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Hindi Story: 3 किरदारों का अनूठा नाटक

Hindi Story: पिछला टेलीफोन उस के लिए परेशानी भरा था. दूसरा फोन तो उसे खौफजदा करने के लिए काफी था. दोनों टेलीफोन दिन के वक्त आए थे. तब जब उस का हसबैंड सिकंदर अपने औफिस में था और वह घर पर अकेली थी.

‘‘मिसेज सिकंदर,’’ फोन पर एक अजनबी औरत की आवाज सुनाई दी.

‘‘हां, बोल रही हूं. आप कौन हैं?’’ मिसेज सिकंदर ने कहा.

‘‘एक दोस्त हूं. मकसद है आप की मदद करना. क्या आप सलिलि को जानती हैं?’’ उस ने पूछा.

‘‘तो क्या आप सलिलि हैं?’’ मिसेज सिकंदर ने पूछा.

‘‘नहीं मिसेज सिकंदर, सलिलि तो आप के शौहर की सेक्रेटरी का नाम है. मिस्टर सिकंदर और सलिलि के बीच जो चल रहा है, आप के लिए ठीक नहीं है. मेरा फर्ज है कि मैं आप को सही हालात की जानकारी दे दूं.’’

मिसेज सिकंदर गुस्से से चिल्लाई, ‘‘यह सब फालतू बकवास है. सलिलि मेरे शौहर की सेक्रेटरी जरूर है. वह उस का जिक्र भी करते हैं. पर उन का उस से कोई चक्कर है, यह बिलकुल गलत है. सलिलि को दिल की बीमारी है, इसलिए वह उस से हमदर्दी रखते हैं. अबकी बार तो वह कह रहे थे, अगर अब उस ने ज्यादा छुट्टियां लीं तो उसे नौकरी से निकाल देंगे.’’

दूसरी तरफ से औरत की जहरीली हंसी की आवाज आई, ‘‘हां, आप यह सच कह रही हैं मिसेज सिकंदर. सलिलि को दिल की बीमारी है, लेकिन वह दूसरी तरह की दिल की बीमारी है. वैसे मुझे सलिलि से कोई जलन नहीं है. मैं तो आप का भला चाहती हूं. आप यह मालूम करने की कोशिश करें कि जब आप के शौहर पिछले महीने बिजनैस के सिलसिले में सिंगापुर गए थे, उस वक्त उन की खूबसूरत सेक्रेटरी सलिलि कहां थी?’’

‘‘आप हद से आगे बढ़ रही हैं मैडम, अपनी बेहूदा बकवास बंद कीजिए.’’ गुस्से से मिसेज सिकंदर ने फोन रख दिया. दोनों हाथों से सिर थाम कर मिसेज सिकंदर सोच में डूब गईं.

उन्हें याद आया, जब पिछले महीने सिकंदर बिजनैस के लिए सिंगापुर गया था, तो उस ने उसे सिंगापुर के उस होटल का नाम बताया था, जहां वह ठहरने वाला था. लेकिन एक जरूरी काम के सिलसिले में जब उस ने सिकंदर को होटल फोन किया था तो होटल से बताया गया था कि सिकंदर नाम का कोई आदमी उन के होटल में नहीं ठहरा है. उस वक्त उस ने सोचा था कि सिकंदर ने किसी वजह से होटल बदल लिया होगा. लेकिन अब?

सिकंदर से उस की शादी किसी रोमांस का नतीजा नहीं थी. उसे कहीं देख कर सिकंदर ने उस के हुस्न की तारीफ की तो वह सोच में पड़ गई थी. वह सिकंदर से उम्र में बड़ी थी. देखने में भी कोई खास अच्छी नहीं थी. उसे अपने हुस्न के बारे में कोई गलतफहमी नहीं थी.

सिकंदर ने उस से शादी सिर्फ इसलिए की थी कि वह एक बड़ी दौलत और जायदाद की वारिस थी. 14 साल से वह सिकंदर के साथ एक अच्छी जिंदगी गुजार रही थी. सिकंदर देखने में स्मार्ट था और बेहद जहीन भी.

उस ने रोमा की दौलत को इस तरह बिजनैस में लगाया कि कारोबार चमक उठा. बिजनैस खूब फलफूल रहा था. 14 साल के अरसे में उन की शादी को एक शानदार कारोबारी समझौता कहा जा सकता था. दोनों एकदूसरे से खुश थे और इस कामयाब फायदेमंद कौंट्रैक्ट को तोड़ने पर राजी नहीं थे. दोनों ही खुशहाल जिंदगी बसर कर रहे थे.

शाम को सिकंदर की वापसी पर रोमा ने फोन काल के बारे में कुछ नहीं बताया. एक हफ्ता आराम से गुजरा. इस बार किसी आदमी का फोन था. जिस ने उसे दहशतजदा कर दिया. उस ने घबरा कर पूछा, ‘‘आप कौन हैं?’’

‘‘इस बारे में आप को फिक्र करने की जरूरत नहीं है. जो मैं कह रहा हूं, उसे ध्यान से सुनो मिसेज सिकंदर. मैं एक पेशेवर कातिल हूं. मैं मोटी रकम के बदले किसी का भी कत्ल कर सकता हूं. शायद यह जान कर आप को ताज्जुब होगा कि आप के शौहर सिकंदर ने आप को कत्ल करने के लिए मुझे 10 लाख रुपए की औफर दी है.’’

रोमा डर कर चिल्लाई, ‘‘तुम पागल हो गए हो या मजाक कर रहे हो? मेरा शौहर हरगिज ऐसा नहीं कर सकता.’’

मरदाना आवाज फिर उभरी, ‘‘अगर आप को आप के शौहर के औफर के बारे में न बताता तो शायद मैं पागल कहलाता. मैं हर काम बहुत सोचसमझ कर करता हूं. 10 लाख का औफर मिलने के बाद मैं ने अपने शिकार के बारे में जानकारी हासिल की और आप तक पहुंचा.

‘‘मैं कोई मामूली ठग या चोर नहीं हूं. अपने मैदान का कामयाब खिलाड़ी हूं. मैं इस तरह कत्ल करता हूं कि मौत नेचुरल लगे. किसी को भी कोई शक न हो. मैं अपने काम में कभी भी नाकाम नहीं रहा.’’

मिसेज सिकंदर ने कंपकंपाती आवाज में कहा, ‘‘यह सब क्या कह रहे हो तुम, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है.’’

अजनबी मर्द की आवाज गूंजी, ‘‘मैं आप को सब समझाता हूं. आप के हसबैंड की औफर कबूल करने के बाद मुझे आप के बारे में पता लगा कि सारी दौलत की मालिक आप हैं. आप का शौहर आप का कत्ल करवाने के बाद पूरी दौलत का मालिक बनना चाहता है.

‘‘तब मुझे एक खयाल आया कि अगर मिसेज सिकंदर मुझे डबल रकम देने पर राजी हो जाएं तो मैं उन की जगह उन के शौहर को ही ठिकाने लगा दूं. आप क्या कहती हैं, इस बारे में मिसेज सिकंदर?’’

मिसेज सिकंदर खौफ से चीखीं, ‘‘तुम एकदम पागल आदमी हो. मैं पुलिस को खबर कर रही हूं.’’

मर्द ने जोरों से हंसते हुए कहा, ‘‘पुलिस, आप उन्हें क्या बताएंगी. चलिए, अगर उन्होंने यकीन कर भी लिया तो आप मुझे कहां तलाश करेंगी? मैं पीसीओ से फोन कर रहा हूं. आप बेकार की बातें छोड़ें और गौर करें. आप दोनों में से कोई एक मरने वाला है. अब रहा सवाल यह कि मरने वाला कौन होगा? आप या आप का शौहर? इस का फैसला आप को करना होगा. आप तसल्ली से सोच लें. कल मैं इसी वक्त फिर फोन करूंगा. आप का आखिरी फैसला जानने के लिए.’’

दूसरी तरफ से फोन बंद हो गया.

शाम को सिकंदर घर नहीं आया. उस ने फोन कर दिया कि औफिस में काम ज्यादा है, वह देर रात तक काम करेगा. उस ने सोचा कि सलिलि के साथ ऐश करेगा. जब आधी रात को सिकंदर बैडरूम में दाखिल हुआ तो वह जाग रही थी और कुछ सोच रही थी.

सोचतेसोचते वह इस फैसले पर पहुंच गई कि सुबह सिकंदर को टेलीफोन के बारे में बताएगी. मगर सिर्फ पहले फोन के बारे में. वह उस से कहेगी कि अगर उसे कोई कीप रखनी है तो रखे. उसे कोई ऐतराज नहीं, पर यह बात राज रहे. कोई बदनामी न हो.

वह आखिर दूसरे फोन के बारे में क्या बताती कि एक आदमी ने कहा है कि मुझे कत्ल करने के लिए 10 लाख का औफर दिया गया है. अगर मैं औफर डबल कर दूं तो मेरी जगह वह मारा जाएगा. शायद यह सुन कर सिकंदर उसे पागलखाने में दाखिल करा दे.

फिर उसे खयाल आया कि क्यों न वह उस अजनबी मर्द के दूसरे फोन का इंतजार करे. हो सकता है बातचीत के दौरान उस की कोई ऐसी गलती पकड़ में आ जाए, जिस की वजह से सिकंदर और पुलिस दोनों को उस की बात का यकीन आ जाए. फिर उसे पागलखाने में डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

लेकिन उसे लगा कि पहले फोन के बारे में भी बताने की भी क्या जरूरत है. वह उस की कहानी सुन कर खूब हंसेगा. अफेयर से इनकार करेगा और चौकन्ना हो जाएगा.

जैसेजैसे वह सोच रही थी, उसे लग रहा था कि फोन करने वाला आदमी पागल है. आखिर सिकंदर उस का कत्ल क्यों करवाएगा? वह खुद बूढ़ा हो रहा है, तोंद निकल आई है. अब क्या इश्क लड़ाएगा. पर यह बात भी सच है कि वह उसे तलाक नहीं दे सकता, क्योंकि सारी दौलत उस के हाथ से निकल जाएगी.

पर अचानक एक खयाल ने उसे डरा दिया कि अगर आज वह मर जाती है तो सारी दौलत का मालिक सिकंदर होगा. इस तरह उसे अपनी बीवी से छुटकारा मिल जाएगा और वह सलिलि से शादी करने के लिए आजाद हो जाएगा.

इसी सोचविचार में सारी रात कट गई. दूसरे दिन जब फोन की घंटी बजी तो उसी मरदाना आवाज ने पूछा, ‘‘मैडम, आप ने क्या फैसला किया?’’

रोमा की पेशानी पसीने से भीग गई. उस ने कहा, ‘‘मैं तैयार हूं. मैं तुम्हें 20 लाख दूंगी, तुम शिकार बदल दो. पर शिकार सिकंदर नहीं, सलिलि होगी.’’

‘‘बहुत अच्छा फैसला है, मतलब अब इस लड़की को ठिकाने लगाना है.’’ मरदाना आवाज ने पूछा.

‘‘हां, मेरे शौहर के बजाए उस की सेक्रेटरी सलिलि को कत्ल करना बेहतर है. क्योंकि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. उसे लग रहा था, जैसे सलिलि और सिकंदर के अफेयर के बारे में सारी दुनिया जानती है. सलिलि के न रहने से वह खुद ही वफादार बन जाएगा और अगर उस ने अपनी बीवी को कत्ल कराने की कोशिश की थी तो वह उस से खौफजदा भी रहेगा.’’

उस के दिमाग में एक खयाल और आया कि ये सारी बातें लिख कर अपने वकील के पास हिफाजत से रखवा देगी कि उस की अननेचुरल डैथ के बाद इसे खोला जाए और मौत का जिम्मेदार सिकंदर को ठहराया जाए.

फोन में मरदाना आवाज उभरी, ‘‘मुझे इस से कोई मतलब नहीं कि शिकार कौन है? मैं अपना काम बहुत ईमानदारी और सलीके से करता हूं. मैं आज ही आप के शौहर के औफर से इनकार कर दूंगा.

‘‘आप का काम हो जाने के बाद फिर कभी आप मेरी आवाज नहीं सुनेंगी, पर एकदो चीजें बहुत जरूरी हैं. मैं अपनी फीस एडवांस में नहीं मांग रहा हूं पर आप को मेरे बताए पते पर मेरे कहे मुताबिक एक खत लिख कर भेजना पड़ेगा. मेरा पता है— रूस्तम, पोस्ट बौक्स-911, रौयल पैलेस.’’

रोमा ने घबरा कर पूछा, ‘‘मुझे क्या लिखना होगा?’’

‘‘आप को लिखना होगा कि आप ने 20 लाख के एवज में मुझे हायर किया है कि मैं आप के शौहर की सेक्रेटरी सलिलि फर्नांडीज को कत्ल कर दूं.’’ मरदानी आवाज सुनाई दी.

रोमा चीख पड़ी, ‘‘नहीं, हरगिज नहीं. इस तरह तो मैं कत्ल में शामिल हो जाऊंगी.’’

‘‘बेशक, पर यह खत मेरे लिए बहुत ही जरूरी है, क्योंकि इसे लिखने के बाद आप मेरे बारे में छानबीन नहीं करेंगी. यही खत मेरी फीस की गारंटी भी है. जब आप को सबूत मिल जाए कि सलिलि मर चुकी है, आप मुझे 20 लाख की रकम भेजेंगी. उस के मिलते ही कुरियर से आप को आप का खत वापस मिल जाएगा.’’

‘‘नहीं नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती.’’ रोमा ने चिल्ला कर कहा.

‘‘मुझे बहुत दुख है मैडम कि आप के शौहर आप से कहीं ज्यादा अक्लमंद हैं. उन्होंने मेरी हर बात मंजूर कर ली थी. अब मैं आप के शौहर से ही सौदा कर लेता हूं.’’

रोमा ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘ठहरो, मुझे तुम्हारी बात मंजूर है. बताओ, मुझे क्या लिखना है?’’

‘‘हां, यह ठीक है. आप कागज पेन ले लें, मैं आप को लिखवाता हूं.’’

रोमा ने कांपते हाथों से खत लिखा. फिर उस ने कहा, ‘‘मैं आप को खबर करूंगा कि आप खत भेज दें. खत मिलने के 2-3 दिन के अंदर ही अखबार में आप को सलिलि फर्नांडीस की मौत की खबर मिल जाएगी. फिर मैं आप को रकम के बारे में बताऊंगा कि कहां और कैसे भेजनी है. और फिर आप का खत आप को वापस मिल जाएगा. इस के बाद हमारा ताल्लुक खत्म.’’ दूसरी तरफ से फोन बंद हो गया.

2 दिन बाद फिर फोन आया. उस ने खत भेजने की हिदायत दी. रोमा ने खत रवाना कर दिया. तीसरे दिन अखबार में सलिलि फर्नांडीस की मौत की खबर छपी कि कल रात सलिलि फर्नांडीस की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई.

रोमा का शौहर सिकंदर काम के सिलसिले में कलकत्ता गया हुआ था. अब उसे कोई फिक्र नहीं थी. वह कहां जाता है, कहां ठहरता है, क्या करता है.

दूसरे दिन उसी आदमी ने रकम के बारे में कई हिदायतें दीं. रोमा ने अलगअलग बैंकों से रकम निकलवाई. कुछ अपने पास से मिलाई और बड़ी ईमानदारी से वहां पैसा पहुंचा दिया, जहां कहा गया था. वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. पेशेवर कातिल भी अपने वादे का पक्का निकला. दूसरे रोज ही रोमा को कुरियर से उस का खत वापस मिल गया. उस ने फौरन उसे जला दिया और चैन की नींद सो गई.

उसी रात रोमा का शौहर रोमा से कई सौ मील दूर अपनी खूबसूरत सेक्रेटरी सलिलि के साथ एक शानदार होटल में अपनी कामयाबी का जश्न मना रहा था. सलिलि ने पूछा, ‘‘सिकंदर, मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि यह सब कैसे हो गया? आखिर कैसे तुम ने मेरी मौत की खबर छपवा दी?’’

सिकंदर ने शराब का घूंट भरते हुए कहा, ‘‘बहुत आसानी से, तुम्हारे मरने की खबर और रकम मैं ने अखबार वालों को भेज दी थी और उस के साथ एक परचा रखा था—‘सलिलि फर्नांडीस का कोई रिश्तेदार या करीबी इस शहर में नहीं है और वह मेरी कंपनी में मुलाजिम थी. उस की सारी जिम्मेदारी मुझ पर आती है. उस के सारे मामलात मैं ही देख रहा हूं. बस अखबार के जरिए उस की मौत की खबर दुनिया को बताना चाहता हूं.’

उन लोगों ने दूसरे दिन ही यह खबर छाप दी. अच्छा जानेमन, तुम यह बताओ कि तुम ने फ्लैट छोड़ते वक्त अपनी मकान मालकिन से क्या कहा?’’

‘‘मैं ने मकान मालकिन से कहा था कि मैं दिल की मरीज हूं. अपने शहर वापस जा कर अपने डाक्टर से इलाज कराऊंगी, क्योंकि अब तकलीफ बहुत बढ़ गई है.’’

‘‘शाबाश, तुम्हें मुंबई आए अभी बहुत कम अरसा हुआ है. कोई तुम्हें जानता भी नहीं है, न कोई दोस्त है. अब तुम दूरदराज के इलाके में एक शानदार फ्लैट ले कर ठाठ से रहना. अपना नाम और पहचान भी बदल लेना. रोमा से मिले 20 लाख रुपए मैं किसी बिजनैस में लगा दूंगा ताकि हर महीने गुजारे के लिए अच्छीखासी रकम मिलती रहे.’’

‘‘डार्लिंग, तुम कितने अच्छे हो, सारी रकम मेरे नाम पर लगा रहे हो.’’

‘‘क्यों नहीं डियर, पहली बार टेलीफोन करने वाली तुम खुद थीं. तुम्हीं ने तो प्लान कामयाब बनाया.’’

‘‘मगर सिकंदर, सारी प्लानिंग तो तुम्हारी थी. तुम ने कितनी कामयाबी से आवाज बदल कर कातिल का रोल अदा किया. तुम्हारी आवाज सुन कर तो मैं भी धोखा खा गई थी. तुम वाकई में बहुत बड़े कलाकार हो.’’

‘‘चलो, फालतू बातें छोड़ो, अब हमारे मिलने में कोई रुकावट नहीं रहेगी. टूर का बहाना कर के मैं तुम्हारे पास आ जाया करूंगा. उधर रोमा अपनी दौलत पर नाज करते हुए चैन से सोएगी. अब मुझ पर शक भी नहीं करेगी.’’ Hindi Story

Hindi Family Story: सुबह अभी हुई नहीं थी – आखिर दीदी को क्या बताना चाहती थी मीनल

Hindi Family Story: सूरज निकलने में अभी कुछ वक्त और था. रात के कालेपन और सुबह के उजालेपन के बीच जो धूसर होता है वह अपने चरम पर चमक रहा था. चारों तरफ एक सर्द खामोशी छाई हुई थी. इस मुरदा सी खामोशी का हनन तब हुआ जब मीनल एकाएक हड़बड़ा कर उठ बैठी. वह कुछ इस तरह कांप रही थी जैसे उस के शरीर के भीतर बिजली सी कौंधी हो. उस की सांसें लगभग दौड़ रही थीं.

अपने आसपास देख उसे कुछ राहत हुई और उस ने तसल्ली जैसी किसी चीज की ठंडी आह भरी. वह एक बुरा सपना था. उसे अपने सपने पर खीज हो आई. ज्यादा खीज शायद इस बाबत कि आज भी कोई बुरा सपना आने पर वह बच्चों सी सहम जाती है. उस ने घड़ी की और देखा तो एक नई निराशा ने उसे घेर लिया. वह घंटों का जोड़भाग करती कि उसे याद हो आया की कमरे में वह अकेली नहीं है. उसे हैरत हुई कि जो कुछ सामने हो उसे कितनी आसानी से भूला जा सकता है. वह धीमे कदमों से हौल की तरफ बढ़ी. उसे यह देख राहत हुई की उस की हलचल से रजत की नींद में कोई खलल नहीं पड़ा था.

वह अपना सपना भूल एकटक रजत को निहारने लगी. जिसे आप प्रेम करते हों उसे चैन से सोते हुए देखना भी अपनेआप में एक बहुत बड़ा सुख होता है. वह खड़ी हुई और धीमे कदमों से, पूरी सावधानी बरतते हुए ताकि कोई शोर न हो, कमरे में टहलने लगी. अनायास ही कांच की लंबी खिड़की के सामने आ कर उस के कदम ठिठक गए. उस की नजर कांच की लंबी खिड़की से बाहर पड़ी तो उस की आखों में जादू भर आया.

खूब घने पाइन और देवदार के पेड़. हर जगह बर्फ और धीमी पड़ती बर्फबारी. दूर शून्य में दिखती हुई पहाड़ों की एक धुंधली सी परछाई. उसे ऐसा लग रहा था जैसे यह लैंडस्केप वास्तविकता में न हो कर किसी महान चित्रकार की उस के सामने की गई कोई पेंटिंग हो. यह नायाब नजारा धीरेधीरे उस के भीतर उतरने लगा.

अब उस के और इस अद्भुत नजारे के बीच बस कांच का एक टुकड़ा था, जैसे वह अपनी पूरी ताकत लगा बाहर की दुनिया के खुलेपन को मीनल के भीतर के बंद से मैला होने से बचाने की जद्दोजेहद में हो. मीनल को लगा जैसे उस की अपनी इस दुनिया से केवल 2 कदम दूर कोई दूसरी, बहुत ही खूबसूरत दुनिया बसती है, जैसे पहली बार उस की अपनी दुनिया और वह जिस दुनिया में होना चाहती है उन के बीच एक ऐसा फासला है जिसे वह सचमुच तय कर सकती है. उस ने मन ही मन कुछ निश्चय किया और शायद वहीं कुछ एक चिट में लिख शीशे पर चिपका कर और ठंड के मुताबिक कपड़े पहन अपने कमरे से बाहर आ गई.

मीनल को इस वक्त कोई जल्दी नहीं थी. वह बर्फ की फिसलन से बचते हुए, धीमे और सधे कदमों से आगे बढ़ने लगी. उस का बस चलता तो वह वक्त की धार को रोक इसी पल में सिमट जाती. शायद वह खुद को पूरा सोख लेना चाहती थी.

चलतेचलते उसे लगा कि यह वही समय है जब सबकुछ बहुत दूर नजर आता है, हमारी पहुंच से बिलकुल बाहर. रह जाते हैं केवल हम और बच जाता है हमारा नितांत अकेलापन या मीठा एकांत. वही समय है जो हमें परत दर परत खोलते हुए खुद ही के सामने उधेड़ कर रख देता है. हम अपने भीतर झांकते हैं, साहस से या किसी मजबूरीवश और खुद को आरपार देखते हैं.

पहले घड़ी देखने के बाद जो घंटों का हिसाब करना रह गया था, वह अब सालों के हिसाब का रूप ले चुका था. शायद सच ही है, जो कुछ भी हम सोचते हैं, करते हैं वह हम तक वापस लौटता है और वह भी इसी जीवन में.

मीनल चलते हुए बहुत दूर जा पहुंची थी और अब आसपास कोई जगह देखने लगी थी. जिस जगह वह बैठी वहां से दूर की पहाड़ियां भी एकदम साफ दिख रही थीं. शायद इसलिए ही उस ने यह जगह चुनी. उसे पहाड़ों से एक लगाव हमेशा से रहा था.

दूर पहाड़ियों की चोटियों पर पड़ी बर्फ की सफेद चादर उसे इस कदर आकर्षित करने लगी कि उस ने वह बर्फ नजदीक से देखने की जगह अगले जन्म बर्फ की चादर हो जाने की कामना की. होने को तो जिस पगडंडी पर चल कर वह इस जगह तक आई थी ढेर सारा बर्फ वहां भी जमा था, लेकिन उस की सतह से वह साफ सफेद होने की जगह धूल से मटमैली हो दागदार सी प्रतीत होती थी. यही कारण रहा होगा जिस की वजह से इस बर्फ ने उसे इस कदर प्रभावित नहीं किया. न ही उस ने इस बर्फ से गोले बना हाथों से कुछ खेलने की कोशिश की और न ही इस की छुअन के ठंडेपन को महसूस तक किया. वह उस के होने को जैसे नकार कर बिना कोई दिलचस्पी दिखाए आगे बढ़ती गई थी.

शायद जब हम किसी चीज को दूर से देखते हैं तो उस अनजान के झुरमुट में भी कुछ सुखद होने की आशा ही हमें विस्मित करती है. जब तक हम उस अनजान को नहीं जानते और उस के पास नहीं पहुंच जाते हमारा यह भ्रम बना रहता है और जैसे ही हम उस अनजान के नजदीक पहुंचते हैं हमारा यह भ्रम कुछ यों बिखरता है मानों भीतर बहुत कुछ टूट गया हो, ऐसा टूट जो किसी की नजर में आने का मोहताज नहीं होता. जिस टूट को केवल हम देख सकते हैं, जिस की पीड़ा केवल और केवल हम खुद महसूस कर सकते हैं.

पहाड़ों के सौंदर्य और सुनहले पुराने दिनों के बीच जरूर कोई अदृश्य लेकिन घनिष्ठ रिश्ता होता है, एक ऐसा रिश्ता जिस में कभी गांठें नहीं पड़तीं. मीनल को भी पहाड़ों की गोद में बैठ बीते किस्से याद हो आए. जीवन भले ही गंदे पानी के तलाब की तरह ही क्यों न रहा हो, उस गंदे से गंदे कीचड़ के बीच भी कुछ हसीन यादें दिलकश कमल की तरह उग आती हैं और यादें भी वे जिन के गुजरते वक्त हम अनुमान भी नहीं लगा सकते कि ये हमारे जेहन का हिस्सा बन हमारे अंत तक साथ रहेंगी और जिन से लिपट कर हम अपना सारा जीवन गुजार देना चाहेंगे.

याद आए किस्से अमूमन किसी बीते हुए प्रेम के होने चाहिए थे, किसी प्रेमी के होने चाहिए थे. लेकिन बादलों में मीनल को जो आकृति दिखाई दी वह बड़की दीदी की थी. उस ने एक गहरी सांस अंदर खींची और कस कर आंखें भींच लीं लेकिन इस के बाद भी पलकों के घने अंधेरेपन में जब बड़की दीदी नजर आईं तो वह कुछ कांप गई. उस ने कुछ धीरे से आंखें खोलीं.
यों बड़की दीदी को याद करने की कोई खास वजह नहीं थी. और इस वक्त तो बिलकुल भी नहीं. पर शायद हमारी जिंदगी के कुछ चुनिंदा खास लोग हमें इसी तरह याद आते हैं, बेवजह और बेवक्त.

बड़की दीदी से उस की 1 अरसे से मुलाकात नहीं हुई है. उसे अचरज हुआ कि इतना समय बीत जाने पर भी उन की छोड़ी छाप अमिट थी. बीते हुए दिन और ज्यादा पुरजोर तरीके से उस के सामने तैरने लगे थे. अतीत और वर्तमान के बीच की रेखा मद्धिम होती हुई एकदम धुंधली पड़ चुकी थी. वह बड़की दीदी को घर की कोई बात बता रही थी. जरूर कोई ऐसी बात रही होगी जिस के लिए मां ने उसे कहा होगा कि यह किसी को मत कहना. हर परिवार के अपने कुछ राज होते हैं. लेकिन बड़की दीदी भी तो उस परिवार में शामिल थीं. बड़की दीदी को वह बात कहते हुए उस की आवाज में कोई संकोच नहीं था और न ही कोई लागलपेट थी. वह बेधड़क हो धड़ल्ले से बोल रही थी.

बड़की दीदी एकमात्र इंसान थीं जिन के सामने वह अपनी हर बात रख सकती थी. जिन के सामने वह खुल कर रो सकती थी और जिंदगी में किसी ऐसे इंसान का होना जिस के सामने आप खुल कर रो सकें, किसी वरदान से कम नहीं हुआ करता

एक बार उस ने बड़की दीदी से कहा था,”काश, इंसान ने कोई ऐसी वाशिंग मशीन भी बनाई होती जिस में मैले हुए रिश्तों को चमकाया जा सकता, उस के सारे दागधब्बे साफ किए जा सकते और सारी गिरहें खोली जा सकतीं…”

बड़की दीदी उस से सहमत नहीं थीं. उन्होंने कहा था,”बिना गिरहों का रिश्ता कभी मुकम्मल नहीं होता. जब तक 2 लोग उन गिरहों को खोलने का खुद तकल्लुफ न उठाएं या उन गिरहों के साथ भी अपने रिश्तों को न सहेज पाएं वह रिश्ता मुकम्मल कैसे होगा…”

कई बार मीनल ने सोचा था कि बड़की दीदी उन के रिश्ते की गिरहें खोलने का प्रयास क्यों नहीं करतीं? पर उन के रिश्ते में दूरियां किस दिन या किस बाबत आईं इस पर ठीकठीक उंगली रखना मुमकिन नहीं है. कई बार रिश्तों में किसी की कोई गलती नहीं होती, वह रिश्ता धीरेधीरे स्वयं खोखला हो जाता है या समय की बली चढ़ जाता है. क्या प्रयास कर एक मरे हुए रिश्ते को जिंदा किया जा सकता है…

मीनल ने खुद को झंझोरा,’बड़की दीदी कहां सोचती होंगी मेरे बारे में, कहां मुझे याद करती होंगी? इतने सालों में एक फोन नहीं, एक मैसेज नहीं. क्या उन्हें कभी मेरी कमी महसूस नहीं हुई? मैं कैसी हूं यह जानने की इच्छा नहीं हुई? इतनी खट्टीमीठी स्मृतियां, साथ बिताए साल क्या सबकुछ… ‘

सवाल खुद से था, तो जवाब भी खुद ही देना था,’लेकिन मैं ने भी कहां किया उन से संपर्क? शायद उन्होंने भी कई दफा सोचा हो पर न कर सकी हों. अकसर रोजमर्रा की जिम्मेदारियां पुराने रिश्तों पर हावी हो जाया करती हैं…’ उस ने खुद ही को समझाने की कोशिश की.

उस ने अपने फोन में वह मैसेज खोला, जो वह लिख कर कई बार पढ़ चुकी है. वह मैसेज जो उस ने बड़की दीदी को लिखा तो था लेकिन कभी भेज नहीं सकी. वह यह सब सोचते हुए बर्फ में ही लेट गई. फिर अचानक लगा कि वह कुछ निश्चय करती इतने मे उसे रजत की आवाज करीब आती सुनाई दी,”मीनल, यह क्या… तुम्हारी सफेद जैकेट तो धूल में सन गई है. चलो, अब जल्दी इसे बदल लो फिर घूमने भी जाना है…” Hindi Family Story

Hindi Story: दामाद – अमित के सामने आई आशा की सच्चाई

Hindi Story: अमित आज शादी के बाद पहली बार अपनी पत्नी को ले कर ससुराल जा रहा था. पढ़ाईलिखाई में अच्छा होने के चलते उसे सरकारी नौकरी मिल गई थी. सरकारी नौकरी लगते ही उसे शादी के रिश्ते आने लगे थे. उस के गरीब मांबाप भी चाहते थे कि अमित की शादी किसी अच्छी जगह हो जाए. अमित के गांव के एक दलाल ने उस का रिश्ता पास के शहर के एक काफी अमीर घर में करवा दिया. अमित तो गांव की ऐसी लड़की चाहता था जो उस के मांबाप की सेवा कर सके लेकिन पता नहीं उस दलाल ने उस के पिता को क्या घुट्टी पिलाई थी कि उन्होंने तुरंत शादी की हां कर दी.

सगाई होते ही लड़की वाले तुरंत शादी करने की कहने लगे थे और अमित के पिताजी ने तुरंत ही शादी की हां भर दी. शादी से पहले अमित को इतना भी मौका नहीं मिला था कि वह अपनी होने वाली पत्नी से बात कर सके. अमित की मां ने उस की बात को भांप लिया था और उन्होंने अमित के पिता से कहा भी कि अमित को अपनी होने वाली पत्नी को देख तो लेने दो, लेकिन उस के पिता ने कहा कि शादी के बाद खूब जीभर के देख लेगा.

खैर, शादी हो गई और अमित को दहेज में बहुतकुछ मिला. लड़की वाले तो अमित को कार भी दे रहे थे लेकिन अमित ने मना कर दिया कि वह दहेज लेने के भी खिलाफ है लेकिन उस के पिताजी के कहने पर वह मान गया. सुहागरात को ही अमित को कुछकुछ समझ में आने लगा था क्योंकि उस की नईनई पत्नी बनी आशा ने न तो उस के मातापिता की ही इज्जत की थी और न ही सुहागरात को उस ने अमित को अपने पास फटकने दिया था.

अमित ने आशा से भी कई बार पूछा भी कि तुम्हारी शादी मुझ से जबरदस्ती तो नहीं की गई है लेकिन आशा ने कोई जवाब नहीं दिया. शादी के तीसरे दिन अमित अपनी मां और पिताजी के कहने पर एक रस्म के मुताबिक आशा को छोड़ने ससुराल चल दिया.

अमित और आशा ट्रेन से उतर कर पैदल ही चल दिए. अमित की ससुराल रेलवे स्टेशन के पास ही थी. रास्ते में आशा अमित से आगे चलने लगी. अमित ने देखा कि 2 लड़के मोटरसाइकिल पर उन की तरफ आ रहे थे. वे आशा को देख कर रुक गए और आशा भी उन को देख कर काफी खुश हुई.

अमित जब तक आशा के पास पहुंचा तब तक वे दोनों लड़के उस की तरफ देखते हुए चले गए. आशा के चेहरे पर असीम खुशी झलक रही थी. अमित के पास आने पर आशा ने अमित को उन लड़कों के बारे में कुछ नहीं बताया और अमित ने भी नहीं पूछा.

अमित अपनी ससुराल पहुंचा. वहां पर सब लोग केवल आशा को देख कर खुश हुए और अमित की तरफ किसी ने ध्यान भी नहीं दिया. आशा की मां उसे ले कर अंदर चली गईं और अमित बाहर बरामदे में खड़ा रहा. अंदर से उस के ससुर और दोनों साले बाहर आए.

अमित के ससुर ने पास ही रखी कुरसी की तरफ इशारा किया और बोले, ‘‘अरे, खड़े क्यों हो, बैठ जाओ.’’ अमित चुपचाप बैठ गया. उसे वहां का माहौल कुछ ठीक नहीं लग रहा था.

अमित के सालों ने तो उस की तरफ ध्यान भी नहीं दिया था. शाम होने को थी और अंधेरा धीरेधीरे बढ़ रहा था. अमित को फर्स्ट फ्लोर के एक कमरे में ठहरा दिया. अमित थोड़ा लेट गया और उस की आंख लग गई. नीचे से शोर सुन कर अमित की आंख खुली तो उस ने देखा कि अंधेरा हो चुका था और रात के 9 बज चुके थे.

अमित खड़ा हुआ और उस ने मुंह धोया. उस को हैरानी हो रही थी कि किसी ने उस से चाय तक की नहीं पूछी थी. अमित उसे अपना वहम समझ कर भूलने की कोशिश कर रहा था. लेकिन दिमाग तो उस के पास भी था इसलिए वह अपने ही विचारों में खोया हुआ था.

अब नीचे से जोरजोर से हंसने की आवाज आ रही थी. अमित के ससुर शायद किसी से बात कर रहे थे. अमित ने नीचे झांका तो पाया कि उस के ससुर और 2-3 लोग बरामदे में महफिल लगाए शराब पी रहे थे. अमित के ससुर बहुत शराब पी चुके थे इसलिए वे अब होश में नहीं थे.

वे बोले, ‘‘देखा मेरी अक्ल का कमाल. मैं ने अपनी बिगड़ैल बेटी की शादी कैसे एक गरीब लड़के से करा दी वरना आप लोग तो कह रहे थे कि इस बिगड़ी लड़की से कौन शादी करेगा,’’ इतना कह कर वे जोर से हंसे और बाकी बैठे दोनों लोगों ने भी उन का साथ दिया और उन की इस बात का समर्थन किया. अमित के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई.

तभी अमित की सास आईं और उस के ससुर के कान में कुछ बोलीं जिस को सुन कर वे तुरंत अंदर गए. अब अमित को समझ आ गया था कि उस के ससुर ने ही अपना रोब दिखा कर उस के पिताजी को डराया होगा और उस की शादी आशा से कर दी होगी. तभी उस के पिताजी उस की शादी में उस के सवालों के जवाब नहीं दे रहे थे.

अमित का सिर चकरा रहा था. वह तुरंत नीचे उतरा और अंदर कमरे के दरवाजे पर पहुंचा. अमित ने अंदर देखा कि आशा एक कोने में नीचे ही बैठी है और उस के ससुर उस के पास खड़े उसे डांट रहे हैं. उन्होंने कहा कि अब वह किस के साथ अपना मुंह काला करा आई. अमित को तो अब बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा था, ऐसा लगता था कि उस की शादी किसी बिगड़ैल लड़की से करा दी गई है और उस का परिवार भी सामाजिक नहीं है. तभी उस की सास ने आशा के बाल पकड़े और उस को मारने लगीं.

आशा बिलकुल चुप थी और वह अपनी पिटाई का भी बिलकुल विरोध नहीं कर रही थी. आशा की मां उसे रोते हुए मारे जा रही थीं. तभी पता नहीं अमित को क्या सूझा कि वह अंदर पहुंचा और अपनी सास से आशा को मारने को मना किया.

अमित को अंदर आया देख सासससुर घबरा गए. ससुर का तो नशा भी उतर गया था. वे समझ चुके थे कि अमित ने सब सुन लिया है. अमित के ससुर अब कुरसी पर बैठ कर रो रहे थे और उस की सास का भी बुरा हाल था. तभी अमित के ससुर एक झटके से उठे और कमरे से अपनी दोनाली बंदूक ले आए और आशा की तरफ तान कर बोले, ‘‘मैं ने इस की हर गलती को माफ किया है. बड़ी मुश्किल से मैं ने इस की शादी कराई है और अब यह मुंह काला करा कर पता नहीं किस का पाप अपने पेट में ले आई है. मैं इसे नहीं छोड़ूंगा.’’

तभी अमित ने उन के हाथों से बंदूक छीन ली और एक तरफ फेंक दी. वह बोला, ‘‘चलो आशा, मेरे साथ अपने घर.’’ आशा ने झटके से अपना चेहरा ऊपर उठाया. अमित की बात सुन कर उस के सासससुर भी चौंक गए.

अमित के ससुर बोले, ‘‘अमित, तुम आशा की इतनी बड़ी गलती के बावजूद उसे अपने साथ घर ले जाना चाहते हो?’’ अमित बोला, ‘‘आप सब लोगों के लाड़प्यार की गलती आशा ही क्यों भुगते. इस में इस की क्या गलती है. गलती तो आप के परिवार की है जो ऐसे काम को अपनी शान समझते हैं और उस को छिपाने के लिए मुझ जैसे लड़के से उस की शादी करवा दी.’’

अमित थोड़ी देर रुका और फिर बोला, ‘‘आशा की यही सजा है कि उसे मेरे साथ मेरी पत्नी बन कर रहना पड़ेगा.’’ यह सुन कर उस के ससुर ने उस के पैर पकड़ लिए लेकिन अमित ने उन्हें उठाया और आशा का हाथ पकड़ कर घर से बाहर निकल गया.

आशा अमित के पीछेपीछे हो ली. अमित के ससुर तो हाथ जोड़े खड़े थे. अमित और आशा पैदल ही जा रहे थे तभी उन्हें वही दोनों लड़के मिले जो उन्हें आते हुए मिले थे. अब की बार वे दोनों पैदल ही थे. आशा को देख उन में से एक बोला, ‘‘चलो आशा डार्लिंग, हम तुम्हारे पेट में पल रहे बच्चे को गिरवा देते हैं और फिर से मजे करेंगे.’’

इतना कह कर वे दोनों बड़ी बेहूदगी से हंसने लगे. उन में से एक ने आशा का हाथ पकड़ने की कोशिश की तो अमित ने उसे पकड़ कर अच्छीखासी धुनाई कर दी और जब दूसरा लड़का अपने साथी को बचाने आया तो आशा ने उस के बाल पकड़ कर नीचे गिरा दिया और लातों से अधमरा कर दिया. थोड़ी देर में वे दोनों ही वहां से भाग खड़े हुए. आशा का साथ देना अमित को अच्छा लगा था. अमित ने आशा का हाथ पकड़ा और रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़े.

घर पहुंच कर अमित ने अपने मां और पिताजी को कुछ नहीं बताया. अब आशा ने अमित के घर को इस तरह से संभाल लिया था कि अमित सबकुछ भूल गया. आशा ने जब उस के पेट में पल रहे बच्चे को गिराने की बात कही तो अमित ने कहा, ‘‘इस में इस मासूम की क्या गलती है…’’ आशा अमित के पैरों में गिर पड़ी और रोने लगी. अमित ने उसे उठाया और गले से लगा लिया. वह बोला, ‘‘आशा, तुम्हारे ये पछतावे के आंसू ही तुम्हारी पवित्रता हैं.’’

आशा अमित के गले लग कर रोए जा रही थी. दूर शाम का सूरज नई सुबह में दोबारा आने के लिए डूब रहा था. Hindi Story

Hindi Romantic Story: इश्क वाला लव – मिस रुशाली की तिरछी नजर का तीर

Hindi Romantic Story: जब से मिस रुशाली की प्यार भरी नजर मु झ पर पड़ी थी, तब से मानो मैं तो जी उठा था. हमारे दफ्तर के सारे मर्दों में मैं ही तो सिर्फ शादीशुदा था और उस पर एक बच्चे का बाप भी. ऐसे में मिस रुशाली पर मेरा जादू चलना किसी चमत्कार से कम न था. पर अब जब यह चमत्कार हो गया था, तब ऐसे में सभी को आहें भरते देख मैं खुद पर नाज कर बैठा था.

‘‘मैं ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि उस विशाल पर मिस रुशाली फिदा होंगी. पता नहीं, उस हसीना को उस ढहते हुए बूढ़े बरगद के पेड़ में न जाने क्या नजर आया, जो उसे अपना दिल दे बैठी?’’ लंच करते वक्त रमेश आहें भरता हुआ सब से कह रहा था.

‘‘हां भाई, अब यह बेचारा दिल ही तो है. अब यह किसी गधे पर आ जाए, तो इस में उस कमसिन मासूम हसीना का क्या कुसूर?’’ राहुल के इस मजाक पर सभी खिलखिला कर हंस पड़े.

कैंटीन में घुसते वक्त जब मैं ने अपने साथियों की ये बातें सुनीं, तो मैं मन ही मन इतरा उठा और अपना लंच बौक्स उठा कर दोबारा अपनी सीट पर आ कर बैठ गया.

अपने दफ्तर के सारे आशिकों के जलते हुए दिलों से निकलती हुई आहें मेरे मन को ऐसा सुकून दे रही थीं कि मैं खुशी के चलते फिर कुछ खा न पाया.

तब मैं ने चपरासी से कौफी मंगाई और कौफी पी कर फिर से अपने काम में जुट गया. वैसे तो उस समय मैं लैपटौप पर काम कर रहा था, पर मेरा ध्यान तो मिस रुशाली के इर्दगिर्द ही घूम रहा था.

सलीके का पहनावा, तीखे नैननक्श, सुल झे हुए बाल और उस पर मदमस्त चाल. सच में मिस रुशाली एक ऐसा कंपलीट पैकेज है, जिस के लिए जितनी भी कीमत चुकाई जाए, कम है.

अब तो मिस रुशाली के सामने मुझे अपनी पत्नी प्रिया की शख्सीयत बौनी सी लगने लगी थी. वैसे, प्रिया में एक पत्नी के सारे गुण थे और मैं उसे प्यार भी करता था, पर मिस रुशाली से मिलने के बाद मुझे लगने लगा था कि कुछ तो ऐसा है मिस रुशाली में, जो प्रिया में नहीं है.

शायद, मु झे मिस रुशाली से इश्क वाला लव हुआ है, जो शायद उस लव से ज्यादा है, जो मैं अपनी पत्नी प्रिया से करता था, इसलिए तो मिस रुशाली मेरे मन में बसती जा रही थी.

इधर मेरा प्यार परवान चढ़ रहा था, तो उधर मिस रुशाली का जादू मेरे सिर चढ़ कर बोलने लगा था.

लौंग ड्राइव, पांचसितारा होटल में डिनर, महंगे उपहार पा कर मिस रुशाली मु झ पर फिदा हो गई थी. जब भी मैं उस की बड़ीबड़ी  झील सी आंखों में अपने प्रति उमड़ रहे प्यार को देखता, तब मेरा दिल जोरजोर से धड़कने लगता था.

अब तो सिर्फ इसी बात की इच्छा होती कि न जाने ऐसा वक्त कब आएगा, जब मिस रुशाली की प्यार भरी नजरें मु झ पर मेहरबान होंगी और उस प्यार भरी बारिश में मेरा मन भीग जाएगा.

बस, इसी कल्पना की चाह में मैं फिर से जी उठा था. ऐसा लगता था, मानो मैं उस मंजिल को पा गया हूं, जहां धरती और आसमान एक हो जाते हैं.

पर प्रिया मेरे अंदर आए इस बदलाव से कैसे अछूती रह पाती? अब उस की सवालिया नजरें मु झ पर उठने लगी थीं. पर मैं चुप था, क्योंकि मु झे एक सही मौके की तलाश जो थी.

रात को सोते वक्त जब कभी प्रिया मेरे नजदीक आने की कोशिश करती, तब मैं जानबू झ कर उस की अनदेखी कर देता था.

तब मैं तो मुंह फेर कर सो जाता और वह आंसू बहाती रहती. मु झे उस का रोना अखरता था, पर मैं क्या करता? मैं अपने दिल के हाथों मजबूर जो था.

बीतते समय के साथ मेरी मिस रुशाली को पाने की चाह बढ़ने लगी थी, क्योंकि मिस रुशाली की बड़ीबड़ी आंखों में मेरे प्रति प्यार का सागर तेजी से हिलोरें जो लेने लगा था.

अब मु झे लगने लगा था कि शायद सही वक्त आ गया है, जब मु झे प्रिया से तलाक ले कर मिस रुशाली को अपना बनाना होगा, तभी मेरी इस उमस भरी जिंदगी में खुशियों के फूल खिल पाएंगे.

अभी मैं सही मौके की तलाश में था कि अचानक मेरी किस्मत मु झ पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गई. प्रिया के मामाजी के अचानक बीमार होने के चलते वह पूरे 3 दिन के लिए आगरा क्या गई, मु झे तो मानो दबा हुआ चिराग मिल गया.

‘सुनो, मैं आगरा जा रही हूं. तुम्हारा खाना कैसरोल में रखा है,’ प्रिया अपना सामान पैक करते हुए फोन पर मु झ से कह रही थी.

‘‘तुम जल्दी से निकलो. मेरे खाने

की चिंता मत करो, वरना तुम्हारी शाम वाली बस छूट जाएगी,’’ मैं खुशी के मारे हड़बड़ा रहा था.

‘हां जी, वह तो ठीक है. मैं ने श्यामा को बोल दिया है कि वह सुबहशाम आप का मनपसंद खाना बना दिया करेगी,’ प्रिया अभी भी मेरे लिए परेशान थी.

‘‘प्रिया, मैं तो चाह रहा था कि मैं दफ्तर से जल्दी निकल कर तुम्हें बसस्टैंड पर छोड़ आऊं, पर क्या करूं, इतना ज्यादा काम जो है,’’ मैं ने अपनी चालाकी दिखाते हुए कहा.

‘नहीं जी, आप अपना काम करो. मैं चली जाऊंगी,’ इतना कह कर प्रिया ने फोन रख दिया.

प्रिया का इस तरह अचानक चले जाना मु झे एक अनजानी सी खुशी दे गया. मैं बावला सा कभी सोचता कि यहां दफ्तर में ही मिस रुशाली को सबकुछ बता कर अपने घर ले जाऊं.

पर फिर बहुत सोचने के बाद मु झे यही लगा कि मैं अपने घर पहुंच कर फ्रैश होने के बाद ही मिस रुशाली से मिलने जाऊंगा.

जब वह अचानक मु झे देखेगी, तब मु झ पर चुंबनों की बरसात कर देगी और उस प्यारभरी बारिश में भीग कर हम दोनों दो जिस्म एक जान बन जाएंगे.

बस फिर क्या था. मैं तुरंत घर पहुंचा और अच्छी तरह तैयार हो कर मिस रुशाली के पास पहुंच गया.

दरवाजे की घंटी बजाने पर दरवाजा रुशाली ने नहीं, बल्कि एक मोटी सी औरत ने खोला.

‘‘मिस रुशाली…’’

‘‘वह ऊपर रहती है,’’ उस औरत ने बेरुखी से कहा.

फिर मैं ऊपर चढ़ गया. जब मैं रुशाली के कमरे में पहुंचा, तब मैं ने देखा कि वह किसी चालू फिल्मी गाने पर थिरक रही थी. कमरे में चारों तरफ कपड़े बिखरे पड़े थे और जूठे बरतन यहांवहां लुढ़के पड़े थे.

‘‘अरे तुम, अचानक…’’ मु झे अचानक सामने देख वह हड़बड़ा गई, ‘‘वह क्या है न, आज मेड नहीं आई.’’

रुशाली यहांवहां पड़ा सामान समेटने लगी. फिर उस ने सामने पड़ी कुरसी पर पड़ी धूल साफ की और मु झे बैठने का इशारा किया. फिर वह मेरे लिए पानी लेने चली गई.

रुशाली के जाने के बाद जब मैं ने कमरे में चारों तरफ नजर घुमाई, तो गर्द की जमी मोटी सी परत को पाया.

इतना गंदा कमरा देख मेरा जी मिचलाने लगा. अब धीरेधीरे मु झे अपनी प्रिया की कद्र सम झ आने लगी थी. वह तो सारा घर शीशे की तरह चमका कर रखती है, तब भी मैं उसे टोकता ही रहता हूं, पर यहां तो गंदगी का ऐसा आलम है कि पूछो मत.

‘‘कुछ खाओगे क्या?’’ पानी का गिलास देते हुए रुशाली मु झ से पूछ बैठी.

‘‘हां… भूख तो लगी है.’’

‘‘ये लो टोस्ट और चाय,’’ थोड़ी देर में रुशाली मु झे चाय की ट्रे थमाते हुए बोली.

डिनर में चाय देख कर मेरे सिर पर चढ़ा इश्क का रहासहा भूत भी उतर गया.

‘‘वह क्या  है न… मु झे तो बस यही बनाना आता है, क्योंकि सारा खाना तो मेरी आंटी ही बनाती हैं. पेईंग गैस्ट हूं मैं उन की,’’ रुशाली अपना पसीना पोंछते हुए बोली, तो मैं सम झ गया कि अब तक मैं जो कुछ भी रुशाली के लिए महसूस कर रहा था, वह सिर्फ एक छलावा था. मेरा उखड़ा मूड देख कर तुरंत रुशाली ने अपना अगला पासा फेंका.

वह तुरंत मेरे पास आई और बेशर्मी से अपना गाउन उतारने लगी.

‘‘क्या कर रही हो यह…’’ मैं गुस्से से तमतमा उठा.

‘‘अरे, शरमा क्यों रहे हो? जो करने आए थे, वह करे बिना ही वापस चले जाओगे क्या?’’ इतना कह कर वह मु झ से लिपटने लगी.

उसे इस तरह करते देख मैं हड़बड़ा गया. इस से पहले कि मैं खुद को संभाल पाता, उस ने मु झे यहांवहां चूमना शुरू कर दिया.

तभी अचानक मेरे गले में पड़ा लौकेट उस के हाथ में आ गया, जिस

में मेरी बीवी प्रिया और अंशुल का

फोटो था.

‘‘ओह, तो यह है तुम्हारी देहाती पत्नी… अरे, इसे तलाक दे दो और मेरे नाम अपना फ्लैट कर दो, फिर देखो कि मैं कैसे तुम्हें जन्नत का मजा दिलाती हूं?’’ इतना कह कर वह मु झ से लिपटने की कोशिश करने लगी.

‘‘प्यार बिना शर्त के होता है रुशाली,’’ मैं उस समय सिर्फ इतना ही कह पाया.

‘‘आजकल कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता, मिस्टर. हर चीज की कीमत होती है और हर किसी को वो कीमत चुकानी ही पड़ती है,’’ इतना कह कर रुशाली जोर से हंस पड़ी.

रुशाली के प्यार का यह घिनौना रूप देख मैं टूट सा गया और उसे धक्का दे कर बाहर आ गया.

हारी हुई नागिन की तरह रुशाली जोर से चीखते हुए बोली, ‘‘विशाल, मेरा डसा तो पानी भी नहीं मांगता, फिर तुम क्या चीज हो?’’

पर मैं तब तक अपनी कार में बैठ चुका था और मेरे इश्क वाले लव का भूत उतर चुका था. Hindi Romantic Story

Best Hindi Kahani: अहंकारी – कामना की वासना का खेल

Best Hindi Kahani: अभिजीत 2 दिनों से घर नहीं लौटा था. उस की मां सरला देवी कंपनी में पूछ आई थीं. अभिजीत 2 दिन पहले कंपनी में आया था, यह चपरासी ने सरला देवी को बताया था. अभिजीत 25 साल का अच्छी कदकाठी का नौजवान था. वह सेठ गोपालदास की कंपनी में पिछले 2 साल से बतौर क्लर्क काम कर रहा था. अभिजीत के परिवार में उस की मां सरला देवी के अलावा 2 बहनें थीं. 2 साल पहले अभिजीत के पिता की मौत हो चुकी थी. वे भी सेठ गोपालदास की कंपनी में काम करते थे. उन्हीं की जगह अभिजीत इस कंपनी में काम कर रहा था.

अभिजीत के इस तरह गायब होने से सरला देवी और उन की दोनों बेटियां परेशान थीं. सरला देवी को उम्मीद थी कि सेठ गोपालदास ने उसे कंपनी के किसी काम से बाहर भेजा होगा, पर अब उन के द्वारा इनकार किए जाने पर सरला देवी की परेशानी और बढ़ गई थी.

सरला देवी ने अभिजीत को हर जगह तलाश किया, पर वह कहीं नहीं मिला. आखिर वह गया तो कहां गया, यह बात उस की मां को बेहद परेशान करने लगी. फिर उन्होंने कंपनी के सिक्योरिटी गार्ड से बात की. पहले तो उस ने इधरउधर की बात की, फिर बता दिया कि उस दिन कंपनी की छुट्टी का समय हो गया था. उस में काम करने वाले लोग जा चुके थे.

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अभिजीत अपने थोड़े बचे काम को तेजी से निबटा रहा था, ताकि समय से घर लौट सके. तभी सेठ गोपालदास की छोटी बेटी कामना कंपनी में आई. वह अभिजीत की टेबल के करीब आई और अपने हाथ टेबल पर टिका कर झुक गई.

उस समय वह जींस और शर्ट पहने हुई थी, जो उस के भरेभरे जिस्म पर यों कसी हुई थीं कि उस के बदन की ऊंचाइयां और गहराइयां साफ दिख रही थीं.

अभिजीत अपने काम में मशगूल था. कामना ने उस का ध्यान खींचने के लिए अपना पैर धीरे से पटका.

आवाज सुन कर अभिजीत ने नजरें उठा कर देखा तो बस देखता ही रह गया. कामना उस की टेबल पर हाथ टिकाए झुकी हुई थी, जिस से उस के भारी और दूधिया उभारों का ऊपरी हिस्सा शर्ट से झांक रहा था.

वह गार्ड नौजवान था, पर समझदार भी था. उस ने सरला देवी को बताया कि उसे कामना का बरताव अजीब लगा था. वह कोने में खड़ा हो कर उन की बातें सुनने लगा. दफ्तर तो पूरा खाली ही था.  उन दोनों की बातचीत इस तरह थी:

‘कहां खो गए?’ कामना धीरे से बोली थी.

‘कहीं नहीं,’ अभिजीत ने बौखला कर अपनी नजरें उस के उभारों से हटा ली थीं. उस की बौखलाहट देख कर कामना के होंठों पर एक मादक मुसकान खिल उठी थी. वह अभिजीत के सजीले रूप को देखते हुए बोली थी, ‘क्यों, आज घर जाने का इरादा नहीं है?’

‘है तो…’ अभिजीत अपनेआप को संभालते हुए बोला था, ‘थोड़ा सा काम बाकी रह गया था, सोचा, पूरा कर लूं तो चलूं.’

‘काम का क्या है, वह तो होता ही रहेगा…’ कामना बोली थी, ‘पर इनसान को कभीकभी घूमनेफिरने का समय भी निकालना चाहिए.’

‘मैं समझा नहीं.’

‘मैं समझाती हूं…’ कामना अभिजीत की आंखों में झांकते हुए बोली थी, ‘अभिजीत, तुम्हें घर लौटने की जल्दी तो नहीं है न?’

‘कोई खास जल्दी नहीं…’ अभिजीत बोला था.

‘मैं आज मूड में हूं और अगर तुम्हें एतराज न हो, तो तुम मेरे साथ पापा के कमरे में चलो.’

‘पर मैं आप का मुलाजिम हूं और आप मेरे मालिक की बेटी.’

‘मैं इन बातों को नहीं मानती…’ कामना बोली थी, ‘मैं तो बस इतना जानती हूं कि मैं इनसान हूं और तुम भी. तुम मुझे अच्छे लगते हो. अब मैं तुम्हें अच्छी लगती हूं या नहीं, तुम जानो.’

‘आप भी मुझे अच्छी लगती हैं…’ अभिजीत पलभर सोचने के बाद बोला था, ‘ठीक है.’

कामना अभिजीत को ले कर एक कमरे में पहुंचे. दफ्तर में अंधेरा था, पर दरवाजे में एक छेद भी था. गार्ड उसी से देखने लगा कि अंदर क्या हो रहा है.

उस गार्ड ने सरला देवी को बताया कि अभिजीत कामना की इस हरकत से परेशान लग रहा था.

‘अरे, तुम अभी तक खड़े ही हो?’ कामना बोली थी, ‘आराम से सोफे पर बैठो.’

अभिजीत आगे बढ़ कर कमरे में रखे गुदगुदे सोफे पर बैठ गया था. कामना आ कर उस के करीब बैठ गई थी और अभिजीत की आंखों में झांकते हुए बोली थी, ‘अभिजीत, तुम ने किसी से प्यार किया है?’

गार्ड सब सुन सकता था, क्योंकि पूरे दफ्तर में सन्नाटा था.

‘नहीं…’ अभिजीत बोला था, ‘कभी यह काम करने का मौका ही नहीं मिला.’

‘अगर मिला, तो क्या करोगे?’

अभिजीत चुप रहा था.

‘तुम ने जवाब नहीं दिया?’

‘हां, करूंगा’ वह बोला था.

‘आज मौका है और समय भी.’

‘पर लड़की?’

‘तुम्हारा मेरे बारे में क्या खयाल है?’ कहते हुए कामना ने अपनी शर्ट उतार दी. उस के ऐसा करते ही उस के उभार अभिजीत के सामने आ गए थे. उन को देखते ही अभिजीत के सब्र का बांध टूट गया था. जब कामना उस से लिपट गई, तो पलभर के लिए वह बौखलाया, फिर अपने हाथ कामना की पीठ पर कस दिए.

इस के बाद तो अभिजीत सबकुछ भूल कर कामना की खूबसूरती की गहराइयों में उतरता चला गया.

सरला देवी ने कामना के ड्राइवर से भी पूछताछ की. उसे भी बहुतकुछ मालूम था. उस ने बताया कि पिछली सीट पर अकसर कामना मनमाने ढंग से उस का इस्तेमाल करने लगी थी.

कामना का दिल जिस पर आ जाता, वह उसे अपने प्रेमजाल में फांसती, उस से अपना दिल बहलाती और जब दिल भर जाता, तो उसे अपनी जिंदगी से निकाल फेंकती.

ड्राइवर ने आगे बताया कि एक दिन उन दोनों में झगड़ा हुआ था. कामना का दिल उस से भर गया, तो वह उस से कन्नी काटने लगी. उस के इस रवैए से अभिजीत तिलमिला उठा. वह कामना से सच्चा प्यार करता था.

जब कामना को पता चला तो वह बोली थी, ‘अपनी औकात देखी है तुम ने? तुम हमारी कंपनी में एक छोटे से मुलाजिम हो. मैं ब्राह्मण और तुम यादव. दूसरी जाति की लड़की को तुम प्यार कर पा रहे हो, क्या यह कम है. शादी की तो सोचना भी नहीं.’

‘पर तुम ने इसी मुलाजिम से दिल लगाया था?’

‘दिल नहीं लगाया था, बल्कि दिल बहलाया था. अब मेरा दिल तुम से भर गया है, इसलिए हमारे रास्ते अलग हैं.’

‘नहीं…’ अभिजीत तेज आवाज में बोला था, ‘तुम मुझे यों अपनी जिंदगी से नहीं निकाल सकती.’

‘और अगर निकाला तो?’

‘मैं सारी दुनिया को तुम्हारी हकीकत बता दूंगा.’

अभिजीत की बात सुन कर कामना पलभर को हड़बड़ाई, पर अगले ही पल उस की आंखों से गुस्सा टपकने लगा. वह अभिजीत को घूरते हुए बोली, ‘तुम ऐसा कर नहीं पाओगे. मैं तुम्हें ऐसा हरगिज करने नहीं दूंगी.’

यह बात सारा दफ्तर जानता था कि एक दिन अभिजीत से सेठ गोपालदास ने कठोर आवाज में सब के सामने बोला था, ‘तुम ने हमारी बेटी को अपने प्रेमजाल में फंसाया और उस की इज्जत पर हाथ डाला. यह बात खुद कामना ने मुझे बताई है.

‘कोई मेरी बेटी के साथ ऐसी हरकत करे, मैं यह बरदाश्त नहीं कर सकता. तुझे इस की सजा मिलेगी,’ इतना कहने के बाद सेठजी ने अपने आदमियों को इशारा किया था.

सेठजी के आदमी अभिजीत को खींचते हुए दफ्तर से बाहर ले गए. इस के बाद अभिजीत को किसी ने नहीं देखा था.

अभिजीत को गायब हुए जब 10 दिन बीत गए, तो सरला देवी समझ गईं कि अभिजीत मार दिया गया है.

सरला देवी ने उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में लिखवा दी.

सरला देवी अपने बेटे को ले कर यों परेशानी के दौर से गुजर रही थीं कि उन की मुलाकात अभिजीत के एक दोस्त से हुई, जो उसी के साथ काम करता था. उस ने सरला देवी को बताया कि अभिजीत को मारने में सेठ गोपालदास का हाथ है.

सरला देवी ने अभिजीत के दोस्त को बताया कि कामना को सबक सिखाना है. कामना अपनी ऐयाशियों में डूबी हुई थी. अभिजीत की मौत से बेपरवाह कामना की नजरें एक दूसरे लड़के को ढूंढ़ रही थीं. उस ने रमेश को फांस लिया.

एक शाम जब कामना अपनी कार में लौंग ड्राइव पर निकली थी, तो रमेश उसे सरला देवी के घर ले गया.

सरला देवी को देख कर कामना की घिग्घी बंध गई. वह सबकुछ उगल गई. रमेश ने उसे एक कुरसी से बांध दिया और कई घंटों तक तड़पने के लिए छोड़ दिया. इस के बाद कामना का पूरा बयान रेकौर्ड कर लिया.

रात में जब सरला देवी ने उसे छोड़ा तो कहा, ‘‘जैसे मैं जिंदगीभर अभिजीत को याद करूंगी, वैसे ही तुम भी करना. यह टेप, यह बयान, हर बार तब काम आएंगे, जब तुम शादी करने की कोशिश करोगी.’’

कामना के पास कोई चारा नहीं बचा था. वह पैदल ही घर की ओर चल पड़ी, हारी और लुटी हुई. Best Hindi Kahani

Hindi Kahani: टिट फौर टैट – जैसे को तैसा

Hindi Kahani: साल की बैस्ट कहानी का अवार्ड लेते ही पूरा हौल तालियों से गूंज उठा था. विजयी लेखिका अरुंधती ने डायस पर आ कर धन्यवाद प्रेषित किया और अपनी कहानी के बारे में बताना शुरू किया-

“आप सब का बहुत शुक्रिया जो आप ने मेरी कहानी को वोट कर के इसे नंबर वन कहानी होने का खिताब दिलवाया. यह इस बात की तस्दीक भी करता है कि मेरी कहानी सिर्फ कहानीभर नहीं, बल्कि बहुत सी औरतों के जीवन की सचाई भी है.

“इस कहानी में एक ऐसी खूबसूरत व हसीन लड़की है जो अपने पति को एक महिला के साथ जिस्मानी संबंध बनाते देख लेती है और पति से इस बात की शिकायत करने पर उस के पति के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती, बल्कि वह और भी बेशर्म व निडर हो जाता है. और अब तो वह खुलेआम दूसरी औरत को घर में भी लाने लगता है. मेरी नायिका दूसरी भारतीय नारियों की तरह इस घटना से रोती नहीं, टूटती नहीं, बल्कि अपने पति को सबक सिखाती है. अगर उस का शादीशुदा पति किसी औरत से शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे भी पूरा हक है कि वह अपने पति से तलाक ले और अपनी शर्तों पर जीवन जिए.”

अरुंधती ने कहना जारी रखा-

“मेरी कहानी की नायिका अपने पति की बेवफाई से आहत है. प्रतिशोध लेने के लिए वह एक के बाद एक 4 युवकों से दोस्ती कर लेती है. उन में से 2 युवक शादीशुदा हैं जो अपनी विवाहित जिंदगी से परेशान हैं, जबकि 2 लड़के कुंआरे हैं. और देखिए कि मेरी नायिका पुरुषों की कामुक प्रवत्ति को पहचान कर उन सब को एकसाथ कैसे हैंडल करती है.

“‘हंसिका, मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं, तुम अभी तक पहुची क्यों नहीं?’ शेखर ने फोन पर परेशान आवाज़ में हंसिका से कहा.

“‘ओह, आई एम सो सौरी. मैं तुम्हें बता नहीं पाई, आज कंपनी के काम से औफिस में ही देर हो जाएगी मुझे.’

“‘पर मैं ने तो आज शाम का पूरा मूड बना लिया था,’ शेखर परेशान हो उठा था.

“‘कोई बात नहीं, तुम अपना मूड बनाए रखो, मैं तुम्हारी कल की शाम हसीन बना दूंगी,’ हंसिका ने फोन पर शेखर को दिलासा देते हुए कहा.

“‘किस से बात कर रही हो जानेमन,’ होटल के कमरे में घुसते हुए आर्यन ने पूछा.

“‘कोई नहीं, बस, ऐसे ही एक सहेली थी.’

“‘साफ क्यों नहीं कहती कि वह बेचारा भी मेरी तरह ही तुम्हारे हुस्न की गरमी का सताया हुआ आशिक है. न जाने तुम में कौन सी कशिश है जो हम आशिकों को तुम्हारे पास बारबार आने को मजबूर करती है.

“‘हम परवानों की बस इतनी सी इबादत है,

बस, तेरे हुस्न में झुलसने की आदत है.’

“यह कह कर आर्यन ने अपनी हंसिका को बांहों में भरा. हंसिका उस की आगोश में सिमटती चली गई. कुछ देर बाद कमरे में कामोत्तेजक सिसकारियां गूंजने लगी थीं. हंसिका और आर्यन एकदूसरे के जिस्म में समा गए थे. जब दोनों का जोश ठंडा हुआ तब हंसिका ने आर्यन के सीने पर सिर रखा और उस से पूछने लगी-

“‘तुम्हारी बीवी तो मुझ से भी खूबसूरत है. फिर भी तुम मेरे आगेपीछे क्यों डोलते रहते हो?’

“आर्यन ने अपनी बीवी का जिक्र आते ही बुरा सा मुंह बनाया और कहने लगा- ‘कहावत है कि मर्द के दिल का रास्ता उस के पेट से हो कर जाता है. पर, मेरे लिए मेरे दिल तक आने का रास्ता इस बैड से हो कर जाता है. मुझे सैक्स में थोड़ा पावर और हीट गेम चाहिए पर वह बैड पर किसी ज़िंदा लाश की तरह पड़ी रहती है.’

“‘तो क्या, तुम्हें बिस्तर पर एक ऐथलीट की ज़रूरत है?’ हंसिका ने उस को बीच में रोकते हुए कहा.

“‘नहीं, पर मर्द और औरत के रिश्तों के लिए एक अच्छी सैक्सलाइफ बहुत ज़रूरी होती है. यह बात तो तुम भी मानोगी न,’ यह कह कर आर्यन ने हंसिका को चूम लिया.

“वैसे, हंसिका इन मर्दों का अश्लील वीडियो बनाना नहीं भूलती थी, क्या पता किस मोड़ पर काम आ जाएं.

“हंसिका पूरी रात आर्यन के साथ गुज़ारने के बाद सुबह अपने औफिस गई और फिर पूरा दिन काम करने के बाद अपने फ्लैट पर जाने से पहले उसने ब्यूटीपार्लर जाना जरूरी समझा. उस के साथ में उस की औफिसमेट माया थी.

“‘अरे हंसिका, अभी तूने 2 दिनों पहले ही तो अपने बालों को स्ट्रेट कराया था. और आज फिर से इन्हें कर्ली क्यों करा रही है,’ माया ने पूछा.

“‘क्योंकि आज मेरी आकाश के साथ डेट है,’ मुसकराते हुए हंसिका ने कहा.

“‘आकाश के साथ? पर तेरे बौयफ्रैंड का नाम तो युवराज है.’ चौंक पड़ी थी माया.

“‘तुम नहीं समझोगी, माया. अच्छा बताओ, इंद्रधनुष में कितने रंग होते हैं?’ हंसिका ने पूछा.

“‘सात.’

“‘और एक हफ्ते में कितने दिन?’

“‘सात,’

“‘तो फिर, बौयफ्रैंड एक क्यों, सात क्यों नहीं?’ अपने होंठों पर हलकी सी मुसकराहट लाते हुए हंसिका ने कहा.

“‘अरे, तू क्या सच में सात मान बैठी. सात नहीं, बल्कि सिर्फ 4 बौयफ्रैंड हैं मेरे.’

“‘ओफ्फो, तुझे समझना बहुत मुश्किल है.’

“यह कह कर माया बाहर की ओर जाने लगी, तो हंसिका ने उसे पास बुलाया और बोली, ‘सुन तो, देख, अजीब ज़रूर लग रहा होगा पर आर्थिकरूप से स्वतंत्र रहने का यही तो मज़ा है. चाहे जैसे रहो, कोई टोकने वाला नहीं. और ज़िन्दगी में ऐश करो. पति के सहारे रहने व उस की बेवफाई सहने में भला रखा ही क्या है.’ हंसिका का दर्द छलक आया था. उस ने सिगरेट सुलगाई. माया ने सहमति में सिर हिला दिया.

“करीब 5 फुट 9 इंच की हाइट वाली हंसिका का व्यक्तित्व देखते ही बनता था. गोरा रंग, पतला चेहरा और सुतवां नाक. इस के साथ उस के बाल कमर तक लहराते हुए. अपने बौडीमास को भी बहुत अच्छी तरह से मेन्टेन किया हुआ था हंसिका ने और इस के लिए वह सप्ताह में कम से कम 3 दिन जिम जाती थी.

“हंसिका एक मौडलिंग एजेंसी में काम करती थी जो बेंगलुरु जैसे शहर में अच्छी आय का स्रोत था और इसी पैसे के चलते हंसिका मनचाहे अंदाज़ से अपना जीवन जी रही थी.

“जो दिखता है वाही बिकता है के सिद्धांत को मानने वाली हंसिका अपने यौवन का भरपूर दिखावा करना अच्छी तरह से जानती थी. अपने अलगअलग बौयफ्रैंड्स के साथ वह सैक्स करने में पीछे कभी नहीं हटती. अलगअलग दिनों में हंसिका के शारीरिक संबंध अलगअलग बौयफ्रैंड से बनते.

“हंसिका के बौयफ्रैंड यह बात अच्छी तरह जानते थे कि हंसिका के संबंध उन लोगों के अलावा और लोगों से भी हैं पर उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि हंसिका जैसी खूबसूरत लड़की पर एकाधिकार दिखा कर वे उसे खोना नहीं चाहते थे. उन के लिए तो हंसिका जैसी दिलकश हसीना के शरीर को भोग लेना ही बहुत बड़ी बात थी.

“आज हंसिका की डेट आकाश नाम के व्यक्ति के साथ थी. आकाश एक समय में हंसिका का फेसबुक फ्रैंड था. आकाश शादीशुदा था. वह अपनी पत्नी की बेवफाई से दुखी था. उस की पत्नी का स्कूल के एक टीचर के साथ अफेयर था जिस के बारे में उसे भनक लग गई थी और दुखी हो कर आत्महत्या के बारे तक में सोचने लगा था. अपनी निराशा से जुड़ी बातें आकाश ने फेसबुक मैसेंजर पर हंसिका से शेयर कीं तो हंसिका को मामले की गंभीरता के बारे में पता चला.

“उस ने अपनी बातों से टूटे हुए आकाश को दिलासा दी और उसे मिलने के लिए बुलाया. दोनों में मुलाकातें होने लगीं. वहीं से आकाश पूरी तरह से हंसिका के रूप का दीवाना हो गया. और हंसिका ने उसे भी अपनी देह का स्वाद चखाने में देर नहीं की. हंसिका अपने इन बौयफ्रैंड्स को अच्छी तरह यूज़ करना जानती थी. कब किस से कितने पैसे की डिमांड करनी है, इस का अच्छी तरह ज्ञान था उस को.

“हंसिका अनचाहे गर्भ से बचने के लिए कंडोम का प्रयोग एक अनिवार्य शर्त बना देती थी. पर इस बार पता नहीं किस से और कैसे चूक हुई कि हंसिका गर्भवती हो गई थी. अपने गर्भवती हो जाने की बात हंसिका ने किसी भी बौयफ्रैंड को नहीं बताई. दिन बीतते रहे. अपनी व्यस्त जीवनशैली के कारण जब हंसिका अपना गर्भपात कराने के लिए डाक्टर के पास पहुंची तो डाक्टर ने यह कह कर गर्भपात करने से मना कर दिया कि समय अधिक हो गया है, अब यह संभव नहीं है, इसलिए आप को बच्चे को जन्म देना ही होगा.

“हंसिका ने सब से पहले यह बात अपने एक पुराने बौयफ्रैंड आर्यन से बताई, ‘सुनो आर्यन, यार, बड़ीड़ा प्रौब्लम हो गई है.’

“‘ऐसा भी क्या हो गया मेरी जान जो तुम इतना घबरा कर बोल रही हो,’ आर्यन ने कहा.

“‘यू नो, आई एम प्रैग्नैंट,’ हंसिका ने फुसफुसा कर कहा.

“‘बधाई हो, मिठाई खिलाओ भाई,’ आर्यन ने चुटकी ली.

“‘मज़ाक मत करो, मैं बहुत परेशान हूं,’ हंसिका चिड़चिड़ा रही थी.

“‘अब तुम कोई दूध पीती बच्ची तो नहीं जो तुम्हें बताना पड़ेगा कि अगर तुम शादी से पहले प्रैग्नैंट हो गई हो तो बच्चे को अबौर्ट करवा दो.’

“‘तुम्हें क्या लगता है कि मैं डाक्टर के पास नहीं गई थी? गई थी पर डाक्टर ने गर्भपात करने से मना कर दिया. अब मुझे बच्चे को जन्म देना ही होगा.’

“ओह्ह, तो यह बात है,’ आर्यन ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा और चुप हो गया. कुछ देर बाद आर्यन ने ही कहना शुरू किया, ‘कोई बात नहीं, तुम फिक्र मत करो. अस्पताल का सारा खर्चा मैं देने के लिए तैयार हूं. पर क्या यह बच्चा वास्तव में मेरा ही है?’

“‘ये कैसी बातें कर रहे हो आर्यन, क्या मतलब है तुम्हारा?’

“‘मेरा मतलब है कि मेरे अलावा तुम्हारे पति का भी तो हो सकता है?’ आर्यन ने कहा. जबकि, उसे अच्छी तरह पता था कि हंसिका अपने पति से अलग रह रही है और उस ने पति से तलाक लेने का मुकदमा दायर कर रखा है.

“‘अगर भरोसा नहीं है तो बच्चे का डीएनए टैस्ट करवा लो.’

“डीएनए टैस्ट करवाने की बात तो आर्यन के मन में भी आई थी पर अगर डीएनए टैस्ट में बच्चा किसी और का निकलता तो बहुत मुमकिन था कि आर्यन को हंसिका से विरक्ति हो जाती और वह उसे खो देता.

“‘अरे, ऐसी कोई बात नहीं है. तुम तो ज़रा सी बात में नाराज़ हो गई. मैं तो मज़ाक कर रहा था,’ आर्यन ने बात बनाते हुए कहा.

“हंसिका के संबंध कई मर्दों से थे. सभी मर्द इस बात को अच्छी तरह से जानते भी थे. हंसिका जैसी चिड़िया किसी एक पिंजरे में बंद हो कर नहीं रह सकती पर वे सब हंसिका जैसी सैक्सी व दिलकश लड़की को छोड़ना नहीं चाहते थे. इसलिए, वे सब उस की लगभग हर बात मानते थे.

हंसिका ने इसी तरह बारीबारी अपने सभी बौयफ्रैंड्स को अपने गर्भवती होने की बात बताई. और उन सब ने कमोबेश यही कहा कि हंसिका, बच्चे को अस्पताल में जन्म दे और वे लोग उसे हर तरह का खर्चा देने के लिए तैयार हैं.

“जब अपने चारों बौयफ्रैंड्स से हंसिका ने बात कर के उन से पैसे मिलने की बात कन्फर्म कर ली, तब जा कर उस को सुकून मिला और वह अपने होने वाले बच्चे के भविष्य को ले कर आश्वस्त हो गई.

“मेरी नायिका हंसिका ने अपने औफिस से मैटरनिटी लीव ली और समय आने पर बच्चे को जन्म दिया.

“हंसिका अपने हर बौयफ्रैंड को अलगअलग यही एहसास कराती रहती कि जैसे यह बच्चा उस का ही है और उन लोगों से अलगअलग बच्चे के पालनपोषण के लिए पैसे भी लेती रही.

“कालांतर में हंसिका के अविवाहित बौयफ्रैंड्स की शादी भी हो गई और कुछ समय बाद बच्चे भी. पर उन प्रेमियों ने हंसिका व उस के बच्चे का ध्यान रखना नहीं छोड़ा.

“हंसिका के कई पुरुषों से संबंध को दुश्चरित्रता इसलिए भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि मर्दों के इस समाज में हंसिका ने ‘टिट फौर टैट’ अर्थात ‘जैसे को तैसा’ वाला आचरण दिखा कर एक नई मिसाल पेश की है. और फिर, अगर एक औरत अपने पति की किसी भी तरह की बेवफ़ाई के खिलाफ किसी भी तरह का सार्थक कदम उठाती है तो उस का स्वागत किया जाना चाहिए. और मुझे पता है कि इस समाज में हंसिका जैसी बहुत औरते हैं जो पति की बेवफाई सह रही हैं. भले ही वे सब अपने मर्द के खिलाफ कुछ न कर पा रही हों पर मेरी इस कहानी को पसंद कर उन्होंने इस साल की बैस्ट कहानी बना कर हंसिका का साथ देने की मूक स्वीकृति तो दे ही दी है.”

हौल में लगातार तालियां बजे जा रही थीं हंसिका जैसी नायिका के लिए. पर यह बात केवल अरुंधती ही जानती थी कि हंसिका की यह कहानी किसी और की नहीं, बल्कि उस की अपनी है. Hindi Kahani

Hindi Funny Story: दबंग पत्नी

Hindi Funny Story: कई साल पहले अपनी नईनई नौकरी के सिलसिले में जब मैं इस शहर में आया था, तो उस समय बिना किसी परेशानी के एक शानदार कमरा किराए पर मिल गया था. दरअसल, मकान मालिक बड़े ही भले आदमी थे. दिन आराम से गुजर रहे थे.

लेकिन एक दिन मकान मालिक अपनी पत्नी के साथ मेरे कमरे में आए और कहने लगे, ‘‘बेटा, हमें बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि तुम्हें अब यह कमरा खाली करना पड़ेगा.’’

इतना सुनते ही मेरे होश उड़ गए. खुद को संभालते हुए मैं ने पूछा, ‘‘यह अचानक क्या हो गया? क्या मुझ से कोई भूल हुई है?’’

जवाब मिला, ‘‘बेटा, मुसीबत अचानक ही आती है. हमें अभीअभी सूचना मिली है कि हमारे साले साहब का तबादला इसी शहर में हो गया है. श्रीमती चाहती हैं कि वे लोग हमारे साथ ही रहें.’’

मामला जोरू के भाई का था. मैं समझ गया कि बहस करना बेकार है.

बस उसी दिन और उसी समय से नए मकान की तलाश शुरू हो गई. दफ्तर जाने से पहले और वहां से आने के बाद मकान की तलाश में शहर की खाक छानता रहता. जहां जाता सिर्फ एक ही सवाल पूछा जाता, ‘‘क्या आप शादीशुदा हैं? हम अपना मकान बालबच्चेदार को ही देंगे. छड़े को दे कर क्या अपनी बदनामी करानी है.’’

मैं सोचने लगा, ‘क्या सचमुच

आदमी शादी के बाद एकदम शरीफ हो जाता है?’

खैर, जो भी हो, मेरा कुंआरापन मेरे और मकान के बीच खाई बना हुआ था.

एक दिन मेरे एक दोस्त दीपक ने किसी खाली मकान का पता दिया. लेकिन यह भी बताया कि तुम्हारा कुंआरापन वहां भी आड़े आएगा. थकाहारा जब मैं वापस अपने घर पहुंचा, तो दरवाजे पर ही मकान मालिक टकरा गया. सिर झुकाए बिना कुछ कहे मैं चुपचाप अपने कमरे में चला गया.

तभी एक नया खयाल मेरे दिमाग में आया और मेरे होंठों पर मुसकान फैल गई. मैं बेफिक्र हो कर सो गया.

दूसरे दिन सवेरे ही दोस्त के बताए हुए पते पर जा पहुंचा. मकान अच्छा था. मैं ने तय कर लिया कि हर हालत में यह मकान ले कर ही रहूंगा, चाहे जो हो जाए.

तभी मकान मालिक ने पूछा, ‘‘आप शादीशुदा हैं न?’’

मैं ने किसी शर्मीले पति की तरह ‘हां’ में सिर हिला दिया. मैं ने उन्हें यकीन दिलाया कि मकान मिलते ही बीवी को गांव से ले आऊंगा. मेरी बातचीत ने मकान मालिक का मन मोह लिया. आखिर मुझे वह मकान मिल गया.

अगले ही दिन मैं अपने सामान के साथ नए मकान में आ गया. एक परेशानी के खत्म होते ही दूसरी में फंस गया. अब सवाल यह था कि पत्नी कहां से लाऊं? दिल में हमेशा डर बना रहता कि कहीं पोल न खुल जाए और इस घर से ही धक्के मार कर निकाल न दिया जाऊं.

एक दिन अपने दफ्तर में इसी परेशानी में खोया हुआ था कि अचानक मेरी निगाह सामने बैठी मीना पर पड़ी. थोड़ी देर बाद मैं उसे कैंटीन में ले गया.

अचानक उस ने पूछा, ‘‘आजकल तुम कुछ ज्यादा ही परेशान दिखाई

देते हो?’’

मरियल सी आवाज में मैं ने अपनी पूरी कहानी उसे सुना दी और सवालिया निगाहों से उस की ओर देखने लगा.

लड़की काफी समझदार थी. बात फौरन समझ गई. अपने होंठों पर शरारत भरी मुसकान बिखेरते हुए वह कहने लगी, ‘‘दोस्त ही दोस्त के काम आता है. जाओ, अपने मकान मालिक से कह दो कि इतवार को तुम्हारी पत्नी आ रही है.’’

मैं ने हैरानी से पूछा, ‘‘कैसे…?’’

उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘यह सब

तुम मुझ पर छोड़ दो. बस जैसा कहती

हूं, करते जाओ, तुम्हारा कल्याण हो जाएगा.’’

लड़की होशियार थी. मुझे उस की काबिलीयत पर भरोसा था. दफ्तर से घर आते ही मैं ने मकान मालिक को कह दिया कि मेरी पत्नी इतवार को आ रही है.

मेरे चेहरे पर उदासी छाई हुई थी. मेरी हालत देख कर मकान मालिक का पूरा परिवार मेरे इर्दगिर्द जमा हो गया.

मकान मालिक ने कहा, ‘‘यह तो खुशी की बात है. पर तुम उदास क्यों हो गए हो?’’

मैं ने झुंझला कर कहा, ‘‘हाथ कंगन को आरसी क्या… वह आ ही रही है, खुद देख लीजिएगा,’’ इतना कह कर मैं अपने कमरे में चला गया.

इतवार की सुबह मैं स्टेशन की ओर चला गया. तकरीबन एक घंटे बाद मैं मीना के साथ लौटा.

उस के आते ही उन लोगों ने बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया. लेकिन मेरी ‘पत्नी’ ने रूखी आवाज में कहा, ‘‘मुझे ये सब चोंचले जरा भी अच्छे नहीं लगते. अपना कमरा बताओ?’’

मैं ने बिना कुछ कहे अपने कमरे की ओर उंगली उठा दी. वह सीधी कमरे में जा कर पलंग पर पसर गई और कहने लगी, ‘‘इन लोगों से कहो कि अब जाएं, मुझे आराम करने दें.’’

उस के इस तरह कहने से पलभर के लिए मुझे भी गुस्सा आ गया, लेकिन खामोश रहने में ही भलाई थी.

मकान मालिक की पत्नी बड़बड़ाते हुए वहां से चली गई. अपनी कामयाबी पर मैं ने मीना से हाथ मिलाया. थोड़ी देर बाद अपने हाथों में डब्बा और थर्मस लिए मैं कमरे के बाहर निकला. मकान मालकिन मुझे हैरानी से देखने लगीं.

मैं ने कहा, ‘‘चाची, मैं जरा बाजार जा रहा हूं. उस के लिए होटल से खाना और चाय ले कर बस अभी लौटता हूं. आप उस की बातों का बुरा न मानें. वैसे, वह दिल की बुरी नहीं है.

‘‘मेरे बाजार से वापस आने तक उस के पास ही बैठें तो बड़ी मेहरबानी होगी. मैं ने उसे सब समझा दिया है. हो सके, तो उसे दुनियादारी की बातें समझाइए… अभी नईनई है न, धीरेधीरे सब सीख जाएगी.’’

तकरीबन एक घंटे बाद मैं जब लौटा, तो घर का ‘सीन’ ही बदला हुआ था. मेरी पत्नी यानी मीना अपनी कमर में दुपट्टा लपेटे किसी भूखी शेरनी की तरह मकान मालकिन पर झपट्टा मारने को तैयार खड़ी थी. उस की आंखों से चिनगारियां बरस रही थीं.

उधर दूसरी तरफ मकान मालकिन को संभाले उन की लड़कियां गुस्से से उबल रही थीं.

मुझे देखते ही मेरी पत्नी दहाड़ी, ‘‘इसीलिए लाए थे कि कोई ऐरागैरा

नत्थू खैरा मुझे यहां मेरी बेइज्जती करता रहे. यह बुढि़या मुझे पवित्रता के गुण सिखा रही है. बड़ी आई सती सावित्री… क्या समझती है अपनेआप को…

मुंह नोच कर रख दूंगी इस का.’’

अभी पत्नी की दहाड़ खत्म भी नहीं हुई थी कि मकान मालकिन ने रेंकना शुरू किया, ‘‘ऐ मिस्टर, निकालो इस परकटी लोमड़ी को हमारे घर से… मैं इसे एक पल भी यहां नहीं रहने दूंगी.’’

पत्नी बीच में ही चीखी, ‘‘यहां रहेगी मेरी जूती. मैं तो थूकती भी नहीं ऐसे मकान को.’’

मकान मालकिन दहाड़ीं, ‘‘निकालो इसे बाहर, वरना आज किसी एक का खून हो कर रहेगा.’’

दोनों एकदूसरे पर झपटने की कोशिश करती रहीं. इधर मैं और उधर मकान मालिक अपनी बीवी को संभाले हुए खड़े हुए थे.

मैं ने अपनी पत्नी को कमरे के भीतर धकेल कर बाहर से दरवाजा बंद कर दिया और मकान मालकिन से माफी मांगने लगा, ‘‘मेहरबानी कर के चुप हो जाइए. अभी तो इसे गांव वापस नहीं भिजवा सकता. अगर यह मेरी पत्नी है, तो जब तक चाहे रहेगी. आप कहेंगे तो जल्दी ही आप का मकान भी खाली कर दूंगा. अब क्या मुंह ले कर रहूंगा आप लोगों के बीच.’’

अगली शाम को जब मीना और मैं घर आए, तो देखा कि दरवाजे पर मेरे मातापिता और मीना के मातापिता दोनों खड़े थे और 2 टैक्सियों और 2 टैंपों से सामान उतर रहा था. मीना लपक कर अपने मांबाप से गले मिलने लगी और बोली, ‘‘यही हैं मनोज और ये मनोज के मातापिता हैं.’’

मेरे मातापिता बड़े प्यार से मीना मिले. मां ने तो मीना को गले लगा लिया, ‘‘अरे मेरे बुद्धू बेटे को इतनी होशियार व सुंदर लड़की कैसे मिल गई.’’

मीना के पिता ने कहा, ‘‘मनोज, चलो मंगनी की रस्म पूरा करते हैं. पर, यहां नहीं मकान मालिक के ड्राइंगरूम में.’’

मैं… भौचक्का सा सब का मुंह देख रहा था.

मीना बोली, ‘‘अरे, ये उल्लुओं की तरह क्या देख रहो. मेरे मातापिता को नमस्कार करो. ये आज से तुम्हारे सासससुर यानी मांबाप जैसे हुए न.’’

अपनी कामयाबी की खुशी को छिपा पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था. मैं भागता हुआ अपने कमरे में चला

गया और मारे खुशी के मीना से, जो मेरी पत्नी बनी भीतर बैठी हुई थी, जा कर लिपट गया.

लेकिन मुझे क्या मालूम था कि मकान लेने के लिए खेला गया नाटक आगे चल कर सचाई में बदल जाएगा. आज मैं उसी मीना का एकलौता पति हूं और वह मेरी प्यारी बीवी है. Hindi Funny Story

Hindi Family Story: लिफाफाबंद चिट्ठी – क्या था उस पत्र में

Hindi Family Story: मैंने घड़ी देखी. अभी लगभग 1 घंटा तो स्टेशन पर इंतजार करना ही पड़ेगा. कुछ मैं जल्दी आ गया था और कुछ ट्रेन देरी से आ रही थी. इधरउधर नजरें दौड़ाईं तो एक बैंच खाली नजर आ गई. मैं ने तुरंत उस पर कब्जा कर लिया. सामान के नाम पर इकलौता बैग सिरहाने रख कर मैं पांव पसार कर लेट गया. अकेले यात्रा का भी अपना ही आनंद है. सामान और बच्चों को संभालने की टैंशन नहीं. आराम से इधरउधर ताकाझांकी भी कर लो.

स्टेशन पर बहुत ज्यादा भीड़ नहीं थी. पर जैसे ही कोई ट्रेन आने को होती, एकदम हलचल मच जाती. कुली, ठेले वाले एकदम चौकन्ने हो जाते. ऊंघते यात्री सामान संभालने लगते. ट्रेन के रुकते ही यात्रियों के चढ़नेउतरने का सिलसिला शुरू हो जाता. उस समय यह निश्चित करना मुश्किल हो जाता था कि ट्रेन के अंदर ज्यादा भीड़ है या बाहर? इतने इतमीनान से यात्रियों को निहारने का यह मेरा पहला अवसर था. किसी को चढ़ने की जल्दी थी, तो किसी को उतरने की. इस दौरान कौन खुश है, कौन उदास, कौन चिंतित है और कौन पीडि़त यह देखनेसमझने का वक्त किसी के पास नहीं था.

किसी का पांव दब गया, वह दर्द से कराह रहा है, पर रौंदने वाला एक सौरी कह चलता बना. ‘‘भैया जरा साइड में हो कर सहला लीजिए,’’ कह कर आसपास वाले रास्ता बना कर चढ़नेउतरने लगे. किसी को उसे या उस के सामान को चढ़ाने की सुध नहीं थी. चढ़ते वक्त एक महिला की चप्पलें प्लेटफार्म पर ही छूट गईं. वह चप्पलें पकड़ाने की गुहार करती रही. आखिर खुद ही भीड़ में रास्ता बना कर उतरी और चप्पलें पहन कर चढ़ी.

मैं लोगों की स्वार्थपरता देख हैरान था. क्या हो गया है हमारी महानगरीय संस्कृति को? प्रेम, सौहार्द और अपनेपन की जगह हर किसी की आंखों में अविश्वास, आशंका और अजनबीपन के साए मंडराते नजर आ रहे थे. मात्र शरीर एकदूसरे को छूते हुए निकल रहे थे, उन के मन के बीच का फासला अपरिमित था. मुझे सहसा कवि रामदरश मिश्र की वह उपमा याद आ गई, ‘कैसा है यह एकसाथ होना, दूसरे के साथ हंसना न रोना. क्या हम भी लैटरबौक्स की चिट्ठियां बन गए हैं?’

इस कल्पना के साथ ही स्टेशन का परिदृश्य मेरे लिए सहसा बदल गया. शोरशराबे वाला माहौल निस्तब्ध शांति में तबदील हो गया. अब वहां इंसान नहीं सुखदुख वाली अनंत चिट्ठियां अपनीअपनी मंजिल की ओर धीरेधीरे बढ़ रही थीं. लेकिन कोई किसी से नहीं बोल रही थी. मैं मानो सपनों की दुनिया में विचरण करने लगा था.

‘‘हां, यहीं रख दो,’’ एक नारी स्वर उभरा और फिर ठकठक सामान रखने की आवाज ने मेरी तंद्रा भंग कर दी. गोद में छोटे बच्चे को पकड़े एक संभ्रांत सी महिला कुली से सामान रखवा रही थी. बैंच पर बैठने का उस का मंतव्य समझ मैं ने पांव समेट लिए और जगह बना दी. वह धन्यवाद दे कर मुसकान बिखेरती हुई बच्चे को ले कर बैठ गई. एक बार उस ने अपने सामान का अवलोकन किया. शायद गिन रही थी पूरा आ गया है या नहीं? फिर इतमीनान से बच्चे को बिस्कुट खिलाने लगी.

यकायक उस महिला को कुछ खयाल आया. उस ने अपनी पानी की बोतल उठा कर हिलाई. फिर इधरउधर नजरें दौड़ाईं. दूर पीने के पानी का नल और कतार नजर आ रहें थे. उस की नजरें मुड़ीं और आ कर मुझ पर ठहर गईं. मैं उस का मंतव्य समझ नजरें चुराने लगा. पर उस ने मुझे पकड़ लिया, ‘‘भाई साहब, बहुत जल्दी में घर से निकलना हुआ तो बोतल नहीं भर सकी. प्लीज, आप भर लाएंगे?’’

एक तो अपने आराम में खलल की वजह से मैं वैसे ही खुंदक में था और फिर ऊपर से यह बेगार. मेरे मन के भाव शायद मेरे चेहरे पर लक्षित हो गए थे. इसलिए वह तुरंत बोल पड़ी, ‘‘अच्छा रहने दीजिए. मैं ही ले आती हूं. आप थोड़ा टिंकू को पकड़ लेंगे?’’

वह बच्चे को मेरी गोद में पकड़ाने लगी, तो मैं झटके से उठ खड़ा हुआ, ‘‘मैं ही ले आता हूं,’’ कह कर बोतल ले कर रवाना हुआ तो मन में एक शक का कीड़ा बुलबुलाया कि कहीं यह कोई चोरउचक्की तो नहीं? आजकल तो चोर किसी भी वेश में आ जाते हैं. पीछे से मेरा बैग ही ले कर चंपत न हो जाए? अरे नहीं, गोद में बच्चे और ढेर सारे सामान के साथ कहां भाग सकती है? लो, बन गए न बेवकूफ? अरे, ऐसों का पूरा गिरोह होता है. महिलाएं तो ग्राहक फंसाती हैं और मर्द सामान ले कर चंपत. मैं ठिठक कर मुड़ कर अपना सामान देखने लगा.

‘‘मैं ध्यान रख रही हूं, आप के सामान का,’’ उस ने जोर से कहा.

मैं मन ही मन बुदबुदाया कि इसी बात का तो डर है. कतार में खड़े और बोतल भरते हुए भी मेरी नजरें अपने बैग पर ही टिकी रहीं. लौट कर बोतल पकड़ाई, तो उस ने धन्यवाद कहा. फिर हंस कर बोली, ‘‘आप से कहा तो था कि मैं ध्यान रख रही हूं. फिर भी सारा वक्त आप की नजरें इसी पर टिकी रहीं.’’

अब मैं क्या कहता? ‘खैर, कर दी एक बार मदद, अब दूर रहना ही ठीक है,’ सोच कर मैं मोबाइल में मैसेज पढ़ने लगा. यह अच्छा जरिया है आजकल, भीड़ में रहते हुए भी निस्पृह बने रहने का.

‘‘आप बता सकते हैं कोच नंबर 3 कहां लगेगा?’’ उस ने मुझ से फिर संपर्कसूत्र जोड़ने की कोशिश की.

‘‘यहीं या फिर थोड़ा आगे,’’ सूखा सा जवाब देते वक्त अचानक मेरे दिमाग में कुछ चटका कि ओह, यह भी मेरे ही डब्बे में है? मेरी नजरें उस के ढेर सारे सामान पर से फिसलती हुईं अपने इकलौते बैग पर आ कर टिक गईं. अब यदि इस ने अपना सामान चढ़वाने में मदद मांगी या बच्चे को पकड़ाया तो? बच्चू, फूट ले यहां से. हालांकि ट्रेन आने में अभी 10 मिनट की देर थी. पर मैं ने अपना बैग उठाया और प्लेटफार्म पर टहलने लगा.

कुछ ही देर में ट्रेन आ पहुंची. मैं लपक कर डब्बे में चढ़ा और अपनी सीट पर जा कर पसर गया. अभी मैं पूरी तरह जम भी नहीं पाया था कि उसी महिला का स्वर सुनाई दिया, ‘‘संभाल कर चढ़ाना भैया. हां, यह सूटकेस इधर नीचे डाल दो और उसे ऊपर चढ़ा दो… अरे भाई साहब, आप की भी सीट यहीं है? चलो, अच्छा है… लो भैया, ये लो अपने पूरे 70 रुपए.’’

मैं ने देखा वही कुली था. पैसे ले कर वह चला गया. महिला मेरे सामने वाली सीट पर बच्चे को बैठा कर खुद भी बैठ गई और सुस्ताने लगी. मुझे उस से सहानुभूति हो आई कि बेचारी छोटे से बच्चे और ढेर सारे सामान के साथ कैसे अकेले सफर कर रही है? पर यह सहानुभूति कुछ पलों के लिए ही थी. परिस्थितियां बदलते ही मेरा रुख भी बदल गया. हुआ यों कि टी.टी. आया तो वह उस की ओर लपकी. बोली, ‘‘मेरी ऊपर वाली बर्थ है. तत्काल कोटे में यही बची थी. छोटा बच्चा साथ है, कोई नीचे वाली सीट मिल जाती तो…’’

मेरी नीचे वाली बर्थ थी. कहीं मुझे ही बलि का बकरा न बनना पड़े, सोच कर मैं ने तुरंत मोबाइल निकाला और बात करने लगा. टी.टी. ने मुझे व्यस्त देख पास बैठे दूसरे सज्जन से पूछताछ आरंभ कर दी. उन की भी नीचे की बर्थ थी. वे सीटों की अदलाबदली के लिए राजी हो गए, तो मैं ने राहत की सांस ले कर मोबाइल पर बात समाप्त की. वे सज्जन एक उपन्यास ले कर ऊपर की बर्थ पर जा कर आराम से लेट गए. महिला ने भी राहत की सांस ली.

‘‘चलो, यह समस्या तो हल हुई… मैं जरा टौयलेट हो कर आती हूं. आप टिंकू को देख लेंगे?’’ बिना जवाब की प्रतीक्षा किए वह उठ कर चल दी. मुझ जैसे सज्जन व्यक्ति से मानो इनकार की तो उसे उम्मीद ही नहीं थी.

मैं ने सिर थाम लिया कि इस से तो मैं सीट बदल लेता तो बेहतर था. मुझे आराम से उपन्यास पढ़ते उन सज्जन से ईर्ष्या होने लगी. उस महिला पर मुझे बेइंतहा गुस्सा आ रहा था कि क्या जरूरत थी उसे एक छोटे बच्चे के संग अकेले सफर करने की? मेरे सफर का सारा मजा किरकिरा कर दिया. मैं बैग से अखबार निकाल कर पढ़े हुए अखबार को दोबारा पढ़ने लगा. वह महिला तब तक लौट आई थी.

‘‘मैं जरा टिंकू को भी टौयलेट करा लाती हूं. सामान का ध्यान तो आप रख ही रहे हैं,’’ कहते हुए वह बच्चे को ले कर चली गई. मैं ने अखबार पटक दिया और बड़बड़ाया कि हां बिलकुल. स्टेशन से बिना पगार का नौकर साथ ले कर चढ़ी हैं मैडमजी, जो कभी इन के बच्चे का ध्यान रखेगा, कभी सामान का, तो कभी पानी भर कर लाएगा…हुंह.

तभी पैंट्रीमैन आ गया, ‘‘सर, आप खाना लेंगे?’’

‘‘हां, एक वैज थाली.’’

वह सब से पूछ कर और्डर लेने लगा. अचानक मुझे उस महिला का खयाल आया कि यदि उस ने खाना और्डर नहीं किया तो फिर स्टेशन से मुझे ही कुछ ला कर देना पड़ेगा या शायद शेयर ही करना पड़ जाए. अत: बोला, ‘‘सुनो भैया, उधर टौयलेट में एक महिला बच्चे के साथ है. उस से भी पूछ लेना.’’

कुछ ही देर में बच्चे को गोद में उठाए वह प्रकट हो गई, ‘‘धन्यवाद, आप ने हमारे खाने का ध्यान रखा. पर हमें नहीं चाहिए. हम तो घर से काफी सारा खाना ले कर चले हैं. वह रामधन है न, हमारे बाबा का रसोइया उस ने ढेर सारी सब्जी व पूरियां साथ रख दी हैं. बस, जल्दीजल्दी में पानी भरना भूल गया, बल्कि हम तो कह रहे हैं आप भी मत मंगाइए. हमारे साथ ही खा लेना.’’

मैं ने कोई जवाब न दे कर फिर से अखबार आंखों के आगे कर लिया और सोचने लगा कि या तो यह महिला निहायत भोली है या फिर जरूरत से ज्यादा शातिर. हो सकता है खाने में कुछ मिला कर लाई हो. पहले भाईचारा गांठ रही है और फिर… मुझे सावधान रहना होगा. इस का आज का शिकार निश्चितरूप से मैं ही हूं.

जबलपुर स्टेशन आने पर खाना आ गया था. मैं कनखियों से उस महिला को खाना निकालते और साथ ही बच्चे को संभालते देख रहा था. पर मैं जानबूझ कर अनजान बना अपना खाना खाता रहा.

‘‘थोड़ी सब्जीपूरी चखिए न. घर का बना खाना है,’’ उस ने इसरार किया.

‘‘बस, मेरा पेट भर गया है. मैं तो नीचे स्टेशन पर चाय पीने जा रहा हूं,’’ कह मैं फटाफट खाना खत्म करते हुए वहां से खिसक लिया कि कहीं फिर पानी या और कुछ न मंगा ले.

‘‘हांहां, आराम से जाइए. मैं आप के सामान का खयाल रख लूंगी.’’

‘ओह, बैग के बारे में तो भूल ही गया था. इस की नजर जरूर मेरे बैग पर है. पर क्या ले लेगी? 4 जोड़ी कपड़े ही तो हैं. यह अलग बात है कि सब अच्छे नए जोड़े हैं और आज के जमाने में तो वे ही बहुत महंगे पड़ते हैं. पर छोड़ो, बाहर थोड़ी आजादी तो मिलेगी. इधर तो दम घुटने लगा है,’ सोचते हुए मैं नीचे उतर गया. चाय पी तो दिमाग कुछ शांत हुआ. तभी मुझे अपना एक दोस्त नजर आ गया. वह भी उसी गाड़ी में सफर कर रहा था और चाय पीने उतरा था. बातें करते हुए मैं ने उस के संग दोबारा चाय पी. मेरा मूड अब एकदम ताजा हो गया था. हम बातों में इतना खो गए कि गाड़ी कब खिसकने लगी, हमें ध्यान ही न रहा. दोस्त की नजर गई तो हम भागते हुए जो डब्बा सामने दिखा, उसी में चढ़ गए. शुक्र है, सब डब्बे अंदर से जुड़े हुए थे. दोस्त से विदा ले कर मैं अपने डब्बे की ओर बढ़ने लगा. अभी अपने डब्बे में घुसा ही था कि एक आदमी ने टोक दिया, ‘‘क्या भाई साहब, कहां चले गए थे? आप की फैमिली परेशान हो रही है.’’

आगे बढ़ा तो एक वृद्ध ने टोक दिया, ‘‘जल्दी जाओ बेटा. बेचारी के आंसू निकलने को हैं,’’ अपनी सीट तक पहुंचतेपहुंचते लोगों की नसीहतों ने मुझे बुरी तरह खिझा दिया था.

मैं बरस पड़ा, ‘‘नहीं है वह मेरी फैमिली. हर किसी राह चलते को मेरी फैमिली बना देंगे आप?’’

‘‘भैया, वह सब से आप का हुलिया बताबता कर पूछ रही थी, चेन खींचने की बात कर रही थी. तब किसी ने बताया कि आप जल्दी में दूसरे डब्बे में चढ़ गए हैं. चेन खींचने की जरूरत नहीं है, अभी आ जाएंगे तब कहीं जा कर मानीं,’’ एक ने सफाई पेश की.

‘‘क्या चाहती हैं आप? क्यों तमाशा बना रही हैं? मैं अपना ध्यान खुद रख सकता हूं. आप अपना और अपने बच्चे का ध्यान रखिए. बहुत मेहरबानी होगी,’’ मैं ने गुस्से में उस के आगे हाथ जोड़ दिए.

इस के बाद पूरे रास्ते कोई कुछ नहीं बोला. एक दमघोंटू सी चुप्पी हमारे बीच पसरी रही. मुझे लग रहा था मैं अनावश्यक ही उत्तेजित हो गया था. पर मैं चुप रहा. मेरा स्टेशन आ गया था. मैं उस पर फटाफट एक नजर भी डाले बिना अपना बैग उठा कर नीचे उतर गया. अपना वही दोस्त मुझे फिर नजर आ गया तो मैं उस से बतियाने रुक गया. हम वहीं खड़े बातें कर रहे थे कि एक अपरिचित सज्जन मेरी ओर बढ़े. उन की गोद में उसी बच्चे को देख मैं ने अनुमान लगा लिया कि वे उस महिला के पति होंगे.

‘‘किन शब्दों में आप को धन्यवाद दूं? संजना बता रही है, आप ने पूरे रास्ते उस का और टिंकू का बहुत खयाल रखा. वह दरअसल अपने बीमार बाबा के पास पीहर गई हुई थी. मैं खुद उसे छोड़ कर आया था. यहां अचानक मेरे पापा को हार्टअटैक आ गया. उन्हें अस्पताल में भरती करवाना पड़ा. संजना को पता चला तो आने की जिद पकड़ बैठी. मैं ने मना किया कि कुछ दिनों बाद मैं खुद लेने आ जाऊंगा पर उस से रहा नहीं गया. बस, अकेले ही चल पड़ी. मैं कितना फिक्रमंद हो रहा था…’’

‘‘मैं ने कहा था न आप को फिक्र की कोई बात नहीं है. हमें कोई परेशानी नहीं होगी. और देखो ये भाई साहब मिल ही गए. इन के संग लगा ही नहीं कि मैं अकेली सफर कर रही हूं.’’

मैं असहज सा महसूस करने लगा. मैं ने घड़ी पर नजर डाली, ‘‘ओह, 5 बज गए. मैं चलता हूं… क्लाइंट निकल जाएगा,’’ कहते हुए मैं आगे बढ़ते यात्रियों में शामिल हो गया. लिफाफाबंद चिट्ठियों की भीड़ में एक और चिट्ठी शुमार हो गई थी. Hindi Family Story

Hindi Story: रखैल नहीं – श्यामलाल की आंखो में किसका चेहरा नजर आ रहा था

Hindi Story: रात के 10 बज चुके थे. टैलीविजन बंद कर के श्यामलाल बिस्तर पर लेट गए और सोने की कोशिश करने लगे, पर नींद ही नहीं आ रही थी. आंखों के सामने बारबार निम्मो का चेहरा और गदराया बदन आ रहा था.

एक घंटे बाद श्यामलाल ने निम्मो को फोन किया, ‘‘निम्मो…’’

‘हां बाबूजी, क्या बात है? तबीयत तो ठीक है न आप की?’ उधर से निम्मो की आवाज सुनाई दी.

‘‘सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है. जरा आ कर गोली दे दो और बाम भी लगा दो.’’

‘अभी आती हूं.’

कुछ देर बाद निम्मो कमरे में आ गई. सिरदर्द की गोली देते हुए वह बोली, ‘‘यह दर्द कब हुआ बाबूजी?’’

‘‘अभी थोड़ी देर पहले. नींद नहीं आ रही थी. राजू बेटा सो गया है क्या?’’

‘‘हां बाबूजी, हम दोनों ही सो गए थे,’’ निम्मो ने कहा और श्यामलाल के माथे पर बाम लगाने लगी.

कुछ देर बाद श्यामलाल ने अपनी बांहें निम्मो की कमर में डाल दीं.

‘‘बाबूजी, यह क्या कर रहे हैं आप?’’ निम्मो ने चौंक कर कहा.

‘‘कुछ नहीं निम्मो, बस थोड़ा और मेरे पास आ जाओ.’’

निम्मो ने कुछ नहीं कहा. वह श्यामलाल के निकट होती चली गई.

कुछ देर बाद कमरे से निकलते हुए निम्मो ने कहा, ‘‘अब तो आप का दर्द बिलकुल ठीक हो गया होगा?’’

श्यामलाल ने कोई जवाब नहीं दिया. वे सोने की कोशिश करने लगे, पर नींद आंखों से गायब थी. वे पुरानी यादों में खो गए.

2 साल हुए वह एक सरकारी महकमे से अफसर के रूप में रिटायर हुए थे. बेटा दिनेश अपनी पत्नी और बेटे के साथ अमेरिका में था. पत्नी सावित्री के साथ जिंदगी की गाड़ी बहुत अच्छी तरह चल रही थी.

एक दिन काम वाली शांतिबाई एक जवान औरत के साथ आई और बोली, ‘‘आप कह रहे थे कि ऐसी बाई चाहिए, जो सुबह से शाम तक काम कर सके. यह निम्मो?है. घर का सारा काम करेगी. यह हमारे गांव की है. आप किसी तरह की चिंता न करना. इस की पूरी जिम्मेदारी मुझ पर है. इस के साथ

5 साल का एक छोटा बेटा है.

‘‘2 साल पहले इस के पति की एक हादसे में मौत हो गई थी. अब इस का गांव में कोई नहीं है. मैं ने ही इस को यहां बुलाया है.’’

निम्मो ने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया. उन्होंने निम्मो की ओर देखा. गदराया बदन, मोटी आंखें, गोरा रंग, खूबसूरत चेहरा.

निम्मो को काम पर रख लिया गया. वह अच्छे ढंग से घर के काम करती व खाना भी बहुत लजीज बनाती थी.

निम्मो के आने से सावित्री को भी बहुत आराम मिल गया था. वे निम्मो की बहुत तारीफ करती थीं.

कुछ दिन के बाद निम्मो को कोठी में ही एक कमरा दे दिया गया था, जहां

वह अपने बेटे राजू के साथ रहने लगी. पास के एक स्कूल में राजू को दाखिला दिला दिया.

एक दिन सावित्री बीमार हो गईं. इलाज कराने पर भी बीमारी बढ़ती चली गई और पता चला कि उन्हें कैंसर है. इलाज होता रहा, पर सावित्री बच न पाईं.

सावित्री की बीमारी के समय निम्मो ने भी बहुत सेवा की थी. सावित्री के आखिरी समय तक वह साथ रही थी.

अमेरिका से दिनेश सपरिवार आया और कुछ दिन बाद वापस चला गया.

इतने बड़े मकान में श्यामलाल अकेले हो गए थे. निम्मो उन का पूरा ध्यान रखती कि उन को कब क्या खाना है और कौन सी दवा लेनी है.

यादों के समुद्र में डूबतेतैरते उन को नींद आ गई. सुबह श्यामलाल की आंख खुली, तो उन को रात की घटना याद आते ही चिंता हो गई कि निम्मो नाराज हो कर यह घर छोड़ कर न चली जाए, पर ऐसा हुआ नहीं.

श्यामलाल ने देखा कि निम्मो का बरताव बिलकुल सामान्य है. उस के चेहरे पर गुस्सा या नाराजगी नहीं?है.

निम्मो ने श्यामलाल को नाश्ता देते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, रात जो हुआ उस से मुझे डर है कि कहीं बच्चा न ठहर जाए.’’

‘‘ऐसा नहीं होगा निम्मो, मैं बाजार से गोलियां ला दूंगा.’’

उस के बाद जब कभी श्यामलाल का मन होता, तो निम्मो को कमरे में

बुला लेते.

एक दिन श्यामलाल ने कहा, ‘‘निम्मो, यहां रहते हुए तुम किसी तरह की चिंता न करना. जब भी अपने लिए या राजू बेटे के लिए बाजार से कुछ खरीदारी करनी हो, तो मुझ से रुपए

ले लेना.’’

‘‘ठीक है बाबूजी,’’ निम्मो बोली. वह अच्छी तरह जानती थी कि बाबूजी उस पर इतने दयालु क्यों हो रहे हैं.

वह बाबूजी की हर जरूरत जो पूरी कर देती है.

निम्मो यह भी समझती थी कि यहां बाबूजी के पास बहुत अच्छा घर मिल गया है. यहां हर तरह की सुविधा व आराम है.

एक दिन निम्मो रसोई में खाना बना रही थी. रेहड़ी पर सब्जी बेचने वाले सुरेंद्र की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘आलू लो, प्याज लो, भिंडी लो, लौकी लो…’’

सब्जी वाले की आवाज सुनते ही वह बाहर आ गई.

पड़ोस की 2 औरतें सब्जी खरीद रही थीं. एक औरत बोली, ‘‘भई सुरेंद्र, जैसे तुम साफसुथरे रहते हो, वैसी ही तुम्हारी सब्जियां भी बढि़या, ताजा और साफ होती हैं. इन को ज्यादा छांटने की जरूरत नहीं पड़ती.’’

‘‘मैडमजी, हमारा तो एक उसूल है कि जब पैसे पूरे लेते हैं, तो सामान भी बढि़या बेचना चाहिए. इसीलिए तो

मंडी से बढि़या, साफसुथरी सब्जी खरीदते हैं. बेईमानी हमें पसंद नहीं?है,’’ सुरेंद्र ने कहा.

‘‘तभी तो सभी लोग तुम्हारा इंतजार करते हैं,’’ दूसरी औरत ने कहा.

निम्मो सब्जी छांटने लगी, तभी सुरेंद्र ने कहा, ‘‘कैसी हैं आप? और बाबूजी व राजू बेटा?’’

‘‘सब ठीक हैं,’’ निम्मो ने कहा.

‘‘बाबूजी को कौन सी सब्जी

पसंद है?’’

‘‘उन को भिंडी, तोरई, लौकी और करेला.’’

‘‘और आप को?’’

‘‘मुझे तो हर सब्जी पसंद है,’’ निम्मो ने कहा.

निम्मो ने सब्जी लेते समय जब भी सुरेंद्र की ओर देखा तो उसे लगा कि वह कुछ कहना चाहता है.

जब वे दोनों औरतें सब्जी ले कर चली गईं, तो सुरेंद्र ने कहा, ‘‘मुझे आप से कुछ कहना है…’’

‘‘कहो.’’

‘‘क्या आप का मोबाइल नंबर मिलेगा? कुछ जरूरी बात करनी है.’’

‘‘कहो न…’’

‘‘मैं यहां नहीं बता सकता.’’

निम्मो ने अपना मोबाइल नंबर उसे दे दिया. सुरेंद्र ने चलतेचलते पूछा, ‘‘आप से कितने बजे बात हो सकेगी?’’

‘‘रात 9 बजे के बाद,’’ निम्मो बोली और सब्जी ले कर घर में आ गई.

रात के साढ़े 9 बजे निम्मो के फोन की घंटी बज उठी. उस समय वह अपने कमरे में राजू के साथ थी.

‘‘हैलो,’’ निम्मो ने कहा.

‘कौन? निम्मो ही बोल रही हैं न?’ उधर से आवाज सुनाई दी.

‘‘मैं ही बोल रही हूं.’’

‘मैं सुरेंद्र बोल रहा हूं. आप तो जानती हैं कि हम दोनों बिहार के एक ही जिले के हैं. मैं यहां 10 साल से रह रहा हूं. चंदन कालोनी में मेरा छोटा सा मकान है. मेरी 8 साल की बेटी है.

‘मेरी पत्नी की पिछले साल दिमागी बुखार से मौत हो गई थी. बेटी तीसरी क्लास में पढ़ रही है. सब्जी के काम से ठीकठाक गुजारा हो रहा है.’

‘‘अच्छी बात है.’’

‘आप के बारे में मैं शांति आंटी से सब मालूम कर चुका हूं. उन्होंने ही आप को यहां काम पर लगाया था.’

‘‘हां.’’

‘कल मेरी छुट्टी रहेगी. मंडी बंद है. क्या आप मुझ से मिलने नेहरू पार्क आ सकती हैं?’

‘‘क्यों?’’

‘कुछ जरूरी बात करनी है.’

‘‘देखिए, मेरा घर से निकलना जरा मुश्किल रहता है. आप को जो बात करनी है, फोन पर ही कह दो,’’ निम्मो ने कहा. वह जानती थी कि सुरेंद्र उस से क्या कहना चाहता है.

‘आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं. मैं चाहता हूं कि आप पत्नी के रूप में मेरे घर आ जाएं. आप के राजू को पापा व मेरी बेटी को भी मां मिल जाएगी.’

निम्मो चुप रही.

‘क्या मेरी बात से नाराज हो गईं आप? आप चुप क्यों हैं? कुछ

बोलिए न?’

‘‘मैं 1-2 दिन में बता दूंगी.’’

‘एक बात और मैं बताना चाहता हूं.’

‘‘क्या…?’’

‘शादी के बाद आप को कहीं काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. बस अपने छोटे से घरपरिवार को संभाल लेना.’

‘‘ठीक है, बता दूंगी,’’ निम्मो ने कहा और मोबाइल बंद कर दिया.

राजू बेटा सो चुका था. निम्मो बिस्तर पर लेट गई. उस की आंखों के सामने बारबार सुरेंद्र का चेहरा आ रहा था.

अगले दिन निम्मो शांति चाची से मिली. शांति चाची ने कहा, ‘‘निम्मो, मैं सुरेंद्र को 5-6 साल से जानती हूं. उस की बहुत अच्छी आदत है. शराब नहीं पीता. गुटकातंबाकू भी नहीं खाता.

‘‘वह तुझ से अगर शादी करना चाहता है, तो मना मत करना. तुम्हारी जिंदगी की नई शुरुआत हो जाएगी और उस का भी घर बस जाएगा.’’

रात को अपने कमरे में पहुंच कर निम्मो ने सुरेंद्र के मोबाइल पर बात शुरू की, ‘‘हैलो.’’

‘हां निम्मो, कैसी हो?’ उधर से सुरेंद्र की आवाज आई.

‘‘मैं ठीक हूं. आप कैसे हैं?’’

‘मैं भी ठीक हूं. बस आप के फोन का इंतजार कर रहा था. क्या कुछ सोचा है अपने उस नए घरपरिवार के बारे में.’

‘‘मुझे मंजूर है.’’

‘अब हम जल्द ही शादी कर लेंगे,’ सुरेंद्र की खुशी भरी आवाज सुनाई दी, ‘अब मैं ज्यादा दिन आप को अपने से दूर नहीं रखूंगा.’

निम्मो काफी देर तक सुरेंद्र से बात करती रही.

सुबह नाश्ता करने के बाद श्यामलाल अखबार पढ़ रहे थे. निम्मो ने कमरे में आते ही कहा, ‘‘बाबूजी, मुझे आप से कुछ कहना है.’’

‘‘हांहां कहो निम्मो, कुछ रुपयों की जरूरत है क्या?’’

‘‘नहीं बाबूजी, रुपयों की जरूरत नहीं है.’’

‘‘अच्छा बताओ कि क्या कहना है?’’

‘‘बाबूजी, मैं शादी कर रही हूं.’’

श्यामलाल चौंक उठे. अखबार से गरदन उठा कर उन्होंने कहा, ‘‘शादी कर रही हो? लेकिन क्यों?’’

‘‘शादी क्यों की जाती है बाबूजी?’’

‘‘मेरा मतलब है कि यहां तुम्हें किसी बात की परेशानी हुई है क्या? मैं ने कुछ गलत बरताव कर दिया है क्या?’’

‘‘नहीं बाबूजी, आप तो बहुत अच्छे हैं. आप ने इतने दिनों तक मुझे आसरा दिया.’’

‘‘फिर क्यों जाना चाहती हो यहां से? तुम किस से शादी कर रही हो?’’

‘‘वह जो सब्जी का ठेला ले कर आता है सुरेंद्र. वह हमारे ही जिले का है. उस की पत्नी पिछले साल बीमारी में चल बसी थी. उस की 8 साल की बेटी है. शांति चाची ने भी कह दिया है उस से शादी करने को.’’

यह सुन कर उदास व दुखी श्यामलाल ने कहा, ‘‘ओह निम्मो, तुम मुझे अकेला छोड़ कर जा रही हो. तुम ने यह नहीं सोचा कि तुम्हारे बिना मैं अकेला कैसे रह पाऊंगा? तुम मुझ

से कुछ और चाहती हो तो ले सकती

हो, पर मुझे छोड़ कर मत जाओ.’’

‘‘बाबूजी, मैं यहां तब तक ही रह सकूंगी, जब तक आप हैं. उस के बाद मुझे यहां कौन रहने देगा और किस हक से रहूंगी. हमेशा रहने का हक पत्नी को है और मैं यह हक हासिल कर सकूं, ऐसा मैं सपने में भी सोच नहीं सकती, क्योंकि मैं कहां और आप कहां? जमीनआसमान का फर्क है बाबूजी.’’

श्यामलाल चुपचाप सुनते रहे.

निम्मो ने आगे कहा, ‘‘बाबूजी, मुझे जिंदगी ने एक बार फिर मौका दिया है कि मैं अपना घर बसा सकूं. यहां आप के पास रह कर तो मैं एक नौकरानी या रखैल ही रहूंगी न. मैं रखैल नहीं किसी की पत्नी बनना चाहती हूं, जहां मैं अपने बेटे के साथ निश्चिंत हो कर रह सकूं.’’

‘‘अब मेरा क्या होगा निम्मो? इतने बड़े मकान में मुझे तो रातभर नींद भी नहीं आएगी.’’

‘‘बाबूजी, आप अकेले नहीं रहेंगे. शांति चाची से कह कर किसी न किसी बाई का इंतजाम हो जाएगा.’’

‘‘कोई भी आ जाए निम्मो, पर तुम जैसी नहीं मिलेगी, जिस ने मेरी हर खुशी का ध्यान रखा,’’ श्यामलाल ने निम्मो की ओर देख कर कहा.

‘‘बाबूजी, जब तक आप के लिए किसी बाई का इंतजाम नहीं होगा, तब तक मैं आप को अकेला छोड़ कर नहीं जाऊंगी.’’

‘‘निम्मो, तुम ने ठीक ही सोचा है. तुम्हारे सामने 2 रास्ते थे. तुम ने दूसरे रास्ते की ओर सही कदम बढ़ाया है. वैसे भी तुम्हारी सेवाओं को मैं कभी भुला नहीं पाऊंगा.

‘‘और हां, अपने नए घरपरिवार में जाने के बाद कभी भी मेरी मदद की जरूरत पड़े तो बता देना. मैं तो यही कहूंगा निम्मो कि तुम जहां भी रहो

खुश रहो.’’

‘‘बाबूजी, आप कितने अच्छे हैं,’’ निम्मो ने मुसकरा कर श्यामलाल की ओर देखते हुए कहा. Hindi Story

Hindi Kahani: हिजड़ा – क्या श्री से सिया बनने के बाद मुसीबतों का खात्मा हो गया?

Hindi Kahani: लड़की जैसे हावभाव होने पर श्री ने सिया बनने का फैसला ले तो लिया, पर मुसीबतों ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा. ट्रांसजेंडर और हिजड़ा शब्द बारबार उस के कानों में गूंजते. श्री से सिया बनने के बाद क्या मुसीबतों का खात्मा हो गया या फिर सामाजिक व मानसिक सोच में कोई बदलाव आया.

‘छनाक’ की आवाज के साथ आईना चकनाचूर हो गया था. कई टुकड़ों में बंटा हुआ आईने का हर टुकड़ा सिया का अक्स दिखा रहा था.

मांग में भरा सिंदूर, गले का मंगलसूत्र, कानों के कुंडल ये सब मानो सिया को चिढ़ा रहे थे.

शायद समाज के दोहरेपन के आगे वह हार मान चुकी थी.

एकसाथ कई सवाल सिया के मन में उमड़घुमड़ रहे थे.

आईने के नुकीले टुकड़ों में  सिया को उस के सवालों का उत्तर नहीं मिल सका. आंखों में आंसुओं के साथ पिछली यादें किसी फिल्म की तरह सिया की आंखों के सामने से गुजरने लगी थी.

“श्री” नाम था उस का. 20 साल का होतेहोते वह और उस के मांबाप ये समझ चुके थे कि श्री का शरीर भले ही एक पुरुष का हो, पर उस के अंदर आत्मा एक महिला की ही है.

मांबाप ने श्री को कई डाक्टरों और मनोचिकित्सकों को दिखलाया, इलाज भी चला, पर कोई लाभ नहीं हुआ. डाक्टरों ने श्री को ‘जेंडर आइडेंटिटी डिसऔर्डर’ का मरीज बताया, जिस में शरीर तो स्त्री या पुरुष का हो सकता है, पर हावभाव और लक्षण विपरीत लिंग के होते हैं.

श्री के नैननक्श तीखे थे. उस के चेहरे की खूबसूरती और चमक से लड़कियों को जलन होना स्वाभाविक ही था. वह लड़कियों के कपड़े पहनता, उन की तरह हावभाव रखता, गाने गाता और लड़कियों की तरह डांस करना उसे बहुत अच्छा लगता था. किसी से बात करते समय लचकनामचकना श्री की आदत थी. अनजाने में ही श्री के अंदर की स्त्री सहज रूप में उभर कर आती थी.

श्री जीवन के 22वें वर्ष में प्रवेश कर चुका था. बाहर जाने पर भी लड़कियों जैसे कपड़े ही पहनने लगा था वह… मानो अब उसे जमाने के कहनेसुनने की कोई परवाह ही नहीं थी. उस ने अमर नाम का एक दोस्त बनाया था, जिसे वह अपना बौयफ्रैंड कहता था.

अमर को इस बात का अहसास था कि श्री की हरकतें लड़कियों जैसी हैं, पर उसे तो सिर्फ श्री के पैसे से मजे करने थे, इसलिए वह उस के नाज उठाता था. आज वे दोनों श्री का जन्मदिन मनाने के लिए किसी रेस्टोरेंट में जाने वाले थे.

इस खास दिन के लिए श्री ने अपने लंबे बालों को खुला छोड़ा हुआ था और वह सलवारसूट पहने था.

उन दोनों को वापसी में रात के साढ़े 11 बजे गए थे. अमर और श्री एकदूसरे का हाथ पकड़े गाड़ी की पार्किंग की तरफ बढ़ रहे थे.

“अरे लगता है, मैं अपना मोबाइल रेस्टोरेंट में ही भूल आया हूं,” कह कर अमर अंदर की ओर लपक गया, जबकि श्री बाहर ही उस के आने का इंतजार करने लगा था.

एक बड़ी सी गाड़ी श्री के ठीक सामने आ कर खड़ी हुई और उन में से बाहर निकले एक बलशाली लड़के ने श्री को अंदर घसीट लिया और श्री के मुंह पर टेप लगा दिया, ताकि वह शोर न मचा सके. गाड़ी को वे लोग एक निर्माणाधीन बिल्डिंग के पास ले गए और श्री को बाहर घसीटा.

“आज बहुत दिनों बाद कोई चिकना माल मिला है,” श्री के कपड़े फाड़ते हुए एक वहशी बोला, पर अगले ही पल वह बुरी तरह चौंक गया, “स्साला… ये तो लड़की के वेश में लड़का है… क्यों बे साले… लड़की बन कर घूमने में ज्यादा मजा आता है क्या?” दोचार लातघूंसे रसीद कर दिए थे उस वहशी ने श्री के गाल पर.

“अब क्या करें… सारे मूड का तो सत्यानाश हो गया…अब मूड कैसे फ्रेश करें?” दूसरा युवक बोला.

“भाई तुम लोग अपना सोच लो… मुझे तो आज इस लड़के के साथ ही मजे लेना है… कभीकभी स्वाद भी तो बदलना चाहिए न,” इतना कह कर वह युवक श्री के साथ जबरन दुराचार करने लगा और फिर कुछ देर बाद बारीबारी से तीनों दोस्तों ने  भी श्री के साथ मुंह काला किया और उसे तड़पती अवस्था में छोड़ कर वहां से चले गए.

अर्धबेहोशी की अवस्था में श्री कब तक रहा, उसे कुछ पता नहीं था. आंखें खुलीं, तो उस ने अपनेआप को एक अस्पताल में पाया. पुलिस वाले उस के सामने खड़े थे.

“तो आप का कहना है कि आप के बेटे का बलात्कार हुआ है,” पुलिस वाले ने श्री के पिता से पूछा.

“जी.”

“हमें पीड़ित का बयान लेना होगा,” इंस्पेक्टर ने कहा और श्री से कुछ अटपटे सवाल पूछने के बाद जल्द ही कार्यवाही करने की बात कह कर बाहर निकलते हुए पुलिस कांस्टेबल इंस्पेक्टर से कह रहा था, “साहब, ये सब अमीर घर के लड़कों  के चोंचले हैं… पहले लड़की बन कर घूमते हैं और फिर बलात्कार करवा कर हमारे लिए काम बढ़ा देते हैं… साले हिजड़े कहीं के…”

‘हिजड़े…’ यह शब्द गाली की तरह चुभा था श्री को. श्री का कलेजा अंदर तक छलनी हो गया था.

ये पहला मौका था, जब उसे अपने इस दोहरे जीवन जीने के ढंग पर शर्म आई थी.

करीब 5 दिन तक अस्पताल में रहने के बाद श्री अपने मांबाप के साथ घर आया और अपने बौयफ्रैंड अमर को फोन लगाया.

काफी देर बाद अमर ने उस का फोन उठाया और सीधे शब्दों में कह दिया कि श्री के साथ जो हादसा हुआ है, उस से उस की काफी बदनामी हो गई है, इसलिए  वह उस के साथ अब कोई संबंध नहीं रखना चाहता.

जिस दोस्त की अब उसे सब से ज्यादा जरूरत थी, उसी ने उस का साथ छोड़ दिया. ये सोच कर श्री काफी परेशान हो उठा.

श्री ने अपने मर्दाना पर निष्क्रिय पड़े हुए अंग को देखा और नफरत से भर गया. यह पहला मौका था, जब श्री ने अपना लिंग परिवर्तन कराने की बात गहराई से सोची, इस के लिए सब से पहले उस ने इंटरनेट खंगालना शुरू किया. उस के जैसे लक्षणों वाले और बहुत से लोग हैं इस दुनिया में. यह बात उसे पता चली, तो उस के मन को थोड़ा सुकून मिला और गहरे जाने पर श्री को बहुत सी नई बातें पता चलीं. उस में से एक यह बात भी थी कि चिकित्सा के नए स्वरूप में  लिंग परिवर्तन कराना कोई बहुत बड़ी बात नहीं रह गई है और 10 लाख से भी कम खर्चे में भारत में ही रह कर अपना लिंग परिवर्तन कराया जा सकता है.

ये सारी बातें जान कर श्री एक नई ऊर्जा से भर गया था. अपने लिंग परिवर्तन अर्थात अपनेआप को एक पुरुष से स्त्री के शरीर में ढालने की बात जब श्री ने अपने मांबाप से की, तो पहले तो वे सकते में आ गए, पर बाद में उन्होंने  हामी भर दी.

श्री ने लिंग परिवर्तन के लिए विशेषज्ञों से औनलाइन परामर्श लेना शुरू किया, जिन से उसे पता चला कि ये प्रोसेस धीमा जरूर है, पर इस में धैर्य रख कर इसे सफल बनाया जा सकता है, कुछ और जरूरी खोजबीन के बाद डाक्टर मुकेश माथुर से अपना लिंग परिवर्तन कराने के लिए वह गुजरात में उन से मिला और उन के अस्पताल में भरती हो गया.

डाक्टर माथुर ने सब से पहले उसे हार्मोंस के इंजेक्शन देने शुरू किए और थेरेपी व अन्य दवाएं भी देनी शुरू कीं, जिन के असर से कभीकभी श्री परेशान हो उठता. कभी वह मूड स्विंग्स का शिकार भी हो जाता था. स्त्री के स्वभाव के साथसाथ उस का शरीर भी एक का हो जाएगा, ये सोच कर श्री ये सारे दर्द झेलता रहा.

जब कभी श्री परेशान होता, तो वह रोने लगता. ऐसे में उस के मनोचिकित्सक की कमी डाक्टर मुकेश माथुर पूरी करते.

40 साल के डाक्टर मुकेश माथुर शहर के जानेमाने सर्जन थे और चिकित्सा में उन्होंने कई इनाम भी जीते थे. उन्हें मरीज की मनोदशा का अच्छी तरह से पता था. वह  घंटों श्री का हाथ पकड़ कर उस के सिरहाने बैठे रहते और उसे हिम्मत बंधाते. श्री को उन का आत्मिक होना बहुत अच्छा लगता था.

धीरेधीरे दवाएं और हार्मोंस का असर श्री के शरीर पर आने लगा. उस की काया कमनीय हो चली थी. सीने पर उभार आने लगे और शरीर के बाल पतले हो कर गायब होने लगे थे.

और आखिर वह दिन भी आया, जब डाक्टर मुकेश माथुर के द्वारा श्री को स्त्री घोषित कर दिया गया.

डाक्टर माथुर ने श्री को नया नाम भी दिया, “नए शरीर के साथ तुम्हारा नया होगा… सिया.”

अपने नए नाम को बारबार दोहरा रहा था श्री और ऐसा करते समय उस की आंखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे.

“वैसे तो हमारे देश में अब लिंग परिवर्तन की प्रक्रिया आसान हो गई है, पर डाक्टर मुकेश माथुर ने जितने कम समय और बिना किसी साइड इफेक्ट के इस सर्जरी को अंजाम दिया है, काबिलेतारीफ है,” डाक्टरों  के एक पैनल ने सर्वसम्मति से डाक्टर माथुर को “धन्वंतरि अवार्ड” से नवाजा.

श्री से सिया बन कर उस के जीने का अंदाज ही बदल गया था. अपनेआप को घंटों आईने के सामने निहारती रहती थी सिया.

सिया के नाम से नया फेसबुक एकाउंट भी बना लिया था उस ने. सब से पहली फ्रेंड रिक्वेस्ट उस ने अमर को भेजी, एक सुंदर लड़की की फोटो देख कर अमर ने तुरंत ही फ्रेंडशिप स्वीकार कर ली. धीरेधीरे फोन नंबरों का आदानप्रदान हुआ और अमर और सिया में बातचीत होने लगी. सिया ने वीडियो काल कर अमर को अपनी खूबसूरती की एक झलक भी दिखला दी थी.

अमर सिया से मिलने के लिए बेचैन हो उठा और उस ने सिया को मिलने के लिए एक रेस्टोरेंट में बुलाया, फिर उसे बहाने से एक होटल के कमरे में ले गया. उस की मंशा सिया जैसी खूबसूरत लड़की को भोगने की थी इसलिए, पर वह सिया को बातों मे लगा कर उस के कपड़े उतारने लगा. सिया ने भी कोई विरोध नहीं किया. कुछ देर बाद सिया पूरी तरह नग्न हो कर अमर के सामने खड़ी थी.

अमर अपलक सिया को निहारे जा रहा था. सिया को बांहों में भर लिया था अमर ने… जैसे ही सिया के शरीर में अमर ने समाने की कोशिश की, सिया ने उसे जोर का धक्का दिया.

यह देख अमर थोड़ा सा चौंक उठा, “अरे सिया, अब इतना नाटक क्यों कर रही हो?”

“मैं नाटक नहीं कर रही, बल्कि मैं तुम्हें ये अहसास कराना चाहती हूं कि तुम ने क्या खोया  है… ये सिया वही श्री है, जिस को तुम ने एक दिन अपनी बदनामी के डर से ठुकरा दिया था.”

ऐसा कह कर सिया ने झट से कपड़े पहने और कमरे से बाहर निकल गई.

अमर को अपने ऊपर भरोसा नहीं हो रहा था कि ये सब हकीकत थी या कोई छलावा था.

सिया अपने मांबाप के साथ रहने लगी. महल्ले के लोगों को पता चल चुका था कि श्री ही लिंग परिवर्तन के बाद की सिया है, इसलिए  सब उसे अजीब नजरों से देखते थे, कभीकभी सिया के पीछे फुसफुसाती आवाजें सिया को अजीब लगतीं, तो कभी 15-16 साल के लड़के उस के पीठ पीछे “हिजड़ा” बोल कर हंसते हुए चले जाते थे.

पहलेपहल तो सिया ने ध्यान नहीं दिया, पर जब इन चीजों की पुनरावृत्ति होने लगी तो सिया के मन में खटास आने लगी.

“मैं कोई हिजड़ा नहीं, बल्कि मैं तो पूरी औरत हूं,” फुसफुसा उठती थी सिया.

इस दौरान उसे हार्मोन थेरेपी के लिए डाक्टर मुकेश माथुर के पास जाना पड़ता था. उस दिन 14 फरवरी अर्थात “वैलेंटाइन डे” था. डाक्टर माथुर ने हाथों में एक सुर्ख गुलाब ले कर सिया को दिया.

“क्या आप किसी लड़की को लाल गुलाब देने का मतलब जानते हैं डाक्टर?” सिया ने पूछा.

“अच्छी तरह जानता हूं…तभी तो दे रहा हूं,” डाक्टर माथुर ने कहा.

“तुम्हारी सर्जरी करने के बाद मुझे तुम से मिलतेमिलते इतना प्यार हो गया है कि अब तुम्हारे बिना मुझ से रहा नहीं जाता है, इसलिए मैं तुम से  शादी करना चाहता हूं.”

एक ट्रांसजेंडर बनने के बाद से ही सिया एक ऐसे व्यक्ति को ढूंढ़ रही थी, जो उस के साथ शादी करने का साहस जुटा सके और उसे औरत के जिस्म का अहसास करा सके.

सिया डाक्टर माथुर की ये बात सुन कर फूली नहीं समा रही थी. उसे लग रहा था कि उस का सपना साकार हो गया है.

सिया के मांबाप को भला इस फैसले से क्या आपत्ति होती… उन्होंने उस की हां में हां मिला दी.

एक सादा समारोह में डाक्टर मुकेश माथुर ने सिया से शादी कर ली. एक ट्रांसजेंडर की एक डाक्टर से शादी को लोकल समाचारपत्रों ने प्रमुखता से स्थान दिया. सोशल मीडिया पर भी डाक्टर मुकेश माथुर और सिया की शादी खूब सुर्खियों में रही.

शादी के बाद डाक्टर मुकेश और सिया जी भर कर सैक्स का सुख लेने लगे. अपने शरीर को ले कर सिया का हर प्रकार का डर खत्म हो गया था.

आज कुछ मीडिया वाले डाक्टर मुकेश का इंटरव्यू लेने आए थे, जो उन से बारबार वही जानना चाह रहे थे कि एक ट्रांसजेंडर के साथ शादी कर के उन्हें कैसा लग रहा है… पत्रकार  घुमाफिरा कर उन के सैक्स संबंधों के बारे में ही सवाल पूछ रहे थे, उन के हर सवाल का जवाब डाक्टर मुकेश माथुर बड़ी गर्मजोशी से जवाब दे रहे थे.

पत्रकारवार्ता खत्म होने के बाद डाक्टर मुकेश के मोबाइल पर एक फोन आया, जिसे सुन कर वे बहुत खुश हुए और सिया से बोले, “सुनो सिया… मैं ने एक लिंग परिवर्तन करवाए हुए एक लड़के से शादी की है. मेरे इस साहसिक निर्णय के लिए मुझे मानव कल्याण संस्था वाले एक अवार्ड दे रहे हैं,” चहक रहे थे डाक्टर मुकेश. उन को खुश देख कर सिया भी खुश हो गई.

2 दिन बाद ही डाक्टर मुकेश माथुर को जब अवार्ड मिल गया, तो उस ने अपने कुछ डाक्टर साथियों को इस खुशी में घर पर पार्टी के लिए बुलाया. सारा खाना बाहर से मंगवाया गया था और महंगी वाली शराब का दौर चल रहा था. मुकेश के सभी साथी नशे में झूमने लगे थे.

“यार मुकेश… शराब तो तू ने पिला दी, पर शबाब के लिए अपनी उस ट्रांसजेंडर बीवी को ही बुला ले,” एक साथी ने कहा.

“हां यार, बड़ा मूड हो रहा है,” दूसरे साथी ने कहा.

“नहीं यार, भले ही वह ट्रांसजेंडर हो… पर है तो उस की बीवी ही,” दूसरे दोस्त ने बचाव किया.

“इन ट्रांसजेंडर की भी क्या इज्जत और क्या बेइज्जती? ये तो ग्रुप सैक्स के लिए भी राजी हो जाते हैं.”

कमाल की बात यह थी कि डाक्टर मुकेश उन सब की बातों का कोई प्रतिरोध नहीं कर रहा था, बल्कि उन की हां में हां मिला रहा था.

दीवार के पीछे खड़ी सिया ये सब सुन रही थी. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. इतने में सिया ने अपनी पीठ पर किसी का मजबूत हाथ महसूस किया. ये डाक्टर मुकेश माथुर था.

मुकेश सिया को घसीटते हुए अपने साथियों के सामने ले गया और बोला,

“लो दोस्तो, शराब के बाद… शबाब… मजे ले लो इस के.”

“ये आप क्या कर रहे हैं… मैं पत्नी हूं आप की.”

बड़ी ज़ोर से हंस पड़ा था डाक्टर मुकेश माथुर.

“अरे ओ… मैं ने तुझ जैसे हिजड़े… सौरी… ट्रांसजेंडर से शादी इसलिए की है कि मुझे समाज में सम्मान मिल सके… अवार्ड मिल सके… और मैं एक हिजड़े का उद्धार करने वाले डाक्टर के रूप मे जाना जाऊं,” नशे में डाक्टर मुकेश माथुर बुरी तरह हावी हो रहा था, जबकि डाक्टर मुकेश के साथी सिया के कपड़े खींचने में लगे हुए थे और कुछ ही देर में सिया उन सब के सामने नंगी खड़ी हुई फफक रही थी. वह हाथों से कैंची बना कर अपने सीने को ढकने की असफल कोशिश कर रही थी. एक व्यक्ति ने उसे बिस्तर पर गिरा लिया. उस के बाद सभी लोगों ने बारीबारी से सिया के साथ मुंह काला किया और इस घटना का वीडियो भी बनाया, ताकि इस बलात्कार की यादें ताजा रहें.

अगली सुबह जब सिया को होश आया था, तब कमरे में  कोई नहीं था, सिर्फ शराब और सिगरेट की गंध शेष थी.

सिया ने किसी तरह से कपड़े पहने और उस की नजर आईने के टूटे हुए टुकड़ों पर पड़ी, जो उसे चिढ़ा रहे थे मानो कह रहे हो कि तू एक हिजड़ा है… तू एक ट्रांसजेंडर है और तुझे समाज वाले इज्जत की नजर से कभी नहीं देखेंगे…बड़ी चली थी शादी करने… सिया ने भरे मन से टूटे आईने का एक टुकड़ा उठाया और अपनी कलाई की नस को काट लिया. उस की कलाई से खून तेजी से टपकने लगा था. सिया के कानों में अब भी आवाजें गूंज रही थीं… ट्रांसजेंडर… हिजड़ा… हिजड़ा… Hindi Kahani

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