       

वेणी शंकर पटेल ‘ब्रज’        

Crime Story: औनर किलिंग-घर आए दामाद को दी दर्दनाक मौत

त्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का एक बहुत पौश इलाका है आशियाना, जहांऔनर किलिंगका ऐसा कांड किया गया कि सुनने और देखने वाली की रूह कांप गई. वहां के सैक्टरआई में मंगलवार, 17 मार्च, 2026 की रात एक एडवोकेट तीरथ राज सिंह ने अपनी बेटी साक्षी के प्रेम विवाह से नाराज हो कर अपने ही दामाद विष्णु यादव की बेरहमी से हत्या कर दी, जिस से पूरे इलाके में हड़कंप मच गया.

मिली जानकारी के मुताबिक, प्रतापगढ़ के सांगीपुर इलाके के रहने वाले 32 साल के विष्णु यादव ने महज 4 साल पहले एडवोकेट तीरथ राज सिंह की बेटी साक्षी से प्रेम विवाह किया था. पर तीरथ राज सिंह इस शादी के खिलाफ थे और तब से ही अपने दामाद और बेटी से  दुश्मनी पाल बैठे थे.विष्णु यादव और साक्षी अपनी 3 साल की बेटी अर्चिता के साथ प्रतापगढ़ में ही रहते थे. पर 17 मार्च को विष्णु यादव अपनी पत्नी साक्षी की जिद पर ससुराल में लखनऊ आए थे.

मंगलवार की रात को तकरीबन साढ़े 10 बजे विष्णु यादव और उन के ससुर तीरथ राज सिंह के बीच किसी बात को ले कर तीखी बहस शुरू हो गई और देखते ही देखते यह बहस हाथापाई में बदल गया.
घर के भीतर शोर सुन कर विष्णु यादव की सालियां और परिवार के दूसरे सदस्य भी वहां पहुंच गए. इसी बीच, गुस्से से तमतमाए तीरथ राज ने पास पड़ी चारपाई का पाया उठाया और विष्णु के सिर पर ताबड़तोड़ चोट कर दी, जिस से विष्णु का सिर फट गया और उस ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. बीचबचाव करने साक्षी भी पिता के हमले में घायल हो गई.

इस हत्याकांड की सूचना मिलते ही पुलिस सुपरिंटैंडैंट (मध्य) विक्रांत वीर और एसीपी कैंट अभय प्रताप मल्ल भारी पुलिस बल और फोरैंसिक टीम के साथ मौके पर पहुंचे. पुलिस ने मौका वारदात
से हत्या में इस्तेमाल चारपाई का पाया बरामद कर लिया, जबकि फोरैंसिक टीम ने मौके से फिंगरप्रिंट्स और दूसरे तमाम सुबूत जुटाए. इतना ही नहीं, पुलिस ने तीरथ राज सिंह और उन की चार बेटियों को हिरासत में ले लिया. पुलिस सुपरिंटैंडैंट विक्रांत वीर ने बताया कि पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या इस हत्याकांड की साजिश पहले से रची गई थी या यह अचानक हुए  का नतीजा है.   

Hindi Story: अंधविश्वास

Hindi Story: जातियों को कंट्रोल करने के लिए मांगलिक दोष का डर बिहार के एक छोटे से कसबे में रहने वाली सविता शर्मा पढ़ीलिखी थी. वह नौकरी करती थी और अपने परिवार का सहारा भी थी. उस के लिए शादी के लिए रिश्ते आते थे, बातचीत होती थी, लड़का और लड़की एकदूसरे को पसंद भी कर लेते थे, लेकिन जैसे ही कुंडली मिलाई जाती, एक शब्द पूरे रिश्ते पर भारी पड़ जाता कि लड़कीमांगलिकहै.
इस के बाद सवाल होते, बातचीत. यह पूछा जाता कि सविता कैसी इनसान है. यह कि वह अच्छे जीवनसाथी के तौर पर कितनी जिम्मेदार साबित हो सकती है. बस, इतना कहा जाता कि हम अपने बेटे की जान खतरे में नहीं डाल सकते.

सविता शर्मा हर बार चुपचाप सुन लेती. धीरेधीरे उसे खुद पर शक होने लगा कि क्या सच में वह किसी की जिंदगी के लिए खतरा है? क्या उस के जन्म के समय मंगल ग्रह की किसी स्थिति ने उसे दोषी बना दिया है?
यह कहानी किसी एक सविता शर्मा की नहीं है, बल्कि उन लाखों लड़कियों और लड़कों की है, जिन की जिंदगी पर मांगलिक दोष नाम का एक अनदेखा लेकिन जालिम ठप्पा लगा दिया गया है खासकर ऊंची जातियों में, जिन में अमूमन कुंडली मिलान करने के बाद ही शादी तय होती है. बिना किसी अपराध, बिना किसी सुबूत, सिर्फ एक ज्योतिषीय सोच की बुनियाद पर. यहीं से शुरू होते हैं वे सवाल, जिन्हें पूछने से हमारा समाज आज भी डरता है.

मांगलिक दोष है कितना सच भारतीय समाज में शादी होने केवल 2 लोगों का निजी संबंध नहीं माना जाता, बल्कि उसे परिवार, परंपरा, धर्मजाति, कुलगोत्र और ग्रहनक्षत्रों से जोड़ कर देखा जाता है. इसी सिलसिले में मांगलिक दोष एक ऐसा शब्द बन चुका है, जिस ने असंख्य युवाओं, खासकर महिलाओं के जीवन में भय, अपमान, मानसिक यातना और अस्वीकार की दीवारें खड़ी की हैं. यह दोष केवल विवाह को कठिन बनाता है, बल्कि प्रेम, समानता और व्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे आधुनिक मूल्यों पर भी सीधा प्रहार करता है.
मांगलिक दोष के नाम पर आज भी भारत में रिश्ते टूटते हैं, लड़कियों को अशुभ कहा जाता है, लड़कों को डराया जाता है और परिवारों को मानसिक गुलामी में जकड़ दिया जाता है.

सवाल यह नहीं है कि ज्योतिष में मंगल ग्रह का क्या स्थान है? सवाल यह भी है कि क्या किसी ग्रह की कथित स्थिति के आधार पर किसी मनुष्य के पूरे जीवन को अभिशप्त घोषित कर देना नैतिक, वैज्ञानिक और मानवीय है? मांगलिक दोष क्या है, इस संबंध में पंडित वाचस्पति ने बताया कि ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल ग्रह कुछ विशेष भावों पहले, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहा जाता है. यह मान लिया जाता है कि ऐसा व्यक्ति विवाह के लिए अशुभ होता है और उस के जीवनसाथी को कष्ट, बीमारी या मृत्यु तक का सामना करना पड़ सकता है.

यहीं से समस्या शुरू होती है. बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के, एक अनुमान को सामाजिक सत्य बना दिया गया. यह मान्यता पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही और धीरेधीरे यह भय, अफवाह और सामाजिक दबाव का औजार बन गई. विज्ञान बनाम ज्योतिष आज का युग विज्ञान, तर्क और प्रमाण का युग है. खगोल विज्ञान और ज्योतिष में बुनियादी अंतर है. खगोल विज्ञान ग्रहों की गति, दूरी और भौतिक गुणों का अध्ययन करता है, जबकि ज्योतिष उन ग्रहों को मनुष्य के भाग्य से जोड़ देता है, बिना किसी ठोस वैज्ञानिक आधार के.
अब तक दुनिया में ऐसी कोई वैज्ञानिक स्टडी नहीं हुई है जो यह साबित करे कि मंगल ग्रह की स्थिति शादी, मौत, बीमारी या शादी से जुड़े ?ागड़े की वजह बनती है. अगर मंगल ग्रह सच में इतना असरदार होता, तो एक ही दिन जनमे लाखों लोगों की जिंदगी एक सी होती, लेकिन हकीकत इस से ठीक उलट है.

सफल और असफल विवाह, सुख और दुख, बीमारी और सेहत, ये सब सामाजिक, माली, दिमागी और बायोलोजिकल वजह से जुड़े होते हैं, कि किसी ग्रह की काल्पनिक स्थिति से. मांगलिक दोष के सब से बड़े शिकार भारतीय समाज में मांगलिक दोष का सब से खतरनाक असर लड़कियों पर पड़ता है. मांगलिक लड़की को अकसर मनहूस, अशुभ, खतरनाक जैसे शब्दों से नवाजा जाता है. उस की कुंडली उस के किरदार, उस की तालीम, उस की काबिलीयत से बड़ी मान ली जाती है. कई परिवारों में मांगलिक लड़की की शादी देर से होती है या उसे जबरन किसी ऐसे लड़के से ब्याह दिया जाता है, जिसे भी मांगलिक बताया गया हो. चाहे उन दोनों की सोच, पढ़ाईलिखाई या जिंदगी को सम?ाने के नजरिए में कोई तालमेल हो.ऐसे हालात में लड़की की नई सोच और आत्मसम्मान पर सीधा हमला होता है. उसे यह भरोसा दिला दिया जाता है कि वह अपने जीवनसाथी के लिए खतरा है. यह मानसिक हिंसा का एक गहरा और अनदेखा रूप है.

दिमागी सेहत पर असर
मांगलिक दोष के डर से पीडि़त नौजवान डिप्रैशन और चिंता का शिकार हो जाते हैं. कई लड़कियां यह मानने लगती हैं कि वे अपने पति की मौत की वजह बन सकती हैं. यह सोच उन के आत्मविश्वास को तोड़ देती है और जिंदगी को बो? बना देती है. कुछ मामलों में मांगलिक होने का ठप्पा खुदकुशी जैसे खतरनाक कदमों तक ले गया है. सवाल यह है कि क्या एक अप्रमाणित सोच किसी की जान से ज्यादा कीमती है?

धार्मिकता या सामाजिक कंट्रोल
अकसर मांगलिक दोष को धर्म से जोड़ कर उसे सवालों से परे रखा जाता है, लेकिन सच यह है कि यह धार्मिक आस्था से ज्यादा सामाजिक कंट्रोल का उपकरण बन चुका है. ब्याह के बाजार में यह दोष सौदेबाजी का हथियार बन जाता हैदहेज बढ़ाने, लड़की को नीचा दिखाने या रिश्ते तोड़ने के लिए.
मांगलिक दोष और पाखंड सब से बड़ा विरोधाभास यह है कि मांगलिक दोष को उपायों से खत्म किया जा सकता है.
ज्योतिषी द्वारा यह बताया जाता है कि मांगलिक लड़कियों का ग्रह से छुटकारा पाने के लिए पेड़ या मूर्ति से ब्याह पहले किया जाता है, खास तरह का पूजापाठ कराया जाता है. पर अगर कोई दोष इतना घातक है कि वह मौत तक करा सकता है, तो वह किसी पेड़ या मूर्ति से शादी कर के कैसे खत्म हो सकता है? यह साफ करता है कि मांगलिक दोष एक डर पैदा करने वाला सिद्धांत है, जिसे बाद में आर्थिक और धार्मिक पाखंड से जोड़ा गया.

कानून का नजरिया
भारतीय संविधान लोगों की बराबरी, इज्जत और आजादी की गारंटी देता है. किसी इनसान को ग्रहों की बुनियाद पर भेदभाव का शिकार बनाना, उस की शादी के हक को सीमित करना या मानसिक पीड़ा देना, संवैधानिक वैल्यू के खिलाफ है. हालांकि, कानून सीधे मांगलिक दोष को नहीं पहचानता, लेकिन इस के चलते होने वाला भेदभाव, दहेज, मानसिक हिंसा और सामाजिक बहिष्कार कानूनन अपराध की श्रेणी में सकते हैं.
तालीम और वैज्ञानिक सोच का रोल मांगलिक दोष जैसे अंधविश्वासों के खिलाफ सब से बड़ा हथियार पढ़ाईलिखाई है. वैज्ञानिक सोच, तर्कभरी बातें और सवाल करने की आदत समाज को इस डर से दूर कर सकती हैं. आज जरूरी है कि स्कूलकालेजों और सामाजिक मंचों पर यह चर्चा खुले रूप में हो कि शादी की बुनियाद ग्रह नहीं, बल्कि आपसी सम?, इज्जत और जिम्मेदारी होनी चाहिए.

नई पीढ़ी और बदलाव की उम्मीद
अच्छा संकेत यह है कि शहरी और पढ़ेलिखे नौजवानों में मांगलिक दोष की पकड़ कमजोर पड़ रही है. प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह और बराबरी की बुनियाद पर खड़े रिश्ते इस अंधविश्वास को चुनौती दे रहे हैं.
लेकिन यह बदलाव अभी अधूरा है. गांवदेहात के इलाकों और पारंपरिक परिवारों में आज भी यह डर गहराई से मौजूद है, इसलिए लड़ाई लंबी है, लेकिन लड़नी जरूरी है.

मांगलिक दोष के विरोध का मतलब
मांगलिक दोष का विरोध केवल ज्योतिष का विरोध नहीं है, बल्कि यह विरोध है मर्द और औरत की बराबरी के पक्ष में, वैज्ञानिक सोच के समर्थन में, मानसिक आजादी के लिए, शादी को इनसानी संबंध मानने के लिए, कि यह ग्रहों का खेल है. यह विरोध उस सिस्टम के खिलाफ है, जो डर पैदा कर के लोगों को कंट्रोल करता है, उन्हें बुजदिल बनाता है. ग्रह नहीं, इनसान जिम्मेदार हैं,
किसी भी शादी की कामयाबी या नाकामी की वजह कोई ग्रह नहीं, बल्कि इनसान होते हैं. उन की सोच, उन का बरताव, उन के हालात होते हैं. जब हम यह जिम्मेदारी ग्रहों पर डाल देते हैं, तो हम खुद से भागते हैं.
मांगलिक दोष जैसा अंधविश्वास एक सामाजिक भरम है, जिसे मिटाना बहुत ज्यादा जरूरी है. यह केवल लोगों की निजी आजादी का सवाल है, बल्कि एक ज्यादा बेहतर समाज बनाने की शर्त भी है.
जब तक हम यह नहीं सम?ोंगे कि इनसान का भविष्य किसी ग्रह की स्थिति से नहीं, बल्कि उस के काम, फीलिंग्स और सामाजिक ढांचे से बनता है, तब तक मांगलिक दोष जैसे अंधविश्वास हमारी जिंदगी पर ग्रहण बन कर छाए रहेंगे. अब समय गया है कि हम उस ग्रहण को हटाएं.                      

Political Story: इजराइल, अमेरिका, ईरान की रंगदारी दुनिया पर है भारी

Political Story: आ विजय ने अनामिका से मिलने का प्रोग्राम बनाया था. दोनों मिले भी, पर अनामिका का मूड कुछ उखड़ा हुआ था.
‘‘तुम्हारा चेहरा क्यों लटका हुआ है? क्या हुआ?’’ विजय ने पूछा.
‘‘यार, हमारे गांव में लफड़ा हो
गया है,’’ अनामिका बु? हुई आवाज में बोली.
‘‘लफड़ा मतलब? अंकल और आंटी ठीक तो हैं ?’’ विजय को चिंता हुई.
‘‘तुम तो जानते हो कि पापा का मछली का कारोबार है. हुआ यों कि वहां एक रंगदार है, जो हर किसी पर रोब जमाने के लिए धमकी देता था,’’ अनामिका बोली.

‘‘क्या उस ने अंकल से कुछ कह दिया?’’ विजय ने बीच में ही टोक कर कहा. ‘‘अरे नहीं, बल्कि एक दूसरे रंगदार ने मछली से भरी उस की नाव डुबो दी. पर वे मछलियां हमारी थीं. बैठेबिठाए पापा का नुकसान हो गया. अब पापा भी बदले की आग में गया,’’ अनामिका बोली. ‘‘ओह, यह तो बहुत बुरा हुआ. पर आजकल पूरी दुनिया में यही हो रहा है.’’

‘‘मतलब?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘इजराइल, अमेरिका और ईरान का युद्ध भी तो अपने दबदबे की लड़ाई है. इस सब में पिस वे देश और लोग रहे हैं, जिन्हें यह युद्ध चाहिए ही नहीं. कल तक शांति का नोबल पुरस्कार मांगने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने पूरी दुनिया में खलबली मचा दी है. बस, किसी तरह अमेरिका सब से ज्यादा ताकतवर बन जाए, यही तो डोनाल्ड ट्रंप चाहता है.’’
‘‘अच्छा, यह बताओ कि ईरान और इजराइल का असली मसला क्या है? कोई तो इतिहास होगा , जो आज ये दोनों देश युद्ध की आग में खुद तो ?ालस रहे हैं, साथ ही और भी कई दूसरे देशों को बरबाद कर रहे हैं,’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘सोशल मीडिया पर तो तरहतरह के दावे किए जा रहे हैं, पर मैं उन पर ज्यादा यकीन नहीं करता. लेकिनजनसत्ताकी एक रिपोर्ट ने मेरा ध्यान जरूर अपनी तरफ खींचा. उस के मुताबिक, मध्यपूर्व में ईरान और इजराइल के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है. यह संघर्ष दशकों पुराना है, जो समयसमय पर युद्ध जैसे हालात पैदा करता रहा है,’’ विजय ने अनामिका से कहा.

‘‘मुझे जरा पूरी बात समझा,’’ अनामिका बीच में ही बोली.
‘‘मेरी पूरी बात तो सुन लो तुमहां, तो मैं कह रहा था कि हाल के दिनों में यह टकराव (ईरान और इजराइल के बीच) और ज्यादा खतरनाक हो गया और अमेरिका और इजराइल ने शनिवार, 28 फरवरी, 2026 को ईरान पर हमला कर दिया.’’
‘‘टकराव तो ईरान और इजराइल के बीच है, फिर अमेरिका क्यों चौधरी बना?’’ अनामिका बोली.
‘‘इस हालिया युद्ध पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इस सैनिक कार्रवाई का मकसद अमेरिका के लिए पैदा हुए सिक्योरिटी खतरे को खत्म करना है और ईरान के लोगों को अपने शासकों के खिलाफ खड़े होने का मौका देना है.
‘‘लेकिन अमेरिका, इजराइल और ईरान के इन हमलों के बाद क्षेत्र के तेल उत्पादक खाड़ी देशों में चिंता बढ़ गई, क्योंकि पूरे इलाके में संघर्ष के और बढ़ने का खतरा पैदा हो गया. वहीं इजराइल
ने कहा कि इस के जवाब में ईरान ने इजराइल की ओर मिसाइलें दागीं.

‘‘ईरान ने भी जवाबी हमला करते हुए चेतावनी दी कि वह इस कार्रवाई का बदला लेगा. ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी ने शनिवार, 28 फरवरी, 2026 को कहा कि इजराइल और अमेरिका को अपने इस कदम पर पछताना पड़ेगा.’’
‘‘लेकिन तुम ने बताया नहीं कि ईरान और इजराइल विवाद आखिर है क्या और क्यों पूरा मिडिल ईस्ट अब
इस संघर्ष को ?ोल रहा है?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘खबरों के मुताबिक, ईरान और इजराइल के बीच दुश्मनी की असली शुरुआत 1979 की ईरानी क्रांति के बाद हुई. इस क्रांति से पहले ईरान पर मोहम्मद रजा पहलवी का राज था और उस समय ईरान और इजराइल के रिश्ते सामान्य ही नहीं, बल्कि काफी सहयोगी भी थे. दोनों देशों के बीच व्यापार, खुफिया सहयोग और सैन्य संपर्क मौजूद थे.

‘‘लेकिन 1979 में क्रांति होने के
बाद रुहोल्ला खोमैनी की अगुआई में ईरान में इसलामिक राज आया. नई सरकार ने अपनी विदेश नीति पूरी तरह बदल दी. ईरान ने इजराइल को मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया और उसेअवैध राज्यबताते हुए अपना प्रमुख दुश्मन घोषित कर दिया.
‘‘इस के बाद ईरान ने फिलिस्तीन के समर्थन को अपनी नीति का अहम हिस्सा बना लिया. इसी वजह से उस ने हिजबुल्लाह और हमास जैसे समूहों को राजनीतिक और सैन्य समर्थन देना शुरू किया, जो इजराइल के खिलाफ संघर्ष करते हैं. इजराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताया. यहीं से दोनों देशों के बीचशैडो वारका दौर शुरू हो गया.’’
‘‘अब यहशैडो वारक्या बला है?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘दरअसल, पिछले 20 सालों में इन दोनों देशों ने सीधे युद्ध के बजाय कई अप्रत्यक्ष तरीके अपनाए. इन में साइबर हमले, वैज्ञानिकों की हत्या, सीरिया और लेबनान में प्रौक्सी मिलिशिया (जैसे ईरान समर्थित हिजबुल्लाह या हूती, जो सीधे युद्ध में शामिल हुए बिना राज्य को फायदा पहुंचाते हैं) के जरीए हमले शामिल हैं. पिछले कुछ सालों के दौरान इजराइल कई बार सीरिया में ईरान समर्थित ठिकानों पर एयरस्ट्राइक करता रहा है.’’

‘‘तो फिर अमेरिका क्यों इस युद्ध में कूदा?’’ अनामिका ने सवाल किया.
‘‘28 फरवरी को जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बमबारी शुरू
की, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान
पर आरोप लगाया कि वह ऐसे परमाणु हथियार बना रहा है, जो अमेरिकी सहयोगियों के लिए खतरा हैं और जल्द ही अमेरिका तक पहुंच सकते हैं.
‘‘हालांकि, 2 मार्च को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि प्रशासन को पता था कि इजराइल ईरान के खिलाफ कार्रवाई करने वाला है और ईरान इस के बाद अमेरिका को भी निशाना बनाता. इस वजह से अमेरिका को उस पर हमला करने की पहल करनी पड़ी,’’ विजय बोला.
‘‘यह बात कुछ हजम नहीं हुई. मु? लगता है कि ईरान, इजराइल और अमेरिका हमारे गांव के दबंग जैसे हैं, जो अपने निजी फायदे के लिए पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बन रहे हैं. इन की रंगदारी पूरी दुनिया के लिए खतरनाक साबित हो रही है,’’ अनामिका बोली.

‘‘तुम सच कह रही हो. 28 फरवरी को जब यह संघर्ष शुरू हुआ, तो किसी ने नहीं सोचा था कि महज एक हफ्ते के भीतर यह 14 देशों तक फैल जाएगा. एक तरफ जहां अमेरिका केआपरेशन एपिक फ्यूरीऔर इजरायल केरोरिंग लायनअभियान के तहत ईरान के सैन्य ठिकानों पर बड़े हमले हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान ने भी अपनी पूरी ताकत ?ांकते हुए खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइलों की बौछार की.
‘‘खबरों की मानें तो ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला खामेनेई की मौत की खबरों से ले कर स्ट्रेट औफ होर्मुज की नाकाबंदी तक, इस एक हफ्ते ने दुनिया का नक्शा और समीकरण दोनों बदल दिए हैं. आसमान में आधुनिक फाइटर जैट्स के बीच सीधी भिड़ंत हो रही है, तो समंदर में युद्धपोत डूब रहे हैं. तबाही का आलम यह है कि 14 देश अब इस जंग का मैदान बन चुके हैं और हर बीतते दिन के साथ खतरा और गहरा होता जा रहा है.

‘‘जंग की शुरुआत अमेरिका और इजराइल के एक बेहद सटीक और सा? हमले से हुई. अमेरिका ने इसेएपिक फ्यूरीकहा, तो इजराइल ने इसेरोरिंग लायननाम दिया. इस हमले में 100 से ज्यादा लड़ाकू विमानों और भारी मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया. टारगेट बिलकुल साफ था, ईरान की सरकारी इमारतें, राष्ट्रपति का घर और सुप्रीम लीडर का दफ्तर. देखते ही देखते खबर आई कि ईरान के सब से बड़े नेता आयतुल्ला अली खामेनेई इस हमले में मारे गए हैं.
‘‘दूसरी तरफ ईरान ने भी एक घंटे के भीतर ही जोरदार जवाब दिया. ईरान की सेना ने इजराइल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलों और ड्रोनों से हमला बोला. इस कार्रवाई की रेंज में दुबई के कुछ प्रमुख पर्यटन स्थल भी रहे, जिन्हें निशाना बनाया गया था.

‘‘इसी दौरान ईरान के मीनाब इलाके में एक प्राइमरी स्कूल पर हमला हुआ, जिस में 165 मासूम लड़कियों की जान चली गई. इसे इस संघर्ष की अब तक की सब से बड़ी त्रासदी माना गया.
‘‘इसी दौरान ईरान के अंदर से 2 अलग तसवीरें सामने आईं. खामेनेई की मौत ने देश के लोगों को 2 हिस्सों में बांट दिया था. तेहरान में जहां लोग काले कपड़े पहन कर मातम मना रहे थे, वहीं करज में लोग अपनी गाडि़यां ले कर सड़कों पर उतर आए थे और हौर्न बजा कर अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे.
‘‘जंग के तीसरे दिन तक यह लड़ाई सिर्फ 2-3 देशों के बीच नहीं रह गई थी, बल्कि धीरेधीरे इस में कुल
12 देश शामिल हो चुके थे. जैसेजैसे समय बीत रहा था, युद्ध का
मैदान और बड़ा होता जा रहा था. लेबनान के संगठन हिज्बुल्लाह ने मोरचा खोलते हुए इजराइल पर ताबड़तोड़ मिसाइलें दागनी शुरू कर दीं.

‘‘इजराइल ने भी इस का करारा जवाब दिया और बेरूत पर भीषण हवाई हमले किए, जिस में 31 लोगों की जान चली गई. तनाव इतना बढ़ गया कि पूरे मिडिल ईस्ट में सिर्फ धुएं का गुबार और सायरन की आवाजें सुनाई दे रही थीं.
‘‘इसी बीच ईरान ने सऊदी अरब की रास तनुरा रिफाइनरी को निशाना बनाया. इस हमले का मकसद साफ था दुनियाभर की ऊर्जा आपूर्ति को संकट में डालना. इसी अफरातफरी और भारी तनाव के बीच कुवैत से भी एक बड़ी खबर आई, जहां अमेरिका के 3 लड़ाकू विमान तकनीकी खराबी या आपसी टक्कर की वजह से क्रैश हो गए. अमेरिकी प्रशासन ने बाद में इसेफ्रैंडली फायर
यानी अपनी ही चूक से हुआ हादसा करार दिया.’’
‘‘क्या नाम दिया हैफ्रैंडली फायर’. शब्दों से खेलना तो कोई सियासी लोगों से सीखे. इन के
लिए लोगों का आग में ?ालस कर मर जाना भीफायरफ्रैंडलीहै,’’ अनामिका बोली.
‘‘अगर आगे के युद्ध की बात करें तो ईरान ने स्ट्रेट औफ होर्मुज को पूरी तरह बंद करने का ऐलान कर दिया. आप को बता दें कि यह वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया का तकरीबन 20 फीसदी तेल गुजरता है.

‘‘ईरान के इस फैसले ने इंटरनैशनल बाजार में खलबली मचा दी और कच्चे तेल की कीमतों को ले कर हर तरफ हाहाकार मच गया. ईरान यहीं नहीं रुका, उस ने रियाद और कुवैत में मौजूद अमेरिकी दूतावासों पर ड्रोन से हमले कर दिए, जिस से वहां कामकाज पूरी तरह ठप हो गया और डिप्लोमैटिक हलकों में सन्नाटा पसर गया.
‘‘इधर, युद्ध के मैदान में इजराइल ने अपनी नई और घातक तकनीकआयरन बीमका पहली बार इस्तेमाल किया. यह एक आधुनिक लेजर डिफैंस सिस्टम है, जिस ने हिज्बुल्लाह की तरफ से दागे गए रौकेटों को पलक ?ापकते ही हवा में जला कर राख कर दिया.
‘‘वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़े तेवर दिखाते हुए साफ कर दिया कि फिलहाल किसी भी तरह के सम?ाते या युद्धविराम की कोई गुंजाइश नहीं है.

‘‘ट्रंप ने चेतावनी दी कि यह जंग अभी थमने वाली नहीं है और यह 5 हफ्ते से भी ज्यादा खिंच सकती है. भारत जैसे देशों के लिए यह खबर किसी बड़े ?ाटके से कम नहीं थी, क्योंकि खाड़ी देशों से तेल की सप्लाई रुकने का सीधा मतलब था देश में पैट्रोल और डीजल के दामों का आसमान पर पहुंच जाना.
‘‘फिर तो युद्ध का दायरा सिर्फ खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह हिंद महासागर और यूरोप की दहलीज तक जा पहुंचा. युद्ध में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब तुर्की की ओर बढ़ रही एक ईरानी मिसाइल को नाटो के एयर डिफैंस सिस्टम ने बीच हवा में ही मार गिराया. नाटो के इस सीधे दखल ने पूरी दुनिया को चौंका दिया और यह साफ कर दिया कि अब यह जंग और भी बड़े लैवल पर फैल सकती है.
‘‘उधर, हिंद महासागर के गहरे पानी में एक और खौफनाक मंजर देखने को मिला. यहां एक अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरान के शक्तिशाली युद्धपोतआईआरआईएस डेनाको टारपीडो से निशाना बनाया और उसे समंदर में डुबो दिया.

‘‘सब से दुखद बात यह रही कि यह ईरानी जहाज भारत में एक नौसैनिक अभ्यास पूरा कर के वापस लौट रहा था. इस अचानक हुए हमले में 87 ईरानी नाविकों की जान चली गई, जिस से हड़कंप मच गया.
‘‘इधर, इजराइली वायु सेना ने भी अपने तेवर और कड़े कर लिए. हालात इतने बिगड़ते देख, कई यूरोपीय देशों ने अपनी सुरक्षा को ले कर अपनी सेनाएं और जंगी जहाज मिडिल ईस्ट की ओर रवाना करना शुरू कर दिए. माहौल ऐसा बन चुका था कि पूरा इलाका मानो एक बारूद के ढेर पर बैठा हो, बस एक छोटी सी चिनगारी ही इसे पूरी तबाही में बदलने के लिए काफी थी.
‘‘इस के बाद इस महाजंग की आग अजरबैजान तक भी पहुंच गई. वहां के एक हवाईअड्डे पर हुए ड्रोन हमले में 4 लोग घायल हो गए, जिस से काकेशस क्षेत्र में भी तनाव चरम पर पहुंच गया.
स्ट्रेट औफ होर्मुज बंद होने का असर भी अब साफ दिखने लगा था, जिस के चलते समंदर में तेल टैंकरों की आवाजाही 90 फीसदी तक गिर गई थी. इस का नतीजा यह हुआ कि इंटरनैशनल बाजार में कच्चे तेल के दाम बेकाबू होने लगे और पूरी दुनिया में महंगाई का डर सताने लगा.

‘‘लेकिन तभी सब से बड़ी खबर आई वाशिंगटन से, जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हथियार बनाने वाली बड़ी कंपनियों के साथ मीटिंग की और ईरान को खुली चेतावनी दे दी. ट्रंप ने दो टूक कहा, ‘अब ईरान के साथ कोई बातचीत या नई डील नहीं होगी. अगर बचना है, तो बिना शर्त सरैंडर करना होगा’. उन्होंने यह भी कहा कि वे ईरान की अर्थव्यवस्था को सुधार देंगे, लेकिन पहले उसे घुटने टेकने होंगे,’’ विजय ने अपनी बात पूरी की.
‘‘तुम ने एक बात और नोटिस की?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘क्या?’’ विजय ने थोड़ा हैरान हो कर कहा.
‘‘इस युद्ध में सोशल मीडिया ने भी बहुत अड़ंगा लगाया है. पहले जब युद्ध होते थे तो उन से जुड़ी प्रैस रिलीज में गंभीरता से सारी बात लिखी होती थी और भाषा भी बड़ी सधी हुई होती थी. लेकिन अब जब सेएक्सया दूसरे सोशल मीडिया हैंडल पर बड़ेबड़े
नेताओं के बयान आते हैं, तो वे
भड़काऊ या बचकाने ज्यादा लगते हैं,’’ अनामिका बोली.
‘‘जैसे?’’ विजय ने पूछा.
‘‘यह युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने
सोशल मीडिया (ट्रुथ सोशल) पर ईरान के खिलाफ आक्रामक बयान दिए थे, जिस में उन्होंने ईरान सेबिना शर्त आत्मसमर्पणकी मांग की थी.‘‘उन्होंने दावा किया था कि ईरान की सैन्य क्षमता नष्ट हो चुकी है और वे ईरानी जनता को शासन बदलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, साथ ही किसी भी हमले की हालत में विनाशकारी नतीजे की चेतावनी दी थी.

‘‘यह बयान अपनेआप में बड़ा विनाशकारी बना और आज नतीजा देख लो कि कितने देश बिना किसी वजह के युद्ध की आग में ?ांक दिए गए हैं. मैं तो इजराइल, अमेरिका और ईरान तीनों को अपने गांव के रंगदारों जैसा ही गुंडा मानती हूं, जो अपने फायदे के लिए दूसरे का नुकसान करने से भी बाज नहीं आते हैं,’’ अनामिका बोली. ‘‘तुम्हारी बात में दम है. सोशल मीडिया ने हमें शब्दों और विचारों से पंगु बना दिया है. चार लाइनें लिख दो, बस हो गया काम खत्म. पढ़ने और लिखने की तो जैसे आदत ही नहीं रही है. यह ट्रैंड नई पीढ़ी के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. इमोशनल हो कर सोशल मीडिया पर कुछ भी लिख दो, फिर भुगतो ट्रोल सेना को.
‘‘मुझे लगता है कि इन तीनों देशों के लोग पढ़नेलिखने से ज्यादा सोशल मीडिया पर यकीन करते हैं. एक्स हैंडल तो जैसे दिल का गुबार निकालने का औजार बन गया है.
‘‘तुम्हें याद होगी भारत की आजादी की लड़ाई और महात्मा गांधी के वे लेख जोनवजीवनऔरहरिजनअखबारों में लिखे जाते थे. ज्यादातर तो गुजराती भाषा में होते थे. बाद में उन के अनुवाद दूसरी भाषाओं में और अखबारों में छपते थे.

‘‘ऐसे लेखों में विचार बड़े संतुलित होते थे, शब्द बड़े मारक होते थे, जनता के हित लिए होते थे, पर आज सोशल मीडिया पर किसी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता. हर कोई कुछ भी लिख मारता है, चाहे काम का हो नहीं,’’ विजय ने अपनी भड़ास निकाली.
‘‘तुम सही कह रहे हो. लोगों को खुद समझना होगा कि सोशल मीडिया उन की लिखने की ताकत की हत्या कर रहा हैचलो, देखते हैं कि यह युद्ध का ऊंट किस करवट बैठेगा. उम्मीद है कि यह लड़ाई जल्दी खत्म हो और इन तीनों रंगदारों से दुनिया को नजात मिले,’’ अनामिका बोली.
‘‘तुम अपने पापा को कहो कि कारोबार का जो भी नुकसान हुआ है, उसे भूल जाएं और वहां के रंगदारों से बातचीत कर के बीच का कोई रास्ता निकालें, क्योंकि इस तरह की दुश्मनी से कुछ हासिल नहीं होगा,’’ विजय ने अपनी राय दी.

‘‘मैं जरूर करूंगी पापा से बात,’’ अनामिका ने अनमने मन से कहा.औनलाइन सट्टे में मिली हार, परिवार पर किया जानलेवा वार मुनचुन नाम का एक शख्स अपने परिवार के साथ दिल्ली में समयपुर बादली में सिरसपुर के चंदन पार्क में किराए के मकान पर रहता था.
उसे सट्टेबाजी की बुरी लत लग गई थी. वह पैसा कमाता और सट्टेबाजी में गंवा देता था. गंवाया हुआ पैसा वापस पाने के लिए उस ने कर्ज ले कर सट्टा लगाया, लेकिन वे भी पैसे डूब गए. वह पूरी तरह से कर्ज में डूब गया था. फिर उस ने एक कांड कर दिया. पुलिस ने उसे पकड़ा तो अपने कुबूलनामे में उस ने बताया कि वह क्रिकेट में सट्टा लगाता था. अचानक उस के पास एक फोन आया, जिस के बाद उस ने अपनी और अपने परिवार की जिंदगी खत्म करने का फैसला कर लिया. बाजार से कटहल काटने के नाम पर 90 रुपए का चाकू खरीद कर लाया और पत्नी समेत 3 बेटियों का गला काट कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया. आरोपी का कहना है कि वह खुद भी खुदकुशी करना चाहता था, लेकिन कर नहीं सका.

हरियाणा में महिला के नाम पर गाड़ी लेने से मिलेगी छूट हरियाणा सरकार ने बजट 2026-27 में दी गई राहतों के तहत एक घोषणा यह भी की है कि अगर कोई परिवार अपनी पत्नी, बेटी या मां के नाम पर गैरपरिवहन (निजी उपयोग) गाड़ी रजिस्टर करवाता है, तो मोटर वाहन टैक्स में एक फीसदी की छूट मिलेगी. यह लाभ कार, स्कूटर या दूसरे निजी वाहनों पर लागू होगा. इस पहल का उद्देश्य महिलाओं के नाम पर संपत्ति बढ़ाना और उन की आर्थिक भागीदारी को मजबूत करना है.

Hindi Story: बच्चों के भीतर नफरत का बीज

Hindi Story: बच्चे जन्म से हिंसक नहीं होते. उन का मन एक कोरे कागज की तरह होता है, जिस पर समाज, परिवार और माहौल अपनेअपने रंग भरते हैं. यह हम हैं, बड़े लोग, जो अनजाने में या जानबू? कर बच्चों के मन में प्रेम, करुणा और भाईचारे के बीज बो सकते हैं या फिर नफरत, डर और शक के जहरीले अंकुर उगा सकते हैं.


आज सब से बड़ा और सब से चिंताजनक सवाल यही है कि हमारे बच्चों के भीतर दूसरे धर्म, जाति और समुदाय के प्रति नफरत और अविश्वास का बीज आखिर बो कौन रहा है? बचपन सीखने की उम्र है. बच्चे अपने आसपास जो देखते हैं, सुनते हैं और महसूस करते हैं, वही उन की पर्सनैलिटी की बुनियाद बनता है. घरपरिवार की बातचीत, बड़ों की सोच, महल्ले की चर्चाएं, धार्मिक और सामाजिक आयोजनों की भाषा और यहां तक कि चुटकुलों अफवाहों का असर भी उन के कोमल मन पर गहराई से पड़ता है. वह वही सच मान लेता है, जो उस के भरोसेमंद बड़े उसे बताते हैं.


पर आज हालत यह है कि बहुत छोटेछोटे बच्चे ऐसे राजनीतिक और धार्मिक जहर से लैस कर दिए जा रहे हैं, जिसे वे सम? भी नहीं सकते. एक 11 साल के बच्चे को महात्मा गांधी की जन्मतिथि या पुण्यतिथि की जानकारी नहीं है, लेकिन उसे यहज्ञानजरूर दे दिया गया है कि मुसलिमों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए था और जो भारत में रह गए, वे गांधी कीगलतीकी वजह से रह गए.


वह बच्चा यह भी मानता है कि देश की सारी समस्याओं की जड़ मुसलिम हैं. सवाल यह नहीं है कि यह बच्चा ऐसा क्यों सोचता है, बल्कि सवाल यह है कि उसे यह सोच सिखाई किस ने? दूसरी ओर, एक मुसलिम बच्चे को यह बताया जाता है कि हिंदुओं के घरों में शादीब्याह के मौके पर दाल में जो घी डाला जाता है, वह सूअर की चरबी का होता है. जब उस परिवार से पूछा जाता है कि यह बात उसे कैसे पता चली, तो उस का जवाब होता है किहमारी बिरादरी के हमारे साथी यही कहते हैं…’


जब उस परिवार को यह सम?ाया जाता है कि हिंदू परिवारों में गाय या भैंस के दूध से बना घी ही इस्तेमाल होता है, तब भी वह भरोसा नहीं कर पाता. अविश्वास इतना गहरा कर दिया गया है कि सच भी ?ाठ लगने लगता है. इसी तरह, हिंदू बच्चों के बीच यह डर बैठा दिया जाता है कि अगर वे मुसलिमों के यहां खाना खा लेंगे, तो उन्हें किसी किसी रूप में गाय का मांस खिला दिया जाएगा. यहां तक कि यह भी कहा जाता है कि किसी हिंदू को अगर मुसलिम गाय का मांस खिला दे, तो उसे मसजिद बनाने कापुण्यमिलता है.


इस से भी आगे बढ़ कर, यह जहरीली सोच बच्चों के भीतर इस हद तक भर दी जाती है कि अगर कोई हिंदू किसी मुसलिम लड़की से संबंध बनाता है, तो उसे मंदिर बनाने काफलमिलता है. ये बातें इतनी भयावह हैं कि इन्हें दोहराते हुए भी शर्म आती है, लेकिन यही ?ाठ आज बच्चों के मन में सच की तरह बोया जा रहा है.


एक सच्ची घटना इस पूरे मामले को आईने की तरह सामने रखती है. एक ट्रेन यात्रा के दौरान एक हिंदू और एक मुसलिम परिवार अगलबगल की सीटों पर बैठे थे. हिंदू परिवार के साथ 8 साल का एक बच्चा था. जब मुसलिम परिवार ने अपना खाना निकाला, तो बच्चा उत्सुकता से उन की ओर देखने लगा. वे लोग उस बच्चे को भी परांठा और भुजिया देने लगे, लेकिन बच्चे के मातापिता ने तुरंत रोक दिया और कहा, ‘मत दीजिए, हम आप के यहां का खाना नहीं खाते. हमारे बापदादा ने भी नहीं खाया, तो हम अपने बच्चों को क्यों खाने दें…’


बात आईगई हो गई, पर रात के समय, जब सभी सो गए, अचानक वही बच्चा तेज पेटदर्द से रोने लगा. हिंदू परिवार के पास उस समय कोई दवा नहीं थी. थोड़ी ?ि?ाक के साथ मुसलिम परिवार ने पेटदर्द की दवा देने की पेशकश की. मजबूरी में दवा ली गई. कुछ ही देर में बच्चा ठीक महसूस करने लगा और गहरी में नींद सो गया. सुबह उठते ही वही बच्चा अपने पिता से बोला, ‘‘पापा, अगर अंकल दवा नहीं देते तो मेरा बहुत बुरा हाल हो जाता. मुसलिम लोग भी अच्छे होते हैं.’’


पिता के पास इस वाक्य का कोई जवाब नहीं था. वे बसहांहांकह कर बात टाल गए. उस एक रात ने बच्चे के भीतर सालों से भरे गए जहर को हिला दिया था. यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम बच्चों को धार्मिक और संस्कारी बनाने के नाम पर उन के दिमाग में जहर तो नहीं घोल रहे हैं? क्या हम उन्हें आस्था नहीं, बल्कि नफरत विरासत में दे रहे हैं? क्या हम उन्हें इनसान बनने से पहले हिंदूमुसलिम बनने की सीख नहीं दे रहे हैं?


आज जरूरत इस बात की है कि हम बच्चों को यह सिखाएं कि समाज विविधताओं से बना है और यही उस की ताकत है. उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि इस देश को आजाद कराने, संवारने और आगे बढ़ाने में हर धर्म, हर जाति और हर समुदाय के लोगों का योगदान रहा है. खेत में काम करने वाला किसान हो या अस्पताल में सेवा देने वाला डाक्टर, स्कूल में पढ़ाने वाला टीचर हो या सड़क साफ करने वाला मजदूर, सभी इस देश को बनाने में बराबर के भागीदार हैं.


बच्चों के भीतर नफरत नहीं, बल्कि प्यार और भाईचारे का बीज बोना होगा. उन्हें सिखाना होगा कि धर्म, जाति और भाषा  इनसान को बांटने के औजार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान के रंग हैं. अगर हम यह कर पाए, अगर हम बच्चों के मन में इनसानियत को सब से ऊपर रख पाए, तो यकीन मानिए कि आने वाला कल समाज और देश दोनों के लिए ज्यादा शांत, खुशहाल और सुखद होगा. Hindi Story

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