Social Story: पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो देश में गौरक्षा के नाम पर कुछ संगठनों द्वारा हिंसक वारदात को अंजाम दिया जा रहा है, जो चिंता की बात है. अमूमन इन वारदात में मुख्य रूप से मुसलिम ट्रक चालकों और व्यापारियों को निशाना बनाया गया है. ये हिंसक वारदात मवेशी तस्करी या अवैध वध को रोकने के बहाने की गई हैं. हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, जम्मूकश्मीर और कर्नाटक सहित कई राज्यों में इन हमलों ने गौरक्षक समूहों द्वारा किए जा रहे हमलों में स्थानीय अधिकारियों, विशेष रूप से पुलिस की भूमिका भी गैरजिम्मेदाराना रही है.
भारत में जिस तरह से हिंदूमुसलिम को बांटने की राजनीति चल रही है,
उस में विभिन्न राज्यों में मुसलिमों के खिलाफ हिंसक हमलों की लहर सी चल रही है. गौरक्षा के नाम पर सक्रिय समूहों ने कानून को अपने हाथ में ले लिया है और गायों की तस्करी या वध के आरोपी मुसलिमों को निशाना बना रहे हैं. ऐसा नहीं है कि गायों की तस्करी और अवैध परिवहन में केवल मुसलिम समाज ही शामिल है, बल्कि हिंदू धर्म के लोग खुद को गाय का हिमायती बता कर सब से ज्यादा गौवंश की तस्करी में शामिल पाए जाते हैं. गौरक्षा दल और दक्षिणपंथी संगठनों के अन्य गौसंरक्षण संगठन के लोग कानून की परवाह किए बिना काम कर रहे हैं. पीडि़त, जो अकसर मवेशी या संबंधित उत्पादों के परिवहन में शामिल मुसलिम होते हैं, अनुचित हमले और धमकियों का शिकार हो रहे हैं.
मध्य प्रदेश के कई छोटे बड़े शहरों में सभी तरह की दुकानों पर गाय की आकृति वाली प्लास्टिक की चंदा जमा करने वाली गुल्लक रखी हुई हैं, जिन में दुकान पर आने वाले ग्राहक चंदे के नाम पर कुछ राशि डालते हैं. ग्राहकों को बताया जाता है कि कमजोर और आवारा गाय को सहारा देने के लिए गौशालाएं पैसा खर्च कर रही हैं, जबकि हकीकत इस से अलग है. गौशालाओं के नाम पर व्यापार किया जा रहा है. ऐसे ही एक दुकानदार से जब पूछा गया, तो उस ने बताया गया कि गौशाला चलाने वाली संस्थाओं के नुमाइंदे इन गुल्लकों को दुकान पर छोड़़ जाते हैं और एक निश्चित समय के बाद दुकान में आ कर उस में डले हुए रुपए निकाल कर ले जाते हैं. गौशाला चलाने वाले ज्यादातर लोग किसी राजनीतिक दल से जुड़े़ लोग होते है, जो स्वयंसेवी संस्था बना कर सरकारी अनुदान का जुगाड़़ करने में माहिर होते हैं.
सड़़को पर आवारा घूमती गायों और इन गुल्लकों को देख कर यह सवाल उठता है कि आखिर गौसेवा के नाम पर उगाहे जा रहे इस चंदे का इस्तेमाल कौन सी गायों की सेवा पर किया जाता है? हालांकि, कुछ ऐसी गौशालाएं आज भी हैं जो बिना चंदे या शासकीय अनुदान के प्रचार से कोसों दूर कमजोर और बीमार गायों की सेवा कर रही हैं. पर दर्जनों संगठन गौसेवा के नाम पर देश में हिंसा फैला रहे हैं, गौरक्षकों की टोली आएदिन सड़़कों पर गायों का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर ड्राइवर और क्लीनर से मारपीट कर उन से चौथ वसूली कर रही है और शासनप्रशासन इन लोगों को खुली छूट दे रहा है. सवाल यह भी उठता है कि गाय का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर उस के ड्राइवर से मारपीट करने वाले इन गौरक्षकों का खून सड़कों पर आवारा घूमती गाय को देख कर क्यों नहीं खोलता? गौहत्या और गौमांस के मुद्दे पर कानों सुनी बातों पर मौब लिंचिंग पर उतारू इन भक्तों की भीड़ को सोचना होगा कि वे गाय को एक तरफ तो मां का दर्जा देते हैं और फिर उन्हें इस तरह सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं.
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