अपनी गलतियों और कमजोर प्रशासनिक क्षमता पर परदा डालने के लिए जिम्मेदार नेताओं के मुंह से भगवान की इच्छा जैसी बातें सुन कर लगता है कि हम लोकतांत्रिक नहीं, बल्कि काल्पनिक पौराणिक व्यवस्था में जी रहे हैं.