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Short Story : रमऊ का मकान

Short Story. रमऊ के आगेपीछे कोई नहीं था. अछूत समझ कर गांव वालों ने उसे गांव से बाहर रहने को मजबूर कर दिया था.

रमऊ ने गांव से बाहर एक कच्चा घर बनाया था. उस के घर में मिट्टी के कुछेक बरतनों और एक फटी गुदड़ी के अलावा कुछ भी न था. वह सुबह आंखें मलता हुआ मजदूरी की तलाश में निकलता और शाम ढले घर पहुंचता. उस के अंगोछे के एक छोर में मजदूरी के एवज में मिले 3-4 मुट्ठी चावल बंधे होते.

एक गरीब ब्राह्मण उसी गांव में दिनभर घूमघूम कर भीख मांगता और रात को किसी के बरामदे में सो जाता. उस ब्राह्मण को लोग ‘देवता’ समझते थे.

बरसात का मौसम आ गया. ऐसे समय में बड़ी जगह भी छोटी पड़ने लगती है. ब्राह्मण को तो कुछ ज्यादा ही परेशानी होने लगी. बरामदे में अकसर उस के साथ कुत्ते भी शरण ले लेते थे. किसी ने सुझाया कि वह रमऊ के मकान पर कब्जा कर ले.

एक दिन जब रमऊ घर पर नहीं था, ब्राह्मण ने उस के मकान पर कब्जा कर के उस की गुदड़ी जला दी, मिट्टी के बरतन फेंक दिए, फिर उस ने साफसफाई करवाई और रंगरोगन करवाया.

शाम को रमऊ घर पहुंचा, तो देखा कि घर में ताला लगा है. उसे बहुत हैरानी हुई. वह वहीं सिर पकड़ कर बैठ गया. कुछ देर बाद ब्राह्मण भी आ पहुंचा. ताला खोल कर वह मकान में दाखिल होने लगा, तो रमऊ ने उसे रोका, ‘‘ठहरिए, यह मेरा घर है.’’

ब्राह्मण ने रमऊ को सिर से पैर तक देखा और डांटते हुए कहा, ‘‘दूर हट अछूत… इधर अब कभी मत फटकना, नहीं तो खूब मरम्मत करूंगा. यह मेरा घर है. समझे.’’

ब्राह्मण आंखें तरेर कर उसे घूरने लगा. रमऊ सहम गया. लेकिन अपने घर की दावेदारी कैसे छोड़ देता. वह गरज कर बोला, ‘‘अरे ब्राह्मण, किसी दूसरे के घर पर कब्जा करते हुए तुझे  लज्जा नहीं आती?’’

दोनों में जम कर ‘तूतू मैंमैं’ होने लगी. रमऊ कहता, यह मेरा घर है और ब्राह्मण कहता कि मेरा है. दोनों फैसला कराने काजी के पास पहुंचे.

‘‘काजीजी, आप इंसाफ कीजिए. यह दुष्ट मेरे घर पर अपना कब्जा जमाना चाहता है,’’ कहते हुए ब्राह्मण रोने लगा.

‘‘काजी साहब, वह तो मेरा घर है, जिस पर इस पाखंडी ब्राह्मण ने कब्जा कर रखा है,’’ रमऊ बोला.

काजी को ब्राह्मण की बात पर यकीन हो गया. उस ने रमऊ को कभी देखा नहीं था. उस का हुलिया काजी को चोर की तरह लगा. लेकिन फैसला तो करना ही था. उस ने उस मकान को देखने का इरादा जाहिर किया.

जब काजी उस घर में दाखिल होने लगा, तो दरवाजे की ऊंचाई कम होने के कारण उस का सिर टकरा गया. तभी उस के दिमाग में एक बात आई.

कमरे में ब्राह्मण के कपड़ेलत्ते, शंकर की मूर्ति के आगे ढेर सारी पूजा की सामग्री रखी थी. कमरे से बाहर निकलते वक्त भी काजी का सिर दरवाजे से टकराया. उस ने फौरन हुक्म दिया, ‘‘आप दोनों बारीबारी से मकान के अंदर जाओ और बाहर निकलो.’’

पहले रमऊ कमरे के अंदर गया और आराम से बाहर निकल आया. काजी ने गौर से देखा कि रमऊ का सिर दरवाजे से नहीं टकराया.

फिर ब्राह्मण ने मकान के अंदर जाने के लिए पैर बढ़ाए, तो दरवाजे से उस का सिर टकराया और वह वहीं बैठ गया.

काजी ने फैसला सुनाया, ‘‘यह रमऊ का मकान है,’’ फिर वह ब्राह्मण के पास पहुंचा और उस के कंधे पर हाथ रख कर बोला, ‘‘अब तो मानते हैं न कि यह मकान आप का नहीं है. अगर यह मकान आप का होता, तो आप को झुक कर चलने की आदत होती और आप का सिर दरवाजे से कभी न टकराता. कुछ समझे, पंडितजी.’’

ब्राह्मण शर्म से जमीन में गड़ गया. धोती की कांछ को कमर में खोंसते हुए वह वहां से भाग खड़ा हुआ.

रमऊ हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘काजी साहब, आप का यह एहसान मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा.’’

काजी ने जवाब दिया, ‘‘रमऊ भाई, इस में एहसान कैसा, यह तो मेरा फर्ज था.’’

रमऊ ने पीतल के बरतनों में खाना बनाया, कांसे के बरतनों में खाया और मखमली बिस्तर पर सो गया. वैसे, वह सोच रहा था कि कभी न कभी ब्राह्मण अपना सामान लेने जरूर आएगा.  Short Story

-इंदरमन साहू

Hindi Story : अनदेखी का दर्द

Hindi Story. बाएं तरफ के लकवे से पीडि़त होने के कारण पिछले 3 साल से काशी प्रसाद अपने घर के बारामदे में बिछी खाट पर लेटे रहते थे. 60 साल की उम्र में हुई इस बीमारी में उन की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी पत्नी सोमवती पर थी, क्योंकि घर में कोई और नहीं रहता था. काफी इलाज के बाद वे ठीक से बोलने जरूर लगे थे, लेकिन बिना सहारा दिए ज्यादा चलफिर नहीं पाते थे.

ऐसा नहीं है कि काशी प्रसाद की कोई संतान नहीं थी. 5 बेटियां और एक बेटा ऋतुराज था. लेकिन, जब 3 एकड़ की खेती से जिंदगी की बुनियादी जरूरतों ने पूरा होने से इनकार कर दिया तो ऋतुराज पीठ पर बैग लाद कर दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने चला गया. बेटियां अपने ससुराल में बस गई थीं, जो कभीकभार ही मांबाप के पास आती थीं.

काशी प्रसाद खेतीकिसानी करने वाले और उसी के सहारे जिंदगी जीने वाले ठेठ गंवई शख्स थे. जाति से ब्राह्मण भले थे, लेकिन कुछ खास पढ़ेलिखे नहीं थे. हालांकि, जातिगत श्रेष्ठता और 3 एकड़ खेत का मालिक होने का घमंड उन में कूटकूट कर भरा हुआ था.

वे अपने चरित्र में एक ऐसे किसान थे, जिस के लिए खेत ही उस की सब से कीमती जायदाद थी. यही खेत उन के इलाके, गांवसमाज और रिश्तेनाते में उन की सामाजिक और माली हैसियत का मापदंड था. गांव के लोग बेटे ऋतुराज को इसी खेत के कारण अकसर मजाक में जमींदार भाई के उपनाम से भी पुकारते थे.

अपने इन खेतों में काशी प्रसाद जब भी मजदूर लगाते थे तो एक सख्त मालिक की तरह उन मजदूरों की निगरानी करते थे. इलाके में छोटी जातियों के लोग उन के इस सख्त बरताव के कारण बहुत मजबूरी में ही उन के खेतों में काम करने को तैयार होते थे, क्योंकि वे मजदूरों से बहुत हाड़तोड़ काम तो लेते ही थे, जातिगत दंभ के कारण बदजबानी भी कर देते थे. इस दौरान वह एक बेरहम जमींदार की रोल में होते थे, जिस के लिए इस जायदाद और जेब में मौजूद रुपयों से ज्यादा कीमती कुछ भी नहीं था.

हालांकि, इन खेतों सहारे इस परिवार का जीवन 90 के दशक तक तो ठीक से चल गया, लेकिन देश में उदारीकरण का दौर आने के बाद, खेती से होने वाली यह आमदनी तेजी से गिरने लगी.

जब खेतीकिसानी अन्य सैक्टर के मुकाबले हाशिए पर गई तो काशी प्रसाद भी चिंतित जरूर हुए, लेकिन अर्थव्यवस्था में आ रहे इस बदलाव को वक्त के मुताबिक पढ़ नहीं पाए.

हालांकि, अर्थव्यवस्था में किसानों की कमजोर होती इस भूमिका को उन के ही खेतों में काम करने वाले भूमिहीन मजदूरों ने बहुत जल्दी पढ़ लिया और वे नए ठिकाने की तलाश में शहरों की तरफ तेजी से शिफ्ट होने लगे.

दरअसल, मजदूरी बढ़ाए जाने की मांग को किसान इसलिए नहीं मानते थे क्योंकि कोई किसानों की आमदनी में कोई बढ़ोतरी ही नहीं हो रही थी.

असल में, काशी प्रसाद को अतीत में कभी यह लगता ही नहीं था कि उन का परिवार ऐसे दिन भी देख सकता है जब ये खेत उन की जिम्मेदारी उठाने में असहाय हो जाएंगे. जाति से ब्राह्मण होने और 3 एकड़ खेत का मालिक होने के गुरूर ने बेटे ऋतुराज की बेहतर पढ़ाईलिखाई पर भी उन्होंने इसलिए भी कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि वे यह मानते थे कि खेत होने से समाज में शादीब्याह तो हो ही जाएगा और फिर इसे कहां नौकरी करने जाना है.

लेकिन, अब जब खेती में गुजारा करने का कोई ठोस औप्शन नहीं बचा तो अपने 10वीं फेल बेटे ऋतुराज को दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के बाबत जाने से नहीं रोक पाए.

हालांकि, ऋतुराज के दिल्ली जाने के दौरान, काशी प्रसाद के द्वारा गांव में यह अफवाह भी फैलाई गई कि बेटा दिल्ली में बिजनैस करने लगा है, क्योंकि उन का सामंती मन यह स्वीकार करने में शर्मिंदगी महसूस करता था कि 3 एकड़ खेत के मालिक का बेटा, और एक ब्राह्मण दिल्ली में डंडा लिए दूसरों की दुकान की रखवाली करेगा?

एक जमींदार सोच, जिसे इलाके में ऊंची सामाजिक और माली हैसियत वाले पालनहार की तरह देखा और इज्जत दी जाती रही हो, का बेटा दिल्ली में एक मामूली सुरक्षा गार्ड की नौकरी कैसे कर सकता है?

यह व्यवस्था का पहला बड़ा झटका था जिस ने काशी प्रसाद जैसे सामंती मिजाज के लोगों को यह सिखाया कि वक्त के साथ नौकरी देने वाले मालिक भी नौकर बन सकते हैं. समय किसी के साथ पक्षपात नहीं करता है, उस की अपनी गति होती है और उस के मुताबिक खुद को ढालना ही होता है.

असल में, खेती के घाटे में जाने के बाद, काशी प्रसाद अपनी बाकी बची जिंदगी में ऋतुराज को कहीं नई जगह सैटल होते देखना चाहते थे. चूंकि अब उन्हें खेती में कोई ठोस आमदनी और भविष्य नहीं दिख रहा था इसलिए खेतों को बंटाई पर दे कर, मन मसोस कर वक्त, समाज और हालात में आ रहे बदलाव के मुताबिक खुद को समझाने और ढालने में लगे हुए थे.

लेकिन, इस बदलाव से उन्हें गहरा दुख इसलिए था क्योंकि उन की सामाजिक, माली हैसियत साल दर साल अप्रासंगिक होती जा रही थी और समय की आंधी में वे बहुत पीछे होते जा रहे थे.

यही नहीं, काशी प्रसाद को अपनी इस बीमारी से उपजी नाकामी और विकलांगता का कोई खास मलाल नहीं था. वे मानते थे कि चलाचली की शुरू हुई इस बेला में ये सब समस्याएं आना लाजिमी ही हैं, इसलिए इस का कोई मलाल भी नहीं होना चाहिए.

उन्हें मलाल इस बात का था कि अपनी पूरी जिंदगी में जिस श्रेष्ठता बोध को उन्होंने देखा और जिया था, अब वह खत्म होती जा रही है. आखिर यह कैसा दौर आया है कि उन के जैसे लोगों को केवल अप्रासंगिक ही नहीं बनाता जा रहा है, बल्कि पुराने सामाजिक, पारिवारिक संबंधों को केवल पैसे से जुड़े रिश्तों में बदल रहा है.

काशी प्रसाद को इस बात का भी बहुत दुख था कि अब गांवसमाज के लोग उन का हालचाल लेने भी नहीं आते हैं, जबकि उन के दौर में इसी गांवसमाज और जाति के लोगों से संपर्क, संवाद न केवल मजबूत रहता था, बल्कि वह एक जिंदादिल समाज के गवाह रहे थे.

उन के दौर में समाज में सामूहिकता की जो भावना थी वह भी अब मरती जा रही थी. किसी के दुखदर्द में शामिल होने की भावना और सामाजिक भाईचारा जिस तरह जमींदोज हो रहा था, वह उन्हें बहुत तकलीफ देता था.

असल में पिछले कुछ सालों में, समाज में पैसे की अहमियत बढ़ने के साथ जिस तरह का एकाकीपन पसरा था उस से उन्हें पीड़ा थी. उन्होंने, अपने दौर में वह वह समाज देखा था जहां लोग एक दूसरे के दुखसुख में न सिर्फ शामिल होते थे बल्कि समाज में सामूहिकता और मदद करने भावना बहुत मजबूत थी. किसी का छप्पर उठाना हो, शादी विवाह हो, भोज हो या फिर लाश उठाना…

समाज के लोग एकदूसरे की मदद के लिए खुले दिल से तत्पर रहते थे. लेकिन अब कोई किसी का हालचाल पूछने के लिए तैयार नहीं था. आखिर लोग इतना कैसे बदल सकते हैं?

यही नहीं, बदलते वक्त ने पुराने रिश्तेनाते, भाईचारा और सामाजिक संबंधों को बेरहमी से तोड़ डाला था. अब लोग केवल खुद के विकास पर केंद्रित हो गए थे, जहां किसी नैतिकता, सामाजिक बंधन और मान्यताओं और रिश्तों की कोई कद्र नहीं थी. यह सोच उदारीकरण के दौर में बने समाज में बहुत तेजी से उपजी थी, जिस ने समाज को मजबूत करने वाली मान्यताओं को गटर में डाल दिया था.

दरअसल, अपने दौर में काशी प्रसाद समाज के लिए बहुत सहयोगी इनसान थे. जब गांवसमाज में लोगों के यहां शादीब्याह, तिलक, भोज या तेरहवीं आदि के कार्यक्रम होते थे तो उन्हें इस कार्यक्रम में खाना बनाने की जिम्मेदारी दी जाती थी. वे अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते थे. गांव और पट्टीदारी सब जगह उन्हें इस काम के लिए बुलाया जाता था.

काशी प्रसाद भोजन तैयार करने की एक टीम रखते थे, जो उन के निर्देशन में काम करती थी. इस टीम ने कभी भी इस जिम्मेदारी के लिए किसी से एक पैसे नहीं लिए. उन्होंने कितने विवाह, तिलकोत्सव, भोज, तेरही और अन्य सामाजिक कामों में यही जिम्मेदारी संभाली कि उन्हें संख्या खुद ही याद नहीं थी.

इस के पीछे उन का सिर्फ एक ही तर्क होता था कि अगर कुछ भी गड़बड़ हुआ तो गांव की बड़ी बदनामी होगी. लेकिन, जब आज वे इसी काम को पेशेवर हलवाइयों द्वारा किए जाते हुए देखतेसुनते तो उन्हें बड़ा दुख होता था.

दरअसल, उदारीकरण के दौर में तैयार हुई नई पीढ़ी के पास इन सामाजिक परंपराओं को संजोने, दूसरे के दुखसुख में शामिल होने जैसी भावुक चीजों में कोई रुचि नहीं रह गई थी.

उदारीकरण ने जिस तरह से हर सेवा, सहायता का मुद्रीकरण किया था, उस का ही असर था कि समाज के लिए हमेशा खड़े रहने वाले काशी प्रसाद और उन के जैसे लोग आज खुद को अप्रासंगिक और बेकार समझने लगे थे.

लेकिन, वक्त के साथ बदलाव एक जरूरी चीज है, जिसे रोका नहीं जा सकता था. हालांकि, इस बदलाव में भी काशी प्रसाद जैसे लोगों को अनदेखा, अप्रासंगिक होने से बचाने की जिम्मेदारी भी इसी नए बने समाज की थी, जिस में वह नाकाम हो गया था. अनदेखा और अप्रासंगिक होने की यह टीस काशी प्रसाद जैसे

लोगों के दिल में गांठ बन कर चुभती थी. आखिर, हम अपने पुरखों की अनदेखी करने के अपराधी बन चुके थे. Hindi Story

Short Story : पानो की मंजिल

Short Story. गरीब सुक्का और पानो के 7 बच्चे थे. वे उन्हें पढ़ालिखा कर काबिल बनाना चाहते थे. पर एक सफाई कर्मचारी और घरों में काम करने वाले इस जोड़े के लिए यह आसान नहीं था. क्या उन्हें मंजिल मिली?

तड़के 4 बजे का अंधेरा अभी पूरी तरह छंटा भी नहीं होता था कि पानो अपने काम पर निकल पड़ती. उस के हिस्से में पूरे 30 घर थे. किसी घर से 20 रुपए महीना मिलते, किसी से नकद मजदूरी के साथ हर घर से 4 रोटियां और थोड़ी सी सब्जी भी मिल जाती, जो उस के बड़े परिवार का सहारा थी.

30 घरों की सफाई करतेकरते पानो अपने घर का चूल्हाचौका कब देख पाती, उसे खुद भी पता नहीं चलता.

पानो का पति सुक्का छावनी में सफाई कर्मचारी था. सैनिकों के बीच रहने से उसे शराब आसानी से मिल जाती. रोज पीता, घर लौट कर झगड़ा भी करता, लेकिन अपने सातों बच्चों पर जान छिड़कता था. 4 बेटियां और 3 बेटे, यही उस की दुनिया थे.

2 कमरों के कच्चे मकान में रहने वाला सुक्का जब छावनी में बड़ेबड़े अफसरों को देखता, तो मन ही मन ठान लेता कि उस के बच्चे भी एक दिन इज्जत की नौकरी करेंगे.

सुक्का की ड्यूटी सैनिकों की बैरकों के शौचालय साफ करने की थी. सुबह 4 बजे सैनिकों की ट्रेनिंग शुरू होने से पहले उसे 10-10 शौचालय साफ करने होते. असहनीय बदबू से लड़ने के लिए वह अंधेरे में ही शराब की पूरी बोतल गले से उतार लेता और फिर तेजी से अपना काम पूरा करता. यह उस की मजबूरी थी, शौक नहीं.

उधर पानो भी सुबहसुबह काम पर निकल जाती. ऐसे में घर की पूरी जिम्मेदारी सब से बड़ी बेटी रचना पर आ जाती. दादी के जिंदा रहते रचना भी 5वीं तक स्कूल जाती थी, लेकिन दादी के मरने के बाद उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ी. अब वही छोटे भाईबहनों… अमर, विजय, सुरेश, निधि, सुनीता, सीमा और सब से छोटी शालू की मां बन गई थी.

रचना सब को उठाती, नहलाती, तैयार करती और स्कूल भेजती.

खुद का बचपन कब जिम्मेदारियों के बोझ तले दब गया, उसे पता ही नहीं चला.

सुक्का का काम एक ही बैरक में था, इसलिए वह जल्दी घर लौट आता. लेकिन पानो को 2 महल्लों में सफाई करनी पड़ती. घर लौटतेलौटते 11 बज जाते. नहा कर वह फिर रोटियां और सब्जी लेने निकल पड़ती.

रास्ते में उस की आवाज गूंजती, ‘‘डाक्टरनी के घर भी जाना है… सुनारनी और सरदारनी के यहां भी खाना लेना है… और रिफ्यूजी वाले घर में तो रोज की तरह पहले क्लेश होगा, फिर रोटी मिलेगी… जल्दी कर…’’

समय बदला. बड़ा बेटा अमर 8वीं पास करते ही सेना में भरती हो गया. 2 साल बाद उस की शादी हो गई और उसी के साथ रचना भी अपनी ससुराल विदा हो गई.

विजय ने 10वीं के बाद वन विभाग में क्लर्क की नौकरी पा ली. सुरेश कालेज की पढ़ाई पूरी कर टीचर बनने की राह पर चल पड़ा. सुक्का ने बेटियों निधि और सुनीता को भी कालेज भेजा.

लेकिन सीमा की दिलचस्पी पढ़ाई में नहीं थी. उसे मां के साथ बड़ेबड़े घरों में जाना अच्छा लगता था.

कई बार तो वह मां से पहले ही खाने की टोकरी ले कर रोटियां लेने निकल पड़ती.

सब से छोटी शालू अलग थी. वह मां को लोगों की गंदगी साफ करते देख तिलमिला उठती.

एक दिन उस ने कहा, ‘‘अमर भैया फौज में हैं, विजय भैया क्लर्क हैं. अब तुम क्यों यह काम करती हो? छोड़ दो इसे.’’

पानो ने शालू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटी, इसी मैला ढोने ने तुम सब को इस काबिल बनाया है. अब यह काम तो मेरी चिता के साथ ही छूटेगा.’’

शालू ने यह बात गांठ बांध ली. उस ने पढ़ाई जारी रखी, कालेज पूरा किया और आखिरकार अपने भाई सुरेश की तरह सरकारी स्कूल में टीचर बन गई.

सुक्का का देखा गया सपना सच हो चुका था.

एक दिन बैरक में सैनिकों से गर्व से बोला, ‘‘तुम लोगों को रोज अफसर बनते और वरदी में सम्मान पाते देखा. बस वहीं से सपना लिया था. मैं ने अपने बच्चों को भी इस काबिल बना दिया. अब वे मैला नहीं ढोएंगे, बल्कि सम्मान से नौकरी करेंगे.’’

उस दिन सुक्का के हाथों से भले ही बैरक की सफाई हो रही थी, लेकिन उस के चेहरे पर पहली बार आत्मसम्मान की चमक थी. उस ने अपने बच्चों को वह विरासत नहीं दी जो उसे मिली थी, बल्कि वह भविष्य दिया जिस के लिए उस ने और पानो ने पूरी जिंदगी अपने हिस्से का अंधेरा सहा.

यही उन दोनों की सब से बड़ी जीत थी. Short Story

-शारदा नंद गौतम

Editorial : पौराणिक कथाओं से खत्म होता दलित छात्रों का कैरियर

Editorial. देश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराने वाले 23 आईआईटी में जाति का जम कर बोलबाला है. यहां पढ़ रहे 1.2 लाख स्टूडैंट्स में से आधे ऊंची जातियों के हैं और वे खातेपीते घरों से हैं जिन्हें बचपन से अपने को ऊंचा होने का एहसास दिलाया गया है. आमतौर पर एक बड़ा गुट एकसाथ रहता है और इन में आपसी मतभेद कम होते हैं.

बाकी आधों से ये आधे खार खाए रहते हैं क्योंकि जहां ऊंची जाति वालों को पूरी 11 से 15 लाख की फीस, जिस में होस्टल और मैस का खाना शामिल है, देनी होती है, रिजर्वेशन पाए वालों को बहुत कम देनी होती है और वे कुछ लाख दे कर पढ़ाई में अच्छे हों तो इंजीनियर बन जाते हैं.

ऊंची जाति वाले छात्रों को यह खलता रहता है कि ये रिजर्वेशन वाले यदि प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेजों में जाते तो उन्हें पूरी 15 से 40 लाख की फीस देनी पड़ती. ऊंची जाति के छात्र नीची जाति वालों को आज भी तंग करते रहते हैं.

आईआईटी बौम्बे में रिजर्वेशन पाने वाले एक सैकंड ईयर के स्टूडैंट साहिल वाकोड़े ने 18 सितंबर को डीन की भेदभाव वाली नीति और उस की शिकायतों पर ध्यान न देने पर आत्महत्या कर ली. वह अपनेआप गलत था. वह दलित था न.

तमाम आरक्षण के बावजूद, तमाम जाति है ही नहीं के नारों के बावजूद असलियत यही है कि दलित स्टूडैंट्स कही भी हों, उन्हें मानसम्मान तो दूर पास बैठने तक नहीं दिया जाता. पढ़ाई की जगह पर यह भेदभाव शुरू हो जाता है, स्कूलों से, और मैरिट में अच्छे नंबर लाए जाने पर भी बंद नहीं होता.

इस देश में एकलव्य मरे नहीं हैं, द्रोणाचार्यों की भरमार है जो अर्जुनों के कहने पर नीची जाति वालों को हुनर देना नहीं सिखाते. यह देश उस की पूजा करता है जिस ने उस शंबूक का गला काट डाला जिस ने वेदों को याद करना शुरू कर दिया था और उसे ही एक ब्राह्मण लड़के की मौत का जिम्मेदार ठहराया गया था.

जब हर किताब, अखबार, टीवी चैनल पर नीची जाति वालों को हर जगह बेइज्जत किया जाता है तो डीन प्रोफैसर सूर्यनारायण डूला ने नकल का आरोप लगा कर साहिल को सस्पैंड करने की बात को समर्थन क्यों नहीं देगा. नीट की परीक्षा में पेपर लीक हुए, लाखों में ऊंची जाति के छात्रों को पेरेंट्स ने अपने ऊंची जाति के लाड़लों के लिए खरीदे, कुछ नहीं हुआ. एक एकलव्य, एक शंबूक, एक अंबेडकर, एक मायावती, एक पासवान साथ बैठ जाएं यह आईआईटी के आधे छात्रों और आधी फैकल्टी को मंजूर नहीं है.

नकल करने का आरोप ऐसा ही है जैसा एकलव्य के गुरुदक्षिणा न देने का है. यह शंबूक के कारण ब्राह्मण पुत्र की हत्या है. जीवन भर लगा कर, मैरिट में जगह बना कर आईआईटी बौम्बे में पहुंचे साहिल वाकोड़े का पूरा कैरियर एक इनविजिलेटर ने सैकड़ों पौराणिक कथाओं की तरह खत्म कर दिया.

यह पहला और आखिरी मामला नहीं है. हर जगह हो रहा है, और जैसेजैसे पढ़ाई में तेज हो कर दलितपिछड़े घरों के बच्चे ऊंचे स्थानों पर पहुंच रहे हैं, गुस्सा उबल रहा है. एक रिधिका शर्मा ने इंस्टाग्राम टीम पर दलित स्टूडैंट्स की अपने हक और इज्जत मांगने पर जम कर हल्ला मचाया है. उस के 7 लाख से ज्यादा फौलोअर्स हैं क्योंकि वह दलितों को अपनी जगह, गीता के अनुसार पैरों से बाहर धकेलने में विश्वास रखती है. ऐसे हजारों हैं जो अपनी बात कहते हैं और ऊंची जाति वाले पैसे वाले सुनते हैं.

दलितों के पास आज भी जबान नहीं. आज भी वे अपने ही लोगों को या अपनी वकालत करने वालों को पैसा देने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उन में मन के भीतर वही बैठा है कि वे पिछले, दलित इसलिए हैं कि उन के पूर्वजन्म के कर्म अच्छे नहीं थे. वे मन से न विरोध करना जानते हैं, न अपनी बात कहने वालों का साथ दे पाते हैं. वे तो बिक जाते हैं, भगवा खेमों में जो बैठते हैं और रोहित वेमुला जैसी मौत पर 2-4 रोज स्यापा कर के इसे अपना भाग्य मान लेते हैं.Editorial

Editorial : बिना नेता के बहकाया जा रहा है वंचित समाज

Editorial. आमतौर पर कोई जना नेता तभी बन पाता है जब वह अपने पीछे चल रहे लोगों का भला सोचता हो, कुछ ऐसा करता हो जो पीछे चलने वाले अकेले नहीं कर सकते और उन्हें एक समूह, एक भीड़ की जरूरत हो और उस भीड़ को सही रास्ता दिखाने वाले की. इतिहास में ऐसे लोगों की कमी नहीं रही है जिन्होंने भीड़ को पहले बड़ेबड़े वादों से ऊंचाइयों पर ले जाने का भरोसा दिया पर रास्ते में किसी खाई में फेंक दिया.

अछूतों, एकदम गंदा काम करने वालों, हिंदू वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोगों को, जिन्हें संविधान में एससी कहा गया है और आमतौर पर अछूत कहा जाता है, को कांशीराम ने 1970 के आसपास एक मंच पर खड़ा करने की कोशिश की थी. भीमराव अंबेडकर ने पहले इन के हितों की बात की थी पर वे पूरी कांग्रेस को उन की अगुआई करने को तैयार नहीं कर सके.

नेता बिना हजारों सालों से लूटे जाने, पैरों वालों से कुचले जाने और सताए जाने वाले वे लोग जानवरों सा जीवन जी कर भी सेवा करने में लगे रहे क्योंकि उन्हें बहका दिया था कि यह सब उन के पिछले जन्मों का फल हैं. न अंबेडकर, न गांधी, न कांशीराम उन्हें इस सोच से निकाल कर बराबरी की जगह पर खड़ा कर पाए.

उम्मीद थी कि मायावती, जो कांशीराम का दायां हाथ बन गई थीं, कुछ कर पाएंगी पर वे सत्ता सुख की चाशनी चख कर अपने पीछे चल रहे लोगों को भूल गईं. पिछड़ी भीड़ के आगे कोई और उभरा नहीं तो बेबस हो कर वह मायावती के पीछे चलती रही जबकि मायावती उन्हीं लोगों की गोद में जा बैठीं जिन्होंने वर्णव्यवस्था, पिछले जन्म की मूर्खता वाली ?ाठी कहानियां गढ़ी थीं. आज भी इन दलितों का कोई नेता नहीं जबकि इन में से सैकड़ों पढ़लिख कर ऊंची पोस्टों पर आ गए हैं. जिस ने भी कुछ खराखरा कहने की कोशिश की, उसे मायावती की तरह गाड़ीबंगला दे कर खरीद लिया गया.

देश की 25-30 करोड़ आबादी जन्म से मरने तक जानवरों की तरह जीती रहे, यह विज्ञान और तकनीक के युग में धब्बा है. मायावती भी जिम्मेदार हैं और पीछे की भीड़ भी. यह भीड़ उसी तरह की मूर्ख है जैसे 1930 से 1945 तक जरमनों की भीड़ हिटलर के पीछे चली. उसी तरह की भीड़ है जैसी चीनियों की माओ के पीछे चली. जैसी आज उत्तर कोरिया के किम जोंग उन के पीछे चल रही है.

दलित किसी भी तरह से किसी भी ब्राह्मण से कम नहीं हैं. न अक्ल में, न बल में, न मेहनत में. उलटे वे ब्राह्मणों से ज्यादा तेज हैं पर बस सही नेता और सही रास्ते से भटक रहे हैं. मायावती उन्हें एक गंदी खाई के बाद दूसरी गंदी गहरी खाई में धकेल रही हैं. कुछ अलग हो कर सीधे भगवाइयों के साथ मिल गए हैं पर वहां और बुरी हालत है. वे अपने जैसों के सही नेता नहीं हैं और इसलिए हर समय अपमान सहते हैं, भेदभाव सहते हैं.  Editorial

Inspirational Hindi Story : डंका

Inspirational Hindi Story . बगीचे में बैठी रचना काफी देर से निर्मल का इंतजार कर रही थी. वह बीते दिनों की मीठी यादों में खोई हुई थी, तभी एक मदहोश कर देने वाली धुन ने उस का ध्यान खींचा.

एक पेड़ के तने से सट कर खड़ा निर्मल अपने मोबाइल फोन से यह मीठी धुन बजा रहा था.

नजरें मिलने पर उन दोनों में खूब हंसीठिठोली हुई और वे एक बैंच पर बैठ गए.

‘‘पुणे में तो तुम्हारे कई दोस्त होंगे और गर्लफ्रैंड्स भी होंगी,’’ रचना ने हंसते हुए कहा.

‘‘पुणे की लड़कियां काफी होशियार होती हैं. मेरी एक साथी है सुमेधा, जिस ने पहली कंपनी को मेरे साथ ही छोड़ा था. वह मेरे सामने वाले अपार्टमैंट्स में ही रहती है. वैसे, वह मेरी गर्लफ्रैंड नहीं है,’’ निर्मल अपने मोबाइल फोन से खेलता हुआ बोला.

‘‘फिर तो अच्छी छनती होगी तुम दोनों में,’’ रचना ने बुझे  मन से कहा.

‘‘तुम बिलकुल नहीं बदली,’’ निर्मल ने रचना को बहलाने के इरादे से कहा.

‘‘तुम भी तो कहां बदले हो. कौन कह सकता है कि तुम ने इंजीनियरिंग की डिगरी ली है. भला कोई इंजीनियर पुणे से सिर्फ अपने तरुण दल के साथ ढोल बजाने के लिए इतनी दूर चुरू आ सकता है?’’

‘‘हां रचना, ढोल बजाने का खयाल मुझ  में जोश भर देता है. शायद इसलिए, क्योंकि इस की गूंज दूर तक सुनाई देती है. और मेरे तरुण दल की कमी पुणे के दोस्त कहां पूरी कर सकते हैं,’’ निर्मल ने मुसकराते हुए कहा.

निर्मल पढ़ाई के साथसाथ एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम कर रहा था. इस बार पंचायत ने बस्ती में ‘समाज समृद्धि यज्ञ’ कराया था. उस में शिरकत करने के लिए ही वह यहां आया था.

रचना निर्मल की बचपन की साथी थी. वे साथ ही पढ़े थे, पर आगे की पढ़ाई के लिए निर्मल को अपने घर से दूर जाना पड़ा था.

रचना टीचर बन गई थी. बच्चों को पढ़ाने में उस का समय बीत जाता था. जब उसे मालूम हुआ कि बस्ती के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए निर्मल चुरू आया है, तो वह उस से मिलने चली आई थी.

निर्मल ने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘रचना, मेरी समझ  में नहीं आता कि तुम टीचर क्यों बनीं?’’

‘‘स्कूल से जुड़ी हमारी बचपन की यादों को मैं हर दिन जीना चाहती थी. दूसरी बात, मुझे  तुम्हारे जैसे होनहार छात्र भी तो तैयार करने हैं.’’

निर्मल मुसकरा दिया. रचना ने उस से सवाल किया, ‘‘अच्छा, तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?’’

‘‘मैं जीतोड़ मेहनत कर रहा हूं,’’ निर्मल ने कहा.

‘‘मैं तो यही चाहती हूं कि तुम खूब तरक्की करो और जल्दी से यहीं लौट आओ,’’ रचना बोली.

‘‘थैंक्स… तुम्हें पता है रचना, अगर मैं वक्त पर सही फैसला न लेता, तो आज एससी कोटे से रेलवे में क्लर्क बन कर एक ही काम करता हुआ अपनी कमर तुड़वा चुका होता.’’

‘‘पिताजी का सपना था कि मैं भी उन के दादा की तरह नाम कमाऊं. मेरे दादा अंगरेज फौज में सिपाही थे. उन की सर्विस के बाद अंगरेजों ने उन्हें लायलपुर की चिनाब कालोनी में बसा कर खेती के लिए जमीन दी थी, पर मेरे दादा को न जाने क्या सूझ  कि वे भावनाओं में बह कर साल 1947 में वहां से चले आए और हमारा जातिगत पेशा अपना कर हमें फिर पीछे की ओर ले गए.

‘‘पर, मैं ने भी पिताजी को भरोसा दिलाया कि कुछ बन कर दिखाऊंगा. तब कहीं उन्होंने मुझे  पुणे यूनिवर्सिटी जाने की इजाजत दी. आज उन का सपना पूरा हो गया.’’

रचना के पिता अमीरचंद कारोबारी और सादुलपुर शिक्षा संस्थान के एक ट्रस्टी थे, तो निर्मल के पिता जय सिंह रेल महकमे में एक चपरासी थे.

कार्यक्रम वाले दिन सुबह से ही बस्ती उत्सव के रंग में सराबोर हो गई थी. तरुण दल के साथ मगन हो कर ढोल बजाता निर्मल रथ पर बैठे महंत रामनारायण का जुलूस धूमधाम से कार्यक्रम वाली जगह पर ले आया. पंचों ने महंत रामनारायण और उन के संगीसाथियों को आदर से आसनों पर बैठाया.

निर्मल के पिता मुखिया जय सिंह ने उस से कहा, ‘‘सुनो बेटा, महंतजी आ चुके हैं. कुछ ही देर में कार्यक्रम शुरू होने वाला है, पर अमीरचंदजी का कहीं कुछ पता नहीं. देखो, कहीं वे बलरामजी के यहां तो नहीं हैं.’’

‘‘ठीक है पिताजी, मैं देखता हूं,’’ कह कर निर्मल अपने एक दोस्त हरनाम को ढोल थमा कर अमीरचंद को बुलाने के लिए चल पड़ा.

बस्ती के दूसरे सिरे पर बलराम की बड़ी सी कोठी थी. वहां पहुंच कर निर्मल ने देखा कि रघु काका उदास चेहरा लिए कोठी से बाहर आ रहे थे.

निर्मल ने उत्सव के नशे में पूछा, ‘‘काका, अमीरचंदजी अंदर हैं क्या?’’

रघु काका ने सिर्फ ‘हां’ में सिर हिलाया और चुपचाप चले गए.

निर्मल जब कोठी की खिड़की के करीब पहुंचा, तब उसे अंदर से बलराम की तीखी आवाज सुनाई दी. वह वहीं रुक कर सुनने लगा.

बलराम कह रहा था, ‘‘देखा इस रघु को. कहता है कि उस का बेटा लघु उद्योग शुरू करना चाहता है, कुछ रुपए उधार दे दूं, जैसे मैं ने धरम खाता खोल रखा है… लड़का कुछ पढ़ गया है, तो कुंवर साफसफाई का काम नहीं करेंगे… सेठ बन कर अब सभी बलराम के कद को छूना चाहते हैं.’’

बलराम के गुस्से का फायदा उठाते हुए अमीरचंद ने कुटिल मुसकराहट से अपने दिल में दबी बात कही, ‘‘बुरा न मानो बलराम, इन लोगों ने तो हम अगड़ों को भी पीछे छोड़ दिया. भला 21वीं सदी में जाति की खुशहाली के लिए हम ऐसे यज्ञ कर सकते थे क्या?’’

फिर पास बैठे मास्टर दीक्षित की ओर देख कर अमीरचंद ने मजाक के लहजे में कहा, ‘‘क्यों दीक्षितजी?’’

मास्टर दीक्षित ने लड्डू चबाते हुए कहा, ‘‘धार्मिकता देख कर मुझे तो लगता है कि आगे चल कर यही लोग हमारे मंदिरों में पुजारी बनने वाले हैं.’’

बलराम ने कड़वाहट से कहा, ‘‘क्यों नहीं, सुबह पाखाना साफ करने के बाद शाम को पुरोहिती भी कर लेंगे.’’

इस पर अमीरचंद ने कहा, ‘‘अब इस मुखिया जय सिंह को ही ले लो, रेल महकमे में चपरासी है, पर अपनेआप को बाबू समझता है.

‘‘देखना, उस का बेटा जरूर भांड़ बनेगा. पुणे की पढ़ाई भी उसे अक्ल नहीं दे पाई. कोई बहाना निकला नहीं कि ढोल पीटने के लिए चुरू आ धमका है.’’

यह हंसी सुन कर निर्मल का जी जल गया. वह वहां से निकल आया. वह देर तक चौराहे के पेड़ के नीचे बैठा रहा.

तब निर्मल सादुलपुर शिक्षा संस्थान का छात्र था और संस्थान में भूतपूर्व छात्रों के सम्मान में किए जाने वाले एक कार्यक्रम में हिस्सा लेना चाहता था. इसी सिलसिले में वह ट्रस्टी अमीरचंद की इजाजत लेने गया था. तब उस के सामने अमीरचंद का यही रूप जाहिर हुआ था.

अमीरचंद ने कहा था, ‘तुम जानते हो, ये जो मेहमान आने वाले हैं, वे कौन हैं? ये हमारे भूतपूर्व मेधावी छात्र हैं, जो आज ऊंचे ओहदों पर बैठे हैं. इस कार्यक्रम में हिस्सा ले कर तुम उन के सामने क्या जाहिर करोगे? किसी की नकल ही तो करोगे.

‘‘अपनी ओर से कुछ नया करना तो तुम लोगों को आता नहीं. यह तुम्हारी बस्ती के आडंबर का कार्यक्रम नहीं, जो तुम मुंह उठाए आओगे और ढोलनगाड़े बजाओगे.’

निर्मल को उस वक्त बहुत बुरा लगा था, पर वह कुछ न कह सका था और वहां से चुपचाप चला आया था.

आज की घटना से निर्मल अपने अंदर एक अजीब सी उथलपुथल महसूस कर रहा था. अमीरचंद तो पराया था, लेकिन बलराम तो उस की अपनी बिरादरी का था.

निर्मल ने फैसला किया कि उसे अपनेआप को साबित करना होगा. बस्ती के उत्सवों में उस ने बहुत ढोलबाजे पीट लिए, अब उसे अपनी निजी ख्वाहिशों को दरकिनार करना होगा. जब तक उसे ठोस जमीन नहीं मिलेगी, तब तक वह चुरू लौट कर नहीं आएगा.

जब निर्मल के दोस्तों मनोहर और हरनाम को यह बात मालूम हुई, तब वे उलझन में पड़ गए. वे उस से मिलने के लिए तुरंत चले आए.

उस समय निर्मल अपना सामान बांध रहा था. मनोहर ने उस से पूछा, ‘‘निर्मल, क्या यह सच है कि तुम जा रहे हो?’’

निर्मल ने कहा, ‘‘देखो दोस्तो, आज अचानक मेरे सामने कुछ खास सवाल खड़े हो गए हैं, जिन का खुलासा मैं इस समय नहीं कर सकता. जब तक मुझे  उन का हल नहीं मिलता, तब तक मैं लौटूंगा नहीं.’’

रचना को जब मालूम हुआ कि निर्मल उस से मिले बिना ही चला गया है, तो उसे बेहद दुख हुआ.

धीरेधीरे निर्मल को अमीरचंद की कड़वी बातों में सचाई दिखाई दी. इसी दौरान उसे मनोहर और हरनाम से मालूम हुआ कि महंत रामनारायण के मंदिर से चढ़ावे के गहने चोरी हो गए हैं.

इस खबर ने निर्मल की बेचैनी और ज्यादा बढ़ा दी. वह चुरू जाने के लिए निकल पड़ा.

चुरू में निर्मल ने तरुण दल की बैठक बुला कर अपनी योजना समझाई. अब बारी पंचों को मनाने की थी.

पंचायतघर में पंच प्रमुख और तरुण दल के साथ बस्ती के और लोग भी मौजूद थे.

पंचायत के किसी सदस्य ने निर्मल से चुभता सवाल किया, ‘‘बेटा, माना कि तुम बड़े शहर की पढ़ाई कर के आए हो. बहुत सी किताबी बातों की समझ आ गई है तुम्हें, पर किताबें पढ़ लेने से हम देवता तो नहीं हो जाते. यह घोर कलियुग ही सही बेटा, पर पुरखों से चली आ रही अपनी प्रथाएं हम कैसे छोड़ सकते हैं?’’

निर्मल ने कहा, ‘‘काका, देवता तो पंडोंमहंतों की कमाई के साधनभर होते हैं. अब रहा सवाल प्रथा का, तो हमारे पुरखे अपने झोंपड़ों में तेल के दीए जलाते थे, फिर उन की इस प्रथा को छोड़ कर क्यों हम अपने घरों को बिजली की बत्तियों से जगमगाते हैं?

‘‘अपनी सहूलियत के हिसाब से बदलती इन प्रथाओं को हम क्यों मानें? ऐसे यज्ञों व टोनेटोटकों की आग में अपनी मेहनत की कमाई हम कब तक झोंकते रहेंगे? हमारे कितने ही लोग इस गोरखधंधे में फंस कर हमेशा के लिए खत्म हो गए हैं.

‘‘हमारी मेहनत की कमाई से बनाए गए लाखों रुपए के जेवरों को लुटेरों ने मंदिर से लूट लिया. क्या मिला हमें? हम सब को खुले दिमाग से सोचना जरूरी है. हम अपना चंदे का रुपया कर्मकांडों में लगाने के बजाय गरीब छात्रों की पढ़ाईलिखाई पर खर्च करें, तो वही सच्चा पुण्य होगा.’’

निर्मल की बातें सुन कर रघु काका ने जोश में आ कर कहा, ‘‘निर्मल ठीक कह रहा है. हमें अपनी पुरानी सोच से उबरना होगा, तभी हमारी आने वाली पीढि़यां ऐसी भेड़बकरियों की जिंदगी से बच सकती हैं.’’

दुविधा में फंसे जय सिंह ने कहा, ‘‘बाकी सब तो ठीक है रघु, लेकिन हमारे इस फैसले को क्या पूरी बिरादरी मान लेगी?’’

निर्मल ने जोर दे कर कहा, ‘‘आप तो पंच हैं, बात को सही ढंग से समझाने पर आप की बात कौन टालेगा.’’

एक बुजुर्ग ने अपना सुझाव दिया, ‘‘कुछ करने से पहले हमें महंत रामनारायणजी की इजाजत लेनी जरूरी है. हम ने आज तक उन से पूछे बिना कोई काम नहीं किया है. मुझे  भरोसा है कि वे जरूर हमें रास्ता बताएंगे.’’

तरुण दल इस बात से सहमत नहीं था, पर पंचों ने बहुमत से यही तय किया कि वे महंत रामनारायण को भी यह बात बताएंगे.

दूसरे दिन जब पंच प्रमुख रामनारायण से मिलने मंदिर पहुंचे, तब वहां पुलिस की टुकड़ी मौजूद थी. पंचों की सम?ा में कुछ आता, तभी मंदिर के भीतर से 2 पुलिस वाले रामनारायण को हथकड़ी पहनाए बाहर निकले.

रामनारायण भीड़ से नजरें नहीं मिला पा रहा था. पूछने पर मालूम हुआ कि पिछले दिनों मंदिर में जो लाखों रुपए के जेवरों की चोरी हुई थी, वह रामनारायण के इशारे पर ही की गई थी.

उस दिन के बाद बस्ती में बदलाव शुरू हो गया. पंचों के पास जो चंदा जमा होता, उसे वे ऐसी सामाजिक संस्था के सुपुर्द करते, जो गरीब व पिछड़े छात्रों की पढ़ाई में मदद का जिम्मा उठाती थी.

निर्मल तरुण दल को आगामी योजना की जानकारी दे कर लौट रहा था कि उस का सामना रचना से हुआ, जो स्कूल से आ रही थी.

निर्मल सकते में आ गया, पर रचना जैसे खुशियों से भर उठी और बोली, ‘‘तुम्हें सामने देख कर मेरी सारी शिकायतें दूर हो गईं… और बधाई हो, तुम ने बस्ती वालों को जो बातें सम?ाई हैं, उस से मु?ो अपनेआप पर गर्व हो रहा है. मैं जानती थी कि तुम जिंदगी में जरूर कुछ अलग ही करोगे. पर तुम मु?ा से दूरी क्यों बना रहे हो?’’

‘‘नहीं रचना, ऐसी तो कोई बात नहीं. बस, काम की वजह से…’’ निर्मल ने बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘अब चुप रहो, तुम मु?ो नहीं बना सकते. बचपन से जानती हूं तुम्हें. जरूर कोई बात हुई है. क्या पिताजी ने तुम से कुछ कहा? अगर ऐसी बात है, तो तुम मु?ा से भी कमजोर हो, क्योंकि तुम से दूरी बनाने के लिए वह बचपन से ही मु?ा पर दबाव डालते आ रहे हैं. पर देखो, मैं ने आज तक अपनी पसंद से कभी सम?ौता नहीं किया. मु?ो तुम पर भरोसा था,’’ रचना ने लताड़ते हुए कहा.

‘‘मु?ो माफ कर दो रचना, पर मैं इतना उल?ा हुआ था कि तुम्हारे किसी फोन या ईमेल का जवाब नहीं दे पाया. लेकिन अब भी मेरा मकसद पूरा नहीं हुआ है. जब हो जाएगा, तभी मैं आगे के बारे में कुछ सोच पाऊंगा,’’ निर्मल ने अपनी बात रखते हुए कहा.

‘‘तुम ने यह कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारे मकसद के आड़े आऊंगी, बल्कि अगर मेरे लायक कोई काम हो, तो उसे करते हुए मु?ो बेहद खुशी होगी. तुम ने जो काम कर दिखाया है, वही पाठ मैं बच्चों को पढ़ा रही हूं.’’

‘‘मैं जानता हूं रचना, तुम्हारी इन्हीं बातों से मु?ो ताकत मिलती रही है.’’

‘‘क्या तुम फिर कहीं जा रहे हो?’’ रचना ने पूछा.

‘‘हां, वहां कंपनी का बहुत सा काम बाकी छोड़ कर आया हूं और…’’

‘‘बसबस, अब और बहाना बनाने की कोशिश मत करो. तुम्हारे सभी कामों के लिए मैं और मेरी शुभकामनाएं हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगी.’’

इस के बाद निर्मल पुणे लौट आया. वहां उस ने एक वैबसाइट बनाई, जिसे उस ने ‘सत्कार्य डौट कौम’ नाम दिया. इस वैबसाइट पर और लोगों को प्रेरित करने के लिए उस ने अपनी बस्ती के लोगों द्वारा किए सामाजिक कामों की पूरी कहानी वीडियो क्लिप के साथ डाल दी.

‘सत्कार्य डौट कौम’ के सामाजिक कामों को अमेरिका की एक मशहूर सौफ्टवेयर कंपनी ने सराहा. उस ने निर्मल को इनाम देने का फैसला लिया.

जब निर्मल अमेरिका से अवार्ड ले कर लौटा, तो सादुलपुर शिक्षा संस्थान ने उस का सम्मान करना चाहा.

मंच पर खास मेहमानों के बीच निर्मल मौजूद था. अमीरचंद माइक थामे कह रहा था, ‘‘हमारी शिक्षा संस्थान के भूतपूर्व होनहार छात्र निर्मल ने हम सब का सिर गर्व से ऊंचा किया है. इस बच्चे ने पिछड़ों में भी पिछड़े समाज को कर्मकांड के अंधेरे कुएं से निकाल कर 21वीं सदी के बदलाव का सेहरा पहनाया.

‘‘एक दिन मैं ने ही निर्मल की बेइज्जती करते हुए कहा था कि वह तो सिर्फ अपनी बस्ती में ही ढोलनगाड़े पीट सकता है, पर निर्मल ने अपने अच्छे कामों का ऐसा डंका बजाया, जिस की चौतरफा टंकार से मेरा अहंकार चूरचूर हो गया.

‘‘आप सब की मौजूदगी में मैं इस के हुनर के सामने झुक कर इस से माफी मांगता हूं.’’

यह सुन कर पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. Inspirational Hindi Story

Hindi Social Story : साहस

Hindi Social Story. सदियों से लकीर के फकीर बने समाज के दकियानूसी लोगों को जब सूरज ने जातपांत की अंधेरी गुफा से निकाल कर रोशनी की ओर ले जाने की कोशिश की,  तो उस के अपने ही राह में रोड़े अटकाने आ खड़े हुए. क्यों?

दरवाजा बंद होने की आवाज पर सूरज चौंक कर पलटा. सामने वही लोग खड़े थे, जिन के आने की उसे उम्मीद थी. वे 4 थे और चारों ही ऊंची जाति के हट्टेकट्टे नौजवान थे.

उन लोगों के हाथों में तरहतरह के हथियार थे. उन की आंखों में उस के लिए नफरत भरी थी.

वैसे सूरज खुद भी एक ऊंची जाति से ताल्लुक रखता था, लेकिन उस का गरीबों, दलितों और पिछड़ी जाति के लोगों से संबंध रखना ऊंची जाति के लोगों को पसंद नहीं था. यही वजह थी कि वे लोग उस के कट्टर दुश्मन हो गए थे.

छेदीलाल का परिवार पुश्तों से दीनदयाल के यहां बेगारी करता आया था. जानवरों को दानापानी देना, खेत जोतना, फसल उगाना, काटना और इसी तरह के और भी कई काम वे लोग बरसों से करते आए थे, लेकिन बदले में उन्हें भरपेट खाना भी नहीं मिलता था. इतना ही नहीं, उन की बहूबेटियों की इज्जत भी लूटी जाती थी.

दीनदयाल और उस का बेटा सुरेश वहशी थे. सुरेश ने जोरजबरदस्ती से छेदीलाल की बेटी मालती की जिंदगी बरबाद कर दी थी.

जब मालती फरियाद ले कर दीनदयाल के पास गई, तो उस ने छेदीलाल को पीटपीट कर अधमरा कर दिया और मालती को सरेआम नंगा घुमाया.

उस वक्त दीनदयाल को सूरज ने ही रोका था. उसी ने उन दरिंदों को ललकारा था, ‘चाचा दीनदयाल, इस तरह किसी औरत को बेइज्जत करने का हक आप को किस ने दिया है?’

‘सूरज, इन नाली के कीड़ों के लिए तुम्हारे जैसे ऊंची जाति के लड़के के मुंह से ये शब्द अच्छे नहीं लगते.’

‘नाली के कीड़े? लेकिन इसी नाली में जब तुम्हारा लायक बेटा सुरेश अपनी नाक डुबोने गया था, तब उसे मालूम नहीं था कि ये नाली के कीड़े हैं. अगर ये ‘अछूत’ हैं, तो इन के उगाए गए अनाज को तुम क्यों छूते हो?’

‘अरे, रंगीन तितलियां देख कर नए खून में उबाल आ ही जाता है,’ दीनदयाल ने कहा.

‘तुम्हारे जैसे बाप ही अपनी औलाद को औरत को तितली सम झने की सीख दिया करते होंगे. लेकिन मैं तो यही जानता हूं कि दुनिया की हर औरत की इज्जत की जानी चाहिए, फिर वह चाहे किसी भी धर्म या जाति की हो.’

इस के बाद सूरज शिकायत ले कर थाने गया. लेकिन थानेदार ने दक्षिणा की उम्मीद में आनाकानी की. फिर सूरज बीडीओ से मिला, तो वे उसे साथ ले कर थाने में गए.

बीडीओ को देखते ही थानेदार ने तुरंत रिपोर्ट दर्ज कर ली और दीनदयाल और उस के बेटे सुरेश को गिरफ्तार कर लिया. केस चला और सुरेश को जेल भेज दिया गया.

तभी से दीनदयाल के हिमायती लोग सूरज से खार खाए बैठे थे. वे बराबर उस के ऊपर हमला करने की ताक में रहते थे.

उधर सूरज के बीडीओ साहब से गहरे संबंध बन गए थे. एक दिन वे दोनों बैठे थे, तभी उन में जातपांत पर चर्चा छिड़ गई.

सूरज ने पूछा, ‘साहब, आप किस जाति से हैं?’

‘नाम से पता नहीं चलता क्या?’ उन्होंने पूछा.

‘साफ नहीं.’

‘मेरा धर्म, मेरा ईमान, मेरी जात… सबकुछ इनसानियत है.’

‘इस का उदाहरण?’

‘मेरी पत्नी भील जाति की है…’ कुछ देर बाद वे बोले, ‘मेरा खयाल है कि इस बार 26 जनवरी को अलगअलग जातियों के नौजवान लड़केलड़कियों के ब्याह रचाए जाएं. तुम्हारा क्या विचार है?’

‘आप का विचार बहुत अच्छा है. मैं हर कदम पर आप के साथ हूं,’ सूरज ने कहा.

जब गांव वालों को इस बात का पता चला, तो ऊंची जाति वाले सूरज के कट्टर दुश्मन बन गए.

आज वे तैयारी कर के आए थे. उसी समय बीडीओ साहब भी सूरज के घर आने वाले थे.

उन चारों नौजवानों ने सूरज के इर्दगिर्द घेरा सा बना लिया.

एक ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘चीर कर रख दो इस को… इस पर दलितों के उद्धार का भूत चढ़ा है. मारो इस को.’’

‘‘बेवकूफ हो तुम सभी. मेरा नाम सूरज है…और मेरी गरमी बरदाश्त करने की ताकत तुम में से किसी में भी नहीं है,’’ सूरज ने गरजते हुए कहा.

‘मारो इसे,’ वे चारों एक आवाज में चीख पड़े और उस पर टूट ही पड़ने वाले थे कि कमरे में एक और आवाज उभरी, ‘‘हिलना मत, वरना कुत्ते की मौत मारे जाओगे,’’ बीडीओ साहब के गार्ड ने उन लोगों की ओर पिस्तौल तानते हुए कहा.

अगले दिन एक सादे समारोह में बीडीओ साहब ने बोलना शुरू किया, ‘‘सदियों से हम सब एक अंधेरे में जिए जा रहे हैं, जिस का नंगा रूप आप सभी खुली आंखों से साफ देख रहे?हैं. जिन्हें हम अछूत और दलित कहते हैं, वही मेहनतकश लोग हमारी जिंदगी की राहों में कदमकदम पर हमारा साथ निभाते हैं.

‘‘मैं ऊंची जाति वालों से पूछना चाहूंगा कि दलित औरतों को बांहों में भरते समय इन की ऊंची जाति की अकड़ कहां चली जाती है? तब तो इन्हें जरा भी शर्म नहीं आती. जब ये रात के अंधेरे में चुपके से दलित औरतों को अपना बना सकते हैं, तो दिन के उजाले में क्यों नहीं? समाज के सामने क्यों नहीं? हमेशा के लिए क्यों नहीं?

‘‘आज जमाना बदल रहा है…नए खून को इनसानियत के नाम पर लगे इस कलंक को मिटाना है. आइए, आगे बढि़ए और अपने जीवनसाथी को चुनिए.’’

दीनदयाल की बेटी स्नेह सब से आगे थी. उसे आगे बढ़ता देख कर ऊंची जाति के कई और जवान लड़केलड़कियां भी आगे बढ़े.

सूरज ने भी मालती का हाथ थाम लिया था.

दीनदयाल अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए बीडीओ साहब से बोला, ‘‘हम अंधेरे में थे साहब. आप ने हमारी आंखें खोल दी हैं. मैं अपनी बेटी के फैसले का स्वागत करता हूं. अब हमारे गांव में छुआछूत नाम की बीमारी कभी भी अपने पैर नहीं पसारेगी.’’

दीनदयाल के इतना कहते ही वहां खुशी का माहौल छा गया.    Hindi Social Story

-अनंत राज सिंह

Inter Caste Love Story : जाति की नाक

सुगिया के नशीले हुस्न में न जाने कितने नेताओं और चंदनधारियों ने गोता लगा कर खुद को खुश किया था, पर वही सुगिया जब छोटे से सुख की तलाश में भोला का दामन थाम बैठी, तो जाति के नाम पर सभी ने जैसे बवंडर सा खड़ा कर दिया. आखिर क्यों?

गांव के अगड़ों ने फरमान जारी कर दिया, ‘सुगिया को नंगा कर के गांव में घुमाया जाएगा और उसे भगाने वाले भोला की गरदन उतार ली जाएगी.

‘उन दोनों ने मिल कर हमारी इज्जत को धूल में मिला दिया है, अगर हमारी नाक ही नहीं रहेगी, तो हम सब यहां रह कर क्या करेंगे, फिर यह पैसा किस काम आएगा?’

जाति की नाक बचाने के नाम पर राघो सिंह जैसे कंजूस आदमी ने भी अपनी ओर से जाति की कटी नाक फिर से जोड़ने के लिए ढाई हजार रुपए के दान का ऐलान कर दिया.

जाति की कटी नाक से शिवन सिंह की विधवा रेणुका को भी परेशानी थी. उस के पति की मौत 3 साल पहले हो गई थी. जब जवान थी, तब उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था, लेकिन किसी जाति वाले ने उस की कोई मदद नहीं की थी. आखिर नाथूराम ने उसे अपने बच्चों को पढ़ानेलिखाने का काम दिया. इस तरह रेणुका को जीने के लिए एक रास्ता मिल गया.

वैसे, लोगों को शक था कि रेणुका नाथूराम के बच्चों की सिर्फ मास्टरनी ही नहीं थी, बल्कि उन दोनों के बीच एक नजदीकी संबंध भी था. हां, इस रिश्ते में कभी भी इतना खुलापन नहीं आया कि उस की बू किसी के बरदाश्त की हद लांघ जाती. फिर चोरी जब तक पकड़ी न जाए, चोरी कैसे कही जा सकती है.

तभी तो अब रेणुका कहती है, ‘‘उस बेशर्म को भागना ही था, तो किसी अपनी जाति वाले को ले कर भाग जाती. नाक कटा दी…’’

देवी मंदिर के बाबा युगल किशोर को इस घटना के पीछे घोर कलियुग का हाथ दिखता है. वे कहते हैं, ‘‘घोर कलियुग आ गया है… पहले भी ऐसा होता था, पर तब राजघरानों में छोटे कुल की लड़कियां आती थीं. अब तो सब उलटा हो गया…’’

सुगिया व भोला को गांव से गए हुए तकरीबन 15 दिन हो गए थे, पर अभी भी हर कहीं यही चर्चा होती.

एक तरफ ऊंची जाति के लोग बदला लेने की तैयारी में जुटे थे, वहीं पिछड़े एकदम खामोश थे.

कुछ ऐसे नौजवान जरूर थे, जिन्हें इस बात की खुशी थी कि भोला ने हिम्मत का काम किया है.

अगड़ों में भी 2-3 लोग ऐसे थे, जो इस सारी घटना पर एक अलग सोच रखते थे. उन की नजर में अपने जीवनसाथी को चुनना कोई गलत हरकत नहीं है, इसलिए इसे ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए. फिर सुगिया ने तो यह कदम बेबसी की हालत में उठाया था.

सुगिया का जन्म तकरीबन 20 साल पहले हुआ था. जब वह मां के पेट में थी, तभी उस के पिता को किसी गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया था. उस के जन्म के डेढ़ साल बाद वे मर गए थे.

तब सुगिया का इस दुनिया में उस की मां के अलावा और कोई न था. कहने को तो उस के 2-2 चाचा भी थे, पर सालों पहले बंटवारा हो चुका था. वैसे, सुगिया के पिता कुछ जमीन छोड़ गए थे.

पति की मौत के बाद सुगिया की मां ने वह जमीन अपने एक देवर के जिम्मे कर दी थी. उसी से उन दोनों मांबेटी का गुजारा चलता रहा.

कुछ समय बाद सुगिया के चाचा ने कुछ भी देने से इनकार कर दिया. सुगिया की मां ने अपनी बिरादरी के कई लोगों से इंसाफ की गुहार लगाई, पर कोई उस की मदद करने के लिए आगे नहीं आया. जमीन उस के हाथ से निकल गई.

आखिर में सुगिया की मां ने पेट की खातिर अपनी बिरादरी के ही भरत मुखिया के यहां काम करना शुरू किया. वह खुद ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, उस के पास पैसे भी नहीं थे, पर उस ने सुगिया को स्कूल भेजना शुरू किया. पहली, दूसरी, तीसरी…छठी जमात, वह लगातार आगे बढ़ती जा रही थी.

अचानक उन्हीं दिनों सुगिया पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. मुखिया की लड़की की शादी थी. उन का घर बिजली की रोशनी से जगमगा रहा था. ठीक समधी मिलन के समय जब लोग बाहर गए हुए थे, पता नहीं कैसे सुगिया की मां का हाथ बिजली के नंगे तार से छू गया और वह चल बसी.

सुगिया का स्कूल जाना बंद हो गया. 12 साल की लड़की का अपना कौन था, जिसे वह अपना कहती. वह दिनरात कोठरी में पड़ी रहती. कोई दूसरा होता तो मुखिया को लेने के देने पड़ जाते, पर यहां तो कोई सुगिया की खोजखबर लेने वाला नहीं था.

वैसे, मुखिया ने सुगिया की मां का अंतिम संस्कार करा दिया था और उसे 50 रुपए नकद व 10 किलो चावल भी दिए थे. साथ ही, उस ने यह संदेशा भी भिजवाया था कि अगर वह अपनी मां की जगह काम करना चाहती है, तो कर सकती है.

सुगिया जैसों का सत्कार हो या अनादर, उस से उन का क्या बनताबिगड़ता है. फिर रोटी का जुगाड़ हो जाने के बाद ही आदमी आदरअनादर की बात सोच पाता है. सुगिया को अगर मुखिया के यहां काम न मिलता, तो शायद उसे दरदर भटकना पड़ता.

मुखिया के यहां काम करतेकरते 2 साल बीत गए. अब सुगिया 14 साल की हो गई थी. उस का बदन गदराया हुआ था और आंखों में एक चमक आ गई थी. मैलेकुचैले कपड़ों में भी वह खूबसूरत लगने लगी थी. वह सुबहशाम मुखिया के घर जाती और काम कर के अपनी कोठरी में लौट आती.

एक दिन सुगिया शाम ढलने के बाद अपनी कोठरी में लौट रही थी, तो मुखिया के बेटे सतीश ने एक दोस्त के साथ उसे उठा लिया. वह चीखीचिल्लाई, पर किसी ने उस की आवाज न सुनी.

मुखिया के बेटे ने उस के हाथ में सौ रुपए का एक नोट पकड़ा दिया. वह चुप हो गई.

इस वारदात के बाद सुगिया ने मुखिया के घर काम करना छोड़ दिया. अब उस का धंधा ही बदल गया.

सुखिया अब मर्दों को जिस्मानी सुख देती, बदले में उसे कुछ पैसे मिल जाते. इस में उसे अजीब सी खुशी महसूस होती, क्योंकि जब वह मुखिया के यहां जूठे बरतन धोती थी, तो भरपेट खाना तक नहीं मिलता था. पीठ पीछे चाहे लोग जो कुछ भी कहते, पर उस के आगे आने पर तो उन्हें नाक ही रगड़नी पड़ती थी.

सुगिया ने कई लोगों की सेवा की. मुखिया के बेटे से ले कर खुद मुखिया तक की. कई चंदनधारी भी उस के तलवों में चंदन रगड़ कर अपने को खुश कर के लौटे और कई नेता भी बेहिचक उस के दरवाजे पर पहुंचे. उस ने सब के साथ एक सा बरताव किया. सब की हवस मिटाई. उस के यहां आने वालों में कोई जाति बंधन नहीं था.

भोला कई दिन से सुगिया को देखता आ रहा था. एक दिन सुगिया का इशारा पा कर वह निहाल हो उठा. फिर क्या था, वह बारबार सुखिया से जिस्मानी सुख पाने लगा. इस के लिए उसे सुगिया के यहां जाने की जरूरत न थी, क्योंकि वही उस के पास आ जाती थी.

सुगिया ने हर नौजवान के सामने इस नरक से अपने को उबार लेने की बात कही, पर किसी ने उसे कबूल न किया. एक भोला ही ऐसा था, जिस ने मर्दानगी दिखाई थी, ‘मैं तुम्हें जरूर अपनाऊंगा… चाहे इस के लिए मु झे जो भी मुसीबत उठानी पड़े.’

फिर एक रात दोनों गांव से भाग गए.

पता नहीं, गांव वालों की नाक इस में कैसे कट गई? उन्हें तो खुश होना चाहिए था कि अब सुगिया गांव की धंधे वाली नहीं, किसी की बीवी बन गई थी. पर उन सिरफिरों को कौन सम झाता?

-विपिन कुमार

Inter Caste Love Story : जूठन से प्यार 

Inter Caste Love Story. नेहा खेतों में गाय चरा रही थी. साथ में उस की सहेली अनुराधा भी थी. नेहा और अनुराधा अपनी बातों में मगन थीं कि एक जानीपहचानी आवाज ने उन का ध्यान खींचा. दोनों ने आवाज की दिशा में नजर घुमाई.

यह थानेदार अशोक सिंह का बेटा आकाश था, जो नेहा से शादी करने की सोच रहा था.

नेहा ने आकाश को देख कर बुरा सा मुंह बना लिया. वह अनुराधा से बोली, ‘‘इस से कह दो कि यहां से चला जाए.’’

‘‘तुम शांत रहो. पहले सुन तो लो कि यह क्या कह रहा है.’’

‘‘जो कहता आया है, वही कहेगा.’’ ‘‘अच्छा, अब तुम शांत हो जाओ, आकाश नजदीक आ गया है.’’

आकाश उन दोनों के पास आ कर खड़ा हो गया. अनुराधा के होंठों पर हलकी मुसकान बिखर गई. वह गंभीर होने की ऐक्टिंग करते हुए बोली, ‘‘यहां क्यों आए हो?’’

‘‘मैं नेहा से मिलने आया हूं.’’ ‘‘मगर क्यों?’’

‘‘उस से कुछ कहना है.’’ ‘‘ठीक है, कहो,’’ बोल कर अनुराधा नेहा के न चाहते हुए भी वहां से कुछ कदम दूर चली गई.

नेहा ने थोड़ा कठोर बनते हुए आकाश से कहा, ‘‘मैं जानती हूं कि तुम क्या कहोगे. मुझे  कुछ नहीं सुनना है. तुम यहां से चले जाओ.’’

आकाश ने प्यार भरे लहजे में कहा, ‘‘नेहा, ऐसा मत बोलो. मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूं और तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘मैं तुम से कितनी बार कह चुकी हूं कि यह मुमकिन नहीं है. तुम ऊंची जाति के हो… उस पर भी थानेदार के बेटे.’’

‘‘थानेदार मेरे पापा हैं, मैं तो नहीं. वैसे भी इस में बुराई क्या है?’’

‘‘बुराई यह है कि तुम्हारे पापा हमेशा अमीर लोगों की बात सुनते हैं. वे रिश्वत ले कर सच को झूठ और झूठ को सच बना देते हैं,’’ नेहा ने कहा.

‘‘ऐसा वे करते हैं, पर मैं नहीं.’’ ‘‘बेटे तो उन्हीं के हो, असर तो पड़ेगा ही.’’

‘‘ऐसा नहीं है नेहा. मैं तुम्हें दिखा दूंगा कि मैं क्या हूं. बस, तुम थोड़ा साथ दे दो.’’

‘‘देखो, मुझ  में और तुम में बहुत फर्क है. मैं छोटी जाति की हूं. तुम्हारे पापा यह बरदाश्त नहीं कर पाएंगे, इसलिए अच्छा यही होगा कि मेरा पीछा करना छोड़ दो.’’

आकाश ने कहा, ‘‘मैं जातपांत को नहीं मानता. तुम मुझ पर भरोसा करो.’’

नेहा आकाश को तिरछी निगाहों से देखने लगी.

आकाश ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘नेहा, तुम मानो या न मानो, मैं तुम्हें अपना समझता हूं. एक दिन ऐसा आएगा कि तुम पिघल जाओगी और मेरे सच्चे प्यार के आगे झुक जाओगी.’’

इतना कह कर आकाश तेजी से चला गया. अनुराधा नेहा के पास आती हुई बोली, ‘‘तुम उस की बात क्यों नहीं मान लेती हो?’’

‘‘कैसे मान लूं, तुम तो…’’

अनुराधा ने उस की बात बीच में ही काट दी, ‘‘नेहा, मुझे  लगता है कि आकाश का प्यार सच्चा है और वह तुम्हें खुश रखेगा.’’

नेहा सोच में पड़ गई.

अनुराधा ने नेहा से फिर कहा, ‘‘वैसे, यह तुम्हारी मरजी है. तुम जैसा ठीक समझे , वही करो.’’

नेहा ने कहा, ‘‘अच्छा, मैं इस पर सोचूंगी. फिलहाल यहां से चलते हैं.’’

नेहा ने अपनी गाय संभाली और अनुराधा के साथ घर की राह ली.

नेहा का इस दुनिया में मां के सिवा कोई न था. जब वह 8 साल की थी, तभी पिता का साया उस के सिर से उठ चुका था. उन की थोड़ी सी जमीन थी, जिस में खेती कर के उस की मां कुछ अनाज उपजा लेती थीं.

नेहा 10वीं पास कर चुकी थी. आगे की पढ़ाई के लिए मां ने मना कर दिया, पर वह और पढ़ना चाहती थी.

नेहा ने खुरपी उठाई और मां से कहा, ‘‘मां, अनुराधा आए तो उसे भेज देना.’’ ‘‘ठीक है, मैं भेज दूंगी.’’

नेहा गांव से बाहर कुछ दूर आ गई, जहां आम का एक बगीचा था. वहां सन्नाटा पसरा था. दूरदूर तक किसी का घर नहीं था. नेहा उसी बगीचे के सामने घास छीलने लगी.

महेंद्र सिंह इस गांव का सब से अमीर आदमी था. गांव में दूरदूर तक उसी की जमीन थी. उस का लड़का अमर सिंह बड़ा घमंडी था. बातबात पर लड़नाझगड़ना, तकरार करना उस की आदत में शामिल था. वह कुछ लड़कियों की तो इज्जत से भी खेल चुका था.

अमर सिंह अपने खेतों को देखता हुआ नेहा के पास पहुंच गया. उस को अचानक अपने सामने देख नेहा डर गई.

वह बोला, ‘‘घबराओ मत. मैं शेर नहीं हूं, जो तुम्हें खा जाऊंगा. मैं सिर्फ मजा लूंगा…’’

नेहा घबराते हुए बोली, ‘‘तुम यहां से चले जाओ. मैं यहां घास लेने आई हूं.’’

‘‘तुम्हारी फूल सी जवानी को छोड़ कर मैं कैसे चला जाऊं. यह कभी नहीं होगा. बस, आ जाओ. थोड़े समय की तो बात है. आओ, मेरी बांहों में…’’ कह कर अमर नेहा की ओर बढ़ने लगा.

नेहा धीरेधीरे पीछे हटने लगी, लेकिन अगले ही पल अमर सिंह ने पूरी ताकत से उसे दबोच लिया और जमीन पर पटक कर उस पर छा गया.

नेहा पूरी ताकत से उस के चंगुल से छूटने की कोशिश करने लगी, पर कहां अमर सिंह का कठोर हाथ और कहां उस का कोमल बदन. कुछ ही देर में उस का सबकुछ लुट गया.

अमर सिंह अपना काम खत्म कर तेजी से वहां से चल दिया. नेहा वहीं कुछ देर तक बेसुध सी हालत में रही, फिर धीरे से उठने की कोशिश करने लगी कि तभी अनुराधा वहां आ गई. उस ने सहारा दे कर नेहा को उठाते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

नेहा के मुंह से कुछ नहीं निकला. वह उस से लिपट कर बुरी तरह रो पड़ी.

अनुराधा ने नेहा की पीठ सहलाई और प्यार से पूछा, ‘‘क्या हुआ नेहा? बोलो तो सही?’’

नेहा ने सारी घटना रोरो कर कह दी.

अनुराधा गुस्से में कांपते हुए बोली, ‘‘घबराओ नहीं. हम अभी थाने चलेंगे, उस अमर सिंह को नहीं छोड़ेंगे.

इस घटना से नेहा की मां को गहरा धक्का लगा. अनुराधा ने उन्हें शांत किया, फिर वह उन दोनों को ले कर थाने चल पड़ी.

नेहा की मां और अनुराधा ने थानेदार अशोक सिंह को सारी घटना बताई, तो वह उलटे उन्हीं पर बिगड़ गया.

‘‘ऐसे इज्जतदार आदमी के बेटे के ऊपर लांछन लगाते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती. निकलो यहां से, नहीं तो हवालात में बंद कर दूंगा.’’

यह सुन कर अनुराधा को बहुत गुस्सा आया.

अनुराधा नेहा की मां से बोली, ‘‘चलिए, चाची यहां से.’’

यह चर्चा पूरे गांव में फैल गई. आकाश को जब इस के बारे में पता चला, तो वह फौरन नेहा के घर पहुंचा.

नेहा आकाश को देख कर रोने लगी. आकाश ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘नेहा, रोओ नहीं. मैं तुम्हारे साथ हूं.’’

नेहा की मां ने रोते हुए आकाश से कहा, ‘‘मैं ने सोचा था कि इस की शादी धूमधाम से करूंगी. अब कैसे होगी मेरी नेहा की शादी? कौन करेगा इस से ब्याह?’’

‘‘मैं करूंगा नेहा से शादी. मैं ने तो कब से इसे अपना मान लिया है,’’ आकाश बोला.

आकाश की यह बात सुन कर वहां खामोशी छा गई.

कुछ देर बाद आकाश ने नेहा से पूछा, ‘‘नेहा, क्या तुम मुझ से शादी करोगी?’’

जवाब में नेहा का सिर झुक गया.

नेहा की मां को मालूम था कि आकाश नेहा को पसंद करता है, इसलिए वे भी मना नहीं कर सकीं.

अनुराधा ने आकाश को उस के पिता थानेदार अशोक सिंह के किए गए गलत बरताव की बात बताई.

आकाश ने कहा, ‘‘मेरे पापा की महेंद्र सिंह से दोस्ती है, लेकिन कोई बात नहीं. मैं अमर सिंह से उस की इस करतूत का बदला जरूर ले कर रहूंगा.

‘‘मुझे  कुछ दिनों के लिए नेहा को यहां दूर ले कर जाना होगा, तभी मैं इस से शादी कर पाऊंगा. मैं पैसों का इंतजाम कर लेता हूं.’’

कुछ दिनों बाद सारा इंतजाम कर के आकाश नेहा के घर पहुंचा. वह पहले से तैयार थी.

आकाश ने नेहा की मां के पैर छुए और कहा, ‘‘मैं इस के साथ शादी कर के जल्दी ही लौट आऊंगा. शादी के बाद मेरे पापा चाह कर भी कुछ नहीं कर सकेंगे. आप नेहा को रेलवे स्टेशन ले कर चलिए, मैं पीछेपीछे आता हूं.’’

अगले दिन पूरे गांव में खबर फैल गई कि आकाश नेहा को ले कर भाग गया है.

थानेदार अशोक सिंह ने अपना सिर पीट लिया. वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था. उस का सारा घमंड चूरचूर हो गया था.  Inter Caste Love Story

-दिनेश प्रसाद गुप्ता

Hindi Social Story : संस्कार

Hindi Social Story. अदिति को क्या पता था कि जिस छात्रा को वे उस की छोटी जाति होने के कारण पसंद नहीं करती थीं, एक दिन उसी की शरण में उन्हें जाना पड़ेगा. फिर क्या हुआ?

‘‘है लो, क्या मैं कमलाजी से बात कर सकती हूं?’’ उधर से जवाब मिला, ‘‘जी नहीं, वे बाहर गई हैं.’’

‘‘कब तक वापस आएंगी?’’

जवाब मिला, ‘‘एक हफ्ते बाद… वैसे आप को क्या काम है?’’

मैं ने बताया कि मेरा एक बहुत ही जरूरी काम है. तब उन की सैक्रेटरी ने कहा, ‘‘मैडम, पहले आप मिलने का वक्त तय कर लीजिएगा.’’

मैं ने हफ्तेभर बाद का समय लिया और फोन रख दिया.

मेरे माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. मुझे अपने बेटे सौरभ का कैरियर बरबाद होता नजर आ रहा था. जन कल्याण केंद्र दिल्ली की मानी हुई संस्था थी. वह अनगिनत लोगों को इंसाफ दिलाती आ रही थी. कमला देवी, यानी उस केंद्र की अध्यक्ष की पहुंच प्रधानमंत्री तक थी.

हफ्तेभर बाद जब मैं जन कल्याण केंद्र के दफ्तर में कमलाजी के सामने पहुंची, तो वे बोलीं, ‘‘कहिए, कैसे आना हुआ?’’

मैं ने देखा तो देखती ही रही. नजरें मानो हटना ही नहीं चाहती थीं. मैं ने कहा, ‘‘अरे कमलाजी, आप… आप ने शायद मुझे पहचाना नहीं. याद है, आप मेरी ही क्लास में थीं?’’

कुछ पल वे सोचती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘अरे हां, आप अदिति मैडम हैं न?’’

मुझे संतोष हो गया कि चलो, अपना काम तो बना. कमला बोलीं, ‘‘हां, बताइए, क्या काम है?’’

‘‘कमलाजी, मेरा बेटा सौरभ इंजीनियरिंग के आखिरी साल का छात्र है…’’

वे बोलीं, ‘‘मैडम, मैं वही कमला हूं, आप की छात्रा… मुझे ‘जी’ न कहें.’’

मैं कुछ देर चुप रहने के बाद बोली, ‘‘अभी कुछ दिन पहले कालेज में होने वाली हड़ताल को रोकने वाले छात्रों में मेरा बेटा भी था. वे चाहते थे कि हड़ताल न हो, मगर कालेज के दादा किस्म के छात्र हड़ताल के मूड में थे.

‘‘काफी मारपीट के बाद जब मामला प्रिंसिपल तक पहुंचा, तो उन्होंने भी सौरभ को बिना बात दोषी ठहराते हुए कालेज से निकाल दिया.

‘‘गुंडों का मुखिया यहां के उद्योगपति का एकलौता बेटा है और उस के पिता से कालेज को काफी तगड़ी इमदाद मिलती है, इसलिए प्रिंसिपल भी उस से दबता है.

‘‘अब तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूं… मेरे बेटे की तो जिंदगी ही अंधेरे में डूबती नजर आ रही है, जबकि वह हर साल अव्वल आता है. अब तो बस आप ही कुछ कर सकती हो, क्योंकि उस गुंडे के पिता की पहुंच काफी है.’’

वे चुपचाप बैठी सुनती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘आप उस लड़के का नाम, पिता का नाम, अपने बेटे का नाम व कालेज के बारे में लिख कर दे दें. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगी.’’

मैं ने जरूरी जानकारी लिख कर दी और विदा ले कर चली आई. जब घर पहुंची, तो दिल कुछ पुरानी यादें सोचने को मजबूर था…

तब मैं 7वीं क्लास की टीचर थी. एक दिन देखा, मेरी क्लास में एक नई लड़की आई थी. वह सहमीसहमी सी चुपचाप बैठी थी. मालूम हुआ कि हमारे स्कूल के सफाई कर्मचारी की लड़की थी.

मैं ने सोचा, ‘अब पढ़ाना तो पड़ेगा ही. क्या जमाना आ गया कि ब्राह्मण भी अब ‘अछूतों’ को पढ़ाएंगे. सत्यानाश हो इस सरकार का, हमारा तो धर्म ही भ्रष्ट कर दिया.’

उसी क्लास में कुछ तेज लड़कियों की एक टोली थी. वे सब मेरी ही कालोनी में रहती थीं. प्रमिला उन सब की मुखिया थी और मेरी सब से ज्यादा मुंहलगी छात्रा थी.

उसी शाम प्रमिला अपने मातापिता के साथ हमारे घर आई, तो मैं ने बताया कि आज हमारी क्लास में एक अछूत लड़की आई है. पता नहीं, मैं उसे कैसे पढ़ा पाऊंगी. मेरा तो दिल ही नहीं कर रहा कि मैं स्कूल जाऊं. गंदी, अछूत… प्रमिला मेरी बातें गौर से सुन रही थी.

अगले दिन जब कमला स्कूल आई, तो वह लड़कियों से बोली, ‘मैं भी खेलूंगी.’

तभी प्रमिला बोल पड़ी, ‘नहीं, हम तुम्हें नहीं खिलाएंगे. दूर हटो.’

वह बेचारी सहम कर एक तरफ खड़ी हो गई. वह खेल देखती रही. उस की आंखों में भी अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ खेलने की चाह उभरती, मगर कोई उस से बात तक न करता. अछूत जो ठहरी, बेचारी.

क्लास में यह मालूम होते ही कि वह स्कूल के सफाई कर्मचारी की बेटी है, सब उस से दूरदूर रहतीं. वह चुपचाप अकेले खाना खाती. अकेली रहती. सब लड़कियां खूब चिढ़ातीं, तो उस की आंखों में आंसू भर आते.

मैं सारी बात जानती थी, मगर चुप रहती. सोचती, अच्छा है, खुद परेशान हो कर स्कूल छोड़ देगी, तो बवाल कटेगा.

एक दिन वह हिम्मत कर के प्रमिला से बोली, ‘मुझे भी अपने साथ खेलने दो न.’

प्रमिला फौरन बोली, ‘तुम अछूत हो, तुम हमारे साथ नहीं खेल सकती.’

उस की समझ में नहीं आया, तो वह बोली, ‘प्रमिला, यह अछूत क्या होता है?’

प्रमिला बोली, ‘यह तो मुझे भी नहीं पता… कल अपने मातापिता से पूछ कर बता दूंगी.’

कमला बेचारी चुपचाप वापस क्लास में चली गई.

अगले दिन प्रमिला ने सब के सामने बताया, ‘पता है, अछूत कौन होते हैं? जो गंदे होते हैं, उन्हें अछूत कहते हैं. तुम सब से ही ज्यादा गंदी लड़की हो, तभी तो हम तुम्हें नहीं खिलाते.’

कमला अपने साफसुथरे हाथों और कपड़ों की तरफ देखती हुई बोली, ‘लेकिन मैं तो रोज नहाती हूं, साफ कपड़े पहनती हूं… फिर मैं गंदी कैसे हुई?’

प्रमिला बोली, ‘यह तो हम नहीं जानते, मगर दूर हटो, हम से मत बोला करो.’

कमला रोती हुई मेरे पास आई और सारी बात बताई. पर मैं ने उसे ही डांट दिया, ‘वे सब ठीक ही तो कह रही हैं. चलो, चुपचाप बैठो. ज्यादा शिकायतें मत लगाया करो.’

उस बेचारी का दिल तो वैसे ही दुखी था. मेरी डांट से वह और भी सहम गई.

कुछ वक्त बाद सालाना इम्तिहान का नतीजा निकला, तो कमला अव्वल रही.

कमला ने अब 8वीं क्लास में दाखिला लिया. मैं उस को हिंदी पढ़ाती थी. एक दिन मैं ‘गंगा’ नामक पाठ पढ़ा रही थी. उस में लिखा था, ‘गंगा में स्नान करने से सब ‘पवित्र’ हो जाते हैं, सारे ‘पाप’ धुल जाते हैं, सब शुद्ध हो जाते हैं.’

उस के कुछ दिनों बाद गंगा स्नान की छुट्टियां पड़ीं. जब स्कूल खुला, तो मैं ने देखा, कमला बहुत खुश थी. वह क्लास में बैग रख कर भागीभागी लड़कियों के पास गई और जोरजोर से बोली, ‘अब तो मैं भी खेलूंगी. पता है प्रमिला, अब की बार मैं ने अपने बाबा से खूब जिद की कि वे मुझे गंगा नहला दें. अब तो मैं गंदी भी नहीं रही. मैं तो शुद्ध हूं. याद है, उस दिन मैडम पाठ में यही बातें पढ़ा रही थीं.’

सब लड़कियां चुप थीं. वे सब मेरे पास आईं, तो कमला भी साथ में थी. सब ने वही बात बताई, जो मैं पहले ही सुन चुकी थी.

अचानक कमला आगे आ कर बोली, ‘मैडम, अब तो मैं इन के साथ खेल लूं? अब तो मैं गंगा नहा आई.’

मगर मेरे दिमाग में बचपन से ही जाति भेद घुट्टी की तरह पिलाया गया था, वह उस वक्त बुरी तरह से उबाल मार रहा था. मैं बिगड़ कर बोली, ‘गंगा भी तुम ने गंदी कर दी… तुम तो फिर भी वही अछूत हो.’

यह सुन कर वह रोने लगी और भाग कर क्लास में चली गई.

मैं ही नहीं, हर टीचर उसे इसी निगाह से देखती थीं. बात आईगई हो गई. कमला 2 साल बाद उसी दबेघुटे माहौल में रह कर, तमाम तकलीफों के बावजूद हाईस्कूल के इम्तिहान में जिलेभर में अव्वल आई. उसी दौरान मेरे पति का तबादला हो गया.

अब उसी कमला को इस रूप में देख कर मैं बीती बातों को याद कर के सिहर गई थी.

मेरे रिटायर इंजीनियर पति सीधेसादे, शरीफ इनसान थे. वे अपने बेटे का केस उस उद्योगपति से कभी भी नहीं जीत सकते थे. ऐसी हालत में मेरी सारी उम्मीदें ‘जन कल्याण केंद्र’ पर टिकी थीं.

तकरीबन 15 दिन गुजर गए, मगर कमला देवी की तरफ से कोई खबर न आई. मुझे यकीन हो गया कि कमला देवी मेरा काम नहीं करेंगी.

एक दिन टेलीफोन की घंटी बजी. मैं ने फोन उठाया, तो कमला देवी बोलीं, ‘‘मैडम नमस्ते, माफ कीजिएगा, मैं दूसरे कामों में मशगूल थी, मगर आप की ओर से लापरवाह हरगिज नहीं थी. आप का काम होने ही वाला है. क्या आप कल मेरे दफ्तर आ सकती हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘बताओ, कब आऊं?’’

वे बोलीं,  ‘‘दोपहर को किसी भी समय आ जाइएगा.’’

अगले दिन दोपहर को जब मैं कमला देवी के दफ्तर पहुंची, तो उन्होंने उठ कर मेरा स्वागत किया और चाय को पूछा.

मैं सकुचा गई, तो वे बोलीं, ‘‘नहीं मैडम, ऐसा कुछ नहीं है. मैं पंडितजी से कह कर चाय मंगवाऊंगी.’’

मैं शर्म से जमीन में गड़ी जा रही थी. मगर कमला देवी साफ दिल की थीं, इसलिए उन का इरादा मेरी बेइज्जती करने का नहीं था.

जब चाय आई, तो मैं ने चुपचाप उठा कर पी ली. फिर मैं ने उन से पूछा,  ‘‘अब बताओ, आप इस मुकाम तक कैसे पहुंचीं?’’

वे सोचते हुए बोलीं,  ‘‘मैडम, मैं एमए तक लगातार अव्वल आई. जब शादी की बात चलती, तो कोई अच्छा लड़का नहीं मिला. इस बीच मेरे बाबा की मौत हो गई. मैं ने बहुत सोचासमझा और फिर यहां दिल्ली में आ कर यह  ‘जन कल्याण केंद्र’ खोल कर जनता की सेवा में जुट गई.

‘‘पहले यह एक छोटी सी संस्था थी, मगर मैं ने अपना तनमनधन इस में लगा दिया. बहुत मेहनत की… नतीजा आप देख ही रही हैं.

‘‘जहां तक शादी करने का सवाल था, तो मेरे साथ समाजसेवा करने वाला कोई मिलता ही न था. फिर किसी और जाति का होता, तो मुझ अछूत से शादी कैसे करता? चाहे मुझ में लाख गुण सही, मगर जाति से तो मैं अछूत ही थी.’’

मैं नजरें झुकाए सब चुपचाप सुनती रही, फिर बात बदलते हुए मैं ने पूछा,  ‘‘अच्छा, यह तो बताओ, आप ने मेरा काम इतनी जल्दी कैसे कर दिया?’’

वे बोलीं, ‘‘मैडम, आप ही पढ़ाया करती थीं,  ‘‘गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु…’’

उन के इन लफ्जों से एक तमाचा सा मुझे लगा. मुझे महसूस हुआ, जैसे एकबारगी मेरा वजूद हिल गया है. मेरे पढ़ाए को जिंदगी में उतारने वाली इस अछूत कन्या की दया की याचिका अब मैं खुद थी, जो खुद तो सारी उम्र सब को पढ़ाती रही, लेकिन खुद उस को अपनी जिंदगी में उतार न पाई.

मैं पसीने से भीग गई. उस पल चाहा कि जमीन फट जाए और मैं उस में समा जाऊं. अपनी  ‘गंगा’ वाली बात याद कर के तो मैं शर्म से पानीपानी हो गई और बोझिल मन से घर वापस आ गई.

कमला देवी की कोशिशों के कारण ही उस गुंडों के मुखिया को कालेज से निकाल दिया गया था और मेरे बेटे को दोबारा दाखिला मिल सका.

अगले दिन मैं ने कमला देवी को फोन किया,  ‘‘मैं जानती हूं, आप हमेशा काम में जुटी रहती हैं… मगर क्या आप समय निकाल कर शाम को मेरे घर आ सकती हैं?’’

वे बोलीं, ‘‘जी मैडम, मैं जरूर आऊंगी.’’

मैं शाम होने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी.

कमला देवी जब अपनी गाड़ी से उतरीं, तो मैं उन्हें आदर से अंदर ले गई और खुद चाय बना कर लाई.

कमला देवी बोलीं, ‘‘मैडम, आप ने क्यों इतनी परेशानी उठाई?’’

‘‘मैं किन शब्दों में आप का धन्यवाद करूं…’’

कमला देवी हंसती हुई बोलीं,  ‘‘मैडम, यह आप को क्या हो गया है?’’

मैं लाजसंकोच छोड़ कर बोली,  ‘‘सच, आज आप को देख कर लगता है कि आप कितनी निर्मल, कितनी पवित्र थीं? अगर आप गंदे तालाब को भी छू दो, तो वह गंगा बन जाए.’’

वे चुप रहीं. कुछ देर बातें करने के बाद जब वे विदा ले कर चलीं, तो उन की तरफ देखते हुए मुझे लग रहा था कि उन के ऊपर मेरे द्वारा चिपकाया गया  ‘अछूत’ नाम का धब्बा तेजी से धुंधला होता जा रहा था.  Hindi Social Story

— वंदना कश्यप

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