Editorial. देश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराने वाले 23 आईआईटी में जाति का जम कर बोलबाला है. यहां पढ़ रहे 1.2 लाख स्टूडैंट्स में से आधे ऊंची जातियों के हैं और वे खातेपीते घरों से हैं जिन्हें बचपन से अपने को ऊंचा होने का एहसास दिलाया गया है. आमतौर पर एक बड़ा गुट एकसाथ रहता है और इन में आपसी मतभेद कम होते हैं.
बाकी आधों से ये आधे खार खाए रहते हैं क्योंकि जहां ऊंची जाति वालों को पूरी 11 से 15 लाख की फीस, जिस में होस्टल और मैस का खाना शामिल है, देनी होती है, रिजर्वेशन पाए वालों को बहुत कम देनी होती है और वे कुछ लाख दे कर पढ़ाई में अच्छे हों तो इंजीनियर बन जाते हैं.
ऊंची जाति वाले छात्रों को यह खलता रहता है कि ये रिजर्वेशन वाले यदि प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेजों में जाते तो उन्हें पूरी 15 से 40 लाख की फीस देनी पड़ती. ऊंची जाति के छात्र नीची जाति वालों को आज भी तंग करते रहते हैं.
आईआईटी बौम्बे में रिजर्वेशन पाने वाले एक सैकंड ईयर के स्टूडैंट साहिल वाकोड़े ने 18 सितंबर को डीन की भेदभाव वाली नीति और उस की शिकायतों पर ध्यान न देने पर आत्महत्या कर ली. वह अपनेआप गलत था. वह दलित था न.
तमाम आरक्षण के बावजूद, तमाम जाति है ही नहीं के नारों के बावजूद असलियत यही है कि दलित स्टूडैंट्स कही भी हों, उन्हें मानसम्मान तो दूर पास बैठने तक नहीं दिया जाता. पढ़ाई की जगह पर यह भेदभाव शुरू हो जाता है, स्कूलों से, और मैरिट में अच्छे नंबर लाए जाने पर भी बंद नहीं होता.
इस देश में एकलव्य मरे नहीं हैं, द्रोणाचार्यों की भरमार है जो अर्जुनों के कहने पर नीची जाति वालों को हुनर देना नहीं सिखाते. यह देश उस की पूजा करता है जिस ने उस शंबूक का गला काट डाला जिस ने वेदों को याद करना शुरू कर दिया था और उसे ही एक ब्राह्मण लड़के की मौत का जिम्मेदार ठहराया गया था.
जब हर किताब, अखबार, टीवी चैनल पर नीची जाति वालों को हर जगह बेइज्जत किया जाता है तो डीन प्रोफैसर सूर्यनारायण डूला ने नकल का आरोप लगा कर साहिल को सस्पैंड करने की बात को समर्थन क्यों नहीं देगा. नीट की परीक्षा में पेपर लीक हुए, लाखों में ऊंची जाति के छात्रों को पेरेंट्स ने अपने ऊंची जाति के लाड़लों के लिए खरीदे, कुछ नहीं हुआ. एक एकलव्य, एक शंबूक, एक अंबेडकर, एक मायावती, एक पासवान साथ बैठ जाएं यह आईआईटी के आधे छात्रों और आधी फैकल्टी को मंजूर नहीं है.
नकल करने का आरोप ऐसा ही है जैसा एकलव्य के गुरुदक्षिणा न देने का है. यह शंबूक के कारण ब्राह्मण पुत्र की हत्या है. जीवन भर लगा कर, मैरिट में जगह बना कर आईआईटी बौम्बे में पहुंचे साहिल वाकोड़े का पूरा कैरियर एक इनविजिलेटर ने सैकड़ों पौराणिक कथाओं की तरह खत्म कर दिया.
यह पहला और आखिरी मामला नहीं है. हर जगह हो रहा है, और जैसेजैसे पढ़ाई में तेज हो कर दलितपिछड़े घरों के बच्चे ऊंचे स्थानों पर पहुंच रहे हैं, गुस्सा उबल रहा है. एक रिधिका शर्मा ने इंस्टाग्राम टीम पर दलित स्टूडैंट्स की अपने हक और इज्जत मांगने पर जम कर हल्ला मचाया है. उस के 7 लाख से ज्यादा फौलोअर्स हैं क्योंकि वह दलितों को अपनी जगह, गीता के अनुसार पैरों से बाहर धकेलने में विश्वास रखती है. ऐसे हजारों हैं जो अपनी बात कहते हैं और ऊंची जाति वाले पैसे वाले सुनते हैं.
दलितों के पास आज भी जबान नहीं. आज भी वे अपने ही लोगों को या अपनी वकालत करने वालों को पैसा देने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उन में मन के भीतर वही बैठा है कि वे पिछले, दलित इसलिए हैं कि उन के पूर्वजन्म के कर्म अच्छे नहीं थे. वे मन से न विरोध करना जानते हैं, न अपनी बात कहने वालों का साथ दे पाते हैं. वे तो बिक जाते हैं, भगवा खेमों में जो बैठते हैं और रोहित वेमुला जैसी मौत पर 2-4 रोज स्यापा कर के इसे अपना भाग्य मान लेते हैं.Editorial
Editorial. आमतौर पर कोई जना नेता तभी बन पाता है जब वह अपने पीछे चल रहे लोगों का भला सोचता हो, कुछ ऐसा करता हो जो पीछे चलने वाले अकेले नहीं कर सकते और उन्हें एक समूह, एक भीड़ की जरूरत हो और उस भीड़ को सही रास्ता दिखाने वाले की. इतिहास में ऐसे लोगों की कमी नहीं रही है जिन्होंने भीड़ को पहले बड़ेबड़े वादों से ऊंचाइयों पर ले जाने का भरोसा दिया पर रास्ते में किसी खाई में फेंक दिया.
अछूतों, एकदम गंदा काम करने वालों, हिंदू वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोगों को, जिन्हें संविधान में एससी कहा गया है और आमतौर पर अछूत कहा जाता है, को कांशीराम ने 1970 के आसपास एक मंच पर खड़ा करने की कोशिश की थी. भीमराव अंबेडकर ने पहले इन के हितों की बात की थी पर वे पूरी कांग्रेस को उन की अगुआई करने को तैयार नहीं कर सके.
नेता बिना हजारों सालों से लूटे जाने, पैरों वालों से कुचले जाने और सताए जाने वाले वे लोग जानवरों सा जीवन जी कर भी सेवा करने में लगे रहे क्योंकि उन्हें बहका दिया था कि यह सब उन के पिछले जन्मों का फल हैं. न अंबेडकर, न गांधी, न कांशीराम उन्हें इस सोच से निकाल कर बराबरी की जगह पर खड़ा कर पाए.
उम्मीद थी कि मायावती, जो कांशीराम का दायां हाथ बन गई थीं, कुछ कर पाएंगी पर वे सत्ता सुख की चाशनी चख कर अपने पीछे चल रहे लोगों को भूल गईं. पिछड़ी भीड़ के आगे कोई और उभरा नहीं तो बेबस हो कर वह मायावती के पीछे चलती रही जबकि मायावती उन्हीं लोगों की गोद में जा बैठीं जिन्होंने वर्णव्यवस्था, पिछले जन्म की मूर्खता वाली ?ाठी कहानियां गढ़ी थीं. आज भी इन दलितों का कोई नेता नहीं जबकि इन में से सैकड़ों पढ़लिख कर ऊंची पोस्टों पर आ गए हैं. जिस ने भी कुछ खराखरा कहने की कोशिश की, उसे मायावती की तरह गाड़ीबंगला दे कर खरीद लिया गया.
देश की 25-30 करोड़ आबादी जन्म से मरने तक जानवरों की तरह जीती रहे, यह विज्ञान और तकनीक के युग में धब्बा है. मायावती भी जिम्मेदार हैं और पीछे की भीड़ भी. यह भीड़ उसी तरह की मूर्ख है जैसे 1930 से 1945 तक जरमनों की भीड़ हिटलर के पीछे चली. उसी तरह की भीड़ है जैसी चीनियों की माओ के पीछे चली. जैसी आज उत्तर कोरिया के किम जोंग उन के पीछे चल रही है.
दलित किसी भी तरह से किसी भी ब्राह्मण से कम नहीं हैं. न अक्ल में, न बल में, न मेहनत में. उलटे वे ब्राह्मणों से ज्यादा तेज हैं पर बस सही नेता और सही रास्ते से भटक रहे हैं. मायावती उन्हें एक गंदी खाई के बाद दूसरी गंदी गहरी खाई में धकेल रही हैं. कुछ अलग हो कर सीधे भगवाइयों के साथ मिल गए हैं पर वहां और बुरी हालत है. वे अपने जैसों के सही नेता नहीं हैं और इसलिए हर समय अपमान सहते हैं, भेदभाव सहते हैं. Editorial
Inspirational Hindi Story . बगीचे में बैठी रचना काफी देर से निर्मल का इंतजार कर रही थी. वह बीते दिनों की मीठी यादों में खोई हुई थी, तभी एक मदहोश कर देने वाली धुन ने उस का ध्यान खींचा.
एक पेड़ के तने से सट कर खड़ा निर्मल अपने मोबाइल फोन से यह मीठी धुन बजा रहा था.
नजरें मिलने पर उन दोनों में खूब हंसीठिठोली हुई और वे एक बैंच पर बैठ गए.
‘‘पुणे में तो तुम्हारे कई दोस्त होंगे और गर्लफ्रैंड्स भी होंगी,’’ रचना ने हंसते हुए कहा.
‘‘पुणे की लड़कियां काफी होशियार होती हैं. मेरी एक साथी है सुमेधा, जिस ने पहली कंपनी को मेरे साथ ही छोड़ा था. वह मेरे सामने वाले अपार्टमैंट्स में ही रहती है. वैसे, वह मेरी गर्लफ्रैंड नहीं है,’’ निर्मल अपने मोबाइल फोन से खेलता हुआ बोला.
‘‘फिर तो अच्छी छनती होगी तुम दोनों में,’’ रचना ने बुझे मन से कहा.
‘‘तुम बिलकुल नहीं बदली,’’ निर्मल ने रचना को बहलाने के इरादे से कहा.
‘‘तुम भी तो कहां बदले हो. कौन कह सकता है कि तुम ने इंजीनियरिंग की डिगरी ली है. भला कोई इंजीनियर पुणे से सिर्फ अपने तरुण दल के साथ ढोल बजाने के लिए इतनी दूर चुरू आ सकता है?’’
‘‘हां रचना, ढोल बजाने का खयाल मुझ में जोश भर देता है. शायद इसलिए, क्योंकि इस की गूंज दूर तक सुनाई देती है. और मेरे तरुण दल की कमी पुणे के दोस्त कहां पूरी कर सकते हैं,’’ निर्मल ने मुसकराते हुए कहा.
निर्मल पढ़ाई के साथसाथ एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम कर रहा था. इस बार पंचायत ने बस्ती में ‘समाज समृद्धि यज्ञ’ कराया था. उस में शिरकत करने के लिए ही वह यहां आया था.
रचना निर्मल की बचपन की साथी थी. वे साथ ही पढ़े थे, पर आगे की पढ़ाई के लिए निर्मल को अपने घर से दूर जाना पड़ा था.
रचना टीचर बन गई थी. बच्चों को पढ़ाने में उस का समय बीत जाता था. जब उसे मालूम हुआ कि बस्ती के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए निर्मल चुरू आया है, तो वह उस से मिलने चली आई थी.
निर्मल ने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘रचना, मेरी समझ में नहीं आता कि तुम टीचर क्यों बनीं?’’
‘‘स्कूल से जुड़ी हमारी बचपन की यादों को मैं हर दिन जीना चाहती थी. दूसरी बात, मुझे तुम्हारे जैसे होनहार छात्र भी तो तैयार करने हैं.’’
निर्मल मुसकरा दिया. रचना ने उस से सवाल किया, ‘‘अच्छा, तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?’’
‘‘मैं जीतोड़ मेहनत कर रहा हूं,’’ निर्मल ने कहा.
‘‘मैं तो यही चाहती हूं कि तुम खूब तरक्की करो और जल्दी से यहीं लौट आओ,’’ रचना बोली.
‘‘थैंक्स… तुम्हें पता है रचना, अगर मैं वक्त पर सही फैसला न लेता, तो आज एससी कोटे से रेलवे में क्लर्क बन कर एक ही काम करता हुआ अपनी कमर तुड़वा चुका होता.’’
‘‘पिताजी का सपना था कि मैं भी उन के दादा की तरह नाम कमाऊं. मेरे दादा अंगरेज फौज में सिपाही थे. उन की सर्विस के बाद अंगरेजों ने उन्हें लायलपुर की चिनाब कालोनी में बसा कर खेती के लिए जमीन दी थी, पर मेरे दादा को न जाने क्या सूझ कि वे भावनाओं में बह कर साल 1947 में वहां से चले आए और हमारा जातिगत पेशा अपना कर हमें फिर पीछे की ओर ले गए.
‘‘पर, मैं ने भी पिताजी को भरोसा दिलाया कि कुछ बन कर दिखाऊंगा. तब कहीं उन्होंने मुझे पुणे यूनिवर्सिटी जाने की इजाजत दी. आज उन का सपना पूरा हो गया.’’
रचना के पिता अमीरचंद कारोबारी और सादुलपुर शिक्षा संस्थान के एक ट्रस्टी थे, तो निर्मल के पिता जय सिंह रेल महकमे में एक चपरासी थे.
कार्यक्रम वाले दिन सुबह से ही बस्ती उत्सव के रंग में सराबोर हो गई थी. तरुण दल के साथ मगन हो कर ढोल बजाता निर्मल रथ पर बैठे महंत रामनारायण का जुलूस धूमधाम से कार्यक्रम वाली जगह पर ले आया. पंचों ने महंत रामनारायण और उन के संगीसाथियों को आदर से आसनों पर बैठाया.
निर्मल के पिता मुखिया जय सिंह ने उस से कहा, ‘‘सुनो बेटा, महंतजी आ चुके हैं. कुछ ही देर में कार्यक्रम शुरू होने वाला है, पर अमीरचंदजी का कहीं कुछ पता नहीं. देखो, कहीं वे बलरामजी के यहां तो नहीं हैं.’’
‘‘ठीक है पिताजी, मैं देखता हूं,’’ कह कर निर्मल अपने एक दोस्त हरनाम को ढोल थमा कर अमीरचंद को बुलाने के लिए चल पड़ा.
बस्ती के दूसरे सिरे पर बलराम की बड़ी सी कोठी थी. वहां पहुंच कर निर्मल ने देखा कि रघु काका उदास चेहरा लिए कोठी से बाहर आ रहे थे.
निर्मल ने उत्सव के नशे में पूछा, ‘‘काका, अमीरचंदजी अंदर हैं क्या?’’
रघु काका ने सिर्फ ‘हां’ में सिर हिलाया और चुपचाप चले गए.
निर्मल जब कोठी की खिड़की के करीब पहुंचा, तब उसे अंदर से बलराम की तीखी आवाज सुनाई दी. वह वहीं रुक कर सुनने लगा.
बलराम कह रहा था, ‘‘देखा इस रघु को. कहता है कि उस का बेटा लघु उद्योग शुरू करना चाहता है, कुछ रुपए उधार दे दूं, जैसे मैं ने धरम खाता खोल रखा है… लड़का कुछ पढ़ गया है, तो कुंवर साफसफाई का काम नहीं करेंगे… सेठ बन कर अब सभी बलराम के कद को छूना चाहते हैं.’’
बलराम के गुस्से का फायदा उठाते हुए अमीरचंद ने कुटिल मुसकराहट से अपने दिल में दबी बात कही, ‘‘बुरा न मानो बलराम, इन लोगों ने तो हम अगड़ों को भी पीछे छोड़ दिया. भला 21वीं सदी में जाति की खुशहाली के लिए हम ऐसे यज्ञ कर सकते थे क्या?’’
फिर पास बैठे मास्टर दीक्षित की ओर देख कर अमीरचंद ने मजाक के लहजे में कहा, ‘‘क्यों दीक्षितजी?’’
मास्टर दीक्षित ने लड्डू चबाते हुए कहा, ‘‘धार्मिकता देख कर मुझे तो लगता है कि आगे चल कर यही लोग हमारे मंदिरों में पुजारी बनने वाले हैं.’’
बलराम ने कड़वाहट से कहा, ‘‘क्यों नहीं, सुबह पाखाना साफ करने के बाद शाम को पुरोहिती भी कर लेंगे.’’
इस पर अमीरचंद ने कहा, ‘‘अब इस मुखिया जय सिंह को ही ले लो, रेल महकमे में चपरासी है, पर अपनेआप को बाबू समझता है.
‘‘देखना, उस का बेटा जरूर भांड़ बनेगा. पुणे की पढ़ाई भी उसे अक्ल नहीं दे पाई. कोई बहाना निकला नहीं कि ढोल पीटने के लिए चुरू आ धमका है.’’
यह हंसी सुन कर निर्मल का जी जल गया. वह वहां से निकल आया. वह देर तक चौराहे के पेड़ के नीचे बैठा रहा.
तब निर्मल सादुलपुर शिक्षा संस्थान का छात्र था और संस्थान में भूतपूर्व छात्रों के सम्मान में किए जाने वाले एक कार्यक्रम में हिस्सा लेना चाहता था. इसी सिलसिले में वह ट्रस्टी अमीरचंद की इजाजत लेने गया था. तब उस के सामने अमीरचंद का यही रूप जाहिर हुआ था.
अमीरचंद ने कहा था, ‘तुम जानते हो, ये जो मेहमान आने वाले हैं, वे कौन हैं? ये हमारे भूतपूर्व मेधावी छात्र हैं, जो आज ऊंचे ओहदों पर बैठे हैं. इस कार्यक्रम में हिस्सा ले कर तुम उन के सामने क्या जाहिर करोगे? किसी की नकल ही तो करोगे.
‘‘अपनी ओर से कुछ नया करना तो तुम लोगों को आता नहीं. यह तुम्हारी बस्ती के आडंबर का कार्यक्रम नहीं, जो तुम मुंह उठाए आओगे और ढोलनगाड़े बजाओगे.’
निर्मल को उस वक्त बहुत बुरा लगा था, पर वह कुछ न कह सका था और वहां से चुपचाप चला आया था.
आज की घटना से निर्मल अपने अंदर एक अजीब सी उथलपुथल महसूस कर रहा था. अमीरचंद तो पराया था, लेकिन बलराम तो उस की अपनी बिरादरी का था.
निर्मल ने फैसला किया कि उसे अपनेआप को साबित करना होगा. बस्ती के उत्सवों में उस ने बहुत ढोलबाजे पीट लिए, अब उसे अपनी निजी ख्वाहिशों को दरकिनार करना होगा. जब तक उसे ठोस जमीन नहीं मिलेगी, तब तक वह चुरू लौट कर नहीं आएगा.
जब निर्मल के दोस्तों मनोहर और हरनाम को यह बात मालूम हुई, तब वे उलझन में पड़ गए. वे उस से मिलने के लिए तुरंत चले आए.
उस समय निर्मल अपना सामान बांध रहा था. मनोहर ने उस से पूछा, ‘‘निर्मल, क्या यह सच है कि तुम जा रहे हो?’’
निर्मल ने कहा, ‘‘देखो दोस्तो, आज अचानक मेरे सामने कुछ खास सवाल खड़े हो गए हैं, जिन का खुलासा मैं इस समय नहीं कर सकता. जब तक मुझे उन का हल नहीं मिलता, तब तक मैं लौटूंगा नहीं.’’
रचना को जब मालूम हुआ कि निर्मल उस से मिले बिना ही चला गया है, तो उसे बेहद दुख हुआ.
धीरेधीरे निर्मल को अमीरचंद की कड़वी बातों में सचाई दिखाई दी. इसी दौरान उसे मनोहर और हरनाम से मालूम हुआ कि महंत रामनारायण के मंदिर से चढ़ावे के गहने चोरी हो गए हैं.
इस खबर ने निर्मल की बेचैनी और ज्यादा बढ़ा दी. वह चुरू जाने के लिए निकल पड़ा.
चुरू में निर्मल ने तरुण दल की बैठक बुला कर अपनी योजना समझाई. अब बारी पंचों को मनाने की थी.
पंचायतघर में पंच प्रमुख और तरुण दल के साथ बस्ती के और लोग भी मौजूद थे.
पंचायत के किसी सदस्य ने निर्मल से चुभता सवाल किया, ‘‘बेटा, माना कि तुम बड़े शहर की पढ़ाई कर के आए हो. बहुत सी किताबी बातों की समझ आ गई है तुम्हें, पर किताबें पढ़ लेने से हम देवता तो नहीं हो जाते. यह घोर कलियुग ही सही बेटा, पर पुरखों से चली आ रही अपनी प्रथाएं हम कैसे छोड़ सकते हैं?’’
निर्मल ने कहा, ‘‘काका, देवता तो पंडोंमहंतों की कमाई के साधनभर होते हैं. अब रहा सवाल प्रथा का, तो हमारे पुरखे अपने झोंपड़ों में तेल के दीए जलाते थे, फिर उन की इस प्रथा को छोड़ कर क्यों हम अपने घरों को बिजली की बत्तियों से जगमगाते हैं?
‘‘अपनी सहूलियत के हिसाब से बदलती इन प्रथाओं को हम क्यों मानें? ऐसे यज्ञों व टोनेटोटकों की आग में अपनी मेहनत की कमाई हम कब तक झोंकते रहेंगे? हमारे कितने ही लोग इस गोरखधंधे में फंस कर हमेशा के लिए खत्म हो गए हैं.
‘‘हमारी मेहनत की कमाई से बनाए गए लाखों रुपए के जेवरों को लुटेरों ने मंदिर से लूट लिया. क्या मिला हमें? हम सब को खुले दिमाग से सोचना जरूरी है. हम अपना चंदे का रुपया कर्मकांडों में लगाने के बजाय गरीब छात्रों की पढ़ाईलिखाई पर खर्च करें, तो वही सच्चा पुण्य होगा.’’
निर्मल की बातें सुन कर रघु काका ने जोश में आ कर कहा, ‘‘निर्मल ठीक कह रहा है. हमें अपनी पुरानी सोच से उबरना होगा, तभी हमारी आने वाली पीढि़यां ऐसी भेड़बकरियों की जिंदगी से बच सकती हैं.’’
दुविधा में फंसे जय सिंह ने कहा, ‘‘बाकी सब तो ठीक है रघु, लेकिन हमारे इस फैसले को क्या पूरी बिरादरी मान लेगी?’’
निर्मल ने जोर दे कर कहा, ‘‘आप तो पंच हैं, बात को सही ढंग से समझाने पर आप की बात कौन टालेगा.’’
एक बुजुर्ग ने अपना सुझाव दिया, ‘‘कुछ करने से पहले हमें महंत रामनारायणजी की इजाजत लेनी जरूरी है. हम ने आज तक उन से पूछे बिना कोई काम नहीं किया है. मुझे भरोसा है कि वे जरूर हमें रास्ता बताएंगे.’’
तरुण दल इस बात से सहमत नहीं था, पर पंचों ने बहुमत से यही तय किया कि वे महंत रामनारायण को भी यह बात बताएंगे.
दूसरे दिन जब पंच प्रमुख रामनारायण से मिलने मंदिर पहुंचे, तब वहां पुलिस की टुकड़ी मौजूद थी. पंचों की सम?ा में कुछ आता, तभी मंदिर के भीतर से 2 पुलिस वाले रामनारायण को हथकड़ी पहनाए बाहर निकले.
रामनारायण भीड़ से नजरें नहीं मिला पा रहा था. पूछने पर मालूम हुआ कि पिछले दिनों मंदिर में जो लाखों रुपए के जेवरों की चोरी हुई थी, वह रामनारायण के इशारे पर ही की गई थी.
उस दिन के बाद बस्ती में बदलाव शुरू हो गया. पंचों के पास जो चंदा जमा होता, उसे वे ऐसी सामाजिक संस्था के सुपुर्द करते, जो गरीब व पिछड़े छात्रों की पढ़ाई में मदद का जिम्मा उठाती थी.
निर्मल तरुण दल को आगामी योजना की जानकारी दे कर लौट रहा था कि उस का सामना रचना से हुआ, जो स्कूल से आ रही थी.
निर्मल सकते में आ गया, पर रचना जैसे खुशियों से भर उठी और बोली, ‘‘तुम्हें सामने देख कर मेरी सारी शिकायतें दूर हो गईं… और बधाई हो, तुम ने बस्ती वालों को जो बातें सम?ाई हैं, उस से मु?ो अपनेआप पर गर्व हो रहा है. मैं जानती थी कि तुम जिंदगी में जरूर कुछ अलग ही करोगे. पर तुम मु?ा से दूरी क्यों बना रहे हो?’’
‘‘नहीं रचना, ऐसी तो कोई बात नहीं. बस, काम की वजह से…’’ निर्मल ने बात अधूरी छोड़ दी.
‘‘अब चुप रहो, तुम मु?ो नहीं बना सकते. बचपन से जानती हूं तुम्हें. जरूर कोई बात हुई है. क्या पिताजी ने तुम से कुछ कहा? अगर ऐसी बात है, तो तुम मु?ा से भी कमजोर हो, क्योंकि तुम से दूरी बनाने के लिए वह बचपन से ही मु?ा पर दबाव डालते आ रहे हैं. पर देखो, मैं ने आज तक अपनी पसंद से कभी सम?ौता नहीं किया. मु?ो तुम पर भरोसा था,’’ रचना ने लताड़ते हुए कहा.
‘‘मु?ो माफ कर दो रचना, पर मैं इतना उल?ा हुआ था कि तुम्हारे किसी फोन या ईमेल का जवाब नहीं दे पाया. लेकिन अब भी मेरा मकसद पूरा नहीं हुआ है. जब हो जाएगा, तभी मैं आगे के बारे में कुछ सोच पाऊंगा,’’ निर्मल ने अपनी बात रखते हुए कहा.
‘‘तुम ने यह कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारे मकसद के आड़े आऊंगी, बल्कि अगर मेरे लायक कोई काम हो, तो उसे करते हुए मु?ो बेहद खुशी होगी. तुम ने जो काम कर दिखाया है, वही पाठ मैं बच्चों को पढ़ा रही हूं.’’
‘‘मैं जानता हूं रचना, तुम्हारी इन्हीं बातों से मु?ो ताकत मिलती रही है.’’
‘‘क्या तुम फिर कहीं जा रहे हो?’’ रचना ने पूछा.
‘‘हां, वहां कंपनी का बहुत सा काम बाकी छोड़ कर आया हूं और…’’
‘‘बसबस, अब और बहाना बनाने की कोशिश मत करो. तुम्हारे सभी कामों के लिए मैं और मेरी शुभकामनाएं हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगी.’’
इस के बाद निर्मल पुणे लौट आया. वहां उस ने एक वैबसाइट बनाई, जिसे उस ने ‘सत्कार्य डौट कौम’ नाम दिया. इस वैबसाइट पर और लोगों को प्रेरित करने के लिए उस ने अपनी बस्ती के लोगों द्वारा किए सामाजिक कामों की पूरी कहानी वीडियो क्लिप के साथ डाल दी.
‘सत्कार्य डौट कौम’ के सामाजिक कामों को अमेरिका की एक मशहूर सौफ्टवेयर कंपनी ने सराहा. उस ने निर्मल को इनाम देने का फैसला लिया.
जब निर्मल अमेरिका से अवार्ड ले कर लौटा, तो सादुलपुर शिक्षा संस्थान ने उस का सम्मान करना चाहा.
मंच पर खास मेहमानों के बीच निर्मल मौजूद था. अमीरचंद माइक थामे कह रहा था, ‘‘हमारी शिक्षा संस्थान के भूतपूर्व होनहार छात्र निर्मल ने हम सब का सिर गर्व से ऊंचा किया है. इस बच्चे ने पिछड़ों में भी पिछड़े समाज को कर्मकांड के अंधेरे कुएं से निकाल कर 21वीं सदी के बदलाव का सेहरा पहनाया.
‘‘एक दिन मैं ने ही निर्मल की बेइज्जती करते हुए कहा था कि वह तो सिर्फ अपनी बस्ती में ही ढोलनगाड़े पीट सकता है, पर निर्मल ने अपने अच्छे कामों का ऐसा डंका बजाया, जिस की चौतरफा टंकार से मेरा अहंकार चूरचूर हो गया.
‘‘आप सब की मौजूदगी में मैं इस के हुनर के सामने झुक कर इस से माफी मांगता हूं.’’
यह सुन कर पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. Inspirational Hindi Story
Hindi Social Story. सदियों से लकीर के फकीर बने समाज के दकियानूसी लोगों को जब सूरज ने जातपांत की अंधेरी गुफा से निकाल कर रोशनी की ओर ले जाने की कोशिश की, तो उस के अपने ही राह में रोड़े अटकाने आ खड़े हुए. क्यों?
दरवाजा बंद होने की आवाज पर सूरज चौंक कर पलटा. सामने वही लोग खड़े थे, जिन के आने की उसे उम्मीद थी. वे 4 थे और चारों ही ऊंची जाति के हट्टेकट्टे नौजवान थे.
उन लोगों के हाथों में तरहतरह के हथियार थे. उन की आंखों में उस के लिए नफरत भरी थी.
वैसे सूरज खुद भी एक ऊंची जाति से ताल्लुक रखता था, लेकिन उस का गरीबों, दलितों और पिछड़ी जाति के लोगों से संबंध रखना ऊंची जाति के लोगों को पसंद नहीं था. यही वजह थी कि वे लोग उस के कट्टर दुश्मन हो गए थे.
छेदीलाल का परिवार पुश्तों से दीनदयाल के यहां बेगारी करता आया था. जानवरों को दानापानी देना, खेत जोतना, फसल उगाना, काटना और इसी तरह के और भी कई काम वे लोग बरसों से करते आए थे, लेकिन बदले में उन्हें भरपेट खाना भी नहीं मिलता था. इतना ही नहीं, उन की बहूबेटियों की इज्जत भी लूटी जाती थी.
दीनदयाल और उस का बेटा सुरेश वहशी थे. सुरेश ने जोरजबरदस्ती से छेदीलाल की बेटी मालती की जिंदगी बरबाद कर दी थी.
जब मालती फरियाद ले कर दीनदयाल के पास गई, तो उस ने छेदीलाल को पीटपीट कर अधमरा कर दिया और मालती को सरेआम नंगा घुमाया.
उस वक्त दीनदयाल को सूरज ने ही रोका था. उसी ने उन दरिंदों को ललकारा था, ‘चाचा दीनदयाल, इस तरह किसी औरत को बेइज्जत करने का हक आप को किस ने दिया है?’
‘सूरज, इन नाली के कीड़ों के लिए तुम्हारे जैसे ऊंची जाति के लड़के के मुंह से ये शब्द अच्छे नहीं लगते.’
‘नाली के कीड़े? लेकिन इसी नाली में जब तुम्हारा लायक बेटा सुरेश अपनी नाक डुबोने गया था, तब उसे मालूम नहीं था कि ये नाली के कीड़े हैं. अगर ये ‘अछूत’ हैं, तो इन के उगाए गए अनाज को तुम क्यों छूते हो?’
‘अरे, रंगीन तितलियां देख कर नए खून में उबाल आ ही जाता है,’ दीनदयाल ने कहा.
‘तुम्हारे जैसे बाप ही अपनी औलाद को औरत को तितली सम झने की सीख दिया करते होंगे. लेकिन मैं तो यही जानता हूं कि दुनिया की हर औरत की इज्जत की जानी चाहिए, फिर वह चाहे किसी भी धर्म या जाति की हो.’
इस के बाद सूरज शिकायत ले कर थाने गया. लेकिन थानेदार ने दक्षिणा की उम्मीद में आनाकानी की. फिर सूरज बीडीओ से मिला, तो वे उसे साथ ले कर थाने में गए.
बीडीओ को देखते ही थानेदार ने तुरंत रिपोर्ट दर्ज कर ली और दीनदयाल और उस के बेटे सुरेश को गिरफ्तार कर लिया. केस चला और सुरेश को जेल भेज दिया गया.
तभी से दीनदयाल के हिमायती लोग सूरज से खार खाए बैठे थे. वे बराबर उस के ऊपर हमला करने की ताक में रहते थे.
उधर सूरज के बीडीओ साहब से गहरे संबंध बन गए थे. एक दिन वे दोनों बैठे थे, तभी उन में जातपांत पर चर्चा छिड़ गई.
‘मेरी पत्नी भील जाति की है…’ कुछ देर बाद वे बोले, ‘मेरा खयाल है कि इस बार 26 जनवरी को अलगअलग जातियों के नौजवान लड़केलड़कियों के ब्याह रचाए जाएं. तुम्हारा क्या विचार है?’
‘आप का विचार बहुत अच्छा है. मैं हर कदम पर आप के साथ हूं,’ सूरज ने कहा.
जब गांव वालों को इस बात का पता चला, तो ऊंची जाति वाले सूरज के कट्टर दुश्मन बन गए.
आज वे तैयारी कर के आए थे. उसी समय बीडीओ साहब भी सूरज के घर आने वाले थे.
उन चारों नौजवानों ने सूरज के इर्दगिर्द घेरा सा बना लिया.
एक ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘चीर कर रख दो इस को… इस पर दलितों के उद्धार का भूत चढ़ा है. मारो इस को.’’
‘‘बेवकूफ हो तुम सभी. मेरा नाम सूरज है…और मेरी गरमी बरदाश्त करने की ताकत तुम में से किसी में भी नहीं है,’’ सूरज ने गरजते हुए कहा.
‘मारो इसे,’ वे चारों एक आवाज में चीख पड़े और उस पर टूट ही पड़ने वाले थे कि कमरे में एक और आवाज उभरी, ‘‘हिलना मत, वरना कुत्ते की मौत मारे जाओगे,’’ बीडीओ साहब के गार्ड ने उन लोगों की ओर पिस्तौल तानते हुए कहा.
अगले दिन एक सादे समारोह में बीडीओ साहब ने बोलना शुरू किया, ‘‘सदियों से हम सब एक अंधेरे में जिए जा रहे हैं, जिस का नंगा रूप आप सभी खुली आंखों से साफ देख रहे?हैं. जिन्हें हम अछूत और दलित कहते हैं, वही मेहनतकश लोग हमारी जिंदगी की राहों में कदमकदम पर हमारा साथ निभाते हैं.
‘‘मैं ऊंची जाति वालों से पूछना चाहूंगा कि दलित औरतों को बांहों में भरते समय इन की ऊंची जाति की अकड़ कहां चली जाती है? तब तो इन्हें जरा भी शर्म नहीं आती. जब ये रात के अंधेरे में चुपके से दलित औरतों को अपना बना सकते हैं, तो दिन के उजाले में क्यों नहीं? समाज के सामने क्यों नहीं? हमेशा के लिए क्यों नहीं?
‘‘आज जमाना बदल रहा है…नए खून को इनसानियत के नाम पर लगे इस कलंक को मिटाना है. आइए, आगे बढि़ए और अपने जीवनसाथी को चुनिए.’’
दीनदयाल की बेटी स्नेह सब से आगे थी. उसे आगे बढ़ता देख कर ऊंची जाति के कई और जवान लड़केलड़कियां भी आगे बढ़े.
सूरज ने भी मालती का हाथ थाम लिया था.
दीनदयाल अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए बीडीओ साहब से बोला, ‘‘हम अंधेरे में थे साहब. आप ने हमारी आंखें खोल दी हैं. मैं अपनी बेटी के फैसले का स्वागत करता हूं. अब हमारे गांव में छुआछूत नाम की बीमारी कभी भी अपने पैर नहीं पसारेगी.’’
दीनदयाल के इतना कहते ही वहां खुशी का माहौल छा गया. Hindi Social Story
सुगिया के नशीले हुस्न में न जाने कितने नेताओं और चंदनधारियों ने गोता लगा कर खुद को खुश किया था, पर वही सुगिया जब छोटे से सुख की तलाश में भोला का दामन थाम बैठी, तो जाति के नाम पर सभी ने जैसे बवंडर सा खड़ा कर दिया. आखिर क्यों?
गांव के अगड़ों ने फरमान जारी कर दिया, ‘सुगिया को नंगा कर के गांव में घुमाया जाएगा और उसे भगाने वाले भोला की गरदन उतार ली जाएगी.
‘उन दोनों ने मिल कर हमारी इज्जत को धूल में मिला दिया है, अगर हमारी नाक ही नहीं रहेगी, तो हम सब यहां रह कर क्या करेंगे, फिर यह पैसा किस काम आएगा?’
जाति की नाक बचाने के नाम पर राघो सिंह जैसे कंजूस आदमी ने भी अपनी ओर से जाति की कटी नाक फिर से जोड़ने के लिए ढाई हजार रुपए के दान का ऐलान कर दिया.
जाति की कटी नाक से शिवन सिंह की विधवा रेणुका को भी परेशानी थी. उस के पति की मौत 3 साल पहले हो गई थी. जब जवान थी, तब उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था, लेकिन किसी जाति वाले ने उस की कोई मदद नहीं की थी. आखिर नाथूराम ने उसे अपने बच्चों को पढ़ानेलिखाने का काम दिया. इस तरह रेणुका को जीने के लिए एक रास्ता मिल गया.
वैसे, लोगों को शक था कि रेणुका नाथूराम के बच्चों की सिर्फ मास्टरनी ही नहीं थी, बल्कि उन दोनों के बीच एक नजदीकी संबंध भी था. हां, इस रिश्ते में कभी भी इतना खुलापन नहीं आया कि उस की बू किसी के बरदाश्त की हद लांघ जाती. फिर चोरी जब तक पकड़ी न जाए, चोरी कैसे कही जा सकती है.
तभी तो अब रेणुका कहती है, ‘‘उस बेशर्म को भागना ही था, तो किसी अपनी जाति वाले को ले कर भाग जाती. नाक कटा दी…’’
देवी मंदिर के बाबा युगल किशोर को इस घटना के पीछे घोर कलियुग का हाथ दिखता है. वे कहते हैं, ‘‘घोर कलियुग आ गया है… पहले भी ऐसा होता था, पर तब राजघरानों में छोटे कुल की लड़कियां आती थीं. अब तो सब उलटा हो गया…’’
सुगिया व भोला को गांव से गए हुए तकरीबन 15 दिन हो गए थे, पर अभी भी हर कहीं यही चर्चा होती.
एक तरफ ऊंची जाति के लोग बदला लेने की तैयारी में जुटे थे, वहीं पिछड़े एकदम खामोश थे.
कुछ ऐसे नौजवान जरूर थे, जिन्हें इस बात की खुशी थी कि भोला ने हिम्मत का काम किया है.
अगड़ों में भी 2-3 लोग ऐसे थे, जो इस सारी घटना पर एक अलग सोच रखते थे. उन की नजर में अपने जीवनसाथी को चुनना कोई गलत हरकत नहीं है, इसलिए इसे ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए. फिर सुगिया ने तो यह कदम बेबसी की हालत में उठाया था.
सुगिया का जन्म तकरीबन 20 साल पहले हुआ था. जब वह मां के पेट में थी, तभी उस के पिता को किसी गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया था. उस के जन्म के डेढ़ साल बाद वे मर गए थे.
तब सुगिया का इस दुनिया में उस की मां के अलावा और कोई न था. कहने को तो उस के 2-2 चाचा भी थे, पर सालों पहले बंटवारा हो चुका था. वैसे, सुगिया के पिता कुछ जमीन छोड़ गए थे.
पति की मौत के बाद सुगिया की मां ने वह जमीन अपने एक देवर के जिम्मे कर दी थी. उसी से उन दोनों मांबेटी का गुजारा चलता रहा.
कुछ समय बाद सुगिया के चाचा ने कुछ भी देने से इनकार कर दिया. सुगिया की मां ने अपनी बिरादरी के कई लोगों से इंसाफ की गुहार लगाई, पर कोई उस की मदद करने के लिए आगे नहीं आया. जमीन उस के हाथ से निकल गई.
आखिर में सुगिया की मां ने पेट की खातिर अपनी बिरादरी के ही भरत मुखिया के यहां काम करना शुरू किया. वह खुद ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, उस के पास पैसे भी नहीं थे, पर उस ने सुगिया को स्कूल भेजना शुरू किया. पहली, दूसरी, तीसरी…छठी जमात, वह लगातार आगे बढ़ती जा रही थी.
अचानक उन्हीं दिनों सुगिया पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. मुखिया की लड़की की शादी थी. उन का घर बिजली की रोशनी से जगमगा रहा था. ठीक समधी मिलन के समय जब लोग बाहर गए हुए थे, पता नहीं कैसे सुगिया की मां का हाथ बिजली के नंगे तार से छू गया और वह चल बसी.
सुगिया का स्कूल जाना बंद हो गया. 12 साल की लड़की का अपना कौन था, जिसे वह अपना कहती. वह दिनरात कोठरी में पड़ी रहती. कोई दूसरा होता तो मुखिया को लेने के देने पड़ जाते, पर यहां तो कोई सुगिया की खोजखबर लेने वाला नहीं था.
वैसे, मुखिया ने सुगिया की मां का अंतिम संस्कार करा दिया था और उसे 50 रुपए नकद व 10 किलो चावल भी दिए थे. साथ ही, उस ने यह संदेशा भी भिजवाया था कि अगर वह अपनी मां की जगह काम करना चाहती है, तो कर सकती है.
सुगिया जैसों का सत्कार हो या अनादर, उस से उन का क्या बनताबिगड़ता है. फिर रोटी का जुगाड़ हो जाने के बाद ही आदमी आदरअनादर की बात सोच पाता है. सुगिया को अगर मुखिया के यहां काम न मिलता, तो शायद उसे दरदर भटकना पड़ता.
मुखिया के यहां काम करतेकरते 2 साल बीत गए. अब सुगिया 14 साल की हो गई थी. उस का बदन गदराया हुआ था और आंखों में एक चमक आ गई थी. मैलेकुचैले कपड़ों में भी वह खूबसूरत लगने लगी थी. वह सुबहशाम मुखिया के घर जाती और काम कर के अपनी कोठरी में लौट आती.
एक दिन सुगिया शाम ढलने के बाद अपनी कोठरी में लौट रही थी, तो मुखिया के बेटे सतीश ने एक दोस्त के साथ उसे उठा लिया. वह चीखीचिल्लाई, पर किसी ने उस की आवाज न सुनी.
मुखिया के बेटे ने उस के हाथ में सौ रुपए का एक नोट पकड़ा दिया. वह चुप हो गई.
इस वारदात के बाद सुगिया ने मुखिया के घर काम करना छोड़ दिया. अब उस का धंधा ही बदल गया.
सुखिया अब मर्दों को जिस्मानी सुख देती, बदले में उसे कुछ पैसे मिल जाते. इस में उसे अजीब सी खुशी महसूस होती, क्योंकि जब वह मुखिया के यहां जूठे बरतन धोती थी, तो भरपेट खाना तक नहीं मिलता था. पीठ पीछे चाहे लोग जो कुछ भी कहते, पर उस के आगे आने पर तो उन्हें नाक ही रगड़नी पड़ती थी.
सुगिया ने कई लोगों की सेवा की. मुखिया के बेटे से ले कर खुद मुखिया तक की. कई चंदनधारी भी उस के तलवों में चंदन रगड़ कर अपने को खुश कर के लौटे और कई नेता भी बेहिचक उस के दरवाजे पर पहुंचे. उस ने सब के साथ एक सा बरताव किया. सब की हवस मिटाई. उस के यहां आने वालों में कोई जाति बंधन नहीं था.
भोला कई दिन से सुगिया को देखता आ रहा था. एक दिन सुगिया का इशारा पा कर वह निहाल हो उठा. फिर क्या था, वह बारबार सुखिया से जिस्मानी सुख पाने लगा. इस के लिए उसे सुगिया के यहां जाने की जरूरत न थी, क्योंकि वही उस के पास आ जाती थी.
सुगिया ने हर नौजवान के सामने इस नरक से अपने को उबार लेने की बात कही, पर किसी ने उसे कबूल न किया. एक भोला ही ऐसा था, जिस ने मर्दानगी दिखाई थी, ‘मैं तुम्हें जरूर अपनाऊंगा… चाहे इस के लिए मु झे जो भी मुसीबत उठानी पड़े.’
फिर एक रात दोनों गांव से भाग गए.
पता नहीं, गांव वालों की नाक इस में कैसे कट गई? उन्हें तो खुश होना चाहिए था कि अब सुगिया गांव की धंधे वाली नहीं, किसी की बीवी बन गई थी. पर उन सिरफिरों को कौन सम झाता?
Inter Caste Love Story. नेहा खेतों में गाय चरा रही थी. साथ में उस की सहेली अनुराधा भी थी. नेहा और अनुराधा अपनी बातों में मगन थीं कि एक जानीपहचानी आवाज ने उन का ध्यान खींचा. दोनों ने आवाज की दिशा में नजर घुमाई.
यह थानेदार अशोक सिंह का बेटा आकाश था, जो नेहा से शादी करने की सोच रहा था.
नेहा ने आकाश को देख कर बुरा सा मुंह बना लिया. वह अनुराधा से बोली, ‘‘इस से कह दो कि यहां से चला जाए.’’
‘‘तुम शांत रहो. पहले सुन तो लो कि यह क्या कह रहा है.’’
‘‘जो कहता आया है, वही कहेगा.’’ ‘‘अच्छा, अब तुम शांत हो जाओ, आकाश नजदीक आ गया है.’’
आकाश उन दोनों के पास आ कर खड़ा हो गया. अनुराधा के होंठों पर हलकी मुसकान बिखर गई. वह गंभीर होने की ऐक्टिंग करते हुए बोली, ‘‘यहां क्यों आए हो?’’
‘‘मैं नेहा से मिलने आया हूं.’’ ‘‘मगर क्यों?’’
‘‘उस से कुछ कहना है.’’ ‘‘ठीक है, कहो,’’ बोल कर अनुराधा नेहा के न चाहते हुए भी वहां से कुछ कदम दूर चली गई.
नेहा ने थोड़ा कठोर बनते हुए आकाश से कहा, ‘‘मैं जानती हूं कि तुम क्या कहोगे. मुझे कुछ नहीं सुनना है. तुम यहां से चले जाओ.’’
आकाश ने प्यार भरे लहजे में कहा, ‘‘नेहा, ऐसा मत बोलो. मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूं और तुम से शादी करना चाहता हूं.’’
‘‘मैं तुम से कितनी बार कह चुकी हूं कि यह मुमकिन नहीं है. तुम ऊंची जाति के हो… उस पर भी थानेदार के बेटे.’’
‘‘थानेदार मेरे पापा हैं, मैं तो नहीं. वैसे भी इस में बुराई क्या है?’’
‘‘बुराई यह है कि तुम्हारे पापा हमेशा अमीर लोगों की बात सुनते हैं. वे रिश्वत ले कर सच को झूठ और झूठ को सच बना देते हैं,’’ नेहा ने कहा.
‘‘ऐसा वे करते हैं, पर मैं नहीं.’’ ‘‘बेटे तो उन्हीं के हो, असर तो पड़ेगा ही.’’
‘‘ऐसा नहीं है नेहा. मैं तुम्हें दिखा दूंगा कि मैं क्या हूं. बस, तुम थोड़ा साथ दे दो.’’
‘‘देखो, मुझ में और तुम में बहुत फर्क है. मैं छोटी जाति की हूं. तुम्हारे पापा यह बरदाश्त नहीं कर पाएंगे, इसलिए अच्छा यही होगा कि मेरा पीछा करना छोड़ दो.’’
आकाश ने कहा, ‘‘मैं जातपांत को नहीं मानता. तुम मुझ पर भरोसा करो.’’
नेहा आकाश को तिरछी निगाहों से देखने लगी.
आकाश ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘नेहा, तुम मानो या न मानो, मैं तुम्हें अपना समझता हूं. एक दिन ऐसा आएगा कि तुम पिघल जाओगी और मेरे सच्चे प्यार के आगे झुक जाओगी.’’
इतना कह कर आकाश तेजी से चला गया. अनुराधा नेहा के पास आती हुई बोली, ‘‘तुम उस की बात क्यों नहीं मान लेती हो?’’
‘‘कैसे मान लूं, तुम तो…’’
अनुराधा ने उस की बात बीच में ही काट दी, ‘‘नेहा, मुझे लगता है कि आकाश का प्यार सच्चा है और वह तुम्हें खुश रखेगा.’’
नेहा सोच में पड़ गई.
अनुराधा ने नेहा से फिर कहा, ‘‘वैसे, यह तुम्हारी मरजी है. तुम जैसा ठीक समझे , वही करो.’’
नेहा ने कहा, ‘‘अच्छा, मैं इस पर सोचूंगी. फिलहाल यहां से चलते हैं.’’
नेहा ने अपनी गाय संभाली और अनुराधा के साथ घर की राह ली.
नेहा का इस दुनिया में मां के सिवा कोई न था. जब वह 8 साल की थी, तभी पिता का साया उस के सिर से उठ चुका था. उन की थोड़ी सी जमीन थी, जिस में खेती कर के उस की मां कुछ अनाज उपजा लेती थीं.
नेहा 10वीं पास कर चुकी थी. आगे की पढ़ाई के लिए मां ने मना कर दिया, पर वह और पढ़ना चाहती थी.
नेहा ने खुरपी उठाई और मां से कहा, ‘‘मां, अनुराधा आए तो उसे भेज देना.’’ ‘‘ठीक है, मैं भेज दूंगी.’’
नेहा गांव से बाहर कुछ दूर आ गई, जहां आम का एक बगीचा था. वहां सन्नाटा पसरा था. दूरदूर तक किसी का घर नहीं था. नेहा उसी बगीचे के सामने घास छीलने लगी.
महेंद्र सिंह इस गांव का सब से अमीर आदमी था. गांव में दूरदूर तक उसी की जमीन थी. उस का लड़का अमर सिंह बड़ा घमंडी था. बातबात पर लड़नाझगड़ना, तकरार करना उस की आदत में शामिल था. वह कुछ लड़कियों की तो इज्जत से भी खेल चुका था.
अमर सिंह अपने खेतों को देखता हुआ नेहा के पास पहुंच गया. उस को अचानक अपने सामने देख नेहा डर गई.
वह बोला, ‘‘घबराओ मत. मैं शेर नहीं हूं, जो तुम्हें खा जाऊंगा. मैं सिर्फ मजा लूंगा…’’
नेहा घबराते हुए बोली, ‘‘तुम यहां से चले जाओ. मैं यहां घास लेने आई हूं.’’
‘‘तुम्हारी फूल सी जवानी को छोड़ कर मैं कैसे चला जाऊं. यह कभी नहीं होगा. बस, आ जाओ. थोड़े समय की तो बात है. आओ, मेरी बांहों में…’’ कह कर अमर नेहा की ओर बढ़ने लगा.
नेहा धीरेधीरे पीछे हटने लगी, लेकिन अगले ही पल अमर सिंह ने पूरी ताकत से उसे दबोच लिया और जमीन पर पटक कर उस पर छा गया.
नेहा पूरी ताकत से उस के चंगुल से छूटने की कोशिश करने लगी, पर कहां अमर सिंह का कठोर हाथ और कहां उस का कोमल बदन. कुछ ही देर में उस का सबकुछ लुट गया.
अमर सिंह अपना काम खत्म कर तेजी से वहां से चल दिया. नेहा वहीं कुछ देर तक बेसुध सी हालत में रही, फिर धीरे से उठने की कोशिश करने लगी कि तभी अनुराधा वहां आ गई. उस ने सहारा दे कर नेहा को उठाते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’
नेहा के मुंह से कुछ नहीं निकला. वह उस से लिपट कर बुरी तरह रो पड़ी.
अनुराधा ने नेहा की पीठ सहलाई और प्यार से पूछा, ‘‘क्या हुआ नेहा? बोलो तो सही?’’
नेहा ने सारी घटना रोरो कर कह दी.
अनुराधा गुस्से में कांपते हुए बोली, ‘‘घबराओ नहीं. हम अभी थाने चलेंगे, उस अमर सिंह को नहीं छोड़ेंगे.
इस घटना से नेहा की मां को गहरा धक्का लगा. अनुराधा ने उन्हें शांत किया, फिर वह उन दोनों को ले कर थाने चल पड़ी.
नेहा की मां और अनुराधा ने थानेदार अशोक सिंह को सारी घटना बताई, तो वह उलटे उन्हीं पर बिगड़ गया.
‘‘ऐसे इज्जतदार आदमी के बेटे के ऊपर लांछन लगाते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती. निकलो यहां से, नहीं तो हवालात में बंद कर दूंगा.’’
यह सुन कर अनुराधा को बहुत गुस्सा आया.
अनुराधा नेहा की मां से बोली, ‘‘चलिए, चाची यहां से.’’
यह चर्चा पूरे गांव में फैल गई. आकाश को जब इस के बारे में पता चला, तो वह फौरन नेहा के घर पहुंचा.
नेहा आकाश को देख कर रोने लगी. आकाश ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘नेहा, रोओ नहीं. मैं तुम्हारे साथ हूं.’’
नेहा की मां ने रोते हुए आकाश से कहा, ‘‘मैं ने सोचा था कि इस की शादी धूमधाम से करूंगी. अब कैसे होगी मेरी नेहा की शादी? कौन करेगा इस से ब्याह?’’
‘‘मैं करूंगा नेहा से शादी. मैं ने तो कब से इसे अपना मान लिया है,’’ आकाश बोला.
आकाश की यह बात सुन कर वहां खामोशी छा गई.
कुछ देर बाद आकाश ने नेहा से पूछा, ‘‘नेहा, क्या तुम मुझ से शादी करोगी?’’
जवाब में नेहा का सिर झुक गया.
नेहा की मां को मालूम था कि आकाश नेहा को पसंद करता है, इसलिए वे भी मना नहीं कर सकीं.
अनुराधा ने आकाश को उस के पिता थानेदार अशोक सिंह के किए गए गलत बरताव की बात बताई.
आकाश ने कहा, ‘‘मेरे पापा की महेंद्र सिंह से दोस्ती है, लेकिन कोई बात नहीं. मैं अमर सिंह से उस की इस करतूत का बदला जरूर ले कर रहूंगा.
‘‘मुझे कुछ दिनों के लिए नेहा को यहां दूर ले कर जाना होगा, तभी मैं इस से शादी कर पाऊंगा. मैं पैसों का इंतजाम कर लेता हूं.’’
कुछ दिनों बाद सारा इंतजाम कर के आकाश नेहा के घर पहुंचा. वह पहले से तैयार थी.
आकाश ने नेहा की मां के पैर छुए और कहा, ‘‘मैं इस के साथ शादी कर के जल्दी ही लौट आऊंगा. शादी के बाद मेरे पापा चाह कर भी कुछ नहीं कर सकेंगे. आप नेहा को रेलवे स्टेशन ले कर चलिए, मैं पीछेपीछे आता हूं.’’
अगले दिन पूरे गांव में खबर फैल गई कि आकाश नेहा को ले कर भाग गया है.
थानेदार अशोक सिंह ने अपना सिर पीट लिया. वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था. उस का सारा घमंड चूरचूर हो गया था. Inter Caste Love Story
Hindi Social Story. अदिति को क्या पता था कि जिस छात्रा को वे उस की छोटी जाति होने के कारण पसंद नहीं करती थीं, एक दिन उसी की शरण में उन्हें जाना पड़ेगा. फिर क्या हुआ?
‘‘है लो, क्या मैं कमलाजी से बात कर सकती हूं?’’ उधर से जवाब मिला, ‘‘जी नहीं, वे बाहर गई हैं.’’
‘‘कब तक वापस आएंगी?’’
जवाब मिला, ‘‘एक हफ्ते बाद… वैसे आप को क्या काम है?’’
मैं ने बताया कि मेरा एक बहुत ही जरूरी काम है. तब उन की सैक्रेटरी ने कहा, ‘‘मैडम, पहले आप मिलने का वक्त तय कर लीजिएगा.’’
मैं ने हफ्तेभर बाद का समय लिया और फोन रख दिया.
मेरे माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. मुझे अपने बेटे सौरभ का कैरियर बरबाद होता नजर आ रहा था. जन कल्याण केंद्र दिल्ली की मानी हुई संस्था थी. वह अनगिनत लोगों को इंसाफ दिलाती आ रही थी. कमला देवी, यानी उस केंद्र की अध्यक्ष की पहुंच प्रधानमंत्री तक थी.
हफ्तेभर बाद जब मैं जन कल्याण केंद्र के दफ्तर में कमलाजी के सामने पहुंची, तो वे बोलीं, ‘‘कहिए, कैसे आना हुआ?’’
मैं ने देखा तो देखती ही रही. नजरें मानो हटना ही नहीं चाहती थीं. मैं ने कहा, ‘‘अरे कमलाजी, आप… आप ने शायद मुझे पहचाना नहीं. याद है, आप मेरी ही क्लास में थीं?’’
कुछ पल वे सोचती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘अरे हां, आप अदिति मैडम हैं न?’’
मुझे संतोष हो गया कि चलो, अपना काम तो बना. कमला बोलीं, ‘‘हां, बताइए, क्या काम है?’’
‘‘कमलाजी, मेरा बेटा सौरभ इंजीनियरिंग के आखिरी साल का छात्र है…’’
वे बोलीं, ‘‘मैडम, मैं वही कमला हूं, आप की छात्रा… मुझे ‘जी’ न कहें.’’
मैं कुछ देर चुप रहने के बाद बोली, ‘‘अभी कुछ दिन पहले कालेज में होने वाली हड़ताल को रोकने वाले छात्रों में मेरा बेटा भी था. वे चाहते थे कि हड़ताल न हो, मगर कालेज के दादा किस्म के छात्र हड़ताल के मूड में थे.
‘‘काफी मारपीट के बाद जब मामला प्रिंसिपल तक पहुंचा, तो उन्होंने भी सौरभ को बिना बात दोषी ठहराते हुए कालेज से निकाल दिया.
‘‘गुंडों का मुखिया यहां के उद्योगपति का एकलौता बेटा है और उस के पिता से कालेज को काफी तगड़ी इमदाद मिलती है, इसलिए प्रिंसिपल भी उस से दबता है.
‘‘अब तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूं… मेरे बेटे की तो जिंदगी ही अंधेरे में डूबती नजर आ रही है, जबकि वह हर साल अव्वल आता है. अब तो बस आप ही कुछ कर सकती हो, क्योंकि उस गुंडे के पिता की पहुंच काफी है.’’
वे चुपचाप बैठी सुनती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘आप उस लड़के का नाम, पिता का नाम, अपने बेटे का नाम व कालेज के बारे में लिख कर दे दें. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगी.’’
मैं ने जरूरी जानकारी लिख कर दी और विदा ले कर चली आई. जब घर पहुंची, तो दिल कुछ पुरानी यादें सोचने को मजबूर था…
तब मैं 7वीं क्लास की टीचर थी. एक दिन देखा, मेरी क्लास में एक नई लड़की आई थी. वह सहमीसहमी सी चुपचाप बैठी थी. मालूम हुआ कि हमारे स्कूल के सफाई कर्मचारी की लड़की थी.
मैं ने सोचा, ‘अब पढ़ाना तो पड़ेगा ही. क्या जमाना आ गया कि ब्राह्मण भी अब ‘अछूतों’ को पढ़ाएंगे. सत्यानाश हो इस सरकार का, हमारा तो धर्म ही भ्रष्ट कर दिया.’
उसी क्लास में कुछ तेज लड़कियों की एक टोली थी. वे सब मेरी ही कालोनी में रहती थीं. प्रमिला उन सब की मुखिया थी और मेरी सब से ज्यादा मुंहलगी छात्रा थी.
उसी शाम प्रमिला अपने मातापिता के साथ हमारे घर आई, तो मैं ने बताया कि आज हमारी क्लास में एक अछूत लड़की आई है. पता नहीं, मैं उसे कैसे पढ़ा पाऊंगी. मेरा तो दिल ही नहीं कर रहा कि मैं स्कूल जाऊं. गंदी, अछूत… प्रमिला मेरी बातें गौर से सुन रही थी.
अगले दिन जब कमला स्कूल आई, तो वह लड़कियों से बोली, ‘मैं भी खेलूंगी.’
तभी प्रमिला बोल पड़ी, ‘नहीं, हम तुम्हें नहीं खिलाएंगे. दूर हटो.’
वह बेचारी सहम कर एक तरफ खड़ी हो गई. वह खेल देखती रही. उस की आंखों में भी अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ खेलने की चाह उभरती, मगर कोई उस से बात तक न करता. अछूत जो ठहरी, बेचारी.
क्लास में यह मालूम होते ही कि वह स्कूल के सफाई कर्मचारी की बेटी है, सब उस से दूरदूर रहतीं. वह चुपचाप अकेले खाना खाती. अकेली रहती. सब लड़कियां खूब चिढ़ातीं, तो उस की आंखों में आंसू भर आते.
मैं सारी बात जानती थी, मगर चुप रहती. सोचती, अच्छा है, खुद परेशान हो कर स्कूल छोड़ देगी, तो बवाल कटेगा.
एक दिन वह हिम्मत कर के प्रमिला से बोली, ‘मुझे भी अपने साथ खेलने दो न.’
प्रमिला फौरन बोली, ‘तुम अछूत हो, तुम हमारे साथ नहीं खेल सकती.’
उस की समझ में नहीं आया, तो वह बोली, ‘प्रमिला, यह अछूत क्या होता है?’
प्रमिला बोली, ‘यह तो मुझे भी नहीं पता… कल अपने मातापिता से पूछ कर बता दूंगी.’
कमला बेचारी चुपचाप वापस क्लास में चली गई.
अगले दिन प्रमिला ने सब के सामने बताया, ‘पता है, अछूत कौन होते हैं? जो गंदे होते हैं, उन्हें अछूत कहते हैं. तुम सब से ही ज्यादा गंदी लड़की हो, तभी तो हम तुम्हें नहीं खिलाते.’
कमला अपने साफसुथरे हाथों और कपड़ों की तरफ देखती हुई बोली, ‘लेकिन मैं तो रोज नहाती हूं, साफ कपड़े पहनती हूं… फिर मैं गंदी कैसे हुई?’
प्रमिला बोली, ‘यह तो हम नहीं जानते, मगर दूर हटो, हम से मत बोला करो.’
कमला रोती हुई मेरे पास आई और सारी बात बताई. पर मैं ने उसे ही डांट दिया, ‘वे सब ठीक ही तो कह रही हैं. चलो, चुपचाप बैठो. ज्यादा शिकायतें मत लगाया करो.’
उस बेचारी का दिल तो वैसे ही दुखी था. मेरी डांट से वह और भी सहम गई.
कुछ वक्त बाद सालाना इम्तिहान का नतीजा निकला, तो कमला अव्वल रही.
कमला ने अब 8वीं क्लास में दाखिला लिया. मैं उस को हिंदी पढ़ाती थी. एक दिन मैं ‘गंगा’ नामक पाठ पढ़ा रही थी. उस में लिखा था, ‘गंगा में स्नान करने से सब ‘पवित्र’ हो जाते हैं, सारे ‘पाप’ धुल जाते हैं, सब शुद्ध हो जाते हैं.’
उस के कुछ दिनों बाद गंगा स्नान की छुट्टियां पड़ीं. जब स्कूल खुला, तो मैं ने देखा, कमला बहुत खुश थी. वह क्लास में बैग रख कर भागीभागी लड़कियों के पास गई और जोरजोर से बोली, ‘अब तो मैं भी खेलूंगी. पता है प्रमिला, अब की बार मैं ने अपने बाबा से खूब जिद की कि वे मुझे गंगा नहला दें. अब तो मैं गंदी भी नहीं रही. मैं तो शुद्ध हूं. याद है, उस दिन मैडम पाठ में यही बातें पढ़ा रही थीं.’
सब लड़कियां चुप थीं. वे सब मेरे पास आईं, तो कमला भी साथ में थी. सब ने वही बात बताई, जो मैं पहले ही सुन चुकी थी.
अचानक कमला आगे आ कर बोली, ‘मैडम, अब तो मैं इन के साथ खेल लूं? अब तो मैं गंगा नहा आई.’
मगर मेरे दिमाग में बचपन से ही जाति भेद घुट्टी की तरह पिलाया गया था, वह उस वक्त बुरी तरह से उबाल मार रहा था. मैं बिगड़ कर बोली, ‘गंगा भी तुम ने गंदी कर दी… तुम तो फिर भी वही अछूत हो.’
यह सुन कर वह रोने लगी और भाग कर क्लास में चली गई.
मैं ही नहीं, हर टीचर उसे इसी निगाह से देखती थीं. बात आईगई हो गई. कमला 2 साल बाद उसी दबेघुटे माहौल में रह कर, तमाम तकलीफों के बावजूद हाईस्कूल के इम्तिहान में जिलेभर में अव्वल आई. उसी दौरान मेरे पति का तबादला हो गया.
अब उसी कमला को इस रूप में देख कर मैं बीती बातों को याद कर के सिहर गई थी.
मेरे रिटायर इंजीनियर पति सीधेसादे, शरीफ इनसान थे. वे अपने बेटे का केस उस उद्योगपति से कभी भी नहीं जीत सकते थे. ऐसी हालत में मेरी सारी उम्मीदें ‘जन कल्याण केंद्र’ पर टिकी थीं.
तकरीबन 15 दिन गुजर गए, मगर कमला देवी की तरफ से कोई खबर न आई. मुझे यकीन हो गया कि कमला देवी मेरा काम नहीं करेंगी.
एक दिन टेलीफोन की घंटी बजी. मैं ने फोन उठाया, तो कमला देवी बोलीं, ‘‘मैडम नमस्ते, माफ कीजिएगा, मैं दूसरे कामों में मशगूल थी, मगर आप की ओर से लापरवाह हरगिज नहीं थी. आप का काम होने ही वाला है. क्या आप कल मेरे दफ्तर आ सकती हैं?’’
मैं ने कहा, ‘‘बताओ, कब आऊं?’’
वे बोलीं, ‘‘दोपहर को किसी भी समय आ जाइएगा.’’
अगले दिन दोपहर को जब मैं कमला देवी के दफ्तर पहुंची, तो उन्होंने उठ कर मेरा स्वागत किया और चाय को पूछा.
मैं सकुचा गई, तो वे बोलीं, ‘‘नहीं मैडम, ऐसा कुछ नहीं है. मैं पंडितजी से कह कर चाय मंगवाऊंगी.’’
मैं शर्म से जमीन में गड़ी जा रही थी. मगर कमला देवी साफ दिल की थीं, इसलिए उन का इरादा मेरी बेइज्जती करने का नहीं था.
जब चाय आई, तो मैं ने चुपचाप उठा कर पी ली. फिर मैं ने उन से पूछा, ‘‘अब बताओ, आप इस मुकाम तक कैसे पहुंचीं?’’
वे सोचते हुए बोलीं, ‘‘मैडम, मैं एमए तक लगातार अव्वल आई. जब शादी की बात चलती, तो कोई अच्छा लड़का नहीं मिला. इस बीच मेरे बाबा की मौत हो गई. मैं ने बहुत सोचासमझा और फिर यहां दिल्ली में आ कर यह ‘जन कल्याण केंद्र’ खोल कर जनता की सेवा में जुट गई.
‘‘पहले यह एक छोटी सी संस्था थी, मगर मैं ने अपना तनमनधन इस में लगा दिया. बहुत मेहनत की… नतीजा आप देख ही रही हैं.
‘‘जहां तक शादी करने का सवाल था, तो मेरे साथ समाजसेवा करने वाला कोई मिलता ही न था. फिर किसी और जाति का होता, तो मुझ अछूत से शादी कैसे करता? चाहे मुझ में लाख गुण सही, मगर जाति से तो मैं अछूत ही थी.’’
मैं नजरें झुकाए सब चुपचाप सुनती रही, फिर बात बदलते हुए मैं ने पूछा, ‘‘अच्छा, यह तो बताओ, आप ने मेरा काम इतनी जल्दी कैसे कर दिया?’’
वे बोलीं, ‘‘मैडम, आप ही पढ़ाया करती थीं, ‘‘गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु…’’
उन के इन लफ्जों से एक तमाचा सा मुझे लगा. मुझे महसूस हुआ, जैसे एकबारगी मेरा वजूद हिल गया है. मेरे पढ़ाए को जिंदगी में उतारने वाली इस अछूत कन्या की दया की याचिका अब मैं खुद थी, जो खुद तो सारी उम्र सब को पढ़ाती रही, लेकिन खुद उस को अपनी जिंदगी में उतार न पाई.
मैं पसीने से भीग गई. उस पल चाहा कि जमीन फट जाए और मैं उस में समा जाऊं. अपनी ‘गंगा’ वाली बात याद कर के तो मैं शर्म से पानीपानी हो गई और बोझिल मन से घर वापस आ गई.
कमला देवी की कोशिशों के कारण ही उस गुंडों के मुखिया को कालेज से निकाल दिया गया था और मेरे बेटे को दोबारा दाखिला मिल सका.
अगले दिन मैं ने कमला देवी को फोन किया, ‘‘मैं जानती हूं, आप हमेशा काम में जुटी रहती हैं… मगर क्या आप समय निकाल कर शाम को मेरे घर आ सकती हैं?’’
वे बोलीं, ‘‘जी मैडम, मैं जरूर आऊंगी.’’
मैं शाम होने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी.
कमला देवी जब अपनी गाड़ी से उतरीं, तो मैं उन्हें आदर से अंदर ले गई और खुद चाय बना कर लाई.
कमला देवी बोलीं, ‘‘मैडम, आप ने क्यों इतनी परेशानी उठाई?’’
‘‘मैं किन शब्दों में आप का धन्यवाद करूं…’’
कमला देवी हंसती हुई बोलीं, ‘‘मैडम, यह आप को क्या हो गया है?’’
मैं लाजसंकोच छोड़ कर बोली, ‘‘सच, आज आप को देख कर लगता है कि आप कितनी निर्मल, कितनी पवित्र थीं? अगर आप गंदे तालाब को भी छू दो, तो वह गंगा बन जाए.’’
वे चुप रहीं. कुछ देर बातें करने के बाद जब वे विदा ले कर चलीं, तो उन की तरफ देखते हुए मुझे लग रहा था कि उन के ऊपर मेरे द्वारा चिपकाया गया ‘अछूत’ नाम का धब्बा तेजी से धुंधला होता जा रहा था. Hindi Social Story
Caste Discrimination. साल 2016 से पहले टीना डाबी नाम की लड़की को कोई नहीं जानता था. वे एक दलित परिवार से ताल्लुक रखती थीं. पढ़ने में बहुत होशियार थीं. उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और 2015 की अपनी पहली ही कोशिश में आल इंडिया टौप किया और ट्रेनिंग के बाद साल 2016 के बैच की आईएएस अफसर बनीं.
यहां टीना डाबी का जिक्र इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि भारत में आज भी जाति का सांप नौजवान पीढ़ी खासकर लड़कियों को डंसने के लिए हमेशा तैयार रहता है. उन्हें ताना दिया जाता है चूंकि वे निचली जाति की हैं तो उन्हें पढ़लिख कर क्या हासिल होगा? घर वाले ही सवाल खड़ा कर देते हैं कि ‘तेरा क्या कालेज जा कर पढ़ने का काम?’, ‘अगर कमाने लगेगी तो तेरे नखरे बढ़ जाएंगे’, ‘हमारी बिरादरी में शादी नहीं हो पाएगी’. कहने का मतलब है कि उन के सपनों की उड़ान के पर काट दिए जाते हैं.
पर क्या जाति का हमारे दिलोदिमाग पर हावी होना इतना जरूरी है कि हम इस की बुनियाद पर किए गए फर्क को ही हकीकत मान लें और अपनी पूरी जिंदगी को बरबाद कर दें?
बिलकुल नहीं, क्योंकि जाति इनसान की काबिलीयत तय नहीं करती, बल्कि उस का काम और सोच तय करती है. टीना डाबी इस बात का सब से शानदार उदाहरण हैं.
अब सवाल उठता है कि जाति का यह भेद बनावटी क्यों है? जवाब, क्योंकि पैदा होते ही कोई ऊंचानीचा नहीं होता. पढ़ाई, हुनर, मेहनत, बरताव… यही इनसान की असली पहचान है. आज डाक्टर, इंजीनियर, टीचर, बिजनैसमैन हर जाति में हैं, तो फिर भेद का लौजिक ही खत्म हो जाता है.
लेकिन जब हम समाज को खंगालते हैं, तो यही महसूस होता है कि हर समुदाय की लड़कियां जाति के नाम पर दबा दी जाती हैं या फिर उन में बचपन से ही यह भर दिया जाता है कि बाहर जा कर अपनी जाति की लड़कियों में उठबैठ करो, विधर्मी लड़की से तो उचित दूरी बनाए रखो.
यहां उन के वजूद को कुंद किया जाता है, क्योंकि समाज के ठेकेदारों को पता है कि लड़कियां अपने वजूद से जाति का भेद मिटा सकती हैं.
ऐसे दिखाएं अपनी स्मार्टनैस
सब से पहले खुद को इतना काबिल बनाओ कि जाति पूछने की जरूरत ही न पड़े. पढ़ाई के साथसाथ स्किल में टौप करो. जब आप का रिजल्ट बोलेगा तो लोग जाति नहीं पूछेंगे. उदाहरण के लिए कोई लड़की ब्यूटी पार्लर चला रही है. वह अपने काम में माहिर है, तो कोई उस की जाति नहीं पूछेगा, बल्कि ‘मैडम’ कह कर इज्जत देगा.
पढ़ाई कर के शादी करो और बच्चे पैदा कर के उन्हें पालते रहो की सोच से बाहर निकलो. इस के बजाय कोई प्रोफैशन जैसे डाक्टर, इंजीनियर वकील, टीचर आदि को चुनो. अगर बिजनैस की समझ है तो कारोबारी महिला बनो. याद रखिए कि आज का आप का काम ही कल की सब से बड़ी कामयाबी है, जो आप को बराबरी का एहसास कराता है.
दोस्ती और टीमवर्क से दीवार तोड़ो
जाति का बंधन तोड़ने के लिए स्कूलकालेज, कोचिंग में सब के साथ बैठो, प्रोजैक्ट करो, खाना शेयर करो. खुद को किसी से कम मत समझो.
जब लड़कियां साथ में आगे बढ़ेंगी तो ‘तुमहम’ वाली सोच अपनेआप खत्म होगी. इस से उन का दायरा बढ़ेगा और दायरा बढ़ने से उन का आत्मसम्मान भी ऊंचा होगा.
बात और भाषा से दूरी मिटेगी
दिक्कत तब ज्यादा होती है जब कोई कहता है कि वह तो ‘फलां जाति की है’. ऐसा कहने के बजाय ‘वह बहुत स्मार्ट है’, ‘अच्छा गाती है’, ‘कोडिंग जानती है’ जैसी हौसला बढ़ाने वाली बातें बोलो. मजाक में भी जाति वाले ताने मत दो, क्योंकि छोटीछोटी बात से ही सोच बदलती है.
रोल मौडल बनो
जब कोई लड़की अपनी मेहनत से नौकरी या बिजनैस कर के परिवार का नाम रोशन करती है, तो पूरे महल्ले की सोच बदलती है. और जब वह कुछ बन जाती है तो उस का भी फर्ज बनता है कि वह बड़ों की इज्जत करे, पर गलत रीतिरिवाज के नाम पर भेदभाव कभी न सहे.
कानून साथ है
संविधान सब को बराबर मानता है. पढ़ाई, नौकरी, मंदिर, दुकान सब जगह बराबरी का हक है. सब से बड़ी स्मार्टनैस क्या है? यही कि ‘मैं लड़की हूं, मैं काबिल हूं’ सोच के साथ जीना.
जब लड़कियां काबिल बनेंगी तो न उन की जाति पूछी जाएगी, न लिंग. सिर्फ काम देखा जाएगा.
याद रखिए, पैदा सब नंगे होते हैं, बिना किसी भेदभाव के, जाति का टैग तो बाद में लगाया जाता है. पर काबिलीयत अपने दम पर कमाई जाती है, तभी तो एक दलित की बेटी जब आईएएस बनती है, तो वह ‘मैडम’ कहलाती है. Caste Discrimination
Blind Faith Story. साधु की बात सुन कर रंपो परेशानी में पड़ गई. क्या करे वह? पति को अच्छा करना है, तो साधु की बात माननी पड़ेगी. इज्जत चली जाएगी, लेकिन पति तो बच जाएगा.
साधु ने उस का हाथ पकड़ लिया और पूछा, ‘‘क्या सोच रही है?’’
रंपो अपनी कलाई को उस के हाथ से छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली, ‘‘आप की बात मान रही हूं बाबा, पर मेरा पति अच्छा हो जाना चाहिए.’’
साधु ने उस के गले में बांहें डालते हुए कहा, ‘‘हम खुश तो देवता खुश. तू चिंता मत कर. तेरा पति पूरी तरह ठीक हो जाएगा.’’
रंपो को साधु की बात पर पूरी तरह यकीन हो गया. वह मंदिर में ही लेट गई. उस ने अपना जिस्म साधु को सौंप दिया.
अपनी वासना का शिकार बनाने के बाद साधु बोला, ‘‘अब जा. कोई आ गया, तो गड़बड़ हो जाएगी.’’
रंपो खड़ी होते हुए बोली, ‘‘बाबा, देवता से सच्ची प्रार्थना करना.’’
साधु उसे हलका सा बाहर की ओर धकेलते हुए बोला, ‘‘जा, अब जल्दी जा यहां से. तू चिंता मत कर.’’
रंपो मंदिर से बाहर निकल आई. भीतर की तरह बाहर भी वैसा ही अंधेरा था. वह अपने पति के पास आ गई. वह सो रहा था. रंपो भी उस के बगल में जा कर लेट गई. उस का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. उसे बारबार अपने किए पर पछतावा हो रहा था. पर फिर सोचा कि कल की सुबह नई रोशनी ले कर आएगी. सालों से बीमार पड़ा उस का पति ठीक हो जाएगा.
रंपो तो अपने पति को यहां ठीक कराने लाई थी. उसे क्या पता था कि देवता भी उस की जाति वालों से फर्क करते हैं. उस की आंखों में एकएक कर वह नजारा साफसाफ घूम रहा था.
उस ने तो साधु के पैरों में पड़ कर मंदिर के देवता के दर्शन की भीख मांगी थी, लेकिन साधु मंदिर की सीढि़यों पर खड़ा हो कर उसे दुत्कारते हुए बोला था, ‘बेहूदा औरत, दूर हट. यह देवता का मंदिर है. सीढि़यां मत चढ़ जाना. तेरा पति बीमार है, तो ठीक हो जाएगा. ले, भभूत ले जा, पर देवता के दर्शन तू नहीं कर पाएगी. देवता तो ऊंची जाति वालों के हैं.’
रंपो और उस का पति दोनों गांव के लोगों के कपड़े धो कर गुजारा करते थे.
रंपो दोनों हाथ जोड़ते हुए बोली थी, ‘देवता तो सभी के हैं. वे किसी जाति से बंधे हुए नहीं होते. मेरे पति दर्द से मरे जा रहे हैं. दर्शन कर लेने दो. हो सकता है, देवता सुन लें. मेरे पति को इस दर्द से छुटकारा मिल जाए, तो मैं आप का एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी.’
रंपो का पति भी गुजारिश भरी नजरों से उस साधु की ओर देख रहा था, पर साधु का उस ओर कोई ध्यान नहीं था.
चमकते लंबे काले बाल, गले में रुद्राक्ष की माला, गेरुए रंग का चमकता कुरताधोती, साधु के चेहरे पर अपने बड़े होने का दंभ साफ रूप से नजर आ रहा था.
साधु रंपो से फिर बोला, ‘तू तो विधवा होगी ही, हम को भी खाएगी. तेरे पति की पीठ में कैंसर का फोड़ा है. वह बच नहीं सकता. क्यों मेरी जान के पीछे पड़ी है? मैं ने तुझे मंदिर में आने दिया, तो समाज मुझे नहीं छोड़ेगा.’
‘मुझ पर रहम करो बाबा. मुझे देवता के दर्शन कर लेने दो. मुझे पूरा भरोसा है कि देवता मेरी अर्जी जरूर सुन लेंगे,’ रंपो ने गुजारिश की.
रंपो की बातों से साधु का दिल पिघलता नजर आया. वह बोला, ‘अभी थोड़ी देर रुक जा. दिन डूबने को है. जब सब चले जाएं, तब तू दर्शन कर के जाना, तब तक बाहर बैठ.’
साधु के कहने से रंपो को हिम्मत बंध गई थी. वह अपने पति रामहेत का हाथ पकड़ कर मंदिर से दूर ले गई.
वह साधु को मन ही मन दुआ देने लगी. महंगे इलाज की इस दुनिया में इतना पैसा उस के पास कहां था कि डाक्टरों से औपरेशन करा सके. अब तक छोटेमोटे डाक्टरों से ही उस ने बहुत इलाज कराया था. रुपए लगातेलगाते वह कंगाल हो गई थी, पर कैंसर में कोई फर्क नहीं पड़ा था.
रंपो के बच्चे अभी छोटे थे. लड़का 10 साल का और दोनों लड़कियां 5 साल और 7 साल की थीं. अब वह माली रूप से बुरी तरह टूट चुकी थी. लोगों ने सलाह दी थी कि अगर देवता ने उस की सुन ली, तो वे रामहेत को ठीक कर सकते हैं. इन देवता ने इस से पहले कई लोगों की बीमारी ठीक की है.
रंपो भी यही चाहती थी कि देवता उस की सुन लें, इसीलिए वह यहां उन के दर्शन करने आई थी. मगर यहां उस की जाति आड़े आ गई. निचली जाति में पैदा होने की वजह से साधु उसे मंदिर में घुसने नहीं दे रहा था.
रंपो ने कपड़ों की गठरी में से एक मैली सी चादर निकाली और रामहेत के नीचे बिछा दी.
रामहेत बोला, ‘दर्द से मरा जा रहा हूं रंपो. अब सांस लेना भी दूभर हुआ जा रहा है. या तो आज रात देवता सुन लेंगे, नहीं तो कल सुबह का सूरज मुश्किल से देख पाऊंगा.’
दिन ढल चुका था. मंदिर से लोगों की भीड़ कम होती जा रही थी. धीरेधीरे आसमान में तारे दिखाई देने लग गए थे. चारों ओर सन्नाटा था. मंदिर के बगल वाले कमरे में वह साधु भी कुछ देर बाद सो चुका था.
रंपो से अब नहीं रुका गया. वह वहां से चुपचाप उठी और मंदिर की ओर चल दी. साधु खर्राटे भर रहा था. उस ने सोचा कि यह अच्छा समय है अंदर जाने का. वह बेधड़क मंदिर की सीढि़यां चढ़ गई. मंदिर का दरवाजा खुला था.
रंपो देवता को मन ही मन धन्यवाद देने लगी, ‘हे ऊपर वाले, आज तो ठीक वैसा ही दिन है मेरे लिए, जैसे कृष्ण के जन्म के समय वसुदेव और देवकी के लिए था. वसुदेव के गोकुल जाते समय अपनेआप दरवाजे खुल गए और पहरेदार सो गए थे. उसी तरह तुम ने अपने दर्शन के लिए साधु को गहरी नींद में सुला दिया.
‘तुम्हारे दर्शन पा कर अब तो मेरे पति जल्दी ही ठीक हो जाएंगे,’ यह सोचती हुई वह मंदिर में घुस गई.
मंदिर में घोर सन्नाटे के अलावा कुछ नहीं था. रंपो अंदाज से टटोलती हुई देवता के पास पहुंच गई. मन में डर था, पर उस ने जल्दी से अपने पति के अच्छे होने की प्रार्थना की. फिर धूनी से भभूत ली और सीढि़यों से नीचे उतर गई.
रामहेत अब भी दर्द से कराह रहा था. रंपो ने भभूत उस के फोड़े के चारों ओर डाली और बोली, ‘हे देवता, सारा दर्द तुरंत बंद कर दो. आप के नाम के बताशे बांटूंगी.’
‘तू मंदिर में कैसे घुस गई?’ रामहेत ने हैरानी से पूछा.
‘हां, देवता की हम पर कृपा है. साधु खर्राटे भर रहा है. मंदिर के दरवाजे खुले पड़े हैं,’ रंपो फुसफुसाई.
‘फिर तो चमत्कार हो गया.’
‘गरीबों की देवता सुन लेते हैं. उन्होंने खुद यह चमत्कार किया है. तुम आज ही अच्छे हो जाओगे.’
दोनों की देवता के प्रति अटूट श्रद्धा थी, पर बीमारी के लिए देवता भला क्या करता? कुछ देर तक तो दर्द कम रहा, पर फिर बढ़ गया.
रात काफी बीत चुकी थी. रामहेत से जब दर्द नहीं सहा गया, तो वह बोला, ‘तू एक बार और मंदिर से भभूत ले आ.’
‘वह साधु जाग गया तो…’ रंपो ने शक जाहिर किया. ‘वह नहीं जागेगा,’ रामहेत बोला.
रंपो को देवता पर विश्वास तो पक्का था, पर इस बार उस का दिल किसी अनजान डर से कांप रहा था. साधु के खर्राटे इस बार बंद हो गए थे.
रंपो फिर धीरेधीरे मंदिर की ओर गई. मंदिर की सीढ़ी चढ़ कर दरवाजे तक आई ही थी कि कड़क आवाज में किसी ने कहा, ‘कौन है वहां?’
रंपो ठिठक कर वहीं सिमट गई. वह थरथर कांप उठी. सीढि़यों से नीचे उतर कर वह बोली, ‘मैं हूं… रंपो.’
‘मंदिर में घुस रही है कमबख्त. तुझे से मना कर दिया, फिर भी,’ साधु यह कहते हुए उस के पास पहुंच गया.
रंपो ने चालाकी से काम लिया. वह बोली, ‘नहीं महात्माजी, आप ने कह नहीं दिया था कि जब यहां कोई नहीं हो, तब आना, इसलिए आई थी. अब तो यहां कोई नहीं है. मुझ पर कृपा करो. मेरे पति को ठीक कर दो.’
‘ठीक कर देंगे, मगर एक शर्त पर.’ ‘कौन सी शर्त?’ ‘थोड़ी देर के लिए अपनी देह मुझे सौंप दे,’ साधु बेशर्मी से बोला और रंपो का हाथ कस कर पकड़ लिया.
रंपो सुन कर हैरान रह गई और बोली, ‘तुम महात्मा हो महाराज, ऐसी बातें करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती.’
रंपो ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, मगर वह नाकाम रही.
साधु बोला, ‘रंपो, अब तू बच नहीं पाएगी. अगर गांव वालों को पता चल गया कि तू मंदिर में आई थी, तो वे मारमार कर तेरी हालत खराब कर देंगे.’ रंपो ने आखिरकार साधु की बात मान ली थी.
रंपो यादों से बाहर निकल आई थी. रामहेत सो चुका था. रंपो को भी नींद आ गई. सुबह 4 बजे रंपो अचानक जागी, तो रामहेत जोरजोर से सांस ले रहा था.
‘‘क्या परेशानी है?’’ रंपो हड़बड़ा कर उठ बैठी. रामहेत घुटनों के बल बैठ गया और बोला, ‘‘लगता है, देवता ने हमारी सुन ली. मेरा जी निकल रहा है.’’
उस की बातें सुन कर रंपो ठगी सी रह गई.
रामहेत बोला, ‘‘रंपो, देवीदेवता सब बेकार की बातें हैं. तू देवता के दर्शन कर आई, पर कुछ हुआ तो नहीं. तू दर्शन नहीं कर पाती, तो तेरे भी मन में कसक रह जाती. अब मैं बच नहीं सकता.’’
रंपो ने उसे अपनी गोद में भर लिया. पर यह क्या, वह तो उस की गोद में ही जड़ हो चुका था.
Hindi Social Story: कैलाश अग्रवाल एक बहुत बड़े कारोबारी का बेटा था. उस ने निर्मला नाम की एक गरीब दलित लड़की को काम पर रखा, फिर उस के प्यार में पड़ गया. उन दोनों ने शादी कर ली, पर क्या निर्मला उस की उम्मीदों पर खरी उतर पाई?
सौम्या ने ड्राइवर को फोन कर गाड़ी निकालने को कहा और ड्रैसिंग रूम से बाहर निकल अपने रूम को लौक करते हुए लिफ्ट की ओर निकल गई.
त्रिवेणी सोसाइटी में सौम्या और उस के पति आकाश अग्रवाल का चारमंजिला मकान था. इस मकान को मकान कहना भी ठीक नहीं. त्रिवेणी सोसाइटी में आलीशान विलाज की कम्युनिटी थी. शानदार पार्क, जिम, स्पोर्ट्स क्लब और कई तरह की सुविधाओं से लैस यह सोसाइटी अमीरों की अलग दुनिया थी.
.आकाश के पिता दिवाकर अग्रवाल ने इस सोसाइटी में 2 मकान लिए हुए थे. एक में आकाश अपनी पत्नी सौम्या और 9 साल की बेटी तृषा के साथ रहता था और दूसरे मकान में उन का दूसरा बेटा कैलाश मांबाप के साथ रहता था. दोनों भाइयों के मकान आसपास ही थे.
आकाश अग्रवाल के छोटे भाई कैलाश अग्रवाल की शादी नहीं हुई थी. कैलाश ने जेएनयू से सोशियोलौजी की पढ़ाई की थी और शायद इसीलिए वह अग्रवाल समाज के दूसरे नौजवानों से बिलकुल अलग था.
जहां दूसरे नौजवान बिजनैस, गलफ्रैंड, पूजापाठ, तीर्थों और लग्जरी लाइफ को प्राथमिकता देते थे, वहीं कैलाश को किताबों का शौक था. हालांकि वह बिजनैस में भी पूरी दिलचस्पी रखता था, लेकिन खाली समय में ज्यादातर वह किताबों में खोया रहता था.
दिल्ली के चांदनी चौक में आकाश और कैलाश के पिता दिवाकर अग्रवाल की मशहूर ज्वैलरी शौप थी. दिवाकर अग्रवाल पिछले 5 साल से अपने बिजनैस का सारा जिम्मा दोनों बेटों के कंधों पर डाल कर लगभग रिटायरमैंट की जिंदगी जी रहे थे. दोनों बेटों ने पिता के बिजनैस को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया था और चांदनी चौक के अलावा करोलबाग में भी ‘दिवाकर ज्वैलर्स’ की ब्रांच खोल ली थी.
दिवाकर अग्रवाल के बिजनैस में अभी तक कोई बंटवारा नहीं हुआ था. मकान अलगअलग जरूर थे, लेकिन बाकी सभी चीजें सा?ा थीं. दोनों भाइयों के पास अलगअलग कारें थीं और मांबाप की जिम्मेदारियां भी बंटी हुई थीं. बूढ़े मांबाप कुंआरे बेटे कैलाश के घर में रहते थे. कैलाश अपने मांबाप का बहुत खयाल रखता था.
दोनों भाइयों में कभी बिजनैस को ले कर कोई मनमुटाव नहीं हुआ था. चांदनी चौक और करोलबाग दोनों जगह अच्छीखासी सेल होती थी. चांदनी चौक वाली शौप पर बड़ा भाई आकाश बैठता था और कैलाश ज्यादातर समय करोलबाग वाली ब्रांच पर रहता था.
हालांकि कभीकभी जब आकाश बिजनैस के काम से बाहर होता तो कैलाश चांदनी चौक वाली शाखा पर भी बैठता था. स्टाफ से मिलता, उन की समस्याओं को सुनता, जरूरी इंस्ट्रक्शन देता और जरूरी होने पर अपने एम्प्लौयी की मदद भी करता.
इसी वजह से दोनों जगह के ज्यादातर वर्कर्स, सेल्स गर्ल्स और टीम के लोग कैलाश को बेहद पसंद करते थे. स्टाफ की नजर में बड़ा भाई आकाश मालिक था, लेकिन कैलाश मालिक से कहीं बढ़ कर था.
आकाश की पत्नी सौम्या बेहद खर्चीली थी. शौपिंग करना तो उस के डेली रूटीन का हिस्सा था. आएदिन घर में पार्टी रखती और अपनी अमीर फीमेल फ्रैंड्स को पार्टी में इनवाइट करती. देर रात तक शोरशराबे के बाद देर रात जा कर घर में शांति कायम हो पाती.
सौम्या की 9 साल की बेटी तृषा तो डिस्टर्ब होती ही आकाश भी रोजरोज के हंगामे से तंग आ चुका था. आकाश सौम्या को सम?ाने की कोशिश करता, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता.
एक दिन आकाश ने सौम्या से कहा, ‘‘देखो सौम्या, रात को मैं तो जैसेतैसे अपने कमरे में कान पर तकिया रख कर सो जाता हूं, लेकिन तृषा के बारे में तो सोचो. अगर तुम्हें रोज पार्टी कर के घर को नरक बनाना ही है तो तृषा को बोर्डिंग में भेज दो.’’
सौम्या ने आकाश की बात का जवाब देते हुए कहा, ‘‘तृषा मेरी बेटी है, उसे हाई क्लास में रहने की आदत बचपन से ही डालनी जरूरी है, लेकिन अब मैं भी नहीं चाहती कि वह इस घर में रहे, क्योंकि जब मैं घर पर नहीं रहती तो तृषा अपने दादादादी के पास चली जाती है जो कि मु?ो बिलकुल पसंद नहीं. अच्छा रहेगा कि वह बोर्डिंग में ही रहे.’’
सौम्या तो पहले से ही और आजादी चाहती थी. उस की आजादी में तृषा पहले से ही रुकावट बन रही थी. सौम्या को अपने सासससुर बिलकुल पसंद नहीं थे. एक ही सोसाइटी में रहने के कारण वे लोग सौम्या की जिंदगी में दखल डालते थे. घर आनाजाना होता था और कई बार उसे मुफ्त की सलाह दी जाती थी. यह मुफ्त की सलाह सौम्या को फूटी कौड़ी नहीं सुहाती थी.
जल्द ही तृषा एक महंगे बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने चली गई. अब सौम्या बिलकुल आजाद थी. अब वह तृषा को स्कूल से लाने ले जाने और उस का खयाल रखने की जिम्मेदारी से छूट गई थी. पूरे दिन शौपिंग, पार्टी और मौजमस्ती के बाद जब शाम को सौम्या घर आती तब उसे खाना तैयार मिलता. घर में 3 नौकर थे जो गार्डन से ले कर किचन तक का सारा काम करते थे, फिर भी सौम्या अपने किसी नौकर से कभी खुश नहीं रहती थी और महीने 2 महीने पर नौकरों को बदलती रहती थी. कैलाश को अपनी भाभी की इन्हीं आदतों से चिढ़ थी, लेकिन वह कहता कुछ नहीं था, बस दूरी बना कर रखता था.
मांबाप और बड़ा भाई आकाश चाहते थे कि जल्द कैलाश को कोई लड़की पसंद आए और वह शादी कर ले. सौम्या ने अपने पति आकाश से कई बार अपनी अमीर सहेली प्रीति की बेटी सोनाक्षी से कैलाश की शादी की बात की, लेकिन हर बार आकाश ने साफ मना कर दिया. एक तो आकाश को सौम्या की कोई भी सहेली पसंद नहीं थी. जितने को वह जानता था सभी घमंडी और संवेदनहीन थीं. दूसरी बात यह कि आकाश अरेंज मैरिज के खिलाफ था. वह चाहता था कि उस का भाई अपनी पसंद से शादी करे.
कैलाश को कोई लड़की भाती ही नहीं थी. वह अमीर होने के बावजूद अमीरों के कल्चर से दूरी बना कर रखता था. अपने औफिस जा कर स्टाफ के साथ बैठ कर लंच कर लेता और वीकएंड पर किसी नाइट क्लब में जाने के बजाय अपने किसी दोस्त के साथ पहाड़ों पर घूमने निकल जाता.
कैलाश के ज्यादातर दोस्त तो उस के अपने वर्कर्स या मैनेजर्स ही थे. उस में ऊंचनीच का भाव बहुत कम था जो उस की सोशियोलौजी की पढ़ाई का नतीजा था.
कुछ दिनों से करोलबाग वाली ब्रांच पर एक लड़की की जरूरत थी. कैलाश ने क्वालिफिकेशन के साथ अखबार में विज्ञापन दिया. शनिवार को उस ने इंटरव्यू की तारीख रखी. काफी लड़कियां आई हुई थीं. खूबसूरत, बिंदास और एजुकेटेड. सभी इंटरव्यू के लिए ऐसे आई थीं जैसे किसी फंक्शन में पहुंची हो.
इन्हीं में से एक थी निर्मला. साधारण से सूटसलवार में वह अलग ही लग रही थी. उस ने नपेतुले शब्दों में हर सवाल का जबाब दिया. उस के 12वीं और बीए में मार्क्स बहुत अच्छे थे. आगे वह और पढ़ना चाहती थी, लेकिन घर के हालात ठीक नहीं थे, इसलिए उसे नौकरी की सख्त जरूरत थी.
कैलाश को निर्मला में न जाने क्या दिखा कि उस ने इंटरव्यू के बाद ही निर्मला को जौइनिंग लैटर थमा दिया और बोला, ‘‘निर्मला, तुम मंडे से जौइन र लेना.’’
निर्मला को तो यकीन ही नहीं हो रहा था. वह हैरान थी कि बीसियों लड़कियों में वह कैसे सिलैक्ट हो गई? उस ने कैलाश को ‘थैंक्स’ कहा और अपनी फाइल टेबल से उठाते हुए औफिस से बाहर निकल गई.
निर्मला के जाने के बाद काफी देर तक कैलाश निर्मला के डौक्यूमैंट्स पर नजरें गड़ाए बैठा रहा. वैसे तो निर्मला एससी परिवार से थी लेकिन कौन्फिडैंस, एजुकेशन और बरताव में काफी ऊपर के क्लास की थी. इंटरव्यू के लिए आई बाकी लड़कियों में नौकरी की जरूरत सब से ज्यादा निर्मला को ही थी, इसलिए कैलाश ने उसे चुना. बाकी लड़कियां तो बस शोरूम में बनठन कर स्मार्ट सेल्स गर्ल की नौकरी करना चाहती थीं.
निर्मला ने इंटरव्यू में आने से पहले ही न केवल कैलाश के शोरूम की जानकारी ले ली थी, उस ने गोल्ड की कैमिस्ट्री के बारे में भी पढ़ लिया था. कैलाश तभी इंप्रैस हुआ था कि निर्मला को तो कैरेट ही नहीं, गोल्ड में डाले जाने वाले कैमिकल्स के बारे में भी पता था.
कुछ ही दिनों में निर्मला ने करोलबाग ब्रांच में अपनी मेहनत, गोल्ड की समझ और बरताव की बदौलत अच्छी जगह बना ली. वह अकसर कैलाश से इजाजत ले कर कारीगरों की भट्ठी के सामने बैठने भी चली जाती. जब भी कैलाश औफिस आता, वह निर्मला से गोल्ड बिजनैस के साथ दूसरे विषयों पर भी ढेरों बातें करता. लंच के समय अकसर कैलाश का टिफिन पास के रैस्टोरैंट से असलम ले कर आता, जिसे कैलाश अपने केबिन में बैठ कर खाता.
एक दिन असलम टाइम पर लंच ले कर नहीं आया तो कैलाश औफिस से बाहर निकला. उस ने देखा कि निर्मला अपना लंच खोल कर बैठ चुकी थी. उस की मेज पर कैमिस्ट्री औफ गोल्ड और हिस्ट्री औफ गोल्ड की 2 मोटी किताबें भी रखी थीं.
कैलाश उन किताबों को देखने के लिए रुक गया और फिर कैलाश ने निर्मला की इजाजत के बिना ही उस के लंच बौक्स से एक रोटी उठाई और सब्जी के साथ खाना शुरू कर दिया.
असल में कैलाश को भूख तो लग रही थी और सब्जी की खुशबू इतनी जबरदस्त थी कि वह खुद को रोक नहीं पाया. यह निर्मला के लिए बेहद हैरान कर देने वाला पल था. सबकुछ अचानक हुआ था. उस ने कैलाश को आते हुए भी नहीं देखा था. वह अकेले ही खाना खाती थी. बाकी स्टाफ पीछे के कमरे में खाना खाता था.
निर्मला को ऐसा लगा जैसे निवाला उस के हलक में ही अटक गया हो. वह कुछ कह पाती इस से पहले ही कैलाश ने कहा, ‘‘वाह, क्या सब्जी है? तुम ने बनाई?’’
निर्मला ने कहा, ‘‘नहीं सर, मुझे सब्जी बनाने नहीं आती. घर में मेरा छोटा भाई है, फिलहाल खाना तो वही बनाता है.’’
कैलाश ने हैरानी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘आप के भाई तो बेहतरीन शैफ हैं यार. इतनी अच्छी सब्जी बनाना उन्होंने कहां से सीखा?’’
निर्मला ने हलक में अटके हुए निवाले को पानी के गिलास के साथ निगल लिया और फिर गहरी सांस लेते हुए बोली, ‘‘सर, मेरे भाई को बचपन से ही कुकिंग का शौक है, उस ने ग्रेजुएशन कर लिया है, अब वह किसी इंस्टिट्यूट से कुकिंग का कोर्स करना चाहता है.
‘‘उसे शैफ बनना है, लेकिन वह अभी जानता नहीं है कि वह जिस कम्युनिटी से आता है, उस समाज के लोग शैफ नहीं बन सकते.’’
कैलाश ने कहा, ‘‘निर्मला, यह तुम से किस ने कह दिया कि दलित समाज के लोग शैफ नहीं बन सकते? जब एससी का बेटा देश का राष्ट्रपति बन सकता है, तो शैफ क्यों नहीं बन सकता? मैं जानता हूं कि समाज में हर लैवल पर जातिवाद होता है, लेकिन जातिवाद किसी के स्किल को नहीं हरा सकता.’’
कैलाश जाति व्यवस्था के सच को बेहद गहराई से समझता था. उसे पढ़ने का बेहद शौक था और जेएनयू की व्यवस्था ऐसी ही थी जिस के कारण वह समाज की इस कड़वी सच्चाई को बखूबी जानने लगा था. जाति व्यवस्था पर उस ने कई किताबें पढ़ी थीं और जेएनयू जैसे संस्थान में पढ़ने के दौरान कैलाश के करीबी दोस्तों में कई दलित और वामपंथी भी थे.
निर्मला की बात सुन कर कैलाश को समझते देर नहीं लगी. उस ने निर्मला से कहा, ‘‘अपने भाई से कहना कि इस शनिवार को वह मुझ से इसी औफिस में आ कर मिलें.’’
कैलाश ने निर्मला के छोटे भाई नवीन का एडमिशन हयात रैजिडैंसी में करवा दिया. 3 साल के कोर्स का सारा खर्च उस ने पहले ही इंस्टिट्यूट को अदा कर दिया. यह निर्मला और उस के भाई नवीन के लिए किसी सपने के पूरा होने जैसा था.
निर्मला की नजर में अब कैलाश सिर्फ बौस नहीं रह गया था. वह निर्मला के दिल में कहीं गहरी जगह बना चुका था.
धीरेधीरे एक साल बीत गया. इस बीच निर्मला ने जहांगीरपुरी की झुग्गियों को छोड़ कर करोलबाग के नजदीक की एक कालोनी में किराए पर फ्लैट ले लिया था. निर्मला के बूढ़े मांबाप अपनी बेटी की कामयाबी से बेहद खुश थे और निर्मला भी ‘दिवाकर ज्वैलर्स’ को ही अपनी जिंदगी मान बैठी थी.
एक साल में 2 बार निर्मला की सैलरी बढ़ी थी, क्योंकि वह पूरे करोलबाग की शौप पर सब से अच्छा काम कर रही थी. उस ने कारीगरों को नई मशीनें भी ले कर देने के लिए कैलाश को तैयार कर लिया. अब वे 8 कैरेट सोने के आभूषण बनाने लगे थे, जो सस्ते तो थे, मगर चमक असली जैसी ही थी. इस से करोलबाग शोरूम की सेल पहले से दोगुना हो गई थी.
निर्मला के टेबल पर आने वाले ज्यादातर ग्राहक कुछ न कुछ खरीद कर ही जाते थे. यह निर्मला की स्किल थी या उस के बरताव में ही ऐसा कुछ था कि कोई भी उस के आकर्षण से बच नहीं पाता था.
निर्मला के इस आकर्षण से ब्रांच का मालिक कैलाश ही नहीं बच पाया, तो ग्राहकों की बात ही क्या थी. वह हर ग्राहक को सोने की बारीकियों को बताती और ग्राहक सिर्फ जानकारी के कारण सही फैसले लेते.
करोलबाग शौप के मैनेजर समेत बाकी स्टाफ के लोग कही न कही निर्मला से जलन रखते थे, लेकिन वे लोग अपने बौस कैलाश से बेहद प्यार करते थे. स्टाफ को लगता था कि निर्मला जानबूझ कर कैलाश पर डोरे डाल रही है, लेकिन सच तो यह था कि कैलाश खुद ही निर्मला पर मरने लगा था.
रविवार की एक सुबह सौम्या ने अपने पति आकाश से कहा, ‘‘आकाश, आज मेरी सहेली प्रीति अपनी बेटी सोनाक्षी के साथ घर आ रही हैं. मैं चाहती हूं कि तुम मम्मीपापा को बुला लो और कैलाश को भी फोन कर दो, क्योंकि उस का आना ज्यादा जरूरी है.’’
आकाश को सौम्या की बात समझते देर नहीं लगी. वह सौम्या को अचरज से देखते हुए बोला, ‘‘सौम्या, तुम्हें पता है न कि कैलाश पर मैं शादी के लिए किसी तरह का दबाव नहीं बना सकता. तुम्हें प्रीति को इनवाइट करने से पहले एक बार मुझ से सलाह तो लेनी चाहिए थी न?’’
सौम्या ने कहा, ‘‘आकाश, तुम्हारा भाई कही न कहीं तो शादी करेगा ही न, अगर वह एक बार सोनाक्षी को देख लेगा तो झट शादी के लिए राजी हो जाएगा, यह मेरी गारंटी है.’’ न चाहते हुए भी आकाश को वह सब करना पड़ा जो वह कभी नहीं चाहता था.
दोपहर तक सौम्या के घर में कैलाश और उस के मम्मीपापा आ चुके थे. साथ ही प्रीति और उस के पति के साथ उन की बेटी सोनाक्षी भी आ चुकी थी. सभी ने साथ में लंच किया और काफी देर गपशप के बाद आखिरकार प्रीति के घर के लोग चले गए.
इस बीच कैलाश और सोनाक्षी के बीच कोई खास बातचीत नहीं हुई. कैलाश ने ही कोई इंट्रस्ट नहीं दिखाया और सोनाक्षी को देख कर भी ऐसा लगा जैसे वह भी बेमन से ही यहां आई हो.
प्रीति के परिवार के जाते ही सौम्या ने कैलाश से कहा, ‘‘कैलाश, कैसी लगी सोनाक्षी?’’
कैलाश ने अपनी भाभी की ओर मुसकराते हुए देखा और बोला, ‘‘बेहद अच्छी लड़की है वह भाभी. लेकिन शायद मैं सोनाक्षी के लायक नहीं हूं, इसलिए आप अब मेरी टैंशन लेना छोड़ दीजिए, क्योंकि मैं ने अपने लिए लड़की पसंद कर ली है.’’
कैलाश की यह बात सुन कर सौम्या के चेहरे की खुशी गायब हो गई. उस के सपने चकनाचूर हो गए. उस ने कैलाश से पूछा, ‘‘कौन है वह लड़की? क्या वह सोनाक्षी से ज्यादा खूबसूरत है?’’
कैलाश ने जवाब दिया, ‘‘भाभी, दुनिया का हर इनसान अलग होता है. किसी से किसी की तुलना नहीं हो सकती. सोनाक्षी अपनी जगह है. मैं ने जो लड़की पसंद की है, वह मेरी नजर में मेरे लिए सब से खूबसूरत है.’’
कैलाश के मुंह से इतना सुनते ही सौम्या का मूड पूरी तरह औफ हो गया. कैलाश के जाते ही उस ने सारा गुस्सा आकाश पर उतारा और पार्किंग से गाड़ी ले कर घर से निकल गई.
बहुत ज्यादा हंगामे और हफ्तों तक रूठारूठी के बाद दिवाकर अग्रवाल ने बिलकुल सादा माहौल में कैलाश ने निर्मला से शादी कर दी. हर तरफ इस शादी की चर्चा थी. कई लोगों का तो यह कहना था कि कैलाश ने करोड़ों के दहेज पर लात मार दी. किसी ऊंचे घर से लड़की लाया होता, तो वह कैलाश के स्टेटस पर फिट बैठती. ऐसे लोगों में ज्यादातर सौम्या के करीबी लोग थे.
सौम्या ने रिश्तेदारों और जानने वालों में कैलाश और निर्मला की शादी को ले कर तमाम तरह की अफवाहें फैलाई थीं, लेकिन इस से कैलाश को कोई फर्क नहीं पड़ा था.
सौम्या को निर्मला की जाति से दिक्कत थी और उस की जाति को ले कर भी उस ने रिश्तेदारों को भड़काया था, लेकिन असल में कैलाश के मम्मीपापा अपने बेटे के फैसले के साथ थे, चाहे मरे मन से ही, क्योंकि निर्मला अब तक एससी वाला रंगरूप छोड़ चुकी थी. वह इंटरव्यू के बाद से बिलकुल अलग लगती थी, लंबी, मसल्स वाली, सम?ादार, सैल्फ कौन्फिडैंट.
सौम्या की जलन बढ़ती चली गई. आखिरकार नौबत बंटवारे तक पहुंची. वैसे तो दोनों भाइयों के मकान और शौप अलगअलग थे. यह व्यवस्था दोनों के पिता दिवाकर अग्रवाल ने 5 साल पहले ही कर दी थी, लेकिन बिजनैस के बहुत से कामों में अभी भी दोनों की साझेदारी थी.
सौम्या ने इसी साझेदारी को खत्म करने के लिए घर में इतना ड्रामा शुरू किया कि आखिरकार दोनों भाइयों को कोर्ट में हलफनामा दे कर अपने अपने बिजनैस को अलगअलग करना पड़ा. अब चांदनी चौक की शौप पूरी तरह आकाश की थी और करोलबाग का शोरूम कैलाश के हिस्से में था.
इस बंटवारे से सौम्या बेहद खुश थी, क्योंकि चांदनी चौक की शौप दिवाकरजी की पुश्तैनी जमीन पर थी, जिस से उस शौप की कीमत करोड़ों में थी, वहीं करोलबाग का शोरूम किराए पर था. फिर भी इस बंटवारे के खिलाफ कैलाश और उस की पत्नी निर्मला ने कोई एतराज नहीं जताया. दोनों खुश थे और बंटवारे के बाद अपने बिजनैस की ग्रोथ में जीजान से जुट गए थे.
आकाश मन ही मन इस बंटवारे से खुश नहीं था, लेकिन सौम्या की वजह से उसे यह करना पड़ा. बंटवारे के बाद सौम्या के खर्चे भी बढ़ते जा रहे थे. बंटवारे के तुरंत बाद ही सौम्या ने नई गाड़ी खरीद ली, जिस की कीमत 50 लाख थी. हालांकि आकाश का बजट गड़बड़ा गया था, लेकिन वह घर में शांति बनाए रखने के नाम पर सौम्या की हर बात मानने को मजबूर था.
मई, 2026 में अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से अपील की कि सोनाचांदी न खरीदें. इस अपील के बाद से दोनों भाइयों की सेल पर असर पड़ा. आकाश तो पहले से ही मुश्किलों में घिरा हुआ था, प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद उसे गहरा धक्का लगा. चांदनी चौक की शौप से उस ने स्टाफ की छंटनी शुरू कर दी. 9 लोगों को नौकरी से निकाल दिया.
इधर करोलबाग में भी प्रधानमंत्री की अपील का गहरा असर पड़ा. ग्राहकों की तादाद 90 फीसदी तक घट गई. कैलाश को समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे हालात का मुकाबला कैसे करें? घर पर कैलाश के पिता कि तबीयत भी बिगड़ने लगी. इस वजह से कैलाश को पूरे दिन हौस्पिटल के चक्कर काटने पड़ते, इसलिए उस ने शोरूम पर जाना कम कर दिया.
निर्मला अपनी कार से शोरूम जाती और पूरे दिन काम करने के बाद घर आती. यह कार उसे कैलाश ने ही शादी पर गिफ्ट की थी. निर्मला ने जल्द ही इस घाटे से निबटने का हल निकाल लिया.
निर्मला ने अपनी कार बेच दी और इन पैसों से कई तरह की नई स्कीमें निकालीं. पुराने कस्टमर्स से कौन्टैक्ट कर उन्हें नई स्कीमों के बारे में और नई टैक्नोलौजी के इस्तेमाल को समझा ने के लिए स्टाफ की कई लड़कियों को काम पर लगाया.
निर्मला ने अपने बिजनैस के प्रचार के लिए सोशल मीडिया का जम कर इस्तेमाल किया. स्टाफ के बाकी लोगों को भी उस ने शोरूम के प्रचार और नई स्कीमों को समझाने में लगा दिया. वह 16-16 घंटे शोरूम में या कारीगरों के पास रहती.
रिजल्ट सामने था. धीरेधीरे हालात बदलने लगे. ग्राहकों का भरोसा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका था. इस में पूरी मेहनत निर्मला की थी. बिजनैस की गाड़ी पटरी पर आना शुरू हो गई. कैलाश बेहद खुश था. उसे निर्मला पर गर्व था और यह गर्व मुसीबत के समय निर्मला के जूनून को देख कर कई गुना बढ़ गया था. निर्मला की यह लगन देख कर वे तमाम रिश्तेदार सदमे में पहुंच गए थे जो कभी निर्मला के बारे में गलत सोच रखते थे.
इधर आकाश का बिजनैस पूरी तरह चौपट हो चुका था. घर में क्लेश बढ़ चुके थे. आकाश अपनी बेटी तृषा के बोर्डिंग की फीस तक नहीं भर पा रहा था. निर्मला को अपने जेठ और जेठानी के हालात का पता था. उस ने तृषा का एडमिशन नजदीक के सब से अच्छे प्राइवेट स्कूल में करवा दिया और उस की फीस की जिम्मेदारी उठा ली.
सौम्या का सारा घमंड टूट चुका था. बिजनैस घाटे में था. कर्ज का भार बढ़ रहा था जिस की वजह से आकाश को अपनी तीनों कारें बेचनी पड़ी थीं. अब सौम्या की शौपिंग के लिए भागदौड़ भी खत्म हो चुकी थी.
यह निर्मला जैसी गरीब घर की लड़की की काबिलीयत थी जो उस ने बुरे समय में भी समझदारी से काम लिया और यह कैलाश की समझदारी थी जो उस ने निर्मला पर भरोसा किया. कैलाश की किताबों से दोस्ती के चलते ही उस ने निर्मला को पहचानने में देर नहीं की और एक निचली जाति की लड़की को अपना लाइफ पार्टनर बनाया जो अब अपने स्किल और हुनर की बदौलत कैलाश की बिजनैस पार्टनर भी बन चुकी थी. Hindi Social Story