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छोटे लोग : रिटायर्ड फौजी विद्या प्रकाश का दर्द

फौज की नौकरी से रिटायर होने के बाद विद्या प्रकाश ने एक सोसाइटी में चौकीदार की नौकरी कर ली थी. रोजाना की तरह आज भी सुबह तड़के ही उठ कर उस ने कसरत की, पर सैर को नहीं निकला, क्योंकि बाहर रात से ही तेज बारिश हो रही थी. फिर नहाधो कर उस ने वरदी के साथ गमबूट पहने और हैट लगाई. आज भी वह 55 की उम्र में 45 साल का लगता है.

विद्या प्रकाश ने ठीक 8 बजे रसोईघर में झांका. पत्नी राधा अभी नहा रही थी. वह तुनक कर बोला, ‘‘कितनी बार कहा है कि खाना समय पर दे दिया करो, पर तुम्हें कौन समझांए. कभी भी समय की कद्र नहीं करती हो.’’

‘‘5 मिनट रुको, चपाती बनानी है. सब्जी तैयार है. वैसे भी आप की ड्यूटी का टाइम 9 बजे से है,’’ राधा बाथरूम से निकलते हुए बोली.

‘‘मैं लेट हो रहा हूं. पहले मुझे मेजर साहब के बंगले पर भी जाना है.’’

‘‘जल्दी जाना था, तो पहले बता देना चाहिए था,’’ चपाती बनाते हुए राधा बोली.

विद्या प्रकाश निकलने लगा, तो बारिश देख कर छाता लेने अंदर लौट आया. तब तक राधा ने खाने की प्लेट हाथ में दे दी.

‘‘यह क्या तरीका है खाना देने का,’’ राधा को घूरते हुए विद्या प्रकाश ने जल्दीजल्दी गुस्से में थोड़ा सा खाना खाया और बाहर निकल आया.

राधा उस के इस बरताव से झंझला गई और मन ही मन बोली, ‘नौकरी के बाद भी कभी प्यार से बात नहीं की.’

जिस सोसाइटी में विद्या प्रकाश चौकीदार है, उस से एक लेन पहले बड़ीबड़ी कोठियों वाली कालोनी है. वहां 7वें नंबर वाली कोठी के गेट में वह दाखिल हो कर अभी लान में खड़ा ही हुआ था कि उस ने मालिक मेजर साहब को अपनी पत्नी पर चिल्लाते हुए सुना.

एक भद्दी सी गाली देने के बाद मेजर साहब की आंखें गुस्से से लाल हो गईं और नथुने फूल गए. वे गरज उठे, ‘‘तुम अपनी कमाई का जो रोब डालना चाहती हो, वह मुझ पर नहीं चलेगा. आज तुम अगर नौकरी कर रही हो तो मेरी बदौलत. मैं तुम्हें इजाजत नहीं देता, तो तुम घर के बाहर कदम भी नहीं रख सकती थी और आज मुझे जता रही हो कि परिवार का स्टैंडर्ड भी तुम्हारी कमाई से सुधरा है. कहे देता हूं कि अपनी औकात मत भूलो, वरना…’’

पर चौकीदार को सामने देख कर मेजर साहब ने अपनी लाल आंखों और फूले हुए नथुनों को सामान्य करने की कोशिश की और अपनी पत्नी को अंदर जाने का इशारा करते हुए धीरे से बोले, ‘‘तुम अंदर जाओ. ये छोटे लोग होते हैं. इन से मैं बात करता हूं.’’

मेजर साहब की पत्नी इतनी डांट सुनने के बाद अपनी जगह से अभी हिल भी नहीं पाई थीं कि विद्या प्रकाश बगीचे में रखी कुरसी के पास पहुंच गया. वह यह सब देख कर हैरत में था.

मैडम अपने आंसुओं को पी कर बोलीं, ‘‘विद्या प्रकाश, आप बैठिए. मैं आप के लिए चाय बनवाती हूं.’’

‘‘नहीं, मैडमजी. मैं आप से ही बात करने आया हूं. मेरे भाई ने आप को धन्यवाद देने को कहा है. अगर आप ने उस दिन बैंक में उस की मदद न की होती, तो उस की बेटी समय पर होस्टल की फीस न भर पाती.’’

मैडम ने बीच में ही विद्या प्रकाश को रोकते हुए कहा, ‘‘अरे, इस में एहसान मानने की कोई जरूरत नहीं है. उन की मदद कर के मुझे अच्छा लगा था.’’

‘‘ये 10,000 रुपए भेजे हैं उस ने,’’ पैसे थमा कर विद्या प्रकाश हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘इजाजत दीजिए, अब मैं चलता हूं. ड्यूटी पर भी पहुंचना है.’’

रास्ते में विद्या प्रकाश की आंखों के सामने मैडम का आंसुओं को थामे रखने वाला चेहरा छा गया. उन की आंखें उसे अंदर तक झंकझोर गई थीं, लेकिन मेजर साहब के धीरे से फुसफुसाए शब्द ‘ये छोटे लोग होते हैं’ उस के मन में कांच के टूटे टुकड़ों की तरह चुभ रहे थे.

विद्या प्रकाश का मन आज काम में नहीं लग रहा था. उस ने आधे दिन की छुट्टी ली और घर आ गया. घर में राधा सोई हुई थी. उस ने बैंक की पासबुक निकाली और बैंक चला गया.

विद्या प्रकाश बैंक से लौट कर घर आया, तो राधा बेसब्री से उस का इंतजार कर रही थी. वह बोली, ‘‘सुनो, मेरे बैंक अकाउंट में सिर्फ 8,000 रुपए ही थे. देखो, फोन में मैसेज आया है. समझ नहीं आ रहा है. शायद मुझे गलती से किसी और का मैसेज आ गया है. इतने सारे पैसे किस के हैं?’’

‘‘किसी और का मैसेज नहीं है, बल्कि मैं ने ही तुम्हारे अकाउंट में रिटायरमैंट के सारे पैसे ट्रांसफर करवा दिए हैं. अब से मेरी पैंशन भी तुम्हारे ही अकाउंट में आएगी.’’

‘‘पर क्यों…?’’ राधा थोड़ा चौंक कर बोली.

‘‘तू ही रोजरोज बोलती रहती है कि मैं दारू पी कर सारी कमाई उड़ा दूंगा. मैं ने यह झगड़ा ही खत्म कर दिया. न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी.’’

‘‘पर, वह तो मैं कई सालों से बोल रही हूं, फिर आज ऐसा क्या हुआ जो…’’

राधा को बीच में ही टोकते हुए विद्या प्रकाश बोला, ‘‘बस, यह समझ लो कि मुझे आज कोई बड़ी सीख मिली है. असल में मैं ने आज तक जो भी कमाया है, वह तुम्हारे सहयोग के बिना मुमकिन नहीं था. इस पर तुम्हारा हक ज्यादा है. सुबह तुम पर जो गुस्सा किया, उस के लिए माफ कर देना,’’ कह कर विद्या प्रकाश सुकून सा पा गया.

विद्या प्रकाश का मन अब छोटेपन के एहसास से उबर चुका था. उसे अपना कद मेजर साहब के कद से बहुत ऊंचा महसूस हो रहा था.

कुलदीपक : शपांडे साहब का वंश

मुंबई का एक भीड़ भरा इलाका. सुबह के तकरीबन 8 बज रहे थे. शबनम सड़क पर तेजी से चलती चली जा रही थी. रातभर जम कर हुई बारिश ने अब जरा राहत की सांस ली थी. 4 महीने धूप में तपी धरती को अब जा कर कहीं थोड़ा चैन मिला था.

आसमान में अब भी बादलों की लुकाछिपी का खेल चल रहा था. पानी अब बरसा कि तब बरसा, कुल मिला कर यही माहौल बन चला था.

शबनम शिवाजी नगर चौक तक पहुंच चुकी थी. वह अमीर लोगों की बस्ती थी. प्रोफैसर, वकील वगैरह सब के दोमंजिला मकान. शबनम उस दोमंजिला बंगले के सामने जा रुकी, जो देशपांडे का था.

बंगले के सामने खूबसूरत बगीचा था, जिस में चमेली, गेंदा, गुड़हल वगैरह के फूल खिले थे. फूलों की खुशबू का एक ?ोंका शबनम की नाक को छू गया.

शबनम ने दरवाजे की घंटी बजाई. थोड़ी देर बाद एक खूबसूरत अधेड़ औरत ने दरवाजा खोला.

‘‘आप को किस से मिलना है?’’ उन्होंने शबनम से पूछा.

‘‘मैं… मैं शबनम. अम्मां बीमार हैं… इसलिए मैं काम करने आई हूं मैडम,’’ डरतेडरते शबनम एक आवाज में कह गई.

‘‘आ जा फिर भीतर… आ… क्या हुआ तेरी अम्मां को?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘बुखार है,’’ शबनम की आवाज में चिंता थी.

‘‘अरे सुनंदा, कौन है?’’ यह कहते हुए देशपांडे साहब भी अब तक बाहर के कमरे में आ गए थे.

उन्होंने शबनम की तरफ देखा, तो देखते ही रह गए. ऊंची कदकाठी, गोरी, चंपा के फूल की तरह नाक, बिल्लौरी आंखों वाली शबनम.

कुदरत का खेल भी कितना निराला होता है. कीचड़ में कमल खिलता है… शबनम नाम का वह कमल गरीबों की बस्ती में गरीबी से जूझती एक झोंपड़ी में खिला था.

देशपांडे साहब के एक ही बेटा था. वह 16 साल का था, जो मंदबुद्धि था. उस का पुणे के एक मशहूर डाक्टर के यहां इलाज चल रहा था.

पिछले 10 साल से वह वहीं उस डाक्टर की निगरानी में रह रहा था. इतने नामचीन प्रोफैसर का बेटा, बेतहाशा दौलत का मालिक… लेकिन दिमागी तौर पर विकलांग था.

बाहर अब जोरदार बारिश होने लगी थी. शबनम जल्दीजल्दी घर के काम निबटाने में लगी थी. उसे यहां से जल्दी से जल्दी निकल कर अपने घर पहुंचना था. इस बड़े बंगले में उस का दम घुट सा रहा था.

देशपांडे साहब की वह गरम नजर मानो उस के बदन पर डंक मार रही थी. इसी विचार में खोएखोए उस ने सारे काम निबटा डाले.

शबनम जब अपने घर पहुंची, तो अम्मां बैठी उस का इंतजार कर रही थीं.

‘‘अम्मां… अब कैसा लग रहा है?’’ पूछते हुए उस ने अपनी मां को खाना परोसा, फिर दवाएं खिलाईं.

‘‘अम्मां, ये गोलियां खा कर जल्दी ठीक हो जाओ. मुझेअच्छा नहीं लगता यह सब काम करना… अब मेरा कालेज भी शुरू होने वाला है.’’

‘‘क्या हुआ शबनम बेटी?’’ अम्मां को उस की चिंता खाए जा रही थी. जवान बेटी को इस तरह लोगों के घर पर काम करने के लिए भेजना उसे भी अच्छा नहीं लग रहा था, पर कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं था. सच, गरीबी बहुत बुरी चीज है.

शबनम जब 2 साल की थी, तभी उस के अब्बा चल बसे थे. अम्मां ने लोगों के घरों में झाड़ूपोंछा कर के शबनम को पालापोसा, पढ़ाया था. अब वह 12वीं जमात में है. उस की पढ़नेलिखने में बेहद दिलचस्पी है और वह खूब होशियार भी है.

8 दिन हो गए आज. शबनम की अम्मां का बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था. अच्छे डाक्टर के पास दिखाने के लिए पैसे चाहिए, जो उस के पास नहीं थे.

इसी सोच में डूबतीउतरती शबनम देशपांडे साहब के बंगले पर पहुंची. दरवाजे की घंटी दबाई, दरवाजा देशपांडे साहब ने खोला.

‘‘मैडम…मैडम…’’ पुकारती हुई वह भीतर चली गई.

‘‘बंटी से मिलने के लिए वह पुणे गई है,’’ देशपांडे साहब ने उसे बताया. अब देशपांडे साहब घर में अकेले ही हैं. शबनम के मन को एक अजीब से डर ने दबोच लिया.

‘आज किसी तरह जल्दी से जल्दी काम निबटा लूं, कल से नहीं आऊंगी,’ अपने मन को यह सम?ाते हुए वह काम में जुट गई.

वह रसोई में पहुंची. पीछे से देशपांडे साहब भी वहां आ गए.

‘‘शबनम, चाय लोगी?’’ पूछते हुए उन्होंने गैस स्टोव सुलगा कर दूध गरम करने रख दिया. फिर चाय बना कर एक कप शबनम को थमा दिया और एक कप खुद ले कर सुड़कने लगे.

चाय पी कर वे आराम करने के लिए बैडरूम में चले गए.

‘‘साहब, कमरा साफ करना है… आप बाहर आ जाएं,’’ शबनम ने कहा.

‘‘आ ना… आ शबनम…’’ उन्होंने अलसाई सी आवाज में कहा और फिर करवट बदल ली.

लिहाजा, शबनम बैडरूम में दाखिल हो गई. उस के भीतर आते ही साहब ने झट से उठ कर दरवाजा बंद कर लिया और उस के संग जबरदस्ती करने लगे.

उम्र के लिहाज से वह उन की बेटी की तरह थी, लेकिन इनसान की नजर में जब वासना के डोरे उतर आते हैं, तब हैवानियत के कीड़े दिमाग में घुस कर उसे पूरी तरह शैतान बना देते हैं.

बेचारी शबनम उस ताकतवर राक्षस के आगे कुम्हला कर रह गई. उस की अनमोल इज्जत लुट गई.

देशपांडे साहब ने अब उस की अम्मां को इलाज के लिए एक बड़े अस्पताल में ले जा कर दिखा दिया था. वहां उन का अच्छी तरह इलाज चल रहा था, यहां शबनम रोजाना कोल्हू के बैल की तरह पिस रही थी.

8 दिन बाद देशपांडे मैडम अपने बेटे से मिल कर लौट आईं. वे खूब दुखी लग रही थीं.

एक दिन शबनम अपनी अम्मां को फलों का जूस बना कर दे रही थी, अचानक उस का जी मिचलाने लगा. वह बाथरूम की ओर दौड़ी और उलटी कर दी.

अम्मां की अनुभवी निगाहों ने जल्दी ही यह ताड़ लिया कि ये उलटियां सादा नहीं हैं.

‘‘शबनम, क्या हुआ बेटी?’’ अम्मां ने खूब पूछापुचकारा, लेकिन शबनम के मुंह से एक भी बोल न फूटा. बेटी ने अनमोल इज्जत गवां दी, खानदान की नाक कटवा दी, भीतर ही भीतर इस बेइज्जती में घुट कर आखिरकार अम्मां ने दम तोड़ दिया.

शबनम की अम्मां को गुजरे आज 40 दिन हो गए थे. उस ने देशपांडे साहब को अपने घर बुलाया था.

‘‘शबनम, मुझे पता है कि तेरे पेट में पल रहा बच्चा मेरा ही है. मैं इस बच्चे को और तुझे अपनाने को राजी हूं. तू इसे जन्म दे, शब्बो, मुझे वंश चलाने के लिए चिराग दे, कुलदीपक दे…’’ देशपांडे साहब ने भावुक हो कर उस से कहा.

फिर जल्दी ही एक दिन उन्होंने शबनम से एक मंदिर में शादी कर ली. उसे रहने के लिए अलग से एक मकान ले कर दे दिया.

9 महीने बाद शबनम ने एक बेटे को जन्म दिया. देशपांडे साहब को वंश चलाने के लिए चिराग मिल गया था, अपना कुलदीपक.

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जिंदगी औरत की : कल्पना और अहल्या का दर्द

काफी पसोपेश के बाद भी अहल्या तय नहीं कर पाई कि वह कोख में पल रही बच्ची को गिराए या नहीं. वैसे, हालात का खयाल आते ही उसे बच्चा गिराने पर मजबूर हो जाना पड़ता था. वह सोचती कि घर हो या बाहर, गांव हो या शहर, चारों ओर दहशतगर्दी है. दिनदहाड़े हत्याएं और बलात्कार होते हैं. बूढ़ी हो या जवान, किसी भी उम्र की औरत को बलात्कार का शिकार बनना पड़ सकता है.

कुछ दिन पहले ही उस के पिता की उम्र के एक अफसर ने उसे काम के बहाने अपने घर पर बुला कर उस के साथ हमबिस्तरी की ख्वाहिश जाहिर की थी. वह सपने में भी उस बूढ़े से ऐसी हरकत की उम्मीद नहीं कर सकती थी.

तकरीबन 15 बरस पहले उस के ममेरे भाई ने उस के साथ जबरदस्ती की थी, लेकिन वह खामोशी से उस पीड़ा को सह गई थी.

अहल्या सोचती कि लड़की को जन्म देना ही आफत मोल लेना है. लेकिन उस के पेट में पलती बच्ची उस के पति की आखिरी निशानी थी, इसलिए इस बारे में उसे बारबार सोचना पड़ रहा था.

आखिर में उस ने पेट में पल रही बच्ची को गिराने का ही इरादा किया और इस काम में होस्टल की वार्डन कल्पना से मदद मांगी, ‘‘मैडम, आप से एक विनती है.’’

‘‘बोलो, क्या बात है? कैसी मदद चाहती हो?’’ मैडम ने पूछा.

‘‘मुझे पेट गिराना है. मेरे पेट में 3 महीने की बच्ची पल रही है.’’

‘‘तू विधवा है न? क्या किसी ने तुम्हारे साथ बलात्कार किया है?’’

‘‘नहीं मैडम, यह मेरे पति की आखिरी निशानी है. उस को मरे तो सिर्फ 2 महीने हुए हैं.’’

‘‘तो फिर यह बच्चा क्यों गिरवा रही है?’’

‘‘मैं ने जांच करवा ली है. पेट में बच्ची है, बच्चा नहीं.’’

‘‘बच्ची होने से तुझे क्या परेशानी है?’’

‘‘उसे पालनेपोसने से ले कर शादी करने तक झमेला ही झमेला है. हालात इतने खराब हो गए हैं कि ऐसा लगता है, जैसे हम किसी जंगल राज में जिंदगी गुजार रहे हैं. बच्ची जब थोड़ी बड़ी होती है, तो उस की इज्जत बचाने की चिंता हरदम सताती रहती है. इस के अलावा उस की शादी करना भी कितनी बड़ी समस्या होती है.

‘‘औरत की जिंदगी नरक बन कर रह गई है. हमारे जैसे लोग अपनी बच्ची को ऐसी जिंदगी गुजारने को क्यों मजबूर करें. यही सोच कर मैं ने पेट गिराने का फैसला लिया है.’’

होस्टल की वार्डन सोचने लगी कि अहल्या का सोचना बिलकुल सही है. इस में कोई दो राय नहीं है कि औरत को हर उम्र में पीछा करने वालों से सावधान रहना पड़ता है. इस अधेड़ उम्र में भी मेरे जीजा ने किस तरह अपने चंगुल में फंसा कर मेरे साथ बलात्कार किया. उस दिन रात को मैं उस के घर पर मजबूरी में ठहरी थी. दीदी बहुत समय पहले मर चुकी थीं. बालबच्चे सभी दूसरे शहरों में रहते हैं.

मेरे पति ने कहा था कि होटल में न ठहरना, हालांकि मुझे सरकारी खर्चे पर वहां 2 दिन ठहरना था. रात में खाने के बाद जब मैं सोने के लिए दूसरे कमरे में जाने लगी, तो जीजा ने फरमाया, ‘कल्पना, मेरे कमरे में चलो. थोड़ी देर गपशप करेंगे… तुम से बहुत दिनों के बाद भेंट हुई है.’

मैं उन के कमरे में जा कर कुरसी पर बैठ गई. कुछ देर तक बातें करने के बाद उन्होंने पूछा, ‘बहुत ठंड है, मैं तो दूध लेता हूं… तुम क्या लोगी… गरम दूध या चाय?’ मैं ने कहा, ‘कुछ नहीं.’

पर उन्होंने जोर दिया, ‘नहीं, कुछ तो लेना पड़ेगा,’ कहते हुए उन्होंने नौकर को दूध लाने को कहा, लेकिन खुद भी रसोई में चले गए.

मैं ने जैसे ही दूध का गिलास खत्म किया, चक्कर सा आने लगा. उस के बाद मैं होश खो बैठी.

सुबह 4 बजे मेरी नींद टूटी. मैं ने अपने को बिलकुल नंगी हालत में उन की गोद में पाया. मेरे गुस्से और हैरानी की सीमा न रही. अगर मेरे पास पिस्तौल होती, तो मैं उसे गोली मार देती.

मैं ने उसे जगा कर लताड़ा, ‘आप ने यह सब क्या किया…’

‘आप इनसान नहीं, जानवर हैं,’ फिर मैं साड़ी ठीकठाक करने गुसलखाने में चली गई.

गुसलखाने से मैं रोती हुई सीधे दूसरे कमरे में जा कर रजाई ओढ़ कर लेट गई और रोने लगी कि क्या सोचा था और क्या हो गया? अपनी ही बड़ी बहन के घर में मेरा सबकुछ लुट गया.

जी में आया कि अभी इस घर से बाहर चली जाऊं, लेकिन जाड़े के दिन थे. इतनी सुबह बाहर निकलना ठीक नहीं समझा.

फिर मैं सोचने लगी कि कैसा जमाना आ गया है, ऐसी हालत में तो किसी भी मर्द पर यकीन नहीं किया जा सकता. अपनी हवस मिटाने के लिए आदमी कितना नीचे गिर जाता है. उसे अपनी उम्र और रिश्ते का भी खयाल नहीं रहता.

सुबह जब मैं जाने के लिए सामान ठीक करने लगी, तो वह टपक पड़े, ‘कल्पना, कहां जा रही हो?’ मैं ने जवाब दिया, ‘जहन्नुम में.’

उन्होंने माफी मांगी, ‘कल्पना, मुझे अफसोस है.’

‘भाड़ में जाओ.’

‘मुझे तुम से कुछ कहना है.’ ‘मैं अब कुछ सुनना नहीं चाहती.’

‘सिर्फ एक बात सुन लो.’

‘आप को जो नहीं करना चाहिए था, वह तो कर दिया… फिर एक बात कहने में क्यों संकोच है?’

‘तुम्हारी दीदी की मौत के बाद मेरा तो जैसे दिमाग ही खराब हो गया था…’

‘दीदी आप की रंगरलियां मनाने की आदत की वजह से हमेशा दुखी रहा करती थीं… इसी वजह से वे जल्दी ही चल बसीं.’

मेरे तमतमाए चेहरे से आग बरस रही थी. मैं ने नौकर को आदेश दिया, ‘टैक्सी बुलाओ.’

जीजाजी मेरे सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए, ‘कल्पना, यह तुम क्या कर रही हो… जाना ही है, तो ड्राइवर के साथ मैं अपनी गाड़ी से भिजवा देता हूं. टैक्सी से क्यों जा रही हो?’

‘अब आप मेरे साथ बात मत कीजिए…’ मैं ने गुस्से से कहा. तभी अहल्या ने वार्डन को टोका, ‘‘मैडम, कुछ बोल नहीं रही हैं?’’

‘खामोश नहीं हूं, तुम्हारे हालात पर गौर कर रही हूं. एक बुजुर्ग के नाते तुम्हें सलाह देना चाहती हूं. इस में कोई दो राय नहीं कि हम औरतों के लिए घर से ले कर बाहर तक खतरा ही खतरा है, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि हम अपना वजूद ही खो बैठें.

‘‘हमें अपने वजूद के लिए मर्दों के इस समाज से जद्दोजेहद करनी होगी. अगर हम हालात के आगे घुटने टेक कर अपना वजूद खो दें, तो सारी मानव जाति का अंत हो जाएगा.

‘‘इसलिए मैं तुम्हें यही राय दूंगी. कि अपनी कोख में पलती बच्ची को धरती पर आने दो, रोको नहीं, उसे नष्ट मत करो.’’

मैडम की बात पर काफी देर तक गौर करने के बाद अहल्या ने अपना इरादा बदल दिया.

पुरानी यादें, कैसे पढ़ाकू कमला बन गई मजदूरन

आज 2 महीने हो गए थे. देशपांडे साहब ने हमारे घर को बनाने का काम अपने हाथों में लिया था. चूंकि हम जिस घर में रहते थे, वह घर भी हमारे बन रहे घर के सामने ही था, इसलिए वहां पर काम करने वाले मजदूरों, बिल्डर और मैटीरियल सप्लाई करने वाले को मैं अच्छी तरह पहचानने लगा था.

कभीकभार दोपहर के खाने के समय जब वहां पानी नहीं होता था, तब सब मजदूर हमारे घर से ही पीने का पानी ले जाया करते थे.

इन 2 महीनों में मैं ने एक बात पर अच्छी तरह गौर किया कि हर बार मजदूर बदलते रहते हैं, पर एक औरत जो मजदूर का ही काम करती है, पिछले 2 महीने से हमेशा काम पर आ रही है. न जाने क्यों, उसे देखते ही मुझे उस की शक्ल कुछ जानीपहचानी सी लगा करती थी. आज भी वह दूसरे मजदूरों के साथ हमारे घर पानी मांगने आई, ‘‘साहब, जरा पीने का पानी दीजिएगा.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं…’’ उस के लोटे में पानी डालतेडालते मैं ने उस से सवाल किया, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘कमला.’’

‘‘कहां रहती हो? मतलब कौन से गांव की हो?’’ मैं ने एकसाथ 2 सवाल किए.

‘‘मैं केडगांव की हूं. यहां नजदीक ही मालिक के घर के पास रहती हूं,’’ उस औरत ने जवाब दिया.

‘‘तुम्हारे घर में और कौनकौन हैं?’’

‘‘मेरे पति, मैं और डेढ़ साल का एक बेटा है,’’ उस ने जवाब दिया, तभी खाने की छुट्टी खत्म होने की घंटी बजी और दूसरे मजदूरों के साथ वह भी काम पर चली गई. वह औरत तो चली गई, लेकिन मेरे मन में उथलपुथल होने लगी.

मेरा बचपन केडगांव में ही बीता था, इसलिए मैं दिमाग पर जोर डाल कर याद करने की कोशिश करने लगा. इस के बाद भी मुझे कुछ याद नहीं आ रहा था.

दूसरे दिन हमेशा की तरह वह काम पर आई. उसे देखते ही फिर से मेरे दिमाग में हलचल मच गई, ‘कुम्हार महल्ले में रहने वाले यशवंत कुम्हार की बेटी तो नहीं है यह? हां, शायद वही होगी.’

मैं पुराने दिनों में चला गया और मेरी आंखों के सामने घाघराचोली पहने 10-12 साल की एक लड़की का चेहरा उभर आया. सांवला रंग, तीखे नैननक्श, थोड़ी सी शर्मीली, लेकिन होशियार कमला का.

उस समय हम केडगांव में रहते थे. कुम्हार महल्ले के पास ही हमारा घर था. हमारे घर के नजदीक ही येशु यानी यशवंत कुम्हार का छोटा सा घर था. उन की ही बड़ी बेटी थी कमला.

मुझे अच्छी तरह याद है कि उस की चौथी जमात के इम्तिहान का नतीजा आने के बाद वह दौड़ते हुए हमारे घर आई थी और उस ने मेरे पापा को अपना अच्छा रिजल्ट दिखाया था.

इस के बाद मेरे पापा का केडगांव से सोलापुर में तबादला हो गया और हम सब केडगांव का घर छोड़ कर सोलापुर आ गए. कुछ समय बाद पापा की मौत हो गई. मेरी पढ़ाई पूरी हुई. मुझे पूना में नौकरी मिल गई और मैं वहीं का हो कर रह गया.

आज 20 साल बाद वही कमला मुझे फिर से दिखी. उस के काम पर आते ही मैं ने उसे बुलावा भेजा. 30-35 बरस की सांवली, गोल चेहरे वाली, हलके पीले रंग की साड़ी पहने, गले में मंगलसूत्र, हाथों में छोटी सी थैली पकड़े सहमी सी वह मेरे सामने आ खड़ी हुई.

‘‘आओ बैठो,’’ मैं ने कुरसी उस की ओर सरकाते हुए कहा. वह थोड़ी सहम कर चुपचाप कुरसी पर बैठ गई.

‘‘तुम येशु कुम्हार की ही बेटी हो न?’’ मैं ने सच जानने की कोशिश की.

‘‘हां, लेकिन आप को कैसे पता?’’ उस ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘मैं केडगांव के कुलकर्णी का बेटा विजय हूं. हम लोग तुम्हारे घर के सामने ही रहा करते थे,’’ मैं ने खुलासा किया.

‘‘अरे सुलभा, जरा बाहर तो आओ,’’ मैं ने अपनी पत्नी को बुलाया और उस की पहचान कराते हुए बोला, ‘‘यह कमला है, केडगांव में हमारे घर के सामने ही रहती थी.’’

एक मजदूर औरत की इस तरह से पहचान कराना सुलभा को कुछ अटपटा सा लगा.

‘‘यह 10-12 साल की थी, तब मैं ने इसे देखा था. उस के बाद आज देख रहा हूं. कितनी बड़ी हो गई है.’’

तब मेहमाननवाजी के तौर पर सुलभा ने उस के हाथ में चाय का कप थमा दिया. पहले तो उस ने मना किया, लेकिन फिर मेरे कहने पर उस ने चाय ले ली.

चाय पीतेपीते ही मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्यों कमला, तुम तो पढ़ने में काफी होशियार थी, फिर तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?’’

यह सुन कर उस की आंखें भर आईं. जैसेतैसे अपनी चाय खत्म कर वह मेरे सवाल को अनसुना कर के बोली, ‘‘अच्छा तो मैं चलती हूं, वरना मालिक गुस्सा करेंगे.’’

‘‘कोई बात नहीं. मैं उस से बात कर लूंगा, तुम बताओ,’’ मैं ने फिर से वही सवाल किया.

वह कहने लगी, ‘‘आप लोगों के केडगांव से चले जाने के बाद 5-6 साल में ही पिताजी की नौकरी छूट गई. उस के एक साल बाद मां भी चल बसीं.

‘‘मां का गुजरना और नौकरी का छूटना इन दोनों के गम में पिताजी ने अपनेआप को शराब में डुबा दिया. ऐसे हालात में भी मैं ने पढ़ाई जारी रखी.

‘‘नगर में मैं ने कालेज की पढ़ाई पूरी करने के साथसाथ घर चलाने के लिए एक दुकान में सेल्स गर्ल की नौकरी भी की, तभी मेरे मामा ने प्रभाकर के साथ मेरी शादी तय कर दी.

‘‘प्रभाकर 10वीं जमात पास थे और उन की अपनी वर्कशौप थी. वर्कशौप और हमारा घर अच्छाभला चल रहा था, तभी श्रीकांत पैदा हुआ. लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था.

‘‘हमेशा की तरह एक दिन वे वर्कशौप में गए थे. उन्हें एक जौब जल्दी पूरा करना था, पर एक मुलाजिम के छुट्टी पर होने की वजह से उन्होंने खुद ही मशीन पर काम शुरू कर दिया. इसी बीच बिजली चली गई और जौब मशीन में ही अटक गया.

‘‘उस जौब मशीन में से हाथ निकालने की कोशिश करते वक्त अचानक बिजली आ गई और इस से पहले कि वे कुछ समझ पाते, उन के दोनों हाथ मशीन में अटक गए और कुहनी के आगे से बेकार हो गए.

‘‘कुछ दिनों बाद वर्कशौप भी बंद हो गई. हम पर भुखमरी की नौबत आ गई. काम की तलाश में हम पूना आ गए. पड़ोस में रहने वाली एक औरत की पहचान से मुझे यहां काम मिल गया,’’ इतना कहतेकहते उस की आंखें भर आईं. फिर आंखें पोंछते हुए वह जातेजाते हमारे मन को हिला गई.

सुलभा को तो उस पर इतना रहम आया कि उस ने झट से मुझ से कहा, ‘‘आप की तो शहर में कितनी जानपहचान है, दिला दीजिए न इसे कहीं अच्छी सी नौकरी.’’

और फिर मैं ने यों ही अपने एक दोस्त का नंबर डायल किया और कमला के बारे में उसे बताया. उस ने भी तुरंत उसे एक बैंक में क्लर्क की नौकरी दिलवा दी.

उस के बाद एक रविवार को छुट्टी के दिन वह अपने पूरे परिवार के साथ हम से मिलने आई और बातोंबातों में कई पुरानी यादें ताजा हो गईं.

 

कैसेकैसे भरोसे : विधवा सुगनी

दिनभर तहसील के चक्कर काटतेकाटते सुगनी की नसनस बोल गई थी. वह मजबूत कदकाठी की थी. उसे हैरानी होती थी कि दुबलापतला दुलाल चश्मे के शीशे पोंछतापोंछता दिनभर तहसील के चक्कर काट कर भी थकता नहीं, बल्कि तरोताजा नजर आता.

वैसे, यह ताजापन कुछ गांव वालों के काम कराने के एवज में दुलाल की जेब में आए नोटों की गरमी का नतीजा होता था. मगर सुगनी को तब और हैरानी होती, जब वह देखती कि गांव में कलक्टर जैसा रोब जमाने वाला लेखपाल बरामदे में टाट बिछा कर बस्ता खोले दुलाल से हंसहंस कर बातें करता. उस का कानूनगो कुरसी पर बैठा हुक्म मारता और जमीन पर बैठा लेखपाल उस की डांट पर ‘जी साहब’ कहता.

सुगनी को लगता कि यह कितना निरीह इनसान है. पर बाद में दुलाल ने उसे बताया था कि लेखपाल का लिखा राजपाल भी नहीं काट पाता.समय की मार खाई सुगनी को बाद में यह बात माननी पड़ी थी.

सालभर पहले पति की मौत के बाद सुगनी को पट्टे के खेत का कब्जा पाने के लिए चूल्हेचौके से निकल कर तहसीलकचहरी करनी पड़ी, वरना 22 साल की उम्र ऐसी नहीं होती कि देखनेसुनने में भली लगने वाली औरत को छलछंदों की इस दुनिया से रूबरू होने का शौक चर्राए.

अकेली गरीब विधवा समझ कर लोगों ने सुगनी पर लालच का चारा डालना चाहा, पर शिकारी से चौकस चिडि़या की तरह उसे जाल के ऊपर से उड़ जाना आता था.

सुगनी धौंकल सिंह के कहने में रहती तो खुश रहती, मगर उस ने तो बंशी के बाग के पास अकेले में हाथ पकड़ने वाले धौंकल सिंह के मुंह पर थप्पड़ मारते हुए कहा था, ‘जाओ ठाकुर, खैर मनाओ. आज इतने पर ही छोड़ दिया आगे से ऐसा कुछ सोचा भी तो सारी मर्दानगी काट कर फेंक दूंगी.’

सुगनी के हाथ में लहराती दरांती देख कर धौंकल सिंह की घिग्घी बंध गई थी. उस की ऊपरनीचे होती तोंद थरथरा रही थी कि सुगनी कहीं उसी पर न फट पड़े.

वे चले भी जाते और मामला ठंडा भी पड़ जाता, लेकिन पीछे से आते भरोसे ने इस बात को पूरे गांव में फैला दिया और बात चर्चा में आ गई.

बस, इसी की रंजिश में ठाकुर ने अपने चक के पड़ोस की सुगनी के पट्टे की जमीन पर ट्रैक्टर चलवा कर उसे अपने खेत में मिला लिया.

खेत जुतने वाले दिन सही माने में सुगनी को लगा कि वह विधवा हो गई है. पूरे गांव में एक से एक मूंछ वाला आदमी, मगर एक गरीब विधवा के लिए धौंकल सिंह से दुश्मनी कौन मोल ले?

सुगनी का मर्द मौजूद होता, तो क्या ऐसा हो पाता?

खैर, जो हुआ सो हुआ. जो सुगनी के वश में है, करेगी और ठाकुर के जूते को गरदन झांका कर नहीं पहनेगी.

दूसरे दिन वह तहसील गई. जिस लेखपाल ने पट्टा दिया है, अभी मर नहीं गया है. वही फिर नापेगा. आखिर इंसाफ भी कोई चीज है.

पति के साथ बिताए 3 साल के समय के सुनहरे सपनों की दुनिया में भटकी सुगनी जान ही न सकी, कब बबुराडीह की पुलिया आ गई, जहां से तांगा मिलता है.

सुगनी तांगे की ओर न जा कर पुलिया के एक ओर ठिठक गई. तांगे पर बैठे दुलाल ने आंखें मिचमिचा कर कहा, ‘‘भाभी, जल्दी आ जाओ, तांगा चलने  वाला है.’’

सुगनी ने तांगे की ओर नजर डाली. सवारी के नाम पर दुलाल ही बैठा था.

तांगा चलने के साथ ही बातचीत चली. जब दुलाल को सुगनी के इरादे का पता चला, तो उस के मन में बताशे फूटने लगे. पर वह अंदरूनी खुशी छिपा कर बोला, ‘‘भाभी, है तो काम खतरे का, पर मैं तुम्हारी मदद करूंगा.

‘‘मेरी यही तो मजबूरी है, गरीब पर होते जुल्म देख नहीं पाता हूं. बाकी, भाभी क्या कहूं, मुल्क ही भ्रष्ट हो गया है. अहलकार ठाकुर के पैसे के गुलाम जरूर हैं, पर तुम्हारा देवर भी कम नहीं है. ऊपर शिकायत करने की एक धौंस से इन के होश फाख्ता कर देता हूं, पर फिर भी जमाने की हवा देख कर कुछ न कुछ खर्च करना ही पड़ता है.

‘‘ऊपर तक खाते हैं, ये भी क्या करें? हां, यह जरूरी है. औरों के 10 का काम तुम्हारे एक रुपए से चलेगा, नहीं तो मैं गरदन पर सवार हो जाऊंगा और काम करवा कर ही चैन लूंगा.’’

सुगनी को लगा, डूबते को सहारा मिल गया है.

सुगनी बोली, ‘‘मैं इन चक्करों से अनजान हूं. तुम मदद कर दोगे, तो मेरी शान रह जाएगी. बात जमीन की नहीं है, यह तुम्हारे भैया की इज्जत की बात है.

‘‘मेरे पास हजार 5 सौ रुपए हैं, जहां कहोगे, खर्च कर दूंगी. अब तुम्हीं चाहे तारो, चाहे बारो.’’

दुलाल ने कहा, ‘‘अब जब तुम से कह दिया है, तो सम?ो कि इज्जत दांव पर लगा दी है. अव्वल तो तुम्हारा पैसा खर्च नहीं होने दूंगा और खर्च हुआ भी, तो इतना तो बहुत है.’’

उस दिन जब दुलाल सुगनी की बात लेखपाल से कराने गया, तो कैंटीन की चकाचकी और दुलाल की जानपहचान से सुगनी हैरत में आ गई. नाश्ते की मेज पर बैठे दुलाल की दुआसलाम वाले ?ाका?ाक कपड़ों वाले 2 बाबू जैसे लोग तो उस के साथ ही बैठ गए.

दुलाल के साथ सब ने नाश्ता किया, चाय पी और पैसे देने के लिए जब दुलाल ने सौ का नोट निकाला, तो वह उसे परोपकार के लिए निछावर होने वाला लगा.

उस ने सोचा, ‘आज तो उसी के काम के सिलसिले में चायनाश्ता हुआ है, खर्चा दुलाल क्यों ?ोले? यह तो सरासर गलत है. फिर जिन्हें दुलाल ‘बाबूबाबू’ कह रहा है, यह भी तहसील के कारिंदे होंगे और क्या पता, किस घाट पर इन पंडों की जरूरत पड़ जाए. पैसे उसे ही देने चाहिए.’

सौ के नोट में बाकी बचे रुपए पानपुडि़या की भेंट चढ़ने के बाद सुगनी को अपना पेट खालीखाली लगने लगा था. मगर पेट की टूटन के बावजूद वह खुश थी. लेखपाल ने भरोसा दिया था कि आज उसे जरूरी काम से तहसीलदार के पास ही रहना है, कल मामले पर नजर डाल दी जाएगी.

दूसरे दिन कानूनगो की मीटिंग थी. काम नहीं चला, मगर 10-20 रुपए खर्च हो ही गए.

तीसरे दिन छुट्टी थी. चौथे दिन बस्ता खुला, तो बोहनी के नाम पर कुछ देना ही था. 20 का नोट हालांकि हैसियत से कम था, पर दुलाल के रसूख के चलते लेखपाल ने उसे माथे से लगा कर कहा, ‘‘अब सब से थोड़े ही कहसुन कर मिलता है.’’

पता चला, खेत तो सुगनी के मर्द के नाम है, मगर नक्शा मालखाने में है. वहां पड़ते तो 2 सौ हैं, मगर सौ रुपए में काम चल जाएगा.

सुगनी को जमीन हिलती सी नजर आई, मगर उस ने कलेजा कड़ा कर के नोट दुलाल के जरीए लेखपाल के हवाले किया.

शाम को लौटते समय वह दुलाल से बोली, ‘‘तुम्हें कब तक काम हो जाने की उम्मीद है?’’

‘‘जल्दी से जल्दी. सरकारी काम में कभीकभार देर हो भी जाती है, पर तुम्हारे मामले में ऐसा नहीं हो पाएगा. मैं जो हूं, इन अहलकारों के सीने पर सवार होने के लिए,’’ दुलाल ने सीना ठोंक कर कहा.

अगले दिन तहसील में हड़ताल थी. संगठन से गद्दारी कोई अच्छी बात है? हां, घर पर यह काम हो सकता है. वहां 5 सौ रुपए ले कर पैमाइश की दरख्वास्त लिखवा दी गई, जिसे पास कराना दुलाल का काम था.

रुपए खर्च होते, तो काम भी होता. मगर दुलाल ने सुगनी को 2-4 दिन की मुहलत देने को कह कर और काम निबटाए. सुगनी के पूछने पर बताया, वह काम उन्हीं रुपयों में लेखपाल के जिम्मे कर दिया था, कल देखेंगे.

अब सुगनी न रह सकी. उसे दुलाल पर भरोसा था, लेकिन लेखपाल उसे हीलाहवाला करता दिखा. नतीजतन, वह अगले दिन तहसील गई. रास्ते में उस ने देखा कि दुलाल की नजर में उस के लिए सराहना के भाव हैं.

वह कुछ कहना चाहता है, पर संकोच उसे चुप किए है. वह मन ही मन भीग गई. दुलाल के घर में भी कोई दीया जलाने वाला नहीं है. कहीं यही भाव उस के मन में भी तो नहीं है.

दुलाल का चेहरा देख कर उसे लगा, उस का सोचना कतई गलत भी नहीं है. पर सुगनी ने अपने चेहरे पर कोमलता को जगह नहीं दी. उस के चेहरे पर सख्ती ही उस की ताकत है. पर मन में कहीं न कहीं बदलाव हो रहा था. अपनेपन में यह दुख कब तक टिक पाएगा?

तहसील में दुलाल और लेखपाल मिले, तो लेखपाल के चेहरे पर रूखापन था. आज वह किसी मोटे आसामी की जुगाड़ में था. दुलाल ने उस के कान में कुछ कहा, तो वह झाझला उठा.

दुलाल ने चिरौरी की, तो बड़ी मुश्किल से पास के खोखे तक जाने को तैयार हुआ.

सुगनी को बड़ा दुख हुआ कि उस के चलते बेचारा दुलाल खिड़की खा रहा है और काम बिगड़ने के डर से बोल भी नहीं रहा है.

खोखे पर पान खाने के बाद गुमटी के पीछे बतियाते इन दोनों को देख कर सुगनी का मन हुआ, वह भी सुने कि दुलाल उस के लिए क्याक्या चिरौरी करता है. सामने जाना ठीक नहीं रहेगा, यह सोच कर वह खोखे के दूसरी ओर खड़ी हो गई.

सुगनी की मौजूदगी से बेखबर लेखपाल कह रहा था, ‘‘यह हम से नहीं होगा. माल मारो तुम और बदनामी हम उठाएं. या तो उस के रुपए लौटा दो या मुझे दे दो, तो काम हो जाएगा, वरना आइंदा मुफ्तखोरी करने मेरे पास न आना.’’

सुगनी दिनभर की दौड़ की हारीथकी थी, किंतु इतनी टूटन उसे तब तक नहीं आई थी. जिस पर भरोसा किया, जिस के लिए जाने क्याक्या सोचा, वह ऐसा निकलेगा, कौन जानता था. वह वहीं बैठ गई. लेखपाल अपने काम में लगा रहा.

इधरउधर घूम कर दुलाल ने सुगनी से कहा, ‘‘ठीक है भाभी, बात हो गई है. तुम फिक्र न करो. मैं गरदन दबा कर काम करा लूंगा. मेरे पास अकेले में गिड़गिड़ाने लगा, तब मैं ने 2 दिन की मुहलत और दे दी है.’’

शांत बैठी सुगनी का निराश चेहरा एकबारगी सुर्ख हो गया. वह बोली, ‘‘तुम ने समय रहते अपनी असलियत खोल दी. मैं तो तुम्हारे ऊपर इतना भरोसा किए थी कि अपने मर्द की खिलाई कसम पूरी करने वाली थी.

‘‘मरतेमरते उस ने कहा था, ‘सुगनी, जिंदगी में तुम्हें कोई सुख न दे सका, मगर असहाय किए जा रहा हूं. तुम्हारी हालत देख कर मेरा मरना बिगड़ रहा है. वचन दो कि कोई भरोसे लायक आदमी मिले, तो घर बसा लोगी?’’’

सुगनी बोलतेबोलते रुक गई. इतनी खूबसूरत सुगनी के मन में क्या था, दुलाल जान ही न सका था. उस ने कागज के चंद टुकड़ों के लिए सुगनी के भरोसे को ठेस पहुंचा कर अपने घर में खुद आगे लगा ली थी. वह सुगनी की ओर दयनीय नजर से देखने लगा.

सुगनी ने उसे देख कर कहा, ‘‘और तुम मुझे वही भरोसे के आदमी लगे थे.’’

‘‘क्या यह सच है?’’ दुलाल सुगनी के सामने हाथ फैला कर जमीन पर बैठ गया.

‘‘नहीं, अब नहीं है, कुछ देर पहले तक था.

‘‘अब मैं अपनी जंग खुद लड़ूंगी और अपने मर्द के भरोसे को टूटने नहीं दूंगी,’’ कह कर सुगनी एक ओर चल दी.

दुलाल की समझ में नहीं आ रहा था कि वह किधर जाए.

26 जनवरी स्पेशल- जवाबी खत : एक फौजी का अपनी मां को पैगाम

नमस्ते मांजी, चरण स्पर्श.

आप के ‘जवाबी खत’ ने मेरे भटके हुए मन को एकदम सही रास्ता दिखाया है. दिल्ली से तबादला होने पर मैं कश्मीर आया. यहां मुझे आतंकवादियों से निबटने के लिए तैयार किए जा रहे ‘विशेष दल’ के लिए चुना गया.

यहां की रोजमर्रा की जिंदगी में आतंकवाद की काली छाया छाई हुई है. वैसे, मेरी ड्यूटी भारतपाक बौर्डर से सटे एक कसबे में लगी है. यहां बौर्डर पर आएदिन छिटपुट गोलीबारी होती रहती है.

मेरे यहां आने के अगले ही दिन की यह घटना है… शाम को हमें खबर मिली कि कश्मीर में कुछ आतंकवादियों ने शहर के बीच गोलीबारी की है. हम लोग फौरन उस जगह पर पहुंचे. वहां मैं ने देखा कि सड़क के बीच खून से लथपथ कुछ लाशें पड़ी थीं. मशीनगन की गोलियों से छलनी लाशें देख कर मैं भी एक पल के लिए कांप गया.

वहीं एक लाश के पास एक जख्मी औरत बेबस सी बैठी थी. उस की आंखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे. वह लाश उस के पति की थी. पूछने पर उस ने बताया, ‘मेरे पति पर गोलियां दागने के बाद दहशतगर्द मेरी जवान लड़की को जबरदस्ती उठा कर मोटरसाइकिल पर ले गए.’

उस औरत की कहानी सुन कर मैं बहुत दुखी हो गया. मैं ने उसे धीरज बंधाया, लेकिन मन ही मन मैं बेहद डर गया था. सड़क पर मौत का नंगा खेल देख कर मैं इतना डर गया था कि जब अपने कैंप में पहुंचा, तो बिस्तर पर लेटेलेटे सोचने लगा कि जो हादसा मैं ने इन आंखों से देखा है, अगर उस में उस आदमी की जगह आतंकवादियों ने मुझे मार डाला होता, तो आप पर क्या गुजरती? आप की बहू भरी जवानी में विधवा हो जाती.

फिर मैं सोचने लगा कि फौज में भरती होने से बेहतर तो यह होता कि मैं किसी आश्रम में चला जाता. आश्रम की जिंदगी में भागमभाग नहीं होती, कोई किसी का दुश्मन नहीं होता, न ही वहां कोई गलाकाट होड़ ही होती है. आश्रम आमतौर पर कुदरत की गोद में होते हैं, उन के आसपास पहाड़ियां होती हैं. वहां पर ऐसी हरियाली छाई रहती है, मानो कुदरत ने मखमल से धरती का सिंगार किया हो.

आश्रम की हवाओं में आतंकवाद की बू नहीं होती. वहां शांति होती है, सिर्फ शांति. तन की शांति, मन की शांति. जो सुकून आश्रमों में होता है, वह कहीं दूसरी जगह देखनेसुनने को भी नहीं मिलता.

मांजी, दरअसल, आतंकवादियों की इस खूनी कार्यवाही से मैं बेहद डर गया था और उसी डर के बीच मैं ने आप को खत में लिख दिया कि फौज की जिंदगी से तो आश्रम की जिंदगी बहुत सुकून भरी होती है. तब मेरा दिल करने लगा था कि फौज की नौकरी छोड़ कर किसी आश्रम में चला जाऊं.

मांजी, आप का जवाबी खत पढ़ा, तो लगा कि मैं कितना गलत था. मेरे खयालात कितने घटिया और सड़ेगले थे. आप की बातों ने मेरी आंखें खोल दी हैं.

आप ने खत में एकदम सही लिखा था, ‘दुनिया में ऐसा कौन सा आश्रम है, जहां उम्रभर के लिए सुकून मिल सके? दरअसल, तुम्हें अपनी जिंदगी से कुछ ज्यादा ही प्यार हो गया है और तुम मौत से डरने लगे हो, इसीलिए तुम्हें आश्रम की जिंदगी में शांति नजर आ रही है.

‘दरअसल, पहले कुछ दिनों तक हर नई जगह पर अच्छा लगता है, लेकिन उस के बाद वहां से भी मन ऊबने लगता है. मैं भगोड़े या डरपोक फौजी की मां कहलाने के बजाय लड़ाई में मारे गए फौजी की मां कहलाने में अपनेआप को धन्य समझूंगी.

‘अगर तू आतंकवादियों से लड़ते हुए अपनी जान भी गंवा बैठा, तो शहीद कहलाएगा. तब मेरा सिर गर्व से ऊंचा उठ जाएगा. मैं शहीद की मां कहलाऊंगी.’

मांजी, आप का खत पढ़ कर मुझे एक नई रोशनी मिली है. कुछ देर के लिए मैं खुदगर्ज हो गया था, डर गया था, लेकिन अब मेरे दिल से डर कोसों मील दूर चला गया है.

आप का खत पढ़ कर ही तो मैं समझ पाया हूं कि आश्रम की जिस शांति की बात मैं ने मन ही मन सोची थी, वही शांति तो मुझे अपने देश में और खासकर कश्मीर में लानी है.

मांजी, यहां आएदिन आतंकवादियों से हमारी झड़पें हुआ करती हैं. हम लोग जान की बाजी लगा कर उन का मुकाबला करते हैं. नतीजतन, उन को उलटे पैर भागना पड़ता है.

आप को यह जान कर खुशी होगी कि अब कश्मीर में हालात बदल रहे हैं, अमनचैन लौटने लगा है. हम फौजी यहां के लोगों के दिलों में आतंकवादियों का खौफ कम करने में कामयाब हो रहे हैं.

यहां के लोग भी यह बात अच्छी तरह से समझ गए हैं कि आतंकवादियों से डरने से काम नहीं चलेगा, इसीलिए अब वे भी हमारा साथ दे रहे हैं.

मांजी, यहां के लोगों की मदद मिलने के चलते ही कुछ आतंकवादियों ने ‘आत्मसमर्पण’ करना भी शुरू कर दिया है.

अगर हमें इसी तरह इन लोगों का साथ मिलता रहा, तो यकीन करो कि हम कश्मीर की जमीन से आतंकवाद के काले निशान को मिटा कर रख देंगे.

बाकी अगले खत में…

आप का बेटा,

रणवीर सिंह.

झूठ का परदाफाश : क्या टीचर था असली कुसूरवार

अखबार में बड़ेबड़े अक्षरों में छपा था, ‘एक टीचर ने नंगा कर के एक लड़का और लड़की की पिटाई की. टीचर और प्रिंसिपल को हटाने की मांग.’

इस खबर से जिला शिक्षा के अफसर हरकत में आ गए और जीप भर कर स्कूल में जा पहुंचे.

सरकारी अफसर के पहुंचते ही गांव भी उमड़ आया. नए टीचर और पुराने हैडमास्टर को अब नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा.

अफसर ने वहां पहुंचते ही दोपहर का खाना चखा. इस में स्कूल को बेदाग पाया गया. इस के बाद असली सवाल आया कि वह कौन टीचर है, जिस ने बच्चों को नंगा कर के मारा? ऊपर से उंगली तक लगाने की मनाही है और उस ने नंगा कर के पीटा.

गांव के सरपंच के साथ पीडि़त बच्चों के मांबाप ने एक दुबलेपतले टीचर की ओर इशारा किया.

वह टीचर हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘नंगा करने की बात झूठ है. मैं ने जो देखा, उस के लिए फटकारा.’’

गांव वाले चिल्लाचिल्ला कर बोलने लगे, ‘इन्हें सस्पैंड करो. हमें नहीं चाहिए ऐसे टीचर, जो बच्चों को कुत्तेबिल्ली समझ कर मारते हैं. दोपहर का खाना कच्चापक्का देते हैं. हैडमास्टर बरसों से यहीं जमे हैं. इन्हें भी बदलो.’

शिक्षा अफसर बोले, ‘‘आप लोग चुप रहें. जो कुछ कहना है, लिखित में दे दें. हम लोग इसी मामले की जांच करने के लिए आए हैं.’’

इस के बाद वे हैडमास्टर से बोले, ‘‘आप तो पुराने हैं. तजरबेकार हैं. आप ने इस मामले में क्या किया?’’

हैडमास्टर बोले, ‘‘ये जितने लोग चिल्ला रहे हैं, मैं ने सब को पढ़ाया है. जहां तक इन टीचर महाशय की बात है, तो मैं थोड़े दिनों में इन्हें जान गया हूं. ये बहुत ही मेहनती हैं.

‘‘आप को सच का पता लगाना ही है, तो लड़के और लड़की को बुलाएं. उन के मातापिता को बुलाएं. वहां दफ्तर में बैठ कर मैं पूछताछ करता हूं. अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.

‘‘सारे गांव के सामने तमाशा करने की जरूरत नहीं है. आप अपना फैसला फिर सारे गांव के सामने सुना देना.’’

शिक्षा अफसर इस बात पर सहमत हो गए. चौकीदार ने घंटेभर के लिए सब को वहां से हटा दिया.

हैडमास्टर ने लड़की से पूछा, ‘‘क्यों बेटी, किसी ने तुम्हारे कपड़े उतारे थे?’’

लड़की बोली, ‘‘नहीं, ड्रैस ढीली है. बांह से निकल जाती है.’’

हैडमास्टर ने लड़के से पूछा, ‘‘बेटा, सचसच बताना कि तुम वहां दूसरे कमरे में मरजी से गए थे या टीचर ले गए थे?’’

लड़का बोला, ‘‘मरजी से.’’

हैडमास्टर ने पूछा, ‘‘वहां लड़की और तुम थे. तुम दोनों ने क्या किया?’’

लड़का बोला, ‘‘मैं उसे लिटा कर उस के ऊपर लेट गया.’’

हैडमास्टर ने पूछा, ‘‘क्या वहां तुम्हारे टीचर भी थे?’’

लड़का बोला, ‘‘नहीं, बाद में देख कर उन्होंने जोर से डांटा. हम रोने लगे.’’

हैडमास्टर ने पूछा, ‘‘कोई बात नहीं बेटा. एक बात और बताओ. टीचर ने ऐसा करने को कहा था या तुम ने अपने मन से किया?’’

लड़का बोला, ‘‘मन से किया.’’

हैडमास्टर ने पूछा, ‘‘ऐसा कहां देखा, जो नकल करने लगे?’’

बच्चे ने झोंपते हुए कहा, ‘‘रात में पापा को मां के ऊपर ऐसा करते देखा था. हम ने भी वही खेल खेला.’’

हैडमास्टर ने शिक्षा अफसर और मांबाप की ओर देख कर कहा, ‘‘बच्चे की पहली पाठशाला परिवार है. जो देखेगा वही करेगा. परिवार में 2 बच्चे नहीं संभलते, हम 2 सौ बच्चों को संभालते हैं. उन्हें खिलातेसिखाते हैं. ऐसे लांछन लगाना क्या ठीक है?’’

यह सुन कर मांबाप उन के पैरों में गिर गए. वे बच्चे भी लिपट कर टीचर को जैसे बदली कराने से रोक रहे थे. शिक्षा अफसर ने गांव वालों से जाने को कहा.

हैडमास्टर ने सब से हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘भाइयो, आप को कष्ट दिया. आप घर जाएं. गांव के दूसरे भाइयों को समझाएं. अब अफसर जो करेंगे, वह स्वीकार होगा.’’

कुछ लोग जातेजाते बोले, ‘साहब, इन्हें माफी दे दें. ये टीचर यहां से कहीं नहीं जाएं. इन्हें सजा नहीं इनाम मिलना चाहिए. आप भले ही हमें सजा दे दें.’’

तब तक बाबू कागज पर मामला तैयार कर चुके थे. पढ़ कर सुनाया. लोगों से दस्तखत कराए. टीचरों से भी और खुद शिक्षा अफसर ने भी दस्तखत किए.

शिक्षा अफसर बोले, ‘‘आपस में मिल कर गलतफहमियां दूर हो जाती हैं. बच्चों के साथ टीचर और गांव का भविष्य भी दांव पर लगता है. अब मामला ठंडा हो गया है.’’

अगले दिन अखबार में खबर छपी, ‘मामले की जांच की, तो वह झूठा निकला. अफवाह फैलाने वालों को पुलिस ढूंढ़ेगी और उन से सख्ती से निबटेगी.’

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