Hindi short Story. पिछले दिनों मैं देहरादून ऐक्सप्रैस ट्रेन से दिल्ली से कोटा जा रहा था. ट्रेन में भीड़ थी और ऊपर से गरमी. फिर भी रिजर्वेशन होने से मु झे ऊपर की बर्थ मिल गई थी.
मेरे सामने वाली बर्थ पर एक यात्री सो रहा था. उठने पर मैं ने बात की, तो मालूम हुआ कि वह कश्मीर का है और मुंबई जा रहा है.
बातचीत के दौरान पता चला कि वह अनपढ़ था, पर मुझे वह दिलचस्प लगा. उस का नाम अब्दुल रसीद था.
मैं ने उस से कहा, ‘‘भाई, तुम इस उम्र में भी इतने रंगीनमिजाज हो.’’
वह बोला, ‘‘भाईजान, यह सच है कि ऊपर वाले ने रंगीनमिजाजी मर्दों को ही सौंपी है. जिसे यह चीज हासिल नहीं, वह आदमी काहे का.’’
मु झे लगा कि वह मु झ पर बातचीत में भारी पड़ रहा है. उस ने कहा कि वह गुनाह करना बुरा नहीं मानता, तो मैं हैरान हुए बिना नहीं रहा.
वह फिर बोला, ‘‘जनाब, मेरी नजर में गुनाह का संबंध इनसान की रूह के साथ है, जान के साथ नहीं. मैं किसी की इज्जत लूटता हूं, चोरी करता हूं, तो उस की रूह को तकलीफ पहुंचाता हूं. यह अपराध है. मगर मैं किसी नापाक इनसान की जान लेता हूं, तो यह गुनाह नहीं है.’’
मु झे लगा कि बहसबाजी में मैं उस के सामने कमजोर पड़ रहा हूं.
मैं ने उस से कहा, ‘‘भाई, बुरे काम का नतीजा तो आखिर बुरा ही होता है.’’
उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा क्या है, बुरा क्या है, इस का अंदाजा आदमी ही लगाता है. दुनिया में कौन अपनेआप को बुरा कहता है, सभी हमाम में नंगे हैं. जब तक मौका नहीं मिलता, सभी शरीफ बने फिरते हैं. गुनाह करने पर भी शरीफ बनने का ढोंग करते हैं.
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