Romantic Story : वे सूखे पत्ते

Romantic Story. आज से 15 साल पहले की बात है. मैं 11वीं जमात में पढ़ता था. वह लड़की हमारी क्लास में नईनई आई थी. उस के पैर में कुछ लचक थी. शायद कुछ चोट लगी हो, इसलिए वह थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी. उस ने 10वीं क्लास में पूरे उदयपुर में टौप किया था और मैं ने अपने स्कूल में.

दिखने में तो वह बला की खूबसूरत थी. मगर कहते हैं न कि चांद में भी दाग होता है, बिलकुल ऐसे ही उस के पैर की वह चोट उस चांद से हुस्न का दाग बन गई थी.

उस ने पहले दिन से ही क्लास के मनचले लड़कों को अपनी खूबसूरती का दीवाना बना दिया था. उस की सादगी की चर्चा हर जबान पर थी.

शुरुआत के चंद महीनों में ही क्लास के आधे से ज्यादा लड़के उसे प्रपोज कर चुके थे. सब को उस के हुस्न से मतलब था, उस से नहीं.

हम लड़कों की सोच गिरी हुई होती है. लड़की को इस्तेमाल करने की चीज सम?ाते हैं. इस्तेमाल किया और फेंक दिया. मगर सबकुछ जानते हुए भी उस ने कभी किसी को जवाब नहीं दिया. न ही नाराजगी से और न ही खुशी से.

और एक मैं था, जो अभी तक उस का नाम भी नहीं जानता था. सच कहूं, तो मैं ने कभी कोशिश भी नहीं की थी. नाम जान कर करना भी क्या था, जब दोनों की दुनिया और रास्ते ही अलग थे.

हर कोई उसे अलगअलग नाम से पुकारता था, इसलिए कभी सुनने में भी नहीं आया उस का असली नाम.

मैं ने उस की आंखें देखी थीं. कुछ बोलती थीं उस की आंखें, मगर क्या बोलती थीं, यह जानने के लिए कभी सोचा ही नहीं. मेरे लिए पढ़ाई ज्यादा जरूरी थी. अनाथ था न मैं. अपना सबकुछ खुद ही देखना था. अपना भविष्य खुद बनाना था.

जिस उम्र में लड़के तरहतरह के शौक पूरे करने में लगे होते हैं, उस उम्र में मैं खुद को एक सांचे में ढालने चला था. भला हो उस गैरसरकारी संस्था का, जो मुझे इस स्कूल में पढ़ा रही थी.

कुछ दिनों के बाद इम्तिहान हो गए. उस लड़की ने क्लास में फिर से टौप कर दिया. मेरी सालों से चली आ रही क्लास में पहली पोजीशन की हुकूमत को उस ने खत्म कर दिया था.

हमारे क्लास टीचर क्लास में आए और बोले, ‘‘सरोज, तुम ने 96 फीसदी नंबर ला कर क्लास में टौप किया है.’’

मुझे धक्का लगा कि मैं पीछे कैसे रह गया. मैं इतनी मेहनत से तो पढ़ा था. टीचर दोबारा बोले, ‘‘राघव, तुम्हारे  95.8 फीसदी नंबर आए हैं. तुम दूसरे नंबर पर हो.’’

इस पर मुझे राहत सी मिली कि बस थोड़ा सा फर्क है. मगर फर्क क्यों है, इस का जवाब मुझे  खुद को देना था. यह जवाब मैं कहां से लाता?

मैं पूरी क्लास में यही सोचता रहा. सब लड़के खुश थे. जो फेल थे वे भी, क्योंकि उन्हें उस का असली नाम पता लग गया था.

क्लास खत्म होने पर मैं उस से मिला और बधाई दी. वह इस की हकदार भी थी, इसलिए उस ने भी मुझे  बधाई दी.

यह हमारी पहली मुलाकात थी. इस के बाद आगे के दिनों में धीरेधीरे बातें होने लगीं, मगर जबान से नहीं, बस इशारों से. दूर से देख कर हाथ हिला देना, मगर सामने होने पर चुपचाप निकल जाना, यह हमारे लिए बहुत आम हो गया था.

फाइनल इम्तिहान आने वाले थे. हमारी बातें अब शुरू होने लगी थीं. मगर मैं ने कभी सरोज के बारे में जानने की कोशिश नहीं की, बस हालचाल पूछ लिया करता था.

फिर एक दिन वह बोली, ‘‘इम्तिहान के बाद मिलना.’’

मगर कहां मिलना, यह नहीं बताया. मैं कुछ देर सोचता ही रहा कि कहां और क्यों? क्यों का जवाब तो यह था कि हम दोस्त थे, मगर कहां का जवाब मुझे नहीं मिल रहा था. क्या मेरे घर में? मगर मैं तो अनाथ आश्रम में रहता हूं. तो क्या फिर उस के घर में? मगर उस का घर तो मुझे पता ही नहीं. तो कहां? फिर उसी ने बताया कि स्कूल के पास वाले बाग में मिलना. मेरे अंदर के सवालों का तूफान थाम दिया था उस के इस जवाब ने.

इम्तिहान खत्म हुए. हम मिले, हम फिर मिले, हम बारबार मिले. एक अजीब सी, मगर बहुत प्यारी सी धुन लग गई थी दोनों को एकदूसरे के साथ की. फिर एक दिन मैं ने उसे बताया कि मैं अनाथ हूं, तो जवाब मिला कि वह भी अनाथ है.

मेरी तो यह जान कर जैसे सांसें ही थम गई थीं कि इतनी प्यारी लड़की  के मांबाप नहीं हैं.

बला की खूबसूरत लड़की इस नोच खाने वाले समाज में अपना वजूद बनाए हुए थी. समझ आ गया था मुझे  कि उस की आंखें क्या बोलती थीं और क्यों वह इतनी नरम मिजाज थी.

मुझे  आज उन सवालों के जवाब भी मिल गए थे, जिन सवालों को मैं ने कभी सोचा भी नहीं था.

फिर कुछ देर चुप रहने के बाद मैं ने बड़ी हसरत से उस से पूछा, ‘‘क्या अब तक तुम्हारा कभी कोई दोस्त रहा है?’’

वह हथेली भर के सूखे पत्ते ले आई और बोली, ‘‘ये हैं मेरे दोस्त.’’

मुझे  कुछ समझ  नहीं आ रहा था कि सरोज क्या बोल रही है. मैं हंस भी नहीं सकता था, क्योंकि उस के चेहरे पर हंसी  नहीं दिख रही थी.

‘‘सरोज, मैं कुछ समझा नहीं?’’ मैं ने बहुत जिज्ञासा से पूछा.

जब उस की आंखें सबकुछ बोलती ही थीं, तो क्यों आज मैं उस की जबान का बोला हुआ शब्द समझ नहीं पा रहा था. वह चाह रही थी कि उस का यह दोस्त उस की आंखें पढ़ कर जान जाए कि क्यों ये सूखे पत्ते उस के दोस्त थे. मगर उस ने नहीं बताया और मैं ने भी मान लिया कि शायद दुनिया में कहीं उस का भरोसा टूटा होगा, इसलिए वह ऐसी बातें करती है.

हमारी बातों के सिलसिले अब काफी बढ़ गए थे और हम धीरेधीरे बहुत करीब आ गए थे. एक लगाव था, एक अधूरापन था, जो साथ रह कर ही पूरा होता था. मैं जानना चाहता था उस का और उस के सूखे पत्तों का रिश्ता. मैं इतना करीब तो था उस के, मगर उस के दोस्त अब भी सूखे पत्ते ही थे.

फिर एक दिन मेरे मन में यह सवाल उठा कि स्कूल से पढ़ाई खत्म होने के बाद हम कैसे मिलेंगे? मगर यह सवाल मैं उस से सुनना चाहता था और यह भी जानता था कि वह नहीं पूछेगी, क्योंकि उसे मुझ से ज्यादा उन सूखे पत्तों से जो लगाव था.

स्कूल की पढ़ाई खत्म हो गई. उस से मिले हुए काफी दिन गुजर गए. अकेलापन महसूस होने लगा था और यह अकेलापन मुझे काटने को दौड़ता था. सरोज लौट गई थी अपनी दुनिया में, अपने उन सूखे पत्तों के पास या फिर कहीं और.

फिर एक दिन मैं ने स्कूल जा कर पता किया. कितना बेवकूफ था मैं. इतना वक्त साथ रहे, मगर कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह रहती कहां थी. मैं अपने टीचर के पास गया और सरोज का पता पूछा.

टीचर बोले, ‘‘राघव, पता तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर सरोज तुम्हारे लिए एक चिट्ठी छोड़ गई है.’’

मैं बहुत खुश हुआ, मगर न जाने क्यों मेरे हाथ कांप रहे थे उस चिट्ठी को खोलने में. जिंदगी में पहली बार किसी ने मुझ अनाथ को चिट्ठी लिखी थी.

टीचर बोले, ‘‘अरे, यह क्या? जो राघव हमेशा पढ़ने में अव्वल रहा, आज उस के हाथ इस मामूली सी चिट्ठी को लेने में कांप क्यों रहे हैं?’’

‘‘पता नहीं, सर. मगर यह मामूली नहीं है,’’ इतना कह कर मैं वहां से बहुत तेजी से भाग निकला. और क्या भागा यह मैं भी नहीं जानता. शायद मुझ में हिम्मत नहीं थी उस वक्त का सामना करने की.

मैं बहुत भागा और न जाने क्यों मेरे कदम उस बाग की ओर बढ़ते चले गए, जहां हम अकसर मिलते थे.

मेरी सांसें बहुत तेज चल रही थीं. थकने की वजह से नहीं, डर की वजह से. और डर था उसे खो देने का. डर था मुझे  कि यह चिट्ठी पढ़ते ही मैं उसे खो दूंगा. या उस का मेरे लिए पहला और आखिरी खत था. क्या करूं, कुछ समझ  ही नहीं आ रहा था. अभी पढ़ूं कि नहीं.

मन में हजारों बुरे खयाल आ रहे थे. सांसें भी थमने का नाम नहीं ले रही थीं. फिर सोचा, ‘शायद उस ने इस में अपना नया पता लिखा हो.’

बहुत हिम्मत कर के मैं ने वह खत खोल ही दिया और वह कुछ यों था:

‘प्यारे दोस्त राघव,

‘मैं जानती हूं कि यह खत पढ़ने से पहले तुम ने हजार बार सोचा होगा. तुम्हारे हाथ कांपे होंगे, धड़कनों का शोर कुछ ज्यादा हो गया होगा. मन में हजारों तरह के खयाल आ रहे होंगे और उन में सब से बड़ा सवाल यह होगा कि मेरे दोस्त सूखे पत्ते ही क्यों?

‘राघव, मैं ने तुम्हें कभी नहीं बताया, पर अब बताती हूं. मैं अपने मातापिता की एकलौती लड़की थी. जिस घर में मैं पैदा हुई, वहां लड़की का पैदा होना जुर्म माना जाता था. जब मैं 4 साल की थी, तब मेरे पिता ने मुझे छत से नीचे फेंक दिया था. मैं आंगन में रखे उन सूखे पत्तों के ढेर पर गिरी थी, जिसे कुछ देर पहले मेरी मां ने जमा किया था. तब मैं तो बच गई, मगर मेरा पैर टूट गया था.

‘पिताजी की ऐसी गिरी हुई हरकत देख कर मां ने वहीं पर रखी कुल्हाड़ी से उन की जान ले ली. उन्होंने मुझे  बहुत प्यार से गले लगाया, खूब रोईं. मैं भी रो रही थी. फिर मां ने मुझे  छोड़ा और घर बंद कर के खुद को आग लगा ली. मां भी मर गईं और मैं छोटी सी लड़की 4 साल की उम्र में ही अनाथ हो गई.

‘किसी रिश्तेदार ने मेरी जिम्मेदारी नहीं ली. जिस उम्र में औलाद को उस की मां के सहारे की सब से ज्यादा जरूरत होती है, वह सहारा मुझ  से छिन गया था. मां के आंचल में खेलने की उम्र में मुझे अनाथालय वाले ले गए.

‘वहां जब मैं गई, तो हर बार बस अपना गिरना याद आता था. उस वक्त मुझे बचाने वोल वे सूखे पत्ते ही थे, जिन से मैं ने कभी बात तक नहीं की थी. उन बेजबानों ने मुझे  एक नई जिंदगी दे दी थी. मेरा पैर हमेशा के लिए खराब हो गया था.

‘मैं आज भी हर रोज जब सड़कों पर गिरे सूखे पत्ते देखती हूं, तो मुझे वही ढेर याद आता है. मैं उन का कुछ इसी तरह एहसान मानती हूं कि जब मेरा अपना पिता मेरा अपना नहीं हो सका, तब इन गैर और बेजबान पत्तों ने मुझे सहारा दिया.

‘मुझे  जब भी इस बेहया दुनिया से डर लगता है, मैं अकसर इन्हें खत लिखती हूं. मैं इन का एक ढेर बनाती हूं, फिर एक हवा का झोका आता है और उस ढेर के सब पत्तों को मेरे चारों ओर फैला कर कहता है कि भरोसा रखना सरोज… ये सूखे पत्ते हमेशा तेरे साथ हैं… हमेशा.

‘मैं जानती हूं राघव कि तुम यह खत अभी उसी बाग में बैठ कर पढ़ रहे हो, और तुम्हारी आंखें भीग गई हैं. मुझे माफ कर देना तुम्हें चुपचाप छोड़ कर जाने के लिए. मगर महसूस कर के देखना… मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं, इन सूखे पत्तों की तरह.

‘तुम्हारी सरोज.’

मेरी आंखें सच में भर आई थीं. एक आह निकल गई थी मेरे दिल से. आज समझ आ गया था कि क्यों हैं ये सूखे पत्ते उस के दोस्त… कितना जानती थी वह मुझे .. उसे पता था कि मैं यह खत उस बाग में ही पढ़ूंगा. अब समझ आया कि क्यों मेरे पैर भागतेभागते मुझे  इस बाग में ले आए थे.

मैं सरोज के दोस्तों को ले कर बनाए हुए ढेर में सरोज की दुनिया को बड़े गौर से देख रहा था कि न जाने कहां से अचानक एक हवा का झोका आया, जिस ने उन पत्तों को मेरे चारों ओर फैला दिया और मुझे सच में एहसास होने लगा कि सरोज मेरे बहुत करीब है… बहुत ही करीब…

Story in Hindi : लहूलुहान लव लैटर

Story in Hindi. आदिल अपनी बीवी महविश को दिलोजान से चाहता था. एक दिन महविश ने उस से अजीब सी डिमांड रख दी कि उसे किसी का लव लैटर पढ़ना है. आदिल ने बड़ी मेहनत से लव लैटर लिखा, पर महविश को पसंद नहीं आया. आगे क्या हुआ?

आ दिल जब अपने कमरे में पहुंचा, तो उस की बीवी सो चुकी थी. उस ने धीरे से कबर्ड खोला, अपना कोट उतारा और कबर्ड के एक हैंगर में टांग दिया. फिर बहुत ही आहिस्ता से कबर्ड को पुश कर दिया. ‘खट…’ की आवाज पूरे कमरे में गूंज गई.

सुर्ख जोड़े में दुलहन की तरह सजी आदिल की बीवी चौंक कर उठ बैठी. बिलकुल उसी तरह जैसे वह एक साल पहले शादी की पहली रात उठ कर बैठी थी.

आदिल को शादी की पहली रात का पूरा मंजर याद आ गया. वह अपनी बीवी के पास पहुंचा. उस की बीवी सिमट कर लजाने लगी. घूंघट उस के सिर से गायब था. उस ने अपने सिर पर घूंघट का पल्लू डालने की कोशिश की.

आदिल ने मना कर दिया, ‘‘नहीं, ऐसे ही ठीक है,’’ उस के हाथ में उस की बीवी का हाथ आ गया. नरम और नाजुक हाथ, ‘‘ऐसे ही ठीक है. बिना बदली का चांद. बेवजह घूंघट उठाने की जहमत करनी पड़ती.’’

‘‘मैं सो गई थी.’’ ‘‘मैं जानता हूं. सफर की थकान है.’’ आदिल की बीवी महविश ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की. ‘‘अब तो यह हाथ जिंदगीभर नहीं छोडं़ूगा, कहीं भागने नहीं दूंगा.’’

महविश शरमा गई. आदिल ने उस के शरमाए हुए वजूद को अपने आगोश में ले लिया.

‘‘कहीं भी भागने नहीं दूंगा,’’ कहते हुए आदिल ने करीब की मेज पर रखा हुआ मिठाई का डब्बा उठाया, उसे खोला. काजू बर्फी का एक पीस उठा कर खिलाने लगा. फिर महविश ने भी उसे खिलाया.

‘‘कौन दूर भागना चाहेगा आप से… कोई बेवकूफ ही होगी, जो आप की मुहब्बत को ठुकराएगी, आप से दूर जाएगी,’’ महविश बोली.

‘‘फिर भी मेरे प्यार में कहीं कोई कमी रही हो तो मु?ो बता दीजिए. ऐसी कोई चीज जो मैं आप को नहीं दे पाया हूं, मु?ो बताइए,’’ आदिल ने बच्चे की तरह जिद की.

महविश ने आदिल के बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा, ‘‘एक ख्वाहिश है मेरी, कहीं दिल में दबी हुई.’’ ‘‘कैसी ख्वाहिश?’’

‘‘मैं ने अपनी जिंदगी में कभी भी कोई लव लैटर नहीं पढ़ा है, पढ़ा क्या देखा तक नहीं है. मु?ो कहीं से लव लैटर ला दीजिए. किसी का लव लैटर, किसी को लिखा हुआ. मैं लव लैटर पढ़ना चाहती हूं. देखना चाहती हूं कि लव लैटर कैसा होता है,’’ महविश ने धीरे से कहा. आदिल हड़बड़ा कर उठ बैठा, ‘‘यह कैसी ख्वाहिश है…’’

आदिल यादों से बाहर आ गया. उस की नजर दीवार घड़ी पर पड़ी. रात के तकरीबन 3 बज रहे थे. उस ने एक नजर अपनी बीवी पर डाली. वह बेसुध पड़ी सो रही थी. बहुत ही खूबसूरत लग रही थी.

आदिल कमरे से निकाल कर बालकनी पर आ गया. घर के सामने गार्डन में शाम के प्रोग्राम की निशानियां अब भी बाकी थीं. एक तरफ स्टेज बना था. एक बड़ी सी मेज पड़ी थी. वही मेज जिस पर मैरिज एनिवर्सरी का केक काटा गया था.

केक कटते ही सब ने ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’ बोला था. ‘मुबारकबाद’ बोल कर गिफ्ट पैक भी दिए थे.

आदिल ने सभी के सामने महविश के गले में डायमंड का नेकलेस भी पहनाया था. फिर ‘भटाभट’ गुब्बारे फूटने लगे थे. मेज पर फटे हुए गुब्बारे अब भी नजर आ रहे थे. कुछेक गुब्बारे टैंट की सीलिंग और साइड के परदों पर अब भी चिपके हुए लटक रहे थे. गार्डन के दाएं और बाएं साइड में टेबल और कुरसियों के इर्दगिर्द डिस्पोजल गिलास और पत्तल पड़े हुए थे. स्टेज के साइड में छोटा सा डीजे सिस्टम भी था, जिस पर कुछ जिस्म थिरके भी थे.

आदिल अंदर अपने स्टडी रूम में आ गया. उस ने मेज के नीचे से कुरसी अपनी तरफ खींची. कुरसी पर बैठ गया. लव लैटर लिखने के लिए कागज और कलम उठाया.

‘कैसे लिखूं… कहां से शुरुआत करूं…’ आदिल सोच में पड़ गया. इस मोबाइल फोन ने तो खत लिखना ही भुला दिया. रोजाना सैकड़ो मैसेज लिखते हैं हम… सोशल मीडिया पर, मगर खत लिखना हम भूल गए.

पर कुछ तो लिखना पड़ेगा. आखिर आदिल की प्यारी बीवी महविश को लव लैटर जो पढ़ना है. कुछ सोच कर आदिल ने लिखा :

जानेमन… जाने तमन्ना… जाने अदा.

तु?ो जैसा है सोचा पाया वही

सूरज की किरनों सा इक चेहरा

देखा है तुम सा मैं ने नहीं…

जानेमन, तुम बहुत खूबसूरत हो. इतनी खूबसूरत कि मेरे पास अल्फाज नहीं हैं… मैं कैसे बयान करूं… तुम्हारे गाल गुलाब से हैं. आंखें बहुत ही नशीली और लब संतरे के दो फांक. तुम न मिलती, तो मैं अधूराअधूरा सा लगता. आई लव यू वैरी मच.

तुम्हारा सिर्फ तुम्हारा

आदिल

चलो हो गया. लिख गया खत. आदिल ने राहत की सांस ली. वह अपने कमरे में लौट आया. महविश अब भी सो रही थी. आदिल ने खत को फोल्ड कर के उस के तकिए के नीचे रख दिया.

सुबह हो गई. आदिल रोजाना की तरह समय पर अपने कालेज पहुंचा. तभी उस के स्टाफ ने आ कर उसे घेर लिया.

‘‘यह बात ठीक नहीं है सर,’’ कंप्यूटर टीचर अजीत वर्मा ने कहा.

‘क्या बात ठीक नहीं है?’ कई और टीचर एकसाथ बोल पड़े.

‘‘कल सर की मैरिज एनिवर्सरी थी… बड़ी धूमधाम से.’’

‘‘नहीं, ऐसे ही छोटीमोटी रस्म मना ली थी केक मंगा कर,’’ आदिल बोला.

‘‘आप ?ाठ बोल रहे हैं सर. यह देखिए मेरे पास सुबूत हैं,’’ अजीत फेसबुक की पोस्ट दिखाने लगा. अजीत रोज ही सोशल साइट पर जा कर चैक कर लेता था. देख लेता था कि कौन कहां है और क्या कर रहा है. आज किस का बर्थडे है. किस की मैरिज एनिवर्सरी.

आदिल ने सिर्फ एक फोटो पोस्ट किया था. अपने घर के गार्डन में डैकोरेट किए गए स्टेज का, जिस पर बड़ेबड़े अल्फाज में लिखा था ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’.

‘‘यह तो गलत बात है आदिल साहब. आप को यहां भी पार्टी देनी पड़ेगी,’’ एक सीनियर टीचर ने कहा.

‘‘ठीक है सर मिल जाएगी, लंच टाइम में,’’ आदिल बोला.

लंच टाइम में आदिल को खत के बारे में याद आया. पता नहीं महविश ने खत पढ़ा है या नहीं, पढ़ा होता तो अब तक उस का फोन आ जाता. शायद खत पर उसकी नजर ही न पड़ी हो. शायद उसे फुरसत ही न मिली हो. कल का सबकुछ बिखरा हुआ पड़ा था. उसे गार्डन भी साफ करवाना पड़ा होगा. टैंट का सामान भी भिजवाना पड़ा होगा.

हालांकि, घरबाहर का सारा काम आदिल का छोटा भाई कामरान ही करता है, लेकिन महविश को भी तो देखना ही पड़ता है. घर पर काम वाली भी आती है, मगर उस के पीछेपीछे भी तो दौड़ना पड़ता है.

आदिल ने फोन मिलाया. पूरी घंटी गई. फोन नहीं उठा. उस ने दोबारा मिलाया.

उधर से फोन आदिल की बहन आलिया ने उठाया, ‘‘भैया मैं हूं आलिया… भाभी छत पर हैं. कपड़े धूप में डाल रही हैं…  मोबाइल अभी देती हूं.’’

आलिया मोबाइल फोन ले कर छत पर पहुंची, ‘‘भाभी, भैया का फोन.’’

‘‘हैलो जी, कैसे हैं आप?’’ आलिया बालटी से कपड़े निकालनिकाल कर छत पर बंधे हुए तार पर फैलने लगी. छत पर नरम धूप फैली हुई थी, जो बहुत भली लग रही थी.

‘‘ठीक हूं,’’ आदिल बोला. ‘‘आप को थकान लग रही होगी…’’ ‘‘थोड़ीबहुत. ज्यादा नहीं. अच्छा, तुम्हें कुछ मिला?’’ आदिल ने पूछा. ‘‘क्या?’’ महविश ने पूछा. ‘‘कुछ भी,’’ आदिल ने कहा. ‘‘कल मु?ो बहुतकुछ मिला था. लोगों से गिफ्ट पैक, आप से डायमंड का नेकलेस.’’ ‘‘इस के अलावा… आज कुछ नहीं मिला… तकिए के नीचे?’’

‘‘अच्छा… वह खत. हां, मिला. आप ने लिखा था? लव लैटर ऐसे तो नहीं होते होंगे. सपाट सीधेसादे. न जज्बात, न एहसास… मु?ो असली लव लैटर चाहिए, नकली नहीं. एक महबूब का, उस की महबूबा के नाम या महबूबा का उस के महबूब के नाम. मियांबीवी का भी चलेगा, लेकिन उस में प्यार हो, मुहब्बत हो, जज्बात हों, एहसास हो.’’

महविश बात करतेकरते नीचे उतर आई. उधर आलिया जब कपड़े फैला चुकी, तो वह रैलिंग के पास पहुंची. बाएं साइड वाले घर के गार्डन में एक लड़की खड़ी थी. सजीधजी. मुसकराती हुई.

गली के मोड़ से एक लड़का आता हुआ दिखाई दिया. दुबलापतला. हाथ में कलावा पहने. छोटेछोटे बालों में एक मोटी सी चोटी. माथे पर तिलक. वह लड़का उस लड़की के घर के गेट के बहुत पास से गुजरा. लड़की से कुछ बोला. क्या बोला? आलिया को सुनाई नहीं पड़ा. लड़की हंस दी. लड़का मुसकराता हुआ गली में आगे बढ़ गया.

शाम को आदिल ने महविश से कहा, ‘‘यार, मैं ने बड़ी मेहनत से वह लव लैटर लिखा था. दिमाग पर कितना जोर डाला था, तब कहीं जा कर अल्फाज कागज  पर उतरे थे. और तुम ने मेरा लव लैटर रिजैक्ट कर दिया.’’

‘‘आप ने खत लिखने में बेशक मेहनत की होगी, लेकिन वह सिर्फ लैटर था, लव लैटर नहीं. उस में मुहब्बत नदारद थी.’’

‘‘अच्छा महविश, यह बताइए कि यह लव लैटर वाली ख्वाहिश तुम्हारे दिल में कब पैदा हुई और कैसे?’’

महविश मुसकराई, ‘‘बचपन की बात है. मैं जमात 4 या 5 में पढ़ रही थी. मेरे क्लास में एक लड़का था. जैसे बहुत से लड़केलड़कियां साथ पढ़ते हैं, वह भी पढ़ता था. जैसे सब साथ में खेलतेकूदते हैं, बोलते हैं, लड़ते?ागड़ते हैं. वह भी साथ में खेलता था,  बोलता था. बचपना था. नासम?ा थी मैं. शायद वह नासम?ा नहीं था. शायद वह नादान था. पता नहीं क्या था वह. किस का बेटा था, मैं नहीं जानती.’’ आदिल के चेहरे पर कई भाव आ

रहे थे, जा रहे थे. महविश उस के चेहरे को देख कर शांत हो गई, ‘‘आप कुछ उलटासीधा तो नहीं सोचने लगे. ऐसीवैसी कोई बात नहीं थी. आप गलतफहमी मत पाल लेना.’’

‘‘मैं इतने छोटे दिल का भी नहीं हूं. आगे बताइए. कहानी इंटरस्टिंग लग रही है.’’

‘‘मिस्टर, यह कहानी नहीं है, बल्कि हकीकत है. सुनिए, एक दिन सुबहसवेरे पहले ही घंटे में मेरे स्कूल के हैडमास्टर साहब उस लड़के को बेतहाशा पीटने लगे. वह चिल्ला रहा था. आखिरकार किसी तरह वह लड़का स्कूल से भाग पड़ा था.

‘‘हैडमास्टर साहब के कहने पर कई लड़कों ने उस का पीछा भी किया था, पर वह लड़का पकड़ में नहीं आया. अरहर के खेतों से होता हुआ वह अपने गांव निकल गया था.

‘‘कहते हैं कि वह लड़का अपनी मौसी के यहां पढ़ने के लिए आया था और मौसी के घर में ही रहता था.’’

‘‘लेकिन हैडमास्टर साहब ने उसे इतनी बेदर्दी से मारा क्यों? क्या गलती थी उस की?’’ आदिल के मुंह से अचानक  निकला.

‘‘उस लड़के ने एक लव लैटर लिखा था और वह लव लैटर हैडमास्टर साहब के हाथ लग गया था.’’

‘‘लेकिन वह लव लैटर किस लड़की के नाम था?’’ आदिल ने जिज्ञासु हो कर पूछा.

‘‘मेरे नाम था वह लव लैटर. मु?ो यह बात बहुत बाद में पता चली. तब जब मैं प्राइमरी स्कूल पास कर के जूनियर में आ गई थी.’’ यह सुन कर आदिल अवाक रह गया. बात आईगई हो गई.

आलिया ने छत से देखा कि आज वह लड़का अपनी बाइक से आ रहा था. गली के उसी मोड़ से. बनाठना. वह लड़का पड़ोस के घर के गार्डन में ?ांकता हुआ है या यों कहें कि खुद को उस लड़की को दिखाता हुआ गुजरा. लड़की तैयार खड़ी थी. मुसकराई.  लड़का भी मुसकराया. लड़का बाइक की स्पीड बढ़ा कर तेजी से गली से ओ?ाल हो गया.

थोड़ी देर बाद वह लड़की भी अपने घर से बाहर निकली. बुरके में. सड़क पर आई. एक आटोरिकशा पकड़ा. आटोरिकशा उसी दिशा में चल दिया, जिधर वह लड़का गया था.

आदिल के कालेज में सालाना इम्तिहान शुरू हो चुके थे. आज अंगरेजी का पेपर था. तकरीबन एक घंटा हो चुका था. एक घंटे के पूरा होने पर एक घंटी बजी.

‘‘चलिए सर, राउंड पर चलते हैं,’’ आदिल के एक साथी टीचर अजीत वर्मा ने कहा.

आदिल, अजीत वर्मा और अमित राठौर तीनों राउंड पर चल दिए. उन्होंने रूम नंबर एक से शुरुआत की. वे छात्रों के पास जाते और पेपर उठा कर देखते कि कहीं कोई निशान तो नहीं लगा है. कोई जवाब तो नहीं लिखा है. कौपियां भी उलटपुलट कर देखते. जिस छात्र पर शक होता उस की तलाशी भी लेते. ऐसा  ही करते हुए जब वे रूम नंबर 3 में पहुंचे, तो आदिल को एक लड़के पर शक हुआ, ‘‘स्टैंडअप.’’

लड़का खड़ा हो गया. आदिल ने उस की शर्ट की तलाशी ली. उस की पैंट की दोनों जेबों की तलाशी ली. कुछ भी नहीं निकला. उस की बैल्ट के हुक में भी देखा. वहां भी कुछ नहीं था.

आदिल का शक गलत निकला. उस छात्र के पास नकल नहीं थी. आदिल ने उस लड़के पास वाले लड़के को इशारा किया. वह उठ खड़ा हुआ.

‘‘कुछ नहीं है सर, मैं नकल नहीं लाता हूं,’’ वह लड़का बोला.

आदिल ने उस लड़के की दोनों जब में हाथ डाला. कुछ नहीं मिला. फिर बैक पौकेट में देखा. एक पर्स था, जिस में 100-100 और 200-200 रुपए के कई नोट थे.

‘‘इतने रुपए क्यों ले कर आते हो? 9वीं जमात में पढ़ते हो, कहां खर्च करते हो इतने पैसे? और यह क्या है… रुपयों के बीच में यह परची कैसी है?’’

‘‘सर, यह नकल नहीं है. सर, यह परची मु?ो वापस कर दीजिए… प्लीज सर.’’

‘‘नकल ले कर आते हो, इतना सम?ाने पर भी.’’ ‘‘नहीं सर, यह नकल नहीं है.’’ ‘‘फिर क्या है?’’ आदिल ने पूछा.

लड़के ने सिर झुका लिया. आदिल ने पर्स लड़के को वापस कर दिया.

आदिल की नजर कागज पर लिखी इबारत पर पड़ी. लिखा था, ‘मेरी जान दीपाली…’

‘यह तो लव लैटर है…’ आदिल ने मन ही मन सोचा. उस की आंखों में ऐसी चमक दौड़ गई जैसे कि उस के हाथ कोई खजाना लग गया हो. ‘‘बैठ जाओ,’’ आदिल ने उस लड़के से कहा और परची अपने हाथ में दबा ली. आदिल के दोनों साथी टीचर उस के पास दौड़ आए. एक ने पूछा, ‘‘क्या निकला? लव लैटर है क्या?’’

‘‘लव लैटर नहीं है, न ही नकल सामग्री है. ऐसे ही फालतू की शायरी लिखी है.’’

शाम को आदिल अपने घर बहुत खुशखुश पहुंचा. महविश गार्डन में ही मिल गई आदिल का इंतजार करते हुए.

आदिल को देखते ही महविश भांप गई कि आज कुछ खास बात हुई है.

‘‘क्या बात है, आज आप बहुत खुश नजर आ रहे हैं? प्रमोशन हो गया क्या?’’

‘‘इधर तो आइए… अभी दिखाता हूं… आप भी खुश हो जाएंगी,’’ आदिल ने बाइक खड़ी करते हुए कहा. फिर दोनों साथसाथ घर के अंदर आ गए.

आदिल ने शर्ट की जेब से लैटर निकाल कर महविश के हाथ पर रख दिया और कहा, ‘‘यह रही आप की ख्वाहिश.’’

महविश ने खत को अनफोल्ड किया. खत सुर्ख रोशनाई से लिखा हुआ था :

मेरी जान दीपाली,

फूलों सा चेहरा तेरा, कलियों सी मुसकान है.

रंग तेरा देख के, रूप तेरा देख के, कुदरत भी हैरान है.

आई लव यू. तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मेरे नंबर पर काल करना.  क्या तुम भी लव मी? तुम्हारा दीवाना.

महविश जैसेजैसे खत पढ़ती गई, वैसेवैसे उस के चेहरे पर चमक फैलती गई. ऐसी चमक आदिल ने पहले कभी नहीं देखी थी. आदिल उसे खुश देख कर बहुत खुश हुआ.

‘‘हां , यह है लव लैटर… ऐसे होते होंगे लव लैटर… लफ्ज भले ही ठीक से नहीं लिखे हैं, लेकिन जज्बात और एहसास कितने क्लियर हैं. कहां मिला आप को?’’

आदिल महविश के खिले चेहरे को अपलक देख रहा था, चौंक पड़ा और बोला, ‘‘कालेज में एक छात्र के पास.’’

अगले दिन आलिया शाम के समय अपने गार्डन में बैठी पढ रही थी. एकदम से बगल वाले घर से जोरजोर की आवाजें आने लगीं. लड़ाईझगड़े की आवाजें.

‘‘इस पर नजर रखिए अम्मी, यह नाक कटवाएगी. बदतमीज हो गई है यह.’’

‘‘अम्मी, सुहेल से कहिए, मुंह बंद कर ले अपना… चिल्लाए नहीं.’’

‘‘चिल्लाऊंगा… खूब चिल्लाऊंगा. तू बदतमीज हो गई है, बेहया हो गई है. रातदिन मोबाइल पर लगी रहती है, इधरउधर घूमती फिरती है.’’

‘‘क्यों गला फाड़ रहा है? क्या किया है मेरी बेटी ने?’’ अम्मी की आवाज सुनाई पड़ी.

‘‘अम्मी, इसी से पूछिए कि यह कल कहां गई थी?’’

‘‘बेटी, सच बता कि तू किस के साथ घूमती फिरती है. महल्ले में तु?ो ले कर दबी जबान से बातें हो रही हैं.’’

‘‘अम्मी, मेरे साथ पढ़ता है वह लड़का.’’

इसी बीच मौका पा कर सुहेल ने उस लड़की के हाथ से मोबाइल फोन छीन लिया, ‘‘यह देखिए अम्मी, उस लड़के के साथ इस के कैसेकैसे फोटो और वीडियो हैं… देखिए.’’

अम्मी ने देखा, तो उन के होश उड़ गए, ‘‘हायहाय… तौबातौबा… यह सब क्या है… तेरे अब्बू जानेंगे, तो कयामत बरपा हो जाएगी… तेरी पढ़ाईलिखाई बंद हो जाएगी.’’

तभी अब्बू आ गए, ‘‘क्या हो रहा है? कैसा हंगामा है?’’

सुहेल अब्बू के पास दौड़ गया, ‘‘अब्बू, यह देखिए… आप की परी क्या गुल खिला रही है… यह देखिए.’’

अब्बू ने देखा कि उन की लाडली कलावा, तिलक और चोटी वाले के साथ. उन के होश उड़ गए. सोचने लगे कि परवरिश में कहां कमी रह गई. वे ‘धड़ाम’ से सोफे में धंस गए.

तकरीबन एक हफ्ते बाद की बात है. शाम को महविश अपने गार्डन में पौधों को पानी दे रही थी. हर छोटेबड़े पौधे के पास जाजा कर. पानी पा कर पौधे तरोताजा नजर आने लगते. फूलों की मुसकराहट और बढ़ जाती.

पानी देतेदेते जब महविश कौर्नर वाले पौट के पास पहुंची, तो उसे घास पर कागज की एक गेंद सी दिखाई पड़ी.

महविश ने उठा कर देखा. एक पत्थर पर कागज को लपेट कर गेंद बना दिया गया था… दूर फेंकने के लिए.

महविश ने कागज को सीधा कर के देखा. कागज एक खत था. खत भी साधारण नहीं, बल्कि लव लैटर.

लिखा था :

मेरी प्यारी आलिया,

इधर एक हफ्ते से मैं बहुत परेशान हूं. रातदिन चैन नहीं पड़ता. मेरी तुम से बात नहीं हो पा रही है. मिलनाजुलना, तुम्हें देखना तो दूर की बात. उस दिन तुम्हारे भाई ने तुम्हारे घर पर बड़ा तांडव मचाया. इसी बीच तुम्हारे पिताजी भी आ गए. उन्हें मेरे और तुम्हारे बारे में सबकुछ पता चल गया… कहां तक छिपता. आज नहीं तो कल पता चल ही जाता.

उसी दिन से तुम पर पाबंदी लगा दी गई. तुम्हारा कोचिंग जाना बंद कर दिया गया. तुम्हारा मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया गया.  तुम से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है, इसलिए मजबूर हो कर मैं चिट्ठी लिख रहा हूं.

तुम जानती हो कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकता. तुम्हारे लिए मैं अपना धर्म बदल सकता हूं. इसलाम धर्म अपना सकता हूं. प्लीज, अपने अम्मीअब्बू को सम?ाओ… मनाओ… तुम नहीं मिली, तो मैं जान दे दूंगा.

तुम्हारा आशीष.

खत पढ़ कर महविश का वजूद कांप गया. उस के मुंह से चीख निकल गई. जोरदार डरावनी चीख. ऐसे जैसे कि सामने जहरीला सांप देख लिया हो.

‘‘आलिया…’’ महविश चिल्लाई. आलिया किचन में थी. सब्जी काट रही थी. छुरी रख कर भागती हुई आई, ‘‘क्या हुआ भाभी?’’

महविश बुत बनी खड़ी थी. ‘‘क्या हुआ भाभी?’’ आलिया ने पूछा. महविश ने उस के हाथों में लैटर थमा दिया, ‘‘यह क्या है आलिया?’’

आलिया ने लैटर हाथ में लिया. पहली ही लाइन पढ़ कर वह चकरा गई, ‘‘मेरी प्यारी आलिया… भाभी यह मेरा नहीं है…  मतलब किसी ने मेरे लिए नहीं लिखा है. आलिया एक दूसरी लड़की भी है, जो इस बाजू वाले घर में रहती है.’’

यह सुन कर महविश के चेहरे पर मुसकान दौड़ गई, ‘‘हां, जानती हूं, पर है तो यह लव लैटर है.’’ ‘‘हां भाभी, लव लैटर ही है,’’ आलिया पसीनेपसीने हो गई थी.

‘‘कितना जज्बाती लेटर है यह,’’ महविश की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने अपनी जिंदगी में यह दूसरा लव लैटर देखा था. उस ने आलिया के हाथों से लव लैटर ले कर दोबारा पढ़ना चाहा.

इसी बीच न जाने कहां से कामरान आ गया. उस ने ?ापटा मार कर वह कागज छीन लिया.

‘‘अच्छा, तो यह सब चल रहा है,’’ कामरान ने जल्दीजल्दी पूरा खत पढ़ डाला. खत पढ़ कर वह आगबबूला हो गया. गुस्से से कांपने लगा, ‘‘तुम इसीलिए यहां रह रही हो. तुम्हें शर्म नहीं आती. आजकल महल्ले में हर तरफ आलियाआलिया ही हो रहा है. आज सुबूत मेरे हाथ लगा है. पहले बोलता, तो कोई मानता ही नहीं. सब मुझे सनकी समझते है न…’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है कामरान,’’ महविश ने कहा. आलिया ने भी सफाई दी, ‘‘कामरान, तुम्हें गलतफहमी हुई है. यह लड़की मैं नहीं हूं. यह लड़की दूसरी है. इस पास वाले घर में रहती है.’’

कामरान पर मानो गुस्से का भूत सवार हो गया था, ‘‘तुम यही सब करती रहती हो. गांव में भी तुम्हारे पास लव लैटर मिला था, इसीलिए अब्बा ने तुम्हें यहां शहर में भेज दिया था. तुम भैया का नाम बदनाम करना चाहती हो. भैया की कितनी इज्जत है… लोग क्या कहेंगे?’’

‘‘कामरान, ऐसा कुछ नहीं है,’’ महविश ने समझाना चाहा.

‘‘भाभी, आप नहीं जानतीं… आजकल क्या चल रहा है… हिंदू लड़के मुसलिम लड़कियों को… इस के जैसी बेवकूफ लड़कियों को भगवा ट्रैप में फंसाते हैं… भगा ले जाते हैं… एक मुहिम चला रखी है. उन लड़कों को मकान मिलता है, दुकान भी और नकद पैसा भी. वे लड़के मुसलिम लड़कियों को हिंदू धर्म में दाखिल कर लेते हैं… जहन्नुमी बना देते हैं.

‘‘दूसरी तरफ, अगर मुसलिम लड़का और हिंदू लड़की शादी करना चाहते हैं, तो नहीं कर पाते. मौब लिंचिंग हो जाती है. कचहरी हो या थाना… कहीं भी… यह सब हो रहा है भाभी… और आज अपने घर में भी…’’

‘‘अपने घर में ऐसा नहीं है. यह खत इस बाजू वाले घर की लड़की के लिए है, उस का नाम भी आलिया है.’’

तभी कामरान के हाथ में एक डंडा आ गया. उस ने आलिया पर जोरदार वार कर दिया. आलिया चीख पड़ी. वह चिल्लाती हुई भागी. कामरान ने एक और डंडा मार दिया. आलिया गिर पड़ी और बोली, ‘‘भाभी, बचाओ… समझाओ इसे.’’

‘‘कामरान, रुकोरुको… मारना मत,’’ महविश ने मौका पा कर उस के हाथों से डंडा छीन लिया, ‘‘कामरान, पागल मत बनो…  बात को समझ.’’

उधर आलिया किसी तरह उठी. वह लंगड़ाती हुई भाग पड़ी. कामरान भी उस की तरफ दौड़ पड़ा. आलिया ने अपनी चाल तेज की. करीब ही किचन था. वह किचन में घुस गई. अंदर से दरवाजा बंद करने लगी. तब तक कामरान भी पहुंच चुका था. उस ने जोर से धक्का मारा. दरवाजा खुल गया.

सब्जी के पास छुरी अब भी पड़ी हुई थी. तेज धारदार छुरी. छुरी कामरान के हाथ में आ गई. उस ने आव देखा न ताव छुरी सीधे आलिया के पेट में भोंक दी. एक तेज बहुत तेज खून का फव्वारा फूटा, जो कामरान की आस्तीन के अंदर से होता हुआ, उस की भुजा पर चढ़ गया. आलिया की चीख पूरे घर में गूंज गई. साथ ही साथ महविश की भी.

Family Story : पत्नी की पगार

Family Story. ‘‘अब आप इतना परेशान मत होइए, धीरेधीरे समय के साथसाथ सब अच्छा हो जाएगा… और जब मैं ने कह दिया कि आप के सामने कैसे भी हालात आ जाएं, मैं हमेशा हर कदम पर आप के साथ हूं, तो फिर आप क्यों इतना सोचविचार करने में उलझे हुए हैं?’’ यह कहते हुए प्रिया ने चाय का प्याला शिशिर के हाथ में थमा दिया.

प्रिया के होंठों से फूटने वाले ये शब्द थकेहारे और सच कहें तो हालात के चलते कहीं न कहीं हताशा के घेरे में आ चुके शिशिर को एक बड़ा संबल देने वाले थे.

‘‘…हां, लेकिन अगर मैं इतने पांव न पसारता, तो शायद आज इस मानसिक परेशानी का मुझे मुंह नहीं देखना पड़ता,’’ शिशिर ने धीरे से कहा.

दरअसल, शिशिर ने शहर में एक मकान लिया था. चूंकि मकान शहर की जानीमानी हाई क्लास कालोनी में था, सो उस की कीमत भी हाई क्लास ही थी.

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए सरस सलिल का चैनल सब्सक्राइब करें

मकान खरीदते ही बैंक के कर्ज की एक अच्छीखासी मासिक किस्त शिशिर के पल्ले पड़ गई और यहीं से शुरू हो गया रोजाना के तनाव और मानसिक अशांति का एक सिलसिला.

शिशिर की पगार का एक बड़ा भाग लोन की किस्त खा जाती थी. बचेखुचे पैसों में तमाम दूसरे खर्चे होते थे, जो मुश्किल से ही निबट पाते थे.

शिशिर की पत्नी प्रिया एक बहुत ही समझदार औरत थी. शिशिर को परेशान देख कर वह सब्र से उसे समझाने की कोशिश करती थी, लेकिन धीरेधीरे उसे लगने लगा कि कहीं न कहीं घर के खर्चों को पूरा करने में पैसे की कमी आड़े आ रही है.

एक दिन प्रिया ने शिशिर से कहा, ‘‘सुनिए, कुछ दिन अगर हम लोग अपने खर्चों को कंट्रोल कर लें, तो समय बीतने पर सबकुछ ठीक हो जाएगा.’’

प्रिया की बात पूरी नहीं हुई थी कि शिशिर ने झुंझला कर कहा, ‘‘मैं ने आज तक कभी अपने खर्चों पर कंट्रोल नहीं किया, तो आज कैसे कर लूं… ‘‘सिर्फ और सिर्फ एक मकान की वजह से मुझे  इतनी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. तुम क्या जानो, मुझ  पर क्या गुजर रही है. जाओ और जा कर अपना काम करो.’’

आज शिशिर के ये शब्द प्रिया को कहीं न कहीं चुभ गए थे, क्योंकि हकीकत तो यह थी कि प्रिया के कहने पर ही शिशिर ने शहर में वह मकान खरीदा था.

अब प्रिया ने मन ही मन ठान लिया कि वह शिशिर की पैसे से मदद कर के रहेगी. लेकिन उस ने अपनी योजना का जिक्र किसी से नहीं किया. आसपास के कई स्कूलों में उस ने इंटरव्यू दिए और आखिरकार एक स्कूल में 15,000 रुपए की मासिक पगार पर उस ने नौकरी जौइन कर ली. जब उस ने यह सूचना शिशिर को दी, तो शिशिर के होंठों पर उम्मीद से भरी मुसकराहट छा गई.

अगले ही दिन से प्रिया काफी बिजी रहने लगी थी. सुबह 4 बजे उठना, पूरे घर का खाना बनाना, साफसफाई करना और उस के बाद स्कूल के लिए तैयार होना. दोपहर को 3 बजे तक वापस आना और फिर घर के कामकाज, रात में पढ़ाई करना और फिर 11 बजे सोना, यह उस का रोज का काम हो चला था.

शिशिर की परेशानी पर प्रिया ने अपना सुकून और आराम न्योछावर कर दिया था. उसे मशीन की तरह काम करते देख कर शिशिर कभीकभी अंदर से दुखी हो जाता और कहता, ‘‘तुम नौकरी छोड़ दो, जो होगा वह देखा जाएगा.’’

लेकिन प्रिया भी बहुत जिद्दी स्वभाव की थी. उस ने ठान लिया था कि जब तक हालात ठीक नहीं हो जाते, तब तक वह शिशिर की मदद करती रहेगी.

आज ही सब्सक्राइब करें सरिता 
 आपके लिए स्पेशल छूट

सरिता

और एक दिन वह आया जब प्रिया ने कड़क चाय के प्याले के साथ शिशिर को एक सफेद लिफाफा थमाया. शिशिर ने लिफाफा खोल कर देखा, तो उस में 15,000 रुपए रखे हुए थे.

यह प्रिया की पहली पगार थी. आज दोनों की खुशी का कोई ठिकाना न था. सच तो यह था कि शिशिर को अपनी पगार आने से कई गुना ज्यादा खुशी और सुकून प्रिया के दिए हुए उस सफेद लिफाफे में रखे 500 के 30 नोटों को छू कर मिला था.

शिशिर ने उन पैसों को एक अलग गुल्लक में डाल दिया और उस पर लिख दिया ‘पत्नी की पगार’.

प्रिया की पहली पगार के साथ ही मानो कुछ चमत्कार सा होने लगा. शिशिर जो अब तक परेशान रहता था, धीरेधीरे सुकून की ओर बढ़ने लगा. वक्त बीतता गया और उस के साथ ही शिशिर के सिर पर से कर्ज का बोझ  भी धीरेधीरे कम होने लगा.

तकरीबन 10 साल की उतारचढ़ाव भरी जिंदगी के बाद आखिरकार शिशिर की प्रमोशन हुई और अब उस की पगार अच्छीखासी हो गई थी. कुछ ही सालों में उस ने बैंक का सारा कर्ज चुकता कर दिया. बैंक से लोन अदायगी का सर्टिफिकेट पा कर उसे ऐसा लग रहा था मानो किसी बंधन से छुटकारा मिल गया हो.

खुशी से झुमता हुआ शिशिर घर पहुंचा. आज प्रिया भी अपने स्कूल से जल्दी आ गई थी. शिशिर कुछ सोच ही रहा था कि चाय के प्याले के साथ एक सफेद लिफाफा उस की ओर बढ़ाते हुए प्रिया ने कहा, ‘‘मैं जानती हूं कि अब आप के लिए इस छोटी सी मदद का कोई मोल नहीं है, लेकिन मैं इसे अपने पास नहीं रख सकती, क्योंकि मेरे लिए सब से खाद आप की खुशी और सुकून है,’’ यह कहते हुए प्रिया की आंखों में आंसू छलक आए.

शिशिर ने प्रिया को अपने पास बिठाया और आंसू पोछते हुए कहा, ‘‘शायद तुम नहीं जानतीं कि मेरे सब से मुश्किल दिनों में इसी सफेद लिफाफे ने मुझे  मेरा मानसिक सुकून लौटाया था. आज भी मैं अपनी पगार से कई गुना ज्यादा इज्जत इस सफेद लिफाफे को देता हूं, इसलिए मेरी तुम से विनती है कि भविष्य में कभी ऐसे शब्द मत बोलना.’’

प्रिया का सिर शिशिर के कंधे पर टिका था और दोनों मुसकराते हुए सामने देख रहे थे. सामने रखा गुल्लक मानो प्रिया के सफेद लिफाफे का बेसब्री से इंतजार कर रहा था.

इतने पुराने गुल्लक पर शिशिर के लिखे हुए शब्द आज भी उम्मीद की खुशबू बिखेरते हुए साफ चमक रहे थे और वे जादुई शब्द थे ‘पत्नी की पगार’.

लेखक :  शिशिर शुक्ला

Story : बसंती

Story. गांव का एकलौता पुरोहित भोला इस बात से पूरी तरह वाकिफ था कि मरने से पहले बसंती की मां बेटी के पास कुछ चांदी के सिक्के व जेवरात छोड़ गई है, जिसे किसी बहाने से हासिल कर के वह कुछ दिनों के लिए अपनी बदहाली तो दूर कर ही सकता है.

थोड़ी देर में ही पूजा का काम खत्म कर उस ने एक गहरी नजर से बीमार सुमन की ओर देखा. फिर बसंती की ओर मुखातिब हो कर बोला, तेरी बेटी को कोई प्रेतात्मा परेशान कर रही है. अब इसे बचाना बड़ा मुश्किल है. अच्छा होगा कि तू इस मनहूस बच्ची का मोह छोड़ कर फिर से गोद भरने की कोशिश करे.

पुरोहित से ऐसा जवाब सुन कर बसंती दुखी आवाज में बोली, बाबा, अगर मेरी एकलौती बेटी मर गई, तो फिर मैं अपनी सूनी गोद ले कर यह पहाड़ सी जिंदगी कैसे काट पाऊंगी? बसंती की इस कमजोरी से पुरोहित को अपने अंधविश्वास का तीर सही निशाने पर लगने का एहसास हुआ. उस ने सहज ही यह जान लिया कि अब देरसवेर वह उस की झोली  में जरूर आ गिरेगी.

पुरोहित भोला मन ही मन मुसकराते हुए मीठी आवाज में बोला, तेरी मां अपने मन में धनदौलत का मोह लिए ही मर गई, इसलिए उस की आत्मा प्रेतलोक में बेचैन भटक रही है. अब वही बेचैन आत्मा प्रेतलोक से लौट कर इस घर में आ बैठी है, जिस के असर से तेरी गोद और सुमन की जिंदगी दोनों खतरे में है.

तो फिर इस प्रेतात्मा से पीछा छुड़ाने का कोई उपाय बताइए बाबा? बसंती ने सहमते हुए पूछा. तुम फौरन अपनी मां के सारे जेवरात और चांदी के सिक्के अपने हाथ से छू कर किसी ब्राह्मण को दान कर दो. उसी दान की बदौलत सुमन को एक नई जिंदगी मिलेगी और तुम्हें मां बनने का सुनहरा मौका.

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए सरस सलिल का चैनल सब्सक्राइब करें

पुरोहित की कही बात पर गंवार बसंती ने पूरी तरह यकीन कर लिया. फिर भी वह अपनी लाचारी जाहिर करते हुए बोली, “लेकिन बाबा, मैं तो बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर पहले से ही अपने सारे जेवर बेच चुकी हूं, अब इस हाल में मां के जेवर भी दान में दे दूंगी, तो फिर वक्त पड़ने पर किस के आगे हाथ पसारने जाऊंगी? कौन सहारा देगा मुझे ’’

बसंती की मजबूरी को सुन कर पुरोहित को अपना खेल बिगड़ता नजर आया. लेकिन तुरंत ही लोभ का दूसरा पासा फेंकते हुए वह बोला, ‘‘क्या तेरे मन में बेटा पाने की तनिक भी लालसा नहीं है?’’ ‘‘लालसा तो कब से लगी है…’’ बसंती झेंपते  हुई बोली, ‘‘सिर्फ एक बेटे की कमी से मेरी पूरी जिंदगी बोझ जैसी बन गई है. एक बेटा पाने के लिए मैं कब से तरस रही हूं.’’ ‘‘तो ठीक है, कल सुबह तुम अपनी मां के सारे जेवर मुझे दान में दे देना. फिर देखना, मैं तेरे अंधेरे घर में कितनी जल्दी उजाला कर देता हूं,’’ इतना कहते हुए भोला की नजर बसंती की देह से फिसलती हुई वहां जा कर ठहर गई, जहां लोहे की पुरानी संदूकची पड़ी हुई थी.

अब बसंती को पुरोहित की नीयत समझने में जरा भी देर नहीं हुई, पर घर में अकेली और देह से कमजोर बसंती मन मसोस कर रह गई. ‘‘अब क्या सोचने लगी?’’ भोला ने उसे टोका, ‘‘क्या मेरा सुझाव ठीक नहीं लगा?’’ ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं,’’ बसंती ने ऊंची आवाज में नफरत से कहा, ‘‘अपनी गोद दोबारा भरने के लिए मां के कीमती जेवर किसी और के हाथ में देने की हिम्मत मुझ में नहीं है.’’

बसंती के इस रूखे बरताव ने पुरोहित के लहलहाते अरमानों पर ओले बरसा दिए. फिर भी पुरोहित ने हार नहीं मानी और धीमी आवाज में बोला, ‘‘जब बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर तुम ने अपने जेवर बेच दिए, तो दोबारा मां बनने की उम्मीद में तुम अपनी मां के पुराने गहने पुरोहित को दान में नहीं दे सकतीं? जानती नहीं, पुरोहित को दिया हुआ दान लोकपरलोक दोनों को सुधारता है?’’

पुरोहित ने एक बार फिर उस संदूकची की ओर देखा, तो बसंती का रोमरोम एक अनजाने खौफ से सिहर उठा. अभी वह खामोश खड़ी थी कि पुरोहित की पत्नी कमला पति को तलाशती हुई वहां आ पहुंची और तेज आवाज में बोली, ‘‘क्योंजी, यजमानी के इस काम से जो आमदनी होती है, उसे आप शराब और गांजा पीने में उड़ा देते हैं, फिर यह धंधा सिर पर ढोने से क्या फायदा, जब घर में बीवीबच्चे रोटी के लिए तरस रहे हों?’’

‘‘ठीक है, आज का ‘सीधा’ बसंती बहू से ले लो और घर जा कर भोजन बनाओ,’’ पुरोहित ने पत्नी को टालने की नीयत से कहा और जल्दी से पोथीपतरा समेट कर दूसरे यजमान के घर कथा बांचने चला गया.

सरिता

आज ही सब्सक्राइब करें सरिता 
आपके लिए स्पेशल छूट

भोला के जाते ही ‘सीधा’ लेने के लिए ठहरी कमला बसंती को उदास देख कर संजीदगी से पूछ बैठी, ‘‘इस पूजापाठ के पीछे तेरी क्या मुराद है बहू?’’ ‘‘मासूम बेटी की सलामती, जो अब मुमकिन नहीं लगती.’’ ‘‘ऐसा क्यों?’’ कमला उतावली हो कर पूछ बैठी, ‘‘क्या इस पूजापाठ पर तुझे बिलकुल भरोसा नहीं?’’ ‘‘भरोसा तो है चाची, लेकिन आज के पुरोहित पूजापाठ की ओट में अपने यजमान को उलटा पाठ पढ़ाना शुरू कर दिए हैं. धर्मकर्म के नाम पर अब ये ढोंगी अपने यजमान का धन और धर्म दोनों लूट लेना चाहते हैं.’’

‘‘यह तुम क्या बकने लगी बहू?’’ कमला हैरत से बोली, ‘‘मैं ने क्या पूछा और तू जवाब क्या देने लगी?’’ ‘‘सच कहती हूं चाची…’’ बसंती का गला भर आया, ‘‘बेटी की लंबी बीमारी ने मुझे बुरी तरह से झकझोर दिया है और इसी आफत में पुरोहितजी दोबारा गोद भरने का लालच दे कर मेरा सबकुछ ठग लेना चाहते हैं.’’ बसंती की पीड़ा सुन कर कमला का दिमाग झनझना उठा. उस के हाल पर तरस खा कर वह बोली, ‘‘ठीक है बहू, इस समय मैं खाना बनाने जा रही हूं. लेकिन शाम को इस बारे में तुम से फिर बात करूंगी.’’

शाम को कमला बसंती से मिल कर उस की आपबीती से पूरी तरह वाकिफ हो चुकी थी. दूसरे दिन सुबह पुरोहित जैसे ही कथा बांचने के लिए बसंती के घर पहुंचा, तो उस के पीछेपीछे कमला भी आ गई. पत्नी को इस तरह आया देख पुरोहित अपनी लाल आंखों से उसे घूरते हुए रूखे स्वर में बोला, ‘‘आज सुबह से ही तुम मेरे पीछे क्यों पड़ी हो? क्या चाहती हो तुम?’’ ‘‘बस यही कि अब आप यह यजमानी का पेशा छोड़ दीजिए,’’ कमला ने कहा. ‘‘वह क्यों?’’ भोला ने हैरत से पूछा.

‘‘क्योंकि अब यह पेशा शरीफ ब्राह्मणों का सुकर्म नहीं, बल्कि खातेपीते ब्राह्मणों का कुकर्म बन गया है. अब यह पेशा पुरोहित और यजमान के पाक रिश्ते के बीच एक ऐसी दरार पैदा करता जा रहा है, जो आने वाले दिनों में दोनों की शराफत पर एक सवालिया निशान लगा सकता है,’’ कमला ने पति की ओर देख कर संजीदगी से कहा.

पुरोहित ने जोर से चीख कर कमला को एक जबरदस्त धक्का दिया, जिस से वह सामने की दीवार से जा टकराई और उस का सिर लहूलुहान हो गया. चोट बड़ी गंभीर लगी थी. कमला फूटफूट कर रो पड़ी, लेकिन भोला पर इस का कोई असर नहीं हुआ. वह गुस्से में अपनी पत्नी को और भी भलाबुरा कहने लगा.

पति की घुड़की से बेअसर कमला बरसती आंखों से उसे देखती हुई बोली, ‘‘आज मुझे भी पता चल गया है कि पुरोहित कितना नीच और घटिया इनसान होता है, जो अपने यजमान की मजबूरी पर तरस खाने के बजाय उस की दौलत व इज्जत लूटने को तैयार हो जाता है.

‘‘अब मेरे लिए विधवा की जिंदगी जी लेना आसान है, मगर किसी ढोंगी, लोभी, पाखंडी, ठग और धर्मकर्म का पेशा करने वाले पुरोहित की सुहागन बन कर जी लेना आसान नहीं. ऐसा कभी नहीं होगा.’’ इतना कह कर कमला जैसे ही वहां से चलने को हुई कि अचानक पुरोहित के भीतर का इनसान जाग उठा और कमला के सिर पर हाथ रखते हुए वह भरे गले से बोला, ‘‘तेरी कसम, यह पूजापाठ, हवन, जाप, लोकपरलोक, पुरोहित और यजमान सब बनावटी बातें हैं.”

‘‘अब इस गलत काम को मैं कभी नहीं दोहराऊंगा. ऐसे दकियानूसी विचारों में कोरे अंधविश्वास व दिमागी वहम के सिवा कुछ और नहीं है. तुम आखिरी बार मुझे माफ कर दो.’’  फिर कमला बिना पति की ओर देखे बसंती की बीमार बेटी सुमन को गोद में उठा कर तेज कदमों से डाक्टर के पास चल पड़ी. Story

Hindi Story: लोकलाज का इलाज

Hindi Story: डाक्टर राहुल रात को थकेहारे घर लौट कर चैन की नींद सोए ही थे कि अस्पताल से फोन गया. एक बुजुर्ग की हालत बहुत गंभीर थी. डाक्टर राहुल अस्पताल पहुंचे. क्या वे उस मरीज को बचा पाए? दिनभर अस्पताल की भागदौड़ के बाद जब डाक्टर राहुल शाम को घर लौटे, तो थकान जैसे उन के पूरे शरीर में उतर आई थी. कई घंटे लगातार आपरेशन, मरीजों की भीड़ और लगातार आते फोन ने उन की रगरग को थका दिया था. घर पहुंचे तो पत्नी ने चिंता से पूछा, ‘‘इतना थक गए हो राहुलसब ठीक तो था आज अस्पताल में?’’ राहुल ने मुसकराने की कोशिश की, ‘‘आज का दिन बहुत भारी था. लगातार आते मरीज, एक से एक गंभीर केस. बस, अब थोड़ी देर चैन से बैठना चाहता हूं.’’

पत्नी ने गरमागरम खाना परोसा, दोनों ने साथ खाना खाया. हलकीफुलकी बातें हुईं, फिर डाक्टर राहुल बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में खो गए. रात के तकरीबन साढ़े 11 बजे फोन की घनघनाहट ने घर की शांति को तोड़ दिया. पत्नी ने फोन उठाया. फोन पर अस्पताल का रेजिडैंट डाक्टर था, जिस की आवाज में घबराहट साफ झलक रही थी, ‘‘मैम, एक बहुत गंभीर मरीज आया है. 85 साल के बुजुर्ग हैं. तेज बुखार है, होश नहीं है. परिवार वाले कह रहे हैं कि डाक्टर राहुल ही उन की आखिरी उम्मीद हैं.
‘‘सरपंच रामकुमार भी उन के साथ हैं. वे कह रहे हैं कि डाक्टर साहब उनके पुराने परिचित हैं. अगर राहुल सर को एक बार बुला लें, तो शायद मरीज बच जाए.’’
पत्नी बेचैन हो गई थीं. डाक्टर राहुल अभी गहरी नींद में थे. पूरे दिन की थकान के बाद बस कुछ पल आराम के मिले थे.

पत्नी ने रेजिडैंट डाक्टर को समझाने की कोशिश की, ‘‘डाक्टर राहुल बहुत थके हुए हैं. उन की तबियत भी ठीक नहीं है. आप ही इलाज शुरू कीजिए, सुबह होते ही वे खुद देख लेंगे.’’ रेजिडैंट डाक्टर ने कहा, ‘‘मैं संभाल लेता हूं मैम. मैं सब टैस्ट और दवाएं शुरू कर देता हूं.’’ पत्नी ने राहत की सांस ली, ‘‘कम से कम आज तो राहुल को थोड़ा आराम मिल जाएगा.’’ पर मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. 15 मिनट बाद फिर फोन बजा. इस बार आवाज में हताशा थी, ‘‘मैम, मरीज के परिवार वाले नहीं मान रहे. उन का कहना है कि सिविल अस्पताल और बाकी डाक्टरों ने जवाब दे दिया है.
‘‘सब ने कहा है कि अब सिर्फ डाक्टर राहुल ही देख सकते हैं. सरपंच रामकुमार खुद कह रहे हैं कि राहुल सर उन के दोस्त हैं, वे जरूर आएंगे.’’

पत्नी की हालत विचित्र थी. एक ओर डाक्टर राहुल की थकान और उन का सख्त निर्देश था किआज किसी भी हालत में मुझे जगाया जाए’, दूसरी ओर एक जिंदगी की आखिरी सांसें थीं. पत्नी ने इनसानियत का पक्ष चुना और धीरे से डाक्टर राहुल को जगाया और सारी बात बताई. डाक्टर राहुल बिना कोई सवाल किए तुरंत उठे, कपड़े बदले और अस्पताल पहुंच गए. वहां उन्होंने बुजुर्ग मरीज पाला राम की जांच की. उन्हें तेज बुखार था, दिमाग पर चढ़ गया था और होश खो चुका था. डाक्टर राहुल ने तुरंत इलाज शुरू किया, टैस्ट करवाए, दवाएं दीं और परिवार वालों को समझाया,

‘‘इनकी हालत नाजुक है, लेकिन मैं पूरी कोशिश करूंगा.’’
3 घंटे की मेहनत के बाद पाला राम की सांसें सामान्य हुईं, आंखें खुलीं और बुखार उतरने लगा. डाक्टर राहुल के चेहरे पर राहत झलकने लगी. परिवार के एक सदस्य ने हाथ जोड़ कर धन्यवाद दिया,
‘‘डाक्टर साहब, आप ने तो कमाल कर दिया.’’
डाक्टर राहुल मुसकराए, पर ज्यादा कुछ बोले नहीं.
अगली सुबह तकरीबन 4 बजे डाक्टर राहुल घर लौटे और थकान से चूर हो कर सो गए. सुबह अस्पताल पहुंचे तो देखा कि पाला राम की हालत और सुधर रही थी.
डाक्टर राहुल ने परिवार वालों को समझाया, ‘‘अब लगातार दवाएं देते रहिए, एक हफ्ते में हालत काफी बेहतर हो जाएगी.’’
पर बाहर वार्ड के कोने में फुसफुसाहटें शुरू हो चुकी थीं, ‘‘हम तो सोच रहे थे कि यह आज रात ही मर जाएगा, अब तो बचता दिख रहा है.’’
‘‘अब 7 दिन अस्पताल में रखेंगे, तो पैसे कहां से आएंगे?’’
‘‘इतना खर्च कौन करेगा, जब सब डाक्टरों ने पहले ही कह दिया था कि यह नहीं बचेगा?’’

धीरेधीरे उन कानाफूसियों ने एक फैसले का रूप ले लिया. अगले दिन परिवार वालों में से एक ने डाक्टर राहुल से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, हमारी बहू सिविल अस्पताल में भरती है, उस का भी केस गंभीर है. हम 2 जगह इलाज नहीं करा सकते. कृपया छुट्टी दे दीजिए, हम मरीज को घर ले जा कर देखभाल करेंगे.’’
डाक्टर राहुल ने उन्हें बहुत समझाया, ‘‘पाला राम की हालत अभी पहले से बेहतर है, लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं. अगर अब इलाज बीच में छोड़ा, तो हालत फिर बिगड़ जाएगी.’’
परिवार वालों ने सिर झुका दिया. सच यह था कि वे खर्च से घबराए
हुए थे. पैसे थे, इच्छा, पर गांव में यह स्वीकार करना किहम इलाज का खर्च नहीं उठा सकतेउन्हें समाज में बेइज्जती वाला काम लगता, इसलिए उन्होंने अपनीलाजको झूठ का जामा पहन लिया.
पाला राम को छुट्टी दे दी गई. राहुल ने आखिरी बार कहा, ‘‘कम से कम दवा और इंजैक्शन समय पर लगवाते रहिए, तभी उम्मीद है.’’

उन्होंने सिर हिला कर हामी भरी, पर वह सिर्फ औपचारिकता थी. 15 दिन बाद गांव का वही सरपंच रामकुमार अस्पताल आया. डाक्टर राहुल ने पूछा, ‘‘अब कैसे हैं पाला राम?’’ सरपंच रामकुमार ने गहरी सांस ली, ‘‘कल रात उन की मौत हो गई.’’ डाक्टर राहुल सन्न रह गए, ‘‘कैसे? वे तो ठीक हो रहे थे…’’ सरपंच ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘घर ले जा कर उन्होंने सारी दवाएं बंद कर दीं. गांव वालों से कहा, डाक्टर राहुल ने खुद जवाब दे दिया है, अब बस सेवा करो. शायद पैसे की भी तंगी थी, पर असली वजह थी लोकलाज. ‘‘उन्हें डर था कि गांव वाले कहेंगे कि शहर में रह कर इलाज क्यों नहीं करवाया? क्यों उस को
बचाने की कोशिश नहीं की गई? इसलिए उन्होंने झूठ बोलना ही आसान समझा.’’
डाक्टर राहुल लंबे समय तक चुप रहे. मन में तूफान था. एक ओर डाक्टर के रूप में उन का काम, जो पूरी ईमानदारी से निभाया गया था, दूसरी ओर समाज का वह सच, जहां झूठी लाज के लिए लोग जिंदगी की डोर काट देते हैं.

डाक्टर राहुल ने सोचा, ‘गरीबी तो फिर भी किसी दिन मिट सकती है, पर यह दिखावे की बीमारीयह समाज के भीतर का जहर है, जो आदमी से उस का इनसान छीन लेती है.’ उस रात डाक्टर राहुल बहुत देर तक छत की ओर टकटकी लगाए रहे. उन की आंखों में सिर्फ एक चेहरा था, पाला राम का, जो मरते समय शायद यह भी नहीं जानता था कि उसे उस के अपने ही लोग उस की झूठीइज्जतके लिए मौत की तरफ धकेल गए. डाक्टर राहुल की आंखों से एक बूंद गिरी. वह आंसू किसी मरीज के लिए नहीं था, बल्कि उस समाज के लिए था, जो आज भीलाजके नाम परजिंदगीकी कीमत चुका देता है.   

डा. सुभाष चंद्र गर्ग ‘पार्थ’

Hindi Story: तुम, मैं और 2 कप चाय

बारिश की हलकी फुहार थी. सड़क किनारे वही पुरानी सी चाय की दुकान, जहां अकसर भीड़ नहीं होती थी.
संजय वहां बैठा था, हाथ में गरम चाय का कप लिए.
तभी सवि आई और बोली, ‘‘आज भी यहीं बैठे हो?’’
संजय ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हां, लगा तुम आओगी.’’
सवि संजय के सामने बैठ गई. दुकानदार ने बिना पूछे चाय का दूसरा कप रख दिया.
सवि ने पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे पता मैं चाय पीऊंगी?’’
‘‘पिछले 3 सालों से हर मुश्किल
में तुम ने चाय ही तो मांगी है,’’

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करें

https://youtube.com/shorts/jzrcLfzA29U?si=O-Oc_W-AGvgLkOmF


संजय बोला.
सवि हंस पड़ी. वही हंसी, जिस में सुकून था.
सवि बोली, ‘‘कभीकभी लगता है, हमारी पूरी कहानी इन्हीं 2 कप चाय में सिमटी है.’’
संजय ने कहा, ‘‘हां, एक तुम्हारे
हाथ में, एक मेरेऔर बीच में ढेर
सारी बातें.’’
कुछ पल खामोशी रही. बारिश तेज हो गई.
सवि धीमे से बोली, ‘‘अगर मैं कभी दूर चली जाऊं तो?’’
संजय बोला, ‘‘तो भी यहां कर
2 कप चाय मंगाऊंगा. एक तुम्हारे
इंतजार में.’’
सवि ने संजय की ओर देखा. आंखों में नमी थी, पर चेहरे पर मुसकान.
सवि ने पूछा, ‘‘कभी कहा क्यों नहीं कि तुम मुझ से…’’
संजय बीच में बात काट कर बोला, ‘‘डरता था, कहीं चाय की यह आदत भी छूट जाए,’’ फिर वह मुसकरा दिया.
सवि ने संजय का हाथ थाम लिया और बोली, ‘‘पागल, प्यार कहा नहीं जाता, महसूस किया जाता है. जैसे
यह चाय.’’ बारिश थम रही थी. चाय खत्म हो चुकी थी, पर कहानी नहीं.
संजय ने पूछा, ‘‘तो कल फिर?’’
सवि बोली, ‘‘हांतुम, मैं और
2 कप चाय.’’
उस दिन संजय को समझ आया
कि प्यार बड़े वादों में नहीं, छोटी
दुकानों, गरम चाय और सच्चे इंतजार में होता है.                             

संजय सिंह चौहान

Hindi Story: एहसास

Hindi Story: बाहर दिन का उजलापन केंचुल बदल कर शाम की सुरमई चादर ओढ़ने लगा था. रंगबिरंगे पक्षियों के झुंड किलकारियां भरते अपने नीड़ की ओर दांडी मार्च कर रहे थे. सड़क और गलियों में कार्पोरेशन की लैड लाइटों की रोशनी का दूधिया शामियाना तन चुका था. प्रकाश बाबू का मन एक रोमांचक जोश से भरा हुआ था. शुभ्रा को लड़के वाले देखने रहे थे. वे पत्नी सहित अगवानी के लिए दरवाजे पर खड़े थे. 4 का समय तय था, घड़ी की सूइयां 5 बजा रही थीं. एकएक पल की देर से  दिल बैचेन हुआ जा रहा था. बड़े लोगों की मसरूफियत अलग किस्म की होती है. कोई जरूरी काम पड़ा हो और प्रोग्राम टाल दें. पत्नी के कहने पर मोबाइल से बात करना चाहते ही थे कि एक इनोवा कार सरपट लपकती इसी ओर आती दिखी. कार का नंबर देख कर सुकून मिला. लड़के वाले ही थे.

कार पास कर रुकते ही दोनों ने मेहमानों का स्वागत किया और उन्हें अंदर ड्राइंगरूम में ले आए.
वे 5 जन थे. अभिषेक, उस के मातापिता और बहन बहनोई. इसी शहर में उन का कपड़े का कारोबार था. अभिषेक कंप्यूटर इंजीनियर था और शुभ्रा एमबीए. दोनों ही बैंगलुरु में अलगअलग जगह जौब पर थे.
नाश्ताचाय देने के बाद पहलगाम कांड आपरेशन सिंदूर पर छोटे से पोस्टमार्टमी संवाद के बाद अभिषेक की बहन ने हंस कर कहा, ‘‘आंटीजी, अब सस्पैंस खत्म भी कीजिए और अपनी लाल परी के हमें दर्शन कराएं,’’ उस के नाटकीय अंदाज पर सभी खिलखिला पड़े. शुभ्रा अपने रूम में तैयार हो रही थी. उस की सहेली काजल हंसीमजाक करती सहयोग कर रही थी. बादामी रंग का सूट. गले, बांह दामन पर महीन बेलबूटों की हलकी कढ़ाई. बाएं कंधे पर सीधा दुपट्टा. साधारण सी ज्वैलरी.

आईने के सामने आई तो काजल चहकी, ‘‘वाह, देखते ही वह कार्टून गश खा कर कहीं गिर पड़े यार…’’ फिर शुभ्रा की दोनों भौंवों के बीच में नन्ही
सी काली बिंदी लगाती हुई बोली,
‘‘यह बिंदी नहीं है, उस कार्टून की
तिरछी नजरों से प्रोटैक्ट करने के लिए ठिठौना है…’’
दोनों ठहाका लगा कर हंस पड़ीं
कि ड्राइंगरूम से मम्मी की आवाज आई, ‘‘काजल, देर करो और शुभ्रा को
ले आओ…’’
‘‘सोच ले, साथ में चल रही हूं
मैं. कहीं तेरी जगह  दिल मचल गया उस कार्टून का तो…’’ काजल ने मजाक किया.
‘‘तो क्याउस पर अभी कौपीराइट थोड़े ही लगा है. ऐसे सौ कार्टून कुरबान मेरी यार पर. अभी यह देख कि अपनी शादी में वेटर का रोल ही करना पड़ रहा.’’
दोनों धीमी चाल से चलती ड्राइंगरूम में आईं. शुभ्रा आगेआगे और काजल पीछे उस के दुपट्टे का छोर थामे. जैसे राजकुमारी और बांदी.

शुभ्रा के हाथ में ड्राई फ्रूट्स की ट्रे थी. अभिषेक के पास जगह खाली रखी गई थी. ट्रे को टेबल पर रख कर शुभ्रा वहां बैठ गई. बैठते हुए नजर तितली सी उड़ती अभिषेक पर पड़ी तो एकदम से चौंक उठी. अरेइस चेहरे को कहीं देखा है पहले. वह चौकन्नी हो गई. भीतर बैठी छठी इंद्री तेजी से यादों के मलबे को कुरेदने में लग गई. कहां देखा होगाकालेज मेंमार्केट मेंया किसी दोस्ताना फंक्शन में. दोनों के शहरों के बीच सिर्फ 30 किलोमीटर का ही तो फासला है. परंपरागत इंटरव्यू एक घंटे चला. सामने तो वह खुश दिख रहा था, पर मन कश्मकश में था. यह तो बिलकुल तय है कि पहले मिल चुके हैं, पर कहांपरिचय का लिंक मिल ही नहीं रहाऊफउस की याद्दाश्त तो खूब तेज है. पढ़ाई में टौपर रही है. फिरलौटने के लिए सभी उठ खड़े हुए तो अभिषेक ने उसे एक ओर ले जा कर कहा, ‘‘ऐसा करते हैं कि कल
मैथान डैम चलते हैं. तफरीह भी हो जाएगी और एकदूसरे को भी लेंगे, ठीक?’’

‘‘बिलकुल,’’ शुभ्रा भी यही चाहती थी. जब तक इस कार्टून से पुरानी मुलाकात का लिंक याद नहीं जाता, रिश्ते के लिए हां नहीं करेगी.
‘‘कल सुबह 10 बजे आप गांधी मोड़ पर कीमाधुरी स्वीट्सके पास मिलें. मैं वहां पहुंच जाऊंगा, ओके…’’
चैन कमबख्त किसी भी तरह नहीं पड़ रहा था. टीवी देखते, बुक पढ़ते और फेसबुक ब्राउज करते. बहुत पुरानी बात तो हो नहीं सकती. फिर भी क्यों नहीं याद रही
रात के 9 बज गए. कल की एक अधूरी पढ़ी कहानी को पूरा करने की कोशिश करने लगी. पढ़ते हुए एक जगह रैगिंग का मामला आया तो अचानक उस कार्टून से जुड़ी घटना डौल्फिन मछली की तरह उछालें भरने लगी जेहन में
सुभाष इंस्टीट्यूट औफ इंजीनियरिंग एंड मैनेजमैंट. मेन गेट परवैलकम फै्रशर्सका बड़ा सा बैनर. कैंपस नएपुराने छात्रछात्राओं के शोर से गूंजता. कालेज में पहला दिन था, धड़कते दिल से ही भीतर गई. शहरी कालेज का मौडर्न माहौल मन में दहशत भर रहा था.
तभी जाने किस ओर से 3 लड़के जिन्न की तरह प्रकट हो गए.
‘‘हाई.. फर्स्ट ईयर की न्यू कमर हो ? हम तुम्हारे सीनियर्सपहला दिन दोस्ताना परिचय के नामठीक…’’

तीनों ने उस से हाथ मिलाया और हंसीमजाक करते दूसरी मंजिल के
एक रूम में गए. दरवाजा बंद सा
कर दिया.
‘‘घबराने का नहीं. बोले तो थोड़ा रैगिंग करने को मांगता बौस कोहलकाफुलका. पहला दिन का शगुन…’’ शांतनु नेमुन्नाभाईके अंदाज में
बोलते हुए पास खड़े मनोज की ओर संकेत किया.
मनोज की ठुड्डी के ऊपर बिंदु के शक्ल की दाढ़ी थी. बदन के कपड़े भी महंगे थे. चेहरे पर अलग रुआब. उस के बाद ऊलजुलूल सवालों का सिलसिला शुरू हुआ.
शुभ्रा शर्म से पानीपानी हुई जा रही थी, जबकि लड़कों के चेहरों पर पानी था ही नहीं, पर वह आत्मविश्वास के साथ जवाब देती गई.
‘‘वैलआज का रैगिंगवा का आखिरी इवैंट…’’ मनोज बोली में बिहारी लहजे का छौंक देता हिनहिनाया, ‘‘देखिए जे हमरा दोस्त अभिषेक आमिर खान जैसा दिखता. दिखता है ? बसआगे बढ़ कर छोटा सा किस करेगा आप को. उस के बाद फिनिश. होंठ पर नहीं, ललाट पर. एतना रियायत दे रहे, ठीक?’’
‘‘प्लीज, मु? जाने दें. रैगिंग के नाम पर ऐसी बेहूदगी ठीक नहीं, शुभ्रा ने बड़े अदब से कहा और
इस बात का ध्यान रखा
कि चेहरे पर डर के भाव उभर पाएं. अभी 3 साल गुजारने हैं यहां.
‘‘यह बेहूदगी हैअरेहम तो शराफत वाली रैगिंग कर रहे यार. लौक्ड कमरे की ओवरनाइट रैगिंग आप ने देखी कहां…’’ शांतनु फनफनाया, ‘‘रैगिंग तो सीनियर्स का हक है, जो अगले साल आप को भी मिल जाएगा.’’
‘‘प्लीज, माफ करें. मु? से यह सब नहीं हो सकेगा. ऐसा हक मु? नहीं चाहिए,’’ अंदर से बेहद डर भी गई थी.
अचानक मनोज तल्ख आवाज में चिल्ला पड़ा, ‘‘बहुत हुआ ड्रामाअभिषेक, आगे बढ़ो,’’ उस की कड़क आवाज पर सभी डर से सहम गए.
अभिषेक हड़बड़ा कर आगे बढ़ा और शुभ्रा के ललाट पर ?ाट से किस जड़ कर पीछे हट गया.
तो यह कार्टून उर्फ अभिषेक वही आमिर खान है. पूरी घटना आंखों के आगे जिंदा हो आई. कैसी तो हवस
टपक रही थी चेहरे से. जिस लड़के
के मन में औरतों के लिए जरा भी
इज्जत नहीं, जिस का चरित्र ढीला हो
उस से शादीकभी नहीं. परआसानी से नहीं छोड़ेगी. कल जरूर मिलेगी. पहले जम कर क्लास लेगी, फिर मना कर देगी.
दूसरे दिन तय समय परमाधुरी स्वीट्सके पास गया अभिषेक. ओला कार से उतरते देख कर मजाकिया हंसी, ‘‘इनोवा के रहते एक भाड़े की
कार से…’’
‘‘हांकभीकभी आम जन की भीड़ का हिस्सा बन कर भीड़ में चलने का मजा ही कुछ और होता है,’’ अभिषेक के होंठों पर मोहक मुसकान तितली सी नाच रही थी. शुभ्रा मन में हंसी, लफ्फाजी में भी अव्वल.
दोनों मैथान डैम पर गए. 2 गेट खुले हुए थे और बेग से गिरता दूधिया पानी सिहरन से भर रहा था. सैर के दौरान हर मुद्दे पर बातें होती रहीं. क्या अभिषेक को रैगिंग का वाकिआ याद नहीं आया? आया है तो असल मुद्दे पर क्यों नहीं रहे बरखुरदार.
दोनों पार्क में चले आए. वहां सैलानियों की खूब चहलपहल थी. अभिषेक पुचका यानी पानी पूरी के ठेले के पास गया.

‘‘शायद तुम्हारे मन में वह रैगिंग वाली घटना अभी भी गांठ बन कर जमी हुई है…’’
‘‘वह घटना साधारण लग रही है आप कोसाधारण. एक हफ्ते तक अपसैट रही थी मैं. उस लंपट के एक इशारे पर लपक कर किस कर बैठनाएक लड़की की इज्जत का जरा भी खयाल नहीं आया…’’ शुभ्रा फट पड़ी.
‘‘जैसा तुम सम? रही हो मैं वैसा नहीं हूं. लड़कियों और औरतों के लिए मेरे मन में खूब इज्जत है. छुटपन से ही ऐसे संस्कार मिले हैं. पूरी अकैडमिक लाइफ में लड़कियों की ओर बुरी नजर से कभी देखा ही नहीं, विश्वास करोपर उस समय मैं मजबूर था.’’
‘‘मजबूर…’’ पुचका मुंह में डालता हाथ थम गया.
‘‘हांमनोज का बाप एमएलए था. गवर्निंग बौडी का चेयरमैन भी. गंदी रैगिंग के कई रिकौर्ड थे मनोज के नाम. इन लोगों से पंगा ले कर कालेज में पढ़ पाना मुश्किल होता. तुम्हें 3 साल गुजारने थे. बात हलकी किस पर छूट रही थी, सो तुम्हारे फायदे के लिए करना पड़ा.’’
‘‘क्या बकवास हैउस समय आप की आंखों में लिजलिजी चमक देखी थी…’’ रूमाल से मुंह पोंछती शुभ्रा के लहजे में मजबूती थी, ‘‘मैं आप से शादी नहीं कर सकती…’’
‘‘लिजलिजी चमक नहीं धुआंता गुस्साकहो तो मां की कसम खा सकता हूं…’’ अभिषेक बोला.
‘‘चलिए, वहां कोन वाली कुल्फी खाते हैं,’’ थोड़ा आगे ही कुल्फी स्टौल था. शुभ्रा मामला बदलती स्टौल की ओर बढ़ गई. स्टौल से एक लड़की बाहर निकल रही थी कि 2 लड़के शरारत से जानबू? कर उस से टकरा गए. कुल्फी धप्प से नीचे.

‘‘सौरीसौरी…’’ बापी आंख मारते हुए बोला, ‘‘आइए, कौर्नैटो से भी अच्छी कुल्फी आइसक्रीम खरीद कर दूंगा…’’ और बेहिचक उस की कलाई थाम कर बाहर की ओर खींचने लगा.
लड़की डर से चीख पड़ी, ‘‘यह क्या कर रहे हो, हाथ छोडि़ए.’’
अभिषेक की नजर पड़ी, तो लड़के की हिमाकत पर हैरान रह गया. तेजी
से पास कर बोला, ‘‘अरे वाह, सरेआम गुंडई…’’
‘‘तुम बीच में क्यों टपक रहे हो? हम मैडम से बात कर रहे हैं ,’’ उस के साथी बकुल ने अभिषेक को धक्का दे कर कहा.
इस धक्के से अभिषेक नीचे गिर पड़ा. कोहनी छिल गई. शुभ्रा घबरा गई. वह लड़की कलाई छुड़ाते हुए बोली, ‘‘हर्जाने की कोई बात नहीं दादा. इट्स ओके.’’
कलाई छूटी तो बकुल ने लड़की का दुपट्टा खींच लिया, ‘‘कुल्फी तो हमारे संग खानी ही होगी मैडम.’’
यह देख कर अभिषेक की आंखों में खून उतर आया. लपक कर बापी का कौलर पकड़ कर चीखा, ‘‘दुपट्टा दीजिए इन का, नहीं तो…’’
‘‘ओहइतनी गरमी…’’ एक विलेन जैसी खिलखिलाहट के संग छाती पर एक जोरदार फाइट. अभिषेक की दर्दीली कराह निकल गई और सिर चकरा गया.
बापी उस लड़की की बांह पकड़ कर फिर से खींचने लगा. जोर से खींचने से लड़की कुछ कदम आगे घिसट गई.
शुभ्रा बड़बड़ा उठी, ‘‘किडनैपिंग…’’
वह लड़की डर से चिल्ला रही थी, ‘‘प्लीज हैल्पबचाओ…’’
इन लोगों की ?ाड़प से मजमा
जुट गया वहां. मजमे में मजा लेने वाले ज्यादा थे. लड़कों की मवाली वाली हरकतें लोगों के मन में खौफ भर
रही थीं.

शुभ्रा की बड़बड़ाहट अभिषेक ने
सुन ली. सचमुचलड़कों के इरादे खतरनाक हैं. लड़की को यों खतरे में छोड़ देना गवारा नहीं हुआ उसे.
शुभ्रा का कलेजा किसी अनजाने डर से धकधक कर रहा था, पर आगे बढ़ते अभिषेक को रोकने की हिम्मत भी कर सकी. अभिषेक के दिमाग में कभी के सीखे कराटे के एकमुश्त दांव जुगुनू से चिलक उठे. खड़ी हथेलियों को क्रौस में ला कर टांग घुमाते हुए बापी की गरदन और बकुल की जांघों पर सीधी चोट की. बापी की आंखों के आगे तारे नाच गए, जबकि बकुल मांमांचिल्लाता दोनों हाथों से अपनी जांघ के कोमल हिस्से को पकड़े उकड़ू ढह गया.
शुभ्रा उस लड़की का हाथ पकड़ कर भीड़ की ओर दौड़ गई. अभिषेक भी उस ओर दौड़ना चाह रहा था कि तभी बापी के हाथ में धारदार छूरा चमक उठा. अभिषेक थम गया. भागना नहीं सामना करना होगा अब. छुरे पर नजर जमाए पैंतरा तौल रहा था कि बापी का हाथ लहराया और बांह पर गहरा जख्म बन गया.
दर्द से अभिषेक की चीख निकल गई. वहां से लहू बहने लगा. गुस्से से चेहरे और गरदन की नसें खिंच गईं. दांत भींचते हुए पगलाया सा बापी पर खड़ी हथेलियों और टांगों से यों कराटे फेंके  कि छुरे समेत बापी दूर जा गिरा.
तभी पुलिस वैन का सायरन गूंज गया. दोनों लड़के लंगड़ाते हुए किसी तरह उठे और पलक ?ापकते गायब हो गए. उन के जाते ही भीड़ की हमदर्दी तीनों के नजदीक सिमट आई.
आननफानन शुभ्रा ने एक आटोरिकशा रोका. लोगों की मदद से घायल अभिषेक को आटोरिकशा में चढ़ाया. आटोरिकशा घर की ओर तेजी से दौड़ चला.
शुभ्रा की नम आंखों में अभिषेक के लिए अथाह प्यार हिलोरें मार रहा था. अगर आज अभिषेक होता तोदुपट्टे को उस की बांह के जख्म पर बांधती बुदबुदाई, ‘‘माय लवमाय हीरो…’’

महावीर अग्रवाल

Hindi Story: ममता की जीत

Hindi Story: 3 बच्चों की विधवा मां राधा की वीरान जिंदगी में विजय  बहार बन कर आए. दुनिया की परवाह करते हुए उन्होंने राधा से शादी की. राधा खुश हो गईं. पर क्या राधा की जिंदगी में वाकई बहार आई थी? विजय का असली मकसद क्या थागंगा के किनारे बसे छोटे से कसबे इटावा में, जहां नदियां पुरानी लोककथाएं गाती हैं और खेतों की हवा में सोने सी धूप नाचती है, एक घर था जो कभी खट्टीमीठी हंसी से गूंजता था. वह घर था राधा कालकड़ी की पुरानी दीवारें और छत पर चढ़ी जूही की लताएं, जो हर सुबह भीनी खुशबू देती थीं.


राधा एक साधारण, सांवली औरत थीं. उम्र 40 के करीब, लेकिन जीवन ने उन के चेहरे पर गहरी और कठोर झुर्रियां उकेर दी थीं. उन के पति हरि प्रसाद एक मेहनती और सिद्धांतवादी किसान थे, जो खेतों में दिनरात खटते, भविष्य के सपने बोते थे. 5 साल पहले, उन की जिंदगी एक झटके में थम गई. हरि प्रसाद की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई. ट्रैक्टर पर बाजार जाते वक्त एक तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें कुचल दिया. इटावा के छोटे अस्पताल में डाक्टर केवल निराशा में सिर हिला सके.


हरि प्रसाद की मौत के बाद, राधा ने टूट कर भी हिम्मत बांधी. वे अपने 3 बच्चों… 2 बेटियां और एक बेटाके साथ अपने मायके लौट आई थीं. मायका कानपुर के बाहरी इलाके में बसा एक शांत, कृषिप्रधान गांव हरिपुरा, जहां राधा देवी की मां सरला और पिता रामलाल रहते थे. हरिपुरा हराभरा था. गेहूं की सुनहरी फसल हवा में लहराती थी और शाम को गायें अपने खुरों की आवाज के साथ घर लौटती थीं. राधा को लगा था कि इस ममता की छांव में उन्हें और बच्चों को शांति मिलेगी. बच्चे स्कूल जाएंगे और वे छोटेमोटे काम कर के घर चलाएंगी.


लेकिन विधवा होना, खासकर एक छोटे गांव में, आसान नहीं होता. गांव वाले इशारे करते. उन के कानाफूसी भरे शब्द तीर बन कर राधा के आत्मसम्मान को भेदते थे. गांव की औरतें इशारों में कहतीं, ‘‘अरे राधा, अब तो बड़ी बेटी को ब्याह दोवरना दुनिया की बातें सुनसुन कर जीना मुश्किल हो जाएगा. जवान विधवा का क्या भरोसा?’’ राधा चुपचाप सब सहतीं. उन के पास विरोध करने की शक्ति नहीं थी, केवल सहनशक्ति थी. बड़ा बेटा छोटू सिर्फ 10 साल का था, पर पिता की तरह खेतों में बड़ों के साथ मदद करता. बेटियां सीता (8 साल की) और गीता (6 साल की) डर कर मां की गोद में सिर छिपातीं.


राधा दिनभर घर संभालतीं. खेतों में काम करतीं. रात को बच्चों को पुरानी लोककथाएं सुनातीं और लोरी गातीं. लेकिन अंदर का खालीपन हर रात उन की नींद और मन की शांति चुरा लेता था. वे अकसर तकिए में मुंह छिपा कर रोती थीं. एक दिन गांव के मेले में राधा की नजर एक अजनबी पर पड़ी. उन का नाम विजय था, जो लखनऊ के बाहरी इलाके के रहने वाले थे और एक ठेकेदार थे. लंबा कद, गोरा रंग और उन की मुसकान इतनी भोली थी कि राधा का बेजान दिल भी एक पल के लिए धड़क उठा.


विजय मिट्टी के बरतनों के स्टौल पर खड़े थे. राधा ने वहां से रंगबिरंगा दीया खरीदा. विजय ने दीया लपक कर पैक किया और शरारती हंसी के साथ बोले, ‘‘दीया जला दो बहनजीलेकिन इस रोशनी में खुद को भी देखना, कहीं अंधेरा छिप जाए. जिंदगी में उजाला रखना जरूरी है.’’ राधा मुसकराईं. यह सालों बाद पहली बार था कि वे दिल से मुसकराई थीं. बात बन गई. विजय ने बताया कि वे विधुर हैं, उन की पत्नी लंबी बीमारी से चल बसीं और उन के कोई बच्चे नहीं हैं. विजय ने अपनी जादुई बातों का सिलसिला जारी रखा, ‘‘जीवन छोटा है बहनजीहंसते रहो, रोते रहोगे तो आंसू भी थक जाएंगे. हर दिन एक नया मौका होता है.’’


विजय की बातों की मिठास, उन की हमदर्दी और स्नेह राधा के तड़पते दिल को सालों बाद छू गया. वे उन्हें अपने जीवन में एक नई आशा जैसे लगे. धीरेधीरे विजय हरिपुरा आने लगे. वे बच्चों के लिए फल ले कर आते, छोटी बच्चियों के लिए खिलौने लाते. वे छोटू से खेती की बातें करते. राधा की मां सरला को शक हुआ. उन्होंने राधा को टोका, ‘‘बेटी, गांव में बातें हो रही हैं. यह बारबार क्यों आता है?’’ राधा ने अपनी मां सरला को समझाया, ‘‘मां, हमारी बस दोस्ती हैइस खाली दिल को थोड़ी सी गरमाहट मिलती है. वे बहुत नेक इनसान हैं.


लेकिन दोस्ती रुकती कहां है, जब दिल प्यार और सहारे के लिए तरस रहा हो. एक शाम तेज बारिश हो रही थी. घर सो चुका था. तभी अचानक विजय आए. विजय ने राधा का हाथ पकड़ा, उन की आंखों में देखा और गंभीर स्वर में कहा, ‘‘राधामैं तुम्हें इस अकेलेपन में तड़पते नहीं देख सकता. यह तुम्हारे लिए नहीं है. शादी कर लो मुझ सेमैं तुम्हारे बच्चों को अपना नाम दूंगा. मैं तुम्हें वह खुशी दूंगा जो सालों से खो गई है. तुम्हारी हर सांस में खुशबू भर दूंगा.’’


राधा का दिल पूरी ताकत से धड़का. वे डर और उत्साह के बीच फंसी थीं. विधवा हो कर दोबारा शादी, गांव क्या कहेगा, बच्चे क्या सोचेंगे. लेकिन विजय की आंखों में सच्चा वादा था. 6 महीने बाद, सामाजिक विरोधों के बावजूद, उन्होंने सादे विवाह में सात फेरे लिए. राधा की मां सरला ने आंसू भरी आंखों से आशीर्वाद दिया. सरला ने कहा, ‘‘बेटीखुश रहना. अपना जीवन फिर से शुरू कर.’’ शादी के बाद विजय का काम लखनऊ में था, जबकि राधा बच्चों की पढ़ाई और गांव की जमीन के कारण हरिपुरा में ही थीं. विजय हफ्ते में 2-3 बार आते.


शुरुआत में सब अच्छा था. प्यार, हंसी और भविष्य की योजनाएं. लेकिन जल्द ही असली रंग दिखने लगे. पहले प्यार, फिर झगड़े. विजय ने एक शाम गुस्से में भर कर कहा, ‘‘तेरे बच्चेमेरे गले की फांस बन गए हैं. मैं यहां आता हूं, तो मुझे आराम नहीं मिलता, बस उन की देखभाल करनी पड़ती है. मुझे आजादी चाहिए.’’ राधा का दिल टूट कर बिखर गया. उन की आंखें अचानक नम हो गईं. उन्होंने हिम्मत बांध कर कहा, ‘‘विजयजीये मेरे कलेजे के टुकड़े हैं, निर्दोष हैं. आप ने शादी से पहले वादा किया था.


एक रात झगड़ा सीमा लांघ गया. विजय ने हिंसा का सहारा लिया और हाथ उठाया. राधा का गाल लाल हो गया. अंदर असहनीय दर्द की लहर दौड़ गई, लेकिन वे चुपचाप सह गईं. दूसरा रिश्ता भी टूटना नहीं चाहिए, इसी डर ने उन्हें जकड़ लिया. विजय का गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ता गया. वे चिल्लाए, ‘‘मैं नया जीवन चाहता हूंएक नया परिवार. इन पुरानी जंजीरों से आजादी…’’ राधा हर तरह से विजय को मनाने की कोशिश करती रहीं. वे उन का मनपसंद खाना बनातीं, उन के कपड़े धोतीं, घर साफ रखतीं. लेकिन विजय शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से और दूर होते गए.


एक साल बाद, राधा गर्भवती हुईं. उन के दिल में खुशी की लहर दौड़ी. यह विजय का अपना बच्चा था.
राधा ने उम्मीद से भर कर कहा, ‘‘विजयजीहमारा बच्चा होगा, हमारा अपना. अब सब ठीक हो जाएगा.’’
विजय का चेहरा काला पड़ गया. उन की आंखें गुस्से से लाल थीं. वे चीखे, ‘‘क्या बकवास है यह?
मैं नहीं चाहता यह बोझ. मेरे पास पहले से 3-3 बच्चे हैं. मुझे यह जिम्मेदारी नहीं चाहिए.’’ राधा का दिल धक से रह गया. आंसू छलक आए. उन्होंने डरते हुए, प्यार से कहा, ‘‘लेकिनयह हमारा है, हमारी खुशी की निशानी है.’’ विजय गुस्से में घर छोड़ कर चले गए और पूरे हफ्ते नहीं आए. जब लौटे तो धमकी भरे लहजे में बोले, ‘‘अगर यह बच्चा पैदा हुआ तोमैं तुम्हें और इन चारों बच्चों को छोड़ कर घर छोड़ दूंगा सब छोड़ दूंगा. मैं तुम्हें तलाक दूंगा.


राधा सिसकियां रोक नहीं पाईं. उन्होंने अकेले ही अपना गर्भ संभाला. मां सरला ने ममता और नैतिकता का सहारा दिया. सरला ने उसे दिलासा दिया, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा, बस हिम्मत मत हारना. तू अकेली नहीं है.’’ राधा रातें रोते काटतीं. विजय आतेजाते रहते, पर प्यार नहीं. वे मानसिक रूप से राधा को तंग
करते रहे. विजय ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए कहा, ‘‘मैं बाहर देख रहा हूंएक लड़की हैयुवा, बिना किसी बोझ की. मैं उस के साथ शादी करूंगा.’’ राधा चुप रहीं. उन का दिल हर पल चुभता. गर्भ के महीने कटे, पेट बढ़ा, और दर्द भी. गांव वालीं ताने मारतीं.


गांव की औरतें कहतीं, ‘‘राधा, संभल करविधवा हो कर दोबारा शादी, अब यह सब. इस नए बच्चे का क्या होगा? क्या पता क्या होगा आगे.’’ राधा मुसकरातीं, अंदर ही अंदर जलतीं और अपने आंसू पी जातीं. वे अपने अजन्मे बच्चे के लिए मजबूत बनी रहीं. 20 अक्तूबर की सुबह तेज प्रसव पीड़ा हुई. मां सरला ने पुरानी दाई बुलाई. घर में अचानक हलचल मच गई. छोटू अपनी मां को तड़पते देख कर रोया.
दाई ने खुशी से कहा, ‘‘लड़का होगासेहतमंद, मजबूत.’’ दोपहर को सेहतमंद बेटा जनमा. राधा ने उसे गोद में लिया. असीम खुशी के आंसू लुढ़क आए.


राधा ने फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘मेरा बेटातू मेरा सहारा है, मेरी जिंदगी. तेरा नाम छोटे हरि होगा.’’
नाम रखा गया छोटे हरि. विजय शाम को आए, पर उन का चेहरा उदासी और असंतोष से भरा था.
विजय ने ठंडे स्वर में कहा, ‘‘अच्छा हैलेकिन अब क्या होगा? अब जिम्मेदारी और बढ़ गई.’’
राधा ने टूटे दिल से उम्मीद जताते हुए कहा, ‘‘परिवार पूरा हो गयाअब सब ठीक हो जाएगा. खुश हो जाओ हमारे लिए.’’ विजय की हंसी कड़वी निकली. वे बोले, ‘‘खुश? यह बोझ और बढ़ गयामेरे सपनों पर, मेरे भविष्य पर.

मैं इस सब को नहीं सहूंगा.’’ राधा का सीना दुखा. विजय उसी रात गुस्से में चले गए. अगली सुबह विजय लौटे. उन के हाथ में एक थैला था. राधा बच्चे को दूध पिला रही थीं. विजय ने बच्चे को देखा और तुरंत घबराए हुए स्वर में कहा, ‘‘बच्चा कमजोर लग रहा हैबुखार है, गंभीर. इसे तुरंत डाक्टर के पास ले जाना है.’’ राधा घबरा गईं. उन का दिल जोरों से धड़कने लगा. वे बोलीं, ‘‘क्या हुआ? मैं भी चलूंगीअपने बेटे के साथ.’’ विजय ने झूठा बहाना बनाया, ‘‘नहींतुम थकी हो, आराम करो. कानपुर का बड़ा अस्पतालआईसीयू में रखना पड़ेगा. 2-4 दिन की बात हैचिंता मत करो.’’


राधा ने कांपते हाथों से बच्चा विजय को सौंपा. उन की आंखें डर और अविश्वास से भरी थीं.
राधा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘सावधान रहना जीयह मेरी जान है. इसे कुछ नहीं होना चाहिए.’’
विजय ने रूखेपन से कहा, ‘‘हांमैं हूं .’’ विजय बाइक पर चले गए. राधा खिड़की से उन्हें देखती रहीं. उन की बेचैनी बढ़ती गई. पहले दिन फोन आया. विजय ने कहा, ‘‘निमोनिया हैगंभीर. 2 दिन और लगेंगेडाक्टर कह रहे हैं.’’ राधा का कलेजा मुंह को आया. वे आंसू बहाती रहीं. उन्होंने दोबारा पूछा, ‘‘मैं जाऊंअपने बेटे के पास…’’


विजय का जवाब था, ‘‘नहींइंफैक्शन फैलेगा, तुम्हें भी हो जाएगा. तुम घर पर इंतजार करो.’’
दूसरे दिन फोन आया. विजय बोले, ‘‘अब ठीक हैलेकिन औब्जर्वेशन में रखा है.’’
राधा रातदिन रोतीं. सरला ने सांत्वना दी, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा. खुद पर भरोसा रखो.
तीसरा दिन फोन नहीं आया. राधा ने फोन किया, नंबर बंद रहा. उन का दिल बैठता गया.
चौथे दिन विजय घर आए. उन का चेहरा पीला पड़ा था, लेकिन वे शांत दिख रहे थे.
विजय ने कहा, ‘‘बच्चाअब ठीक है. अस्पताल में ही छोड़ा हैकल ले आएंगे. उस की हालत अब सुधर
गई है.’’


राधा गले लगीं, खुशी के आंसू छलके, ‘‘धन्यवाद जीमेरी जान बचाई आप ने.’’ लेकिन विजय की आंखें झूठी लगीं. वे डर और छिपाव से भरी थीं. दिन बीतते गए, विजय के बहाने चलते रहे, ‘‘डाक्टर ने कहाएक हफ्ता और.’’ राधा का दूध सूख गया. उन की ममता उफनती रही. वे रोईं, ‘‘मेरा बेटा भूखा होगामां का दूध मांगेगा. मैं उसे कब देखूंगी?’’ गांव की औरतें कानाफूसी करतीं, ‘‘बच्चा कहां है राधा? इतने दिनों तक अस्पताल में क्यों?’’ राधा झूठा आत्मविश्वास दिखाती, ‘‘अस्पताल मेंठीक हो रहा है. जल्दी आएगा.’’
शक बढ़ता गया. एक रात राधा ने डर समाए पूछा, ‘‘सच बताओ जीमेरा बेटा ठीक है ? आप झूठ तो नहीं बोल रहे?’’


विजय चिल्लाए, ‘‘चुप रहोसब ठीक है, बस चुप. ज्यादा सवाल मत पूछो.’’ राधा कांप उठीं. सरला ने राधा को अलग बुलाया. सरला बोलीं, ‘‘बेटीकुछ गड़बड़ है, मेरा दिल कह रहा है. पता करोजल्दी.’’
29 अक्तूबर की शाम, भयानक हलचल मच गई. गांव का एक लड़का दौड़ादौड़ा आया. लड़का बोला, ‘‘मां जीतालाब के पास कुछ मिला है. किसी बच्चे की लाश…’’ हरिपुरा के बाहर 300 मीटर दूर एक सूखा तालाब था, जहां झाडि़यां उग आई थीं. गाय चराने वाले ने एक पौलीथिन में लिपटा हुआ कुछ देखा था. उस ने खोला. नवजात बच्चे का शव निकला. गांव वाले जमा हो गए.


कोई बोला, ‘‘ओह, कौन सा बच्चा है यह?’’ किसी ने पहचान लिया, ‘‘राधा का तो गायब है.’’ सरला तुरंत दौड़ीं, ‘‘बेटीतालाब चल, जल्दी.’’राधा गईं. उन के पैर लड़खड़ाए. भीड़ जमा थी. पौलीथिन खुली पड़ी थी. छोटा शरीर, नीला पड़ गया था. राधा चीखीं. उन की चीख से पूरी दुनिया थम गई. राधा आह भरते हुए बोलीं, ‘‘मेरा बेटामेरा छोटे हरि.’’ राधा दौड़ीं छू ने, लेकिन गांव वालों ने दर्द से रोका. कोई चाचा बोले, ‘‘नहीं राधापुलिस को बुलाओ. इसे छूना नहीं.’’ राधा सिसकती रहीं, ‘‘कौनकौन कर सकता है यह? मेरा मासूमकिस शैतान ने?’’


सरला ने राधा को गले लगाया, ‘‘बेटीसंभाल खुद को. तू अकेली नहीं है.’’ 112 पर फोन किया गया. पुलिस आई. इंस्पैक्टर राजेश सिंह. शव को कवर किया गया. राधा को थाने ले गए. थाने में राधा बैठी थीं. उन की आंखें सूजी थीं, दिल टूट चुका था. इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘‘क्या हुआ थासब बताओ. हमें सच जानना है.’’ राधा बयान देती रहीं. उन का गला रुंधता गया. राधा बोलीं, ‘‘साहबविजय ने किया, मेरे पति. वे नहीं चाहते थे बच्चाबोझ कहता था. उन्होंने मुझे झूठ कहा कि वह अस्पताल में है…’’ इंस्पैक्टर बोला, ‘‘तहरीर लिखाओसब लिखो. हम तुम्हें इंसाफ दिलाएंगे.’’ राधा ने कांपते हाथों से दस्तखत किए. पुलिस तलाश में निकली.


राधा घर लौटीं. छोटू ने पूछा, ‘‘मांभाई कहां है?’’ राधा ने टूटे स्वर में कहा, ‘‘नहीं रहा.’’ राधा रातभर जागीं, दर्द से करवटें बदलती रहीं. सुबह विजय पकड़े गए. कानपुर हाईवे पर भागते हुए. उन के खून लगे कपड़े मिले. वे टूट गए. विजय ने स्वीकार किया, ‘‘हांमैं ने मार डाला. वह रातभर रो रहा थामुझे बोझ लग रहा था. मैं ने राधा को झांसा दिया थाअब सब खत्म. मैं आजाद होना चाहता था.’’ पोस्टमार्टम हुआगला दबा कर हत्या निकली. कोर्ट चला. राधा गवाह बनीं. उन की आंखों में आग सुलगती रही. राधा ने कहा, ‘‘वह मेरा पति थालेकिन शैतान निकला. उस ने मेरी ममता को मारा.’’ विजय को सजा सुनाई गई. उम्रकैद. राहत मिली, पर दर्द नहीं गया.


राधा हरिपुरा में, अकेले बच्चों को पालती रहीं. वे तालाब जातीं, फूल चढ़ातीं, आंसू बहातीं. राधा बोलीं, ‘‘बेटामां के पास आया कर, सपनों में ही सही.’’ जीवन चला, लेकिन छाया रही. विधवा की, मां की, टूटे सपनों में जीती. सुबह सूरज उगता, गंगा बहती. राधा खेत जातीं, बच्चों को स्कूल भेजतीं. शाम को घर संभालतीं. रात को लोरी सुनातीं, छोटा सा कोना खाली रहता. छोटू बड़ा होता, बेटियां पढ़तीं. राधा मुसकरातीं, दर्द छिपातीं. गांव चुप, हमदर्दी देता. विजय जेल में था. वहां से चिट्ठी भेजता… ‘माफ कर दोअब पछता रहा हूं.’


राधा चिट्ठी फाड़ देतीं, ‘‘कभी नहींकभी नहीं.’’ सरला बूढ़ी हो गईं, रामलाल चल बसे. राधा ने सब संभाल लिया. छोटू ने कहा, ‘‘मांमैं डाक्टर बनूंगा, बच्चों को बचाऊंगा. कोई मासूम बच्चा नहीं मरेगा.’’
राधा की नम आंखें, गर्व से भर गईं, ‘‘हां, बेटाबिलकुल बनो, मेरे छोटे हरि की तरह.’’ राधा की बेटियां बोलीं, ‘मैं टीचरमैं पुलिस…’ राधा गले लगाई, खुशी के आंसू बहे, ‘‘सब बनोमेरे सपने बनो.’’ छोटू अब 20 साल का था. कानपुर मैडिकल कालेज में एमबीबीएस कर रहा था. छोटे हरि की मौत ने उसे इतना झकझोर दिया कि उस ने कसम खाई कि कोई मासूम नवजात उस की वजह से नहीं मरेगा.


छोटू रातदिन पढ़ता, गरीब बच्चों का मुफ्त इलाज करता. गांवदेहात के इलाकों में कैंप लगाता, मां की तरह दर्द समझता. उस का सपना था, हरिपुरा में छोटा क्लिनिक खोलेगाछोटे हरि की याद में.
सीता अब 18 की थी, कानपुर यूनिवर्सिटी में बीएड कर रही थी. वह गांव की लड़कियों को पढ़ाती, महिला समिति में सक्रिय थी. मां की तरह मजबूत, तानों से नहीं डरती. वह स्कूल टीचर बनेगी, जहां विधवाओं के बच्चों को मुफ्त तालीम देगी.


गीता 16 की थी, पुलिस की तैयारी कर रही थी. दौड़ती, जिम जाती, कानून की किताबें रटती. विजय की हैवानियत ने उसे सिखायाइंसाफ खुद लड़ कर लेना पड़ता है. वह इंस्पैक्टर बनेगी, हर राधा की आवाज बनेगी. तालाब साफ हुआ, राधा पौधे लगातीं, छोटे हरि की याद में. फूल खिलते गए. राधा बोलीं, ‘‘बेटा देखतेरी मां जी रही है, तेरे लिए.’’ झुर्रियां बढ़ीं, हिम्मत नहीं टूटी. गांव की औरतें सम्मान से देखतीं.
बारिश की शाम, छत पर खड़ीं. याद आईविजय की पहली बारिश. सपना रह गया. अंदर गईं, लोरी सुनाई, सो गईं. सपने में छोटे हरि आया, मुसकराया, ‘‘मांमैं ठीक हूं, तुम मुसकराओ.’’ सुबह नम आंखें, मुसकान आई, उम्मीद जगी. हरिपुरा बदला. राधा महिला समिति में हौसला देतीं, ‘‘मजबूत रहोटूटना नहीं. बच्चों के लिएसब सहना.’’


सपने पूरे हुए. छोटू मैडिकल में टौप कर रहा था, सीता कालेज में गोल्ड मैडलिस्ट, गीता पुलिस भरती में सिलैक्ट. राधा गर्व करतीं, आंसू खुशी के. ‘‘मेरा छोटे हरितुम सब में जी रहा है. मेरे बच्चेमेरी दुनिया, मेरी ताकत.’’ समय बीता, राधा अब 70 पार कर चुकी थीं. बाल सफेद, कद झुका, लेकिन आंखों में वही चमक. छोटू ने हरिपुरा मेंछोटे हरि मैमोरियल क्लिनिकखोला. सीता नेराधा देवी विद्या मंदिरशुरू किया. गीता कानपुर में इंस्पैक्टर बनी. राधा अब गंगा को निहारतीं. तालाब अब बगीचा बन चुका था. गांव वालेराधा मांकहते. आखिरी सर्दी में, राधा बीमार पड़ीं. बिस्तर पर लेटीं, बच्चों ने घेरा. छोटे हरि सपने में आया, हाथ बढ़ाया.


हलकी आवाज में राधा बोलीं, ‘‘ रही हूं बेटा…’’ आंखें बंद हुईं, मुसकान बरकरार. राधा मां नहीं रहीं.
अंतिम संस्कार गंगा तट पर हुआ. तालाब पर पत्थर लगा, ‘राधा मां : मां, योद्धा, प्रेरणा’. 20 अक्तूबर कोराधा स्मृति दिवसमनाया जाता है. उस रात गंगा की लहरें ऊंची उठीं. हवा में लोरी गूंजी. राधा की आत्मा बच्चों में, फूलों में, गंगा में समा गई. दर्द खत्म हुआ, प्यार अमर हो गया. राधा मां चली गईं, लेकिन उन की कहानी हर मां के दिल में धड़कती रहेगीटूट कर भी टूटने की, खो कर भी जीतने की.                    Hindi Story

News Story: एआई समिट, चीनी कुत्ता और भारत की साख

News Story: होली आने वाली थी. अनामिका अपने घर जाना चाहती थी, पर विजय को उसी के साथ होली खेलनी थी. एक दिन जब अनामिका विजय के घर आई, तो विजय ने कहा, ‘‘यार, होली पर घर मत जाओ . अब तो ठंड भी कम हो गई है. मुझे लगता है कि इस बार की होली हम दोनों मस्ती और मजे से मनाएंगे.’’


‘‘पर मैं पिछले 2 साल से अपने घर नहीं गई हूं. मम्मीपापा चाहते हैं कि मैं घर जाऊं उन के पास. अगर तुम्हें मेरे साथ होली खेलनी है, तो साथ चलो. बड़ा मजा आएगा,’’ अनामिका बोली.
‘‘तुम बात को कहां ले जा रही होमम्मी, आप कुछ बोलो …’’ विजय ने अपनी मम्मी को इस मामले में शामिल करते हुए कहा.


‘‘यह तुम दोनों का मामला है. मुझे तो होली वैसे भी ज्यादा पसंद नहीं है. पर एकदूसरे को रंग मलो, फिर उतारते फिरो. इस से तो अच्छा है कि घर पर बैठो और दहीभल्ले, गुजिया, चाय पार्टी करो. पर नहीं, लोगों को तो रंग के साथ भांग का नशा चाहिए. और नहीं तो दारू पार्टी कर के पूरे त्योहार का मजा बिगाड़ देते हैं.
‘‘मुझे तो रंगों से वैसे भी एलर्जी है. मैं इस पचड़े में नहीं फंसना चाहती.
यह तुम दोनों की समस्या है, खुद ही सुलझा,’’ मम्मी ने दो टूक अपनी
बात रखी.


‘‘वाह, बेटे ने मां का साथ मांगा, पर मां ने उसे ही लपेट दिया. अरे यार, हर त्योहार का अपना मजा होता है. तुम्हें रंग पसंद नहीं तो क्या लोग होली खेलना छोड़ दें,’’ इसी बीच पापा ने विजय का साथ दिया.
‘‘वही तो पापा. मम्मी को होली खेलना पसंद नहीं और ये अनामिकाजी अपने घर जा रही हैं. वैसे, जहां तक मम्मी की रंगों से एलर्जी से समस्या है, तो एआई कब काम आएगा,’’ विजय बोला.


‘‘एआई और रंग का क्या तालमेल बना?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘किस दुनिया में जी रही हो. क्या तुम नहीं जानती कि एआई होली की तैयारी में मदद करता है, जैसे कि रंगों की डिजाइनिंग, गानों की रिकमैंडेशन और होली के लिए खास औफर्स.
‘‘इतना ही नहीं, एआई होली के दौरान सुरक्षा को सुनिश्चित करने में मदद करता है, जैसे कि रंगों की पहचान और अवैध गतिविधियों की निगरानी,’’ विजय बोला.
तुम होली मेरे साथ खेलोगे या फिरओरियनरोबोटिक डौग के साथ?’’ अनामिका ने ताना कसा.
‘‘मतलब? यह तुम ने क्यों कहा?’’ विजय ने पूछा.
‘‘तुम ने दिल्ली में फरवरी महीने में हुए एआई समिट में हुए गलगोटियास यूनिवर्सिटी के विवाद का नहीं पढ़ा था क्या खबरों में?’’
‘‘गलगोटियास यूनिवर्सिटी का क्या मामला है?’’ विजय ने पूछा.
‘‘मैं ने खबर में पढ़ा था कि इस समिट में गलगोटियास यूनिवर्सिटी की एक प्रोफैसर नेहा सिंह ने एक रोबोट डौग को दिखाते हुए कहा कि इस का नामओरियनहै. उन्होंने यह भी कहा कि यह रोबोट उन की यूनिवर्सिटी के सैंटर औफ एक्सीलैंस में बनाया गया है.’’
‘‘तो इस पर विवाद कैसे हुआ?’’ विजय बोला.
‘‘दरअसल, सोशल मीडिया यूजर्स और फैक्ट चैकर्स ने तुरंत पकड़ लिया कि यहयूनिट्री जीओ2’ नाम का चाइनीज रोबोट है. चीन की कंपनी यूनिट्री रोबोटिक्स का ऐसा रेडीमेड प्रोडक्ट जो औनलाइन 2 से 3 लाख रुपए में आसानी से मिल जाता है.


‘‘इस का खुलासा होते ही सोशल मीडिया पर बवाल मच गया. लोग बोले कि यूनिवर्सिटी ने विदेशी प्रोडक्ट को अपना बता दिया,’’ अनामिका ने अपनी बात सम?ाई.
‘‘फिर यूनिवर्सिटी ने क्या कहा?’’ यह सवाल विजय के पापा का था.
‘‘यूनिवर्सिटी ने एक्स (ट्विटर) हैंडल पर बयान जारी किया, जिस में यूनिवर्सिटी की ओर से कहा गया कि गलगोटियास ने यह रोबोट डौग नहीं बनाया है, ही हम ने कभी ऐसा दावा किया है. हम दुनियाभर से (चीन, सिंगापुर, अमेरिका) सब से अच्छी टैक्नोलौजी ला कर छात्रों को एक्सपोजर देते हैं.
‘‘यूनिट्री से लिया गया रोबोट


सिर्फ दिखाने के लिए नहीं है, यह एक चलताफिरता क्लासरूम है. हमारे छात्र इसे इस्तेमाल करते हैं, इस की लिमिट्स टैस्ट करते हैं और अपनी नौलेज बढ़ाते हैं. इनोवेशन की कोई सीमा नहीं होती. लर्निंग की भी नहीं. हमारा मकसद छात्रों को आगे की टैक्नोलौजी से जोड़ना है, ताकि वे भारत में ही ऐसी चीजें डिजाइन, इंजीनियर और मैन्युफैक्चर कर सकें.


‘‘लेकिन यूनिवर्सिटी की इस बात पर भी मामला नहीं सुल? और कहा गया कि यूनिवर्सिटी का दावा गलत और भ्रामक है. वीडियो में प्रोफैसर (नेहा सिंह) ने साफ कहा था कि रोबोट हमारे सैंटर औफ एक्सीलैंस में बना है और नामओरियनदिया है. कई यूजर्स ने कहा कि पहले तो अपना बता दिया, अब क्लैरिफिकेशन में मुकर रहे हैं.’’


‘‘पर यह यूनिट्री रोबोट डौग आखिर बला क्या है?’’ इस बारे में विजय की मम्मी को अच्छी तरह जानना था.
‘‘आंटीजी, जितना मैं ने सम? है, यूनिट्री रोबोटिक्स एक चाइनीज कंपनी है. यह 4 पैरों वाले (क्वाड्रुपैड) रोबोट बनाती है. ये रोबोट असली जानवरों की तरह चलते हैं. ये औब्स्टेकल्स पार करते हैं. इंडस्ट्रियल इंस्पैक्शन करते हैं और मनोरंजन के काम भी आते हैं. यूनिट्री के रोबोट बौस्टन डायनामिक्स के स्पौट से सस्ते और आसानी से मिल जाते हैं,’’ अनामिका बोली.


‘‘मु? लगता है कि गलत या अधूरी जानकारी देने से अच्छा है कि अपना होमवर्क सही से किया जाए. गलगोटियास यूनिवर्सिटी की प्रोफैसर बिना सटीक जानकारी के कैमरे के सामने जोशजोश में ज्यादा बोल गईं,’’ विजय ने कहा.


‘‘गलगोटियास यूनिवर्सिटी ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है. यूनिवर्सिटी ने इस पूरी घटना कोगलतफहमीकरार दिया है. यूनिवर्सिटी ने कहा कि पवेलियन पर तैनात प्रतिनिधि को प्रोडक्ट की तकनीकी उत्पत्ति की सही जानकारी नहीं थी. कैमरे के सामने आने के उत्साह में प्रतिनिधि ने उत्पाद के स्रोत को ले कर गलत और भ्रामक दावे कर दिए.


‘‘लेकिन यह मामला इतना ज्यादा बड़ा हो गया था कि बात बिगड़ती चली गई. सरकार ने इसे नैशनल एम्बैरसमैंट (राष्ट्रीय शर्म की बात) बताया. इस पूरे मामले पर आईटी सैक्रेटरी एस. कृष्णन ने साफ कहा, ‘एग्जिबिटर्स को ऐसे आइटम्स नहीं दिखाने चाहिए जो उन के नहीं हैं.’
‘‘18 फरवरी को गलगोटियास के स्टौल की बिजली काट दी गई और यूनिवर्सिटी को तुरंत एक्सपो खाली करने का आदेश दिया गया.’’


‘‘फिर तो विपक्ष ने केंद्र सरकार को खूब घेरा होगा?’’
‘‘बिलकुल. मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के राज्यसभा सदस्य जौन ब्रिटास ने सोशल मीडिया हैंडलएक्सपर एक पोस्ट में आरोप लगाया कि ग्रेटर नोएडा में बनी गलगोटियास यूनिवर्सिटी कोप्रमुख भाजपा नेताओं का संरक्षण और समर्थनहासिल है.


‘‘शिव सेना (उद्धव ठाकरे) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने इस घटना कोशर्मनाकबताया और कहा कि इस से देश और इस शिखर सम्मेलन की साख को भारी नुकसान हुआ है.
‘‘तृणमूल कांग्रेस के सांसद साकेत गोखले ने कहा, ‘गलगोटियास नामक एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी ने इंडिया एआई समिट में गो2 नामक चीनी रोबोट को अपना आविष्कार बताने की कोशिश की, लेकिन असली शर्मनाक बात यह है कि सरकारी चैनल डीडी न्यूज ने उन का पूरा प्रचार किया. आज डीडी न्यूज और भाजपा एकजैसे हैं. यह चैनल भाजपा का प्रचार माध्यम बन गया है.’
‘‘सही कहूं तो यह मुद्दा बहुत ज्यादा बड़ा बन गया था, जिस से इस एआई समिट की साख को बहुत बड़ा धक्का लगा है,’’ अनामिका बोली.


‘‘पर एक विवाद तो कांग्रेस ने भी खड़ा किया. सुना है कि समिट में कांग्रेस के लोगों ने खूब हंगामा किया था? क्या था पूरा मामला?’’ विजय ने पूछा.
अनामिका ने बताया,

‘‘शुक्रवार, 20 फरवरी को समिट में उस समय अफरातफरी मच गई थी, जब यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने वहां जम कर विरोध प्रदर्शन किया. जानकारी के मुताबिक, कार्यकर्ताओं ने सुरक्षा घेरे को तोड़ कर अंदर प्रवेश किया और नारेबाजी की.

‘‘विरोध प्रदर्शन का जो वीडियो सामने आया, उस में साफ देखा गया कि प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ टीशर्ट उतार कर विरोध जता रहे थे. इन लोगों ने इस समिट, 2026 की आलोचना भी की और पीएम मोदी पर अमेरिका से ट्रेड डील परसम?ाताकरने का आरोप भी लगाया.
‘‘एक बयान में इंडियन यूथ कांग्रेस ने कहा कि उस के कार्यकर्ता एआई समिट में देश की पहचान से सम?ाता करने वाले प्रधानमंत्री के खिलाफ विरोध कर रहे थे. बाद में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया.’’


‘‘अमेरिका की ट्रेड डील से इस एआई समिट का क्या लेनादेना?’’ ‘‘इंडियन यूथ कांग्रेस के एक औफिशियल पोस्ट में कहा गया कि इंडियन यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने एआई समिट में देश की पहचान से सम?ाता करने वाले प्रधानमंत्री के खिलाफ अपनी आवाज उठाई और प्रोटैस्ट किया.
‘‘यह विरोध कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के उस बयान के बाद हुआ, जिस में उन्होंने समिट के और्गैनाइजेशन को ले कर सरकार पर हमला किया था. उन्होंने कहा था कि भारत के टैलेंट और डाटा का फायदा उठाने के बजाय, एआई समिट एक बेतरतीब तमाशा हैभारतीय डाटा बिक्री के लिए है, चीनी प्रोडक्ट दिखाए जा रहे हैं.


‘‘कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी एआई समिट में अव्यवस्था का आरोप लगाया था और दावा किया था कि जो भारत के लिए एकशोपीसइवैंट हो सकता था, वहपूरी तरह से अव्यवस्थामें बदल गया.


‘‘मल्लिकार्जुन खड़गे ने यह भी दावा किया कि खाने और पानी जैसी बेसिक सुविधाओं की कमी के कारण विजिटर्स और एग्जिबिटर्स दोनों कोबहुत ज्यादा परेशानीका सामना करना पड़ रहा है.
‘‘समिट में जिस समय कांग्रेस यूथ कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया उस समय एआई समिट में तमाम दिग्गज और प्रतिनिधि मौजूद थे. यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता पोस्टरबैनर ले कर अंदर पहुंच गए थे.’’
‘‘पर सरकार तो इसे कामयाब समिट बता रही है. ऐसा क्यों? कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन पर सरकार का क्या कहना है?’’ विजय के पापा ने पूछा.


‘‘अंकल, वे लोग तो भड़के हुए थे. भाजपा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के इस प्रदर्शन कोस्टुपिडिटी टू न्यूडिटी’ (मूर्खता से नग्नता) तक का सफर बताया. उन्होंने कहा कि यह देश की उपलब्धियों का अपमान है. वहीं, शहजाद पूनावाला ने इस प्रदर्शन कोएंटी इंडियाऔरचरित्रहीनकरार दिया. भाजपाई समर्थित कई संगठनों ने कांग्रेस के विरोध में खूब प्रदर्शन किए.


‘‘और जहां तक इस समिट के कामयाब होने की बात है, तो भारत सरकार के मुताबिक, ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिटअब तक का सब से बड़ा एआई समिट था. ब्रिटेन, साउथ कोरिया और फ्रांस में यह समिट होने के बाद, पहली बारग्लोबल साउथके किसी देश में यह समिट हुआ.


‘‘21 फरवरी को 88 देशों और अंतराष्ट्रीय संगठनों ने नई दिल्ली एआई इम्पैक्ट समिट डिक्लेरेशन का समर्थन किया. इन में अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, जरमनी और यूरोपियन यूनियन शामिल हैं.
‘‘समिट के दौरान भारत के 3 एआई मौडल को भी लौंच किया गया. इन 3 मौडल के नाम हैंसर्वम, ज्ञानी और भारतजेन. इन मौडल्स का फोकस भारत की भाषाओं के इस्तेमाल पर था.


‘‘साथ ही, समिट के दौरान कई कंपनियों ने भारत में आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस में निवेश करने के वादे भी किए. इस में रिलायंस, माइक्रोसौफ्ट, गूगल जैसी कई कंपनियां शामिल हैं.’’ ‘‘मुझे लगता है कि जब कोई इतना बड़ा समिट होता है, तो वहां विवाद भी होते हैं. पर इस तरह के समिट के होते ही किसी तरह के फैसले पर नहीं पहुंचना चाहिए. कुछ समय देना चाहिए कि समिट में जोकुछ हुआ, उस का नतीजा क्या रंग लाएगा.


‘‘तकनीक से फायदा नुकसान दोनों होता है. यह तो उस को इस्तेमाल करने वाले पर निर्भर करता है कि वह आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस जैसी तकनीक को किस तरह से अपनी जिंदगी में उतारता है,’’ विजय ने कहा. ‘‘एकदम सही कहा. तकनीक दोधारी तलवार की तरह होती है. इस का इस्तेमाल सोचसम? कर करना चाहिए,’’ अनामिका ने हां में हां मिलाई, ‘‘चलो, हम ने खूब बहस कर ली अब तुम मु? कौफी पिलाओ. बाद में होली पर भी डिस्कस कर लेंगे.’’


‘‘क्यों नहीं. अब कोई रोबोट डौग तो हमारे लिए यहां कौफी लाएगा नहीं,’’ विजय का इतना कहते ही अनामिका खिलखिला कर हंस पड़ी. ‘‘तुम दोनों बैठो, आज कौफी मैं बनाता हूं,’’ विजय के पापा ने कहा तो मम्मी हैरान थीं यह सुन कर.        

News Story: ‘जी राम जी’ का बवाल

News Story: शनिवार का दिन था. शाम के 6 बज रहे थे. विजय घर पर अकेला था. इतने में दरवाजे की घंटी बजी. विजय ने दरवाजा खोला. बाहर अनामिका खड़ी थी. वह दनदनाती हुई भीतर आई. उस का मुंह गुस्से से तमतमा रहा था.‘‘क्या हुआ? घायल शेरनी क्यों बनी हुई हो? सब ठीक है ? तुम तो अपनी सहेली के घर गई थी,’’ विजय ने पूछा. ‘‘सत्यानाश हो गया. और तुम तो अपना मुंह खोलो ही मत. सब तुम्हारा ही कियाधरा है,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘मैं ने क्या किया? सुबह तो तुम्हारा मूड एकदम ठीक था,’’ विजय बोला.
इतने में अनामिका ने अपने बैग से एक प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप निकाली और विजय के सामने रख दी. ‘‘यह क्या है?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम्हारी करतूत…’’ अनामिका बोली, ‘‘मैं प्रैग्नेंट हूं. कहा था कि प्रोटैक्शन लगा लेना, पर तुम्हें तो अपने मजे से मतलब है.’’ वह स्ट्रिप देख कर विजय के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उस ने कांपते हाथ से वह स्ट्रिप उठाई और अपना माथा पकड़ लिया. ‘‘अब मुंह से कुछ बोलोगे या ऐसेही माथा पकड़े इसे घूरते रहोगे?’’ अनामिका बोली तुम  ही क्यों कोस रही हो? सारी गलती क्या मेरी है? तुम्हें भी तो ध्यान रखना चाहिए था. सब तुम्हारी लापरवाही का नतीजा है,’’ विजय बोला. तुम सही कह रहे हो. यहां मैं तुम्हारी जीहुजूरी करती रहूं और वहां केंद्र सरकार चाहती है कि दुनियाजय राम जीबोलती रहे,’’ अनामिका बोली. ‘‘अब यहां केंद्र सरकार कहां से गई?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम और केंद्र सरकार एकजैसे हो. सारी गलती सामने वाले की. अब बताओ कि मनरेगा का नाम बदल करजी राम जीकरने की क्या तुक थी?’’ ‘‘तुम किस बारे में कह रही हो?’’ विजय ने कहा. अनामिका ने कहा, ‘‘मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के बारे में, जो भारत की गांवदेहात से जुड़ी सब से बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना रही है. यह साल 2005 में कांग्रेस सरकार के समय में लागू हुई थी. यह योजना गांवदेहात में 100 दिनों का गारंटेड रोजगार देती थी, जिस से गरीबों, किसानों और मजदूरों को पैसे के तौर पर ताकत मिलती थी. ‘‘पर अब केंद्र की मोदी सरकार ने चूंकि इस योजना से जुड़ा नया बिल पास किया है और इस काविकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानीवीबीजी राम जीनाम दिया है, तो इस पर विपक्ष ने बवाल मचाया है.’’


‘‘इस बारे में किस ने क्या कहा है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस पर गहरा एतराज जताया है. ‘ हिंदूअखबार में एक लेख के जरीए मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि मनरेगा को बुल्डोज कर दिया गया है. ‘‘सोनिया गांधी ने आगे कहा कि सरकार ने पिछले 11 सालों में इसे कमजोर किया और अबवीबीजी राम जीबिल से इसे पूरी तरह बदल दिया है, जो एक काला कानून है. वजह, केंद्र सरकार द्वारा यह बिल बिना बहस, राज्यों से सलाह या विपक्ष की सहमति के बिना पास किया गया. नया कानून केंद्र सरकार को रोजगार तय करने का हक देता है, जो जमीनी हकीकत से दूर है.


‘‘सोनिया गांधी ने इसे करोड़ों किसानों, मजदूरों और गरीबों के हितों पर हमला बताया और कांग्रेस द्वारा इस का विरोध करने का वादा किया. उन्होंने मनरेगा को महात्मा गांधी के सर्वोदय (सभी का कल्याण) का प्रतीक बताया और इस के ध्वस्त होने को नैतिक नाकामी कहा, जो सालों तक माली और इनसानी नुकसान पहुंचाएगा,’’ अनामिका ने कहा. यह सुन कर विजय ने कहा, ‘‘लेकिन क्या तुम जानती हो कि मनरेगा से पहले इस योजना का नाम नरेगा था. मई, 2004 में तब की संप्रग सरकार ने गांवदेहात के इलाकों के लिए एक रोजगार योजना को अपने न्यूनतम सा? कार्यक्रम में शामिल किया था. ‘‘भारत में 11वीं पंचवर्षीय योजना (साल 2007-12) पर काम शुरू होने से पहले ही इस पर काम करने वाले वर्किंग ग्रुप ने उस समय देश में मौजूद करीब 36 फीसदी गरीब आबादी पर खास चिंता जताई थी. उसी समय से गांवदेहात के इलाकों के लिए एक योजना बनाने पर काम शुरू हो गया था.


‘‘हालांकि, इस से पहले ही वीपी सिंह वाली केंद्र सरकार ने ऐसी योजना पर विचार किया था, लेकिन वह योजना कामयाब नहीं हो पाई थी. दिसंबर, 2004 में नैशनल रूरल गारंटी स्कीम (नरेगा) का विधेयक पेश किया गया था. ‘‘यह योजना मूल रूप से महाराष्ट्र राज्य में चल रही एक रोजगार योजना से प्रेरित थी. उस के बाद यह विधेयक उस समय ग्रामीण विकास मंत्रालयकी संसद की स्थायी समिति के पास भेजा गया था. जून, 2005 में समिति के अध्यक्ष कल्याण सिंह ने इसे आजादी के बाद का सब से खास बिल बताया था.
‘‘अब केंद्र सरकार ने नए अधिनियम कोविकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानीवीबीजी राम जीनाम दिया है. केंद्र सरकार के इस नए अधिनियम में नाम के अलावा भी कई बदलाव किए गए हैं, जैसे नए अधिनियम में साल में 125 दिन रोजगार देने का प्रस्ताव है.


‘‘मजदूरों को उन की मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर या अधिकतम 15 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा. इस योजना के तहत होने वाले कामों को 4 मुख्य क्षेत्रों में बांटा गया है, जैसे जल सुरक्षा, ग्रामीण सड़कें, बाजार और भंडारण जैसे आजीविका इन्फ्रास्ट्रक्चर और जलवायु में बदलाव से निबटने वाले काम. ‘‘इन सभी का रिकौर्डविकसित भारत नैशनल रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टैकनाम के नैशनल डाटाबेस में रखा जाएगा. भ्रष्टाचार रोकने के लिए बायोमैट्रिक हाजिरी, जियोटैगिंग और जीपीएस आधारित रियलटाइम मौनिटरिंग को अनिवार्य बनाया गया है. ‘‘सब से बड़ा रणनीतिक बदलाव योजना की फंडिंग में हुआ है. अब तक मनरेगा पूरी तरह केंद्र प्रायोजित थी, लेकिन अब यह 60:40 के अनुपात (केंद्र:राज्य) पर आधारित होगी, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 होगा. इस के अलावा, यह अब पूरी तरहडिमांड ड्रिवननहीं रहेगी.


‘‘केंद्र सरकार हर साल राज्यों के लिए एक निश्चित बजट तय करेगी. अगर राज्य उस बजट से ज्यादा खर्च करते हैं, तो अतिरिक्त बो? उन्हें खुद उठाना होगा. इस पूरी योजना का सालाना बजट तकरीबन डेढ़ लाख करोड़ रुपए आंका गया है.’’ ‘‘दूर के ढोल सुहावने. तुम तो इस बिल का कागजी करतब बता रहे हो, जमीनी हकीकत से इस का दूरदूर तक कोई नाता नहीं है,’’ अनामिका बोली.  तुम कहना क्या चाहती हो?’’ विजय ने कहा. ‘‘यही कि किसी बिल में अगर सुधार करना भी है, तो उस के लिए योजना का नाम बदलने की क्या जरूरत है? पहले यह योजना महात्मा गांधी के नाम पर थी, तो अब इसेजी राम जीक्यों बना दिया गया है?’’ अनामिका बोली.


‘‘अरे, ‘जी राम जीबोलने में क्या हर्ज है? अब सनातनी भारत मेंजी राम जीही बोला जाएगा ?’’ विजय ने कहा. ‘‘बस, यहीं पर मु? सरकार की नीयत में खोट नजर आता है. भारत जैसे सैकुलर देश में जहां कई धर्मों के लोग रहते हैं, वहां धर्म विशेष और उस में भीरामका नाम जोड़ने की क्या वजह थी? ‘‘फिर प्रियंका गांधी की कही बात भी तो सच ही लगती है. उन्होंने कहा, ‘मु? नाम बदलने की यह सनक सम? नहीं आती. इस में खर्चा बहुत होता है, इसलिए मु? सम? नहीं आता कि वे बेवजह ऐसा क्यों कर रहे हैं. मनरेगा ने गरीब लोगों को 100 दिन के रोजगार का अधिकार दिया था. यह बिल उस अधिकार को कमजोर करेगा…’


‘‘इस के आगे प्रियंका गांधी बोलीं, ‘उन्होंने दिनों की संख्या तो बढ़ा दी है, लेकिन मजदूरी नहीं बढ़ाई है. पहले ग्राम पंचायत तय करती थी कि मनरेगा का काम कहां और किस तरह का होगा, लेकिन यह बिल कहता है कि केंद्र सरकार तय करेगी कि फंड कहां और कब देना है, इसलिए ग्राम पंचायत का अधिकार छीना जा रहा है. हमें यह बिल हर तरह से गलत लगता है.’ ‘‘जहां तक सैकुलर होने की बात है तोजी राम जीजैसे नाम वाली सरकारी योजनाओं से हर केंद्र सरकार को परहेज करना चाहिए. हमारे देश में 75 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो गरीब हैं और उन में से ऐसे हैं जो सालभर दिहाड़ी मजदूरी नहीं कर पाते हैं. वे सभीराम भक्ततो नहीं हैं. इस तरह की योजना से देश के गैरहिंदुओं को लगेगा कि सरकार जानबू? कर चाहती है कि धर्म विशेष के लोग सिर्फ योजना के नाम से ही इस का फायदा लें पाएं.


‘‘गैरहिंदू ही क्यों, एससी और एसटी तबके के बहुत से लोग हिंदू देवीदेवताओं की पूजा नहीं करते हैं खासकर अंबेडकरवादी सोच के लोग भी इस योजना से कन्नी काट सकते हैं या फिर उन्हें उकसाया जा सकता है. तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकार सिर्फ रामभक्तों के लिए यह योजना लाई है? ‘‘मेरा ऐसा कहने की एक वजह यह है कि हिंदुओं के भी हजारों देवीदेवता हैं. शैव भक्त क्या राम भक्त हो सकते हैं, क्योंकि उन का पूजा करने का अपनाअपना तरीका है.’’ ‘‘तुम मामले को बेवजह धार्मिक रंग दे रही हो. सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है,’’ विजय ने कहा. ‘‘मेरी मंशा सही है, पर सरकार के इन सांसद की भी सुन लो. जब इस बिल पर चर्चा हो रही थी, तब उस में भाग लेते हुए भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था कि प्रभु राम चाहते थे तो मंदिर बन गया और अब वे चाहते हैं कि विकसित गांव बनें.

यह विधेयक रामराज्य लाने के लिए लाया गया है, गांधीजी के सपनों को पूरा करने के लिए लाया गया है.
‘‘बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था किजी राम जीसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और गांवों का चौतरफा विकास होगा भ्रष्टाचार रुकेगा. इस विधेयक से हिंदुत्व और सनातन की भावना उभर कर सामने आई है.’’ ‘‘तो तुम्हारा यह मानना है कि इस से देश को रफ्तार नहीं मिलेगी?’’ विजय ने कहा. ‘‘रफ्तार तो मनरेगा से ही मिल रही थी. अगर बिल में कुछ अच्छे बदलाव होते तो बात सम? में आती, पर यहां तोजी राम जीका खेल चल रहा है. कहीं ऐसा हो कि इस योजना का हीराम नाम सत्यहो जाए और साथ ही ऐसे करोड़ों लोगों के सपने बिखर जाएं जो साल के 365 दिनों में इज्जत से 100 दिन की मजदूरी पा कर अपने घरों में चूल्हा जलाते हैं,’’ अनामिका ने कहा.


‘‘तुम्हें तो हर बात में कमी निकालनी है और कुसूर मोदी सरकार पर मढ़ना है. कभी तारीफ भी तो कर दिया करो,’’ विजय ने कहा. ‘‘जैसे तुम ने सारा कुसूर मु? पर मढ़ दिया कि मेरी गलती से मैं प्रैग्नेंट हुई
हूं. क्यों सही कहा ?’’ अनामिका ने ताना कसा. और नहीं तो क्याजब तुम्हें पता है कि अभी हम शादी नहीं कर सकते हैं, तो क्यों यह बवाल खड़ा किया. अब कहीं इसे साफ कराओ,’’ विजय बोला. ‘‘यार, तुम तो बड़े दब्बू निकले. जैसे ही जिम्मेदारी निभाने की बात आई तो मु? पर भड़ास निकाल दी,’’ अनामिका ने कहा, ‘‘तुम सत्ता पक्ष के हिमायती लोगों को यही बीमारी है कि जब मामला हाथ से निकल जाए, तो सामने वाले को ही कोस दो. ‘‘पर डरो मत. यह प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप मेरी नहीं है. यह तो मेरी सहेली की बड़ी बहन की है, जिस की शादी को 2 साल हो गए हैं और अब उस के घर यह खुशखबरी आई है. मैं खुद अभी जल्दबाजी में शादी नहीं करना चाहती. अभी तो हमें और ज्यादा एकदूसरे को सम?ाना है,’’ कह कर अनामिका ने अपनी बात खत्म की. यह सुन कर विजय की सांस में सांस आई और उस ने अनामिका को गले से लगा लिया. News Story: 
          

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें