क्या काँग्रेस अपना परचम फिर लहरा पाएगी

गुजरात व हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं के, दिल्ली की म्युनिसिपल कमेटी के, उत्तर प्रदेश, बिहार व उड़ीसा के उपचुनावों से एक बात साफ है कि न तो भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ कोई बड़ा माहौल बना है और न ही भारतीय जनता पार्टी इस देश की अकेली राजनीतिक ताकत है. जो सोचते हैं कि मोदी है तो जहां है वे भी गलत हैं और जो सोचते हैं कि धर्म से ज्यादा महंगाई बीरोजगारी, ङ्क्षहदूमुसलिम खाई से जनता परेशान है, वे भी गलत है.

गुजरात में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सीटें बढ़ा ली क्योंकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में बोट बंट गई. गुजरात की जनता का बड़ा हिस्सा अगर भाजपा से नाराज है तो भी उसे सुस्त कांग्रेस औैर बडबोली आम आदमी पार्टी में पूरी तरह भरोसा नहीं हुआ. गुजरात में वोट बंटने का फायदा भारतीय जनता पार्टी को जम कर हुआ और उम्मीद करनी चाहिए कि नरेंद्र मोदी की दिल्ली की सरकार अब तोहफे की शक्ल में अरङ्क्षवद केजरीवाल को दिल्ली राज्य सरकार और म्यूनिसिपल कमेटी चलाने में रोकटोक कम कर देंगे. उपराज्यपाल के भाषण केंद्र सरकार लगाकर अरङ्क्षवद केजरीवाल को कीलें चुभाती  रहती है.

कांग्रेस का कुछ होगा, यह नहीं कहा जा सकता. गुजरात में हार धक्का है पर हिमाचल की अच्छी जीत एक मैडल है. हां यह जरूर लग रहा है कि जो लोग भारत को धर्म, जाति और बोली पर तोडऩे में लगे है, वे अभी चुप नहीं हुए है और राहुल गांधी को भारत जोड़ो यात्रा में मिलते प्यार और साथ से उन्हें कोर्ई फर्क नहीं पड़ता.

देशों को चलाने के लिए आज ऐसे लोग चाहिए जो हर जने को सही मौका दे और हर नागरिक को बराबर का समझें. जो सरकार हर काम में भेदभाव करे और हर फैसले में धर्म या जाति का पहलू छिपा हो, वह चुनाव भले जीत जाए, अपने लोगों का भला नहीं कर सकती. धर्म पर टिकी सरकारें मंदिरों, चर्चों का बनवा सकती हैं पर नौकरियां नहीं दे सकीं. आज भारत के लाखों युवा पढऩे और नौकरी करने दूसरे देशों में जा रहे हैं और विश्वगुरू का दावा करने वाली सरकार के दौरान यह गिनती बढ़ती जा रही है. यहां विश्व गुरू नहीं, विश्व सेवक बनाए जा रहे हैं. भारतीय युवा दूसरे देशों में जा कर वे काम करते हैं जो यहां करने पर उन्हें धर्म और जाति से बाहर निकाल दिया जाए.

अफसोस यह है कि भाजपा सरकार का यह चुनावी मुद्दा था ही नहीं. सरकार तो मान अपमान, धर्म, जाति, मंदिर की बात करती रही और कम से कम गुजरात में तो जीत गई.

देश में तरक्की हो रही है तो उन मेहनती लोगों की वजह से जो खेतों और कारखानों में काम कर रहे हैं और गंदी बस्तियों में जानवरों की तरह रह रहे हैं. देश में किसानों के मकान और जीवन स्तर हो या मजदूरों का उस की ङ्क्षचता किसी को नहीं क्योंकि ऐसी सरकारें चुनी जा रही है जो इन बातों को नजरअंदाज कर के धर्म का ढोल पीट कर वोट पा जाते हैं.

ये चुनाव आगे सरकारों को कोई सबक सिखाएंगे, इस की कोई उम्मीद न करें. हर पार्टी अपनी सरकार वैसे ही चलाएगी. जैसी उस से चलती है. मुश्किल है कि आम आदमी को सरकार पर कुछ ज्यादा भरोसा है कि वह अपने टूटफूट के फैसलों से सब ठीक कर देगी. उसे लगता है तोडज़ोड़ कर बनाई गई महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, मध्यप्रदेश जैसी सरकारें भी ठीक हैं. चुनावों में तोडफ़ोड़ की कोई सजा पार्टी को नहीं मिलती. नतीजा साफ है जनता को सुनहरे दिनों को भूल जाना चाहिए. यहां तो हमेशा धुंधला माहौल रहेगा.

राजस्थान: राजनीति की भेंट चढ़ी श्रद्धांजलि सभा  

कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला को श्रद्धांजलि देने के लिए 12 सितंबर, 2022 को पुष्कर में एक श्रद्धांजलि सभा हुई. इस सभा में कांग्रेस सरकार के मंत्री अशोक चांदना पर जूतेचप्पल फेंके गए, लेकिन सब से बड़ी बात यह कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को भाषण नहीं देने दिया गया.

जिस बेटे का पिता मुख्यमंत्री हो, उसे अपने पिता के शासन वाले राज्य में भाषण नहीं देने दिया जाए, इस से बड़ी कोई राजनीतिक घटना नहीं हो सकती. 12 सितंबर को पुष्कर में गुर्जरों की सभा में जोकुछ भी हुआ, उस से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को राजस्थान के हालात का अंदाजा लगा लेना चाहिए. ऐसे हालात तब हैं, जब महज 14 महीने बाद वहां विधानसभा चुनाव होने हैं.

सवाल उठता है कि आखिर मुख्यमंत्री के बेटे और सरकार के मंत्रियों को ले कर गुर्जर समुदाय में इतना गुस्सा क्यों है? सब जानते हैं कि जुलाई, 2020 के राजनीतिक संकट के समय मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बरखास्त उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को धोखेबाज, नालायक और मक्कार तक कहा था. यह बात अलग है कि साल 2018 में गुर्जर समुदाय के सचिन पायलट के चलते ही प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी थी.

सचिन पायलट के मुख्यमंत्री बनने को ले कर गुर्जर समुदाय में इतना उत्साह था कि भाजपा के सभी गुर्जर उम्मीदवार चुनाव हार गए थे. पर सचिन पायलट के बजाय अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने से गुर्जर समाज में नाराजगी देखी गई. यह नाराजगी तब और ज्यादा बढ़ गई, जब अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को नालायक कहा था.

अशोक गहलोत मानें या न मानें, लेकिन जुलाई, 2020 में जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया, उसी का नतीजा रहा कि गुर्जरों की सभा में वैभव गहलोत को बोलने तक नहीं दिया गया. सवाल यह भी है कि आखिर वैभव गहलोत गुर्जरों की सभा में क्यों गए?

जानकारों के मुताबिक, पुष्कर को अपनी जागीर मानने वाले आरटीडीसी के अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौड़ की रणनीति के तहत वैभव को गुर्जरों की सभा में लाया गया. इस के लिए उन्होंने ही कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के बेटे विजय बैंसला से वैभव को फोन करवाया. धर्मेंद्र राठौड़ ने ही अशोक गहलोत को बताया था कि वे वैभव को गुर्जरों की सभा में ले जा रहे हैं.

धर्मेंद्र राठौड़ को उम्मीद थी कि वैभव गहलोत बड़ी शान से गुर्जरों को संबोधित करेंगे, लेकिन सभा में जो उपद्रव हुआ, उस में धर्मेंद्र राठौड़ और वैभव गहलोत को पुलिस संरक्षण में सभा स्थल से महफूज जगह पर जाना पड़ा.

12 सितंबर, 2022 को पुष्कर के मेला मैदान में गुर्जर आरक्षण आंदोलन के मुखिया रहे कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला को श्रद्धांजलि देने का कार्यक्रम था. यह पूरी तरह सामाजिक आयोजन था, लेकिन सभा से पहले ही कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के बेटे विजय बैंसला ने राजनीति शुरू कर दी.

विजय बैंसला ने जिस तरह राजनीतिक बयानबाजी की, उस से सभा का माहौल और गरम हो गया. यही वजह रही कि अनेक नेताओं ने राजनीतिक भाषण दिया. नतीजतन, यह सभा श्रद्धांजलि सभा से ज्यादा राजनीतिक मंच बन गई.

जब कांग्रेस सरकार के खेल मंत्री अशोक चांदना और उद्योग मंत्री शकुंतला रावत (गुर्जर) भाषण देने आए, तो उपद्रव हो गया. राजनीतिक भाषणबाजी के चलते कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला को श्रद्धांजलि भी नहीं दी जा सकी. कहा जा सकता है कि राजनीतिक दलों की आपसी खींचतान की वजह से श्रद्धांजलि सभा राजनीति की भेंट चढ़ गई.

12 सितंबर, 2022 को जिस तरह पुष्कर में उपद्रव के दौरान सरकार के मंत्रियों को बोलने तक नहीं दिया गया, उस मामले में अब अजमेर प्रशासन पर गाज गिर सकती है. जानकार सूत्रों के मुताबिक, पुष्कर मामले को ले कर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत गंभीर हैं. यह माना जा रहा है कि हालात को भांपने में अजमेर प्रशासन नाकाम रहा.

मुख्यमंत्री की कबड्डी

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इन दिनों चौतरफा घिरे हुए हैं और विरोधियों से अकेले ही जूझ रहे हैं. चेहरे पर निराशा का भाव न आए, इसलिए 14 सितंबर, 2022 को उदयपुर के गोगुंदा में आयोजित ग्रामीण ओलिंपिक खेलों में उन्होंने खुद भी नौजवानों के साथ कबड्डी खेली.

अशोक गहलोत की उम्र 71 साल के पार है और अब कबड्डी जैसा जोखिम भरा खेल खेलना मुमकिन नहीं है, लेकिन विरोधियों को चुनौती देने के लिए अशोक गहलोत ने गोगुंदा में कबड्डी खेली.

दरअसल, अशोक गहलोत को भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के असंतुष्टों से खतरा है.

12 सितंबर, 2022 को पुष्कर में आयोजित गुर्जरों के प्रोग्राम में जिस तरह से पुत्र वैभव गहलोत और सरकार के मंत्रियों को बोलने तक नहीं दिया गया, उस से जाहिर है कि अशोक गहलोत को अपनों से ही ज्यादा परेशानी है.

कांग्रेस के नेताओं को जब मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना, मुफ्त दवा और जांच, सवा करोड़ महिलाओं को मुफ्त स्मार्टफोन, मनरेगा की तरह शहरी क्षेत्रों में युवाओं को 100 दिन के रोजगार देने की गारंटी, बिजली के बिल में मोटी सब्सिडी जैसी योजनाओं का प्रचार करना चाहिए, तब कांग्रेस के ही नेताओं और विधायक गुर्जरों के प्रोग्राम में मंत्रियों और वैभव गहलोत को नहीं बोलने देने का मुद्दा उछाल रहे हैं.

सब जानते हैं कि अशोक गहलोत पिछले एक साल से कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय हैं. दिल्ली जा कर केंद्र सरकार के खिलाफ मोरचा खोलने का नतीजा ही है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अशोक गहलोत के गृह जिले जोधपुर में आ कर सार्वजनिक सभा की.

इतना ही नहीं, अशोक गहलोत के गृह राज्य मंत्री राजेंद्र यादव के परिवार के सदस्यों के व्यावसायिक ठिकानों पर इनकम टैक्स के छापे बताते हैं कि आने वाले दिनों में अशोक गहलोत के मंत्रियों व पहचान वालों पर छापामार कार्यवाही होगी.

राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का ऐसा कोई नेता नहीं है, जो चौतरफा घिरे अशोक गहलोत का बचाव कर सके. कांग्रेस का नेतृत्व करने वाले गांधी परिवार का बचाव तो खुद अशोक गहलोत ही कर रहे हैं. कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर पर अशोक गहलोत के मुकाबले कोई नेता नहीं है, इसलिए उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव है. पर पुष्कर में वैभव गहलोत और उन के मंत्रियों के साथ जो गलत बरताव हुआ है, उस से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बेहद आहत हैं.

पुष्कर में सचिन पायलट समर्थकों ने ही अपनी भावनाओं को प्रदर्शित किया था. 12 सितंबर, 2022 की घटना के बाद अभी तक दोनों नेताओं की प्रतिक्रिया का सामने न आना बहुतकुछ दिखा रहा है. अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जो राजनीतिक संघर्ष चल रहा है, उस के नतीजे अब जल्द ही देखने को मिलेंगे.

हर पटवारी बेईमान होता है!

हमारे देश के कितने ही गांव, शहर, कसबे, जाति के लोग बेईमान माने जाते हैं. इन लोगों को बारबार जन्मजात बेईमान बताया जाता है. गालियां देते समय इन की जाति, शहर या राज्य का नाम ले कर कहा जाना आम है कि तुम तो वहां के हो, इसलिए बेईमान होगे ही.

भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने खिलाफ राजनीति में जुड़े हर जने पर ईडी, सीबीआई, पीएमएलए, एनआईए, पुलिस को लगा कर अपना उल्लू तो सीधा कर रही है पर इस चक्कर में खुदको भी गहरा काला पोत रही है. यह सोच हरेक के मन में पक्की होती जा रही है कि जिस के पास सत्ता है, पावर है, कुछ कर सकता है, वह ऊपर की भरपूर कमाई कर रहा है, उस के यहां तो कमरे भरे पड़े हैं.

अगर वह भारतीय जनता पार्टी में है तो उस पर रेड न होने की वजह से जनता उसे शरीफ मान लेगी, यह नामुमकिन है. जब बहुत से मंत्री, मुख्यमंत्री, अफसर, उद्योगपति, ठेकेदार चपेट में आ चुके हों तो कुछ बचे होंगे, यह भी पक्का माना जाएगा कि भारतीय जनता पार्टी का हर मंत्री भी बेईमान होगा.

कोई ऐसे ही केवल दिल बदलने से वर्षों पुरानी पार्टी से नाता नहीं तोड़ता. उसे मंत्री पद का लालच भी तभी दिया जा सकता है जब वह मंत्री न हो. यहां तो भाजपा दूसरी पार्टी के मंत्रियों को अपने में मिला कर मंत्री बना रही है तो मतलब साफ है कि उन्हें मंत्री बनने के साथसाथ कुछ और मिला होगा. यह वही कुछ और जिसे ढूंढ़ने के अवसर भाजपा सरकार अपने विरोधियों की पार्टी वालों को भेज रही है.

जनमानस में यह तो हमेशा से था कि हरेक पार्टी बेईमान है पर कांग्रेस महाबेईमान है, यह 2014 तक विनोद राय जैसे कंपट्रोलर जनरल ने नकली, झूठी, विश्वासघात करने वाली साजिशों भरी रिपोर्टें दे कर साबित कर दिया था. जिस तरह 2014 में जीतने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उसे हाथोंहाथ लिया, साबित हो गया कि वह नितांत बेईमानी वाली रिपोर्ट थी और आज जिस तरह वे ऊंचे पद पर बैठे हैं उस से भी साबित है कि इनाम भी मिला.

हमारे देश में शराफत को भाव कभी अच्छा नहीं मिला. धर्म हमेशा कहता रहा कि हर जजमान तो पाप करता ही रहता है और जब तक दानदक्षिणा न दो इस पाप से मुक्ति नहीं मिलेगी. गोदान इसी पाप से मरने के बाद पिंड को यमराज के प्रेतों के जुल्मों से बचाने के लिए किया जाता है. गरुड़ पुराण भरा है उन कष्टों के बखानों से जो यम के दूत देते हैं और उन तरीकों से भी जो दान की वजह से मिलते हैं, पर इस से क्या दान लेने वाला बेईमान नहीं हो जाता?

जो लोग पापी से दान लेते हैं वे पापी के पार्टनर हुए न. अगर 20 नेताओं के यहां रेड पड़ती है, 2-3 के यहां करोड़ों मिलते हैं, 18 के मामले बरसों चलते रहते हैं तो क्या साबित नहीं होता कि सभी नेता चाहे किसी पार्टी के हैं, बेईमान हैं? आज सत्ता में सब से ज्यादा नेता भाजपा के हैं, सब से ज्यादा सरपंच भाजपा के हैं, सब से ज्यादा जिला अध्यक्ष भाजपा के हैं, सब से ज्यादा विधायक भाजपा के हैं, सब से ज्यादा सांसद भाजपा के हैं, सब से ज्यादा मंत्री भाजपा के हैं. वे शराफत के पुतले होंगे जबकि उन के जैसे दूसरी हर पार्टी के विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री काले हैं, यह तो सोचना ही गलत है. भाजपा अपना नुकसान ज्यादा कर रही है. भाजपा हर सुबह बता देती है कि किसी विधायक, मंत्री, सांसद पर भरोसा न करो, उस ने जनता का पैसा खाया होगा.

हर नेता पटवारी की तरह का है क्योंकि यह मान लिया गया है कि हर पटवारी बेईमान होता है.

भाजपा की कमजोर कड़ी है पश्चिमी इलाका

उत्तर प्रदेश  भाजपा की   शैलेंद्र सिंह  कमजोर कड़ी है  पश्चिमी इलाका भारतीय जनता पार्टी को यह पता है कि अगर वोट जातीय आधार पर पड़ेंगे, तो उसे नुकसान होगा. ऐसे में उस की पहली कोशिश यह रहती है कि वोट धर्म के आधार पर पड़ें. साथ ही, वह जातियों में भी एकजुटता नहीं रहने देना चाहती है.  उत्तर प्रदेश में जाट बिरादरी ऐसी है, जिस के पास केवल लोकदल का सहारा रहता है. अब भाजपा इस में सेंधमारी करने की कोशिश कर रही है. इस योजना के तहत भाजपा ने अपना प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश संगठन मंत्री पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रहने वालों को बनाया है.

भारतीय जनता पार्टी ने 2022 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीत कर लगातार दूसरी बार बहुमत की सरकार बनाने में कामयाबी हासिल कर ली थी. इस के बाद भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ले कर उस के मन में डर बैठा हुआ है.  भाजपा को इस बात का भरोसा नहीं है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट समाज भाजपा के पक्ष में ही वोट देगा. भाजपा की बहुत सारी कोशिशों के बाद भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जिस में जाट बिरादरी का बहुमत ज्यादा है, को वह अपने पक्ष में खड़ा नहीं देख रही है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल की साख बनी हुई है. चौधरी अजित सिंह के बाद उन के बेटे जयंत चौधरी ने जाट समाज पर अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में लोकदल और समाजवादी पार्टी गठबंधन ने अपना असर दिखा दिया था.

अगर बहुजन समाज पार्टी ने विधानसभा चुनाव में अपनी भूमिका सही से दिखाई होती, तो भाजपा का जीतना मुश्किल हो जाता. भाजपा साल 2024 के लोकसभा चुनावों में कोई ऐसा खतरा नहीं मोल लेना चाहती, जिस से उसे किसी दूसरे दल पर निर्भर रहना पड़े. राजनीति में कोई भी स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता. विपक्षी एकता के असर में अगर बसपा, सपा और लोकदल एक ही मंच पर आ गए और दलितपिछड़ों में यादव और जाटव समाज के साथ दूसरी जातियां भी एक मंच पर खड़ी हो गईं, तो भाजपा के लिए दिक्कत हो सकती है. जाट बिरादरी को खुश करने के लिए ही भारतीय जनता पार्टी ने चौधरी भूपेंद्र सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. वैसे, वे पहले योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री थे.

उन्होंने साल 1991 में भाजपा का साथ पकड़ा था और मेहनती नेता कहलाते हैं. खराब हालात में भी उन की मेहनत से साल 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा इस बैल्ट की 126 सीटों में से  85 सीटें जीतने में कामयाब हो गई थी. अब साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उत्तर प्रदेश की सभी लोकसभा 80 सीटें जितने का लक्ष्य रख रही है. ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश को खुश करना सब से ज्यादा जरूरी है. इस के लिए ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले चौधरी भूपेंद्र सिंह को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है. पश्चिम से ही हैं संगठन मंत्री भाजपा ने प्रदेश संगठन मंत्री के रूप में सुनील बंसल की जगह पर बिजनौर जिले की नगीना तहसील के रहने वाले धर्मपाल सिंह को जिम्मेदारी दी है. इस का मतलब यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ही भाजपा ने अपना प्रदेश  अध्यक्ष चौधरी भूपेंद्र सिंह को बनाया है और यहीं से धर्मपाल सिंह को संगठन मंत्री बना दिया है.  भाजपा में संगठन मंत्री का पद बहुत खास पद होता है. इस की वजह यह है कि भाजपा का संगठन मंत्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूर्णकालिक सदस्य होता है. इस पद पर वही रहता है, जो संघ का सदस्य हो. इस के पहले यह पद सुनील बंसल के पास था, जिन को ‘सुपर सीएम’ कहा जाता था.

सत्ता के इसी असर की वजह से सुनील बंसल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच संबंध सहज नहीं रहते थे. भाजपा के मंत्री और नेता योगी आदित्यनाथ से ज्यादा सुनील बंसल को अहमियत देते थे.  इस से भाजपा में संगठन मंत्री की ताकत को समझा जा सकता है. यह पद ऐसा है, जिस पर संघ तबादले करता है. धर्मपाल सिंह इस के पहले झारखंड भाजपा के प्रदेश संगठन मंत्री थे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अहमियत को बढ़ाने के लिए भाजपा ने अपना प्रदेश अध्यक्ष और संगठन मंत्री दोनों ही एक इलाके से दे दिए हैं. इस दांव से वह जाट बिरादरी के बीच अपनी पैठ और मजबूत करना चाहती है.  पश्चिमी उत्तर प्रदेश का असर केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि इस की सीमा से लगे दिल्ली और हरियाणा तक भी होता है. ऐसे में ये दोनों ही नेता काफी असरदार साबित हो सकते हैं. इन को संगठन का अनुभव भी है. इस वजह से ये अच्छा चुनाव लड़ा सकते हैं, जिस से भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ज्यादा लोकसभा सीटें मिल सकती हैं.

क्या नरेंद्र मोदी -“पानीदार नहीं रहे”

जिस रास्ते पर आज भारतीय जनता पार्टी के नेता चल रहे हैं अगर अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी यही करती तो आज देश में भारतीय जनता पार्टी तो क्या अन्य दूसरी पार्टियां के कोई नामलेवा भी नहीं होते और उनकी राजनीति के गर्भ में ही भ्रूण हत्या हो जाती.

मगर कांग्रेस के नेताओं ने चाहे पंडित जवाहरलाल नेहरु हों अथवा श्रीमती इंदिरा गांधी अथवा अन्य ने लोकतंत्र पर सदैव विश्वास आस्था रखी और विपक्ष की विचारधारा को सदैव सम्मान दिया. गोवा में जिस तरह 8 विधायकों बदल बदल हुआ है और घटनाक्रम सामने आया है उससे एक सबसे बड़ा प्रश्न आज यह उठ खड़ा हुआ है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी क्या अब पानीदार नहीं रहे हैं.

दरअसल, सत्ता और विपक्ष लोकतंत्र के दो ऐसे पहिए हैं जिनके बूते देश आगे बढ़ता है अगर सत्ताधारी यह समझ ले और ठान लें कि विपक्ष को निर्मूल करना है तो यह संभव है. मगर इससे जिस तानाशाही का जन्म होगा वह न तो देश के हित में हैं और ना ही देश के लोकतंत्र के हित में. गोवा में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के 8 विधायकों का जिस तरह इस्तीफा दिलवा भाजपा प्रवेश करवाया गया है राजनीति के इतिहास में शर्मनाक घटना के रूप में याद किया जाएगा.

सवाल है, आज देश में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार है तो देश किस दिशा में अग्रसर होगा एक तरफ है लोकतंत्र तो दूसरी तरफ है नाजी हिटलर शाही शासन .भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है हमें गर्व करते हैं कि भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है जहां सभी संविधानिक दायित्व के तहत देश के चारों स्तंभ अपने अपने कर्तव्य निर्वहन करते हैं. मगर आज स्थिति जैसी बनाई जा रही है उसे लोकतंत्र के लिए हितकारी कभी नहीं कहा जा सकता.

दरअसल, दलबदल एक ऐसा मसला है जिस पर किसी का कोई अंकुश नहीं है गोवा के मामले में यह आज सामने है. वहां सभी विधायकों को ईश्वर के नाम पर शपथ दिलाई गई थी और सभी ने यह कसम खाई थी कि हम दल बदल नहीं करेंगे मगर बड़े ही हास्यास्पद स्थिति में जिसे देश में देखा है गोवा में विपक्ष को खत्म करने का खेल हो गया.

गोवा और भारत जोड़ो यात्रा

भारत जोड़ो यात्रा के साथ राहुल गांधी ने जिस तरह देश को संदेश दिया है उससे कांग्रेस की स्थिति मजबूत बनने लगी है माना जा रहा है, शायद इसी से घबरा करके भाजपा ने गोवा में यह खेल किया  है.

कांग्रेसी नेता पवन खेड़ा में बड़ी गहरी बात कही है – “सुनाई है भारत जोड़ो यात्रा से बौखलाई भाजपा ने गोवा में “ऑपरेशन कीचड़” आयोजित किया है. सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो… जो भारत जोड़ने के इस कठिन सफ़र में साथ नहीं दे पा रहे, वो भाजपा की धमकियों से डर कर तोड़ने वालों के पास जाएं तो यह भी समझ लें कि भारत देख रहा है.’”

सचमुच आज देश में जिस तरह की गंदली राजनीति प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी कि भारतीय जनता पार्टी उनके संरक्षण में कर रही है यह सब कभी भुलाया नहीं जा सकेगा और आने वाला समय प्रत्युत्तर तो मांगेगा ही.

ईश्वर के नाम पर शपथ लेकर के विधायकों ने संकल्प लिया था कि हम दल बदल नहीं करेंगे अब जब यह खेल हो गया है तब गोवा मे सत्तारूढ़ भाजपा के पास होंगे 40 में से 33 विधायक हो गए हैं .

मार्च2022  में सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी के साथ कांग्रेस के विधायक दल के विलय के साथ, तटीय राज्य में सत्तारूढ़ दल के पास 40 में से 33 विधायक हो गए हैं इनमें से 20 विधायक बीजेपी के टिकट पर जीते हुए हैं, 2 विधायक महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी से और तीन निर्दलीय जिन्होंने बीजेपी को समर्थन दिया. इसके पहले माइकल लोबो और कामत पर जुलाई में पहली बार जब वो दलबदल करना चाह रहे थे तब कांग्रेस पार्टी ने उनका ये प्रयास विफल कर दिया था.

अब  कांग्रेस के साथ रहने वाले तीन विधायक अल्टोन डी’कोस्टा, यूरी अलेमाओ और कार्लोस फरेरा हैं. कांग्रेस विधायकों ने फरवरी विधानसभा चुनाव से पहले एक मंदिर और एक चर्च सहित विभिन्न पूजा स्थलों पर दलबदल को लेकर शपथ ली थी. इस संबंध में उन्होंने एक शपथ पत्र पर भी हस्ताक्षर किए थे.

गोवा फॉरवर्ड पार्टी के अध्यक्ष विजय सरदेसाई ने  जो कहा है वह सारे देश की आवाज है- “कांग्रेस के जिन आठ विधायकों ने सभी राजनीतिक औचित्य, बुनियादी शालीनता और ईमानदारी के खिलाफ, धन के अपने लालच और सत्ता की भूख को आगे बढ़ाने का फैसला किया है, वे आज अपने बेशर्म स्वार्थ, लोभ और कपट का प्रदर्शन करते हुए,सर्वशक्तिमान ईश्वर की अवहेलना करते हुए बुराई के प्रतीक के रूप में खड़े हैं.”

गहरी पैठ: गांवों की जमीनों को हथियाने की साजिश

देश के सब से पिछड़े राज्य बिहार ने हाल में दावा किया है कि उस ने जमीनों की मिल्कीयत का डिजिटल नक्शा एक सौफ्टवेयर के जरीए बना लिया है और जब भी कोई बदलाव मालिक का होगा, यह नक्शा अपनेआप बदल जाएगा और कोई भी विवाद खड़ा न होगा. फरवरी, 2021 में बिहार विधानसभा ने इस बारे में कानून पास किया था और केंचुए की स्पीड से चलने वाली नौकरशाही का दावा है कि अब यह लोगों के लिए लगभग तैयार है.

बिहार में सरकार के हिसाब से कोई 37,000 मामले जमीन की मिल्कीयत को ले कर चल रहे हैं. हर जना जो मेहनत से कमाए पैसे से जमीन खरीदना चाहता है, डरता रहता है कि कहीं उस का मालिक या दावेदार और कोई नहीं निकल आए. वर्षों बाद भी किसी पुराने दस्तावेज को चुनौती दे दी जाती है.

यह काम लोगों के भले के लिए किया जा रहा है, इस में पूरा शक है. असल में शहरों में रहने वालों की नजर अब गांवों की जमीनों पर फिर जा रही है जो पहले कोडि़यों के भावों में बिका करती थीं. अब इन के दाम लाखोंकरोड़ों में होने लगे हैं. रिश्वत या ऊपरी कमाई वाले शहरी बाबू, नेता, माफियाई और पैसे के भंडार वाली कंपनियां अब गांवों की जमीनों पर कब्जा चाहती हैं और उन्होंने कंप्यूटर टैक्नोलौजी को हथियार बनाया है.

बिहार का यह डिजिटल नक्शा करोड़ों की लागत में बना है. 20 जिलों के एरियल ड्रोनों और हवाईजहाजों से फोटो लिए गए, हर खसरे के कागज निकाल कर मिलान किए गए, 5,000 लोग इस काम में लगे ताकि 5,127 गांवों की जमीनों के 22,000 नक्शे तैयार हो सकें. यह सब काम जनता और किसानों के लिए किया गया हो, यह नामुमकिन है.

यह तो कंप्यूटर की मारफत पढ़ेलिखों की साजिश है जो कंप्यूटर नक्शों में हेरफेर आसानी से कर सकेंगे. बैंक उन के आधार पर कर्जदार की जमीन पर कब्जा जमा सकेंगे. बड़ी कंपनियां हजारों एकड़ जमीन खरीद कर इन के आधार पर कर्जदार की जमीन पर कब्जा जमा सकेंगे. बड़ी कंपनियां हजारों एकड़ जमीन खरीद कर अपना हक सुरक्षित रख सकेंगी. दलितों, अधपढ़ों, पिछड़ों को जिन्हें कंप्यूटर सम?ा नहीं आता बरगलाना और आसान हो जाएगा.

कंप्यूटर के रिकौर्डों का फायदा यह भी है कि कोई भी कंप्यूटर जानकार सौफ्टवेयर में हैकिंग कर के रिकौर्ड बदल दे और एक बार बदला गया रिकौर्ड पत्थर की लकीर बन जाता है. शहरी बाबू, शहरी कंप्यूटर ऐक्सपर्ट, शहरी पैसे वाले मनचाहा फैसला कंप्यूटर के हिसाब से ले सकते हैं.

जीएसटी और इनकम टैक्स में ऐसा होने लगा है कि लाखोंकरोड़ों की डिमांड निकल आती है. वर्षों पहले अगर सरकारी अफसरों ने अपने खाते ठीक नहीं किए तो जो गलती रह गई वह कंप्यूटर सौफ्टवेयर बनाने वाले जनता के सिर पर मढ़ देते हैं क्योंकि सरकारी दफ्तर से तो उन्हें मोटी कमाई प्रोग्राम बनाने से हो रही है.

बिहार का कंप्यूटरी नक्शा एक अच्छा कदम है पर इस का जो नुकसान आम लोग सहेंगे यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.

देशभर में अगर कंप्यूटरों की बिक्री हो रही है तो उस के पीछे सरकारी वरदहस्त है. आज कमाई करने वाली कंपनियों में कंप्यूटर सौफ्टवेयर कंपनियां हैं जो बिहार जैसे गरीब राज्य से 100-200 करोड़ छोटेछोटे कंप्यूटर प्रोग्रामों के ले जाती हैं. जनता वहीं रह रही है. उस की न बिजली ठीक है, न पानी, न सड़क, न रंगदारी, न रिश्वतखोरी कम. डिजिटल नक्शेबाजी पढ़ों और अधपढ़ों के बीच एक और खाई पैदा करेगी और जमीनों को हड़प करने का एक कदम बनेगी.

धर्म के अंधे दलित-पिछड़े भाजपा की जीत की गारंटी

रोहित

यह दोहा 14वीं ईसवी में उत्तर प्रदेश के काशी (बनारस) में जनमे संत रविदास का है. वही रविदास, जो अपने तमाम कथनों में धर्म की जगह कर्म पर विश्वास करते थे और पाखंड के खिलाफ थे. आज की भाषा में अगर उन्हें धार्मिक कट्टरवाद और पोंगापंथ के खिलाफ एक मिसाल माना जाए तो गलत नहीं होगा.

इस दोहे में भी रविदास साफ शब्दों में कहते हैं कि न मुझे मंदिर से कोई मतलब है, न मसजिद से, क्योंकि दोनों में ईश्वर का वास नहीं है.

रविदास निचली जाति से संबंध रखते थे और जूते सिलने का काम करते थे. उन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी, जहां शोषण, अन्याय और गैरबराबरी पर आधारित समाज नहीं होगा, कोई दोयम दर्जे का नागरिक नहीं होगा और न ही वहां कोई छूतअछूत होगा. अपने इस समाज को उन्होंने बेगमपुरा नाम दिया, जहां कोई गम न हो.

समयसमय पर संत रविदास जैसे महापुरुष धर्म पर आधारित सत्ता और पाखंड को चुनौती देते रहे और उन से प्रेरणा लेने वाली दबीशोषित जनता इन पाखंडों के खिलाफ खड़ी होती रही.

जैसे अपनेअपने समय में बुद्ध, कबीर और रविदास ने ब्राह्मणवाद को चुनौती दी, ऐसे ही आधुनिक काल में अय्यंकाली, अंबेडकर और कांशीराम जैसों ने भेदभाव की सोच को इस तरह खारिज किया, जिस से दलितपिछड़ों की आवाज सुनी और बोली जाने लगी.

इतने सालों की कोशिशों और टकरावों के बाद एक ऐसा समय भी आया, जब भले ही दलितपिछड़ों की हालत में बड़ा बदलाव न आया हो, पर देश की राजनीति से ले कर सत्ता तक इन जातियों के प्रतिनिधि संसद, विधानसभा में तो पहुंचे ही, साथ ही सरकार बनाने में भी कामयाब रहे, लेकिन आज हालात वापस पलटते दिखाई दे रहे हैं.

आज रविदास के बेगमपुरा जाने वाले रास्ते में ब्राह्मणवाद की गहरी खाई खुद गई है और इस खाई को खोदने वाले जितने सवर्ण रहे हैं, उस से कई ज्यादा खुद दलितपिछड़े हो गए हैं.

सवर्णों की बेबाकी की चर्चा तो हमेशा की जाती है, लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि दलितपिछड़ों की चुप्पी और भगवाधारियों पर मूक समर्थन की चर्चा की जाए, क्योंकि आज हालात ये हैं कि दलितपिछड़ों की राजनीति और उस के मुद्दे धार्मिक उन्माद के शोर में दब चुके हैं और इस की वजह भी वे खुद ही हैं.

5 राज्यों के चुनाव

10 मार्च, 2022 को 5 राज्यों के चुनावी नतीजे सामने आए. इन 5 राज्यों में से 4 राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में भगवाधारी भारतीय जनता पार्टी ने अपनी मजबूत वापसी की, वहीं पंजाब में कुल 117 सीटों में से

92 सीटें जीत कर आम आदमी पार्टी ने राज्य के पहले दलित मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया.

उत्तर प्रदेश में जहां एक तरफ भाजपा गठबंधन को 403 सीटों में से 273 सीटें, उत्तराखंड में 70 सीटों में से 47 सीटें, मणिपुर में 60 सीटों में से 32 सीटें और गोवा में 40 सीटों में से 20 सीटें मिलीं, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इन चुनावों में पूरी तरह से धराशायी हो गया.

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने अपने लैवल पर थोड़ीबहुत लड़ाई जरूर लड़ी, पर जिस तरह के कयास भारतीय जनता पार्टी को हराने के लगाए जा रहे थे, वे सब धूल में मिल गए.

उत्तर प्रदेश के अलावा भाजपा न सिर्फ दूसरे 3 राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रही, बल्कि उत्तर प्रदेश में तो उस का वोट फीसदी गिरने की जगह बढ़ गया और यह सब इसलिए मुमकिन हो पाया कि दलितपिछड़ों के एक बड़े तबके ने भाजपा को वोट दिए.

दलितपिछड़ा वोटर कहां

पहली बार ऐसा हुआ है कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी को महज एक सीट से संतोष करना पड़ा और उस का कोर वोटर इस अनुपात में किसी दूसरी पार्टी में शिफ्ट हुआ.

चुनाव में बुरी तरह हार का मुंह देखने के बाद बसपा मुखिया मायावती ने मीडिया के सामने कहा, ‘‘संतोष की बात यह है कि खासकर मेरी बिरादरी का वोट चट्टान की तरह मेरे साथ खड़ा रहा. मुसलिम समाज अगर दलित के साथ मिलता तो परिणाम चमत्कारिक होते.’’

यह तो वही बात हुई कि खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे. मायावती मुसलिमों और सपा पर हार का ठीकरा फोड़ने की जगह अगर इस बात को समझने पर जोर देतीं कि उन का कोर दलित वोटर भाजपा की तरफ कैसे खिसक गया तो शायद उन की जीरो होती राजनीति में यह आगे के लिए एक बेहतर कदम साबित होता. पर अपनी हार का सही विश्लेषण करने की जगह उन की टीकाटिप्पणी यही साबित कर रही है कि वे अभी तक यह नहीं समझ पाई हैं कि जिस तरह से बसपा और मायावती ने भाजपा जैसी हिंदूवादी पार्टी के साथ मेलजोल बढ़ाया है और जो अभी भी जारी है, उसी का  नतीजा है कि उस के अपने वोटरों ने भी भाजपा के धर्म के इर्दगिर्द जुड़े मुद्दों और पाखंडों से संबंध बना लिए हैं.

इसी का खमियाजा है कि बसपा को इस विधानसभा चुनाव में महज 12.8 फीसदी ही वोट मिले, जो पिछली बार के 22.9 फीसदी से 10 फीसदी कम हैं. जाहिर है कि ये वोट पूरी तरह से भाजपा के साथ गए. यह दिखाता है कि सवर्णपिछड़ा तबके के वोटों का जितना नुकसान सपा ने भाजपा का किया, उस से ज्यादा वोटों की भरपाई भाजपा ने बसपा के दलित वोटों को पाखंड के जाल में फंसा कर कर ली.

यह सब इसलिए हुआ कि जिस सियासी जमीन पर कभी कांशीराम ने दलित हितों के लिए बहुजन समाज पार्टी की बुनियाद रखी थी, मायावती ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा जैसी दलितों की वैचारिक दुश्मन संस्थाओं के साथ अपने रिश्तों को बढ़ा कर उस बुनियाद को खोखला करने का काम ही किया, जिस का सीधा नतीजा यह है कि वे दलित, जिन्हें सवर्णों के बनाए पाखंडों को चुनौती देनी थी, वे भी उन पाखंडों में रमते चले गए.

यहां तक कि भगवा भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए जहां बसपा को ताकत लगानी चाहिए थी, उसी बसपा ने 122 सीटों पर ऐसे उम्मीदवार खड़े किए, जिन का सीधा टकराव सपा के उम्मीदवारों से ही था. इन में से 91 मुसलिम बहुल और 15 यादव बहुल सीटें थीं. ये ऐसी सीटें थीं, जिन में सपा की जीत की ज्यादा उम्मीद थी, पर इन 122 सीटों में से 68 सीटें भाजपा गठबंधन ने जीतीं.

साफ है कि उत्तर प्रदेश में एक नया और बड़ा तबका भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में आया है. इसी तरह समाजवादी पार्टी को पिछड़ों के एक हिस्से ने भाजपा से अलग हो कर वोट जरूर दिया, पर यह इतना नहीं था कि भाजपा को चोट पहुंचा सके.

बसपा के वोट फीसद और सीटों के रुझान को देखें, तो यह पता चलता है कि भाजपा को पड़े और बढ़े वोट दलितों के ही बसपा से शिफ्ट हुए, जो आगे की राजनीति (लोकसभा चुनाव) में भाजपा के लिए वरदान और दलितपिछड़ों व अल्पसंख्यकों के लिए चिंता का सबब बनेंगे.

पोंगापंथ में फंसे दलितपिछड़े

5 राज्यों के चुनाव खासकर उत्तर प्रदेश के चुनाव से सीधेसीधे समझ आता है कि दलितपिछड़ों का एक बड़ा तबका भाजपा और संघ के पोंगापंथ में फंस चुका है. वह खुद नहीं समझ पा रहा है कि जिस पार्टी का समर्थन कर रहा है, वह न सिर्फ उस की वैचारिक दुश्मन है, क्योंकि संघ और भाजपा ब्राह्मणवादी संस्कृति से प्रभावित रहे हैं, बल्कि जिस हिंदुत्व के लिए वह भाजपा को समर्थन दे रहा है, उस हिंदुत्व की बुनियाद ही दलितपिछड़ों के शोषण पर टिकी हुई है, जो आज नहीं तो कल सामने आने वाला ही है.

यह बहुत हद तक सामने आने भी लगा है, क्योंकि रामराज्य से खुद को जोड़ रहा दलित समाज सरकारी संपत्तियों के बिकने पर अपने आरक्षण की चढ़ती भेंट को नहीं देख पा रहा है. वह यह नहीं समझ पा रहा है कि मंदिर का मुद्दा उस के किसी काम का नहीं है, यह मुद्दा तो बस उसे पाखंड में शामिल करने को ले कर है, ताकि उस के दिमाग में यह बात फिट कर दी जाए कि सारी इच्छाएं, कष्ट सब मोहमाया है, इनसान तो मरने के लिए जन्म लेता है, आत्मा अजरअमर है, इस जन्म में पिछले जन्म का पापपुण्य भोगना पड़ता है, इसलिए जो भूख और तकलीफ है, वह सब पुराने जन्म के कर्मों का फल है, इसलिए ज्यादा इच्छाएं मत पालो, सरकार से सवाल मत पूछो. बस कर्म करो, फल की चिंता मत करो.

जाहिर है कि भाजपा दलितबहुजनों का इस्तेमाल बस अपने एजेंडे के लिए ही करेगी, बाकी इस के आगे अगर हाथ फैलाए तो रोहित वेमुला हत्याकांड, ऊना, सहारनपुर और हाथरस कांड के उदाहरण भी सब के सामने हैं. रविदास, कबीर, नानक, बुद्ध, अंबेडकर, कांशीराम क्या कह गए, यह भले ही दलितों को पता न चले, पर इन के मंदिर और मूर्तियां बना कर उन्हें ही भगवान बना दो, सब सही हो जाएगा.

भाजपा ने अपना पूरा चुनाव हिंदुत्व और कठोर राजकाज के मुद्दे पर लड़ा. ये दोनों मुद्दे ही किसी लोकतंत्र और संविधान के लिए घातक हैं. ऐसे में आने वाले समय में हिंदुत्व की गतिविधियां तेज होंगी, जो खुद दलितपिछड़े समाज के लिए घातक होंगी. आज दलितपिछड़े ऐसे रामराज्य का सपना देख रहे हैं, जिस में नुकसान उन्हीं का होना है.

मसला: पौराणिक जीवियों के विरोध में मुखरता की कमी

 शैलेंद्र सिंह

सिस्टम में बदलाव के लिए राजनीतिक सत्ता जरूरी होती है. राजनीतिक सत्ता को बनाए रखने के लिए विचारों की शुद्धता से समझौता करना पड़ता है. विचारों को बनाए रखते हुए सत्ता को बहुत लंबे समय तक बैलैंस नहीं रखा जा सकता है. ऐसे में कई बार दूसरे विचारों को अपनाने का दिखावा किया जाता है और मतलब निकल जाने पर दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देने को राजनीतिक चतुराई कहा जाता है.

यह कड़वा सच है, जिस की हकीकत जान कर भी उस की धोखेबाजी की बुराई तो दूर बात भी नहीं की जाती. इसे सहज घटना की तरह लिया जाता है मानो यह बेईमानी तो धर्म से एप्रूव्ड है.

पौराणिक कथाओं तक में ऐसी कहानियों को बारबार दोहराया गया है, जिस की वजह से ऐसे कामों को गलत भी नहीं माना जाता है.

हिंदू पौराणिकजीवियों के सताए गए लोग भी पौराणिक कथाओं और नियमों में विश्वास करने लगे हैं, क्योंकि उन को समझाने के लिए कोई मीडिया या मंच नहीं है.

इस समुद्र मंथन की कहानी ऐसी ही एक पौराणिक कथा है, जिस के जरीए आज के हालात को समझाने की कोशिश करते हैं.

एक समय की बात है. राजा बलि के राज्य में दैत्य, असुर व दानव बहुत ज्यादा ताकतवर हो उठे थे. उन को असुरों के गुरु शुक्राचार्य से तमाम ताकतें हासिल हो गई थीं. दुर्वासा ऋषि के शाप से देवराज इंद्र कमजोर हो गए थे. दैत्यराज बलि का राज तीनों लोकों पर हो चुका था. इंद्र समेत सभी देवता उस से डरे रहते थे.

इस बात से दुखी देवता विष्णु के पास पहुंचे और उन को अपनी परेशानी सुनाई. तब विष्णु ने कहा कि यह तुम लोगों के लिए संकट का समय है. दैत्यों, असुरों व दानवों का दबदबा हो रहा है और तुम लोगों के लिए संकटकाल को दोस्ती के भाव से बिता देना चाहिए. तुम दैत्यों से दोस्ती कर लो और क्षीरसागर को मथ कर उस में से अमृत निकाल कर पी लो.

दैत्यों की मदद से यह काम आसानी से हो जाएगा. इस काम के लिए उन की हर शर्त मान लो और अपना काम निकाल लो. अमृत पी कर तुम अमर हो जाओगे और तुम में दैत्यों को मारने की ताकत आ जाएगी.

इस के बाद इंद्र ने समुद्र मंथन से अमृत निकालने की बात बलि को बताई. दैत्यराज बलि ने देवराज इंद्र से समझौता कर लिया. समुद्र मंथन की तैयारियों में ही देवताओं ने चतुराई दिखानी शुरू कर दी.

वासुकी नाग को मुंह की ओर से पकड़ते समय देवताओं ने ऐसा दिखावा किया, जैसे वही ताकतवर हैं. यह बात दैत्य, असुर, दानवों को अपना मजाक लगी. इन लोगों ने देवताओं से कहा कि हम किसी से ताकत में कम नहीं हैं. हम मुंह की ओर की जगह लेंगे.

तब देवताओं ने वासुकी नाग की पूंछ की ओर की जगह ले ली. समुद्र मंथन से जो निकला, वह देवता और दानव आपस में बांटने लगे. अच्छीअच्छी चीजों पर देवताओं ने कब्जा किया, बाकी चीजें दानवों को दे दीं.

जब अमृत कलश सामने आया, तो आपस में लड़ाई होने लगी. दोनों ही पक्ष इस पर अपना हक चाहते थे. जब देवता हारने लगे, तब एक बार ही छल का इस्तेमाल किया गया. देवताओं की निराशा को देख कर विष्णु ने तत्काल बहुत सुंदर कामुक युवती का मोहिनी रूप धर लिया और लड़ते दैत्यों के पास जा पहुंचे.

विष्णु को विश्वमोहिनी रूप में देख कर देत्य व देवताओं की तो बात ही क्या स्वयं ब्रह्मज्ञानी, कामदेव को भस्म कर देने वाले शंकर भी मोहित हो कर उन की ओर बारबार देखने लगे. जब दैत्यों ने उस नवयौवना सुंदरी को अपनी ओर आते देखा, तब वे अपना सारा झगड़ा भूल कर उसी सुंदरी की ओर एकटक देखने लगे.

विश्वमोहिनी बने विष्णु ने अमृत का बंटवारा कुछ इस तरह किया कि सारा का सारा देवताओं को मिल गया. अमृत कलश ले कर देवताओं और दैत्यों को अलगअलग लाइन में बैठने के लिए कहा. उस के बाद दैत्यों को अपने कटाक्ष से मदहोश करते हुए देवताओं को अमृतपान कराने लगे.

दैत्य उन के कटाक्ष से ऐसे मदहोश हुए कि अमृत पीना ही भूल गए. इस तरह देवताओं को अमृत पिला कर विष्णु वहां से लोप हो गए. उन के लोप होते ही दैत्यों की मदहोशी खत्म हो गई. वे गुस्सा हो देवताओं पर हमला करने लगे. भयंकर देवासुर संग्राम शुरू हो गया, जिस में देवराज इंद्र ने दैत्यराज बलि को हरा कर अपना इंद्रलोक वापस ले लिया.

ऐसे खो गई विचारधारा

भारत की राजनीति में भी ऐसी तमाम कहानियां हैं, जहां वोटों के लिए दलित और पिछड़ों का इस्तेमाल किया गया. वोट हासिल करने के बाद उन को इस हालत में पहुंचा दिया गया कि वे अपनी ताकत खो कर दूसरों के मुहताज हो गए.

80 के दौर में दलित चिंतन में कांशीराम का नया विचार आया कि सत्ता के जरीए सिस्टम को बदलना होगा. कांशीराम ने बामसेफ की जगह पर बसपा यानी बहुजन समाज पार्टी को शुरू किया. इसी दौर में राम मंदिर आंदोलन आगे बढ़ा, मंडल कमीशन लागू हुआ, समाज में उथलपुथल का दौर चला. दलितपिछड़ों के सामने पौराणिक विचारधारा कमजोर पड़ने लगी. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने ‘मिले मुलायमकांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ का नारा दे कर सत्ता पर कब्जा किया. ऐसा लगा कि सत्ता के जरीए सिस्टम बदलने के लिए दलितपिछड़े एक मंच पर आ गए हैं.

उत्तर प्रदेश में उस समय सरकार चला रहे समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों को रोकने के लिए अयोध्या में गोली चलवाई. इस के बाद मुलायम सिंह यादव को ‘मुल्ला मुलायम’ कहा जाने लगा. अब धर्म की राजनीति और राम मंदिर आंदोलन का विरोध पूरी ताकत से हो रहा था.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में सब को हरा कर सपाबसपा गठबंधन की सरकार बनी. उस दौर में यह साफ  दिख रहा था कि जातीय जागरूकता ने धर्म की राजनीति को हाशिए पर धकेल दिया है. अयोध्या की सरयू नदी में कुछ ही पानी बहा होगा कि सपा और बसपा जैसे दल धर्म के विरोध की राजनीति को छोड़ कर सत्ता की राजनीति पर उतर आए और धर्म का विरोध करना छोड़ दिया.

बसपा नेता मायावती धर्म का विरोध करते हुए कहती थीं, ‘हिंदू देवीदेवताओं की जो मूर्तियां खुद अपनी रक्षा नहीं कर पातीं, वे जनता की रक्षा क्या कर पाएंगी?’

कांशीराम खुद भी कहते थे कि पौराणिक विचारधारा नीबू के रस की तरह होती है. जैसे एक बूंद नीबू का रस पूरे दूध को फाड़ सकता है, वैसे ही पौराणिक विचारधारा के समर्थन की राजनीति होने लगी. मायावती ने मनुवादी भाजपा की मदद से 3 बार मुख्यमंत्री की कुरसी हासिल की.

साल 2007 में जब बसपा अपने बल पर जीत कर बहुमत से सत्ता में आई, तो इस का श्रेय ‘दलितब्राह्मण एकता’ वाले सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को दिया गया. 1990 के बाद मंडल कमीशन का असर देश की राजनीति पर कमजोर होने लगा और धर्म की राजनीति का असर बढ़ने लगा.

हर दल का नेता अयोध्या जा कर माथा टेकने लगा. 2014 के बाद तो अयोध्या में बौद्ध धर्म भी आडंबर का विरोध दिखावे भर तक सीमित रह गया. 6 दिसंबर को मसजिद के शहीद होने को होने वाले कार्यक्रम फकत तमाशाई बन कर रह गए. कई संगठन, जो अयोध्या को अछूत मान कर दूरी बनाए हुए थे, अयोध्या की भक्ति में डूब गए. अयोध्या की ब्रांडिंग का जरीया बनने लगे.

हिंदू पौराणिकजीवियों के सताए लोग भी पौराणिक कथाओं और नियमों में विश्वास करने लगे, क्योंकि उन के लिए पौराणिक कथाओं से मुकाबला करना आसान नहीं रह गया. बसपा के विचार खत्म हो गए, तो उस का जनाधार भी खो गया और वह सत्ता से दूर हो गई.

‘गैस्ट हाउस कांड’ को भूल कर मायावती ने समाजवादी पार्टी से समझौता किया. इस के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ, तो वापस अपनी जगह आ गईं. भाजपा के विरोध का स्वर नरम पड़ गया. अब दलित बसपा से ज्यादा भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया है.

इस्तेमाल किया और छोड़ा

मायावती कोई अकेली नेता नहीं हैं, जिन को पौराणिक विचारधारा ने इस्तेमाल किया और जब वह किसी काम के नहीं रह गए, तो उन को छोड़ दिया. ऐसे नेताओं की लंबी लिस्ट है. दलित नेताओं में एक बड़ा नाम रामविलास पासवान का था. रामविलास पासवान ऐसे नेता थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री वीपी सिंह, एचडी देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, डा. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी सब के मंत्रिमंडल में प्रमुख मंत्री के रूप में काम किया था.

राम विलास पासवान का जन्म बिहार के खगरिया जिले के शाहरबन्नी गांव में हुआ था. वे एक अनुसूचित जाति परिवार में पैदा हुए थे.

रामविलास पासवान ने 2 शादियां की थीं. पहली शादी राजकुमारी देवी से हुई थी. पहली पत्नी राजकुमारी देवी से उषा और आशा 2 बेटियां हैं. बाद में उन्होंने पहली पत्नी को तलाक दे दिया. इस के बाद अमृतसर की रहने वाली एयरहोस्टेस और पंजाबी हिंदू रीना शर्मा से शादी की. उन से एक बेटा और एक बेटी हैं. उन के बेटे चिराग पासवान लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं. रामविलास पासवान 9 बार लोकसभा सांसद और 2 बार राज्यसभा सांसद रहे थे.

रामविलास पासवान ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत दलितों के अधिकार और सम्मान को ले कर की थी. साल 1983 में उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए दलित सेना का गठन किया. जनता दल और जनता दल (यूनाइटेड) से अलग हो कर लोक जनशक्ति पार्टी का गठन किया. इस के बाद वह भाजपा की अगुआई वाले राजग का सदस्य हो कर रह गए.

साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले ही बीमारी की हालत में रामविलास पासवान की मौत हो गई. पार्टी की कमान बेटे चिराग पासवान के हाथ आई. बिहार के चुनाव में पिता की तरह उन्होंने भाजपा का साथ दिया. भाजपा ने जनता दल (यूनाइटेड) नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और चिराग पासवान के बीच दूरियां बढ़ाने का काम किया.

बिहार चुनाव में हार के बाद चिराग पासवान और उन की पार्टी लोक जनशक्ति दोनों ही बिहार की राजनीति में अलगथलग पड़ गए.

रामविलास पासवान ने दलित राजनीति से अपना कैरियर शुरू किया और फिर सत्ता के लिए समझौता कर के कुरसी पर बने रहे. विचारधारा छोड़ने के बाद उन का जनाधार सिमट गया. वे उस पार्टी के पीछे चलने को मजबूर रहे, जिस के खिलाफ चुनाव लड़ने का काम किया करते थे.

पौराणिक विचारधारा ने रामविलास पासवान का इस्तेमाल कर उन के आधार को खत्म कर दिया. रामविलास पासवान के बाद उन की पार्टी गुम हो गई है.

न इधर के रहे न उधर के

दलित नेताओं में एक बड़ा नाम डाक्टर उदित राज का लिया जाता है. वे भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर उत्तरपश्चिम दिल्ली के सांसद बने थे.

उदित राज भी दलित राजनीति के सहारे आगे बढ़े थे. एससीएसटी संगठनों के अखिल भारतीय संघ के वे राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे.

इस के पहले साल 1988 में उदित राज को भारतीय राजस्व सेवा के लिए चुना गया था. एमए और एलएलबी की डिगरी लेने के साथ ही साथ अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से उन्हें मानद उपाधि मिली थी. डाक्टर उदित राज की पत्नी का नाम सीमा राज है. उन के एक बेटा और एक बेटी हैं.

साल 2003 में डाक्टर उदित राज ने भारत सरकार की सभी सेवाओं से इस्तीफा दे दिया और ‘इंडियन जस्टिस’ नाम की पार्टी बनाई. उदित राज हमेशा की तरह अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य वंचित वर्गों के लिए लड़ते रहे.

उत्तर प्रदेश में मायावती के विकल्प के रूप में खुद को पेश करने के लिए उन्होंने ‘इंडियन जस्टिस’ पार्टी बनाई. जब कामयाबी नहीं मिली, तो दलित विचारधारा छोड़ पौराणिक विचारधारा के साथ हो लिए.

साल 2014 में डाक्टर उदित राज भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. साल 2014 में उत्तरपश्चिम दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से आम आदमी पार्टी की राखी बिड़ला को हराने के बाद वे 16वीं लोकसभा में सांसद चुने गए.

सत्ता के लिए विचारधारा छोड़ने के बाद डाक्टर उदित राज का जनाधार खत्म हो गया. तब भाजपा ने उन को साल 2019 में निकाल दिया. डाक्टर उदित राज फिर से दलितों की लड़ाई लड़ने का दम भरने लगे, पर अब उन की पहले जैसी साख नहीं रही.

ऐसे नेताओं की लिस्ट में दलित नेता रामदास अठावले, ‘अपना दल’ की नेता अनुप्रिया पटेल के नाम भी शामिल हैं. समय के साथसाथ भाजपा की अगुआई वाले राजग में इन का कद इस कदर छोटा हुआ है कि अब रोटी, कपड़ा और मकान के लिए सरकार के आगे हाथ फैलाने को मजबूर हैं.

उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर को उत्तर प्रदेश सरकार से बाहर जाना पड़ा. योगी सरकार भी ओमप्रकाश राजभर के जनाधार को खत्म करने की योजना बना रही है. ऐसे तमाम दलित नेता भी अपनी विचारधारा को छोड़ कर पौराणिक विचारधारा के साथ जा खड़े हुए हैं. दलित नेताओं के ऐसे फैसलों से दलितों को बेहद नुकसान हुआ है.

समाज का हुआ नुकसान

पौराणिक विचारधारा ने केवल राजनीति को ही नेस्तनाबूद करने का काम नहीं किया है, बल्कि समाज को भी नुकसान पहुंचाया है. विचारों की लड़ाई को पूरी तरह से खत्म कर दिया. कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म करने के समय यह कहा गया कि इस से पूरे देश के लोग कश्मीर में जमीन खरीद सकेंगे.

देशभर के लोगों में खुशी की लहर उठने लगी. बिना सोचेसमझे लोग सोशल मीडिया पर कश्मीर में जमीन का टुकड़ा खरीदने को ले कर खुश होने लगे. धारा 370 को खत्म करने के बाद आज तक वहां के हालात सामान्य नहीं हुए हैं. बाहर के लोगों को तो छोड़ दें, वहां के रहने वाले भी पहले की तरह खुशहाली से नहीं रह पा रहे हैं.

ठीक इसी तरह अयोध्या में राम मंदिर बनाते समय यह कहा गया कि सभी जातियों के लोगों का यह मंदिर है. जब अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट बना, तो उस में सब से बड़ी संख्या में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोग शामिल हुए. राम मंदिर बनाने के लिए चंदा हर किसी से लिया जा रहा है. मंदिर के संचालन का काम केवल कुछ खास लोगों तक ही सीमित रहेगा.

पौराणिक विचारधारा की सब से बड़ी खासीयत यही है कि वह अपना काम निकालने के लिए हर जाति और धर्म की बात करती है, पर जैसे ही काम निकल जाता है, वह केवल अपने हित पर काम करती है.

समुद्र मंथन से ले कर दलित नेताओं के इस्तेमाल तक इस बात को देखा और समझा जा सकता है. चुनावी दौर की बात करें, तो वह भी सत्ता के लिए समुद्र मंथन सा होता है, जहां हर किसी के हक की बात होती है.

चुनाव में महंगाई कम करने, भ्रष्टाचार खत्म करने, रोजगार देने और देश के विकास की बात होती है. सत्ता पाने के बाद ये काम नहीं होते. जनता को किसी न किसी तरह बहकाने का काम किया जाता है. पौराणिक विचारधारा में आम लोगों को धर्म के नाम पर बेवकूफ  बनाया जाता है.

धर्म के नाम पर चंदा लिया जाता है. इस से मंदिर और उस से जुड़े लोगों का विकास होता है, भक्तों का केवल नुकसान होता है. यह बात नहीं बताई जाती है.

भक्ति की आड़ में दलित राजनीति की ही तरह से आरक्षण को बेदम किया जा रहा है. सरकार जिस तरह से खेती का निजीकरण करने वाले कृषि कानून ले कर आई है, उस से गरीब को और भी गरीब बनाना है, जिस से वह सरकार को वोट दे कर मिलने वाली सब्सिडी और नकद सहायता राशि पा कर खुश होते रहें. जैसे 500 रुपए महीने की ‘किसान सम्मान निधि’ पा कर किसान खुश हो रहे हैं. यह राशि तभी तक है, जब तक किसानों से काम है. उस के बाद किसानों की हालत भी दलित नेताओं की तरह से हो जानी है.

औरतों पर भक्ति की मार

पौराणिक विचारधारा की सब से ज्यादा मार औरतों पर ही पड़ती है. पौराणिक विचारधारा ने औरतों को गुलाम बना लिया है. ऐसे में हर राजनीतिक दल उन्हें संरक्षण नहीं देता है. समझने के लिए देखें, तो भाजपा की मोदी सरकार ने मुसलिम औरतों को राहत देने के लिए ‘तीन तलाक कानून’ में सुधार का काम किया, पर हिंदू धर्म की औरतों के लिए कुछ भी नहीं किया.

हिंदू औरतों के सब से ज्यादा मुकदमे फैमिली कोर्ट में लंबित हैं. सालोंसाल औरतें भटकती रहती हैं. औरतों को ले कर किसी तरह के रोजगार का अलग से प्रावधान नहीं किया गया. केवल कैरियर के लिहाज से नहीं, घरगृहस्थी को सही ढंग से चला सकें, उस के लिए भी कोई योजना नहीं बनाई गई. रसोई गैस के सिलैंडर महंगे हो रहे हैं. बच्चों की स्कूल की फीस महंगी हो गई है. गृहस्थी की गाड़ी चलाना मुश्किल हो गया है. औरतों के नाम पर नाममात्र की प्रौपर्टी है.

भक्ति की मार का ही असर है कि आज भी औरतें बेटा और बेटी में फर्क करती हैं. वे आईवीएफ तकनीक अपना कर बेटे ही पैदा करना चाहती हैं. मंगलसूत्र पहने रहती हैं. करवाचौथ का व्रत वही करती हैं. विधवा या परित्यक्ता होने पर अपने भाग्य को दोष देती हैं, मर्द को नहीं. अंधविश्वास में पड़ कर धर्म के बनाए चक्र में वे पिसती रहती हैं.

त्याग की कमी

धर्म और आडंबर के प्रचार और विरोध की शुरुआत को देखें तो लगता है कि साल 1990 में पहले धर्म के विरोध का जो लैवल था, वह धीरेधीरे कमजोर पड़ने लगा. इस में बामसेफ और वामपंथी दलों के विचारों का कमजोर पड़ना सब से प्रमुख रहा.

भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर आंदोलन के सहारे पौराणिक कथाओं और नियमों का जिस तरह से प्रचार करना शुरू किया, विरोध के स्वर कमजोर पड़ने लगे. पहले राजनीतिक दलों में विचारधारा को ले कर भ्रम पैदा हुआ, फिर सामाजिक संगठन इस का शिकार हुए. धीरेधीरे मीडिया में भी धर्म के आडंबर का विरोध खत्म हो गया. मीडिया में धर्म का प्रचार हावी होता गया. प्रिंट के मुकाबले इलैक्ट्रौनिक चैनलों ने धर्म के प्रचार को बढ़ावा देने का काम किया.

पौराणिक कथाओं का महिमामंडन शुरू हुआ. स्वर्ण की सीढि़यां, पुनर्जन्म, मंदिरों की कहानियों के जरीए धर्म का बखान दिनरात किया जाने लगा. इस के बाद बाबाओं के प्रवचन और पौराणिक कथाओं को टीवी सीरियल के रूप में पेश किए जाने का काम शुरू हुआ.

एक तरफ जहां धर्म का प्रचार करने में पैसा था, तो वहीं दूसरी तरफ धर्म और आडंबर का विरोध करने वाले माली रूप से टूटते जा रहे थे. जैसे नशे का प्रचार करने वाले आबकारी विभाग के पास बहुत पैसा होता है और नशे का विरोध करने वाले मद्य निषेध विभाग के पास पैसे की कमी होती है. इस वजह से वे अपने कार्यक्रमों को पूरा नहीं कर पाते हैं. धर्म और आडंबर का विरोध करने वालों की हालत भी उसी तरह से हो गई. पैसे की कमी में यह लड़ाई कमजोर पड़ती गई.

धर्म असरदार क्यों

धर्म की विचारधारा का विरोध और समर्थन एकसाथ शुरू हुआ. इस के बाद विरोध के स्वर हाशिए पर पहुंच गए. इस की वजह यह रही कि धर्म बहुत सारी जातियों को अपने साथ ले कर चलने में सफल हो गया.

जिन दलितों में एक जमाने में बौद्ध धर्म अपनाने की दिलचस्पी रहती थी, अब वह हिंदू धर्म की तरफ बढ़ने लगे. देवीदेवताओं को गाली देने वाले लोगों का साथ छोड़ कर यह देवीदेवताओं की पूजा करने लगे. तीजत्योहार मनाने लगे. मंदिरों में जाने लगे. ऐसे लोगों ने ही बसपा का साथ छोड़ दिया और पौराणिक कथाएं सुनाने वाले को वोट देना शुरू कर दिया.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस ने जब अपना संगठन बनाया, तो उस की राजनीतिक शाखा भी तैयार कर ली थी. जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी का सफल उदाहरण है.

संघ ने धर्म को सीढ़ी बना कर राजनीति की सत्ता को हासिल किया. इसी के जरीए सिस्टम को अपने मुताबिक बनाने का काम किया. राम मंदिर बनाना और अनुच्छेद 370 को हटाना इस के उदाहरण हैं.

जैसेजैसे भाजपा राजनीतिक संतुलन को साधने के लिए अलगअलग विचारों के लोगों को साथ लेगी, उस के विचारों में भी शुद्धता कम होगी और दूसरे विचार के लोगों के शामिल होने से पार्टी का हाशिए पर जाना शुरू हो जाएगा. अगर धर्म की विचारधारा को सत्ता हासिल नहीं होती, तो उस का प्रचारप्रसार इतना ज्यादा नहीं होता.

पौराणिक विचारधारा ने राजनीतिक समुद्र मंथन कर सत्ता को हासिल किया. सत्ता से मिले अमृत का खुद पान किया. अमृत की मांग दूसरे लोग न कर सकें, इस के लिए जातिधर्म के मोहपाश में उन को उलझाने का काम किया गया है.

अमृत के नाम पर नशा मोहिनी द्वारा पिलाया जा रहा है, यह न कोई बता रहा है और न औरतें सुनने को तैयार हैं, क्योंकि इन बातों को पुलिस, अदालत और कानून के नाम पर दबा दिया जाता है और सताए गए लोगों के नेता चुप हैं.

‘सूत्रधार’ के बहाने सत्ता का खेल

सुनील शर्मा

20 दिसंबर, 2021 को मराठी और हिंदी फिल्मों के कलाकार व डायरैक्टर चंद्रकांत दत्तात्रेय जोशी की 77 साल की उम्र में मौत हो गई थी. जब मैं ने उन के बारे में थोड़ा ज्यादा खंगाला तो मुझे उन से जुड़ी एक हिंदी फिल्म नजर आई, जिस का नाम ‘सूत्रधार’ है.

चंद्रकांत दत्तात्रेय जोशी ने इस फिल्म का डायरैक्शन किया था, जिस में स्मिता पाटिल, गिरीश कर्नाड और नाना पाटेकर जैसे दिग्गज कलाकारों ने बेहतरीन काम किया था.

इस फिल्म की कहानी का प्लौट इतना भर था कि एक कच्चेपक्के घरों के अति पिछड़े गांव में एक अमीर जमींदार गिरीश कर्नाड का एकछत्र राज चलता है, जिसे लोग डर कहें या इज्जत से ‘सरकार’ कहते हैं.

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वह ‘सरकार’ बच्चे नाना पाटेकर के सामने उस के पिता की अपने गुरगों से पिटाई करवाता है, जो नाना पाटेकर के बालमन पर छप जाती है. नाना पाटेकर के पिता का कुसूर इतना ही होता है कि वह अपनी जमीन पर कुआं खुदवा रहा होता है, पर उस ने ‘सरकार’ से इजाजत नहीं ली होती है.

बड़ा हो कर नाना पाटेकर पहले गांव में ही टीचर बनता है और गिरीश कर्नाड के फैसलों की काट करता है. इतना ही नहीं, बाद में नौकरी छोड़ कर उसी के खिलाफ सरपंच का चुनाव लड़ कर जीतता है और गिरीश कर्नाड की सत्ता के किले में सेंध लगा देता है, पर बाद में नाना पाटेकर राजनीति के खेल में इतना ज्यादा रम जाता है कि वह अपने परिवार, अपने उसूल, अपनी आक्रामकता को परे रख कर धीरेधीरे दूसरा गिरीश कर्नाड बन जाता है. फिल्म के आखिर में एक बच्चा नाना पाटेकर के खिलाफ हो जाता है और कहानी में एक नया सूत्र बंध जाता है.

चूंकि अब देश में चुनाव का माहौल है तो फिल्म ‘सूत्रधार’ का एक संवाद और भी मौजूं हो जाता है कि ‘कुरसी सबकुछ बिगाड़ देती है’. यह संवाद एक आम आदमी के मुंह से कहलवाया गया है, जो गांव का ही बाशिंदा है और वह गांव भी कोई भारत सरकार का ‘निर्मल गांव’ नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र का एक पिछड़ा हुआ गांव है, जहां नाना पाटेकर अपनी राजनीति की शुरुआत हरिजन टोले से करता है, जो ‘सरकार’ गिरीश कर्नाड के अहम पर पहली चोट होती है और चूंकि लोग अंदर ही अंदर ‘सरकार’ और उन के गुरगों से खार खाए बैठे होते हैं, लिहाजा नाना पाटेकर अपनी ईमानदार इमेज के चलते चुनाव जीत जाता है.

फिल्म ‘सूत्रधार’ साल 1987 में रिलीज हुई थी, मतलब आज से 35 साल पहले, पर अगर भारत में राजनीति के मौजूदा हालात की बात करें, तो तब से ले कर आज तक कुछ ज्यादा आंदोलनकारी बदलाव नहीं हुआ है.

नाना पाटेकर जैसे नएनवेले नेता अपने क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव के सपने दिखा कर सत्ताधारी पक्ष को हराने की नीयत से जनता के सामने जाते हैं और अपने लक्ष्य को पा भी लेते हैं, पर बाद में जनता को महसूस होता है कि यह तो पहले जैसा ही निकम्मा निकला. अब भी उन की समस्याएं जस की तस हैं, पर भ्रष्टाचार करने वालों के चेहरे बदल गए हैं.

अगर फिल्म ‘सूत्रधार’ के कथानक को देखें तो एक मास्टरपीस होने के गुण भले ही उस में न हों, फिर भी वह भारतीय राजनीति का ऐसा आईना है, जो आज भी जस की तस तसवीर दिखाता है.

‘सरकार’ गिरीश कर्नाड का दबदबा खत्म होते ही उन के कुछ पिछलग्गू नाना पाटेकर की तरफ हो जाते हैं यानी उन की निष्ठा जनता के प्रति नहीं होती है, बल्कि वे सत्ता पक्ष में बने रहना चाहते हैं, फिर ताकत किसी के पास भी क्यों न रहे.

यहां जनता भी कठघरे में खड़ी दिखाई देती है और उस के लिए चुनाव का मतलब प्रचार के समय अमीर नेताओं से कुछ दिन भरपेट स्वादिष्ठ भोजन मिल जाना, कंबलबरतन उपहार में लपक लेना भर होता है. और अगर किसी ‘खास गुरगे’ को कुछ ज्यादा मिल गया तो वह अपनी औकात के हिसाब से गोलमाल करता है.

इस फिल्म में यही छोटा भ्रष्टाचार बड़ी बारीकी से दिखाया गया है कि कैसे गांव वालों से दूध खरीदने वाली सहकारी समिति के ‘कर्ताधर्ता’ किसान महिलाओं को ‘छुट्टा नहीं है’ कह कर अठन्नी का भी घपला कर लेते हैं. मुरगी केंद्र का रखवाला रात को मुरगी पका कर खा जाता है और दोस्तों के साथ दारू पार्टी करता है और सब से कहता फिरता है कि रात को मुरगी चोरी हो जाती है.

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यहां ‘कुरसी सबकुछ बिगाड़ देती है’ संवाद की गहराई समझ में आती है कि जब किसी छोटी या बड़ी कुरसी पर बैठने वाले के दस्तखत की कीमत बढ़ जाती है, तो फिर जनता के बीच से गए जनता के नुमाइंदे ही खुद को खुदा से कम नहीं समझते हैं. खुद नाना पाटेकर उस ‘भाऊ’ नीलू फुले की शरण में चला जाता है, जिस का हाथ पहले ‘सरकार’ के सिर पर होता है. मतलब जो मक्कारी और मौकापरस्ती में ‘सरकार’ का भी बाप होता है.

यहां फिर ‘निष्ठा’ का सवाल खड़ा होता है कि नेता तो जैसे भी होते हों, जनता भी अपनी मक्कारी का ठीकरा नेताओं के सिर पर फोड़ कर अपना पल्ला झाड़ने में बड़ी माहिर होती है. वह अपनी गरीबी, गंदगी और गलीजपने को कभी नहीं देखती है.

घरपरिवार में ही देख लें, तो किसी बड़े और सयाने के फैसलों की ही कद्र घर के दूसरे लोग नहीं करते हैं. वे अपने छोटे फायदों में ही उलझे रहते हैं, जिस का नतीजा यह होता है कि वे दूसरों से हर मामले में पिछड़ जाते हैं. जब ऐसे लोगों की भरमार हो जाती है तो उन से बना पड़ोस, महल्ला, गांव, कसबा, शहर भी उन शातिरों की भेड़ बन जाता है, जिसे जहां मरजी हांकना सब से आसान काम होता है.

भारत, जो कई सौ साल से विदेशी आक्रांताओं का गुलाम रहा है, में हम भारतीयों की इसी ‘निष्ठा’ की कमी भी बहुत बड़ी वजह रही है. यह कमी हमारे मन में इतनी ज्यादा घर कर चुकी है कि आज के सियासी नेता भी ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का सहारा ले कर कभी धर्म के नाम पर, तो कभी क्षेत्रवाद के नाम पर और जब बस नहीं चलता है तो जातियों में बांट कर अपना उल्लू सीधा करते हैं.

यही वजह है कि फिल्म ‘सूत्रधार’ का एक पिछड़ा हुआ गांव हो या फिर असली जिंदगी की कोई मैट्रो सिटी, जनता चुनाव के समय तमाशबीन बन जाती है. उसे अपने छोटेछोटे फायदे नजर आते हैं, फिर सामने फिल्मी ‘सरकार’ हो या असली का बाहुबली.

पिछड़ों और दलितों से घबराई भाजपा की ठंडी गरमी

 शैलेंद्र सिंह

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का जिस तरह से विरोध हो रहा है, उस से शिमला सी ठंड में भी भाजपा के पसीने छूट रहे हैं. चुनाव की गरमी जैसेजैसे बढ़ रही है, भाजपा की बेचैनियां भी वैसेवैसे बढ़ रही हैं. महंगाई, बेरोजगारी और खेतीकिसानी के मुद्दों के आगे धर्म की बातें सुनना लोगों को पसंद नहीं आ रहा है.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की घोषणा होते ही राजनीतिक दलों में वैसे ही भगदड़ मच गई, जैसे प्लेटफार्म पर रेलगाड़ी के आने के समय होती है. जिस का रिजर्वेशन होता है, वह भी और जिस का साधारण टिकट होता है, वह भी भगदड़ का हिस्सा होता है. जिस के पास ट्रेन का टिकट नहीं होता, वह सब से ज्यादा उछलकूद करता है. सब का मकसद एक ही होता है, रेलगाड़ी पर चढ़ कर अपनी मंजिल तक पहुंचना.

चुनाव आते ही सब नेताओं का एक ही मकसद होता है कि चुनाव जीत कर विधायक बनना. राजनीतिक दल कमजोर नेता को हटा कर मजबूत नेता को टिकट देना चाहते हैं, जिस से उन की सरकार बन सके. नेता टिकट कटने पर पार्टी के प्रति सारी निष्ठा को छोड़ कर अपने जुगाड़ में लग जाता है. उत्तर प्रदेश में चुनावी रेलगाड़ी अब प्लेटफार्म से चल चुकी है. जिस नेता को जहां बैठना था, बैठ चुका है.

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चुनावी गरमी अब बढ़ चुकी है. हालांकि प्रदेश के मौसम में पहले जैसी गरमी नहीं है, खासकर प्रदेश में सरकार चलाने वाली भारतीय जनता पार्टी के खेमे में माहौल बेहद ठंडा महसूस हो रहा है. उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी पूरी ताकत झोंक दी है.

भाजपा के कार्यकर्ता धर्म के सहारे राजनीति करने में माहिर हैं. वे धर्म का प्रचार बेहतर तरीके से कर सकते हैं. बेरोजगारी, महंगाई और किसानों के मुद्दे पर हो रहे विरोध का वे सही जवाब नहीं दे पा रहे हैं. यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने 40 संगठनों के 4 लाख कार्यकर्ताओं को चुनाव प्रचार में उतार दिया है. ये कार्यकर्ता घरघर जा कर यह सम?ाने का काम कर रहे हैं कि वोट बेरोजगारी, महंगाई और किसान के मुद्दे पर नहीं, बल्कि धर्म के मुद्दे पर दें.

सवालों में घिरी ‘बुलडोजर सरकार’

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करते केंद्र सरकार में गृह मंत्री अमित शाह ने यह कहा कि ‘वोट यह देख कर मत दें कि विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री कौन है? वोट प्रधानमंत्री के हाथों को मजबूत करने के लिए दें’.

इस का सीधा सा मतलब यह था कि भाजपा बेरोजगारी, महंगाई और किसान के मुद्दे पर चुनाव लड़ने से डर रही है. इसी वजह से वह राष्ट्रवाद, धर्म और केंद्र सरकार के नाम पर वोट मांग रही है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने चुनाव प्रचार में कहते हैं, ‘कुछ नेताओं की गरमी अभी शांत नहीं हुई है. 10 मार्च को चुनाव नतीजा आने के बाद यह गरमी शांत कर दी जाएगी. मईजून के महीने में भी हम उत्तर प्रदेश को शिमला बना देते हैं’. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह बयान उन की ‘ठोंक दो’ शैली को बढ़ावा देने वाला है.

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योगी आदित्यनाथ और भाजपा के बड़े नेता डर और आतंक का माहौल बना कर वोट हासिल करना चाहते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में 5 साल पहले दबंग, दंगाई ही कानून थे. उन का कहा ही सरकार का आदेश हुआ करता था. हम उत्तर प्रदेश  के बदलाव के लिए खुद को खपा रहे हैं. विपक्ष के लोग बदला लेने के लिए ठान कर बैठे हैं. इन बदला लेने वालों के बयानों को देख कर लगता है कि वे पहले से ज्यादा खतरनाक हैं.

‘कोई भूल नहीं सकता कि 5 साल पहले व्यापारी लुटता था, बेटी घर से बाहर निकलने में घबराती थी, माफिया सरकारी संरक्षण में घूमते थे. प्रदेश  दंगों की आग में जल रहा होता था और सरकार उत्सव मना रही होती थी.’

योगी आदित्यनाथ ने अपनी छवि ‘बुलडोजर सरकार’ की बनाई है, जहां ‘ठोंक दो’, ‘गाड़ी पलटा दो’ जैसे अलंकार उन की सरकार की शोभा बढ़ाते हैं. यही जुमले अब भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए वोट मांगने में मुश्किल खड़ी कर रहे हैं. तमाम दांवपेंच और सत्ता के दबाव के बाद भी भाजपा अकेली पड़ गई है. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने लोकदल सहित छोटेछोटे दलों के साथ सीधा गठबंधन कर लिया है.

कांग्रेस भी समाजवादी पार्टी के साथ है. कांग्रेस ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उन के चाचा शिवपाल यादव के सामने कांग्रेस का कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच यह नया नहीं है. समाजवादी पार्टी भी कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ कभी अपना उम्मीदवार नहीं उतारती थी.

उत्तर प्रदेश के इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी अलगअलग चुनाव लड़ रही हैं. इस के बाद भी टिकट बंटवारे में उन का टारगेट यह है कि किस तरह से भाजपा के उम्मीदवार को हराया जा सके. इस के लिए दोनों दलों में आपसी सहमति बनी हुई है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रचार करते हुए जब सड़क पर प्रियंका गांधी वाड्रा के काफिले के सामने सपा नेता अखिलेश यादव और लोकदल के नेता जयंत चौधरी मिल गए थे, तो दोनों काफिले रुक गए थे और आपसी अभिवादन के बाद ही आगे बढ़े थे.

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यह इन नेताओं की आपसी सम?ाबू?ा को दिखाता है. असल में कांग्रेस सपा गठबंधन से इस वजह से अलग है, जिस से वह अलग चुनाव लड़ कर भाजपा की अगड़ी जातियों खासकर ब्राह्मणों के वोट अपनी तरफ कर के भाजपा को नुकसान कर सके.

बेरोजगारी, महंगाई, किसान पर लाचारी

वोट मांगने के लिए घरघर जाने वाले कार्यकर्ताओं से लोग सवाल करते हैं कि पैट्रोल 100 रुपए लिटर, खाने का तेल 200 रुपए लिटर और रसोई गैस का सिलैंडर 1,000 रुपए का है, ऐसे में गृहस्थी कैसे चलेगी? इन सवालों के जवाब भाजपा का प्रचार करने वालों के पास नहीं है. शहरों से हट कर जब गांव के लोगों से वोट मांगे जाते हैं, तो वहां के लोग छुट्टा जानवरों से खेत में होने वाले नुकसान, खाद के महंगे दाम की बात करने लगते हैं.

इन सवालों के जवाबों से लाचार हो कर भाजपा ने नई रणनीति बनाई है. अब वह वोट मांगने के लिए उन घरों में जा रही है, जिन को सरकार की किसी न किसी योजना का लाभ मिला है. भाजपा की भाषा में इन को ‘लाभार्थी’ कहा जाता है.

प्रचार पर जाने वाले कार्यकर्ताओं को उन के क्षेत्र के लाभार्थियों के नाम की लिस्ट पहले से दे दी जाती है. कार्यकर्ता इन घरों पर ही जा रहे हैं. वहां उन से महंगाई, बेरोजगारी और किसानों के सवाल कम होते हैं. भले ही ‘लाभार्थी’ कहा जाने वाला यह वर्ग सीधे सवाल नहीं करता, पर उस के मन में भी यह सवाल उठता है कि महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की क्या हालत है?

भाजपा के लिए चुनौती देने वाली बात यही है कि उस का समर्थन करने वाले से ज्यादा लोग उस का विरोध करने वालों का कर रहे हैं.

एक लोकगायिका हैं नेहा सिंह राठौर. वे बिहार की रहने वाली हैं. उत्तर प्रदेश में उन का ननिहाल है. बिहार विधानसभा चुनाव के समय उन्होंने एक गाना ‘बिहार मा का बा’ गाया था, जिस के जरीए नेहा सिंह को सोशल मीडिया पर बहुत तारीफ मिली थी. अब उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी नेहा सिंह राठौर ने ‘यूपी में का बा’ गाने के सहारे यहां की अव्यवस्था पर सवाल किया. इन सवालों के घेरे में नेहा सिंह ने ‘मोदीयोगी’ को निशाने पर लिया.

नेहा सिंह राठौर को जनता ने हाथोंहाथ लिया, जिस से बौखला कर भाजपा की आईटी सैल और अंधभक्तों ने नेहा को जबरदस्त ट्रोल करना शुरू कर दिया. पर नेहा ने हौसला नहीं हारा और हिम्मत से ‘यूपी में का बा’ के अलगअलग गाने गाती रहीं.

भाजपा का विरोध जनता के बीच इतना है कि उस का प्रचार करने वालों को दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है. कार्यकर्ताओं को ही नहीं, बल्कि भाजपा के विधायकों और कई नेताओं को उन के क्षेत्र में घुसने से रोका गया. पहले भी इस तरह का इक्कादुक्का विरोध होता था, जिस में जनता को सामने कर के विपक्ष के लोग बैनरपोस्टर टांग देते थे कि ‘प्रचार के लिए यहां संपर्क न करें’. लेकिन नेता के सामने आ कर कोई विरोध नहीं करता था.

इस बार जनता विरोध कर रही है और भाजपा नेताओं को क्षेत्र में घुसने नहीं दे रही है. इस तरह की घटनाएं पूरे प्रदेश में घट रही हैं. उत्तर प्रदेश में 20 जनवरी से 30 जनवरी के बीच 9 नेताओं को जनता का विरोध ?ोलना पड़ा. लोगों ने इन को गांव में घुसने नहीं दिया.

मंत्री से ले कर विधायक का विरोध

इस में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य से ले कर तमाम नेता शामिल हैं. वे कौशांबी जिले की सिराथू सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. 22 जनवरी, 2022 को जब वे गुलामीपुर चुनाव प्रचार करने गए, तो महिलाओं ने उन को घेर कर नारेबाजी शुरू कर दी.

प्रयागराज से एमएलसी सुरेंद्र चौधरी को अफजलपुर में लोगों ने चुनाव प्रचार नहीं करने दिया. सुरेंद्र चौधरी सम?ाते रहे कि ‘सरकार ने राम मंदिर बनवाया’, पर लोगों ने एक नहीं सुनी. सुरेंद्र चौधरी को वहां से प्रचार छोड़ कर जाना पड़ा.

जालौन की उरई सीट से विधायक गौरी शंकर वर्मा चुनाव प्रचार करने गए, तो विरोध में नारेबाजी शुरू कर दी गई. लोगों ने जब सड़क, नल, पानी का हिसाब मांगा, तो गौरी शंकर वर्मा वहां से चलते बने.

इस तरह की घटनाएं पूरे प्रदेश में घट रही हैं. बुलंदशहर में देवेंद्र सिंह लोधी स्याना सीट से विधायक हैं. जब वे प्रचार करने गए, तो लोगों ने विरोध किया. उन का आरोप था कि ‘5 साल न कोई नल दिया, न सड़क. अब वोट मांगने क्यों आए हो?’ पहले तो देवेंद्र सिंह ने लोगों को सम?ाने की कोशिश की, पर जब बात नहीं बनी तो चुपचाप वापस चले आए.

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा विधायकों से लोग नाराज हैं कि अपने ही वोटरों को किसान आंदोलन में मुकदमे में फंसा दिया. इसी बात को ले कर खतौली से भाजपा विधायक विक्रम सैनी का विरोध हुआ. यही नहीं, कई जगहों पर वोट मांगने पर जनता ने भाजपा विधायकों के खिलाफ नारेबाजी की.

यहां के किसानों ने कहा कि उन पर जिस तरह से मुकदमे किए गए, कील और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया, वह दर्द वे भूले नहीं हैं. यह सब देख कर ही भाजपा के बड़े नेताओं को प्रचार के लिए उतारना पड़ा, जिन के साथ पूरा लावलश्कर चलता है. इस से जनता विरोध नहीं कर पाती है.

किसान आंदोलन के साथसाथ महंगाई और बेरोजगारी भी विरोध की एक बड़ी वजह है. भाजपा इस कारण से इन मुद्दों को पीछे छोड़ कर धर्म, राष्ट्र, पलायन और बदमाशी पर बात कर रही है. भाजपा इन मुद्दों के नाम पर वोटर को डरा कर वोट लेना चाहती है.

‘अंडर करंट’ साबित होंगे

महंगाई और बेरोजगारी को भले ही विपक्ष चुनावी मुद्दा न बना पा रहा हो, पर महंगाई और बेरोजगारी को ले कर जनता के बीच गुस्सा बना हुआ है. पहले यह उबलते दूध की तरह होता था, जो कुछ समय में शांत हो जाता था.

इस चुनाव में केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में भी यह मुद्दा बना हुआ है. जनता इसी कारण विपक्षी दलों के साथ खड़ी है. भले ही विपक्षी दल खुद इन मुद्दों को ले कर बात करने से बच रहा हो, पर एक तरह से देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में इस बार जनता चुनाव लड़ रही है. उस का यह गुस्सा ‘अंडर करंट’ की तरह ही है, जो अब वोट देते समय निकल कर सामने आएगा.

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सीएमआईई के आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर, 2021 में बेरोजगारी दर 7.84 फीसदी हो गई है. उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी की दर 4.9 फीसदी हो गई है. भले ही विपक्षी दल प्रमुखता से यह बात नहीं कर पा रहे हैं, पर उत्तर प्रदेश के बेरोजगारों ने ‘यूपी मांगे रोजगार’ नाम से अलग मुहिम चला रखी है.

भाजपा के वोटरों में सब से बड़ी तादाद  नौजवानों की है, जो 18 से 35 साल की उम्र के हैं. इन के पास रोजगार का सब से बड़ा संकट है. प्रयागराज में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वाले नौजवानों पर जिस तरह से लाठियां बरसाई गईं, वह भाजपा के लिए बड़ा संकट बन रहा है.

युवा कार्यकर्ता जब वोट मांगने जा रहे हैं, तो उन के साथी ही उन का विरोध कर रहे हैं. इन के विरोध की गंभीरता को इस बात से भी समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी क्षेत्र वाराणसी के नौजवानों ने उन के जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस’ के रूप में मनाया था.

बेरोजगारों के गुस्से की वजह यह है कि कोरोना काल के दौरान तालाबंदी से निजी क्षेत्र को जब नुकसान हुआ, तो वहां से तमाम लोगों को नौकरियों से बाहर कर दिया गया. ये युवा अब अपने सुरक्षित भविष्य के लिए सरकारी नौकरियों की तरफ जाना चाहते हैं. वहां परीक्षा पेपर आउट हो जा रहा है. परीक्षा का रिजल्ट सालोंसाल नहीं आता. जिन का रिजल्ट आ जाता है, उन को अपौइंटमैंट लैटर नहीं दिया जाता.

सरकार अब अपने विभागों में भी संविदा पर नौकरियां देने लगी है. वहां भी भाईभतीजावाद और सिफारिश चल रही है. इस वजह से छात्रों का गुस्सा उन के अंदर भरा हुआ है.

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बड़ी तादाद में नौजवानों ने भाजपा को वोट दिया था. उस को यह लगा था कि ‘डबल इंजन’ सरकार उत्तर प्रदेश में रोजगार के अवसर खोलेगी.

नौजवानों को झांसा देने के लिए योगी सरकार ने ‘इंवैस्टर मीट’ और ‘डिफैंस ऐक्सपो’ जैसे कई आयोजन किए. नौजवानों को यह बताने की कोशिश भी की थी कि चीन से भाग कर विदेशी कंपनियां उत्तर प्रदेश में कारखाने लगाने जा रही हैं, जिस से नौजवानों को रोजगार मिल सकेगा.

उत्तर प्रदेश को फिल्म सिटी बनाने का झांसा भी दिया गया. इन में से कोई भी घोषणा जमीन पर नहीं उतरी. इस वजह से बेरोजगारों का गुस्सा अंडर करंट के रूप में काम कर रहा है, जिस का पता 10 मार्च को चल पाएगा.

भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं का जिस तरह से विरोध हो रहा है, उस से शिमला की ठंड में भी भाजपा के पसीने छूट रहे हैं.

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